भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

१२९२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करनेवाले उन पितरोंको मैं नमस्कार करता हूँ। जो मनु आदि सब मनुष्यों तथा सूर्य और चन्द्रमाके भी माननीय पितर हैं, उन सबको मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। जो नक्षत्रों, ग्रहों, वायु, अग्नि, आकाश और पृथ्वीके भी पिता हैं, उन सबको मैं हाथ जोड़कर नमस्कार करता हूँ। सातों लोकोंमें रहनेवाले सातों पितरोंको नमस्कार है, नमस्कार है। योगदृष्टिवाले स्वयम्भू ब्रह्माको नमस्कार करते हैं। यह सप्तार्चिष स्तोत्र ब्रह्मर्षिगणोंसे पूजित, परम पवित्र तथा समस्त राक्षसोंका विनाशक है। इस प्रकार इस स्तोत्रका तीन बार जप करे। जो श्रद्धालु, जितेन्द्रिय तथा एकाग्रचित्त होकर बड़ी श्रद्धाके साथ प्रतिदिन इस सप्तार्चिष स्तोत्रका जप करता है, वह सात समुद्रोंवाली पृथ्वीका एकमात्र राजा होता है। जो इस श्राद्धकल्पका नित्य पाठ करता है, वह पंक्तिपावन है, वही अठारह विद्याओंका पारंगत विद्वान् माना गया है। पितर लोग प्रसन्न होकर मनुष्योंको प्रज्ञा, पुष्टि, स्मृति, मेधा, राज्य तथा आरोग्य प्रदान करते हैं। पार्वती! इस प्रकार सरस्वती और समुद्रके संगमपर मनुष्यको विधिपूर्वक श्राद्ध करना चाहिये।


परायी वस्तुके अपहरण और प्रतिग्रहके दोष

महादेवजी कहते हैं— जो मनुष्य अमावास्याको दूसरेका अन्न खाता है, उसका महीनेभरका किया हुआ पुण्य अन्नदाताको मिल जाता है। अयनारम्भके दिन पराया अन्न भोजन करे तो छः महीनोंका और विषुवकालमें परान्न भोजन करनेपर तीन मासका पुण्य चला जाता है। यदि चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर मनुष्य भोजन करे तो बारह वर्षोंसे एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है।* संक्रान्तिके दिन दूसरेका अन्न ग्रहण करनेपर महीनेभरसे अधिक समयका पुण्य चला जाता है। आद्य श्राद्ध (एकादशाह-श्राद्ध)-में परान्न भोजन करनेपर तीन वर्षका पुण्य चला जाता है। मासिक श्राद्धमें भोजन करनेपर आठ वर्षका और छमाही श्राद्धमें भोजन करनेसे आधे वर्षका पुण्य नष्ट होता है। जो अस्थि-संचयन-श्राद्धमें दूसरेका अन्न खाता है, उसका जन्मभरका पुण्य चला जाता है। जो मरे हुए मनुष्यकी शय्याका दान लेता है, जो वेदाध्ययनको बेचता है तथा जो ब्राह्मणका धन हड़प लेता है, ऐसे लोगोंकी शुद्धि कभी नहीं होती। एक माशा सुवर्ण, एक गाय अथवा आधी अंगुल भूमि भी जो चुराता है, वह प्रलयकालतक नरकमें रहता है। ब्रह्महत्या, मदिरापान, दरिद्रके धनका अपहरण, गुरुपत्नीगमन तथा सुवर्णकी चोरी—ये पाप स्वर्गमें बैठे हुए पुरुषको भी नीचे गिरा देते हैं। चिताके काष्ठसमूहका और वेद बेचनेवाले ब्राह्मणका स्पर्श करके स्नान करना चाहिये। वेद बेचनेवाला पुरुष द्रव्यके लिये जितने वेदाक्षरोंका उपयोग करता है, उतनी बाल-हत्याओंको प्राप्त होता है। जो वेदकी शिक्षा लेकर उसके बदलेमें ब्राह्मणको दान देता है, वह पहले नरकमें जाता है। उसके बाद वह ब्राह्मण भी नरकमें गिरता है। वेदज्ञ ब्राह्मण भी यदि बलिवैश्वदेव नहीं करते तथा अग्निहोत्र आदि गृह्यकर्मसे अलग रहते हैं, उन्हें शूद्र ही जानना चाहिये। जिन ब्राह्मणोंने अध्ययन नहीं किया है, जो अग्निहोत्रसे रहित तथा अपने आचारसे हीन हैं, वे सभी


* अमावास्यां नरा ये तु परान्नमुपभुञ्जते। तेषां मासकृतं पुण्यमन्नदातुः प्रदाप्यते ॥
षण्माससमये भुङ्क्ते त्रीन्मासान् विषुवे स्मृतम्। वर्षार्द्धादशभिश्चैव यत्पुण्यं समुपाजितम् ॥
तत् सर्वं विलयं याति भुक्त्वा सूर्येन्दुसम्प्लवे।
(स्क० पु०, प्र० ख० २००। ११–१३)

* प्रभासखण्ड *१२९३
शूद्रजातिके हैं। जो क्षयाहके दिन श्रद्धापूर्वक पिताका श्राद्ध नहीं करता, वह मनुष्य द्विज होनेपर भी शूद्रके ही समान है। जो ब्राह्मण मृतक-श्राद्ध, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, गजच्छाया* और सूतकमें भोजन करता है, उसके साथ शूद्रोचित बर्ताव करे। ब्रह्मचारी, संन्यासी, शिल्पी तथा यज्ञदीक्षित पुरुषको एवं यज्ञ, विवाह तथा सत्रमें कभी सूतक नहीं लगता। शिल्पी, नट, दूत और सूदखोर ब्राह्मणोंके साथ शूद्रोचित बर्ताव करना चाहिये। जो निषिद्ध कर्मोंमें संलग्न, पाखण्डी, दुष्कर्मी और पापाचारी हो, वह ब्राह्मण शूद्रके समान माना गया है। बिना स्नान किये भोजन करनेवाला विष्ठा भोजन करता है। बिना जप किये खानेवाला पीब और रक्त खाता है। बिना हवन किये आहार करनेवाला कीड़े खाता है और देवता, अतिथि आदिको दिये बिना भोजन करनेवाला पुरुष मानो मदिरा पीता है। राजाका अन्न तेज हर लेता है। शूद्रका अन्न ब्रह्मतेजको नष्ट कर देता है। सुनारका अन्न आयु और चमारका अन्न यश ले लेता है। कारीगरका अन्न सन्तानका नाश करता है। धोबीका अन्न बलको क्षीण करता है। किसी समूह या संस्थाका अन्न तथा वेश्याका अन्न स्वर्ग आदि पुण्यलोकोंसे भ्रष्ट कर देता है। वैद्यका अन्न पीब, व्यभिचारिणी स्त्रीका अन्न वीर्य, अधिक व्याज लेनेवालेका विष्ठा और हथियार बेचनेवालेका अन्न मलके समान त्याज्य है। ब्राह्मण मांस, लाख और नमक बेचनेसे तत्काल पतित हो जाता है और दूध बेचनेसे तीन दिनमें शूद्रके समान हो जाता है। रसको रससे बदलना चाहिये,किंतु रस देकर नमक नहीं लेना चाहिये। पके अन्नको कच्चे अन्नसे बदला जा सकता है। तिलको उसीके बराबर धान्यसे बदलना चाहिये। जो ब्राह्मण तिलोंसे भोजन, उबटन और दानसे भिन्न कोई दूसरा व्यापार आदि कर्म करता है, वह कीड़ा होकर अपने पितरोंके साथ कुत्तेकी विष्ठामें डूबता है। पूआ, सुवर्ण, गौ, घोड़ा, पृथ्वी और तिलका दान लेनेवाला ब्राह्मण यदि विद्वान् न हो तो वह उसे ग्रहण करके काष्ठकी भाँति जल जाता है। दानमें लिया हुआ सुवर्ण आयुका तथा रत्न अपने शरीर, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, दौहित्र तथा कुलमें होनेवाले अन्य पुरुषोंका नाश कर देता है। पाँच योजनके भीतर भी यदि अपने गुरुका आगमन सुनायी पड़े तो उनकी उपेक्षा न करे। मनुष्य सदा सत्पात्रको ही दान दे। जो कहीं दान दिया जाता हुआ देखकर लोभवश उसे माँगने लगे तो विद्वान् पुरुष उसे दान न दे; क्योंकि लोलुपता या चपलता अच्छी नहीं होती। यदि ब्राह्मण रसका विक्रय त्याग दे तो उसे सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। मांसका त्याग करनेसे सन्तानकी आयु बढ़ती है। चीर और वल्कल धारण करनेसे वस्त्र और आभूषण प्राप्त होते हैं, सच बोलनेसे मनुष्य स्वर्गमें क्रीड़ा करता है। अहिंसाधर्मके पालनसे आरोग्य और दान देनेसे यशकी प्राप्ति होती है। ब्राह्मणकी सेवा करनेसे राज्य तथा द्विजत्व प्राप्त होते हैं। देवताओंकी सेवासे मनुष्य दिव्य रूप पाता है। अन्नदानसे सम्पूर्ण अभीष्ट भोगोंकी प्राप्ति होती है।

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* ज्योतिषका एक योग जो उस समय होता है, जब कृष्ण त्रयोदशीके दिन चन्द्रमा मघा नक्षत्रमें और सूर्य हस्त नक्षत्रमें हो—यह योग श्राद्धके लिये अच्छा माना जाता है।

१२९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


उत्तम-अधम जन्म, व्यर्थ और सफल दान, सुपात्रके लक्षण, विद्धा एकादशीके दोष तथा द्रव्याभावमें श्राद्धकी विधि

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! चार प्रकारके जन्म और सोलह प्रकारके दान व्यर्थ हैं तथा चार प्रकारके जन्म उत्तम और सोलह प्रकारके दान महादान हैं। अब इनका विवरण सुनो। (१) कुपुत्रोंका जन्म व्यर्थ है। (२) जो धर्मसे बहिष्कृत हैं, (३) जो परदेशमें जाते हैं तथा (४) जो सदा परस्त्रियोंमें आसक्त रहते हैं, उनका जन्म भी व्यर्थ है। १. जो दूसरेके यहाँ भोजन करते हैं और (२) परस्त्री-लम्पट हैं, उनको दिया हुआ दान व्यर्थ है। (३) एक बार देनेसे इन्कार करके फिर जो दान दिया जाता है, वह भी व्यर्थ है। (४) आरूढ़-पतित (संन्यासी होकर फिर गृहस्थ होनेवाले)-को दिया हुआ दान तथा (५) अन्यायोपार्जित धनका दान भी व्यर्थ है। (६) ब्रह्महत्यारे, (७) पतित, (८) चोर, (९) गुरुको प्रसन्न न रखनेवाले (१०) कृतघ्न, (११) ग्राम-पुरोहित, (१२) अधम ब्राह्मण, (१३) शूद्रा स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मण, (१४) वेदविक्रेता, (१५) जिसकी स्त्रीका किसी जार पुरुषसे सम्बन्ध हो तथा (१६) जो स्त्रीके अधीन रहता हो, ऐसे ब्राह्मणोंको दिये हुए दान असफल होते हैं। इस तरह ये सोलह प्रकारके दान व्यर्थ हैं।

अब जिनका जन्म उत्तम है, उनका परिचय सुनो। (१) जो अपने माता-पिताके उत्तम पुत्र हैं, (२) सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं, (३) परदेशमें नहीं जाते और (४) परायी स्त्रियोंसे विमुख हैं—इन चार प्रकारके मानवोंका जन्म श्रेष्ठ है। (१) गौ, (२) सुवर्ण, (३) चाँदी, (४) रत्न, (५) विद्या, (६) तिल, (७) कन्या, (८) हाथी, (९) घोड़ा, (१०) शय्या, (११) वस्त्र, (१२) भूमि, (१३) अन्न, (१४) दूध, (१५) छत्र तथा (१६) आवश्यक सामग्रियों-सहित गृह—इन सोलह प्रकारकी वस्तुओंके दानको महादान कहते हैं।

इसलिये शठता छोड़कर श्रद्धा और विधिके साथ उत्तम देशमें, उत्तम कालमें और उत्तम पात्रको न्यायोपार्जित धनका दान देना चाहिये। जो वेदाध्ययनसे सम्पन्न, योगनिष्ठ, शान्त, पुराणका ज्ञाता, पापसे डरनेवाला, स्त्रियोंके प्रति क्षमाभाव रखनेवाला, धर्मात्मा, गौओंको आश्रय देनेवाला तथा सदाचारसे युक्त हो, उसीको दानका उत्तम पात्र कहते हैं। सत्य, इन्द्रियसंयम, तप, शौच, सन्तोष, ईर्ष्याका न होना, सरलता, ज्ञान, मनःसंयम, दया और दान—ये सद्गुण ही सुपात्रके लक्षण हैं।* जो ऐसे श्रेष्ठ पात्रको समान बछड़ेवाली, चाँदीके खुर और सोनेके सींगवाली, सर्वगुणसम्पन्न एक गाय भी दान करता है, वह मेरे लोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो मानव ऐसी गायको दानमें देता है, वह उत्तम गतिको प्राप्त होता है। उसके ऊपर मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ। जो गाय क्रोध करनेवाली, दुष्ट, दुर्बल, रोगिणी तथा मूल्य न देकर लायी गयी हो, उसका दान नहीं करना चाहिये। जो अतिथियोंका प्रेमी, मनको वशमें रखनेवाला, अग्निहोत्री तथा धनके अभावसे कष्ट पानेवाला श्रोत्रिय ब्राह्मण हो, उसे दी हुई एक गाय भी अधिक गुणवाली होती है। जो ज्ञान-दुर्बल ब्राह्मण गायको बेचता है, वह गोदान लेनेका अधिकारी नहीं है, उसे ब्राह्मण नहीं मानना चाहिये। गाय, घर, शरण तथा कन्या—ये वस्तुएँ अनेक पुरुषोंको नहीं देनी चाहिये—इनमेंसे एक वस्तु एक ही व्यक्तिको देनी चाहिये।


* सत्यं दमस्तपः शौचं सन्तोषोऽनैर्ष्यमार्जवम्। ज्ञानं शमो दया दानमेतत्पात्रस्य लक्षणम्॥
(स्क० पु०, प्र० ख० २०२। १८। १९)

* प्रभासखण्ड * । १२९५

यदि एकादशी दशमीसे विद्ध हो और द्वादशीका क्षय हो गया हो, तो उस दिन नक्त-व्रत करे। उस दिन उपवासका विधान नहीं है। जो एकादशीमें उपवास करके त्रयोदशीको पारण करता है, उसकी बारह द्वादशियोंका फल नष्ट हो जाता है। उपवास और श्राद्धके दिन काष्ठसे दन्तधावन न करे। दर्श, पौर्णमास तथा पिताका वार्षिक श्राद्ध पूर्वविद्धा तिथिमें ही करना चाहिये; जो ऐसा नहीं करता, वह नरकमें पड़ता है। उसकी सन्तानकी हानि बतायी गयी है और वह दुर्भाग्यको प्राप्त होता है।*

द्रव्यके अभावमें एक ही ब्राह्मणके द्वारा छः पिण्डवाला श्राद्ध करे। उसमें पिता आदिके लिये छः अर्घ्य स्थापित करके उन्हें विधिपूर्वक निवेदन करे। ब्राह्मणके हाथमें जो अन्न जाता है, उसे पिता भोजन करते हैं, मुखमें पितामह खाते हैं, तालुभागमें स्थित होकर प्रपितामह उस अन्नको ग्रहण करते हैं। ब्राह्मणके कण्ठमें मातामह, हृदयमें प्रमातामह और नाभिमें वृद्ध प्रमातामह स्थित होकर अन्न ग्रहण करते हैं। ब्राह्मण न मिले तो कुशका ब्राह्मण बनाकर रखे (और उसके सन्निधानमें श्राद्ध-कार्य पूर्ण करे) यह सभी पुराणोंसे उनका सार निकालकर कहा गया है। जो नास्तिक चुगलखोर और वेदोंका निन्दक हो, उसे इसका उपदेश नहीं देना चाहिये।


मार्कण्डेयेश्वर आदि विविध लिंगोंकी महिमा

महादेवजी कहते हैं—पार्वती ! तदनन्तर महर्षि मार्कण्डेयजीके द्वारा स्थापित परम उत्तम मार्कण्डेयेश्वरके समीप जाय। उनका स्थान सावित्रीसे पूर्व दिशामें थोड़ी ही दूरपर है। पूर्वकालमें महर्षि मार्कण्डेय एक विख्यात महात्मा हुए हैं। पद्मयोनि ब्रह्माजीके प्रसादसे उन्हें अजरता और अमरता प्राप्त हो चुकी है। वे प्रभासक्षेत्रमें गये और वहाँ शिवजीकी स्थापना तथा पूजा करके दक्षिण ओर स्थित हो पद्मासन लगाकर ध्यानमग्न हो गये। ध्यानमें ही उनके दस हजार अरब युग बीत गये; परंतु मुनीश्वर मार्कण्डेय नहीं जगे। इस दीर्घकालमें हवासे उड़ी हुई धूलके द्वारा धीरे-धीरे वहाँके मन्दिर, शिवलिंग और स्थान आदिका लोप हो गया। तत्पश्चात् किसी समय मुनि जब समाधिसे जगे, तब उन्होंने सारा शिवमन्दिर धूलसे आच्छादित देखा। फिर वे मिट्टी खोदकर वहाँसे बाहर निकले और वहाँ शिवकी पूजाके लिये एक बहुत बड़ा द्वार बनवाया। जो मनुष्य उसमें प्रवेश करके वहाँ भगवान् शिवका पूजन करता है, वह मेरे परम धामको प्राप्त होता है।

मार्कण्डेयेश्वरसे उत्तर दिशामें पाँच धनुषकी दूरीपर पुलस्त्येश्वरका स्थान है। उनका दर्शन और पूजन करके मनुष्य अपने सात जन्मोंका पाप नष्ट कर डालता है।

वहाँसे नैर्ऋत्यकोणमें आठ धनुषके अन्तरपर ऋत्वीश्वर शिव हैं, उनका भक्तिभावसे पूजन करना चाहिये। वे बड़े-बड़े यज्ञोंके फल देनेवाले हैं। उनका दर्शन करके मानव पुण्डरीक-यज्ञका फल पाता है। उसे सात जन्मोंतक दरिद्रता और दुःखकी प्राप्ति नहीं होती।

ऋत्वीश्वरसे पूर्व दिशामें सोलह धनुष दूर कश्यपेश्वर लिंग है, जो महापातकोंका नाश


* दर्शञ्च पौर्णमासञ्च पितुः सांवत्सरं दिनम्। पूर्वविद्धमकुर्वाणो नरकं प्रतिपद्यते ॥
हानिश्च संततेः प्रोक्ता दौर्भाग्यं हि समाप्नुयात् ॥
(स्क० पु०, प्र० ख० २०३। ४२-४३)

१२९६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करनेवाला है। कश्यपेश्वरका दर्शन करके मनुष्य धनवान् और पुत्रवान् होता है तथा सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है।

कश्यपेश्वरसे ईशानकोणमें आठ धनुष दूर कौशिकेश्वर शिव हैं, जो बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाले हैं। उनका दर्शन-पूजन करके मानव मनोवांछित फल पाता है।

मार्कण्डेयेश्वरसे बीस धनुष दक्षिण ओर कुमार कार्तिकेयद्वारा स्थापित लिंग है। उसके आगे एक कूप है। उसमें स्नान करके जो कुमारेश्वर शिवका पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त होकर स्वामी कार्तिकेयजीके लोकमें जाता है।

मार्कण्डेयेश्वरसे उत्तर दिशामें पंद्रह धनुष दूर गौतमेश्वर नामक उत्तम लिंग है। उस लिंगकी विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य पाँच पातकोंसे छूट जाता है।

वहाँसे पश्चिम भागमें सोलह धनुषपर देवराजेश्वर लिंग है, जिसकी स्थापना देवराज इन्द्रने की है। जो मनुष्य उनकी पूजा करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। वहींपर मनुजीके द्वारा स्थापित मानवेश्वर लिंग है। जो उसकी पूजा करता है, वह पातकोंसे मुक्त होता है। सब लोक शिवममय हैं और सब कुछ शिवमें ही प्रतिष्ठित है। इसलिये जो अपना कल्याण चाहे वह भगवान् शिवके ही नामोंका जप करे। ब्रह्मा आदि सब देवता, राजा, महर्षि, मनुष्य और मुनि—ये सभी लोग शिवलिंगका पूजन करते हैं। शिवलिंगकी स्थापना करनेवाला मानव ब्रह्महत्या, बालहत्या तथा अन्य पातकोंका शिवजीके तेजसे नाश करता है।

वहाँसे दक्षिण दिशामें वृषध्वजेश्वर नामक शिव हैं। वे ही अव्यक्त अविनाशी अक्षर ब्रह्म हैं, जिससे परे कुछ भी नहीं है। उनका न आदि है, न अन्त है। वे योगिगम्य हैं। सर्वाश्चर्यमय हैं। बुद्धिसे ग्रहण करनेयोग्य तथा निरामय हैं। उनके सब ओर हाथ, पैर, नेत्र, सिर और मुख हैं। उन्हींको मृड और स्थाणु आदि नामोंसे पुकारते हैं। राजा मरुत्त, पृथु, भरत, शशविन्दु, गय, शिबि, राम, अम्बरीष, मान्धाता, दिलीप, भगीरथ, सुहोत्र, रन्तिदेव, ययाति और सगर—ये भाग्यशाली राजा प्रभासक्षेत्रमें आये और वृषध्वजेश्वरकी यज्ञोंद्वारा आराधना करके स्वर्गलोकमें चले गये। देवि! मैं सच कहता हूँ, हितकी बात कहता हूँ और बार-बार इसको दुहराता हूँ—इस विनाशशील असार संसारमें केवल शिवकी आराधना ही सार है। जिसने भगवान् शिवका दर्शन किया है, वह धन्य है।


गौतम और प्रेतका संवाद, प्रेतोंका उद्धार तथा प्रेततीर्थकी उत्पत्ति

महादेवजी कहते हैं—पूर्वकालकी बात है, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि गौतम भृगुकच्छसे प्रभासक्षेत्रमें आये। वे परम पवित्र उत्तरायणमें श्रीसोमनाथजीका दर्शन करनेकी इच्छासे वहाँ पधारे थे। सोमेश्वरका दर्शन तथा सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करके गौतमजी प्रभासमें ही तीर्थभ्रमण करने लगे। घूमते-घूमते गात्रच्छेद तीर्थमें गये। उसकी सीमापर पहुँचते ही उन्हें वैष्णव वन दिखायी दिया, जो भगवान् विष्णुको बहुत ही प्रिय है। उस वनमें सौ धनुषतक फैला हुआ पुरुषोत्तम क्षेत्र है। वहाँ सीमापर पहुँचकर उन्होंने महाभयंकर विशालकाय पाँच प्रेतोंको देखा, जो बड़े-बड़े वृक्षोंपर बैठे हुए थे। उनके केश ऊपरकी ओर उठे हुए थे। उन प्रेतोंको देखकर वे भयसे थर्रा उठे। फिर भी धैर्य धारण करके देरतक कुछ सोच-विचारकर उन्होंने पूछा—'अहो! यह विकराल देह धारण करनेवाले तुमलोग कौन हो?'

  • प्रभासखण्ड * १२९७

प्रेतोंने कहा—महामना! हमलोग प्रेत हैं और इस तीर्थको श्रेष्ठ एवं पुण्यमय सुनकर बहुत दूरसे यहाँ आये हैं; परंतु हमें इसके भीतर प्रवेशकी आज्ञा नहीं मिलती। कुछ अदृश्य दूतोंने हमें मार-मारकर जर्जर कर दिया है। हममेंसे एक यह लेखक है, दूसरा रोहक है, तीसरा शीघ्रग है, चौथा सूचक है और पाँचवाँ मैं सबसे बड़ा पापी हूँ। मेरा नाम पर्युषित है।

गौतमने पूछा—तुमलोग तो प्रेतयोनिमें पड़े हुए हो? फिर तुम्हारे ये लेखक आदि नाम कैसे हुए?

प्रेत बोले—इसके पास जब कोई ब्राह्मण याचना करने आता, तब यह पृथ्वीपर कुछ लिखने लगता था। उसे 'हाँ' या 'ना' कुछ भी उत्तर नहीं देता था। इसीलिये यह लेखक नामसे सूचित हुआ है। हमारा यह दूसरा साथी किसी याचक ब्राह्मणको देखते ही भयसे महलकी छतपर चढ़ जाता था, इसीलिये इसका नाम 'रोहक' (चढ़नेवाला) हुआ। इस तीसरे पापीने राजासे बहुतेरे ब्राह्मणोंके विषयमें यह सूचना दी (चुगली खायी) कि ये तो बड़े धनाढ्य हैं। अतः इसकी सूचक नामसे ही प्रसिद्धि हुई। ये चौथे महाशय ब्राह्मणोंद्वारा याचना करनेपर प्रतिदिन भागकर शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ जाते थे, किसीको कुछ भी नहीं देते थे। अतः इन्हें 'शीघ्रग' कहा गया है। मैं ब्राह्मणोंको सदा पर्युषित (बासी) कदन्न देता था और स्वयं मिष्ठान्नोंसे ही पेट भरता था, इसलिये मैं 'पर्युषित' नामसे भूतलपर प्रसिद्ध हुआ।

गौतमने पूछा—संसारमें कोई भी प्राणी बिना भोजनके नहीं रहते; अतः बताओ, तुमलोग क्या आहार करते हो?

प्रेतोंने कहा—द्विजश्रेष्ठ! जहाँ भोजनके समय आपसमें कलह होने लगता है, वहाँ उस अन्नके रसको हम ही खाते हैं। जहाँ मनुष्य बिना लिपी-पुती धरतीपर खाते हैं, जहाँ ब्राह्मण शौचाचारसे भ्रष्ट होते हैं, वहाँ हमको भोजन मिलता है। जो पैर धोये बिना खाता है, जो दक्षिणकी ओर मुँह करके भोजन करता है अथवा जो सिरमें वस्त्र लपेटकर भोजन करता है, उसके उस अन्नको सदा प्रेत ही खाते हैं।* जहाँ रजस्वला स्त्री, चाण्डाल और सूअर श्राद्धके अन्नपर दृष्टि डाल देते हैं, वह अन्न हम प्रेतोंका ही भोजन होता है। जिस घरमें सदा जूठन पड़ा रहे, निरन्तर कलह होता रहे और बलिवैश्वदेव न किया जाता हो, वहाँ हम प्रेतलोग भोजन करते हैं।

ब्राह्मणने पूछा—कैसे घरोंमें तुम्हारा प्रवेश नहीं होता? यह बात मुझे सत्य-सत्य बताओ।

प्रेत बोले—ब्रह्मन्! जिस घरमें बलिवैश्वदेव होनेसे धुएँकी बत्ती उठती दिखायी देती है, उसमें हमारा प्रवेश नहीं होता। जिस घरमें सबेरे चौका लग जाता है तथा वेदमन्त्रोंकी ध्वनि होती रहती है, वहाँकी किसी वस्तुपर हमारा अधिकार नहीं होता।

गौतमने पूछा—किस कर्मके परिणामसे मनुष्य प्रेत भावको प्राप्त होता है?

प्रेत बोले—जो धरोहर हड़प लेते हैं, झूठे मुँह यात्रा करते हैं तथा गौओं और ब्राह्मणोंकी हत्या करनेवाले हैं, वे प्रेतयोनिको प्राप्त होते हैं। जो दूसरोंकी चुगली खानेमें लगे रहते हैं, झूठी गवाही देते और न्यायके पक्षमें नहीं रहते, वे मरनेपर प्रेत होते हैं। जो सूर्यकी ओर मुँह करके थूक, खँखार और मल-मूत्र त्याग करते हैं, वे प्रेतशरीर प्राप्त करके दीर्घकालतक उसीमें स्थित रहते हैं। गौओं, ब्राह्मणों तथा रोगियोंको जब कुछ दिया जाता हो, उस समय जो न देनेकी सलाह देते हैं, वे भी प्रेत ही होते हैं। यदि शूद्रका अन्न पेटमें रहते हुए ब्राह्मणकी मृत्यु हो जाय तो वह अत्यन्त भयंकर प्रेत होता है। विप्रवर! जो अमावास्या तिथिमें मदोन्मत्त होकर हलमें तीन बैलोंको जोतता है, वह मनुष्य प्रेत होता है। जो


* अप्रक्षालितपादस्तु यो भुङ्क्ते दक्षिणामुखः। यो वेष्टितशिरा भुङ्क्ते प्रेता भुञ्जन्ति नित्यशः ॥ (स्क० पु०, प्र० ख० २१६ । ४१)

१२९८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


विश्वासघाती, ब्रह्महत्यारा, स्त्री-वध करनेवाला, गोघाती, गुरुघाती और पितृहत्या करनेवाला है, वह मनुष्य भी प्रेत होता है। मरनेपर जिसके लिये सोलह एकोद्दिष्ट नहीं किये गये हैं, उसको भी प्रेतयोनिकी प्राप्ति होती है।

गौतमने पूछा—किस कर्मके परिणामसे मनुष्य प्रेतयोनिमें नहीं पड़ता, वह सब मुझसे कहो।

प्रेतोंने कहा—जो तीर्थयात्रामें तत्पर, देवपूजा-परायण तथा सदा ब्राह्मण-भक्त रहता है, वह प्रेत नहीं होता। जो प्रतिदिन शास्त्र सुनता, नित्य पण्डितोंकी सेवा करता और वृद्ध पुरुषोंसे अपना सन्देह पूछता है, वह प्रेत नहीं होता। जो पवित्र गयातीर्थमें जाकर श्राद्ध करता है, उसके वंशमें कोई प्रेत नहीं होता। इसीलिये हम बड़ी दूरसे यहाँ शीघ्रतापूर्वक आये हैं, परंतु इस पुण्यक्षेत्रमें प्रवेश नहीं कर पाते। इस प्रेतशरीरसे हमारा मन खिन्न हो गया है। अतः महाभाग! आप ही प्रयत्नपूर्वक हमलोगोंके आश्रय होइये।

गौतमने पूछा—तुम्हारा उद्धार किस प्रकार होगा?

प्रेत बोले—प्रभो! आप वैष्णव-क्षेत्रमें जाकर हमारे नाम और गोत्रका उच्चारण करके श्राद्ध कीजिये। इससे हमारी मुक्ति हो जायगी।

यह सुनकर दयार्द्र गौतमने वैष्णव-क्षेत्रमें जाकर उन सबोंके लिये पृथक्-पृथक् श्राद्ध किया। वे जिस-जिसका श्राद्ध करते थे, वह-वह रात्रिको स्वप्नमें आकर दर्शन देता और कहता—'विप्रवर! आपके प्रसादसे मैं प्रेतयोनिसे मुक्त हो गया। आपका कल्याण हो, अब मैं जाता हूँ। मेरे लिये विमान उपस्थित हुआ है।' यों कहकर प्रत्येक प्रेत चल देता था। इस प्रकार उन्होंने चार प्रेतोंका तो उद्धार कर दिया। पाँचवें दिन उन्होंने पर्युषितके लिये विधिपूर्वक श्राद्ध किया। तदनन्तर रातको स्वप्नमें उन्हें पर्युषित दिखायी दिया, जो लंबी-लंबी साँसें खींचता हुआ दीनतापूर्ण वाणीमें बोल रहा था—'विप्रवर! मुझ भाग्यहीन पापीका उद्धार नहीं हुआ। मेरे द्वारा यही सबसे बड़ा पाप हुआ कि मैंने धन बढ़ाया।'

गौतमने पूछा—प्रेत! तुम्हारा उद्धार अब किस प्रकार होगा? अब शीघ्र बताओ।

पर्युषित बोला—ब्रह्मन्! आप मेरा पुनः श्राद्ध कीजिये।

उसके यों कहनेपर गौतमने उसके लिये उत्तरायणमें पुनः श्राद्ध किया। तदनन्तर रातको स्वप्नमें उसने आकर दर्शन दिया और कहा—'विप्रवर! मैं आपके प्रसादसे प्रेत-योनिसे छूट गया। आपका कल्याण हो, मैं जाता हूँ। मुझे देवत्व प्राप्त हुआ है, अतः मुझमें वर देनेकी शक्ति आ गयी है; इसलिये मुझसे कोई शुभ वर ग्रहण कीजिये। क्योंकि ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा व्रतभंग करनेवाले पुरुषोंके लिये साधु पुरुषोंने प्रायश्चित्त बताया है; किंतु कृतघ्नके लिये कोई भी प्रायश्चित्त नहीं बतलाया गया है।'

गौतमने कहा—यदि तुम मुझे वर देनेमें समर्थ हो तो जिस स्थानमें मैंने तुम सब प्रेतोंको देखा है, वहाँ मैं आश्रम बनाकर तपस्या करूँगा। वहाँ जो मनुष्य भक्तिपूर्वक स्नान और देवताओंका तर्पण करके पितरोंके उद्देश्यसे विधिवत् श्राद्ध करे, वह आपके प्रसादसे कभी प्रेत-योनिमें न आये। उसके वंशमें भी कभी कोई प्रेत न हो।

पर्युषित बोला—विप्रवर! तुम वहाँ जाकर आश्रम बनाओ। इससे तुम्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त होगी। जो मानव श्रद्धा-भक्तिसे यहाँ श्राद्ध करेंगे, वे पितरोंसहित विमानमें बैठकर स्वर्गको जायँगे। उनमेंसे कोई प्रेत नहीं होगा। स्थिरबुद्धिवाले विद्वानोंने मैत्रीको सात पदवाली बताया है। तुम्हारा यह पवित्र आश्रम सब पापोंका नाशक और समस्त दुःखोंका निवारक होगा। यह स्थान मेरे नामपर प्रेततीर्थ कहलाये।

'एवमस्तु' कहकर गौतमजी चले गये। तदनन्तर वेदोक्त मार्गसे उन्होंने सब कार्य सम्पन्न किया।

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  • प्रभासखण्ड * १२१९

नरकेश्वरका माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! इन्द्रेश्वरसे उत्तर दिशामें समस्त पापोंका नाश करनेवाले नरकेश्वरदेव विराजमान हैं। प्राचीन कालकी बात है, भूतलमें विख्यात मथुरा नामकी नगरीमें देवशर्मा नामक एक विद्वान् ब्राह्मण रहता था, जो अगस्त्यगोत्रमें उत्पन्न तथा दरिद्रतासे पीड़ित था। उस नगरमें उसी रूप और अवस्थासे युक्त एक दूसरा भी वेदज्ञ ब्राह्मण था, जो उसी गोत्रमें उत्पन्न हुआ था। नाम भी उसका वही था। किसी समय यमराजने अपने दूतसे कहा—'तुम मथुरापुरीको जाओ और देवशर्माको ले आओ।' दूत गया और नामकी समानतासे उस दारिद्र्य-पीड़ित देवशर्माको ले आया। उसे देखकर यमराजने कहा—'विप्रवर! आप शीघ्र लौट जाइये। दूत नामकी समानतासे तुम्हें ले आया है।' ब्राह्मण बोले—'भगवन्! मैं घर नहीं लौटूँगा। जीवनभरकी दरिद्रतासे वहाँ भी मैं तंग आ गया था। अब जो शेष आयु है, उसे यहाँ आपके समीप ही बिता दूँगा।'

यमराज बोले—ब्रह्मन्! यहाँ कोई असमयमें नहीं आता और समय पूरा होनेपर कोई पृथ्वीपर क्षणभर भी जीवित नहीं रहता। पृथ्वीपर न कोई मेरा मित्र है न शत्रु। यदि उसका समय पूरा नहीं हुआ है तो सैकड़ों बाणोंसे घायल होनेपर भी मनुष्यकी मृत्यु नहीं होती और आयु पूर्ण हो जानेपर कुशाग्रसे बिंधनेपर भी वह जीवित नहीं रहता। अतः द्विजश्रेष्ठ! जबतक तुम्हारा शरीर जला न दिया जाय, तबतक लौट जाओ।

ब्राह्मणने कहा—देव! साधु पुरुषोंका, विशेषतः आपका दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता। अतः मैं पूछता हूँ कि ये जो अत्यन्त भयंकर नरक दिखायी देते हैं, इनमें किस कर्मसे मनुष्यको जाना पड़ता है? इन नरकोंकी कितनी संख्याएँ हैं?

यमराजने कहा—विप्रवर! मेरे लोकमें बहुत-से नरक हैं। इनमेंसे कुछ प्रधान हैं और कुछ उन्हींकी शाखाएँ हैं। जिनको तुम मेरे सेवकोंद्वारा यन्त्रमें पीड़ित देख रहे हो, ये पापी और कृतघ्न हैं। इन्होंने आसक्त होकर परायी स्त्रियोंपर कुदृष्टि डाली है और जिन्हें तुम कुम्भीपाकमें डाला हुआ देखते हो, ये सब झूठी गवाही देनेवाले और घूसखोर हैं। ये जो लोहेके तपाये हुए खम्भोंका आलिंगन कर रहे हैं, इन दुरात्माओंने परायी स्त्रियोंके साथ रमण किया है। जो दुष्ट गोघाती तथा देवताओं और ब्राह्मणोंके निन्दक रहे हैं, वे ही ये कुठारसे काटे जाते हैं। जिन्हें सियार, भेड़िये और लोहमुख जन्तु खा रहे हैं तथा ये जो भूखसे पीड़ित होकर अपना ही मांस खाते हैं, इन्होंने कभी अन्न-दान नहीं किया है। जो लोग सदा गौओं और ब्राह्मणोंके विनाशके लिये यत्नशील रहे हैं, वे ही ये रक्त, पीब और चर्बी भक्षण कर रहे हैं। इसी प्रकार विविध पापोंका फल भोग करानेके लिये भिन्न-भिन्न नरक हैं। जो प्रभासक्षेत्रमें जाकर नरकेश्वर शिवका दर्शन करता है, उसे कभी नरक नहीं देखना पड़ता। नरकेश्वरकी स्थापना स्वयं मैंने ही की है।

यह सुनकर वह ब्राह्मण अपने घरको लौट गया और धर्मराजके वचनका स्मरण करके प्रभासक्षेत्रमें जा जीवनभर नरकेश्वरकी आराधनामें संलग्न हो उत्तम सिद्धिको प्राप्त हुआ। इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके भक्तिपूर्वक नरकेश्वरका दर्शन करना चाहिये। अतिपातकोंसे युक्त मनुष्य भी उनके दर्शनसे नरकमें नहीं पड़ता। आश्विनकृष्णा चतुर्दशीको जो वहाँ विधिपूर्वक श्राद्ध करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है।

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१३०० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

संवर्तेश्वर, बलभद्रेश्वर, दशाश्वमेधिक तीर्थ, शतमेधादि लिंग तथा दुर्वासादित्यका माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! इन्द्रेश्वरसे पश्चिम और अर्कस्थलसे पूर्व संवर्तेश्वर लिंग है। पुष्करिणीके जलमें स्नान करके उनका दर्शन करनेसे मनुष्य दस अश्वमेध यज्ञोंका फल पाता है। उसके पूर्वभागमें और पापमोचन तीर्थसे नैर्ऋत्यकोणमें मेघेश्वर नामसे विख्यात शिवलिंग है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। अनावृष्टिका भय होनेपर वहीं वारुणी शान्ति करानी चाहिये तथा वहाँकी पृथ्वीको जलमें डुबाये। जहाँ प्रतिदिन मेघोंद्वारा स्थापित मेघेश्वर लिंगका पूजन होता है, वहाँ अनावृष्टिका भय नहीं होता।

गात्रोत्सर्ग तीर्थसे उत्तर बलभद्रजीके द्वारा स्थापित महापापहारी शिवलिंग है। जो मानव तृतीया और रेवती नक्षत्रके योगमें भक्तिभावसे चन्दन, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा बलभद्रेश्वर लिंगका पूजन करता है, वह योगीश्वरका पद पाता है।

प्राचीन कालमें राजा भरतने पुण्यमय प्रभासक्षेत्रमें आकर परम उत्तम दस अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। उसमें सोमपान करके सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्र पूर्ण तृप्त हुए थे। अन्न और पानसे दीनजन तथा दक्षिणासे ब्राह्मणलोग तृप्त हुए थे। तदनन्तर सब देवता प्रसन्न होकर राजा भरतसे बोले—'महाबाहो! तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।'

राजा बोले—जो मनुष्य यहाँ आकर भक्ति-पूर्वक स्नान करे, उसे दस अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त हो।

देवताओंने कहा—राजन्! भूतपर यह स्थान दशाश्वमेधिक नामसे विख्यात होगा।

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! तबसे सब पापोंका नाश करनेवाला वह तीर्थ पृथ्वीपर दशाश्वमेधिक नामसे विख्यात हुआ। ऐन्द्रवारुण स्थानसे लेकर गोमुखतक और गोमुखसे आश्वमेधिक तीर्थतक विद्वानोंने शिवक्षेत्र बताया है। वहाँ मृत्युको प्राप्त होनेपर मनुष्य शिवलोकमें आनन्दित होता है।

वहीं शतमेध, सहस्रमेध और कोटिमेध नामके क्रमशः तीन लिंग हैं। दक्षिण दिशामें शतमेध लिंग है, जो सौ यज्ञोंका फल देनेवाला है। प्राचीन कालमें कार्तवीर्यने वहीं शिवलिंगकी स्थापना करके सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। मध्यमें जो कोटिमेध लिंग है, वहाँ साक्षात् ब्रह्माजीने ही महालिंगकी स्थापना करके एक करोड़ यज्ञ किये थे। उसके उत्तर भागमें सहस्रमेध लिंग है, जिसकी स्थापना करके देवराज इन्द्रने सहस्र यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। जो पंचामृत रस, जल, गन्ध और पुष्प आदिद्वारा विधिसे उस लिंगत्रयकी पूजा करता है, वह उन तीनों शिवलिंगोंके नामवाले यज्ञोंका फल पाता है।

वहीं दुर्वासादित्यका स्थान है, जहाँ मुनिवर दुर्वासाने हजार वर्षोंतक तप किया और निराहार रहकर सूर्यनारायणकी आराधना की थी। तब भगवान् सूर्यने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'सुव्रत! वर माँगो।' दुर्वासाजी बोले—'भगवन्! यहाँ मेरे द्वारा आपकी जो सुन्दर प्रतिमा स्थापित की गयी है, उसमें आप तबतक निवास करें, जबतक यह पृथ्वी स्थिर है। आपकी पुत्री यमुनाजी भी यहाँ रहें और आपके महाबली पुत्र धर्मराजजी भी यहाँ निवास करें।'

सूर्यदेवने कहा—महामुने! तुमने जो कुछ माँगा है, वह तो होगा ही; उसके सिवा गंगा आदि कोटि तीर्थोंका और भी यहाँ निवास होगा। देवताओंसहित मैं सदा यहाँ स्थित रहूँगा। दुर्वासादित्यका दर्शन करनेसे यहाँ सब प्राणी कोटि यज्ञोंका फल पायेंगे।

यों कहकर भगवान् सूर्यने अपनी कन्या और पुत्रका स्मरण किया। यमुनाजी पाताल फोड़कर

* प्रभासखण्ड * १३०१

वहाँ प्रकट हुईं तथा कालदण्डधारी यमराज भी भगवान् सूर्यके निकट उपस्थित हुए।

सूर्यदेव बोले—धर्म! तुम और यमुना कोटि तीर्थोंके साथ यहाँ निवास करो। तुम्हें यहाँ रहकर पापी प्राणियोंकी भी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये।

यों कहकर श्रीसूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। दुर्वासाजीने अपने आश्रमकी ओर दृष्टिपात किया तो देखा, वहाँ पातालसे यमुना प्रकट हो गयीं और उस क्षेत्रमें साक्षात् यमराज भी स्वरूप धारण करके दृष्टिगोचर हुए। आदित्यसे दक्षिण और दुन्दुभिसे पूर्वभागमें यमुनाकुण्ड है। दुन्दुभि वहाँके क्षेत्रपाल हैं, जिनका शब्द दुन्दुभि-ध्वनिके समान होता है। वैशाखमासमें उस कुण्डमें स्नान करके मनुष्य भक्तिभावसे दुर्वासादित्यकी पूजा करे। जो उस महाकुण्डमें स्नान करके पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितर दस वर्षतक तृप्त रहते हैं। वहाँ पिण्ड देनेसे पितरोंकी एक सौ आठ पीढ़ियाँ पुष्ट होती हैं, साथ ही नरकमें गिरे हुए पितरोंका तत्काल उद्धार हो जाता है। माघमासके शुक्लपक्षमें सप्तमी तिथिको जो मानव अपने मनको संयममें रखते हुए दुर्वासादित्यकी पूजा करता है, वह ब्रह्महत्यासे छूट जाता है। जो वहाँ दुर्वासादित्यके समीप सहस्र नामोंका पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। दुर्वासादित्यका दर्शन सब बालकोंपर लगे हुए ग्रहों और राक्षसोंका निवारण तथा महान् पापपुंजोंका शमन करनेवाला है। जो वहाँ क्षेत्रपाल दुन्दुभिका पूजन करता है, वह पशु-सम्पत्ति, पुत्र, बुद्धि तथा लक्ष्मीसे सम्पन्न होता है। सूर्यदेवका वह क्षेत्र एक कोसतक फैला हुआ है। जो सूर्यदेवके प्रति भक्तिभावसे रहित है, उसे उस क्षेत्रमें नहीं प्रवेश करना चाहिये।

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नागरादित्य, पिंगा नदी, संगमेश्वर तथा गंगेश्वरकी महिमा

महादेवजी कहते हैं—समस्त यादवोंका संहार हो जानेपर केवल वज्र शेष रह गये थे। वे अपनी आयुके शेष भागमें अपने पुत्र महद्वलक यादवोंके राज्यपर अभिषिक्त करके प्रभासक्षेत्रमें आये। यहाँ उन्होंने एक शिवलिंग स्थापित किया, जो व्रजेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ। राजा वज्रने नारदजीके उपदेशसे दीर्घकालतक पापनाशक प्रभासक्षेत्रमें तपस्या की और परम सिद्धिको प्राप्त किया। जो मनुष्य जाम्बवतीके जलमें स्नान करके व्रजेश्वरकी पूजा करता और वहाँ यादवस्थलके समीप ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह सहस्र गोदानोंका फल पाता है।

हिरण्याके समीप नागरादित्यका स्थान है। नागरादित्य सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। द्वारकामें निघ्नके पुत्र सत्राजित् हो गये हैं। उन्होंने यहाँ भगवान् सूर्यकी आराधना की और भगवान्ने संतुष्ट होकर उन्हें स्यमन्तकमणि प्रदान की, जो प्रतिदिन आठ भार सोना देती थी। उसे देकर भगवान् भानुने पुनः सत्राजित्को वर माँगनेके लिये प्रेरित किया। तब सत्राजित्ने कहा—'प्रभो! आप इस पुण्य आश्रममें सदा निवास करें।' 'एवमस्तु' कहकर सूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। सत्राजित्ने वहाँ सूर्यदेवकी दिव्य प्रतिमा स्थापित की और प्रभास नगरके ब्राह्मणोंको वृत्ति देकर उन्हें सेवा-पूजाका भार समर्पित किया। अतः नागर ब्राह्मणोंके नामपर ही उसका नाम नागरादित्य हुआ। जो हिरण्या नदीके जलमें स्नान करके नागरादित्यका पूजन करता है, वह सूर्यलोकमें पूजित होता है। जब शुक्लपक्षकी सप्तमीको सूर्यकी संक्रान्ति हो, तब उसे महाजया सप्तमी कहते हैं। उसमें किये हुए स्नान, दान, जप, होम तथा देवताओं और पितरोंका पूजन—ये सभी कोटिगुना फल देनेवाले होते हैं। जो उस समय नागरादित्यके समीप एक ब्राह्मणको भोजन

१३०२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कराता है, उसे एक करोड़ ब्राह्मण-भोजन करानेका फल होता है। विकर्तन, विवस्वान्, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाशक, श्रीमान्, लोकचक्षु, ग्रहेश्वर, लोकसाक्षी, त्रिलोकेश, कर्ता, हर्ता, तमिस्रहा (अन्धकार-नाशक), तपन, तापन, शुचि, सप्ताश्ववाहन, गभस्तिहस्त (किरणरूप हाथवाले), ब्रह्मा तथा सर्वदेवनमस्कृत—यह इक्कीस नामोंवाला नागरादित्यका स्तोत्र है। इसे स्तवराज कहते हैं। यह शरीरको आरोग्य तथा पुष्टि प्रदान करनेवाला है। महादेवि! जो दोनों सन्ध्याओंके समय इस स्तोत्रसे नागरादित्यकी स्तुति करता है, वह मनोवांछित फल पाता है।

ऋषितीर्थसे पश्चिम पातकोंका नाश करनेवाली पिंगा नदी है, जो समुद्रमें मिली है। उसके जलका स्पर्श करनेसे मनुष्य रूपवान् होता है। एक समय दक्षिण भारतके रहनेवाले कुछ महर्षि सोमनाथजीका दर्शन करनेकी इच्छासे प्रभासक्षेत्रमें आये और एक नदीके किनारे ठहर गये। वे काले रंगके और कुरूप थे, किंतु वहाँ स्नान आदि करनेसे कामदेवके समान रूपवान् हो गये। तब उन सबने आश्चर्यचकित होकर कहा—'इसमें स्नान करके हम सब लोग पिंगल (गौरवर्ण) को प्राप्त हुए हैं, इसलिये आजसे इसका नाम पिंगा होगा। जो लोग भक्तिपूर्वक इसमें स्नान करेंगे, उनके वंशमें कोई कुरूप न होगा। पिंगाके दर्शनसे मनुष्यको पितृमेध यज्ञका फल प्राप्त होगा। यहाँ स्नान करनेसे दूना और तर्पणसे चौगुना पुण्य होगा। जो यहाँ श्राद्ध करेगा, उसे असंख्य फलकी प्राप्ति होगी।'

पूर्वकालमें उद्दालक नामके एक महातपस्वी महर्षि प्रभासक्षेत्रमें रहते थे। उन्होंने सरस्वती-पिंगा-संगमके समीपकी भूमिपर बड़ी भारी तपस्या की। उनकी भक्तिके प्रभावसे उनके आगे ही एक शिवलिंग प्रकट हुआ और आकाशवाणी हुई—'महाबाहु उद्दालक! मेरी बात सुनो, आजसे इस शिवलिंगमें मेरा नित्य निवास होगा। यह संगमपर प्रकट हुआ है, इसलिये इसका नाम संगमेश्वर होगा। इस लोकप्रसिद्ध संगममें स्नान करके जो मनुष्य संगमेश्वरका दर्शन करेगा, वह उत्तम गतिको प्राप्त होगा।'

इस आकाशवाणीको सुनकर महर्षि उद्दालक दिन-रात आलस्य छोड़कर संगमेश्वरकी आराधना करने लगे। तदनन्तर देहत्यागके पश्चात् वे मेरे महेश्वरधामको चले गये।

संगमेश्वरसे पश्चिम त्रिभुवनविख्यात गंगेश्वर लिंग है। भगवान् श्रीकृष्णने परम धाम पधारते समय स्नान करनेके लिये वहाँ गंगाजीका आवाहन किया। गंगाने शिवभक्तिपरायण होकर वहाँ शिवलिंग स्थापित किया। गंगेश्वरका दर्शन करनेसे गंगास्नानका फल होता है।

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नन्दादित्य, पर्णादित्य, गंगेश्वर, सूर्यप्राची, त्रिलोचनलिंग, देविका, उमापतीश्वर, भूधरवराह तथा मूलस्थानगत सूर्यकी महिमा, वाल्मीकिजीकी पूर्वकथा

महादेवजी कहते हैं—तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर नन्दादित्यका दर्शन करनेके लिये जाय। पूर्वकालमें नन्द नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो चुके हैं, जो सब लोगोंको सुख देनेवाले थे। उन धर्मज्ञ नरेशके शासनकालमें दुर्भिक्ष, रोग, व्याधि, अकालमृत्यु तथा अनावृष्टिका भय किसीको नहीं था। कुछ कालके अनन्तर पूर्वकर्मोंके फलसे राजाका शरीर बड़े भारी कुष्ठरोगसे व्याप्त हो गया। इससे उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ और उन्होंने प्रभासमें नदीके तटपर देवाधिदेव भगवान् सूर्यकी स्थापना की। इससे वे रोगसे मुक्त हो गये। वहाँ स्नान और श्राद्ध-तर्पण करके नन्दादित्यका दर्शन

* प्रभासखण्ड * । १३०३

करनेवाला मनुष्य फिर मर्त्यलोकमें जन्म नहीं लेता—मुक्त हो जाता है।

पार्वती! प्राची सरस्वतीके तटपर भगवान् पर्णादित्यका स्थान है। प्राचीन कालके त्रेतायुगकी बात है, पर्णाद नामके एक ब्राह्मणने प्रभासक्षेत्रमें आकर बड़ी कठोर तपस्या की। उन्होंने अत्यन्त भक्तिभावसे भगवान् सूर्यका आराधन तथा वेदोक्त स्तुतियोंद्वारा स्तवन किया। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने कहा—'सुव्रत ! मैं इस तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।'

ब्राह्मणने कहा—भगवन् ! आप प्रसन्न हो गये, यही मेरे लिये सबसे बड़ा वर और अभीष्ट मनोरथ है। देवेश्वर ! आपका दर्शन तो स्वप्नमें भी दुर्लभ है; तथापि यदि मुझे वर देना ही है तो मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप सदा इस स्थानपर निवास करें।

'एवमस्तु' कहकर भगवान् सूर्य अन्तर्धान हो गये। पर्णादके द्वारा स्थापित होनेके कारण वे पर्णादित्य कहलाये। पर्णाद जीवनभर उनकी आराधनामें लगे रहे। अन्तमें उन्हें सूर्यलोककी प्राप्ति हुई। जो भाद्रपदमासकी षष्ठीको वहाँ स्नान और पर्णादित्यका दर्शन करता है, वह कभी कोई कष्ट नहीं पाता।

गंगापथ नामक स्थानमें महान् स्रोतवाली गंगाजी और गंगेश्वर शिव हैं। जो वहाँ स्नान करके गंगेश्वरकी पूजा करता है, वह भयंकर पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य वैशाखकी पूर्णिमाको सरस्वती नदीमें स्नान करके वहीं चमसोद्भेद तीर्थमें पिण्डदान देता है, उसे गयासे कोटिगुना पुण्य प्राप्त होता है।

तदनन्तर सब पापोंका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली सूर्यप्राचीकी यात्रा करे। वहाँ स्नान करके मनुष्य पाँच महापातकोंसे मुक्त हो जाता है।

ऋषितीर्थके समीप न्यंकुमती नदीके उत्तर तटपर ऋषियोंद्वारा पूजित त्रिलोचन लिंग है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। जो भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशीको वहाँ उपवास, रातमें जागरण तथा प्रातःकाल श्राद्ध एवं विधिवत् शिवकी पूजा करता है, वह शिवलोकमें निवास करता है।

ऋषितीर्थके समीप देविका नामक उत्तम क्षेत्र है, जो इच्छानुसार फल देनेवाला है। वहीं ऋषियों और सिद्धोंसे घिरा हुआ महासिद्ध वन है, जो भाँति-भाँतिके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त तथा पर्वतोंसे सुशोभित है।

देविकाके उत्तर तटपर मैं उमापतीश्वर नामसे निवास करता हूँ। वह क्षेत्र मुझे बहुत प्रिय है। पार्वती! वहाँ मेरा विग्रह उमा नामके तुम्हारे विग्रहसे संयुक्त है; इसलिये उमापति नामसे मेरी प्रसिद्धि हुई है। जो पौषमासकी अमावास्याको वहाँ श्राद्ध करता है, उसका वह श्राद्ध अक्षय होता है। बुद्धिमान् मनुष्य वहाँ गौ, भूमि, सुवर्ण तथा वस्त्रका दान करे। सब देवताओंने उस श्रेष्ठ नदीका आवाहन किया है, इस कारण वह पापनाशिनी देविका कही गयी है।

वहीं भगवान् भूधर (वाराह)-का दर्शन करना चाहिये। चारों वेद ही उनके चारों पैर हैं। यूप उनकी दाढ़ हैं। क्रतु उनके दाँत हैं। स्रुवा मुख है। अग्नि जिह्वा है। कुश रोम हैं। ब्रह्म मस्तक हैं। दिन और रात उनके नेत्र हैं। वेदांग कानोंके आभूषण हैं। इस प्रकार यज्ञमय वाराह भगवान् उस स्थानपर स्थित हैं। आश्विनमासकी अमावास्या तथा एकादशीको जब सूर्य कन्याराशिपर स्थित हों, गुड़युक्त पायस एवं गुड़युक्त हविष्य लेकर 'नमो वः पितरो रसाय' इत्यादि मन्त्रसे उसको तथा अन्य भोजन-सामग्रीको अभिमन्त्रित करे। 'तेजोऽसि शुक्रम्' इत्यादि मन्त्रसे घी और 'दधि क्राव्णो' इत्यादि मन्त्रसे दही अभिमन्त्रित करे। 'आप्यायस्व' इत्यादि मन्त्रके द्वारा दूध अभिमन्त्रित करके जितने व्यंजन और भक्ष्य-भोज्य पदार्थ हैं, उन सबको 'महान् इन्द्रेण' इत्यादि मन्त्रके द्वारा अर्पण करे। 'संवत्सर' इत्यादि मन्त्रके द्वारा जल अर्पण करे। इस प्रकार ब्राह्मण-भोजन कराकर वहाँ पिण्डदान देना चाहिये।

प्राचीन कालमें शमीमुख नामक एक ब्राह्मण

१३०४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

था। उसके विशाख नामका एक पुत्र हुआ, जो बड़े भयंकर कर्म करनेवाला था। उसने एकमात्र माता-पिताकी सेवाको छोड़कर और कोई सत्कर्म कभी नहीं किया था। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उसके माता-पिता बहुत वृद्ध हो गये और मृत्युके निकट पहुँचे। वे रोग आदिसे अत्यन्त व्याकुल थे। विशाख प्रतिदिन जंगलमें जाता और अपनी शक्तिका प्रयोग करके दूसरोंका धन लूट लाता। उसी धनसे वह अपने माता-पिता और पत्नीका पोषण करता था। एक समय उसी मार्गसे तीर्थयात्रापरायण सप्तर्षि जा रहे थे। उन्हें देखकर विशाखने डंडा उठाया और कठोर वचनोंद्वारा उन्हें घुड़कते हुए कहा—'ठहरो, ठहरो।' वे मुनि परम शान्त थे। ढेला, पत्थर और स्वर्णको समान समझते थे। शत्रु तथा मित्रके प्रति भी उनके मनमें समान भाव था और राग-द्वेषसे वे सर्वथा शून्य थे। उन्होंने आपसमें कहा—'हमलोगोंके साथ जो इसका दर्शन और सम्भाषण हुआ है, वह व्यर्थ न जाय—इसलिये इससे वार्तालाप करना चाहिये।'

ऐसा निश्चय करके अंगिराने कहा—तस्कर ! थोड़ी देरतक सावधान होकर मेरी बात सुनो। मैं तुम्हारे हितके लिये ही सच्ची बात कह रहा हूँ। पहले यह बताओ कि तुम्हारे घरमें किस गोत्रके कौन-कौन लोग रहते हैं ?

तस्कर बोला—मुने ! मेरे घरमें बूढ़े माता-पिता और मेरी सन्तानहीन पत्नी है और एक मैं हूँ। पाँचवाँ कोई नहीं है।

अंगिराने कहा—तुम पापसे जो धन कमाते हो, उससे उन सबकी पुष्टि हो रही है। अतः घर जाकर उन सबसे पूछो कि 'मैं पाप करता हूँ और सब लोग उस पापकी कमाई खाते हैं; अतः वह पाप किसको लगेगा ? और मेरा पाप कैसे शीघ्र छूटेगा ?'

मुनिके यों कहनेपर विशाख तुरंत अपने घर चला गया और मुनिकी कही हुई बातें अपने माता-पितासे उसने पूछीं। उसकी बात सुनकर माता-पिता बोले—'बेटा ! एक मनुष्य पाप करता है और उस पापकी कमाईको बहुत-से लोग भोगते हैं। भोगनेवाले तो छूट जाते हैं और कर्ता उस पापदोषसे लिप्त होता है। जो मन्दबुद्धि मानव कुटुम्बके लिये अशुभ कर्म करता है, उस पापीको निश्चय ही अपना आत्मा प्रिय नहीं है।'

माता-पिताकी बात सुनकर उसे मन-ही-मन कुछ भय हुआ और उसने निकट जाकर पिता-मातासे कहा—'मैं आपलोगोंके लिये ही पाप करता हूँ, अतः आप उसके किसी अंशका भोग करेंगे या नहीं ?'

पिता-माता बोले—बेटा ! जब हम पहली अवस्थामें थे, तब तुम हमारे द्वारा पालन करने योग्य थे और अब इस वृद्धावस्थामें तुमको ही हमारा पालन करना चाहिये। ब्रह्माजीने यही पिता-पुत्रका पारस्परिक धर्म बतलाया है। हमने तुम्हारे लिये जो शुभाशुभ कर्म किया है, उसको हम भोगेंगे और अब तुम जो शुभ या अशुभ कर्म करते हो, उसका भोग तुम्हींको करना पड़ेगा। अतः विद्वान् पुरुषको सदा शुभ कर्म ही करने चाहिये। चोरी, खेती, ब्याज, व्यापार अथवा नौकरी—कुछ भी करके तुम हमें प्रतिदिन भोजन देते हो। उसका दोष हमको नहीं लगता।

माता-पिताकी बात सुनकर विशाखाने पत्नीसे भी वही बात पूछी। उसने भी वही उत्तर दिया, जो माता-पिताने दिया था। इससे विशाखको बड़ा वैराग्य प्राप्त हुआ। वह बार-बार अपनी निन्दा करता हुआ बहुत दुःखी हुआ और बोला—'मुझ पापकर्मपरायण दुष्कर्मीको धिक्कार है। जो विवेकसे शून्य और सत्संगसे रहित है, जो विद्वान् पुरुषोंकी सेवा नहीं करता, वही पाप करता है। उस पापीको अपना आत्मा प्रिय नहीं है।'

इस प्रकार सोच-विचार करता हुआ वह ऋषिके समीप आया और मधुर वाणीमें आदरपूर्वक कहा—'मुने ! अब आप पधारिये। यह अपना कुशासन और कमण्डलु लीजिये। ये हैं आपके वल्कल, चीर और मृगचर्म। ये सब लेकर मेरा अपराध क्षमा कीजिये। मैं दीन हूँ, कृपण हूँ तथा सत्संगसे वंचित एवं मूर्ख हूँ। मुझे क्षमा कीजिये।

  • प्रभासखण्ड * १३०५

आजसे मैं इस साधुनिन्दित, क्रूर एवं भयंकर कर्मसे निवृत्त हो गया। अब मुझे इस पापकर्मका कोई प्रायश्चित्त बताइये, जिससे आपकी कृपासे मैं पापसे मुक्त होऊँ।'

ऋषियोंने कहा—वत्स ! तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। एकाग्रचित्त होकर सुनो। मैं तुम्हें गोपनीय बात बतलाऊँगा, उसे किसीके सामने कहना नहीं चाहिये। उसके जपसे तुम अवश्य पापमुक्त हो जाओगे। यह चार अक्षरवाला मन्त्र तुम उच्च स्वरसे जपते रहो, यह मनुष्योंके सब पापोंको हरनेवाला तथा स्वर्ग और मोक्ष देनेवाला है।

उनके यों कहनेपर विशाख प्रतिदिन उस मन्त्रका जप करने लगा और वे मुनि वहाँसे चले गये। विशाख गुरुभक्त था। देविकाके उत्तम तटपर उस मन्त्रका जप करते हुए उसे समाधि लग गयी। उसकी भूख-प्यास नष्ट हो गयी और शरीर शुद्ध हो गया। मन्त्र, तीर्थ, द्विज, देवता, दैवज्ञ, दवा और गुरु—इनमें जैसी जिसकी भावना होती है, उसको वैसी सिद्धि प्राप्त होती है। यह जीवात्मा स्वभावसे ही निर्मल परमात्माका स्वरूप है, उपाधिके संगसे विकारको प्राप्त होता है—जैसे स्फटिकमणि स्वरूपतः स्वच्छ है किंतु उपाधिवश उसमें भी भिन्न रंगोंकी प्रतीति होती है—जिस प्रकार भ्रमरी स्वयं तो वन्ध्या होती है, परंतु कहींसे छोटा-सा जीव-जन्तु पाकर उसे अपने स्थानपर ले आती है और ध्यानमग्न होकर अपने शिशुरूपसे उसका चिन्तन करती है, जिसके कारण उसीका ध्यान करके बढ़नेवाला वह जीव भी वैसा ही हो जाता है। यद्यपि वह जीव दूसरी योनिमें उत्पन्न हुआ रहता है, तथापि भ्रमरीके चिन्तनसे भ्रमररूप हो जाता है। यही सत्पुरुषोंके लिये दृष्टान्त है। जो गुरुसे उपदेश पाकर उसमें संदेह करता है, वह सिद्धिको नहीं पाता, जैसे भाग्यहीन पुरुषको निधि नहीं मिलती।

इस प्रकार मन्त्रजपमें संलग्न हो अमरत्वको प्राप्त हुए विशाख मुनिके सहस्रों वर्ष बीत गये। कुछ कालके पश्चात् वे बाँबीकी मिट्टीसे घिर गये। उन्हें इस बातका कुछ भी पता नहीं था। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् वे सप्तर्षि फिरसे उधर आ निकले और उस स्थानको देखकर एक-दूसरेसे कहने लगे—'यहीं वह भयानक आकारवाला तस्कर विशाख हमें मिला था, जिसने यहाँ आते ही हमारा सब कुछ लूट लिया था।' इस प्रकार वार्तालाप करते हुए महर्षियोंने बाँबीके भीतरसे आती हुई मन्त्रोच्चारणकी उत्तम ध्वनि सुनी। तब कौतूहलवश उन्होंने खनतीसे उस पर्वताकार वल्मीकको खोदा। उसके भीतर उसी चतुरक्षर मन्त्रका जप करता हुआ विशाख उन्हें दिखायी दिया। उसे समाधिमें स्थित जान योगसम्मत ओषधियोंको लेकर उन्होंने उसके सुप्त शरीरमें मर्दन किया। तब वह सजग होकर बोला—'महर्षियो ! अपना-अपना धन ले लीजिये, मुझ पापीने अज्ञानवश इसे छीन लिया था। अब आप यह सब लेकर तीर्थयात्राको जाइये, मैंने आपको मुक्त कर दिया। मेरे माता-पिता और पत्नीसे जाकर कह दीजिये कि विशाख सब प्रकारकी आसक्तियोंसे रहित हो गया। अब वह पहलेकी तरह आपलोगोंसे मिलना नहीं चाहता।'

सप्तर्षि बोले—मुने ! तुम्हें यहाँ रहते हुए बहुत वर्ष बीत गये। तुम्हारे माता-पिता, पत्नी तथा अन्य जो कुटुम्बी लोग थे, उन सबकी मृत्यु हो चुकी है। हमलोग दीर्घकालके पश्चात् इस स्थानपर आये हैं। अब तुम इस मन्त्र-जपके प्रभावसे सिद्ध हो गये हो। तुम एकाग्रतापूर्वक मन्त्रका चिन्तन करते हुए वल्मीकमें स्थित रहे हो। अतः इस भूतलपर 'वाल्मीकि' नामसे प्रसिद्ध होओगे। तुम्हारी जिह्वाके अग्रभागपर सरस्वती देवी स्वच्छन्द निवास करेंगी और तुम रामायण काव्यका निर्माण करके मोक्ष प्राप्त करोगे।

विशाख बोला—विप्रवरो ! आप प्रसन्न होकर गुरु दक्षिणा स्वीकार करें, जिससे मैं उऋण होकर महान् तपमें संलग्न होऊँ।

१३०६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


ऋषि बोले— ब्रह्मन्! तुम सिद्ध हो गये। यही हमारे लिये गुरुदक्षिणा है। तुम पुनः कोई मनोवांछित वर माँग लो।

वाल्मीकिजी बोले— यदि आपलोग मेरे ऊपर प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो बताइये, यहाँ देविका नदीके सुरम्य तटपर कौन-से देवता स्थित हैं, जो समस्त कामनाओं और फलोंके देनेवाले हैं?

ऋषि बोले— ब्रह्मन्! यह सामने जो अनेक शाखाओंके साथ फैला हुआ वृक्ष है, इसकी ओर देखो। इसके मूलस्थानमें ब्रह्माजीके अंशसे उत्पन्न भगवान् सूर्य स्थित हैं। कल्पके प्रारम्भकालसे ही उनकी यहाँ स्थिति है। वे ही इस क्षेत्रके देवता हैं, उनकी आराधना करो। यहाँ दो कोसतकका स्थान सूर्यक्षेत्र कहा गया है। यहाँ रहनेवालोंको निश्चय ही स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है।

उनकी बात सुनकर वाल्मीकिने भगवान् सूर्यकी आराधना की। इससे सन्तुष्ट होकर भगवान् सूर्यने कहा—'वर माँगो।'

वाल्मीकि बोले— देवेश्वर! आजसे आप यहाँ सदैव निवास करें।

सूर्यने कहा— विप्रवर! मूलस्थानमें निवास करनेवाला मैं आज तुमपर सन्तुष्ट हुआ हूँ, अतः यह क्षेत्र अब मूलस्थानके नामसे ही विख्यात होगा। जो लोग उत्तरायणमें यहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करेंगे, वे स्वर्गलोकमें जायँगे। विप्रवर! तिलमिश्रित जलसे यहाँ तर्पण करनेपर पितरोंको गयाश्राद्धके समान सन्तोष प्राप्त होगा। जो मानव भक्तिपूर्वक साग, मूल, फल, खली अथवा गुड़से यहाँ श्राद्ध करेंगे, वे परम मोक्षको प्राप्त होवेंगे। कीट, पतंग, पशु, पक्षी तथा मृग भी प्याससे पीड़ित हो यहाँके जलका स्पर्श करने मात्रसे परम गतिको प्राप्त होंगे। श्रावणमासकी पूर्णिमाको तुम्हारे स्नेहवश मैं यहाँ विशेषरूपसे निवास करूँगा। उस दिन जो यहाँके जलसे पितरोंका तर्पण करेगा, उसकी अठारह प्रकारकी कोढ़ तत्काल नष्ट हो जायगी। कपाल, औदुम्बर, मण्डल, विचर्चिका, ऋक्षजिह्व, कच्छु, किटिभ, सिध्म, अलस, विपादिका, दद्रु, शतारु, विस्फोटक, पुण्डरीक, काकण, पामा, चर्मदल और चर्म—ये अठारह प्रकारके कुष्ठ अवश्य दूर हो जायँगे, इसमें सन्देह नहीं है।

यों कहकर सूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। वाल्मीकि मुनिने सूर्यदेवकी आराधना तथा रामायणकाव्यका निर्माण किया। अतः उस तीर्थमें सब यज्ञोंका फल देनेवाले सूर्यदेवका अवश्य दर्शन तथा इस सर्वपातकनाशिनी कथाका श्रवण करना चाहिये।


भगवान् सूर्यके अष्टोत्तरशतनामोंकी महिमा

महादेवजी कहते हैं— पार्वती! हिरण्याके पूर्वभागमें महर्षि च्यवनके द्वारा स्थापित परम उत्तम च्यवनादित्यका उत्तम स्थान है। मनुष्योंद्वारा विधिपूर्वक पूजित होनेपर वे समस्त अभीष्ट फलोंको देनेवाले हैं। जो मानव सप्तमी तिथिके दिन एक सौ आठ नामोंद्वारा श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति करता है, वह मनोवांछित फलको पाता है।

पूर्वकालमें महर्षि धौम्यने महात्मा युधिष्ठिरसे सूर्यदेवके जिन एक सौ आठ नामोंका वर्णन किया, उन्हें सुनो—सूर्य, अर्यमा, भग, त्वष्टा, पूषा, अर्क, सविता, रवि, गभस्तिमान्, अज, काल, मृत्यु, धाता, प्रभाकर, पृथ्वी, बल-तेज-आकाश-वायु-परायण, सोम, बृहस्पति, शुक्र, बुध, अंगारक, मंगल, इन्द्र, विवस्वान्, दीप्तांशु, शुचि, सौर्य, शनैश्वर, ब्रह्मा, रुद्र, विष्णु, स्कन्द, वैश्रवण, यम, वैद्युत, जाठराग्नि, ऐन्धन, तेजःपति, धर्मध्वज, वेदकर्ता, वेदांग, वेदवाहन, कृत

  • प्रभासखण्ड * १३०७

(सत्ययुग), त्रेता, द्वापर, कलि, सर्वामराश्रय (अथवा संवत्सरात्मक), कला-काष्ठा-मुहूर्त-पक्ष-मास-अहः-निशा-संवत्सरकर, स्वच्छ, कालचक्र, विभावसु, पुरुष, शाश्वत, योगी, व्यक्त, अव्यक्त, सनातन, लोकाध्यक्ष, प्रजाध्यक्ष, विश्वकर्मा, तमोनुद, वरुण, सागर, अंशु, जीमूत, जीवन, अरिहा (शत्रुनाशक), भूताश्रय, भूतपति, सर्वभूतनिषेवित, स्रष्टा, संवर्तक, वह्नि, सर्वादिकर, अमल, अनन्त, कपिल, भानु, कामद, सर्वतोमुख, जय, विषाद, वरद, सर्वधातुनिषेवित, सम, सुवर्ण, भूतादि, शीघ्रग, प्राणधारक, धन्वन्तरि, धूमकेतु, आदिदेव, अदितिपुत, द्वादशात्मा, अरविन्दाक्ष, पिता, माता, पितामह, स्वर्गद्वार, प्रजाद्वार, मोक्षद्वार, त्रिविष्टप, देहकर्ता, प्रशान्तात्मा, विश्वात्मा, विश्वतोमुख, चराचरात्मा, सूक्ष्मात्मा तथा मैत्रशरीरान्वित।

ये कीर्तन करनेयोग्य अमित तेजस्वी भगवान् सूर्यके एक सौ आठ नाम महात्मा इन्द्रके द्वारा प्रकाशित हुए हैं। इन्द्रसे नारदको, नारदसे धौम्यको और धौम्यसे राजा युधिष्ठिरको इनका उपदेश प्राप्त हुआ है। राजा युधिष्ठिरने इन्हें पाकर सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लिया। जो एकाग्रचित्त होकर सूर्योदय कालमें इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह पुत्र, धन, रत्नराशि, पूर्व-जन्मकी स्मृति, स्मरण-शक्ति तथा मेधा (बुद्धि) प्राप्त कर लेता है। जो देवताओंमें श्रेष्ठ भगवान् सूर्यके इस स्तोत्रका एकाग्रचित्त होकर पाठ करता है, वह शोकरूपी दावानलसे मुक्त हो मनोवांछित फलोंको प्राप्त कर लेता हैं।

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महर्षि च्यवनकी कथा और च्यवनेश्वरकी महिमा

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! महर्षि भृगुके पुत्र च्यवन मुनिने प्रभासक्षेत्रमें जाकर बड़ी भारी तपस्या की। वे आसन लगाकर ठूंठकी भाँति अविचल भावसे बहुत समयतक एक ही स्थानपर बैठे रहे। वहाँ उनके शरीरपर सब ओरसे बाँबीकी मिट्टी जम गयी और उसके ऊपर लताएँ फैल गयीं। उस बाँबीमें सब ओर चींटियाँ फैल गयी थीं। इस प्रकार बाँबीसे घिरे हुए च्यवन मुनि मिट्टीकी मूर्तिकी भाँति वहाँ स्थिर होकर घोर तपस्यामें स्थित हो गये। तदनन्तर किसी समय राजा शर्याति तीर्थयात्राके प्रसंगसे श्रीसोमनाथजीका दर्शन करनेके लिये पापनाशक प्रभासक्षेत्रमें आये। राजाके सुकन्या नामकी एक कन्या थी, जो सखियोंसे घिरी हुई वहाँ वनमें घूमने लगी। घूमते-घूमते वह च्यवन मुनिकी बाँबीके समीप जा पहुँची। वहाँ उनके चमकते हुए नेत्रोंको देखकर उसने कौतूहलवश सोचा, यह क्या है? फिर उसने काँटेसे उन दोनों नेत्रोंको छेद दिया। नेत्रोंके बिंध जानेपर मुनिके कोपसे राजा शर्यातिके सैनिकोंका मल-मूत्र रुक गया। इससे सारी सेना बहुत दुःखी हुई। यह देख राजाको भी बड़ा दुःख हुआ। वे बोले—'आज किसने यहाँ महात्मा भार्गवका अपकार किया है, उसे तुमलोग शीघ्र बताओ?' सैनिकोंने उत्तर दिया, 'हमें किसी अपकार करनेवालेका पता नहीं है।' तब राजाने अपने सुहृदोंसे पूछा।

सैनिकोंको दुःखसे व्याकुल तथा पिताको चिन्तित देखकर सुकन्याने कहा—'पिताजी! मैं इस वनमें घूम रही थी। इतनेमें एक बाँबीके भीतरसे मुझे जुगनूकी भाँति चमकते हुए दो प्रकाश दिखायी पड़े। मैंने अज्ञानवश उन्हें बींध डाला।' यह सुनकर राजा शर्याति शीघ्र ही बाँबीके पास आये और उन्होंने तपोवृद्ध एवं वयोवृद्ध च्यवन मुनिका दर्शन किया। तदनन्तर वे हाथ जोड़कर सैनिकोंके कष्ट-निवारणके लिये प्रार्थना करते हुए बोले—'भगवन्! मेरी बालिकाने अज्ञानवश जो आपका अपराध किया है, उसके लिये क्षमा करें।'

१३०८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

इसके बाद महर्षिकी आज्ञासे शर्यातिने उन्हें अपनी कन्या ब्याह दी और स्वयं सेनाके साथ नगरको प्रस्थान किया। सुकन्या परम उत्तम तपस्वी पतिको पाकर प्रेमपूर्वक तपस्या और नियमसे रहती हुई उनकी सेवा करने लगी। मुनिके यहाँ जो अतिथि आते, उनका यथोचित सत्कार करके वह शीघ्र ही महर्षि च्यवनकी सेवामें संलग्न हो जाती थी।

कुछ कालके पश्चात् अश्विनीकुमार नामक देवता उस वनमें आये। उन्होंने सुन्दर दाँतोंवाली सुकन्याको स्नान करके जाते हुए देखा और उसके समीप जाकर कहा—'वामोरु! तुम किसकी स्त्री हो और इस वनमें किस लिये घूम रही हो?'

सुकन्याने प्रसन्न होकर कहा—आपलोग मुझे राजा शर्यातिकी पुत्री तथा महर्षि च्यवनकी पत्नी जानें।

अश्विनीकुमार बोले—तुम्हारे पिताने जान-बूझकर इन गतायु महर्षिके साथ तुम्हारा विवाह कैसे किया? च्यवनजी तुम्हारे पालन-पोषण और रक्षणमें तो सर्वथा असमर्थ हैं। अतः उन्हें छोड़कर तुम हम दोनोंमेंसे किसी एकको अपना पति बना लो।

उनके यों कहनेपर सुकन्या बोली—देवताओ! मैं अपने पतिदेव च्यवनमें पूर्णतः अनुरक्त हूँ। मेरे विषयमें आपलोग कोई ऐसी आशंका न करें।

तब अश्विनीकुमारोंने कहा—देवि! हम दोनों वैद्य हैं। तुम्हारे पतिको रूप और यौवनसे सम्पन्न कर देंगे। उसके बाद हम तीनोंमेंसे किसी एकको तुम अपना पति चुन लेना।

उन दोनोंकी यह बात सुनकर सुकन्या च्यवन मुनिके पास गयी और अश्विनीकुमारोंने जो कुछ कहा था, वह सब उसने कह सुनाया। उसकी बात सुनकर मुनिवर च्यवनने कहा—'अश्विनी-कुमारोंकी बातोंका आदर करो।' मुनिकी यह आज्ञा पाकर सुकन्या उन दिव्य रूपधारी देववैद्योंसे बोली—'आप दोनोंने मेरे पतिको तरुण बनानेके विषयमें जो कुछ कहा है, उसे शीघ्र पूरा करें।' वे बोले—'तुम्हारे पति इस तालाबमें प्रवेश करें।' तब मुनिवर च्यवनने दिव्य रूपकी अभिलाषासे शीघ्र ही उस तालाबमें प्रवेश किया, तत्पश्चात् अश्विनीकुमार भी उस जलके भीतर प्रविष्ट हुए। दो ही घड़ीमें वे तीनों उस सरोवरसे बाहर निकले। उनके रूप और वेष दिव्य थे। तीनों ही तरुण एवं दिव्य कुण्डलोंसे विभूषित थे। वे सब एकत्र होकर बोले—'शुभे! हममेंसे एकको वरण करो। सुकन्याने सबको एक समान रूपवाले देखकर अपने मन और बुद्धिसे निश्चय करके अपने पति च्यवन मुनिको पहचान लिया और एकमात्र उन्हींका वरण किया। अपनी पत्नीको पाकर तेजस्वी महर्षि च्यवन अश्विनीकुमारोंसे बोले—'आप दोनोंने कृपा करके मुझे दिव्य रूप तथा तरुण अवस्थासे संयुक्त किया और मुझे अपनी पत्नीकी प्राप्ति हुई, इसलिये मैं आप दोनोंको यज्ञभागका अधिकारी बनाऊँगा।' मुनिकी यह बात सुनकर अश्विनीकुमार प्रसन्नतापूर्वक चले गये।

तदनन्तर राजा शर्यातिने जब सुना कि महर्षि च्यवनको नयी अवस्था प्राप्त हुई है, तब वे बहुत प्रसन्न हुए और सेनाके साथ उनके आश्रमपर गये। पुत्री और जामाताको देवकुमारोंकी भाँति देखकर राजा शर्यातिके हर्षकी सीमा न रही। महर्षि च्यवनने रानीसहित महाराज शर्याति का पूर्ण सत्कार किया और समीप बैठकर वार्तालाप किया। बातचीतमें ही उन्होंने राजासे कहा—'राजन्! मैं आपसे यज्ञ कराऊँगा। आप सब सामग्री एकत्र करें।' राजा शर्याति इस प्रस्तावसे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने शुभ मुहूर्तमें यज्ञमण्डप निर्माण कराया। उस मण्डपमें महर्षि च्यवनने राजासे यज्ञ प्रारम्भ कराया और उसमें अश्विनीकुमारोंके लिये सोमरसका भाग ग्रहण किया। इन्द्रने उन्हें ऐसा करनेसे रोका और कहा—'अश्विनीकुमार सोमरसके अधिकारी नहीं हैं, ऐसा मेरा निश्चित मत है। वे दोनों देवताओंके वैद्य हैं, अतः निन्दित माने गये हैं।'

  • प्रभासखण्ड * १३०९

च्यवनने कहा—देवराज! आप अश्विनीकुमारोंको भी देवताओंकी ही कोटिमें समझें। ये दोनों महात्मा रूपसम्पदासे सम्पन्न और तेजस्वी हैं। इन्होंने इस समय मुझे अजर बनाया है।

इन्द्र बोले—ये दोनों वैद्य हैं और इच्छानुसार रूप धारण करके मर्त्यलोकमें विचरते रहते हैं; अतः देवताओंकी श्रेणीमें बैठकर सोमके अधिकारी कैसे हो सकते हैं?

इन्द्रके यों कहनेपर भी उनका अनादर करके च्यवन मुनिने अश्विनीकुमारोंके लिये भाग ग्रहण किया। यह देख इन्द्रने कहा—'यदि तुम मेरी अवहेलना करके इन वैद्योंके लिये सोमरसका भाग ग्रहण करोगे तो मैं तुम्हारे ऊपर भयंकर वज्रका प्रहार करूँगा।'

इन्द्रकी यह बात सुनकर च्यवनने एक बार उनकी ओर दृष्टिपात किया और अश्विनीकुमारोंके लिये सोमरसका भाग विधिपूर्वक निकाला। इसी समय इन्द्रने उनपर तुरंत वज्रका प्रहार किया, परंतु भृगुनन्दन च्यवनने वज्रसहित उनकी बाँह स्तम्भित कर दी। तदनन्तर मन्त्र पढ़कर अग्निमें आहुति डाली। मुनिके तपोबलसे उस समय महापराक्रमी महाकाय मद नामक महादैत्य उत्पन्न हुआ और क्रोधमें भरकर भयंकर सिंहनादसे सम्पूर्ण लोकोंको गुँजाता हुआ इन्द्रकी ओर दौड़ा।

मुँह बाये हुए कालकी भाँति उस दैत्यको आते देख इन्द्र भयसे पीड़ित हो गये और मुनिवर च्यवनको प्रणाम करके बोले—'भृगुनन्दन! आजसे ये दोनों अश्विनीकुमार सोमरसके अधिकारी होंगे। तपोधन! मुझपर आपका अकारण क्रोध न हो; जिस प्रकार आपने इन अश्विनीकुमारोंको सोमरसका अधिकारी बनाया है, उसी प्रकार मेरी रक्षाके लिये भी अपने बल-वीर्यको प्रकाशित करें। आजकी इस घटनासे सुकन्याके पिता राजा शर्यातिकी कीर्ति संसारमें अमर होगी। आप मुझपर कृपा करें।'

इन्द्रके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर मुनिवर च्यवनका क्रोध शान्त हो गया। इन्द्र उनकी आज्ञा ले शीघ्र वहाँसे चले गये। च्यवनने इन्द्रकी पूजा करके अश्विनीकुमारोंसहित सब देवताओंका पूजन किया तथा राजा शर्यातिका यज्ञ पूर्ण कराकर वे सुकन्यासहित इस वनमें विहार करने लगे। उनके द्वारा स्थापित च्यवनेश्वर लिंग महापातकोंका नाश करनेवाला है। जो विधिपूर्वक च्यवनेश्वरकी पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। यहाँ आश्विनमासकी पूर्णिमाको विधिपूर्वक श्राद्ध करे और ब्राह्मणोंको भोजन कराये। यों करनेसे कोटि तीर्थोंके सेवनका फल प्राप्त होता है।

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सुकन्यासरोवर, गोष्पदतीर्थ, गंगेश्वर, बालादित्य, पातालगंगा तथा कुबेरेश्वरकी महिमा; कुबेरके द्वारा शिवकी स्तुति

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! जहाँ च्यवन मुनिके साथ अश्विनीकुमारोंने स्नान किया था, वह जलाशय सुकन्या सरोवरके नामसे विख्यात है। जो नारी तृतीयाको उस सरोवरमें स्नान करती है, उसकी गृहस्थी सात हजार जन्मोंतक नष्ट नहीं होती और उसका पुत्र दरिद्र, अंगहीन, दीन तथा अंधा नहीं होता।

तदनन्तर न्यंकुमती नदीके तटपर जाकर परम उत्तम गोष्पदतीर्थमें गया-श्राद्ध करे। उसके बाद भगवान् वराहका दर्शन करके नारिगृहकी यात्रा करे। फिर मातृसुतकी पूजा करके सागरसंगममें स्नान करे, फिर न्यंकुमतीके तटपर जाकर मुनिवर अगस्त्यजीके क्षुधाहर नामक दिव्य आश्रमपर जाय। वह समस्त पातकोंका नाश करनेवाला है।

उसके पश्चिम भागमें उससे थोड़ी ही दूरपर गंगाजीके द्वारा स्थापित गंगेश्वर लिंग है। अगस्त्यजीके

१३१० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

आश्रममें गंगेश्वरका दर्शन करके स्नान, दान और जप आदि करनेसे मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है।

उस आश्रमसे थोड़ी दूर उत्तर दिशामें सूर्यदेवने बाल्यावस्थामें तपस्या की है। इससे उनका नाम बालादित्य हुआ। रविवारको उनका दर्शन करनेसे मनुष्य कोढ़ी नहीं होता और बालकोंको रोग-व्याधि नहीं सताते।

वहाँसे दक्षिणमें दो कोसकी दूरीपर सब पातकोंका नाश करनेवाली पातालगामिनी गंगा हैं, जिन्हें विश्वामित्रजीने स्नान करनेके लिये बुलाया था। उसमें स्नान करके मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। वहाँ गंगेश्वर, विश्वामित्रेश्वर तथा बालेश्वरका दर्शन करनेसे मनुष्यको सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंकी प्राप्ति होती है।

शास्त्रज्ञान और शीलसे सम्पन्न धर्मात्मा कुबेरने न्यंकुमतीके पूर्व-तटपर एक शिवलिंग स्थापित किया, जो कुबेरेश्वरके नामसे विख्यात है। वहाँसे पश्चिम न्यंकुमतीके तटपर जो सोमनाथ महादेव हैं, उनकी पूजा करके कुबेरजीने इस प्रकार मेरा स्तवन किया—'जो यज्ञका मूल, तुम्बीके ऊँचे फलके समान आकृतिवाली तथा सौ कोटि ब्रह्माण्डोंमें स्थित है, ब्रह्माण्डवर्ती देवसमूह भी जिसका परिमाण नहीं जानते, महेश्वरकी वह कोई महामहिम लिंगमूर्ति सदा हमारी रक्षा करे। जो अजन्मा, पुराण, उपेन्द्र (विष्णु) के भी वन्दनीय तथा बड़े-बड़े राजाओंसे सेवित हैं, चन्द्रमा, सूर्य और अग्निके समान जिनके नेत्र हैं, जो अपनी ध्वजामें वृषभेन्द्र नन्दीका चिह्न धारण करनेवाले तथा प्रलय आदिके हेतु हैं, उन महादेवजीको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सबके एकमात्र ईश्वर, देवताओंके एक ही बन्धु, योगसे प्राप्त होनेवाले, सम्पूर्ण विश्वके निवासस्थान, विस्मयके आधार, अनन्त शक्तिसम्पन्न, ज्ञानजनक तथा धैर्य आदि गुणोंके कारण सर्वोत्कृष्ट हैं अथवा जिनमें धैर्य आदि गुणोंकी अधिकता है, उन भगवान् शिवको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनके हाथोंमें पिनाक, पाश, अंकुश और त्रिशूल शोभा पाते हैं, जो मस्तकपर जटाजूट धारण करते हैं, जिनके शब्दोच्चारणकी ध्वनि मेघके समान गम्भीर है, जिनके सम्पूर्ण अंगोंकी कान्ति स्फटिक मणिके समान उज्ज्वल तथा कण्ठमें नीला चिह्न है, जो सहस्रों मूर्ति धारण करनेवाले विशिष्ट पुरुष हैं, उन भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्हें संत पुरुष अक्षर, निर्गुण, अप्रमेय, ज्योतिर्मय, एक, दूरंगम (दूर गमन करनेवाले), जानने योग्य, अनिन्द्य, सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान तथा परम पवित्र बतलाते हैं, उन भगवान् शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनका स्वरूप तेज-पुंजके समान है, जिनके मस्तकपर बालचन्द्रमा शोभा पाते हैं, जिनका भयानक मुख स्फुरित होता रहता है, जो कालके भी काल, मनोवांछित फलोंके दाता, आसक्तिरहित, धर्मासनपर स्थित तथा परा और अपरा दोनों प्रकृतियोंमें विराजमान हैं, उन भगवान् रुद्रदेवको मैं प्रणाम करता हूँ। जो इन्द्रियातीत, विश्वपालक, शत्रुविजयी, तीनों गुणोंसे परे, अजन्मा, निरीह, तपोमय, वेदमय, प्रजापालक तथा अनेक नामोंवाले इन्द्ररूप हैं, उन्हीं आप महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो भूत और भविष्यके ज्ञाता महेश्वर हैं, योगवेत्ता मुनीश्वर सदा जिनका ध्यान करते रहते हैं, जो संसारबन्धनके काटनेवाले तथा नित्य मुक्तस्वरूप हैं, उन महादेवजीको मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ। जिन परम पुरुष परमात्माके अनुपम मुख, बल, प्रभाव और स्वभाव आदिका ज्ञान देवताओंको भी नहीं होता, उन अचिन्तनीय महिमावाले भगवान् वामदेवको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन उग्रमूर्ति भगवान् शिवकी आराधना करके अगस्त्यजीने समुद्रको पी लिया तथा राजा दिलीपने सम्पूर्ण मनोरथ प्राप्त कर लिये, उन विश्वयोनि भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। देवेन्द्रवन्द्य शम्भो! मुझ अनाथका उद्धार कीजिये। आप कृपालु एवं करुणामय हैं। उमेश! दुःखसागरमें डूबे हुए मुझ

  • प्रभासखण्ड * | १३११ ---|---

दीनका उद्धार कीजिये। भव! आप सबका कल्याण करनेवाले हैं। मेरा भी कल्याण कीजिये। जिनकी पूजा करके ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता स्वर्गमें इच्छानुसार विहार करते हैं, उन वन्दनीय शिवकी शरणमें आकर मैं उन्हींकी स्तुति, उन्हींका गुणगान, उन्हींके नामका जप और उन्हींकी वन्दना करता हूँ।'

इस प्रकार स्तुति करके जब कुबेरजी चुप हुए, तब भगवान् शिवने उन्हें अपने मित्रका पद, दिक्पालका पद और देवताओंके धनाध्यक्षका पद—ये तीन वर प्रदान किये और कहा—'यह स्थान तुम्हारे ही नामपर कुबेरनगर कहलायेगा। तुमने इस स्थानसे पश्चिममें जो शिवलिंग स्थापित किया है, उसका जो पुरुष श्रीपंचमीके दिन विधिपूर्वक पूजन करेगा, उसके यहाँ सात पीढ़ियोंतक लक्ष्मी बराबर बनी रहेगी।'


भद्रकाली, कुबेर, ऋषितोया नदी, शृगालेश्वर तथा गुप्त प्रयागका माहात्म्य

**महादेवजी कहते हैं—**पार्वती! कुबेरस्थानसे उत्तर भागमें मनोवांछित वस्तुओंको देनेवाली महादेवी भद्रकालीका स्थान है। जो चैत्रमासकी तृतीयाको उनकी पूजा करता है, उसे सौभाग्य, विजय और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है।

कुबेरस्थानसे नैर्ऋत्य भागमें साक्षात् कुबेरजी विराजमान हैं। जो पंचमी तिथिको भक्तिभावसे गन्ध, पुष्प तथा चन्दन आदिके द्वारा उनकी पूजा करता है, उसे विघ्नरहित अनुपम निधिकी प्राप्ति होती है। वहाँ कुण्डमें स्नान करनेसे ब्रह्महत्या-जैसे पापोंका नाश हो जाता है। उसके पूर्वभागमें बालार्केश्वर लिंग तथा उत्तर भागमें गयाक्षेत्रसहित अम्बिका स्थान है। उन दोनोंके दर्शनसे मनुष्य वाजपेय यज्ञका फल पाता और समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। कुबेरस्थानसे दस कोसकी दूरीपर पुष्कर नामका तीर्थ है। उससे अग्निकोणमें चौदह कोस दूर देवकुल नामक स्थान है, जहाँ देवताओंका समागम हुआ है, उसके पश्चिम भागमें ऋषितोया नदी है, जो समस्त पातकोंका नाश करनेवाली तथा ऋषियोंको प्रिय है। जो मनुष्य उसमें विधिवत् स्नान करके पितरोंका तर्पण करता है, वह सत्तर हजार वर्षोंतकके लिये पितरोंको तृप्त कर देता है; इतना ही नहीं, उसे सात जन्मोंके पापोंसे छुटकारा मिल जाता है।

परमपवित्र देवदारु-वनमें सहस्रों ऋषि निवास करते थे। वे सभी प्रतिदिन बावली, कुआँ और तड़ाग आदिमें स्नान करते थे। वहाँ रहते उन्हें बहुत वर्ष व्यतीत हो गये। उनके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या बढ़ गयी और वे दारुकवनमें सब ओर फैलकर रहने लगे। एक दिन उन सबने एकत्र होकर परस्पर विचार किया कि 'हमलोग ब्रह्मलोकमें चलकर ब्रह्माजीकी प्रार्थना करें, जिससे यहाँ कोई नदी प्रकट हो।' ऐसा निश्चय करके वे तपोधन मुनि ब्रह्मलोकमें गये और वहाँ ब्रह्माजीकी अनेक प्रकारसे स्तुति करने लगे।

**ऋषि बोले—**ॐकारस्वरूप आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करनेवाले आपको बार-बार नमस्कार है। समस्त संसारकी रक्षा करनेवाले आप परमात्माको नमस्कार है और जगत्का संहार करनेवाले तथा ब्रह्मरूपधारी आपको नमस्कार है। पितामह! आपको नमस्कार है। सुरज्येष्ठ! आपको नमस्कार है।

उन ऋषियोंके इस प्रकार स्तवन करनेपर लोकपितामह ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए और बोले—'विप्रवरो! तुम्हारा स्वागत है। मैं इस दिव्य स्तोत्रसे बहुत संतुष्ट हूँ। तुम कोई उत्तम वर माँगो।'

**ऋषियोंने कहा—**सुरश्रेष्ठ! आप हमें स्नान