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सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

, इष्टकल्पना = १०० का वर्ग = १०००० को ८ से और भाज्य से गुणा करने पर १६९ × १०००० × ८ = १३५२०००० । इसके मूल = ३६७७ में इष्ट संख्या = १०० गुणित हर = ८ = ८०० का भाग दे देने से ३६७७ ÷ ८०० = ४ ४७७/८०० यही आसन्न मूल होता है । यदि इष्ट अङ्क की कल्पना = १०००, १०००० इत्यादि जैसे-जैसे अधिक से अधिक इष्ट संख्या कल्पना करेंगे तो आसन्नमूल ४ ४७७/८०० से भी और अधिक सूक्ष्म में आवेगा । उपपत्ति से भी = यदि राशि = य/ल अतः य/ल = (य × ल × महान् इ. अङ्क²) / (य × ल × महान् इष्ट²) (य × ल × म. इ.²) / (ल² × म. इ.²) = √(य × ल × म. इ.²) / (ल × म. इ.) = √(य/ल) = सूक्ष्ममूल = ३६७७/८०० = ४.५९६२५८ दशमलव प्रणाली से भी हो जाता है । अतः सावयव अङ्कों का सूक्ष्ममूल गणित ज्ञान के

( ५ ) भास्कराचार्य की अंकगणित की कुछ प्रतिभाएँ भास्कराचार्य ने लीलावती ग्रन्थ के क्षेत्र व्यवहार में चतुर्भुज क्षेत्र के क्षेत्रफल निका- लने के सम्बन्ध में अपनी सूक्ष्म बुद्धि का परिचय दिया है । एक चतुर्भुज क्षेत्र है । जिसकी दोनों भुजाएँ क्रमशः ५२ और ३९ हैं । जिसकी भूमि आधार ६० के तुल्य है, तथा जिसका मुख २५ हाथ के तुल्य है । प्राचीनों ने इस क्षेत्र को अतुल्य लम्बक कहते हुये इसके दोनों कर्णों को क्रमशः ५६ और ६३ के तुल्य ही कहा है । भास्कराचार्य ने प्राचीनों के इस गणित को एक देशीय गणित कहा है । “ब्रह्म- गुप्ताचार्य” के मत को आगम मानते हुये भी आचार्य ने सिद्धान्त पक्ष स्थापित करने में सङ्कोच नहीं किया है । ब्रह्मगुप्त का निःसंकोच खण्डन भी किया है । भास्कराचार्य का कथन है कि—चतुर्भुज की चारों भुजाओं के मान नियत होने पर भी उसके नियत कर्ण नहीं हो सकते । कर्णों की नियत स्थिति न होने से लम्ब मानों में भी अन्तर पड़ता है, जिससे चतुर्भुज का क्षेत्रफल एक रूप का कदापि न होकर अवश्य अनेक रूप का हो सकता है । जैसे, उक्त अ क ल प चतुर्भुज के अ क और ल क अथवा क कोण की दोनों भुजाओं को भीतर की तरफ संकुचित करने से क ल और क अ भुजाओं के योग ७७ के तुल्य तक कर्ण का परम मान होगा जो ब्रह्मगुप्त के मत से बृहत्कर्ण ६३ के तुल्य मानने पर लघुकर्ण का मान केवल ५६ ही आता है ठीक है, किन्तु भास्कराचार्य का कथन है कि— (१) चतुर्भुज के एकान्तर कोणों के खिंचाव से चतुर्भुज संकुचित होकर त्रिभुज के रूप में परिणत हो जाता है । जैसे एक कोण में लगी हुई दो भुजाओं के योग के तुल्य आधार

का मान हो जाता है । और चतुर्भुज की शेष दोनों भुजाएँ त्रिभुज की भुजाएँ बन जाती हैं । दूसरा संकुचित कर्ण चतुर्भुज के लम्ब से कम नहीं होगा और वे दोनों भुजाएँ आधार से बड़ी नहीं होगी । इस कथन के अनुसार ५६ की जगह पर कर्ण के ३२ मानने से इसी चतुर्भुज का दूसरा कर्ण ७६ २२/२५ आता है । (सामने चित्र देखिये) (२) इसी क्षेत्र को समलम्ब चतु- भुज की स्थिति में रखने से ६० - २५ = ३५ को आधार मानकर, अन्तर्लम्ब त्रिभुज के स्वरूप में ३५ आधार के दो विभागों में एक विभाग का मान ३/५ और दूसरे विभाग का मान १७२/५ होता है । तथा शीर्षकोण से आधार तक लम्ब का मान √(३८०१६ / २५) आता है । आसन्नमूल लेने से लम्ब का मान ३८ २४/२५ आता है । √{(६० - ३/५)² + ३८०१६/२५} आसन्न मूल ७१ १/१८ तथा √{(६० - १७२/५)² + ३८०१६/२५} आसन्न मूल ४६ २/३ यह द्वितीय कर्ण होता है ।

( ७ ) उक्त स्पष्ट विवेचनों से भास्कराचार्य का कथन ("चतुरस्रे तेष्वेव बाहुष्वपरौ च कर्णौ बहुधा भवतः'') इन्हीं भुजाओं में और भी कर्ण हो सकते हैं, तथा इन्ही भुजाओं से निर्मित चतुर्भुज का क्षेत्रफल भी बहुत तरह का हो सकता है यह कथन युक्ति युक्त है। आधुनिक अंक गणित में इस प्रकार की सूक्ष्म देनें यदि हैं तो वह सब भास्कराचार्य की ही हो सकती हैं। यदि नहीं हैं तो गङ्गातट पर भी प्यासे होने की तरह आश्चर्य की ही बात कहनी पड़ेगी। लीलावती में वृत्तक्षेत्र गणित वृत्तक्षेत्र गणित में ब्रह्मगुप्त श्रीपति-लल्लाचार्य प्रभृति गणितज्ञों से भास्कराचार्य का वृत्त का क्षेत्रफल, वृत्त का पृष्ठफल और गोलक्षेत्र का घनफल विशेष उल्लेखनीय हो जाता है। भास्कराचार्य ने वृत्त के व्यास और परिधि का (व्यास × ३९२७) / १२५० = वृत्त की सूक्ष्म परिधि बताया है। लाघव के लिए (व्यास × २२) / ७ = वृत्त की परिधि कही है। क्योंकि ३९२७ / १२५० का स्वल्पा- न्तर मान २२ / ७ कहा है। आधुनिक विकास गणित के युग में व्यास परिधि का सम्बन्ध दशमलीय गणित पद्धति से २२ / ७ = ३·१४२९७ होता है। यह सम्बन्ध भास्कराचार्य का स्थूल सम्बन्ध है। आचार्य ने स्वयं (व्यास × ३९२७) / १२५० से ३९२७ / १२५० = ३.१४१६, यही व्यास परिधि का सूक्ष्म सम्बन्ध कहा है।

( ८ ) भास्कराचार्य के पूर्ववर्ती श्री लल्लाचार्य ने वृत्तफल गुणित व्यास को गोल का पृष्ठ- फल कहा है । गणित की इस महान त्रुटि पर भास्कराचार्य ने गोलाध्याय में बहुत विशद् वर्णन के साथ गोलपृष्ठफल का सूक्ष्म गणित बताया है । उदाहरणतः—किसी वृत्त के व्यास का मान ७ है, उस वृत्त का वृत्तक्षेत्रफल उसका पृष्ठफल और उसी वृत्त का घनफल क्या होगा ? ७ × ३९२७ यतः व्यास = ७ अतः ------------ = वृत्त की परिधि होती है । १२५० परिधि × व्यास ७ × ७ × ३९२७ २४२३ ------------------ = वृत्तफल = ------------------ = ३८--------- । वृत्तफल × ४ = ४ १२५० × ४ ५००० ७ × ३९२७ × ४ × ७ ११७३ कन्दुक जाल की तरह गोलपृष्ठफल = -------------------------- = १५३ = -------- १२५० × ४ १२५० गोलपृष्ठफल × ७ ७ × ३९२७ × ७ × ४ ७ × ३९२७ × ७×४×७ -------------------- = गोलघनफल = ---------------------- = ---------------------------- ६ १२५० × ४ × ६ १२५० × ४ × ६ १३४६९६१ १४८७ = ------------ = १७९ ------------ यह गोल का घनफल हो जाता है । ७५०० २५०० भास्कराचार्य ने किसी वृत्त के ज्या और उत्क्रमज्या = जिसे शर या बाण भी कहते हैं जानने का भी सरल गणित किया है । किसी वृत्त का व्यास = १० और उसमें जीवा = ज्या = ६ है तो उसमें शर क्या होगा ? इसका हल १० ± ६ = १६ × ४ = √६४ = ८ १० - १ = ९, ९ × १ = ९ का मूल = ३, ३ × २ = ६ जीवा हो जाती है । / जीवा \² विलोम गणित से जीवा और व्यास को जानकर ( ------- ) = ९ ÷ १ = ९, ९ + १ = १० \ २ / = व्यास मान स्पष्ट होता है । तथा किसी २००० व्यासमान के वृत्तान्तर्गत समभुज त्रिभुज से समनवभुज क्षेत्र तक की भुजाओं के ज्ञान के लिए, वृत्त के व्यास को क्रमशः १०३९२३······८४८५३······४१०३१ गुणाकर १२०००० से भाग देने पर उक्त त्रिगुणादि नवभुजान्त क्षेत्र की प्रत्येक भुजा ज्ञात हो जाती है । लीलावती में अंकजाल या अंकपाश गणित अङ्कपाश को अंकजाल के रूप में भी निर्देशित किया जा सकता है । आधुनिक विक- सित गणित में इस गणित का महत्वपूर्ण स्थान है । १ से लेकर ९ संख्या तक के अङ्कों के विभिन्न स्थानों से उनके भेद, उनके योग आदि का ज्ञान करने के अध्याय को भास्कराचार्य ने अङ्कपाशाध्याय जिसे अङ्कों के जाल का अध्याय कहा है । उदाहरण से भी अनन्तरूपी भगवान विष्णु का एक सीमित रूप चतुर्भुज (चतुर्बाहु) भी है ।

यद्यपि शंख, चक्र, गदा और पद्म चार आभूषणों १, २, ३, ४ से युक्त-भगवान् विष्णु का १ ही रूप होता है। यदि अन्योन्य हाथों में शंख, गदा, चक्र और पद्म को धारण किया जाय तो भगवान् विष्णु के अखंड १ रूप से अन्य कितने रूप हो सकते हैं इन रूपों को भी गणित से निम्न भाँति जाना जा सकता है। आभूषण संख्या = १, २, ३, ४ अतः १ x २ x ३ x ४ = २४ भेद या भगवान विष्णु के २४ अवतार हो जाते हैं। इसी प्रकार भगवान शंकर के प्रसिद्ध १० आसन या आभूषण धारण की स्थायी स्थिति में सभी आभूषणों का अन्योऽन्य हस्त परिवर्तन से धारण परिवर्तन किया जाय तो अखण्ड एक रूप के अतिरिक्त भगवान शङ्कर के कितने रूप हो सकते हैं ? चूंकि भगवान शङ्कर के दश हाथों में (१) पाश, (२) अङ्कुश, (३) सर्प, (४) डमरू, (५) कपाल, (६) त्रिशूल, (७) खट्वाङ्ग, (८) शक्ति, (९) शर और (१०) धनुष को प्रत्येक हाथ से बदल बदल कर रखने से भगवान शङ्कर के १x२x३x४x५x६x७x८x ९x१० = ३६२८८०० (छत्तीस लाख अठाईस हजार आठ सौ) रूप होते हैं, यह कैसे ? इत्यादि भेदों को सुविधा से समझने के लिये एक छोटे से उदाहरण ८२, और २८ = २८ ३, ९, ८ अङ्कों से बनी संख्याओं को कितने बार लिख सकते हैं और उनका योग भी क्या होगा ? यह एक प्रश्न है। यह छोटा अङ्क जैसे २८ है तो इसे हम २८ और ८२ भी लिखकर इस अंक के भेद = २ और भेद के अंकों का योग = ८२ + २८ = ११० योग कह सकते हैं। जैसे यहाँ पर, अंक २ हैं जिनका योग = १० है, इसलिये १ x २ = २ स्थान = भेद— आगे सूत्र से, (भेद x स्थान / अंकमान) अंकभेद = १ x २ = २, अङ्कयोग = ८ + २ = १०, अङ्कमान ८२ = २ ही अङ्क है। इसलिये (अंकभेद x अंकयोग / अंकस्थान) = २x१० / २ = १० को एक स्थान दाहिनी तरफ बढ़ा- कर लिखने से १० / ११० यही अंकभेद और उनका योग हो जाता है। छोटा अंक होने से स्पष्ट समझ में आ जाता है। २८ की तरह और ८२ की तरह लिख सकते हैं और २८ + ८२ का योग उक्त ११० तुल्य हो जाता है। भगवान विष्णु के रूप भेद = १ x २ + ३ x ४ = २४ अंक योग = १० और अंक- मिति = ४। इसलिए सूत्र से २४ x १० / ४ = ६० को ४ जगह दाहिने एक स्थान बढ़ाकर लिखने से—

( १० ) ६ ० ६ ० ६ ० ६ ० ———————— ६ ६ ६ ६ ० अंकभेद ज्ञानगणित में तुल्य अंकों के पृथक् भेदों से समग्र भेदों में भाग देने से लब्ध तुल्य अंक के सही भेद होते हैं। जैसे—४८५५५ यही अंक है तो पूर्व नियमानुसार १×२×३×४×५ = १२० भेद होते हैं। किन्तु ५५५ इनके १×२×३ = ६ भेदों से १२० में भाग देने से १२०/६ = २० भेद होंगे अतः ४८५५५, ४५८५५, ४५८८५.... २४ के तुल्य लिखकर योग करना कठिन होने से ४+८+५+५+५ = २७ को भेद से गुणाकर अंक स्थान ५ से भाग देने पर (२७ × २०) / ५ = १०८ को एक स्थान से हटाकर ५ जगह लिखकर योग १०८ १०८ १०८ १०८ १०८ १०८ —————————————— १ १ ९ ९ ९ ९ ८ ८ के तुल्य अंक योग हो जाते हैं। आज के युग में गणितविद्या के इस गणितसागर का नाम संभवतः स्टैटिक्स कहा जाता होगा ? भास्कराचार्य इस गणित के विषय में कहते हैं— “न गुणो न हरो, न कृतिर्नघनः पृष्टस्तथापि दुष्टानाम्। गर्वितगणकबहूनां स्यात्पातोऽवश्यमङ्कपाशेऽस्मिन् ॥” अर्थात् इस गणित में गुणन भजन वर्ग रचना··· आदि कोई नियम न होने पर भी गणिताभिमानी, गर्वी गणितज्ञों के लिये यह एक शिर झुकाने का विषय अवश्य हो जाता है। श्री भास्कराचार्य के अप्रतिम गणित पाण्डित्य प्रकाशन पर कुछ विद्वान लेखकों, शोधकर्ताओं ने अपने प्रकाशनों पर “लीलावती” ग्रन्थ के सम्बन्ध में ‘लीलावती’ नामक भास्कराचार्य की कन्या का उल्लेख किया है। जिसे देखकर क्लेश व कष्ट होना स्वाभाविक है। ग्रन्थ के आमूलचूड़ अध्ययन की उपेक्षा होने से लेखकों आदि द्वारा

( ११ ) "लीलावती को भास्कराचार्य की कन्या है" ऐसा कहना बड़ा भ्रामक एवं तथ्यों से बहुत दूर हैं । अतएव उदाहरणार्थ 'लीलावती' ग्रन्थ के कतिपय चमत्कारिक प्रश्नों के हल के साथ यत्र-तत्र आये हुये सम्बोधनों आदि का उल्लेख विज्ञपाठकों के मनन तथा विचारार्थ प्रस्तुत कर रहा हूं— १--अंकों के योग उदाहरण के अवसर पर भास्कराचार्य अपनी 'लीलावती' नामक पत्नी से प्रश्न करते हैं— "अये बाले ! लीलावति ! मतिमति ब्रूहि सहितान् !" इत्यादि २, ५, ३२, १९३, १८, १० और १०० अंकों का एकीकरण कितना होगा ? साथ ही 'शतोपेतानेतानयुत वियुतांश्चापि वद मे । यदि व्यक्ते युक्तिर्व्यवकलन मार्गेऽसि कुशला' । उक्त योगांक को १००० में घटाने से क्या फल होगा ? एक ही श्लोक में अंको के स्थानीय मानो के अनुसार योग और अंतर का अत्यंत सुन्दर उदाहरण उपस्थित किया गया है । ( योग, ३६० इसे १००० में घटाने से अंतर = ६४४ ) २—"सखे नवानां च चतुर्दशानां ब्रूहित्रीहीनस्य शतत्रयस्य । पंचोत्तरस्याप्ययुतस्य वर्गं जानासि चेद्वर्गविधानमार्गम् ॥ उपरोक्त श्लोक में भास्कराचार्य कह रहे हैं कि हे मित्र ( सखे ) यदि तुम वर्ग करने की विधि जानते हो, तो ९, १४, २९७ और १०००५ का वर्ग बताओ ? यदि लीलावती उनकी पुत्री होती तो वे पुत्री या लीलावती सम्बोधन कर सकते थे न कि सखे ! सम्बोधन करते । ३—इसी प्रकार अन्यत्र भी सखे ! सम्बोधन का व्यवहार किया गया हैं । "नवघनं त्रिघनस्य घनं तथा कथयस्यपञ्चघनस्य घनञ्च में । घन पदं च ततोऽपि घनात्सखे । यदिघनेऽस्ति घना भवतो मतिः ॥ अर्थात हे सखे घनमूल जानने में यदि तेरी बुद्धि घनी है तो ९ का घन और ३ के घन का २७ का घन का और ५ के घन १२५ का घन आगत अंको का धनमूल भी बताओ । ४—व्यस्त गणित के उदाहरण में— यस्त्रि घ्नस्त्रिभिरन्वितः स्वचरणैर्भक्त स्ततः सप्तभिः स्वत्र्यंशेन विवर्जितः स्वगुणितो हीनो द्विपञ्चाशता । तन्मूलेऽष्टयुते हृतेऽपि दशभिर्जातं द्वयं ब्रूहि तं राशिं वेत्सि हि चंचलक्षि ! विमलं बाले ! विलोमक्रियाम् ॥

( १२ ) वह कौन सी राशि है जिसे ३ से गुणा कर उसमें अपना ३/४ जोड़कर ७ से भाग देकर उसीका तीसरा भाग उसमें घटाकर शेष के वर्ग में ५२ घटाकर उसके मूल में ८ जोड़कर १० से भाग देने पर वह अंक २ होता है। हे बाले हे चंचलाक्षि यदि तुम विलोम विधि गणित जानती हो, तो वह राशि बताओ । यहाँ राशि का स्वांश अधिक या न्यून की जगह पर युत में ३/४ की जगह ३/७ और ऋण में १/३ की जगह १/२ समझिये । २ × १० = २०, २० - ८ = १२, ( १२ )² = १४४, १४४ + ५२ = १९६, १९६ का मूल = १४, १४ + १४/२ = २१ और २१ × ७ = १४७, १४७ - (१४७ × ३)/७ १४७ - ६३ = २८ यह दृश्य राशि उत्तर होता है । आचार्य ने जो व्यस्त गणित का सिद्धांत बताया है, तदनुसार उत्तर के साथ यहाँ पर भी सम्बोधन में चंचलाक्षि ! बाले ! आदि सम्बोधन लड़की को सम्बोधन कहना उचित नहीं है । ५—विश्लेष जाति का उदाहरण— “पञ्चांशोऽलि कुलात्कदम्बमगम”दिति — “हे मृगाक्षि ! हे कान्ते”!''''इत्यादि सम्बोधनों से बोधिता पत्नी ही कही जायेगी । भ्रमर समूह से उड़कर भ्रमर समूह का १/५ कदम्ब पुष्पों में, १/३ शिलीन्ध्र पुष्प में दोनों का त्रिगुणित अन्तर कुटज पुष्प में चला गया, जब उसी भ्रमर कुल में शेष १ भ्रमर रह गया तो वह भी अपने परिवार वियोग में उड़कर पारिवारिक सदस्यों की गवेषणा कर ही रहा था एक स्थल पर केतकी और मालती पुष्प वृक्षों ने उस भ्रमर को आकृष्ट किया जब वह मालती में पहुँच ही रहा था तो द्वेष से केतकी के गहन सुगन्धाकर्षण ने उस भ्रमर को अपने में आकृष्ट कर लिया और केतकी तक पहुँच, स्पर्श को समझ कर मालती ने पुनः ऐसा सौरभ फैलाया कि भ्रमर पुनः मालती की ओर आही रहा था कि पुनः केतकी की हरकत शुरू हो गयी, तात्पर्य कि भ्रमर आकाश में केतकी और मालती के मध्य में एक दूसरे के संदेश वाहक ( दूत ) की तरह हो गया । बताओ भ्रमर संख्या क्या थी···गणित सरल है १५ उत्तर आता है पर साहित्यक दृष्टि से यह स्पष्ट हो रहा है कि दो भार्यायों के बीच का नायक अकर्मण्य हो जाता है । एक पत्नी व्रती ही सुखी रहता है, इत्यादि साहित्य के रस प्रवाह का अंकगणित लड़की को पढ़ाया जाना क्या संभव है ? मर्यादा का ख्याल होना चाहिए, पत्नी के साथ ही यह रसास्वाद सम्पन्न अंकगणित का व्याख्यान समीचीन होता है ।

( १३ ) गणित का यह निम्न उदाहरण यदि प्रक्षिप्त है तो भी तथा कुछ विद्वान् इस पद्य गणित को भास्कराचार्य की ही कृति कहते हैं । ६—कामिन्या हारवत्याः सुरतकलहतो मौक्तिकानां त्रुटित्वा । प्राप्तः षष्ठः सुकेश्या गणक दशमकः संगृहीत प्रियेण ॥ इत्यादि हे गणितज्ञ ! सुरत कलह में किसी कामिनी की मोतीमाला के टूट जाने से उस का १/३ जमीन पर १/५ विस्तर पर और १/६ कामिनी को, १/१० स्वामी ( पतिको और शेष ६ तागे में गुथे रह गये तो मोती संख्या क्या थी ? क्या इस प्रकार के प्रश्नोत्तर लड़की को पढ़ाये या लड़की से पूछे जा सकते हैं । ७—"बाले ! मरालकुल मूल दलानि समतीरे" इत्यादि हे बाले ! किसी सरोवर के हंस समूह का ७/२ क्रीडा की थकावट के शिथिलगमन से सरोवर के तट पर देखा गया, शेष हंसों को जल में क्रीडा कलह करते देखा गया तो हंस कुल का प्रमाण संख्या क्या है ? मूल संख्या का गुणक ७/२ और दृश्य = २, गणित क्रिया से ५६/१६ में + २ गुणकार्थ ७/२ × १/२ = ७/४ का वर्ग ४९/१६ में दृश्य २ का योग ८१/१६ का मूल = ९/४ में गुणकार्थ ७/४ + जोड़ने से १६/४ = ४ का वर्ग = १६ हंस संख्या यही हंस कुल प्रमाण होता है । ८—पुनश्च लड़की से नहीं स्त्री से ही प्रश्न और गणित कौशल सूचक उदाहरण और क्रिया — वर्षा ऋतु के समय हे बाले ! हंस कुल का दश गुणित मूल मानस सर में और उसी का १/८ जल के किनारे से उड़कर स्थल कमलिनी वन में, शेष ३ हंस का जोड़ा ( = ६ ) कोमल कमलनाल सुशोभित जल में क्रीड़ा की लालसा के देखे गये तो हंस संख्या क्या है ? उत्तर १ - १/८ = ७/८ । ६ ÷ ७/८ = ४८/७ = नूतन दृश्य, तथा १० ÷ ७/८ = ८०/७ नया गुणांक, ८०/७ ÷ २ = ४०/७ का वर्ग = १६००/४९ में ४८/७ को जोड़ने से १९३६/४९ का मूल = ४४/७ अतः ४०/७ + ४४/७ = ८४/७ = १२ का वर्ग हंस कुल प्रमाण = १४४ होता है । ९—अपि च स्त्री से सम्बन्धित गणित और उत्तर— अलिकुलदलमूलं मालती यातभृङ्गौ — निखिल नवम भागाश्चालिनीं भृङ्गमेकम् निशिपरिमललुब्धं पद्ममध्ये निरुद्धम् रणति प्रति रणन्तं ब्रूहि कान्ते ! ऽलिसंख्याम् । हे कान्ते ! भ्रमर झुण्ड का १/९ भाग तथा झुण्ड का १/२ के मूल के बराबर मालती पुष्प पर गये, सुगन्धि के प्रलोभन से कमल पुष्प कोश में ग

रात भर गूंजते हुए एक भ्रमर के साथ बाहर को एक भ्रमरी पुष्प के भीतरी भ्रमर से युद्ध सा ही करती रही । सूर्योदय के समय भीतरी भ्रमर पुष्प से बाहर होने पर दोनों का संगम हो सका तो भ्रमर संख्या क्या थी ? यहाँ पर मूल गुणक = १/२, भाग = ८/९, दृश्य = १ । प्रथम प्रकार की क्रिया १ - ८/९ = १/९, १ ÷ १/९ = ९ = नूतन दृश्य १/२ ÷ १/९ = ९/२ = नूतन मूल गुणक, अतः गुणार्ध = ९/४ । (९/४)² + ९ = ८१/१६ + ९ = २२५/१६ का मूल = १५/४ अतः १५/४ + ९/४ = २४/४ = ६ का वर्ग = ३६ यह राशि का आधा होता है । अतः यदि राशि / २ = ३६ तो राशि = ७२ सिद्ध होती है । १०—त्रैराशिक गणित में भी आचार्य का परिष्कार कैसा व्यावहारिक है, यह देखने योग्य है— यदि सोलह वर्ष की स्त्री अपेक्षित काल में ३२/ प्राप्त करती है तो २० वर्ष की स्त्री कितना द्रव्य प्राप्त करेगी ? यद्यपि त्रैराशिक के साधारण नियम के

( १५ ) जिसके समग्रगणित व्यवहार दोष शून्य हैं, ऐसी सर्वांग शुद्ध लीलावती नाम की पुस्तिका जिन्हें कण्ठस्थ हो उनकी सुखद गणित सम्पत्ति सदा वर्धमान होती है । अथवा और भी एक अत्यन्त स्पष्ट अर्थ होता है कि, सुन्दर गुण, वर्ग जाति आदि से विभूषित अंग की, अत्यन्त पवित्र व्यवहार युक्त कण्ठसक्ता (स्त्री, वामा, भार्या, अर्द्धाङ्गिनी) पति प्रिया तथा विनोद जिसमें विद्यमान हो ऐसी सुन्दर सरस भाषिणी या सुन्दर सरस युक्तियों की दृष्टांत दायिका लीलावती (भार्या) गृहिणी अपने अति सुन्दर रूप से जिन गृहस्थों के घरों को अलंकृत करती है, उन गृहपतियों की सुख सम्पत्तियाँ (पुत्र, मित्र, बन्धु, लक्ष्मी) सदैव वर्द्धमान और स्थिर होती हैं। जैसे - "येषां सुजातिगुणवर्गविभूषिताङ्गी शुद्धाखिलव्यवहृतिः खलु कण्ठसक्ता । लीलावतीह सरसोक्तिमुदाहरन्ती तेषां सदैव सुखसम्पदुपैति वृद्धिम् ॥" इस प्रकार हम यह देखते हैं कि भास्कराचार्य की इस प्राचीन शुद्ध अंकगणित प्रक्रिया के नवीन अविष्कारों से सुसज्जित ग्रन्थ का नाम स्त्रीलिङ्ग में अति सुन्दर "लीलावती" नामकरण आचार्य ने अपनी अनन्य प्रियतमा आर्द्धाङ्गिनी पतिलीला- नुरागिणी के लिये किया है। फलतः लीलावती नाम्नी महागणित विदुषी आचार्य भास्कर की धर्म पत्नी हो सकती है या कही जानी चाहिये । एक संभावित कल्पना यह भी हो सकती है कि ऐसी महान् विभूतियों में लौकिक सम्पत्ति कम देखी गई है। अनपत्य (सन्तानहीन) होने से भी पति पत्नी का या पुरुष प्रकृति का ब्रह्म रूप में साक्षात् विलय हो जाता है, जैसा भास्कराचार्य को भी यदि हुआ होगा तो भी राष्ट्र की भविष्य की समग्र शिक्षित सन्तानें उन्हें स्मरण करती हुई दीर्घ समय तक अपनी श्रद्धाञ्जलियां समर्पण करती रहेंगी। जैसा भास्कराचार्य के जन्म शक १०३६ से आज के वर्तमान शक १८८५ तक प्रत्येक शताब्दी से भास्कराचार्य के ग्रहगणित को आधार मानकर अपनी-अपनी बहुविध रचनाओं से विद्वानों ने आचार्य का धवल यश दिग्दिगन्त तक पहुँचाया है।

सिद्धान्तशिरोमणि में बीजगणित

भास्कराचार्य के बीजगणित में (१) अवर्गाङ्क अङ्कों का मूल ज्ञात करने के नियम, (२) कुट्टक गणित की अनेक विशेषताएँ, (३ वर्ग प्रकृति गणित में याग अन्तर की भावनाओं से कनिष्ठज्येष्ठ के ज्ञान के अनेक नियम, (४) एक वर्णसमीकरण के पञ्चकशत- दत्तधनात् इत्यादि के उदाहरण में कल्पना लाघव से व्यक्त मान ज्ञात करने की युक्तियाँ, (५) त्रिभिः पारावता पञ्च इत्यादि उदाहरण में क्रिया लाघव से कपोतादि मान ज्ञात करने की विधि, (६) की राशो वद पञ्चषट् क विहतात्रित्यादि उदाहरण में क्रिया संकोच का कल्पना कौशल, (७) वर्ग समीकरण में विविध मान प्रदर्शन के सिद्धान्त का प्रतिपादन,

? Wait, let's look at the dash between and + ३: Wait, does it have two bars? No, it looks like a single bar - or a very thin =. Wait, let's look at ० - ३ - + ३: Could it be ० - (- ३) = + ३ where ( and ) are missing? Wait, in transcription, our instruction is: "Transcribe the text on this ancient Indian astronomy / mathematics / Jyotisha shastra page line by line into pure, clean Markdown in Unicode Devanagari. Include all Sanskrit shlokas, sutras, mathematical derivations, tables, numerical examples, Hindi translation, commentary, and footnotes. Prefix each line with line marker like , . Output line markers for every line. Do NOT output LaTeX math syntax."

Let's carefully inspect every line from to :

( १६ ) (८) आचार्य पद्मनाभ के बीजसूत्र का व्यभिचार प्रदर्शन, (९) अनेक वर्ण मध्यमाहरण के 'यत्स्यात्साम्पवधार्धतो धन पदम्' इत्यादि उदाहरण में राशि कल्पना की अपूर्व युक्ति Wait, in line 3: 'यत्स्यात्साम्पवधार्धतो धन पदम्' Let's check the letters: य त् स्य ा त् स ा म् प व ध ा र

( १७ ) ०, भाजक = ० लब्धि = ० तथा भाजक = १, भाज्य = ० तो लब्धि = ३ इसी प्रकार (०)² = ० तथा शून्य का मूल = शून्य । यदि अ क तो अ² = क² तथा अ² - क² = ० = (अ + क) (अ - क) चूंकि अ - क = ० अतः ०/० = अ² - क² / अ - क = अ + क अथवा अ² - क² / अ² - क² = १ यहाँ इस प्रकार से ऐसा मान भी अनन्त की तरह हो जाता है । इस प्रकार के मान से अनन्तत्व का भास होने लगता है । यदि - अ ± १ करते हैं तो योग = ० अर्थात् यह संख्या ० से भी कम है तथा अ² ÷ ० = लब्धि = अनन्त । यदि शून्य से कम

  • अ से भाग देंगे तो लब्धि = अनन्त से भी अधिक होती है । अतः अ² / - अ = - अ, यह संख्या अनन्त से भी अधिक हो जाती है । "गुरूणां गुरु म० म० सुधाकर द्विवेदी ने इस सम्बन्ध में लिखा है— "अत्यल्पमानमुपलभ्य सकृत्प्रकृत्या मानं महाधिकमनन्तमितैर्यदेति । मूलञ्च नो मिलति यस्य रसातलेऽपि तस्मै नमोऽच्युतकलामहितेऽधनाय ॥" प्रकृतितः अत्यन्त अल्पमान प्राप्ति के साथ जिसका मान महान् से महान् अत्यधिक अनन्त तक हो जाता है और, जिस - ० का मूल लाने का कोई भी सिद्धान्त कहीं रसातल में भी नहीं है, ऐसे सदास्थायी, शाश्वत अधन (ऋण) शून्य या शेषस्थायी श्री विष्णु को नमस्कार है । इत्यादि तक कह दिया है । वर्ग और वर्गमूल प्रसिद्ध होते हुए भी अ ४ - ६ का वर्ग क्या है तो उत्तर = १६ अ² - ४८ अ + ३६ अ², १६ अ² - ४८ अ + ३६ अ² का मूल = ४ अ - ६ । जिन संख्याओं का पूर्णतया वर्गमूल नहीं मिलता है उन अवर्गाङ्कों का नाम करणी = क संकेत से जाना गया है अतः इस स्थल पर आधुनिक चिह्न करणी अवर्गाङ्क = √ है । अङ्कों का योग अन्तर, गुणन, भजन, वर्ग ओर वर्गमूल ६ प्रकार की गणित क्रिया में २ और ८ अङ्कों के मूलों का योगान्तर क्या है तो उसकी ऐसी गणित क्रिया कही जा रही है जैसे— √२ + √८ को करणी को मूल चिह्न की जगह "क" रखने से क २ + क ८ का मान ज्ञात करना है इसके लिए भास्कराचार्य और पूर्ववर्ती ब्रह्म गुप्तो ने सिद्धान्त (आविष्कार) रचना की है कि, करणियों का साधारण अङ्कों की तरह योग का नाम = महती और करणी संख्या x करणी संख्या (योगान्तर ज्ञान के लिये द्वित्रि''''करणी'''से प्राप्त अङ्क) का मूल द्विगुणित = लघु मान कर साधारण अङ्क की तरह महती ± लघु = करणियों का योगान्तर हो जाता है । उक्त उदाहरण में (क.२ क.८) का योग = १० = महती दोनों के २

( १८ )

गुणनफल ८ × २ = १६ का मूल = ४ × २ = ८ = लघु । अतः महती ± लघु = योगान्तर = योग = क १८ । अन्तर = क. २ होता है । इसी प्रकार क ३ + क २७ से २७ + ३ = ३० महती, √२७ × ३ = ८१ का मूल × २ = ९ × २ = १८ = लघु अतः ३० ± १८ - क. ४८, क = १२ अथवा क ३ ± क ७ से लघु = १०, क ३ × क ७ = २१ का मूल नहीं मिलने से क ३ ± क ७ = क ३ ± क ७ यथावत् उत्तर होता है । "पृथक् स्थितिस्याद्यदिनास्तिमूलम्" कहा भी है । करणी अर्थात् अवर्गाङ्क अङ्कों का गुणन— गुण्य क २ + क ३ + क ८ को गुणक क ३ + ५ से गुणा करिये अवर्गाङ्क का सजातीय रूप ५ = क २५ समझ कर यदि सम्भव हो तो गुण्य गुणक में दी हुई कर- णियों का योग वियोग कर तब गुणा करने से गुणक के क २ + क ८ = क १८ अतः क १८ + क ३ से गुण्य क ३ + क २५ । यहाँ पर स्वतन्त्र रूप ५ = क २५ । क ३ + क २५ क ३ + क १८

क ९ + क ७५ + क ५४ + क ४५० । यहाँ पर क ९ अर्थात्— √९ = ३ होने से उत्तर = ३ + क ७५ + क ५४ + क ४५० गुणन की विलोम क्रिया से गुणक को = भाजक और गुणनफल को = भाज्य मानकर भाज्य में भाजक से भाग देने पर गुणांक ज्ञात हो जाता है । बीजगणित में कुट्टक गणित संक्षेप से कुट्टक गणित दिखाया जा रहा है । धान से चावल निकालने के लिये बार बार धान को कूटना पड़ता है इसी अभिप्राय से "कुट्टतीति कुट्टकः" इस गणित का नामकरण कुट्टक हुआ । प्रश्न है कि २२१ को किससे गुणा करें, और उस गुणनफल में ६५ जोड़ दें, और उसमें १९५ का भाग दें, तो वह संख्या निःशेष हो जाती है । प्रश्नानुसार भाज्यमान = २२१, हार या हर का मान = १९५ जोड़े जाने वाले अंक का मान क्षेपक = ६५ "भाज्यो हारः क्षेपकश्चापवर्त्यः केनाप्यादौ संभवे कुट्टकार्थम्" इत्यादि सूत्र से बड़े अंकों में यदि किसी १ अंक का अपवर्तन लग जाय तो गणित लाघव के लिए अपवर्तनाङ्क समझकर उससे अपवर्तन देना चाहिए । ध्यान रहे जिस अंक से भाज्य हार कट जाते हैं उस अंक से क्षेप में पूरा अपवर्तन लगना चाहिए, नहीं तो प्रश्न ही अशुद्ध समझा जाना चाहिए । अपवर्तनाङ्क की गवेषणा का उपाय बार बार २२१ ÷ १९५, गणित करने से अंतिम भाजक का अंक अपवर्तनाङ्क होता है ।

( १९ ) जैसे— १९५ ) २२१ ( १ १९५ ————— २६ ) १९५ ( ७ १८२ ————— १३ ) २६ ( २ २६ ————— × यहाँ पर भाज्य और हार का अपवर्तनांक १३ है। जो क्षेपक ६५ का भी अपवर्तन होता है। अतः लाघव से भाज्य = २२१/१३ = १७, हार = १९५/१३ = १५ और क्षेपक ६५ ÷ १३ = ५ । अतः भाज्य भाजक में परस्पर भाग देने से पूर्व की लब्धियों को अधोऽधः रखने से (तब तक भाग देते रहें जब तक शेष १ हो) एक बल्ली लता सी बनती है। जैसे, १७ ÷ १५ = ल० १ शेष २ से १५ में भाग देने से = ल० ७ शेष १ हो जाने से बल्ली भी यहीं समाप्त हो जाने से बल्ली के दो अंक होते हैं। बल्ली के नीचे क्षेपक = ५ और अंत में ० शून्य रखने से बल्ली का स्वरूप = १ / ७ / ५ / ० (अधोऽधः) होता है। अन्तिम अंक = ०, अन्तिम के समीप का ऊपरी अंक = ५ तदुपरि अंक = ७, ५ × ७ = ३५ + ० = ३५, तब बल्ली का स्वरूप = १ / ३५ / ५ पूर्ववत् ३५ × १ + ५ = ४० और ३५ बल्ली का लघु स्वरूप ४० / ३५ हो जाता है। इनमें दृढ़ भाज्य १७ दृढ़ हार १५ से शोधित करने पर ४० ÷ १७ = ६, ३५ ÷ १५ शेष ५ अन्तिम बल्ली का फल = ६ / ५ इन दोनों में गुणकांक = ५ और लब्धाङ्क = ६ उत्तर हो जाते हैं। आलाप से (२२१ × ५ + ६५) / १९५ = ल० ६ । इस उत्तर के अतिरिक्त १, २, ३ इष्ट कल्पनावश भा० १७ क्षे० ५, हा० १५, ६ लब्धि, ल० २३, ४०, ५७ गुणांक गु० २०, ३५, ५० इत्यादि। अनेक सही उत्तर होते हैं। जैसे, (२२१ × २० + ६५) / १९५ = २३ लब्धि इत्यादि, अनेक सही उत्तर हो जाते हैं। जैसे, (२२१ × ३५ + ६५) / १९५ = ४० लब्धि। इस कुट्टक गणित का ग्रह गणित में अत्यधिक उपयोग हुआ है। संक्षेप में सृष्ट्यादि से वर्त- मान शक वर्ष के किसी भी अभीष्ट दिन के अहर्गण ज्ञान से कल्प कुदिन में कल्प के ग्रह भगण तो इष्ट अहर्गण में ग्रह की राश्यादि क्या होगी ? जैसे, (क० ग्र० भ० × इ० अहर्गण) / (क० कु० दि०)

( २० ) भगण शेष में इष्ट ग्रह भगण + ──────── अतः भगण शेष को १२ से गुणा करने पर भ० शे० कल्प कुदिन भगण शेष × १२ गतराशि + भगण शेष ────────── = ───────────────── इसी प्रकार आगे विकलादि शेष ज्ञात कर क० कु० क० कु० गुणक और लब्धि के ज्ञान से विलोम क्रिया से विकलादि शेषादि समझकर कल्प कुदिन का ज्ञान सुलभ हो जाता है। इसलिए मात्र दिग्दर्शनार्थ संक्षेप से यहाँ पर इस गणित का उल्लेख किया गया है। वर्ग प्रकृति जिस गणित की प्रकृति ही वर्गात्मक होती है उसे वर्ग प्रकृति गणित कहा गया है । जैसे, उदाहरण—वह कौन सा वर्गांक है जिसको ८ से गुणाकर उसमें १ जोड़ दें तो वह अंक वर्गांक ही रहता है अर्थात् सदा उसका मूल मिल ही जाता है। आचार्य यहाँ पर गुणक ८ का नामकरण प्रकृति करते हुए जोड़े या घटाये जाने वाले पदार्थ का नाम क्षेपक देते हैं। जैसे, इस प्रश्न में प्रकृति = ८ क्षेपक = १ इसका हल निम्न- भाँति से है। इष्ट अंक कल्पनाकर उसको प्रकृति से गुणा करने पर गुणन फल में जितना जोड़ने से मूल मिलता है उसे क्षेप संज्ञा देकर इष्ट का नाम कनिष्ठ, प्रकृति × इष्ट वर्ग + क्षेप का नाम ज्येष्ठ और मूल प्राप्त्यर्थ युक्त अंक का नाम क्षेप कहा गया है। जैसे—यहाँ पर इष्ट का मान यदि १ तो १ का वर्ग = १ इसे प्रकृति से ८ से गुणा करने पर १ × ८ = ८ इसमें फिर हाल १ जोड़ने पर ९, और ९ का मूल = ३ यह ज्येष्ठ होता है। इसी प्रकार दूसरी पंक्ति में दोनों क्षेप, ज्येष्ठ और कनिष्ठ उत्पन्न होने से दोनों में परस्पर भावना एक दूसरे का घनिष्ठतम संबन्ध से इष्ट = १ = ज्येष्ठ = ३ क्षेप = १, कनिष्ठ = इष्ट - १ ज्येष्ठ = ३, क्षेप = १ । ऐसी स्थिति में वज्राभ्यास का तात्पर्य × गुणा अर्थात् कनिष्ठ × ज्येष्ठ + ज्येष्ठ × कनिष्ठ = कनिष्ठ, तथा (कनिष्ठ × कनिष्ठ) × प्रकृति + ज्येष्ठ × ज्येष्ठ = ज्येष्ठ मूल और दोनों क्षेपों का गुणनफल क्षेप × क्षेप = तृतीय क्षेप होता है । इस प्रकार कनिष्ठ ज्येष्ठ और क्षेप अनेक नवीन उत्पन्न होते हैं। यथा क ×

( २१ ) और १ × १ = १ = क्षेप की उपलब्धि होती है। पुनः नूतन उत्पन्न क० = ३५ ज्ये० = ९९, क्षे० = १ आलाप मिलाने से ३५ का वर्ग = १२२५, इसे ८ से गुणा करने पर १२२५ होता है। इसको प्रकृति = ८ से गुणा करने पर १२२५ × ८ = ९८०० होता है। इसमें क्षेप = १ जोड़ने से ९८०१ होता है, ९८०१ का मूल निकालने से ९९ ┌────── │ ९८०१ │ ८१ ─────── १८९ │ १७०१ मूल = ९९ │ १७०१ ज्येष्ठमान स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार एक ही नहीं अनेक अनन्त अंक पदों से प्रश्न का समीचीन उत्तर होता है। यह है आचार्य की सूक्ष्म बुद्धि का महान् अंकगणित कौशल का आविष्कार। वर्ग प्रकृति और कुट्टक से सम्बन्धित चक्रवाल गणित चक्र की तरह परिभ्रमणशील होने से इस गणित का कुट्टक और वर्ग प्रकृति संबंधेन कुट्टक से गुण लब्धि की प्राप्ति के अनन्तर पुनः

से प्राप्त शेषित करने पर लब्धि = ३ । गुणांक = १ का वर्ग = १ को प्रकृति ६७ में कम करने से गुण - १, करने से ६७ - १ = ६६ यहाँ अल्प शेष होना चाहिए अधिक शेष होने से क्रिया गौरव होता है । अतः इष्ट = २ की कल्पना से लब्धि ः - ५ + - २ = ७ (७)² = ४९ प्रकृति ६७ में कम करने से ६७ - ४९ = १८, क्षेप = ३ से भाग देने पर लब्धि - ६ = क्षेपक होता है । गुण का वर्ग प्रकृति में घट गया है इसलिए प्र० - गु०² = शेष धनात्मक का मान यहाँ पर धनात्मक - ६ = + ६ और लब्धि - ५ = कनिष्ठ हो जाता है । - ५ का घनत्व और ऋणत्व से कोई विकार नहीं है अतः गुण लब्धि = - ५, गुणक ७ का वर्ग = ४९ को प्रकृति ६७ लब्धि में घटाने से शेष = १८ होता है । शेष में - ३ से भाग देने से + ६, - ५ का वर्ग = २५ से गुणित करने पर १६७५, में क्षेप ६ जोड़ने से १६८१ का मूल = ४१ = ज्येष्ठमूल होता है । अतः पुनः कुट्टक के लिए भाज्य = ५, हार = ६, क्षेप = ४१ बल्ली = १ लब्धि = ११ ° १ गुणक = ५ गुणक का वर्ग (५)² = २५, प्रकृति = ६७ में कम करने से शेष = ४२ में क्षेप से भाग देने पर लब्धफल = ७ प्रकृति में घटने पर व्यस्त चिह्न, धन हो तो ऋण और ऋण हो तो धन हो जाने से फल, ७ ऋण हुआ, अतः कनिष्ठ = ११ ज्येष्ठ = ९०, क्षेप = ७ फिर से कुट्टक करने से— भा० = ११, हा० = - ७, क्षेप = ९० उक्त रीति से गुण = ५ बल्ली विषम है । अतः गुण = ७ - ५ = गुण = २, क्षेप = - ७, को - १ से गुणा करने पर - ७ × - १ = + ७, × + क्षेप = ७ + २ = ९ (९)² = ८१, प्रकृति ही ६७ पर घट रही है, अतः ८१ - ६७, १४ में क्षेप से भाग देने पर = १४ / - ७ = - २, लब्धि, और २७ = कनिष्ठ पुनः कुट्टक से— क = २७, ज्ये० २२१, क्षेप = - २ क = २७, ज्ये० २२१, क्षेप - २ क २७ × २२१ + २२१ × २७ = ११९३४ । क्षेप = + ४ । ज्ये०, प्र० (२७ × २७) ६७ + २२१ × २२१ = ९७६८४ और क्षेप = - २ × - २ = ४ स्पष्टता से कनिष्ठ = ११९३४ ज्येष्ठ = ९७६८४ और क्षेप = ४ । इष्ट कल्पना = २ का वर्ग ४ = से क्षेप में भाग देने से ४ ÷ ४ = १ तथा कनिष्ठ / २ = कनिष्ठ ५९६७, तथा ज्येष्ठ / २ = ज्येष्ठ = ४८८४२ और क्षेप ४ ÷ ४ = १ इस प्रकार ५९६७ के वर्ग को ६७ से गुणा कर १ जोड़ने से उस वर्गाङ्क संख्या का मूल ४८८४२ होगा । और भी अनेक उत्तर होते हैं । विशेष सूत्र—“रूप शुद्धौ खिलोद्दिष्टं वर्गयोगो गुणो न चेत्” ऋण १ क्षेप में गुणक संख्या किन्हीं दो वर्गों के = योग तुल्य होनी चाहिए, यदि प्रकृति दो वर्गों का योग नहीं है तो ऐसा प्रश्न अशुद्ध समझना चाहिए । उदाहरण से—

( २३ ) वह कौन सा वर्ग है जिसे १३ से गुणा कर १ जोड़ देने से प्राप्त अंक का मूल मिल जाता है । प्रकृति १३ है । जो (२)² + (३)² = ४ + ९ दो वर्गाङ्कों को योग तुल्य है अतः प्रश्न सही है । दोनों वर्गाङ्कों ४, ९ के मूलों २, ३ से १ में भाग देने पर ऋण १ में कनिष्ठ पद = १/२, अतः १/२ का वर्ग = १/४ को प्रकृति १३ से गुणा करने पर १/४ × १३ = १३/४ इसमें ऋण १ क्षेप कम करने से १३/४ - १ = ९/४ का मूल ३/२ यह ज्येष्ठ का मान है । इष्ट ३ से १ में भाग देने से १/३ कनिष्ठ, १/३ का वर्ग = १/९ को १३ से गुणा करने पर १३/९ में ऋण १ कम करने से ४/९ का मूल = २/३ यह ज्येष्ठ का मान भी होता है । अथवा कनिष्ठ १ के वर्ग को १३ से गुणा कर ४ कम कर मूल लेने से क० = १, ज्ये० ३, क्षे० ४, यहाँ पर इष्ट = यदि २ का वर्ग = ४ अतः क ३/२ ज्ये० ३/२, क्षे० = - १ । यदि प्रकृति १३ में - ९ = ४ का मूल २ से १ में भाग देने से क० १/२, ज्ये० ३/२, क्षे० - १ कुट्टक रीति से भाज्य = १ हा० = - १, क्षे० = ३/२ तीनों में ३/२ का अपवर्तन देने से भा० = १, हा० - २, क्षे०, ३ अतः कुट्टक से ल० = १, गु० = २, यहाँ पर १ इष्ट मानकर गुण ३ गुणवर्ग (३) अतः १३ - ९ = क्षेप = ४ = कनिष्ठ वर्ग (३)² को प्रकृति १३ से गुणा कर ४ जोड़ने से = १२१ का मूल ११ = ज्ये० । क० ३ ज्ये० ११ क्षे० = ४ भा० = ३ क्षे० ११ और हा० = ४ पूर्ववत् क० = ५ ज्ये० = १८ क्षे० = १ इस प्रकार अनेक अनन्त उत्तर होते हैं । इस प्रकार उक्त कुट्टक, वर्ग प्रकृति और चक्रवाल गणित का यत्र-तत्र सर्वत्र ग्रह गणित में अति आवश्यक उपयोग होता है जिसको संक्षेप से आवश्यक समझ कर यहाँ पर प्रदर्शित किया गया है । इस बीजगणित के उत्तरार्द्ध में भी कुट्टक गणित का उपयोग यथा स्थान आगे भी आ रहा है जो दिखाया जायगा । श्री भास्कराचार्य एवं तत्पूर्ववर्ती आचार्यों ने अव्यक्त पदार्थों की अव्यक्त कल्पना के लिए यावत् = या. तावत् - ता. कालक = का. नीलक = नी. पीतक = पी. लोहितक = लो. श्वेतक = श्वे. हरितक - ह. अभ्रक = अ. इत्यादि संकेत दिये हैं । आधुनिक गणित सागर के गाताखार अव्यक्त मात्र कल्पना के लिए, A, B, C, D, E, F इत्यादि या अ, ब, क, ल, ह, च... इत्यादि वर्णों के मान से अव्यक्त अर्थात् अज्ञात पदार्थों की कल्पना करते हैं ।