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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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सौंदर्य लहरी १०९


का १/८ भाग मिटाना है। गै रेखा के सिरों पर से ५/८८ वां और र्द रेखा के सिरों से ७/३२ भाग, जैं और र्ड रेखाओं के सिरों पर से ३/८ भाग और टें रेखा के सिरों पर से ३/८ भाग मिटा दो, चै और तैं रेखाएं पूरी रहेंगी। खडी रेखा पर कं बिन्दु के ६ विभाग ऊपर वाले अन्तर्वृत्तस्थ बिन्दु को स मानों और पें बिन्दु से ६ विभाग नीचे वाले अन्तर्वृत्तस्थ बिन्दु को ह मानो। ह को चै वाली रेखा के सिरों को मिलाने से चौथा श्रीकंठ (शिव-त्रिकोण) बनता है, पें बिन्दु को गै रेखा के मिटाने के पश्चात् नये सिरों को मिलाने से तीसरा, र्द बिन्दु को जैं रेखा के मिटाने के पश्चात् नये सिरों को मिलाने से दूसरा, और तैं बिन्दु को कें रेखा के नये सिरों को मिलाने से प्रथम श्रीकंठ बनता है। इसी प्रकार जैं बिन्दु को पें रेखा के नये सिरों को मिलाने से प्रथम शक्ति त्रिकोण, चै बिन्दु को टें रेखा के सिरों को मिलाने से दूसरा, गै बिन्दु को र्ड रेखा से मिलाने से तीसरा, कें बिन्दु को र्द रेखा से मिलाने से चौथा और स बिन्दु को तैं रेखा से मिलाने से पांचवां शक्ति त्रिकोण बनता है।

उक्त ९ त्रिकोणों को बनाने का क्रम इस प्रकार होना चाहिये, जिससे मध्य त्रिकोण, अष्टार, अन्तर्दशार, बहिर्दशार, और चतुर्दशार चक्रों का निर्माण क्रमशः सामने आता जाय।

पहिले प्रथम शक्ति त्रिकोण बनाओ, फिर दूसरा शक्ति त्रिकोण बनाने से मध्य त्रिकोण स्पष्ट दिखने लगता है। वैसे तो वह प्रथम शक्ति त्रिकोण के बनने से ही टें रेखा के ऊपर दिखने लगता है दूसरे शक्ति त्रिकोण की उसे अपेक्षा नहीं है। फिर प्रथम शिव

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त्रिकोण बनाओ, तीनों के योग से अष्टार स्पष्ट बन जाता है । फिर तीसरा शक्ति और दूसरा शिव त्रिकोण बनाने से अन्तर्दशार बन जाता है, फिर चौथा शक्ति और तीसरा शिव त्रिकोण बनाने से बहिर्दशार और फिर पांचवां शक्ति और चौथा शिव त्रिकोण बनाने से चतुर्दशार बन जाता है । यह सृष्टि क्रम है जिसमें शिव के त्रिकोण नीचे को उतरते हैं और शक्ति त्रिकोण ऊपर को चढते हैं अर्थात् शिव त्रिकोणों का मुख नीचे की ओर और शक्ति त्रिकोणों का मुख ऊपर की ओर होता है । इसके विपरीत जब शिव के त्रिकोण ऊपर चढते हैं और शक्ति त्रिकोण नीचे को उतरते हैं, उसे लय क्रम समझना चाहिये । क्योंकि शिव त्रिकोण उर्ध्वमुख और शक्ति त्रिकोण अधोमुख हो जाते हैं । यह क्रम बाह्य उपासना में ग्रहण किया जाता है, परन्तु अन्तरुपासना में जब शक्ति मूलाधार से सहस्रार में चढती है तो लय क्रम होता है क्योंकि तब शिव भाव की वृद्धि होती है और जब शक्ति नीचे उतरती है तब जीव भाव की वृद्धि होती है, इसलिये यह प्रभव क्रम है ।

भगवती का सौंदर्य कल्पनातीत है

ऊपर के दो श्लोकों में भगवती का अन्तः और बाह्य ध्यान पूजन बताया गया है । आज्ञा चक्र के ऊपर अमृत की वर्षा करती हुई ज्योतिर्मयी भगवती का ध्यान करते समय देवी के सौंदर्य की कल्पना का वर्णन इस श्लोक में है । परन्तु वह वैखरी बाणी का विषय नहीं,

सौन्दर्य लहरी १११


कवियों की कल्पना के बाहर का विषय है; इस भाव को प्रकट करने के लिये भगवत्पाद कहते हैं कि:—

[ १२ ]

त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुं कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चि प्रभृतयः । यदालोकौत्सुक्यादमरललना यान्ति मनसा तपोभिर्दुष्प्रापामपि गिरिशसायुज्यपदवीम् ॥

अर्थ:— हे हिमगिरि सुते ! तेरे सौन्दर्य की तुलना करने को ब्रह्मा प्रभृति कवीन्द्र भी कुछ कुछ कल्पना किया करते हैं । तेरे सौन्दर्य को देखकर स्वर्ग की अप्सराएं ध्यानस्थ हो जाती हैं और अनेक तपश्चर्या से भी कठिनता से प्राप्त होने वाली शिवसायुज्य पदवी को सहज प्राप्त कर लेती हैं ।

सं० टि०:— यहां आनन्द लहरी के सौन्दर्य के चिन्तन से शिव-सायुज्य पदवी की प्राप्ति कही गई है ! साधक को अपने अधिकारा-नुसार बहिर्याग और अन्तर्याग द्वारा भगवती को प्रसन्न करना चाहिये । बहिर्याग का फल अन्तर्याग है और अन्तर्याग द्वारा शिव-सायुज्य मुक्ति की प्राप्ति होती है । क्योंकि सहस्रार में शिव शक्ति का ऐक्य होने पर परंपद की उपलब्धि कही गई है ।

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हिमाचल की कन्या का वर्ण भी हिमवत् स्वच्छ होना चाहिये । हिम में शीतलता रहती है और प्रकाश भी । चन्द्रमा में भी शीतल प्रकाश होने के कारण उसे अमृत बरसाने वाला कहा जाता है । इसी प्रकार भगवती का स्वरूप सुधामयी ज्योति के सदृश है । अमृत को प्रकाशमान् समझना चाहिये ।

यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधातं ।
तद्वात्मतत्वं प्रसमीक्ष्यदेही एकः कृतार्थो भवते वीत शोकः ॥
(श्वे. २, १४)

अर्थः— मिट्टी से लिपे हुए, तेजोमय अमृत सदृश चमकते हुए शीतल बिंबवत् आत्म तत्व को देखकर देहाभिमानी जीव ब्रह्म से एकता प्राप्त करके कृतार्थ और वीत शोक हो जाता है ।

ब्रह्मा सृष्टि के कर्ता हैं, इसलिये सर्व प्रथम कवि हैं, चारों मुखों से वेदों का गान करते हैं, इसलिये सब कवियों में श्रेष्ठ हैं । वे भी भगवती के सौन्दर्य की उपमा नहीं ढूंढ सके, अन्य कवि इसलिये कुछ-२ कल्पना किया करते हैं। यदि अप्सराओं की उपमा दी जाय तो वे भी तो भगवती के रूप को उत्सुकता से देखकर ध्यान मग्न होकर समाधिस्थ हो जाती हैं । भाव यह भी है कि भगवती के सौन्दर्य की कल्पना करने से समाधि लग सकती है ।

सौंदर्य लहरी ११३


काय सम्पत् सिद्धि

अगले श्लोक में यह दिखाया गया है कि कुंडलिनी के जागरणोपरान्त अमृत सिंचन स्वरूप भगवती की कृपा से शारीरिक कल्प हो जाता है। अर्थात् वृद्ध मनुष्य भी युवा हो जाता है।

[ १३ ]

नरं वर्षीयांसं नयनविरसं नर्मसु जडं
तवापाङ्गालोके पतितमनुधावन्ति शतशः ।
गलद्वेणीबन्धाः कुचकलशविस्रस्तसिचया
हठात्त्रुट्यत्काञ्च्यो विगलितदुकूला युवतयः ॥

कठीन शब्दों का अर्थ:— नर्म=क्रीडा, विस्रस्त=गलित, कांची=मेखला ।

अर्थ:— वयोवृद्ध, देखने में कुरूप, क्रीडा में जड मनुष्य भी तेरी दृष्टि के पडने मात्र से ऐसा रमणीय हो जाता है कि सैकड़ों युवतियां उसके पीछे भागने लगती हैं, जिनके बेणी के बन्ध खुल गये हैं, कुच कलशों पर से चोली फट गई है, जिनकी मेखला हटात् टूट गई हैं और जिनकी साड़ी शरीर से उतरी जा रही हैं।

सं० टि०:— यहां काम कला ईं की ओर संकेत है ।

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शक्ति जागरण से काय संपत् विभूति भी प्राप्त हो सकती है, जो षट चक्र बेध द्वारा पंच महा भूत जय होने पर होती है। रूप, लावण्य, बल, और शरीर का वज्रवत संगठित होना काय संपत् कहलाता है। देखे योग दर्शन (३, ४५-५६)। भूत जय से अणिमादि सिद्धियों की प्राप्ति भी होती है। अणिमादि सिद्धियों का श्री चक्र के सब से बाह्य चतुष्कोण पर स्थान दिखाया जाता है और इन सिद्धियों का फल भी युवावस्था की एक गौण सिद्धि है। प्रत्येक नाडी में अमृत का संचार होने का फलस्वरूप ही यह काय संपत् है। श्लोक १० में प्रपंचं सिञ्चन्ती पद में अमृत से प्रत्येक नाडी का भर जाना दिखाया गया है, जिससे देह दिव्य हो जाता है। वह मनुष्य उर्द्धू रेता हो जाता है, उसके शरीर की glands में रसोत्पादन की शक्ति इतनी बढ़ जाती है कि शरीरस्थ निर्माण शक्ति का ह्रास बन्द हो जाता है। उसके स्नायुओं में जीवन शक्ति संचार करने लगती है, और सातों धातुओं का पुनः निर्माण होने लगता है। ज्ञानेश्वरी के छठे अध्याय में कुण्डलिनी जागरण से शारीरिक कल्प होने की बात इन शब्दों में कही गई है—

“तब अवयवों की कान्ति की शोभा ऐसी दिखाई देती है कि मानों वह स्फटिक का ही हो, अथवा संध्या काल के आकाश के रंग निकालकर उनका ही वह शरीर बनाया गया हो, अथवा आत्म ज्योति का लिंग ही स्वच्छ किया रखा हो इत्यादि। कुण्डलिनी जब चन्द्रामृत पीती है, तब ऐसा शरीर हो जाता है, कृतान्त भी उस देहाकृति से भय खाता है, वार्धक्य पीछे हटता है, यौवन की गांठ खुल जाती है, और लुप्त हुई बालदशा फिर प्रकट होती है। इत्यादि।”

सौंदर्य लहरी १२७

तत्त्वों की किरणें

[ १४ ]

क्षितौ षट्पंचाशद्द्विसमधिकपंचाशदुदके हुताशे द्वाषष्टिश्चतुरधिकपंचाशदनिले दिवि द्विःषट्त्रिंशन्मनसि च चतुःषष्टिरिति ये मयूखास्तेषामप्युपरि तव पादाम्बुजयुगम् ॥

अर्थः— पृथिवी में ५६, जल में ५२, अग्नि में ६२, वायु में ५४, आकाश में ७२, और मन में ६४ मयूखा अर्थात् रश्मियों के ऊपर, हे देवि ! तेरे दोनों चरण कमल हैं ।

सं० टि० मातृका न्यास में छःओं चक्रों का न्यास हंसः सहित उक्त किरणों से संबंधित अक्षरों से किया जाता है ।

उक्त किरणें छः चक्रों से संबंध रखने वाले तत्त्वों की किरणें हैं, और भगवती के चरण युगल सब के ऊपर होने का अभिप्राय यह है कि वे आज्ञा चक्र के ऊपर बिराजते हैं । उक्त किरणों में आधी शिवात्मिका और आधी शक्त्यात्मिका हैं, अर्थात् दो दो के जोडें से पृथिवी में २८, जल में २६, अग्नि में ३१, वायु में २७, आकाश में ३६ और मन में ३२ किरणों के जोडे हैं । सब का योग ३६० है, जो चान्द्र वर्ष के अनुसार एक वर्ष की ३६० तिथियों से उपमित की जाती हैं। प्रत्येक पक्ष की १५ तिथियों को १५ नित्या कहते हैं। श्री चक्रस्थ षोडश दल की गुप्ततर योगिनियां नित्या कहलाती हैं ।

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नवम श्लोक में कहे अनुसार चक्रों के बेध के साथ तत्वों का भी वेध होना कहा गया है। और तत्वों के बेध से उन पर जय प्राप्त की जाती है, जिसको योग दर्शन में भूतजय, मनोजय और प्रकृतिजय कहा गया है।

भूतजय, इन्द्रियजय और मनो जय के साधन विभूति पाद के ४४, ४७, और ४८ सूत्रों में बताए गये हैं। स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व पर संयम करने से भूत जय होता है। विशेष धर्मी को प्रथम स्थूल और सामान्य धर्मी को दूसरा स्वरूप तन्मात्राओं को सूक्ष्म, अर्थात तीसरा रूप और तीनों गुणों का अन्वय उनका कारण रूप और उनके भोग और अपवर्ग के लिये उपयोगिता का ज्ञान, इन ५ स्तरों पर संयम अर्थात् धारणा ध्यान समाधि करने से प्रत्येक भूत का जय प्राप्त किया जा सकता है। इसी प्रकार इन्द्रियों की ग्रहण शक्ति, स्वरूप, अस्मिता (अहं की सूक्ष्म कारण वृत्ति,) अन्वय (तीनों गुणों से संबंध) और अर्थवत्त्व पर संयम करने से इन्द्रियों का जय होता है। इन्द्रियों के जय से मनोजय और क्रमशः प्रकृतिजय किया जाता है। यह राजयोग का साधन क्रम है। इस श्लोक में ५ भूतों और मन के स्थूल, सूक्ष्म आदि क्रम से व्यतिरेक स्वरूप पृथक्करण (analysis) को रश्मियों की संख्या द्वारा दिखाया गया है। सब तत्वों के द्विविध भेद ईडा और पिंगला गत भेद हैं। ईडा से संबंध रखने वाली किरणें चन्द्रमा अथवा शक्ति की किरणें और पिंगला से संबंध रखने वाली प्राण की किरणें, सूर्य अथवा शिव की किरणें हैं। इन को स्त्रीलिंग और पुंलिंग वाचक भी कह सकते हैं। सुषुम्ना में दोनों

सौंदर्य लहरी ११७

का योग हो जाता है। सब किरणों को सुषुम्ना पथ में, कार्य को कारण में लीन करते हुए, भगवती के चरणों तक पहुंचा जाता है, अर्थात् आज्ञा चक्र के ऊपर जाया जाता है। जैसा कि श्लोक में कहा है कि भगवती के दोनों चरण सब किरणों का अतिक्रमण कर के सब के ऊपर स्थित हैं।

किरणों का संबंध तत्वों से, वर्ण माला से और उनके अधिष्ठातृ शक्तियों से त्रिविध जानना चाहिये।

किरणों का तत्वों से सम्बन्ध

पृथिवी की ५६ किरणें:— ५ महाभूत, ५ तन्मात्रा, ५ कर्मेन्द्रियां ५ ज्ञानेन्द्रियां, ४ अन्तःकरण चतुष्टय, कला, प्रकृति, महत्, और पुरुष। इनका योग २८ है और शिव शक्ति भेद से ५६।

जल किरणें:— ५ महाभूत, १० इन्द्रियां, १० उनके कार्य और मन। इनका योग २६ है और शिव शक्ति भेद से ५२।

अग्नि की किरणें:— ५ महाभूत, ५ तन्मात्रायें, १० इन्द्रियां, १० उनके कार्य और मन, सब का योग ३१ है, शिव शक्ति भेद से ६२।

वायु की किरणें: — ५ महाभूत, ५ तन्मात्रा, ५ कर्मेन्द्रियां, ५ ज्ञानेन्द्रियां, ४ अन्तःकरण चतुष्टय, कला, प्रकृति और पुरुष। इनका योग २७ है, शिव शक्ति भेद से ५४।

आकाश की किरणें:—सब ३६ तत्व, शिव शक्ति भेद से ७२

११८ सौंदर्य लहरी


मन की किरणें:— प्रथम ४ शुद्ध तत्व अर्थात् शिव, शक्ति, सदाख्य और महेश्वर को छोड़कर शेष ३२ । शिव शक्ति भेद से ६४ ।

किरणों का वर्ण-माला से सम्बन्ध — विश्व के प्रस्तार में नाम और रूप अथवा वाचक और वाच्य अथवा शब्द और अर्थ भेद से, दो स्तर हैं। अर्थ भेद से ५ कलाएं, ३६ तत्व, और १४ भुवन हैं। कलाओं और तत्वों के नाम ऊपर दिये जा चुके हैं, १४ भुवन के उपभेद २२४ किये जाते हैं, इन २२४ भुवनों के नाम स्थानाभाव से यहां नहीं दिये जाते ! शब्द भेद से ५१ वर्ण, ८१ पद और ११ मंत्र से सारे विश्व का प्रस्तार है । ३ लिंग (पुं, स्त्री, नपुंसक,) ३ पुरुष (उत्तम, मध्यम और अन्य,) ३ वचन (एक, द्वि और बहु) और ३ काल (भूत, वर्तमान, और भविष्य ) के परस्पर योग से ३x३x३x३=८१ प्रकार के पद होते हैं, और ५ कर्मेन्द्रियां, ५ ज्ञानेन्द्रियां और अन्तःकरण के एकादशविध व्यापारों की सिद्धियों के लिये ११ प्रकार के मंत्र हैं, उनके ११ देवता ११ रुद्र हैं। इसलिये उक्त ३६० किरणों का मातृका (वर्ण माला) से संबंध है और प्रत्येक किरण का पृथक पृथक देवता है । उनका संबंध नीचे दिया जाता है ।

मातृकाओं का तत्वों से संबंध:—

पृथिवी की ५६ किरणें = ५० मातृका + ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ।
जल की ५२ किरणें = ५० मातृका + सौं श्रीं ।
अग्नि की ६२ किरणें = ५० मातृका + औ औ औ औ, हं सः हं सः हं सः हं सः ।

सौंदर्य लहरी ११ ९


वायु की ५४ किरणें = ५० मातृका + यं रं लं वं । आकाशकी ७२ किरणें = अ ५ बार,.......औ ५ बार = १४ × ५ = ७० + ऐं ह्रीं ।

मन की ६४ किरणें = अ वर्ग चार बार = १६ × ४ = ६४ ।

एषु स्वराः स्मृताः सौम्याः स्पर्शाः सौराः शुभोदयाः ।
आग्नेया व्यापकाः सर्वे सोम सूर्याग्नि देवताः ॥
( शा. नि. २.२ )

तत्वात्मानः स्मृताः स्पर्शाः मकारः पुरुषो मतः ।
व्यापका दशते कामधनधर्मप्रदायिनः ॥ (२. ४)

विन्दु पुमान्रविः प्रोक्तः सर्गः शक्तिर्निशाकरः ।
स्वराणां मध्यमं यच्च चतुस्रं तच्च नपुंसकम् ॥ २. ६

पिंगलायां स्थिता ह्रस्वा ईडायां संगताः परे ।
सुषुम्नायां मध्यगाज्ञेया श्रत्वारो ये नपुंसकाः ॥ २. ७

वाय्वग्निभूजलाकाशाः पंचाशल्लिपयः क्रमात् ।
पंचह्रस्वाः पंचदीर्घाविन्द्रन्ताः संधिसंभवाः ।
क्रमादयः पंचशः ष क्ष ळ स हान्ताः प्रकीर्तिताः ॥ २. ९

१२० सौंदर्य लहरी

नीचे शारदातिलक के अनुसार वर्ण माला का पाँचों तत्त्वों, छःओं चक्रों, और ईड़ा, पिंगला, और सुषुम्ना तीनों नाड़ियों से संबंध एक नकशे (chart) द्वारा दिखलाया जाता है ।

षट् चक्र
पं० महाभूतविशुद्धअनाहतमणिपूरस्वाधिष्ठानमूलाधारआज्ञागुरु चक्र
ह्रस्वदीर्घ
वायुआ, एक्च्ट्त्प्य्ष्
अग्निई, ऐख्छ्ठ्थ्फ्र्क्ष
पृथिवीऊ, ओग्ज्ड्द्ब्ल्
जलॠ, औघ्झ्ढ्ध्भ्व्
आकाशॡ, अंङ्ञ्ण्न्म्श्ह्
लिंगपुमान्स्त्रीनपुंसक
नाड़ीपिंगलाईडासुषुम्ना
वर्णभेदईडा (चन्द्र)<br>स्वराःपिंगला (सूर्य)<br>स्पर्शाःसुषुम्ना (अग्नि)<br>व्यापिकाः

अनुस्वार = पुमान्, विसर्ग = शक्ति.

सौंदर्य लहरी १२१


किरणों की अधिष्ठातृ शक्तियां

अधिष्ठातृ शक्तियों के नाम शिव शक्ति के जोडे से नीचे दिये जाते हैं।

पृथिवी:— १. उड्डीश्वर, उड्डीश्वरी, २. जलेश्वर, जलेश्वरी, ३. पूर्णेश्वर, पूर्णेश्वरी, ४. कामेश्वर, कामेश्वरी, ५. श्रीकंठ, गगना, ६. अनन्त स्वरसा, ७. शंकर, मति, ८. पिंगल, पाताल देवी, ९. नारदारव्य, नादा, १०. आनन्द, डाकिनी, ११. आलम्य, शाकिनी, १२. महानन्द, लाकिनी, १३. योग्य, काकिनी, १४. अतीत, साकिनी १५. पाद, हाकिनी, १६. आधारेश, रक्ता, १७. चक्रीश, चंडा, १८. करंगीश, कराला, १९. मदधीश, महोच्छुष्मा, २०. अनादि विमल, मातंगी, २१. सर्वज्ञ विमल, पुलिन्दा, २२. योग विमल, शंवरी, २३. सिद्ध विमल, वाचापरा, २४. समय विमल, कुलालिका, २५. मित्रेश, कुब्जा, २६. उड्डीश, लघ्वा, २७. षष्ठीश, कुलेश्वरी, २८. चर्याधीश, अजा ।

जलदेवता— १. सद्योजात, माया, २. वाम देव, श्री ३. अघोर, पद्मा, ४. तत्पुरुष, अंबिका, ५. अनन्त, निवृत्ति, ६. अनाथ, प्रतिष्ठा, ७. अनाश्रित, विद्या, ८. अचिन्त्य, शान्ता, ९. शशिशेखर, उमा, १० तीव्र, गंगा, ११. मणिवाह, सरस्वती, १२. अंबुवाह, कमला, १३ तेजोधीश, पार्वती, १४ विद्यावागीश्वर, चित्रा, १५. चतुर्विधेश्वर सुकमला, १६. उमांगंगेश्वर, मानमथा, १७. कृष्णेश्वर, श्रिया, १८. श्रीकंठ, लया, १९. अनन्त, सती, २०. शंकर, रत्नमेखला, २१. पिंगल, यशोवती, २२. सादारव्य, हंसानन्दा, २३. परि-

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दिव्यौध, वामा. २४. मारदिव्यौध, ज्येष्ठा, २५. पीठौध, रौद्री, २६. सर्वेश्वर, सर्वमयी।

आग्नेय— १. परापर, चंडेश्वरी, २. परम, चतुष्मती, ३. तत्पर, गुह्य काली, ४. अपर, संवर्ता, ५ चिदानन्द, नीलकुब्जा, ६ अघोर, गंधा, ७. डामराघोर, समरसा, ८ ललित, रूपा, ९. स्वच्छ, स्पर्शा, १० भूतेश्वर, शब्दा, ११. आनन्द, डाकिनी, १२. आलस्य, रत्नडाकिनी, १३. प्रभानन्द, चक्रडाकिनी, १४. योगानन्द, पद्म डाकिनी, १५. अतीत, कुब्ज डाकिनी, १६. स्वाद, प्रचंड डाकिनी, १७. योगेश्वर, चंडा, १८ पीठेश्वर, कोशला, १९. कुल-कौलेश्वर, पावनी, २०. कुक्षेश्वर, समया, २१. श्रीकंठ, कामा, २२. अनन्त, रेवती, २३ शंकर, ज्वाला, २४. पिंगलाख्य, कराला, २५. सदाख्य, कुब्जिका, २६. कालरात्रिगुरू, परा, २७. सिद्ध गुरू, शान्त्यातीता, २८. रत्न गुरू, शान्ता, २९. शिव गुरू, विद्या, ३०. मेल गुरू, प्रतिष्ठा, ३१. समय गुरू, निवृत्ति।

वायव्य— १. खगेश, भद्रा, २. कूर्म, आधारा, ३. मेष, कोषा, ४. मीन, मल्लिका, ५. ज्ञान, विमला, ६. महानन्द, शर्वरी, ७. तीव्र, लीला, ८. प्रिय, कुमुदा, ९. कालिक, मैनकी, १०. डामर डाकिनी, ११. रामर, राकिनी, १२. लामर, लाकिनी, १३. कामर, काकिनी, १४. सामर, साकिनी, १५. हामर, हाकिनी, १६. आधारेश, राका, १७. चक्रीश, बिन्दु, १८. कुकुर, कुला, १९. मदग्रीश, कुब्जिका, २०. हृदीश, काम कला, २१ शीरस, कुल दीपिका, २२. शिखेश, बर्बरी, २३. वर्मन, बहुरूपा, २४. शास्त्रेश,

सौंदर्य लहरी १२३

महत्तरी, २५. परम गुरू, मंगला, २६. पराधिकार गुरू, सौकर्या, २७. पूज्य गुरू, रामा ।

आकाश— १. हृदय, कौलिनी, २. घर, कान्ता, ३. भोग, विशेषी, ४. भय, योगिनी, ५. मह, ब्रम्ह तारा, ६. शव, शवरी, ७. द्रव, कालिका, ८. सरस, जुष्ट चांडाली, ९. मोह, अघोरेशी १०. मनो भव, हेला, ११. केक, महारक्ता, १२. ज्ञान गुह्य, कुब्जिका, १३. खर, डाकिनी, १४. ज्वल शाकिनी, १५. महाकुल, लाकिनी, १६. भ्योज्वल, काकिनी, १७. तेज, साकिनी, १८. भूति, हाकिनी, १९ वामु, पापघ्नी, २०. कुल, सिंही, २१. संहार, कुलांबिका, २२. विश्वंभर, कामा, २३. कौटिल, कूण माता, २४. गालव, काली, २५. व्योम, व्योमा, २६. श्वसन, नादा, २७. खेन्वर, महादेवी, २८. बहुल, महत्तरी, २९. तात, कुण्डलिनी, ३०. कुलातीत, कुलेश्वरी, ३१. अज, ईंधिका, ३२. अनन्त, दीपिका, ३३. ईश, रेचिका, ३४. शिख, मोचिका, ३५. परम, परा, ३६. पर, चिति ।

मन— १. पर, परा, २. भव, भवपरा, ३. चित्, चित्परा, ४. महामाया, महामाया परा, ५. इच्छा, इच्छापरा, ६. सृष्टि, सृष्टि परा, ७. स्थिति, स्थिति परा, ८. निरोध, निरोध परा, ९. मुक्ति, मुक्ति परा, १०. ज्ञान, ज्ञान परा, ११. सत्, सति परा, १२. असत्, असति परा, १३. सदसत्, सदसति परा, १४. क्रिया, क्रिया परा, १५. आत्मा, आत्मपरा, १६. इंद्रियाश्रय, इंद्रियाश्रय परा, १७. गोचर, गोचर परा, १८. लोक मुख्य, लोक मुख्य परा, १९. वेदवत्, वेद-वतिपरा, २०. संवित्, संविति परा, २१ कुण्डलिनी, कुण्डलिनी परा,

१२४ सौंदर्य लहरी


२२. सोषुम्णी, सोषुम्णी परा, २३. प्राण सूत्र, प्राण सूत्र परा, २४. स्यन्द, स्यन्द परा, २५. मातृका, मातृका परा, २६. स्वरोद्भव, स्वरोद्भव परा, २७. वर्णज, वर्णज परा, २८. वर्गज, वर्गजा परा, २९. शब्दज, शब्दज परा, ३०. वर्णज्ञात, वर्णज्ञता परा, ३१. संयोगज, संयोगज परा, ३२. मंत्र विग्रह, मंत्र विग्रह परा ।

पाचों तत्वों का संबंध मूलाधार से विशुद्ध चक्र तक क्रमशः ५ चक्रों से है और मन का सम्बन्ध भ्रूमध्य में आज्ञा चक्र से, इसलिये इन किरणों का भी सम्बन्ध छःओं चक्रों से है। छः चक्रों से वर्ष की छः ऋतुओं की समानता की जाती है। अर्थात बसन्त की मूलाधार से समानता है। क्योंकि इस ऋतु में पृथ्वी का वेध होकर पुष्प खिलते हैं और सुगन्ध का विकास होता है, ग्रीष्म ऋतु की स्वाधीष्ठान चक्र से समानता की जाती है, इस ऋतु में जल का वेध होकर सब जल सूखने लगता है। वर्षा की मणिपूर से समानता है, क्योंकि इस ऋतु में अग्नि का वेध होकर विद्युत और पर्जन्य का विकास होता है। शरद् ऋतु की अनाहत चक्र से समानता की जाती है क्योंकि इसमें वायु का वेध होकर वातावरण शान्त निर्मल हो जाता है। हेमन्त ऋतु की विशुद्ध चक्र से समानता है, क्योंकि इस ऋतु में आकाश के वेध सूचक शीत की प्रधानता होती है, और शिशिर ऋतु की आज्ञा चक्र से समानता की जाती है क्योंकि इसमें चित्त की प्रसन्नता बढती है। इस प्रकार उक्त ३६० किरणों को वर्ष की ३६० तिथियों से समानता यह बात सिद्ध करती है कि पिंड का संवत्सर पुरुष आधार है। कृष्ण और शुक्ल पक्षों को भी शक्ति शिवात्म समझना चाहिये। कृष्णपक्ष में चन्द्रमा

सौंदर्य लहरी — १८५

की अन्वय और शुक्ल पक्ष में उन्नेय भूमिका समझनी चाहिये । इसी प्रकार उत्तरायण और दक्षिणायन को सूर्य ( प्राण ) की उन्नेय और अन्वय भूमिकायें समझनी चाहिये ।

अगले तीन श्लोकों में वाक् सिद्धि का वर्णन है । १५ वें श्लोक में सात्विक, १६ वें राजसिक और १७ वें मिश्रित भावों युक्त कविता शक्ति के विकास का वर्णन है ।

वाक् सिद्धि


[ १५ ]

शरज्ज्योत्स्नाशुभ्रां शशियुतजटाजूटमकुटां
वरत्रासत्राणस्फटिकघुटि (णि) कापुस्तककराम् ।
सकृन्न त्वां नत्वा कथमपि सतां सन्निदधते
मधुक्षीरद्राक्षा मधुरि मधुर्गैणा भणितयः ॥

अर्थ:— शरत् पूर्णिमा की चांदनी के सदृश शुभ्रवर्णा, द्वितीया के चन्द्रमा युक्त जटाजूट रूपी मकुट धारण किये हुए, दो हाथों से भक्तों को त्रास से त्राणार्थ अभयद और वरद अभिनय किये हुए और दो हाथों में स्फटिक मणियों की माला और पुस्तक धारण किये हुए, तुझको एक बार भी नमन न करनेवाला मनुष्य किस प्रकार सत्कवियों की सी मधु, दूध और द्राक्षा की मधुरता से युक्त मधुर कविता कर सकता है, अर्थात् नहीं कर सकता ।

१२६ | सौंदर्य लहरी


सं० टि० यह और अगले दो श्लोक मिल कर सारस्वत प्रयोग कहलाते हैं । अच्युतानन्द के अनुसार यहां वाग्भव रूप क्रिया शक्ति का ध्यान है, अर्थात वाग्भव कूट की देवी क्रिया शक्ति का ध्यान बताया गया है ।

यहां कुण्डलिनी शक्ति के जागृत होने पर सास्वत सिद्धि हो की ओर संकेत है । कहा है ।

सर्वे वाक्यात्मका मंत्रा वेद शास्त्राणि कृत्स्नशः ।
पुराणानि च काव्यानि भाषाश्च विविधा अपि ॥ ३,७
सप्तस्वराश्च गाथाश्च सर्वे नाद समुद्भवाः :
एषा सरस्वती देवी सर्वभूतगुहाश्रया ॥ ३, ८
य इमां वैखरीं शक्तिं योगी स्वात्मनि पश्यति ।
स वाक सिद्धिमाप्नोति सरस्वत्याः प्रसादतः ॥
३,१० (यो. शिखा.)

अर्थः— सब वाक्यात्मक मंत्र वेद शास्त्र, पुराण और काव्य, विविध भाषायें, सातों स्वर और गाथायें सब नाद् से उत्पन्न होती हैं । यह नाद् रूपा सरस्वती देवी सब प्राणियों की बुद्धिरूपी गुहा में रहती है । जो योगी इस वैखरी शक्ति को अपने भीतर देखता है उसे सरस्वती के प्रसाद से वाक् सिद्धि की प्राप्ति हो जाती है ।

कुण्डलिनी शक्ति जागकर चार रूपों में प्रकट होती है, उन रूपों के नाम ये हैं, क्रियावती, कलावती, वर्णमयी और बेधमयी · शारीरिक कंपदि, हठ योग के आसन प्रणायाम मुद्रादि, नृत्यादि

सौंदर्य लहरी १२७

क्रियाओं में क्रियावती का रूप हैं। ३६ तत्वों के व्यतिरेक और शुद्धि की क्रियाओं में कलावती का रूप है। वर्णात्मिका मंत्रमयी है और षट् चक्र वेध वेधमयी करती है। वर्णमयी सरस्वती का रूप है जो समस्त शब्दमय जगत् को परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी इन चारों स्तरों पर धारण किये हुए है।

चत्वारि वाक् परिमिता पदानितानि विदुर्ब्राह्मणांये मनीषिणः ।
गुहात्रीणि निहिता नेंगयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥ ऋक

अर्थात् वाचा चार पाद वाली होती है, उनको जो बुद्धिमान ब्राह्मण हैं वे ही जानते हैं, उनमें से तीन तो गुहा में निहित (छुपी हुई) हैं, वे अपने स्थानों से नीचे नहीं हिलती, चौथी वैखरी को मनुष्य बोलते हैं। इस मंत्र के साथ ऐं बीज की उपासना की जाती है। देखें सरस्वती रहस्योपनिषद। यह वाक् बीज वाग्भव कूट का रूप है। इस श्लोक में सारस्वत प्रयोग का ध्यान बताया गया है। अगले दो श्लोक भी सारस्वत प्रयोग से ही संबंध रखते हैं।


[ १६ ]

कवीन्द्राणां चेतः कमलवनबालातपरुचिं
भजन्ते ये सन्तः कतिचिदरुणामेव भवतीम् ।
विरिञ्चिप्रेयस्यास्तरुणतर शृङ्गार लहरी—
गभीराभिर्वाग्भिर्विदधति सतां (भां) रञ्जनमयी ॥