संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
८५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
सम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है। एक बार प्रणाम करनेमात्रसे देहधारी जीवोंके देहरूपी बन्धनका निवारण करनेवाले आपको नमस्कार है। खण्डपरशो! अर्धचन्द्रको धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। स्कन्दकी उत्पत्तिके स्थान आप गौरीपति गिरीशको नमस्कार है। चन्द्रार्धरूप शुद्ध आभूषणवाले तथा सूर्य-चन्द्र एवं अग्निरूप नेत्रोंवाले आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण दिशाएँ आपके लिये वस्त्ररूप हैं, आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, जीर्ण (पुरातन) जरा और जन्मका कष्ट हर लेनेवाले, जीवोंको जीवन देनेवाले तथा पाप आदिका अपहरण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आपके एक हाथमें डमरू और दूसरे हाथमें धनुष है, आपको नमस्कार है। समस्त जगत्के लोचनरूप आप भगवान् त्रिलोचनको नमस्कार है। गंगाधर! आपको नमस्कार है। आप तीन वेदस्वरूप, सदा सन्तुष्ट रहनेवाले और भक्तोंको सन्तोष देनेवाले हैं। आप जगत्के उद्धारकी दीक्षासे युक्त हैं, आप देवाधिदेव महादेवको नमस्कार है। सम्पूर्ण पापोंको विदीर्ण करनेवाले, दीर्घदर्शी, प्रपंचसे दूर रहनेवाले तथा सम्पूर्ण दोषोंका दलन करनेवाले आप परम दुर्लभ देवको नमस्कार है। आप चन्द्रमाकी कलाको धारण करनेवाले तथा दोषोंके संग्रहका सर्वथा त्याग करनेवाले हैं। धतूरका फूल आपको अधिक प्रिय है, प्रभो! मस्तकपर जटाभार धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। आप धीर, धर्मस्वरूप तथा धर्मके रक्षक हैं। नीलग्रीव! आपको नमस्कार है। जो आपके नामोंका स्मरणमात्र करते हैं, उनके लिये आप तीनों लोकोंका ऐश्वर्य भर देते हैं। आप प्रमथगणोंके अधिपति तथा अपने एक हाथमें सदा पिनाक उठाये रहनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। संसारी जीवोंके अज्ञानमय बन्धनको खोलनेवाले आप भगवान् पशुपतिको नमस्कार है। अपने नामका उच्चारण करनेमात्रसे बड़े-बड़े पातकोंको हर लेनेवाले आपको नमस्कार है। आप परसे भी परे, सबको पार उतारनेवाले, कार्य और कारणसे भी परे, अनन्त चरित्रवाले तथा परम पवित्र कथावाले हैं, आपको नमस्कार है। आप वामदेव हैं, अपने आधे अंगमें नारीस्वरूपको धारण करते हैं तथा धर्मस्वरूप वृषभपर यात्रा करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। प्रणतजनोंके भयका निवारण करनेवाले आपको नमस्कार है। आप जगत्की उत्पत्तिके कारण तथा संसार-बन्धनका नाश करनेवाले हैं, आप ही सम्पूर्ण भूतोंका पालन करनेवाले पति हैं, आपको नमस्कार है। महादेव! आपको नमस्कार है। महेश्वर! तेजोंके स्वामी! आपको नमस्कार है। आप पार्वतीके पति और मृत्युंजय हैं, आपको नमस्कार है। आप दक्षके यज्ञका नाश करनेवाले और यक्षराज कुबेरके प्रिय हैं, आपको नमस्कार है। आप बड़े-बड़े यज्ञ करनेवाले, यज्ञस्वरूप तथा यज्ञोंके फल देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप रुद्रस्वरूप, रुद्रपति तथा कुत्सित रोदनकारी कष्टको दूर करनेवाले हैं। आप भक्तोंके हृदयमें रमण करते हैं, आपको नमस्कार है। आप त्रिशूलधारी, सनातन ईश्वर, श्मशानभूमिमें विहार करनेवाले, सर्वस्वरूप तथा सर्वज्ञ हैं, भगवती पार्वतीके प्रियतम! आपको नमस्कार है। आप सबका कष्ट हरनेवाले क्षमास्वरूप और क्षेत्रज्ञ हैं। क्षमाशील महेश्वर! आप सब कुछ करनेमें समर्थ, पृथ्वीका संहार करनेवाले तथा दूधके समान गौर हैं, आपको नमस्कार है। अन्धकासुरके शत्रु आपको नमस्कार है। आदि-अन्तसे रहित आप परमेश्वरको नमस्कार है। आप पृथ्वीके आधार, ईश्वर तथा इन्द्र और उपेन्द्र आदि देवताओं-द्वारा प्रशंसित हैं, आप उमाकान्त, उग्र और ऊर्ध्वरेताको नमस्कार है। आप एक रूप, अद्वितीय तथा महान् ऐश्वर्य-स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप अनन्तकर्ता तथा पार्वतीके पति हैं, आपको नमस्कार है। आप ही ॐकार, वषट्कार, भूलोक, भुवर्लोक तथा स्वर्लोक हैं। उमापते! इस जगत्में दृश्य और अदृश्य जो कुछ भी है, वह सब आप ही हैं। देव! मैं स्तुति करना नहीं जानता। महेश्वर! आप
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ही शब्द हैं, आप ही अर्थ हैं और आप ही वाणी हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। महादेव! मैं आपसे भिन्न और किसी ईश्वरको नहीं जानता। दूसरेका नाम लेनेमें गूँगा हूँ, दूसरेकी कथा सुननेमें बहरा हूँ, दूसरेके समीप जानेमें पंगु हूँ और अन्य किसी देवताका दर्शन करनेमें अन्धा हूँ। एकमात्र आप ही ईश्वर हैं, आप ही कर्ता हैं तथा आप ही पालन और संहार करनेवाले हैं। सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले भिन्न-भिन्न देवता हैं, यह भेद-भाव मूर्खोकी कल्पनामात्र है। अतः एकमात्र आप ही बार-बार मेरे लिये शरण हैं। महेश्वर! मैं संसार-समुद्रमें डूबा हूँ, मेरा उद्धार कीजिये।
इस प्रकार महेश्वरकी स्तुति करके महामुनि जैगीषव्य उनके सामने ठूँठकी तरह अविचल और मौन हो गये। मुनिद्वारा की हुई इस स्तुतिको सुनकर चन्द्रमौलि भगवान् शिवने प्रसन्न होकर कहा—'मुने! तुम कोई वर माँगो।'
जैगीषव्य बोले—देवेश! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो यही वर दीजिये कि मैं आपके चरणारविन्दोंसे कभी दूर न होऊँ और दूसरा वर मुझे यह देनेकी कृपा करें कि मैंने जो शिवलिंगकी स्थापना की है, उसमें आप सदा ही स्थित रहें।
महादेवजीने कहा—महाभाग जैगीषव्य! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब तुम्हारी इच्छाके अनुसार पूर्ण हो। इसके सिवा मैं तुम्हें दूसरा वर और देता हूँ—मोक्षके साधनभूत योगशास्त्र मैं तुम्हें अर्पण करता हूँ। तुम सब योगियोंके मध्य योगाचार्यरूपसे प्रसिद्ध होओ। तपोधन! तुम मेरी कृपासे योगविद्याका यथावत् रहस्य जान लोगे, जिसके द्वारा तुम्हें मोक्षकी प्राप्ति होगी। जिस प्रकार नन्दी, भृंगी और सोमनन्दी मेरे भक्त हैं, उसी प्रकार तुम भी मेरे जरा-मृत्युसे रहित भक्त होओगे। तुम सदा मेरे चरणोंके समीप निवास करोगे और वहीं तुम्हें मोक्षलक्ष्मीकी प्राप्ति होगी। काशीमें जैगीषव्येश्वर नामक शिवलिंग परम दुर्लभ होगा। तीन वर्षोतक उसका सेवन करके मनुष्य योगकी प्राप्ति कर सकता है, इसमें संशय नहीं। जैगीषव्य-गुहामें जाकर योगाभ्यास करनेवाला मनुष्य मेरी कृपासे छः महीनेमें मनोवांछित सिद्धि प्राप्त कर सकता है। तुम्हारे द्वारा स्थापित किया हुआ यह शिवलिंग ज्येष्ठेश्वर क्षेत्रमें सब प्रकारकी सिद्धियोंको देनेवाला होगा तथा दर्शन, स्पर्श और पूजन करनेपर सम्पूर्ण पापराशिका विनाश करेगा। जैगीषव्य! तुमने जो यह स्तवन किया है, यह बहुत उत्तम और योगसिद्धिमें सहायक है। यह बड़े-बड़े पापोंका नाशक, महान् पुण्यकी वृद्धि करनेवाला, महान् भयकी शान्ति और महाभक्तिकी वृद्धि करनेवाला है। इस स्तोत्रका जप करनेसे मनुष्योंके लिये कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। अतः उत्तम साधकोंको सर्वथा प्रयत्न करके इस स्तोत्रका जप करना चाहिये।
इस प्रकार जैगीषव्यको वर देकर महादेवजीने उस क्षेत्रमें निवास करनेवाले ब्राह्मणोंको देखा।
## काशीके ब्राह्मणोंको भगवान् शिवका वरदान तथा काशी क्षेत्रकी महिमा
अगस्त्यजीने पूछा—षडानन! ब्राह्मणोंको देखकर भगवान् शंकरने उनसे क्या कहा?
स्कन्दजी बोले—अगस्त्य! जब ब्रह्माजीके गौरवकी रक्षाके लिये महादेवजी मन्दराचलको चले गये, तब वहाँके क्षेत्रसंन्यासी पापहीन ब्राह्मण निराश्रय हो गये। उन्होंने उस महाक्षेत्रमें प्रतिग्रह लेना सदाके लिये बंद कर दिया और अपने दण्डोंके अग्रभागसे भूमि खोद-खोदकर कन्द-मूल आदिसे वे जीवननिर्वाह करने लगे। इस प्रकार धरती खोद-खोदकर उन्होंने एक बड़ी सुन्दर पुष्करिणी तैयार कर दी। उसका नाम हुआ 'दण्डखात' तीर्थ। उस तीर्थके चारों ओर
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उन्होंने अनेक बड़े-बड़े शिवलिंग स्थापित किये और भगवान् महेश्वरकी आराधनामें तत्पर हो प्रयत्नपूर्वक तपस्या की। वे नित्य ही विभूति धारण करते और रुद्राक्षकी माला पहनते थे। प्रतिदिन शिवलिंगका पूजन और शतरुद्रियका जप करते थे। मुने! उन ब्राह्मणोंने जब पुनः देवाधिदेव महादेवजीके शुभागमनका समाचार सुना, तब वे दण्डखात नामक महातीर्थसे उनका दर्शन करनेके लिये आये। उनकी संख्या पाँच हजार थी। वे अपने हाथोंमें नूतन दूर्वादल, आर्द्र अक्षत, फूल, फल और सुगन्धित माला लिये हुए थे और मुखसे भगवान् शिवकी जय-जयकार बोलते थे। उन्होंने बारंबार प्रणाम करके मंगलमय वैदिक सूत्रोंद्वारा महादेवजीका स्तवन किया। तब भगवान् शंकरने उन सबको अभय दान देकर प्रसन्नतापूर्वक उनका कुशल-मंगल पूछा।
वे ब्राह्मण बोले—नाथ! इस क्षेत्रमें निवास करनेवाले हमलोगोंके लिये सदा ही कुशल है। विशेषतः इस समय, जब कि हमने इन नेत्रोंसे आपके स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन किया है, हमारी कुशलके लिये क्या कहना है। आप वही हैं, जिनके स्वरूपको श्रुतियाँ भी यथार्थरूपसे नहीं जानतीं। जो आपके क्षेत्रसे विमुख हैं, वे ही सदाके लिये कुशलसे वंचित हैं। सर्पोंका भुजबन्द धारण करनेवाले महादेव! जिनके हृदयमें सदैव काशीका चिन्तन होता है उनके ऊपर संसाररूपी सर्पके विषका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 'काशी' यह दो अक्षरोंका मन्त्र गर्भकी रक्षा करनेवाली (अथवा गर्भवाससे बचानेवाली) मणि है। यह जिसके कण्ठमें स्थित है, उसका अमंगल कैसे हो सकता है? जो प्रतिदिन 'काशी' इस दो अक्षरमयी सुधाका पान करता है, वह जरा आदि छः भावविकारोंसे रहित देवरूपताकी भी उपेक्षा करके साक्षात् अमृत (मोक्ष)-रूप हो जाता है। जिसने कानोंमें अमृतके समान प्रतीत होनेवाले 'काशी' इन दो अक्षरोंको सुना है, वह फिर कभी गर्भवासकी कथा नहीं सुनता। काशीसे अन्यत्र रहकर भी जो 'काशी-काशी-काशी' इस प्रकार जप करते हुए जीवन-यापन करता है, उसके आगे मुक्ति सदैव प्रकाशित होती है। भगवन्! यह काशीपुरी कल्याणस्वरूपा है, आप कल्याणस्वरूप हैं तथा गंगाजी भी कल्याणस्वरूपा हैं। दूसरा कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहाँ तीन-तीन कल्याणमूर्तियाँ रहती हों।
काशी क्षेत्रकी भक्तिसे परिपूर्ण यह ब्राह्मणोंका वचन सुनकर भगवान् शिव बहुत सन्तुष्ट हुए और प्रसन्नचित्त होकर बोले—द्विजवरो! तुम सब धन्य हो, मैं जानता हूँ, इस क्षेत्रका सेवन करनेसे तुम विशुद्ध सत्त्वमय हो गये हो, तुममें रजोगुण और तमोगुणका सर्वथा अभाव है। अतएव तुमलोग संसारसमुद्रसे पार हो गये हो। जो काशीपुरीके भक्त हैं, वे निश्चय ही मेरे भक्त हैं और जीवन्मुक्त हैं। जो पापहीन मानव इस आनन्दवनमें निवास करते हैं, वे निश्चय ही मेरे अन्तःकरणमें स्थित होते हैं। जो मेरे क्षेत्रमें रहकर मेरी भक्ति करते और मेरे चिह्नोंको धारण करते हैं, उन्हींको मैं उपदेश देता हूँ। काशीवासी ब्राह्मणो! मेरी भक्ति और चिह्न धारण करनेवाले तुम सब लोग धन्य हो। तुम्हारे हृदयसे न तो मैं दूर हूँ और न यह काशीपुरी ही दूर है। तुम सब लोग मुझसे अपनी रुचिसे वर माँगो।
ब्राह्मण बोले—उमापते! महेश्वर! सर्वज्ञ! हमारे लिये यह वर है कि आप भवताप हरनेवाली काशीपुरीका कदापि परित्याग न करें। यहाँ काशीमें ब्राह्मणोंके वचनसे कभी किसीके ऊपर भी ऐसा कोई शाप न लागू हो जो मोक्षमें विघ्न डालनेवाला हो। आपके युगल चरणारविन्दोंमें हमारी निर्द्वन्द्व भक्ति बनी रहे। इस शरीरके अन्ततक हमारा निरन्तर काशीमें ही निवास बना रहे। और किसी वरसे हमें क्या काम है, हमें
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तो बस यही वर देना चाहिये। आपकी भक्तिसे प्रभावित होकर हमलोगोंने आपके प्रतिनिधिस্বরূপ जिन लिंगोंकी स्थापना की है, उन सबमें आपका निरन्तर वास हो।
ब्राह्मणोंके ये वचन सुनकर शिवजीने कहा—'तथास्तु' ऐसा ही हो। इसके सिवा तुम्हें दूसरा वर यह देता हूँ कि तुम सब ब्राह्मणोंको यथार्थ ज्ञान प्राप्त होगा। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको उत्तरवाहिनी गंगाके सेवन, शिवलिंगका यत्नपूर्वक पूजन, दम (इन्द्रियसंयम), दान और दया—ये सदा ही करने चाहिये। इस क्षेत्रमें निवास करनेवाले लोगोंके लिये यही रहस्यकी बात बतायी गयी है। अपनी बुद्धिको दूसरोंके हित-चिन्तनमें लगाना चाहिये और किसीसे भी उद्वेगमें डालनेवाला वचन नहीं बोलना चाहिये। यहाँ विजयकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको मनसे भी कभी पाप नहीं करना चाहिये, क्योंकि यहाँका किया हुआ पुण्य और पाप अक्षय होता है। अन्यत्रका किया हुआ पाप काशीमें नष्ट होता है, काशीमें किया हुआ पाप अन्तर्गृहमें नष्ट होता है, किंतु अन्तर्गृहमें किया हुआ पाप पैशाच्यनरककी प्राप्ति करानेवाला है। अन्तर्गृहमें पाप करनेवाला पुरुष यदि काशीसे बाहर चला जाता है तो उसे पिशाचनरककी प्राप्ति होती ही है, क्योंकि काशीमें किया हुआ पापकर्म करोड़ों कल्पोंमें भी शुद्ध नहीं होता। परंतु यदि यहीं उसकी मृत्यु हो तो उसे तीस हजार वर्षोंतक रुद्रपिशाच होकर रहना पड़ता है। जो काशीमें रहकर सदा पातकोंमें ही तत्पर रहता है, वह तीस हजार वर्षोंतक पिशाचयोनिमें रहेगा। उसके बाद फिर यहीं रहते हुए उसे उत्तम ज्ञानकी प्राप्ति होगी और उसी ज्ञानसे उसे परम उत्तम मोक्ष प्राप्त हो जायगा। इस संसारमें सब कुछ अनित्य है और मनुष्य-जन्म अनेक प्रकारके पापोंसे भरा हुआ है, ऐसा जानकर संसारभयसे छुड़ानेवाले अविमुक्त क्षेत्र (काशीधाम)-का सदैव सेवन करना चाहिये। ब्राह्मणो! मेरी भक्तिमें तत्पर जो पतिव्रता स्त्रियाँ अविमुक्त क्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त होती हैं, वे परम गतिको पाती हैं। द्विजवरो! यहाँ प्राण निकलते समय मैं स्वयं ही जीवको तारक ब्रह्मका उपदेश देता हूँ जिससे वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। मुझमें मन लगाये रखनेवाला तथा अपने सम्पूर्ण कर्मोंको मुझमें ही समर्पित करनेवाला मेरा भक्त इस काशीमें जिस प्रकार मोक्षको प्राप्त होता है वैसा अन्य किसी पुण्य क्षेत्रमें नहीं। देहधारी जीवकी मृत्यु निश्चित है, कर्मोंसे प्राप्त होनेवाली गति भी दुःखरूप ही है तथा प्रत्येक आगन्तुक वस्तु एक-न-एक दिन चली जानेवाली है। ऐसा समझकर काशीकी शरण लेनी चाहिये। जो अपने न्यायोपार्जित धनसे एक भी काशीवासी पुरुषको तृप्त करता है, उसने मेरे साथ सम्पूर्ण त्रिलोकीको तृप्त कर दिया। धर्मसे काशीकी रक्षा करनेवाले राजर्षि दिवोदास सशरीर मेरे उस लोकको प्राप्त हुए हैं जहाँसे पुनः इस संसारमें आना नहीं होता। जो पृथ्वीके अन्तमें रहकर भी मेरे अविमुक्त नामक लिंगका स्मरण करते हैं वे निश्चय ही बड़े-बड़े पापोंसे भी मुक्त हो जाते हैं। इस क्षेत्रमें जिसने भी मेरा दर्शन, स्पर्श और पूजन किया है वह तारक-ज्ञान प्राप्त करके पुनः इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जो इस तीर्थमें मेरी पूजा करके अन्यत्र कहीं मृत्युको प्राप्त होता है वह दूसरे जन्ममें भी मुझे प्राप्त होकर मुक्त हो जायगा। इस प्रकार ब्राह्मणोंके आगे काशीक्षेत्रकी महिमाका वर्णन करके महादेवजी उन सब ब्राह्मणोंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये। वे ब्राह्मण भी भगवान् शंकरका प्रत्यक्ष दर्शन पाकर प्रसन्नचित्त हो अपने-अपने आश्रमको चले गये।
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परापरेश्वर और व्याघ्रेश्वर लिंगकी महिमा, भगवान् शिवद्वारा व्याघ्ररूपधारी दैत्यका वध
स्कन्दजी कहते हैं—कुम्भज ! ज्येष्ठेश्वर क्षेत्रके सब ओर जो मुनियोंद्वारा स्थापित पाँच हजार शिवलिंग हैं, वे पूर्ण सिद्धि देनेवाले हैं। ज्येष्ठेश्वरसे उत्तरमें परम पूजनीय परापरेश्वर लिंग है, जिसके दर्शनमात्रसे निर्मल ज्ञानकी प्राप्ति होती है। दण्डखात नामक महातीर्थके समीप जब ब्राह्मणलोग परम उत्तम निष्काम तप कर रहे थे, उस समय प्रह्लादके मामा 'दुन्दुभिनिह्लाद' नामक दुष्ट दैत्यने मन-ही-मन यह विचार किया कि देवताओंको किस प्रकार सुगमतापूर्वक जीता जा सकता है। इसका उपाय सोचते-सोचते उसने निश्चय किया कि 'ब्राह्मण ही देवताओंके सबल होनेमें कारण हैं, क्योंकि देवता यज्ञमें दिये हुए भागका ही आहार करते हैं। यज्ञ वेदोंसे सम्पन्न होते हैं और वे वेद ब्राह्मणोंके अधीन हैं। अतः ब्राह्मण ही देवताओंके बल हैं। यदि ब्राह्मण नष्ट हो जायँ तो वेद स्वयं नष्ट हो जायँगे और जब वेद नष्ट हो जायँगे तब यज्ञ तो नष्ट ही हैं। यज्ञोंका नाश होते ही देवताओंका आहार छिन जायगा। इस प्रकार निर्बल हुए देवतालोग सुगमतापूर्वक जीते जा सकते हैं। देवताओंके परास्त होनेपर मैं ही तीनों लोकोंका सम्माननीय सम्राट होऊँगा।' यह सोचकर उसने ब्राह्मणोंको ही मार डालनेका बार-बार उद्योग किया। काशीमें आकर उस मायावी दैत्यने कितने ही ब्राह्मणोंका वध किया। श्रेष्ठ द्विज जिस किसी ओर भी समिधा और कुशा लानेके लिये जाते, उधर ही वनमें उन सबको पकड़कर वह दुर्बुद्धि दैत्य अपना आहार बना लेता था। उसका रूप किसीको दिखायी नहीं देता था। देवता लोग भी उस मायावीको देख नहीं पाते थे। वह दिनभर मुनियोंके ही बीचमें बैठकर उन्हींकी भाँति ध्यान लगाये रहता था। पर्णशालामें किधरसे प्रवेश करने और किस ओरसे निकल भागनेका मार्ग है, यह सब वह दिनमें ही देख लेता था तथा रातमें व्याघ्रका रूप धारण करके वहाँ बहुतसे ब्राह्मणोंको खा डालता था। इस प्रकार उस दुष्ट दैत्यने बहुतसे ब्राह्मणोंको मार दिया।
एक दिन शिवरात्रिके समय एक शिवभक्त ब्राह्मण महादेवजीकी पूजा करके उनके ध्यानमें बैठा था। उसी समय अपने बलके घमंडमें भरे हुए दैत्यराज दुन्दुभिने व्याघ्रका रूप धारण करके उस भक्तको पकड़ लेनेका विचार किया। वह शिवभक्त अपने चित्तको दृढ़तापूर्वक स्थिर करके ध्यानमें स्थित हो भगवान् शिवके दर्शनमें तल्लीन था। उसने विधिपूर्वक मन्त्रके अंगन्यास, करन्यास, कवच और ध्यान आदिका प्रयोग कर लिया था। अतः वह दैत्य उस भक्तपर सहसा आक्रमण करनेमें समर्थ न हुआ। इसी समय सर्वव्यापी भगवान् शिवने उस दुष्ट दैत्यके मनोभावको समझकर उसका वध करनेका विचार किया। वे उस भक्तद्वारा पूजित शिवलिंगसे सहसा प्रकट हो गये। उन्हें आते देख वह दैत्य उसी रूपमें बढ़कर पर्वतके समान विशालकाय हो गया और उनकी ओर झपटा। इतनेमें ही उसे पकड़कर भगवान्ने अपनी काँखमें दबा लिया और उसीमें पीस डाला। इस
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८६३ ---|--- प्रकार काँखमें कुचला जाता हुआ वह दैत्य आकाश और पृथ्वीको गुँजाता हुआ आर्तनाद करने लगा। उसका चीत्कार सुनकर बहुत-से तपस्वी रात्रिमें उसी शब्दका लक्ष्य करके उस पर्णशालामें आ पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा—भगवान् शंकर अपनी काँखमें एक व्याघ्रको दबाये हुए खड़े हैं। यह देख सबने जय-जयकार करते हुए उनके चरणोंमें प्रणाम और स्तवन किया। 'जगद्गुरो! ईश! आप हमपर अनुग्रह कीजिये और इसी रूपमें व्याघ्रेश नाम धारण | करके यहाँ निवास कीजिये। महादेव! इस श्रेष्ठ स्थानकी आप सदैव रक्षा करें।'<br><br>उन तपोधनोंका ऐसा वचन सुनकर चन्द्रभूषण भगवान् शिवने कहा—'ब्राह्मणो! ऐसा ही हो। जो श्रद्धापूर्वक यहाँ इस रूपमें मेरा दर्शन करेगा, उसके समस्त उपद्रवोंका मैं निश्चय ही नाश करूँगा।' ऐसा कहकर महादेवजी उस शिवलिंगमें लयको प्राप्त हो गये। तबसे वह शिवलिंग व्याघ्रेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुआ। ज्येष्ठेश्वरके उत्तरभागमें उसका दर्शन और स्पर्श करनेपर वह सम्पूर्ण भयोंका नाश करनेवाला है।
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हिमवान्के द्वारा काशीमें शैलेश्वर लिंगकी प्रतिष्ठा
कार्तिकेयजी कहते हैं—एक समय पर्वतराज हिमवान्से उनकी पतिव्रता पत्नी मेनाने कहा—'आर्यपुत्र! मैं विवाहके बादसे अपनी बेटी गौरीका समाचार न पा सकी। इस समय महादेवजी कहाँ हैं? प्रभो! वे एक और अद्वितीय हैं। उन त्रिशूलधारी भगवान् शिवका समाचार जाननेके लिये कोई उद्योग कीजिये।'<br><br>गिरिराज हिमवान् बोले—देवि! मैं अपनी प्यारी पुत्रीकी खोज करनेके लिये स्वयं ही जाऊँगा। मैं तो ऐसा समझता हूँ कि जबसे गौरी मेरे घरसे गयी है तबसे इस घरकी लक्ष्मी ही चली गयी। ऐसा कहकर भाँति-भाँतिके रत्न और वस्त्र साथ ले गिरिराज हिमवान् शुभ लग्नमें घरसे चले। बहुत दूर आगे जानेपर उन्होंने दूरसे ही काशीपुरीको देखा जो कि मणियोंकी ज्योतिसे जगमगा रही थी और अपने प्रकाशसे सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त करनेवाली थी। सब ओर वैजयन्ती पताकाओंके समुदायसे सुशोभित वह पुरी स्वर्गलोककी अमरावती-सी जान पड़ती थी। इसी समय वहाँ उन्हें कोई तीर्थयात्री दिखायी दिया। पर्वतराजने उसे बुलाकर आदरपूर्वक पूछा—'भाई कार्पटिक! यहाँका वृत्तान्त कहो, यह कौन-सा अपूर्व नगर है? इस समय यहाँका अधिष्ठाता कौन है और उसका कर्म क्या है?'<br><br>कार्पटिक बोला—मानद! अभी तो पाँच-छः | दिन ही बीते हैं, गिरिराजनन्दिनी गौरीके पति भगवान् विश्वनाथ यहाँ काशीपुरीमें मन्दराचलसे पधारे हैं। यहाँके राजा दिवोदास परम धामको चले गये। जो सम्पूर्ण जगत्के अधिष्ठाता हैं, वे ही भगवान् शंकर इस काशीपुरीके भी स्वामी हैं। वे ही सब कुछ देनेवाले हैं। पर्वतराज हिमवान् भी श्रेष्ठ हैं, जिन्होंने प्राणोंसे भी अधिक प्यारी पुत्री देकर भगवान् विश्वनाथको सन्तुष्ट किया है। वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य परमेश्वर शिवजीकी चेष्टाओंको कौन जानता है। मैं तो बहुत थोड़ा और इतना ही जानता हूँ कि यह सब जगत् उन्हींकी रचना है। इस समय भगवान् शिव गिरिराजकुमारी पार्वतीजीके साथ काशीके ज्येष्ठेश्वर नामक स्थानमें ठहरे हुए हैं। भगवान् विश्वनाथके लिये विश्वकर्माद्वारा जिस विशाल प्रासाद (मन्दिर)-का निर्माण किया जा रहा है, वह अपूर्व है। वैसा तो मैंने अपने कानोंसे कभी सुना भी नहीं है। जहाँ मणियों और रत्नोंकी शलाकाओंसे मन्दिरकी दीवारें बनायी गयी हैं, उस मन्दिरमें एक सौ बारह खम्भे हैं जो सूर्यके समान तेजस्वी प्रतीत होते हैं। ऐसा अपूर्व वैभव जिनके समीप सदा प्रकट होता है, उन भगवान् उमाकान्तको आप कैसे नहीं जानते?<br><br>अगस्त्य! अपने जामाताकी उस अद्भुत समृद्धिका वर्णन सुनकर पर्वतराज लज्जासे दब गये। उन्होंने
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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
उस कार्पटिक (तीर्थयात्री)-को पारितोषिक देकर विदा किया और स्वयं इस प्रकार चिन्ता करने लगे—‘अहो ! इस जगत्में जितनी वैभवराशि सुनी जाती है, वह सब मेरे जामाताके भवनमें विद्यमान है। मैं कन्या और जामाताके संतोषके लिये भेंट देनेको जो कुछ लाया हूँ, वह सब उनके अगाध वैभवको देखते हुए मुझे अत्यन्त तुच्छ प्रतीत होता है। यह सम्पूर्ण जगत् जिनका ही पसारा है, जिन्हें उनसे पहले रहकर कोई भी नहीं जान सका है, वे वेदवेद्य सर्वज्ञ परमेश्वर ये ही हैं। जिन्हें मैंने सदा अनभिज्ञ (भोला) समझा था, वे ही सर्वज्ञ ईश्वर हैं। सबके समस्त नाम जिनके ही नाम हैं, वे सर्वदेश-व्यापी और सबको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाले परमात्मा ये ही हैं। जिनका कोई एक देश नहीं ज्ञात होता है, जिनको पहले मेरे-जैसा पाषाणबुद्धिका पुरुष आचारहीनके समान देखता था, वे ही ये साक्षात् ईश्वर हैं। जिनसे श्रुतियाँ और स्मृतियाँ भी आचारका ज्ञान प्राप्त करती हैं, अबतक मैं जिन्हें नाममात्रसे ईश्वर जानता था, वे साक्षात् ईश्वर हैं। ये दूसरोंको भी ऐश्वर्यकी प्राप्ति करानेवाले हैं। गुणातीत होकर भी समस्त गुणोंके आधार हैं। कार्य और कारण सब इन्हींके स्वरूप हैं। यद्यपि यहाँ ये अर्वाचीन (नवीन)-से प्रतीत होते हैं तथापि ये परम प्राचीन और परात्पर हैं। मैं केवल पर्वतोंका स्वामी हूँ और मेरे जामाता उमाकान्त सम्पूर्ण विश्वके स्वामी हैं। मेरी सम्पत्ति परिमित (बहुत थोड़ी) है, परंतु इनके दिव्य वैभवका कोई माप नहीं है। अतः मेरी लायी हुई यह उपहारकी सामग्री बहुत थोड़ी है। इससे इस समय मैं इन महेश्वरका दर्शन नहीं करूँगा।’
मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके गिरिराज हिमवान्ने सायंकाल समस्त पर्वतीय अनुचरोंको बुलाकर आज्ञा दी, ‘सेवको ! तुम सब लोग शीघ्र ही सूर्योदयसे पहले यहाँ एक शिवालय निर्माण करो।’ हिमवान्की यह आज्ञा पाकर अनुगामी सेवकोंने रात बीतनेके पहले ही सुन्दर शिवालय बनाकर तैयार कर दिया। फिर गिरिराज हिमवान्ने उसमें शैलेश्वर नामक शिवलिंगकी प्रतिष्ठा की- जो चन्द्रकान्तमणिका बना हुआ था। जिसकी जगमगाती हुई प्रभासे सारा मण्डप उज्ज्वल आलोकमय हो रहा था। तदनन्तर प्रातःकाल होते ही गिरिराजने पंचनद कुण्डमें स्नान किया और कालराज (भैरव)-को नमस्कार एवं पूजन करके वहीं अपनी लायी हुई रत्नराशि छोड़कर वे अपने सब पर्वतीय सेवकोंके साथ तुरंत लौट गये। उसके बाद प्रातःकाल ‘हुण्डन’, ‘मुण्डन’ नामवाले दो शिवगणोंने वरणाके सुन्दर तटपर बने हुए उस सुन्दर देवालयको देखा। उसे देखकर वे बड़े प्रसन्न हुए। वे शिवजीके समीप गये और उन्हें साष्टांग प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले—‘देवाधिदेव ! हम नहीं जानते, किस सुदृढ़ भक्तने वरणाके तटपर परम मनोहर मन्दिरका निर्माण कराया है। कल शामतक तो हमने वहाँ कोई मन्दिर नहीं देखा था। आज ही प्रातःकाल वह देखा गया है।’ अपने गणोंका यह कथन सुनकर भगवान् शिवने पार्वतीजीसे कहा—‘गिरिराजकुमारी ! वह मन्दिर देखनेके लिये हम और तुम दोनों चलें।’ ऐसा कहकर पार्वती और गणोंसहित भगवान् शिव वहाँ गये और वहाँ उन्होंने वरणाके तटपर रातभरमें बनाये हुए उस परम सुन्दर देवमन्दिरको देखा। फिर मण्डपमें प्रवेश करके चन्द्रकान्तमणिमय शिवलिंगका भी दर्शन किया। ‘किसने इस शिवलिंगकी स्थापना की है?’ यह जिज्ञासा मनमें उठते ही महादेवजीने अपने आगे अंकित की हुई वह प्रशस्ति देखी जो मन्दिरका निर्माण और प्रतिष्ठा करनेवालेको सूचित कर रही थी। उसे मन-ही-मन बाँचकर भगवान् शिवने देवीसे कहा—‘प्रिये ! सौभाग्यवश यह तुम्हारे पिताकी ही कृति है, इसको अच्छी तरह देख लो।’ यह सुनकर पार्वतीजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने महादेवजीके चरणोंमें प्रणाम करके प्रार्थना की—‘नाथ ! इस श्रेष्ठ लिंग-विग्रहमें आपको दिन-रात स्थित रहना चाहिये।’ ‘एवमस्तु—ऐसा ही होगा’ यों कहकर महादेवजीने पुनः पार्वतीसे कहा—‘वरणा नदीके जलमें स्नान करके जिनके द्वारा शैलेश्वर शिवकी पूजा होगी तथा जो पितरोंका
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तर्पण करके प्रसन्नतापूर्वक अपनी शक्तिके अनुसार दान देंगे, उनकी इस संसारमें पुनरावृत्ति नहीं होगी। शुभे! शैलेश्वर नामवाले इस महालिंगमें मैं सदा निवास करूँगा तथा जो इस लिंगका पूजन करेगा उस मनुष्यको मैं परम मोक्ष प्रदान करूँगा। जो वरणाके सुन्दर तटपर शैलेश्वरका दर्शन करेंगे, काशीमें निवास करनेवाले उन लोगोंको कभी दुःख नहीं दबा सकेगा।'
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रत्नेश्वर लिंगकी महिमा
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! शैलेश्वरका दर्शन करके पार्वतीसहित भगवान् शिव उस स्थानपर आये, जहाँ रत्नमय लिंग प्रकट हुआ था। सब प्रकारके रत्नोंसे प्रकट हुए उस शुभ लिंगका दर्शन करके भवानीने शंकरजीसे पूछा—'देवदेव! जगन्नाथ! आप सब भक्तोंको अभय देनेवाले हैं, यह लिंग कहाँसे प्रकट हुआ है? इसका मूल तो सातों पातालतक चला गया है! इसका क्या नाम है, क्या स्वरूप है और क्या प्रभाव है?'
महादेवजी बोले—देवि! तुम्हारे पिता गिरिराज हिमवान् तुम्हें देनेके लिये बहुतसे रत्नोंका भार यहाँ ला रहे थे, उन्हीं रत्नोंको यहाँ जमा करके वे पुनः अपने घर लौट गये। तुम्हारे या मेरे लिये काशीमें जो कुछ श्रद्धापूर्वक समर्पित किया जाता है, उसका फल ऐसा ही होता है। यहाँ जितने भी शिवलिंग हैं, उन सबमें यह श्रेष्ठ रत्नरूप है तथा मोक्षरत्नको देनेवाला है। इसलिये इसका नाम रत्नेश्वर है। काशीमें इसका प्रभाव बहुत बड़ा है। तुम्हारे पिताने जो यहाँ स्वर्णराशि जमा की है, उसीसे तुम यहाँ इस शिवलिंगके लिये मन्दिर बनवा दो। शिवमन्दिर बनानेसे या टूटे-फूटे मन्दिरकी मरम्मत करनेसे शिवलिंग-स्थापनका पुण्य अनायास ही प्राप्त हो जाता है।
'बहुत अच्छा' कहकर देवी पार्वतीने शिवमन्दिर बनवानेके लिये शिवनन्दी आदि असंख्य पार्षदोंको नियुक्त किया। उन पार्षदोंने एक ही पहरमें सुमेरुशिखरके समान सुन्दर सुवर्णमय मन्दिरका निर्माण कर दिया। तदनन्तर देवी पार्वतीने महादेव-जीको प्रणाम करके उस शिवलिंगकी महिमा पूछी।
श्रीमहादेवजीने कहा—देवि! यह कल्याणदायक शिवलिंग अनादिसिद्ध है। इस समय तुम्हारे पिताके पुण्य-गौरवसे प्रकट हुआ है। यह गोपनीय वस्तुओंमें परम गोपनीय है और इस क्षेत्रमें समस्त मनोवांछित वस्तुओंको देनेवाला है। कलियुगमें जो पापबुद्धिवाले मनुष्य हैं उनसे यह रहस्य प्रयत्नपूर्वक छिपाये रखनेयोग्य है। देवि! कोटि-कोटि रुद्रसूक्तोंके जपसे जो फल बताया गया है वह रत्नेश्वरकी पूजा करनेसे प्राप्त हो जाता है। सबको सब कुछ देनेवाले मेरे इस रत्नेश्वर लिंगका प्रभाव अनुपम है। इस लिंगकी आराधना करके सहस्रों सिद्धोंने सिद्धि प्राप्त की है। सुन्दरी! अबतक यह लिंग गुप्त रहा है, अब मेरे भक्त एवं तुम्हारे पिता हिमवान्ने अपने पुण्यसे उपार्जित महारत्नद्वारा रत्नेश्वरको प्रकट किया है। गिरिराजनन्दिनी! इस शिवलिंगमें मेरी निरन्तर प्रीति बनी रहती है। काशीमें इस शिवलिंगका यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये।
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कृत्तिवासेश्वर लिंगका प्राकट्य और उसकी महिमा
स्कन्दजी कहते हैं—कुम्भज ! इस प्रकार भगवान् शंकर जब रत्नेश्वर लिंगकी महिमाका वर्णन कर रहे थे इसी समय सब ओरसे 'रक्षा करो, रक्षा करो' का महान् कोलाहल सुनायी दिया। लोग कह रहे थे 'यह वीर्यके मदसे उन्मत्त गजासुर आ रहा है जो महिषासुरका पुत्र है। वह जहाँ-जहाँ पृथ्वीपर पैर रखता है वहाँ-वहाँ उसके भारसे पृथ्वी डगमगाने लगती है। वह ब्रह्माजीके द्वारा कामदेवसे हारे हुए स्त्री-पुरुषोंसे अवध्य होनेका वरदान पाकर तीनों लोकोंको तृणके समान समझता है।'
तब त्रिशूलधारी भगवान् शिवने अपनी ओर आते हुए उस दैत्यको दूसरेसे अवध्य जानकर उसके ऊपर त्रिशूलका प्रहार किया। गजासुर उस त्रिशूलमें गुँथ गया और अपनेको भगवान्के सिरपर छत्र बना हुआ-सा मानकर उनसे इस प्रकार बोला—'शूलपाणे ! देवेश्वर ! मैं जानता हूँ, आपने कामदेवको परास्त किया है। अतः आपके हाथसे मेरा वध होना श्रेष्ठ ही है। मृत्युंजय ! मेरी एक बात सुनिये। एकमात्र आप ही सम्पूर्ण विश्वके लिये वन्दनीय हैं और सबके ऊपर विराजमान हैं। फिर भी आज मैं आपके भी ऊपर स्थित हूँ। अतः मेरी ही विजय हुई है। आपके त्रिशूलके अग्रभागपर स्थित होकर आज मैं धन्य और अनुगृहीत हूँ। एक दिन सभीको कालके द्वारा मरना है, परंतु ऐसी मृत्यु परम कल्याणके लिये होती है।'
उसका ऐसा वचन सुनकर कृपानिधान भगवान् शिव हँसते हुए बोले—गजासुर ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम अपने अनुकूल कोई वर माँगो।
गजासुर बोला—दिगम्बर ! यदि आप प्रसन्न हों तो मेरे इस चमड़ेको वस्त्रके स्थानमें धारण करें। इससे सदैव उत्तम गन्ध निकले और यह सदा अत्यन्त कोमल बना रहे। इसमें कभी किसी प्रकारकी मैल न बैठे और यह आपके अंगमें महान आभूषणकी भाँति सुशोभित हो। तपोधनोंकी महातपस्याजनित अग्निज्वालाको पाकर भी मेरा यह चर्म दग्ध नहीं हुआ है, अतः यह पुण्य और सुगन्धकी निधि है। इसे धारण करके आजसे आपका नाम 'कृत्तिवासा' हो जायगा।
तब 'एवमस्तु' कहकर भगवान् शंकर बोले—दैत्य ! इस मुक्तिक्षेत्रमें तुम्हारा यह शरीर सबको मोक्ष देनेवाला मेरा लिंगविग्रह हो जाय। इसका नाम कृत्तिवासेश्वर होगा और यह बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला होकर समस्त शिवलिंगोंका शिरोमणि होगा। रुद्र, पाशुपत, सिद्ध, ऋषि, तत्त्वचिन्तक, शान्त (मनको वशमें रखनेवाले), दान्त (जितेन्द्रिय), क्रोधको काबूमें रखनेवाले, द्वन्द्वरहित, परिग्रहशून्य तथा मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले जो मेरे भक्त काशीपुरीमें रहकर मान और अपमानमें समभाव रखते तथा ढेला, पत्थर और सुवर्णको समान समझते हैं, उन सबपर अनुग्रह करनेके लिये मैं कृत्तिवासेश्वर लिंगमें सदा निवास करूँगा। द्वापर और कलियुगमें उत्पन्न होनेवाले पाप-बुद्धि मनुष्य भी कृत्तिवासेश्वरकी शरण लेकर सब पापोंसे मुक्त हो सुखसे मोक्ष प्राप्त कर लेंगे, ठीक उसी तरह, जैसे पुण्यात्मा पुरुष प्राप्त करते हैं। जो माघ (फाल्गुन) कृष्णा चतुर्दशी (शिवरात्रि)-को उपवासपूर्वक कृत्तिवासेश्वरका पूजन करते हुए रातमें जागरण करता है वह परम गतिको प्राप्त होता है।
ऐसा कहकर देवेश्वर शिवने गजासुरके उस महान् चर्मको लेकर अपने ऊपर ओढ़ लिया। कुम्भज ! जिस दिन दिगम्बर-देवने कृत्तिवासा नाम धारण किया उस दिन बड़ा भारी उत्सव हुआ। जहाँ पृथ्वीपर त्रिशूल गाड़कर उस दैत्यको छत्रके समान धारण किया गया था, वहाँ उस शूलको उखाड़नेसे एक बड़ा भारी कुण्ड बन गया। उस कुण्डमें स्नान और पितरोंका तर्पण करके कृत्तिवासेश्वरका दर्शन करनेवाला मनुष्य कृतार्थ हो जाता है। अगस्त्य ! कृत्तिवासेश्वरके
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समीप वह कुण्ड लोकमें हंसतीर्थके नामसे प्रसिद्ध है। इस तीर्थके सब ओर मुनियोंद्वारा स्थापित दस हजार दो सौ शिवलिंग हैं जिनमें कात्यायनेश्वर प्रथम और च्यवनेश्वर अन्तिम हैं। इनमेंसे एक-एक शिवलिंग भी अपनी पूजा की जानेपर समस्त काशीवासी मनुष्योंको सिद्धि देनेवाला है।
विभिन्न तीर्थोंके देवविग्रहोंका काशीमें आगमन और उनका स्थान
स्कन्दजी कहते हैं—जहाँ महादेवजीने लीलापूर्वक गजासुरके चर्मको ओढ़ा था, वह स्थान रुद्रावासके नामसे विख्यात हुआ। तदनन्तर महादेवजी पार्वतीजीके साथ स्वेच्छानुसार कृत्तिवास तीर्थमें निवास करने लगे। वहीं नन्दीने आकर उन्हें प्रणामपूर्वक यह सूचना दी—'भगवन् ! तीनों लोकोंमें जो शुभ एवं मुक्तिदायक तीर्थ और देवता हैं, उन सबको मैं यहाँ ले आया हूँ। कुरुक्षेत्रसे उस तीर्थके साथ स्थाणु लिंगका आगमन हुआ है। कुरुक्षेत्रस्थली लोलार्कसे पश्चिम भागमें स्थित है। वह सब सिद्धियोंको देनेवाली है। ढुण्ढिराजसे उत्तर भागमें साधकको सिद्धि प्रदान करनेवाला देवदेवेश्वर नामसे प्रसिद्ध लिंग है। यहाँ गोकर्णस्थानसे स्वयं ही प्रकट हुआ महाबल नामक शिवलिंग साम्बादित्यके समीप स्थित है। ऋणमोचनसे पूर्वभागमें शशिभूषण नामक लिंग प्रतिष्ठित है। ॐकारेश्वर महालिंगसे पूर्व महाकाल नामक शिवलिंग है जो दर्शनमात्रसे मोक्ष देनेवाला है। श्रेष्ठ तीर्थ पुष्करसे आकर अयोगन्धेश्वर नामक शिवलिंग यहाँ स्वतः प्रकट हुआ है। मत्स्योदरीके उत्तर भागमें उसकी स्थिति है। महोत्कटेश्वर लिंग मरुत्कोटिसे आकर यहाँ प्रकट हुआ है। वह कामेश्वरके उत्तर भागमें है। विमलेश्वर लिंग भी विश्वस्थानसे यहाँ आया है। स्वर्नीलेश्वरसे पश्चिम भागमें उसका दर्शन होता है। जो मनुष्य इस अविमुक्त क्षेत्रमें महादेवजीका दर्शन करेगा, वह कहीं भी क्यों न मृत्युको प्राप्त हो, निश्चय ही भगवान् शिवके लोकमें जायगा। जिस लिंगस्वरूप महादेवने कल्पान्तरमें भी काशीपुरीका कभी त्याग नहीं किया, वह हिरण्यगर्भतीर्थसे पश्चिममें हैं। गयातीर्थसे यहाँ पितामहेश्वर लिंगका आगमन हुआ है, जो यहाँ फल्गु आदि साढ़े आठ करोड़ तीर्थोंके साथ वर्तमान है। प्रयागतीर्थके साथ शूलटंकेश्वर नामक महादेव वहाँसे स्वयं यहाँ आकर स्थित हुए हैं। परम सुन्दर मुक्तिमण्डपसे दक्षिण दिशामें उनका स्थान है। शंकुकर्ण नामक महाक्षेत्रसे यहाँ आकर महातेज नामक लिंग प्रकट हुआ है। उसका स्थान विनायकेश्वरसे पूर्वभागमें है। रुद्रकोटि नामक परम पावन तीर्थसे यहाँ स्वयं आकर महायोगीश्वर लिंग प्रकट हुआ है। वह पार्वतीश्वर लिंगके समीप स्थित है। उसके मन्दिरके सब ओर करोड़ों रुद्र-मन्दिर हैं, जो रुद्रमूर्तियोंद्वारा बड़े सुन्दर बनाये गये हैं। काशीमें वेदवादी विद्वान् उसे रुद्रस्थली कहते हैं। रुद्रस्थलीमें जिनकी मृत्यु हुई है वे कृमि, कीट, पतंग, पशु, पक्षी, मृग, मनुष्य, यज्ञदीक्षित यजमान अथवा म्लेच्छ ही क्यों न हों—साक्षात् रुद्रस्वरूप हो जाते हैं और उनका इस संसारमें पुनरागमन नहीं होता। कोई सकाम हो या निष्काम अथवा पशु-पक्षीकी योनिमें ही क्यों न हो, यदि वह रुद्रस्थलीमें प्राण त्याग करता है तो उत्तम मोक्षको प्राप्त होता है। एकाम्बर क्षेत्रसे स्वयं भगवान् कृत्तिवासा यहाँ पधारे हैं। वे यहाँके कृत्तिवासेश्वर लिंगमें प्रतिष्ठित हैं। इस स्थानमें पार्वती और ऋषियोंके साथ भगवान् शिव स्वयं ही अपने भक्तोंके कानमें वेदोंद्वारा प्रशंसित तारक ब्रह्मका उपदेश करते हैं। साक्षात् भगवान् चण्डीश्वर मरु-जांगल क्षेत्रसे आकर इस सिद्धिदायक क्षेत्रमें विराज रहे हैं। कालञ्जरसे भगवान् नीलकण्ठ स्वयं ही इस तीर्थमें पधारे हैं और दन्तकूट नामक गणेशजीके समीप उनका स्थान है। काश्मीरसे बीजेश्वर लिंग
८६८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
यहाँ प्राप्त हुआ है। इसकी स्थिति शालकंटकटसे पूर्व भागमें है। त्रिदण्डापुरीसे यहाँ आये हुए भगवान् ऊर्ध्वरेता कूष्माण्ड गणेशजीको आगे करके स्थित हैं। मण्डलेश्वर क्षेत्रसे प्राप्त हुआ श्रीकण्ठ नामक लिंग मण्डविनायकसे उत्तर दिशामें स्थित है। महातीर्थ छागलाण्डसे पधारे हुए कपर्दीश्वर नामक शिव यहाँके पिशाचमोचन तीर्थमें स्वयं प्रकट हुए हैं। सूक्ष्मेश्वर लिंगका शुभागमन आम्रातकेश्वर क्षेत्रसे हुआ है। विकटदन्त नामक गणेशके समीप उनकी स्थिति है। मधुकेश्वर क्षेत्रसे पधारे हुए भगवान् जयन्तेश्वर यहाँ लम्बोदर गणेशके पूर्वमें स्थित हैं। श्रीशैलसे आकर त्रिपुरान्तक नामवाले देवेश्वर यहाँ प्रकट हुए हैं। श्रीविश्वनाथजीके पश्चिम भागमें स्थित भगवान् कुक्कुटेश्वर सौम्यस्थानसे यहाँ आये हैं। वे वक्रतुण्ड गणेशके समीप स्थित हैं। जालेश्वर तीर्थसे त्रिशूलीश्वरने पदार्पण किया है। वे कूटदन्त गणेशके पूर्व भागमें स्थित हैं। महाक्षेत्र रामेश्वरसे जटाधारी देव पधारे हैं जो एकदन्त गणेशके उत्तर भागमें पूजित होते हैं। त्रिसन्ध्य क्षेत्रसे भगवान् त्र्यम्बकका शुभागमन हुआ है जो त्रिमुखसे पूर्व भागमें स्थित हैं। हरिश्चन्द्र क्षेत्रसे यहाँ भगवान् हरेश्वर पधारे हैं। ये हरिश्चन्द्रेश्वरके पूर्व भागमें पूजित होते हैं। मध्यमकेश्वर स्थानसे भगवान् शर्वका आगमन हुआ है। वे चतुर्वेदेश्वर लिंगको आगे करके स्थित हैं। स्थलेश्वर तीर्थसे यहाँ यज्ञेश्वर नामक महालिंग प्रकट हुआ है। सुवर्ण क्षेत्रसे सहस्राक्ष नामक शिवलिंगका शुभागमन हुआ है जो शैलेश्वरसे दक्षिणमें स्थित है। हर्षित क्षेत्रसे प्राप्त हुए हर्षितेश्वर शिव मन्त्रेश्वरके समीप हैं। रुद्रमहालय क्षेत्रसे यहाँ रुद्रका आगमन हुआ है। भगवान् रुद्रेश्वर त्रिपुरेश्वरके समीप स्थित हैं। वृषेश्वर नामक महादेवजी वृषभध्वजतीर्थसे आकर बाणेश्वर लिंगके समीप स्थित हैं। ईशानेश्वर महादेव केदार क्षेत्रसे यहाँ आये हैं। प्रह्लादकेशवसे पश्चिम भागमें उनका दर्शन करना चाहिये। उत्तरवाहिनी गंगाके जलमें स्नान करके ईशानेश्वरकी पूजा करनेवाला मनुष्य ईशानके ही समान कान्तिमान् होकर उनके धाममें निवास करता है। भैरव क्षेत्रसे यहाँ परम मनोहर भैरव-मूर्ति प्राप्त हुई है जो खर्वविनायकसे पूर्वमें स्थित है। सिद्धिदायक भगवान् उग्र कनखलतीर्थसे यहाँ प्रकट हुए हैं। अर्कविनायकसे पूर्वमें स्थित उग्र लिंगकी पूजा करनेसे अत्यन्त उग्र उपद्रव भी शान्त हो जाते हैं। वस्त्रापथ नामक महान् क्षेत्रसे भगवान् भव स्वयं यहाँ आकर भीमचण्डीके समीप प्रकट हुए हैं। पातकोंको दण्ड देनेवाले भगवान् दण्डी देवदारु वनसे काशीमें आकर लिंगरूपसे यहाँ निवास करते हैं। देहलीविनायकसे पूर्व-दिशामें दण्डीश्वरकी पूजा करनी चाहिये। उनकी पूजासे मनुष्योंका पुनर्जन्म नहीं देखा जाता है। भद्रकर्ण कुण्डसे साक्षात् भद्रकर्णेश्वर शिव यहाँ आये हैं, उद्दण्ड गणेशसे पूर्वदिशामें उनका उत्तम तीर्थ है। यमलिंग नामक महातीर्थसे आकर काललिंग यहाँ स्थित हुआ है। जो मनुष्य मंगलवार तथा चतुर्दशी तिथिके योगमें यहाँकी यात्रा करेगा वह अतिपातकयुक्त होनेपर भी यमलोकमें नहीं जायगा। नेपाल नामक महाक्षेत्रसे साक्षात् भगवान् पशुपति यहाँ पधारे हैं। यहाँ पिनाकपाणि भगवान् शिवने पाशुपत योगका उपदेश किया है। करवीरकतीर्थसे कपालीश्वरने यहाँ पदार्पण किया है। कपालमोचनतीर्थमें उनका प्रयत्नपूर्वक दर्शन करना चाहिये। महेश्वर क्षेत्रसे आकर दीप्तेश्वर नामक लिंग भगवान् उमापतिके समीप स्थित है। गंगासागरतीर्थसे अमरेशलिंगका शुभागमन हुआ है। सप्तगोदावरीतीर्थसे भगवान् भीमेश्वर पधारे हैं और लिंगरूपी होकर यहाँ निवास करते हैं। भूतेश्वर क्षेत्रसे आकर भस्मगात्र नामक लिंग यहाँ स्थित हुआ है जो भीमेश्वरसे दक्षिण भागमें है। नकुलीश्वरतीर्थसे भक्तभयहारी भगवान् स्वयम्भू नामक शिव पधारकर काशीमें स्वयं प्रकट हुए हैं। प्रयागतीर्थके समीप धरणीवराह नामक देवका मन्दिर है जो विन्ध्याचलसे यहाँ प्राप्त हुआ है। कर्णिकार क्षेत्रसे आये हुए कर्णिकार नामक
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गणेशजी पूज्य हैं। हिमकूट पर्वतसे विरूपाक्ष नामक शिवलिंग यहाँ आकर प्रकट हुआ है, जो कि महेश्वरसे दक्षिणमें स्थित हुआ है। हरिद्वारसे हिमके समान कान्तिमान् हिमस्थेश नामक लिंगका आगमन हुआ है जो ब्रह्मनालसे पश्चिममें दर्शन करनेयोग्य है। कैलाशसे गणेशजी तथा अन्य महाबली सात करोड़ पार्षद यहाँ पधारे हैं। उन सबने सात स्वर्गके समान दुर्ग बनाये हैं। फिर काशीके चारों ओर उन्होंने पर्वतके समान ऊँचा परकोटा तैयार किया है। साथ ही गहरी खाई भी तैयार की है जो मत्स्योदरीके जलसे भरी हुई है। बाहर और भीतरके भेदसे मत्स्योदरी दो भागोंमें विभक्त है। उसका जल गंगाके जलसे मिला हुआ है। अतः वह महातीर्थके रूपमें प्रसिद्ध है। जब संहारमार्गसे अर्थात् उलटा बहकर गंगाजीका जल इस मत्स्योदरीमें फैलता है तब मत्स्योदरीतीर्थका जल भारी पुण्यसे ही प्राप्त होता है। उस समय सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण होनेपर पर्व शतकोटिगुना होकर प्राप्त होता है। मत्स्योदरीमें जहाँ-कहीं भी स्नान करके जो मनुष्य पितरोंको पिण्डदान करते हैं, वे फिर कभी माताके गर्भमें शयन नहीं करते। जब गंगाका जल चारों ओर फैल जाता है, तब यह अविमुक्त क्षेत्र मत्स्यके आकारका दिखायी देता है।
गन्धमादन पर्वतसे आकर भूर्भुवः नामक लिंग यहाँ स्वयं प्रकट हुआ है जो गणेशजीसे पूर्व भागमें स्थित है। पातालगंगासहित हाटकेश्वर महालिंग स्वयं सात पाताल-तलसे यहाँ आकर प्रकट हुआ है। वह लिंग ईशानेश्वरसे पूर्वमें है। आकाशके नक्षत्र-लोकसे यहाँ ज्योतिर्मय लिंग आकर प्रकट हुआ है। यह तारकेश्वर लिंग ज्ञानवापीसे पूर्व भागमें स्थित है। पूर्वकालमें महादेवजीने जहाँ किरातरूप धारण किया था, उस किराततीर्थसे किरातेश्वर लिंग यहाँ आकर प्रकट हुआ है। लंकापुरीसे मरुकेश्वर नामक लिंगका आगमन हुआ है, वह नैर्ऋत्य भागमें स्थित होनेके कारण नैर्ऋत्येश्वर नामसे भी प्रसिद्ध है और पौलस्त्यराघवसे पश्चिम-दिशामें पूजित होता है। स्थलतीर्थसे आया हुआ परम पुण्यमय जलप्रिय लिंग यहाँ गंगाजीके जलमें स्थित है। कोटीश्वरतीर्थसे आया हुआ श्रेष्ठ लिंग ज्येष्ठेश्वरके पश्चिम भागमें विराजमान है। बड़वानलके मुखसे प्रकट हुआ अनलेश्वर नामक लिंग यहाँ नलेश्वरके अग्रभागमें स्थित है। देवोंके देव त्रिलोचन महादेव वीरजतीर्थसे यहाँ आकर अनादिसिद्ध त्रिविष्टप लिंगमें स्थित हैं। अमर-कण्टकसे आकर ओंकारेश्वर महादेव यहाँके पुण्यमय पिलपिलातीर्थमें प्रकट हुए हैं। जब यहाँ गंगा नहीं आयी थी और जिस समय त्रिलोकीका उद्धार करनेके लिये यहाँ काशीपुरीका आविर्भाव हुआ था, तभीसे वह आदिलिंग प्रकट हुआ है। भगवन्! इस प्रकार मैं इन सब स्थानोंके श्रीविग्रहोंको काशीपुरीमें ले आया हूँ। अपने-अपने स्थानमें तो उन्हें अंश मात्रसे ही रख छोड़ा है। उन सब देवताओंके यहाँ गगनचुम्बी सुन्दर मन्दिर भी बन गये हैं। महेश्वर! अब इस समय मेरे लिये क्या आज्ञा है, जिसका पालन करूँ? यदि कोई कार्य हो तो उसे कृपापूर्वक बतावें।'
स्कन्दजी कहते हैं— नन्दीकी यह बात सुनकर
८७० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
देव-देवेश्वर शिवजीने कहा—'यह तुमने बहुत अच्छा किया। अब चण्डिकाओंको उपयुक्त कार्योंमें नियुक्त करो। यहाँ नौ करोड़ चामुण्डाएँ रहती हैं। उनके देवता, भूत, बेताल और भैरव भी उनके साथ ही हैं। उनको पुरीकी रक्षाके कार्यमें लगाओ और प्रत्येक दुर्गमें उनको बसाओ।' इस प्रकार आज्ञा देकर महादेवजी पार्वतीके साथ त्रैविष्टप क्षेत्रमें चले गये। नन्दीने परमेश्वर शिवकी आज्ञाको शिरोधार्य करके सब दुर्गाओंको बुलाया और उन्हें प्रत्येक दुर्गमें यथास्थानपर बसाया।
दैत्योंसहित दुर्गमासुरका देवी और उनकी शक्तियोंके साथ युद्ध
स्कन्दजी कहते हैं—अगस्त्य! पूर्वकालमें दुर्ग नामक एक महान् दैत्य हुआ था, जो तीव्र तपस्या करके पुरुषमात्रसे अवध्य होनेका वरदान प्राप्त कर चुका था। वह रुरु दैत्यका पुत्र था। उसने भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक आदि समस्त लोकोंको बाहुबलसे जीतकर अपने अधीन कर लिया था। उसके भयसे पीड़ित होकर ब्राह्मण वेदाध्ययन नहीं कर पाते थे। उसके दुर्धर्ष सैनिकोंने यज्ञशालाओंका विध्वंस कर दिया था।
संसारमें वे ही लोग धन्य हैं जो विपत्तिमें पड़ जानेपर भी दीनतासे प्रेरित होकर धनसे मलिन चित्तवाले पुरुषोंके आँगनमें कभी नहीं जाते। किसीके सामने छोटा न बनकर शानसे मर जाना भी अच्छा है, परंतु संसारमें लघुता (अपमान)-से युक्त अमरत्व भी प्राप्त हो तो वह अच्छा नहीं है। लोकमें उन्हींका जीवन सफल है और वे ही पुण्यात्मा हैं, जिनका चित्तरूपी समुद्र विपत्तिमें भी गम्भीरताका त्याग नहीं करता।१ जगत्में कभी सम्पत्ति प्राप्त होती है और कभी विपत्ति। भाग्यवश इन दोनोंको प्राप्त करके भी धीर पुरुष अपनी धीरता न छोड़े। जो आपत्तिमें पड़नेपर दीनताग्रस्त होकर मरता है, उसके इहलोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाते हैं। इसलिये दीनताको त्याग देना चाहिये। जो आपत्तिमें भी धैर्य नहीं छोड़ते उनकी धीरतासे तिरस्कृत होकर इहलोक या परलोकमें कहीं भी विपत्ति फिर उनके पास नहीं आती २। स्वर्गका राज्य छिन जानेपर देवतालोग भगवान् महेश्वरकी शरणमें गये। तब सर्वज्ञ शिवजीने उस असुरका नाश करनेके लिये देवीको आदेश दिया। भगवान् महेश्वरकी आज्ञा पाकर भवानीने देवसमूहको अभयदान देकर युद्धके लिये उद्योग किया। उन्होंने कमनीय कान्तिसे तीनों लोकोंमें सर्वाधिक सुन्दरी रुद्रशक्ति कालरात्रिको बुलाकर उस देवद्रोही दैत्यको युद्धके लिये ललकारनेके निमित्त भेजा। कालरात्रिने उस दैत्यके पास जाकर कहा—'दैत्यराज! तू त्रिभुवनकी सम्पत्तिका त्याग कर दे। त्रिलोकीका राज्य इन्द्रको प्राप्त हो और तू रसातलको चला जा, जिससे वेद-वादियोंकी सम्पूर्ण वैदिक क्रियाएँ बेरोक-टोक चलती रहें। यदि तुझे अपने बलका थोड़ा भी घमण्ड हो तो युद्धके लिये आ जा। अन्यथा, इन्द्रकी शरण ले। इन दोनोंमेंसे जो उचित जान पड़े, वही कर।'
महाकालीका यह वचन सुनकर दैत्यराज दुर्ग क्रोधसे जल उठा और सेवकोंसे बोला—पकड़ो,
१- विपद्यपि हि ते धन्या न ये दैन्यप्रणोदिताः। धनैर्मलिनचित्तानामालभन्तेऽङ्गनं क्वचित्॥
पञ्चत्वमेव हि वरं लोके लाघववर्जितम्। नामरत्वमपि श्रेयो लाघवेन समन्वितम्॥
त एव लोके जीवन्ति पुण्यभाजस्तु एव वै। विपद्यपि न गाम्भीर्यं यच्चेतोऽब्धिः परित्यजेत्॥
(स्क० पु०, का० उ० ७९।१६-१८)
२- आपद्यपि हि ये धीरा इहलोके परत्र च। न तान् पुनः स्पृशेदापत्तद्धैर्येणावधीरिता॥
(स्क० पु०, का० उ० ७९।२२)
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८७१
पकड़ लो इसे। इसीको प्राप्त करनेके लिये मैंने देवर्षियों तथा राजाओंको बन्दी बनाया है। आज मेरे सौभाग्यका उदय होनेसे यह अनायास ही प्राप्त हो गयी। अन्तःपुरके रक्षको! इसे मेरे अन्तःपुरमें ले जाओ।
दैत्यराजके ऐसा कहनेपर जब रनिवासके रक्षक उस देवीको लेनेके लिये आये, तब उसने दैत्यराजसे कहा—दैत्यराज! हमलोग तो दूतियाँ हैं। दूतियाँ सदैव परवश होती हैं। कोई क्षुद्र पुरुष भी दूतको कभी पीड़ा नहीं देते, फिर जो तुझ-जैसे महाबली हैं, राजा हैं, वे ऐसा कैसे कर सकते हैं? हमलोगोंकी जो स्वामिनी हैं उनको संग्राममें जीतकर तू हम-जैसी सहस्रों स्त्रियोंका यथेष्ट उपभोग कर सकता है।
कालरात्रिका यह वचन सुनकर काम और क्रोधसे मोहित हुए असुरने मृत्युकी दूतीके तुल्य उस एक ही दूतीको अपने लिये बहुत माना और अन्तःपुरके रक्षकोंको आदेश दिया कि 'इसे शीघ्र रनिवासमें पहुँचाओ।' दैत्यकी यह आज्ञा पाकर अन्तःपुरकी रक्षा करनेवाले सब खोजे उसे पकड़नेका उद्योग करने लगे, किंतु देवीने उन्हें पास आते ही हुंकारजनित अग्निसे शीघ्र भस्म कर दिया। यह देख दैत्यराज दुर्गने तीस हजार दैत्योंको भेजा और कहा—'दानवो! इस दुष्टाको पाशोंसे बाँधकर शीघ्र ले आओ।' दैत्यराजका यह आदेश पाकर बड़े-बड़े दैत्योंने उसे पकड़नेका प्रयास किया, परंतु देवीके निःश्वासवायुसे आहत होकर सब दूर चले गये। तदनन्तर देवी कालरात्रि वहाँसे उड़कर आकाशमार्गसे गमन करने लगीं। तब सहस्रों महादैत्य उनके पीछे लग गये। दैत्यराज दुर्गने भी दैत्योंकी असंख्य सेनाके साथ प्रस्थान किया। उस समय महादेवी विन्ध्याचलमें निवास करती थीं। कालरात्रिने वहाँ आकर देवीका दर्शन किया और दुर्गके अपराध भी कह सुनाये। दैत्यराज दुर्गने भी महादेवीको देखकर अपने सेनापतियोंको आदेश दिया—'वीरो! तुममेंसे जो कोई भी धैर्य, बुद्धि, बल अथवा छलसे भी इस विन्ध्यवासिनीको मेरे समीप ले आयेगा, उसे मैं अवश्य इन्द्रका पद दे दूँगा।'
दानवराजका यह वचन सुनकर दैत्य दोनों हाथ जोड़े हुए उच्चस्वरसे बोले—महाराज! यह कौन-सा कठिन कार्य है। एक तो वह अनाथ, दूसरे अबला। भला, उसको पकड़ लानेमें महान् प्रयत्नकी क्या आवश्यकता है। राजन्! आप हमारा पुरुषार्थ तो देखिये। हम केवल अपने बल-पराक्रमसे ही उस स्त्रीको आपके पास पकड़ लाते हैं।
ऐसा कहकर वे सब दैत्य एक ही साथ चल पड़े, सब ओरसे रणभेरियाँ बज उठीं। दैत्योंका यह आक्रमण देखकर देवता भी भयसे त्रस्त हो उठे, धरती काँपने लगी। तब महादेवीने अपने श्रीअंगोंसे सहस्रों शक्तियोंको प्रकट किया। उन शक्तियोंने इन महाबली दैत्योंकी सेनाके प्रत्येक सैनिकको आगे बढ़नेसे रोक दिया। मानो सीमाका उल्लंघन करके उमड़ता हुआ समुद्र ही रोक दिया गया हो। महादैत्योंने उस युद्धमें जिन-जिन भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार किया, उन सबको शक्तियोंने तृणके समान समझकर हाथमें ले-लेकर फेंक दिया। तब दैत्योंने मेघोंके समान अनेक प्रकारके अस्त्रों, वृक्षों तथा पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा की। यह देख विन्ध्यपर्वतपर निवास करनेवाली महामायाने प्रचण्ड धनुष लेकर उसपर वायव्यास्त्रका अनुसन्धान किया और उसके द्वारा शस्त्रास्त्रसमूहोंको लीलापूर्वक दूर फेंक दिया। तब महासुर दुर्गने अपनी सेनाको शस्त्रहीन देख एक जलती हुई शक्ति हाथमें ली और उसे देवीके ऊपर दे मारा, परंतु देवीने अपनी ओर आती हुई उस महावेगवती शक्तिको अपने धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा चूर्ण कर डाला। शक्तिको टूटी हुई देख उस महादैत्यने चक्र चलाया, किंतु देवीके सैकड़ों बाणोंसे वह बीचमें ही कटकर टूक-टूक हो गया। तब दैत्यने सींगका बना हुआ धनुष लेकर देवीकी छातीमें ताककर बाण मारा, परन्तु देवीने कालदण्डके समान उस बाणको अपने
८७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
शीघ्रगामी बाणसे मारकर रोक दिया। यह देख दुर्गमासुरने प्रलयाग्निके समान प्रज्वलित शूल लेकर बड़े वेगसे देवीके ऊपर चलाया, किंतु चण्डिकाने अपने शूलद्वारा उसे बीचमें ही काट दिया। शूलके असफल होनेपर दैत्यराज दुर्ग गदा हाथमें लेकर सहसा कूद पड़ा और देवीकी भुजामें आघात किया। देवीकी भुजासे टकराते ही उस गदाके टूट-फूटकर सहस्रों टुकड़े हो गये। तदनन्तर देवीने अपने बायें पैरसे दैत्यराजकी छातीमें मारा। इससे दैत्यराज घायल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और उसके हृदयमें बड़ी पीड़ा हुई। गिरनेके बाद पुन: उसी क्षण वह उठकर खड़ा हुआ और सहसा अदृश्य हो गया। उस समय जगदम्बाकी प्रेरणासे उनकी शक्तियाँ दैत्योंकी सेनामें इस प्रकार विचरण करने लगीं, जैसे प्रलयकालमें मृत्युकी सेना संसारमें विचरण करती है।
दुर्गदैत्यका वध, देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति और दुर्गा नामकी प्रसिद्धि
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! देवीकी शक्तियोंने दैत्योंकी विशाल सेनाको उसी प्रकार नष्ट कर दिया, जैसे प्रलयाग्निकी लपटें समस्त संसारको दग्ध कर देती हैं। इतनेमें ही दैत्यराज दुर्ग बादलोंकी आड़में खड़ा हो प्रचण्ड आँधी और बवण्डरके साथ कंकड़-पत्थरोंकी वर्षा करने लगा। तब महादेवीने शोषणास्त्रका प्रयोग करके पानी और पत्थरोंकी वर्षाको क्षणभरमें रोक दिया। यह देख दैत्यराजने क्रोधमें पर्वतके शिखरको उखाड़कर आकाशसे ही देवीके ऊपर गिराया। अपने ऊपर गिरते हुए उस पर्वतशिखरको देखकर महादेवीने वज्रके प्रहारसे उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। तब वह दैत्य हाथीका स्वरूप धारण करके अपने कुण्डलमण्डित मस्तकको डुलाता हुआ शीघ्रतापूर्वक देवीके सम्मुख दौड़ा। उस पर्वताकार हाथीको आते देख भगवतीने शीघ्रतापूर्वक पाशसे बाँधकर उसकी सूँड़को तलवारसे काट डाला। तदनन्तर उसने भैंसेका स्वरूप धारण किया और अपने सींगोंसे पर्वतोंको उखाड़कर देवीके ऊपर फेंका। उसके उपद्रवसे समस्त ब्रह्माण्डको व्याकुल देखकर भगवतीने दानवपर त्रिशूलसे आघात किया। तब वह भैंसेका रूप छोड़कर सहस्र भुजाधारी पुरुष बन गया और देवीका हाथ पकड़कर उन्हें आकाशमें खींच ले गया। वहाँ ऊँचेसे उसने जगदम्बिकाको छोड़ दिया और क्षणभरमें बाणोंके जालसे उन्हें आच्छादित कर दिया। तब महादेवीने अपने बाणोंसे शरसमूहको काटकर एक महाबाणके द्वारा उस दैत्यको बींध डाला। देवीका वह बाण दैत्यकी छातीमें घुस गया, उसकी आँखें नाचने लगीं और वह अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। महापराक्रमी दुर्गके गिरते ही देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं। समस्त संसारमें उल्लास छा गया। सूर्य, चन्द्रमा और अग्निदेवको अपने खोये हुए तेजकी प्राप्ति हुई। तदनन्तर सब देवता फूलोंकी वर्षा करते हुए महर्षियोंके साथ वहाँ आये और महादेवीकी स्तुति करने लगे।
देवता बोले—सम्पूर्ण जगत्का धारण-पोषण करनेवाली महादेवि! तुम्हें नमस्कार है। तीनों लोकोंकी उत्पत्तिकी आधारभूता महामहेश्वरकी शक्ति! तुम दैत्यरूपी वृक्षोंको काटनेके लिये कुठार हो, तुम्हें नमस्कार है। त्रैलोक्यव्यापिनी कल्याणमयी शिवे! तुम्हें नमस्कार है। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाली तथा अपने व्यग्र हाथोंमें शार्ङ्ग-धनुषको उठानेवाली विष्णुस्वरूपे देवि! तुम्हें नमस्कार है। सबकी सृष्टि करनेवाली, प्राचीनोंकी भाषा, संस्कृतिकी जन्मभूमि तथा हंसकी सवारीसे यात्रा करनेवाली चतुराननस्वरूपे देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हीं इन्द्र, कुबेर, वायु, वरुण, यम, निर्ऋति, ईशान और अग्निकी शक्ति हो, तुम्हीं चन्द्रमाकी चाँदनी और सूर्यकी शक्ति प्रभा हो। तुम्हीं सर्वदेवमयी
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८७३
शक्ति और तुम्हीं परमेश्वरी हो। तुम्हीं गौरी हो, तुम्हीं सावित्री हो और तुम्हीं गायत्री एवं सरस्वती हो। तुम्हीं प्रकृति, तुम्हीं मति और तुम्हीं अहंकारस्वरूपा हो। तुम्हीं चित्त और समस्त इन्द्रियरूप हो, पंचतन्मात्राएँ भी तुम्हारा ही स्वरूप हैं। पंचमहाभूत-स्वरूपा जगदम्बिके! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हीं शब्दादि विषयरूपिणी हो, तुम्हीं इन्द्रियोंकी अधिष्ठातृ देवता हो, देवि! तुम्हीं ब्रह्माण्डकी सृष्टि करनेवाली हो तथा इस ब्रह्माण्डके भीतर भी तुम्हीं व्याप्त हो। महादेवि! तुम्हीं पराशक्ति और तुम्हीं परापर (कार्य-कारण)-स्वरूपा तथा तुम्हीं पर और अपरसे भी परे रहनेवाली परमात्मस्वरूपिणी हो। ईशानि! तुम्हीं सर्वरूपा हो और तुम्हीं सर्वव्यापिनी निराकारस्वरूपा हो। महामाये! तुम्हीं चित्-शक्ति, तुम्हीं स्वाहा और तुम्हीं स्वधा हो। अकृतस्वरूपे! वषट् और वौषट् भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं प्रणव हो तथा अन्य सब मन्त्र भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। ब्रह्मा आदि सब देवता तुमसे ही उत्पन्न हुए हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों वर्ग तुम्हारे ही स्वरूप हैं। चारों पुरुषार्थरूपी फलका उदय तुम्हींसे होता है। यह सम्पूर्ण विश्व तुम्हींसे उत्पन्न हुआ है, तुम्हींमें स्थित है और तुम्हींमें इसका लय होता है। तुम्हीं जगत्की आधारशक्ति हो। दृश्य, अदृश्य, स्थूल और सूक्ष्मरूपसे जो कुछ उपलब्ध होता है, सबमें तुम्हीं शक्तिरूपसे विद्यमान हो। तुम्हारे बिना कहीं किसी भी वस्तुकी स्थिति नहीं है। प्रणतजनोंको सदा शरण देनेवाली देवि! मातः! आज तुमने महादैत्यपति दुर्गको, जो स्वभावसे ही देवताओंके विरुद्ध दैत्यसेनाको प्रेरित करता रहता था, मारकर हमारी रक्षा की है। तुम्हारे सिवा दूसरा कौन है, जिसकी शरणमें हम जायँ? तुम्हीं हमें शरण देनेवाली हो। अहो! इस युद्धमें वह दुर्ग नामक दैत्य तुम्हारे अमृतमय दृष्टिपातको पाकर जो मृत्युके अधीन हुआ है, यह बड़ी ही अद्भुत बात है। भवानी! आज हमलोगोंने यह जान लिया कि तुम्हारी दृष्टिमें पड़कर कोई दुष्ट भी दुर्गतिको नहीं प्राप्त होता। देवि! आपकी शस्त्राग्निमें पतंगोंकी भाँति जलकर भी दैत्यलोग सूर्यकी-सी कान्ति प्राप्त करके दिव्य धामको जा रहे हैं। सच है, संतपुरुष दुष्टोंके प्रति भी दुष्टबुद्धि नहीं करते, अपितु साधुओंके प्रति जैसा स्नेह रखते हैं वैसा ही स्नेह उन दुष्टोंके प्रति भी रखकर उन्हें अपना मार्ग प्रदान करते हैं। मृडानी! हम तुम्हारे चरणोंमें नतमस्तक हैं, तुम सदा अब ओरसे हमारी रक्षा करो। भवानी! तुम प्रतिक्षण पग-पगपर विपत्तियोंसे हम सबकी रक्षा करो।
इस प्रकार जगदम्बाकी स्तुति करके ऋषि, गन्धर्व और चारणोंसहित इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंने जगदम्बाके चरणोंमें बारंबार प्रणाम किया। तब सन्तुष्ट हुई जगन्माता महादेवीने उन श्रेष्ठ देवताओंसे कहा—'आजसे सब देवता पहलेकी भाँति अपने-अपने अधिकारोंका पालन करें। तुमलोगोंने जो यह मेरी यथार्थ स्तुति की है, इससे मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ, अतः तुम्हें दूसरा वरदान देती हूँ। जो मनुष्य पवित्रभावसे भक्तिपूर्वक इस स्तुतिद्वारा मेरा स्तवन करेगा उसकी विपत्तिका मैं पग-पगपर नाश करूँगी। संग्राममें अत्यन्त दुर्गम दुर्ग नामक दैत्यको मार गिरानेके कारण आजसे मेरा 'दुर्गा' नाम प्रसिद्ध होगा*। जो मुझ दुर्गाकी शरणमें आयेंगे, उनकी कभी दुर्गति नहीं होगी। यह वज्रपिंजर नामवाली दुर्गास्तुति पुण्यकी वृद्धि करनेवाली है।'
देवताओंको इस प्रकार वरदान देकर महादेवी उसी समय अन्तर्धान हो गयीं और स्वर्गवासी देवता भी अपने-अपने स्थानको चले गये। कुम्भज! इस प्रकार महादेवीका नाम दुर्गा हुआ। काशीमें अष्टमी, चतुर्दशी एवं विशेषतः मंगलवारको दुर्गतिनाशिनी दुर्गादेवीका सदैव पूजन करना चाहिये। नवरात्रमें प्रयत्नपूर्वक प्रतिदिन पूजित हुई दुर्गादेवी
* अद्यप्रभृति मे नाम दुर्गेति ख्यातिमेष्यति। दुर्गदैत्यस्य समरे पातनाद्दतिदुर्गमात्॥ (स्क० पु०, का० उ० ७२। ७१)
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समस्त विघ्नसमूहोंका नाश और सद्बुद्धि प्रदान करेंगी। काशीमें दुर्गाकुण्डके भीतर स्नान करके समस्त दुर्गम पीड़ाओंका नाश करनेवाली दुर्गादेवीकी विधिवत् पूजा करनेवाला मनुष्य नौ जन्मोंके पापको त्याग देता है। दुर्गादेवी अपनी शक्तियोंके साथ सब ओरसे काशीकी रक्षा करती हैं। महादेवीकी उन कालरात्रि आदि शक्तियोंका प्रयत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। जो मनुष्य नाना शक्तियोंसे युक्त इस दुर्गविजय नामक पुण्यमय अध्यायको श्रवण करता है वह दुर्गम संकटसे शीघ्र ही पार हो जायगा।
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काशीके अट्ठाईस प्रमुख लिंगोंका संक्षिप्त वर्णन तथा ॐकारेश्वरके प्राकट्यकी कथा, ब्रह्माजीके द्वारा ॐकारेश्वरका स्तवन और उनकी महिमा
अगस्त्यजीने पूछा— षडानन! जगदम्बा पार्वतीजीके साथ त्रिलोचन महादेवके समीप जाकर भगवान् शिवने क्या किया?
स्कन्दजी बोले— अगस्त्यजी! त्रिलोचन (या त्रिविष्टप) लिंगके समीप जानेपर माता पार्वतीदेवीने भगवान् शिवसे कहा—‘देवदेव! विश्वनाथ! आप सर्वव्यापी तथा सब कुछ देनेवाले हैं। आप ही सबके साक्षी तथा जनक हैं। आपका परम प्रिय यह क्षेत्र कर्मजनित रोगकी ओषधि है, मोक्षलक्ष्मीका लीला निकेतन है। मुझे भी यह क्षेत्र अत्यन्त प्रिय है। इस क्षेत्रके एक-एक धूलि-कणके समक्ष सम्पूर्ण त्रिलोकी भी तिनकेके समान है। फिर इस सम्पूर्ण तीर्थकी महिमाको कौन जान सकता है? प्रभो! मैं यह जानना चाहती हूँ कि इस काशीधाममें कौन-कौनसे शिवलिंग अनादिसिद्ध हैं, जिनका जन्मभरमें एक बार भी पूजन करनेसे काशीमें स्थित सम्पूर्ण लिंग पूजित हो जाते हैं? मुझे उन सबका परिचय दीजिये।'
देवीका यह वचन सुनकर महेश्वरने कहा—प्रिये! जिनके नामोंका उच्चारण करनेमात्रसे समस्त पाप क्षीण हो जाते हैं और पुण्यराशिकी प्राप्ति होती है, ऐसे स्थूल, सूक्ष्म एवं रत्ननिर्मित शिवलिंग काशीमें असंख्य हैं। अनेकों धातुमय लिंग हैं और बहुतसे प्रस्तरमय लिंग भी हैं। इनमें बहुतेरे तो स्वयम्भू हैं—स्वतः प्रकट हुए हैं और बहुतसे देवताओं एवं ऋषियोंद्वारा स्थापित किये हुए हैं। सुन्दरि! तुमने जिन शिवलिंगोंका परिचय पूछा है, उनका वर्णन करता हूँ। वे लिंग कलियुगमें अत्यन्त गोप्य होंगे, परंतु उनका प्रभाव अपने-अपने स्थानका परित्याग नहीं करेगा। जो कलियुगके पापसे पुष्ट हो रहे हैं तथा जो दुष्ट, नास्तिक और शठ हैं, वे इन सिद्ध लिंगोंके नाम भी नहीं जान सकेंगे। उनमेंसे प्रथम ॐकार लिंग है, दूसरा त्रिलोचन, तीसरा महादेव, चौथा कृत्तिवासा, पाँचवाँ रत्नेश्वर, छठा चन्द्रेश्वर, सातवाँ केदारेश्वर, आठवाँ धर्मेश्वर, नवाँ वीरेश्वर, दसवाँ कामेश्वर, ग्यारहवाँ विश्वकर्मेश्वर, बारहवाँ मणिकर्णीश्वर, तेरहवाँ अविमुक्तेश्वर और चौदहवाँ विश्वेश्वर महालिंग है। प्रिये! ये चौदहों लिंग कल्याणके हेतु हैं, इनका समुदाय ही मुक्तिक्षेत्र कहा गया है। ये सब इस क्षेत्रके अधिष्ठाता देवता हैं और आराधना करनेपर मोक्षलक्ष्मी प्रदान करते हैं। प्रिये! इस आनन्दकाननमें देहधारियोंकी मुक्तिके लिये ये ही चौदह महालिंग परम पूजनीय माने गये हैं। प्रत्येक मासकी मंगलमयी प्रतिपदासे लेकर चतुर्दशीतक इन प्रधान-प्रधान लिंगोंकी यत्नपूर्वक यात्रा करनी चाहिये। जो इन चौदह महालिंगोंकी आराधना करता है, उसकी इस संसारमार्गमें कभी पुनरावृत्ति नहीं होती। यह काशीतीर्थका अनुपम कोष है, इसको जहाँ-तहाँ सब ओर प्रकाशित नहीं करना चाहिये। देवि! बहुत बड़ी विपत्तिमें भी इन लिंगोंके नामोंका उच्चारण किया जाय तो ये सब दुःख हर लेते हैं। यह इस क्षेत्रका परम गोपनीय रहस्य है। गिरिराजकुमारी! ये चौदह लिंग मेरे सामीप्यकी
* काशीखण्ड-उत्तरार्ध *
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प्राप्ति करानेवाले तथा अविमुक्त धामके हृदय हैं। प्रिये! इस क्षेत्रमें निश्चय ही सबकी मुक्ति होती है, ऐसी जो प्रसिद्धि है, उसमें ये मेरे चौदह महालिंग ही कारण हैं। जिन भक्तों ने आनन्द-वनमें इन लिंगोंका चिन्तन किया है, वे ही व्रतधारी और तपस्वी हैं। जिन्होंने दूरसे भी इन लिंगोंका दर्शन कर लिया है, वे ही उत्तम योगाभ्यासी और महादानी हैं।
तदनन्तर भगवान् शंकरने अपने भक्तोंके हितके लिये पार्वतीदेवीसे अन्य लिंगोंका भी इस प्रकार परिचय दिया—शैलेश्वर, संगमेश्वर, स्वर्लीनेश्वर, मध्यमेश्वर, हिरण्यगर्भेश्वर, ईशानेश्वर, गोप्रेक्षेश्वर, वृषभध्वजेश्वर, उपशान्तेश्वर, ज्येष्ठेश्वर, निवासेश्वर, शुक्रेश्वर, व्याघ्रेश्वर और जम्बुकेश्वर—ये चौदह लिंग भी काशीके महत्त्वपूर्ण आयतन हैं। इनकी सेवासे भी मनुष्य मोक्षको प्राप्त होता है। वैशाख कृष्ण प्रतिपदासे लेकर चतुर्दशीतक श्रेष्ठ पुरुषोंको इन लिंगोंकी पूजा करनी चाहिये। देवि! इनमेंसे एक-एक लिंगकी महिमाका भी कहीं आदि-अन्त नहीं है।
पार्वतीजी बोलीं—समस्त कारणोंके ईश्वर महादेव! आपने जो यह कहा है कि पूर्वोक्त लिंगोंमेंसे एक-एक लिंग भी काशीमें परम मोक्षका कारण है, इससे मेरी उत्सुकता बहुत बढ़ गयी है। जिनके नामश्रवणसे भी समस्त पापोंका अपहरण हो जाता है, उन चौदह लिंगोंमेंसे प्रत्येककी महिमाका वर्णन कीजिये। ॐकारेश्वर लिंगका स्वरूप क्या है, उनकी क्या महिमा है, पूर्वकालमें किसने इनकी आराधना की थी और आराधित होनेपर इन्होंने उसे कौन-सा फल प्रदान किया था?
महादेवजीने कहा—महादेवी! पूर्वकालकी बात है। जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने आनन्दवनमें समाधि लगाकर बड़ी भारी तपस्या की। तपस्या करते-करते जब एक सहस्र युग बीत गया तब सातों पातालोंका भेदन करके उनके आगे एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई। उसके प्रकाशसे सम्पूर्ण दिशाएँ प्रकाशित हो उठी थीं। उनकी निर्व्याज समाधिसे जो परम ज्योति अन्तःकरणमें प्रकट हुई थी, वही बाहर व्यक्त हो गयी। ब्रह्माजीने समाधि त्याग करके जब आँखें खोलीं तब सामने आदि अक्षर ॐकारको प्रकट देखा। उसीमें अकारका दर्शन हुआ जो सत्त्वगुणसम्पन्न, ऋग्वेदका अधिष्ठान, सृष्टिपालक, साक्षात् नारायणस्वरूप तथा अज्ञानमय अन्धकारसे परे प्रतिष्ठित है। उसके बाद उकार दृष्टिगोचर हुआ जो रजोगुणस्वरूप, यजुर्वेदकी उत्पत्तिका स्थान तथा उन्हींके प्रतिबिम्बित स्वरूपकी भाँति ब्रह्ममय प्रतीत होता था। उसके बाद ब्रह्माजीने मकारको प्रत्यक्ष किया जो किसी प्रकारकी ध्वनिसे रहित, अन्धकारके संकेतस्थानके सदृश तथा तमोगुणस्वरूप ज्ञात हुआ। वह साक्षात् रुद्रस्वरूप मकार भी सामवेदकी उत्पत्तिका स्थान है। उसके बाद ब्रह्माजीने परमानन्दस्वरूप परा वाणीके आश्रयभूत नादतत्त्वका साक्षात्कार किया, जिसकी आकृति विश्वरूपमय है तथा जो सगुण और निर्गुणस्वरूप है। उसीको शब्दब्रह्म कहते हैं तथा वही समस्त वाङ्मयका कारण है। तत्पश्चात् विधाताने तपस्यासे प्रत्यक्ष हुए विन्दुतत्त्वका अवलोकन किया, जो समस्त कारणोंका भी कारण, समस्त जगत्की उत्पत्तिका स्थान तथा परम शिवरूप है। अपने प्रभावसे सबका अवन- (रक्षण) करनेके कारण प्रणवको ॐ कहते हैं अथवा भक्तमुन्नयति—भक्तको ऊर्ध्वलोकमें ले जाता है, इसलिये जिसे ॐ कहते हैं वह प्रणव निराकार होकर भी साकाररूपसे ब्रह्माजीको दृष्टिगोचर हुआ। जो अपने जपमें मन लगानेवाले भक्तको भवसागरसे तार देता है, इसीलिये जिसे 'तार' कहते हैं, उसी प्रणवका ब्रह्माजीने साक्षात्कार किया। समस्त मोक्षकामी पुरुषोंद्वारा यह प्रणुत्त (स्तुत अथवा प्रशंसित) होता है, इसलिये इसका नाम प्रणव है अथवा यह अपनी उपासना करनेवाले पुरुषोंको परम पदमें पहुँचाता है, इस कारण इसे प्रणव कहते हैं। वेदत्रयी जिसका स्वरूप है, जो तुरीय, तुरीयातीत और सर्वात्मक है उसी नादविन्दुस्वरूप
८७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ॐकारका ब्रह्माजीको प्रत्यक्ष दर्शन हुआ। जिससे अंगोंसहित सम्पूर्ण वेद प्रकट होते हैं, जो वृषभरूप यज्ञमय परमेश्वर मन्त्र, ब्राह्मण और कल्प—तीनोंसे सम्बद्ध होकर बार-बार शब्द करता है अर्थात् वैदिक मन्त्रोंसे ध्वनित होता है, जो तेजोमय तथा सबसे श्रेष्ठ है। जिसमें ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्का लय होता है, इसीलिये जो साधुपुरुषोंद्वारा लिंग-नामसे पूजित होता है उसी ॐकार लिंगका ब्रह्माजीने प्रत्यक्ष दर्शन किया। तदनन्तर अ, उ, म, नाद, विन्दु—इन पाँच अक्षरोंसे युक्त प्रपंचसे भिन्न लिंगरूपधारी ॐकारेश्वरका ब्रह्माजीने इस प्रकार स्तवन किया।
ब्रह्माजी बोले—सदाशिव! अक्षरस्वरूप धारण करनेवाले आप ॐकाररूप परमेश्वरको नमस्कार है। आप ही अकार आदि अक्षरोंके उत्पत्तिस्थान हैं, आपको नमस्कार है। निराकार परमात्मन्! आप अकार, उकार और मकार हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद आपके ही स्वरूप हैं, आप रूपातीत परमेश्वरको नमस्कार है। आप ही नाद, विन्दु और कलास्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। लिंगरहित होते हुए भी लिंगरूपसे प्रकट होनेवाले आप सर्वस्वरूप महेश्वरको नमस्कार है। आप आदि-अन्तसे रहित एवं तेजकी निधि हैं, आपको नमस्कार है। आप भव (जगत्को उत्पन्न करनेवाले), रुद्र (दुःख दूर करनेवाले) और शर्व (संहारकारी) हैं, आपको नमस्कार है। आप पापियोंके लिये उग्र और भीमरूप हैं, आपको नमस्कार है। पशुओं (अज्ञानी जीवों)-का पालन करनेवाले आपको नमस्कार है। आप तारक प्रणवरूप हैं, आपसे ही सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति होती है, आपको नमस्कार है। आप मायासे परे परम कल्याणस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ—ये सब स्वर आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। 'क'से लेकर 'ह'तक सम्पूर्ण व्यंजन भी आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। उदात्त, अनुदात्त और स्वरितरूप आपको बार-बार नमस्कार है। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुतके नियन्ता तथा विसर्गसहित वर्णस्वरूप आपको नमस्कार है। अनुस्वाररूप आपको नमस्कार है। अनुनासिकमय आपको नमस्कार है। निरनुनासिक अक्षर तथा दन्त और तालुसे उच्चारित होनेवाले वर्ण आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। ओष्ठ और हृदयसे निकलनेवाले अक्षर भी आपसे भिन्न नहीं हैं, ऊष्मा और अन्तःस्थवर्ण आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप ही प्रत्येक वर्गके पंचम वर्ण हैं, आपको नमस्कार है। आप पिनाक धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप ही निषाद (किरात) और निषादोंके स्वामी हैं, आपको नमस्कार है। वीणा, वेणु और मृदंग आदि वाद्य भी आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। उच्च और गम्भीर ध्वनि-स्वरूप आपको नमस्कार है। आप पापियोंके लिये घोर (भयंकर) और भक्तोंके लिये अघोर (सौम्य)-रूप धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। आप ही तानस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप ही इक्कीस मूर्छनाओंके पति हैं, आपको नमस्कार है। स्थायी और संचारीके भेदसे द्विविध भावरूप आपको नमस्कार है। आप तालप्रिय, तालस्वरूप तथा लास्य और ताण्डव नृत्यको प्रकट करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। तौर्यत्रिक (नृत्य, गान और वाद्य) आपका स्वरूप है। आप नृत्य, गान और वाद्यके बड़े प्रेमी हैं तथा भक्तिपूर्वक नृत्य, गान एवं वाद्यके द्वारा आपकी आराधना करनेवाले भक्तोंको आप मोक्षलक्ष्मी प्रदान करते हैं, आपको नमस्कार है। स्थूल और सूक्ष्म आपके ही स्वरूप हैं। दृश्य और अदृश्य रूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। अर्वाचीन (नवीन) और प्राचीन सब आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। वाणीका विस्तार भी आपका ही रूप है। आप समस्त वाङ्मय-प्रपंचसे परे हैं, आपको नमस्कार है। एक, अनेक रूप तथा सत्-असत्के स्वामी आपको नमस्कार है। शब्दब्रह्म (प्रणवरूप) आपको नमस्कार है। परब्रह्म! आपको नमस्कार है। वेदान्तके द्वारा जाननेयोग्य आपको नमस्कार है। वेदोंका पालन करनेवाले आपको नमस्कार है। आप वेदस्वरूप हैं, आपका रूप
* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८७७
वेदगम्य है, आपको नमस्कार है। पार्वतीपते! आपको नमस्कार है। जगदीश्वर! आपको नमस्कार है। देवदेवेश्वर! दिव्य पद प्रदान करनेवाले देव! आपको नमस्कार है। महेश्वर! परम कल्याणकारी आपको बारंबार नमस्कार है। जगदानन्द! चन्द्रशेखर! मृत्युंजय! आप त्रिनेत्रधारी शिवको नमस्कार है। पिनाक एवं त्रिशूल धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। आप भक्तोंका विषाद दूर करते हैं। आप ही ज्ञान हैं, ज्ञान ही आपका स्वरूप है, आप सर्वज्ञ शिवको नमस्कार है। योगसत्तम! आप ही योगियोंको योगसिद्धि प्रदान करनेवाले हैं। तपोधन! आप ही तपस्वी लोगोंको तपस्याका फल देते हैं। आप ही मन्त्ररूप हैं और आप ही मन्त्रोंके फलदाता हैं। आप ही महादान देनेवाले और आप ही महादानके फल हैं। आप ही महायज्ञ और उसके फलदाता हैं। आप ही सर्व, सर्वगत, सब कुछ देनेवाले और सबके साक्षी हैं। सर्वभोक्ता, सर्वकर्ता और सर्व-संहारकारी भी आप ही हैं। योगियोंके हृदयाकाशमें निवास करनेवाले शिव! आपको नमस्कार है। आप ही विष्णुरूपसे शंख, चक्र और गदा धारण करके तीनों लोकोंका पालन करते हैं। जगत्पालक! सत्त्वस्वरूप! आपको नमस्कार है। आप ही सृष्टिरचनाके ज्ञाता ब्रह्मा होकर इस विश्वकी सृष्टि करते हैं। रजोगुणप्रधान रूप धारण करके भी आप रजोहीन मोक्षपद प्रदान करनेवाले हैं। आप ही कल्पके अन्तमें कालाग्निरुद्र होकर महाप्रलय आरम्भ करते हैं। कल्पके आदिमें आप ही अपने दृष्टिपातमात्रसे पुरुष और प्रकृतिरूपसे महत्तत्त्व आदि सम्पूर्ण जगत्को पुनः प्रकट कर देते हैं। आपकी पलकोंका खुलना और बंद होना—ये ही दोनों सृष्टि और संहारके कारण हैं। स्वेच्छानुसार विचरण करनेवाले आप परमेश्वरका यह सब खेल है। शम्भो! आपसे ही यह सब कुछ उत्पन्न हुआ है और आपमें ही सम्पूर्ण चराचर जगत् स्थित है। आप वेदवाणीके भी अगोचर हैं। आपकी यथावत् स्तुति कौन जानता है? आप ही स्तुति करनेवाले हैं, आप ही स्तुति हैं और आप ही स्तवनीय देवता हैं। मैं तो 'ॐ नमः शिवाय' (प्रणवस्वरूप कल्याणमय शिवको नमस्कार है) इतना ही जानता हूँ, इसके सिवा और कुछ भी नहीं जानता। आप ही मुझे शरण देनेवाले हैं और आप ही परम गति हैं। ईश! मैं आपको ही प्रणाम करता हूँ, आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है।
इस प्रकार बार-बार कहकर ब्रह्माजीने ॐकारनामक महालिंगरूपधारी महेश्वरको पृथ्वीपर दण्डकी भाँति गिरकर साष्टांग प्रणाम किया।
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! ब्रह्माजीद्वारा की हुई उस उत्तम एवं अद्भुत स्तुतिको सुनकर मैं बहुत सन्तुष्ट हुआ और मैंने ब्रह्माजीसे कहा—'चतुरानन! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, वर माँगो।'
ब्रह्माजी बोले—देवेश्वर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और मुझे वरदानका अधिकारी मानते हैं तो इस महालिंगमें आपका सदैव निवास बना रहे और यह ॐकारेश्वर नामक शिवलिंग भक्तोंको एकमात्र मोक्ष प्रदान करनेवाला हो।
स्कन्दजी कहते हैं—ब्रह्मर्षे! ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर भगवान् शिवने कहा—'तथास्तु' ऐसा ही होगा। सुरश्रेष्ठ! तुम तपस्याके कारण सर्वश्रेष्ठ हो और सम्पूर्ण वेदोंकी निधि हो। जब गंगा ॐकारेश्वरके समीपमें आवेगी तब देवताओं, ऋषियों और पितरोंको प्रिय लगनेवाला पुण्यकाल उपस्थित होगा। उस समय ॐकारेश्वरके समीप मत्स्योदरीके जलमें किया हुआ स्नान, जप, दान, होम और देवपूजन सब अक्षय होता है। ॐकारेश्वरके दर्शनसे ही मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। अतः काशीमें प्रयत्नपूर्वक ॐकारेश्वरका दर्शन करना चाहिये। इस प्रकार कमलोद्भव ब्रह्माजीको वर देकर भगवान् शंकर पुनः उसी महालिंगमें लीन हो गये। अगस्त्य! ब्रह्माजी द्वारा की हुई स्तुतिका जप करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। महान् पुण्योंसे परिपूर्ण होता है और श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त कर लेता है।
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