सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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ॐ तिस्र पुरास्त्रिपथा विश्वचर्षेणा अत्राकथा अक्षराः संनिविष्टाः आधेष्टायैना अजरा पुराणी महत्तरा महिमा देवतानाम् ॥१॥
**अर्थ—**तीन पुर जिसके तीन पथ हैं, विश्व का आकषण करके धारण किये हुए है, जहां अकथ अक्षर संनिविष्ट हैं, उसकी अधिष्ठातृ देवता अजरा, पुराणी, देवताओं की सबसे बडी महिमा युक्त त्रिपुरा हैं।
श्रीचक्र के मध्यस्थ त्रिकोणाकृति सर्वसिद्धिप्रद आवरण का यहां संकेत है । तीनों भुजाओं पर सोलह २ अक्षर जानने चाहियं, अर्थात् ▽ की ऊपर की भुजा पर अ से अः तक १६ स्वर, दाहिनी ओर भुजा पर क से त तक और तीसरी भुजा पर थ से म तक और शेष तीन ह क्ष और ळ तीनों अक्षरों को उसी क्रम से तीनों कोणों पर जानना चाहिये । इस क्रम में ळकार नीचे के कोण पर आता हैं । इसको अकथ अथवा गुरु चक्र भी कहते हैं, इसका स्थान सहस्रार के मध्य ब्रह्मरंध्र में है। यह त्रिपुरा भगवती की पीठ है। सौन्दर्य लहरी श्लोक ८ में कहा शिवाकार मंच यह ही है
नवयोनीर्नवचक्राणि दधिरे नवैवयोगा नवयोगिन्यश्च । नवानां चक्रा अधिनाथा स्योना नवभद्रा नवमुद्रा महीनाम् ॥२॥
उसमें ९ योनी, और ९ चक्रों को धारण किया हुआ है, ९ ही योग हैं और ९ योगिनियां हैं । वे चक्रों की अधिनाथा हैं जिनकी किरणें ९ भद्रा और ९ मुद्रा हैं ।
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सौन्दर्य लहरी के ११ वें श्लोकोक्त चार श्रीकंठ और पांच शिव युवतियां ९ योनियां हैं। इनको वहां मूल प्रकृति कहा गया है। ९ चक्र ९ आवरण हैं। प्रत्येक चक्र की एक २ योगिनी है। उनके नाम प्रकट, गुप्त, गुप्ततर, संप्रदाय, कुलोत्तीर्ण, निगर्भ, रहस्य, परा, और परपरातिरहस्य योगिनी हैं। देखें श्लोक ११ सौंदर्य लहरी।
एका साऽऽसीत प्रथमा सा नवासीदासोनविंशदासोनत्रिंशत् ।
चत्वारिंशदथ तिस्रः समिधा उशतीरिव मातरो मा विशन्तु ॥३॥
अर्थः— वह पहिले एक थी, फिर (अष्टार सहित) ९ हो गई, (अन्तर्दशार सहित्) १९ हुई, (बहिर्दशार सहित) २९ हुई, और (चतुर्दशार सहित ४३ हुई। ये सब प्रज्वलित कान्ति युक्त समिधा सदृश तेजोमयी माताएं मेरे भीतर प्रवेश करें। अर्थात मेरे शरीर में निवास करें।
ऊर्ध्वज्वलज्ज्वलनं ज्योतिरग्रे तमो वै तिरश्चीनमजरं तद्रजोऽभूत् ।
आनन्दनं मोदनं ज्योतिरिन्दोरेता उ वै मण्डला मण्डयन्ति ॥४॥
अर्थः— पहिले ऊर्ध्व ज्वाला युक्त प्रज्वलित ज्योति तमोगुण हुई, बिना जीर्ण हुए अर्थात अनन्त वह जब तिरछी फैलीं, वह रजोगुण हुआ, और आनन्द एवं मोद के देने वाली चन्द्रमा की
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ज्योति सत्त्व गुण, ये तीनों क्रमशः अग्नि, सूर्य और सोम के मण्डल बनाती हैं।
४३ त्रिकोणों को समिधाओं से उपमित किया जाने से यह अभिप्राय प्रतीत होता है कि ये सब अग्नि और सूर्य मंडलों के अन्तर्गत होने चाहिये क्योंकि चन्द्रमा को समिधा की आवश्यकता नहीं होती। इसलिये अष्ट दल और षोडश दल पद्म चन्द्रमण्ड में होने चाहिये, चतुर्दशार और बहिर्दशार सूर्य मंडल में, और अन्तर्दशार एवं अष्टार अग्नि मण्डल में। मध्य त्रिकोण शक्ति का स्थान है और भूगृह तीनों पुर अर्थात् भूर्भुवः स्वः तीनों लोकों का प्रतीक है।
अन्तर्दशार और बहिर्दशार के दस २ दलों को अग्नि की दस २ कलायें, अष्टार के ८ दलों को अष्टवसु अथवा ८ दिशाओं रूपी ८ समिधा और चतुर्दशार के १४ दलों को सप्ताह की दिन रात्रियों रूपी १४ समिधाओं से उपमित किया जा सकता है।
यास्तिस्रोरेखाः सदनानि भूस्त्रीस्त्रिविष्टपास्त्रिगुणास्त्रिप्रकाराः ।
एतन्त्रयं पूरकं पूरकाणां मंत्री प्रथते मदनो मदन्या ॥७॥
**अर्थः—**जो तीन रेखा हैं वे तीन सदन अर्थात लोक हैं, तीन प्रकार तीन गुण हैं। इस तीन मण्डलों से बने श्रीचक्र का कामेश्वरी मंत्र द्वारा मदन मंत्रीकरण करता है।
८
नोट:—मनुष्य देह ही श्रीचक्र है ।
मदंतिका मानिनी मंगला च सुभागा च सा सुन्दरी सिद्धिमत्ता । लज्जा मतिस्तुष्टिरिष्टा च पुष्टा लक्ष्मीरूमा ललिता लालपंती ॥६॥
पंचदशी कादिविद्या के प्रत्येक अक्षर के अनुसार १५ शक्तियों के नाम ये हैं:--
अर्थः—मदन्तिका, मानिनी, मंगला, सुभागा और वह सुन्दरीत्रिपुरा; सिद्धिमत्ता, लज्जा, मति, तुष्टि, इष्टा, और पुष्टा; लक्ष्मी, उमा, ललिता और लालपन्ती ।
इमां विज्ञाय सुधिया मदन्ती परिस्रुता तर्पयन्तः स्वपीठम् । नाकस्य पृष्ठे महतोवसन्ति परंधाम त्रैपुरं चाविशंति ॥७॥
अर्थः— इस विद्या को जानकर ( सुधारूपी ) मदिरा से मदन्ती को, उसकी पीठ (श्रीचक्र) में तृप्त ( प्रसन्न ) करने वाले महान पुरुष स्वर्ग के ऊपर वास करते हैं और त्रैपुर धाम में प्रवेश करते हैं ।
स्वपीठम् को निवसन्ति के साथ पढ़ने से इस प्रकार अर्थ समझना चाहिये कि मदन्ती को तृप्त करने वाले महान् पुरुष स्वर्ग के ऊपर उसकी पीठ में वास करते हैं, इत्यादि ।
षष्ठं सप्तममथवहिसारथिमस्या मूलत्रिकमादेशयन्तः।
९
कामो योनिः कामकला वज्रपाणिर्गुहाहसा मातरिश्वाभ्रनिन्द्रः पुनर्गुहा सकला मायया च पुरूच्येषा विश्वमातादिविद्या ॥८॥
**अर्थः—**कामः (ककार) योनिः (एकार) कामकला (ईकार) वज्रपाणिःइन्द्र (लकार) गुहा (ह्रीं) हसा (हस) मातरिश्वा (ककार) अभ्रं (हकार) इन्द्रः (लकार) पुनर्गुहा (ह्रीं), सकला (सकल) मायया (ह्रीं)। यह प्रकाशवती विश्वमाता स्वरूपा आदि विद्या हैं।
षष्ठं सप्तममथवहिसारथिमस्या मूलत्रिकमादेशयन्तः। कथ्यं कविं कल्पकं काममीशं तुष्टुवांसो अमृतत्वं भजन्ते ॥९॥
**अर्थः—**ऊपर वाली विद्या के षष्ठं, सप्तम, और वह्निसारथि अर्थात् मातरिश्वा का मूलत्रिकं (प्रथम तीन अक्षरों के स्थान पर आदेश करने वाले साधक कथ्य (वाच्य पद) सर्वज्ञ कल्प के निर्माता कामेश्वर को प्रसन्न करके मुक्त हो जाते हैं। (कल्पः शास्त्रे विधौ न्याये संवर्ते ब्रह्मणो दिने)। यह लोपा मुद्रा मंत्र है।
पुरं हन्त्रीमुखं विश्वमातूरेवेरेखा स्वर-मध्यं तदेषा। बृहत्तिथि दर्शपंच च नित्या सषोडशीकं पुरमध्यंविभर्ति ॥१०॥
**अर्थः—**पुरं हन्त्रीमुखं (शिवाभिमुखं), विश्वमातुः (छंदे—दीर्घ) विश्वमाता की, अवेः पुष्पवती की, रेखा 'ए'नामाख्या, स्वर मध्यं (स्वर हैं मध्य में) जिसके वह (विद्या), बृहत्तिथिदर्शपंच च (शुक्ल पक्ष की १५ तिथियां) और षोडशीक बीज सहित नित्या
१०
भगवती पुरके मध्य में धारण करती है। अर्थात् पुष्पवती विक- सिता विश्वमाता की 'ए'नामाख्या और जो शुक्ल पक्ष की १५ तिथियों युक्त है वह नित्या शिवाभिमुखसषोडशीक मध्य में स्वर- युक्त है उसे पुरके मध्य में लिये हुए श्रीचक्र अथवा सहस्रारस्थ अकथ चक्र को धारण करती है ।
इस श्रुति का संकेत अष्टम मंत्रोक्त विद्या की ओर और विशुद्ध चक्र एवं श्रीचक्र के पूजन की विधि की ओर है । अर्थात् कादिविद्या को सषोडशीक लेना चाहिये, जिसके १५ अक्षर शुक्लपक्ष की तिथियों के सदृश विकसित हो रहे हैं । अविः से रजस्वला स्त्री का अर्थ ग्रहण नहीं करना चाहिये । उसका अर्थ शिवाभिमुख अर्थात् शिव की ओर मुख किये हुए मोक्ष मार्ग की ओर ले जाने वाली होनी चाहिये । विशुद्ध चक्र जो सब स्वरों का स्थान है उसमें उसका ध्यान करना चाहिये, जिसके दल सह- स्रार की ओर विकसित हो रहे हैं ।
यद्वा मंडलाद्वा स्तनविम्बमेकं मुखं चाधस्त्रीणि गुहासदनानि । कामीकलां कामरूपां चिन्तित्वा नरो जायते कामरूपश्चकामः ॥१२॥
अर्थः— अथवा जो गोल होने के कारण स्तनबिम्ब के सदृश एक मुख वाला है और उसके नीचे तीन गुहा सदृश घर बने हुए हैं एसी कामरूपा कला के कोई सकामी मनुष्य अनु-
११
ष्ठान में लाता है तो उसकी कामना पूर्ण होती है और वह स्वयं कामरूप हो जाता है। यहां कामबीज की ओर संकेत है।
परिस्रुतं झषमाजंफलं च भक्तानि योनीः सुपरिष्कृताश्च । निवेदयन्देवतायै महत्यै स्वात्मीकृते सुकृते सिद्धिमेति ॥१२॥
अर्थः— परिस्रुतं=मदिरा, झषं=मत्स्य, नागरवेल, आजं= अजा से संबंध रखने वाला फल, अथवा आज्यं घी और फल अथवा झषा नागबला से उत्पन्न होने वाला फल, भात भोजन के पदार्थ, और योनियों को अच्छी तरह साफ सुथरा करके महादेवी को नैवेद्य देकर अपने लिये किये हुए सुकृत से सिद्धि पाता है। यह सारी विद्या सांगोपांग अति गोपनीय है, इसका यंत्र, मंत्र, पूजन विधि और पूजन की सामग्री का वर्णन कूट शब्दों में किया गया है। वास्तविक अर्थ सांप्रदायिक आचार्यों के मुख से ही जाना जा सकता है। इसलिये नैवेद्य की सामग्री के नाम भी कूट शब्दों में बताये हैं। जैसे परिस्रुतं मदिरा, झषं मछली, आजंबकरे का मांस. योनि स्त्री की योनि इत्यादि वास्तव में इन निषिद्ध पदार्थों के नामों द्वारा कूटशब्दों में अध्यात्म निवेदन निहित है। उसको गुप्त रखा गया है। परिस्रुतं से कुण्डलिनी जागरणोपरान्त अनुभव में आने वाली आध्यात्म मस्ती का संकेत है, झषमाजफलं से कर्मों का फल, भक्तानि से प्रारब्ध भोग और योनी से उनकी कारण भूत वासनायें समझनीं चाहिये।
१२
सृण्येव सितया विश्वचर्षणिः पाशेनैव प्रतिबध्नात्यभीकाम्। इषुभिः पंचभिर्धनुषा च विधत्यादिशक्तिरुणा विश्वजन्या ॥१३॥
अर्थः—शर्करा के अंकुश से विश्व का आकर्षण करने वाली, पाश से क्रूरता का दमन करती है पांचबाणों से और धनुष से वह विश्व जननी आदि शक्ति अरुणा सबको नियन्त्रण में रखती है।
भगवती के चारों हाथों में अंकुश पाश, पांच बाण और धनुष हैं। और उसका वर्ण लाल है, इसलिये उसका नाम अरुणा है। अंकुश शर्करा का बना है, बाण फूलों के और धनुष ईख का। क्रोध को अंकुश, मोह को पाश, शब्द स्पर्श-रूपरसगंध को पांच बाण और मन को धनुष समझना चाहिये। मोह भी माधुर्य लिये होता है, भगवती का क्रोध भी मीठा होता है। मन में आनंद रूपी रस भरा रहता है और पांचों विषयों में भी मधुरता होती है।
भगः शक्तिर्भगवान्काम ईश उभा दातारविह सौभगानाम । समप्रधानौ समसत्वौ समोजौ तयोः शक्तिरजरा विश्वयोनिः ॥१४॥
अर्थः—भग शक्ति है, भगवान् कामेश दोनों यहां सौभाग्य के देने वाले हैं, दोनों समान रूप से प्रधान हैं, समान सत्व वाले हैं, और समान ओजस्वी हैं, ओजरा उनकी शक्ति है जो विश्व का कारण है।
१३
इच्छा, श्री, ज्ञान, वैराग्य, कीर्ति, ऐश्वर्य, धर्म और मोक्ष ये ८ भग कहलाते हैं, इनकी शक्तियों से युक्त भगवान कहलाता है ।
परिस्रुता हविषा भावितेन प्रसंकोचे गलिते वैमनस्कः । शर्वः सर्वस्य जगतो विधाताधर्ता हर्ता विश्वरूपत्वमेति ॥१५॥
**अर्थः—**मदिरा की हविद्वारा अर्थात् आनन्दावेशरूपी हविद्वारा भावना करने से प्रसंकोच के गलित होने पर अर्थात् जीवभाव का त्याग करके वैमनस्क उनमनी भाव को प्राप्त होता है । और कल्याण स्वरूप सारे जगत का विधाता धर्ता और हर्ता उसको विश्वरूप में दिखने लगता है ।
इयं महोपनिषत् त्रैपुर्या यामक्षयं परमोर्गीर्भिरीट्टे । एषर्ग्यजुःपरमेतश्च सामायमथर्वेयमन्या च विद्या ॥१६॥
**अर्थः—**यह त्रिपुरा का महोपनिषत् है, जो अक्षय और परम है, जिसको, यहां वाणी द्वारा कहा गया है । यह ऋक् यजुर् है और वह परंसाम है, यह ही अथर्व और अन्य विद्या स्वरूप है ।
ॐ ह्रींमों ह्रींमित्युपनिषत् । वाङ्मे मनसीति शांतिः ॥ हरिःॐ तत्सत् इति ऋग्वेदीया श्रीत्रिपुरोपनिषत् समाप्ता ॥
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परिशिष्ट ( ३ )
अथ अथर्ववेदीया भावनोपनिषत् का हिन्दी अनुवाद !
स्त्राविक्षापदतत्कार्य श्रीचक्रोपरि भासुरम् ।
विन्दुरूपंशिवकारं रामचन्द्रपदं भजे ॥
ॐ भद्रंकर्णेभिः शृणुयामदेवा भद्र पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गै स्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः । स्वस्तिन इन्द्रो वृद्धश्रवाः, स्वस्तिनः पूषाविश्ववेदाः, स्वस्ति नस्ताक्षर्यो अरिष्टनेमिः, स्वस्तिनो वृहस्पतिर्दधातु । ॐ शान्तिः ३ ॥
हरिः ॐ ॥ आत्माका चारों ओर सकल ब्रह्माण्डमण्डल को घेरेहुए, अखण्ड मण्डलाकार स्वयं प्रकाशमान ध्यान करना चाहिये । ॐ श्रीगुरु सबकी कारणभूता शक्ति है । उससे ९ रंध्र (छिद्र) वाला देह बनता है, वह ही ९ शक्ति स्वरूप श्रीचक्र है । (जैसे देह में २ नेत्र, २ कान, २ नाक के छिद्र, १ मुख, १ पायु और १ उपस्थ ये ९ छिद्र हैं वैसे ही श्रीचक्र में ४ श्रीकंठ और ५ शिव युवतियों वाले ९ प्रकृति स्वरूप त्रिकोण हैं), (सौ. ल. श्लोक ११) । वाराही शक्ति पितृ रूपा है । (सौ. ल. श्लोक ३) और कुण्डलिनी शक्ति मातृ रूपा है (सौ. ल. श्लोक ९), पुरुषार्थ सागर हैं, देह नवरत्नद्वीप (सौ. ल. श्लोक ८), आधार नवक मुद्रा शक्तियां हैं (त्रैलोक्य
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मोहन चक्र के तीसरे चतुष्कोण की प्रकट योगिनियां, अर्थात् सर्व संक्षोभिणी, सर्व विद्राविणी, सर्वाकर्षिणी, सर्व वशंकरी, सर्वोन्मादिनी, सर्व महाङ्कुशा, सर्व खेचरी, सर्व बीजा और सर्व योनि मुद्रा शक्तयः)। त्वगादि सप्त धातुओं से अनेक प्रकार संयुक्त संकल्प कल्पतरु हैं, तेजकल्पकोद्यान हैं। (श्लोक ८) जिह्वा के मधुर, अम्ल, तिक्त, कटु, कषाय और क्षार (लवण) भेद से छः रस छः ऋतु हैं। क्रियाशक्ति पीठ है, ज्ञानशक्ति कुण्डलिनी घर है, और इच्छाशक्ति महात्रिपुर सुन्दरी हैं। ज्ञाता होता, ज्ञान अग्नि और ज्ञेय हवि हैं; तीनों की अभेद भावना श्रीचक्र पूजन है। नियति सहित श्रृंगार, विभत्स, रौद्र, अद्भुत, भयानक, वीर, हास्य, करुण और शान्त ये ९ रस, त्रैलोक्य मोहन चक्र के प्रथम बहिर चतुष्कोण पर स्थि्त अणिमा, लघिमा, महिमा, ईशत्व, वशित्व, प्राकाम्य, भुक्ति इच्छा, प्राप्ति और मुक्ति १० सिद्धियां हैं (श्लोक ५१)। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मय, मात्सर्य, पुण्य और पाप मध्य चतुष्कोणास्था ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा और महालक्ष्मी ८ मातृ देवता हैं। पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश; श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण; वाक्, हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ, और मनोविकार सर्वाशा परिपूरक दूसरे आवरण के १६ दलों पर स्थित कामाकर्षिणी, बुद्धया कर्षिणी, अहंकाराकर्षिणी, शब्दस्पर्श रूपरसंगधाकर्षिणि, चित्ताकर्षिणी धैर्याकर्षिणी, स्मृत्याकर्षिणी,
१६
नामाकर्षिणी, बीजाकर्षिणी, आत्माकर्षिणी, अमृता कर्षिणी और शरीराकर्षिणी १६ नित्या कला गुप्त योगिनियां हैं। बोलना, चलना, पकडना, मलमूत्र का विसर्जन करना मैथुन, हानि, लाभ और उपेक्षा बुद्धि, सर्व संक्षोभण संज्ञक तीसरे आवरणके ८ दलों पर स्थिता अनङ्ग कुसुमा, मेखला, मदना, मदनातुरा, रेखा, वेगिनी, अङ्कुशा और मालिनी ८ गुप्ततर योगिनियां हैं । अलंबुसा, कुहू विश्वोदरी, वरुणा, हस्तिजिह्वा यशस्वती अथवा पयस्विनी, अश्विनी, गांधारी, पूषा, शंखिनी, सरस्वती, ईडा, पिङ्गला, और सुषुम्ना ये १४ नाडियां सर्व सौभाग्य दायक चतुर्थ चतुर्दशार आवरण के १४ त्रिकोणों पर स्थिता सर्व संक्षोभिणी, सर्व विद्राविणी, सर्वाकर्षिणी सर्वाह्लादिनी, सर्वसंमोहनी सर्वस्तंभिनी, सर्वजृंभिणी, सर्ववशंकरी, सर्वरंजनी, सर्वोन्मादिनी, सर्वार्थसाधिनी, सर्वसंपत्ति पूरिणी, सर्वमंत्रमयी, और सर्वद्वंद्वक्षयंकरी १४ संप्रदाय योगिनियां हैं । प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त और धनंजय १० वायु सर्वार्थ साधक संज्ञक बहिर्दशार गत पांचवें आवरणके १० त्रिकोणों पर स्थिता सर्वसिद्धिप्रदा, सर्वसंपत्प्रदा, सर्वप्रियकरी, सर्वमंगलकरी, सर्वकामदा, सर्वदुखःविमोचिनी, सर्वमृत्यु प्रशमनी, सर्वविघ्न निवारिणी, सर्वाङ्ग सुन्दरी, और सर्वसौभाग्य दायिनी १० कुलोत्तीर्ण योगिनियां हैं । उक्त दस वायु के संसर्ग की उपाधि भेद से जो रेचक पूरक, शोषक, दाहक, प्लावक पंचप्राणादि की अमृत रूपी पालन करने वाली क्रियाएं
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हैं, और क्षारक, दारक, क्षोभक, मोहक, जृंभक ५ क्रियाएं जो पालन नहीं करतीं नागादि की क्रियाएं हैं, जिन ने मनुष्यों का मोहक दाहक खाया पीया भक्ष्य, लेह्य, चोष्य, और पेय चतुर्विध अन्न पचता है सर्वरक्षाकर संज्ञक छठे अन्तर्दशार चक्र की सर्वज्ञा सर्वशक्तिप्रदा, सर्वैश्वर्यप्रदा, सर्वज्ञानमयी, सर्वव्याधि विनाशिनी, सर्वाधारस्वरूपा, सर्वपापहरा, सर्वानन्दमयी सर्वरक्षा स्वरूपिणी, और सर्वेप्सित फलप्रदा १० वह्निकला निगर्भ योगिनियां हैं। शीत, ऊषण, सुख, दुःख, इच्छा, सत्व, रजोगुण और तमोगुण सर्वरोगहर संज्ञक अष्टार सप्तम आवरण के ८ त्रिकोणों में स्थिता वशिनी कामेश्वरी, मोदिनी, विमला, अरुणा, जयनी, सर्वेश्वरी और कौलिनी वाग्देवता ८ रहस्य योनियां हैं। शब्द स्पर्श रूप-रसगंध ५ तन्मात्रा ५ पुष्पबाण हैं, मन इक्षुधनु, वश्यबाण, राग पाश और द्वेष अङ्कुश है। अव्यक्त, महत्, अहङ्कार तीनों कामेश्वरी, वज्रेश्वरी, और भगमालिनी देवियां हैं जिनका स्थान सर्वसिद्धप्रद अष्टम आवरण के मध्य त्रिकोण के अग्र भागों पर है। काल के परिणाम को दिखाने वाली १५ तिथियां १५ नित्या हैं, श्रद्धानुरूपा बुद्धि देवता है, उन में कामेश्वरी सदा आनंदघना परिपूर्ण स्वात्मैका रूपा हैं। इसका स्थान सर्वानन्दमय संज्ञक नवम आवरण में अर्थात् विन्दुस्थान है, जिसको ललिता महात्रिपुर सुन्दरी परापरातिरहस्य योगिनी कहते हैं।
**उपासना क्रमः—**तर्पणादि के लिये जल सत्त्व है, कर्त्तव्या कर्त्तव्य विचार उपचार है, कर्त्तव्यता है या नहीं यह अनूपचार
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अर्थात गौण उपचार है। वाह्य और अभ्यन्तर इन्द्रियों की रूप ग्रहण करने की योग्यता बनी रहे यह इच्छा आवाहन है। उन वाह्याभ्यन्तर कर्मों की एक विषय पर स्थिरता आसन है। रक्त और शुक्ल पदों का एकीकरण पाद्य है। (ईडा और पिंगला शक्ति के दोनों चरणों में शक्त्यात्मक पद रक्त है और शिवात्मक पद शुक्ल है। आमोद और आनंद का प्रकाश आसनदान और अर्घ्यदान। स्वतः सिद्ध स्वच्छता आचमन। चन्द्रमयी चिति से सर्वांग स्रवण स्नान है। चिदग्नि स्वरुप परमानन्द शक्ति का स्फुरण वस्त्र है। सत्ताइस भेदों से युक्त क्रिया, इच्छा और ज्ञान रूपी ब्रह्म ग्रंथिवाली छः तन्तु की ब्रह्म नाडी ब्रह्म सूत्र है। प्रत्येक क्रिया शक्ति, इच्छा और ज्ञान शक्ति के २७ भेद कहे गये हैं। अधिभौतिक, अधिदैविक, और अध्यात्म भेद से तीनों शक्तियां तीन तीन प्रकार की होती है। फिर प्रत्येक के मृदु मध्य और तीव्र भेद से तीनों के नवधा भेद समझना चाहिये। फिर प्रत्येक के सुख दुःख और मोहात्मक अथवा सात्विक राजसिक और तामसिक भेद से सत्ताईस भेद होते हैं। मृदु मध्य और तीव्र के स्थान पर मनसा वाचा कर्मणा भेद से भी तीनों को त्रिधा माना जा सकता है। ब्रह्म सूत्र में तीन ग्रंथियां इच्छा ज्ञान और क्रिया रूपा है और उसमें छः तन्तु है। तीनों की शक्तियां शिव शक्ति अथवा ईडा पिंगला भेद से ६ प्रकार की होती हैं। इस प्रकार २७ तारों का यज्ञोपवीत बट कर उसकी छ डोरियों
३९
ने सुषुम्ना रूपी ब्रह्म सूत्र बना है। अपने को वस्तु संग रहित पृथक स्मरण करना विभूषण है। सच्चिदानन्द की परिपूर्णता का स्मरण करना गंध है। सब विषयों का एकाग्रस्थिर मन से अनुसंधान करना पुष्प हैं। उन को ही सर्वदा स्वीकार करना धूप है। सच्चित् स्वरूप उल्काकाश देह वाला जो पवन के झोकों से न हिलने वाला उर्द्ध शिखा युक्त प्रज्वलित दीप है। सर्वथा यातायात वर्जित एकान्तवास नैवेद्य है। तीनों अवस्थाओं का एकीकरण तांबूल है। मूलाधार से ब्रह्मरंध्र पर्यन्त और ब्रह्मरंध्र से मूलाधार तक आना जाना प्रदक्षिणा है। तुर्यावस्था नमस्कार है। देह के शून्य होने पर प्रमातृत्व का लय होना बलि हरण है। सत्य हैं कर्तव्य और अकर्तव्य परन्तु उदासीनता के भाव में नित्य आत्मा को मग्न रखना होम है। स्वयं उसकी पादुकाओं में निमग्नता परिपूर्ण ध्यान है। इस प्रकार तीन मुहूर्त्त भावना करने वाला जीवन्मुक्त हो जाता है। उसे सायुज्य देवात्मैक्य सिद्धि होती है। उसके चिन्तित कार्य बिना यत्न के सिद्ध होते हैं। वह ही शिवयोगी कहलाता है। यह कादि हादि मत के अनुसार भावना प्रतिपादित् की गई है। जो ऐसा जानता है वह जीवन मुक्त हो जाता है। वह जीवन मुक्त हो जाता है।
इति उपनिषत् । ॐ भद्रं कर्णे भिरिति शान्तिः।
हरीः ॐ तत्सत् ।
इत्यथर्वण वेदे भावनोपनिषद् हिन्दी अनुवाद।
२०
परिशिष्ट (४)
अथ देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् ।
न मंत्रं नो यंत्रंतदपि च नजाने स्तुति महो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च नजाने स्तुति कथाः ।
नजाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥ १ ॥
अर्थः— हे मां ! मैं न यंत्र जानता हूं, न मंत्र, और फिर अहो स्तुति भी तो नहीं जानता, आवाहन ध्यान और तेरी स्तुति कथा कुछ नहीं जानता, तेरी मुद्रा नहीं जानता, और न रोना ही जानता हूं, परन्तु हे मात ! इतना तो जानता हूं कि तेरा अनुसरण करने से क्लेशों का नाश होता है ।
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रोजायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ २ ॥
अर्थः— तेरी पूजा की विधि का ज्ञान न होने के कारण धन के अभाव से और आलस्य से एवं विधिवत् पूजा करने में अशक्य होने के कारण जो तेरे चरणों से अलग रहा हूं, वह मेरा अपराध क्षमा किया जाने के योग्य है । हे जननि सब का
२१
उद्धार करने वाली शिवे ! कुपुत्र तो हो सकता है परन्तु कहीं भी कुमाता नहीं होती ।
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः संतिसरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तवसुतः ।
मदीयोंऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ३ ॥
**अर्थः—**पृथ्वी पर तेरे, हे मां ! बहुत से सरल पुत्र हैं, परन्तु उनमें मैं भी एक विरल चपल तेरा सुत हूं । हे शिवे ! जो तूने मुझे त्याग रखा है, यह तेरे लिये उचित नहीं है, क्योंकि कुपुत्र तो होते हैं परन्तु कहीं भी कुमाता नहीं होती ।
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वादत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ४ ॥
**अर्थः—**हे जगज्जननि ! हे मां ! मैंने तेरे चरणों की सेवा कभी नहीं की, और हे देवि ! मैं तुझे बहुत धन भी न दे सका, तौ भी तू जो मेरे ऊपर निरुपम स्नेह करती हैं, ठीक है क्योंकि कुपुत्र तो हो सकते है, परन्तु कहीं भी कुमाता नहीं होती ।
२२
परित्यक्ता देवा विविधविध सेवा कुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ ५ ॥
अर्थ:—विविध प्रकार से सेवा करते-करते व्याकुल होकर अब ८५ वर्ष से भी अधिक वय हो जाने पर मैंने सब देवों कोछोड दिया है, यदि अब हे मां ! तेरी भी कृपा नहीं होगी, तो हे गणेश जननि ! मैं निरालम्ब किसकी शरण में जाउं ?
यहां ८५ वर्ष की आयु से अधिक समय अन्य देवताओं की सेवा में व्यतीत हो जाने के उल्लेख से यह शंका होती है कि यह स्तोत्र आदि शंकर भगवत्पाद का विरचित नहीं है । संभव है कि चारों मठों की आचार्य परंपरा में किसी अन्य आचार्य का यह विरचित हो सकता है, क्योंकि सब मठों के आचार्य शंकराचार्य ही कहलाते हैं । अन्यथा ८५ वर्ष से भी अधिक वय कहने से सामान्य लोगों का दीर्घायु तक अन्य देवताओं की सकाम उपासना में ही लगे रहने की ओर संकेत है ।
श्वपाकोजल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विरहति चिरं कोटि कनकः ।
तवार्पणे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥ ६ ॥
२३
अर्थः— हे अपर्णे ! तुम्हारे मंत्र का एक वर्ण भी कान में पडजाने का जब यह फल है, कि बकवास करने वाला अबोध भी मधुपाक जैसी मधुरवाणी का वक्ता हो जाता है और रंक भी किरोडों सुवर्ण की मुद्राओं मे दीर्घ काल तक निर्भय विहार करता है। तो कौन मनुष्य जान सकता है कि हे जननि . जप की विधि के अनुसार जप करने का क्या फल होगा. क्योंकि जप विधि को कौन जानता है ? अर्थात् कोई नहीं जानता।
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पट धरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥७॥
अर्थः—हे भवानि ! चिता की भस्म कालेप करने वाला, हलाहल खाने वाला, दिगम्बर जटाधारी, कंठ में सर्पों का हार पहिनने वाला, पशुओं का पति, कपाली (हाथ में भिक्षा के लिये खप्पर लिये) भूतेश ईश्वर जगत की एक मात्र ईशन (शासन) करने की पदवी धारण करता है. इसका कारण तेरा पाणिग्रहण करने की परिपाटी का ही फल है।
न मोक्षस्याकांक्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
नविज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः !
२४
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥ ८
अर्थ:-- हे चन्द्रमुखि जननि ! न मुझे मोक्ष की इच्छा है न संसारिक वैभव की इच्छा है, न विज्ञान की ही अपेक्षा है और न सुख की इच्छा, इसलिये यह ही याचना करता हूं कि मेरा जीवन 'मृडानी' रुद्राणी, शिव २ भवानी' इस प्रकार जप करता हुआ बीते ।
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः किं रूक्षचिन्तनपरै र्न कृतं वचोभिः । श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥
अर्थ:-- हे श्यामे ! अम्बे ! मेरेसे न तो विधिपूर्वक तेरी विविध सामग्रियों से पूजा ही हुई है । और मेरी रूखे चिन्तन में लगी वाणी द्वारा क्या नहीं किया गया है ? तो भी यदि तूही मुझ अनाथ पर जो कुछ कृपा रखती है, हे मां वह तेरे लिये उचित है । (जो मुझ जैसे कुपात्र पर कृपा तो है ही)
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि । नैतच्छठत्वं मम भावयेथा : क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥