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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

.४० स्पन्दकारिका हैं। फलतः उनके द्वारा स्वीकारे गये भिन्नकालीन एवं भिन्नाकार ज्ञान अनेकाकार होने के कारण वेद्य ही बन सकते हैं वेदक नहीं। अनेकाकारता ही वेद्यता होती है। वेद्यता में अर्थ- प्रकाशित का स्वभाव नहीं हो सकता। अतः अर्थप्रकाशित के अभाव में ये ज्ञानक्षण स्वतः जड़ ही हैं। ये कदापि प्रकाशमान नहीं माने जा सकते। इसके साथ ही बौद्ध लोगों का विचार है कि संसार के सारे आदान-प्रदान दूसरे सविकल्प ज्ञानक्षणों से चलते हैं और पहला निर्विकल्प ज्ञानक्षण इनका आधार होता है। वास्तव में बात ऐसी है कि ज्ञान का प्रथम क्षण अनुभवकाल और दूसरा क्षण स्मृतिकाल होता है। संसार के सारे व्यवहार प्राथमिक अनुभव पर नहीं अपितु उसकी स्मृति पर आधारित होते हैं क्योंकि संसार में एक ही पदार्थ को सैकड़ों बार देखने पर हर देखने को पहला अनुभव नहीं कहा जा सकता। स्मृतिकाल में विषय ठीक उसी रूप में प्रकाशित होते हैं जिस रूप में अनुभवकाल में उनका अनुभव हुआ होता है। विचारणीय यह है कि जब अनुभवक्षण में स्मृति नहीं है और स्मृतिक्षण में अनुभव नष्ट हुआ होता है तो ऐसी परिस्थिति में स्मृतिक्षण में घट, पट आदि पदार्थों का अनुभवकालीन रूप किस प्रकार प्रकाशित हो सकता है ? विषयों के, ठीक वैसे ही रूप में प्रकाशित न होने की दशा में उनकी स्मृति कैसी और परिमाणतः संसार के व्यवहारों का चलना भी कैसा ? अब यदि बौद्धों के संस्कारसिद्धान्त को माना जाय कि अनुभव के संस्कारों से स्मृति- क्षण में ठीक अनुभवकाल के ही आकार-प्रकार वाले विषयों का प्रकाशन हो जाता है तो एक बाधा उपस्थित होती है। वह यह कि संस्कार का स्वभाव पहली जैसी स्थिति की स्थापना करना होता है। अनुभवकाल के संस्कार स्मृतिकाल में भी बिल्कुल अनुभवकाल के समान रूपवाले ज्ञानों को जन्म देंगे। अनुभवकाल में विषय का अनुभव निर्विकल्प रूप में होता है। अतः स्मृतिकाल में भी ज्ञानों का रूप निर्विकल्प ही होगा। अर्थात् स्मृति का विषय बने हुए ग्राह्यपदार्थों में किसी प्रकार की नामरूपादि की कल्पना सम्भव नहीं होगी। ऐसी दशा में स्मृति के द्वारा भी संसार के आदान-प्रदान कैसे सम्भव होंगे ? इन बाधाओं को दृष्टि में रखकर शैव दार्शनिक इस निर्णय पर पहुँच गये हैं कि वास्तव में इन दोनों ही ज्ञानक्षणों के बीच में इनसे इतर चेतन और स्वयंप्रकाशमान सत्ता अनुस्यूत है जिसमें सारे अनुभव, स्मृतियां, आकार और प्रकार बीज में वृक्ष के समान अवस्थित हैं। वह चेतनसत्ता स्वप्रकाश होने के कारण अपने आन्तरिक अनुसन्धान के द्वारा अनुभव और स्मृति को एकाकार बनाकर और निर्विकल्प को नामरूपादि की कल्पना के द्वारा सवि- कल्प का रूप देकर, संसार के व्यवहारों को चलाती है। २. मीमांसकवाद का पर्यालोचन—१सुखदुःखादिविशिष्ट 'मैं' प्रतीति को ही आत्मा का नाम देते हुए ये लोग वास्तव में बुद्धितत्त्व पर ही अवस्थित हैं क्योंकि सुख, दुःख और मोह अन्तःकरण की वृत्तियाँ हैं। इस विषय में यह विचारणीय है कि यदि आत्मसत्ता प्रति- १. अहंप्रतीतिप्रत्येयः सुखदुःखाद्युपाधिभिस्तिरस्कृत आत्मा—इति मन्वाना मीमांसका अपि बुद्धावेव निविष्टाः। (प्र० हृ०, सूत्र ८)

स्पन्दशक्ति का पारमार्थिक अस्तित्व ४१ समय सुखदुःखादि की उपाधियों के नीचे दबी रहती है तो उसको चेतन और स्वतन्त्र नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर सुखदुःखादि अवस्थाओं को, उसके प्रतिद्वन्द्वी के रूप में, एक अलग सत्तावान् पदार्थ मानना पड़ेगा परन्तु ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि सुखदुःखादि स्वयं जड़ और अनेक होने के कारण शाश्वत सत्तावान् पदार्थ नहीं माने जा सकते हैं। कुमारिल जैसे प्रख्यातनामा मीमांसक आत्मा को स्वतन्त्ररूप में चैतन्य न मान कर चैतन्य-विशिष्ट मानते हैं। इसका स्पष्ट अभिप्राय यह हो सकता है कि आत्मा में चैतन्य और कहीं से आया है। कहाँ से आया है यह स्पष्ट नहीं है। कहीं से भी आया हो, परन्तु उसको स्वतन्त्र न रख कर, आत्मा की विशेषता बनाना और आत्मा को उसका विशेष्य बनाना निष्प्राण कामिनी के गले में कंचन का हार डालने के समान है। यह कहना कि 'गुण, गुणी के बिना ठहर नहीं सकता है' न्यायसंगत नहीं है। ऐसी अवस्था में भी आत्मा की स्वतन्त्रता और एकता संशय में पड़ जाती है। साथ ही यह नियम केवल संसारभूमिका पर ही चलता है क्योंकि विश्वात्मा वही बन सकता है जो गुणों को सत्ता प्रदान करने पर भी स्वयं गुणातीत हो। फलतः इन लोगों का उपाधिविशिष्ट आत्मवाद भी कुछ संतोषजनक नहीं है। ३. चार्वाकों के देहात्मवाद का पर्यालोचन—¹चार्वाकों की ज्ञानमीमांसा प्राचीन भारत के सारे बौद्ध, जैन और ब्राह्मण मतावलम्बियों को समानरूप से कभी भी मान्य नहीं रही है। कम से कम आज भी, जबकि विश्व के कोने कोने में भौतिकवाद अपनी चरमसीमा पर पहुँच चुका है, चार्वाकीय विचारधारा भारतीय वसुन्धरा पर पनप नहीं सकती है। यहाँ के जनमानस की गहराइयों में शैव और वेदान्त जैसे दर्शनों के अध्यात्मवाद ने शताब्दियों से इतनी मजबूत जड़ पकड़ ली है कि कोई या किसी प्रकार की भी भौतिकता-मूलक विचारधारा उसको सरलता से हिला नहीं सकती। चार्वाकों की ज्ञानमीमांसा स्पष्टरूप में देहात्मवाद, प्रत्यक्षवाद और आधिभौतिक सुखवाद पर आधारित है। इसमें धर्म, आचार और ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है। भारत का, दिनभर कड़कती धूप में काम करने वाला खेतीहर या सड़क पर पत्थर तोड़ने वाला मजदूर, दिन भर खून-पसीना एक करके सायंकाल को मंदिर में जाकर, जब तक भोलेनाथ या गिरधर की आरती न उतारे, तब तक उसको चैन कहाँ ? भले ही उसका उदर आधा खाली ही रहे परन्तु ज़ोर ज़ोर से घड़ियाल बजाने में उसको अपूर्व आनन्द और संतोष प्राप्त होता है। यह बात उसके रक्त में मिली हुई है; आखिर इससे उसको अलग कैसे, किया जा सकता है ? चार्वाकों का देहात्मवाद तो खैर, शरीर की नश्वरता प्रत्यक्षरूप में देखने से ही संशय में पड़ जाता है परन्तु केवल प्रत्यक्षवाद को स्वीकार करना भी तर्क के अनुकूल नहीं है। आखिर संसार के व्यवहार कभी कभी अनुमान या आप्तवाक्य पर भी चलते हुए दिखाई देते हैं। अतः इन दो प्रमाणों को किसी के कहने मात्र से ही झुठलाया नहीं जा सकता। इसके साथ ही इन लोगों ने भौतिकसुखवाद के अन्तर्गत जिस प्रकार के आचार-विचार की रूपरेखा प्रस्तुत कर रखी है वह तो आदर्शवादी भारतीय मस्तिष्क को कभी मान्य नहीं होगी। १. द्रष्टव्य—भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ ७१-८७.

४२ स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri फलतः निष्कर्ष यही निकलता है कि अध्यात्मवाद की पृष्ठभूमि पर चार्वाकों के देहात्मवाद का आलोचन करना सरासर अन्याय है क्योंकि जब ये लोग शरीर के अतिरिक्त अन्य किसी आत्मा नामक सत्ता के सद्भाव को नहीं स्वीकारते हैं तो उन पर यह सिद्धान्त थोपा भी कैसे जा सकता है ? ॥४॥ [स्पन्दशक्ति का पारमार्थिक अस्तित्व] अब सूत्रकार अगले सूत्र में स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका का स्वरूप-वर्णन करने के साथ साथ, उसकी परमार्थ-सत्ता को सिद्ध कर रहे हैं :- न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यो ग्राहको न च । न चास्ति मूढभावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ॥ ५ ॥ तस्य चायं स्वभावो यत् सुख-दुःख-ग्राह्यग्राहक-मूढतादिभावैरस्पृष्टः। स एव च परमार्थतोऽस्ति नित्यत्वात् । सुखादयः पुनः संकल्पोत्थाः क्षणभङ्गुरा आत्मस्वरूप- बाह्याः शब्दादिविषयतुल्याः। न च, सुखादिस्वरूपो यदा नासौ तदा पाषाणप्रख्य एव ॥ ५ ॥ अनुवाद सूत्र—जिसमें दुःख, सुख की अवस्थायें नहीं हैं, जिसको ग्राह्यता¹ या ग्राहकता² छू भी नहीं लेती हैं और, जो मूढभाव³ से सर्वथा रहित है वही तत्त्व परमार्थसत्⁴ है ॥५॥ वृत्ति—उस स्पन्द-तत्त्व का यह स्वभाव है कि उसको सुख, दुःख, ग्राह्यता, ग्राहकता, और मूढता इत्यादि भाव कभी भी स्पर्श नहीं करते हैं। वही तत्त्व परमार्थ-सत् है क्योंकि वह नित्य है। सुख इत्यादि केवल मानसिक संकल्पों की ही उपज हैं, क्षणमात्र में नष्ट होने वाले हैं और आत्मा के वास्तविक रूप से बाह्य हैं। अतः वे भी शब्द इत्यादि ज्ञेय-विषयों के ही तुल्य-कक्ष हैं। इस सम्बन्ध में यह सोचना भी व्यर्थ है कि यदि उस तत्त्व को सुख इत्यादि की अनुभूति नहीं तो वह पत्थर के समान (जड़) है ॥५॥ विवरण शाश्वत-स्पन्दमयी संवित्-भट्टारिका बहिर्मुखीन विश्वरूप में प्रसृत होने की उन्मुखता में स्वयं बहिर्मुख होकर सबसे पहले सूक्ष्म प्राणभूमिका या सामान्य-प्राणना की भूमिका पर अवतीर्ण होकर, त्रिगुणात्मक अन्तःकरणों का रूप धारण कर लेती है। इन त्रिगुणात्मक अन्तःकरणों का रूप ही सुख, दुःख और मोह होता है। अतः सुखिता, दुःखिता और मूढता १. शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध के रूप में बहिरङ्ग प्रमेयता । २. पुर्यष्टक में नियन्त्रित जीव का मित प्रमातृ-भाव । ३. किसी भी वेद्य पदार्थ को ज्ञान का विषय बनाने के सामर्थ्य का अभाव; अचेतनता की जैसी अवस्था । ४. शाश्वत रूप में और सदा एक रूप में वर्तमान सत्ता ।

स्पन्दशक्ति का पारमार्थिक अस्तित्व ४३ इत्यादि अवस्थायें स्वरूप से इतर अन्य कोई पदार्थ नहीं हैं। १यह तो अखण्ड—ज्ञानरूपा पारमेश्वरी शक्ति है जो कि आन्तर और बाह्य रूप में प्रकाशमान, नील सुख इत्यादि वेद्य पदार्थों के रूप में स्वयं ही प्रकाशमान है। प्रतिसमय संसार में देखा जाता है कि प्रत्येक प्रमाता ज्ञान के द्वारा ही इन नील सुखादि विषयों का अनुभव करता है, अर्थात् ज्ञान-सत्ता के आधार के बिना किसी भी विषय की कोई सत्ता नहीं है। इससे यह बात स्पष्ट होती हैं कि जो जिसके बिना अलग रूप में स्थित नहीं रह सकता वह उससे अभिन्न हुआ करता है। २फलतः नील सुखादि भी ज्ञान से इतर अन्य कोई पदार्थ नहीं हैं। यदि यह अवस्थायें ज्ञानरूप हैं तो हैं, यदि नहीं हैं तो नहीं हैं। जिसप्रकार यदि मिट्टी है तो घट है यदि मिट्टी नहीं है तो घट भी नहीं है। इस सम्बन्ध में यह बात स्मरणीय है कि चित्-तत्त्व का स्वरूप विश्वात्मक अहंविमर्श है। इस अहंविमर्श के दो रूप हैं—शुद्ध तथा अशुद्ध। शुद्ध का सम्बन्ध पतिप्रमातृभाव के साथ है। इसमें सारी अवस्थायें और सारे विरोधात्मक द्वन्द्व अपनी भेदमयता को भूल कर विशुद्ध चिद्रूप एकाकारता में उसी प्रकार अवस्थित रहते हैं जिस प्रकार संसार की सारी सरितायें सागर में पहुँच कर सरितायें न रह कर सागर ही बन जाती हैं। अशुद्ध अहं- विमर्श (माया शक्ति के द्वारा संकोच में पड़ी हुई 'मैं' प्रतीति) का सम्बन्ध संसारी जीव अथवा पशु-प्रमातृभाव के साथ है। यह वह अवस्था है जिसमें वही विशुद्ध चित्-३तत्त्व, अपने ही रूपान्तर मायाशक्ति के द्वारा, अपनी ही अभिन्न ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति और माया- शक्ति को संकोच में डाल कर क्रमशः४ सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण (बुद्धि, मनस् और अहंकार) के समष्टिरूप चित्त के रूप को धारण कर लेता है। यह चित्त ही प्रत्येक प्रकार की अवस्थाओं, उपाधियों, उनके पारस्परिक विरोधात्मक द्वन्द्वों, विचित्र प्रकार के शरीरों एवं आकार-प्रकारों की अनेकाकारता की सर्जना करके उनको अपना वास्तविक स्वरूप समझता रहता है जबकि वास्तविक स्थिति कुछ और है। फलतः विशुद्ध चित्-तत्त्व प्रतिसमय अखंड ज्ञानात्मक एकाकारता होने के कारण इन सारी सुखिता, दुःखिता, ग्राह्यता और ग्राहकता की उपाधियों से रहित और परमार्थसत् है। अब जो पशु प्रमातृ-भाव की पदवी पर प्रत्येक जीवधारी में इन उपाधियों के प्रति 'अहं' १. तत्तद्रूपतया ज्ञानं बहिरन्तः प्रकाशते । ज्ञानादृते नार्थसत्ता ज्ञानरूपं ततो जगत् ॥ (का० क्र० उदाहृत शि० सू० वि०, सू० ३०) २. नहि ज्ञानादृते भावाः केनचिद्विषयीकृताः । ज्ञानं तदात्मतां यातमेतस्मादवसीयते ॥ (तत्रैव) ३. चितिरेव चेतनपदादवरूढा चेत्यसंकोचिनी चित्तम् । (प्र० हृ०, ५) ४. स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या । मायातृतीये ते एव पशोः सत्त्वं रजस्तमः ॥ (ई० प्र०, ३-२-४)

सूत्र के अन्तिम पाद में आत्मतत्त्व की परमार्थसत्ता की बात कहने से सूत्रकार ने

४४ स्पन्दकारिका अभिनिवेश देखने में आता है वह तो केवल अपने वास्तविक चैतन्य स्वरूप की अनुभूति की हीनता के कारण ही है। १इसके विपरीत निरन्तर अभ्यास एवं गुरुकृपा से आत्मस्वरूप की अनुभूति को प्राप्त करने वाले साधक, इन सारी उपाधियों को, दूसरे घट पट आदि ग्राह्य पदार्थों की तरह ही अपने से अलग 'इदम्' रूप में और अपने आत्मस्वरूप को विशुद्ध 'अहं' रूप में अनुभव कर लेते हैं। फलतः ऐसे व्यक्तियों को संसार के द्वन्द्व प्रभावित नहीं कर सकते हैं। अब रहता है मूढता का प्रश्न। इस विषय में कई दार्शनिकों का यह विचार है कि यदि आत्मस्वरूप में सुख दुःख इत्यादि अवस्थाओं का नितान्त अभाव अर्थात् इनकी संवेदन- हीनता ही है तो उसका स्वरूप भी २मूढता अर्थात् वेद्यपदार्थों की अनुभूति के सामर्थ्य का अभाव ही है। शास्त्रों में इस शंका का निवारण इस प्रकार किया गया है कि ३यदि कोई व्यक्ति संज्ञाहीनता अथवा प्रगाढ सुषुप्ति की अवस्था में पड़ा हुआ हो तो प्रत्यक्षरूप में उसे किसी बात का संवेदन नहीं होता है। परन्तु ज्योंही वह ऐसी अवस्था से उठता है तो कहने लगता है; 'अरे, मैं तो गहरी संवेदनहीनता (मूढता) में पड़ा हुआ था'। यदि उस समय में उसकी आत्मा सत्यतः ही मूढ बनी होती तो उसको मूढता में पड़े रहने का संवेदन ही कैसे होता ? मूढ़ता से सर्वशून्यावस्था का अभिप्राय है तो ऐसी अवस्था में रहने की अवधि का उसको किसी भी प्रकार का संवेदन नहीं होना चाहिये था, परन्तु वैसा देखने में नहीं आता है। अतः मूढता भी आत्मा का स्वरूप नहीं है। सूत्र के अन्तिम पाद में आत्मतत्त्व की परमार्थसत्ता की बात कहने से सूत्रकार ने 'असत् = सर्वाभाव' को ही शाश्वत यथार्थ मानने वाले लोगों का मुखमुद्रण किया है। सूत्रकार के मतानुसार सर्वोपाधिरहित विशुद्ध आत्मस्वरूप निश्चयपूर्वक परमार्थ-सत् है जबकि उससे इतर यह सारा कार्यरूप प्रपञ्च संवृति-सत् है। जो वस्तु परमार्थ सत् है वह कभी असत् नहीं हो सकती है। यदि उसको 'असत्' मान लिया जाये तो इस शङ्का का समाधान नहीं हो सकता है कि 'असत्' वस्तु से 'सत्' (सत्स्वरूप में दिखाई देने वाले कार्यरूप जगत् ) की उत्पत्ति कैसे हुई है ? फलतः मौलिक स्पन्दतत्त्व स्वयं 'सत्' है और इसी कारण उससे, दृश्यमान कार्यरूप 'सत्' का ही विकास होता है। सूत्र के तीसरे और चौथे पाद में शून्यवादी माध्यमिकों (बौद्ध दार्शनिकों की एक शाखा) और अभाव ब्रह्मवादी श्रुत्यन्तविदों (प्राचीन वेदान्तियों की एक शाखा) के मतों की निःसारता का प्रतिपादन किया गया है। आगे सूत्र १२ में इन दोनों वादों का यथासम्भव पर्यालोचन किया जायेगा ।। ५ ।। १. सुखदुःखयोर्बहिर्मननम् । (शि० सू०, ३. ३३) २. मूढस्य भावो मूढत्वं वेद्यवेदनसामर्थ्याभावः । (स्प० का०, पृष्ठ ३१) ३. यतः तस्यापि अवस्थान्तरे मूढोऽहमासम् इति प्रत्यवमर्शमानत्वात् वेद्यत्वं स्थितमेव केवलं तत्कालमनुपलम्भः (स्प० का० पृष्ठ ३१.),

सूत्र—जिस आत्मबल (स्पन्दात्मकबल) के स्पर्शमात्र से ही, आन्तर शक्तिचक्र के

[ स्पन्दतत्त्व की उपादेयता ] इस प्रकार स्पन्दतत्त्व की परमार्थसत्ता को सिद्ध करके अब सूत्रकार अगले दो सूत्रों में इस बात को स्पष्ट कर रहे हैं कि विश्व के अणु अणु में उसी स्पन्दात्मक पारमेश्वरी शक्ति के स्वातन्त्र्य का प्रसार स्पष्टरूप में दृष्टिगोचर होता है। वह शक्ति उसी स्वातन्त्र्य के द्वारा जड़वर्ग में अनुस्यूत होकर उसको भी ठीक चेतनधर्मा ही बना लेती है। अतः बड़ी लगन और अथक प्रयत्न के द्वारा उस मौलिक तत्त्व के परीक्षण करने से ही मनुष्यजन्म चरितार्थ हो सकता है। यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत् स्वयम्। सहान्तरेण चक्रेण प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः ॥६॥ लभते, तत्प्रयत्नेन परीक्ष्यं तत्त्वमादरात्। यतः स्वतन्त्रता तस्य सर्वत्रेयमकृत्रिमा ॥७॥ यतः करणवर्गस्य अन्तश्चक्रसहितस्य विमूढस्याप्यमूढवत् उत्पत्तिस्थितिनिरोधाः, सोऽन्येषां चैतन्यापादने समर्थः कथं निःस्वभावः । तस्मात् तत् तत्त्वं यत्नेन परीक्षितव्यं योगिना। यथास्य करणादिषु चैतन्यदाने स्वातन्त्र्यम्, तथा परपुरादिष्वपि सम्भाव्यते; स्वातन्त्र्यस्य स्वस्वभावभूतस्य सर्वत्राकृत्रिमस्याभ्यासात् यतो व्यक्तिः ॥ ६-७ ॥ अनुवाद सूत्र—जिस आत्मबल (स्पन्दात्मकबल) के स्पर्शमात्र से ही, आन्तर शक्तिचक्र के साथ साथ, उस बाह्य अचेतन इन्द्रियवर्ग को भी चेतन की तरह ही सृष्टि, स्थिति और संहार करने का धर्म प्राप्त होता है, उस तत्त्व (स्पन्दात्मक स्वभाव) का परीक्षण महती श्रद्धा और भगीरथ प्रयत्न के द्वारा करना चाहिये। ऐसा करना आवश्यक है क्योंकि उस तत्त्व की स्वभाव- भूत स्वतन्त्रता विश्व के अणु अणु में (प्रत्येक शरीर और प्रत्येक दशा में) व्याप्त है ॥६-७॥ वृत्ति—जिस तत्त्व के बलस्पर्श से आन्तर करणेश्वरीचक्र (खेचरी इत्यादि शक्तिचक्र) के साथ, इस सारे इन्द्रिय वर्ग को, स्वतः अचेतन (जड़) होने पर भी, चेतन की तरह ही सृष्टि, स्थिति और संहार करने का धर्म प्राप्त होता है, वह तत्त्व दूसरे (जड़वर्ग से संबंधित) पदार्थों को चेतनता प्रदान करने में समर्थ होने के कारण, स्वयं स्वभावहीन (चैतन्य से रहित) कैसे हो सकता है? अतः योगी को चाहिये कि वह भगीरथ प्रयत्न के द्वारा उस तत्त्व का परीक्षण करे। जिस प्रकार उस तत्त्व को इन्द्रिय इत्यादि जड़ वर्ग में चेतनता का संचार करने की स्वतन्त्रता है उसी प्रकार इस बात की भी सम्भावना है कि वह दूसरे शरीर, प्राण इत्यादि को भी चेतनधर्मा बनाने में स्वतन्त्र है। सहज-स्वातन्त्र्य (स्वतन्त्र अहंप्रत्यवमर्श) ही प्रत्येक पदार्थ का स्वभाव (अपना वास्तविक भाव-आत्मा) बन कर अवस्थित है। अतः अभ्यास (श्रमहीन साधना) करते से ही उसकी अनुभूति हो जाती है ॥ ६-७ ॥

४६ स्पन्दकारिका विवरण प्रस्तुत सूत्रों का अर्थ अच्छी प्रकार हृदयङ्गम करने के लिए इनमें प्रयुक्त 'करणवर्ग' 'आन्तरचक्र' तथा 'प्रवृत्तिस्थितिसंहृती:' इन दार्शनिक शब्दों का अभिप्राय समझना आवश्यक है। अतः निम्नलिखित पंक्तियों में इन पर यावत्-शक्य प्रकाश डालने का प्रयत्न किया जा रहा है— १. करणवर्गं—'करण' शब्द का अर्थ वह कोई अपेक्षिततम साधन है जिसके बिना किसी कार्य की निष्पत्ति नहीं हो सकती है। संसार के आदान-प्रदान में किसी भी चेतन प्राणी के अन्तर में विद्यमान भावात्मक विश्व का बाहर के नामरूपात्मक व्यक्त विश्व के साथ और बाहर का आन्तर के साथ सम्बन्धित होने का कार्य चलता रहता है। इसी को दैनिक-जीवन का व्यवहार कहते हैं। इस जीवन व्यवहार के, ज्ञानप्रधानता में सङ्कल्पन, निश्चयन, अभि- मानन, श्रवण, स्पर्शन, दर्शन, आस्वादन, जिघ्रण ( सूंघना ); और, क्रियाप्रधानता में चलना, उठना, बोलना, मलत्याग और आनन्दानुभूति ये तेरह रूप हैं। इनमें से पहले तीन का आन्तर भावनात्मक और शेष का बाह्य नामरूपात्मक विश्व के साथ सम्बन्ध है। इन तेरह प्रकार के कार्यों को करने वाले साधन तेरह इन्द्रियां हैं। अतः इस इन्द्रियवर्ग का ही शास्त्रीय नाम करणवर्ग है। इन तेरह इन्द्रियों का उपर्युक्त कार्यों के अनुसार विभाग इस प्रकार है— तीन अन्तःकरण—मनस्, बुद्धि और अहंकार। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ—कर्ण, त्वचा, नेत्र, रसना, नासिका। पाँच कर्मेन्द्रियाँ—पाद, हस्त, जिह्वा, पायु, उपस्थ। इनमें से जिह्वा आस्वाद के समय ज्ञानेन्द्रिय और बोलने के समय कर्मेन्द्रिय बन जाती है। ये सारे करण स्वयं अचेतन हैं अतः उपर्युक्त कार्यों को करना इनका अपना धर्म नहीं है। विशेषस्पन्दों की धारायें ही इनमें संचारित होकर इनको चेतनधर्मा बना लेती हैं जिससे ये चेतन की तरह संकल्पमात्र से ही तत्तत्कार्य करते रहते हैं। प्रत्यक्षतः ऐसा लगता है कि ये स्वयं ही सारा काम करते हैं परन्तु वास्तव में काम करने की शक्ति इनसे इतर होकर इनमें अनुस्यूत होती है और ये स्वयं उसके साधनमात्र होते हैं। यदि इनमें ये सारे कार्य करना अपना ही धर्म होता तो मृत्यु हो जाने के अनन्तर भी इनसे वह धर्म छूटने न पाता। २. आन्तर-चक्र—पहले सूत्र के विवरण में आन्तर शक्तिचक्र के विषय में कुछ संकेत दिया गया है। यह भी कहा गया है कि वास्तव में परमेश्वर की स्वातन्त्र्यशक्ति अथवा स्पन्दशक्ति एक ही है जो अनन्त एवं अपरिमित धाराओं में प्रवहमान होकर विश्व के अणु अणु का रूप धारण करती है। शक्ति की इन्हीं अनन्त धाराओं को शास्त्रों में आन्तरचक्र या करणेश्वरीचक्र का नाम दिया गया है। तन्त्रालोक, स्वच्छन्द, विज्ञानभैरव इत्यादि अनेक शैवग्रन्थों में परमेश्वर की अनेक शक्तियों और अनेक चक्रों की विस्तृत विवेचना की गई है। प्रस्तुत ग्रन्थ में भी आगे कई स्थानों पर इनकी ओर संकेत किया गया है जिन पर यथासम्भव प्रकाश डाला जायेगा।

स्पन्दतत्त्व की भूमिका ४७ यहाँ पर इस चक्र से उस शक्तिवर्ग का अभिप्राय है जो प्रमाता ( जीव ) के अन्तःकरणों, बहिष्करणों ( इन्द्रियवर्ग ) और प्रमेयभावों को स्फुरणा प्रदान करता है । इस शक्तिवर्ग के खेचरी¹, गोचरी, दिक्‌चरी और भूचरी ये चार प्रधान विभाग किये गये हैं। इस विषय में निम्नलिखित बातें स्मरणीय हैं । परमेश्वर की स्वातन्त्र्यशक्ति विश्व का बाह्यप्रसार करने की भूमिका पर 'वामेश्वरी'² रूप धारण कर लेती है । शास्त्रकारों ने यह नामकरण निम्नलिखित उपपत्तियों के आधार पर किया है— १. यह विश्व का वमन करती है अर्थात् स्वरूप में केवल 'अहं' रूप में ही अवस्थित भावमण्डल का, बाह्य 'इदं' रूप में अवभासन करती है । २. यह वाम अर्थात् उल्टा आचरण करती है । भाव यह कि स्वभाव के विरुद्ध रूप को अर्थात् संसार के रूप को धारण करके सारे विश्व को अनन्त आपत्तियों और जन्ममरण का विषय बना लेती है । ३. यह संसार-भाव के विरुद्ध आचरण करती है । भाव यह कि पारमेश्वर शक्तिपात का पात्र बने हुए व्यक्तियों में शिवभाव का विकास करती है । ऐसी वामेश्वरी शक्ति ही उपर्युक्त खेचरी इत्यादि चार शक्तियों की मूलभूता शक्ति है । ये खेचरी इत्यादि शक्तियाँ³ पशुभाव में पड़े हुए शिव को मोह में डाल कर उसकी बुद्धि में संसारी हेय पदार्थों के प्रति अहं-अभिनिवेश का दुराग्रह उत्पन्न करती हैं जिससे उसको अपने वास्तविक विश्वात्मभाव और अपनी अबाध एवं असीम पञ्चविधकृत्य- कारिता का ज्ञान नहीं रहता है । परमेश्वर की इसी अवस्था को 'संसारभाव' कहते हैं । इतना होते हुए भी इस शक्तिवर्ग का काम द्विमुखी है। जहाँ⁴ ये शक्तियाँ अज्ञानी पुरुषों को अधोगति के गर्त में धकेलती रहती हैं वहाँ सद्गुरुओं की कृपा से निर्मल हृदय वाले पुरुषों को शिवभाव पर आरूढ कराने की क्षमता भी रखती है। ऐसे⁵ सावधान साधकों के हृदयों में ये शक्तियां मूढ़भाव को उत्पन्न नहीं करती हैं। वे तो शरीर, प्राण इत्यादि में रहते हुए भी साक्षात् शिव ही होते हैं । १. खेचरी-गोचरी-दिक्करी-भूचरीरूपैः अशेषैः प्रमातृ-अन्तःकरण-बहिष्करण-भावस्वभावैः परि- स्फुरन्ती, ( प्र० हृ०, सू० १२) । २. किञ्च चितिशक्तिरेव भगवती विश्ववमनात् संसारवामाचारत्वाच्च वामेश्वर्याख्या सती•••• । ( तत्रैव ) । ३. तदपरिज्ञाने स्वशक्तिभिर्व्यामोहितता संसारित्वम् । (प्र० हृ०, १२ सूत्र) ४. पूर्णविच्छिन्नमात्रान्तर्बहिष्करणभावगाः । वामेशाद्याः परिज्ञानाज्ञानात् स्युर्मुक्तिबन्धदाः । (मुक्तक, भट्टदामोदर, उदाहृत प्र० हृ०, सूत्र १२) ५. एवं संकुचितशक्तिः प्राणादिमानपि यदा स्वशक्तिव्यामोहितो न भवति, तदा अयम्, ••••• वामेश्वरीसमावेशात् चिन्मय एव ( तत्रैव )

४६ स्पन्दकारिका इन चारों शक्तिचक्रों के स्वरूप के विषय में शास्त्रकारों का मन्तव्य संक्षेप में इस प्रकार है— १. खेचरी—ज्ञान¹ के अनन्त आकाश में विचरण करने वाली शक्तियाँ। अपने मूलरूप में इन शक्तियों का नाम 'चिद्गगनचरी' (चिदाकाश में विचरण करने वाली) है। परन्तु² जब परमेश्वर की सर्वकर्तृता आदि असंकुचित और असीम पाँच शक्तियाँ संकोच में पड़कर कला, विद्या आदि पाँच कञ्चुकों का रूप धारण करती हैं तब पशुभूमिका पर उनका 'खेचरी-चक्र' पड़ता है। इस अवस्था में पशुओं के ज्ञान के क्षेत्र पर संकोच का आवरण डालकर अपने वास्तविक 'चिद्गगनचरी' रूप को छिपा लेती है जिससे वे अपने आपको शक्ति-दरिद्र एवं असहाय जैसा समझते हैं। ³दूसरी ओर यही शक्तिवर्ग सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व इत्यादि पाँच असीम परमेश्वरी शक्तिरूपों में स्पन्दायमान होता हुआ, अपने वास्तविक 'चिद्गगनचरी' रूप से पतिप्रमाता के हृदय को विकसित करता रहता है। २. गोचरी—⁴परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी इन चार वाणियों के और अन्तःकरणों के क्षेत्र में विचरण करने वाला शक्तिवर्ग—एक ओर पशुप्रमाता के हृदय को भेदव्याप्ति में डालकर अपारमार्थिक संकल्पविकल्पों का शिकार बना लेता है और दूसरी ओर पतिप्रमाता के हृदय में पूर्ण अभेद-व्याप्ति के रूप में स्फुरणशील रहता है। ३. दिक्धरी—५पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ नामक दस दिशाओं में विचरण करने वाला शक्तिवर्ग—एक ओर पशुओं की इन्द्रियों को बाहर संसार की ओर प्रवहमान बनाकर, उनके द्वारा उनको बाह्य विषयों का भेदरूप में ग्रहण करवाता रहता है और दूसरी ओर प्रतिप्रमाता को अन्तर्मुखीन एवं अतीन्द्रिय संवेदन के द्वारा प्रत्येक पदार्थ का अभेद 'अहं' रूप में ग्रहण करवाता है। ४. भूचरी—६शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच प्रमेय भूमिकाओं में विचरण करने वाला शक्तिवर्ग—एक ओर पशुप्रमाता को भिन्न-भिन्न रूपों में अवभासित होने वाले घट पट इत्यादि अनन्त प्रमेयजालों के गोरखधन्धे में फंसा लेता है और दूसरी ओर पति- प्रमाता को उन्हीं अनन्त रूपों वाले प्रमेय पदार्थों का, अपने ही अङ्गों के समान, विशुद्ध चिन्मात्र रूप में ही अनुभव करा लेता है। १. खे बोधगगने चरतीति। (प्र० हृ०, सू० १२) २. पशुभूमिकायां शून्यपदविश्रान्ता किञ्चित्कर्तृत्वाद्यात्मक-कलादिशक्त्यात्मना खेचरीचक्रेण गोपितपारमार्थिकचिद्गगनचरीत्वस्वरूपेण चकास्ति। (प्र० हृ०, सू० १२) ३. पतिभूमिकायां तु सर्वकर्तृत्वादिशक्त्यात्मकचिद्गगनचरीत्वेन। (तत्रैव) ४. द्रष्टव्य, प्र० हृ०, सूत्र १२. ५. द्रष्टव्य, प्र० हृ०, सूत्र १२. ६. द्रष्टव्य, प्र० हृ०, सूत्र १२.

स्पन्दतत्त्व की उपादेयता ४९ सारा आन्तर शक्तिचक्र स्पन्दमयी संवित् के साथ अभिन्न होने के कारण सतत- स्पन्दमय अर्थात् नित्यचेतन है। यही नित्य-चेतन शक्तिवर्ग सारे इन्द्रियवर्ग में और इनसे इतर देह, प्राण, पुर्यष्टक इत्यादि में चेतना का संचार करके उनको चेतन के समान- धर्मा बना लेता है जिससे संसारी जीव भी अपनी अपनी अनुरूप परिधि में उसी प्रकार सृष्टि संहारादि कार्य करता रहता है जिसप्रकार स्वयं परमेश्वर अपने असीम विश्वात्मस्वरूप में करता रहता है। जीवभाव में इन्द्रियों की प्रवृत्ति, स्थिति और संहृति (सृष्टि, स्थिति, संहार) की दशा— १. प्रवृत्ति (सृष्टि)—१अपने अपने ग्राह्य विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) को ग्रहण करने के अवसरों पर इन्द्रियों की, उनकी ओर उन्मुख होने की अवस्था को इन्द्रियों की प्रवृत्ति या 'सृष्टिदशा' कहते हैं। २. स्थिति—२अपने-अपने अनुकूल ग्राह्य विषयों को ग्रहण करने के अनन्तर, कुछ समय तक उन्हीं के साथ तन्मय होकर, विश्रान्त होने की अवस्था को इन्द्रियों की 'स्थिति- दशा' कहते हैं। ३. संहार—अभिलषित३ कार्य समाप्त हो जाने पर, उन्हीं ग्रहण किये हुए ग्राह्य पदार्थों से अलग होकर, अपने कार्य से निवृत्त होने की दशा को, इन्द्रियों की 'संहारदशा' कहते हैं। इसको दूसरे शब्दों में इन्द्रियों की 'प्रत्यस्तमयावस्था' भी कहते हैं। इस प्रकार यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सारे आन्तर शक्तिचक्र और तद्द्वारा बाह्य इन्द्रिय-वर्ग अथवा सारे जडवर्ग को सत्ता देने वाला मूलतत्त्व अहंप्रत्यवमर्शात्मक स्पन्द- तत्त्व (संवित्भट्टारिका) ही है। अब रहा प्रश्न उस तत्त्व की परीक्षा का। इस विषय में शास्त्रों के गहरे अध्ययन, प्रत्यक्षादि प्रमाणों से प्राप्त यथार्थ अनुभूति और सर्वोपरि शक्तिरूप गुरुचरणों की सेवा निष्काम-भाव से करने की आवश्यकता है। सातवें सूत्र के उत्तरार्द्ध 'यतः स्वतन्त्रता तस्य सर्वत्रेयमकृत्रिमा' के द्वारा सूत्रकार ने इस बात का संकेत भी दिया है कि अथक प्रयत्न और अटूट श्रद्धा से उस मौलिक तत्त्व की परीक्षा करने से ही मितप्रमाता को अपने मूलभूत सहज-स्वातन्त्र्य की अनुभूति हो पाती है ॥ ६-७॥ [ मितप्रमाता में स्पन्दशक्ति का स्पर्श ] पूर्व सूत्र में कहा गया है कि शाश्वत स्पन्दमय अनुत्तरतत्त्व स्वतन्त्र इच्छाशक्ति के द्वारा अचेतन इन्द्रियवर्ग में चेतना का संचार करके उनको चेतनधर्मा बना लेता है। इस सम्बन्ध में यह शंका उत्पन्न हो जाती है कि फिर पतिप्रमाता और जडवर्ग के बीच में १. 'प्रवृत्तिः' जिघृक्षितार्थोन्मुखतासमुन्मिषदवस्था। (स्प० का०, पृष्ठ ३४) २. 'स्थितिः' गृहीतार्थविश्रान्त्यवस्था। (स्प० का०, पृष्ठ ३४) ३. 'संहृतिः' कृतकृत्यत्वाद् बाह्यार्थपरित्यागे स्वव्यापारोपरमः 'प्रत्यस्तमयावस्था'। (तत्रैव)

सूत्र—यह बात निश्चित है कि यह पुरुष (मितप्रमाता) केवल पारमेश्वरी इच्छा के

५० स्पन्दकारिका अवस्थित पशुप्रमाता (संसारी जीव) के लिए कौन सा स्थान अवशिष्ट रह जाता है ? क्या वह सदा के लिए दोनों के बीच में अटका हुआ रहकर, कहीं और दिशा से आई हुई इच्छारूपी चाबुक की मार से, इन्द्रियों को अपने अपने कार्य की ओर प्रवृत्त होने की मात्र प्रेरणा देता रहता है ? इस शंका का निवारण अगले सूत्र में किया जा रहा है— न हीच्छानोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते । 'अपि त्वात्मबलस्पर्शात् पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥ ८ ॥ न चेच्छाप्रेषणेन करणानि प्रेषयति, अपि तु स्वस्वरूपे स्थित्वा केवलं यादृशी तस्येच्छा प्रवर्तते तथाविधमेव स बाह्यान्तरं कार्यमुत्पादयति, तेन न करण- विषयमेव सामर्थ्यम्, किं तु तस्य सर्वत्र ॥८॥ अनुवाद सूत्र—यह बात निश्चित है कि यह पुरुष (मितप्रमाता) केवल पारमेश्वरी इच्छा के अंकुश का प्रेरकमात्र बनकर ही नहीं रह जाता है अपितु आत्मबल का स्पर्श होने की दशा में स्वयं भी उसी (पतिप्रमाता) के समान बन जाता है ॥८॥ वृत्ति—यह नहीं सोचना चाहिये कि यह मितप्रमाता पारमेश्वरी इच्छारूपी अंकुश के द्वारा इन्द्रियवर्ग को अपना अपना काम करने की मात्र प्रेरणा देता रहता है, अपितु, इसका अभिप्राय यह है कि यह अपने स्वरूप में ही स्थित रहकर, अपनी इच्छा के अनुसार बाह्य एवं आभ्यन्तर कार्यों की सृष्टि करता है। ऐसी दशा में इसको केवल इन्द्रियों को विषयाभि- मुख बनाने का सामर्थ्य ही नहीं होता है अपितु प्रत्येक क्षेत्र में स्वतन्त्रता से कार्य करने की क्षमता भी प्राप्त ही होती है ॥८॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र वास्तव में पूर्वसूत्र की ही व्याख्या है। पूर्वसूत्र में जो कुछ कहा गया है उससे यह शङ्का सहज ही में उत्पन्न हो सकती है कि जब पतिप्रमाता सीधा ही जडवर्ग में चेतनासंचार करके संसार के कार्य चलाता है तो संसारी ग्राहकवर्ग अर्थात् संसार के सारे जीवों का अस्तित्व ही संशय में पड़ जाता है परन्तु वस्तुस्थिति तो इससे कुछ भिन्न ही देखने में आती है। संसार के प्रत्येक आदान-प्रदान के समय हम देखते हैं कि प्रत्येक संसारी जीव (ग्राहक जीव) अपनी स्वतन्त्र इच्छा से अपनी इन्द्रियों को सहजरूप में विषयों की ओर अभि- मुख या उनसे निवृत्त कर लेता है। आखिर किसी भी प्रकार का कार्यकलाप सम्पन्न होने के समय परमेश्वर स्वयं ही हिमालय जैसे ऊंचे मंच पर खड़ा होकर जीवों को कठपुतलियों की १. सूत्र के इन दो चरणों का यह अभिप्राय भी निकल सकता है कि साधारण जीवों में भी आत्मबल का ही अंशतः स्पर्श होता है जिससे वे भी अपनी संकुचित परिधि में परमात्मा की तरह ही अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने में सक्षम होते हैं।

मितप्रमाता में स्पन्दशक्ति का स्पर्श ५१ तरह नचाता तो नहीं रहता है। यदि ऐसी ही परिस्थिति होती तो संसार के सारे ग्राहकवर्ग के अस्तित्व का अभिप्राय ही क्या होता ? साथ ही जब संसार का सारा ग्राहकवर्ग प्रत्यक्षरूप में स्वयं ही प्रत्येक प्रकार का आदान-प्रदान करता हुआ देखने में आता है तो इस यथार्थ को पारमेश्वरी इच्छामात्र का नाम देकर टाला भी कैसे जा सकता है। इस शङ्का का समाधान तब तक मिलना असम्भव है जब तक यह न समझा जाये कि शैवसिद्धान्त के अनुसार पतिप्रमाता१, पशुप्रमाता२ और सारे ग्राह्यवर्ग३ (जडप्रमेयवर्ग) का वास्तविक स्वरूप क्या है ? क्या ये तीन प्रकार की अलग अलग और पारस्परिक सम्बन्ध- रहित स्वतन्त्र सत्तायें हैं या एक ही मूलभूत सत्ता के तीन रूपान्तरमात्र हैं ? इस सम्बन्ध में यह भी विचारणीय है कि सूत्रकार ने इसी सूत्र में जो आत्मबल के स्पर्श की पहेली बुझा दी है उसका वास्तविक अभिप्राय क्या है। आत्मबल स्वयं क्या है और वह किसको स्पर्श करता है ? शैवशास्त्रियों का मन्तव्य है कि वास्तव में सतत-स्पन्दमयी पारमेश्वर सत्ता स्वयं ही इन तीनों रूपों में प्रकाशमान है। वह४ सत्ता विभु होने के कारण सर्वव्यापक; नित्य होने के कारण आदि और अन्त से रहित; विश्वाकृति होने के कारण स्वयं ही चेतनरूप और जडरूप और विश्व के विचित्र आकार-प्रकारों का अवभासन करने वाली है। सच बात तो यह कि इन कारणों से वह स्वयं ही बहुरूपिया है। असीम एवं अनन्त शक्तियों से परिपूर्ण शिव, विश्व का बाह्य अवभासन करने की ओर संकल्पात्मक उन्मुखता के समय सर्वप्रथम उसका अवभासन स्वरूप से अभिन्न अहंविमर्श के रूप में ही करता है। इस अवभासन का शास्त्रीय नाम 'आदिसर्ग'५ है। अनन्तर अपनी ही स्वातन्त्र्यशक्ति के रूपान्तर मायाशक्ति के द्वारा स्वरूप पर ही आवरण डालकर, स्वात्मरूप६ दर्पण में ही अनन्त प्रकार के ग्राहकों और ग्राह्यों का अवभासन करता है। संसारी ग्राहक- दशा७ और ग्राह्यदशा स्वरूप पर पड़े हुए आवरण के तारतम्य और अनुपात पर ही आधारित १. शिव—पूर्णप्रमाता, पतिप्रमाता। २. जीव—संसारी ग्राहक, मितप्रमाता। ३. सारा जडवर्ग, ग्राह्य, ज्ञेयविषय। ४. विभुत्वात्सर्वगो नित्यभावादाद्यन्तवर्जितः । विश्वकृतित्वाच्चिदचित्तद्वैचित्र्यावभासकः ॥ ततोऽस्य बहुरूपत्वम्......... । (तं० १.६१-६२) ५. विश्वनिर्माणेच्छुर्हि परमेश्वरः प्रथमं स्वाव्यतिरिक्तमेव विश्वं प्रकाशयेत्, अयमेव हि 'आदि- सर्गः' तत्र तत्रागमेषु उच्यते। (तं० वि०, १.१३५) ६. अनन्तरं यदास्य मायया सर्गचिकीर्षा भवति तदा स्वस्वातन्त्र्यात् स्वात्मदर्पणेऽनन्तग्राह्य- ग्राहकद्वयाभाससन्ततीराभासयति। (तत्रैव) ७. सोऽयमात्मानमावृत्य स्थितो जडपदं गतः। आवृतानावृतात्मा तु देवादिस्यावरान्तगः। जडाजडस्याप्येतस्य द्वैरूप्यस्यास्ति चित्रता॥ (तं०, १.१३४-५)

५२ स्पन्दकारिका है। इस प्रकार परमेश्वर स्वयं ही तीनों रूपों में भासमान है। निम्नलिखित तालिका से यह बात स्पष्ट हो जायेगी:—

प्रमाता का रूपआवरण का तारतम्यशक्तित्व का स्वरूपआकारभावों का रूपभेद
१.पति प्रमाताविशुद्ध, चिद्रूप<br>अनावृतज्ञातृत्व और कर्तृ-<br>त्वरूपपूर्ण-<br>स्वातन्त्र्यविश्वात्मभाव<br>आकारहीनसारे भाव अपने ही अंग जैसेभेदरहित<br>सर्वव्यापक
२.पशु प्रमाताचिदचित्,<br>आधा आवृत<br>आधा अनावृतसंकुचित<br>ज्ञान और<br>क्रियादेह, प्राण<br>पुर्यष्टक और<br>शून्यसारे भाव<br>अपने से<br>भिन्नदेवता<br>मानव<br>पशुपक्षिवर्ग
३.जड<br>प्रमेयअचित्<br>चिद्रूपता-<br>पूर्ण आवृतज्ञेयभाव<br>और<br>कार्यभावजड<br>पंचमहाभूतघोरमूढ़ता में<br>पड़े रहने के<br>कारण<br>संज्ञाहीनतासारी<br>स्थावर<br>प्रकृति के<br>असंख्यभेद
वास्तव¹ में संसार में दिखाई देने वाली अनन्त भावराशि परमात्मा की अनन्त
शक्तियों के विश्वमय प्रसार के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वह इसको अपने स्वतन्त्र
संकल्पमात्र से ही अवभासित करता है। स्वरूपतः एकाकार होने पर भी ग्राहकरूप या
ग्राह्यरूप अनेकाकारता को अवभासित करने की संकल्पात्मक क्षमता ही परमेश्वर का
क्रियात्मक स्वातन्त्र्य है जो संकुचित ग्राहकवर्ग में सम्भव नहीं हो सकता है। चैतन्य² किसी
दूसरे वस्तु की अपेक्षा से रूपप्रसार नहीं करता है अपितु यह उसका अकाट्य स्वभाव ही है।
भूमि में डाला हुआ बीज लोकयात्रा की अपेक्षा से अंकुर नहीं बनता है अपितु अंकुरित
१. एष चानन्तशक्तित्वादेवमाभासयत्यमून ।
भावानिच्छावशादेषा क्रिया निर्मातृतास्य सा ॥
(ई० प्र०, २. ४. २)
२. न लोकयात्राभिप्रायज्जनयेद् बीजमङ्कुरम् ।
किन्तु स्वभावात्...........................॥
(ई० सि०, ४१)

पतिप्रमाता में स्पन्दशक्ति का स्पर्श ५३ होना उसका स्वभाव ही है। फलतः यह बात स्पष्ट हो जाती है कि संसारी ग्राहक (मित- प्रमाता) और पतिप्रमाता स्वरूपतः भिन्न नहीं हैं। ऐसी दशा में उनकी इच्छाशक्ति भी भिन्न नहीं हो सकती है। परिणामतः ज्ञान और क्रिया में भी भेद नहीं हो सकता है। हां केवल स्वातन्त्र्य के अनुपात और तारतम्य में भेद अवश्य है। पतिप्रमाता पूर्ण स्वतन्त्र और चिद्रूप होने के कारण विश्वरूप में इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों को प्रयोग में ला सकता है जबकि पशुप्रमाता अंशतः स्वतन्त्र और चिद्रूप होने के कारण, अपनी संकुचित परिधि में ही इन तीनों शक्तियों को, उसी अनुपात से प्रयोग में ला सकता है। इतना ही नहीं, अपितु संसार के अनन्त जीव-जन्तुओं में आपस में भी, चिद्रूपता पर पड़े हुए आवरण का अनुपात से इन तीन शक्तियों की हीनता या अधिकता देखने में आती है। यदि एक छोटे से जीव का विश्व की परिधि और शक्तित्रय का तारतम्य कुछ होता है वही उससे बड़े जीव या मनुष्य का नहीं हो सकता है। महान् दावाग्नि बड़े जंगल को जला सकती है जब कि अंगारा एक छोटे दाह्यपदार्थ को और चिंगारी एक रूई के रेशे को ही जला सकती है। परन्तु जिस प्रकार अग्नि के छोटा या बड़ा होने से उसके जलाने के स्वभाव में कोई अन्तर नहीं पड़ता है उसी प्रकार प्रमाता चाहे पतिभाव पर हो या पशुभाव पर, उसके स्पन्दात्मक चैतन्यस्वभाव में कोई अन्तर नहीं पड़ सकता है। अब यदि कोई कहे कि छोटी सी चिंगारी भी कभी बड़ी से बड़ी आग बन सकती है, तो ठीक है; पशुप्रमाता भी कभी कभी साधना के बल से पतिप्रमाता बन सकता है । प्रमाता के इस पतिभाव और पशु के विषय में भगवान् उत्पलदेव का कथन है कि प्रमाता¹ को जिस अवस्था में सारा भावमण्डल अपना अंग जैसा ही अर्थात् अपने अहंविम- र्शात्मक स्वभाव से अभिन्न प्रतीत होता है उसको पतिप्रमातृभाव कहते हैं । उस प्रमाता को 'पति' इसलिए कहते हैं कि उसका स्वतन्त्र साम्राज्य सारे भाववर्ग पर छाया रहता है और वह उन सारे भावों को अपने चैतन्यामृत की बिन्दुओं से अनुप्राणन या पालन करता रहता है। इसके प्रतिकूल जिस अवस्था में उसको, मायीय आवरण में ढके रहने के कारण, अपने ही अंगभूत भाव अपने से व्यतिरिक्त रूप में प्रतीत होते हैं उसको 'पशुप्रमातृभाव' कहते हैं। इस अवस्था में वह भाववर्ग का अधिपति न रहकर उनका दास बना रहता है। भावों का क्षोभ (उथल पुथल) ही उसके लिए बन्धन बन जाता है जिसमें फँसकर वह पशु और जन्ममरण की संसृति से दुरत्यय पथ का राही बन जाता है । इन तीनों रूपों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में शैवगुरुओं ने लम्बी-चौड़ी और पेचदार दिमागी कवायद करने के अनन्तर यह निष्कर्ष निकाला है कि ये तीनों आपस में अभेद-सम्बन्ध में स्थित हैं । १. स्वाङ्गरूपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते पतिः । मायातो भेदिषु क्लेशकर्मादिक्लुषः पशुः ॥ (ई० प्र०, ३. २. ३)

५४ स्पन्दकारिका अब रह जाता है प्रश्न आत्मबल और उसके स्पर्श का। आत्मसत्ता में स्पन्दमयी पूर्णाहन्ता का बल है। पतिप्रमातृभाव की अवस्था में यह बल अपरिमित एवं पूर्ण स्वतन्त्र है। संसारी ग्राहकभाव की अवस्था में इसका 'स्पर्श' अर्थात् अंशतः विद्यमानता है अतः वह परिमित एवं अंशतः स्वतन्त्र है। यही कारण है कि जहाँ पतिप्रमाता असीम रूप में सब कुछ युगपत् ही चाहता है, जानता है और करता है, वहाँ पशुप्रमाता, देह, प्राण एवं पुर्यष्टक के पिंजरे में बद्ध होने के कारण, ससीम रूप में और निश्चितक्रम में कुछ ही चाहता है, जानता है और करता है। परन्तु दोनों रूपों में प्रवर्त्तमान क्रियाशीलता वास्तव में मौलिक¹ आत्म- सत्ता पर ही आश्रित है। फलतः पशुप्रमाता भी वास्तव में स्वरूप में ही अवस्थित है, उससे बाहर नहीं है। इसके अतिरिक्त 'आत्मबलस्पर्श' का अभिप्राय स्वरूप की पूर्णानुभूति होना भी है। पशुप्रमाता को अलक्ष्य अनुग्रह से जब वास्तविक पूर्ण अहन्तारूप स्वरूप की अनुभूति हो जाती है तब वह भी पशुभाव से मुक्त होकर साक्षात् शिव ही बन जाता है। ऐसी दशा में उसकी इच्छा विश्वात्मा की ही इच्छा होती है। आत्मबल के विषय पर आगे भी यथासम्भव विवेचन किया जायेगा। यहाँ पर केवल इतना ही कहना पर्याप्त है कि आत्मबल का महत्त्व शब्दों के द्वारा अवर्णनीय है। इसके स्पर्शमात्र से, करणवर्ग ही क्या, सारे विश्व में हलचल मच जाती है। आज का यांत्रिक युग तो इसका ज्वलन्त उदाहरण है। किसी भी बिन्दु पर आत्मबल का स्पर्श पाते ही सारा जडवर्ग ऐसे नाचने लगता है कि मानो कठपुतलियाँ नाच रही हों। प्रत्येक प्राणी की पंच- भौतिक काया, प्राण इत्यादि भी इसके अपवाद नहीं हैं ॥८॥ [ क्षोभ की शान्ति और स्पन्द की उपलब्धि ] पूर्व सूत्र में यह बात सिद्ध की गई कि वास्तव में पतिप्रमाता में कोई स्वरूपगत भेद नहीं है। इस सिद्धान्त को स्वीकारने में कोई आपत्ति नहीं थी परन्तु सूत्र का अन्तिम चरण इसमें अड़चन उत्पन्न कर रहा है। वह यह कि यदि जीव और शिव में कोई स्वरूपगत भेद नहीं है तो इस अन्तिम चरण-'पुरुषस्तत्समो भवेत्' में पुरुष को शिव के साथ समानता प्राप्त करने की आवश्यकता को अभिव्यक्त करने का क्या प्रयोजन है ? अतः स्पष्ट है कि स्वरूपगत भेद न होने पर भी पुरुष किसी बात में शिव से न्यून है। अगले सूत्र में इसी बात पर प्रकाश डाला जा रहा है— निजशुद्ध्याससमर्थस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः । यदा क्षोभः प्रलीयेत तदा स्यात्परमं पदम् ॥९॥ स चास्य आत्मबलस्पर्शः सहजया अशुद्ध्या व्याप्तस्य कार्यमिच्छतोऽपि न भवति, किन्तु यदा क्षोभः 'अहमिति' प्रत्ययभावरूपोऽस्य प्रलीयेत, तदास्य भवति परमे पदे प्रतिष्ठानम् ॥९॥ १. यद्यप्यर्थस्थितिः प्राणपुर्यष्टकनियन्त्रिते । जीवे निरुद्धा तत्रापि परमात्मनि सा स्थिता ॥ (अ० प्र० सि०, २०)

क्षोभ की शान्ति और स्पन्द की उपलब्धि ५५ अनुवाद सूत्र—अपने ही स्वातन्त्र्य से उत्पादित सहज १अशुद्धि (मल) के द्वारा असमर्थ बने हुए और संसार के वासनात्मक २कर्त्तव्यों की अभिलाषाओं में पड़े हुए, मितप्रमाता का ३क्षोभ, जब स्वरूप में ही लीन हो जाये तब उसको परमपद प्राप्त होता है ॥९॥ वृत्ति—स्वभाव से उत्पन्न अशुद्धि के द्वारा ओत-प्रोत रहने के कारण और वासना- त्मक कर्त्तव्यों की अभिलाषाओं में पड़े रहने के कारण, मितप्रमाता को आत्मबल का पूर्ण स्पर्श होने नहीं पाता है। परन्तु जब इनका क्षोभ अर्थात् देहादि पर 'अहं' अभिमानमूलक विकल्पपरम्परा, स्वरूप में ही लीन हो जाये, तब यह सर्वोत्कृष्ट पदवी पर प्रतिष्ठित हो जाता है ॥९॥ विवरण शैवशास्त्रियों ने स्थान स्थान पर विश्वात्मा के पतिरूप और पशुरूप की तर्कपूर्ण विवेचना प्रस्तुत करके, प्रबल युक्तियों के द्वारा इस बात को सिद्ध कर दिया है कि ये दोनों रूप वास्तव में एक ही स्वतन्त्र सत्ता के 'पूर्णस्वतन्त्र' और 'संकुचितस्वतन्त्र' रूपान्तर मात्र हैं। उस सत्ता ने विश्वमयता के महान् नाटक की भूमिका निभाने के लिये, अपनी ही इच्छा से, अपने को ही अख्याति का लबादा पहना कर 'संकुचितस्वतन्त्र' रूप धारण किया है। 'पूर्णस्वतन्त्र' रूप में यह भूमिका निभ नहीं सकती क्योंकि पूर्ण में संकोच कहाँ और संकोच के अभाव में संसार कहाँ ? फलतः यदि 'पति' अग्नि का बड़ा सा ढेर है तो 'पशु' उसी की एक छोटी सी चिंगारी है। वह अनुपम अभिनेता स्वयं ही महान् और स्वयं ही लघु है, परन्तु वास्तव में महत्ता और लघुता इत्यादि सारे मायीय बन्धनों से रहित स्वातन्त्र्यवन- विहारी आनन्दघन है। वह शवित्तघन प्रति समय चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया इन पांच रूपों में स्पन्दायमान है। इनमें से आनन्दशक्ति के द्वारा विश्वरूप की सर्जना होती है क्योंकि सारा विश्व असीम आनन्दामृत की उछल्लता ही है। परमेश्वर संसार भाव को, अपने से भिन्नरूप में (वेद्यरूप में) अवभासित करने की ओर संकल्पात्मक उन्मुखता के समय अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति को मायाशक्ति का रूप देकर, उससे जनित स्वात्मविस्मृतिरूप अख्याति (अपने स्वरूप की पूर्णता की विस्मृति) के द्वारा, अपने वास्तविक असीमरूप को भुलाकर, ससीम पशु का रूप धारण करता है। इसको शास्त्रीय शब्दों में अभेद व्याप्ति को भूलकर भेदव्याप्ति का ग्रहण करना कहते हैं। फलतः अख्याति भी पतिप्रमाता की स्वयं ही उत्पादित अशुद्धि है, जिसके द्वारा वह स्वयं ही शक्ति-दरिद्र बन कर, जीवभाव की संकुचित और पग पग पर हेयता और उपादेयता के संशयों से ग्रस्त, इतिकर्तव्यता के क्षोभ में पड़ गया है। यह क्षोभ अर्थात् संसार की अनन्त तुच्छ कामनायें और उनकी पूर्ति के लिए चिरसंघर्ष ही तो इन दो रूपों में एक ऐसी गहरी खाई है जिसको पाटना उतना सरल नहीं जितना आम गोष्ठियों में कहा या सुना १-३. सूत्र में उल्लिखित 'अशुद्धि' शब्द से आणव, 'कर्त्तव्य' शब्द से कार्म और 'क्षोभ' शब्द से मायीय मलों का अभिप्राय है।

५६ स्पन्दकारिका जाता है। यदि किसी प्रकार अर्थात् गम्भीर अध्ययन, श्रद्धा-भक्ति, अथक-अभ्यास, शक्तिपात- रूप गुरुकृपा इत्यादि साधनात्मक उपायों के द्वारा इस खाई को पाटना सम्भव हो सके तो स्वरूपस्पन्द की अनुभूति हो जाती है और पशु भी साक्षात् पति ही बन जाता है। शैवगुरुओं ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञा, तंत्रालोक इत्यादि महान् शैवग्रन्थों में, स्वतन्त्र चैतन्य की इसी द्विमुखी स्फुरणा के सिद्धान्त और इसके साथ सम्बन्धित अवरोहप्रक्रिया की विस्तृत एवं गम्भीर विवेचना प्रस्तुत की है परन्तु उसका अध्ययन करना लोहे के चने चबाना ही तो है। शास्त्र पढ़ने की अपेक्षा बहुधा संशयों की निवृत्ति गुरुओं के वचनामृतों से ही हो जाती है। अस्तु, जहाँ तक स्वतन्त्र संवित्-भट्टारिका के स्वयं ही अस्वतन्त्र संसारी पशुपदवी पर अवतीर्ण होने की प्रक्रिया का प्रश्न है उस पर सूत्र १९-२० में यथा सम्भव प्रकाश डाला जायेगा। यहाँ पर केवल विषय को स्पष्ट करने के लिए शैव दर्शन के स्वातन्त्र्यवाद, अशुद्धि और माया के स्वरूप पर थोड़ा बहुत प्रकाश डालना आवश्यक है। स्वातन्त्र्य—शैवशास्त्रों में 'स्वातन्त्र्य' शब्द और 'चैतन्य शब्द पर्यायवाची हैं। दोनों भाववाचक संज्ञायें हैं। इनको भाववाचक रखने का एक विशेष अभिप्राय है। वह अभिप्राय आगे स्पष्ट हो जायेगा। पहले यह समझना आवश्यक है कि स्वातन्त्र्य या चैतन्य शब्दों से ज्ञान और क्रिया के स्वतन्त्र अर्थात् १अनन्यमुखापेक्षी कर्तृत्व का अभिप्राय लिया गया है। इसका अर्थ विश्वात्मक रूप में सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान और अनुग्रह इन पाँच प्रकार के दुर्घट कृत्यों के जानने और करने में, अनन्यमुखापेक्षी अर्थात् स्वरूप से इतर और किसी सत्ता पर निर्भरता का अभाव है। इस स्वतन्त्र२ आत्मनिर्भरता की स्वरूपभूता पूर्णज्ञातृता और पूर्णकर्तृता की अहंविमर्शनमयी विश्वात्मक-स्फुरणा को ही शैव शब्दों में स्वातन्त्र्य, चैतन्य या आत्मा इत्यादि नाम दिये गये हैं। अब यह देखना है कि इस सर्वोत्कृष्ट सत्ता को स्वतन्त्र न कह कर स्वातन्त्र्य या चेतन न कह कर चैतन्य कहने का अभिप्राय क्या है ? शैवदर्शन में ज्ञातृता और कर्तृता का साधारण ज्ञान (जानना) या क्रिया (करना) अर्थ नहीं है, प्रत्युत विश्वरूप में प्रत्येक वस्तु के देश, काल एवं आकार की बाधाओं या सीमाओं से अबाधित रूप में, जानने३ और करने की क्रिया का स्वतन्त्र कर्तृत्व ही ज्ञातृता और कर्तृता है। साधारण पशुभाव में प्रत्येक जीव भी जानता और करता है परन्तु उस को एक ही समय पर प्रत्येक वस्तु जानने और करने की स्वतन्त्रता नहीं है क्योंकि वह देश, काल एवं आकार की परिधियों में सीमित हो कर कुछ ही जान सकता है या कुछ ही कर सकता है; सारा नहीं। फलतः संसारी जीव में अपने सीमित विश्व के अनुपात से सीमित स्वातन्त्र्य है। अतः वह प्रतिसमय पर-मुखापेक्षी है। १. स्वातन्त्र्यमेव च अनन्यमुखप्रेक्षित्वम् आत्मनः स्वरूपम् । (ई० प्र० वि०, १. ८. ११) २. 'चैतन्यमात्मा'········'चैतन्यं सर्वज्ञानक्रियामयं परिपूर्णं स्वातन्त्र्यम् उच्यते । (शि० सू० वि०, १. १) चैतन्यमात्मनो रूपं सिद्धं ज्ञानक्रियात्मकम् । (शि० स्तो० वि०, १. १) ३. आत्मात एव चैतन्यं चित्क्रियाचितिकर्तृता । तात्पर्येणोदित''''''''। (ई० प्र०, १. ५. १२)

मोक्ष की शक्ति और सानन्द की उपलब्धि ५७ 'चेतन' और 'चैतन्य' का मूल शब्द 'चिति' है। इस 'चिति' शब्द का अर्थ चेतने की क्रिया है। यह चेतने की क्रिया संसार के प्रत्येक ग्राहक में सर्वसाधारण रूप में विद्यमान है। यदि^२ सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो सारे तथाकथित जड पदार्थों में भी इसका सद्भाव पाया जाता है। चेतने वाले को चेतन कहा जाता है अर्थात् जो स्वतन्त्रतापूर्वक किसी भी वस्तु को जान सके या कर सके। यहाँ तक तो ठीक है परन्तु फिर भी एक संसारी ग्राहक और विश्वात्मा के चेतने में क्या भेद है ? यदि कोई भेद नहीं है तो पूर्ण-स्वातन्त्र्य नहीं कहा जा सकता है। अतः^३ शैव दार्शनिकों ने इसकी भाववाचक संज्ञा बनाकर यह अभिप्राय निकाला है कि विश्वात्मकरूप में ज्ञानक्रियामयी चेतने की क्रिया का पूर्ण अधिकारात्मक और अनन्य- मुखापेक्षी कर्तृत्व ही पूर्ण स्वातन्त्र्य अथवा पारमेश्वर ऐश्वर्य है। यह कर्तृत्व अथवा स्वातन्त्र्य ऐसा है कि शाश्वतरूप में सत्तावान् होकर किसी भी देश, काल इत्यादि की संकुचित परिधि में सीमित नहीं है। विश्वात्मा प्रत्येक समय प्रत्येक बात को जानने या करने में स्वतन्त्र है फलतः^४ 'चैतन्य' शब्द से केवल और केवल ज्ञातृता-कर्तृता-रूप स्वातन्त्र्य को अभिव्यक्त किया गया है और यही स्वातन्त्र्य शाश्वत स्पन्दमय पतिप्रमाता का वास्तविक स्वरूप और सारे विश्व के प्रत्येक दृश्यमान अथवा चिन्त्यमान पदार्थवर्ग का आधार एवं अन्तिम विश्रान्तिस्थान भी है। इसी स्वातन्त्र्य को शास्त्रीय शब्दों में सतत स्पन्दमयी-संवित् भी कहते हैं। इस विषय के अधिक स्पष्टीकरण के लिए पूर्वोक्त ज्ञानक्रियात्मक चितिक्रिया के स्वरूप को भी समझना आवश्यक है। जैसा पहले सूत्र के विवरण में भी स्पष्ट किया गया है कि चितिक्रिया का स्वरूप चलना, पकाना इत्यादि स्थूल क्रियाओं का जैसा नहीं अपितु आन्तर अनुसंधानात्मक अथवा मात्र संकल्पात्मक गतिमयता ही है जिसको शास्त्रीय शब्दों में अहं^५ प्रत्यवमर्शात्मक सामान्यस्पन्द कहते हैं। यह विमर्शात्मकता ही इसका एक अविच्छेद्य स्वभाव है जो इसको ^६जड़ से पृथक् करता है। ज्ञान और क्रिया अथवा प्रकाश और विमर्श दो अलग पदार्थ नहीं अपितु एक ही चितिशक्ति की द्विमुखी स्पन्दात्मकता के द्योतक हैं। क्रिया, ज्ञान की ही पल्लवित दशा है और ज्ञान क्रिया का ही पूर्वरूप है। दूसरे शब्दों में इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि प्रकाश अर्थात् शिव ही बहिर्मुखदशा में विमर्श अर्थात् शक्ति ही अन्तर्मुख दशा में प्रकाश अर्थात् शिव है। 'अहं' ही 'इदं' का बीजरूप और 'इदं' ही 'अहं' का विकसित १. 'चितिक्रिया सर्वसामान्यरूपा' (शि० सू० वि०, १. १) २. द्रष्टव्य—ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के १. १. ३ सूत्र पर भास्कराचार्य की टीका, (भास्करी, प्रथमभाग, पृष्ठ ६५) ३. चैतन्यं सर्वज्ञानक्रियासम्बन्धमयं परिपूर्णं स्वातन्त्र्यम्। (शि० सू० वि०, १. १) ४. 'चैतन्यमिति भावन्तः शब्दः स्वातन्त्र्यमात्रकम्। अनाक्षिप्तविशेषं सदाह सूत्रे पुरातने। (तं०, १. २८) ५. चितिः प्रत्यवमर्शात्मा। (ई० प्र०, १.५.१३) ६. तेन जडात् स हि विलक्षणः। (ई० प्र०, १. ५-१२)

५८ स्पन्दकारिका रूप है । स्पन्दात्मक शिव में सारा जगत् अभेदरूप में अवस्थित है और सारा जगत् ही शिव का प्रसार है । ऐसी ही चितिकर्तृ'तारूप स्वातन्त्र्य की गति में कहीं कोई अड़चन खड़ी नहीं हो सकती है और यही कारण है कि विश्वात्मा स्वयं उत्पादित अशुद्धि के द्वारा अपने ही स्वरूप को भागशः आवृत करके संसारी जीव का और पूरा आवृत करके सारे जडवर्ग का रूप धारण करके अवस्थित है । स्वातन्त्र्य तो आखिर स्वातन्त्र्य ही है । वह स्वयं ही कभी अर्धस्वतन्त्र या अस्वतन्त्र भी बन सकता है । यदि न बन सकता तो पूर्णस्वातन्त्र्य ही नहीं कहलाता । अशुद्धि—शैवशास्त्रों में अशुद्धि, अख्याति, मल अथवा बन्ध इत्यादि कतिपय शब्दों से वास्तविक स्वतन्त्र स्वरूप के अज्ञान का अर्थ लिया जाता है । स्वरूप का अज्ञान ही एक ऐसी महान् अशुद्धि है जिसने विश्वात्मा को भी विश्वात्मभाव से गिरा कर पशुभाव के चौराहे पर ला खड़ा कर दिया है। इस अज्ञान के स्वरूप के विषय में भगवान् चन्द्रमौलि ने—'ज्ञान बन्धः' [शिवसूत्र १-२] इस सूत्र में यह निर्णय दिया है कि, 'अज्ञान' का अभिप्राय सर्वथा ज्ञानाभाव नहीं, अपितु वास्तविक स्वरूप का अपूर्णज्ञान है । १अज्ञान तिमिर (एक प्रकार का आँखों का रोग) है जो कि स्वरूपगोपन अर्थात् स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा अपने ही स्वतन्त्र स्वरूप को छिपाने अर्थात् विस्मृत करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । इस स्वात्मविस्मृतिरूप अज्ञान के विषय में आगे सूत्र २० में प्रकाश डाला जायेगा । यहाँ पर संक्षेप में इसके विकास एवं प्रसार की प्रक्रिया के साथ सम्बन्धित कुछ बातों का उल्लेख किया जायेगा । ऊपर कहा गया है कि परमेश्वर की स्वातन्त्र्यशक्ति सतत उदीयमान होने के कारण प्रतिसमय पांच रूपों में स्पन्दनशील है जिनको चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया कहते हैं । इन्हीं को दूसरे शब्दों में क्रमशः सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व और व्यापकत्व भी कहते हैं । वह अनुत्तरतत्त्व इसी शक्तिपञ्चक के द्वारा प्रतिसमय विश्वरूप में सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान और अनुग्रह इन पाँच विराट् कृत्यों को करता रहता है । विश्वरूप में प्रसृत अथवा अवभासित होना तो चैतन्य का स्वभाव ही है क्योंकि उसमें आनन्द की प्रधानता है । संसारभाव का अवभासन करने की ओर उन्मुख हो जाने पर वह चैतन्य-तत्त्व स्वतन्त्रता से अपनी अभेदव्याप्ति को भूलकर भेदव्याप्ति को ग्रहण करता है । इसका अभिप्राय यह कि यद्यपि सारा विश्व उस अखण्ड स्वातन्त्र्यसागर में भेदरहित 'अहं' रूप में अवस्थित ही है तथापि उसमें इसको स्वरूप से भिन्न 'इदं' रूप में अवभासित करने की सूक्ष्म स्फुरणामयी अभिलाषा भी उस स्वरूप-स्वातन्त्र्य से ही उदित हो जाती है । इसप्रकार की अभिलाषा का उदित होना ही स्वरूप में अपूर्णता की प्राथमिक अनुभूति अर्थात् सब से पहला मल है क्योंकि जब सारी विश्वकल्पना स्वरूप में शाश्वत रूप में अवस्थित ही है तो उसको अपने से भेद में १. अज्ञानं तिमिरं पारमेश्वरस्वातन्त्र्यमात्रसमुल्लसितस्वरूपगोपनामात्रसतत्त्वम्.... (तं० वि० १.२३)

क्षेमराजकृत शिवसूत्रविमर्शिनी ५९ देखने की अभिलाषा का उदय होना अपूर्णता की अनुभूति नहीं तो और क्या हो सकती है ? यह अपूर्णता की अनुभूति आणव, मायीय और कार्म इन तीन रूपों में अभिव्यक्त होती है जिनको शैव शब्दों में मलत्रय कहते हैं। अनुग्रहमूर्ति भगवान् आशुतोष ने स्वयं ही श्रीमालिनीविजय-तन्त्र के दो सूत्रों में इन तीन मलों के स्वरूप का विश्लेषण किया है जो इस प्रकार है :— 'मलम्ज्ञानमिच्छन्ति१ संसाराङ्कुरकारणम् ॥१॥ 'धर्माधर्मात्मकं कर्म सुखदुःखादिलक्षणम्' ॥२॥ इसका अभिप्राय यह है कि अपने वास्तविक स्वरूप का अज्ञान ही मूलभूत आणवमल है। यह आणवमल, संसार अर्थात् मायीयमल के, अङ्कुर अर्थात् कारणभूत कार्ममल का भी कारण है। भाव यह कि आणवमल से कार्ममल और कार्ममल से मायीयमल का विकास हो जाता है। आणवमल का रूप२ अज्ञान, कार्ममल का रूप हेय एवं उपादेय कर्मों का ३पचडा और मायीय मल का रूप शुभ अथवा अशुभ कर्मों की वासनाओं से जनित सुख दुःख, जन्म, मरण इत्यादि का ४भोग है। आणवमल के विषय में शास्त्रकारों का कथन है कि स्वातन्त्र्य की हानि अर्थात् संकोच दो रूपों में अभिव्यक्त होता है।— (१) ५बोध में स्वातन्त्र्य की हानि अर्थात् ६चिन्मय स्वरूप की पूर्णज्ञातृता का संकोच; (२) ७स्वातन्त्र्य का अबोध अर्थात् ८पूर्णकर्तृता को बोधरूपता से भिन्न समझने का मिथ्याभिमान । यहाँ पर यह नहीं समझना चाहिये कि ये दो अलग-अलग मल हैं, प्रत्युत दोनों रूपों में स्वातन्त्र्य की अख्याति होने के कारण वास्तव में एक ही मल के दो रूप हैं। प्रस्तुत सूत्र (निजाशुद्ध्या इत्यादि) में भी सूत्रकार ने इसी मलत्रय की ओर संकेत करते हुए कहा है कि पतिप्रमाता ने अपने स्वातन्त्र्य से, स्वयं ही, एक प्रकार की अशुद्धि (आणवमल) उत्पन्न की है जिसके द्वारा वह स्वयं शक्तिदरिद्र होकर, संसारी शुभाशुभ कर्मों १. 'मलम्ज्ञानमिच्छन्ति' इसमें 'इच्छन्ति' शब्द का अर्थ 'कहते हैं' हैं। २. मलम्ज्ञानमिच्छन्ति । (मा० वि०, १.२३) ३. धर्माधर्मात्मकं कर्म । (तत्रैव) ४. सुखदुःखादिलक्षणम् । (तत्रैव) ५. स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य । (ई० प्र०, ३.२.४) ६. बोधस्य चिन्मात्रस्य स्वातंत्र्यहानिर्ज्ञातृत्वसंकोचः एकः प्रकारः। (ई० प्र०, ३.२.४)—भास्करी ७. स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता । (ई० प्र०, ३.२.४) ८. स्वातन्त्र्यस्य कर्तृत्वस्य अबोधता बोधव्यतिरिक्ताभिमानः द्वितीयः प्रकारः। (ई० प्र०, ३.२.४-भास्करी) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal