सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
ब्रह्मसाक्षात्कारमें करण-विचार ] भाषानुवादसहित ४६९
विशेपाहार्यज्ञानवद् अर्थाबाधेन प्रमात्वोपपत्तिः, प्रमाणामूलकप्रमात्वा- योगात् । आहार्यवृत्तेश्च उपासनार्वृत्तिवद् ज्ञानभिन्नमानसक्रियारूपतया इच्छादिवद् अवाधितार्थविषयत्वेऽपि प्रमाणत्वानभ्युपगमात् । मैवम्, क्लृप्त- प्रमाकरणामूलकत्वेऽपीश्वरमायावृत्तित्त्वत् प्रमात्वोपपत्तेः । विषयाबाधतौ- ल्यात् । मार्गद्वयेऽपि प्रसङ्ख्यानस्य विचारितादविचारिताद्वा वेदान्तात् ब्रह्मात्मैक्यावगतिमूलकतया प्रसङ्ख्यानजन्यस्य ब्रह्मसाक्षात्कारस्य प्रमाण- मूलकत्वाच्च । उक्तं च कल्पतरुकारैः—
संख्याविशेषके सफल ज्ञानके समान अर्थके बाधित न होनेपर भी ब्रह्मसाक्षा- त्कारको प्रमा नहीं मान सकते हैं, क्योंकि प्रमाणसे अनुत्पन्न ज्ञान प्रमा नहीं होता, यह नियम है, जैसी उपासना वृत्ति ज्ञानभिन्न क्रियारूप है, वैसे ही आहार्यवृत्ति भी * मानस क्रियारूप ही है, इसलिए उसके अबाधितार्थविषयक होनेपर भी इच्छा आदिके समान उसमें प्रमात्व नहीं माना जा सकता है, तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यद्यपि ब्रह्मसाक्षात्कार प्रसिद्ध प्रमाणजन्य नहीं है, तथापि ईश्वरकी † मायावृत्तिके समान उसमें प्रमात्वकी उपपत्ति हो सकती है, क्योंकि विषयका ‡ अबाध समान ही है । और उक्त दो मार्गोंमें प्रसंख्यानके मूलविचारित या अविचारित वेदान्तसे × होनेवाली जीवब्रह्मैक्यविषयक अवगति के होनेसे प्रसंख्यानजन्य ब्रह्मसाक्षात्कार भी प्रमाणमूलक ही हो सकता है । इस विषयमें कल्पतरुकारने कहा भी हैं ।
* अविसंवादी वराटकसंख्या आदिको विषय करनेवाली वृत्ति आहार्य वृत्ति कहलाती है, अथवा बाधकालीन इच्छाजन्य वृत्ति आहार्यवृत्ति है ।
† ईश्वरकी मायावृत्तिमें भी यदि ज्ञानत्वका अङ्गीकार न किया जायगा, तो 'यः सर्वज्ञः स सर्ववित्' इत्यादि श्रुतिकी उपपत्ति नहीं होगी, कारण कि ईश्वरमें सर्वज्ञताकी भी मायावृत्तिके आधारपर ही उपपत्ति है, यह भाव है ।
‡ इच्छाका वारण करनेके लिए इच्छाभिन्नत्व विशेषण देना चाहिए, अतः इच्छामें ज्ञानत्वकी प्रसक्ति नहीं है, अन्यथा इच्छाके अबाधितार्थ कत्व होनेसे उसमें भी ज्ञानत्वकी प्रसक्ति, होगी यह भाव है ।
× अविचारित वेदान्तसे ब्रह्मात्मैक्यज्ञान होता है, यह योगमार्गाभिप्रायसे कहा गया है, और सांख्यमार्गमें विचारित वेदान्तसे ब्रह्मात्मैक्यावगति होती है, इस अभिप्रायसे 'विचारितात्' यह विशेषण है, यदि शङ्का हो कि विचारित या अविचारित वेदान्तसे ही ब्रह्मावगति हो
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'वेदान्तवाक्यजज्ञानभावनाजाऽपरोक्षधीः ।
मूलप्रमाणदार्थ्येन न भ्रमत्वं प्रपद्यते ॥
न च प्रामाण्यपरतस्त्वापत्तिस्तु प्रसज्यते ।
अपवादनिरासाय मूलशुद्ध्यनुरोधनात् ॥' इति ।
अन्ये तु मन एवाहुरेनां तत्सहकारिणीम् ।
कुछ लोग कहते हैं कि मन ही ब्रह्मसाक्षात्कारमें कारण है और प्रत्ययावृत्ति मनकी सहकारी कारण है ।
अन्ये तु 'एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः', 'दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या' इत्यादिश्रुतेर्मन एव ब्रह्मसाक्षात्कारे करणम्, तस्य सोपाधिकात्मनि अहंवृत्तिरूपप्रमाकरणत्वक्लप्तेः । 'स्वप्नप्रपञ्चविपरीतप्रमात्रादिज्ञानसाधनस्यान्तःकरणस्य' इत्यादिपञ्चपादिकाविवरणग्रन्थैरपि तथा
' वेदान्तवाक्यजज्ञान० '
अर्थात् वेदान्तवाक्योंके ज्ञानरूप अभ्याससे होनेवाली अपरोक्ष बुद्धि वेदान्तवाक्यकी अथवा इससे होनेवाली प्रमाकी दृढ़तासे (अविप्रतिपन्न प्रामाण्य होनेसे) भ्रम नहीं होती है । इससे परतः प्रामाण्यापत्ति भी प्रसक्त नहीं है, क्योंकि अपवादके (अप्रामाण्य शङ्काके) निरासके लिए मूल प्रमाणकी शुद्धिकी अपेक्षा की गई है ।
- कुछ लोग कहते हैं कि 'एषोऽणुरात्मा०' (इस अत्यन्त सूक्ष्म आत्माको मनसे जानना चाहिए) 'दृश्यते०' (कुशाग्र बुद्धिसे आत्मा देखा जाता है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंसे आत्मसाक्षात्कारमें मन ही कारण प्रतीत होता है, क्योंकि मनमें सोपाधिक आत्माके अहमाकार वृत्तिरूप प्रमात्मक साक्षात्कारके प्रति करणता लोकमें प्रसिद्ध है, और 'प्रातिभासिक स्वप्न प्रपञ्चसे विपरीत व्यावहारिक प्रमाता आदि पदार्थोंके ज्ञानके प्रति साधनभूत अन्तःकरणके' इत्यादि प्रपञ्चपादिका आदि विवरणग्रन्थोंसे प्रमाताशब्दसे कहलानेवाले सोपाधिक
सकती है, तो प्रसंख्यानकी क्या आवश्यकता है ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि प्रसंख्यानके पूर्वमें अविद्याके निवर्तक अप्रतिबद्ध ब्रह्मावगति उत्पन्न नहीं हो सकती है, यह भाव है।
* केवल प्रसंख्यान ही ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारण नहीं है, किन्तु तत्सहकृत अन्तःकरण ही ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारण है, इस प्रकारके मतका अवलम्बन करनेवालोंके मतका निरूपण इस ग्रन्थसे करते हैं ।
ब्रह्मसाक्षात्कारमें करण-विचार ] भाषानुवादसहित ४७१
प्रतिपादनात् । 'अहमेवेदं सर्वं सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः' इति श्रुत्युक्ते स्वाप्ने ब्रह्मसाक्षात्कारे एव मनसः करणत्वसम्प्रतिपत्तेश्च । तदा करणान्तराभावात् । प्रसङ्ख्यानं तु मनस्सहकारिभावेनापि उपयुज्यते । 'वाक्यार्थभावनापरिपाकसहितमन्तःकरणं त्वंपदार्थस्यापरोक्ष्यस्य तत्तदुपाध्याकारनिषेधेन तत्पदार्थतामाविर्भावयति'—इति भामतीवचनात् । 'ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः' इति श्रुतावपि ज्ञानप्रसादशब्दितचित्तैकाग्र्यहेतुतयैव ध्यानोपादानात् । न तु प्रसङ्ख्यानं स्वयं करणम्, तस्य क्वचिदपि ज्ञानकरणत्वाक्लृप्तेः । कामातुरकामिनीसाक्षात्कारादावपि प्रसङ्ख्यानसहकृतस्य मनस एव करणत्वोपपत्त्याऽक्लृप्तज्ञानकरणान्तरकल्पनायोगादित्याहुः ।
आत्मसाक्षात्कारके प्रति मनकी करणताका प्रतिपादन किया गया है । और 'अहमेवेदम्०' ( सब वस्तुओंमें सद्रूपसे अनुभूयमान यह सर्वात्मक ब्रह्म मैं ही हूँ, इसलिए सभी मैं हूँ, ऐसा स्वप्नमें ब्रह्मवित् मानता है, यह इसका उच्च लोक है ) इस श्रुतिसे प्रतिपादित स्वप्नकालीन निर्गुण ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति मन ही करण माना गया है, क्योंकि स्वप्नकालमें मनके सिवा अन्य करण नहीं रहते हैं । आत्मसाक्षात्कारके प्रति प्रसङ्ख्यान मनकी सहकारितारूपसे उपयुक्त होता है, क्योंकि 'महावाक्यार्थकी भावनाके परिपाकसे युक्त अन्तःकरण तत्-तत् उपाधिके आकारके निषेधसे त्वंपदार्थके अपरोक्षानुभवमें तत्पदार्थत्वका आविर्भाव करता है' इस प्रकार भामतीकारका वचन भी है । 'ज्ञानप्रसादेन † विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु' ( ध्यानसे लब्ध चित्तकी एकाग्रतासे शुद्ध ब्रह्मको देखता है ) इस श्रुतिमें भी 'ज्ञानप्रसाद' शब्दसे विवक्षित चित्तकी एकाग्रताके प्रति हेतुरूपसे ही ध्यानशब्दका प्रयोग किया गया है । केवल प्रसंख्यान आत्मसाक्षात्कारमें करण नहीं है, क्योंकि कहीं भी उसकी ज्ञानके करणरूपसे प्रतीति नहीं होती है । और कामातुर पुरुषके कामिनीसाक्षात्कारकी प्रसङ्ख्यानसहकृत मनकी करणतासे ही उपपत्ति हो सकती है, फिर ज्ञानके प्रति अक्लृप्त अन्य करण माननेमें कोई प्रमाण नहीं है ।
† करण-व्युत्पत्तिसे अर्थात् 'ज्ञायते अनेन' इत्यादि व्युत्पत्तिसे ज्ञानशब्दका अर्थ अन्तःकरण है, उसका प्रसाद—चित्तकी एकाग्रता, यह एकाग्रता ध्यानसे प्राप्त होती है,
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महावाक्यं परे प्राहुर्मनसः प्रतिषेधतः ॥ २० ॥
कुछ लोग कहते हैं कि ब्रह्मसाक्षात्कारमें तत्त्वमस्यादि महावाक्य ही करण है, क्योंकि अनेक श्रुतियोंमें मनकी करणताका प्रतिषेध किया गया है ॥ २० ॥
अपरे तु 'तद्धास्य विजज्ञौ' 'तमसः पारं दर्शयति' 'आचार्यवान् पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरम्' इत्यादिश्रुतिषु आचार्योपदेशानन्तरमेव ब्रह्मसाक्षात्कारोदये, जीवन्मुक्तिश्रवणाद्, 'वेदान्तविज्ञानसुनिश्चिताथाः' इति ज्ञानान्तरनैराकाङ्क्ष्यश्रवणात्, 'तं त्वौपनिषदं पुरुषम्' इति ब्रह्मण उपनिषदेकगम्यत्वश्रवणाच्च औपनिषदं महावाक्यमेव ब्रह्मसाक्षात्कारे
कुछ लोग कहते हैं कि 'तद्धास्य विजज्ञौ' (उसने पिताके उपदेशसे उस ब्रह्मका साक्षात्कार किया) 'तमसः पारं दर्शयति०' (अविद्याके अधिष्ठानभूत ब्रह्मको दिखलाता है) 'आचार्यवान्०' (आचार्यवाला पुरुष जानता है, विद्वान्की विदेह मुक्तिमें तबतक ही देर है, जबतक प्रारब्धसे वह मुक्त नहीं होता है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंमें आचार्यके उपदेशके बाद ही ब्रह्मसाक्षात्कारका उदय होनेपर, जीवन्मुक्तिका श्रवण है, इसलिए और 'वेदान्तविज्ञान०' * (वेदान्त वाक्योंके ज्ञानसे ही जिन्हें अर्थ निश्चित हो गया है) इससे ज्ञानके बाद किसी आकाङ्क्षाके न होनेसे एवं 'तन्त्वौपनिषदं पुरुषम्' (उस उपनिषत्प्रमाणगम्य पुरुषको) इस श्रुतिसे ब्रह्मके उपनिषत्प्रमाणगम्यत्वके श्रवणसे [यही निश्चित होता है] ब्रह्मके साक्षात्कारके प्रति उपनिषत्के महावाक्य ही † करण हैं, मन
इसलिए ध्यानसे लब्ध चित्तकी एकाग्रतासे उस आत्माको देखता है, यह इस श्रुतिका तात्पर्य है।
* जिन लोगोंके मतसे महावाक्य ही ब्रह्म-साक्षात्कारके प्रति कारण है, उनका मत इस ग्रन्थसे दिखलाया जाता है।
प्रकृत श्रुतिसे वेदान्तवाक्यजन्य ज्ञानसे ही ब्रह्मात्मैक्यरूप अर्थका निश्चय होता है, ऐसा कहनेसे वाक्यार्थज्ञानके बाद प्रसङ्ख्यानका अनुष्ठान अपेक्षित नहीं है, यह प्रतीत होता है, इसकी तभी उपपत्ति हो सकती है जब कि वाक्यसे ही अपरोक्ष ज्ञानकी उत्पत्ति मानी जाय, इससे 'वेदान्तविज्ञान' इत्यादि श्रुतिसे वाक्य ही अपरोक्षज्ञानमें करणत्वरूपसे निश्चित होता है, यह भाव है।
† सांख्य और योगमार्गके अनुष्ठानसे दृष्ट और अदृष्टरूप सकल प्रतिबन्धकका विनाश होनेपर प्रतिबन्धकसे रहित वाक्य ही साक्षात्कारको उत्पन्न करता है, इसलिए वाक्यके करणत्व-पक्षमें सांख्य और योगमार्गकी वैयर्थ्यशङ्का नहीं हो सकती है, यह भाव है।
ब्रह्मसाक्षात्कारमें करणविचार ] भाषानुवादसहित ४७३
करणम्, न मनः । 'यन्मनसा न मनुते' इति तस्य ब्रह्मसाक्षात्कारकरणत्वनिषेधात् । न चाऽपक्वमनोविषयमिदम् । 'येनाहुर्मनो मतम्' इतिवाक्यशेषे मनोमात्रग्रहणात् । न चैवं 'यद्वाचाऽनभ्युदितम्' इति शब्दस्यापि तत्करणत्वं निषिध्यते इति शङ्क्यम्, मनःकरणत्ववादिनामपि शब्दस्य निर्विशेषपरोक्षज्ञानकरणत्वस्याभ्युपगतत्वेन तस्य 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' इति श्रुत्यनुरोधेन शब्दार्थप्राप्तिरूपशक्तिमुखेन शब्दस्य तत्करणत्वनिषेधे तात्पर्यस्य वक्तव्यतया शक्यसम्बन्धरूपलक्षणामुखेन तस्य तत्कारणत्वाविरोधात् । न च 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' इति श्रुतिसिद्धं मनसोऽपि तत्करणत्वं न पराकर्तुं शक्यमिति वाच्यम्,
नहीं। क्योंकि 'यन्मनसा न मनुते' (जिसका मनसे ज्ञान नहीं हो सकता है) इस श्रुतिसे ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति मनकी साधनताका निषेध किया गया है। यदि शङ्का हो कि वह निषेध अपक्व मनके लिए है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'येनाहुर्मनो मतम्' (जिस चैतन्यसे मनका प्रकाश होता है) इस प्रकारके वाक्यशेषमें सामान्य मनका ही ग्रहण है। यदि शङ्का हो कि 'यद्वाचानभ्युदितम्' (जिस चैतन्यका वाणीसे प्रकाश नहीं होता है) इस श्रुतिसे शब्दकी भी ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारणताका खण्डन किया गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि मन जिसके मतमें साक्षात्कारके प्रति करण है, उसके मतमें भी शब्दको निर्विशेष वस्तुके परोक्षज्ञानके प्रति करण मानते हैं, अतः 'यद्वाचानभ्युदितम्' इत्यादि निषेधका 'यतो वाचो०' ❊ (मनके साथ वाणी भी प्राप्ति न कर जिससे निवृत्त होती है) इस प्रकारकी श्रुतिके अनुरोधसे शब्दकी अर्थप्राप्तिरूपा शक्तिके निषेध द्वारा शब्दनिष्ठ साक्षात्कारके निषेधमें तात्पर्य है, ऐसा कहना होगा, इसलिए शक्यसम्बन्धरूप लक्षणाके द्वारा शब्दमें ब्रह्मसाक्षात्कारकी करणताका निषेध नहीं है। यदि शङ्का हो कि 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' (मनसे ही ब्रह्मका साक्षात्कार करना चाहिए) इस श्रुतिसे मनमें सिद्ध हुई साक्षात्कारकरणताका निषेध नहीं कर सकते हैं, तो यह भी
❊ अर्थात् पूर्वापरवाक्योंके अनुसन्धानसे यही ज्ञात होता है, कि शब्द शक्तिवृत्तिसे ब्रह्मका बोधक नहीं है, परन्तु लक्षणावृत्तिसे बोधक नहीं है, यह नहीं मान सकते हैं, यह भाव है।
| ४७४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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शाब्दसाक्षात्कारजननेऽपि तदैकाग्र्यस्याऽपेक्षितत्वेन हेतुत्वमात्रेण तृतीयोपपत्तेः । 'मनसा ह्येष पश्यति मनसा शृणोति' इत्यादौ तथा दर्शनात् । गीताविवरणे भाष्यकारीयमनःकरणत्ववचनस्य मतान्तराभिप्रायेण प्रवृत्तेरित्याहुः ॥ ९ ॥
ननु तथाऽपि शब्दस्य परोक्षज्ञानजनकत्वस्वभावस्याऽपरोक्षज्ञानजनकत्वं न सङ्गच्छते इति चेत्,
मानान्तरस्याप्रसरात्परोक्षेण भ्रमाक्षयात् ।
सहकारिविधानाच्च शब्दादप्यपरोक्षधीः ॥ २१ ॥
ब्रह्ममें किसी अन्य प्रमाणकी प्रवृत्ति नहीं होनेसे, परोक्षज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति न होनेसे और सहकारी (मनन आदि) का विधान होनेसे शब्दसे भी अपरोक्ष ज्ञान हो सकता है ॥२१॥
अत्र केचित्—स्वतोऽसमर्थोऽपि शब्दः शास्त्रश्रवणमननपूर्वकप्रत्ययाभ्यासजनितसंस्कारप्रचयलब्धब्रह्मैकाग्र्यचित्तदर्पणानुगृहीतोऽपरोक्षज्ञानमु-
युक्त नहीं है, क्योंकि शब्दसाक्षात्कारके उत्पादनमें भी मनकी एकाग्रताकी अपेक्षा होनेसे केवल हेतु अर्थमें भी उक्त तृतीयाकी (मनसा) उपपत्ति हो सकती है। 'मनसा ह्येष' (यह मनसे देखता है और मनसे सुनता है) इत्यादि स्थलमें चाक्षुष आदि ज्ञानमें मनकी करणताके न होनेपर भी केवल हेतुत्वरूपसे तृतीयाकी उपलब्धि है। गीताके विवरणमें मनमें करणताका प्रतिपादक जो भाष्यकारका वचन है, उसकी किसी मतान्तरसे (वृत्तिकारके मतसे) प्रवृत्ति हुई है, खास निजी मतसे नहीं, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है ॥९॥
अब शङ्का होती है कि शब्दके ब्रह्मसाक्षात्कारकरणत्वपक्षमें श्रुति और भाष्यका विरोध यद्यपि नहीं है, तथापि जिस शब्दका स्वभाव परोक्षज्ञानजनकता है, उसकी अपरोक्षज्ञानजनकता कैसे सङ्गत हो सकती है ?
इस प्रश्नके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि शब्द स्वतः अपरोक्षज्ञान करनेमें समर्थ नहीं है, तथापि शास्त्रश्रवणमननपूर्वक प्रत्ययाभ्याससे उत्पन्न अनेक संस्कारोंसे प्राप्त ब्रह्मैकाग्र्यसे युक्त चित्तरूप दर्पणसे * अनुगृहीत
* जैसे चक्षु अपने आप प्रतिबिम्बका ग्रहण नहीं करता है, तथापि दर्पणके समवधानसे प्रतिबिम्बका ग्रहण करता है, वैसे ही प्रकृतमें चित्ताख्य दर्पणसे युक्त शब्द अपरोक्षज्ञानको पैदा करता है, यह भाव है।
ब्रह्मज्ञानकी शाब्द अपरोक्षता ] भाषानुवादसहित ४७५
त्पादयति शास्त्रीयसंस्कारसंस्कृताग्न्यधिकरणक इव होमोऽपूर्वमिति कल्प्यते । 'तरति शोकमात्मवित्' इति शास्त्रप्रामाण्याद् । अपरोक्षस्य कर्तृत्वाध्यासस्यापरोक्षाधिष्ठानज्ञानं विना निवृत्त्ययोगाद् औपनिषदे ब्रह्मणि मानान्तराप्रवृत्तेः शब्दादप्यपरोक्षज्ञानानुत्पत्तौ अनिर्मोक्षप्रसङ्गादित्याहुः ।
भावनाऽऽवृत्तिसचिवाद्धिधुरस्येव मानसात् ।
कामिन्या इव शब्दात्तामितरे सम्प्रचक्षते ॥ २२ ॥
भावनाकी आवृत्तिसे युक्त अन्तःकरणसे जैसे विधुर पुरुषको कामिनीका साक्षात्कार होता है, वैसे ही भावनाकी आवृत्तिसे युक्त शब्दसे भी ब्रह्मसाक्षात्कार होता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥२२॥
शब्द अपरोक्ष ज्ञानको उत्पन्न करता है, जैसे कि शास्त्रीय संस्कारसे संस्कृत † अग्निमें होनेवाला होम अपूर्वकी उत्पत्ति करता है, क्योंकि 'तरति शोकमात्मवित्' यह श्रुति प्रमाण है। और अपरोक्षरूप कर्तृत्वादि अध्यासकी अधिष्ठानविषयक अपरोक्ष ज्ञानके विना × निवृत्ति नहीं हो सकती है, इसलिए जिसमें अन्य प्रमाणकी प्रवृत्ति नहीं है, ऐसे केवल उपनिषत् प्रमाणगम्य ब्रह्मकी शब्दसे भी अपरोक्षानुभूति न मानी जाय, तो मोक्षकी ‡ अप्रसक्ति होगी ।
† अर्थात् आधान आदि संस्कारोंसे संस्कृत अग्निमें किया हुआ होम (त्यक्त द्रव्यका अग्निमें प्रक्षेप ) ही अपूर्वकी उत्पत्ति करता है, क्योंकि आधान आदि संस्कार से रहित अग्निमें किया हुआ होम अपूर्वकी उत्पत्तिमें समर्थ नहीं है, इसी प्रकार शब्द भी उक्त चित्तदर्पणानुगृहीत होकर अपरोक्षज्ञानकी उत्पत्ति करता है, यह भाव है।
× कारण कि श्रवण आदिसे उत्पन्न परोक्षज्ञानके रहते हुए भी कर्तृत्वादि अध्यासकी निवृत्ति नहीं होती है, यदि परोक्षज्ञानमात्रसे अध्यासकी निवृत्ति मानी जाय, तो मनन आदिका विधान व्यर्थ होगा और अपरोक्ष दिग्भ्रम अपरोक्ष साक्षात्कारके विना निवृत्त भी नहीं होता, अतः अपरोक्षकर्मृत्वादि अध्यासकी निवृत्ति करनेके लिए अवश्य शब्दसे अपरोक्ष ज्ञान मानना चाहिए, यह भाव है ।
‡ तात्पर्य यह है कि अतीन्द्रिय मनको यदि ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति करण माना जाय, तो केवल उपनिषत्प्रमाणसे ही ब्रह्मका ज्ञान होता है, इस औपनिषदत्वश्रुतिके साथ विरोध होनेसे ब्रह्ममें किसी शब्दभिन्न प्रमाणकी प्रवृत्ति न होनेपर शब्दकी भी यदि प्रवृत्ति न मानी जाय, तो ब्रह्मसाक्षात्कारकरणके लब्ध न होनेसे ब्रह्मसाक्षात्कार भी नहीं होगा और सुतरां मोक्षबोधक सम्पूर्ण शास्त्रोंकी अप्रामाण्यप्रसक्ति होगी, इसलिए मोक्षबोधकशास्त्रोंके प्रामाण्यके लिए अवश्य शब्दको साक्षात्कारके प्रति करण मानना चाहिए, यह भाव है ।
| ४७६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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अन्ये तु भावनाप्रचयसाहित्ये सति बहिरसमर्थस्यापि मनसो नष्ट-वनितासाक्षात्कारजनकत्वदर्शनाद् निदिध्यासनसाहित्येन शब्दस्याप्यपरोक्षज्ञानजनकत्वं युक्तमिति दृष्टानुरोधेन समर्थयन्ते ।
विज्ञातृचिदभिन्नस्य विषयस्यापरोक्षतः ।
पारोक्ष्यासम्भवादन्ये प्राहुः शब्दापरोक्षताम् ॥ २३ ॥
कुछ लोग कहते हैं कि प्रमातृचैतन्यसे अभिन्न विषयका अपरोक्षत्व होनेसे और शब्दसे परोक्षज्ञानका सम्भव न होनेसे शब्दसे ही ब्रह्मका अपरोक्ष होता है ॥२३॥
अपरे तु अपरोक्षार्थविषयत्वं ज्ञानस्याऽपरोक्षत्वं नाम, अन्यानिरुक्तेः । अर्थापरोक्षत्वं तु नापरोक्षज्ञानविषयत्वम्, येनाऽन्योन्याश्रयो भवेत् । किन्तु तत्तत्पुरुषीयचैतन्याभेदः । अन्तःकरणतद्धर्माणां साक्षिणि कल्पिततया·
* कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि बाह्य पदार्थके ग्रहण करनेमें स्वतः मन असमर्थ है, तथापि भावनाधिक्यके सहकारसे वह अन्तःकरण विनष्ट वनिताके साक्षात्कारमें जैसे जनक देखा जाता है, वैसे ही निदिध्यासनके सहकारसे शब्द भी अपरोक्ष ज्ञानको उत्पन्न कर सकता है ।
† अन्य लोग कहते हैं कि ज्ञानका अपरोक्षत्व अपरोक्षार्थविषयत्व है, क्योंकि उसका ( अपरोक्षत्वका ) निर्वचन अन्य प्रकारसे नहीं हो सकता है । अर्थनिष्ठ अपरोक्षत्व अपरोक्षज्ञानविषयत्वरूप नहीं है, जिससे कि अन्योन्याश्रय हो, किन्तु तत्-तत् पुरुषोंके चैतन्यके साथ अभेद है, ‡ अन्तःकरणोंके धर्मोंकी
* शास्त्रप्रमाण कदाचित् न लिया जाय और केवल युक्तिके आधारपर ही विचार किया जाय, तो भी अपरोक्षज्ञानजनकत्व घट सकता है, ऐसा इस मतसे प्रतिपादन करते हैं ।
† अब शब्दमें परोक्षज्ञानजनकत्व हैं ही नहीं, अतः नित्य अपरोक्षब्रह्मके साक्षात्कारमें वेदान्तोंकी करणता अबाधित है, इस प्रकारके मतान्तरको कहते हैं ।
‡ तात्पर्य यह है कि अन्य प्रकारकी अनुपलब्धि होनेसे अर्थका अपरोक्षत्व यदि अपरोक्ष-ज्ञानविषयत्व माना जायगा, तो अन्योऽन्याश्रय होगा, क्योंकि अर्थके अपरोक्षत्वकाज्ञान होनेपर ज्ञानके अपरोक्षत्वका ज्ञान होगा और ज्ञानके अपरोक्षत्वका ज्ञान होनेपर अर्थ की अपरोक्षताका ज्ञान होगा, इसलिए अपरोक्षज्ञानविषयकत्वको अर्थका अपरोक्षत्व नहीं कह सकते हैं, किन्तु तत्-तत् प्रमातृचैतन्यसे अभिन्नत्व ही उन उन विषयोंका तत्-तत् प्रमाताके प्रति अपरोक्षत्व है । अर्थात् तत्-तत् प्रमातृचैतन्यसे अभिन्न अर्थविषयक ज्ञान ही तत्-तत् प्रमातृचैतन्याभिन्न विषयमें अपरोक्षज्ञान है । यदि शङ्का हो कि इस प्रकारके अर्थापरोक्षत्वका अनुगम नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अपरोक्षत्वकी जातिरूपता
ब्रह्मज्ञानकी शाब्द अपरोक्षता ] भाषानुवादसहित [ ४७७
तदभेदसत्त्वाद् । बाह्यचैतन्ये कल्पितानां घटादीनां बाह्यचैतन्ये वृत्तिकृततत्त्पुरुषीयचैतन्याभेदाभिव्यक्त्या तदभेदसत्त्वाच्च न क्वाप्यव्याप्तिः । न चान्तःकरणतद्धर्माणां ज्ञानादीनामिव धर्माधर्मसंस्काराणामपि साक्षिणि कल्पितत्वाविशेषाद् आपरोक्ष्यापत्तिः । तेषामनुद्भूतत्वाद् उद्भूतस्यैव जडस्य चैतन्याभेद आपरोक्ष्यमित्यभ्युपगमात् । एवं च सर्वदा सर्वपुरुषचैतन्याभिन्नत्वाद् ‘यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म’ इति श्रुत्या स्वत एवाऽपरोक्षं
साक्षीमें कल्पना होनेके कारण साक्षी चैतन्यके साथ अभेद है ही + । बाह्य घटावच्छिन्न चैतन्यमें कल्पित घट आदिका बाह्य चैतन्यमें वृत्ति द्वारा × तत्-तत् पुरुषके चैतन्यके साथ अमेदाभिव्यक्तिसे तत्-तत् पुरुषके चैतन्यके साथ अभेद होनेसे कोई अनुपपत्ति नहीं है । यदि शङ्का हो कि अन्तःकरण और उसके ज्ञान आदि धर्मोंके समान धर्म, अधर्म और संस्कारोंकी भी साक्षीमें ही कल्पना होनेसे उनका भी आपरोक्ष्य (प्रत्यक्षत्व) प्रसक्त होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि धर्म आदिके अनुद्भूत होनेसे उद्भूत जड़ पदार्थका चैतन्यके साथ अभेद ही अर्थका अपरोक्षत्व है, * ऐसा स्वीकार किया गया है । इस अवस्थामें सदा सब पुरुषोंके चैतन्यके साथ अभेद होनेसे ‘यत् साक्षादपरोक्षात् ब्रह्म’ (साक्षात् अपरोक्ष ही ब्रह्म है) इस श्रुतिके अनुसार ब्रह्म स्वतः अपरोक्ष
और उपाधिरूपताका पूर्वमें ही निरास किया गया है, इसलिए उसका यदि अननुगम हो, तो भी कोई हानि नहीं है ।
+ साक्षीशब्दसे विवक्षित प्रमातृचैतन्यके साथ अभेद है, यह भाव है, अर्थापरोक्षत्वके निर्वचनमें कल्पितावशिष्ट साधारण अभेदका प्रवेश होनेसे प्रमातृचैतन्य और जड़का वास्तविक अभेद न होनेपर भी ‘जडं यत्’ इस प्रतीतिसे कल्पित अभेदके होनेसे दोष नहीं है, यह तात्पर्य है ।
× बाह्यविषयावच्छिन्न चैतन्यमें चक्षुरादिद्वारा निर्गतवृत्तिका संसर्ग होनेपर वृत्ति और वृत्तिमान्का अभेद सिद्ध होगा, इससे वृत्तिमान् अन्तःकरणके साथ भी संसर्ग प्राप्त होगा, इसलिए वृत्तिसे संसृष्ट बाह्य चैतन्य ही अन्तःकरणके सम्बन्धसे तत्-तत्पुरुषीय चैतन्य होगा, अतः इसी प्रकारके बाह्यचैतन्यमें वृत्तिकृत तत्-तत्पुरुषीय चैतन्याभेदकी अभिव्यक्ति भी होती है, यह भाव है ।
***** अर्थात् तद्भूतत्वे सति प्रमातृचैतन्याभिन्नत्वम् अर्थापरोक्षत्वम्, अर्थात् उद्भूत होकर प्रमातृचैतन्यके साथ जो अभिन्न हो, वही अर्थापरोक्षत्व है, उद्भूतत्व है, फलके बलसे कल्पित स्वभावविशेष, वह उद्भूतत्व धर्म आदिमें नहीं है और घट आदिमें है, यह समाधानका तात्पर्य है ।
| ४७८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीये परिच्छेद |
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ब्रह्मेति अपरोक्षार्थविषयत्वात् शाब्दस्यापि ब्रह्मज्ञानस्याऽपरोक्षत्ववाचो- युक्तिर्युक्तेत्याहुः ।
अद्वैतविद्याचार्यास्तु स्वसुखज्ञानसङ्ग्रहात् ।
आपरोक्ष्यं स्फुरचित्त्वं तदभेदात्तु तद्भाजि ॥ २४ ॥
अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं कि स्वरूपसुखके अपरोक्षज्ञानका संग्रह करनेके लिए प्रकाशमान चैतन्यत्व ही अपरोक्षत्व है और चैतन्यके साथ अभेद होनेसे अर्थमें भी अपरोक्षत्व रह सकता है ॥२४॥
अद्वैतविद्याचार्यास्तु नापरोक्षार्थविषयत्वं ज्ञानस्याऽऽपरोक्ष्यम्, स्वरू- पसुखापरोक्षरूपस्वरूपज्ञानाऽव्यापनात् स्वविषयत्वलक्षणस्वप्रमाणत्वनिषेधात् । किन्तु यथा तत्तदर्थस्य स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याऽभेदोऽर्थापरोक्ष्यम्,
ही है । इसलिए अपरोक्ष अर्थको विषय करनेवाला होनेसे शब्दजन्य ब्रह्म-ज्ञानमें भी अपरोक्षत्वका कथन युक्ति-युक्त है ।
† अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं कि ज्ञानका अपरोक्षत्व अपरोक्षार्थविषयत्व नहीं है, क्योंकि स्वविषयत्वलक्षण स्वप्रकाशत्वका निषेध होनेसे स्वरूपसुखके अपरोक्षरूप स्वरूपज्ञानमें उक्त लक्षण अव्याप्त होगा, किन्तु जैसे तत्-तत् अर्थोका अपने व्यवहारानुकूल चैतन्यके साथ अभेद ही अर्थका आपरोक्ष्य है ‡
† पूर्वोक्त ज्ञानापरोक्षत्व और अर्थापरोक्षत्वका अन्य प्रकारसे निर्वचन करते हैं, तात्पर्य यह है कि स्वरूपसुखके अपरोक्षरूप स्वरूपज्ञानमें अपरोक्षार्थविषयकत्वके न होनेसे अपरोक्षार्थविषयकत्वरूप अपरोक्षत्वकी उसमें अवस्थिति नहीं होगी, यदि कहा जाय, कि आत्मस्वरूप सुखानुभव साक्षिचैतन्यात्मक है, इसलिए उसके स्वप्रकाश होनेसे और स्वप्रकाशत्वके स्वविषयकत्वरूप होनेसे स्वरूपसुखविषयकत्वरूप अपरोक्षत्व रह सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि एक ही चैतन्यमें विषयविषयीभाव लक्षण सम्बन्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि सम्बन्ध दो में रहता है, अतः उक्त लक्षणोंमें अव्याप्ति ही है ।
‡ अपने व्यवहारके अनुकूल चैतन्यके साथ अभिन्नत्व ही अर्थका अपरोक्षत्व है, अन्तःकरण और उसके धर्मोका अपने व्यवहारमें अनुकूल साक्षिचैतन्यके साथ अभेद है, क्योंकि साक्षिचैतन्यमें उनका अध्यास है, वैसे ही घट आदिका भी उनके व्यवहारमें अनुकूल घटाकार-वृत्तिसे उपहित घटादिके अधिष्ठान चैतन्यके साथ अभेद है, वैसे ब्रह्मका भी अपने व्यवहारमें अनुकूल स्वविषयक वृत्तिसे उपहित साक्षिचैतन्यके साथ अभेद है, इसलिए कहीं-पर भी अव्याप्ति नहीं है । घट आदि अर्थोकी चैतन्यमें ही कल्पना होनेसे चैतन्यके साथ अभेद तो है, परन्तु अपरोक्षत्व सदा नहीं है, इसलिए स्वव्यवहारानुकूल विशेषण दिया
महाज्ञानकी शाब्द अपरोक्षता ] | भाषानुवादसहित | ४७९
एवं तत्तद्व्यवहारानुकूलचैतन्यस्य तत्तदर्थाभेदो । तथा च चैतन्यधर्म एवाऽऽपरोक्ष्यम्, न त्वनुमितित्वादिवद् अन्तःकरणवृत्तिधर्मः । अत एव सुखादिप्रकाशरूपे साक्षिणि स्वरूपसुखप्रकाशरूपे चैतन्ये चाऽऽपरोक्ष्यम् । न च घटाद्यैन्द्रियकवृत्तौ तदनुभवविरोधः । अनुभवस्य वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यगतापरोक्ष्यविषयत्वोपपत्तेः ।
ननूक्तं ज्ञानार्थयोरापरोक्ष्यं हृदयादिगोचरशाब्दवृत्तिशाब्दविषययोर-
वैसे ही तत्-तत् व्यवहारके अनुकूल चैतन्यके साथ तत्-तत् अर्थोंका अभेद ज्ञानका अपरोक्षत्व है । इस परिस्थितिमें अर्थात् चैतन्यके ही तत्-तत् व्यवहारमें अनुकूलत्वेन विवक्षित होनेपर, अपरोक्षत्व चैतन्यका ही धर्म है, अनुमितित्व आदिके समान अन्तःकरणकी वृत्तिका धर्म नहीं है*, इससे अर्थात् अपरोक्षत्वके चैतन्यधर्म होनेसे सुख आदिके प्रकाशरूप साक्षीमें और स्वरूपसुखप्रकाशरूप चैतन्यमें अपरोक्षत्व हो सकता है । यदि शङ्का हो कि ज्ञानापरोक्षत्वको चैतन्य धर्म माना जाय, तो घटादि विषयाकारवृत्तिमें अपरोक्षत्वव्यवहार विरुद्ध होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त अनुभवकी—वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाले अपरोक्षत्वको विषय मान करके भी—उपपत्ति हो सकती है ।
यदि शङ्का † हो कि ज्ञान और अर्थके आपरोक्ष्यकी हृदय आदिविषयक
गया है, घट आदि विषयक वृत्तिकी अवस्था में ही घट आदि अधिष्ठानभूत चैतन्य उनके व्यवहारमें अनुकूल होता है, सर्वदा नहीं होता, इसलिए अतिप्रसङ्ग नहीं है, यह भाव है ।
* यदि अपरोक्षत्वको वृत्तिधर्म माना जायगा, तो सुख, दुःख आदि पदार्थों की अपरोक्षवृत्तिका अङ्गीकार न होनेसे और सुखादिके अवभासक साक्षिचैतन्यमें अपरोक्षत्वरूप वृत्तिधर्मके न होनेसे सुख आदिका अपरोक्षत्वानुभव विरुद्ध होगा, इसलिए अपरोक्षत्वको ज्ञानका ही धर्म मानना चाहिए, वृत्तिका नहीं, यह तात्पर्य है । अपरोक्षत्वका परिष्कृत लक्षण यह हुआ—तत्तदर्थव्यवहारानुकूलत्वे सति तत्तदर्थाभिन्नत्वम् अर्थात् उन उन पदार्थोंके व्यवहारमें अनुकूल होकर उन उन पदार्थोंसे जो अभिन्नत्व है, वह ज्ञानापरोक्षत्व है । वह्निविषयक अनुमित्यात्मक वृत्तिसे उपहित जीव चैतन्यमें भी जो वह्निव्यवहारका अनुकूल है, सत्यन्त अर्थात् तत्-तदर्थव्यवहारानुकूलत्व है, अतः उसमें अतिव्याप्तिवारण करनेके लिए विशेष्य दल है । घटादिविषयक ज्ञानके अभावकालमें भी घटावच्छिन्न चैतन्यमें घटाद्यर्थाभिन्नत्व है, इसलिए उसके वारणके लिए विशेषण दल है, यह भाव है ।
† शङ्काका तात्पर्य यह है कि अन्तःकरणमें उत्पद्यमान सारे शरीरमें व्याप्त होनेवाली हृदय, नाड़ी और धर्म आदिको विषय करनेवाली शाब्दवृत्ति दैवयोगसे कदाचित् हृदय,
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तिप्रसक्तम् । तत्र दैवात् कदाचित् वृत्तिविषयसंसर्गे सति वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्य विषयावच्छिन्नचैतन्यस्य चाऽभेदाभिव्यक्तेरवर्जनीयत्वादिति चेद्,* न; परोक्षवृत्तेर्विषयावच्छिन्नचैतन्यगताज्ञाननिवर्तनाक्षमतया तत्राऽज्ञानेनाऽऽवृतस्य विषयचैतन्यस्याऽनावृतेन वृत्त्यवच्छिन्नसाक्षिचैतन्येनाऽभेदाभिव्यक्तेरभावादापरोक्ष्याप्रसक्तेः। अत एव जीवस्य संसारदशायां वस्तुतस्सत्यपि ब्रह्माभेदे न तदापरोक्ष्यम् , अज्ञानावरणकृतभेदसत्त्वात् । न चैवं ब्रह्मणो
शब्दवृत्ति और शाब्दज्ञान विषयमें अतिव्याप्ति होगी, क्योंकि उस स्थलमें दैवसे कदाचित् वृत्ति और विषयका परस्पर संसर्ग होनेसे वृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्य और विषयसे अवच्छिन्न चैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति अवश्य हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है ‡, क्योंकि परोक्षवृत्ति विषयावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाले अज्ञानकी निवृत्ति नहीं कर सकती है, इसलिए उक्त स्थलमें अज्ञानसे आवृत विषय चैतन्यका अनावृत वृत्त्यवच्छिन्न साक्षिरूप चैतन्यके साथ अभेदकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती है, इससे अपरोक्षत्वकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है । इसीसे संसारदशामें ब्रह्मके साथ जीवका अभेद है, तो भी उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है, क्योंकि अज्ञानके आवरणसे भेद है* ।
नाडी आदिसे अवच्छिन्न अन्तःकरणके प्रदेशमें उत्पन्न हो, तो हृदय आदिरूप विषयसे अवच्छिन्न चैतन्यका और हृदय आदिविषयक शाब्दवृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यका परस्पर अवश्य अभेद अभिव्यक्त होगा, क्योंकि घटादिस्थलमें वृत्तिका विषयके साथ सम्बन्ध होनेपर वृत्त्यवच्छिन्न और विषयावच्छिन्न चैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति मानी गई है। इस अवस्थामें हृदय आदिविषयक शाब्द और अनुमिति आदिवृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यरूप परोक्ष ज्ञानमें, जो कि हृदय आदि अर्थोंसे अभिन्न है और उनके व्यवहारमें अनुकूल है, ज्ञानके अपरोक्षत्वरूप लक्षणकी अतिव्याप्ति अवश्य हो सकती है, अतः तथाकथित ज्ञानका अपरोक्षत्व असिद्ध है।
‡ समाधानका तात्पर्य यह है कि जिन चैतन्योंका परस्पर अभेद विवक्षित है उनका अनावृतत्व भी अपेक्षित है, क्योंकि उनमें से एक भी चैतन्य यदि आवृत हो, तो उनका अभेद अभिव्यक्त नहीं हो सकता है, इसलिए हृदय आदि विषयको अवगाहन करनेवाली शाब्दवृत्ति स्थलमें उक्त लक्षणकी अतिव्याप्ति नहीं हो सकती है ।
* तात्पर्य यह है कि अभेदाभिव्यक्तिमें ही अपरोक्षत्वप्रयोजकताका अङ्गीकार होनेसे तत्त्वसाक्षात्कारके पूर्वकालमें ब्रह्मका अपने व्यवहारमें अनुकूल जीव चैतन्यके साथ अभेद होनेपर भी अभेदाभिव्यक्ति न होनेसे ब्रह्मका अपरोक्षत्व नहीं होता है ।
ब्रह्मज्ञानके शाब्दापरोक्षत्वका विचार ] भाषाअनुवादसहित ४८१
जीवापरोक्ष्यासम्भवादसर्वज्ञत्वापत्तिः, अज्ञानस्य ईश्वरं प्रत्यनावारकतया तं <sup>*</sup>प्रति जीवभेदानापादनात् । यद् अज्ञानं यं प्रत्यावरकम्, तस्य तं प्रत्येव स्वाश्रयभेदापादकत्वात् । अत एव चैत्रज्ञानेन तस्य घटाज्ञाने निवृत्ते अनिवृत्तं मैत्राज्ञानं मैत्रं प्रत्येव विषयचैतन्यस्य भेदापादकमिति न चैत्रस्य
यदि शङ्का हो कि अज्ञानकृत भेदके अभेदाभिव्यक्तिका प्रतिबन्धक होनेपर ब्रह्मको जीवका प्रत्यक्ष न होनेसे ईश्वरमें असर्वज्ञत्वकी प्रसक्ति <sup>*</sup> होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि <sup>†</sup> ईश्वरके प्रति अज्ञान आवरण नहीं करता है, अतः ईश्वरके प्रति जीवके भेदका वह अज्ञान आपादन नहीं करता है, क्योंकि जो अज्ञान <sup>‡</sup> जिसके प्रति आवरण करता हो वह उसीके प्रति अपने आश्रयके भेदका आपादन करता है। इसीसे <sup>×</sup> चैत्रके ज्ञानसे उसके घटाज्ञानके निवृत्त-होनेपर भी अनिवृत्त मैत्रका अज्ञान मैत्रके प्रति विषयचैतन्यके भेदका आपादक
<sup>*</sup> शङ्काका तात्पर्य यह है कि 'जीवका मैं साक्षात्कार करता हूँ' जीव मुझे अपरोक्ष है, इत्यादि जीवविषयक व्यवहारमें अनुकूल जो ब्रह्मका ज्ञान है, वह मायावृत्तिसे उपहित नहीं है, किन्तु ब्रह्मचैतन्य ही है, इस परिस्थितिमें ब्रह्मकर्तृक व्यवहारके विषयीभूत जीवका और ब्रह्मकर्तृक व्यवहारमें अनुकूल उक्त ब्रह्मचैतन्यका परस्पर अभेद होनेपर भी अभेदकी अभिव्यक्ति नहीं होनेसे ब्रह्मके प्रति जीव अपरोक्ष नहीं होगा, इसलिए ब्रह्मको सर्वज्ञत्व नहीं होगा, यदि कहा जाय कि ब्रह्मके जीवविषयक परोक्षज्ञानसे ही सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ईश्वरके परोक्षज्ञानका अङ्गीकार नहीं है ।
<sup>†</sup> जो अज्ञान है, वह जीवधर्मिक ब्रह्मप्रतियोगिक भेदका प्रयोजक है, क्योंकि जीवको ही 'मैं ब्रह्म नहीं हूँ' इस प्रकार अनुभव होता है, इसलिए ब्रह्मधर्मिक जीवप्रति-योगिक भेदका अज्ञान प्रयोजक नहीं है, क्योंकि 'मैं (ब्रह्म) जीव नहीं हूँ' इस प्रकारके ब्रह्मके अनुभवमें प्रमाण नहीं है । इस अवस्थामें ब्रह्मके प्रति जीवकी ब्रह्मके साथ अभेदाव्यक्तिमें प्रतिबन्धक अज्ञानकृत भेदके न होनेसे उक्त दोष नहीं है, इस अभिप्रायसे उक्त आक्षेपका परिहार करते हैं । और दूसरी बात यह भी है कि 'मैं अज्ञानी हूँ' इस प्रकार ईश्वरको अनुभव भी नहीं होता है, अतः ईश्वरके प्रति जीवका आवारक भी अज्ञान नहीं होता है ।
<sup>‡</sup> अर्थात् जिस जीवके प्रति जो अज्ञान विषयचैतन्यका आवारक है, उसी जीवके प्रति वह अज्ञान अपने आश्रयभूत विषयचैतन्यप्रतियोगिक भेदका प्रयोजक होता है, यह भाव है ।
<sup>×</sup> प्रकृतमें भाव यह है कि जैसे घटावच्छिन्न चैतन्यमें चैत्रके प्रति घटावच्छिन्न चैतन्यका आवारक अज्ञान रहता है, वैसे ही मैत्रके प्रति भी घटचैतन्यका आवारक अज्ञान भी उसमें रहता है । इससे चैत्रीय घटके ज्ञानसे चैत्रीय घटाज्ञानके—जो कि अपने आश्रय विषयचैतन्यके भेदका आपादक है—निवृत्त होनेपर भी चैत्रीय घटज्ञानसे अनिवृत्त घटचैतन्यमें रहनेवाला मैत्रके प्रति
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| ४८२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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घटापरोक्ष्यानुभवानुपपत्तिरपि । नन्वेवं वृत्तिविषयचैतन्याभेदाभिव्यक्ति- लक्षणस्याऽपरोक्ष्यस्य स्वविषयचैतन्यगताज्ञाननिवृत्तिप्रयोज्यत्वे तस्याज्ञा- ननिवृत्तिप्रयोजकत्वायोगाद् ज्ञानमात्रमज्ञाननिवर्तकं भवेदिति चेद्, न; 'यद् ज्ञानमुत्पद्यमानं स्वकारणमहिम्ना विषयसंसृष्टमेवोत्पद्यते, तदेवा- ज्ञाननिवर्तकम्' इति विशेपणाद्, ऐन्द्रियकज्ञानानां तथात्वात् । एवं च शब्दादुत्पद्यमानमपि ब्रह्मज्ञानं सर्वोपादानभूतस्वविषयब्रह्मसंसृष्टमेव
है, इसलिए चैत्रको घटके अपरोक्षत्वका अनुभव भी नहीं होता है । ❊यदि शङ्का हो कि ऐसा माननेपर अर्थात् वृत्त्यवच्छिन्न और विषयावच्छिन्न चैतन्यके अभेदकी अभिव्यक्तिरूप अपरोक्षत्वके अपने विषयमें रहनेवाले अज्ञानकी निवृत्तिसे प्रयोज्य होनेपर उसमें अज्ञाननिवृत्तिकी प्रयोजकताका अभाव होनेसे ज्ञानमात्र ही अज्ञानका निवर्तक प्रसक्त होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो उत्पद्यमान ज्ञान अपने कारणकी सामर्थ्यसे विषयसंसृष्ट ही उत्पन्न होता है, वही अज्ञानका निवर्तक होता है, ऐसा विशेषण होनेसे इन्द्रियजन्य ज्ञान ही अज्ञानके निवर्तक होते हैं, सब ज्ञान नहीं । इसी प्रकार शब्दसे उत्पद्यमान ब्रह्मज्ञान भी सबके प्रति उपादानभूत अपने विषयरूप ब्रह्मसे संसृष्ट ही उत्पन्न
घटावारक अज्ञान मैत्रके प्रति ही स्वाश्रयभूत घटचैतन्यप्रतियोगिक भेदका आपादक होगा, मैत्रका अज्ञान चैत्रके प्रति घटावच्छिन्न चैतन्यका अनावारक है, तथापि चैत्रके प्रति स्वाश्रय- भूत घटावच्छिन्न चैतन्यप्रतियोगिक भेदका आपादक नहीं है, इस अवस्था में चैत्रके घटज्ञानसे चैत्रके अज्ञानकी निवृत्ति होनेसे तत्कृत भेदकी निवृत्ति होनेपर भी चैत्र और घटावच्छिन्न चैतन्यका परस्पर मैत्राज्ञानकृत भेद होनेसे अभेदकी अभिव्यक्ति नहीं है, अतः चैत्रको घटके अपरोक्षत्वका अनुभव अनुपपन्न ही होगा, इससे मैत्रका अज्ञान मैत्रके प्रति जैसे स्वाश्रय चैतन्यका भेदापादक है, वैसे चैत्रके प्रति स्वाश्रयचैतन्यप्रतियोगिक भेदका आपादक नहीं है, क्योंकि चैत्रके प्रति स्वाश्रय चैतन्यका आवारक नहीं है, ऐसा कहना होगा, इसलिए उक्त व्यवस्थाकी सिद्धि होगी ।
* तात्पर्य यह है कि 'अपरोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तक होता है' इस प्रकारसे ज्ञानके अज्ञान- निवर्तकत्वमें अपरोक्षत्वको प्रयोजक नहीं मान सकते हैं, क्योंकि ज्ञानगत अपरोक्षत्व अज्ञानकी निवृत्तिके अधीन है, यदि कहो कि ज्ञानगत अपरोक्षत्व अज्ञाननिवृत्तिका प्रयोजक नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे ज्ञानमात्रमें अज्ञाननिवर्तकत्वकी प्रसक्ति होनेसे परोक्षज्ञानमें भी अज्ञाननिवर्तकत्वकी प्रसक्ति होगी, इस अभिप्रायसे इस ग्रन्थसे शङ्का करते हैं ।
ब्रह्मज्ञानके शाब्दापरोक्षत्वका विचार ] भाषानुवादसहितं ४८३
उत्पद्यत इति तस्याऽज्ञाननिवर्तकत्वमज्ञाननिवृत्तौ तन्मूलभेदप्रविलयादा-*परोक्ष्यं चेत्युपपद्यतेतराम् ।
नन्वध्ययनकालेऽपि शब्दात् स्यादपरोक्षधीः ।
सत्ताधृतिर्विचाराच्चेन्मननादिश्रमो वृथा ॥ २५ ॥
मैवं पुन्दोषशान्त्यर्थं मननादेर्विधानतः ।
तत्तत्संसृष्टवृत्त्येत्थं तदज्ञाननिवर्हणम् ॥ २६ ॥
यदि शङ्का हो कि अध्ययनकालमें भी वेदान्तशब्दसे अपरोक्ष ज्ञानके होनेसे विचार व्यर्थ है, यदि कहें कि ब्रह्मसत्ताके निश्चयात्मक ज्ञानके लिए उसकी आवश्यकता है, तो मनन आदिकी निरर्थकता होगी, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि पुरुषदोषकी निवृत्ति करनेके लिए मनन आदिका विधान होनेसे तत्-तत् अर्थोंसे संसृष्ट वृत्तिसे तत्तद्विषयक अज्ञानकी निवृत्ति होती है ॥ २५ ॥ २६ ॥
नन्वेवमध्ययनगृहीतवेदान्तजन्येनापि तज्ज्ञानेन मूलाज्ञाननिवृत्त्यापरोक्ष्यं किं न स्यात् । न च तत्सत्तानिश्चयरूपत्वाभावाद् नाज्ञान-निवर्तकमिति वाच्यम्, तथाऽपि कृतश्रवणस्य निर्विचिकित्सशाब्दज्ञानेन तन्निवृत्त्या मननादिवैयर्थ्यापत्तिरिति चेद्, न; सत्यपि श्रवणाद् निर्विचिकित्सज्ञाने चित्तविक्षेपदोषेण प्रतिबन्धाद् अज्ञानानिवृत्त्या तन्निराकरणे होता है, इसलिए उसमें अज्ञानकी निवर्तकता है और अज्ञानकी निवृत्तिहोनेसे तन्मूलक भेदका विनाश होनेसे अपरोक्षत्वकी भी उपपत्ति हो सकती है ।
यदि शङ्का हो कि ऐसा होनेपर अध्ययनसे सम्पादित वेदान्तसे उत्पन्न ब्रह्मज्ञानसे भी मूलभूत अज्ञानकी निवृत्ति होनेसे अपरोक्षत्व क्यों नहीं होता ? यदि कहो कि विचारके पूर्व अध्ययनगृहीत वेदान्तजन्य ज्ञान सत्तानिश्चयात्मक नहीं है, अतः अज्ञानका निवर्तक नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि निवर्तक ज्ञानमें सत्तानिश्चयरूपत्व विशेषण देनेपर भी कृतश्रवण पुरुषको सत्तानिश्चयात्मक शाब्दज्ञान होनेसे उसीसे अज्ञानकी निवृत्ति हो सकती है, फिर मनन आदि निरर्थक प्रसक्त होंगे, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि श्रवणसे सत्तानिश्चयात्मक ज्ञानके होनेपर भी चित्तके विक्षेपात्मक दोषसे प्रतिबन्ध होनेके कारण अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है, अतः उसके (अज्ञानके) निराकरण
* अर्थात् जो ज्ञान नियमतः विषयसंसृष्टरूपसे उत्पन्न हो, वही ज्ञान अज्ञानका निवर्तक होता है, ऐसे नियमका अङ्गीकार करनेसे, यह भाव है ।
४८४ • सिद्धान्तलेशसंग्रहे [ तृतीय परिच्छेद
मनननिदिध्यासननियमविध्यर्थानुष्ठानस्याऽर्थवत्त्वाद्, भवान्तरीयमननाद्यनुष्ठाननिरस्तचित्तविक्षेपस्य उपदेशमात्राद् ब्रह्मापरोक्ष्यस्य इष्यमाणत्वाच्चेत्याहुः ॥ १० ॥
नन्वेवं वृत्त्यभिव्यक्तचिदंशे विषयैक्यतः ।
श्रवणादिमतो नश्येन्मूलाज्ञानं घटेक्षणात् ॥ २७ ॥
अब शङ्का होती है कि वृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यांशमें विषयका ऐक्य होनेसे श्रवणादिसे युक्त पुरुषको घटके ज्ञानसे भी मूलाज्ञानका विनाश होना चाहिए ॥२७॥
अथैवमपि कृतनिदिध्यासनस्य वेदान्तजन्यब्रह्मज्ञानेनेव घटादिज्ञानेनाऽपि ब्रह्माज्ञाननिवृत्तिः किं न स्यात् । न च तस्य ब्रह्माविषयत्वाद् न ततो ब्रह्माज्ञाननिवृत्तिरिति वाच्यम्, 'घटस्सन्' इत्यादिवुद्धिवृत्तेः सद्रूप-
करनेके लिए मनन और निदिध्यासनकी नियमविधिसे प्राप्त अर्थके अनुष्ठानकी अवश्य अपेक्षा है, और जन्मान्तरीय † मनन आदिके अनुष्ठानसे जिसके चित्तकी अस्थिरता ( विक्षेप ) निवृत्ति हुई है, ऐसे पुरुषको केवल उपदेशमात्रसे भी ब्रह्मापरोक्ष इष्ट ही है ॥१०॥
* अब शङ्का होती है कि विक्षेपदोषकी निवृत्तिके लिए मनन आदिकी अपेक्षा होनेपर भी जिसने निदिध्यासन किया है, ऐसे पुरुषको वेदान्तोंसे उत्पन्न ब्रह्मज्ञानसे जैसे ब्रह्मविषयक अज्ञानकी निवृत्ति होती है, वैसे ही उसके घटादिज्ञानसे भी अज्ञानकी निवृत्ति क्यों नहीं होती है ? यदि कहो कि घटविषयक ज्ञान ब्रह्मविषयक नहीं है, अतः वह ब्रह्माज्ञानका निवर्तक नहीं है, तो यह भी
† तात्पर्य यह है कि यदि मनन आदिका प्रयोजन विक्षेपशब्दसे कहलानेवाले असम्भावना, विपरीत भावना आदिकी निवृत्ति है, तो जिस अधिकारी पुरुषका जन्मान्तरीय मनन आदिके सहित श्रवणके अनुष्ठानसे समस्त विक्षेपदोष निवृत्त हो गया है, उस पुरुषको उपदेशमात्रसे भी सत्तानिश्चयात्मक और अप्रतिबद्ध ब्रह्मज्ञान उत्पन्न होता है, इसलिए उसको इस जन्ममें 'श्रवण, मनन, आदिके अनुष्ठानके विना भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति और ब्रह्मका अपरोक्षज्ञान हो सकता है,' इसलिए उक्त पुरुषको श्रवणादिके अनुष्ठानके विना ही यदि ब्रह्मज्ञान माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं है ।
* शङ्काका अभिप्राय यह है कि जिसने निदिध्यासन किया है, ऐसे पुरुषको ब्रह्मज्ञानसे जैसे मूलाज्ञानकी निवृत्ति होती है, वैसे ही घटज्ञानसे भी मूल अज्ञानकी निवृत्ति होनी चाहिए, क्योंकि घटादिवृत्ति भी मूलाज्ञानके विषयभूत चैतन्यको ही विषय करती है ।
अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भाषानुवादसहित ४८५
ब्रह्मविषयत्वोपगमात् । न च तत्र घटाद्याकारवृत्त्या तदज्ञाननिवृत्तौ स्वतः स्फुरणादेव तदवच्छिन्नं चैतन्यं सदिति प्रकाशते, न तस्य घटाद्याकारवृत्तिविषयत्वमिति वाच्यम्, तदभावे घटविषयं ज्ञानं तदवच्छिन्नचैतन्यविषयमज्ञानमिति भिन्नविषयेण ज्ञानेन तदज्ञाननिवृत्तेरयोगाद्, जडे आवरणकृत्याभावेन घटस्याऽज्ञानाविषयत्वात् । न च घटादिवृत्तेस्तदवच्छिन्नचैतन्यविषयत्वेऽपि अखण्डानन्दाकारत्वाभावाद् न ततो मूलाज्ञाननिवृत्तिरिति वाच्यम्, वेदान्तजन्यसाक्षात्कारेऽपि तदभावात् । न हि
युक्त नहीं है, क्योंकि 'घटः सन्' ( घट सत् है ) इत्यादि अन्तःकरणकी वृत्तिको भी सद्रूप ब्रह्मविषयक माना गया है। यदि शङ्का हो कि घटादिस्थलमें घटाकारवृत्तिसे घटाज्ञानकी निवृत्ति होनेपर स्वतः स्फुरणसे ही घटावच्छिन्न चैतन्यका सद्रूपसे प्रकाश होता है, अतः ब्रह्ममें घटाकारवृत्तिविषयता नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि चैतन्यको यदि घटादिवृत्तिका विषय न माना जाय, तो ज्ञान घटविषयक होगा और अज्ञान घटावच्छिन्नचैतन्यविषयक होगा, इसलिए भिन्नविषयक ज्ञानसे घटाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, और जड़में † आवरण कार्यका अभाव होनेके कारण घट अज्ञानका विषय ही नहीं होगा। यदि शङ्का हो कि घटादिके आकारमें परिणत वृत्ति घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यको अवश्य विषय करती है, तथापि वह अखण्ड आनन्दाकार नहीं है, इसलिए घटज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि वेदान्तजन्य साक्षात्कारमें भी अनवच्छिन्नानन्दाकारत्व नहीं भासता है, अतः उससे भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि वेदान्तज्ञानमें अखण्डत्व ( अनवच्छिन्नत्व ) या आनन्दाकारत्व कोई धर्म है ही नहीं। यदि वेदान्तजन्य ज्ञानमें
† यदि शङ्का हो कि केवल घटविषयक ज्ञानसे घटावच्छिन्न चैतन्यविषयक अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि ज्ञान और अज्ञान समानविषयक नहीं हैं, अतः घटज्ञानके साथ अज्ञानकी समानविषयकता लानेके लिए अज्ञानको भी केवल घटादि जड़विषयक मानना चाहिए, इसपर 'जडे आवरणकृत्याभावेन' इससे पूर्वपक्षी कहता है कि जड़में तो स्वतः जड़त्व हेतुसे प्रमाणकी अप्रवृत्तिदशामें अप्रकाशकी उपपत्ति हो सकती है, फिर जड़के अप्रकाशके लिए आवरणकी कल्पना व्यर्थ है, इस अवस्थामें वेदान्तजन्य ज्ञानके समान घटादिज्ञान भी ब्रह्मचैतन्यविषयक होनेसे मूलाज्ञानका समानविषयक है, अतः उससे भी अज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग आ सकता है, यह भाव है।
| ४८६ | सिद्धान्तलेशसंग्रहं | [ तृतीय परिच्छेद |
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तत्राऽखण्डत्वमानन्दत्वं वा कश्चिदस्ति प्रकारः । वेदान्तानां संसर्गागोचर-प्रमाजनकत्वलक्षणाखण्डार्थत्वहानापत्तेः । न च वेदान्तजन्यज्ञानादेव तन्निवृत्तिनियम इति वाच्यम्, क्लृप्तसाज्ञाननिवर्तकत्वप्रयोजकस्य रूपस्य ज्ञानान्तरेऽपि सद्भावे तथा नियन्तुमशक्यत्वात् । न च घटाद्याकारवृत्ति-विषयस्याऽवच्छिन्नचैतन्यस्याऽपि कल्पितत्वेन यन्मूलाज्ञानविषयभूतं सत्य-मनवच्छिन्नं चैतन्यम्, तद्विषयत्वाभावाद् घटादिवृत्तीनां निवर्त्यत्वाभि-
अखण्डत्व, आनन्दत्वादि माने जाँय, तो संसर्गाविषयकप्रमाजनकत्वरूप अखण्डार्थत्वका व्याघात होगा । यदि शङ्का हो कि वेदान्तजन्य ज्ञानसे ही मूलाज्ञानकी निवृत्ति होती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अज्ञाननिवर्तकत्वमें प्रयोजकीभूत क्लृप्त स्वरूपका अन्यज्ञानमें भी अवस्थान होनेसे वैसा नियम कर ही * नहीं सकते हैं । यदि शङ्का हो कि घटाद्याकारवृत्तिके विषय अवच्छिन्न चैतन्यके कल्पित होनेसे सत्य अनवच्छिन्न चैतन्य उसका विषय नहीं है, अतः घटादि वृत्तियोंमें निवर्त्यत्वरूपसे अभिमत अज्ञानसमानविषयत्वरूप क्लृप्त प्रयोजक ही नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उसमें अर्थात् अवच्छिन्न चैतन्यमें †
* वेदान्तजन्य ज्ञानमें क्लृप्त मूलाज्ञानसमानविषयकत्वरूप सत्तानिश्चयत्वरूप अप्रतिबद्धत्वात्मक जो मूलाज्ञाननिवर्तकत्वरूप प्रयोजकत्व है, वह निदिध्यासनके परिपाककालमें चक्षु आदिसे उत्पन्न होनेवाली घटादि वृत्तिमें भी है, अतः वेदान्तजन्य ज्ञानसे ही मूलाज्ञानकी निवृत्ति होती है, घटादि ज्ञानसे नहीं होती है, इस प्रकार नियमन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि सत्तानिश्चयत्वके समान वेदान्तजन्यत्वको प्रयोजकके विशेषण करनेमें गौरव है, यह भाव है ।
† अवच्छेद्य चैतन्यांश भी, जो कि घटादिवृत्तिका विषय है, अकल्पित मूलाज्ञानका विषयीभूत ब्रह्मचैतन्यात्मक ही है, अतः घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यविषयक वृत्तिमें भी—निवर्त्यत्वेन अभिमत जो अज्ञान है, उसका समानविषयकत्वरूप वेदान्तजन्य ज्ञानमें क्लृप्त—प्रयोजक है, तात्पर्य यह है कि घटाद्यवच्छिन्न चैतन्य कल्पित है, इसमें चैतन्यको अकल्पित मानने पर यह दोष है, यदि कल्पित मानेंगे, तो घट आदिके समान उक्त अवच्छिन्न चैतन्य जड़ ही होगा, इस परिस्थितिमें उसके अज्ञानविषयत्व न होनेसे अवस्थारूप अज्ञानके प्रति मूलाज्ञानका विषयभूत ब्रह्मचैतन्य ही विषय कहना होगा, क्योंकि निर्विषयक अज्ञान नहीं होता, इस अवस्थामें ब्रह्मचैतन्यविषयक अवस्थारूप अज्ञानके निवर्तकत्वकी उपपत्तिके लिए घटादिवृत्तियोंमें भी मूलाज्ञानविषय ब्रह्मचैतन्यविषयकत्व मानना पड़ेगा, क्योंकि घटादिवृत्तियोंके सत्यब्रह्मविषयक न होनेसे अवस्थारूप अज्ञानके साथ समानविषयकत्वके न होनेसे आवृत्तियोंमें अवस्थारूप अज्ञाननिवर्तकत्वकी प्रसक्ति नहीं होगी ।
अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भाषानुवादसहित ४८७
मताज्ञानसमानविषयत्वलक्षणं क्लृप्तं प्रयोजकमेव नाऽस्तीति वाच्यम्; तत्राऽवच्छेदकांशस्य कल्पितत्वेऽप्यवच्छेद्यांशस्याऽकल्पितमूलाज्ञानविषयचैतन्यरूपत्वात्, तस्य कल्पितत्वे घटवज्जडतया अवस्थाऽज्ञानं प्रत्यपि विषयत्वायोगाेनावस्थाऽज्ञानस्य मूलाज्ञानविषयाकल्पितचैतन्यविषयत्वस्य वक्तव्यतया तन्निवर्तकघटादिज्ञानस्याऽपि तद्विषयत्वावश्यम्भावेन तत्पक्षेऽपि ततो मूलाज्ञाननिवृत्तिप्रसङ्गस्याऽपरिहारात् ।
नैषमत्राहुराचार्या न सन्दृश इति श्रुतेः ।
चित् चक्षुराद्ययोग्यैव चिद्द्वाराऽस्त्यावृतिर्जडे ॥ २८ ॥
उक्त पूर्वपक्षके उत्तरमें आचार्य कहते हैं कि 'न सन्दृशे' इस श्रुतिसे ब्रह्मचैतन्य चक्षु आदिका अयोग्य ही है । जड़में चैतन्य द्वारा अज्ञानका आवरण होता है ॥ २८ ॥
अत्राऽऽहुराचार्याः—न चैतन्यं चक्षुरादिजन्यवृत्तिविषयः ।
अवच्छेदक अंशके कल्पित होने पर भी अवच्छेद्य अंश मूलाज्ञानका विषयीभूत अकल्पित ब्रह्मचैतन्यात्मक है, यदि अवच्छेद्य अंशको कल्पित माना जाय, तो घटके समान जड़ होनेसे अवस्थारूप अज्ञानके प्रति भी वह विषय नहीं हो सकता है, इसलिए अवस्थारूप अज्ञानको भी मूलभूत अज्ञानका विषयभूत अकल्पित चैतन्यविषयकं कहना होगा, इससे अवस्थारूप अज्ञानके निवर्तक घटादिज्ञानमें भी मूलाज्ञानका विषयीभूत ब्रह्मचैतन्यविषयकत्व अवश्य प्रसक्त होगा, अतः अवच्छेद्यांशके कल्पितत्वपक्षमें भी घटादिज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग हटा नहीं सकते हैं ।
इस विषयमें आचार्य कहते हैं कि * चक्षु आदिसे उत्पन्न हुई
* पूर्वोक्त आक्षेपकर्ताका भाव यही सिद्ध होता है कि घटादिज्ञान भी मूलाज्ञानका निवर्तक होगा, क्योंकि वह भी चैतन्यविषयक है, जैसे कि वेदान्तजन्यज्ञान चैतन्यविषयक होता है । परन्तु इस अनुमानमें हेतुकी सिद्धि नहीं है, इस अभिप्रायसे उक्त पूर्वपक्षका परिहार करते हैं, अर्थात् चक्षु आदिसे उत्पन्न होनेवाला विज्ञान यदि आत्माको विषय करनेवाला है, तो उससे मूलाज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग आ सकता है, परन्तु चक्षुरादिजन्यज्ञान वेदान्तजन्यज्ञानके समान आत्माको विषय करनेवाला है ही नहीं, अतः उक्त अतिप्रसङ्ग नहीं है, इसमें प्रमाण भी 'न सन्दृशे' इत्यादि श्रुति है, इस श्रुतिका तात्पर्य यही है कि चक्षु आदि इन्द्रियोंकी सामर्थ्य पटादि जड़ पदार्थोंके अवगाहन करनेमें ही है, आत्माके अवगाहन करनेमें नहीं, इससे परमाणु आदिके ग्रहणमें जैसे चक्षुकी योग्यता नहीं है, वैसे आत्माके ग्रहणमें भी इसकी सामर्थ्य
| ४८८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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‘न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् ।
पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूस्तस्मात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्’ ॥
इत्यादिश्रुत्या तस्य परमाण्वादिवत् चक्षुराद्ययोग्यत्वोपदेशाद्, ‘औ-
पनिषदम्’ इति विशेषणाच्च । न च—
‘सर्वप्रत्ययवेद्ये वा ब्रह्मरूपे व्यवस्थिते’ ।
इत्यादिवार्त्तिकविरोधः ; तस्य घटाद्याकारवृत्त्युदये सति आवरणा-
भिभवात् स्वप्रभं सद्रूपं ब्रह्म ‘घटस्सन्’ इति घटवद् व्यवहार्यं भवतीत्यौ-
वृत्तिका विषय चैतन्य नहीं है, क्योंकि ‘न सन्दृशे०’ (आत्माका स्वरूप चक्षुके योग्य नहीं है, इसलिए आत्माको कोई भी चक्षुसे नहीं देखता है, इन्द्रियाँ ईश्वरसे जड़ अर्थोंके ग्रहण करनेके लिए ही बनाई गई है, अतः बाह्य पदार्थोंका ही इन्द्रियाँ ग्रहण करती हैं, अन्तरात्माका—चैतन्यका—ग्रहण नहीं करती हैं) इत्यादि श्रुतिसे परमात्माको परमाणु आदिके समान चक्षुका अयोग्य ही बतलाया है और ‘औपनिषदम्’ (केवल उपनिषत्प्रमाणसे गम्य) ऐसा आत्मामें विशेषण भी दिया गया है ।
यदि शङ्का हो कि ‘सर्वप्रत्ययवेद्ये०’ (सब प्रत्ययोंमें वेद्यरूपसे व्यवस्थित ब्रह्मरूप वस्तुमें) इत्यादि वार्त्तिकके साथ विरोध होगा? नहीं, नहीं होगा, क्योंकि उस वार्त्तिकवचनका तात्पर्य यह है—घटाद्याकारवृत्तिके उदित होने पर आवरणके विनष्ट होनेसे स्वप्रकाश सद्रूप ब्रह्म ‘घटः सन्’ इस प्रकार घटके समान व्यवहृत किया जाता है, इसलिए वह गौणरूपसे .वृत्तिसे वेद्य है*।
नहीं है, अतः पूर्वोक्त प्रसङ्ग अनुचित है, यदि ‘सर्वप्रत्ययवेद्ये’ इत्यादि वार्त्तिकके आधारपर शंका की जाय कि सभी घटादिज्ञानोंमें ब्रह्मका प्रकाश होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त श्रुतिके जबरदस्त प्रमाण होनेसे उक्त वार्त्तिक गौणार्थक है, अर्थात् जैसे घटमें घटविषयक वृत्तिके अधीन व्यवहारकी विषयता है, वैसे ही घट आदिका अधिष्ठानभूत सद्रूप ब्रह्म भी घटादिके आकारमें परिणत अन्तःकरणकी वृत्तिके अधीन व्यवहारका विषय है, इसलिए ‘सद्रूप ब्रह्म घटादिज्ञानसे वेद्य है’ इस प्रकारका औपचारिक व्यवहार होता है । यदि शङ्का हो कि परोक्षवृत्तियोंमें आवरणाभिभावकत्वका अभाव होनेसे वहां पर उक्त व्यवस्था नहीं घट सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त वार्त्तिकमें उक्त प्रत्ययशब्दका अर्थ है—आवरणाभिभावक वृत्ति, अतः पूर्वोक्त आक्षेप सर्वथा अनुपपन्न है, यह समझना चाहिए ।
* इसका प्रकृतमें तात्पर्य यह है कि उक्त प्रकारसे घटादि वृत्तिको यदि चैतन्यविषयक न माना जाय, तो घटज्ञानसे घटावच्छिन्न चैतन्यावारक अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि समानविषयक