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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
५१८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

श्रीराम बोले—सौभाग्यवती सीते! इस तीर्थमें विधिपूर्वक किया हुआ स्नान, दान, जप, होम अथवा तप सब अक्षय हो। मार्गशीर्ष कृष्णा चतुर्दशीको यहाँ स्नानका विशेष पर्व होगा। उस समय इसमें स्नान करनेवाले मनुष्योंके समस्त पापोंका नाश होगा।

प्रजाप्रेमी श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीको इस प्रकार वरदान दिया था। तभीसे यह तीर्थ पृथ्वीपर प्रसिद्ध है। सीताकुण्ड मनुष्योंके लिये बड़ा अद्भुत तीर्थ है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य निश्चय ही भगवान् श्रीरामचन्द्रजीको प्राप्त कर लेता है। उसमें स्नान, दान और तपस्या करके चन्दन, माला, धूप, दीप तथा अनेक भाँतिके वैभवविस्तारसे श्रीराम और सीताजीकी पूजा करके मनुष्य मुक्त हो जाता है। मार्गशीर्ष मासमें यहाँ स्नान करना चाहिये। इससे फिर गर्भमें नहीं आना पड़ता। अन्य समयमें भी यहाँ स्नान करके मनुष्य भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। भगवान् विष्णुहरिके पश्चिम दिशामें चक्रहरि नामसे प्रसिद्ध श्रीविष्णु निवास करते हैं, जो समस्त मनोवांछित फलोंको देनेवाले हैं। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विद्वान् पुरुष भी चक्रहरिकी महिमाका वर्णन नहीं कर सकते। वहाँसे पश्चिम हरिस्मृति नामसे प्रसिद्ध भगवान् विष्णुका परम पवित्र मन्दिर है, जो पारमार्थिक फल देनेवाला है। उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। चक्रहरि और हरिस्मृति इन दोनोंके दर्शनसे मनुष्य इस पृथ्वीपर जितने पाप करते हैं, उन सबका नाश हो जाता है।

पूर्वकालकी बात है, देवताओं और असुरोंमें बड़ा भयंकर संग्राम हुआ। वरदानके मदसे उन्मत्त हुए दैत्योंने उस युद्धमें देवताओंको परास्त कर दिया। देवता भागने लगे। तब भगवान् शंकरने उनका अगुआ बनकर उन्हें रोका और ब्रह्माजीको आगे करके सब लोग क्षीरसागरपर गये। वहाँ भगवान् विष्णु क्षीरसमुद्रमें शेषनागकी शय्यापर शयन कर रहे थे। भगवती लक्ष्मी उनके पास बैठकर अपने हाथसे उनके चरणारविन्दोंकी सेवा करती थीं। नारद आदि श्रेष्ठ मुनि भगवान्के गुण-गौरवका उच्चस्वरसे गान कर रहे थे। गरुड़जी सामने खड़े होकर निरन्तर हाथ जोड़े उनकी स्तुति करते थे। क्षीरसागरके जलसे उठती हुई तरंगोंके कारण भगवान्के पीताम्बरमें जलके कुछ छींटे पड़े हुए थे। नक्षत्रसमुदायके समान प्रकाशमान उज्ज्वल हार भगवान्के वक्षःस्थलकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके कटिप्रदेशमें पीताम्बर शोभायमान था। मुखपर मुसकानकी घटा छा रही थी। भगवान् एक अद्भुत भावसे भावित थे। कानोंमें मोती जड़े हुए दिव्य एवं स्थूल कुण्डल पहने हुए थे। श्वेतद्वीपकी स्वच्छ रत्नमयी लता-सी भगवान्ने धारण कर रखी थी। मस्तकपर किरीट और हाथोंमें पद्मरागमणिके वलय सुशोभित थे। भगवान् शंकरने विनीतभावसे सम्पूर्ण देवताओंके साथ उस समय भगवान्की शरण ली और एकाग्रचित्त होकर स्तवन किया।

भगवान् शिव बोले—जो संसारसमुद्रसे तारने और गरुड़जीको सुख देनेवाले हैं, घनीभूत मोहान्धकारका निवारण करनेके लिये चन्द्रस्वरूप हैं, उन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार है। जहाँ ज्ञानमयी मणिकी प्रज्वलित शिखा प्रकाशित होती है तथा जो चित्तमें भगवत्संगरूपी सुधाकी वर्षा करनेवाली चन्द्रिकाके तुल्य है, मानसके उद्यानमें जो प्रवाहित होती है, उस भगवद्भक्तिरूपी मन्दाकिनीकी मैं शरण लेता हूँ। वह लीलापूर्वक उत्साहशक्तिको जाग्रत् करनेवाली तथा सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त है। सात्त्विक भावोंकी पूर्वकोटि है। उसे ही वैष्णवी शक्ति कहते हैं। हवासे हिलते हुए कमलदलके पर्वके भीतर रहनेवाले पतनशील जन्तुओंकी भाँति पतनके गर्तमें गिरनेवाले प्राणियोंको स्थिरता देनेवाली एकमात्र श्रीहरिकी

  • वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५११

स्मृति ही है। हृदयकमलकी कलिकाको विकसित करनेवाली ज्ञानरूपी किरणमालाओंसे मण्डित सूर्यस्वरूप आप भगवान्‌को नमस्कार है। योगियोंकी एकमात्र गति आप संयमशील श्रीहरिको नमस्कार है। तेज और अन्धकार दोनोंसे परे विराजमान आप परमेश्वरको नमस्कार है। आप यज्ञस्वरूप, हविष्यके उपभोक्ता तथा ऋक्, यजु एवं सामवेदस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। भगवती सरस्वतीके द्वारा गाये जानेवाले दिव्य सद्गुणोंसे विभूषित आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है। आप शान्तस्वरूप, धर्मके निधि, क्षेत्रज्ञ एवं अमृतात्मा हैं, आपको नमस्कार है। आप साधकके योगकी प्रतिष्ठा तथा जीवके एकमात्र हेतु हैं, आपको नमस्कार है। आप घोरस्वरूप, मायाकी विधि तथा सहस्रों मस्तकवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप योगनिद्रास्वरूप होकर शयन करते और अपने नाभिकमलसे उत्पन्न संसारकी सृष्टि रचते हैं, आपको नमस्कार है। आप जलस्वरूप एवं संसारकी स्थितिके कारण हैं, आपको नमस्कार है। आपके कार्योंद्वारा आपकी शक्तिका अनुमान होता है। आप महाबली, सबके जीवन और परमात्मा हैं, आपको नमस्कार है। समस्त भूतोंके रक्षक और प्राण आप ही हैं, आप ही विश्व तथा उसके स्रष्टा ब्रह्मा हैं, आपको नमस्कार है। आप नृसिंहशरीर धारण करके दर्पयुक्त हो दैत्यका संहार करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप ही सबके पराक्रम हैं। आपका हृदय अनन्त है। आप सम्पूर्ण संसारके भावको ग्रहण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप संसारके कारणभूत अज्ञानरूपी घोर अन्धकारका नाश करनेवाले हैं। आपका धाम अचिन्त्य है, आपको नमस्कार है। आप गूढ़रूपसे स्थित तथा अत्यन्त उद्वेगकारक रुद्र हैं, आपको नमस्कार है। आप शान्त हैं, जहाँ समस्त ऊर्मियाँ शान्त हो जाती हैं ऐसे कैवल्यपदको देनेवाले हैं। सम्पूर्ण भावपदार्थोंसे परे तथा सर्वमय हैं, आपको नमस्कार है। जो नील कमलके समान श्याम हैं और चमकते हुए केसरके समान सुशोभित कौस्तुभमणि धारण करते हैं तथा नेत्रोंके लिये रसायनरूप हैं, ऐसे आप भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ।

इस प्रकार स्तुति करनेपर प्रसन्नचित्त, वरदायक भगवान् गरुड़ध्वजने कृपायुक्त हो सम्पूर्ण देवताओंपर अपनी सुधावर्षिणी दृष्टिसे अमृतकी वर्षा की और विनीत देवताओंसे यह मधुर वचन कहा—'देवताओ! मैं ध्यानसे तुम्हारा सारा अभिप्राय जान गया हूँ। मैं इस समय अयोध्या नगरमें जाकर तुम्हारे तेजकी वृद्धि और दैत्योंके उपद्रवकी शान्तिके लिये गुप्त रहकर उत्तम तपका अनुष्ठान करूँगा। तुमलोग भी शुद्धचित्त हो अयोध्यामें जाकर दैत्योंके विनाशके लिये तीव्र तपस्या करो।'

ऐसा कहकर भगवान् गरुड़वाहन अन्तर्धान हो गये। उन्होंने अयोध्यामें आकर गुप्त रहकर देवताओंके तेजकी वृद्धिके लिये शीघ्र उत्तम तपस्या प्रारम्भ की। इसलिये वे गुप्तहरिके नामसे प्रसिद्ध हुए। यहाँ पहले आये हुए भगवान् विष्णुके हाथसे सुदर्शन-चक्र छूटकर गिरा था, अतः चक्रहरिके नामसे भगवान्‌की प्रसिद्धि हुई। उन दोनोंके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। भगवान् श्रीहरिके प्रभावसे देवता प्रबल तेजस्वी हो गये। उन्होंने युद्धमें दैत्योंको परास्त करके अपना स्थान प्राप्त कर लिया और परम आनन्दयुक्त हो वे अतिशय शोभा पाने लगे। तत्पश्चात् बृहस्पति आदि सब देवताओंने भगवान्‌को प्रणाम किया और उनके दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो सब-के-सब अयोध्यामें आये। वहाँ पुनः प्रणाम करके हाथ जोड़कर एकाग्रचित्तसे श्रीहरिका ध्यान करते हुए उन्हींमें तन्मय हो गये। तब भगवान् विष्णुने उनसे कहा—'देवताओ! मैं इस समय तुम्हारी कौन-सी इच्छा पूर्ण करूँ।'

५२०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

देवता बोले—जगत्पते! इस समय आपके द्वारा | संगम है, जहाँ गोप्रतारघाटसे तीन योजन हमारा सब कार्य सिद्ध हो गया तथापि हमारी | पश्चिम घाघरा नदीसे सरयूका संगम हुआ है। रक्षाके लिये आपको सदैव यहीं रहना चाहिये। | वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके समस्त मनोरथोंकी श्रीभगवान् बोले—देवताओ! यह कथा संसारमें | सिद्धि करनेवाले भगवान् गुप्तहरिका दर्शन प्रसिद्धिको प्राप्त होगी। समस्त प्राणियोंमें श्रेष्ठ | करना चाहिये। जो पुरुष यहाँ उत्तम भक्तिसे पूजा, यज्ञ और | ऐसा कहकर पीताम्बरधारी भगवान् विष्णु जप आदिका अनुष्ठान करता है, वह परमगतिको | वहीं अन्तर्धान हो गये। देवता भी विधिपूर्वक प्राप्त होता है। जो जितेन्द्रिय मानव अपनी | यात्रा करके यत्नपूर्वक अयोध्यामें रहने लगे। शक्तिके अनुसार यहाँ दान करता है, वह | तबसे यह स्थान पृथ्वीमें विख्यात हो गया। अनुपम स्वर्गलोकको पाकर फिर कभी शोक | कार्तिककी पूर्णिमाको विशेषरूपसे यहाँकी वार्षिक नहीं करता। यहाँ मेरी प्रसन्नताके लिये शुद्धचित्तसे | यात्रा होती है। वहाँ संगमस्नान करके भगवान् गोदान करना चाहिये। जो मेरी भक्तिमें तत्पर | गुप्तहरिका दर्शन किया जाता है। तत्पश्चात् होकर यहाँ आत्मशुद्धिके लिये स्नान करते हैं, | सरयू और घाघराके मिले हुए जलके तटपर उनकी मुक्ति उनके हाथमें ही है। भगवान् | गोप्रतारतीर्थमें स्नान करके सम्पूर्ण कामनाओंको चक्रहरिके स्थानपर मेरी प्रीतिके लिये प्रयत्नपूर्वक | देनेवाले भगवान्की पूजा करनी चाहिये। मार्गशीर्ष उत्तम दान और जप-होमादि करना चाहिये। | शुक्ला द्वादशीको चक्रहरिकी यात्रा करनी चाहिये। श्रेष्ठ देवताओ! तुम भी यहाँ विधानसे यात्रा | जो इस प्रकार यात्रा करता है, वह भगवान् करो। इस गुप्तहरिके स्थानके निकट ही शुभ | विष्णुके लोकमें आनन्दका अनुभव करता है।

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गोप्रतारतीर्थकी महिमा और श्रीरामके परमधामगमनकी कथा

सरयू और घाघराके संगममें दस कोटिसहस्र | जो संगमपर श्रद्धापूर्वक सुवर्ण, अन्न और वस्त्र तथा दस कोटिशत तीर्थ हैं। उस संगमके जलमें | देता है, वह उत्तम गतिको प्राप्त होता है। संगममें स्नान करके एकाग्रचित्त हो देवताओं और पितरोंका | स्नान करनेवाला मनुष्य सात पीढ़ी पूर्वकी तथा तर्पण करे तथा अपनी शक्तिके अनुसार दान दे। | सात पीढ़ी भावी सन्तति इन सबको तार देता है। फिर वैष्णवमन्त्रसे हवन करके पवित्र होवे। | संगमके समीप ही एक दूसरा गोप्रतार नामक अमावास्या, पूर्णिमा, दोनों द्वादशी तिथि, अयन | तीर्थ है। वह भी बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला और व्यतीपातयोग आनेपर संगममें किया हुआ | है। उसमें स्नान और दान करनेसे मनुष्य कभी स्नान विष्णुलोक प्रदान करनेवाला है। विष्णुभक्त | शोकके वशीभूत नहीं होता है। जैसे काशीमें पुरुष भगवान् विष्णुकी पूजा करके उन्हींकी लीला- | मणिकर्णिका, उज्जयिनीमें महाकाल-मन्दिर तथा कथाका श्रवण करते हुए विष्णुप्रीतिकारक गीत, | नैमिषारण्यमें चक्रवापीतीर्थ सबसे श्रेष्ठ है, उसी वाद्य, नृत्य तथा पुण्यमयी कथा-वार्ताके द्वारा | प्रकार अयोध्यामें गोप्रतार-तीर्थका महत्त्व सबसे रात्रिमें जागरण करे। तत्पश्चात् प्रातःकाल विधिपूर्वक | अधिक है, जहाँ भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे श्रद्धासे स्नान करके भगवान् विष्णुका पूजन करे | समस्त साकेतनिवासियोंको उनके दिव्य धामकी और ब्राह्मणोंको यथाशक्ति सुवर्ण आदि दान करे। | प्राप्ति हुई थी।

  • वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५२१

पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने आलस्यहीन होकर देवताओंका कार्य पूरा करके अपने भाइयोंके साथ परम धाममें जानेका विचार किया। गुप्तचरोंके मुँहसे यह समाचार सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर, भालु, गोपुच्छ एवं राक्षस झुंड-के-झुंड वहाँ आये। वानरगण देवताओं, गन्धर्वों तथा ऋषियोंके पुत्र थे। वे सब-के-सब श्रीरामचन्द्रजीके अन्तर्धान होनेका समाचार पाकर वहाँ आ पहुँचे। श्रीरामचन्द्रजीके समीप आकर सब वानर यूथपतियोंने कहा—'राजन्! हम सब लोग आपके साथ चलनेके लिये आये हैं। पुरुषोत्तम! यदि आप हमें छोड़कर चले जायँगे तो हम सब लोग महान् दण्डसे मारे गये प्राणियोंकी-सी अवस्थामें पहुँच जायँगे।' उन वानर, भालु और राक्षसोंकी बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उसी क्षण विभीषणसे कहा—'विभीषण! जबतक भूतपर प्रजा रहे, तबतक तुम भी यहीं रहकर लंकाके महान् साम्राज्यका पालन करो। मेरा वचन अन्यथा न करो।' विभीषणसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीरामचन्द्र हनुमान्‌जीसे बोले—'वायुनन्दन! तुम चिरजीवी रहो। कपिश्रेष्ठ! जबतक लोग मेरी कथा कहें, तबतक तुम प्राणोंको धारण करो। मयंद और द्विविद—ये दोनों अमृतभोजी वानर हैं। ये दोनों तबतक इस पृथ्वीपर जीवित रहें, जबतक कि सम्पूर्ण लोकोंकी सत्ता बनी रहे। ये सभी वानर यहाँ रहकर मेरे पुत्र-पौत्रोंकी रक्षा करते रहें।'

ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजीने शेष वानरोंसे कहा—'तुम सब लोग मेरे साथ चलो।' तदनन्तर रात बीतनेपर जब प्रातःकाल हुआ, तब विशालवक्ष और कमलदलके समान नेत्रोंवाले महाबाहु श्रीराम अपने पुरोहित वशिष्ठजीसे बोले—'भगवन्! प्रज्वलित अग्निहोत्रकी अग्नि आगे चले। वाजपेय यज्ञ और अतिरात्र यज्ञकी अग्नि भी आगे-आगे ले जायी जाय।' तब महातेजस्वी वशिष्ठजीने अपने मनमें सब बातोंका निश्चय करके विधिपूर्वक महाप्रस्थान-कालोचित कर्म किया। तदनन्तर ब्रह्मचर्यपूर्वक रेशमी वस्त्र धारण किये भगवान् श्रीराम दोनों हाथोंमें कुश लेकर महाप्रस्थानको उद्यत हुए। वे नगरसे बाहर निकलकर शुभ या अशुभ कोई वचन नहीं बोले। भगवान् श्रीरामके वामपार्श्वमें हाथमें कमल लिये लक्ष्मीजी खड़ी हुईं और दाहिने पार्श्वमें विशाल नेत्रोंवाली लज्जा देवी उपस्थित हुईं। आगे मूर्तिमान् व्यवसाय (उद्योग एवं दृढ़निश्चय) विद्यमान था। धनुष, प्रत्यंचा और बाण आदि नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र पुरुषशरीर धारण करके भगवान्‌के पीछे-पीछे चले। ब्राह्मणरूपधारी वेद वामभागमें और गायत्री दक्षिण भागमें स्थित हुई। ॐकार, वषट्कार सभी श्रीरामचन्द्रजीके साथ चले। ऋषि, महात्मा और पर्वत सभी स्वर्गद्वारपर उपस्थित भगवान् श्रीरामके पीछे-पीछे चले। अन्तःपुरकी स्त्रियाँ वृद्ध, बालक, दासी और द्वाररक्षक सबको साथ लेकर श्रीरामचन्द्रजीके साथ प्रस्थित हुईं। रनिवासकी स्त्रियोंको साथ ले शत्रुघ्नसहित भरत भी चले। रघुकुलसे अनुराग रखनेवाले महात्मा ब्राह्मण भी स्त्री, पुत्र और अग्निहोत्रसहित जाते हुए श्रीरामचन्द्रजीके पीछे-पीछे चले। मन्त्री भी सेवक, पुत्र, बन्धु-बान्धव तथा अनुगामियोंसहित श्रीरामचन्द्रजीके पीछे गये। भगवान्‌के गुणोंसे सतत प्रसन्न रहनेवाली अयोध्याकी सारी प्रजा हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे घिरी हुई श्रीरामचन्द्रजीका अनुगमन करनेके लिये घरसे चल दी। उस समय वहाँ कोई दीन, भयभीत अथवा दुःखी नहीं था, सभी हर्ष और आनन्दमें मग्न थे। अयोध्यामें उस समय कोई अत्यन्त सूक्ष्म प्राणी भी ऐसा नहीं था जो स्वर्गद्वारके समीप खड़े हुए श्रीरामचन्द्रजीके पीछे न गया हो। वहाँसे

५२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


आधा योजन दक्षिण जाकर भगवान् पश्चिमकी ओर मुख करके चलने लगे। आगे जाकर रघुनाथजीने पुण्यसलिला सरयूका दर्शन किया। उस समय सब देवताओं तथा महात्मा ऋषियोंसे घिरे हुए लोकपितामह ब्रह्माजी श्रीरामचन्द्रजीके समीप आये। उनके साथ सौ कोटि दिव्य विमान भी थे। वे उस समय आकाशको सब ओरसे तेजोमय एवं प्रकाशित कर रहे थे। वहाँ परम पवित्र सुगन्धित एवं सुखदायिनी वायु चलने लगी। श्रीरामचन्द्रजीने अपने चरणोंसे सरयूजीके जलका स्पर्श किया।

तदनन्तर ब्रह्माजी देवताओंके साथ श्रीरामचन्द्रजीकी स्तुति करने लगे—देव! आप समस्त लोकोंके पति हैं, आपके स्वरूपको कोई नहीं जानता। विशाललोचन! आप अचिन्त्य एवं अविनाशी ब्रह्मरूप हैं। महावीर्य! आप अपने जिस दिव्य स्वरूपको ग्रहण करना चाहें ग्रहण करें। ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीरामने अपने भाइयोंसहित दिव्य वैष्णवतेजमें सशरीर प्रवेश किया। तत्पश्चात् सुरश्रेष्ठ भगवान् विष्णुका सब देवताओंने पूजन किया। देवताओंका मनोरथ पूर्ण हुआ था; इसलिये वे सब बहुत प्रसन्न थे। उस समय महातेजस्वी भगवान् विष्णुने पितामह ब्रह्मासे कहा—'सुव्रत! इस जनसमुदायको तुम्हें उत्तम लोक देना चाहिये।' भगवान्‌का यह आदेश पाकर सर्वलोकेश्वर ब्रह्माने कहा—'वे समस्त मानव सान्तानिक लोकमें निवास करेंगे। स्वर्गद्वार तीर्थमें श्रीरामचन्द्रजीका चिन्तन करते हुए जो प्राणत्याग करता है वह परम उत्तम सान्तानिक लोकको प्राप्त होता है। सान्तानिक लोक मेरे लोकसे भी ऊपर है। वानर आदिमेंसे जो जिस देवताके अंश थे, वे उसीमें मिलेंगे। सूर्यपुत्र सुग्रीव सूर्यमण्डलमें चले जायँगे। ऋषि, नाग और यक्ष सभी अपने-अपने कारणको प्राप्त होंगे।'

देवेश्वर ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर गोप्रतारतीर्थमें उपस्थित जल सरयूको प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् वहाँ सरयूजल परिपूर्ण हो गया। फिर तो सबने जलमें डुबकी लगायी और हर्षपूर्वक प्राणत्याग करके मनुष्य-शरीरको त्याग दिया तथा विमानोंपर बैठकर दिव्यलोकको प्रस्थान किया। पशु-पक्षी आदिकी योनिमें जो जीव थे, वे भी सरयूमें प्रवेश करके शरीर त्यागकर दिव्यरूपधारी हो गये। इसी प्रकार अन्य चराचर प्राणी भी उत्तम शरीर पाकर देवलोक (सान्तानिक)-में गये। भगवान् श्रीराम देवताओंके साथ परमधामको गये। अतः सबको तारनेवाला वह तीर्थ 'गोप्रतार' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। गोप्रतारतीर्थमें उत्तम मोक्ष प्राप्त होता है। गोप्रतारतीर्थमें निःसन्देह भगवान् विष्णु स्थित हैं। उसमें जो स्नान करता है, वह निश्चय ही योगियोंके लिये भी दुर्लभ परम धामको प्राप्त होता है। जितेन्द्रिय मनुष्योंको वहाँ विशेषरूपसे कार्तिककी पूर्णिमामें स्नान करना चाहिये। नियमपूर्वक व्रत पालन करनेवाले श्रद्धालु पुरुषोंको भगवान् विष्णुके उद्देश्यसे वहाँ स्नानपूर्वक ब्राह्मणोंका विशेषरूपसे पूजन करना चाहिये तथा श्रीहरिकी प्राप्तिके लिये बड़ी भक्तिके साथ नाना प्रकारके अन्न, सुवर्ण और भाँति-भाँतिके वस्त्र दान करना चाहिये। इस प्रकार पुण्यात्मा पुरुष उत्तम विधिसे गोप्रतारतीर्थमें यत्नपूर्वक स्नान करके आदरपूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करनेपर समस्त पाप-तापसे रहित हो उन्हींके सायुज्यको प्राप्त होता है।

  • वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५२३

क्षीरोदकतीर्थ, बृहस्पतिकुण्ड, रुक्मिणी आदि कुण्डोंका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं—सीताकुण्डसे वायव्य कोणमें क्षीरोदक नामक तीर्थ है, जो सब दुःखोंका नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें राजा दशरथने वहीं पुत्रके लिये पुत्रेष्टि नामक यज्ञ किया था। यज्ञके अन्तमें वहाँ भगवान् अग्निदेव अपने हाथमें हविष्यसे भरा हुआ सोनेका पात्र लिये दृष्टिगोचर हुए थे। उस हविष्यमें परम उत्तम विष्णुतेज व्याप्त था। राजाने उसके चार भाग करके अपनी पत्नियोंको बाँट दिया। जहाँ उस क्षीर (खीर या हविष्य)-की प्राप्ति हुई, वहीं क्षीरोदक नामवाला तीर्थ प्रसिद्ध हुआ। जितेन्द्रिय पुरुष उस तीर्थमें आदरपूर्वक स्नान करके सम्पूर्ण भोगों और बहुज्ञ पुत्रोंको प्राप्त करता है। आश्विन शुक्ला एकादशीको व्रतका पालन करनेवाला पुरुष वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके ब्राह्मणको यथाशक्ति दान दे। इससे वह सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है। उस क्षीरोदक स्थानसे नैर्ऋत्यकोणमें बृहस्पतिका कुण्ड प्रसिद्ध है। वह सब पापोंका नाशक तथा पवित्र जलकी तरंगोंसे सुशोभित है, जहाँ साक्षात् बृहस्पतिजीने निवास किया है। वह तीर्थ सघन पत्तोंकी छायासे सुशोभित एवं नाना प्रकारके फल देनेवाला है। पापियोंके लिये वह दुर्लभ है। भादोंके शुक्ल पक्षकी पंचमी तिथिमें वहाँकी यात्रा फलदायिनी होती है। अन्य समयमें भी बृहस्पतिके दिन उसमें किया हुआ स्नान बहुत फलदायक है। जो मनुष्य वहाँ भगवान् विष्णु तथा बृहस्पतिका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो वैकुण्ठधाममें आनन्दका अनुभव करता है।

उसके दक्षिण भागमें परम उत्तम रुक्मिणीकुण्ड है, जिसे श्रीकृष्णकी प्रियतमा महारानी रुक्मिणी देवीने स्वयं निर्माण कराया था। उस समय भगवान् विष्णुने स्वयं ही उस कुण्डके जलमें निवास किया। पत्नीके स्नेहसे वर देकर भगवान्ने उस कुण्डके महत्त्वको और बढ़ा दिया है। मनुष्यको चाहिये कि वह मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर वहाँ स्नान, दान, वैष्णवमन्त्रसे होम, ब्राह्मणपूजन तथा भगवान् विष्णुका अर्चन करे। कार्तिक कृष्णा नवमीको वहाँकी वार्षिक यात्रा करनी चाहिये। इससे सब पापोंका नाश होता है। यात्रा करनेवाला मनुष्य रुक्मिणी और श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये अपनी शक्तिके अनुसार दान दे। वहाँ शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण करनेवाले भगवान् लक्ष्मीपतिका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये—भगवान्‌के श्रीअंगोंमें पीताम्बर शोभा पा रहा है। वे वनमाला पहने हुए हैं और नारद आदि ऋषि उनकी स्तुति करते हैं। मस्तकपर मुकुट शोभा पा रहा है तथा वे इन्द्रनीलमणि आदि दिव्य रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित हैं। वक्षःस्थलमें कौस्तुभमणि प्रकाशित हो रही है, जो समस्त कामनाओं एवं फलकी प्राप्ति करानेवाली है। भगवान्‌की अंगकान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम है। उनके नेत्र कमलदलके समान परम सुन्दर हैं। इस प्रकार ध्यान करनेपर मनुष्य निःसन्देह सम्पूर्ण मनोरथोंको पा लेता है और इहलोकमें सुख भोगकर भगवान्‌के लोकमें आनन्दका अनुभव करता है।

रुक्मिणीकुण्डके वायव्य कोणमें 'धनयक्ष' नामसे प्रसिद्ध उत्तम तीर्थ है। पूर्वकालकी बात है विश्वामित्र मुनिने राजसूय यज्ञ करनेवाले राजा हरिश्चन्द्रसे (दानमें) सारा राज्य ले लिया। तत्पश्चात् वह सब राज्य और धन एक यक्षके संरक्षणमें दे दिया। किसी समय परम बुद्धिमान् विश्वामित्र मुनि उस यक्षपर प्रसन्न हुए और बोले—'यक्ष! यह तीर्थ 'धनयक्ष' के नामसे प्रसिद्ध होगा। यहाँ नवों निधियोंका पूजन करनेसे मनुष्य इहलोकमें सुख और परलोकमें आनन्दका अनुभव करता है। महापद्म, पद्म, शंख, मकर,

५२४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और खर्व—ये नौ निधियाँ हैं*। इन सबका इस कुण्डमें निवास होगा। यहाँ जलमें निधि-लक्ष्मीका पूजन करना चाहिये। माघ कृष्णा चतुर्दशीको यहाँकी वार्षिक यात्रा होनी चाहिये। उस समय स्नान और पितृतर्पण विशेषरूपसे करने चाहिये।'

धनयक्षतीर्थसे उत्तर दिशामें वशिष्ठकुण्ड नामक विख्यात तीर्थ है, जो सदा सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ तपोनिधि वशिष्ठ और निर्मल व्रतवाली अरुन्धतीजीका नित्य निवास है। उसमें आलस्य छोड़कर जो बुद्धिमान् पुरुष स्नान और विशेषरूपसे श्राद्ध करता है, उसे उत्तम पुण्यकी प्राप्ति होती है। वहाँ वशिष्ठ और वामदेवजीका यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। पतिव्रता अरुन्धती देवी वहाँ विशेषरूपसे पूजनीय हैं। उस तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान और यथाशक्ति दान करना चाहिये। जो उसमें स्नान करता है, वह वशिष्ठके समान होता है। भाद्रमासकी शुक्ला पंचमीको विधिपूर्वक मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए वहाँकी वार्षिक यात्रा करनी चाहिये और प्रयत्नपूर्वक श्रद्धासे भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष सब पापोंसे शुद्धचित्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है।

वशिष्ठकुण्डसे पश्चिम दिशामें सागरकुण्डके नामसे विख्यात एक तीर्थ है, जो सम्पूर्ण कामनाओं और मनोरथोंकी सिद्धि देनेवाला है। उसमें स्नान और दान करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। सागरसे नैर्ऋत्यकोणमें उत्तम योगिनीकुण्ड है, जहाँ जलमें चौंसठ योगिनियाँ निवास करती हैं। वे पुरुषोंका सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध करती हैं और स्त्रियोंको विशेषरूपसे उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं। वे सब-की-सब समस्त मनोवांछित फलोंको देनेवाली हैं। योगिनीकुण्डसे पूर्व परम उत्तम उर्वशीकुण्ड है, जिसमें स्नान करनेवाला पुरुष स्वर्गमें उर्वशीको प्राप्त करता है। यहाँ स्नान करके मनुष्योंको भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये। ऐसा करनेवाला विद्वान् मनुष्य सदैव विष्णुलोकमें निवास करता है। वह स्त्री हो या पुरुष, सब मनोरथोंको पाता है। उर्वशीकुण्डके दक्षिणभागमें उत्तम घोषार्ककुण्ड है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। घावसे युक्त, कोढ़ी, निर्धन अथवा दुःखसे घिरा हुआ जो कोई भी मनुष्य वहाँ विधिपूर्वक स्नान करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। विशेषतः रविवारको वहाँ आदरपूर्वक स्नान करना चाहिये। रविवारके साथ यदि सप्तमी तिथिका भी योग हो तो वहाँका स्नान बहुत फलदायक होता है। घोष नामक एक राजाने किसी समय उस तीर्थमें स्नान और सन्ध्या करते हुए मुनियोंको देखा। तब उसने भी विधिपूर्वक आचमन करके स्नान किया। स्नान करते ही राजाका शरीर दिव्य हो गया। उनका मन आनन्दसे परिपूर्ण हो गया। तब मुनियोंसे उस तीर्थकी महिमा जानकर राजाने सूर्यदेवकी प्रसन्नताके लिये स्तुति की।

राजा बोले—देवदेवेश्वर! भगवान् सूर्य! आपका स्वरूप सच्चिदानन्दमय है, आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण जगत्‌को उत्पन्न करनेवाले तथा जगत्‌को आनन्द देनेवाले सूर्यदेवको नमस्कार है। आप प्रभाके निकेतन तथा दिव्यरूपधारी हैं। तीनों वेद आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। योगके ज्ञाता एवं सत्स्वरूप आप भगवान् विवस्वान्‌को नमस्कार है। आप सबसे परे हैं, परमेश्वर हैं और त्रिलोकीका अन्धकार नष्ट करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आपका स्वरूप अचिन्त्य है, आप प्रभा फैलानेवाले तेजसे सम्पन्न हैं, आपको सदा नमस्कार हैं। आप योगप्रिय, योगस्वरूप और योगज्ञ हैं, आपको


* महापद्मस्तथा पद्मः शंखो मकरकच्छपौ। मुकुन्दकुन्दनीलाश्च खर्वश्च निधयो नव॥ (स्क० पु०, वै० अ० मा० ७।५१)

* वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५२५

सदैव नमस्कार है। आप ओंकाररूप, वषट्कारस्वरूप और ज्ञानरूप हैं, आपको नमस्कार है। यज्ञ, यजमान, हविष्य तथा ऋत्विज सब कुछ आप हैं, आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण रोगोंके नाशक, आत्मस्वरूप तथा कमलोंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप अत्यन्त कोमल और अतिशय तीक्ष्ण हैं, सम्पूर्ण देवताओंका पालन करनेवाले आपको नमस्कार है। आप यज्ञभोक्ता, भक्तरक्षक तथा प्रियस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप निरन्तर प्रकाश देनेवाले और समस्त लोकोंके हितकारी हैं, आपको नमस्कार है। मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करनेवाला शरणागत भक्त हूँ। प्रभो! आज मुझपर प्रसन्न होइये।

इस प्रकार स्तुति करते हुए अपने भक्त राजा घोषपर भगवान् सूर्य प्रसन्न हो गये और भक्तका प्रिय करनेकी इच्छासे सहसा प्रकट होकर बोले— 'राजेन्द्र! तुमने जो यह स्तवन किया है, इसे जो मनुष्य पढ़ेंगे, उनपर प्रसन्न होकर मैं उनके सब मनोरथोंको पूर्ण करूँगा। यह स्थान आजसे इस पृथ्वीपर तुम्हारे ही नामसे विख्यात होगा। जो यहाँ स्नान करेगा, वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेगा। इस प्रकार वरदान देकर भगवान् सूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। राजाने भगवान् सूर्यके शरीरसे प्रकट हुई दिव्य सूर्यमूर्ति लेकर वहाँ उसको स्थापित किया और स्वयं ही उसकी पूजा की। अतः राजा घोषके नामपर उस तीर्थका नाम घोषार्ककुण्ड हुआ।

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अयोध्याक्षेत्रके अन्य विविध तीर्थोंका वर्णन तथा वसिष्ठके मुखसे विभीषण आदिका अयोध्या-माहात्म्य-श्रवण

घोषार्कतीर्थसे पश्चिम दिशामें रतिकुण्ड नामक प्रसिद्ध तीर्थ है, जो सब पापोंको हरनेवाला है। उससे पश्चिम कुसुमायुधकुण्ड है, जो समस्त मनोरथोंकी सिद्धिके लिये प्रसिद्ध है। जो पति-पत्नी इन दोनों कुण्डोंमें स्नान करते हैं, वे रति और कामदेवके समान सुन्दर होते हैं। कुसुमायुधकुण्डसे पश्चिम दिशामें मन्त्रेश्वरतीर्थ है। उसमें स्नान करके जो भगवान् मन्त्रेश्वरका दर्शन करता है, वह परम गतिको पाता है। उसके उत्तर कुमुद और कमलोंसे सुशोभित एक सुन्दर सरोवर है,जिसमें किये हुए स्नान और दान अनेक प्रकारके फल देनेवाले हैं। चैत्र शुक्ला चतुर्दशीको वहाँकी वार्षिक यात्रा उत्तम मानी गयी है। मन्त्रेश्वरकी महिमाका कोई भी भलीभाँति वर्णन नहीं कर सकता। सुगन्धित पुष्प, धूप, चन्दन आदि उपचारोंसे उनका प्रयत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। वे सम्पूर्ण कामनाओं और प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाले हैं। उनके पूजनसे मुक्ति हो जाती है। वहीं पूर्व दिशामें महारत्ननामक तीर्थ है, जो सब तीर्थोंमें उत्तम है। उसमें स्नान, दान और ब्राह्मण-पूजन करनेसे
५२६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

समस्त कामनाओंकी सिद्धि होती है। भादों कृष्णा चतुर्दशीको वहाँकी वार्षिक यात्रा होती है। उससे नैर्ऋत्यकोणमें दुर्भर सरोवर है, जहाँ स्नान करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकको प्राप्त करता है। महारत्न और दुर्भर दोनों तीर्थोंमें भक्तिभावसे स्नान करके नीलकण्ठ महादेवजीका गन्ध-पुष्प आदिके द्वारा भलीभाँति पूजन करना चाहिये। पार्वतीसहित भगवान् शिवका ध्यान करके मनुष्य सब कामनाओंको शीघ्र पाकर सदैव शिवलोकमें निवास करता है। भादों कृष्णा चतुर्दशीको जो मनुष्य श्रद्धासहित विधिपूर्वक शिवपूजा तथा ब्राह्मणपूजा विशेषरूपसे करता है, वह शिवलोकमें निवास करता है। भगवान् विष्णु और शिव उसके ऊपर बहुत प्रसन्न होते हैं, जिनके स्मरणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।

दुर्भरस्थानसे ईशान कोणमें महाविद्या नामक महान् तीर्थ है। उसके दर्शनमात्रसे मनुष्योंके हाथमें सब सिद्धियाँ उपस्थित हो जाती हैं। महाविद्याके आगे सरोवरमें स्नान करके जो महाविद्याका श्रद्धा और भक्तिसे दर्शन करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। वहीं सुप्रसिद्ध सिद्धपीठ है। वहाँ उत्तम भक्तिसे पूजा करनी चाहिये। जो पवित्र मनुष्य वहाँ श्रद्धासे शिव, शक्ति, गणपति तथा भगवान् विष्णुके मन्त्रको एकाग्रचित्त होकर जपता है, उसको सदा सिद्धि प्राप्त होती है। आश्विन शुक्ल पक्षके नवरात्रमें वहाँकी यात्रा करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। उसके समीप ही क्षीरकुण्डमें दुग्धेश्वर नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिव विराजमान हैं। उस क्षीरसंगम कुण्डका सीताजीने बड़ा सत्कार किया है, इसलिये सीताकुण्डके नामसे भी उसकी प्रसिद्धि हुई है। सीताकुण्डमें स्नान करके सीता, राम, लक्ष्मण और दुग्धेश्वरनाथका पूजन करके मनुष्य सब मनोरथोंको पा लेता है। ज्येष्ठ मासकी चतुर्दशीको वहाँकी वार्षिक यात्रा सम्पन्न होती है। वहाँ पूर्व दिशामें सुग्रीवद्वारा निर्मित एक उत्तम तीर्थ है, जो तपोनिधितीर्थके नामसे विख्यात है। उसमें स्नान, दान करके श्रीरामचन्द्रजीका यत्नपूर्वक पूजन करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। उससे पश्चिम हनुमत्कुण्ड है और हनुमत्कुण्डके पश्चिम विभीषणकुण्ड है। उन दोनोंमें स्नान, दान और श्रीरामचन्द्रजीका पूजन करनेसे मनुष्य सब कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।

एक समय विभीषण आदिने मुनिवर वशिष्ठसे विनयपूर्वक पूछा—तपोनिधे! विद्वान् पुरुष अयोध्याका जो सर्वोत्तम माहात्म्य बतलाते हैं, उसका वर्णन कीजिये।

वशिष्ठजीने कहा—यह अयोध्या नामक उत्तम तीर्थ अत्यन्त गुप्त है। यह सदा सभी प्राणियोंके मोक्षका साधक है। इसमें सिद्ध और देवता भी वैष्णवव्रतका आश्रय लेकर नाना प्रकारके वेष धारण किये विष्णुलोककी अभिलाषासे नित्य निवास करते हैं। नाना प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त एवं अनेकानेक विहंगमोंके कलरवसे युक्त इस उत्तम तीर्थमें वे सिद्ध और देवता जितेन्द्रिय हो प्राणायामपूर्वक योगाभ्यास करते हैं। इस उत्तम क्षेत्रमें निवास करना भगवान् विष्णुको सदैव रुचिकर है। जिन्होंने अपने समस्त कर्म भगवान् विष्णुको समर्पित कर दिये हैं, वे विष्णुभक्त यहाँ मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। यहाँ भगवान् विष्णुका निवास है, इसलिये यह अयोध्या नामक महाक्षेत्र अत्यन्त उत्तम है। जो मोक्ष अन्यत्र दुर्लभ माना गया है, वही यहाँ सब सिद्धों और महर्षियोंको प्राप्त होता है। जिसका चित्त विषयोंमें आसक्त है और जिसने धर्मका अनुराग त्याग दिया है, ऐसा मनुष्य भी यदि इस क्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त हो तो वह पुनः संसार-बन्धनमें नहीं

  • वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५२७

पड़ता। सहस्रों जन्मोंतक योगाभ्यास करनेवाला योगी भी जिस मोक्षको नहीं पाता, उसीको यहाँ मृत्यु होनेसे मनुष्य प्राप्त कर लेता है। यह अयोध्या ही उत्तम स्थान है, यही परम पद है। यहाँ पुण्याभिलाषी पुरुषोंको विधिपूर्वक यात्रा करनी चाहिये। नियमपूर्वक स्नान और यथाशक्ति दान करना चाहिये। मनको वशमें करके पवित्र व्रतवाला पुरुष भलीभाँति यहाँकी यात्रा सम्पन्न करे। अयोध्यामें जहाँ कहीं भी मृत्युको प्राप्त होनेपर धीर पुरुष उत्तम मोक्षको पाता है।

वशिष्ठजीका कहा हुआ यह माहात्म्य सुनकर विभीषण आदि सब लोगोंका चित्त निर्मल हो गया।


गयाकूप आदि अनेक तीर्थोंका माहात्म्य तथा ग्रन्थका उपसंहार

वहाँसे आग्नेय कोणमें गयाकूप नामक तीर्थ प्रसिद्ध है, जो सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंको देनेवाला है। इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाला श्रेष्ठ द्विज उसमें स्नान करके यथाशक्ति दान दे और पितरोंका श्राद्ध करे तो वह सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है। उस तीर्थमें श्राद्ध करनेपर नरकमें पड़े हुए पितर और पितामह विष्णुलोकमें चले जाते हैं। सोमवती अमावास्या हो उस समय वहाँ पितरोंके उद्देश्यसे किया हुआ श्राद्ध अक्षय एवं अनन्त फल देनेवाला होता है। वहाँसे पूर्वभागमें पिशाचमोचन नामक सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है जो उत्तम फल देनेवाला है। उसमें स्नान और दान करनेसे मनुष्य पिशाच नहीं होता। अतः अगहनकी शुक्ला चतुर्दशीको वहाँ विशेषरूपसे स्नान करना चाहिये। पिशाचमोचनके पास ही पूर्वभागमें मानस नामक तीर्थ है। वहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य सब कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। मन, वाणी और शरीरमें जो कुछ पाप होता है वह सब मानसतीर्थमें स्नान करनेसे नष्ट हो जाता है। उससे दक्षिण दिशामें तमसा नामक नदी है, जिसमें किया हुआ स्नान और दान सब पापोंको हरनेवाला है। तमसाके सुन्दर तटपर पवित्रात्मा मुनियोंके अनेक स्थान हैं और माण्डव्य मुनिका भी पापनाशक आश्रम है। जहाँसे उत्तम तरंगोंवाली तमसा नदी प्रकट हुई है, वह वन अत्यन्त पवित्र है। उसके दर्शनसे मनुष्योंके सब पापोंका नाश हो जाता है। वह तीर्थ सब ओरसे मनोहर है। वहाँ माण्डव्य मुनिने बड़ी भारी तपस्या की, जिसके प्रभावसे वह तीर्थ परम पावन हुआ है। वहाँ पहले गौतम ऋषिका परम पवित्र आश्रम था। च्यवन और पराशर मुनिका भी पूर्वकालमें वहाँ स्थान रहा है। इसमें किये हुए स्नान, दान और श्राद्धसे सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है। मार्गशीर्ष शुक्ल पक्षकी पूर्णिमामें वहाँका स्नान मनुष्योंके लिये विशेष फलकी प्राप्ति करानेवाला है। उसके उत्तर भागमें सुन्दर भरतकुण्ड है, जिसमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है। पूर्वकालमें रघुकुलमें उत्पन्न भरतजी वहीं नन्दिग्राममें निवास करते थे। श्रीरामवनवासके बाद निर्मल अन्तःकरणवाले भरतजी इन्द्रियोंको संयममें रखकर श्रीरामचन्द्रजीका हृदयमें ध्यान करते हुए वहीं रहकर प्रजाका पालन करते थे। उस कुण्डमें स्नान करनेसे बड़ा भारी पुण्य होता है। उसके पश्चिम भागमें अति उत्तम जटाकुण्ड है, जहाँ वनसे लौटनेपर श्रीराम आदिने अपनी जटाएँ कटवायी थीं। उनके जटा छोड़नेसे ही उसका नाम जटाकुण्ड हो गया। वह सब तीर्थोंमें उत्तम तीर्थ है। वहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य सब कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। पूर्वकुण्डोंमें श्रीभरतजीका पूजन करना चाहिये। जटाकुण्डमें सीता, राम और लक्ष्मणजीका पूजन करना उचित है। चैत्र कृष्णा चतुर्दशीको वहाँकी वार्षिक यात्रा होती है। इस प्रकार पूजन करके पुण्यात्मा मनुष्य विष्णुलोकमें निवास करता है।

५२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

इसके उत्तरमें वीर मत्तगजेन्द्रका शुभ सूचक स्थान है। उनके सामने जो सरोवर है, उसमें स्नान करके जो निश्चितरूपसे वहाँ निवास करता है, वह पूर्ण सिद्धिको पाता है। अयोध्याकी रक्षा करनेवाले वीर मत्तगजेन्द्र समस्त कामनाओंकी सिद्धि करनेवाले हैं। उसके पश्चिम भागमें परम पुरुषार्थी वीर पिण्डारकका स्थान है। सरयूके जलमें स्नान करके वीर पिण्डारककी पूजा करे। वे पापियोंको मोहनेवाले और पुण्यात्माओंको सदा सद्बुद्धि प्रदान करनेवाले हैं। पिण्डारकके पश्चिम भागमें विघ्नेश्वर (गणेश)-जीकी पूजा करे। उनके दर्शन करनेसे मनुष्योंको लेशमात्र विघ्नका भी सामना नहीं करना पड़ता।

विघ्नेशसे ईशान कोणमें श्रीरामजन्म-स्थान है। इसे ‘जन्म-स्थान’ कहते हैं। यह मोक्षादि फलोंकी सिद्धि करनेवाला है। विघ्नेशसे पूर्व, वशिष्ठसे उत्तर तथा लोमशसे पश्चिम भागमें जन्मस्थान तीर्थ माना गया है। उसका दर्शन करके मनुष्य गर्भवासपर विजय पा लेता है। रामनवमीके दिन व्रत करनेवाला मनुष्य स्नान और दानके प्रभावसे जन्म-मृत्युके बन्धनसे छूट जाता है। आश्रममें निवास करनेवाले तपस्वी पुरुषोंको जो फल प्राप्त होता है, सहस्रों राजसूय और प्रतिवर्ष अग्निहोत्र करनेसे जो फल मिलता है, जन्मस्थानमें नियममें स्थित पुरुषके दर्शनसे तथा माता, पिता और गुरुकी भक्ति करनेवाले सत्पुरुषोंके दर्शनसे मनुष्य जिस फलको पाता है, वही सब फल जन्मभूमिके दर्शनसे प्राप्त कर लेता है। सरयूका दर्शन करके भी मनुष्य उस फलको पा लेता है। एक निमेष या आधे निमेष भी किया हुआ श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान मनुष्योंके संसार-बन्धनके कारणभूत अज्ञानका निश्चय ही नाश करनेवाला है। जहाँ कहीं भी रहकर जो मनसे अयोध्याजीका स्मरण करता है, उसकी पुनरावृत्ति नहीं होती। सरयू नदी सदा मोक्ष देनेवाली है। यह जलरूपसे साक्षात् परब्रह्म है। यहाँ कर्मका भोग नहीं करना पड़ता। इसमें स्नान करनेसे मनुष्य श्रीरामरूप हो जाता है। पशु, पक्षी, मृग तथा अन्य जो पापयोनि प्राणी हैं, वे सभी मुक्त होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं, जैसा कि श्रीरामचन्द्रजीका वचन है। सत्यतीर्थ, क्षमातीर्थ, इन्द्रियनिग्रहतीर्थ, सर्वभूतदयातीर्थ, सत्यवादितातीर्थ, ज्ञानतीर्थ और तपस्तीर्थ—ये सात मानसतीर्थ कहे गये हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति दया करनारूप जो तीर्थ है, उसमें मनकी विशेष शुद्धि होती है। केवल जलसे शरीरको पवित्र कर लेना ही स्नान नहीं कहलाता। जिस पुरुषका मन भलीभाँति शुद्ध है, उसीने वास्तवमें तीर्थस्नान किया है*। भूमिपर वर्तमान जो तीर्थ हैं उनकी पवित्रताका कारण यह है। जैसे शरीरके कोई अंग मध्यम और कोई उत्तम माने गये हैं, उसी प्रकार पृथ्वीपर भी कुछ प्रदेश अत्यन्त पवित्र होते हैं। इसलिये भौम और मानस दोनों प्रकारके तीर्थोंमें निवास करना चाहिये। जो दोनोंमें स्नान करता है वह परमगतिको प्राप्त होता है। जलचर जीव जलमें ही जन्म लेते और जलमें ही मरते हैं, परंतु वे स्वर्गमें नहीं जाते; क्योंकि उनका मन अशुद्ध होता है और वे मलिन होते हैं। विषयोंमें निरन्तर राग होना मनका मल कहलाता है। उन्हीं विषयोंमें जब


* सत्यतीर्थं क्षमातीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः । सर्वभूतदयातीर्थं तीर्थानां सत्यवादिता ॥
ज्ञानतीर्थं तपस्तीर्थं कथितं तीर्थसप्तकम् । सर्वभूतदयातीर्थे विशुद्धिर्मनसो भवेत् ॥
न तोयपूतदेहस्य स्नानमित्यभिधीयते । स स्नातो यस्य वै पुंसः सुविशुद्धं मनो मतम् ॥
(स्क० पु०, वै० अ० मा० १०। ४६-४८)

* वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य *५२९

आसक्ति न रह जाय, तब उसे मनकी निर्मलता कहते हैं। यदि मनुष्य भावसे निर्मल है—उसके अन्तःकरणमें शुद्ध भाव है तो उसके लिये दान, यज्ञ, तप, शौच, तीर्थसेवा और वेदोंका अध्ययन—ये सभी तीर्थ हैं। इन्द्रियसमुदायको वशमें रखनेवाला पुरुष जहाँ निवास करता है, वहीं उसके लिये कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य और पुष्कर हैं। यह मानसतीर्थका लक्षण बतलाया गया, जिसमें स्नान करनेसे क्रियावान् पुरुषोंके सब कर्म सफल होते हैं।

बुद्धिमान् मनुष्य प्रातःकाल उठकर संगममें स्नान करे, फिर भगवान् विष्णुहरिका दर्शन करके ब्रह्मकुण्डमें स्नान करे। तत्पश्चात् चक्रतीर्थमें स्नान करके मनुष्य भगवान् चक्रहरिका दर्शन करे। उसके बाद धर्महरिका दर्शन करके वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। प्रत्येक एकादशीको यह यात्रा शुभकारक होती है।

बुद्धिमान् पुरुष प्रातःकाल उठकर स्वर्गद्वारके जलमें गोता लगावे। फिर नित्य कर्म करके अयोध्यापुरीका दर्शन करे। तत्पश्चात् पुनः सरयूका दर्शन करके वीर मत्तगजेन्द्र, वन्दीदेवी, शीतलादेवी और वटुकभैरवका दर्शन करे। उनके आगे सरोवरमें स्नानकर महाविद्याका दर्शन करे। तत्पश्चात् पिण्डारकका दर्शन करे। अष्टमी और चतुर्दशीको यह यात्रा फलवती होती है। अंगारक चतुर्थीको पूर्वोक्त देवताओंके साथ-साथ समस्त कामनाओंकी सिद्धिके लिये विघ्नेशका भी दर्शन करे।

पूर्ववत् प्रातःकाल उठकर बुद्धिमान् पुरुष ब्रह्मकुण्डके जलमें स्नान करे। फिर विष्णु और विष्णुहरिका दर्शन करके मनुष्यके मन, वाणी और शरीरकी शुद्धि होती है। उसके बाद मन्त्रेश्वर और महाविद्याका दर्शन करे। तत्पश्चात् सब कामनाओंकी सिद्धिके लिये अयोध्याका दर्शन करके जितेन्द्रिय पुरुष स्वर्गद्वारमें वस्त्रसहित स्नान करे। उससे मनुष्यके अनेक जन्मोंके उपार्जित नाना प्रकारके पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिये वस्त्रसहित स्नान अवश्य करे। यह यात्रा सब पापोंका नाश करनेवाली बतायी गयी है। जो प्रतिदिन इस प्रकार शुभ फल देनेवाली यात्रा करता है, उसकी सौ कोटि कल्पोंमें भी पुनरावृत्ति नहीं होती। अयोध्यापुरी सर्वोत्तम स्थान है। यह भगवान् विष्णुके चक्रपर प्रतिष्ठित है।

सूतजी कहते हैं— जो मनुष्य पवित्रचित्त होकर अयोध्याके इस अनुपम माहात्म्यका पाठ करता है अथवा जो श्रद्धासे इसको सुनता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। अतः मनुष्योंको सदा यत्नपूर्वक इसका श्रवण करना चाहिये। ब्राह्मणों तथा भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये और अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणके लिये सुवर्ण आदि देना चाहिये। पुत्रकी इच्छा रखनेवाला पुरुष इस माहात्म्यको सुनकर पुत्र पाता है और धर्मार्थीको धर्मकी प्राप्ति होती है। जो श्रेष्ठ मनुष्य अति विस्तृत विधानके साथ वर्णित इस धर्मयुक्त आदिक्षेत्रके उत्तम माहात्म्यका भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह लक्ष्मीसे सनाथ होकर संसारमें सब उत्तम भोगोंको भोगनेके पश्चात् भगवान् विष्णुके लोकमें निवास करता है।

श्रीअयोध्या-माहात्म्य सम्पूर्ण।

~~ ० ~~
वैष्णवखण्ड समाप्त
~~ ० ~~

११. ब्राह्मखण्ड (सेतुमाहात्म्य)

ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः

संक्षिप्त श्रीस्कन्दमहापुराण

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ब्राह्मखण्ड

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सेतु-माहात्म्य

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सेतुतीर्थ (रामेश्वर-क्षेत्र)-की महिमा

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये॥

'जिन्होंने श्वेत वस्त्र धारण कर रखा है, जिनका चन्द्रमाके समान गौर वर्ण है, चार भुजाएँ हैं और मुखपर प्रसन्नता छा रही है, ऐसे भगवान् विष्णुका सब विघ्नोंकी शान्तिके लिये ध्यान करना चाहिये।'

नैमिषारण्य तीर्थमें शौनक आदि ऋषि अष्टांगयोगके साधनमें तत्पर हो एकमात्र ब्रह्मज्ञानके साधनमें संलग्न थे। वे सभी महात्मा संसार-बन्धनसे मुक्ति चाहनेवाले थे। उनमें ममताका सर्वथा अभाव था। वे ब्रह्मवादी, धर्मज्ञ, किसीके दोष न देखनेवाले, सत्यव्रती, इन्द्रियसंयमी, क्रोधको जीतनेवाले तथा सब प्राणियोंके प्रति दया रखनेवाले थे। शौनक आदि महर्षि इस परम पवित्र मोक्षदायक नैमिषारण्यमें अतिशय भक्तिके साथ सनातनदेव भगवान् विष्णुकी पूजा करते हुए तपस्यामें लगे रहते थे। एक समय उन महात्माओंने उत्तम सत्संगका आयोजन किया। उसमें वे परम पुण्यमयी पापनाशक कथाएँ कहते और मुक्तिके उपायपर परस्पर प्रश्नोत्तर किया करते थे। उसी अवसरपर वहाँ व्यासजीके शिष्य महाविद्वान् पौराणिकोंमें श्रेष्ठ मुनिवर सूतजी आये। उन्हें देखकर शौनकादि महर्षियोंने अर्घ्य आदिके द्वारा उनका पूजन किया। जब वे सुखपूर्वक उत्तम आसनपर बैठे, तब महर्षियोंने उनसे पूछा—'सूतजी! जीवोंकी संसारसागरसे किस प्रकार मुक्ति होती है? भगवान् शिव अथवा विष्णुमें मनुष्योंकी भक्ति कैसे होती है? ये तथा अन्य सब बातें भी आप कृपा करके हमें बताइये।'

तब सूतजीने पहले अपने गुरु श्रीव्यासदेवजीको प्रणाम करके इस प्रकार कहना प्रारम्भ किया—'ब्राह्मणो! श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा बँधाये हुए सेतुसे जो परम पवित्र हो गया है, वह रामेश्वर नामक क्षेत्र सब तीर्थोंमें उत्तम है। उसके दर्शनमात्रसे संसारसागरसे मुक्ति हो जाती है। भगवान् विष्णु और शिवमें भक्ति तथा पुण्यकी वृद्धि होती है। सेतुका दर्शन करनेपर मनुष्य सब यज्ञोंका कर्ता माना गया है। उसने सब तीर्थोंमें स्नान और सब प्रकारकी तपस्याका अनुष्ठान कर लिया। सेतुमें स्नान करनेवाला पुरुष विष्णुधाममें जाकर वहीं मुक्त हो जाता है। सेतु, रामेश्वर-लिंग और गन्धमादनपर्वतका चिन्तन करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। द्विजवरो! जो सेतुकी

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५३१

बालुकाओंमें शयन करता है, उसकी धूलसे वेष्टित होता है, उसके शरीरमें बालूके जितने कण सटते हैं, उतनी ब्रह्महत्याओंका नाश हो जाता है। सेतुके मध्यवर्ती प्रदेशकी वायु जिसके सम्पूर्ण शरीरका स्पर्श करती है, उसके दस हजार सुरापानका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। पुत्र और पौत्रोंके द्वारा जिसकी हड्डी सेतुमें डाली गयी है, उसका दस हजार बार की हुई सुवर्णकी चोरीका पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है। जिस मनुष्यका स्मरण करके सेतुतीर्थमें कोई स्नान करता है, उसका भी महापातकियोंके संसर्गसे प्राप्त हुआ दोष तत्क्षण नष्ट हो जाता है। मार्गको नष्ट करनेवाला, केवल अपने लिये भोजन बनानेवाला, संन्यासियों और ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला, चाण्डालका अन्न खानेवाला और वेद बेचनेवाला—ये पाँच ब्रह्महत्यारे कहे गये हैं। जो ब्राह्मणोंको बुलाकर यह आशा देता है कि 'तुम्हें धन आदि दूँगा' और फिर यह कह देता है कि 'मेरे पास नहीं है' वह भी ब्रह्महत्यारा कहा गया है। जो जिससे धर्मका उपदेश ग्रहण करता है, वह उसीसे द्वेष करे या उसकी अवहेलना करे तो वह भी ब्रह्महत्यारा कहा गया है। जो पानी पीनेके लिये जलाशयकी ओर जाती हुई गौओंके समूहको रोक देता है, उसको भी ब्रह्मघाती कहा गया है। सेतुतीर्थमें आकर वे सभी अपनी पापराशिसे मुक्त हो जाते हैं। ब्रह्महत्यारोंके समान जो दूसरे पापी हैं, वे भी सेतुतीर्थमें आकर अपने पापोंसे छुटकारा पा जाते हैं। जो उपासनाका परित्याग करता, देवताका अन्न खाता, शराब पीता, शराब पीनेवाली स्त्रीसे संसर्ग रखता, वेश्याका अन्न खाता और किसी समुदाय अथवा संस्थाका अन्न भोजन करता है तथा जो पतितका अन्न खानेमें तत्पर रहता है, ये सभी सुरापी (शराब पीनेवाले) कहे गये हैं। ये सब कर्मोंसे बहिष्कृत हैं। ऐसे लोग भी सेतुतीर्थमें स्नान करनेसे पापरहित हो मुक्त हो जाते हैं। शराब पीनेवालेके समान अन्य जो पापी हैं, वे भी सेतुमें गोता लगानेसे पापमुक्त हो जाते हैं। कन्द, मूल, फल, कस्तूरी, रेशमी वस्त्र, दूध, चन्दन, कपूर, सुपारी, शहद, घी, ताँबा, काँस तथा रुद्राक्षकी चोरी करनेवाले मनुष्योंको सुवर्ण चुरानेवाला समझना चाहिये। वे सेतुक्षेत्रमें आकर मुक्त हो जाते हैं। अन्य प्रकारके चोर भी वहाँ स्नान करनेसे पापमुक्त होते हैं। बहिन, पुत्रवधू, रजस्वला स्त्री, भाईकी स्त्री, मित्रकी स्त्री, मदिरा पीनेवाली स्त्री, परायी स्त्री, हीन जातिकी स्त्री तथा अपने ऊपर विश्वास रखनेवाली स्त्रीके पास जब आसक्त पुरुष जाता है, तब वह गुरुशय्यागामी समझा जाने योग्य है। वह सब कर्मोंसे बहिष्कृत है। ये तथा और भी जो गुरुशय्यागामीके समान पापी हैं, वे सेतुतीर्थमें स्नान करके पापमुक्त हो जाते हैं। इन सबके साथ संसर्ग रखनेवाले जो पापी हैं, वे भी सेतुतीर्थके महास्नानसे पापरहित हो जाते हैं। सेतुतीर्थका स्नान अन्तःकरणको शुद्ध करनेवाला तथा मोक्ष देनेवाला है। पापनाशक सेतुतीर्थमें निष्कामभावसे किया हुआ स्नान मोक्ष देनेवाला है। जो मनुष्य धन-सम्पत्तिके उद्देश्यसे सेतुतीर्थमें स्नान करता है, वह प्रचुर सम्पत्ति पाता है और यदि वह आत्मशुद्धिके लिये स्नान करता है तो आत्मशुद्धिको पाता है। यदि स्वर्गीय सुख भोगनेके लिये स्नान करता है, तो उसे ही प्राप्त करता है और यदि मोक्षदायक सेतुतीर्थमें मुक्तिके लिये स्नान करे, तो मनुष्य पुनरावृत्तिरहित मुक्तिको पाता है। जो अंगोंसहित चारों वेदोंके ज्ञानमें पारंगत होने, समस्त शास्त्रोंकी विद्वत्ता और सम्पूर्ण मन्त्रोंकी अभिज्ञता प्राप्त करनेके उद्देश्यसे सर्वार्थसिद्धिदायक सेतुतीर्थमें स्नान करता है, वह उस मनोवांछित सिद्धिको अवश्य प्राप्त होता है। श्रद्धालु मनुष्य हो या श्रद्धाहीन, यदि वह सेतुतीर्थमें स्नान करता है तो इहलोक और

५३२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

परलोकमें कभी दुःखका भागी नहीं होता। संसारमें कामधेनु, चिन्तामणि तथा कल्पवृक्ष जिस प्रकार मनुष्योंको अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करते हैं, वैसे ही सेतुस्नान मनुष्योंके सब मनोरथ पूर्ण करता है। जो मनुष्य सेतुतीर्थमें जानेवाले पुरुषको धन-धान्य अथवा वस्त्र आदि देकर उसमें प्रवृत्त कराता है, वह अश्वमेधादि यज्ञोंके उत्तम फलको पाता है। उसके ब्रह्महत्या आदि पापोंका नाश हो जाता है। जो मनुष्य 'मैं सेतुतीर्थमें जाऊँगा' ऐसा कहकर दूसरोंसे धन लेता है और लेकर लोभवश नहीं जाता, उसको ब्रह्मघाती कहते हैं। जो सम्पन्न होकर भी दरिद्रकी भाँति सेतुतीर्थमें जानेके लिये लोभवश धनकी याचना करता है, उसे विद्वानोंने चोर कहा है। जिस किसी उपायसे हो सके, मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक सेतुतीर्थकी यात्रा करे। जो वहाँतक जानेमें असमर्थ हो, वह ब्राह्मणको दक्षिणा देकर उससे वहाँकी यात्रा करवावे।


सेतुबन्धकी कथा तथा सेतुमें स्थित मुख्य-मुख्य तीर्थोंके नाम

ऋषियोंने पूछा—महाभाग सूतजी! अनायास ही सब कार्य करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने अगाध समुद्रमें किस प्रकार सेतु बाँधा? सेतुतीर्थमें एवं गन्धमादन पर्वतपर कितने तीर्थ हैं? ये सब हमें बताइये।

श्रीसूतजीने कहा—मुनिवरो! पिताकी आज्ञासे भगवान् श्रीराम सीताजी और लक्ष्मणके साथ दण्डकारण्यके अन्तर्गत पंचवटीमें एकाग्रचित्त होकर निवास करते थे। वहाँ रहते हुए महात्मा रघुनाथजीकी पत्नी सीताको मारीचद्वारा छल करके रावणने हर लिया। दशरथनन्दन श्रीराम उस वनमें अपनी पत्नी सीताकी खोज करते हुए किष्किन्धामें पम्पासरोवरके तटपर गये। वहाँ उन्हें कोई वानर दिखायी दिया। उस वानरने निकट आकर श्रीरामचन्द्रजीसे पूछा—'आप कौन हैं?' तब उन्होंने अपना सब वृत्तान्त प्रारम्भसे ही उसको कह सुनाया। तत्पश्चात् श्रीरामने भी वानरसे पूछा—'तुम कौन हो?' तब उसने महात्मा राघवेन्द्रको अपना परिचय इस प्रकार दिया—'मैं सुग्रीवका मन्त्री हनुमान् नामक वानर हूँ। सुग्रीवके भेजनेसे मैं यहाँ आया हूँ। वे आप दोनोंसे मित्रता करना चाहते हैं। आपका कल्याण हो, आप दोनों शीघ्र ही सुग्रीवके समीप चलें।' 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीरामचन्द्रजी हनुमान्जीके साथ सुग्रीवके समीप आये। सुग्रीवने उनके साथ अग्निको साक्षी देकर मित्रता स्थापित की। श्रीरामचन्द्रजीने उनसे बालिके वधकी प्रतिज्ञा की और सुग्रीवने विदेहराजनन्दिनी सीताको पुनः खोज लानेके लिये प्रतिज्ञा की। इस प्रकार प्रतिज्ञापूर्वक परस्पर विश्वास करके वे दोनों नरराज और वानरराज प्रसन्नतापूर्वक ऋष्यमूक पर्वतपर रहने लगे। श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवको अपनी शक्तिका विश्वास दिलानेके लिये दुन्दुभि दानवके शरीरको शीघ्र ही पैरके अंगूठेसे मारकर अनेक योजन दूर फेंक दिया तथा एक ही बाणसे सात ताल बींध डाले। यह सब देखकर सुग्रीवके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—'रघुनन्दन! मुझे इन्द्र आदि देवताओंसे भी भय नहीं है, क्योंकि आप-जैसे अत्यन्त पराक्रमी वीर मुझे मित्रके रूपमें प्राप्त हुए हैं। मैं लंकापति रावणको मारकर आपकी पत्नी सीताको यहाँ ले आऊँगा।'

तदनन्तर लक्ष्मण, सुग्रीव और महाबली श्रीरामचन्द्रजी बालिके द्वारा सुरक्षित किष्किन्धापुरीमें शीघ्रतापूर्वक गये। वहाँ बालिको युद्धके लिये बुलानेकी इच्छासे सुग्रीवने बड़ी भारी गर्जना की। अपने छोटे भाईकी वह गर्जना बालि नहीं सह सका। वह अन्तःपुरसे बाहर निकला और सुग्रीवसे भिड़ गया। बालिके मुक्केकी मारसे आहत हो सुग्रीव बहुत व्याकुल हो गये और शीघ्र ही वहाँ चले

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५३३

गये, जहाँ महाबली श्रीरामचन्द्रजी खड़े थे। तब महाबाहु श्रीरामने सुग्रीवके गलेमें पहचाननेके लिये चिह्नस्वरूप एक लता बाँध दी और पुनः युद्धके लिये भेजा। सुग्रीवने फिर गर्जना करके बालिको ललकारा तथा श्रीरामचन्द्रजीकी प्रेरणासे उसके साथ बाहुयुद्ध प्रारम्भ किया। इसी समय राघवेन्द्रने एक ही बाणसे बालिको मार डाला। उसके मारे जानेपर सुग्रीवने किष्किन्धाके राज्यपर अधिकार पाया। तत्पश्चात् वर्षा बीत जानेपर वानरराज सुग्रीव सीताको खोज लानेके लिये वानरोंकी विशाल सेना साथ लेकर राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मणके समीप आये। सीताकी खोजके लिये उन्होंने बहुत-से वानरोंको इधर-उधर भेजा। वायुपुत्र हनुमान्‌जीने लंकामें जाकर विदेहनन्दिनी सीताका पता लगाया और वहाँसे लौटकर सीताकी दी हुई चूड़ामणि श्रीरामचन्द्रजीको भेंट की। उसे पाकर श्रीरामचन्द्रजीको हर्ष तथा शोक दोनों हुआ।

तत्पश्चात् सुग्रीव, लक्ष्मण, हनुमान् तथा जाम्बवान् और नल आदि अन्य वानर वीरोंके साथ श्रीरघुनाथजीने अभिजित् मुहूर्तमें यात्रा की और अनेक प्रकारके देशोंको लाँघकर वे महेन्द्रपर्वतपर जा पहुँचे। वहाँ चक्रतीर्थमें जाकर उन सबने निवास किया। वहीं राक्षसराज रावणके भाई धर्मात्मा विभीषण आकर श्रीरामचन्द्रजीसे मिले। महामना श्रीरामने स्वागतपूर्वक उन्हें ग्रहण किया। उस समय सुग्रीवके मनमें यह शंका हुई कि 'हो न हो, यह कोई गुप्तचर है।' परंतु राघवेन्द्रने विभीषणकी उत्तम चेष्टाओं और हितकारक चरित्रोंसे ही यह समझ लिया कि इसके मनमें कोई दुष्टता नहीं है। तभी उन्होंने विभीषणका स्वागत-सत्कार किया तथा उन्हें समस्त राक्षसोंके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। श्रीरामने सूर्यनन्दन सुग्रीवको अपना श्रेष्ठ मन्त्री नियुक्त किया और कुछ विचार करते हुए सुग्रीव आदिसे कहा—'मित्रो! आपने इस समुद्रको लाँघनेके लिये कौन-सा उपाय सोचा है?'

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार पूछनेपर सुग्रीव आदिने हाथ जोड़कर कहा—'भगवन्! हम सब लोग नाना प्रकारकी नावोंसे समुद्रको पार करेंगे।' तब विभीषणने कहा—'राजा सगरके पुत्रोंने वरुणके निवासभूत इस समुद्रको खोदा है, अतः श्रीरामचन्द्रजीको समुद्रकी शरणमें जाना चाहिये। ये सगरके कुटुम्बी हैं, अतः समुद्र इनका कार्य अवश्य सिद्ध करेगा।' यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने वानरोंको समझाते हुए कहा—'श्रेष्ठ वानरो! हमारी सेनाके लिये बहुत-सी नौकाएँ चाहिये, सो यहाँ उपस्थित नहीं हैं। यदि व्यापारी बनियोंकी नावें ले ली जायँ, तो उनकी बड़ी हानि होगी। हम-जैसे लोग यह अनुचित कार्य कैसे कर सकेंगे। हमारी सेनाका विस्तार बहुत अधिक है। यदि नावपर बैठकर या तैरकर समुद्रमें जायँ, तो यह छिद्र देखकर कोई भी शत्रु हमपर प्रहार कर सकता है। इसलिये तैरकर जाना या नावसे पार करना मुझे ठीक नहीं जँचता। विभीषणकी ही बात मुझे सुखदायक प्रतीत होती है। अतः मार्गकी सिद्धिके लिये मैं इस समुद्रकी उपासना करूँगा। यदि यह मार्ग नहीं दिखायेगा, तो अपने महान् अस्त्रोंसे इसे जलाकर राख कर दूँगा।'

ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ समुद्रके जलका स्पर्श करके तटपर बिछाये हुए कुशके आसनपर बैठे। श्रीरामचन्द्रजी नीतिके ज्ञाता और धर्मपरायण थे; उन्होंने समुद्रसे मार्गकी प्राप्तिके लिये तीन राततक उसकी उपासना की तथा यथायोग्य सामग्रियोंसे उसका पूजन भी किया। तथापि उसने अपने-आपको श्रीरामचन्द्रजीके सम्मुख प्रकट नहीं किया। इससे श्रीरामको समुद्रपर बड़ा क्रोध हुआ। उनकी आँखें लाल-लाल हो गयीं। उन्होंने पास ही बैठे हुए लक्ष्मणसे कहा—'सुमित्रानन्दन! आज मैं अपने बाणोंसे समुद्रनिवासी मगर आदि जल-जन्तुओंको छिन्न-भिन्न करते हुए सागरके जलको क्षणभरमें स्तब्ध कर दूँगा

५३४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

और शंख, शुक्ति, मछली, मगर आदिके सहित इस जलनिधिको अमोघ बाणोंद्वारा सुखा डालूँगा। मुझे क्षमायुक्त देखकर यह असमर्थ समझने लगा। शान्तिपूर्ण ढंगसे प्रार्थना करनेपर यह अपने-आपको मेरे सामने नहीं प्रकट करता है। लक्ष्मण! तुम शीघ्र मेरा धनुष और सर्पोंके समान मेरे बाण उठा लाओ, अब सागरको सुखा दूँगा। मेरे वानर सैनिक पैदल ही इसे पार करें।'

ऐसा कहकर भगवान् श्रीरामने धनुष हाथमें लिया। वे उस समय त्रिपुरविनाशक शिवजीकी भाँति दुर्धर्ष प्रतीत होने लगे। उन्होंने धनुषको खींचकर अपने बाणोंसे संसारको कम्पित करते हुए उन भयंकर बाणोंको उसी प्रकार छोड़ा, जैसे भगवान् शंकरने त्रिपुरोंके ऊपर बाणका प्रहार किया था। वे तेजस्वी बाण दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए अभिमानी दानवोंसे भरे हुए समुद्रके जलमें धँस गये। तब तो समुद्र भयभीत होकर काँपने लगा और कहीं भी शरण न पाकर पातालसे उठकर हाथ जोड़े हुए मोक्षके कारणभूत भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी शरणमें आया। उसने मनोहर शब्दोंमें राघवेन्द्रकी इस प्रकार स्तुति की।

समुद्र बोला—रघुकुलशिरोमणि सीतापते! मैं आपके चरणारविन्दोंको नमस्कार करता हूँ, जो अपनी सेवा करनेवाले पुरुषोंको सुख देनेवाले हैं। देववृन्दसे सेवित आपकी श्रीचरणरेणुको प्रणाम करता हूँ, जो गौतमपत्नी अहल्याको शापसे मुक्त करनेवाली है। राम! राम! आप देवताओंका कार्य करनेकी इच्छासे रघुकुलमें अवतीर्ण हुए हैं और भक्तोंका अभीष्ट सिद्ध करनेवाले हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप आदि-अन्तरहित, मोक्षदायक, कल्याणस्वरूप तथा अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले नारायण हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। राम! महाबाहु श्रीराम! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिये। राजेन्द्र! आप अपने क्रोधको शान्त कीजिये। करुणालय! मेरे अपराधको क्षमा कीजिये। रघुवंशशिरोमणे! पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और अग्नि—इन सबको विधाताने जिस स्वभावका बनाया है, वे उसी स्वभावके अनुसार बरतते हैं। मेरा स्वभाव ही अगाधता है। यदि मैं अगाध न होऊँ, तो यह मेरे लिये विकारकी बात होगी, मैं यह सब आपसे सत्य कहता हूँ। राघवेन्द्र! लोभ, काम, भय अथवा रागसे भी मैं वंशपरम्परासे प्राप्त हुए अपने गुणका किसी प्रकार त्याग करनेमें समर्थ नहीं; अतः इस समय आपकी सेनाके पार उतारनेमें मैं सहायता करूँगा। सर्वथा सूख नहीं जाऊँगा। यदि सेनासहित पार जानेकी इच्छावाले आपकी आज्ञासे मैं सूख जाऊँ, तो दूसरे लोग भी मुझे धनुषके बलसे ऐसी ही आज्ञा देंगे। अतः आपकी सेनाके उतरनेके लिये मैं दूसरा उपाय बतलाता हूँ—भगवन्! आपकी सेनामें यहाँ नल नामक वानर मौजूद है; वह बड़े-बड़े कारीगरोंमें माननीय है। महाबली नल साक्षात् विश्वकर्माका पुत्र है। वह अपने हाथसे जो कुछ भी काठ, तृण अथवा पत्थर मेरे अंदर फेंकेगा, वह सब मैं पानीके ऊपर धारण करूँगा। वही आपके लिये सेतु (पुल) हो जायगा, उसीके द्वारा आप रावणपालित लंकामें सेनासहित जाइये।

यों कहकर समुद्र अन्तर्धान हो गया। तब श्रीरामचन्द्रजीने नलसे कहा—'महामते! तुम समुद्रमें पुल बनाओ; क्योंकि तुममें यह कार्य करनेकी शक्ति है।' उस समय नलने धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—'भगवन्! मैं अगाध समुद्रमें सेतुका निर्माण करूँगा। मन्दराचल पर्वतपर विश्वकर्माने मेरी माताको वरदान दिया था कि तुम्हारा पुत्र मेरे समान शिल्पकर्ममें निपुण होगा। अतः समस्त श्रेष्ठ वानर आज ही सेतु बाँधना आरम्भ कर दें।' तब श्रीरामचन्द्रजीके भेजे हुए अतिशय बलवान् वानर पर्वत, गिरिशिखर, लता, तृण तथा वृक्षोंको उठा-उठाकर लाने लगे। वे सभी गरुड़के समान वेगवान् तथा विशालकाय वानर थे। नलने समुद्रके बीचमें बहुत बड़ा पुल

* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५३५

तैयार किया, जो दस योजन चौड़ा और सौ योजन लंबा था। इस प्रकार सीतावल्लभ श्रीरामने विश्वकर्मापुत्र वानरराज नलके द्वारा इस सेतुका निर्माण कराया। उस सेतुपर पहुँचकर सम्पूर्ण पातकी मनुष्य सब प्रकारके पातकोंसे मुक्त हो जाते हैं। श्रीरामचन्द्रजीने लंकामें जानेकी इच्छासे वानरोंद्वारा उस पवित्र पापनाशक सेतुका जहाँ प्रारम्भ कराया, वह स्थान आगे चलकर लोगोंमें दर्भशयनके नामसे प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकार समुद्रमें सेतुबन्धनकी कथा कही गयी। वहाँ अनेक पवित्र तीर्थ हैं, जिनमें चौबीस तीर्थ प्रधान हैं। वे सब सेतुपर ही स्थित हैं। पहला चक्रतीर्थ है, दूसरा वेतालवरदतीर्थ और तीसरा पापविनाशनतीर्थ है, जो सब लोकोंमें विख्यात है। उसके बाद सीतासरोवर नामक पुण्यतीर्थ है। तत्पश्चात् मंगलतीर्थ है। मंगलतीर्थके अनन्तर सब पापोंका नाश करनेवाली अमृतवापिका है। फिर ब्रह्मकुण्ड, हनुमत्कुण्ड, अगस्त्यतीर्थ, रामतीर्थ, लक्ष्मणतीर्थ, जयतीर्थ, लक्ष्मीतीर्थ, अग्नीतीर्थ, चक्रतीर्थ, शिवतीर्थ, शंखतीर्थ, यामुनतीर्थ, गंगातीर्थ, गयातीर्थ, कोटितीर्थ, साध्यामृततीर्थ, मानसतीर्थ तथा धनुष्कोटितीर्थ है। विप्रवरो! ये सेतुके मध्यमें स्थित प्रधान-प्रधान तीर्थ बताये गये हैं, जो सब पापोंका अपहरण करनेवाले हैं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस प्रसंगको पढ़ता और सुनता है, वह अनन्त विजय प्राप्त करता है तथा परलोकमें भी उसे पुनर्जन्मका क्लेश नहीं उठाना पड़ता।

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चक्रतीर्थका माहात्म्य—गालवमुनि तथा धर्मकी तपस्याका वर्णन

ऋषि बोले—आपने पापनाशक सेतुपर स्थित जिन चौबीस तीर्थोंके नाम बताये हैं, उनमें सबसे पहले तीर्थका नाम चक्रतीर्थ कैसे हुआ?

श्रीसूतजीने कहा—विप्रवरो! चौबीस प्रधान तीर्थोंमें जो आदितीर्थ बताया गया है, वह सब लोकोंमें विख्यात है। उसकी चक्रतीर्थके नामसे प्रसिद्धि क्यों हुई, यह बात बता रहा हूँ, सुनो। जो स्थान सेतुका मूल कहा गया है, वही दर्भशयनतीर्थ है। वहींपर महापातकोंका नाश करनेवाला चक्रतीर्थ है। पूर्वकालमें वहाँपर गालव नामसे प्रसिद्ध एक वैष्णव महात्मा रहते थे। वे दक्षिण समुद्रके तटपर हालास्यसे थोड़ी दूरपर फुल्लग्रामके समीप क्षीरसरोवरके निकट धर्मपुष्करिणीके किनारे बड़ी भारी तपस्या करते थे। उनका स्वभाव दयालु था, वे सत्यवादी और जितेन्द्रिय थे और उन्होंने आहारका सर्वथा त्याग कर दिया था। वे सब प्राणियोंको अपने ही समान देखते हुए विषयकी स्पृहासे रहित, सब प्राणियोंके हितैषी, मनको वशमें रखनेवाले तथा सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे दूर थे। कुछ वर्षोंतक तो वे सूखे पत्ते चबाकर रहे, फिर कुछ समयतक उन्होंने केवल जलका आहार किया। तत्पश्चात् कुछ वर्षोंतक वे वायु पीकर रहे। इस प्रकार उन महामुनिने बड़ी कठोर तपस्या की। कितने ही वर्षोंतक वे बिना खाये, बिना किसीकी ओर

५३६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


देखे, बिना श्वास लिये और बिना आश्रयके रहे। वर्षा-ऋतुमें आकाशसे गिरती हुई पानीकी धाराका कष्ट सहन करते, सर्दीकी रातमें जलके भीतर खड़े रहते और गरमीके समय पंचाग्नि सेवन करते हुए भगवान् विष्णुके ध्यानमें तत्पर रहते थे। मुखसे अष्टाक्षर मन्त्रका* जप और हृदयमें भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए वे महातेजस्वी गालव मुनि तपस्यामें संलग्न रहे। इस प्रकार कितने ही वर्ष बीतनेपर भगवान् लक्ष्मीपतिने उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट हो उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। भगवान्ने अपने हाथोंमें शंख, चक्र और गदा आदि धारण कर रखे थे, उनके नेत्र विकसित कमलदलके समान सुशोभित थे, उनका तेज कोटि सूर्योंके समान था, वे गरुड़की पीठपर आरूढ़ थे, उनके सिरपर छत्र और पार्श्वभागमें डुलाये जाते हुए चवँरकी शोभा हो रही थी। वे हार, भुजबन्द, मुकुट और कड़े आदि आभूषणोंसे विभूषित थे, विष्वक्सेन तथा सुनन्द आदि पार्षद उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़े थे। भगवान् अपनी मन्द मुसकानसे त्रिभुवनके मनको मोहित किये लेते थे तथा अपनी दिव्य कान्तिसे समस्त पदार्थों एवं दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। कण्ठमें धारण की हुई कौस्तुभमणिसे उनकी बड़ी शोभा हो रही थी।

उस समय उन पीताम्बरधारी भगवान् विष्णुको देखकर महामुनि गालव बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने बड़ी भक्तिसे भगवान् जगदीश्वरका स्तवन किया—'शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् विष्णुको नमस्कार है। नित्य शुद्ध सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है। भक्तोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले हव्य-कव्यस्वरूप आप यज्ञपुरुषको नमस्कार है। जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले आप ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप त्रिमूर्तिको नमस्कार है। आप परमेश्वरको नमस्कार है। सर्वव्यापी प्रभुको नमस्कार है। जगत्की रचना करनेवाले आप लक्ष्मीपतिको नमस्कार है। सूर्य और चन्द्रमारूपी नेत्रोंवाले आप भगवान्को नमस्कार है। ब्रह्मा आदि देवताओंसे वन्दित आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जो नाम और जाति आदि भेदोंसे रहित तथा समस्त दोषोंसे वर्जित हैं, समस्त संसारका भय दूर करनेवाले उन दैत्यविनाशक विष्णुको नमस्कार है। जो वेदान्तवेद्य परमेश्वर हैं, वैकुण्ठधाममें जिनका निवास है, जो ब्रह्माजीके पिता हैं, भक्तजनोंके दुःखोंका तत्काल नाश करनेवाले हैं, उन अमित पराक्रमी भगवान् नारायणको नमस्कार है। शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले आप भगवान् वासुदेवको नमस्कार है। शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले आप भगवान् नारायणको बार-बार नमस्कार है।'

इस प्रकार महात्मा गालवकी की हुई स्तुति सुनकर भगवान्ने प्रसन्न हो उन्हें चारों हाथोंसे खींचकर छातीसे लगा लिया और प्रेमपूर्वक कहा—'गालव! मैं तुम्हारी तपस्या और इस स्तुतिसे बहुत सन्तुष्ट हूँ तथा वर देनेके लिये आया हूँ।' गालवने कहा—'नारायण! रमानाथ! पीताम्बर! जगन्मय! जनार्दन! जगद्धाम! गोविन्द! नरकान्तक! मैं आपके दर्शनमात्रसे सर्वाधिक कृतार्थ हो गया। इससे अधिक दूसरा वर क्या हो सकता है। जिन्हें योगी नहीं देख पाते, कर्मठ लोग भी जिनका दर्शन नहीं कर पाते, उन्हीं परमात्माका आज मैं साक्षात् दर्शन कर रहा हूँ। इससे अधिक दूसरा वर क्या हो सकता है। जगत्पते! जनार्दन! मैं इतनेसे ही कृतार्थ हो गया। जिनके नामोंका स्मरण करनेमात्रसे महापातकी भी मुक्तिको प्राप्त होते हैं, उन्हीं भगवान् विष्णुको मैं यहाँ प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। प्रभो! आपके युगल चरणारविन्दोंमें मेरी अविचल भक्ति हो।'

भगवान् विष्णुने कहा—गालव! मुझमें तुम्हारी दृढ़ एवं निष्काम भक्ति हो। प्रारब्धके फलस्वरूप


* 'ॐ नमो नारायणाय' यह अष्टाक्षर मन्त्र है।

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * | ५३७ ---|---

इस शरीरका अन्त होनेपर तुम्हें मेरे स्वरूपकी प्राप्ति होगी। मुनिश्रेष्ठ! तुम इसी पवित्र आश्रमपर निवास करो। यह धर्मपुष्करिणी पुण्यमयी एवं पापनाशिनी है। इसके किनारे तप करनेवाला मनुष्य सिद्धिको प्राप्त होता है। पूर्वकालमें धर्मराजने यहाँ आकर दक्षिण समुद्रके तटपर महादेवजीका चिन्तन करते हुए तपस्या की थी। इसीसे यह धर्मपुष्करणीके नामसे प्रसिद्ध है। धर्मराजकी तपस्यासे प्रसन्न हो शूलपाणि भगवान् महेश्वर अपनी प्रभासे दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए प्रकट हुए। तब धर्मने उनकी इस प्रकार स्तुति की—‘मैं जगत्के स्वामी ॐकारस्वरूप ईश्वरको नमस्कार करता हूँ। समस्त देवता जिनके स्वरूप हैं, जो आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं, जिनके नेत्र भयंकर हैं, उन विश्वरूप ऊर्ध्वरेता भगवान् शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सम्पूर्ण जगत्के आधार, अनन्त, अजन्मा और अविनाशी हैं, योगीश्वर जिनको सदा प्रणाम करते हैं, उन पुष्टिवर्द्धक भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। जो समस्त लोकोंके स्वामी हैं, उन भगवान् महादेवको नमस्कार है। जिनके कण्ठमें नील चिह्न है, जो समस्त पशुओं (जीवों) के पालन करनेवाले पति हैं, उन भगवान् महेश्वरको बार-बार नमस्कार है। समस्त पापोंका नाश करनेवाले भगवान् शंकरको नमस्कार है। समस्त कामनाओंकी वर्षा करनेवाले महेश्वरको नमस्कार है। रुद्रदेवको नमस्कार है। सर्पोंको प्रश्रय देनेवाले शिवको नमस्कार है। उत्कृष्ट चित्तवाले प्रचेता (वरुण) रूप शम्भुको नमस्कार है। हाथोंमें पिनाक और त्रिशूल धारण करनेवाले आपको बार-बार नमस्कार है। चैतन्यरूप शिवको नमस्कार है। पुष्टिपालक महेश्वरको नमस्कार है। समस्त क्षेत्रों (शरीरों) के स्वामी भगवान् पंचानन शिवको नमस्कार है।’

इस प्रकार स्तुति करनेपर लोककल्याणकारी भगवान् शंकरने कहा—महामते धर्म! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम मुझसे वर माँगो।

धर्मने कहा—पार्वतीपते! मैं सदा आपका वाहन होऊँ।

शिवजीने कहा—धर्म! तुम सदैव मनुष्योंसे पूजित हो, तुम मेरे वाहन बनो। तुम्हारा सेवन करनेवाले मनुष्योंकी मुझमें सदैव भक्ती बनी रहेगी और तुमने दक्षिण समुद्रके तटपर जो तीर्थ बनाया है, वह धर्मपुष्करिणीके नामसे प्रसिद्ध होगा।

इस प्रकार उस धर्मतीर्थके लिये वर देकर भगवान् शंकर वृषभरूपधारी धर्मपर आरूढ़ हो कैलास पर्वतपर चले गये। महर्षि गालव! तुम भी इस धर्मपुष्करिणीके किनारे तपस्या करते हुए तबतक निवास करो, जबतक कि तुम्हारे शरीरका अन्त न हो जाय।

ऐसा कहकर भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। तब मुनिश्रेष्ठ गालव धर्मपुष्करिणीके तटपर भगवान् विष्णुके ध्यानमें तत्पर हो निवास करने लगे। किसी समय माघ मासमें शुक्ल पक्षकी एकादशीको उपवास करके उन्होंने रात्रिमें जागरण किया और दूसरे दिन द्वादशीको धर्मपुष्करिणीके जलमें स्नान करके सन्ध्या-वन्दनपूर्वक नित्य कर्मोंका अनुष्ठान किया। तत्पश्चात् भगवान् विष्णुकी पूजा सम्पन्न करके उन्होंने इस प्रकार स्तवन किया—

गालव बोले—सहस्रों मस्तक धारण करनेवाले भगवान् विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, श्रीकृष्ण तथा कल्किरूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। जो प्रणतजनोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले और समस्त प्राणियोंके आधार हैं, उन आधारशून्य वासुदेव भगवान् जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सर्वज्ञ, सबके कर्ता, सच्चिदानन्द-स्वरूप, तर्कके अविषय एवं नामनिर्देशसे रहित हैं, उन भगवान् जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ।