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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

ब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७१


इष्ट ईश उपादानं सर्वस्मिन् व्यावहारिके ।
प्रातिभासिककार्ये तु जीव इत्यपरे जगुः ॥२२॥

सम्पूर्ण व्यावहारिक पदार्थोंका उपादान ईश्वर है और प्रतिभासिक पदार्थोंका उपादान जीव है, ऐसा अन्य लोग कहते हैं ॥ २२ ॥

“एतस्माज्जायते प्राणो मनस्सर्वेन्द्रियाणि च ।
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी” ॥

इत्यादिश्रुतेः कृत्स्नव्यावहारिकप्रपञ्चस्य ब्रह्मैव उपादानम् । जीवस्तु प्रातिभासिकस्य स्वप्नप्रपञ्चस्य च । ‘कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा’

‘एतस्माज्जायते०’ ( इस प्रकृत ईश्वरलूप उपादानसे प्राण, मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज और सम्पूर्ण पदार्थोंकी आधारभूत पृथ्वी उत्पन्न हुई ) इत्यादि श्रुतिसे सम्पूर्ण व्यावहारिक घट आदि प्रपञ्चका ब्रह्म ही उपादान कारण है और प्रातीतिक स्वप्नके प्रपञ्चोंका अर्थात् स्वप्न सृष्टिमें देखे जानेवाले प्रतीतिकालावस्थायी भ्रमात्मक पदार्थोंका जीव ही उपादान कारण है, क्योंकि ‘कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा’ * इस अधिकरणमें ‘जगत्का उपादान


धर्त्ता माना जाय, तो उसके मायावी होनेसे उसमें व्यामोहका अभाव है, यह नहीं कह सकते । और इच्छाके अनुसार माया कर सकते हैं और अविद्या नहीं कर सकते यह युक्ति भी भेदमें नहीं दे सकते, क्योंकि मन्त्र और औषध आदिमें कर्ताका स्वातन्त्र्य है, मायामें नहीं है अविद्यामें भी द्विचन्द्र आदि भ्रम कर्ताकी इच्छाके अधीन होते हैं । और शास्त्रीयव्यवहारसे भी माया एवं अविद्याका भेद नहीं है, क्योंकि ‘भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’ इत्यादि श्रुतिसे यथार्थ ज्ञानसे निवर्त्य अविद्यामें मायाशब्दका प्रयोग होता है । ‘तरत्यविद्यां विततां हृदि यस्मिन्निवेशिते। योगी मायाममेयाय तस्मै विद्यात्मने नमः ॥’ इस श्रुतिमें भी माया और अविद्या-का सामानाधिकरण्यसे ( एकार्थकत्वसे ) निर्देश कर तत्त्वज्ञानसे तैरना बतलाया है । इसी प्रकार भगवान् सूत्रकारने ‘मायामात्रन्तु कात्स्न्ये॑नानभिव्यक्तस्वरूपत्वात्’ इस सूत्रमें स्वप्नमें भी मायाशब्दका प्रयोग किया है । भाष्यकारने भी ‘अविद्यामायाऽविद्यात्मिका मायाशक्तिः’ ( अविद्या-माया है मायाशक्ति भी अविद्यारूप है ) इस वाक्यसे माया और अविद्याका अभेद दर्शाया है अतः यह स्पष्ट हुआ कि माया और अविद्याका अभेद है, भेद नहीं है ।

* ‘कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा’ इस सूत्रका अर्थ है, यदि ब्रह्मका सर्व अंशसे परिणाम माना जाय, तो कृत्स्नप्रसक्ति होगी अर्थात् जैसे दधिके आकारसे परिणत दुग्धकी अपने स्वरूपसे हानि होती है, वैसे ही ब्रह्मकी अपने रूपसे हानि होगी । और एक देशसे

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७२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

( उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ७ सू० २६ ) इत्यधिकरणे ब्रह्मणो जगदुपादानत्वे तस्य कात्स्न्येन जगदाकारेण परिणामे विकारातिरेकेण ब्रह्माभावो वा, एकदेशेन परिणामे निरवयवत्वश्रुतिविरोधो वा प्रसज्यते इति पूर्वपक्षे 'आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि' ( उ० मी० अ० २ पा० १ सू० २८ ) इति सूत्रेण विवर्तवादाभिप्रायेण स्वप्नदृशि जीवात्मनि स्वरूपानुपमर्दनेनाऽनेकाकारस्वाप्नप्रपञ्चसृष्टिवत् ब्रह्मणि वियदादिसृष्टिरुपपद्यते इति सिद्धान्तितत्वादित्यन्ये ।


ब्रह्म है' इस सिद्धान्तमें शङ्का की है कि क्या ब्रह्म सर्वांशसे जगदाकारमें परिणत होता है या एकदेशसे ? प्रथम पक्षमें ( जैसे दधिरूपमें दूधके परिणत होनेसे दूध रहता ही नहीं है, वैसे ही ) ब्रह्मके सर्वांशसे जगद्रूपमें परिणत होनेपर जगत्से पृथक् ब्रह्मका अस्तित्व नहीं रहेगा; यदि द्वितीय पक्ष अर्थात् एकदेशसे ब्रह्मका परिणाम माना जाय, तो ब्रह्मके निरवयवत्वका प्रतिपादन करनेवाली ( 'अजो नित्यः शाश्वतो' ( आत्मा उत्पन्न नहीं होता है, नित्य—अवयवरहित और सनातन है ) इस श्रुतिके साथ विरोध होगा। अतः दोनों मार्गोंसे ब्रह्म जगत्का उपादान नहीं हो सकता है, इस प्रकार पूर्वपक्षके प्राप्त होनेपर † 'आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि' इस सूत्रसे विवर्तवादके अभिप्रायसे 'जैसे जीवके स्वरूपके बिगड़े बिना ही स्वप्न देखनेवाले जीवात्मामें अनेक आकार-प्रकारवाली स्वप्न पदार्थोंकी सृष्टि बनती है, वैसे ही ब्रह्मके स्वरूपमें कुछ भी विकृति न होकर आकाश आदि प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है' इस प्रकारका सिद्धान्त किया गया है, ऐसा भी कुछ लोगोंका मत है ।


परिणाम माना जाय, तो निरवयवत्वशब्दकोप होगा अर्थात् ब्रह्मकी निरवयवताका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिके साथ विरोध होगा।

† आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि। इस सूत्रमें प्रथम 'च' शब्दका अर्थ यथा ( जैसे ) है और द्वितीयका अर्थ तथा ( वैसे ही ) है और 'हि' शब्द हेतु अर्थमें है। इसलिए जैसे आत्मनि-स्वप्नद्रष्टा जीवमें विचित्र—विलक्षण रथ आदि सृष्टि प्रतीत होती है, और उसके स्वरूपका विनाश नहीं होता है, क्योंकि स्वप्नावस्थाकी निवृत्तिके बाद भी साक्षीरूपसे जीव चैतन्य पूर्ववत् ही रहता है, वैसे ही ब्रह्ममें भी स्वरूपविनाशके बिना विचित्र आकाश आदि सृष्टि उत्पन्न होती है।

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ब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७३


स्वात्ममोहात् समस्तस्य सेश्वरस्य प्रकल्पकः ।
स्वप्नवज्जीव एवैको नापरोऽस्तीति केचन ॥ २३ ॥

केवल एक जीव ही अज्ञानसे स्वप्न पदार्थोंके समान ईश्वरसहित इस सब प्रपञ्चका कारण है, दूसरा कोई कारण नहीं है, ऐसा कुछ लोगोंका मत है ॥ २३ ॥

जीव एव स्वप्नद्रष्टृवत् स्वस्मिन्नीश्वरत्वादिसर्वकल्पकत्वेन सर्वकारणम् इत्यपि* केचित् ॥ ४ ॥

स्वप्नद्रष्टाके समान अपनेमें ईश्वरत्व आदि सभी वस्तुओंकी कल्पना करनेके कारण जीव ही सबके प्रति उपादान कारण है, यह भी कुछ लोगोंका मत है । भाव यह है कि पूर्वग्रन्थमें जगत्का शुद्ध ब्रह्म उपादान है या ईश्वररूप ब्रह्म उपादान है या जीवरूप ब्रह्म उपादान इस प्रकार तीन विकल्प किये गये हैं, उनमें से तृतीय पक्षको लेकर कहते हैं—जीव ही उपादान है अर्थात् अवच्छेद या प्रतिबिम्बवादकी अपेक्षा न करके परिपूर्ण चिदात्मा ही अविद्यासे जीवभावको प्राप्त होकर अपनेको सभीका ईश्वर मानता है अर्थात् 'मैं ही ईश्वर हूँ' इस प्रकार कल्पना करता है, अनन्तर अपनेसे गगन आदिकी उत्पत्तिकी कल्पना करता है और अपने आप अपनेसे ही कल्पित ईश्वरका भेद और उससे 'मैं नियम्य हूँ' इस प्रकार कल्पना करता है, इसी रीतिसे मनुष्य आदिभावकी क्रमसे कल्पना करता है । जैसे 'आकाश आदि प्रपञ्च व्यवहारमें सत्य है और स्वप्नप्रपञ्च प्रातीतिक है' इस पक्षमें स्वप्नका द्रष्टा जीव ही—( स्वप्नमें ) देवादिभावसे, उसके नियन्ता परमेश्वररूपसे और उससे मैं भिन्न हूँ—इत्यादिरूपसे अपनी कल्पना करता है, वैसे ही दृष्टिसृष्टिपक्षमें श्रद्धा रखनेवाले कुछ महाजन अपने आपमें सब प्रपञ्चकी कल्पना करनेवाला जीवस्वरूपापन्न ब्रह्म ही जगत्का उपादान है, ऐसा स्वीकार करते हैं ॥ ४ ॥


* यहाँ ज्ञातव्यविशेष यह है कि इस पक्षमें अर्थात् जीवभावापन्न ब्रह्म जगत्का उपादान है, इस पक्षमें जीवसे इतर ईश्वर रहेगा नहीं, इससे एक तो ईश्वरके अस्तित्वका प्रतिपादन करनेवाली तथा सब जीवोंके नियन्ताका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंके साथ एवं इसीके समर्थक सूत्र और स्मृतियोंके साथ विरोध प्रसक्त होगा, दूसरा बन्ध और मोक्ष-व्यवस्था भी अस्तंगत होगी, इसलिए यह पक्ष असङ्गत है और यह भाव 'इत्यपि' इसके अपि शब्दसे सुस्पष्ट विदित भी होता है, अतः ईश्वररूप ब्रह्म ही जगत्का उपादान है यही पक्ष निर्दुष्ट है, ऐसा प्रतीत होता है।
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७४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अहेतुत्वादमायस्य मायाशवलतेष्यते ।
साऽप्युपादानमेवेति तत्त्वनिर्णयकृन्मतम्॥ २४ ॥

मायासे रहित शुद्ध ब्रह्म उपादान नहीं हो सकता है, इसलिए (ब्रह्ममें) मायाशबलता मानी जाती है और वह माया भी उपादान ही है, ऐसा तत्त्वनिर्णयकारका मत है ॥ २४ ॥

अथ 'मायां तु प्रकृतिं विद्यात्' इति श्रुतेः, मायार्जाड्यस्य घटादिष्वनुगमाच्च माया जगदुपादानं प्रतीयते, कथं ब्रह्मोपादानम् ? ।
अत्राऽऽहुः पदार्थतत्त्वनिर्णयकाराः—ब्रह्म माया चेत्युभयमुपादानमित्युभयश्रुत्युपपत्तिः, सत्ताजाड्यरूपोभयधर्मानुगत्युपपत्तिश्च । तत्र ब्रह्म विवर्तमानतयोपादानम्, अविद्या परिणममानतया ।

यहाँपर यह शङ्का होती है कि 'ब्रह्म जगत्का उपादान है' यह नहीं कह सकते हैं, क्योंकि 'मायां तु प्रकृतिं'० (माया ही जगत्की प्रकृति—उपादान है, ऐसा जानो) इस प्रकारकी मायामें ही उपादानत्वकी प्रतिपादिका श्रुति है और [जैसे घट आदिमें उपादानभूत मृत्तिकाके श्लक्ष्णत्व आदि धर्मोंका अनुस्यूतरूपसे भान होता है, वैसे ही] घट आदि समस्त प्रपञ्चमें मायामें रहनेवाले जडत्व धर्मका अनुस्यूतरूपसे भान होता है, अतः माया जगत्की उपादान है, ऐसा प्रतीत होता है। [यद्यपि अनेक श्रुतियोंके आधारपर पीछे ब्रह्मकी उपादानताका दिग्दर्शन कराया गया है, तथापि निरवयव ब्रह्ममें मृत्तिका आदिके समान परिणामी उपादानता नहीं हो सकती है, यदि ब्रह्मको विवर्तोपादान कहें तो भी जैसे परिणामी उपादान लोकमें देखे जाते हैं, वैसे विवर्तके अधिष्ठानमें उपादानत्वकी प्रसिद्धि लोकमें नहीं है, अतः ऐसे पदार्थोंमें उपादानत्वका स्वीकार करना केवल स्वकीय-कपोलकल्पनासे परिभाषा बांधनामात्र है, ऐसा आक्षेपकर्ताका प्रकृतमें अभिप्राय है]।

इस परिस्थितिमें पदार्थतत्त्वनिर्णयकार उत्तर कहते हैं—ब्रह्म और माया दोनों ही जगत्के प्रति उपादान हैं; इसलिए माया और ब्रह्ममें उपादानत्वकी प्रतिपादिका दोनों श्रुतियोंकी युक्तार्थता है और (घट आदिमें भासनेवाले) सत्ता और जड़ता दोनों धर्मोंके अनुगमकी भी उपपत्ति हो सकती है। इसमें विशेषता यह है कि ब्रह्म विवर्तमानरूपसे उपादान है और माया परिणामरूपसे उपादान है।

मायाकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७५


न च विवर्ताधिष्ठाने पारिभाषिकमुपादानत्वम् । स्वात्मनि कार्यजनि- हेतुत्वस्योपादानलक्षणस्य तत्राऽप्यविशेषादिति ।

केचित् उक्तामेव प्रक्रियामाश्रित्य विवर्तपरिणामोपादानद्वयसाधारण- मन्यल्लक्षणमाहुः--स्वाभिन्नकार्यजनकत्वमुपादानत्वम् । अस्ति च प्रपञ्चस्य


और. पूर्वमें यह जो कहा गया है कि विवर्तके अधिष्ठानमें पारिभाषिक उपादानत्व है, यह भी नहीं है, क्योंकि 'स्वात्मनि कार्यजनिहेतुत्वरूप उपादानका लक्षण है, वह [ मृत्तिका आदि उपादानमें जैसे रहता है, वैसे ही ] विवर्तके अधिष्ठानमें भी रहता ही है । ['स्वात्मनि' इत्यादि उपादानके लक्षणमें प्रविष्ट स्वशब्दसे उपादानरूपसे अभिमत जो वस्तु हो उसका ग्रहण करना चाहिए, अतः लक्षण-समन्वय यों करना चाहिए--स्वपदसे मृत्तिकाका ग्रहण हुआ, उसमें घटरूपकार्यकी उत्पत्तिकी हेतुता है, इसलिए घटकी कारण मृत्तिकामें उपादानता है । ब्रह्ममें भी वियदादिसृष्टिकी हेतुता होनेसे उपादानका उक्त लक्षण घट जाता है ] ।

कुछ लोग इसी प्रक्रियाके आधारपर विवर्त और परिणाम दोनों उपादानोंमें समानरूपसे लागू होनेवाला अन्य लक्षण कहते हैं कि स्वाभिन्नकार्यजनकत्व ही उपादानत्व * है अर्थात् उपादानसे अभिन्न जो कार्य उसकी उत्पत्तिका जो हेतु


* इस लक्षणमें स्वशब्दसे परिणामी-उपादानत्वसे विवक्षित मृत्तिका, अज्ञान आदिका और विवर्तोपादानत्वसे विवक्षित ब्रह्मका ग्रहण होता है, मृत्तिकारूप उपादान और घटका परस्पर अभेद है ही, क्योंकि 'घट मृत्तिका ही है' इस प्रकार अभेद प्रतीत होता है । परन्तु इस परिस्थितिमें एक विचार अवश्य होता है कि 'मृत्तिका घट है' या 'तन्तु पट है' इस प्रकार जैसे अभेदप्रत्यायक प्रतीति हुआ करती है, वैसे 'घट ब्रह्म है' 'पट ब्रह्म है' या 'अज्ञान घट है' इस प्रकार ब्रह्म और अज्ञानका घटादिसे अभेद सिद्ध होनेके लिए लौकिक व्यवहार नहीं होता, अतः ब्रह्म या अज्ञानरूप उपादानसे घटादि प्रपञ्चका अभेद कैसे मान सकते हैं ? इस शङ्काके परिहारमें यों कहा जाता है--यद्यपि ब्रह्म और अज्ञानके साथ प्रपञ्चका अभेद ब्रह्मत्व या अज्ञानत्वरूपसे व्यवहृत नहीं होता है, तो भी सत्त्व और जडत्वरूप धर्मोंसे, जो ब्रह्म और अज्ञानके धर्म हैं, 'सन् घटः' 'जडो घटः' इस प्रकार ब्रह्म और अज्ञानका प्रपञ्चके साथ अभेद भासता है । सत्त्व और जडत्व ब्रह्म तथा अज्ञानके धर्म हैं इसमें श्रुतिरूप प्रमाण भी है 'सदेव' ( ब्रह्म सत् ही है ) 'तदेतज्जडं मोहात्मकम्' ( वह अज्ञान जड़ और मोहात्मक है ) इसी गूढ़ अभिप्रायका सूचन करनेके लिए मूलमें 'सद्रूपेण' यह ब्रह्मका विशेषण और 'जडेन' यह अज्ञानका विशेषण दिया गया है ।

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७६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

सद्रूपेण ब्रह्मणा विवर्तमानेन जडेनाऽज्ञानेन परिणामिना चाऽभेदः; ‘सन् घटः, जडो घटः’ इति सामानाधिकरण्यानुभवात् ।

न च ‘तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः’ (उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ६ सू० १४) इति सूत्रे ‘अनन्यत्वं व्यतिरेकेणाऽभावः’ ‘न खल्वनन्यत्वमित्यभेदं ब्रूमः, किन्तु ? भेदं व्यासेधामः’ इति भाष्यभामतीनिबन्धनाभ्यां प्रपञ्चस्य ब्रह्माभेदनिषेधाद्भेदाभ्युपगमे अपसिद्धान्त इति वाच्यम्, तयोर्ब्रह्मरूपधर्मिसमानसत्ताकाभेदनिषेधे तात्पर्येण शुक्तिरजतयोरिव प्रातीतिकामेदाभ्युपगमेऽपि विरोधाभावादिति ।


हो, वही उपादान है। सद्रूप विवर्तमान ब्रह्मके साथ तथा परिणामी जडरूप अज्ञानके साथ प्रपञ्चका अभेद भासता है, क्योंकि ‘सन् घटः’ और ‘जडो घटः’ अर्थात् घटमें सत्ताका और जड़ताका अनुभव होता है।

अब शङ्का होती है कि * ‘तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः’ इस सूत्रमें अनन्यत्वका अर्थ है—‘कारणसे पृथक् कार्यका न रहना’ ‘अनन्यत्वशब्दका अर्थ हम अभेद नहीं करते हैं, परन्तु भेदका निषेध करते हैं’ इस प्रकार भाष्य और भामती ग्रन्थसे ब्रह्म और प्रपञ्चके अभेदका निषेध किया गया है, अतः यदि प्रपञ्च और ब्रह्मका परस्पर अभेद माना जाय, तो अपसिद्धान्त होगा, परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उन निबन्धोंका ब्रह्मरूपधर्मीके समानसत्तावाले अभेदके निषेधमें तात्पर्य है, अर्थात् पारमार्थिक अभेदके निषेधमें अभिप्राय है, अत एव जैसे शुक्ति और रजतमें प्रातीतिक अभेदके स्वीकारमें विरोध नहीं है, वैसे ही प्रकृतमें भी प्रातीतिक अभेदके स्वीकरणमें कोई विरोध नहीं है।


* इस सूत्रका अर्थ है—तदनन्यत्वम्—तयोः—कार्यकारणयोः अनन्यत्वम्—उन कार्य और कारणका अनन्यत्व है, क्योंकि आरम्भण आदि श्रुतियाँ, इस अर्थका प्रतिपादन करती हैं। आरम्भणशब्दसे ‘वाचारम्भण’ श्रुति ली जाती है और आदि शब्दसे ‘आत्मैवेदं सर्वम्’ ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ इत्यादि श्रुतियोंका संग्रह करना चाहिए। भाव यह हुआ कि कार्य और कारण तत्त्वान्तर माने जायँ, तो जगत्कारण ब्रह्ममें सर्वात्मत्वकी प्रतिपादिका श्रुतियाँ विरुद्ध होंगी। अतः अनन्यत्व मानना चाहिए।

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मायाकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७७


ब्रह्ममात्रमुपादानं माया तु द्वारकारणम् ।
मृच्छ्लक्ष्णतावत् संक्षेपशारीरककृतां नये ॥ २५ ॥

संक्षेपशारीरककारके मतमें केवल ब्रह्म जगत्‌के प्रति उपादान है और माया तो जैसे घट आदिके प्रति मृत्तिकाका श्लक्ष्णत्व द्वार कारण है, वैसे ही द्वार कारण है ॥ २५ ॥

सङ्क्षेपशारीरककृतस्तु—ब्रह्मैवोपादानम्। कूटस्थस्य स्वतः कारणत्वानुपपत्तेः माया द्वारकारणम्। अकारणमपि द्वारं कार्येऽनुगच्छति।

ब्रह्म ही जगत्‌का उपादान कारण है, माया उपादान कारण नहीं है, ऐसा संक्षेपशारीरककार कहते हैं, कूटस्थ ब्रह्ममें स्वतः कारणताकी उपपत्ति नहीं हो सकती, अतः माया द्वार कारण है। [भाव यह है कि यदि मायाके बिना ही ब्रह्म जगत्‌के प्रति उपादान कारण हो, तो माया व्यर्थ होगी और ब्रह्म स्वयं परिणामी होगा, इस परिस्थितिमें परिणामवादियोंके मतमें परिणाम और परिणामीका परस्पर वस्तुसन् अभेद होनेसे परिणामके जन्म आदि विकारोंसे ब्रह्म भी विकृत होगा, और इसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं, क्योंकि 'न जायते' (आत्मा उत्पन्न नहीं होता) इस प्रकार अनेक श्रुतियोंके साथ


* संक्षेपशारीरककार कूटस्थ ब्रह्मको जगत्‌के प्रति उपादान मानते हैं, इसके सविशेष दृढ़ीकरणमें उन्हींके दो श्लोक देते हैं—

उपादानता चेतनस्याऽपि दृष्टा यथा स्वप्नसर्गे विचित्रे प्रतीचः ।
यथा चोर्णनाभस्य सूत्रेषु पुंसां यथा केशलोमादिसृष्टौ च दृष्टा ॥
[ संक्षेपशा० १ अ० श्लो० ५४५ ]

अज्ञानतज्जघटना चिदधिक्रियायाम् द्वारं परं भवति नाधिकृतत्वमस्याः ।
नाचेतनस्य घटतेऽधिकृतिः कदाचित् कर्तृत्वशक्तिविरहादिति वक्ष्यते हि ॥
[ संक्षेपशा० १ अ० श्लो० ५५५ ]

अर्थात्— जैसे विचित्र स्वप्नसृष्टिमें निद्रासे तिरस्कृत—अभिभूत है करणसमुदाय जिसका ऐसा प्रत्यगात्मा उपादान है, और जैसे ऊर्णनाभ उसके सूत्रोंके प्रति उपादान है अथवा जैसे केश, लोम आदिमें पुरुष उपादान है, वैसे ही कूटस्थ चेतन भी उपादान है। अविद्या और उसके कार्यका अध्यास ब्रह्मकी अधिकारितामें अर्थात् जगत्‌के प्रति ब्रह्ममें उपादानत्वके सम्पादनमें निमित्तमात्र है, क्योंकि अचेतनकी अध्यासमें अधिकारिता नहीं है, कारण कि उसमें कर्तृत्वशक्तिका अभाव है, ऐसा कहेंगे। और ५५३ के 'अनधिकारिणि शुद्धचिदात्मके' इत्यादिमें भी 'माया ब्रह्मकी अधिकारिताकी सम्पादिका है' ऐसा कहा गया है। इससे स्पष्ट रीतिसे ज्ञात होता है कि संक्षेपशारीरककारने मूलोक्त विषयका अत्यन्त विस्तारसे अपने ग्रन्थमें विवेचन किया है।

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७६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

सद्रूपेण ब्रह्मणा विवर्तमानेन जडेनाऽज्ञानेन परिणामिना चाऽभेदः; 'सन् घटः, जडो घटः' इति सामानाधिकरण्यानुभवात् ।

न च 'तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः' ( उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ६ सू० १४ ) इति सूत्रे 'अनन्यत्वं व्यतिरेकेणाऽभावः' 'न खल्व-नन्यत्वमित्यभेदं ब्रूमः, किन्तु ? भेदं व्यासेधामः' इति भाष्यभामतीनि-बन्धनाभ्यां प्रपञ्चस्य ब्रह्माभेदनिषेधादभेदाभ्युपगमे अपसिद्धान्त इति वाच्यम्, तयोर्ब्रह्मरूपधर्मिसमानसत्त्वाकाभेदनिषेधे तात्पर्येण शुक्तिरजत-योरिव प्रातीतिकाभेदाभ्युपगमेऽपि विरोधाभावादिति ।


हो, वही उपादान है। सद्रूप विवर्तमान ब्रह्मके साथ तथा परिणामी जडरूप अज्ञानके साथ प्रपञ्चका अभेद भासता है, क्योंकि 'सन् घटः' और 'जडो घटः' अर्थात् घटमें सत्ताका और जड़ताका अनुभव होता है।

अब शङ्का होती है कि * 'तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः' इस सूत्रमें अनन्यत्वका अर्थ है—'कारणसे पृथक् कार्यका न रहना' 'अनन्यत्वशब्दका अर्थ हम अभेद नहीं करते हैं, परन्तु भेदका निषेध करते हैं' इस प्रकार भाष्य और भामती ग्रन्थसे ब्रह्म और प्रपञ्चके अभेदका निषेध किया गया है, अतः यदि प्रपञ्च और ब्रह्मका परस्पर अभेद माना जाय, तो अपसिद्धान्त होगा, परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उन निबन्धोंका ब्रह्मरूपधर्मीके समान-सत्तावाले अभेदके निषेधमें तात्पर्य है, अर्थात् पारमार्थिक अभेदके निषेधमें अभिप्राय है, अत एव जैसे शुक्ति और रजतमें प्रातीतिक अभेदके स्वीकारमें विरोध नहीं है, वैसे ही प्रकृतमें भी प्रातीतिक अभेदके स्वीकरणमें कोई विरोध नहीं है।


* इस सूत्रका अर्थ है—तदनन्यत्वम्—तयोः—कार्यकारणयोः अनन्यत्वम्—उन कार्य और कारणका अनन्यत्व है, क्योंकि आरम्भण आदि श्रुतियाँ, इस अर्थका प्रतिपादन करती हैं। आरम्भणशब्दसे 'वाचारम्भण' श्रुति ली जाती है और आदि शब्दसे 'आत्मैवेदं सर्वम्' 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि श्रुतियोंका संग्रह करना चाहिए। भाव यह हुआ कि कार्य और कारण तत्त्वान्तर माने जायँ, तो जगत्कारण ब्रह्ममें सर्वात्मत्वकी प्रतिपादिका श्रुतियाँ विरुद्ध होंगी। अतः अनन्यत्व मानना चाहिए।

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मायाकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७७


ब्रह्ममात्रमुपादानं माया तु द्वारकारणम् ।
मृच्छ्लक्ष्णतावत् संक्षेपशारीरककृतां नये ॥ २५ ॥

संक्षेपशारीरककारके मतमें केवल ब्रह्म जगत्के प्रति उपादान है और माया तो जैसे घट आदिके प्रति मृत्तिकाका श्लक्ष्णत्व द्वार कारण है, वैसे ही द्वार कारण है ॥ २५ ॥

**सङ्क्षेपशारीरककृतस्तु—**ब्रह्मैवोपादानम् । कूटस्थस्य स्वतः कारणत्वानुपपत्तेः माया द्वारकारणम् । अकारणमपि द्वारं कार्येऽनुगच्छति ।

ब्रह्म ही जगत्का उपादान कारण है, माया उपादान कारण नहीं है, ऐसा संक्षेपशारीरककार कहते हैं, कूटस्थ ब्रह्ममें स्वतः कारणताकी उपपत्ति नहीं हो सकती, अतः माया द्वार कारण है । [ भाव यह है कि यदि मायाके बिना ही ब्रह्म जगत्के प्रति उपादान कारण हो, तो माया व्यर्थ होगी और ब्रह्म स्वयं परिणामी होगा, इस परिस्थितिमें परिणामवादियोंके मतमें परिणाम और परिणामीका परस्पर वस्तुसत् अभेद होनेसे परिणामके जन्म आदि विकारोंसे ब्रह्म भी विकृत होगा, और इसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं, क्योंकि 'न जायते' ( आत्मा उत्पन्न नहीं होता ) इस प्रकार अनेक श्रुतियोंके साथ


* संक्षेपशारीरककार कूटस्थ ब्रह्मको जगत्के प्रति उपादान मानते हैं, इसके सविशेष दृढ़ीकरणमें उन्हींके दो श्लोक देते हैं—

उपादनता चेतनस्याऽपि दृष्टा यथा स्वप्नसर्गे विचित्रे प्रतीचः ।
यथा चोर्णनाभस्य सूत्रेषु पुंसां यथा केशलोमादिसृष्टौ च दृष्टा ॥
[ संक्षेपशा० १ अ० श्लो० ५४५ ]

अज्ञानतज्जघटना चिदधिक्रियायाम् द्वारं परं भवति नाधिकृतत्वमस्याः ।
नाचेतनस्य घटतेऽधिकृतिः कदाचित् कर्तृत्वशक्तिविरहादिति वक्ष्यते हि ॥
[ संक्षेपशा० १ अ० श्लो० ५५५ ]

**अर्थात्—**जैसे विचित्र स्वप्नसृष्टिमें निद्रासे तिरस्कृत—अभिभूत है करणसमुदाय जिसका ऐसा प्रत्यगात्मा उपादान है, और जैसे ऊर्णनाभ उसके सूत्रोंके प्रति उपादान है अथवा जैसे केश, लोम आदिमें पुरुष उपादान है, वैसे ही कूटस्थ चेतन भी उपादान है । अविद्या और उसके कार्यका अध्यास ब्रह्मकी अधिकारितामें अर्थात् जगत्के प्रति ब्रह्ममें उपादानत्वके सम्पादनमें निमित्तमात्र है, क्योंकि अचेतनकी अध्यासमें अधिकारिता नहीं है, कारण कि उसमें कर्तृत्वशक्तिका अभाव है, ऐसा कहेंगे । और ५५३ के 'अनधिकारिणि शुद्धचिदात्मके' इत्यादिमें भी 'माया ब्रह्मकी अधिकारिताकी सम्पादिका है' ऐसा कहा गया है । इससे स्पष्ट रीतिसे ज्ञात होता है कि संक्षेपशारीरककारने मूलोक्त विषयका अत्यन्त विस्तारसे अपने ग्रन्थमें विवेचन किया है ।


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७८ सिद्धान्तलेशसंग्रहं [ प्रथम परिच्छेदे


मृद इव तद्गतश्लक्ष्णत्वादेरपि घटे अनुगमनदर्शनादित्याहुः ।

ब्रह्मैव जीवाश्रितयाऽविद्यया विषयीकृतम् ।
वाचस्पतिमते हेतुर्माया तु सहकारिणी ॥ २६ ॥

वाचस्पतिमिश्रके मतमें जीवाश्रित अविद्यासे विषयीकृत ब्रह्म ही जगत्के प्रति उपादान है और माया तो सहकारी कारण है ॥ २६ ॥


विरोध होगा, कारण कि उन श्रुतियों द्वारा ब्रह्ममें नित्यत्व, अविकारित्व आदिका प्रतिपादन किया गया है। अतः मायाके द्वारा ही ब्रह्म कारण है, ऐसा कहना चाहिए, अतः माया व्यर्थ भी नहीं है। जैसे घटादिके प्रति मृद् आदिके उपादान होनेपर भी मृत्तिकामें रहनेवाला श्लक्ष्णत्व आदि संस्कार द्वारकारण हैं, क्योंकि जब तक मृत्तिकाका संस्कार न किया जाय, तब तक मृत्तिकामें घटादिकी उपादानता नहीं घट सकती है, वैसे ही कूटस्थ चैतन्यरूप ब्रह्ममें आरोपित माया उसमें (ब्रह्ममें) जगत्प्रकृतित्वका सम्पादन करके सहकारिकारण बन जाती है। मायामें उपादानत्वकी प्रतिपादिका 'मायांन्तु प्रकृतिं विद्यात्' इत्यादि श्रुतिके साथ विरोध भी नहीं है, क्योंकि उन श्रुतियोंका तात्पर्य यह है कि माया ही ब्रह्ममें प्रकृतित्वका निर्वाह करती है, अतः उसमें प्रकृतित्वका केवल उपचार है। इसीलिए मायामें शक्तित्वका व्यवहार होता है—'पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते' (इस ब्रह्मकी अनेक परा शक्तियाँ हैं) और मृत्तिकामें रहनेवाली शक्तिमें घटादिके प्रति उपादानता लोकमें नहीं देखी जाती है। अतः माया और ब्रह्म दोनोंमें उपादानता नहीं है। इस मतमें परिणामी उपादान कोई नहीं, होगा यदि ब्रह्ममें वैसी उपादानता मानी जाय, तो सैकड़ों श्रुतियोंके साथ विरोध होगा, इसलिए वाचस्पतिमतके समान चित्में अध्यस्तमाया-विषयीकृत ब्रह्मका प्रपञ्च विवर्त है, यही इस मतमें मानना होगा, संक्षेप-शारीरकमें कहींपर मायामें परिणामित्वका कथन किया गया है, वह अन्य मतोंके अभिप्रायसे किया गया है, यह ध्यानमें रखना चाहिए]। अकारण भी द्वार-कार्यमें अनुस्यूत होता है। जैसे कि मृत्तिकाके समान मृत्तिकामें रहनेवाले श्लक्ष्णत्व आदिका भी घटमें अनुगम होता है, यह देखा जाता है। अतः मायाकी जड़ताका घटादिमें भान होता है।

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मायाकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७९


वाचस्पतिमिश्रास्तु--जीवाश्रितमायाविषयीकृतं ब्रह्म'स्वत एव जाड्याश्रयप्रपञ्चाकारेण विवर्तमानतयोपादानमिति माया सहकारिमात्रम्, न कार्यानुगतं द्वारकारणमित्याहुः ।

वाचस्पतिमिश्र, कहते हैं कि जीवकी आश्रित मायासे विषयीकृत ब्रह्म ही स्वयं जाड्यका आश्रयीभूत अर्थात् जड़ प्रपञ्चके आकारसे विवर्तमानरूपसे उपादान है, अतः माया सहकारी कारण ही है। कार्यानुगत द्वारकारण नहीं है * ।

• वाचस्पतिमिश्रके उक्त मतमें एक विचार उपस्थित होता है कि अक्षरब्राह्मणमें आकाशशब्दसे कहलनेवाली मायाका अक्षरशब्दसे वाच्य नित्य चैतन्य रूप ब्रह्म ही आश्रय माना गया है, इसलिए उसका (मायाका) जीव आश्रय है, यह कहना अत्यन्त विरुद्धसा ज्ञात होता है और 'मायिनं तु महेश्वरम्' (महेश्वरको मायाका आश्रय जानो) इत्यादि प्रत्यक्ष श्रुतियाँ मायाके ब्रह्माश्रितत्वमें प्रमाण हैं जीवाश्रितत्वमें प्रमाण नहीं, अतः उभयथा यह मत असङ्गत है, दूसरी बात यह है कि जीवके मायाश्रय होनेपर जीवमें जगदुपादानत्वका प्रसङ्ग आवेगा ब्रह्ममें नहीं आवेगा। अपि च यदि माया ब्रह्मकी उपाधि न हो, तो ब्रह्म नियन्ता भी कैसे होगा? इसपर वाचस्पतिमिश्रके अनुयायियोंका कहना है कि जीवाश्रितत्वपदसे जीवत्वविशिष्ट चैतन्याश्रितत्व विवक्षित नहीं है, परन्तु अक्षरब्राह्मणके अनुरोधसे चैतन्याश्रितत्व ही विवक्षित है। और मायापदसे वेदनीय अविद्याकी चैतन्यवृत्तिमें जीवत्वका अवच्छेदकरूपसे भान होता है, अतः मायामें जीवाश्रितत्वका कथन है और 'निरवद्यं निरञ्जनम्' इत्यादि श्रुतिसे ब्रह्मके निर्गुणत्वका ज्ञान होनेसे उसे अविद्याश्रय मानना विरुद्ध ही है 'मायिनं तु महेश्वरम्' इत्यादि श्रुतिका माया और ब्रह्मका परस्पर विषयविषयीभावरूप सम्बन्धके बोध करनेमें तात्पर्य है। प्रपञ्चका उपादान जीव होगा, यह आपत्ति भी वन्ध्यापुत्रके समान मिथ्या है, क्योंकि समस्त प्रपञ्च जीवाश्रितमायाविषयीकृत ब्रह्मका विवर्त है, ऐसा स्वीकार करनेसे जीवमें जगत्‌की उपादानकारणताकी प्रसक्ति नहीं होगी। ब्रह्ममें वस्तुतः उपाधिका सम्पर्क न होनेपर भी सर्वनियन्तृत्व आदिकी—जीवकी अविद्यासे विषयीकृत ब्रह्मके विवर्त रूपसे—ब्रह्मधर्मसे कल्पना की जाती है, इसलिए जीवाविद्याविषयीकृत ब्रह्म ही प्रपञ्चाकारसे विवर्त मान होता है, इसमें कोई दोष नहीं है।

आरम्भणाधिकरणके भाष्यमें 'मूलकारणमेव······नटवत्सर्वव्यवहारास्पदत्वं प्रतिपद्यते' नटके दृष्टान्तसे वाचस्पतिमिश्रका यह मत ज्ञात होता है, इसीलिए कल्पतरुमें कहा गया है कि-

स्वाश्रया नटवद् ब्रह्म कारणं शङ्करोऽब्रवीत् ।
जीवभ्रान्तिनिमित्तं तद् बभाषे भामतीपतिः ॥
अज्ञातं नटवद् ब्रह्म कारणं शङ्करोऽब्रवीत् ।
जीवाज्ञानं जगद्बीजं जगौ वाचस्पतिस्तथा ॥

अर्थात् जैसे द्रष्टाओंसे अविज्ञात है रूप जिसका ऐसा नट उन-उन अभिनयोंको, जो वस्तुतः सत्य नहीं है, प्राप्त होता है, वैसे ही जीवों द्वारा अज्ञातस्वरूप ब्रह्म ही असत्य


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८० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


अपूर्वानपरं ब्रह्म नोपादानं जगत्स्थितेः ।
माया तु मुख्योपादानमिति मुक्तावलीकृतः ॥ २७ ॥

कार्य्य कारणसे रहित ब्रह्म जगत्के प्रति उपादान नहीं हो सकता है, इसलिए माया ही मुख्य कारण है, ऐसा सिद्धान्त मुक्तावलीकार कहते हैं ॥ २७ ॥

सिद्धान्तमुक्तावलीकृतस्तु—मायाशक्तिरेवोपादानं न ब्रह्म ‘तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमवाह्यम्’ ‘न तस्य कार्यं करणं च विद्यते’ इत्यादिश्रुतेः जगदुपादानमायाधिष्ठानत्वेन उपचारादुपादानम्, तादृशमेवोपादानत्वं लक्षणे विवक्षितमित्याहुः ॥ ५ ॥

मायाशक्ति ही उपादान है ब्रह्म उपादान नहीं है, क्योंकि ‘तदेतत् ०’ (प्रकृत बुद्धि आदिका साक्षीरूप ब्रह्म कारण नहीं है, कार्य नहीं है और वाह्य नहीं है) ‘न तस्य०’ (उसका अर्थात् ब्रह्मका कोई कारण और कार्य नहीं है) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्ममें उपादानताका निषेध किया गया है । और ब्रह्ममें जो उपादानताका व्यवहार होता है, वह तो केवल जगत्की उपादान मायाके अधिष्ठान होनेसे औपचारिक व्यवहार होता है । इसीलिए जगदुपादानमायाधिष्ठानत्व ही उपादानत्व लक्षणमें अर्थात् ब्रह्मके लक्षणमें विवक्षित है, ऐसा सिद्धान्त-मुक्तावलीकार कहते हैं * ॥ ५ ॥


वियदादिकी आकारताको प्राप्त होता है और उसके द्वारा व्यवहारकी विषयताको प्राप्त होता है, इस दृष्टान्तसे भामतीकारका मत शङ्कराचार्यके अनुकूल है, ऐसा प्रतीत होता है [ पृ० ४७१ कल्पतरु निर्णय० मु० ] और 'न ह्यचेतनं चेतना...’ से लेकर 'तस्माज्जीवाधिकरणाप्यविद्या निमित्ततया विषयतया चेश्वरमाश्रयते इतीश्वराश्रयेत्युच्यते, न त्वाधारतया, विद्यास्वभावे ब्रह्मणि तदनुपपत्तेरिति' भाव यह है कि जीवमें रहनेवाली अविद्या निमित्त और विषय रूपसे ईश्वरको आश्रय करती है, अतः ईश्वराश्रय माया कही जाती है, वस्तुतः आधाररूपसे ईश्वराश्रय है नहीं, क्योंकि जिसका विद्यास्वभाव है, उसमें अविद्या कैसे रह सकती है [ कल्पतरुसहित भाम० पृ० ३७८ निर्णय-सागर मु० ] इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि मूलोक्त वाचस्पतिमिश्रका पक्ष भामती ग्रन्थमें स्पष्ट ही है ।

* इसी भावको सिद्धान्तमुक्तावलीकार श्रीप्रकाशानन्दस्वामीजी निम्न लिखित पंक्तियोंसे प्रकट करते हैं—

ब्रह्माज्ञानात् जगज्जन्म ब्रह्मणोऽकारणत्वतः ।
अधिष्ठानत्वमात्रेण कारणं ब्रह्म गीयते ॥३८॥

दृश्यत्वाद्यनुमानसिद्धानिर्वचनीयस्य जगतः अनाद्यनिर्वचनीया अविद्यैव कारणम्, न ब्रह्म, तस्य कूटस्थस्य कार्यकारणविलक्षणत्वात्, 'तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमवाह्यम्' 'अयमात्मा .

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ८१


क ईश्वरोऽथ को जीवः ? प्रकटार्थकृतो विदुः ।
ईशं मायाचिदाभासं जीवमाविद्यकं च तम् ॥ २८ ॥
अनादिर्विश्वप्रकृतिर्माया चिन्मात्रसंश्रया ।
तदेकदेशोऽविद्या तु विक्षेपावरणान्विता ॥ २९ ॥

ईश्वर कौन है और जीव कौन है ? इस प्रकारकी विप्रतिपत्तिमें प्रकटार्थकार कहते हैं कि मायामें चैतन्यका जो आभास है, वह ईश्वर है और अविद्यामें चैतन्यका जो आभास है, वह जीव है । अनादि विश्वकी प्रकृति और चिन्मात्रमें रहनेवाली माया है और उस मायाका आवरण-विक्षेपशक्तियुक्त एकदेश अविद्या है ॥ २८ ॥ २९ ॥

अथ क ईश्वरः को वा जीवः ? अत्रोक्तं प्रकटार्थविवरणे—

[ पूर्वग्रन्थमें जगत्के उपादान ईश्वरका और ‘जीवाश्रित माया’ इस वाक्यमें जीवका कथन हुआ है, अतः प्रसङ्गसे या उपोद्घात सङ्गतिसे ईश्वर और जीवके स्वरूपका निर्णय करनेके लिए प्रश्न करते हैं— ] ईश्वर कौन है और जीव कौन है ? अर्थात् ईश्वर और जीवका क्या लक्षण है । इस परिस्थितिमें प्रकटार्थ-


ब्रह्म सर्वानुभूः' इति श्रुतेः । कथं तर्हि ब्रह्मणो जगत्कारणत्वं श्रुतौ प्रसिद्धम् ? जगत्कारणाधिष्ठानत्वेन कारणत्वोपचारात् । ब्रह्मकारणश्रुतेरन्यार्थत्वाच्च—'एकमेवाद्वितीयमिति श्रुतेः अद्वितीयत्वं तावद् ब्रह्मणः सिद्धं तत्कथं सम्भाव्यतामिति कार्यकारणयोः अभेदस्तावल्लोकप्रसिद्धः······ अज्ञानं कारणमिति अविदितत्वाच्च । साथ ही साथ इनका सारांश भी सुन लीजिए—ब्रह्माज्ञानसे अर्थात् अज्ञानसे ही जगत्की उत्पत्ति होती है, क्योंकि ब्रह्म अविकारी होनेसे कारण नहीं हो सकता, यदि ब्रह्ममें कारणत्वव्यवहार होता है, तो केवल जगत्की उपादान मायाके आश्रय होनेसे होता है, वस्तुतः किसी प्रकारका कारणत्व उसमें है ही नहीं । इसलिए ‘विमत अनिर्वचनीय है, दृश्यत्व होनेसे, इत्यादि दृश्यत्वहेतुसे अनुमानसे सिद्ध अनिर्वचनीय जगत्की अनादि अनिर्वचनीय अविद्या ही कारण है, ब्रह्म नहीं, क्योंकि ‘तदेतद् ब्रह्मापूर्वम्०’ ( अज्ञान आदिका विषय जगत् ब्रह्म ही है अर्थात् जगत्का स्वरूप ब्रह्मसे अन्य नहीं है, वह ब्रह्म कारण और कार्य रहित है, तथा अव्याकृताननुगत है.) इत्यादि श्रुतियोंसे कूटस्थ ब्रह्ममें कारणत्वका निषेध किया गया है । कहींपर श्रुतिमें ब्रह्मकी जगत्कारणता जो प्रसिद्ध है, वह जगत्कारण मायाके अधिष्ठान होनेसे उपचारमात्रसे है और ब्रह्ममें कारणत्वप्रतिपादक श्रुतिका प्रयोजन ‘ब्रह्म कारण है’ इस अर्थका प्रतिपादन करना नहीं है, परन्तु अन्य है अर्थात् ‘एकमेवाद्वितीयम्’ ( एक ही अद्वितीय ब्रह्म है ) इत्यादि श्रुतिसे ‘ब्रह्म अद्वितीय है’ ऐसा सिद्ध होता है । परन्तु इसका सम्भव कैसे हो सकता है, इस प्रकार असम्भावनाके प्राप्त होनेपर लोकप्रसिद्ध कार्यकारणके अभेदके अनुसार उक्त असम्भावनाकी निवृत्ति करना ही कारणत्वबोधक श्रुतिका तात्पर्य है, अतः अज्ञान ही कारण है ।

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८२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद


अनादिरनिर्व्वाच्या भूतप्रकृतिश्चिन्मात्रसम्बन्धिनी माया । तस्यां चित्प्रतिबिम्ब ईश्वरः, तस्या एव परिच्छिन्नानन्तप्रदेशेष्वावरणविक्षेपशक्तिमत्सु अविद्याभिधानेषु चित्प्रतिबिम्बो जीव इति ।

विवरणमें कहा गया है—अनादि, अनिर्वचनीय, * सर्व भूतोंकी प्रकृति और चिन्मात्रमें रहनेवाली जो माया है, उस मायामें चैतन्यका जो प्रतिबिम्ब है, वह ईश्वर है और उसी मायाके अविद्या नामक आवरण और विक्षेपशक्तिवाले जो परिच्छिन्न अनन्त प्रदेश हैं, उनमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है ।


* यहाँ अनिर्वचनीयशब्दसे मायाकी सत्यताका निराकरण किया गया है, अन्यथा जैसे सांख्य प्रकृतिको सत्य मानते हैं; वैसे ही किसीको यह शङ्का हो सकती है कि 'माया' वेदान्तमतमें भी सत्य है। माया अनिर्वचनीय है, इसमें भी युक्तियोंका अनुसन्धान करना चाहिए, माया ब्रह्मसे वस्तुतः भिन्न भी नहीं है, क्योंकि ब्रह्मभिन्न सम्पूर्ण प्रपञ्चके मिथ्या होनेसे उसका भेद वास्तविक हो ही नहीं सकता। ब्रह्मसे माया अभिन्न भी नहीं है, क्योंकि चैतन्य और जड़ एक कैसे हो सकते हैं, भिन्ना-भिन्न अर्थात् ब्रह्मसे भिन्न भी है और अभिन्न भी है, ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि परस्पर विरुद्ध भिन्नत्व और अभिन्नत्व धर्म एक मायामें कैसे रहेंगे। माया सत् भी नहीं है, द्वैतापत्ति होनेसे अद्वैत श्रुतिके साथ विरोध होगा, असत् भी वह नहीं कही जा सकती, क्योंकि जगत्की प्रकृति वह कैसे होगी, अर्थात् असत् पदार्थ किसी भी वस्तुके प्रति उपादान या निमित्त कारण नहीं हो सकता है। मायाको सदसत् नहीं कह सकते, पूर्वके समान सत्त्व और असत्त्व, जो परस्पर तेज और अन्धकारके समान विरुद्ध हैं, एकमें कदापि नहीं रह सकते। इसी प्रकार मायाको सावयव नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसा स्वीकार करनेसे मायामें सादित्वका प्रसङ्ग होगा और सुतरां उसके प्रतिबिम्बभूत ईश्वरमें भी सादित्वकी प्रसक्ति होगी, और मायाके सादि माननेसे उसकी कारण और माया माननी पड़ेगी, निरवयव भी नहीं मान सकते हैं, क्योंकि जो निरवयव पदार्थ है, वह भी किसीका उपादान कारण या प्रकृति नहीं हो सकता।

निरवयव और सावयवरूप नहीं कह सकते, क्योंकि सावयत्व और निरवयवत्वके एक स्थलमें रहनेमें विरोध है। इससे सभी प्रकारसे मायाका निर्वचन करना असम्भव होनेके कारण परिशेषात् उसे अनिर्वचनीय ही मानना चाहिए।

मूलमें प्रदेशशब्दमें परिच्छिन्नत्व विशेषण देनेसे उसमें प्रतिबिम्ब जीव भी परिच्छिन्न है, यह लाभ होता है। इसीलिए अनेक स्थलोंमें भाष्यमें भी जीवका परिच्छिन्नत्व कथन सङ्गत होता है—जैसे 'सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्' इस सूत्रके भाष्यमें जीवनिरूपणमें अर्थात् सूत्रस्थ शारीरपदके निर्वचनमें 'शारीर इति शरीरे भव इत्यर्थः । ननु ईश्वरोऽपि शरीरे भवति, सत्यं शरीरे भवति, न तु शरीर एव भवति' इत्यादिसे जीवमें परिच्छिन्नत्वका व्यपदेश भली भाँति किया गया है। यद्यपि अनादि होनेसे मायामें अनन्त प्रदेश नहीं हो सकते है, तथापि मायाके आवरणशक्ति और विक्षेपशक्तिसे युक्त होनेसे उसके आधारपर मायाके अनेक प्रदेश बतलाये-

जीवेश्वरस्वरूपविचारं ] भाषांनुवादसहित ८३


उक्ता तत्त्वविवेके तु शुद्धसत्त्वमयी स्फुटा ।
माया रजस्तमोऽवरस्ताऽविद्या, शेषं तु पूर्ववत् ॥ ३० ॥

तत्त्वविवेकमें तो शुद्धसत्त्वप्रधान मूलप्रकृति माया कही गई है तथा रज और तमसे तिरस्कृत मूलप्रकृति अविद्या कही गई है, शेष पूर्वके समान है ॥ ३० ॥

तत्त्वविवेके तु—त्रिगुणात्मिकाया मूलप्रकृतेः 'जीवेशावाभासेन करोति माया चाऽविद्या च स्वयमेव भवति' इति श्रुतिसिद्धौ द्वौ रूपभेदौ । रजस्तमोऽनभिभूतशुद्धसत्त्वप्रधाना माया, तदभिभूतमलिनसत्त्वा अविद्येति मायाऽविद्याभेदं परिकल्प्य, मायाप्रतिबिम्ब ईश्वरः, अविद्याप्रतिबिम्बो जीव इत्युक्तम् ।

त्रिगुणात्मिका अर्थात् सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणोंकी साम्यावस्था-रूप मूल प्रकृतिके माया और अविद्या दो स्वरूप 'जीवेशावाभासेन करोति'० ( जीव और ईशको आभाससे करती है माया और अविद्या स्वयं होती है ) इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध हैं । उनमें रज और तमसे तिरस्कृत न होकर जो मुख्य-रूपसे शुद्धसत्त्वप्रधान है वह माया है । जो रज और तमसे अभिभूत होकर मलिनसत्त्वप्रधान है, वह अविद्या है, इस प्रकार माया और अविद्याके भेदकी कल्पना करके मायामें प्रतिबिम्बित चैतन्य ईश्वर और अविद्यामें प्रतिबिम्बित चैतन्य जीव है, ऐसा तत्त्वविवेकमें * कहा गया है ।


गये हैं । आवरणशक्ति—ब्रह्म चैतन्यको आवृत्त करनेवाली मायाकी शक्ति और आवरण—'ब्रह्म नहीं है, ब्रह्म प्रकाशित नहीं होता' इस प्रकारके व्यवहारकी योग्यता । विक्षेपशक्ति—तत्तज्जीवोंमें रहनेवाले असाधारण दुःखोंके अनुकूल मायाकी शक्ति । भाष्यकार अविद्याको जीवकी उपाधि मानते हैं वह भी प्रदेशोंके अभिप्रायसे है अर्थात् उन उन स्थलोंमें आया हुआ अविद्याशब्द प्रदेशार्थक है ।

* तत्त्वविवेकशब्दसे विद्यारण्यस्वामीकृत पञ्चदशीका प्रथमप्रकरण ही अभिप्रेत है, क्योंकि पञ्चदशीके आरम्भमें तत्त्वविवेकप्रकरण है । किसी-किसीका मत है कि पञ्चदशीमें आये हुए सभी प्रकरणोंके कर्त्ता श्रीविद्यारण्यस्वामी नहीं हैं प्रत्युत भिन्न-भिन्न हैं, कुछ कालके बाद कर्त्ताओंके नामका ठीक-ठीक स्मरण न होनेके कारण उन सब प्रकरणोंको मिलाकर एक ग्रन्थ विद्यारण्यस्वामीजीके नामसे प्रसिद्ध हुआ, इसीलिए सिद्धान्तलेशमें उन उन प्रकरणोंका पृथक्-पृथक्रूपसे उद्धरण किया है अन्यथा 'पञ्चदशीमें ऐसा प्रतिपादन किया है' ऐसा ग्रन्थकार क्यों नहीं लिखते, परन्तु इस बातका विवेचन इतिहासके यथार्थवेत्ताओंके ऊपर छोड़कर हम प्रकृत अर्थकी पुष्टिके


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८४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


विक्षेपशक्तिप्राधान्यात् मायेशोपाधिरुच्यते ।
अविद्याऽऽवरणोत्कर्षात् जीवस्येत्यपि कश्चन ॥ ३१ ॥

विक्षेपशक्तिकी प्रधानतासे मूलप्रकृति-मायाशब्दसे कहलानेवाली ईश्वरकी उपाधि कही जाती है और आवरणशक्तिकी प्रधानतासे अविद्याशब्दसे वाच्य मूलप्रकृति जीवकी उपाधि कही जाती है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं ॥ ३१ ॥

एकैव मूलप्रकृतिर्विक्षेपप्राधान्येन मायाशब्दितेश्वरोपाधिः, आवरण- प्राधान्येनाविद्याऽज्ञानशब्दिता जीवोपाधिः । अत एव तस्या जीवेश्वर- साधारणचिन्मात्रसम्बन्धित्वेऽपि जीवस्यैव ‘अज्ञोऽस्मि’ इत्यज्ञानसम्बन्धा- नुभवः, नेश्वरस्येति जीवेश्वरविभागः क्वचिदुपपादितः ।

एक ही मूलप्रकृति विक्षेप अंशकी प्रधानतासे मायाशब्दसे वाच्य होकर ईश्वरकी उपाधि होती है और आवरण अंशकी प्रधानतासे अविद्या होकर अर्थात् अज्ञानसे वाच्य होकर जीवकी उपाधि होती है । इसी लिए—जीवके ही आवरणशक्तिमदुपाधिसे उक्त होनेके कारण मूल प्रकृतिका जीव और ईश्वर साधारण चिन्मात्रके साथ सम्बन्ध होनेपर भी ‘अज्ञोऽस्मि’ ( मैं अज्ञानी हूँ ) इस प्रकार जीवको ही अज्ञानके संसर्गका अनुभव होता है, ईश्वरको* नहीं होता है, क्योंकि आवरणशक्ति ईश्वर भी अंशमें प्रविष्ट नहीं है । इसलिए जीव और ईश्वरकी उपाधिके एक होनेपर भी सर्वज्ञत्व और असर्वज्ञत्वधर्मोंसे जो उनमें वैलक्षण्य है, उसकी अनुपपत्ति नहीं है । इस प्रकार भी जीव और ईश्वरका कहींपर विभाग बतलाया गया है ।


लिए उक्त प्रकरणके कुछ वचन उद्धृत करते हैं—उसमें माया और अविद्याका भेद इस तरह कहा गया है—

सत्त्वशुद्धयविशुद्धिभ्यां मायाविद्ये च ते मते ।
मायाविम्बो वशीकृत्य तां स्यात् सर्वज्ञ ईश्वरः ॥ १६ ॥
अविद्यावशगस्त्वन्यस्तद्वैचित्र्यादनेकधा ॥ १७ ॥

सत्त्वकी शुद्धि और अशुद्धिसे प्रकृतिके माया और अविद्या दो भेद हैं, उस मायामें प्रति- फलित चिदात्मा मायाको अधीन करके सर्वज्ञ ईश्वर होता है और अविद्यामें प्रतिबिम्ब- रूपसे स्थित परतन्त्र अन्य चिदात्मा जीव है, उक्त वचनोंका यह भाव है । [ पंच० तत्त्व० पृ० १२ निर्ण० मु० ] ।


* यहाँपर भी ‘अत एव’ शब्दका सम्बन्ध करना चाहिए । इसलिए आवरणशक्तिका ईश्वरकी उपाधिकुक्षिमें सम्बन्ध न होनेसे अज्ञानका सम्पर्क ईश्वरमें नहीं होगा, यह भाव है ।

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ८५


कार्योपाधिर्भवेज्जीवः कारणोपाधिरीश्वरः ।
प्रतिबिम्बोऽत्र सङ्क्षेपशारीरककृतां नये ॥ ३२ ॥

संक्षेपशारीरककारके मतमें अविद्यामें चैतन्यका प्रतिबिम्ब ईश्वर है और अन्तःकरणमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है ॥ ३२ ॥

सङ्क्षेपशारीरके तु—कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः । इति श्रुतिमनुसृत्याऽविद्यायां चित्प्रतिबिम्ब ईश्वरः, अन्तःकरणे चित्प्रतिबिम्बो जीवः । न चाऽन्तःकरणरूपेण द्रव्येण घटेनाऽऽकाशस्येव चैतन्यस्याऽवच्छेदसम्भवात् तदवच्छिन्नमेव चैतन्यं जीवोऽस्त्विति वाच्यम्, इह

संक्षेपशारीरकमें तो कहा गया है कि 'कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः' (कार्योपाधिक—अन्तःकरणोपाधिक जीव है और मायोपाधिक ईश्वर है) इस श्रुतिके आधारपर अविद्यामें चैतन्यका प्रतिबिम्ब ईश्वर है और अन्तःकरणमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है ❊। शङ्का होती है कि जैसे आकाशका घटरूप द्रव्यसे परिच्छेद होता है, वैसे ही अन्तःकरणरूप द्रव्यसे चैतन्यका परिच्छेद


❊ इस विषयमें थोड़ा विचारणीय है—'जीवेशावाभासेन करोति' इत्यादि श्रुतिके साथ इस मतका विरोध है, क्योंकि इस श्रुतिसे जीवमें कारणोपाधिकता प्रतीत होती है, इसपर कहा जाता है—'जीवेशावाभासेन' इस पूर्ण भागसे जीव और ईश्वर दोनोंका प्रतिबिम्बभाव प्रतीत होता है, जहां बिम्ब एक ही होगा उस स्थलमें उपाधिके भेदके बिना वह नहीं हो सकता है, कारण कि सूर्य आदिके प्रतिबिम्बस्थलमें उपाधिकी भिन्नताके बिना भेद नहीं देखा जाता है, इसलिए उक्त श्रुतिसे प्रतिबिम्बरूप जीव और ईश्वरमें क्रमसे माया और अविद्या शब्दोंसे उपाधि समर्पित होती है। इस श्रुतिमें मायाशब्द मायाका कार्य अन्तःकरणरूप अर्थका बोधक है। 'माया चाविद्या च स्वयमेव भवति' इस वाक्यशेषकी उपपत्ति भी—माया-शब्दसे कहलानेवाले अन्तःकरण और मूल प्रकृतिमें मुख्य अभेदके न होनेपर भी प्रकृति विकृतिभावप्रयुक्त अभेदके सम्भव होनेसे—हो सकती है।

कृतहान—किये गये कर्मोंकी निष्फलता, भाव यह है कि ब्राह्मण आदि शरीरोंमें रहनेवाले अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चैतन्यप्रदेश ही इस लोकके कर्मोंका कर्ता है और अन्य लोकमें देव आदिगत अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य प्रदेश, जो कि किसी कर्मका कर्ता नहीं है, भोक्ता होगा, इसलिए उसका भोग किसी पूर्वोपार्जित कर्मका फल नहीं हो सकता है, अतः कृतकर्मका हान स्पष्ट होगा, यदि अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य प्रदेशको जीव माना जाय, तो अकृताभ्यागम—जिसने कर्म किया उसको भोगप्राप्ति नहीं होगी और जिसने कर्म नहीं किया उसको भोग प्राप्ति होगी। अर्थात् देवादिशरीरके अन्तःकरणसे युक्त चैतन्य किसी कर्मका कर्ता नहीं है तो भी फलका भोक्ता है और मनुष्य आदि शरीरगत अन्तःकरणसे युक्त चैतन्य कर्मका कर्ता है, तो भी फलका भोक्ता नहीं हो सकता, ये दोनों दोष अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यके जीव माननेमें होंगे

८६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


परत्र च जीवभावेनावच्छेद्यचैतन्यप्रदेशस्य भेदेन कृतहानाकृताभ्यागमप्रसङ्गात् । प्रतिबिम्बस्तूपाधेर्गतागतयोरवच्छेद्यवन्न भिद्यते इति प्रतिबिम्बपक्षे नायं दोष इत्युक्तम् ।

एवमुक्तेष्वेतेषु जीवेश्वरयोः प्रतिबिम्बविशेषत्वपक्षेषु यत् बिम्बस्थानीयं ब्रह्म तत् मुक्तप्राप्यं शुद्धचैतन्यम् ।

घटाभ्रवारिणोर्व्योम्नः प्रतिबिम्बाविवात्मनः ।
बुद्धितद्वासनाभासौ जीवेशौ, बुद्धयुपाधिकः ॥ ३३ ॥
कूटस्थः शुद्धचित् ब्रह्म चित्रदीपे चतुर्विधम् ।
कूटस्थे कल्पितो जीवः शुद्धे ब्रह्मणि चेश्वरः ।
अहं ब्रह्मेति बाधायामैक्यमित्यपि तन्मतम् ॥ ३४ ॥

घटके जल और मेघके जलमें जैसे आकाशके प्रतिबिम्ब हैं, वैसे ही बुद्धि—अन्तःकरण और उसकी वासनाओंमें चैतन्यके आभास क्रमशः जीव और ईश हैं, बुद्धयुपाधिक—स्थूल सूक्ष्म शरीरोंमें अधिष्ठानरूपसे वर्तमान कूटस्थ चैतन्य है अर्थात् कूटके अयोग्धनके समान निश्चलरूपसे रहनेवाला चैतन्य है और सब उपाधियोंसे रहित शुद्ध चैतन्य ब्रह्म है, इस प्रकार चैतन्यके चार भेद चित्रदीपमें हैं। और कूटस्थमें कल्पित जीव है, शुद्धब्रह्ममें कल्पित ईश्वर है और 'अहं ब्रह्मास्मि' ( मैं ब्रह्म हूं ) यह बाधमें सामानाधिकरण्य है, यह भी उसका मत है ॥३३॥३४॥


हो सकता है, तो अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही जीव हो, अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित चैतन्यको जीव क्यों माना जाता है ? नहीं यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि इस लोकमें और परलोकमें अन्तःकरणसे अवच्छिन्न प्रदेशका भेद होनेसे कृतहान और अकृताभ्यागमका प्रसङ्ग आवेगा । प्रतिबिम्ब तो उपाधिके गमनमें या आगमनमें भी भिन्न नहीं होता है, इसलिए यह दोष प्रतिबिम्ब पक्षमें नहीं है ।

[ जैसे चन्द्र आदि प्रतिबिम्बसे युक्त जलपात्रोंमें से एकके विनाश होनेपर उसमें वृत्तिरूपसे प्रकाशित प्रतिबिम्बका बिम्बके साथ एकीभाव देखा जाता है, अन्य प्रतिबिम्बका एकीभाव नहीं देखा जाता, इसी प्रकार प्रतिबिम्बरूप जीवका भी विदेहकैवल्य समयमें बिम्बभूत शुद्ध ब्रह्मके साथ एकीभाव होगा प्रतिबिम्बभूत ईश्वरके साथ नहीं होगा, क्योंकि प्रत्यक्ष विरोध है, इस प्रकार आशङ्का करके


इस मतमें माया और अविद्या पर्याय है, विशुद्धसत्त्व माया है और अविशुद्धसत्त्व अविद्या है यह भेद नहीं है, इससे मायाका मायाकार्य अन्तःकरण अर्थ करनेमें और अविद्याको ईशकी उपाधि माननेमें कोई हानि नहीं है यह भाव है ।

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ८७


चित्रदीपे—'जीव ईशो विशुद्धा चित्' इति त्रैविध्यप्रक्रियां विहाय यथा घटावच्छिन्नाकाशो घटाकाशः, तदाश्रिते जले प्रतिबिम्बितस्साभ्रनक्षत्रो जलाकाशः, अनवच्छिन्नो महाकाशः, महाकाशमध्यवर्तिनि मेघमण्डले दृष्टिलक्षणकार्यानुमेयेषु जलरूपतदवयवेषु तुषाराकारेषु प्रतिबिम्बितो मेघाकाशः' इति वस्तुत एकस्याप्याकाशस्य चातुर्विध्यम्, तथा स्थूलसूक्ष्मदेहद्वयस्याऽधिष्ठानतया वर्तमानं तदवच्छिन्नं चैतन्यं कूटवन्निर्विकारत्वेन स्थितं कूटस्थम्, तत्र कल्पितेऽन्तःकरणे प्रतिबिम्बितं चैतन्यं संसारयोगी जीवः, अनवच्छिन्नं चैतन्यं ब्रह्म, तदाश्रिते मायातमसि स्थितासु सर्वप्राणिनां धीवासनासु प्रतिबिम्बितं चैतन्यमीश्वरः इति चैतन्यस्य चातुर्विध्यं परिकल्प्य अन्तःकरणधीवासनोपरक्ताज्ञानोपाधिभेदेन जीवेश्वरविभागो दर्शितः ।


इष्टापत्तिसे परिहार करते हैं—'एवम्' इत्यादिसे ] इस प्रकारसे जीव और ईश्वरके विषयमें कहे गये इन प्रतिबिम्बविशेष पक्षोंमें जो बिम्बस्थानीय शुद्ध चैतन्य ब्रह्म है, वही मुक्तों द्वारा प्राप्य है ।

चित्रदीपमें 'जीव ईशो विशुद्धा चित्' (जीव, ईश और शुद्ध चेतन) इस प्रकार चैतन्यके तीन भेदोंकी प्रक्रियाको छोड़कर—जैसे घटरूप उपाधिसे युक्त आकाश—घटाकाश है, उस घटस्थ आकाशमें आश्रित जलमें प्रतिबिम्बित बादल और नक्षत्रोंके सहित जो आकाश है—वह जलाकाश है, घट आदि उपाधिसे रहित आकाश—महाकाश है और महाकाशके मध्यवर्ती मेघमण्डलमें वृष्टिरूप कार्यसे अनुमित जलरूप तुषाराकार मेघमण्डलके अवयवोंमें प्रतिबिम्बित आकाश मेघाकाश है, इस प्रकार वस्तुस्थितिमें एक ही आकाशके चार भेद हैं, वैसे ही स्थूल और सूक्ष्म दो शरीरोंमें अधिष्ठानरूपसे वर्तमान दो देहोंसे अवच्छिन्न (युक्त) चैतन्य कूटके—लोहघनके—समान निर्विकाररूपसे स्थित कूटस्थ चैतन्य है, उस कूटस्थ चैतन्यमें कल्पित अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित चैतन्य—सांसारिक जीव चैतन्य है, समस्त उपाधिसे रहित अर्थात् अनवच्छिन्न चैतन्य—ब्रह्मचैतन्य है और ब्रह्मके आश्रित मायारूप तममें विद्यमान सब प्राणियोंकी धीवासनाओंमें (धी उनका नाम है जो अन्तःकरण जाग्रत् और स्वप्न दो अवस्थाओंमें स्थूलरूपसे अनुगत हैं और उन अन्तःकरणोंकी सुषुप्तिकालीन सूक्ष्मावस्थाको वासना कहते हैं) प्रतिबिम्बित चैतन्य—ईश्वरचैतन्य है,—इस रीतिसे चैतन्यके चार विभाग करके अन्तःकरण और

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८८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद

अयं चापरस्तदभिहितो विशेषः—चतुर्विधेषु चैतन्येषु जीवः 'अहम्' इति प्रकाशमानः कूटस्थे अविद्यातिरोहितासङ्गानन्दरूपविशेषांशे शुक्तौ रूप्यवदध्यस्तः । अत एवेदन्त्व-रजतत्वयोरिवाऽधिष्ठानसामान्यांशाध्यस्त-विशेषांशरूपयोः स्वयन्त्वाहन्त्वयोः सह प्रकाशः 'स्वयमहं करोमि' इत्यादौ ।

धीवासनोपरक्त अज्ञानरूप दो उपाधियोंके भेदसे जीव और ईश्वरका विभाग बतलाया गया है * ।

इस विषयमें चित्रदीपमें कहा गया यह अन्य विशेष है अर्थात् इसमें पूर्व ग्रन्थसे चैतन्यका चातुर्विध्य विशेष दिखलाया उसकी अपेक्षा अन्य प्रतिबिम्ब मिथ्यात्वरूप विशेष है, यह भाव है। चार प्रकारके चैतन्योंमेंसे 'अहम्' (मैं) इस प्रकारसे प्रकाशमान जो जीव है, वह अविद्यासे आच्छादित हुए हैं असङ्ग और आनन्दरूप विशेष अंश जिसके, ऐसे कूटस्थ चैतन्यमें—शुक्तिमें रजतके समान—अध्यस्त है, इसीलिए अर्थात् अहमर्थके कूटस्थमें अध्यस्त


* पञ्चदशीके चित्रदीपप्रकरणमें इस अभिप्रायके सूचक निम्नलिखित श्लोक हैं—

कूटस्थो ब्रह्म जीवेशावित्येवं चिच्चतुर्विधा ।
घटाकाशमहाकाशौ जलाकाशाभ्रखे यथा ॥१८॥
घटावच्छिन्नखे नीरं यत्तत्र प्रतिबिम्बितः ।
साभ्रनक्षत्र आकाशो जलाकाश उदीर्यते ॥१९॥
महाकाशस्य मध्ये यन्मेघमण्डलमीक्ष्यते ।
प्रतिबिम्बतया तत्र मेघाकाशो जले स्थितः ॥२०॥
मेघांशरूपमुदकं तुषाराकारसंस्थितम् ।
तत्र खप्रतिबिम्बोऽयं नीरत्वादनुमीयते ॥२१॥
अधिष्ठानतया देहद्वयावच्छिन्नचेतनः ।
कूटवन्निर्विकारेण स्थितः कूटस्थ उच्यते ॥ २२ ॥
कूटस्थे कल्पिता बुद्धिस्तत्र चित्प्रतिबिम्बकः ।
प्राणानां धारणाज्जीवः संसारेण स युज्यते ॥ २३ ॥
जलव्योम्ना घटाकाशो यथा सर्वस्तिरोहितः ।
तथा जीवेन कूटस्थः सोऽन्योन्याध्यास उच्यते ॥ २४ ॥

इन श्लोकोंका भाव मूल ग्रन्थसे व्यक्त है, केवल अन्तिम श्लोकका सार यह है कि यदि कूटस्थ चेतन है, तो उसका अनुभव क्यों नहीं होता है? इसका उत्तर है कि जैसे जलाकाशसे घटाकाश तिरोहित हो जाता है, वैसे ही जीवसे तिरोहित हो जानेके कारण कूटस्थका अनुभव नहीं होता है, और इसीको अन्योन्याध्यास कहते हैं ।

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