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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

शब्दकोश नैमित्तिक-प्राकृत ] नैमित्तिक-निमित्तसे उत्पन्न नैरन्तर्य-निरन्तर होनेका भाव नैर्घृण्य-निर्ममता, क्रूरता प पक्षान्तर-दूसरी ओर पन्था-पथ परिज्ञात-अच्छे प्रकारसे ज्ञात परिनिष्ठित-दूसरेमें निष्ठावाला परदार-दूसरेकी स्त्री परवर्ती-बादमें पराक्रान्त-शक्तिशाली परिग्रह-ग्रहण पराभक्ति-श्रेष्ठा, शुद्धा भक्ति पराभूत-पराजित परिचर्या-सेवा परिचालक-चलानेवाला परिदृष्ट-दृष्ट परिनिष्ठित-पूर्णतया निपुण परिमित-सीमित परिलक्षित-अच्छी तरह देखाभाला हुआ परिव्राजक-संन्यासी परिवेष्टित-घिरा हुआ पर्यन्त-तक पर्यवसित-समाप्त पाण्डित्य-विद्वता पारत्रिक-परलोक-सम्बन्धी पारलौकिक-परलोक-सम्बन्धी पार्षद-परिकर पाषण्डी-पाखण्डी पूर्वपक्ष-संशयके सम्बन्धमें उठाया गया प्रश्न पूर्वराग-मिलनसे पहलेका राग प्रकरण-निर्माण, प्रसङ्ग प्रकृत-यथार्थ प्रकृष्ट-उत्तम प्रक्षिप्त-बादमें जोड़ा या घुसाया हुआ प्रच्छन्न-ढका हुआ प्रजल्प-इधर-उधरकी बात प्रज्ञा-बुद्धि प्रणयन-रचना, निर्माण प्रणत-शरणागत प्रणतपाल-शरणागतकी रक्षा करनेवाले प्रणति-प्रणाम, शरणागति प्रताड़ित-सताया गया प्रतिपादित-प्रमाणित प्रतिपाद्य-जिसे प्रमाणित किया जाय प्रतिभात-प्रभायुक्त, ज्ञात प्रतीयमान-जान पड़ता हुआ, जिसकी प्रतीति हो रही हो प्रत्यगात्मा-जीवात्मा प्रत्यवाय-दोष प्रत्याहार-निरोध, रोकना प्रत्युपकार-भलाईके बदलेमें की हुई भलाई प्रदत्त-दिया हुआ प्रधान-मायाकी एक वृत्ति प्रधानतः-मुख्यरूपसे प्रपत्ति-शरणागति प्रभूत-अत्यधिक प्रभृति-जैसा प्रयोजनीयता-आवश्यकता प्रयोजक-प्रयुक्त करनेवाला प्रयोजकत्व-प्रयोजक होनेका भाव प्रवर-श्रेष्ठ प्रवर्त्तक-किसी काममें लगानेवाला, आरम्भ करनेवाला प्रवृत्ति-मनका किसी विषयकी ओर झुकाव, प्रभाव प्रशस्त-प्रशंसाके योग्य प्रशान्तात्मा-शुद्ध या शान्त आत्मा प्रशामक-शान्त करनेवाला प्राकृत-प्रकृति-सम्बन्धी । 551

[ प्राक्तन-विक्षिप्त श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला प्राक्तन-प्राचीन प्रादुर्भूत-आविर्भूत, अवतरित प्रादेशिक वाक्य-प्रसङ्गत, स्थानीय वाक्य प्रापक-प्राप्त करने या करानेवाला प्रापञ्चिक-जगत् या प्रपञ्च-सम्बन्धी प्राप्य-प्राप्त होने योग्य प्रार्थित-प्रार्थना किया हुआ प्रेमास्पद-प्रेमका स्थल प्रेमोत्कर्ष-प्रेमका उत्कर्ष ब बाहुल्य-अधिकता बाह्य अङ्ग-बाहरी अङ्ग बिद्ध-छेदा हुआ, आहत बृहत्-बड़ा बोधगम्य-समझमें आने योग्य ब्रह्मलय-ब्रह्ममें लय होना ब्रह्मवेत्ता-ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्मानन्द-ब्रह्मका आनन्द ब्रह्मानुभूति-ब्रह्मकी अनुभूति भ भक्तानन्दायिनी-भक्तोंको आनन्द देनेवाली भोक्तृत्वभाव-भोक्ता होनेका भाव म मत्सम्बन्धी-मेरे सम्बन्धी मत्सरता-डाह, जलन, द्वेष मथन-मथनेका भाव मधुरिमा-माधुर्य मन्वन्तर-ब्रह्माजीके दिनका चौदहवाँ भाग मन्तव्य-विचार, मत मर्मार्थ-सार महत्-बड़ा मायाच्छन्न-मायाके द्वारा आच्छन्न मुकुलित-आधा विकसित मुमुक्षु-मुक्तिकी इच्छा करनेवाला मेधायुक्त-मेधावी मोहान्ध-मोहसे अन्धा म्लेच्छ-चारो वर्णोंसे भी नीच य यतिगण-संन्यासी लोग याग-यज्ञ यादृच्छिक-स्वतन्त्र, ऐच्छिक युक्तियुक्त-उचित, युक्तिपूर्ण युगपत्-एक ही समयमें, साथ-साथ युगावतार-प्रत्येक युगमें लेनेवाले अवतार योगमाया-भगवान्‌की परा शक्ति योगस्थैर्य-योगकी स्थिरता र रक्तिम-लालिमायुक्त रञ्जित-रंगा हुआ रुक्ष-रूखा, नीरस ल लिङ्गशरीर-सूक्ष्म शरीर लिप्सा-किसी वस्तुको पानेकी इच्छा लुब्ध-ललचाया हुआ, लोभित लोकपाल-लोकका पालन करनेवाला लोकप्रवर्त्तन-लोगोंके कल्याणके लिये व वञ्चक-वञ्चना करनेवाला वयस-उम्र वर्चस्व-अधिकार वर्णविशिष्ट-वर्णवाला वर्णसङ्कर-भिन्न जातियोंके स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न वाक्-वाणी, बोलनेकी इन्द्रिय वाचाल-अधिक बोलनेवाला वागिन्द्रिय-जिह्वा विक्षिप्त-पागल, उद्विग्न 552 ।

शब्दकोश विगुण-सारगर्भित ] विगुण—गुणहीन विच्युति—भूल, पतन, वियोग विजितात्मा—जिसने मनको जीत लिया है विज्ञ—पण्डित, जाननेवाला विदित—मालूम विधर्म—धर्मविरूद्ध विधिवादिगण—नैतिक लोग विधेय—करने योग्य विधेयात्मा—जिसकी आत्मा संयत हो विन्यास—व्यवस्थित करना विपर्यय—प्रतिकूलता, विपरीतता विभूति—ऐश्वर्य विरहकातर—विरहसे कातर विरोधाभास—विचारमें विरोध प्रतीत होना विलास—क्रीड़ा विवक्षित—इच्छित, कथित विवृत—स्पष्ट, व्यक्त विशारद—निपुण विशिष्ट—विशेषतायुक्त विशिष्टता—विशेषता विशुद्धचित्त—जिसका चित्त शुद्ध है विशेषत्त्व—विशेषता विषयणी—विषयसे सम्बन्धित विहित—आदेश किया हुआ वृष्टि—वर्षा वेदज्ञ—वेदोंके जाननेवाला वैषम्य—विषमता व्यङ्गोक्ति—गूढ़भाषा, वह भाषा जिसमें व्यङ्ग हो व्यतिक्रम—उल्लङ्घन व्यतिरेक—असङ्गति, निषेध व्यवहृत—व्यवहार किया हुआ व्योम—आकाश श शोच्य—शोचनीय शैव—शिवके उपासक श्रुत—सुना हुआ श्रोतव्य—सुनने योग्य श्लेषोक्ति—छिपे अर्थवाली बात ष षडैश्वर्यपूर्ण—छः ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण स सङ्कीर्णता—उदार ना होनेका भाव संवरण—छिपाना संवेदन—अनुभूति संस्पर्श—अच्छी तरहसे होनेवाला स्पर्श संहर्त्ता—संहार करनेवाला सङ्गति—मेल सञ्चित—जमा किया हुआ सदातन—विष्णु सद्विवेकी—सद् विवेकवाला समत्वभाव—समताका भाव सन्निविष्ट—उत्तम रूपसे एकाग्र समाहर—समुच्चय, समूह समाहित—संयमित, व्यवस्थित सम्बन्धविशिष्ट—सम्बन्धवाला सम्मत—सहमत, एक मत समन्वित—संयुक्त, स्वाभाविक रूपसे क्रमबद्ध सम्यक्—भलीभाँति, अच्छी तरह सर्वतन्त्र—समस्त सिद्धान्त सर्वतोभावेन—सम्पूर्ण रूपसे सर्वभूतात्मा—सभी जीवोंके आत्मा अर्थात् परमात्मा सर्वभुक्—सब कुछ खा जानेवाला सर्वात्मकत्व—सर्वात्मकता सहस्र—हजार साम—सामवेद सामर्थ्यविशिष्ट—सामर्थ्यवान् साम्यलक्षण—समानताका लक्षण सारगर्भित—तत्त्वपूर्ण । 553

[ सालोक्य-हृदगत श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सालोक्य मुक्ति—जीवका भगवान्‌के साथ एक ही लोकमें वास करना साष्टाङ्ग प्रणाम—आठ अङ्गोंसे प्रणाम (सिर, हाथ, पैर, आँख, जंघा, हृदय, वचन और मन) सुखान्वेषी—सुखकी खोज करनेवाला सुदुराचारी—अति दुराचारी सुधा—अमृत सुरस—रसयुक्त सुष्ठु—भली भाँति, अच्छी तरह सुस्पष्ट—विशेषरूपसे स्पष्ट सौम्य—सुन्दर, कोमल स्खलित—गिरा हुआ स्निग्ध—स्नेहयुक्त, प्रियता स्नेहाधिक्य—स्नेहकी अधिकता स्फूर्ति—स्फुरण, व्यक्त होना स्पृहा—इच्छा, आकाङ्क्षा स्फुरण—व्यक्त होना स्फुलिङ्ग—चिङ्गारी स्मार्त्त—स्मृति शास्त्रका अनुयायी स्थायित्व—स्थिरता स्रुवा—घीमें आहुति डालनेकी करछी स्वच्छन्द—स्वतन्त्र स्वधर्मस्थ—अपने धर्ममें स्थित स्वयंभू—स्वयं उत्पन्न स्वानन्दपूर्ण—अपने आनन्दमें पूर्ण ह हत—मरा हुआ हतभागा—भाग्यहीन हन्त—मारना हिरण्यगर्भ—ब्रह्मा हेयता—तुच्छता हृदगत—हृदय-सम्बन्धी 554 ।

॥ श्रीश्रीगुरुगौराङ्गौ जयतः॥ गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन चौथी पीढ़ीके महापुरुष श्रीरूपानुग अप्राकृत-कविकुलश्रेष्ठ- ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् कृष्णदास-कविराज-गोस्वामी-रचित श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला (सम्पूर्ण) गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन आठवीं पीढ़ीके पुरुषप्रधान श्रीरूपानुगवर- ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् सच्चिदानन्द-भक्तिविनोद-ठाकुर-रचित अमृतप्रवाह-भाष्य, गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन नौवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन परमहंस-परिव्राजकाचार्य-श्रीरूपानुगश्रेष्ठ- श्रीब्रह्ममाध्वगौड़ीय-सम्प्रदायके सर्वोत्तम संरक्षक- ॐ विष्णुपाद परमहंसस्वामी श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद-रचित श्रीस्वरूप-रूप-विरोधी समस्त-कुसिद्धान्तोंको निरस्त करनेवाला अनुभाष्य एवं नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज कृत ‘अमृतानुकणा', विविध गौड़ीय वैष्णवाचार्योंके लेखों एवं नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके प्रवचनोंसे सङ्कलित 'अमृतानुकणिका' भाष्य, विविध सूची और विवरण आदि-सहित गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन दसवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन श्रीगौड़ीय वेदान्त समितिके प्रतिष्ठाता-आचार्य-भास्कर नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजके अनुकम्पा-पात्र नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके- आदेश-निर्देशानुसार उनके चरणाश्रितजनोंके द्वारा अनुवादित और सम्पादित प्रकाशक : इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स

मूल बङ्गला पयार, संस्कृत श्लोक, 'अमृतप्रवाह भाष्य, अनुभाष्य, अमृताणुकणा और अमृताणुकणिका' टीकाओं सहित प्रकाशित प्रथम संस्करण : 28 दिसम्बर, 2021 { नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री } { श्रीमद्भक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराजकी 100 वीं आविर्भाव तिथि } { एवं } { नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री } { श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजकी 11 वीं तिरोभाव तिथि } संख्या : 1000 प्रतियाँ अनुवाद, विन्यास एवं सम्पादन (Translation, Layout & Editing) :- श्रीमान् गोकुलचन्द्र दास शोधकार्य (Research) :- श्रीमती जानकी दासी श्रीमान् गोकुलचन्द्र दास संस्कृत-हिन्दी अनुवाद :- श्रीमान् डॉ अच्युतलाल भट्ट (पी०एच०डी०) श्रीमती इन्दुलेखा दासी (एम०ए०, एम०एड०) टङ्कण (Typing) :- श्रीमती ऐश्वर्य दासी प्रूफ-संशोधन (Proof Reading) :- श्रीमती आनन्दस्वरूपिणी दासी श्रीमती गीता दासी मुखपृष्ठ चित्र (Front Cover Painting) :- श्रीमान् अनुज श्रीमती प्रभावती दासी श्रीमती आनन्दा दासी भीतरी चित्र सज्जा (Inside Pictures decoration) :- श्रीमान् धनञ्जय दास प्रकाशक (Publisher) :- श्रीपाद रामचन्द्र दास इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स मुद्रण (Printing and binding) :- मणिपाल टेक्नोलॉजीज लिमिटेड, मणिपाल

विषय-सूची 1 पुनः रूपसङ्गोत्सव . . . . . . . . . . . . . 1-42 2 श्रीहरिदास-दण्डरूप-शिक्षा . . . . . . . . . 43-66 3 श्रीहरिदास ठाकुर महिमा-कथन . . . . . . . 67-102 4 पुनः सनातन-सङ्गोत्सव . . . . . . . . . 103-138 5 प्रद्युम्नमिश्र-उपाख्यान . . . . . . . . . 139-164 6 श्रीरघुनाथदास मिलन . . . . . . . . . 165-208 7 श्रीवल्लभभट्ट मिलन . . . . . . . . . 209-234 8 महाप्रभुका भिक्षा सङ्कोच . . . . . . . 235-250 9 श्रीगोपीनाथ पट्टनायक उद्धार . . . . . . . 251-270 10 भक्त प्रदत्त व्यञ्जन-आस्वादन . . . . . . . 271-290 11 श्रीहरिदास-निर्याण-वर्णन . . . . . . . . 291-304 12 श्रीजगदानन्दका तेल-पात्र-भञ्जन . . . . . 305-322 13 श्रीजगदानन्दका वृन्दावन गमन . . . . . . . 323-348 14 चटक-पर्वत-गमनरूप दिव्योन्माद-वर्णन . . . 349-374 15 उद्यान-विहार . . . . . . . . . . . 375-392 16 कालिदास-प्रसाद एवं विरहोन्माद-प्रलाप . . . 393-418 17 कूर्माकार-अनुभावोन्माद-प्रलाप . . . . . . 419-430 18 समुद्र-पतन . . . . . . . . . . . . 431-448 19 विरह-प्रलाप-मुख-घर्षणादि-वर्णन . . . . . 449-474 20 शिक्षा-श्लोकार्थ-आस्वादन . . . . . . . 475-504 ❀ श्लोक सूची . . . . . . . . . . . . 505-508 ❀ पद्य सूची . . . . . . . . . . . . 509-524 ❀ शब्दकोश . . . . . . . . . . . . 525-532

{ग्रन्थ प्राप्ति स्थान}

  1. श्रीरमणविहारी गौड़ीय मठ, B-3, जनकपुरी, नई दिल्ली ✆ 9810192540
  2. श्रीकेशवजी गौड़ीय मठ, जवाहर हाट, मथुरा (उ.प्र.) ✆ 9719070939
  3. श्रीरूप-सनातन गौड़ीय मठ, दान गली, वृन्दावन (उ.प्र.) ✆ 7060236316
  4. श्रीगिरिधारी गौड़ीय मठ, दसविसा, राधाकुण्ड रोड, गोवर्धन (उ.प्र.) ✆ (0565)2815668
  5. श्रीश्रीकेशवजी गौड़ीय मठ, कोलेरडाङ्गा लेन, नवद्वीप (प.बं.) ✆ 9333222775
  6. श्रीगोपीनाथ-भवन, इमली-तला, परिक्रमा-मार्ग, वृन्दावन (उ.प्र.) ✆ 9634563739
  7. श्रीदुर्वासा-ऋषि गौड़ीय आश्रम, ईशापुर, मथुरा (उ.प्र.) ✆ 9917643971
  8. श्रीराधामाधव गौड़ीय मठ, 162, सैक्टर-16A, फरीदाबाद (हरियाणा) ✆ 9911283869
  9. जयश्री दामोदर गौड़ीय मठ, चक्रतीर्थ रोड़, जगन्नाथपुरी (ओडीशा) ✆ 9776238328
  10. श्रीविनोदबिहारी गौड़ीय मठ, Q-29, सैक्टर-12, नोएडा, (उ.प्र.) ✆ 9650824442
  11. श्रीराधागोविन्द गौड़ीय मठ, D-5, सैक्टर-55, नोएडा, (उ.प्र.) ✆ 9910400878
  12. श्रीवामन गोस्वामी गौड़ीय मठ, 39, रामानन्द चटर्जी स्ट्र ✆ 9433203718 कोलकाता (प.बं.)
  13. श्रीरङ्गनाथ गौड़ीय मठ, बेङ्गलुरु, कर्नाटक ✆ (080)28466760
  14. श्रीराधे-कुञ्ज, आनन्द-वाटिकाके समीप, परिक्रमा-मार्ग, ✆ 9457225567 वृन्दावन, (उ.प्र.)
  15. श्रीश्रीगोविन्दजी गौड़ीय मठ, रूपनगर एन्क्लेव, जम्मू ✆ 9906904809
  16. श्रीराधामाधवजी गौड़ीय मठ, माधवी कुञ्ज, भूपतवाला, हरिद्वार ✆ (01334)260845
  17. श्रीनारायण गोस्वामी गौड़ीय मठ, 31/28 दीनबन्धु मित्रा सरणी, ✆ 8629911400 सुभाषपल्ली, सिलीगुड़ी (प.बं.)
  18. श्रीगोविन्द गौड़ीय मठ, बेङ्गलुरु, कर्नाटक ✆ 9900192738
  19. श्रीराधागोविन्द गौड़ीय मठ, बड़ौत, (उ.प्र.) ✆ 7037919949
  20. श्रीकृष्णविहारी गौड़ीय मठ, अम्बाला (हरियाणा) ✆ 9729384995
  21. Pure Bhakti Centre, जयपुर (राजस्थान) ✆ 7229882228
  22. खण्डेलवाल एण्ड सन्स, अठखम्बा बाजार, वृन्दावन (उ.प्र.) ✆ (0565)2443101

निवेदन हमारे परमाराध्य गुरुदेव नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजजीकी अपार कृपासे गौड़ीय वैष्णवाचार्योंकी विविध टीकाओं सहित हिन्दी भाषामें श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतकी दो भागोंमें आदिलीला एवं दो भागोंमें मध्यलीला प्रकाशित करनेके पश्चात् अब ‘अन्त्यलीला (सम्पूर्ण)’ का प्रकाशन कार्य सम्पन्न हुआ है। यह कार्य उनकी आज्ञा एवं उनके द्वारा प्रदत्त शक्तिसे ही सम्पादित हुआ है। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीने श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा अनुमोदित गूढ़ तत्त्व-सिद्धान्तों और सर्वोच्च रस-तत्त्वका अनूठा, अद्भुत और चमत्कारी समन्वय इस ग्रन्थमें अति सरल बङ्गला भाषामें करके अपने अप्राकृत कवित्वका परिचय प्रदान किया है। “मितञ्च सारञ्च वचो हि वाग्मिता”, श्रील कविराज गोस्वामीकी लेखनी इस उक्तिका उज्ज्वल उदाहरण है, उन्होंने अति अल्प शब्दोंमें समस्त शास्त्रोंके सारको प्रमाण सहित इस ग्रन्थमें प्रस्तुत किया है। इस ग्रन्थकी भाषा सरल होनेपर भी इसमें अत्यन्त गूढ़ रहस्य समन्वित हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर और श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरने अपनी टीकाओं एवं अनेकानेक लेखोंके द्वारा उन गूढ़ रहस्योंको उद्घाटित किया है। इन टीकाओं और लेखों तथा श्रील गुरुदेवके प्रवचनोंको इस प्रकाशनमें समन्वय करके ग्रन्थके गूढ़ भावोंको सर्वसाधारणके लिये बोधगम्य बनानेका हमारा प्रयास है। उनके मनोवाञ्छित कार्यको सम्पूर्ण करनेके लिये प्रकाशन मण्डलीके सेवक निरन्तर प्रयासशील हैं और श्रील गुरुदेवकी प्रेरणा एवं निरुपाधिक निरवधि कृपाशक्ति हमें इस महत् कार्यमें सदा उत्साहशील बनाये रखती है। यह अति हर्षका विषय है कि श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतका ‘अन्त्यलीला (सम्पूर्ण)’ भाग भी अब प्रकाशित हो गया है और श्रीगुरुदेवकी प्रसन्नताके लिये उनकी निज वस्तुको उनके ही करकमलोंमें अर्पित करते हुए परमानन्दका अनुभव कर रहे हैं। इस ग्रन्थके प्रकाशनके लिये आत्मीय सहायता एवं प्रेरणाके लिये हम श्रीयुता उमादेवी दासीके आभारी हैं। इस ग्रन्थमें कुछ त्रुटियोंका रह जाना स्वाभाविक है। सुधी पाठकोंके द्वारा उनका संशोधनपूर्वक पाठ करनेसे हम आनन्दित होंगे। प्रकाशन मण्डली इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स (IGVP)

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला उद्धृत प्रमाण-ग्रन्थ तालिका अभिज्ञान-शकुन्तल-नाटक—18/40; आर्य्यशतक—16/74; इतिहास-समुच्चय—16/25; उज्ज्वलनीलमणि—14/16, 53; उपपुराण—3/82; काव्यप्रकाश—1/78; कृष्णकर्णामृत—17/51; कृष्णचैतन्योक्त श्लोक—6/239, 285; 20/12, 16, 21, 29, 32, 36, 39, 47; कृष्णसन्दर्भ—7/80; गीतगोविन्द—15/84; गोविन्दलीलामृत—15/14, 63, 78, 119; 17/40; 19/91; गोस्वामीपादोक्त श्लोक—14/41; चैतन्यचन्द्रोदय नाटक—6/263, 264; नाटकचन्द्रिका—1/135; नामकौमुदी—7/80; नृसिंहपुराण—3/56; 16/52, 53; नैषधी—1/92; न्याय—1/91; पद्मपुराण—3/60; पद्यावली—1/78; 3/180, 6/239; 8/32; 20/12, 16, 21, 29, 32, 36, 39, 47; पाणिनि—8/78; प्राचीनकृत श्लोक—1/195; बङ्गदेशीय विप्रकृत श्लोक—5/112; विदग्धमाधव—1/99, 120, 128, 132, 136, 138, 139, 142-146, 148, 150, 155, 158-165, 169-171; भक्तिरसामृतसिन्धु—1/108, 212; 3/62, 195; 19/105; भगवत्सन्दर्भ—5/127; भगवद्गीता—4/177-178; 8/65-66; भरतमुनि-वाक्य—16/71; भागवत—2/119; 3/63, 83, 178, 186, 187; 4/59, 63, 64, 69, 175, 194; 5/10, 48, 124, 125, 137; 6/137, 314; 7/10, 27, 29, 32, 33, 39, 41; 8/76; 9/77; 14/86; 15/32-34, 44, 51, 70, 81; 16/26, 27, 117, 140; 17/31; 18/25; 19/45, 70; 20/10; भारवी—10/21; भावार्थदीपिका—5/127; यमुनाचार्य्यकृत श्लोक—3/91; रामचन्द्रपुरीवाक्य—8/47; रूपगोस्वामीकृत श्लोक—1/79, 114; 14/16, 53; लघुभागवतामृत—1/67; 5/123; 7/15; ललितमाधव—1/166-168, 175, 177, 184, 188-191; 19/35; विष्णुपुराण—3/84, 112-115, 344; 24/68, 304; विष्णुस्वामिवाक्य—5/127; सर्वज्ञसूक्तवाक्य—5/127; साहित्यदर्पण—1/186; स्तवमाला—15/97; स्तवावली—6/327; 14/73, 120; 16/87; 17/71; 19/76; हरिभक्तिविलास—3/60; 16/25 । अमृतप्रवाह भाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका भक्तिरसामृतसिन्धु—19/101; याज्ञवल्क्य—6/23 । अनुभाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका अमरकोष—14/10; अष्टादश-महापुराण—9/10; आदित्य-पुराण—20/57; उज्ज्वलनीलमणि—1/140, उपदेशामृत (रूपगोस्वामीकृत)—4/180; कल्याण-कल्पतरु—4/173; काव्यप्रकाश—18/99; कृष्णकर्णामृत—10/142; गरुड़-पुराण—4/197; 16/28, 29; चैतन्यभागवत—20/87; तत्त्व-सागर—16/28-29; तन्त्र—12/37; तिथितत्त्व—12/108; दिग्दर्शिनी-टीका—4/219, 222; नाटकचन्द्रिका—1/35, 134, 137; नामाष्टक (श्रीरूप गोस्वामी)—4/71; नारायण-संहिता—7/11;

पद्मपुराण—5/118; 16/28-29; 20/57; पद्यावली—14/53; परिजातसौरभ-भाष्य—2/95; पूर्णप्रज्ञ-दर्शन—2/95; ब्रह्मसूत्र—9/10; भक्तिरत्नाकर—4/218, 226; भक्तिरसामृतसिन्धु—5/97; भक्तिसन्दर्भ—3/60, 220; 4/71; 6/226; 8/24; 20/39; भागवत—4/66, 70-71; 5/45-46, 121; 6/226; 7/45; 9/10; 11/105; 13/113; 16/7, 28-29; 17/54; 19/106-108; 20/71; महाभारत—16/28-29, 96-100; 17/54; मार्कण्डेय-पुराण—20/57; रघुनाथवैद्यलिखित ग्रन्थ—12/120; रामायण—3/80; लघुतोषणी-टीका—8/24, ललितमाधव—14/53, लीलास्तव—4/219-222, विलापकुसुमाञ्जलि—6/1; विष्णुभक्तिचन्द्रोदय—8/24; विष्णुस्मृति—11/3024; शारीरिकभाष्य—2/95; शिक्षाष्टक—4/71; श्रीभाष्य—2/95; श्रुति—5/119; सप्तशती—9/69; सर्वज्ञभाष्य—2/95; साहित्य-दर्पण—1/35, 71, 134, 137, 185; 18/99; सिद्धान्त-शिरोमणि—2/10; स्कन्दपुराण—16/96, 100; स्मृति—8/7; हंसदूत—14/53; हरिभक्तिविलास—3/60; 4/219-222; 6/226।

अमृतानुकणामें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका ऐतरयोपनिषद्—20/21; कठोपनिषद्—20/21; गौरगणोद्देश-दीपिका—7/140; 8/5; चैतन्यभागवत—8/5; छान्दोग्योपनिषद्—20/21; बृहद्भागवतामृत—13/61; बृहदारण्यक—20/21; ब्रह्मसूत्र—20/21; भगवद्गीता—13/61; 20/21; भागवत—13/61; 20/21; भावार्थ-दीपिका—13/61; विदग्धमाधव—18/88; श्वेताश्वतर-उपनिषद्—20/21; श्रीचैतन्य-शिक्षाष्टक—20/21; श्रीमुकुन्दाष्टकम्—13/61; श्रीराधाकृष्णगणोद्देश-दीपिका—13/61; सन्मोदिनी-भाष्य—20/21; सारार्थ-दर्शिनी—13/61 ।

अमृतानुकणिकामें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका कृष्णकर्णामृत-टीका—17/51; गरुड़पुराण—16/17-19; गीतगोविन्द—14/30; चैतन्यभागवत—3/196; 16/17-19; छान्दोग्योपनिषद्—7/113; प्रीतिसन्दर्भ—20/52; भक्तिरसामृतसिन्धु—4/125; भक्तिसन्दर्भ—20/25; भगवद्गीता—16/17-19; भागवत—7/113; 17/51; 20/25, 52; माधुर्य-कादम्बिनी—15/12-23; विलापकुसुमाञ्जली—6/313; श्रीगोविन्दलीलामृत—15/14; श्रीश्रीगोवर्धनाष्टकम्—4/125; श्रीप्रेमविवर्त—7/139; 13/41; सारार्थ-दर्शिनी—19/70 ।

साङ्केतिक चिह्नोंकी सूची

अन्त्य – अन्त्यलीला आदि – आदिलीला उःनीः – उज्ज्वलनीलमणि कठः – कठोपनिषद छाः – छान्दोग्योपनिषद बृःआः – बृहदारण्यकोपनिषद मध्य – मध्यलीला मःभाः – महाभारत

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला अध्याय-विवरण पहला अध्याय— 1-42 श्रीस्वरूप गोस्वामीके द्वारा गौड़में महाप्रभुके वृन्दावनसे पुरी आगमनका संवाद भेजना, सभी भक्तोंके साथ शिवानन्द सेनकी नीलाचल यात्रा। शिवानन्द सेनके द्वारा मार्गमें कर आदि देना और उनके साथमें आये कुत्तेका उपाख्यान, श्रीरूपका वृन्दावनमें आगमन और नाटककी रचना आरम्भ करना, छोटे भ्राताके साथ श्रीरूपकी गौड़यात्रा और गौड़में श्रीअनुपमकी गङ्गा-प्राप्ति, वहाँसे श्रीरूपकी पुरी यात्रा, सत्यभामापुरमें स्वप्नमें सत्यभामा देवीका उपदेश प्राप्त करना ही ललितमाधव रचनाका मूल सूत्रपात, पुरीमें ठाकुर श्रीहरिदासके वासस्थानपर श्रीरूपका आगमन, भक्तोंके साथ श्रीरूपका मिलन, महाप्रभुका कृपादेश ही विदग्धमाधवकी रचनाका मूल सूत्रपात्र, श्रीरूपके द्वारा नाटकका विभाग करना, रथके आगे नृत्यकालमें महाप्रभुके द्वारा पाठ किये गये 'यः कौमारहरः' श्लोकके अनुरूप श्रीरूपके द्वारा श्लोक लिखना, महाप्रभुके द्वारा रूपके द्वारा लिखित श्लोकको पढ़ना, महाप्रभुका श्रीस्वरूप दामोदरसे श्लोकका वृत्तान्त कहना, श्रीरूपकी लिखावटकी प्रशंसा और श्रीरूपके द्वारा 'नाम-महिमा' श्लोकका पाठ करना, श्रीरूपके गुणोंका वर्णन, श्रीस्वरूप गोस्वामीके द्वारा श्रीरूपकृत श्लोकका पाठ, महाप्रभुका श्रीराय रामानन्द और श्रीसार्वभौमादि भक्तोंके साथ श्रीरूपके नाटककी भूमिकाका श्रवण, श्रीराय रामानन्दके द्वारा श्रीरूपकृत नाटकके अङ्ग-प्रत्यङ्गादिका विचार करके उसकी सर्वश्रेष्ठताका निर्धारण, वैराग्ययुक्त प्रेमभक्ति सिद्धान्त रस-पाण्डित्यके विषयमें श्रीराय रामानन्दके साथ श्रीसनातनकी समानताको कहना, महाप्रभुकी भक्तिशास्त्र प्रचार करनेकी इच्छा, चातुर्मासके अन्तमें भक्तोंके द्वारा गौड़में वापस लौटना, दोलयात्रा तक श्रीरूपका महाप्रभुके चरणोंमें अवस्थान करना, श्रीरूपमें महाप्रभुके द्वारा शक्ति सञ्चार और चार प्रकारकी सेवा प्रदान करना एवं श्रीरूपका वृन्दावनमें गमन। दूसरा अध्याय— 43-66 महाप्रभुका तीन प्रकारसे प्राकट्य—महाप्रभुका साक्षात् दर्शन, योग्य जीवमें आवेश और उसके समक्ष आविर्भाव, तीन प्रकारके प्राकट्यके फलोंका वर्णन, नकुल ब्रह्मचारीकी देहमें आवेश और श्रीप्रद्युम्नके द्वारा आविर्भावके उपाख्यानका वर्णन, महाप्रभुका चार स्थानोंमें नित्य आविर्भाव, श्रीकान्तके प्रति कृपा, श्रीप्रद्युम्नका नृसिंहानन्द-नाम प्राप्तिका कारण, श्रीप्रद्युम्नको महाप्रभुके द्वारा सभी विष्णु-तत्त्वोंके साथ उनके अभेद और ऐक्यका प्रदर्शन, भक्तके प्रेममें वशीभूत भगवान्, भगवान् आचार्यके पास मायावादी भाई गोपाल भट्टाचार्यका आगमन और महाप्रभुके साथ मिलन, आचार्यका श्रीस्वरूप गोस्वामीसे मायावाद भाष्य सुननेका अनुरोध, श्रीस्वरूपके द्वारा मायावादके दोषोंका वर्णन, निन्दा और आचार्यके भाईको स्वदेशमें वापस भेजना, भगवान् आचार्यके आदेशसे छोटे हरिदासकी माधवीदेवीसे चावलकी भिक्षा और छोटे हरिदासके प्रति महाप्रभुकी दण्ड प्रदान करनेकी लीला, माधवीदेवीका परिचय, स्त्रीके साथ वार्तालाप करनेवाले वैरागीके प्रति महाप्रभुका व्यवहार, छोटे हरिदासकी गति, स्त्रीसे वार्तालाप करनेका प्रायश्चित और छोटे हरिदास-दण्डलीलाके प्रसङ्गमें शिक्षा ग्रहण करने योग्य सात विषय।

अध्याय-विवरण तीसरा अध्याय— 67-120 विधवा ब्राह्मणीके पुत्रके प्रति महाप्रभुका कृपा-स्नेह और महाप्रभुको श्रीदामोदर पण्डितका वाक्यदण्ड, श्रीदामोदरको महाप्रभुकी कृपा प्राप्ति और नवद्वीपमें शचीमाताके पास जानेका आदेश, धर्मरक्षा करनेके लिये निरपेक्षताकी आवश्यकता, श्रीदामोदरके द्वारा माताको अनेक प्रकारके संवाद भेजना, शचीमाताके घरमें महाप्रभुका आविर्भाव और भोजन-लीलाका दृष्टान्त। श्रीदामोदर पण्डितके आगे किसीकी भी स्वतन्त्रता नहीं चलती थी, चैतन्यलीला महा-गम्भीर रहस्यमयी है, महाप्रभु और श्रीहरिदास ठाकुरका संवाद, महाप्रभुका श्रीहरिदास ठाकुरके मुखसे नाम, नामाभास, नामापराधके फल और उच्च सङ्कीर्तनके माहात्म्यका कथन, श्रीहरिदास ठाकुरका बेनोपोलमें अवस्थान करनेके समयमें मायादेवीके प्रति कृपालीला तक-का संक्षिप्त विवरण, उसके मध्यमें वैष्णवके चरणाश्रय ग्रहण करनेवालेकी परमागति और वैष्णव- अपराधीके भयानक परिणामका वर्णन एवं 'रामनाम' और 'कृष्णनाम'के माहात्म्यके वैशिष्ट्यका कथन। चौथा अध्याय— 103-138 श्रीसनातन गोस्वामीका मथुरामण्डलसे होकर झारिखण्डके मार्गसे नीलाचलमें आगमन, बाहरसे देखनेपर श्रीसनातन गोस्वामीके सभी अङ्गोंमें फोड़ोंका दिखलायी देना, श्रीसनातन गोस्वामीका देहत्यागका सङ्कल्प और उनका श्रीहरिदास और महाप्रभुके साथ मिलन, महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातन गोस्वामीका आलिङ्गन और उन्हें अनुपमकी गङ्गाप्राप्तिका समाचार देना। श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा अनुपमकी रामनिष्ठाका वर्णन, महाप्रभुका मुरारिगुप्तकी रामनिष्ठाके दृष्टान्तका वर्णन, एकान्तिक भक्त और भगवान्, एकान्तिक भक्तवात्सल्य, श्रीसनातन गोस्वामीको श्रीहरिदासके साथ रहनेकी महाप्रभुकी आज्ञा, श्रीसनातन गोस्वामीके देहत्यागके सङ्कल्पको निषेध करनेको उपलक्ष्य करके मनोधर्मसे चालित अनर्थयुक्त साधकको महाप्रभुके द्वारा कृष्णप्राप्तिके उपायकी शिक्षा देना, सिद्धकी चेष्टा साधकके लिये अनुकरणीय नहीं है, गाढ़ानुरागका वियोग असहनीय, कृष्णभजनमें योग्यताका निर्देश, नाम-सङ्कीर्तन ही भक्तिका सर्वश्रेष्ठ अङ्ग, अपराधशून्य होकर निरन्तर नाम-सङ्कीर्तनके फलसे ही कृष्णप्रेमकी प्राप्ति, भक्तकी देह प्रभुका अपना धन है, श्रीसनातनके द्वारा महाप्रभुके चार प्रकारके मनोऽभीष्टका सम्पादन, महाप्रभुका श्रीहरिदासको श्रीसनातनकी देहका भार-अर्पण, श्रीहरिदासका जीवको महाप्रभुके आनुगत्यका शिक्षादान, महाप्रभुका श्रीहरिदासके द्वारा नाम महिमाका प्रचार, आचार एवं प्रचार, चातुर्मास्य कालमें गौड़ीय और उड़िया भक्तोंके साथ श्रीसनातन गोस्वामीका मिलन, महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातन गोस्वामीकी परीक्षा, मर्यादाकी रक्षा ही साधुका आभूषण, मर्यादा उल्लङ्घनसे इहलोक और परलोकका नाश, श्रीसनातन गोस्वामीका श्रीजगदानन्द पण्डितके साथ मिलन और उनको अपने दुःखको बतलाना, श्रीजगदानन्द पण्डितके द्वारा श्रीसनातन गोस्वामीको वृन्दावन जानेका परामर्श देना, महाप्रभुके द्वारा प्रदत्त देश वृन्दावन ही श्रीसनातन गोस्वामीका स्थान, महाप्रभुसे श्रीसनातन गोस्वामीका अपने दुःखका निवेदन करना और श्रीजगदानन्द पण्डितके दिये गये परामर्शको बतलाना, महाप्रभुका श्रीजगदानन्द पण्डितके प्रति क्रोध प्रकाश करना और श्रीसनातन गोस्वामीके प्रति कृपासहित गौरव-उक्ति, अपने और श्रीजगदानन्द पण्डितके प्रति महाप्रभुके स्नेहकी तुलना करके श्रीसनातन गोस्वामीको दुःख और महाप्रभुका उनको सांत्वना देना, विशेष पात्रसे ही विषयकी प्रीतिका वैशिष्ट्य, वैष्णव-देह अप्राकृत, अप्राकृत राज्यमें जड़ीय विधि-निषेधका कोई विचार नहीं, महाभागवतका सर्वत्र विष्णु प्रतीतिके कारण जड़भेदसे उत्पन्न वैषम्यहीन समदर्शन, भक्त और भगवान्‌के मध्य परस्परका व्यवहार, वासुदेव विप्रकी घटना, दीक्षाकालमें कृष्णके चरणोंमें आत्म-समर्पणकारी भक्तका चिन्मय देह प्राप्त करना, महाप्रभुके आलिङ्गन-स्पर्शके फलसे श्रीसनातन गोस्वामीके शरीरके फोड़ोंका दूर होना, श्रीसनातन

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला

[चतुर्थ अध्याय - अवशिष्ट]

गोस्वामीको उस वर्ष नीलाचलमें ही रहनेकी आज्ञा, दोलयात्राके बाद श्रीसनातन गोस्वामीको वृन्दावनमें भेजना। महाप्रभु और श्रीसनातन गोस्वामीका विच्छेद, वृन्दावनके मार्गमें महाप्रभुके लीलास्थानके दर्शनसे सनातन गोस्वामीमें प्रेमका आवेश, श्रीसनातन और श्रीरूपका वृन्दावनमें मिलन, श्रीरूपका धन-विभाग, श्रीरूप-सनातनके द्वारा गौर-आज्ञाका पालन, वृन्दावनमें लुप्त तीर्थोंका उद्धार, सेवाप्रकाश एवं ग्रन्थ-रचना आदिका कार्य, श्रीजीवका परिचय और ग्रन्थ-रचनादिका कार्य, श्रीजीवके प्रति श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपा और कविराज गोस्वामीके चार शिक्षागुरु। शुद्धा सरस्वतीकी श्रीकृष्णसेवा, अक्षजज्ञानी इन्द्रकी, विद्वेषी जरासन्ध और शिशुपालकी निन्दा उक्तियोंके दृष्टान्त, दारुब्रह्म और जङ्गमब्रह्मका अभेदत्व स्थापन, कविके द्वारा वैष्णवके चरणोंमें आत्मसमर्पण करनेके कारण उसे महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति, कविका संन्यास-ग्रहण और नीलाचलमें वास।


पाँचवाँ अध्याय— (139-164)

महाप्रभुसे कृष्णकथा श्रवण करनेके इच्छुक श्रीप्रद्युम्न मिश्रको महाप्रभुके द्वारा श्रीराय रामानन्दके निकट भेजना, श्रीराय रामानन्दका वृत्तान्त, श्रीमिश्रका श्रीराय रामानन्दकी सभामें जाना और पुनः लौटकर आना, महाप्रभुसे मिश्रके द्वारा श्रीराय रामानन्द-वृत्तान्तका वर्णन, महाप्रभुके द्वारा श्रीप्रद्युम्न मिश्रको श्रीरामानन्द-तत्त्वका विशेष रूपमें प्रकाश, श्रीरामानन्द एकमात्र अद्वितीय अधिकारी, 'रागात्मिका' भक्तियाजी नित्यसिद्ध श्रीराय रामानन्दके निकट श्रीमिश्रको शिक्षा प्राप्त करनेके लिये महाप्रभुका पुनः भेजना, श्रीराय रामानन्दका श्रीमिश्रके निकट कृष्णकथाका कीर्तन, कृष्णकीर्तनकारी गुरुमें मर्त्यबुद्धिका निषेध, श्रीराय रामानन्दके मुखसे स्वयं श्रीचैतन्य महाप्रभु वक्ता, महत्-व्यक्तिका स्वभाव, जगद्गुरु श्रीगौराङ्ग महाप्रभुका लोकशिक्षा-रहस्य, प्राकृत वर्णाश्रम और पाण्डित्यादि सत्यधर्मका वक्तव्य देनेका लक्षण नहीं, पूर्व बङ्गवासी एक ब्राह्मणवेशी प्राकृत कविका दृष्टान्त, श्रीस्वरूपका क्रोध करनेके कारण—(1) श्रीविष्णुमें जीवबुद्धि नरक-जननी, (2) ईश्वरमें देह-देहीभेद माननेका अपराध ही प्रमाद; श्रीस्वरूप गोस्वामीका बङ्गदेशीय कविको वैष्णवके निकट जाकर भागवत पढ़नेका उपदेश, मूर्ख या विद्वेषीकी कृष्णनिन्दा-उक्तिके द्वारा भी


छठा अध्याय— (165-208)

विप्रलम्भ-दशामें श्रीराय रामानन्दकी कृष्णकथा और श्रीस्वरूपका गान ही महाप्रभुका जीवातु (प्राण), श्रीकृष्णके लिये जैसे सुबलसखा, महाप्रभुके लिये भी वैसे ही श्रीराय रामानन्द, श्रीराधाके लिये जैसे श्रीललिता, महाप्रभुके लिये भी वैसे ही श्रीस्वरूप-दामोदर, महाप्रभुके साथ श्रीरघुनाथ दास गोस्वामीके मिलनका प्रसङ्ग, श्रीरघुनाथके प्रति श्रीनित्यानन्दकी अहैतुकी कृपा, चिड़ा-दधि महोत्सव, श्रीनित्यानन्दकी कृपासे ही श्रीचैतन्यकी कृपाकी प्राप्ति, श्रीरघुनाथका गृहत्याग और बारह दिनोंमें पुरीमें आगमन, मार्गमें तीन दिन मात्र प्रसाद-सेवन, महाप्रभु और भक्तोंके साथ श्रीरघुनाथका मिलन, महाप्रभुके द्वारा कृष्णकृपाके माहात्म्यका वर्णन, महाप्रभुके द्वारा हिरण्य-गोवर्धनके चरित्रका कथन, नित्यसिद्ध श्रीरघुनाथका विषय-भोग न रहनेपर भी अनर्थयुक्त साधकोंके लिये महाप्रभुका उपदेश, महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथका स्वरूप दामोदरके हाथोंमें समर्पण, महाप्रभुके तीन रघुनाथ, श्रीरघुनाथ दासका 'स्वरूपेर रघु' नाम, श्रीरघुनाथको महाप्रभुके द्वारा समुद्रमें स्नान और जगन्नाथ दर्शनका आदेश। श्रीरघुनाथकी सिंहद्वारपर अयाचक-वृत्ति, क्षेत्रमें निष्किञ्चन विरक्त भक्तके व्यवहारका वर्णन, महाप्रभुके द्वारा वैरागी या गृहत्यागीके वैध या अवैध आचारका वर्णन, श्रीस्वरूपको शिक्षागुरुरूपमें वरण करनेके लिये महाप्रभुका श्रीरघुनाथको आदेश, श्रीस्वरूप ही साध्य-साधन तत्त्वके आचार्य, महाप्रभुके द्वारा 'रागानुगा'-भक्तियाजीके आचारका वर्णन, श्रीशिवानन्दके द्वारा श्रीरघुनाथके कठोर वैराग्यको श्रवण करके उनके पिताके द्वारा धन और

अध्याय-विवरण सेवकोंको भेजना, श्रीरघुनाथका धन आदिको अस्वीकार करना, और बादमें महाप्रभुको निमन्त्रणके लिये उसमें-से कुछ अंशको स्वीकार करना, दो वर्षोंके बाद महाप्रभुके निमन्त्रण कार्यका भी त्याग, विषयीके अन्नके प्रति महाप्रभुके वचन, श्रीरघुनाथके द्वारा सिंहद्वारका भी त्याग और माधुकरी भिक्षा स्वीकार करनेका वर्णन, श्रीरघुनाथको महाप्रभुके द्वारा गोवर्धनकी शिला और गुञ्जामाला प्रदान करना, महाप्रभुका श्रीरघुनाथको शिला-पूजाकी प्रणाली बतलाना, श्रीरघुनाथके शिलामें व्रजेन्द्रनन्दनके दर्शन, श्रीरघुनाथका सब समय कृष्णभजन, छह वेगोंको जय करनेवाले श्रीरघुनाथका जीवन-निर्वाहके लिये जितना आवश्यक उतना ही ग्रहण करना और श्रीरघुनाथके द्वारा 'सड़ा' प्रसाद-चावल ग्रहण करना। सातवाँ अध्याय— 209-234 श्रीवल्लभ भट्टके साथ महाप्रभुका मिलन, श्रीभट्टके द्वारा 'युगधर्म-प्रचारक' आदि कहकर महाप्रभुकी स्तुति, महाप्रभुके द्वारा श्रीभट्टको श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य, श्रीराम force? -> श्रीरामानन्द राय, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीहरिदास ठाकुर आदि भक्तोंकी महिमाका गान करना, श्रीभट्टका विस्मय और गर्वनाश, श्रीभट्टकी भक्तोंके दर्शनकी इच्छा और भक्तोंके सहित महाप्रभुको भिक्षा-प्रदान, भक्त-संन्यासियोंका एक पंक्तिमें बैठना, रथयात्रा कालमें सात-सम्प्रदायोंमें सात कीर्तनकारी और चौदह मृदङ्ग, कीर्तनके बीचमें महाप्रभुका अलातचक्रकी भाँति भ्रमण, श्रीभट्टका विस्मय, महाप्रभुसे श्रीभट्टकी स्वरचित भागवत-टीका श्रवण करनेका आवेदन, महाप्रभुकी उसमें उदासीनता, श्रीभट्टकी कृष्णनामकी व्याख्या प्रकाश करनेकी इच्छा और महाप्रभुकी उसमें असम्मति, पण्डित गोस्वामीकी अनिच्छा होनेपर भी श्रीभट्टका उनके निकट कृष्णनाम-व्याख्याका पाठ करना, श्रीअद्वैताचार्य आदिके साथ श्रीभट्टका कुतर्क करना, श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा श्रीभट्टके सभी सिद्धान्तोंका खण्डन, पतिरूपी श्रीकृष्णके आदेशसे ही प्रकृतिरूपी जीवके द्वारा सदा श्रीकृष्णनाम ग्रहण करनेकी विधि, नाम-उच्चारणके फलसे श्रीकृष्णचरणकमलोंमें प्रेमका उदय होना, प्रतिष्ठाका नाश होनेपर श्रीभट्टको दुःख, श्रीभट्टके द्वारा श्रीधरस्वामीकी निन्दा और महाप्रभुके द्वारा श्रीधरस्वामीकी निन्दा करनेवालेकी वेश्याके मध्य गणना, श्रीभट्टका गर्व चूर्ण होना और महाप्रभुके चरणोंमें शरण ग्रहण करना, महाप्रभुके द्वारा श्रीभट्टको श्रीधरस्वामीके आनुगत्यमें भागवत-व्याख्या और निरपराध होकर कृष्णनाम ग्रहण करनेका आदेश, सत्यभामाके अवतार श्रीजगदानन्दका वाम्य-स्वभाव, रुक्मिणीके अवतार श्रीगदाधर पण्डितका दक्षिण-स्वभाव, महाप्रभुके द्वारा श्रीगदाधरकी प्रेम-परीक्षा और श्रीगदाधरका भय, महाप्रभुका 'गदाधर-प्राणनाथ'-नाम, भक्तोंके द्वारा 'गदाइ-गौराङ्ग'-नामका गान, श्रीभट्टके द्वारा श्रीगदाधर पण्डितसे मन्त्र-दीक्षा प्राप्त करना। आठवाँ अध्याय— 235-250 महाप्रभुका श्रीपरमानन्द पुरी और रामचन्द्रपुरीके साथ मिलन, वैष्णव-संन्यासियोंका साम्प्रदायिक व्यवहार, श्रीजगदानन्दका भिक्षा प्रदान करना, रामचन्द्रपुरीका निन्दक स्वभाव, श्रीमाधवेन्द्रपुरीका रामचन्द्रका वर्जन और श्रीईश्वरपुरीपर कृपा, अप्राकृत विप्रलम्भ अवस्थामें श्रीमाधवेन्द्रपुरी गोस्वामीका अन्तर्धान होना, रामचन्द्रपुरीका स्वयं महाप्रभुको मर्त्य मानकर उनके दोषोंको ढूँढ़ना, महाप्रभुका भिक्षा सङ्कुचित करना और भक्तोंका रामचन्द्रपुरीके प्रति क्रोध, अपना निजजन जानकर श्रीगोविन्द और श्रीकाशीश्वरको महाप्रभुके द्वारा कहीं ओर भोजनका आदेश, रामचन्द्रपुरीकी महाप्रभुको वैराग्यकी शिक्षा देनेकी धृष्टता, जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुके द्वारा संन्यास-धर्मकी विधिका निर्णय, अभक्त वर्ण-ब्राह्मण और पांक्तेय ब्राह्मणके घरमें महाप्रभुकी भिक्षा ग्रहण करनेकी रीतिका वैशिष्ट्य, रामचन्द्रपुरीका क्षेत्रत्याग करनेपर महाप्रभुके द्वारा सङ्कोचका परित्याग, भक्तोंके आनन्दमें महाप्रभुका सन्तोष और गुरुकी उपेक्षाके फलसे जीवका विष्णु-विरोधी या पाखण्डी होना।

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला नौवाँ अध्याय— 251-270 मनुष्य वेशमें देवताओंका महाप्रभुका दर्शन, श्रीभवानन्दके पुत्र गोपीनाथको राजदण्डसे छुटकारा दिलवानेके लिये लोगोंकी महाप्रभुसे प्रार्थना, महाप्रभुकी निरपेक्षता और गोपीनाथका तिरस्कार, गोपीनाथका दण्डमोचन, महाप्रभुकी विषयकथामें अनिच्छाका ज्ञापन और अलालनाथ जानेकी इच्छा, लोकशिक्षाके लिये महाप्रभुकी कठोर निरपेक्षता, श्रीकाशीमिश्रका महाप्रभुको आश्वासन, जड़ेन्द्रिय-तर्पणके लिये विष्णुभजनकी चेष्टा मूर्खता, प्रभुके प्रीतिकामी निष्किञ्चन शुद्धभक्तगण, गोपीनाथ सकाम व्यापारी नहीं, गोपीनाथके प्राणदण्डके आयोजनको देखकर उनके हितैषियोंकी महाप्रभुसे कृपा-याचना, शुद्धभक्तकी संज्ञा और आचार-व्यवहार, श्रीप्रतापरुद्रके द्वारा अपने गुरु श्रीकाशीमिश्रकी नित्य चरण दबानेकी सेवा, राजासे श्रीमिश्रका गोपीनाथ-वृत्तान्त वर्णन करना और महाप्रभुके अलालनाथ जानेकी इच्छा बताना, पुरीमें महाप्रभुके अवस्थानके उद्देश्यसे राजाकी सर्वस्व त्याग करनेकी प्रतिज्ञा और गोपीनाथको पुनः राजसम्मान प्रदान, पाँचों पुत्रोंके साथ श्रीभवानन्दकी महाप्रभुके चरणोंमें शरणागति, श्रीगौरस्मरणका मुख्यफल—'गौर-प्रीति' और गौणफल—'विषय-सुख' और गोपीनाथके प्रति महाप्रभुका उपदेश। दसवाँ अध्याय— 271-290 भक्तोंका नीलाचलमें महाप्रभुके दर्शनके लिये गमन, दमयन्तीके द्वारा प्रदान की गयी झालीके साथ श्रीराघवका महाप्रभुके पास गमन और श्रीगोविन्दको झालीका समर्पण करना, श्रीराघवकी झालीका विवरण, श्रीराघव और दमयन्तीकी महाप्रभुके प्रति प्रगाढ़ प्रीति, भक्तोंके साथ महाप्रभुकी नरेन्द्र-सरोवरमें जलक्रीड़ा, सात सम्प्रदायोंमें बेड़ा-सङ्कीर्तनका वर्णन, महाप्रभुका परिमुण्डा-नृत्य, महाप्रभुके द्वारा महैश्वर्यका प्रकाश, रानियोंके साथ राजाका सङ्कीर्तन दर्शन, गम्भीरामें श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुका पाद-सम्वहन, महाप्रभुके शरीरके ऊपर बर्हिवास देकर श्रीगोविन्दका महाप्रभुको पार करना और पाद-सम्वहनादिकी सेवा, श्रीगौरकृष्णकी इन्द्रियोंके तर्पणकी इच्छा ही सेवकका एकमात्र लक्ष्य, भक्तोंके साथ महाप्रभुका गुण्डिचा-मार्जन, महाप्रभुका भक्तोंके द्वारा प्रदान किये गये नानारूप नैवेद्यका भोजन, महाप्रभुका भक्तोंके साथ चातुर्मास्य-यापन, महाप्रभुके प्रिय अनेक प्रकारके व्यञ्जन, सब भक्तोंका महाप्रभुको निमन्त्रण, श्रीशिवानन्दके पुत्रका निमन्त्रण, श्रीशिवानन्दके बड़े पुत्र चैतन्यदासके प्रति महाप्रभुकी कृपाका वर्णन, गौड़ीय भक्तोंका गौड़में गमन और पुरीवासियोंका पुरीमें ही अवस्थान। ग्यारहवाँ अध्याय— 291-304 श्रीहरिदास-निर्याण-वर्णन-प्रसङ्ग, महाप्रभुका कृष्ण विरहमें काल-यापन, अप्राकृत विप्रलम्भ-लीलामें महाप्रभुके दो नित्य सङ्गी, श्रीगोविन्दका श्रीहरिदास ठाकुरको प्रसाद देनेके लिये जाना, श्रीठाकुरके अप्रकट कालकी अवस्था, श्रीठाकुरके साथ महाप्रभुका साक्षात्कार और श्रीठाकुरके कुशलकी जिज्ञासा, संख्या-नामकीर्तनके अभावसे जनित अपने दुःखको बतलानेपर महाप्रभुका सिद्धदेह श्रीठाकुरको साधन-अभिनय कम करनेका आदेश, महाप्रभुसे अपने अभिप्रायका ज्ञापन, महाप्रभुके द्वारा श्रीठाकुरकी वाञ्छाको पूर्ण करना, श्रीठाकुरके सामने भक्तोंके साथ महाप्रभुका महाकीर्तन प्रारम्भ, महाप्रभुका परमानन्दसे श्रीठाकुरके गुणोंका कीर्तन, अपने सामने महाप्रभुका दर्शन और महाप्रभुके नाम कीर्तनके साथ ही श्रीठाकुरका निर्याण, भीष्मकी इच्छामृत्युका स्मरण, श्रीठाकुरकी देहको गोदमें लेकर महाप्रभुका नृत्य, श्रीठाकुरको समुद्रमें लाना और समुद्रमें स्नान कराना, समुद्रका महातीर्थ हो जाना, भक्तगणोंका श्रीठाकुरके चरणामृतका पान, कीर्तनके साथ ही समाधि प्रदान करनेकी रीति, महाप्रभुका अपने श्रीहस्तसे श्रीठाकुरको समाधिस्थ करना, समाधि-पीठका निर्माण, भक्तोंके साथ कीर्तन-नृत्यके अन्तमें समुद्र स्नानके बाद समाधि-पीठकी प्रदक्षिणा करके श्रीजगन्नाथ

अध्याय–विवरण

[बायाँ स्तम्भ]

मन्दिरमें आगमन, स्वयं महाप्रभुके द्वारा प्रसादकी भिक्षा, निर्याण-महामहोत्सव, उत्सवमें जिस किसी प्रकारसे योगदान देनेवालेको 'कृष्णप्राप्ति'के वरकी प्राप्ति। श्रीहरिदासके गुणोंका वर्णन और जयगान। बारहवाँ अध्याय— 305–322 महाप्रभुके प्रेमविकार, प्रतिवर्षकी भाँति गौड़ीय भक्तोंकी सपरिवार महाप्रभुके दर्शनके लिये पुरी-यात्रा, श्रीशिवानन्द सेनका कर देनेका समाधान, महाप्रभुके मना करनेपर भी श्रीनित्यानन्दकी यात्रा, श्रीशिवानन्दके नित्यानन्द-पदाघात सौभाग्यका वर्णन, श्रीकान्तका अभिमान और सबसे पहले महाप्रभुके निकट आगमन, श्रीगोविन्दका श्रीकान्तको भगवद्विग्रहके विषयमें मर्यादा-विधिका उपदेश, अन्तर्यामी महाप्रभुका श्रीकान्तके मनोभावका ज्ञापन, श्रीकान्तका महाप्रभुसे पदाघात-संवादको गोपन रखना, पुत्रसहित श्रीशिवानन्दपर महाप्रभुकी कृपा, परमानन्द या पुरीदासका महाप्रभुके चरणोंके अँगूठेको चूसना, परमेश्वर मोदकका वृत्तान्त और उसके प्रति महाप्रभुकी कृपा, स्त्रियोंका नाम श्रवण करनेसे ही जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुका सङ्कोच-बोध, गुण्डिचा-मार्जन और रथके आगे नृत्य, भक्तोंके साथ चातुर्मास्य-यापन, भक्तके दुःखमें भगवान्का दुःख, भक्तोंको सांत्वना और विदायी-दान, श्रीनित्यानन्दको गौड़में ही रहनेका आदेश, श्रीजगदानन्दका नवद्वीपमें शचीमाताके पास गमन और महाप्रभुके द्वारा दिये गये द्रव्यादिको प्रदान करना, श्रीजगदानन्दसे शचीमाताका निमाइकी कथाका श्रवण, श्रीजगदानन्दका चन्दनादि-तेलका संग्रह, पुरीमें जाकर महाप्रभुको प्रदान करना, महाप्रभुकी तेल-व्यवहार अस्वीकारकी उक्तिसे श्रीजगदानन्दका प्रणयाभिमान-रोष, तेलपात्रका भञ्जन और उपवासादि, महाप्रभुके द्वारा श्रीजगदानन्दके कोपकी शान्ति और इस प्रसङ्गसे महाप्रभुका लोकशिक्षा दान। तेरहवाँ अध्याय— 323–348 महाप्रभुका केलेकी छालपर शयन, इससे


[दायाँ स्तम्भ]

श्रीजगदानन्दके मनमें कष्ट और तकिये एवं गद्देका निर्माण, महाप्रभुके द्वारा उसे अस्वीकार करना और श्रीस्वरूपके द्वारा केलेके छिलकेसे निर्मित शय्याको स्वीकार करना, श्रीजगदानन्दके मनमें दुःख, श्रीजगदानन्दकी वृन्दावन गमन-इच्छाका प्रकाश और महाप्रभुकी अनुमतिकी प्राप्ति, श्रीजगदानन्दको महाप्रभुके द्वारा पथके विषयमें और ऐश्वर्यज्ञानहीन रागमार्गीय भक्तसङ्गके विषयमें सतर्क करना एवं सदा श्रीसनातनके साथमें रहनेका उपदेश देना, श्रीसनातनको महाप्रभुके आगमनका संवाद बतलाने और उनके लिये भजन-स्थानके निर्वाचन करनेका आदेश, श्रीजगदानन्द पण्डितका काशीसे होकर मथुरामैं आगमन और श्रीसनातनके साथ मिलन, दोनोंका एक ही स्थानपर रहना, किन्तु पृथक् अभ्यासके कारण पृथक् भोजन ग्रहण करना, सबको मान देनेवाले श्रीसनातनके द्वारा श्रीपण्डितकी सेवा, श्रीसनातनके मस्तकपर लाल वस्त्र देखकर पहले श्रीपण्डितको सन्तोष, बादमें वस्त्र प्राप्तिका कारण जानकर श्रीसनातनके प्रति क्रोध और उन्हें मारनेकी चेष्टा, इसे देखकर श्रीसनातनका सन्तोष, रागमार्गीय परमहंसका कषाय-वस्त्र पहनना निषिद्ध, श्रीजगदानन्दकी पुरीयात्रा और महाप्रभुके लिये श्रीसनातनके द्वारा प्रदान किये गये द्रव्यादि ग्रहण, श्रीसनातनका महाप्रभुके लिये स्थान निर्वाचन और संस्कार-साधन, श्रीजगदानन्दका महाप्रभुके साथ मिलन और श्रीसनातनके द्वारा दी गयी भेंट प्रदान करना, पीलूफल भोजनलीला, देवदासीके गानके श्रवणसे महाप्रभुका आवेश और श्रीगोविन्दका महाप्रभुको सावधान करना, 'गौरनागरवाद'-निवारण, श्रीरघुनाथ भट्टगोस्वामीका वृत्तान्त, रामानन्दी सम्प्रदायके अन्तर्गत रामदास विश्वासकी कथा, श्रीभट्टके प्रति महाप्रभुकी कृपा, रामदासके प्रति महाप्रभुकी उदासीनता और उसका कारण, श्रीभट्टके प्रति महाप्रभुका आदेश, माता-पिताके धाम प्राप्ति तक श्रीभट्टको काशीमें ही रहनेका आदेश, उसके बादमें पुरी गमन और महाप्रभुके आदेशसे वृन्दावन गमन, महाप्रभुका भट्टको तुलसी माल्यादि प्रदान करना, श्रीभट्टका वृन्दावनमें

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला श्रीरूपगोस्वामीकी सभामें भागवतका पाठ एवं श्रीगोविन्ददेवका मन्दिर निर्माण आदि। चौदहवाँ अध्याय— 349-374 महाप्रभुका श्रीकृष्णविरहमें अधिरूढ़ दिव्योन्माद, महाप्रभुकी कृपाके बिना महाप्रभुके दिव्योन्मादको समझनेमें असमर्थता, श्रीस्वरूप और श्रीरघुनाथदास—इन दो प्रभुओंके कड़चा ही श्रीगौरलीला-वर्णनके मूलग्रन्थ, श्रीस्वरूप-सूत्रकर्त्ता, श्रीरघुनाथ—वृत्तिकार, (चौदहवें अध्यायसे बीसवें अध्याय तक) सर्वत्र 'गौरनागर'-वादका खण्डन, महाप्रभुका अधिरूढ़ महाभावमें दिव्योन्माद, अभ्याससे ही नित्यकृत्य- सम्पादन, उड़िया स्त्रीकी श्रीजगन्नाथ-दर्शनमें आर्त्ति, अक्षजज्ञानसे कृष्ण-सेवकको स्त्री-पुरुषादि बाह्य परिचयसे दर्शननिषेध—शिक्षादान, महाप्रभुकी अन्तर्दशा, अर्धबाह्यदशा और बाह्यदशा, दस-दशा, समस्त रात्रि जागकर महाप्रभुका उच्चःस्वरसे नामसङ्कीर्तन, तीनों द्वार बन्द, तथापि कमरेके भीतर महाप्रभुकी अप्राप्ति, महाप्रभुकी सिंहद्वारपर अचेतन अवस्थामें प्राप्ति, श्रीस्वरूपका महाप्रभुके कानोंमें कृष्णनामका उच्चारण और महाप्रभुकी बाह्यदशाका आना, महाप्रभुका गोवर्धन जानकर चटक-पर्वतकी ओर दौड़ना, श्रीगोविन्दका उनके पीछे दौड़ना, मार्गमें स्तम्भादि विकार और भूमिपर गिरना, सबके द्वारा उच्च-सङ्कीर्तन और श्रीगोविन्दके द्वारा उनपर जल छिड़कना, महाप्रभुकी अर्धबाह्यदशा, श्रीपुरी और श्रीभारतीके दर्शनसे महाप्रभुकी बाह्यदशा और श्रीरघुनाथ दास गोस्वामीका श्रीचैतन्यस्तव- कल्पवृक्ष ग्रन्थ। पन्द्रहवाँ अध्याय— 375-392 अप्राकृत कृष्णविरह-प्रेमावेशमें महाप्रभुका अचेतन होना, महाप्रभुकी अन्तर्दशा, अर्धबाह्यदशा और बाह्यदशा, स्वभाव और अभ्यासके द्वारा ही नित्य कृत्यादि, महाप्रभुका श्रीजगन्नाथमें साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दनका दर्शन, महाप्रभुकी इन्द्रियोंके द्वारा श्रीगोविन्द-सेवाकी शिक्षा, उपभोगके बाद भक्तोंका महाप्रभुको घरमें लाना और महाप्रभुका विलाप, गोपियोंके द्वारा अप्राकृत पुष्पबाणके माधुर्यबलका वर्णन, महाप्रभुका श्रीस्वरूप और श्रीरामानन्दके गलेमें हाथ डालकर विलाप, महाप्रभुका सर्वत्र कृष्णलीलाका दर्शन और उनको ढूँढ़नेकी लीला-प्रसङ्गमें पुष्पोद्यानमें कृष्ण-अन्वेषण-लीलाका वर्णन, श्रीरामानन्दका श्लोक पाठ और श्रीस्वरूपका गीत गोविन्दका गान, महाप्रभुका प्रेमावेशमें नृत्यादि। सोलहवाँ अध्याय— 393-418 गौड़ीय भक्तोंके साथ श्रीकालिदासका श्रीक्षेत्रमें आगमन, श्रीकालिदासके गुण, पूर्व-परिचय, महाप्रसादमें विश्वास और वैष्णवमें जातिबुद्धिका न होना, श्रीकालिदास और झडुठाकुरका वृत्तान्त, श्रीकालिदासका वैष्णव-माहात्म्य-सूचक श्लोकका पाठ, कृष्णभक्तकी पदवीका निर्णय, कृष्णभक्त स्वयं अमानी और सबको मान देनेवाला, झडुठाकुरके द्वारा वैष्णवोंके अनुव्रज्या (पीछे जानेका) शिक्षादान, श्रीकालिदासके द्वारा छिपकर झडुठाकुरकी पदधूलिको ग्रहण करना और उच्छिष्टका सम्मान, श्रीकालिदासका गौड़देशके सभी वैष्णवोंके उच्छिष्टका सम्मान, श्रीकालिदासके प्रति महाप्रभुकी निष्कपट महाकृपा, लोकशिक्षक आचार्यरूपी श्रीमहाप्रभुकी कठोरता, अन्तरङ्ग भक्तोंके अतिरिक्त अन्योंका महाप्रभुके चरणामृतमें अनाधिकार, श्रीकालिदासका महाप्रभुके चरणामृतका पान, महाप्रभुका श्रीनृसिंह-प्रणाम, श्रीकालिदासको महाप्रभुकी इच्छासे श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुका उच्छिष्ट-दान, वैष्णव-प्रसादसे ही कृष्णकृपाकी प्राप्ति, श्रीकृष्ण-उच्छिष्ट और भक्तोंके उच्छिष्टकी संज्ञा, साधकके 'तीन साधनके बल', पत्नी और पुत्रके साथ श्रीशिवानन्दका महाप्रभुका दर्शन करना, पुरीदासका मौन रहना और श्रीस्वरूपके द्वारा उसके तात्पर्यकी व्याख्या, सात वर्षके शिशु पुरीदासके द्वारा श्लोक-रचना, चातुर्मासके अन्तमें भक्तोंका गौड़में जाना और श्रीमहाप्रभुका दिव्योन्माद, द्वारपालको श्रीकृष्णके दर्शन करानेके लिये अनुरोध, द्वारपालका महाप्रभुका हाथ पकड़कर श्रीजगन्नाथके सामने लाना और महाप्रभुका श्यामसुन्दर दर्शन, गोपालवल्लभ-भोग,

अध्याय-विवरण महाप्रभुका महाप्रसाद ग्रहण और सात्त्विक-विकार, किन्तु ऐश्वर्यमिश्रित श्रीजगन्नाथके सेवकोंके दर्शनसे उसका सङ्कोपन, महाप्रभुका फेलामृत-माहात्म्य और चिद्बलका वर्णन एवं सभीको अप्राकृत श्रद्धाके साथ प्रसादका सम्मान करनेका आदेश, श्रीरामानन्दका महाप्रभुकी आज्ञासे श्लोकका पाठ, महाप्रभुकी उत्कण्ठा और श्रीकृष्णाधरामृतके चिद्बल एवं परम महिमाका कीर्तन, महाप्रभुका गोपीभावमें श्रीकृष्ण-प्रेमोन्माद। सतरहवाँ अध्याय— 419-430 महाप्रभुका उन्माद और प्रलाप, महाप्रभुके नित्यसङ्गी श्रीस्वरूपका गान और श्रीरामानन्दका श्लोक पाठ, बीच-बीचमें स्वयं श्रीमहाप्रभुका श्लोक पाठ, महाप्रभुका उच्चनाम-सङ्कीर्तन, महाप्रभुका दिव्योन्माद, बन्द द्वार कमरेके मध्यसे ही महाप्रभुकी वहाँ अप्राप्ति, सभीके द्वारा महाप्रभुको ढूँढ़ना और तैलङ्गी गायोंके बीचमें महाप्रभुकी प्राप्ति, महाप्रभुकी कूर्माकार अवस्था, उच्च सङ्कीर्तनसे महाप्रभुका चेतन और अर्धबाह्य-दशामें आगमन, श्रीस्वरूपको महाप्रभुका अपनी अवस्थाका वर्णन, महाप्रभुके आदेशसे श्रीस्वरूपका श्लोक-पाठ और महाप्रभुका श्लोकके अर्थका वर्णन, भावशाबल्य, पिङ्गलाके वचनकी स्मृति, शाखा-चन्द्र-न्याय, महाप्रभुके दिव्योन्मादादि महाभाव— मर्त्यबुद्धिसे अगोचर, श्रीचैतन्यभजनसे ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति। अठारहवाँ अध्याय— 431-448 शारदीय ज्योत्स्ना रात्रिमें महाप्रभुका रासलीलाका उद्दीपन, समस्त रासपञ्चाध्यायका पाठ और व्याख्यामें महाप्रभुको एक साथ हर्ष और विषाद, भक्तप्रेमनिर्धारण और आस्वादन-परिमाणके लिये श्रीकृष्णका भक्तभाव स्वीकार, श्रीकृष्णप्रेमका अद्भुत विक्रम, चित्-परमाणुकण जीवका अप्राकृत श्रीकृष्णप्रेमसिन्धुके बिन्दुमात्र स्पर्शमें ही अधिकार, श्रीस्वरूप-रामानन्दादि कृष्ण-शक्तिवर्गका ही महाप्रभुके भावोंकी अनुभूतिमें अधिकार, गोपियोंके साथ श्रीकृष्णकी जलकेलि-श्लोकपाठ और महाप्रभुकी मूर्च्छा, यमुना जानकर समुद्रमें महाप्रभुका कूदना और मूर्च्छा, मूर्च्छित अवस्थामें ही तैरते हुए कोणार्ककी ओर गमन, भक्तोंका उनको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते समुद्रके तटपर गमन और महाप्रभुके न मिलनेसे उनके अन्तर्धान होनेका अनुमान, प्रियके हृदयमें प्रियके अदर्शनसे अमङ्गलकी आशङ्का, मछुआरेके साथ साक्षात्कार और मछुआरेके वाक्यसे महाप्रभुके सन्धान-प्राप्ति विषयमें श्रीस्वरूपका यथार्थ अनुमान, श्रीनृसिंहके स्मरणसे समस्त विपद्-विनाश, मछुआरेके साथ भक्तोंका महाप्रभुके निकट गमन और उन्हें चेतन करनेके लिये महाप्रभुकी सेवा, सभीके द्वारा उच्च सङ्कीर्तन और महाप्रभुका अर्धबाह्यदशामें आगमन, महाप्रभुकी तीन दशाओंका परिचय, अर्धबाह्यदशामें महाप्रभुका चित्रजल्प, अर्धबाह्यसे महाप्रभुका बाह्यदशामें आगमन एवं श्रीस्वरूपादिके निकट अपने वृत्तान्तका वर्णन। उन्नीसवाँ अध्याय— 449-474 महाप्रभुका दिव्योन्माद, अपनी वात्सल्य-उक्तिके ज्ञापनके लिये महाप्रभुका श्रीजगदानन्दको नवद्वीपमें भेजना, श्रीपरमानन्दपुरीके अनुरोधसे श्रीशचीदेवीके निकट वस्त्र और प्रसाद भेजना, अप्राकृत वात्सल्यप्रेमके वशमें भगवान्, श्रीजगदानन्दका नवद्वीपमें आगमन और श्रीशचीदेवीको महाप्रभुके सन्देशका ज्ञापन, श्रीपण्डितका नवद्वीपमें और शान्तिपुरमें अवस्थान करनेके बाद विदा लेनेकी याचना, श्रीअद्वैताचार्यका श्रीपण्डितके द्वारा महाप्रभुके पास एक पहेली भेजना, श्रीपण्डितका पुरीमें जाकर महाप्रभुको पहेली-ज्ञापन और महाप्रभुका थोड़ासा मुस्कुरानेके बाद मौनका अवलम्बन, श्रीस्वरूपके अनुरोधसे महाप्रभुके द्वारा पहेलीकी व्याख्याका सङ्केत, महायोगेश्वर श्रीअद्वैत प्रभु, भक्तोंका विस्मय और श्रीस्वरूपको उद्वेग, महाप्रभुकी कृष्णविरह-दशाकी वृद्धि, उद्घूर्णा और प्रलाप, महाप्रभुका नामकीर्तनमें रात्रि व्यतीत करना, महाप्रभुका दीवारोंसे मुख-घर्षणरूपी दिव्योन्माद, श्रीस्वरूपका महाप्रभुके चरणोंके

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला तकियेके रूपमें श्रीशङ्कर पण्डितको चुनना, श्रीविदुरके समान श्रीशङ्करकी सेवाका सादृश्य, श्रीशङ्करकी महाप्रभुकी सेवा, महाप्रभुका जगन्नाथवल्लभ-उद्यानमें गमन और अन्तर्दशामें कृष्ण-अन्वेषणकी लीला, श्रीस्वरूप और श्रीरायकी चेष्टासे महाप्रभुकी बाह्यदशा, भ्रमरगीतमें श्रीराधाके प्रलाप एवं महिषीगीतमें दस प्रकारकी चित्रजल्पोक्ति। बीसवाँ अध्याय— 475-504 पुरीमें निरन्तर विप्रलम्भ भावमें व्याकुल महाप्रभु, परमप्रेष्ठ अन्तरङ्ग दो नित्यसङ्गी, महाप्रभुमें आठ सात्त्विक और तैंतीस व्यभिचारी भावोंका उदय, स्वयं और दोनों भक्तोंके साथ उन-उन भावोद्दीपक श्लोकोंका पाठ एवं श्रवण, महाप्रभुका श्रीनामकीर्तन-माहात्म्यका वर्णन, कृष्णकीर्तनकारी ही एकमात्र सुबुद्धिमान्, नामाभास एवं शुद्धनामका फल—अनर्थ-निवृत्ति और कृष्णप्रेमोदय, महाप्रभुके मुखसे निःसृत शिक्षाष्टक और उसकी व्याख्या, कोढ़ग्रस्त ब्राह्मणकी पत्नीके पातिव्रत्य-धर्मका वर्णन, महाप्रभु स्वयं ही शिक्षाष्टकके आस्वादक और स्वयं ही उसके प्रचारक, श्रीशिक्षाष्टक श्रवण-कीर्तनसे निश्चय ही श्रीकृष्णप्रेम-प्राप्ति, अन्तिम बारह वर्षोंमें अन्त्यलीलामें निरन्तर कृष्णप्रेमास्वादन, ग्रन्थका आकार बढ़नेके भयसे ग्रन्थकारका महाप्रभुकी प्रेमचेष्टा-वर्णनको विराम। ग्रन्थकारका ठाकुर वृन्दावनके माहात्म्यका वर्णन एवं नाना प्रकारसे अपने दैन्यका ज्ञापन, ग्रन्थकारके उपास्य विग्रहगण और श्रीमदनमोहनकी कृपा प्राप्तिरूपी सुसौभाग्यका ज्ञापन, भागवतमें व्यासदेवकी रीतिके अनुसार अन्त्यलीलाके अध्यायोंकी संक्षेपमें पुनरावृत्ति, अनुवाद (संक्षिप्त वर्णन), पुनः आलोचन या पुनरावृत्ति फलसे ही लीलास्मरणोदय, गौड़ियोंके नाथ एवं ग्रन्थकारके द्वारा श्रीहरि-गुरु-वैष्णवोंकी चरण-वन्दना करते हुए ग्रन्थकी समाप्ति और ग्रन्थसमाप्तिके कालका निर्देश।