श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
( ३२८ ) “दण्डित्व, कुण्डलित्व” की तरह रूपत्व, रसत्व और गंधवत्व आदि होते हुए भी एकता के विरुद्ध नही है । इस प्रकार केवल विरोध का अभाव ही नही है, अपितु प्रवृत्ति निवृत्ति के भेदानुसार जो सामानाधिकरण्य का नियम है, उसके अनुसार भी दो धर्मों वाली विशेषताओं का उपपादन हो जाता है । केवल वस्तु स्वरूप की एकता के बतलाने, या अनेक पदों के प्रयुक्त होने पर भी उपयुक्त कारण न होने से सामानाधिकरण्य का नियम लागू नहीं हो सकता । विशेष्य के साथ विशेषणों का संबंध स्वीकार न करके, केवल वस्तुमात्र बोधकता ही स्वीकारी जाय, तब भी, एक विशेषण से ही जब वस्तु की विशेषता उपलक्षित हो जाती है, तब अन्यान्य विशेषण स्वतः ही व्यर्थ हो जाते हैं । अन्यान्य विशेषणों द्वारा यदि उपलक्ष्य वस्तु का, आकार भेद ही माना जावे, तब भी उन विशे- षणों से वस्तु की सविशेषता सिद्ध हो जाती है । “सोऽयं देवदत्तः” इत्यत्रापि लक्षणा गन्धो न विद्यते, विरोधा- भावात् । देशान्तरसंबंधतयाऽतीतस्य सन्निहितदेशसंबंधतया वर्त्तमानत्वाविरोधात् । अतएव हि “सोऽयम्” इति प्रत्यभिज्ञा कालद्वयसंबंधिनोवस्तुन ऐक्यमुपपाद्यते वस्तुनः स्थिरत्ववादिभिः । अन्यथा प्रतीतिविरोघे सति सर्वेषां क्षणिकत्वमेव स्यात् । देश- द्वयसंबंधविरोधस्तु कालभेदेन परिह्रियते । “यह वही देवदत्त है” इस उदाहरण में भी किसी प्रकार की लक्षणा की संभावना नही है । क्योंकि—लक्षणा का कारणीभूत किसी भी प्रकार का विरोध नहीं है । अतीत और स्थानान्तर में दृष्ट व्यक्ति के वर्त्तमान में देखे जाने पर उस व्यक्ति में कोई अन्तर तो आ नहीं जाता; ‘यह वही है’ ऐसा जो स्मृति परक ज्ञान है, वह काल द्वय ( भूत और वर्त्तमान ) में दृष्ट एक ही व्यक्ति के अभेद का ही द्योतक है—ऐसा वस्तुस्थिरत्व वादियों का मत है । अन्यथा, प्रतीति के अनुसार भेद मान लेने से तो, सारी ही वस्तुएं क्षणिक माननी पड़ेंगी दो स्थानों की जो विभिन्नता है, वह कालभेद से निवृत्त हो जाती है । यतः समानाधिकरणपदानामेकविशेषणविशिष्टैकार्थवाचि-
( ३२६ ) त्वम्, अतः एव “अरुणयैकहायन्या पिंगाक्ष्या सोमं क्रीणाति” इत्या- रुण्यादिविशिष्टैकहायन्या क्रयः साध्यतया विधीयते । इससे सिद्ध होता है कि समानाधिकरण पदों की अनेक विशेषण विशिष्ट एकार्थ बोधकता है । जैसे कि-“रक्तवर्णा पिंगाक्षी एक वर्ष वाली गो के बदले वह सोम खरीदता है” इसमें अरुणत्वादिविशिष्ट गौ से सोमक्रय की साध्यता बतलाई गई है । तदुक्तम् ”अर्थैकत्वे द्रव्यगुणयोरैककर्म्यान् नियमः स्यात्” इति । तत्रैवं पूर्वपक्षी मन्यते-यदप्यरुणयेति पदमाकृतेरिव गुणस्यापि द्रव्य- प्रकारतैकस्वभावत्वाद् द्रव्यपर्यन्तमेवारुणिमानमभिदधाति, तथाऽ- प्येकहायनि अन्वयनियमोऽरुणिम्नो न संभवति, एकहायन्या क्रीणाति तच्चारुण्येत्यर्थद्वयविधानासम्भवात् । ततश्चारुण्येति वाक्यं भित्वा प्रकरणविहितसर्वद्रव्यपर्यन्तमेवारुणिमानमविशेषेणाभिदधाति । अरुण्येति स्त्रीलिंगनिर्देशः प्रकरणविहित सर्वलिंगद्रव्याणां प्रदर्शनार्थः । तस्मादेकहायनि अन्वयनियमोऽरुणिम्नो न स्यात् इति । पूर्वमीमांसादर्शन में कहा गया है कि--“अर्थ ( प्रयोजन ) यदि एक हो तो गुण और द्रव्य ( अर्थात् विशेष्य और विशेषण ) का एक कर्म से ही प्रयोजन सिद्ध होगा, ऐसा नियम है ।” इस नियम के अनुसार पूर्व पक्षी ऐसा मानते हैं कि- आकृति के समान गुण भी जब द्रव्य का प्रकार ( विशेषण ) होता है तब आकृति और गुण एक स्वभाव के होते हैं “अरुणा” पद अरुणिमा युक्त द्रव्य का सही अर्थ “लाल गौ” ठीक ही करता है, फिर भी “अरुणिमा” की एकहायनीयता के साथ अन्वय की आवश्यकता सिद्ध नहीं हो पाती । “एकवर्षीया से खरीदत। है” और वह भी “लाल रंग वाली से” ये दो भिन्न विशेषताओं को बतलाने वाले, समानता के विपरीत विशेषण हैं । इन दोनों को मानने से ‘अरुणा’ इत्यादि वाक्य से, प्रकरणस्थ सभी द्रव्यों का अरुणिमा से संबंध हो जाता है । अरुणया” पद में जो स्त्रीलिंग का निर्देश किया गया है, वह प्रकरणस्थ
संपूर्ण लिंगक द्रव्यों का बोधक है, यह भी मानना पड़ेगा । “अरुणिमा” के साथ “एक वर्षीया” का संबंध हो ही ऐसा कोई नियम नहीं है । अत्राभिधीयते “अर्थैकत्वे द्रव्यगुणयोरेककर्म्यान्नियमः स्यात्” –“अरुणयैकहायन्या” इत्यारुणयविशिष्टद्रव्यैकहायनीद्रव्यवाचिप- दयोः सामानाधिकरण्येनाऽर्थैकत्वे सिद्धे सत्येकहायनीद्रव्यारुण्य- गुणयोररुणयेति पदेनैव विशेषणविशेष्यभावेन संबंधिताऽभिहितयोः क्रयाख्यैक कर्मान्वयाविरोधादरुणिम्नः क्रयसाधनभूतैकहायन्यन्वय नियमः स्यात् । इस पर यजुर्वेद ६।१।६ में निर्णय किया गया है कि—“अर्थ ( प्रयोजन ) यदि एक हो तो गुण और द्रव्य ( विशेषण-विशेष्य ) दोनों का एक कर्म से प्रयोजन सिद्ध होगा” “अरुण्यैकहायन्या” इस उदाहरण में अरुण्यत्व विशिष्ट द्रव्यवाची अरुण शब्द और एकहायनी द्रव्यवाची एकहायनी शब्द की सामानाधिकरण्य के नियम से एकार्थ प्रतिपादनता जब
( ३३१ ) 'एकहायनी' पद की सामानाधिकरण्य के नियम से एकहायनीयता मात्र ही प्रतीत होती है, गुण संबंध तो प्रतीत होता नहीं। विशिष्ट द्रव्यों की एकता करना ही सामानाधिकरण्य का कार्य है। जैसा कि—कैय्यट ने वृद्ध्याह्निक पर लक्षण बतलाया कि—"विभिन्नार्थ बोधक शब्द समूहों की एक मात्र अर्थ बोधकता ही सामानाधिकरण्य है।" [अर्थात्--एक- हायनी शब्द गाय का विशेषण नहीं है अपितु उसकी उम्र का बोधकमात्र है, जब कि अरुणिम शब्द उसकी वर्ण विशेषता का परिचायक है; एक हायनी के बदले सोमक्रय करना कोई विशेषता नहीं रखता अपितु अरुणिम होने से गाय की विशिष्टतापरक बहुमूल्यता सिद्ध होती है। इसलिए एकहायनी और अरुणिमा का कोई साथ नहीं है, अतः उनका अभेद संबंध भी नही हो सकता ] अतएव हि 'रक्तः पटो भवति' इत्यादिष्वैकार्थ्यादेकवाक्य- त्वम् । पटस्यभवनक्रियासंबंधे हि वाक्यव्यापारः रागसंबंधस्तु रक्तपदेनैवाभिहितः, रागसंबंधिद्रव्यं पट इत्येतावन्मात्रं सामाना- धिकरण्यावसेयम् । एकमेकेनगुणेन द्वाभ्यां बहुभिर्वा तेन तेन पदेन समस्तेन व्यस्तेन वा विशिष्टमुपस्थाप्य सामानाधिकरण्येन सर्वं विशेषणविशिष्टोऽर्थ एक इति ज्ञापयित्वा तस्य क्रिया संबंधाभि- धानमविरुद्धम् । "देवदत्तः श्यामो युवा लोहिताक्षो दंडी कुंडली तिष्ठति," शुक्लेन वाससा यवनिकां संपादयेत् "नीलमुत्पलमानय" “नीलोत्पलमानय,” गामानय शुक्लां शोभनाक्षीम् “अग्नये पथिकृते पुरोडाशमष्टकपालं निर्वपेत्” इति। एवम्--"अरुण्यैकहायन्या पिंगाक्ष्या सोमं क्रीणाति” इति। 'कपड़ा लाल होता है' इस उदाहरण में अर्थगत ऐक्य होने से, एक वाक्यता है वस्त्र का होना क्रिया से संबंध दिखलाना ही वाक्य का प्रयोजन है। उसके रंग का संबंध तो रक्तवर्ण से ही प्रतीत होता है "राग संबंधी द्रव्य पट है" केवल इतना अर्थ ही सामानाधिकरण्य से ज्ञात होता है। इसी प्रकार अन्यान्य सामानाधिकरण्य के प्रसंगों में प्रयुक्त ankurnagpal108@gmail.com
( ३३२ ) पदसमूह समष्टि रूप हों अथवा पृथक्-पृथक् हों, दोनों ही स्थिति में, एक दो या अनेक गुण विशेषित वस्तु का बोध कराकर, सामानाधिकरण्य से समस्त विशेषणों से विशिष्ट वस्तु एक है, यही प्रतिपादन किया जाता है। इसलिए समस्त विशेषण विशिष्ट वस्तु का जो क्रिया विशेष के साथ संबंध दिखलाया जाता है उसमें कोई विरोध नहीं है। "श्यामवर्ण- वाला युवा रतनारे नैन का कुण्डलधारी देवदत्त लाठी लेकर खड़ा है", "धवल वस्त्र से परदा बनावेगा" "नीले रंग का कमल लाओ", श्वेत आँखों वाली गाय लाओ", "पथिकृत अग्नि के लिए अष्टकपाल ( आठपात्रों मे क्षोधित ) पुरोडाश ( पिष्टक के प्रकरण का एक खाद्य विशेष ) दूँगा" इत्यादि उदारहणों की तरह "रक्तवर्णा, एकहायनी, कपिलनेत्री गाय से सोम खरीदता है" इस उदाहरण मे भी सामानाधिकरण्य विशिष्ट का एकत्व प्रतिपादन करना चाहिये। एतदुक्तं भवति-यथा-"काष्ठैःस्थाल्यामोदनंपचेत्" इत्यनेक- कारकविशिष्टैकाक्रिया युगपत् प्रतीयते, तथा समानाधिकरण- पदसंघाताभिहितमेकैकंकारकं तत्तत्कारकप्रतिपत्तिवेलायामेवानेक- विशेषणविशिष्टं युगपत् प्रतिपन्नं क्रियायामन्वेतीति न कश्चिद् विरोधः "खादिरैः शुष्कैः काष्ठैः समपरिमाणे भाण्डे पायसं शाल्यो- दनं समर्थः पाचकः पचेत्, इत्यादिषु" इति। कथन यह है कि- "सूखी लकड़ियों से बटुये में चावल पकाता है" इस उदाहरण में जैसे एक साथ ही काष्ठादि अनेक कारक विशिष्ट एक क्रिया का ज्ञान होता है, सामानाधिकरण्य के प्रसंग में भी वैसे ही, पद समूह में प्रयुक्त एक-एक कारक की जब प्रतिपत्ति की जाती है, तब उन सबका एक साथ अनेक विशेषण विशिष्ट क्रिया में, निर्विरोध समन्वय हो जाता है। जैसे कि-"सूखी लकड़ियों मे उचित परिमाण वाले पात्र में शाली के चावल की खीर चतुर रसोइया पकाता है" इत्यादि में एक क्रिया से संबंद्ध कारकों में कोई विरोध नहीं है। यत्तूपात्तद्रव्यकवाक्यस्थगुणशब्दः केवल गुणाभिधायीत्यरुण- येति पदेन केवलगुणस्यैवाभिधानमिति तन्नोपपद्यते, लोकवेदयो-
( ३३३ ) द्रव्यवाचिपद समानाधिकरणस्य गुणवाचिनः क्वचिदपि केवल- गुणाभिधानादर्शनात् । उपस्थितद्रव्यवाक्यस्थं गुणपदं केवलगुणाभि- धायोत्यप्यसंगतम् । "पटः शुक्लः" इत्यादिषूपात्तद्रव्यकेऽपि गुण- विशिष्टस्यैवाभिधानात् । "पटस्य शुक्लः" इत्यत्र शौक्ल्यविशिष्ट पटाप्रतिपत्तिरसमानविभक्ति निर्देशकृता, न पुनरुपात्तद्रव्यकत्व कृता तत्रैव "पटस्य शुक्लो भागः" इत्यादिषु समानविभक्तिनिर्देशे शोक्ल्यविशिष्ट द्रव्यं प्रतीयते । यत्पुनः क्रयस्यैक हायन्यवरुद्धतयाऽ- रुणिम्नः क्रयान्वयो न संभवतीति, तदपि विरोधिगुणरहित द्रव्य- वाचिपद समानाधिकरणगुणपदस्य तदाश्रयगुणाभिधानेन क्रिया- पदान्वयाविरोधादसङ्गतम् । राद्धान्ते चोक्तन्यायेनारुणिम्नः शब्दे द्रव्यान्वये सिद्धे द्रव्यगुणयोः क्रमसाधनत्वानुपपत्त्या अर्थात् परस्परा- न्वयः सिद्ध्यतीत्यप्यसंगतम् । अतोयथोक्त एवार्थः । और जो यह कहते हैं कि-जिस वाक्य में द्रव्यवाचक पद का उल्लेख होता है, उस वाक्य का गुणवाचक शब्द, उस गुण का ही बोधक होता है, इसलिए 'अरुणया' पद से केवल गुण का ही अनुमान करेंगे ( उसको द्रव्य की विशेषता नहीं मानेंगे ) ( मेरी दृष्टि में ) ऐसा मानना संगत् न होगा, क्योंकि लौकिक व्यवहार या वैदिक भाषा में कहीं भी, द्रव्य वाचक शब्द के साथ, सामानाधिकरण्य रूप से प्रयुक्त गुणवाचक पद को, केवल गुणमात्र ही माना गया हो, ऐसा उदाहरण नहीं मिलता । द्रव्यवाचक पद वाले वाक्य में आए हुये गुणवाचक पद की, एकमात्र गुणबोधकता असंगत भी है। द्रव्यवाचक पद घटित "सफेद वस्त्र" इस वाक्य में भी गुणविशिष्टार्थ का प्रतिपादन किया गया है ।" कपड़े की सफेदी" इस वाक्य में, शुक्ल गुण विशिष्ट पद की प्रतीत नहीं होती, क्योंकि—इसमें असमान विभक्ति दीखती है। द्रव्य संबंध से यहाँ गुण विशिष्टता की प्रतीति न हो रही हो, सो बात नहीं है । कपड़े का सफेद हिस्सा इस वाक्य में समान विभक्ति है, इसमें शुक्ल गुण विशिष्ट द्रव्य की प्रतीति होती है । ankurnagpal108@gmail.com
( ३३४ )
और फिर जो यह कहा कि—समीपवर्त्ती "एकहायनी" पद के साथ "क्रय ' का संबंध हो सकता है "अरुणिम" पद के साथ नहीं हो सकता, सो यह भी असंगत बात है, क्योंकि—यह नियम है कि—गुण- वाची पद के साथ यदि द्रव्यवाची पद का सामानाधिकरण्य होता है और उस द्रव्य का किसी अन्य विरुद्ध गुण का संबंध नहीं होता तो सामाना- धिकरण विशिष्ट गुणवाची पद की आश्रित जो गुण बोधकता है, उसका क्रियापद से निर्विरोध समन्वय हो जाता है । उपर्युक्त नियमानुसार सिद्धान्त "अरुणिमा" शब्द का अन्वय सिद्ध हो जाने पर भी, द्रव्य और गुण दोनों का क्रय साधनता में समन्वय न मानें, अर्थात् परस्पर समन्वय की बात सिद्ध हो जाने पर भी, यह असंभावना बनी रहे, यह भी असंगत बात है [ निर्णयपूर्वक सिद्ध हो जाने पर भी यह कहते रहें कि— द्रव्य और गुण का क्रय साधन में समन्वय नहीं हो सकता, यह हठवाद मात्र है ] उपर्युक्त बात ही यथार्थ है ।
तस्मात् तत्त्वमस्यादि सामानाधिकरण्ये पदद्वयाभिहित [L15
( ३३५ ) यदि कहें कि-यदि ऐसा मानने पर भी, समानाधिकरण पदों के समस्त विशेषण विशिष्ट पदार्थों की एकता होने से, "त्वं" पदवाची जीवात्मा के संपूर्ण दोष परमात्मा में भी प्रसक्त हो जावेंगे ? नहीं "त्वं" पद से भी, जीवान्तर्यामी परमात्मा ही मान लें तो, दोष प्रसक्ति का प्रश्न ही नहीं उठेगा । एतदुक्तं भवति सच्छब्दाभिहितं निरस्तनिखिलदोषगन्धं सत्यसंकल्पमिश्रानवधिकातिशयासंख्येयकल्याणगुणगणं समस्त कारणभूतं परंब्रह्म "बहुस्याम्" इति संकल्प्य तेजोबन्नप्रमुखं कृत्स्नं जगत् सृष्ट्वा तस्मिन् देवादि विचित्रसंस्थानसंस्थिते जगति चेतनं जीववर्गं स्वकर्मानुगुणेषु शरीरेष्वात्मतया प्रवेश्य स्वयं च स्वेच्छयैव जीवान्तरात्मतयाऽनुप्रविश्य एवम्भूतेषुश्वपर्यन्तेषुदेवाद्याकारेषु- संघातेषु नामरूपे व्याकरोत् । एवं रूपं संघातस्यैव वस्तुत्वं शब्द वाच्यत्व चाकरोदित्यर्थः । अनेनजीवेनात्मना जीवेनात्मेति निर्देशो जीवस्य ब्रह्मात्मकत्वं दर्शयति । ब्रह्मात्मकत्वं च जीवस्य जीवान्त- रात्मतया ब्रह्मणोऽनुप्रवेशादित्यवगम्यते "इदसर्वमसृजत् यदिदं किं च तत्सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत तदनु प्रविश्य सच्चत्यच्चा- भवत् ।" इति अत्रेदं सर्वमिति निर्दिष्टं चेतनाचेतनवस्तुद्वयं सत्यच्छब्दाभ्यां विज्ञानाविज्ञानशब्दाभ्यां च विभज्य निर्दिश्य चिद् वस्तुन्यपि ब्रह्मणोऽनुप्रवेशाभिधानात् । अतएव नामरूप व्याकर- णात् सर्वे वाचकाः शब्दाः, अचिज्जीवविशिष्टपरमात्मवाचिन् इत्यवगतम् । कथन यह है कि-समस्त दोषों से रहित, अवधि और संख्या रहित, सर्वाधिक, सत्य संकल्प इत्यादि कल्याणमय गुणों से युक्त, सर्व- कारण वह ब्रह्म "सत्" शब्द से संबोधित किये गए हैं, उन्होंने 'एक से अनेक हो जाऊँ" इस संकल्प से तेज जल आदि समस्त जगत की सृष्टि करके, देवता आदि विभिन्न रूपों वाले शरीरों में, चेतन जीवों के गुण- कर्मानुसार आत्मा रूप से प्रविष्ट कराके स्वयं ही स्वेच्छा से, जीवों में
( ३३६ ) अन्तर्यामी रूप से स्थित होकर देवता आदि जीवों और स्वयं अपने भी नामरूप को व्यक्त किया। अर्थात् जड़ चेतन और ईश्वरात्मक जगत् समष्टि की सत्ता की वस्तुता और शब्दवाच्यता का संपादन किया। ‘इस जीवात्म रूप में अपने को ही’ इत्यादि श्रौतवाक्य में भी जीव का ब्रह्मात्मभाव दिखलाया गया है। जीवान्तरात्मा के रूप में ब्रह्म के अनु- प्रवेश से ही जीव के ब्रह्मात्म भाव का स्पष्ट ज्ञान होता है। जैसा कि- श्रौतवाक्यों से भी स्पष्ट है—‘सृष्टि करके वे उसी में प्रविष्ट हो गए” “प्रविष्ट होकर वे सत् और त्यत् हो गए” इत्यादि। यहाँ “इदं सर्वम्” का तात्पर्य जड चेतन दोनों से है। सत् और त्यत् शब्द से भी विज्ञान और अविज्ञान के भेद को बतला कर चिद् (जीव) में ब्रह्म के अनुप्रवेश का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि-नाम रूप के बोधक सारे शब्द, अचित् जीवविशिष्ट परमात्मा के बोधक हैं। किञ्च “ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्” इति चेतन मिश्रं प्रपंचं इदं सर्वमिति निर्दिश्य “तस्यैष आत्मा” इति प्रतिपादितम्। एवं च सर्वचेतनाचेतनंप्रति ब्रह्मण आत्मत्वेन सर्वं अचेतनं जगत् तस्य- शरीरं भवति। तथा च श्रुत्यन्तराणि-“अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानां सर्वात्मा” यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद, यस्य पृथिवी शरीरम् यः पृथिवीमन्तरो यमयति। स त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः “इति आरभ्य” य आत्मनि तिष्ठन् आत्म- नोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्याऽत्मा शरीरम्, य आत्मानमंतरो यमयति, स त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” इत्यादि। “यः पृथिवीमंतरे संचरन्, यस्य पृथिवी शरीरम्। योऽपामन्तरे संचरन् यस्यापश्- शरीरं” इत्यारभ्य ‘योऽक्षरमंतरे संचरन् यस्याक्षरं शरीरम्, यमक्षरं न वेद, एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः” इत्यादीनि सचेतनं जगत् तस्य शरीरत्वेन निर्दिश्य तस्यात्मत्वेन परमात्मानमुपदिशन्ति, अतश्चेतन वाचनोऽपि शब्दाः चेतनस्याप्या त्मभूतं चेतनशरीरकम् परमात्मानमेवाभिदधति। यथा अचेतन
( ३३७ ) देवादिसंस्थानपिण्डवाचिनः शब्दाः तच्छरीरकजीवात्मन एव वाचकाः “चत्वारः पंचदशरात्रात् देवत्वं गच्छन्ति” इत्यादिषु, देवा भवन्ति इत्यर्थः । अधिक क्या—"यह सब ब्रह्मात्मक है" इस वाक्य से चेतन मिश्रित प्रपंच जगत को "इदंसर्वम्" द्वारा बतलाकर "वही इसका आत्मा है" ऐसा ब्रह्मात्मभाव का प्रतिपादन किया गया है । इस प्रकार सारा चेतन अचेतन जगत ब्रह्मात्मक होने से सचेतन है और उस ब्रह्म का शरीर है । तथा अन्य श्रौत वाक्य भी—'वही जन समूह के अन्तस्थ शासक और सर्वात्मा हैं, जो कि पृथिवी में अन्तर्यामी रूप से नियमन करते हैं, पृथिवी उन्हें नहीं जानती पृथिवी उनका शरीर है, वही अमृत स्वरूप परमात्मा तुम्हारे अन्तर्यामी हैं” “जो आत्मा में विराजते हैं, आत्मा से भिन्न हैं, आत्मा उन्हें नहीं जानता, आत्मा ही उनका शरीर है, जो अन्तर्यामी रूप से आत्मा का संयमन करते हैं, वही अमृत स्वरूप, तुम्हारे अन्तर्यामी आत्मा है ।” तथा— 'जो पृथिवी में संचरण करते हैं, पृथिवी उनका शरीर है, जो जल में संचरण करते हैं, जल उनका शरीर है” “जो अक्षर (जीव) में संचरण करते हैं, अक्षर ही उनका शरीर है, अक्षर जिन्हें नहीं जानता, वह नारायण ही सब भूतों के अंतरात्मा, निष्पाप, अलौकिक, द्योतमान एक और अद्वितीय है” इत्यादि—सचेतन जगत को उनका शरीर बतलाकर उस जगत के आत्म स्वरूप परमात्मा का उपदेश दिया गया है । अचेतन वाचक शब्द समूह भी, चेतन शरीर धारी तथा चेतन के भी आत्मभूत परमात्मा के ही, अभिधायक हैं । जैसे कि—"पंद्रह दिन के अनुष्ठान से चारो देवत्व प्राप्त करते हैं" अर्थात् देवता होते हैं । इत्यादि । शरीरस्य शरीरिणंप्रति प्रकारत्वात् प्रकारवाचिनां च शब्दानां प्रकारिण्येव पर्यवसानात् शरीरवाचिनांशब्दानां शरीरि- पर्यवसानं न्याय्यम् । प्रकारो हि नाम इदमित्थमिति प्रतीयमाने वस्तुनि इत्थमिति प्रतीयमानोंऽशः । तस्य तद् वस्त्वपेक्षत्वेन तत्प्रती- तेस्तदपेक्षत्वात् तस्मिन्नेव पर्यवसानं युक्तमिति तस्य प्रतिपादकोऽपि
( ३३८ )
शब्दस्तस्मिन्नेव पर्यवस्यति। अतएव "गौरश्वो मनुष्यः" इत्या- दिप्रकारभूताकृतिवाचिनः शब्दाः प्रकारिणि पिण्डे पर्यवस्यन्तः पिण्डस्यापि चेतन शरीरत्वेन तत्प्रकारत्वात् पिण्डशरीरक चेतन- स्यापि परमात्मप्रकारत्वाच्च परमात्मन्येव पर्यवस्यतीति सर्व- शब्दानां परमात्मैव वाच्य इति परमात्मवाचिशब्देन सामामाधि- करण्यं मुख्यमेव। शरीर शरीरी का एक ही प्रकार है अत. प्रकार वाचक शब्द का प्रकारी में ही पर्यवसित होना स्वाभाविक है, इसलिए शरीर वाचक शब्दों का शरीरी में ही पर्यवसान होना चाहिए। "यह ऐसा है" इस वाक्य में "ऐसा है" यह वाक्यांश वस्तु के प्रकार का ही बोधक है। प्रकार वस्तुसापेक्ष होता है। वस्तु की प्रतीति, प्रकार अपेक्षित होती है, इसलिए वस्तु में उसके प्रकारवाची शब्द का पर्यवसान स्वाभाविक ही है, उसका प्रतिपादक शब्द भी उसी में पर्यवसित हो जाता है। "गो- मनुष्य-अश्व" इत्यादि प्रकारभूत, आकृतिवाचक, प्रकारी के देहपिण्ड के अर्थ में पर्यवसित शब्द, उन शरीरों में जो चेतनता है उसके प्रकार का बोध कराते हैं। वह देह विशिष्ट चेतन, परमात्मा का प्रकार मात्र है, इसलिए शब्दों के अर्थों का पर्यवसान उस परमात्मा में ही है। सभी शब्दों का वाच्यार्थ परमात्मा ही है। इस प्रकार परमात्मवाची शब्दों के साथ जो सामानाधिकरण्य है, वह मुख्य ही है (गौण नहीं) ननु "खण्डो गौः खण्डः शुक्लः" इति जातिगुणवाचिनामेव पदानां द्रव्यवाचिपदैः सह सामानाधिकरण्यं दृष्टं, द्रव्याणांतु द्रव्यान्तर प्रकारत्वे मतुबर्थीयप्रत्ययो दृष्टः यथा-"दण्डी कुण्डली" इति, नैवम् जातिर्गुणो वा द्रव्यं वा नैतेष्वेकमेव सामानाधिकरण्ये प्रयोजकम्, अन्योन्यस्मिन् व्यभिचारात्, यस्य पदार्थस्य कस्यचित् प्रकारतयैव सद्भावः, तस्य तदपृथक् सिद्धिस्थितिप्रतीतिभिः तद् वाचिनां शब्दानां स्वाभिधेयविशिष्टद्रव्यवाचित्वात् धर्मान्तरविशिष्ट-
( ३३६ ) तद्द्रव्यवाचिनाशब्देन सामानाधिकरण्यं युक्तमेव । यत्र पुनः पृथक्सि- द्धस्य स्वनिष्ठस्यैव द्रव्यस्य कदाचित्क्वचिद्द्रव्यान्तरप्रकारत्व- मिष्यते, तत्र मत्वर्थीयप्रत्यय इति निरवद्यम् । संदेह होता है कि “खण्ड गौ, शुक्ल खण्ड” आदि वाक्यों में जाति गुणवाची (गो और शुक्ल) पदों के साथ सामानाधिकरण्य स्पष्ट दीख रहा है, किन्तु द्रव्यवाची पदों के अन्य प्रकारक द्रव्यों के साथ मत्वर्थीय प्रत्यय वाले “दण्डी-कुण्डली” ऐसे प्रयोग भी देखे जाते हैं [अर्थात् विशेषण विशेष्य के अलग-अलग होने पर तो दोनों पदों का सामानाधिकरण्य मुख्य होता ही है, परन्तु मत् प्रत्यय से निष्पन्न विशेषण-विशेष्य युक्त “दण्डी कुण्डली” आदि प्रयोगों में सामानाधिकरण्य मुख्य है या गौण ?] उत्तर-बात ऐसी नहीं है-अपितु जाति, गुण अथवा द्रव्य इन तीनों की एकता सामानाधिकरण्य में प्रयोजक नहीं है, क्यों कि इनमें परस्पर व्यभिचार रहता है। जिस पदार्थ की किसी अन्य प्रकार (विशेषण) से ही स्थिति ज्ञात होती है; उसकी उस प्रकार (विशेषण) से अपृथक् सिद्ध स्थिति, प्रतीति से भी अभिन्न ही रहती है [अर्थात् उस पदार्थ की सत्ता और प्रतीति विशेषण से ही होती है] प्रकार (विशेषण) द्वारा पदार्थ के बोधक शब्दों की अभिधेयविशिष्ट वाचकता होने से, अन्य विशिष्ट गुणों को धारण करने वाले, उसी द्रव्य के बोधक शब्दों के साथ सामानाधि- करण्य युक्ति संगत हैं, असंगत नहीं। जहाँ कभी, पृथक् सिद्ध स्वनिष्ठ द्रव्य की, अन्य द्रव्य की प्रकारता से ही प्रतीति होती है, वहाँ मत्वर्थीय प्रत्यय ही उचित अर्थ बोधक होता है । तदेवं परमात्मनः शरीरतया तत्प्रकारत्वादचिद्विशिष्ट जीवस्यापि जीवनिर्देशविशेषरूपा अहंत्वमित्यादि शब्दाः परमात्मा- नमेवाऽचक्षत इति । “तत्त्वमसि” इति सामानाधिकरण्येनोपसंहृतम्, एवं च सति परमात्मानं प्रति जीवस्य शरीरतयाऽन्वयाज्जीवगता धर्माः परमात्मानं न स्पृशन्ति । यथास्वशरीरगता बालत्वयुवत्व- स्थविरत्वादयो धर्माः जीवं न स्पृशन्ति । श्रतः “तत्त्वमसि” इति सामानाधिकरण्ये तत्पदं जगत्कारणभूतं सत्यसंकल्पं सर्वकल्याण-
( ३४० ) गुणाकरं निरस्तसमस्तहेयगन्धंपरमात्मानमाचष्टे, त्वमिति च तमेव सशरीर जीव शरीरकमाचष्ट इति सामानाधिकरण्यं मुख्यवृत्तम्, प्रकरणविरोधः सर्वश्रुत्यविरोधो ब्रह्मणि निरवद्ये कल्याणैकताने अविद्यादिदोषगंधाभावश्च। अतोजीव सामाना- धिकरण्यमपि विशेषणभूताज्जीवात् अन्यत्वमेवापादयतीति विज्ञान- मयाज्जीवादन्य एव आनंदमयः परमात्मा। इस प्रकार अचिद् विशिष्ट जीव जो कि परमात्मा का शरीर है, वह उसकी प्रकारता (धर्म स्वरूप) का बोधक है, और ऐसा मानने पर अचिद् विशिष्ट जीव निर्देशक "मैं और तुम" इत्यादि संबोधन भी परमात्मा के ही बोधक हैं। ऐसा ही "तत्त्वमसि" इस सामानाधिकरण्य वाक्य में भी है। ऐसा मानने से, देह स्वरूप जीव के धर्म शरीरी परमात्मा का स्पर्श नहीं कर सकते जैसे कि-बचपन, जवानी बुढापा आदि शरीरिक धर्म जीव को स्पर्श नहीं करते। "तत्त्वमसि" वाक्य में "तत्" शब्द जगत के कारण सत्यसंकल्प सर्वकल्याणगुणाकर निर्दोष परमात्मा का बोधक है तथा "त्वम्" पद भी उसी जीव रूपी शरीर वाले शरीरी परमात्मा का ही बोधक है। इस प्रकार सामानाधिकरण्य निर्बाध रूप से सिद्ध हो जाता है तथा निर्दोष, सर्व कल्याण प्रवण ब्रह्म के विषय में प्रकरण या श्रुति विरोध भी नहीं होता। सामानाधिकरण्य में विशेषणीभूत जीव से परमात्मा की भिन्नता भी प्रतिपादित हो जाती है, इससे सिद्ध होता है कि विज्ञानमय जीवात्मा से भिन्न परमात्मा ही आनंदमय है। यदुक्तम्—"तस्यैष एव शारोर आत्मा" इत्यानंदमयस्य शारोरत्व श्रवणाज्जीवादन्यत्वं न संभवति-इति, तदयुक्तम्, अस्मिन् प्रकरणे सर्वत्र "तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य" इति परमात्मन एव शारीरात्मत्वाभिधाने कथं 'तस्माद्वा एतस्मा- दात्मन् आकाशः संभूतः" इत्याकाशादिसृज्यवर्गस्य परमकारणत्वेन ankurnagpal108@gmail.com
( ३४१ )
प्रज्ञातजीवव्यतिरेकस्य परस्य ब्रह्मण आत्मत्वेन व्यपदेशात्तद्व्यतिरिक्ता- काशादीनामन्नमयपर्यन्तानां तच्छरीरत्वमवगम्यते । “यस्य पृथिवी शरीरं, यस्यापः शरीरं, यस्य तेजः शरीरं, यस्यवायुः शरीरं, यस्याकाशः शरीरं, यस्याक्षरं शरीरं, यस्य मृत्युः शरीरं, एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्योदेव एको नारायणः” इति सुबालश्रुत्या सर्वतत्त्वानां परमात्म शरीरत्वं स्पष्टमभिधीयते । जो यह कहते हैं कि-“यह शरीर (जीव) ही आत्मा है” इस उदा- हरण में आनन्दमय को शरीरी रूप से वर्णन किया गया है, इसलिए जीवात्मा के अतिरिक्त दूसरा शरीरी नही हो सकता । यह कथन युक्ति- युक्त नहीं है, क्यों कि-आनन्दमय के प्रकरण में सभी जगह “यही उसका शरीर (शरीराभिमानी) आत्मा है, जो कि पूर्वतन का आत्मा है” इस प्रकार परमात्मा को ही शरीरी कहा गया है, “इस आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ” इस उदाहरण में सृज्यमान आकाश की तरह, आकाश से लेकर अन्नमय तक सभी पदार्थों को परमात्मा का शरीर बतलाया गया है जो कि-जीव से भिन्न, परम कारण परमात्मा की आत्मरूपता का द्योतक है । “पृथिवी जिसका शरीर है, जल जिसका शरीर है तेज जिसका शरीर है, वायु जिसका शरीर है, आकाश जिसका शरीर है अक्षर (जीव) जिसका शरीर है, मृत्यु (पंचभूत) जिसका शरीर है, ऐसे सर्वान्तर्यामी निर्दोष निष्पाप दिव्य देव एक नारायण हैं ।” ऐसी सुबाल श्रुति से, सभी तत्त्वों की परमात्म शरीरता स्पष्ट बतलाई गई है । अतः “तस्माद् वा एतस्मादात्मनः” इत्यत्रैवान्नमयस्य परमा- त्मैव शारीर आत्मेत्यवगतः । प्राणमयं प्रकृत्याह-“तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य’ इति । पूर्वस्यान्नमयस्य यः शारीर आत्मा श्रुत्यन्तरसिद्धः परमकारणभूतः परमात्मा, स एव तस्य प्राणमय स्यापि शारीर आत्मेत्यर्थः । एवं मनोमयविज्ञानमययोर्द्रष्टव्यम् आनंदमयेतु “एष एव” इति निर्देशः तस्य अनन्यात्मत्वं दर्शयितुं तत्कथंविज्ञानमयस्यापि पूर्वोक्त्या नीत्या परमात्मैव शारीर आत्मेत्य
वंगतः । एवं सति विज्ञानमयस्य यः शारीर आत्मा स एव आनन्द- मयस्यापि शारीर आत्मेत्युक्ते आनन्दमयस्य अभ्यासावगतपरमात्म- भावस्य परमात्मनः स्वयमेवात्मेत्यवगम्यते । एवं च व्यतिरिक्तं चेतनाचेतनवस्तुजातं स्वशरीरमिति स एव निरुपाधिकः शारीर आत्मा श्रतएवेदं परं ब्रह्माधिकृत्य प्रवृत्तं शास्त्रं शारीरकमित्यभि- युक्तैरभिधीयते । श्रतो विज्ञानमयाज्जीवादन्य एव परमात्मा आनन्दमयः ।
“तस्माद्वा” इत्यादि उदाहरण में उल्लेक्ष्य अन्नमय के शारीर आत्मा परमात्मा ही ज्ञात होते हैं । प्राणमय के शरीरी भी परमात्मा हैं, ऐसा “तस्यैष एव आत्मा” श्रुति में बतलाया गया है । इस श्रुति का तात्पर्य है कि—“जो पूर्व कोष अन्नमय के शारीर आत्मा हैं जो कि- अन्यान्य श्रुतियों में परमकारणभूत परमात्मा के नाम से अभिव्यक्त हैं वे ही उस प्राणमय के शरीर आत्मा हैं ।” ऐसा ही मनोमय और विज्ञानमय के लिए भी समझना चाहिए । आनंदमय प्रकरण में तो “यही” शब्द उनके अन्यात्मत्व का निर्देशक है । विज्ञानमय प्रकरण में भी पूर्वोक्त नीति के अनुसार परमात्मा ही शारीर आत्मा ज्ञात होते हैं इसी प्रकार जो विज्ञानमय का शारीर आत्मा है वही आनंदमय का भी शारीर आत्मा है, आनन्दमय का बार-बार उल्लेख होने से प्रतीत होता है कि- परमात्मभाव को प्राप्त स्वयं परमात्मा ही अपने आत्मा हैं । परमात्मा से भिन्न चेतन अचेतन सभी वस्तुएं उनकी शरीर स्थानीय हैं, वे ही सब के निरुपाधि (स्वाभाविक) शारीर आत्मा है । इसी लिए परब्रह्म के प्रतिपादक इस शास्त्र को विद्वद्गण ‘शारीरक मीमांसा’ नाम से परिचय कराते हैं । इससे निश्चित होता है कि-विज्ञानमय जीव से भिन्न परमात्मा ही आनंदमय है ।
आह—नायमानंदमयो जीवादन्यः विकार शब्दस्य मयट् प्रत्य- यस्य श्रवणात् “मयड्वैतयोः” प्रकृत्य “नित्यंवृद्धशरादिभ्यः” इति विकारार्थे मयट् स्मर्यते । वृद्धश्चायमानन्दशब्दः ।
( ३४३ ) (वाद) कहते हैं कि-आनंदमय जीव से भिन्न नहीं है, क्यों कि मयट् प्रत्यय का प्रयोग विकार अर्थ में किया जाता है। “मयट् वैतयो- र्भाषायामभक्ष्याच्छादनयोः "अर्थात् अभक्ष्य और आच्छादन को छोड़कर प्रकृतिमात्र में वैकल्पिक मयट् प्रत्यय विकार अर्थ में होता है। तथा “नित्यंवृद्धशरादिभ्यः” (वृद्धशर आदि में नित्यमयट् प्रत्यय विकार अर्थ में होता है इन दो पाणिनीय व्याकरण सूत्रों में विकारार्थक मयट् प्रत्यय का विधान किया गया है । आनंदमय शब्द वृद्ध संज्ञक है । ननु-प्राचुर्येऽपि मयडस्ति “तत्प्रकृतवचने मयट्” इति स्मृतेः । यथा “अन्नमयो यज्ञः” इति । स एवायम् भविष्यति । नैवम् अन्न- मय इत्युपक्रमे विकारार्थत्वं दृष्टम् अत श्रौचित्यादस्यापि विकारा- र्थत्वमेव युक्तम् । (विवाद) नहीं- प्राचुर्य्य अर्थ में भी मयट् प्रत्यय होता है, “तत्प्र- कृतवचने मयट्” ( प्राचुर्य्य प्रतिपादक अर्थ में मयट् होता है ) ऐसा पाणिनीय सूत्र है “अन्नमय यज्ञ” ऐसा प्राचुर्य्यार्थक प्रयोग भी होता है, उसी प्रकार आनंदमय में भी होगा । (वाद) ऐसा नहीं है, “अन्नमय विज्ञानमय” आदि के उपक्रम में स्पष्ट विकारार्थ की प्रतीति हो रही है, उचित भी यही है कि, शब्द से जो प्राथमिक वाच्यार्थलब्ध हो उसे ही अन्ततः माना जाय, इसलिए आनंदमय में विकारार्थ ही युक्ति संगत है । किं च-प्राचुर्य्यार्थत्वेऽपि जीवादन्यत्वं न सिध्यति, तथाहि आनंद प्रचुर इत्युक्ते दुःखमिश्रत्वमवर्जनीयम् । आनंदस्य हि प्राचुर्यं दुःखस्याल्पत्वमवगमयति । दुःखमिश्रत्वमेव हि जीवत्वम् । अर्थ श्रौचित्यप्राप्त विकारार्थत्वमेव युक्तम् । यदि ऐसा न भी मानें, प्राचुर्य्य अर्थ ही मानलें, तब भी जीव की परमात्मा से भिन्नता सिद्ध नहीं होती प्रचुर आनंद कहने से दुःख मिश्रण अनिवार्य हो जाता है, आनंद की प्रचुरता दुःख की अल्पता बतलाती । दुःख मिश्रता ही जीवत्व है । इसलिए विकारार्थ ही उचित है । ankurnagpal108@gmail.com
( ३४४ ) किंच-लोके मृण्मयं हिरण्मयं दारुमियमित्यादिषु वेदे च "पर्णमयी जुहू" शमीमयी अ्रसस्तु च "दर्भमयी रसना" इत्यादिषु मयटो विकारार्थे प्रयोग बाहुल्यत्वात् स एव प्रथमतरां धियमधि- रोहति । जीवस्य चानंदविकारत्वमस्त्येव । तस्य स्वत आनंद- रूपस्य सतः संसारितावस्था तद्विकार एवेति । अतो विकार वाचिनो मयट् प्रत्ययस्य श्रवणादानंदमयो जीवादनतिरिक्त इति । तदेतदनुभाष्य परिहरति । तथा-"मृन्मय" हिरण्मय "दारुमय' इत्यादि लौकिक तथा "पर्णमयी जुहू" शमीमय श्रुवाये "दर्भमयी रसना' इत्यादि वैदिक प्रयोगो में विकारार्थ का ही बाहुल्य मिलता है, इसलिए मयट् का विकारार्थ ही सबसे प्रथम बुद्धि में आरूढ होता है। जीव का आनंद विकृत ही है, स्वभावतः जीव आनंद स्वरूप है, संसारदशा में वह आनंद विकृत हो जाता है इसलिए विकारवाची मयट् प्रत्यय का वर्णन होने से निश्चित होता है कि—"आनन्दमय" तत्त्व जीव से अभिन्न वस्तु है। इस प्रकार के मत का विवेचन करते हुए परिहार करते है— विकार शब्दान्नेतिचेन्न प्राचुर्यात् १।१।१४ नैतद्युक्तं, कुतः ? प्राचुर्यात्-परस्मिन् ब्रह्मण्यानन्दप्राचुर्यात् । प्राचुर्यार्थे च मयटस्संभवात् । एतदुक्तं भवति-शतगुणितोत्तरक्रमे- णाभ्यस्यमानस्यांनंदस्य जीवाश्रयत्वासंभवात् ब्रह्माश्रयोऽयमानंद इतिनिश्चिते सति तस्मिन् ब्रह्मणि विकारासंभवात् प्राचुर्येऽपि मयड्विधिसंभवाच्चानंदमयः परंब्रह्म-इति । यह कहना ठीक नही है कि-जीवात्मा ही आनंदमय है, क्यों कि- परब्रह्म में आनंद की प्रचुरता है, इसलिए यह शब्द उन्हीं के लिए प्रयुक्त किया गया है। प्राचुर्यार्थ में भी मयट् होता है। शतगुणितोत्तर क्रम से बार बार जिस आनंद की अनुवृत्ति की गई है, वह जीव में कदापि संभव नहीं है। वह तो ब्रह्म में ही संभव है, उस ब्रह्म में विकार की शून्यता तथा प्राचुर्यार्थ में भी मयट् विधि के होने से यह निश्चित होता है कि-परब्रह्म ही आनंदमय है। ankurnagpal108@gmail.com
( ३४५ ) औचित्यात् प्रयोग प्रौढ्याच मयटो विकारार्थत्वमर्थविरोधान्न संभवति । किंच औचित्यं प्राणमय एव परित्यक्तम् तत्र विकारा- र्थत्वासंभवात् । अतस्तत्र पंचवृत्तेर्वायोः प्राणवृत्तिमत्तामात्रेण प्राणमयत्वम्, प्राणापानादिषु पंचषु वृत्तिषु प्राणवृत्तेः प्राचुर्याद्वा । न च प्राचुर्ये मयट् प्रत्ययस्य प्रौढिर्नास्ति “अन्नमयो यज्ञः, शकटमयी यात्रा” इत्यादिषु दर्शनात् । औचित्य और प्रयोग प्रौढ़ि से भी मयट् का विकारार्थत्व, अर्थ विरोध होने से, संभव नहीं है। प्राणमय में तो प्रचुरार्थ मानना ही उचित था, जिसकी आपने अवहेलना कर दी, वहाँ विकारार्थ किसी भी प्रकार हो ही नहीं सकता। पंचवृत्ति वाले वायु में प्राणवृत्तिमत्ता श्रेष्ठ और विशिष्ट है इसलिए तथा प्राण, अपान आदि पांचवृत्तियों में प्राण वृत्ति की प्रचुरता होने से ही उसकी प्राणमयता है। यह भी नहीं कह सकते कि—मयट् प्रत्यय के प्राचुर्यार्थक प्रयोग अधिक नहीं देखे जाते, जिससे प्राचुर्यार्थ की प्रौढ़ि सिद्ध हो सके, “अन्नमय यज्ञ” “शकटमयी यात्रा” आदि अनेक प्राचुर्यार्थक प्रयोग होते हैं। यदुक्तमानंदप्राचुर्यमल्पदुःखसद्भावमवगमयतीति, तदसत् तत्प्रचुरत्वं हि तत्प्रभूतत्वम् तच्चेतरस्य सत्तां नावगमयति, अपितु तस्याल्पत्वं निवर्तयति इतरसद्भावासद्भावौतु प्रमाणान्तरावसेयौ; इह च प्रमाणान्तरेण तदभावोऽवगम्यते “अपहतपाप्मा” इत्यादिना तत्रैतावदेववक्तव्यं, ब्रह्मानंदस्य प्रभूतत्वमन्यानन्दस्याल्पत्वपेक्षत इति । उच्यते च तत् “स एको मानुष आनंदः” इत्यादिना जीवा- नन्दापेक्षया ब्रह्मानंदो निरतिशयदशापन्नः प्रभूत् इति । जो यह कहा कि प्राचुर्य आनंद अर्थ करने से अल्प दुःख की प्रतीति होती है, सो यह कथन भी असत् है। आनंद की प्रचुरता, प्रभूतत्व का बोध कराती है उसके अतिरिक्त उसमें दूसरे की सत्ता की प्रतीति नहीं होती अपितु उसकी अल्पता का निराकरण करती है। दूसरी वस्तुओं के सद्- ankurnagpal108@gmail.com
( ३४६ ) भाव और असद्भाव का निराकरण तो प्रमाणान्तरों पर आधारित होता है, पर इसमें प्रमाणान्तरों से अभाव की ही प्रतीति होती है "अपहत- पाप्मा" इत्यादि प्रमाण दुःख के अभाव के ही परिचायक हैं, यहाँ केवल इतना ही कहना पर्याप्त है कि—ब्रह्मानंद की जो प्रभूतता है वह अन्यान्य आनंदों से अपेक्षाकृत श्रेष्ठ, है उसके समक्ष सारे आनंद अल्प हैं—इसके लिए कहा भी गया है कि—"मानुष आनंद एक अंश मात्र है।" जीव नद की अपेक्षा ब्रह्मानंद अत्यन्त आनंदपूर्ण हैं। यच्चोक्तं जीवस्यानंदविकारत्वं संभवतीति, तदपि नोपपद्यते, जीवस्य ज्ञानानन्दस्वरूपस्य केनचिदाकारेण मृद इव घटाद्या- कारेण परिणामः सकल श्रुतिस्मृतिन्यायविरुद्धः संसारदशायां तु कर्मण ज्ञानानंदौ सकुचितावित्युपपादयिष्यते। अतश्चानन्दमयो जीवादन्यः परब्रह्म । जो यह कहते हो कि—जीव की विकारता ही संभव है सो यह कथन भी असंगत है, मिट्टी का जैसा घट आदि आकार वाला विकृत परिणाम होता है, वैसा ज्ञान और आनंद स्वरूप जीव का भी संभव हो, ऐसा श्रुति स्मृति और युक्ति से विरुद्ध है। संसार दशा में कर्म से, ज्ञान और आनंद संकुचित हो जाते हैं, इसका विवेचन आगे करेंगे। जीव से भिन्न परमात्मा ही आनंदमय है। इतश्च जीवादन्य आनंदमयः परंब्रह्म इसलिए भी जीव से भिन्न परब्रह्म आनंदमय है कि— तद्धेतुव्यपदेशाच्च १।१।१५। “को ह्येवान्यात् को प्राण्यात् यदेष आकाश आनंदो न स्यात् एष ह्येवानन्दयति” इति। एष एव जीवानन्दयतीति। जीवानन्द हेतुरयं व्यपदिश्यते। अतश्चानन्दयितव्याज्जीवादानंदयिताऽयमन्य आनंदमयः परमात्मेति विज्ञायते। आनंदमय एवात्र आनंद शब्देनो- क्त इति चानन्तरमेव वक्ष्यते। ankurnagpal108@gmail.com
( ३४७ ) “यदि यह आकाश (ब्रह्म) आनंद (जीवान्तरवर्त्ती दहराकाश) न होता तो कौन चेष्टा करता और कौन प्राण धारण करता” इस उदाहरण से ज्ञात होता है कि—परमात्मा ही जीवो के आनंद का हेतु और जीवों का आनंददाता है। आनंद करने वाले जीवात्मा से, आनंद- दाता ब्रह्म भिन्न ही है, जो कि—आनंदमय शब्द से जाना जाता है। उक्त उदाहरण में आनंद शब्द से आनंदमय की ही व्याख्या की गई है, और उसकी भिन्नता बतलाई गई है। इतश्च जीवादन्य आनंदमयः— इसलिए भी आनंदमय जीव से भिन्न है कि— मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते १।१।१६ “सत्यंज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इति मंत्रवर्णोदितं ब्रह्मैवानंदमय इति गीयते । तत्तु जीवस्वरूपादन्यत् परंब्रह्म “ब्रह्म विदाप्नोति परं” इति जीवस्य प्राप्यतया ब्रह्म निर्दिष्टम् । ‘ सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म” इस मंत्र में उल्लेख्य ब्रह्म को ही बार-बार “आनंदमय” नाम से बतलाया गया है। इसलिए जीव स्वरूप से भिन्न परब्रह्म है, ऐसा निश्चित होता है। “ब्रह्मवेत्ता ही परब्रह्म को प्राप्त करता है” इस मंत्र में भी जीव के प्राप्य ब्रह्म का निर्देश किया गया है। “तदेषाभ्युक्ता” इति तत् ब्रह्म अभिमुखीकृत्य प्रतिपाद्यतया परिगृह्य, ऋगेषा अध्येतृभिरुक्ता । ब्राह्मणोक्तस्यार्थस्य वैशद्यमनेन मंत्रेण क्रियत इत्यर्थः, जीवस्योपासकस्य प्राप्यं ब्रह्म तस्माद् विलक्षणमेव अनंतरंच “तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” इत्यारभ्य उत्तरोत्तरैर्ब्राह्मणैर्मन्त्रैश्च तदेव विशदो क्रियते । अतो जीवादन्य आनंदमयः । “तदेषाभ्युक्ता” ( तत् = ब्रह्म को अभिमुख करके एषा = ऋक् मन्त्र + उक्ता = पाठकों द्वारा कहा गया ) इस मंत्र में ब्रह्म को प्रतिपाद्य ankurnagpal108@gmail.com