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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
९८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

था कि 'मैं यजमानके यज्ञमण्डपमें अपने अग्निरूपी मुखके द्वारा घीमें डुबोयी हुई आहुति पाकर भी उसे उतनी तृप्तिपूर्वक नहीं खाता, जितनी कि मुझमें अपने कर्मफल समर्पित करके प्रसन्न होनेवाले ब्राह्मणके मुखसे भोजन करते समय मुझे एक-एक ग्रासमें तृप्ति होती है।' अतः मैंने अपने व्यवहारोंसे यदि कभी ब्राह्मणोंका अप्रिय किया हो तो सबके स्वामी ब्राह्मणलोग कृपापूर्वक मुझे क्षमा करें। मुने! आप कौन हैं? आप कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। मैं चरणोंमें मस्तक रखकर आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। कृपया अपना परिचय दीजिये।

राजा धर्मवर्माके ऐसा कहनेपर उस समय मैंने अपना परिचय इस प्रकार दिया— नृपश्रेष्ठ! मैं देवर्षि नारद हूँ। स्थानकी प्राप्तिके लिये आया हूँ। तुम अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार मुझे धन दो और स्थान बनानेके लिये भूमि अर्पण करो। महाराज! यद्यपि यह भूमि और धन देवताओंके ही हैं; तथापि जिस समय जो राजा हो, उसीसे उनको माँगना चाहिये। क्योंकि वह पृथ्वीका प्रतिपालक और दाता होता है। इसलिये द्रव्यशुद्धिकी इच्छासे मैं तुमसे कुछ भूमि माँगता हूँ।

राजाने कहा—विप्रवर! यदि आप देवर्षि नारद हैं तो यह सारा राज्य आपका ही रहे। मैं तो आपकी और समस्त ब्राह्मणोंकी चाकरी करूँगा।

नारदजी कहते हैं—अर्जुन! तब मैंने राजा धर्मवर्मासे कहा—'यह धन तुम्हारे ही पास रहे। आवश्यकताके समय मैं ले लूँगा।' ऐसा कहकर मैं रैवतक पर्वतपर चला गया। उस श्रेष्ठ पर्वतका दर्शन करके मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। वहाँ तपस्या करके मनुष्य अपनी अभीष्ट वस्तुको प्राप्त कर लेता है। ठीक उसी तरह जैसे भक्तपुरुष भगवान् महादेवको पाकर अपना मनोरथ सिद्ध कर लेता है। कुन्तीनन्दन! मैं रैवतक पर्वतकी एक बहुत बड़ी शिलापर बैठ गया और शीतल, मन्द, सुगन्ध पवनके स्पर्शसे अत्यन्त प्रसन्न हो मन-ही-मन विचार करने लगा—स्थान तो मैंने प्राप्त कर लिया, जो अत्यन्त दुर्लभ था। अब मैं उत्तम ब्राह्मणकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न आरम्भ करूँ। मुझे ऐसे ब्राह्मण देखने चाहिये, जो सर्वश्रेष्ठ पात्र माने गये हैं। इस विषयमें वेदवादी विद्वानोंके वचन इस प्रकार सुने जाते हैं—जैसे खेनेवालेके बिना कोई नाव किसी प्राणीको पार उतारनेमें समर्थ नहीं है, उसी प्रकार जातिसे श्रेष्ठ ब्राह्मण भी यदि दुराचारी हो तो वह किसीका उद्धार नहीं कर सकता। जिसने शास्त्रोंका अध्ययन नहीं किया है, वह ब्राह्मण तिनकेकी आगके समान शीघ्र बुझ जाता है—तेजोहीन हो जाता है। अतः उसे हव्य प्रदान नहीं करना चाहिये, क्योंकि राखमें आहुति नहीं दी जाती। दानके सुयोग्य पात्रको छोड़कर अपात्रको जो दान दिया जाता है, वह दान वैसा ही है, जैसा कि ऊसरमें बोये हुए बीज शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। दानमें ली हुई भूमि विद्याहीन ब्राह्मणके अन्तःकरणको नष्ट करती है। इसी प्रकार गाय उसके भोगोंका, सुवर्ण उसके शरीरका, घोड़ा उसके नेत्रका, वस्त्र उसकी स्त्रीका, घृत उसके तेजका और तिल उसकी सन्तानका नाश करते हैं। अतः अविद्वान् ब्राह्मणको सदा

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ९९

प्रतिग्रहसे डरना चाहिये। मूर्ख ब्राह्मण थोड़ा प्रतिग्रह लेकर भी कीचड़में फँसी हुई गायकी भाँति कष्ट पाता है। इसलिये जो मूढ़ तपस्यासे युक्त और गुप्तरूपसे स्वाध्यायका साधन करनेवाले हैं तथा जो शान्त चित्तवाले हैं, उन्हींको दिया हुआ दान सदा अक्षय होता है। उत्तम देशमें (काशी आदि तीर्थोंमें), उत्तम काल (ग्रहण आदि)-में श्रेष्ठ उपायसे सत्पात्रको श्रद्धापूर्वक जो द्रव्य दिया जाता है, वही परिपूर्ण दान-धर्मका लक्षण है। केवल विद्या अथवा तपस्यासे सुपात्रता नहीं आती। जहाँ सदाचार है और उसके साथ ये दोनों (विद्या और तपस्या) भी हैं, उसीको उत्तम पात्र कहा जाता है।


कलाप-ग्रामनिवासी सुतनुद्वारा नारदजीके जटिल प्रश्नोंका समाधान

**नारदजी कहते हैं—**अर्जुन! मैं देश-देश घूमकर विद्यारूपी नेत्रवाले ब्राह्मणोंकी परीक्षा करता हूँ। यदि वे मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे देंगे, तब मैं उन्हें दान करूँगा। ऐसा विचार करके मैं उस स्थानसे उठा और महर्षियोंके आश्रमोंपर इन प्रश्नरूपी श्लोकोंका गान करता हुआ विचरण करने लगा। वे श्लोक इस प्रकार हैं, सुनो—

मातृकां को विजानाति कतिधा कीदृशाक्षराम्।
पञ्चपञ्चाद्भुतं गेहं को विजानाति वा द्विजः॥
बहुरूपां स्त्रियं कर्तुमेकरूपां च वेत्ति कः।
को वा चित्रकथं बन्धं वेत्ति संसारगोचरः॥
को वार्णवमहाग्राहं वेत्ति विद्यापरायणः।
को वाष्टविधं ब्राह्मण्यं वेत्ति ब्राह्मणसत्तमः॥
युगानां च चतुर्णां वा को मूलदिवसान् वदेत्।
चतुर्दशमनूनां वा मूलवारं च वेत्ति कः॥
कस्मिंश्चैव दिने प्राप पूर्वं वा भास्करो रथम्।
उद्वेजयति भूतानि कृष्णाहिरिव वेत्ति कः॥
को वास्मिन् घोरसंसारे दक्षदक्षतमो भवेत्।
पन्थानावपि द्वौ कश्चिद्वेत्ति वक्ति च ब्राह्मणः॥
इति मे द्वादश प्रश्नान् ये विदुर्ब्राह्मणोत्तमाः।
ते मे पूज्यतमास्तेषामहमाराधकश्चिरम्॥
(स्क० पु० मा० कुमा० ३।२०५-२१२)

(१) मातृकाको कौन विशेषरूपसे जानता है? वह मातृका कितने प्रकारकी और कैसे अक्षरोंवाली है? (२) कौन द्विज पचीस वस्तुओंके बने हुए गृहको अच्छी तरह जानता है? (३) अनेक रूपवाली स्त्रीको एक रूपवाली बनानेकी कला किसको ज्ञात है? (४) संसारमें रहनेवाला कौन पुरुष विचित्र कथावाली वाक्य-रचनाको जानता है? (५) कौन स्वाध्यायशील ब्राह्मण समुद्रमें रहनेवाले महान् ग्राहकी जानकारी रखता है? (६) किस श्रेष्ठ ब्राह्मणको आठ प्रकारके ब्राह्मणत्वका ज्ञान है? (७) चारों युगोंके मूल दिनोंको कौन बता सकता है? (८) चौदह मनुओंके मूल दिवसका किसको ज्ञान है? (९) भगवान् सूर्य किस दिन पहले-पहल रथपर सवार हुए? (१०) जो काले सर्पकी भाँति सब प्राणियोंको उद्वेगमें डाले रहता है, उसे कौन जानता है? (११) इस भयंकर संसारमें कौन दक्ष मनुष्योंसे भी अत्यधिक दक्ष माना गया है? (१२) कौन ब्राह्मण दोनों मार्गोंको जानता और बतलाता है? जो श्रेष्ठ ब्राह्मण मेरे इन बारह प्रश्नोंको जानते हैं, वे मेरे लिये परमपूज्य हैं और मैं उनका चिरकालतक सेवक बना रहूँगा।

अर्जुन! इन प्रश्नोंका गान करता हुआ मैं सारी पृथ्वीपर घूमता रहा। मुझे जो-जो ब्राह्मण मिले, उन सबने यही कहा—'आपके इन प्रश्नोंकी व्याख्या बहुत कठिन है। हम तो केवल नमस्कार करते हैं।' इस प्रकार सारी पृथ्वीपर घूमकर मैं लौट आया और हिमालयके शिखरपर बैठकर पुनः इस प्रकार विचार करने लगा। 'अहो! मैंने सब ब्राह्मणोंको देख लिया, अब क्या करूँ?'

१००* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

इसी समय मेरे मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि 'मैं अभीतक कलाप-ग्राममें तो गया ही नहीं। वह एक उत्तम स्थान है। जहाँ ऐसे ब्राह्मण निवास करते हैं, जो तपस्याके मूर्तिमान् स्वरूप हैं। उनकी संख्या चौरासी हजार है। वे सब-के-सब वेदाध्ययनसे सुशोभित होते रहते हैं। अतः उसी स्थानपर चलूँ।'

मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके मैं वहाँसे चल दिया और आकाशमार्गसे वहाँ जा पहुँचा। पुण्यभूमिपर बसा हुआ वह श्रेष्ठ ग्राम सौ योजनतक फैला हुआ था। नाना प्रकारके वृक्ष वहाँ सब ओरसे छाया किये हुए थे। अग्निहोत्रसे उठा हुआ धूँएँका प्रवाह वहाँ कभी शान्त नहीं होता था। कलापग्राम वह स्थान है, जहाँ सत्ययुगके लिये सूर्यवंश, चन्द्रवंश तथा ब्राह्मणवंशका बीज शेष और सुरक्षित है। उस स्थानपर पहुँचकर मैंने द्विजोंके आश्रमोंमें प्रवेश किया। वहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मण मधुर वाणीमें अनेक प्रकारके वादोंपर वार्तालाप कर रहे थे। उस समय उस विद्वत्-सभाके बीच मैंने अपनी भुजा उठाकर घोषणा की—'ब्राह्मणो! अब आपलोग मेरे प्रश्नोंका समाधान कीजिये।'

**ब्राह्मण बोले—**विप्रवर! आप अपना प्रश्न उपस्थित कीजिये। यह हमारे लिये बहुत बड़ा लाभ है कि आप कोई प्रश्न पूछ रहे हैं।

वहाँके विद्वान् ब्राह्मण 'पहले मैं उत्तर दूँगा—पहले मैं उत्तर दूँगा।' ऐसा कहकर एक-दूसरेको मना करने लगे। तब मैंने उनके सामने अपने बारह प्रश्न उपस्थित किये। सुनकर वे मुनीश्वर उन प्रश्नोंको खिलवाड़ समझते हुए मुझसे कहने लगे—'विप्रवर! आपके प्रश्न तो बालकोंके-से हैं। इन छोटे-छोटे प्रश्नोंसे यहाँ क्या होनेवाला है? आप हमलोगोंमें जिसे सबसे छोटा और ज्ञानहीन समझते हों, वही इन प्रश्नोंका उत्तर दे।' यह सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने अपनेको कृतार्थ माना और उनमेंसे एक बालकको सबसे हीन समझकर कहा—'यह मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे।'

उस बालक ब्राह्मणका नाम सुतनु था। उसने मेरे प्रश्नोंका उत्तर देते हुए कहा—(१) मातृकामें बावन अक्षर बताये गये हैं। उनमें सबसे प्रथम अक्षर ॐकार है। उसके सिवा चौदह स्वर, तैंतीस व्यंजन, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय—ये सब मिलकर बावन मातृका वर्ण माने गये हैं।* द्विजवर! यह तो मैंने आपसे अक्षरोंकी संख्या बतायी है। अब इनका अर्थ सुनिये। इस अर्थके विषयमें पहले आपसे एक इतिहास कहूँगा। पूर्वकालकी बात है, मिथिला नगरीमें कौथुम नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण रहते थे। उन्होंने इस पृथ्वीपर प्रचलित हुई सम्पूर्ण विद्याओंको पढ़ लिया था। वे इकतीस हजार वर्षोंतक आदरपूर्वक अध्ययनमें लगे रहे। उनका एक क्षण भी कभी व्यर्थ नष्ट नहीं हुआ। अध्ययन पूरा करके जब वे गृहस्थ हुए, तब कुछ कालके बाद उनके एक पुत्र हुआ। उनके सारे बर्ताव जड़की भाँति होते थे। उसने केवल मातृका पढ़ी। मातृका पढ़नेके बाद वह किसी प्रकार दूसरी कोई बात नहीं याद करता था। इससे उसके पिता बहुत खिन्न हुए और उस जड बालकसे कहने लगे—'बेटा! पढ़ो, पढ़ो, मैं तुम्हें मिठाई दूँगा। नहीं पढ़ोगे तो यह मिठाई दूसरेको दे दूँगा और तुम्हारे दोनों कान उखाड़ लूँगा।'

यह सुनकर पुत्रने कहा—पिताजी! क्या मिठाई लेनेके लिये ही पढ़ा जाता है? क्या लोभकी पूर्ति ही अध्ययनका उद्देश्य है? अध्ययन तो उसका नाम है, जो मनुष्योंको परलोकमें लाभ पहुँचानेवाला हो।

**कौथुम बोले—**वत्स! ऐसी बातें कहनेवाले, तेरी आयु बढ़े। तेरी यह बुद्धि बहुत अच्छी है। पर तू पढ़ता क्यों नहीं है?


* ॐकारः प्रथमस्तस्य चतुर्दश स्वरास्तथा। वर्णाश्चैव त्रयस्त्रिंशदनुस्वारस्तथैव च॥
विसर्जनीयश्च परो जिह्वामूलीय एव च। उपध्मानीय एवापि द्विपञ्चाशदमी स्मृताः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २३५-२३७)

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १०१ ---|---

पुत्रने कहा—पिताजी! जाननेयोग्य जितनी भी बातें हैं, वे सब तो मैंने मातृकामें ही जान लीं। बताइये, इसके बाद अब कण्ठ किसलिये सुखाया जाय?

पिता बोले—वत्स! तू तो आज बड़ी विचित्र बात कहता है। मातृकामें तूने किस ज्ञातव्य अर्थका ज्ञान प्राप्त किया है? बता, बता। मैं तेरी बात फिर सुनना चाहता हूँ।

पुत्रने कहा—पिताजी! आपने इकतीस हजार वर्षोंतक नाना प्रकारके तर्कोंका अध्ययन करते हुए भी अपने मनमें केवल भ्रमका ही साधन किया है। 'यह धर्म है, यह धर्म है' ऐसा कहकर शास्त्रोंमें जो धर्म बताया गया है, उसमें चित्त भ्रान्त-सा हो जाता है। आप उपदेशको केवल पढ़ते हैं। उसके वास्तविक अर्थकी जानकारी नहीं रखते। जो ब्राह्मण केवल पाठमात्र करते हैं, अर्थ नहीं समझते, वे दो पैरवाले पशु हैं। अतः मैं आपसे मोहनाशक वचन सुनाता हूँ। अकार ब्रह्मा कहे गये हैं, भगवान् विष्णु उकार बतलाये गये हैं, मकारको भगवान् महेश्वरका प्रतीक माना गया है। ये तीन गुणमय स्वरूप बताये गये हैं, ॐकारके मस्तकपर जो अनुस्वाररूप अर्द्धमात्रा है, वह सर्वोत्कृष्ट भगवान् सदाशिवका प्रतीक है।^१ यह है ॐकारकी महिमा, जिसका वर्णन कोटि-कोटि ग्रन्थोंद्वारा दस हजार वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता।

पुनः जो मातृकाका सारसर्वस्व बताया गया है, उसे सुनिये। अकारसे लेकर औकारतक जो चौदह^२ स्वर हैं, वे चौदह मनुस्वरूप हैं। स्वायम्भुव, स्वारोचिष, औत्तम, रैवत, तामस, छठे चाक्षुष, सातवें वैवस्वत—जो इस समय वर्तमान हैं, सावर्णिक, ब्रह्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, दक्षसावर्णि, धर्मसावर्णि, रौच्य तथा भौत्य—ये चौदह मनु हैं। श्वेत, पाण्डु, लोहित, ताम्र, पीत, कपिल, कृष्ण, श्याम, धूम्र, अधिक पिंगल, थोड़ा पिंगल, तिरंगा, बहुरंगा तथा कबरा—ये क्रमशः चौदह मनुओंके रंग हैं। पिताजी! वैवस्वत मनु ऋकारस्वरूप हैं। उनका रंग काला बतलाया जाता है। 'क'से लेकर 'ह' तक तैंतीस देवता हैं। 'क' से लेकर 'ठ' तक तो बारह आदित्य^३ माने गये हैं। 'ड' से लेकर 'ब' तक जो अक्षर हैं, वे ग्यारह^४ रुद्र हैं। 'भ' से लेकर 'ष' तक आठ^५ वसु माने गये हैं। 'स' और 'ह'—ये दोनों अश्विनीकुमार बताये गये हैं। इस प्रकार ये तैंतीस देवता कहे जाते हैं। पिताजी!


१- अकारः कथितो ब्रह्मा उकारो विष्णुरुच्यते। मकारश्च स्मृतो रुद्रस्त्रयश्चैते गुणाः स्मृताः॥
अर्द्धमात्रा च या मूर्ध्नि परमः स सदाशिवः।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३।२५१-२५२)

२- अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ—ये चौदह स्वर हैं।

३- वेंकटेश्वरकी प्रतिमें आदित्य, रुद्र और वसुओंके नाम भी आये हैं। आदित्यसम्बन्धी श्लोक इस प्रकार हैं—
धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणश्चांशुरेव च।
भगो विवस्वान् पूषा च सविता दशमस्तथा।
एकादशस्तथा त्वष्टा विष्णुर्द्वादश उच्यते॥
जघन्यजः स सर्वेषामादित्यानां गुणाधिकः॥
अर्थात् धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंशु, भग, विवस्वान्, पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु—ये बारह आदित्य हैं। इनमें विष्णु सबसे छोटे होनेपर भी गुणोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं।

४- ग्यारह रुद्र ये हैं—
कपाली पिंगलो भीमो विरूपाक्षो विलोहितः। अजकः शासनः शास्ता शम्भुश्चण्डो भवस्तथा॥

५- आठ वसु ये हैं—
ध्रुवो घोरश्च सोमश्च आपश्चैव नलोऽनिलः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च अष्टौ ते वसवः स्मृताः॥

१०२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय और उपध्मानीय—ये चार अक्षर जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज नामक चार प्रकारके जीव बताये गये हैं।^१

पिताजी! यह भावार्थ बताया गया है। अब तत्त्वार्थ सुनिये। जो पुरुष इन देवताओंका आश्रय लेकर कर्मानुष्ठानमें तत्पर होते हैं, वे ही अर्द्धमात्रास्वरूप नित्यपद (सदाशिव)-में लीन होते हैं। चार प्रकारके जीवोंमेंसे कोई भी जब मन, वाणी और क्रियाद्वारा इन देवताओंका भजन करता है, तभी उसे मुक्ति प्राप्त होती है। जिस शास्त्रमें पापी मनुष्योंके द्वारा ये देवता नहीं माने गये हैं, उस शास्त्रको यदि साक्षात् ब्रह्माजी भी कहें तो नहीं मानना चाहिये। ये सब देवता वैदिक मार्गमें सर्वत्र प्रतिष्ठित हैं। अतः जो दुरात्मा इन देवताओंका उल्लंघन करके तप, दान अथवा जप करते हैं, वे वायुप्रधान मार्गमें जाकर सर्दीसे काँपते रहते हैं। अहो! अजितेन्द्रिय मनुष्योंके मोहकी महिमा तो देखो। वे पापी मातृका पढ़ते हैं, परंतु इन देवताओंको नहीं मानते।

सुतनु कहते हैं—पुत्रकी यह बात सुनकर पिताको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने और भी बहुत-से प्रश्न पूछे। पुत्रने भी उनके प्रश्नोंके अनुसार ठीक-ठीक उत्तर दिया। मुने! मैंने भी उसी प्रकार तुम्हारे मातृकासम्बन्धी उत्तम प्रश्नका समाधान किया है। (२) अब पचीस वस्तुओंसे बने हुए गृहसम्बन्धी द्वितीय प्रश्नका उत्तर सुनिये। पाँच महा^२भूत, पाँच^३ कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञा^४नेन्द्रियाँ, पाँच^५ विषय—मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति और पुरुष—ये पचीस तत्त्व हैं। पचीसवाँ तत्त्व पुरुष है जो सदाशिवस्वरूप है। इन पचीस तत्त्वोंसे सम्पन्न हुआ यह शरीर ही घर कहलाता है। जो इस शरीरको इस प्रकार तत्त्वतः जानता है, वह कल्याणमय परमात्माको प्राप्त होता है।^६

(३) वेदान्तवादी विद्वान् बुद्धिको ही अनेक रूपोंवाली स्त्री कहते हैं; क्योंकि वही नाना प्रकारके विषयों अथवा पदार्थोंका सेवन करनेसे अनेक रूप ग्रहण करती है। किंतु अनेकरूपा होनेपर भी वह एकमात्र धर्मके संयोगसे एकरूपा ही रहती


१- औकारान्ता अकाराद्या मनवस्ते चतुर्दश। स्वायम्भुवश्च स्वारोचिरौत्तमो रैवतस्तथा ॥
तामसश्चाक्षुषः षष्ठस्तथा वैवस्वतोऽधुना। सावर्णिर्ब्रह्मसावर्णी रुद्रसावर्णिरेव वा ॥
दक्षसावर्णिरेवापि धर्मसावर्णिरेव च। रौच्यो भौत्यस्तथैवापि मनवोऽमी चतुर्दश ॥
श्वेतः पाण्डुस्तथा रक्तस्ताम्रः पीतश्च कापिलः। कृष्णः श्यामस्तथा धूम्रः सुपिशङ्गः पिशङ्गकः ॥
त्रिवर्णः शवलो वर्णैः कर्बुरश्च इति क्रमात्। वैवस्वत ऋकारश्च तात कृष्णः प्रपद्यते ॥
ककाराद्या हकारान्तास्त्रयस्त्रिंशच्च देवताः। ककाराद्याष्ठकारान्ता आदित्या द्वादश स्मृताः ॥
डकाराद्या वकारान्ता रुद्राश्चैकादशैव ते।
भकाराद्याः षकारान्ता अष्टौ हि वसवो मताः। सहौ चेत्यश्विनौ ख्यातौ त्रयस्त्रिंशदिति स्मृताः ॥
अनुस्वारो विसर्गश्च जिह्वामूलीय एव च। उपध्मानीय इत्येते जरायुजास्तथाऽण्डजाः ॥
स्वेदजाश्चोद्भिज्जाश्चापि पितर्जीवाः प्रकीर्तिताः।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २५४-२६२)
२- पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश। ३- वाक्, हाथ, पैर, गुदा और लिंग। ४- कान, नेत्र, रसना, नासिका और त्वचा। ५- शब्द, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श।
६- पञ्चभूतानि पञ्चैव कर्मज्ञानेन्द्रियाणि च। पञ्च पञ्चापि विषया मनोबुद्ध्यहमेव च ॥
प्रकृतिः पुरुषश्चैव पञ्चविंशः सदाशिवः। पञ्चपञ्चभिरेतैस्तु निष्पन्नं गृहमुच्यते ॥
देहमेतदिदं वेद तत्त्वतो यात्यसौ शिवम्।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २७२-२७४)

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १०३


है। जो इस तत्त्वार्थको जानता है, वह (धर्मका आश्रय लेनेके कारण) कभी नरकमें नहीं पड़ता। (४) मुनियोंने जिसे नहीं कहा है तथा जो वचन देवताओंकी मान्यता नहीं स्वीकार करता, उसे विद्वानोंने विचित्र कथासे मुक्त बन्ध (वाक्यविन्यास) कहा है, तथा जो कामयुक्त वचन है वह भी इसी श्रेणीमें है।^१ (ऐसा वचन सुनने और मानने योग्य नहीं है। वास्तवमें वह बन्धन ही है।)

(५) अब पाँचवें प्रश्नका समाधान सुनिये। एकमात्र लोभ ही इस संसार-समुद्रके भीतर महान् ग्राह है। लोभसे पापमें प्रवृत्ति होती है, लोभसे क्रोध प्रकट होता है, लोभसे कामना होती है, लोभसे ही मोह, माया (शठता), अभिमान, स्तम्भ (जडता), दूसरेके धनकी स्पृहा, अविद्या और मूर्खता होती है। यह सब कुछ लोभसे ही उत्पन्न होता है। दूसरेके धनका अपहरण, परायी स्त्रीके साथ बलात्कार, सब प्रकारके दुस्साहसमें प्रवृत्ति तथा न करने योग्य कार्योंका अनुष्ठान भी लोभकी ही प्रेरणासे होता है। अपने मनको जीतनेवाले संयमी पुरुषको उचित है कि वह उस लोभको मोहसहित जीते। जो लोभी और अजितात्मा हैं, उन्हींमें दम्भ, द्रोह, निन्दा, चुगली और दूसरोंसे डाह—ये सब दुर्गुण प्रकट होते हैं। जो बड़े-बड़े शास्त्रोंको याद रखते हैं और दूसरोंकी शंकाओंका निवारण करते हैं, ऐसे बहुज्ञ विद्वान् भी लोभके वशीभूत होकर नीचे गिर जाते हैं। लोभ और क्रोधमें आसक्त मनुष्य सदाचारसे दूर हो जाते हैं। उनका अन्तःकरण छुरेके समान तीखा होता है। परंतु ऊपरसे वे मीठी बातें करते हैं। ऐसे लोग तिनकोंसे ढके हुए कुएँके समान भयंकर होते हैं। वे ही लोग केवल युक्तिवादका सहारा लेकर अनेकों पन्थ चलाते हैं। लोभवश मनुष्य समस्त धर्ममार्गोंका लोप कर देते हैं। लोभसे ही कुटुम्बीजनोंके प्रति निष्ठुरतापूर्ण बर्ताव करते हैं। कितने ही नीच मनुष्य लोभवश धर्मको अपना बाह्य आभूषण बना धर्मध्वजी होकर जगत्‌को लूटते हैं। वे सदा लोभमें डूबे रहनेवाले महान् पापी हैं। राजा जनक, युवनाश्व, वृषादर्भि, प्रसेनजित् तथा और भी बहुत-से राजा लोभका नाश करके स्वर्गलोकमें गये हैं। इसलिये जो लोग लोभका परित्याग करते हैं, वे ही इस संसार-समुद्रके पार जाते हैं। इनसे भिन्न लोभी मनुष्य ग्राहके चंगुलमें ही फँसे हुए हैं। इसमें संशय नहीं है।^२


१- बहुरूपं स्त्रियं प्राहुर्बुद्धिं वेदान्तवादिनः । सा हि नानार्थभजनान्नानारूपं प्रपद्यते ॥
धर्मस्यैकस्य संयोगाद्बहुधाप्येकिकैव सा । इति यो वेद तत्त्वार्थं नासौ नरकमाप्नुयात् ॥
मुनिभिर्यच्च न प्रोक्तं यन्न मन्येत देवताम् । वचनं तद् बुधाः प्राहुर्बन्धं चित्रकथं त्विति ॥
यच्च कामान्वितं वाक्यं......................।
(स्क० पु० मा० कुमा० ३। २७४-२७७)

२- .............पञ्चमं चाप्यतः शृणु । एको लोभो महान् ग्राहो लोभात्पापं प्रवर्तते ॥
लोभात् क्रोधः प्रभवति लोभात् कामः प्रवर्तते । लोभान्मोहश्च माया च मानः स्तंभः परेप्सुता ॥
अविद्याऽप्रज्ञता चैव सर्वं लोभात् प्रवर्तते । हरणं परवित्तानां परदाराभिमर्शनम् ॥
साहसानां च सर्वेषामकार्याणां क्रियास्तथा । स लोभः सह मोहेन विजेतव्यो जितात्मना ॥
दम्भो द्रोहश्च निन्दा च पैशुन्यं मत्सरस्तथा । भवन्त्येतानि सर्वाणि लुब्धानामकृतात्मनाम् ॥
सुमहन्त्यपि शास्त्राणि धारयन्ति बहुश्रुताः । छेत्तारः संशयानां च लोभग्रस्ता व्रजन्त्यधः ॥
लोभक्रोधप्रसक्ताश्च शिष्टाचारबहिष्कृताः । अन्तःक्षुरा वाङ्‌मधुराः कूपाश्छन्नास्तृणैरिव ॥
कुर्वते ये बहून् मार्गान्स्तांस्तान् हेतुबलान्विताः । सर्वं मार्गं विलोपयन्ति लोभाज्ज्ञातिषु निष्ठुराः ॥
धर्मावतंसकाः क्षुद्रा मुष्णन्ति ध्वजिनो जगत् । एतेऽतिपापिनः सन्ति नित्यं लोभसमन्विताः ॥

९०४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

विप्रवर ! अब आप ब्राह्मणके आठ भेदोंका वर्णन सुनें—मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनूचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि और मुनि—ये आठ प्रकारके ब्राह्मण श्रुतिमें पहले बताये गये हैं। इनमें विद्या और सदाचारकी विशेषतासे पूर्व-पूर्वकी अपेक्षा उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं। जिसका जन्म-मात्र ब्राह्मण-कुलमें हुआ है, वह जब जातिमात्रसे ब्राह्मण होकर ब्राह्मणोचित उपनयन-संस्कार तथा वैदिक कर्मोंसे हीन रह जाता है, तब उसको ‘मात्र’ ऐसा कहते हैं। जो एक उद्देश्यको त्यागकर—व्यक्तिगत स्वार्थकी उपेक्षा करके वैदिक आचारका पालन करता है, सरल, एकान्तप्रिय, सत्यवादी तथा दयालु है, उसे ‘ब्राह्मण’ कहा गया है। जो वेदकी किसी एक शाखाको कल्प और छहों अंगोंसहित पढ़कर ब्राह्मणोचित छः कर्मोंमें संलग्न रहता है, वह धर्मज्ञ विप्र ‘श्रोत्रिय’ कहलाता है। जो वेदों और वेदांगोंका तत्त्वज्ञ, पापरहित, शुद्धचित्त, श्रेष्ठ, श्रोत्रिय विद्यार्थियोंको पढ़ानेवाला और विद्वान् है, वह ‘अनूचान’ माना गया है। जो अनूचानके समस्त गुणोंसे युक्त होकर केवल यज्ञ और स्वाध्यायमें ही संलग्न रहता है, यज्ञशिष्ट अन्न भोजन करता है और इन्द्रियोंको अपने वशमें रखता है, ऐसे ब्राह्मणको श्रेष्ठ पुरुष ‘भ्रूण’ कहते हैं। जो सम्पूर्ण वैदिक और लौकिक विषयोंका ज्ञान प्राप्त करके मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए सदा आश्रममें निवास करता है, वह ‘ऋषिकल्प’ माना गया है। जो पहले ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) होकर नियमित भोजन करता है, जिसको किसी भी विषयमें कोई सन्देह नहीं है तथा जो शाप और अनुग्रहमें समर्थ और सत्यप्रतिज्ञ है; ऐसा ब्राह्मण ‘ऋषि’ माना गया है। जो निवृत्तिमार्गमें स्थित, सम्पूर्ण तत्त्वोंका ज्ञाता, काम-क्रोधसे रहित, ध्याननिष्ठ, निष्क्रिय, जितेन्द्रिय तथा मिट्टी और सुवर्णको समान समझनेवाला है, ऐसे ब्राह्मणको ‘मुनि’ कहते हैं। इस प्रकार वंश, विद्या और वृत्त (सदाचार)—से ऊँचे उठे हुए ब्राह्मण ‘त्रिशुक्ल’ कहलाते हैं। वे ही यज्ञ आदिमें पूजे जाते हैं।*

इस प्रकार आठ भेदोंवाले ब्राह्मणत्वका वर्णन


जनको युवनाश्वश्च वृषदर्थिः प्रसेनजित् । लोभक्षयाद्दिवं प्राप्तास्तथैवान्ये जनाधिपाः ॥
तस्मात्त्यजन्ति ये लोभं तेऽतिक्रामन्ति सागरम् । संसाराख्यमतोऽन्ये ये ग्राहग्रस्ता न संशयः ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २७७-२८७)

* अथ ब्राह्मणभेदांस्त्वमष्टौ विप्रावधारय ॥
मात्रश्च ब्राह्मणश्चैव श्रोत्रियश्च ततः परम् । अनूचानस्तथा भ्रूणो ऋषिकल्प ऋषिर्मुनिः ॥
इत्येतेऽष्टौ समुद्दिष्टा ब्राह्मणाः प्रथमं श्रुतौ । तेषां परः परः श्रेष्ठो विद्यावृत्तविशेषतः ॥
ब्राह्मणानां कुले जातो जातिमात्रो यदा भवेत् । अनुपेताक्रियाहीनो मात्र इत्यभिधीयते ॥
एकोद्देश्यमतिक्रम्य वेदस्याचारवानृजुः । स ब्राह्मण इति प्रोक्तो निभृतः सत्यवाग्घृणी ॥
एकां शाखां सकल्पां च षड्भिरङ्गैरधीत्य च । षट्कर्मनिरतो विप्रः श्रोत्रियो नाम धर्मवित् ॥
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञः शुद्धात्मा पापवर्जितः । श्रेष्ठः श्रोत्रियवान् प्राज्ञः सोऽनूचान इति स्मृतः ॥
अनूचानगुणोपेतो यज्ञस्वाध्याय यन्त्रितः । भ्रूण इत्युच्यते शिष्टैः शेषभोजी जितेन्द्रियः ॥
वैदिकं लौकिकं चैव सर्वज्ञानमवाप्य यः । आश्रमस्थो वशी नित्यमृषिकल्प इति स्मृतः ॥
ऊर्ध्वरेता भवत्यग्रे नियताशी न संशयी । शापानुग्रहयोः शक्तः सत्यसन्धो भवेदृषिः ॥
निवृत्तः सर्वतत्त्वज्ञः कामक्रोधविवर्जितः । ध्यानस्थो निष्क्रियो दान्तस्तुल्यमृत्काञ्चनो मुनिः ॥
एवमन्वयविद्याभ्यां वृत्तेन च समुच्छ्रिताः । त्रिशुक्ला नाम विप्रेन्द्राः पूज्यन्ते सवनादिषु ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २८७-२९८)

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १०५ ---|---

किया गया। अब युगादि तिथियाँ बतलायी जाती हैं। कार्तिकमासके शुक्ल पक्षकी नवमी तिथि सत्ययुगकी आदि बतायी गयी है। वैशाख शुक्ल पक्षकी जो तृतीया है, वह त्रेतायुगकी आदि कही जाती है। माघ कृष्ण पक्षकी अमावश्याको विद्वानोंने द्वापरकी आदि-तिथि माना है और भाद्र कृष्ण त्रयोदशी कलियुगकी प्रारम्भ-तिथि कही गयी है। ये चार युगादि तिथियाँ हैं, इनमें किया हुआ दान और होम अक्षय जानना चाहिये। प्रत्येक युगमें सौ वर्षोंतक दान करनेसे जो फल होता है, वह युगादि-कालमें एक दिनके दानसे प्राप्त हो जाता है।१ | ये युगादि तिथियाँ बतायी गयी हैं, अब मन्वन्तरकी प्रारम्भिक तिथियोंको श्रवण कीजिये। आश्विन शुक्ला नवमी, कार्तिककी द्वादशी, चैत्र और भाद्रकी तृतीया, फाल्गुनकी अमावास्या, पौषकी एकादशी, आषाढ़की दशमी, माघकी सप्तमी, श्रावणकी कृष्णा अष्टमी, आषाढ़की पूर्णिमा, कार्तिककी पूर्णिमा, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठकी पूर्णिमा—ये मन्वन्तरकी आदि तिथियाँ हैं, जो दानके पुण्यको अक्षय करनेवाली हैं।२<br><br>भगवान् सूर्य जिस तिथिको पहले-पहल रथपर आरूढ़ हुए, वह ब्राह्मणोंद्वारा माघमासकी सप्तमी


१- नवमी कार्तिके शुक्ला कृतादिः परिकीर्तिता। वैशाखस्य तृतीया या शुक्ला त्रेतादिरुच्यते॥
माघे पञ्चदशी कृष्णा द्वापरादिः स्मृता बुधैः। त्रयोदशी नभस्ये च कृष्णा सादिः कलेः स्मृता॥
एताश्चतस्रस्तिथयो युगाद्या दत्तं हुतं चाक्षयमासु विद्यात्।
युगे युगे वर्षशतेन दानं युगादिकाले दिवसेन तत्फलम्॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २९९—३०२)

विशेष वक्तव्य—यहाँ जो युगादि तिथियाँ दी गयी हैं, इनमें मतभेद भी उपलब्ध होता है। कहीं-कहीं 'वैशाखस्य तृतीया या कृतस्यादिः प्रकीर्तिता। कार्तिकस्यापि नवमी शुक्ला त्रेतादिरुच्यते।' ऐसा पाठान्तर मिलता है। इसके अनुसार वैशाख शुक्ला तृतीया सत्ययुगकी और कार्तिक शुक्ला नवमी त्रेताकी प्रारम्भिक तिथि है। हिंदीशब्दसागर कोषके संपादकोंने भी कृतादि और त्रेतादि तिथिका इसी रूपमें उल्लेख किया है। परंतु मुहूर्तचिन्तामणिकारका मत इस सम्बन्धमें मूलसे मिलता है। 'सिते गोऽग्नी बाहुलराधयोः' कहकर उन्होंने यही मत स्वीकार किया है। मूलमें जो द्वापरादि और कलियुगादि तिथि दी गयी है, इससे मुहूर्तचिन्तामणिकारका मत नहीं मिलता। वे 'मदनदर्शौ भाद्रमाघासिते' कहकर भाद्र कृष्ण त्रयोदशीको द्वापरकी और माघ-अमावास्याको कलिकी आदितिथि घोषित करते हैं। हिंदीशब्दसागरने भी यही माना है। केवल माघ अमावास्याकी जगह पौष अमावास्याका उसमें उल्लेख हुआ है। मुहूर्त्तचिन्तामणिकारके मतका प्राचीन आधार क्या है, इसे विद्वान् लोग ढूँढें। स्कन्दपुराण, कुमारिकाखण्डका उपर्युक्त मत अति प्राचीन होनेके कारण स्वतःप्रमाण तो है ही, नारद-स्मृतिके निम्नांकित वचनसे भी इसका समर्थन होता है—

कार्तिके शुक्ल नवमी चादिः कृतयुगस्य सा।
त्रेतादिर्माधवे शुक्ला तृतीया पुण्यसंमिता॥
कृष्णा पञ्चदशी माघे द्वापरादिरुदीरिता।
कल्पादिः स्यात् कृष्णपक्षे नभस्ये च त्रयोदशी॥
(इन श्लोकोंका उल्लेख मु० चि० की पीयूषधारा टीकामें हुआ है।)

२- अश्वयुक् शुक्ल नवमी द्वादशी कार्तिके तथा। तृतीया चैत्रमासस्य तथा भाद्रपदस्य च॥
फाल्गुनस्य त्वमावास्या पौषस्यैकादशी तथा। आषाढस्यापि दशमी माघमासस्य सप्तमी॥
श्रावणस्याष्टमी कृष्णा तथाषाढी च पूर्णिमा। कार्तिकी फाल्गुनी चैत्री ज्येष्ठपञ्चदशी सिता॥
मन्वन्तरादयश्चैता दत्तस्याक्षयकारिकाः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ३०३—३०६)

१०६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


बतायी गयी है, जिसे रथसप्तमी कहते हैं। उस तिथिको दिया हुआ दान और किया हुआ यज्ञ सब अक्षय माना गया है। वह सब प्रकारकी दरिद्रताको दूर करनेवाला और भगवान् सूर्यकी प्रसन्नताका साधक बताया गया है।^१

विद्वान् पुरुष जिसे सदा उद्वेगमें डालनेवाला बताते हैं, उसका यथार्थ परिचय सुनिये—जो प्रतिदिन याचना करता है, वह स्वर्गमें जानेका अधिकारी नहीं है। जैसे चोर सब जीवोंको उद्वेगमें डाल देता है, उसी प्रकार वह भी है। वह पापात्मा सबके लिये सदा उद्वेगकारक होनेके कारण नरकमें पड़ता है।^२

ब्रह्मन् ! 'इस लोकमें किस कर्मसे मुझे सिद्धि प्राप्त हो सकती है और (मृत्युके पश्चात्) यहाँसे मुझे कहाँ किस लोकमें जाना है?' इस बातका भलीभाँति विचार करके जो पुरुष भावी क्लेशके निराकरणका समुचित उपाय करता है, विद्वानोंने उसीको दक्ष पुरुषोंसे भी अधिक दक्ष (चतुरशिरोमणि) कहा है। पुरुष अपनी आयुमेंसे आठ मास, एक दिन, अथवा सम्पूर्ण पूर्वावस्थामें अथवा पूरी आयुभर ऐसा कर्म अवश्य करे, जिससे अन्तमें वह परम सुखी हो और निरन्तर उन्नतिके पथपर बढ़ता रहे।^३

वेदान्तवादी विद्वान् अर्चि और धूम—ये दो मार्ग बतलाते हैं। अर्चिमार्गसे जानेवाला पुरुष मोक्षको प्राप्त होता है और धूममार्गसे जानेवाला जीव स्वर्गमें पुण्यफल भोगकर पुनः इस संसारमें लौट आता है। सकामभावसे किये हुए यज्ञ आदिके द्वारा धूममार्गकी प्राप्ति होती है और नैष्कर्म्य (कर्मफलत्याग एवं ज्ञान)-से अर्चिमाग प्राप्त होता है। इन दोनोंसे भिन्न जो अशास्त्रीय मार्ग है, वह पाखण्ड कहलाता है। जो देवताओं तथा मनुप्रोक्त धर्मोंको नहीं मानता, वह उक्त दोनों मार्गोंको नहीं प्राप्त होता। इस प्रकार यह तत्त्वार्थका निरूपण किया गया।^४ विप्रवर! आपके इन प्रश्नोंका यथाशक्ति समाधान किया गया है। यह ठीक है या नहीं, इसको आप बताइये। साथ ही अपना परिचय भी दीजिये।


१- यस्यां तिथौ रथं पूर्वं प्राप देवो दिवाकरः। सा तिथिः कथिता विप्रैर्माघे या रथसप्तमी॥  
तस्यां दत्तं तु चेष्टं यत् सर्वमेवाक्षयं मतम्। सर्वदारिद्र्यशमनं भास्करप्रीतये मतम्॥  
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ३०७-३०८)

२- नित्योद्वेजकमाहुर्यं बुधास्तं शृणु तत्त्वतः। यश्च याचनको नित्यं न स स्वर्गस्य भाजनम्॥  
उद्वेजयति भूतानि यथा चौरस्तथैव सः। नरकं याति पापात्मा नित्योद्वेगकरस्त्वसौ॥  
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ३०९-३१०)

३- इहोपपत्तिमम केन कर्मणा क्व च प्रयातव्यमितो भवेन्मया।  
विचार्य चैवं प्रतिकारकारी बुधैः स चोक्तो द्विज दक्षदक्षः॥  
मासैरष्टभिरह्ना च पूर्वेण वयसायुषा।  
तत्कर्म पुरुषः कुर्याद् येनान्ते सुखमेधते॥  
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ३११-३१२)

४-अर्चिषा याति मोक्षं च धूमेनावर्तते पुनः। यज्ञैरासाद्यते धूमो नैष्कर्म्येणार्चिराप्यते॥  
एतयोरपरो मार्गः पाखण्ड इति कीर्त्यते। यो देवान् मन्यते नैव धर्मांश्च मनुसूचितान्॥  
न तौ स याति पन्थानौ तत्त्वार्थोऽयं निरूपितः॥  
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ३१३-३१५)
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १०७

नारदजीके द्वारा कलाप-ग्रामके ब्राह्मणोंको महीसागरसंगममें ले आना और वहाँ उन्हें भूमि आदि देकर पुण्यस्थानकी स्थापना करना

नारदजी कहते हैं—अर्जुन! इस प्रकार अपने प्रश्नोंका समाधान सुनकर मेरे सम्पूर्ण शरीरमें रोमांच हो आया। तब मैंने अपने स्वरूपको प्रकट करके उन ब्राह्मणोंसे इस प्रकार कहा—'अहो!

मेरे पिता ब्रह्माजी धन्य हैं, जिनकी सृष्टिके बालक भी आप-जैसे ब्राह्मणशिरोमणिके रूपमें विद्यमान हैं। मुझे अपने जन्मका फल प्राप्त हो गया, क्योंकि आप-जैसे निष्पाप और उपद्रवशून्य महात्माओंका मैंने दर्शन किया।'

इतना सुनते ही वे शातातप आदि ब्राह्मण सहसा उठकर खड़े हो गये और अर्घ्य, पाद्य आदि पूजा-सामग्रियोंसे मेरे स्वागत-सत्कारमें लग गये। तत्पश्चात् साधुजनोचित वाणीमें वे इस प्रकार बोले—'हम धन्य हैं, क्योंकि आप साक्षात् देवर्षि नारद यहाँ हमलोगोंके समीप पधारे हैं। देवर्षे! कहाँसे आपका शुभागमन हुआ है और अब कहाँ जानेका विचार है? मुनिश्रेष्ठ! इस आश्रमपर पधारनेकी क्या आवश्यकता थी, वह कार्य आप हमें बतावें।'

नारदजी बोले—मैं ब्रह्माजीके आदेशसे मही-सागरसंगम नामक महातीर्थमें ब्राह्मणोंको उत्तम स्थान दान करना चाहता हूँ। इसके लिये आपलोग मुझे आज्ञा दें।

मेरे ऐसा कहनेपर शातातपने सब ब्राह्मणोंकी ओर दृष्टि डालकर यों कहना आरम्भ किया—'नारदजी! यह सत्य है कि भारतवर्ष देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। उसमें भी महीसागरसंगमके विषयमें तो क्या कहना है, जहाँ स्नान करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण महातीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त कर लेता है। आपके प्रस्तावमें एक ही महान् दोष है, जिससे हमलोग निरन्तर डरते रहते हैं। वहाँ बहुतसे निर्दयी और दुस्साहसपूर्ण कर्म करनेवाले चोर हैं, जो हमारे-जैसे तपस्वियोंका धन हर लेते हैं। स्पर्श वर्णोंमें जो सोलहवाँ और इक्कीसवाँ अक्षर है वही हमारा धन है। उस धनसे हीन हो जानेपर हमारा जन्म कैसा निरर्थक हो जायगा। हम चोरोंके हाथमें न पड़ें, यही हमारी अभिलाषा है।'

अर्जुनने पूछा—ब्रह्मन्! वे चोर कौन हैं और कौन-सा धन हर लेते हैं।

नारदजीने कहा—कुन्तीनन्दन! 'काम' और 'क्रोध' आदि दोष ही चोर हैं और 'तप' ही उन ब्राह्मणोंका धन है, जिसके अपहरणके भयसे उन्होंने मुझसे वैसी बात कही थी।

तब हारीत मुनि बोले—कौन अपनी मूढ़ बुद्धिके कारण महीसागरसंगम नामक तीर्थका त्याग करेगा, जहाँ स्वर्ग और मोक्ष हाथमें ही रहते हैं। हमारे हृदयमें भगवान् उमानाथका निवास है। वे दृढ़तापूर्वक हमारा पालन करते हैं। उनके रहते हुए वहाँ चोरोंका भय हमारा क्या कर लेगा। नारदजी! आपके कहनेसे मैं वहाँ चलूँगा।

१०८

  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मेरे परिवारमें छब्बीस हजार ब्राह्मण हैं, वे सब-के-सब अध्ययन, अध्यापन आदि छः कर्मोंमें तत्पर, बाहर-भीतरसे शुद्ध तथा लोभ और दम्भसे रहित हैं। उन सबके साथ मैं वहाँ चल सकता हूँ। यह मेरा उत्तम निश्चय है।

उनके ऐसा कहनेपर मैंने उन सब ब्राह्मणोंको अपने दण्डके ऊपर चढ़ा लिया और बड़ी प्रसन्नताके साथ सहसा आकाशमार्गसे लौट पड़ा। बीचमें सौ योजनतक हिमका मार्ग है। उसे लाँघकर उन ब्राह्मणोंके साथ मैं केदारक्षेत्रमें आ पहुँचा। वह हिम-प्रदेश आकाशमार्गसे या बिलके मार्गसे तथा भगवान् कार्तिकेयके प्रसादसे लाँघा जा सकता है। इसके लिये दूसरा कोई उपाय नहीं है।

अर्जुनने पूछा—नारदजी! कलाप-ग्राम कहाँ है? उसका मार्ग बिलके द्वारा किस प्रकार लाँघा जा सकता है तथा स्वामिकार्तिकेयका कृपा-प्रसाद कैसे प्राप्त होगा? ये सब बातें मुझे बताइये।

नारदजी बोले—केदारक्षेत्रसे आगे सौ योजनतक हिमसंयुक्त प्रदेश माना गया है। उसके अन्तमें सौ योजन विस्तारवाला कलाप-ग्राम है, उसके अन्तमें सौ योजनतक बालूका समुद्र बताया जाता है। उसके बाद सौ योजन विस्तारवाला वह प्रदेश है, जिसे भूमिसवर्ग कहते हैं। बिलके मार्गसे वहाँ जिस प्रकार जाना हो सकता है, उसे सुनो। अन्न और जलका त्याग करके उपवासपूर्वक दक्षिण दिशावर्ती भगवान् कार्तिकेयकी आराधना करे। कार्तिकेयजी जब साधकको पापरहित हुआ मानते हैं तब स्वप्नमें प्रकट होकर आदेश देते हैं कि तुम अभीष्ट स्थानकी यात्रा करो। कार्तिकेयजीके स्थानसे पश्चिम एक बहुत बड़ी गुफा है, वह सात सौ योजन दूरतक गयी हुई है। कार्तिकेयजीकी आज्ञा मिलनेके पश्चात् उसीमें प्रवेश करके आगे बढ़ना चाहिये। उसके भीतर मरकतमणिका एक शिवलिंग है, जो सूर्यके समान प्रकाश करनेवाला है। उस शिवलिंगके आगे अत्यन्त स्वच्छ सुवर्णके रंगकी मिट्टी मिलती है। वहाँ शिवलिंगको नमस्कार करके तथा उस पीली मिट्टीको हाथमें लेकर स्तम्भ तीर्थमें आना चाहिये। वहाँ भगवान् कुमार तथा वाराहदेवकी आराधना करके आधी रात होनेपर कुएँसे जल निकालना चाहिये। उस जल और मिट्टीसे दोनों आँखोंमें अंजन करना चाहिये। साथ ही सम्पूर्ण शरीरमें उस जल और मिट्टीका उबटन लगाना चाहिये। उस अंजनके प्रभावसे कदाचित् साठ कदम चलनेपर उसे एक सुन्दर बिल दिखायी देता है। तदनन्तर उस बिलके भीतरसे होकर वह यात्रा करे। वहाँ कारीष नामक बड़े भयंकर कीड़े होते हैं, परंतु वे उस उबटनके प्रभावसे साधकको डँसते नहीं हैं। उस बिलके भीतर भगवान् सूर्यके समान तेजस्वी सिद्ध पुरुषोंका दर्शन करते हुए साधक आगे बढ़ता है और परम उत्तम कलाप-ग्राममें पहुँच जाता है। वहाँके मनुष्योंकी आयु चार हजार वर्षकी बतलायी गयी है। वहाँ सब लोग फलोंका ही भोजन करते हैं।

इस प्रकार बिलके मार्गसे कलाप-ग्रामतक पहुँचनेकी विधि बतायी गयी है। अब आगे जो कुछ हुआ उसको श्रवण करो। अपनी तपस्याकी शक्तिसे अत्यन्त सूक्ष्म रूप धारण करनेवाले उन ब्राह्मणोंको दण्डके अग्र भागपर रखकर मैं महीसागरसंगम तीर्थमें आया और वहाँ पवित्र जलाशयके तटपर उतारंकर उन्हें स्वतन्त्र कर दिया। फिर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ मैंने सम्पूर्ण दोषोंको दग्ध करनेके लये दावानलसदृश महीसागरसंगम तीर्थमें स्नान किया और देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करके परम उत्तम गायत्रीमन्त्रका जप करते हुए हम सब लोगं संगमके समीप बैठ गये। हृदयमें भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए भगवान् सूर्यकी ओर देखते रहे। इसी समय इन्द्र आदि देवता, सूर्य आदि सम्पूर्ण ग्रह, लोकपाल, आठ देव-जातियाँ, गन्धर्व तथा अप्सराओंके समूह—ये सब वहाँ आ पहुँचे। तदनन्तर महामुनि कपिलजी भी वहाँ आये और नारदजीसे इस प्रकार बोले—'देवर्षे ! मुझे आठ

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १०९

हजार ब्राह्मण दीजिये। कलापग्रामके निवासी इन ब्राह्मणोंको मैं भूमिदान करूँगा। आप इसकी व्यवस्था करें।' तब मैंने उनसे प्रतिज्ञापूर्वक कहा—'महामुने! ऐसा ही हो। आप भी यहाँ उत्तम कपिलस्थानका निर्माण करें। श्राद्धमें अथवा श्राद्धोपयोगी समय प्राप्त होनेपर जिसके आश्रममें आया हुआ अतिथि विमुख लौट जाता है, उसका सब सत्कर्म निष्फल होता है। जो अतिथिका पूजन—स्वागत-सत्कार नहीं करता, वह रौरव नरकमें जाता है। जिसके द्वारा अतिथिका पूजन होता है, वह सम्पूर्ण देवताओंके द्वारा स्वयं भी पूजित होता है।<sup></sup> इसलिये उस तीर्थमें दान और यज्ञके द्वारा मैंने कपिल मुनिको भोजन कराया।'

तत्पश्चात् मैंने श्रीमान् हारीत मुनिको उनका चरण पखारनेके लिये बुलाया। तब मैंने ब्राह्मणोंसे कहा—

पूर्वकालकी बात है, महर्षि अंगिराके कुलमें एक प्रसिद्ध ब्राह्मण हुए थे। वे महान् विद्वान् थे, परंतु प्रत्येक कार्यमें अधिक विलम्ब किया करते थे। उनके पिताका नाम महर्षि गौतम था। वे सब कार्य भलीभाँति सोच-विचारकर बहुत देरके बाद प्रारम्भ करते थे। उनके द्वारा चिरकालमें कार्य-सिद्धि होनेके कारण वे जनसाधारणमें चिरकारी कहे जाने लगे। एक बार चिरकारीकी मातासे कोई अपराध हो गया। उससे कुपित होकर उनके अदीर्घदर्शी पिताने अन्य सब पुत्रोंको छोड़कर केवल चिरकारीको आदेश दिया कि 'तुम अपनी इस माताको मार डालो।' उन्होंने बड़ी देरके बाद उत्तर दिया—'अच्छा, ऐसा ही करूँगा।' परंतु वे तो स्वभावसे ही चिरकारी थे। अपनी चिरकारिताका विचार करके चिरकालतक इस विषयमें सोच-विचार करते रहे। 'मैं पिताकी इस आज्ञाका पालन कैसे करूँ? अपनी माताको कैसे मारूँ? पिताके आज्ञापालनस्वरूप धर्मका बहाना लेकर इस मातृहत्यारूप अधर्ममें कैसे डूब जाऊँ? माना कि पिताकी आज्ञाका पालन सबसे बड़ा धर्म है; परंतु उसी प्रकार माताकी रक्षा भी तो मेरा अपना धर्म है। पुत्रत्व सर्वथा परतन्त्र है—पुत्र माता और पिता दोनोंके अधीन है। स्त्रीकी, उसमें भी माताकी हत्या करके कभी भी कौन सुखी रह सकता है? ऐसे ही, पिताकी भी अवहेलना करके कौन प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता है? पुत्रके लिये यही उचित है कि पिताकी अवहेलना न करे। साथ ही उसके लिये माताकी रक्षा करना भी उचित है। शरीर आदि जो देनेयोग्य वस्तुएँ हैं, उन सबको एकमात्र पिता देते हैं, इसलिये पिताकी प्रत्येक आज्ञाका पालन करना चाहिये। पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले पुत्रके पूर्वकृत पातक भी धुल जाते हैं। पिता स्वर्ग है, पिता धर्म है और पिता सर्वश्रेष्ठ तपस्या है। पिताके प्रसन्न होनेपर सब देवता प्रसन्न हो जाते हैं।<sup></sup> यदि पिता प्रसन्न है, तो पुत्रके सब पापोंका प्रायश्चित्त हो जाता है। वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। पुत्रके स्नेहसे कष्ट पाते हुए भी पिता उसके प्रति स्नेह नहीं छोड़ते। यह पिताका गौरव है, जिसपर पुत्रकी दृष्टिसे मैंने विचार किया है। पिताका छोटा-मोटा स्थान नहीं है। उनका पद बहुत ऊँचा है। अब मैं माताके विषयमें विचार करूँगा। मेरे इस मानव-जन्ममें जो यह पंचभूतोंका समुदायरूप शरीर प्राप्त हुआ है इसका कारण तो मेरी माता ही है। जिसकी माता जीवित है, वह सनाथ है। जो मातृहीन है, वह अनाथ है। पुत्र और पौत्रसे युक्त मनुष्य यदि सौ वर्षकी आयुके बाद भी अपनी माताके आश्रयमें जाता है, तो वह दो वर्षके बालककी भाँति आचरण


१- श्राद्धे वा प्राप्तकाले वा ह्यतिथिर्विमुखो भवेत्। यस्याश्रममुपायातस्तस्य सर्वं हि निष्फलम्॥
स गच्छेद्रौरवाँल्लोकान् योऽतिथिं नाभिपूजयेत्। अतिथिः पूजितो येन स देवैरपि पूज्यते॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ४।५७-५८)
२- पिता स्वर्गः पिता धर्मः पिता हि परमं तपः। पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वाः प्रीणन्ति देवताः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ४। ८९-९०)

११० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करता है। पुत्र समर्थ हो या असमर्थ, दुर्बल हो या पुष्ट—माता उसका विधिवत् पालन करती है। माताके समान कोई तीर्थ नहीं है, माताके समान कोई गति नहीं है, माताके समान कोई रक्षक नहीं है तथा माताके समान कोई प्याऊ नहीं है। माता अपने गर्भमें धारण करनेके कारण 'धात्री' है, जन्म देनेवाली होनेसे 'जननी' है, अंगोंकी वृद्धि करनेके कारण 'अम्बा' है, वीर पुत्रका प्रसव करनेके कारण 'वीरप्रसू' कहलाती है, शिशुकी शुश्रूषा करनेसे वह 'शक्ति' कही गयी है तथा सदा सम्मान देनेके कारण उसे 'माता' कहते हैं।* मुनिलोग पिताको देवताके समान समझते हैं परंतु मनुष्यों और देवताओंका समूह माताके समीप नहीं पहुँच पाता—माताकी बराबरी नहीं कर सकता। पतित होनेपर गुरुजन भी त्याग देनेयोग्य माने गये हैं; परंतु माता किसी प्रकार भी त्याज्य नहीं है। कौशिकी नदीके तटपर स्त्रियोंसे घिरे हुए राजा बलिकी ओर वह देरतक देखती रही; केवल इसी अपराधवश पिताने मुझे अपनी माताको मार डालनेका आदेश दिया है।' चिरकारी होनेके कारण वे इन्हीं सब बातोंपर अधिक समयतक विचार करते रहे, परंतु उनकी चिन्ताका अन्त नहीं हुआ।

इसी समय उदारबुद्धिवाले मेधातिथि (गौतम) दुःखी हो आँसू बहाते हुए इस प्रकार चिन्ता करने लगे—'अहो! पतिव्रता नारीका वध करके मैं पापके समुद्रमें डूब गया हूँ। अब कौन मेरा उद्धार करेगा? मैंने उदार विचारवाले चिरकारीको बड़ी शीघ्रतासे वह कठोर आज्ञा दे दी थी। यदि यह सचमुच चिरकारी हो तो मुझे पापसे बचा सकता है। चिरकारिक! तुम्हारा कल्याण हो। यदि आज भी अपने नामके अनुसार तुम चिरकार्य बने रहे, तभी वास्तवमें चिरकार्य हो। बेटा! तुम आज मुझे अपनी माताको तथा मेरे द्वारा उपार्जित तपस्याको बचाओ। चिरकारक! तुम पातक और भयसे अपनी भी रक्षा करो।' इस प्रकार अत्यन्त दुःखित हो चिन्ता करते हुए गौतम मुनि चिरकारीके पास आये। वहाँ आकर उन्होंने अपने पुत्र चिरकारीको माताके पास बैठे देखा। चिरकारी पिताको अपने समीप आया देख बहुत दुःखी हुए और हथियार फेंककर पिताके चरणोंमें मस्तक रखकर वे उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगे। मेधातिथि पुत्रको पृथ्वीपर मस्तक रखकर पड़े देख और पत्नीको जीवित पाकर बड़े प्रसन्न हुए। जब पुत्र हाथमें हथियार लेकर खड़ा था, तब भी माताने ऐसा नहीं समझा कि यह मुझे मार डालेगा। अब उसे पिताके चरणोंमें पड़ा देख माता यह विचार करने लगी कि 'इसने हथियार उठानेकी जो चपलता की है, उसीको पिताके भयसे छिपा रहा है।' तदनन्तर पिताने बड़ी देरतक पुत्रकी ओर देखा। देरतक उसका मस्तक सूँघा। चिरकालतक उसे दोनों भुजाओंमें कसकर छातीसे लगाये रखा और अन्तमें कहा—'बेटा! तुम चिरजीवी


* नास्ति मात्रा समं तीर्थं नास्ति मात्रा समा गतिः। नास्ति मात्रा समं त्राणं नास्ति मात्रा समा प्रपा ॥
कुक्षौ सन्धारणाद्धात्री जननाज्जननी तथा। अङ्गानां वर्द्धनादम्बा वीरसूत्वेन वीरसूः ॥
शिशोः शुश्रूषणाच्छक्तिर्माता स्यान्माननाच्च सा। ... ... ... ... ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ४। ९९-१०१)

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १११

रहो।' मेधातिथि बड़ी देरतक प्रसन्नतामें डूबे रहे। फिर पुत्रसे इस प्रकार बोले—'चिरकारिक ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारी आयु चिरस्थायिनी हो। सौम्य ! तुमने चिरकालतक विलम्ब करके जो कार्य किया है, उसके कारण मुझे इस समय अधिक समयतक दुखी नहीं होना पड़ा है।'

तदनन्तर प्रसिद्ध विद्वान् मुनिश्रेष्ठ गौतमने गाथा गान किया, जो इस प्रकार है—'चिरकालतक विचार करके कोई मन्त्रणा स्थिर करे। स्थिर किये हुए मन्त्र (परामर्श)-को चिरकालके बाद छोड़े। चिरकालमें किसीको मित्र बनाकर उसे चिरकालतक धारण किये रहना उचित है। राग, दर्प, अभिमान, द्रोह, पापकर्म तथा अप्रिय कर्तव्यमें चिरकारी (विलम्ब करनेवाला) प्रशंसाका पात्र है। बन्धु, सुहृद्, भृत्य और स्त्रीवर्गके अव्यक्त अपराधोंमें जल्दी कोई दण्ड न देकर देरतक विचार करनेवाला पुरुष प्रशंसनीय माना गया है। चिरकालतक धर्मोंका सेवन करे। किसी बातकी खोजका कार्य चिरकालतक करता रहे। विद्वान् पुरुषोंका संग अधिक कालतक करे। इष्टमित्रोंका सेवन अथवा इष्टदेवताकी उपासना दीर्घकालतक करे। अपनेको चिरकालतक विनयशील बनाये रखनेवाला पुरुष दीर्घकालतक आदरका पात्र बना रहता है। दूसरा कोई भी यदि धर्मयुक्त वचन कहे तो उसे देरतक सुने और देरतक उसके विषयमें प्रश्न करता रहे। ऐसा करनेसे मनुष्य चिरकालतक तिरस्कारका पात्र नहीं बनता।

पर यदि कोई धर्मका कार्य आ गया हो तो उसके पालनमें विलम्ब नहीं करना चाहिये। शत्रु हाथमें हथियार लेकर आता हो तो उससे आत्मरक्षा करनेमें देर नहीं लगानी चाहिये। यदि कोई सुपात्र व्यक्ति अपने समीप आ गया हो तो उसका सम्मान करने या उसे कुछ देनेमें विलम्ब नहीं करना चाहिये। भयसे बचने और साधु पुरुषोंका स्वागत-सत्कार करनेमें भी देर नहीं करनी चाहिये। उपर्युक्त कार्योंमें जो विलम्ब करता है, वह प्रशंसाका पात्र नहीं है।'*

ऐसा कहकर स्त्री और पुत्रके साथ गौतम मुनि शान्तिको प्राप्त हुए। तदनन्तर चिरकालतक तपस्या करके उन्होंने दिव्यलोक प्राप्त किया।

यह बात मैंने उन सर्वगुणसम्पन्न ब्राह्मणोंके समक्ष वहाँ कही। तत्पश्चात् धर्मवर्माके समीप हारीत आदि मुनियोंके चरण पखारकर सम्पूर्ण देवताओंको साक्षी बनाकर मैंने संकल्पपूर्वक सुवर्ण, गौ, गृह, धन, स्त्री, वस्त्र और आभूषण आदि दे उन ब्राह्मणोंको कृतार्थ किया। इसके बाद उस देवसमाजमें इन्द्रने हाथ उठाकर कहा—'देवताओ! भगवान् शंकरके अर्द्धांगमें अपना वामार्द्ध भाग स्थापित करनेवाली देवी गिरिराजनन्दिनी जबतक विद्यमान हैं, गणेशजी, हम सब देवता और ये तीनों लोक जबतक मौजूद हैं, तबतक नारदजीके द्वारा स्थापित किया हुआ यह स्थान सदा समृद्धिशाली बना रहे। इस स्थानको नष्ट करनेवाले मनुष्यपर ब्रह्मशाप, विष्णुशाप, रुद्रशाप तथा ब्राह्मणशाप भी पड़े; क्योंकि तीर्थभूमिमें देवताओं और ब्राह्मणोंके


* चिरेण मन्त्रं संधीयाच्चिरेण च कृतं त्यजेत् । चिरेण विहितं मित्रं चिरं धारणमर्हति ॥
रागे दर्पे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि । अप्रिये चैव कर्तव्ये चिरकारी प्रशस्यते ॥
बन्धूनां सुहृदां चैव भृत्यानां स्त्रीजनस्य च । अव्यक्तेष्वपराधेषु चिरकारी प्रशस्यते ॥
चिरं धर्मान्निषेवेत कुर्याच्चान्वेषणं चिरम् । चिरमन्वास्य विदुषश्चिरमिष्टानुपास्य च ॥
चिरं विनीय चात्मानं चिरं यात्यनवज्ञताम् । ब्रुवतश्च परस्यापि वाक्यं धर्मोपसंहितम् ॥
चिरं पृच्छेच्च शृणुयाच्चिरं न परिभूयते । धर्मे शत्रौ शस्त्रहस्ते पात्रे च निकटस्थिते ॥
भये च साधुपूजायां चिरकारी न शस्यते ।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ४। १२०—१२६)

११२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


द्रव्यका अपहरण करनेवाले और उनका अनुमोदन करनेवाले पापात्मा मनुष्य नरकमें सैकड़ों वर्षोंतक रुद्रतालकी मार खाते रहते हैं।'

तब सबने प्रसन्न होकर 'ऐसा ही हो, ऐसा ही हो' इस प्रकार कहा। इस प्रकार मेरे द्वारा स्थापित किये हुए स्थानमें महर्षि कपिलने कापिल नामक स्थानकी संस्थापना की। तदनन्तर सब देवता देवलोकको चले गये।


लोमशजीका राजा इन्द्रद्युम्नको अपने पूर्वजन्मका चरित्र सुनाकर शिवकी आराधनाका महत्त्व बतलाना

**अर्जुन बोले—**नारदजी! आपने महीसागरसंगमके अद्भुत माहात्म्यका वर्णन किया। उसे सुनकर मुझे बड़ा विस्मय और हर्ष हो रहा है। बताइये, किसके यज्ञमें मही नदी प्रकट हुई है?

**नारदजीने कहा—**पाण्डुनन्दन! प्राचीन कालमें इस पृथ्वीपर इन्द्रद्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे बड़े दानी, सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता, माननीय पुरुषोंका सम्मान करनेवाले तथा सामर्थ्यशाली थे। वे उचित कार्योंके ज्ञाता, विवेकके निवासस्थान तथा गुणोंके समुद्र थे। भूमण्डलमें कोई भी ऐसा नगर, ग्राम या शहर नहीं था, जो राजाके द्वारा किये गये धर्मानुष्ठानके चिह्नोंसे अंकित न हो। उन्होंने ब्राह्मविवाहकी विधिसे अनेक बार कन्यादान किया था। वे धनार्थियोंको एक हजार स्वर्णमुद्रासे कम दान नहीं देते थे। दशमी तिथिके दिन रात्रिकालमें हाथीकी पीठपर नगाड़ा रखकर उनके सम्पूर्ण नगरमें बजाया जाता और यह घोषणा की जाती कि 'कल प्रातःकाल एकादशीका व्रत है, वह सबको करना चाहिये।' गंगाकी बालू, वर्षाकी धारा तथा आकाशके तारे कदाचित् विद्वान् पुरुषोंद्वारा गिने जा सकते हैं; परंतु महाराज इन्द्रद्युम्नके पुण्योंकी गणना नहीं की जा सकती। ऐसे पुण्योंके प्रभावसे राजा इन्द्रद्युम्न अपने मानव-शरीरसे ही विमानपर बैठकर ब्रह्माजीके लोकमें जा पहुँचे और वहाँ देवदुर्लभ भोगोंका उपभोग किया। इस प्रकार अनेक कल्प बीत जानेके बाद ब्रह्माजीने अपने लोकमें निवास करनेवाले राजा इन्द्रद्युम्नसे कहा—'राजन्! अब तुम पृथ्वीपर जाओ।'

राजाने ब्रह्माजीकी यह बात सुनी और सुननेके साथ ही अपनेको पृथ्वीपर आया हुआ देखा।

(उसके बाद राजा इन्द्रद्युम्न मार्कण्डेय मुनि, नाडीजंघ बक, प्राकारकर्ण उलूक, चिरायु गीधराज एवं मन्थर कछुएसे मिले और) वे बोले—स्वयं चार मुखवाले ब्रह्माने ही मुझे स्वर्गसे निकाल दिया है। इसके कारण मैं लज्जित हूँ, अतः बार-बार पतन होनेके दोषसे दूषित स्वर्गलोकमें अब मैं नहीं जाऊँगा। अब तो मैं अविद्या और पापका नाश करनेवाले विवेक-वैराग्यका आश्रय ले ज्ञान-प्राप्तिपूर्वक मोक्षके लिये यत्न करूँगा। इसलिये यदि आप अपने घरपर आये हुए मुझ अतिथिका आज सत्कार करना चाहते हैं तो मुझे ऐसे किसी

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ११३

गुरुका पता बता दीजिये जो मुझे इस संसारसागरसे पार कर देनेवाला हो।

कछुएने कहा—राजन्! लोमश नामवाले एक महामुनि हैं, जिनकी आयु मुझसे भी बड़ी है। पहले मैंने उन्हें कलाप-ग्राममें कहीं देखा था।

इन्द्रद्युम्न बोले—तब तो चलिये, हम सब लोग साथ ही उनके पास चलें, विद्वान् पुरुष सत्संगको तीर्थसे भी अधिक पवित्र बतलाते हैं।<sup></sup>

नारदजी कहते हैं—अर्जुन! तदनन्तर उन सबने कलाप-ग्राममें पहुँचकर महामुनि लोमशके दर्शन किये। वे मन और इन्द्रियोंके संयममें तत्पर तथा क्रियायोगमें संलग्न थे। तीनों काल स्नान करनेसे उनकी जटाएँ कुछ पीली पड़ गयी थीं, उन्हींको अपने मस्तकपर धारण किये हुए, घीकी आहुतिसे प्रज्वलित हुई अग्निकी भाँति अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उन्होंने छाया करनेके लिये अपने बायें हाथमें एक मुट्ठी तृण ले रखा था और दाहिने हाथमें रुद्राक्षकी माला धारण कर रखी थी। वे महामुनि मैत्र मार्गमें स्थित थे। जो कटुवचन आदिके द्वारा पृथ्वीपर रहनेवाले प्राणियोंको पीड़ा न देते हुए केवल जपसे सिद्धि प्राप्त कर लेता है वह मुनि 'मैत्र' कहलाता है।<sup></sup> राजा, मुनि, बक, उलूक, गृध्र और कछुएने कलाप-ग्राममें उन पुरातन तपोनिधि महात्माका दर्शन करके उनके चरणोंमें प्रणाम किया। मुनिने भी आसन आदि देकर स्वागत-सत्कारके द्वारा उन सबको प्रसन्न किया। तत्पश्चात् उन्होंने अपना मनोगत कार्य निवेदन किया।

कछुआ बोला—भगवन्! ये यज्ञ करनेवाले पुरुषोंमें अग्रगण्य महाराज इन्द्रद्युम्न हैं। वसुधामें इनकी कीर्तिका लोप हो जानेसे ब्रह्माजीने इन्हें स्वर्गसे निकाल दिया है। अब ये स्वर्गकी इच्छा नहीं रखते। वहाँसे पुनः गिरनेका भय बना रहता है। इसलिये स्वर्ग इन्हें भयानक प्रतीत होता है। अब आपके अनुग्रहसे ये मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं। अतएव मैं इन्हें आपके पास ले आया हूँ, इन्हें आप अपना शिष्य समझें और इनके मनोवाञ्छित प्रश्नोंका उत्तर दें, क्योंकि परोपकार साधुपुरुषोंका व्रत है।

लोमशजीने कहा—कूर्म! तुम्हारा कथन उचित ही है। राजन्! तुम्हारे मनमें क्या सन्देह है सो बताओ।

इन्द्रद्युम्न बोले—भगवन्! मेरा पहला प्रश्न यह है कि गरमीका समय है, सूर्यदेव आकाशके मध्यमें आकर तप रहे हैं, तो भी आपने अपने लिये कोई कुटी क्यों नहीं बनायी, जो हाथमें तिनके लेकर आप मस्तकपर छाया किये हुए हैं।

लोमशजीने कहा—राजन्! एक दिन मरना अवश्य है। यह शरीर गिर जायगा, फिर इस अनित्य संसारमें रहनेवाले मनुष्योंद्वारा किसके लिये घर बनाया जाता है। दाँत चले जाते हैं, लक्ष्मी चली जाती है तथा यौवन और जीवन भी चला जानेवाला है। यह जो कुछ दिखायी देता है, सब अत्यन्त चंचल (क्षणभंगुर) है। ऐसी दशामें दान करना ही मनुष्योंके लिये सर्वोत्तम गृह है। इस प्रकार संसारको असार और चलायमान जान लेनेपर किसके लिये कुटी आदिका संग्रह किया जाय।

इन्द्रद्युम्नने पूछा—भगवन्! तीनों लोकोंमें केवल आप ही चिरायु सुने जाते हैं, इसीलिये मैं आपके पास आया हूँ। फिर आपके मुँहसे ऐसी बात क्यों निकलती है?

लोमशजीने कहा—राजन्! प्रत्येक कल्पमें मेरे शरीरसे एक रोम टूटकर गिर जाता है। जिस


१- प्राहुः पूततमां तीर्थादपि सत्संगतिं बुधाः।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ९।४९)
२- अहिंसयन्दुरुक्ताद्यैः प्राणिनो भूमिचारिणः। यः सिद्धिमेति जप्येन स मैत्रो मुनिरुच्यते॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० १०।४)

१९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


दिन सब रोएँ नष्ट हो जायँगे, उस दिन मेरी मृत्यु हो जायगी। देखो, मेरे घुटनेमें दो अंगुलतक रोएँसे खाली हो गया है। इसीसे मैं डरता हूँ, जब मरना ही है तब घर बनाकर क्या होगा?

इन्द्रद्युम्न बोले—ब्रह्मन्! मैं पूछता हूँ कि आपको जो ऐसी बड़ी आयु प्राप्त हुई है वह दानका प्रभाव है अथवा तपस्याका?

लोमशजीने कहा—राजन्! सुनो, मैं अपने पूर्वजन्मका प्रसंग सुना रहा हूँ। यह कथा शिवधर्मकी महिमासे युक्त, पुण्यदायिनी तथा सब पापोंका नाश करनेवाली है। पूर्वकालमें मैं इस पृथ्वीपर अत्यन्त दरिद्र शूद्र होकर उत्पन्न हुआ था। उस समय भूखसे बहुत पीड़ित होकर पृथ्वीपर भ्रमण किया करता था। एक दिन दोपहरके समय जलके भीतर मैंने एक बहुत बड़ा शिवलिंग देखा। फिर उस जलाशयमें प्रवेश करके जल पीया और स्नान किया। तत्पश्चात् कमलके सुन्दर फूलोंसे उस नहलाये हुए शिवलिंगका पूजन किया। भूखसे मेरा गला सूखा जा रहा था। भगवान् नीलकण्ठको नमस्कार करके मैं पुनः आगे चल दिया। उस मार्गमें ही मेरी मृत्यु हो गयी। तदनन्तर दूसरे जन्ममें मैं ब्राह्मणके घरमें उत्पन्न हुआ। एक ही बार शिवलिंगको नहलाने और पूजा करनेसे मुझे अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण रहने लगा। 'यह सम्पूर्ण जगत् जो सत्य-सा प्रतीत हो रहा है, मिथ्याका विलास है, अविद्या ही इसका मूलकारण है।' ऐसा जानकर मैंने मूकता धारण कर ली। उस ब्राह्मणने भगवान् शंकरकी भलीभाँति आराधना करके वृद्धावस्थामें मुझे प्राप्त किया था। इसलिये मेरा नाम ईशान रखा। मेरे माता-पिताके मनको महामायाने ममतामें बाँध रखा था। वे मेरा गूँगापन दूर करनेके लिये नाना प्रकारके मन्त्र-यन्त्र तथा दूसरे उपाय भी किया करते थे। उनकी वह मूढ़ता देखकर मुझे मन-ही-मन हँसी आती थी। कुछ कालके पश्चात् जब मैं जवान हुआ, तो रातमें अपना घर छोड़कर निकल जाता और कमलके फूलोंसे भगवान् शिवकी पूजा करके पुनः शयनस्थानपर लौट आता था। तदनन्तर पिताकी मृत्यु हो जानेपर मेरे सम्बन्धियोंने मुझे निरा गूँगा समझकर त्याग दिया। इससे मुझे प्रसन्नता ही हुई। अब मैं फलाहार करके रहने लगा और भाँति-भाँतिके कमलोंसे भगवान् भूतनाथकी पूजा करने लगा। इस प्रकार सौ वर्ष बीतनेपर वरदायक भगवान् चन्द्रशेखरने मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उस समय मैंने याचना की—'भगवन्! मेरी जरा और मृत्युका नाश हो।'

तब भगवान् शिव बोले—जो नाम और रूप धारण करता है वह सर्वथा अजर-अमर नहीं हो सकता। अतः तुम अपने जीवनकी कोई सीमा निश्चित करो।

भगवान् शिवका यह वचन सुनकर मैंने इस प्रकार वरदान माँगा—'प्रत्येक कल्पके अन्तमें मेरे शरीरका एक रोम गिरे और इस प्रकार सब रोम गिर जानेपर मेरी मृत्यु हो, उसके बाद मैं आपका गण होऊँ, यही मेरा अभीष्ट वर है।' 'अच्छा, ऐसा ही होगा' यों कहकर भगवान् शिव अदृश्य हो गये और मैं तभीसे तपस्यामें संलग्न हो गया। ब्रह्म-कमल अथवा अन्य कमलोंसे भगवान्

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ११५


शिवकी पूजा करनेपर मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। महाराज! तुम भी ऐसा ही करो। इससे तुम अपनी मनोवांछित वस्तु प्राप्त कर लोगे। भगवान् शिवके भक्तके लिये त्रिलोकीमें कुछ भी दुर्लभ नहीं। ज्ञानेन्द्रियोंकी बाह्य विषयोंमें होनेवाली प्रवृत्तिको रोककर उन सबका भगवान् सदाशिवमें नित्य लय करना 'अन्तर्याग' कहलाता है। अन्तर्यागका साधन कठिन होनेके कारण भगवान् शिवने स्वयं ही बहिर्यागका इस प्रकार वर्णन किया है, पाँच भूतोंके द्वारा भगवान् शिवका पूजन 'बहिर्याग' है, अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश— ये सब भगवान् शिवकी पूजाके उपकरण हैं, ऐसा समझकर भावनाद्वारा इन्हें भगवान् शिवके चरणोंमें समर्पित करना, यह बहिर्याग-पूजाकी पद्धति है। बहिर्याग विशिष्ट फल देनेवाला और अक्षय माना गया है। जो अविद्या आदि पाँच^१ क्लेशों, कर्मोंके सुख-दुःखादि परिणामों तथा वासनाओंसे सर्वथा पृथक् हैं, उन भगवान् शंकरकी आराधनापूर्वक प्रणव-जप करनेवाला पुरुष मोक्षको प्राप्त होता है, सब पापोंका नाश हो जानेपर भगवान् शिवमें भावना होती है—उनके चिन्तनमें मन लगता है। जिनकी बुद्धि पापसे दूषित है उनके लिये शिवकी चर्चा भी दुर्लभ है, भारतवर्षमें जन्म होना दुर्लभ है, भगवान् शिवका पूजन दुर्लभ है, गंगा-स्नान दुर्लभ है, शिवकी भक्ति अत्यन्त दुर्लभ है, ब्राह्मणको दान देना दुर्लभ है, अग्निकी आराधना भी दुर्लभ है, थोड़े-से पुण्यवाले पुरुषोंके लिये भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजाका अवसर तो और भी दुर्लभ है।^२ पूर्वकालमें महादेवजीकी आराधना करके जिस प्रकार मेरी आयु बड़ी हुई, वह प्रसंग मैंने तुम्हें सुनाया ही है। भगवान् शिवकी भक्ति करनेवाले महात्मा पुरुषोंको त्रिलोकीमें कुछ भी दुर्लभ, दुष्प्राप्य अथवा असाध्य नहीं है। जिनकी इच्छासे यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न होता, स्थिर रहता और अन्तमें संहारको प्राप्त होता है, उन भगवान् शंकरकी शरणमें कौन नहीं जायगा। राजन्! यह रहस्यकी बात है। भगवान् शंकरकी आराधना ही संसारके मनुष्योंका प्रधान कर्तव्य है। जो भगवान् शिवको मस्तक झुकाता है, वह निश्चय उन्हें प्राप्त करता है।

$\sim\sim\circ\sim\sim$

संवर्तके मुखसे महीसागरसंगमकी महिमा तथा भर्तृयज्ञद्वारा शतरुद्रिय सुनकर शिवकी आराधनासे इन्द्रद्युम्न आदि सब भक्तोंको शिवसारूप्यकी प्राप्ति

नारदजी कहते हैं— मुनिवर लोमशके ये वचन सुनकर राजा इन्द्रद्युम्नने कहा, अब मैं आपको छोड़कर दूसरे किसीके पास नहीं जाऊँगा। यहीं आपसे अनुगृहीत होकर अब मैं शिवलिंगका आराधन करूँगा, जो कि मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है। वक, गृध्र, कच्छप और उलूकने भी वैसा ही विचार प्रकट किया। मुनिवर लोमश बड़े शरणागतवत्सल थे। उन सब लोगोंपर दया करके उन्होंने शिवदीक्षाकी विधिसे उन्हें लिंगपूजनका उपदेश किया। सच है, साधुपुरुषोंका समागम तीर्थसे भी बढ़कर है। उसका परिपक्व फल तत्काल प्राप्त होता है तथा वह


१- अविद्या, अस्मिता (चिज्जडग्रन्थि), राग, द्वेष और अभिनिवेश (मरणभय)।
२- पापोपहतबुद्धीनां शिववार्तापि दुर्लभा। दुर्लभं भारते जन्म दुर्लभं शिवपूजनम्॥
दुर्लभं जाह्नवीस्नानं शिवे भक्तिः सुदुर्लभा। दुर्लभं ब्राह्मणे दानं दुर्लभं वह्निपूजनम्॥
अल्पपुण्यैश्च दुष्प्राप्यं पुरुषोत्तमपूजनम्।
(स्क० पु०, मा० कुमा० १०। ५३-५५)

१९६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

दुरन्त पापोंका भी नाश करनेवाला है। साधु-सभा (सत्संग) रूपी सूर्यका उदय कोई अद्भुत और अनिर्वचनीय प्रभाव रखता है; क्योंकि वह अन्तःकरणमें व्याप्त हुए अज्ञानान्धकारका अत्यन्त विनाश करने-वाला है। साधु-समागमसे प्रकट हुए आनन्दमय अमृतरसकी सभी लहरें श्रेष्ठ हैं तथा वे सुधा, माध्वी, शर्करा और मधुके समान मीठी एवं छः^१ रसोंसे युक्त हैं।^२

तदनन्तर मार्कण्डेय मुनि और राजा इन्द्रद्युम्न आदि छहों मित्रोंने साधुसंग पाकर शिवशास्त्रके अनुसार क्रियायोग (तप, स्वाध्याय और ईश्वरका ध्यान) आरम्भ किया। एक समय उनके तपस्याकालमें ही लोमश मुनिका दर्शन करनेके लिये उत्सुक हो तीर्थयात्राके प्रसंगसे मैं वहाँ गया, क्योंकि तीर्थयात्राके प्रसंगसे महापुरुषोंके दर्शनके लिये जाना ही यात्राका प्रधान उद्देश्य है। जिस भूभागमें संत-महात्मा निवास करते हैं, वही 'तीर्थ' कहलाता है।^३ अर्जुन! पूजन और आतिथ्य-सत्कार होनेके पश्चात् जब मैं भलीभाँति विश्राम कर चुका, तब उन नाड़ीजंघ आदि भक्तोंने प्रणाम करके मुझसे पूछा—'ब्रह्मन्! मोक्ष-साधनके लिये कौन-सा स्थान है, बतलानेकी कृपा करें?'

उनके ऐसा पूछनेपर मैंने कहा—तुमलोग महासंवर्तसे यह बात पूछो। वे तुम्हें सब तीर्थोंके फलकी प्राप्ति करानेवाले तीर्थस्थानका पता बतायेंगे।

वे बोले—योगी संवर्तजी कहाँ तपस्या करते हैं, यदि जानते हों तो बताइये?

तब मैंने कहा—संवर्त मुनि काशीमें रहते हैं। उन्होंने गुप्त वेष धारण कर रखा है। वे नंगे रहते और भिक्षान्न भोजन करते हैं। दिनके दूसरे पहरकी पिछली घड़ी और तीसरे पहरकी पहली घड़ीको 'कुतप' काल कहते हैं। उसके बाद ही वे निकलते हैं और हाथमें ही भिक्षा लेकर उसे भोजन करते हैं। उनके पास किसी प्रकारकी वस्तुका भी संग्रह नहीं है। वे प्रणववाच्य परब्रह्म परमेश्वरका ध्यान करते रहते हैं। सायंकाल वनमें रहते हैं, किन्तु कोई भी मनुष्य उन योगीश्वर संवर्तजीको पहचान नहीं पाता। न पहचाननेका एक कारण भी है, उन्हींके-जैसे वेष और चिह्न धारण करनेवाले दूसरे लोग भी वहाँ रहते हैं। मैं एक ऐसा लक्षण बतलाता हूँ, जिससे तुमलोग संवर्तजीको पहचान लोगे। रातको उस चौड़ी सड़कपर, जो नगरके मध्यसे होकर निकलती है, तुमलोग एक मुर्दा लाकर जमीनपर इस ढंगसे रखना, जिससे दूसरोंको उसका पता न चले और स्वयं उससे थोड़ी ही दूरपर खड़े रहना। जो कोई भी उस भूमिके निकटतक आकर सहसा लौट पड़े, वही संवर्त हैं। ये मुर्देको शल्य समझकर उसे लाँघकर नहीं जाते; यह एक संशयरहित पहचान है। इस प्रकार जब संवर्तजी मिल जायँ तब विनीत भावसे उनकी शरणमें जाकर उनसे अपनी इच्छाके अनुसार प्रश्न करना। यदि वे पूछें, 'मेरा पता किसने बताया है?' तो मेरा नाम प्रकट कर देना।

मेरी बात सुनकर उन सबने वैसा ही किया।


१- दास्यरति, सख्यरति, वात्सल्यरति, शान्तरति, कान्तरति तथा अद्भुतरति— भक्तिरसके पोषक ये षड्विध भाव ही यहाँ छः रस बताये गये हैं।
२- तीर्थादप्यधिकः स्थाने सतां साधुसमागमः। पचेलिमफलः सद्यो दुरन्तकल्मुषापहः॥
अपूर्वः कोऽपि सद्गोष्ठी सहस्रकिरणोदयः। य एकान्ततयात्यन्तमन्तर्गततमोपहः॥
साधुगोष्ठीसमुद्भूतसुखामृतरसोर्मयः। सर्वे वराः सुधाशीधुशर्करामधुषड्रसाः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ११।६-८)
३- मुख्या पुरुषयात्रा हि तीर्थयात्रानुषङ्गतः। सद्भिः समाश्रितो भूमिभागस्तीर्थतयोच्यते ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ११।११)

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ११७

काशीपुरीमें पहुँचकर मेरे बताये अनुसार संवर्तको देखा। उनके रखे हुए शवको देखकर संवर्तजी भूखसे व्याकुल होनेपर भी सहसा लौट पड़े। तब वे उन्हें पहचानकर शीघ्रतापूर्वक उनके पीछे गये। सड़कपर चलते हुए संवर्तको पुकारकर कहते जाते थे—'ब्रह्मन्! क्षणभरके लिये खड़े तो हो जाइये।' परन्तु वे उन्हें फटकारते हुए चले जाते थे। साथ ही यह भी कहते जाते थे—'अरे! तुम सब लोग लौट जाओ।' भागते-भागते जब वे बहुत दूर चले गये, तब एक स्थानपर रुककर पूछा—'किसने तुम्हें मेरा पता बताया है, शीघ्र बताओ?' तब उन्होंने काँपते हुए उत्तर दिया—'नारदजीने बताया है।' तब संवर्तने पुनः मार्कण्डेय आदिसे कहा, 'मेरे रास्तेका शल्य हटा दो, मैं भूखा हूँ, पुनः पुरीमें भिक्षाके लिये जाऊँगा। तुम्हारा प्रश्न क्या है, उसे भी कहो।'

वे बोले—महामुने! हम आपकी शरणमें आये हैं। कृपया हमें ऐसा कोई उपाय बतावें, जिससे हमलोग आपके अनुग्रहसे मोक्ष प्राप्त कर लें। जिस तीर्थमें जाकर मनुष्य सब तीर्थोंका फल प्राप्त कर लेता है, उसका नाम बताइये, जिससे हम सब लोग जाकर वहीं रहें।

संवर्तने कहा—स्वामिकार्त्तिकेय तथा नव दुर्गाओंको नमस्कार करके मैं तुमलोगोंको सर्वोत्तम तीर्थका परिचय देता हूँ। उस तीर्थका नाम है—महीसागरसंगम। ये परम बुद्धिमान् नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्न जब यहाँ यज्ञ करते थे, तब इनके द्वारा यह पृथ्वी दो अंगुल ऊँची कर दी गयी थी। उस समय जैसे गीले काठके तपनेपर उससे पानी चूता है, उसी प्रकार यज्ञाग्निद्वारा तपती हुई पृथ्वीसे जलका स्रोत टपकने लगा। उस जलराशिको समस्त देवताओंने नमस्कार किया। वही मही नामक नदी है। पृथ्वीपर जो कोई भी तीर्थ हैं, उन सबके जलसे उत्पन्न साररूप मही नदीका जल माना गया है। मालवा नामक देशसे मही नदी उत्पन्न हुई है और दक्षिण समुद्रमें जाकर मिली है। उसके दोनों तट परम पुण्यमय तीर्थ हैं। वह सबके लिये कल्याणमयी है। पहले तो महानदी मही स्वयं ही सर्वतीर्थमयी है। फिर जहाँ सरिताओंके स्वामी समुद्रसे उसका संगम हुआ है, उस तीर्थके विषयमें कहना ही क्या है। काशी, कुरुक्षेत्र, गंगा, नर्मदा, सरस्वती, तापी, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, चन्द्रभागा, इरावती, कावेरी, सरयू, गण्डकी, नैमिषारण्य, गया, गोदावरी, अरुणा, वरुणा तथा अन्य जो बीस हजार छः सौ नदियाँ इस पृथ्वीपर विद्यमान हैं, उन सबके सारतत्त्वसे मही नदीका जल प्रकट हुआ बताया गया है। पृथ्वीके सब तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वही महीसागरसंगममें भी प्राप्त होता है, ऐसा कहा गया है। स्वामिकार्त्तिकेयका भी इस विषयमें ऐसा ही वचन है। यदि तुमलोग किसी एक स्थानमें सब तीर्थोंका संयोग चाहते हो तो परम पुण्यमय महीसागरसंगम तीर्थमें जाओ। मैंने भी पहले बहुत वर्षोंतक वहाँ निवास किया है। यहाँ नारदजीके भयसे आकर रहता हूँ। महीसागरसंगममें नारदजी मेरे पास ही रहते थे। इधरकी बातें उधर लगा देनेका गुण उनमें विशेषरूपसे है। इन दिनों राजा मरुत्त मुझे ढूँढ़नेका प्रयास करते हैं। नारदजी उन्हें मेरा पता अवश्य बता देंगे, यही भय था। यहाँ तो बहुत-से दिगम्बर साधुओंके बीच उन्हींके समान बनकर मैं भी रहता हूँ। मरुत्तसे अधिक भयभीत होनेके कारण मैं यहाँ गुप्तरूपसे निवास करता हूँ। मुझे सन्देह है, नारद पुनः मेरा यहाँ रहना मरुत्तको बता देंगे, क्योंकि उनकी प्रायः ऐसी चेष्टा देखी जाती है। तुमलोग कभी किसीसे यह सब न कहना। राजा मरुत्त यज्ञकी सिद्धिके लिये चेष्टा कर रहे हैं। कुछ कारणवश देवताओंके आचार्य मेरे पिताने उनको त्याग दिया है। अतः उस यज्ञका ऋत्विग् बनानेके लिये उन्होंने मुझ गुरुपुत्रको ही मनोनीत किया है; परंतु अविद्याके अन्तर्गत होनेवाले हिंसात्मक यज्ञोंसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। इसलिये राजा इन्द्रद्युम्नके साथ