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सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

सुगम चिकित्सा

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वसन्त ऋतु में आस्मान साफ रहता है। ढाक, कमल, मौलसिरी और आम फूलते हैं। बन-जङ्गल की शोभा बढ़ती है, ठण्डी-मन्द हवा चलती है वृक्षों में नये पत्ते और कोपल फूलते हैं।

वसन्त

वसन्त-ऋतु में सर्दी का इकट्ठा हुआ कफ पाचन-शक्ति को मन्द करता है इससे इस मौसम में कफकारी चीज नहीं खानी चाहिए। हल्का-रूखा, कडुची, कसैली और नमकीन चीज खानी चाहिए। पोशाक और बिछोना हल्का होना चाहिए। दिन में नहीं सोना चाहिए। सूख कसरत करना, धूम्रना, तैरना, गेहूँ, चावल, मूँग, जो, चना ज्यादा खाना चाहिए।

ग्रीष्म में सूरज की किरणें तेज होती हैं। धूप तेज पड़ती है। नैऋत्य कोण की भूलसाने वाली हवा चलती है। पानी सूख जाता है। वनस्पति मुर्छा जाती है। इस ऋतु में मीठी,

ग्रीष्म

चिकनी, ठण्डी चीजें—शर्बत, छाछ, दूध-लस्सी, दाल-भात, तरकारी खाना, छत पर सोना, दोनों समय स्नान करके सक्रेद कपड़े पहनना और धूप से बचना चाहिए।

वर्षा में बारिश होती है। नदियाँ जल से भर जाती हैं। धरती हरी-भरी हो जाती है। पुरवा हवा चलती है। इस ऋतु में हाजमा कम होजाता है। हल्की और जल्दी हजम होने

वर्षा

वाली चीजें सेवन करना चाहिए। थोड़ा सिरके का सेवन अच्छा है। नींबू चूसना भी फायदेमन्द है। इस मौसम में सब मौसम आ जाती हैं। कभी गर्मी, कभी सर्दी, कभी वर्षा। इसलिए पहचियात रखनी चाहिए। पानी छानकर पीना, बदन को

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ऋतु-चर्या

भीगने से बचना जरूरी है। घर के चारों ओर घास-फूस न इकट्ठी होने देना चाहिए, न सील होने देना चाहिए। हवादार छप्पर या वरांडे में सोना, मच्छरों से बचना और मच्छरदानी काम में लाना बहुत जरूरी है। नीम की लकड़ी के घुएँ से मच्छर भागते हैं। दही-छाछ, उर्दू की दाल, नदी स्नान, वारिश में भीगना त्याग देना चाहिए।

शरद ऋतु में पित्त का कोप होता है। इसलिए मौसमी बुखार आता है। घी के बने भोजन, गेहूँ, जो, चना, मूँग, चावल आदि शरद पदार्थ खाने चाहिए। यह मौसम जुलाब के लिए अच्छा है। ज्यादा मिहनत न करे, गरम चटपटे पदार्थ न खाय, दिन में न सोवे, सर्दी और धूप से बचे।

हेमन्त में उत्तरी हवा चलती है। यह ऋतु ठण्डी और बलकारी है। खट्टे-मीठे, नमकीन पदार्थ खाय। तेल हेमन्त मालिश करे। गेहूँ, उर्दू, बाजरा, तिल, ईख का गर्म रस, सेवन करे। गर्म कपड़े पहने। शिशिर में भी हेमन्त की भांति रहे।

जो आदमी तन्दुरुस्त रहना चाहता है उसे चाहिए कि रोज के काम-काज, खान-पान, रहन-सहन ऋतु और अपनी शक्ति के अनुसार रखे। मन, बचन, कर्म से पवित्र रहे। ईश्वर से डरता रहे। दीन दुखियों पर दया रखे। पड़ोसियों और सम्बन्धियों से प्रेम रखे। सत्य व्यवहार करे। काम, क्रोध, लोभ, मोह से दूर रहे। मन और इन्द्रियों को वश में रखे। क्रोध न करे। झोटों का अपराध चूमा करे। मेहमानों की खातिर करे। मीठा बोले। पराई खी और

भुगम चिकित्सा

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पराये धन पर दुरी नजर न डाले । पाप से बचे । खराब खवारी, दरखत, पहाड़ पर फजूल न चढ़े । विना बात हंसना, छींकना, नाक में उझली देना, व्यादा चक्कावास करना, दाँत कटकड़ाना, नाखूत घिसना छोड़ दे । सुने घर में अकेला न रहे, जङ्गल में न घूमें, मल-मूत्र, छींक, डकार के वेग को न रोके, अपरिचित स्थान में न जाय । इन नियमों के पालन करने से मनुष्य नीरोग रहकर बड़ी उम्र पाता है । बीमार होने पर रोग को मामूली न समझे, तुरन्त उसका बन्दोबस्त करे । रोग होने पर डरे नहीं, घर में रोगी हो तो उसे तसल्ली दे और अच्छे वैद्य का इलाज कराये । रोगी के पास विश्वासी, प्रेमी आदमी रहे । भीड़-भाड़ न रहे । रोगी का घर सूखा, हवादार हो, उसके कपड़े साफ और आरामदेह हों । जैसे डाक्टर बतावें उसी भांति दवा-पानी का बन्दोबस्त करे । इस तरह करने से असाध्य रोगी भी अच्छा हो जाता है ।

: ५ :

तत्त्व की बातें

श्रुति—सत्त्व-रज-तम इनकी साम्यावस्था को प्रकृति कहते हैं।

पंचमहाभूत—पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, ये पञ्च महाभूत कहाते हैं।

इन्द्रियार्थ—गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द, ये ५ क्रम से इन्द्रियार्थ हैं।

ज्ञानेन्द्रिय—आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, ये ५ ज्ञानेन्द्रिय हैं।

कर्मेन्द्रिय—हाथ, पैर, मुख, उपस्थ और वागेन्द्रिय, ये पाँच कर्मेन्द्रिय हैं।

उभयेन्द्रिय—मन उभयेन्द्रिय है।

चौबीस तत्त्व—५ महाभूत, ५ इन्द्रियार्थ, ५ ज्ञानेन्द्रिय, ५ कर्मेन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार और जीवात्मा इनको चौबीस तत्त्व कहते हैं।

जीव—गर्भाशय में गया रज-वीर्य जीव कहाता है।

गर्भ—जीव, प्रकृति और २४ तत्त्व मिलकर गर्भ कहाता है।

सुगम चिकित्सा

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शरीर—सात धातु, आशय, भ्रमनी, सिरापेशी, कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय सब मिलकर शरीर कहाता है।

पुरुष—शरीर, मन और आत्मा के समवाय सम्बन्ध को पुरुष कहते हैं।

वात, पित्त, कफ, तीन दोष हैं। देह को दूषित करने के कारण इन्हें दोष कहते हैं। वात, खुरक, हल्दी, चंचल और नेता है,

पित्त गर्म, द्रव और तेज है, कफ ठण्डा चिकना और भारी है। तीनों दोष सारे शरीर में रहते हैं।

वात ५ प्रकार का है—१— उदान वायु कण्ठ में रहता है। बोलना, हँसना इसीसे होता है, इसमें खराबी होने पर हँसकी से ऊपर के रोग होते हैं। २— प्राणवायु हृदय में रहता है, यह मूह में जाता है, अन्न को यही ले जाता है, इसमें खराबी आने से हिचकी और दम की बीमारी होती है। ३— समानवायु भेद में रहता है, यह खुराक को पचाकर मल-मूत्र को अलग करता है। इसमें खराबी आने से मन्दाग्नि और अतिसार वायगोला आदि बीमारी होती हैं। ४— छ्पान वायु आँतों में रहता है; यही दस्त, पेशाब, वीर्य और गर्भ को बाहर निकालता है। ५— व्यानवायु तमाम शरीर में रहता है। इसीसे खून शरीर में दौरा करता है और यही पसीना निकालता है। इसी प्रकार पित्त भी पाँच प्रकार का होता है। पाचक पित्त भेद में रहकर खाना हजम करता है। रंजक जिगर में रहकर खून को शुद्ध करता है। साधक हृदय में रहकर बुद्धि और स्मृति को ठीक रखता है। आलेखक आँखों में रहकर रूप दिखाता है। आजक

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तत्व की वाते

चमड़ी में रहकर लेप को सुखाता है। कफ भी पाँच प्रकार का है। क्लेदन कफ आमाशय में रहकर अन्न को नर्म करता है। अवलम्बन हृदय को ठीक रखता है और सिर के वीभ को धारण करता है। रसन जीभ में रहकर स्वाद लेता है, स्नहन इन्द्रियों को पुष्ट करता है। विश्लेषण जोड़ों को ठीक रखता है।

धातु सात हैं। रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और वीर्य। रस का काम प्राणों को धारण करना, रक्त का जीवन धारण करना, धातु मांस का शरीर को पुष्ट रखना, मेद का शरीर को चिकना रखना, हड्डी का शरीर को खड़ा रखना, मज्जा का पूर्ण करना और वीर्य का गर्भ उत्पादन करना है।

शरीर में आठ अंग हैं। सिर, गर्दन, दोनों हाथ, छाती, पेट, दोनों कोख, पाठ और पैर। सिर में सुषुम्ना, चेष्टा- बहा और संज्ञावहा नाडियाँ, ललाट, भेजा, अंग भौं, दोनों आँखें, कनपटी, दो कान; नाक, हाँठ, गाल, दाँत, मसूड़े, जीभ, ठोड़ी और मुँह हैं। छाती में फेफड़े, हृदय, स्वास नाली, पेट और पीठ में तिल्ली, जिगर, गुर्दे और आँतें हैं।

चमड़ी सारे शरीर पर लिपटी हुई है। इसीमें छूने की शक्ति है, चमड़ी पसीना निकालने के छेद इसीमें हैं। यह दो प्रकार की है। भीतरी और बाहरी। बाहरी बहुत पतली है, गौरा-काला रङ्ग इसीमें है। जलने से फफोला इसीमें पड़ता है। भीतरी चमड़ी में ६ पतें हैं। यह मोटी है। छूने की शक्ति इसीमें है।

सुगम चिकित्सा

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रक्त जीवन का साधन है। शरीर को जीवित और चैतन्य रखता है। हृदय में इसका भण्डार है। शरीर में घूमने से वह

गन्दा होकर नीले रङ्ग का होजाता है। वह रक्त नालियों में होकर हृदय में आता है। वहाँ से

फेफड़ों में जाता है। वहाँ साँस के साथ गई हवा गन्द्गी चूस लेती है, जिससे खून साफ होजाता है और फिर लाल होकर शरीर में लौट जाता है।

छाती में बाईं ओर सातवीं पसली के नीचे हृदय है। यह माँस का बना होता है। इसमें चार कोठरी हैं। सूत में बन्द कमल के फूल के

समान उल्टा धरा है। थड्कन के साथ खुलता और हृदय बन्द होता है। इसकी लम्बाई ४ इञ्च, चौड़ाई ३। इञ्च,

मोटाई २। इञ्च है। जवान आदमी का हृदय चार से छः छटाँक तक वजनी होता है, बूढ़ी में वजन कम होजाता है। १०—१५ तोला खून हर वक्त हृदय में बना रहता है। जितनी बार हृदय थड्कता है उतनी ही बार नाड़ी चलती है।

फेफड़े साँस लेने के काम में आते हैं। ये स्पंज की तरह छेद वाले हैं। छाती के दोनों ओर दो होते हैं। इनके बीच में हृदय

फेफड़े है। इनकी शकल सूँड के आकार की है।

वजन अन्दाज़न १। सेर होता है। दाहिना कम लम्बा पर, वजनी होता है। स्त्रियों का फेफड़ा पुरुषों से हल्का होता है।

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तत्व की यातें

सूँह और गले में दो नालियाँ हैं। एक आगे एक पीछे। आगे साँस-नाली और पीछे आहार-नाली है। साँस-नाली का मुँह पर एक ढकना है, नाक का छेद भी यहाँ तक है। खाने-पीने की जरा-सी चीज भी इसमें जाने से फन्दा लग जाता है। साँस-नाली ४-५॥ इक्ष लम्बी नर्म हड्डियों के छल्ले से बनी है। नीचे जाकर इसकी शाखायें सारे फेफड़े में फैल गई हैं। यह एक इक्ष मोटी है।

आँत दो प्रकार की हैं; एक छोटी दूसरी बड़ी। छोटी आँत का सूँह मंदे से मिला है। यह कोई २० फीट लम्बी है, इसका दूसरा सिरा बड़ी आँत से मिला है। बड़ी आँत ४ से ६ फीट लम्बी है। इसका दूसरा सिरा गुदा तक जाता है। इसीमें होकर मल निकलता है।

पेट में दाहिनी ओर ज़िगर है। इसके दो हिस्से हैं और १०-१२. इक्ष चौड़ा है। वजन ११-२ सेर होता है। इसके नीचे पित्तकोष है जो अमरूद के फल के समान है।

पेट में चाँई और पसलियों के नीचे तिल्ली है। यह ५ इक्ष लम्बी २ इक्ष चौड़ी और ११ इक्ष मोटी होती है। इसका वजन १५ से २१ तोला तक है। इसका काम खून को रंगना है।

गुदे पीठ के वांस के दोनों ओर हैं। बड़े सेम के बीज के आकार के हैं। लम्बाई ४ इक्ष, चौड़ाई २॥ इक्ष, मोटाई १। इक्ष

सुगम चिकित्सा

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गुर्दे हैं। वजन ११-१२ तोला तथा रंग गुलाबी है। इनका काम पेशाब बनाना है। तन्दुरुस्त गुर्दे दिन-रात में ११ सेर के क्रीव पेशाब बनाते हैं।

मसाना नाभी से नीचे है। इसीमें गुर्दे से पेशाब बनकर आता है। यह एक प्रकार की थैली है, जब भर मसाना जाती है तब पेशाब निकल जाता है।

गर्भाशय—(स्त्रियों के) गर्भाशय दाहिनी तरफ कोख में कलश के आकार का होता है।

मस्तक अस्त्ररोट के गूदे के समान ११ सेर वजन का है। खोपड़ी में रखा है। ज्ञान और चैष्टावहा नाड़ियों मस्तक इसीमें मिली हैं। स्त्री का मस्तक कुछ हलका होता है।

मस्तिष्क की बनावट

१. बृहन् मस्तिष्क २. लघु मस्तिष्क ५. प्राचीन मस्तिष्क या सेतु ४. सुप्पुन्ना नाड़ी (Spinal cord) ३. कशेरुकायें (Vertebrae)

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:६:

रोगी-परीक्षा

रोगी और रोग की परीक्षा करके तब इलाज करना चाहिए। ठीक-ठीक रोग की परीक्षा न होगी तो उसका इलाज भी न हो सकेगा। रोग की परीक्षा के तीन तरीके हैं। कुछ बातें वैद्यक विधि से जानी जाती हैं, कुछ अपने तजुर्वे से और कुछ रोगी को देखने से। बीमार की सूत्र और बातचीत से बहुत-सी बातों का अन्दाजा लगाया जा सकता है। उसे देखकर उसकी ताकत, उम्र और कितना पुराना बीमार है तथा कैसी तबीयत का और कैसी हैसियत का है, ये सब बातें जानी जा सकती हैं। नब्ज देखने और खून, पेशाब, जीभ, दस्त आदि के देखने से बहुत-सी बातें मालूम होजाती हैं।

हाथ के पहुँचे और अंगूठे की जड़ में एक गाँठ है, उसे दवाने से नब्ज देखी जाती है। नब्ज देखने में पुरुष का दाहिना और स्त्री का बाँया हाथ लेना चाहिए। खास-खास नब्ज देखना सौकों पर दोनों पैर, गले और मूत्रेन्द्रिय की भी नाड़ी देखी जाती है। इसकी जरूरत तब पड़ती है जब रोगी को चलाचली हो और हाथ की नब्ज का पता न चले। नब्ज देखने की

सुगम चिकित्सा

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रीति यह है कि नब्ज पर बहुत हल्के ढक्क से अपने दाहिने हाथ की तीनों वीच की उँगलियाँ बराबर-बराबर धरो और बायें हाथ से बीमार का हाथ कोहनी पर से जरा टेढ़ा कर दो और ध्यान से देखो कि किस उँगली के नीचे नब्ज साफ-साफ मालूम पड़ती है। अगर झँगूठे के पासवाली उँगली के नीचे है तो वायु की, वीच की उँगली के नीचे पित्त की और तीसरी उँगली के नीचे कफ की है। तेल मालिश करने के बाद, सोते हुए रोगी की, या खाना खाने के बाद या भूखे-प्यासे रोगी की नब्ज नहीं देखनी चाहिए। तन्दुरुस्त आदमी की नब्ज केँचुए की तरह धीरे-धीरे एक-सी चाल से चलती है। वायु का जोर होने पर साँप की तरह लहराती हुई, पित्त की नब्ज मेंढक की तरह फुदकती हुई और कफ की नब्ज मोर या कबूतर की तरह रुक-रुककर चलती है। सन्निपात की हालत में गड़बड़ नब्ज चलती है और मृत्यु के समय कुछ देर चलकर फिर रुक जाती है, जिसकी नब्ज इस तरह चलते-चलते वीच में रुक-रुक जाय और कहीं बदन पर सूजन न हो तो समझना कि ८-७ दिन में रोगी मर जायगा। जिसकी नब्ज झँगूठे की जड़ से आध झंगुल खसक जाय, उसकी मौत ३ दिन में होगी। जिसकी नब्ज सिर्फ झँगूठे की पासवाली उँगली के नीचे ही मालूम हो वह ४ दिन जियेगा, जिसका बदन बहुत गर्म और नाड़ी बहुत ठण्डी हो वह ३ दिन जियेगा। जिसकी नब्ज भौरि की तरह चक्कर खाकर गायब हो जाय, वह १ दिन जियेगा। जिसकी नब्ज सिर्फ झँगूठे के पासवाली उँगली के नीचे बिजली के समान भटका देकर गायब हो जाय, वह उसी दिन मरेगा। ऐसे रोगी की

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भारी । सन्निपात में टेढ़ी फटी हुई, भीतर धँसी हुई, या अथखुली । वायु से फटी और रुखी, पिस्त से लाल या आँखव जीभ काली, क्रक से सफेद, कफ से लिपी हुई-सी । सन्निपात में जली हुई-सी । जीभपेट की खराबी और कृच्छ्र में मैली और नीरस । साँस में बदबू । आँतों में आँव रक्त से जीभ, होठ और मुँह में झाले । जिगर की बीमारी में जीभ में घाव रहते हैं । रोगी के मुँह का स्वाद वायु से नमकीन, पिस्त से कड़ू आ, क्रक से मीठा, सन्निपात में जड़ होता है ।

जिसकी भाँहे नीचे को मुक्त जाँच या ऊपर चढ़ जाँच उसकी मृत्यु निकट है । जिसका स्वभाव एकाएक बदल जाय, आँखें घूमे, मस्तक और गर्दन गिर जाय, बोली बदल जाय, मृत्यु लक्षण सिर से सूखे गोबर की तरह चूरा गिरे, सुबह के बक्त ललाट में पसीना आवे, नाक का छेद लाल हो जाय, या फुन्सी दिखाई दे, शरीर या मुँह का आधा रंग बदल जाय, बीमार के दोनों होठ पके जामन की तरह काला हो जाय, या दाँत काले हो जाँच, जीभ फूल जाय या काली हो जाय, आँखें फटी की फटी रह जाँच, सिर के बाल और भौं एकाएक कँधी से घाने की तरह मालूम हों, तेल न लगाने पर भी चिकनाई मालूम हो, पलकों के बाल भड़ जाँच, नाक टेढ़ी हो जाय, नाक का छेद बड़ा हो जाय, हाथ पैर और साँस ठण्डी हो जाय, जो मुँह फैलाकर साँस ले, या दूटी साँस ले, जो बात कहते-कहते बेहोश हो जाय और चित्त सोकर दोनों पैर इधर-उधर पटकें, तो उसकी मौत पास ही जानना ।

: ७ :

रोगी की टहल

याद रखने की बात यह है कि रोगी को आराम करने के लिए सिर्फ दवा ही काफी नहीं है, बल्कि उसकी सेवा-टहल सबसे बड़ी

चीज है। अगर शुरू ही में रोगी को पूरा आराम,

रोगी की टहल

अच्छी टहल और परहेज का खाना मिले तो

रोग चाहे भी जैसा भयानक हो रोगी के चंगा हो जाने की पूरी-पूरी आशा रहती है। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि जबतक रोगी बिल्कुल लाचार नहीं हो जाता वह न तो आराम करता है और न खाने-पोने ही का खयाल रखता है। जब रोग बढ़ जाता है तब यह कार्यवाही की जाती है, ऐसी हालत में उसको अधिक लाभ नहीं होता। रोगी को जल्द आराम होने के लिए नीचे लिखी बातों की सख्त जरूरत है।

१—रोगी को बिछौने पर चुपचाप लिटाये रहो और पूरा आराम करने दो।

२—ताजा हल्का और परहेज का खाना खाने को दो।

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३—कालतु मुलाकतियों को रोगी के पास मत आने दो।

४—अच्छे वैद्य-डाक्टर से इलाज कराओ।

५—जबतक पूरा आराम न हो जाय परहेज और आराम का पूरा ध्यान रखो।

६—रोगी को साफ हवादार कमरे में रखो और किसीको वहाँ हुक्का-बीड़ी मत पीने दो और न वहाँ भीड़ रहने दो।

७—रोगी को भरपूर नींद सोने दो।

दहल करनेवाला ऐसा आदमी होना चाहिए कि जो समझदार, धीरजवान और फुर्तिला हो। बीमार अक्सर चिड़चिड़ा होजाता है और अकारण ही बक-भक किया करता है।

दहल करनेवाला

जबतक सेवा करनेवाला रोगी से प्रेम न करेगा, वह उसकी बकभक सहन न करेगा और न उसकी गन्दगी साफ करेगा रोगी को आराम नहीं पहुँचा सकता। उसे डाक्टर-वैद्य की बताई हुई बातों का भी पूरा ध्यान रहना चाहिए जिससे वह पूरी तौर-पर उनका रोगी से पालन करा सके, तथा निरालस्य होकर रात-दिन रोगी की देख-भाल कर सके।

जिस कमरे या कोठरी में मरीज रखा जाय वह बिल्कुल खाली और साफ हो, उसमें सटर-पटर कोई सामान न हो। उसमें

कमरा

सिवा दहल करनेवाले के कोई न आवे, न सोवे।

उसमें हवा और उजाले की काफी गुंजाइश

रहनी चाहिए। पर हवा का मोका मरीज को न लगे यह ध्यान रहे।

छूत के मरीज को बिल्कुल दूर रखना चाहिए।

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रोगी की टहल

बहुत लोग समझते हैं कि बीमार को नहलाना न चाहिए। पर याद रखो कि तन्दुरुस्त आदमी की बनिस्वत रोगी को नहलाने की ज्यादा जरूरत है क्योंकि उसके शरीर से स्नान पसीने के रूप में ज्यादा जहर निकलते रहते हैं और चमड़ी साफ न रहने से नये रोगों को पैदा कर देते हैं। कमजोर रोगी को स्पंज-स्नान कराना चाहिए जिसकी विधि हमने अन्यत्र लिख दी है।

हमने अन्यत्र थर्मोमिटर देखने की रीति लिखी है। नाड़ी देखने की रीति भी लिखी है। भिन्न-भिन्न उम्र में नाड़ी बुखार देखना की गति भिन्न होती है वह भी हमने पीछे लिख दिया है। इस बात का बारीकी से खयाल रखा जाय।

बीमार का साँस भी कभी-कभी देखा जाता है। इसकी रीति यह है कि एक हाथ में घड़ी लो और दूसरा रोगी की छाती पर धरो। हर बार जब साँस ले, गिनो।

तुरत के बच्चे का साँस १ मिनट में ४० बार होता है।

२ वर्ष में ..... २८ " "

४ " ..... २५ " "

१० " ..... २० " "

जवान आदमी का ..... १६-१८ बार " "

टहल करनेवाले को, खासकर छूत के बीमार की टहल करने के समय अपने हाथ और अङ्ग की सफाई का पूरा खयाल रखना चाहिए। हैजा, ताऊन, मोतीभर्रा, चेचक आदि के बीमार का

सुगम चिकित्सा

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दस्त, पेशाब उठाकर या उसे साफ करके गर्म पानी में पोटास परमैंगनेट मिलाकर उससे हाथ धोना चाहिए। आराम होने पर रोगी के कपड़े इसी दवा के पानी में उबाल डालने

सफाई

चाहिए। उनके दस्त और गंदगी को जला डालना चाहिए। साधारण रोगी के बिछौने हर २४ घण्टे बाद धूप में पड़े रहने चाहिए। नीलाथोथा भी पानी में मिलाकर सफाई के काम में लाया जा सकता है। ४ गिलास पानी में १ चम्मच नीलाथोथा काफी है। जिस घर में बीमार रह चुका हो उसे लीप-पोत कर साफ कर देना चाहिए।

भोजन—बीमार के लिए खास प्रकार का खाना बनाया जाता है।

१—थोड़ा कुटा हुआ चावल या जौ का दलिया बनाकर १० गुने पानी में पकाना चाहिए। फिर उसमें नमक या चीनी मिलाकर पीना चाहिए।

२—बहुत कमजोर मरीज को खासकर जिन्हें आँब-खून के दस्त की बीमारी हो यह उत्तम है कि थोड़ी धान की खीले गर्म-पानी से भिगोकर मसल-खान कर मिश्री या नमक मिलाकर देना चाहिए।

३—मूंग, मसूर, अरहर की दाल का शोरबा बनाना हो तो दाल को १८ गुने पानी में सिभाना चाहिए। उसमें सैन्धा-नमक और जीरा तथा हरा धनिया, पोदीना डाला जा सकता है। काली मिर्च इच्छा होने पर डाली जा सकती हैं।

४—पुराने बुखार के लिए दूध में बराबर पानी मिला २-३ सासुत

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शर्मा श्री टहल

पीपल डालकर पकाने में जब पानी जलजाय तब दूध छान कर मिश्री, चीनी मिलाकर रोगी को देना बहुत लाभकारी है।

५—कमजोर रोगी को आटे की रोटी जो जल्द हज्म हो मके, बनाने की विधि यह है कि आटा गुंदाकर एक घण्टा तक पानी में भिगो रखना—फिर नूत्र ममलकर गोला बनाना, फिर एक बरतन में पानी चुल्हे पर चढ़ाकर वह गोला १५-२० मिनट उबालकर बाहर निकाल लेंना, फिर उसकी रोटी बनाना। यह रोटी बहुत जल्द हज्म होती है।

६—मच्छी-तरकारी—जैसे लोका-धीया, तोरई, पालक, चाँलाई आदि पतली रसदार बनाना चाहिए। ज्यादा मिर्च-ममाला न डालना चाहिए।

७—मूँह का स्वाद खराब होने पर पोदीना अदरख नीबू मिलाकर चटनी बनाई जा सकती है। या अनारदाने की चटनी भी फायदा कर सकती है। ताजे नीबू में नमक, काली-मिर्च मिलाकर गर्म करके चूसना फायदा करता है। मुनक्का बीज निकाल नमक-मिर्च मिला, सूई में छेद, गर्म करके खाये जा सकते हैं।

८—फलों में सेव, संतरा, अनार भीठा बेदना, पपीता, अंगूर, मुनक्का, अंजीर, गन्ना आदि मौका देखकर डाक्टर की सलाह से दिये जा सकते हैं।