भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

तस्मात् महाकाव्येष्वस्य काव्यस्य गणनायां महाकविषु च चन्द्रशेखरमहाभागस्य गणनायां न कापि संशीतिः । महाकविरयं बङ्गदेशीयोऽपि कथं कदा वा बुन्दीराज्यमागतः कियन्तं च कालं तत्र राजकविपदमलञ्चकार इति सुस्पष्टं न प्रतीयते । सुर्जनमहाराजेनास्य सुचिरं समागम इति केवलमनुमीयते । सुर्जनमहाराजोऽन्तिमे वयसि वाराणसीमध्युवास तत्रैव च ब्रह्मसा- युज्यमापेति सुस्पष्टमैतिहासिकी घटना । रणस्तम्भपुरदुर्गमुपादाय तत्प्रतिनिध्येन उत्तरप्रदेशस्य कतिचन भागा वाराणसीचुनारप्रभृतयः सम्राजाऽकबरेण सुर्जनमहाराजाय वितीर्णा इत्यत्रैव ग्रन्थे वर्णितं ऐतिहासिकं तथ्यं च तत् । तत्प्रसंगेनैव काश्यां शासकरूपेण तस्य निवासः। वदान्यतमश्चायमस्मिन् प्रदेशे बहूनि देवमन्दिराणि सरांसि प्रासादान् घट्टांश्च निर्मापयामास यान्यद्यापि तत्र तत्रोपलभ्यन्ते । काश्यां राजमन्दिरमित्यद्यत्वे प्रख्यातो भागो बुन्दीराजमन्दिर- सत्तयैव ख्यातिमगात् तत्र च सुर्जनमहाराजस्य स्मारकमप्युपलभ्यते । तदेवं काशीमधिवसतो महाराजस्य अत्रैव बंगदेशीयेन कविनानेन समागमः संभाव्यते । अनन्तरं च बुन्दीराज्येऽपि काले काले तस्य यातायातमभूदिति तद्वर्णनालोचनेन स्फुटीभवति । अस्य च काव्यस्य गुणगणलुब्धेन मयैतत्प्रकाशनमत्यन्तं समुचितमित्युपक्रान्तम् । निवेदिता- श्चैतदर्थं श्रीमन्तः श्रीभीमसिंहवर्माणः कोटानरपतयः । तैश्चात्युदारै र्गुणग्राहिभिः पुस्तकप्रकाशा- दिव्ययः सप्रमोदं स्वीकृतः । अस्माकं पूर्वजानां राजपुरोहितपदभाजां कोटामहाराजैः साकमस्ति .चिरकालिकः सम्बन्धः । मत्पितृचरणा अद्यापि कोटानगरमेवाधिवसन्ति राजपुरोहितपदमलं- कुर्वन्ति च तेषामाज्ञयैवाहं पुस्तकस्यास्य प्रकाशने संप्रवृत्तः । तद्ग्रन्थोऽयं सहृदयान् सेवितुं यदुपतिष्ठति सोऽयं वर्तमानकोटानरेशस्यैव प्रसादः । गुणग्राहिणो महाराजस्य प्रातिस्विका- मात्याः श्रीदलेलसिंहमहाभागाश्चाप्यत्र धन्यवादाः यैः प्रसङ्गोऽयं महाराजसविधे समु- पनीतः प्रोत्साहिताश्चैतदर्थं महाराजाः । संस्कृतभाषानभिज्ञा अपि काव्यस्यास्य कल्पनादिरासास्वादान् माभूवन् वञ्चिता इति हिन्दीभाषानुवादोऽपि मयाऽत्र निवेशितः । स्थाने स्थाने च तत्तत्तच्चमत्कृतिस्पष्टीकरणाय काठिन्यनिवृत्तये च संस्कृतेऽपि संक्षिप्तं टिप्पणं निवेशितम् । आदर्शपुस्तकमेकमेव मया प्राप्तमि- त्युक्तं प्राक् । ततश्च यत्र यत्र लेखकत्रुटिस्तत्र तत् संशोधनस्य नासीत् कश्चिदुपाय इति स्वमनीष- यैव क्वचित् क्वचित् पाठभेदा ऊहिताः । त एव चात्र निवेशिताः । मानवसुलभाज्ञानवशात् यदि भवेत् काचित् तत्र त्रुटिस्तर्हि तदर्थमहमेवापराध्यामि ।. अस्मिन् पाठसंशोधनटिप्पणादि- कार्ये महामहोपाध्यायवाचस्पतिश्रीगिरिधरशर्मचतुर्वेदमहाभागैः सर्वतन्त्रस्वतन्त्रकविताकिकचक्र- वर्तिश्रीमहादेवपाण्डेयमहाभागैश्च सुबहुसाहाय्यमाचरितमिति तयोर्नितरामुपकारभारं वहामि । तयोराशिषैव च ग्रन्थस्यास्यैतावत् सुन्दरं शुद्धं प्रकाशनं सम्पन्नम् । महाकाव्यस्यालोचनेन सहृदया यदि लोकोत्तराह्लादं प्रसादञ्चाधिगच्छेयुः संस्कृतछात्राश्च वर्णनशैल्याऽस्य कृतोपकारा भवेयुस्तर्हि परिश्रमं स्वीयं सफलमाकलयिष्यामीति । हिन्दू विश्वविद्यालयः काशी चन्द्रधरशर्मा

भूमिका

प्रस्तुत 'सुर्जनचरितमहाकाव्य' सोलहवीं शताब्दी के बूँदी-नरेश राव सुर्जन पर लिखा गया है। इस महाकाव्य की अमुद्रित आदर्शपुस्तक मुझे सौभाग्य से अपने पूज्य पितामह द्वारा सञ्चित अपने ही पुस्तकालय में मिली। आदर्शपुस्तक की लिपि भी मेरे दिवङ्गत पूज्य पितामह सर्व- तन्त्रस्वतन्त्र पदवाक्यप्रमाणपारावारीण श्रीमान् पण्डितहरिशास्त्रिमहोदय की ही है। बहुत खोज करने पर भी मुझे इस ग्रन्थ की अन्य प्रतिलिपि का पता नहीं लगा। बूँदी और कोटा के राजकीय पुस्तकालयों में भी इसका पता नहीं चला। राव सुर्जन के प्रतापी पुत्र राव भोज ने इस महाकाव्य की अनेक हस्तलिखित प्रतियों का पण्डितों में वितरण किया होगा। मेरे पूर्वजों का, राजपुरोहित होने के कारण, कोटा-बूँदी के राजवंश से सदा से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। इस प्रसङ्ग से मेरे पूर्वजों को भी इस काव्य की एक पुस्तक मिली होगी और उस पुस्तक का, प्रकाशन करने के निमित्त, संशोधन करके मेरे पितामह ने यह आदर्शपुस्तक लिखी होगी। मेरे पूज्य पिताश्री का कहना है कि पूज्य पितामह की इस ग्रन्थ को प्रकाशित करने की बड़ी इच्छा थी। अनुकूल अवसर न मिल सकने के कारण पितामह की इच्छा पूर्ण न हो सकी। पूज्य पिता- श्री की आज्ञा पाकर और इस काव्य के गुणगण से प्रभावित होकर मैंने इस ग्रन्थरत्न का प्रकाशन आवश्यक समझा। इस सम्बन्ध में मैंने श्रीमान् वर्तमान कोटानरेश से प्रार्थना की और अपने पूर्वजों के गौरव का प्रसार करने के निमित्त गुणग्राही और उदार श्रीमान् कोटा-नरेश ने सहर्ष मेरी प्रार्थना स्वीकार करके इस काव्य के सम्पादन, हिन्दी-अनुवाद, प्रकाशन आदि का सम्पूर्ण व्यय प्रदान करने की कृपा की है। श्रीमान् कोटा-नरेश महिमहेन्द्र महाराव श्री भीमसिंह जी साहब की कृपा के कारण ही यह महाकाव्य आज प्रकाश में आ रहा है। श्रीमान् कोटा- नरेश जैसे दानवीर, गुणग्राही और साहित्य-प्रेमी नरेश विरले ही हैं। मुझे बड़ा हर्ष है कि इस महाकाव्य को प्रकाशमें लाने के लिये ईश्वर ने मुझे निमित्त बनाया। राजस्थान के कोटा और बूँदी राज्यों का राजवंश अग्निवंशी हाड़ा क्षत्रिय-कुल है। हाड़ा वंश चौहानवंशान्तर्गत है। कोटा के राजचिह्न की मुद्रा में 'अग्नेरपि तेजस्वी' शब्द रक्खे गये हैं। चन्द बरदाई के 'पृथ्वीराजरासो' में लिखा है कि महर्षि वसिष्ठ ने आबू पर्वत पर यज्ञ करके यज्ञा- ग्निकुण्ड से प्रतिहार, चालुक्य और परमार इन तीन क्षत्रिय वीरों को उत्पन्न किया, किन्तु जब इस पर भी असुरों का उपद्रव शान्त न हो सका तो वसिष्ठ ने ब्रह्मा जी की स्तुति करके वेद मंत्रों से अत्यन्त तीव्र आहुति दी जिससे क्षत्रिय वीर चौहान उत्पन्न हुये जिनके चार हाथ थे और जो तलवार से सुशोभित थे। सूर्यमल्ल कृत 'वंशभास्कर' में भी लिखा है कि आबू पर्वत पर वसिष्ठ की यज्ञ-रक्षा के लिये प्रतिहार, चालुक्य, परमार और—अत्यन्त तीव्र आहुति द्वारा—चौहान, ये चार क्षत्रिय वीर उत्पन्न किये गये जिनमें चौहान के चार हाथ थे और वे भीषण तलवार लिये हुये थे। उन्हींको चह्वाण, चहुवाण, चुहाण, और चौहाण कहा जाता है। चन्द बरदाई और सूर्यमल्ल की कथाओं के आधार पर ही ये चारों वंश स्वयं को अग्निवंशी कहने लगे हैं। इन कथाओं को आलंकारिक मान कर जेम्स टॉड, विन्सेन्ट स्मिथ और जेम्स केम्बेल आदि ६

८ पाश्चात्य इतिहास-विद्वानों ने तथा डा० देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर आदि भारतीय इतिहास- विद्वानों ने तो यहाँ तक कह दिया है कि अग्निवंशी क्षत्रिय हूण गुर्जर आदि शुद्ध किये हुये विदेशी हैं क्योंकि यज्ञ के अग्निकुंड से असुरों का विध्वंस करने के लिये उत्पन्न होने की आलंकारिक कथा का केवल यही युक्तियुक्त अर्थ हो सकता है कि ब्राह्मणों ने, अपने युद्धों में लड़ने के लिये इन विदे- शियों को शुद्ध करके क्षत्रिय बना लिया और यज्ञाग्नि द्वारा शुद्ध होने के कारण इन्हें अग्निवंशी कहा जाने लगा। हूण-कुमारियों के विवाह उच्च क्षत्रियवंशों में हुये एवं कुछ हूण, जैसा राजा मिहिरकुल आदि, प्रसिद्ध शैव थे । किन्तु यह मत ठीक नहीं है क्योंकि इसके लिये कोई पुष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है। हूणों का शैव होना या हूण कुमारियों का कुलीन क्षत्रियों के साथ विवाह होना अग्निवंशियों को हूण सिद्ध नहीं कर सकता । और फिर जिन आलंकारिक कथाओं के आधार पर यह तथाकथित 'युक्तियुक्त' मत पुष्ट किया जा रहा है, स्वयं वे कथायें ही ऐतिहासिक सिद्ध नहीं हो सकी हैं। चन्द बरदाई के 'पृथ्वीराजरासो' के अधिकांश भाग को, ऐतिहासिक भूलों व आलंकारिक कथाओं के कारण, इतिहास के विद्वान् न तो पृथ्वीराज के समय का मानने को तैयार हैं और न ऐतिहासिक दृष्टि से प्रामाणिक ही। उपर्युक्त विषय में 'वंशभास्कर' में भी 'रासो' की ही छाया है, अतः इस विषय में उस ग्रन्थ की प्रामाणिकता भी सिद्ध नहीं हो पाती। 'रासो' और 'वंशभास्कर' से प्राचीन साहित्य में चौहानों को सूर्यवंशी क्षत्रिय माना गया है। इस बात का ज्ञान चन्द बरदाई और सूर्यमल्ल को भी था और इसीलिये इन दोनों को ही यह भी स्वीकार करना पड़ा है कि अग्निवंशी क्षत्रियों को सूर्यवंशी मानने में कोई विरोध नहीं क्योंकि अग्नि और सूर्य दोनों एक ही तेजस्तत्व के प्रतीक हैं। अन्य उपलब्ध साहित्य में चौहानों को सूर्यवंशी माना गया है और चौहान की उत्पत्ति-कथा भी दूसरे प्रकार से दी गई है। विग्रहराज (बीसलदेव) चतुर्थ के शिलालेख में, जो अजमेर के ढाई दिन के झोंपड़े के पास मिला है, उत्कीर्ण है कि—चाहमान या चौहान वीर सूर्यवंश में उत्पन्न हुआं। जिस सूर्यवंश में इक्ष्वाकु और राम हुये ।१ जयानक कवि (जो पृथ्वीराज के समसामयिक थे) के 'पृथ्वीराजविजयमहाकाव्य' में लिखा है—'काकुत्स्थमिक्ष्वाकुरघू च यद् दधत् पुराऽभवत् त्रिप्रवरं रघोः कुलम्। कलावपि प्राप्य स चाहमानतां प्ररूढतुर्यप्रवरं बभूव तत् ॥' (२, ७१)। अर्थात् 'जिस रघुवंश ने काकुत्स्थ, इक्ष्वाकु और रघु—इन तीन महापुरुषों को त्रिप्रवर के समान धारण किया, वही रघुवंश, कलियुग में, चाहमान को पाकर प्रवरचतुष्टययुक्त हुआ।' इस ग्रन्थ के अनुसार ब्रह्माजी ने पुष्कर तीर्थ में म्लेच्छविनाश के लिये भगवान् विष्णु की स्तुति की। विष्णु भगवान् ने सूर्य पर दृष्टि डाली और तब सूर्यबिम्ब से एक महान् तेजस्वी पुरुष पृथ्वी पर अवतीर्ण हुये जिनकी प्रसिद्धि चाहमान नाम से हुई—'अथांशुभिः सूर्यमयस्य चक्षुषः स सूर्य- कान्तादिव सूर्यमण्डलात् । जवादारोहदखण्डचण्डिमा वसुन्धरासंमुखमर्चिषां चयः ॥' (२, १) नयचन्द्र सूरी ने भी अपने 'हम्मीर महाकाव्य' में चाहमान को सूर्यवंशी माना है और पुष्कर तीर्थ में ब्रह्माजी के कारण उनकी उत्पत्ति का वर्णन किया है—'ततश्चतुर्वक्त्रभवत्प्रसादात् साम्राज्य- १. गौ. ही. ओझा—राजपूताने का इतिहास, पहला खंड, पृ० ६४ 8

६ मासाद्य स चाहमानः । चक्रेऽर्कवद् भूभृत आशुपादाक्रान्तान् गुरून्प्ययमस्य वप्ता ।।' (१,१८) अर्थात् 'जिस प्रकार चाहमान का जनक सूर्य अपनी किरणों से बड़े बड़े पर्वतों को आक्रान्त कर देता है, उसी प्रकार ब्रह्माजी की कृपा से चाहमान ने साम्राज्य की स्थापना करके बड़े बड़े राजाओं को भी अपने पैरों से आक्रान्त कर दिया ।' इसी मत की पुष्टि हमारे कवि ने प्रस्तुत महाकाव्य में की है । उनके मतानुसार ब्रह्मा जी ने पुष्कर में यज्ञ किया और भावी विघ्न की आशंका के कारण उन्होंने सूर्य पर दृष्टि डाली ; उसी समय सूर्य बिम्ब से एक महान् तेजस्वी पुरुष वेग से नीचे उतरे जो लोक में चौहान नाम से प्रसिद्ध हुये— 'इत्थं वितन्वन् विधिवद् वितानमुत्प्रेक्ष्य विघ्नस्य पुरोऽवतारम् । विधिर्विधित्सुः प्रतिकारमस्य दिदेश दृष्टिं दिवसाधिनाथे ।। बिम्बादथाम्भोजवनस्य बन्धोः स्वधामसन्दोहनिगूढदेहः । अवातरद् वातरयेण कश्चित् पुमान् पुरस्तात् परमेष्ठिनोऽस्य ।। बाणासनं सज्यमंसि सशक्तिं महेषुधी मार्गणपूगपूर्णौ । बिभ्रच्चतुर्बाहुरवार्यवीर्यो वधं विधास्यन् मखबाधकानाम् ।। ध्रुवं चतुर्बाहुरिति प्रसिद्धः स चाहुवाणः किल लौकिकोत्या । वंशस्य कर्ता भवतां बभूव संरक्षितोऽधिक्षिति विश्वधात्रा ।।' (७, ५७-६०) वे तेजस्वी पुरुष धनुष, दो भारी तरकस और मंत्रशक्ति से युक्त तलवार लिये हुये थे। उनके चार भुजायें थीं। अतः 'चतुर्बाहुमान्' शब्द लोक में अपभ्रंश के कारण 'चाहुवाण' या चौहान बन गया। उपर्युक्त कारणों से यह मानना अधिक युक्तियुक्त है कि जो सूर्यवंश इक्ष्वाकु के कारण इक्ष्वाकुवंश और रघु के कारण रघुवंश कहलाया वही 'चतुर्बाहुमान्' के कारण चौहानवंश कह- लाया और उसी वंश की एक शाखा हरराज, हरिराज या हाडोराज के कारण हाडावंश के नाम से प्रसिद्ध हुई । इस प्रसिद्ध हाडावंश में सोलहवीं शती में महान् प्रतापी राव सुर्जन हुये । हाडों का सबसे विस्तृत राज्य उन्हीं के समय में रहा । राव सुर्जन रणथंभौर से कोटा तक और रामगढ़ से बूँदी तक निष्कंटक राज्य करते थे । युद्धवीर, दानवीर और दयावीर राव सुर्जन पर यह महाकाव्य लिखा गया है। सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना उचित है कि प्रस्तुत ग्रन्थ एक महाकाव्य.है, ऐतिहासिक ग्रन्थ नहीं। महाकवि चन्द्रशेखर ने इस ग्रन्थ को वीणापाणि देववाणी वाणी की आराधना के लिये तथा संस्कृत-साहित्य की श्रीवृद्धि के लिये लिखा है । इसका लक्ष्य न तो ऐतिहासिक वर्णन है और न मध्यकालीन राजाओं की प्रशस्ति ही । यह महाकाव्य संस्कृत-साहित्य के सूर्य वाग्देवता- वतार महाकवि कालिदास के रघुवंश को आदर्श बना कर लिखा गया है। महाकवि कालिदास की छाप हमारे कवि पर स्पष्ट है। इस महाकाव्य में, महाकवि कालिदास की कृतियों की तरह, भारतीय दर्शन और संस्कृति की धारा, गंगा-यमुना के संगम में सरस्वती के समान अथवा मणि- गणों में सूत्र के समान, अन्तर्निहित है। सोलहवीं-शती में जब संस्कृत-साहित्य प्रायः शब्दाडम्बर

१० की बेड़ियों में जकड़ रहा था, जब रस और भाव, शब्द और अर्थ के अलंकारों के आगे नतमस्तक हो रहे थे, जब ग्रन्थ-ग्रन्थिनिर्माण ही पाण्डित्य-प्रदर्शन समझा जाता था, जब कविता-कामिनी वाग्जाल के भयंकर पर्दे और समस्या-पूर्ति के संकुचित घर में, रस और भाव के स्वच्छ और उन्मुक्त वातावरण में साँस न ले सकने के कारण, क्षय-पीड़ित हो रही थी, उस समय महाकवि चन्द्रशेखर का महाकवि कालिदास से प्रेरणा लेना बड़ी भारी बात थी । और बड़े हर्ष का विषय है कि महा- कवि कालिदास के प्रसाद गुण और लालित्य का अनुकरण करने में हमारे कवि को उत्कृष्ट साफल्य मिला है । कल्पना-शक्ति और पदलालित्य में हमारे कवि ने महाकवि श्रीहर्ष का अनुकरण किया है और कहीं कहीं यमकादि अलंकारों के समावेश में भारवि और माघ का । हम कह चुके हैं कि इस महाकाव्य को ऐतिहासिक ग्रन्थ नहीं समझना चाहिये । हमारे कवि स्वयं यह नहीं चाहते क्योंकि उन्होंने, नवम सर्ग में, अपनी कल्पना की उड़ान से राजा अजयपाल को नागलोक में शेषनाग के पास तक भेज दिया है और एक नाग-कन्या से उनका विवाह भी करा दिया है। साहित्य का सौन्दर्य उसके चिरन्तन और शाश्वत सत्य में है । प्रकृति के विभिन्न रूपों का वर्णन—सूर्योदय, सूर्यास्त, रात्रि, चन्द्र, तारे, भूमि, जल, गगन, उपवन, कमल, कुमुद, पुष्प, हंस, सारस, वसन्त, ग्रीष्म, शरद्, शिशिर, हेमन्त, वर्षा आदि का वर्णन ; तथा मानसिक भावों और रसों का वर्णन—शृंगार, करुण, वीर आदि रसों का ; माधुर्य, ओज और प्रसाद रूपी गुणों का ; तथा अन्य चित्तवृत्तियों का वर्णन, किसी व्यक्ति विशेष से सम्बन्ध नहीं रखता । फिर भी यह कहना नितान्त अनुचित होगा कि प्रस्तुत महाकाव्य के वर्ण्य विषय काल्पनिक हैं । यद्यपि यह महाकाव्य इतिहास-ग्रन्थ नहीं है, तथापि इसकी पृष्ठभूमि ऐतिहासिक है । हो सकता है कि इस ग्रन्थ में दी गई राजवंशपरम्परा ठीक न हो, हो सकता है कि इस महा- काव्य में ऐतिहासिक भूलें हों, किन्तु जिन जिन मुख्य मुख्य राजाओं का इसमें विशद वर्णन किया गया है वे सब निःसन्देह ऐतिहासिक पुरुष हैं और उनके वर्णन की मुख्य मुख्य घटनाओं में भी अवश्य ऐतिहासिक सत्य का अंश है । इस महाकाव्य में 'चतुर्बाहुमान्' या 'चौहान' वंश में सबसे पहले प्रतापी राजा वासुदेव बताये गये हैं । जयानक ने भी अपने 'पृथ्वीराजविजयमहाकाव्य' में (जो ऐतिहासिक दृष्टि से काफी विश्वस्त माना जाता है) वासुदेव को ही इस वंश का प्रथम प्रतापी राजा माना है । प्रस्तुत महा- काव्य में वासुदेव से लेकर राव भोज तक की लम्बी परम्परा का उल्लेख है जो मेरे विचार से, ऐतिहासिक दृष्टि से, बहुत विश्वसनीय नहीं है। फिर भी इस वंशपरम्परा में वासुदेव से लेकर पृथ्वीराज चौहान तक जितने नाम आये हैं उनमें से बहुत से नाम, हर्ष और बिजोलिया के शिला- लेखों से तथा अन्य ऐतिहासिक गवेषणाओं से, ऐतिहासिक सिद्ध हो चुके हैं । आठवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक के समय में शाकंभरी (सांभर) प्रदेश के, जिसमें लाखों गाँव थे और अहिच्छत्र (नागोर) और अजमेर तथा पुष्कर तीर्थ शामिल थे, कई प्रतापी चौहान राजा हुये हैं जिनमें सामन्तराज, चन्द्रराज, गुवक (गुर्वक या गोवाक), चन्दन, वाक्पति (विश्वपति), सिंहराज, अजयदेव (अजयपाल), अरुणदेव (अनलदेव, अरुणराज, अर्णोराज या आना), विग्रहराज (विशालदेव या बीसलदेव) और पृथ्वीराज अत्यन्त प्रसिद्ध हैं । यद्यपि इस महाकाव्य में वासुदेव से लेकर राव भोज तक की लम्बी वंशपरम्परा दी गई है, तथापि अधिक वर्णन केवल महाँप्रतापी राजाओं का ही किया है । वासुदेव, विश्वपति, हरिराज,

११ भीमदेव, अनलदेव, बीसलदेव, पृथ्वीराज, हम्मीरदेव, राव सुर्जन और राव भोज—इन दस राजाओं का अधिक वर्णन किया गया है। वासुदेव, विश्वपति (वाक्पति?), हरिराज और भीमदेव के विषय में तो अधिक ज्ञान उपलब्ध नहीं है। इस काव्य में विश्वपति को साँभर (शाकंभरी) में शाकंभरी देवी के प्रसाद से लवणाकर बनाने का श्रेय दिया गया है, किन्तु 'पृथ्वी- राजविजय महाकाव्य' में इस कथा का सम्बन्ध, कुछ हेर फेर के साथ, वासुदेव से जोड़ा गया है। हमारे कवि ने भीमदेव से दिग्विजय यात्रा करवाई है, किन्तु इस वर्णन में 'रघुवंश' के 'रघुदिग्वि- जय' की छाप स्पष्ट है। अनलदेव (अरुणदेव या अर्णोराज या आना) द्वारा पुष्कर में पक्के घाट और मन्दिर बनवाने का वर्णन है। यह ऐतिहासिक सत्य प्रतीत होता है। बीसलदेव या विग्रहराज अत्यन्त प्रतापी और विद्याप्रेमी नरेश थे। इस काव्य में उन्हें "इन्द्र के समान तेजस्वी, तीनों शक्ति और छहों गुणों से सम्पन्न, जगद्विजयी, जितेन्द्रिय और परम शिवभक्त" बतलाया है और कहा है कि उन्होंने अवन्तिनगरी को जीत कर मालवों को करप्रद बना दिया था। कवि ने उनसे महाकालेश्वर की बड़ी सुन्दर स्तुति भी करवाई है। यह भी ऐतिहासिक सत्य प्रतीत होता है। बीसलदेव ने स्वयं 'हरकेलि' नाटक लिखा था और उनके राजकवि सोमदेव ने 'ललित विग्रहराज' नाटक लिखा। इन दोनों नाटकों को बीसलदेव ने श्वेत पत्थरों पर उत्कीर्ण करवा कर संस्कृत महाविद्यालय की दीवारों में लगवाया था जिसे मुहम्मद गोरी ने तुड़वा कर मसजिद बना दिया था और जो आजकल अजमेर में ढाई दिन के झोंपड़े के नाम से प्रसिद्ध है। बीसल- देव का एक लोहस्तम्भ दिल्ली में मिला है जिसमें एक श्लोक यह भी उत्कीर्ण है— "ब्रूते सम्प्रति चाहमानतिलकः शाकम्भरीभूपतिः श्रीमद्विग्रहराज एष विजयी सन्तानजानात्मजान्। अस्माभिः करदं व्यधायि हिमवद्विन्ध्यान्तरालं भुवः शेषस्वीकरणाय मास्तु भवतामुद्योगशून्यं मनः॥" अर्थात् "चौहान कुलभूषण शाकंभरीनरेश विजयी श्रीमान् विग्रहराज अपने पुत्र पौत्रों से यह निवेदन करते हैं कि—'हमने हिमालय और विन्ध्याचल के बीच के भूभाग को जीत कर करप्रद बना दिया है, और शेष भूभाग को विजय करने के लिये आप लोगों के मन में आलस और प्रमाद नहीं होना चाहिये।' पृथ्वीराज को सोमेश्वर और कर्पूरदेवी का पुत्र बतलाया है, जो ठीक है। किन्तु पृथ्वीराज का वर्णन चन्द बरदाई के 'रासो' के आधार पर किया गया है। यह सत्य है कि सोमेश्वर के पुत्र पृथ्वीराज चौहान महाप्रतापी राजा थे। उनका कन्नौज-नरेश जयचन्द्र से मनोमालिन्य भी था। संयुक्ता (जिसे इस काव्य में कान्तिमती कहा है) के अपहरण की कथा कहाँ तक सत्य है, इसका विवेचन इतिहास के विद्वान् करें। इस काव्य के अनुसार जयचन्द्र दिल्ली में पृथ्वीराज से परास्त होकर यमुना में डूब गये। यह बिलकुल गलत है। यह सत्य है कि पृथ्वीराज ने सन् ११९१ में शहाबुद्दीन गोरी को बुरी तरह हराया। किन्तु दो वर्ष बाद ही दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज, गोरी से पराजित हुये। या तो वे युद्ध में लड़ते हुये काम आये और या कुछ समय बाद मार डाले गये। इतिहास के विद्वान् चन्द बरदाई की इस कथा को कि मुहम्मद गोरी उन्हें कैद करके अपने देश ले गया और उनकी आँखें निकलवा लीं तथा चन्द की सहायता से उन्होंने शब्दवेधी बाण से

१२ गोरी को मार डाला, कल्पित मानते हैं। हमारे कवि ने, कुछ हेर फेर के साथ, इसी कथा का वर्णन किया है और चन्द का नाम भी लिया है। इससे केवल यही सिद्ध होता है कि 'रासो' के ये स्थल भी सोलहवीं शताब्दी में काफी प्रसिद्धि पा चुके थे। हम्मीरदेव का वर्णन हमारे कवि ने बड़ा सुन्दर किया है। उनके पिता का नाम जैत्रसिंह और पितामह का वाग्भट बतलाया है, जो ठीक है। अलाउद्दीन, जलालुद्दीन, उलूगखाँ, रणमल, मीर मोहम्मद शाह और मीर खेब्रू के जो वर्णन आये हैं वे भी ठीक हैं। पट्टन (पाटन), षट्पुर (खटकड़), पारियात्र (अरावली), चर्मण्वती (चम्बल) आदि के वर्णन और हम्मीर के तुला- दान और यज्ञ के वर्णन बड़े सुन्दर हैं। हम्मीरदेव ने सन् १२८३ में राज्यभार सँभाला। १२९१ में जलालुद्दीन खिलजी रेवाड़ी होता हुआ रणथंभौर के काफी पास चला आया था, किन्तु उस दुर्ग को अभेद्य समझ कर वापस लौट गया। १२९९ में अलाउद्दीन ने अपने भाई उलूग खाँ को रण- थंभौर पर आक्रमण करने के लिये भेजा। युद्ध में उलूग खाँ हार कर भाग गया। तब खुद अलाउद्दीन ने आकर रणथंभौर पर घेरा डाला। हम्मीरदेव ने मीर मुहम्मद शाह और उनके भाई मीर खेब्रू को, जो जालोर-विद्रोह के नेता थे और अलाउद्दीन के भय से भागकर आये थे, अपने यहाँ शरण दी और बड़े सम्मान से रखा। काफी समय तक घेरा डालने पर भी जब अला- उद्दीन को विजय की आशा नहीं दिखाई दी तब उसने हम्मीरदेव के पास सन्देश भेजा कि यदि मीर मुहम्मद शाह और मीर खेब्रू आदि विद्रोही लौटा दिये जावें तो घेरा उठा लिया जावेगा। किन्तु वीर हम्मीर ने शरणार्थियों के साथ विश्वासघात करने से साफ मना कर दिया। हम्मीर का मंत्री रणमल बहुत सी सेना के साथ, अपने स्वामी से विश्वासघात करके, अलाउद्दीन से जा मिला। इसके कारण दुर्ग में रसद की भयंकर कमी आ गई थी और वीर क्षत्रिय भूखों मरने लगे थे। जब कोई चारा न देखकर वीर हम्मीर की पतिप्राणा रानियों ने जौहर किया और हम्मीरदेव अपने साथियों के साथ दुर्ग से उतर कर युद्धक्षेत्र में कूद पड़े। वीर मुहम्मदशाह और खेब्रू बड़ी वीरता से हम्मीर के साथ लड़े। प्रणवीर हम्मीर शत्रु के शस्त्र से घायल होकर युद्धभूमि में काम आये और ता० ११ जुलाई सन् १३०१, मंगलवार को चौहान-सूर्य अस्त हो गया। 'हम्मीरमहाकाव्य' में लिखा है कि हम्मीर ने स्वयं अपना मस्तक काट लिया, किन्तु प्रस्तुत महाकाव्य में हम्मीर, शत्रु के भिन्दिपाल नामक शस्त्र से घायल होकर वीरगति को प्राप्त हुये, जो अधिक उचित प्रतीत होता है। 'भिन्दिपाल' शब्द आजकल 'गुलेल' के अर्थ में प्रयुक्त होता है, किन्तु इसका प्रयोग 'नालिकास्त्र' (बन्दूक) के अर्थ में भी किया गया है और यहाँ यही उचित प्रतीत होता है। हमारे कवि ने लिखा है कि अलाउद्दीन ने 'आग्नेयास्त्र' (तोप) का प्रयोग रणथंभौर के घेरे के समय किया। इतिहास के विद्वान् प्रायः यह मानते हैं कि बारूद का प्रयोग भारत में सर्व- प्रथम बाबर ने १५२७ में किया। हमारे कवि अकबर के समकालीन थे, अतः इनके समय में तो तोपें थीं ही। अलाउद्दीन द्वारा तोपों और बन्दूकों का प्रयोग किया जाना हमारे कवि की कल्पना मात्र है अथवा इसमें कुछ तथ्य है, इसका निर्णय इतिहास के विद्वान् करें। हमारे कवि के अनुसार राव सुरर्जन की साक्षात् वंशपरम्परा हम्मीरदेव के सातवें पूर्वज प्रसिद्ध पृथ्वीराज चौहान के छोटे भाई माणिक्यराज से प्रारंभ होती है। इतिहास के विद्वानों के अनुसार गंगदेव के पुत्र देवसिंह ने तेरहवीं शती में जेता मीणा को जीत कर बूँदी राजधानी बनाई। हमारे

[पृष्ठ संख्या: १३]

कवि के अनुसार गंगदेव माणिक्यराज की सातवीं पीढ़ी में हुये। इतिहास के विद्वान् इस बात को स्वीकार करते हैं कि पृथ्वीराज चौहान के पूर्वज चन्दन के पुत्र और सिंहराज के पिता वाक्पति- राज के छोटे भाई लक्ष्मण ने सन् ९४३ के लगभग नाडोल में अलग राज्य स्थापित किया था और इसी वंश के माणिक्यराय ने बम्बावदा राजधानी बनाई। गंगदेव इन्हीं माणिक्यराय के वंशज थे। ये माणिक्यराय न तो गंगदेव के सातवें पूर्वज थे और न पृथ्वीराज के भाई ही। अतः हमारे कवि का पूर्वोक्त कथन इतिहास की दृष्टि से ठीक नहीं है। 'पृथ्वीराजविजयमहाकाव्य' में पृथ्वीराज के छोटे भाई का नाम हरिराज बताया गया है, माणिक्यराज नहीं। कहा जा चुका है कि गंगदेव के पुत्र देवसिंह ने तेरहवीं शती में जेता मीणा को जीत कर बूँदी राजधानी बनाई। गंगदेव के बाद बम्बावदे का राज्य भी बूँदी में मिला लिया गया। देवसिंह ने अपने पुत्र समरसिंह का राज्याभिषेक करके सन्यास लिया। समरसिंह और उनके छोटे पुत्र जैतसिंह ने १२७४ में कोटचा भील को हरा कर कोटा जीता। हमारे कवि ने गंगदेव से वरसिंह तक तो राजाओं के नाम ठीक ठीक बताये हैं। राव सुर्जन के पिता का नाम अर्जुन बताया है जो भी ठीक है। किन्तु वरसिंह से अर्जुन के बीच की परम्परा ठीक नहीं है। हमारे कवि के अनुसार वरसिंह के पुत्र भारमल्ल हुये, भारमल्ल के नमंद और नमंद के अर्जुन। किन्तु इतिहास- कारों के अनुसार हमें भारमल्ल और नमंद के नाम नहीं मिलते और इनके बजाय वैरीसाल, भाँडा, नारायणदास, सूर्यमल्ल और सुलतानसिंह, ये नाम मिलते हैं। नारायणदास की उपेक्षा अत्यन्त आश्चर्यजनक है क्योंकि उनका नाम बूँदी के इतिहास में अमर है। नारायणदास ने अपने धर्मभ्रष्ट चाचाओं से बूँदी वापस ली और जब मालवा के सुलतान ने मेवाड़ पर आक्रम[ण] किया तब उन्होंने राणा साँगा को सुलतान के विरुद्ध सहायता दी। नारायणदास और रा[णा] साँगा में मित्रता थी और वे राणा साँगा के साथ बाबर के विरुद्ध भी लड़े थे। हमारे कवि भाँडा को भारमल्ल और नरबुध को नमंद कहा है। सुलतान सिंह निःसन्तान थे, अतः उनके बाद भाँडा (भारमल्ल) के दूसरे पुत्र नरबुध (नमंद) के बड़े लड़के अर्जुन गद्दी पर बैठे। नमंद राजा नहीं थे, राजा उनके बड़े भाई नारायणदास थे। हमारे कवि ने वैरी- साल, नारायणदास, सूर्यमल्ल और सुलतानसिंह के नाम छोड़ दिये हैं। हमारे कवि चन्द्रशेखर राव सुर्जन की पंडित-सभा के प्रसिद्ध कवि थे; अतः राव सुर्जन और उनके पुत्र राव भोज के समकालीन होने के कारण, उन्होंने जो वर्णन इन दोनों नरेशों का किया है वह ठीक ही होना चाहिये। इस वर्णन से उस समय की राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं पर भी पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। राव सुर्जन का नाम बूँदी-कोटा के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। महाप्रतापी राव सुर्जन युद्धवीर, दानवीर और दयावीर नरेश थे। जिस प्रकार नारायणदास ने बूँदी वापस ली, उसी प्रकार राव सुर्जन ने केसर खाँ और डोकर खाँ नामक पठानों को पराजित करके कोटा पर फिर अधिकार किया। हाड़ा वंश का सबसे विस्तृत राज्य—रणथंभोर से कोटा तक और रामगढ़ से बूँदी तक—राव सुर्जन का ही था। १५६० में अकबर ने रणथंभौर को विजय करने के लिये सेना भेजी, किन्तु उस सेना को हार कर लौटना पड़ा। १५६८ में अकबर ने चित्तौड़ का प्रसिद्ध दुर्ग जीत लिया। उस युद्ध में फत्ता और जयमल की वीरता को आज भी चित्तौड़ दुर्ग की ईंट ईंट सूचित करती

१४ है। उस समय हजारों राजपूतों ने वीरगति पाई थी और अनेक पतिप्राणा रानियों ने जौहर किया था। चित्तौड़ विजय से उत्साहित होकर १५६९ में अकबर ने फिर रणथंभौर पर आक्रमण किया। उस युद्ध में राव सुर्जन बड़ी वीरता से लड़े। आमेर के मानसिंह पहले ही अकबर से मिल चुके थे और चित्तौड़ भी अकबर के अधिकार में आ चुका था। महान् शक्तिशाली और राजनीतिज्ञ अकबर का सामना करना उस समय कठिन ही नहीं, असंभव सा था। राव सुर्जन की वीरता से प्रभावित होकर अकबर ने मानसिंह को सन्धि के लिये राव सुर्जन के पास भेजा। उस समय वंश- भास्कर के अनुसार सात और टॉड के अनुसार दस शर्तें स्वीकार हुईं। इन शर्तों में कोई शत ऐसी नहीं थी जिसे स्वीकार करने में नीतिज्ञ अकबर को कुछ दुविधा होती। शर्तें इस प्रकार थीं—जैसे बूँदी राजधानी मानी जावे, जजिया न लगाया जावे, रानियां दिल्ली नहीं जावेंगी, बादशाह को लड़की नहीं दी जावेगी आदि। हमारे कवि ने इन शर्तों का कोई उल्लेख नहीं किया है। उन्होंने केवल इतना ही लिखा है कि रणथंभौर के बजाय नर्मदा, मथुरा और काशी का राज्य सुर्जन को दिया गया। इतिहास के विद्वान् इस बात को स्वीकार करते हैं कि अकबर ने राव सुर्जन को कुछ परगने बूँदी के आस पास के दिये और कुछ परगने बनारस के पास के दिये। राव सुर्जन अकबर के सामन्त बन गये और उन्हें बनारस और चुनार और आसपास के परगनों का हाकिम बनाया गया। राव सुर्जन ने गोंडवाना विजय में प्रमुख भाग लिया था। वार्धक्य में राव सुर्जन विरक्त होकर काशी में ही रहने लगे। काशी में इन्होंने अनेक सुन्दर महल और घाट बनवाये। उदार और दानवीर होने से इनका यश खूब फैला। राव सुर्जन ने काशी में ही देह- त्याग किया। काशी में बूँदी के राजमन्दिर में उनका स्मारक बना हुआ है। राव सुर्जन के पुत्र राव भोज ने अहमदनगर के घेरे में बड़ी वीरता दिखाई थी। अकबर ने प्रसन्न होकर उनके स्मारक के रूप में वहाँ भोजबुर्ज बनवाई। राव भोज के पुत्र राव रतन ने,जो बड़े वीर और न्याय- परायण थे, जहाँगीर से बड़ी बड़ी उपाधियाँ पाईं। हमारे कवि ने इस महाकाव्य के आदि और अन्त में कहा है कि यह महाकाव्य उन्होंने राव सुर्जन के आदेश और अनुरोध से लिखा—'आज्ञाबलात् तदपि शूरजनस्य राज्ञः' ( १, ७ ) और 'निर्वन्धान् नृपसुर्जनस्य नितरां' ( २०,६४ )। किन्तु काव्य समाप्त होने से पूर्व ही राव सुर्जन का देहान्त हो गया। अतः हमारे कवि ने अन्तिम सर्ग में राव भोज के राज्याभिषेक और पराक्रम का वर्णन किया है। राव रतन उस समय विद्यमान थे क्योंकि कवि ने काव्य समाप्त करते समय लिखा है कि 'महाप्रतापी, युद्धवीर, दानवीर, प्रजापालक, यशस्वी, विद्वानों का आदर करने वाले और सम्राट् अकबर द्वारा सम्मानित राव भोज अपने रत्न (राव रतन) आदि पुत्रों सहित, राज्यलक्ष्मी और कुल-कीर्ति को बढ़ाते हुये बूँदी में सुशासन कर रहे हैं।' अतः यह महाकाव्य सोलहवीं शताब्दी के चतुर्थ पाद में पूर्ण हुआ। महाकवि चन्द्रशेखर के विषय में हमारा ज्ञान उनके इस महाकाव्य के अन्तिम श्लोक पर ही निर्भर है। उन्होंने अपने विषय में यह लिखा है :— 'गौडीयः किल चन्द्रशेखरकविर्यः प्रेमपात्रं सता- मम्बष्ठान्वयमण्डनात् कृतधियो जातो जितामित्रतः। निर्बन्धान् नृपसुर्जनस्य नितरां धर्मैकतानात्मनो ग्रन्थोऽयं निरमायि तेन वसता विश्वेशितुः पत्तने॥'

१५ इससे यह विदित होता है कि हमारे कवि गौडीय अर्थात् बंगाली थे, जितामित्र के पुत्र थे और अम्बष्ठ कुल में उत्पन्न हुये थे। वे राव सुर्जन के समकालीन और उनकी सभा के कवि थे और उन्होंने इस काव्य का निर्माण भगवान् विश्वनाथ की नगरी काशी में रह कर किया। महाकवि चन्द्रशेखर जन्मजात कवि थे। उनकी यह कृति उन्हें निःसन्देह अमर कर देगी। इस महाकाव्य में स्थान स्थान पर महाकवि कालिदास के प्रसाद और माधुर्य की, महाकवि श्रीहर्ष क पदलालित्य और कल्पना की एवं कहीं कहीं यमकादि अलंकार सन्निवेश में भारवि और माघ की छाप है। इस महाकाव्य के कई श्लोक संस्कृतवाङ्मय की अमूल्य निधि हैं। महाकवि कालिदास ने लिखा है— 'कामं नृपाः सन्तु सहस्रशोऽन्ये राजन्वतीमाहुरनेन भूमिम् । नक्षत्रताराग्रहसङ्कुलाऽपि ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रिः ॥' अर्थात्, 'भले ही अन्य हजारों राजा हों, किन्तु पृथ्वी इसी राजा के कारण 'राजन्वती' बनी; भले ही हजारों नक्षत्र और तारागण जगमगाते रहें,

१६ हमारे कवि की कल्पना का एक और उदाहरण देखिये—वासुदेव राजा की शुभ्र कीर्ति- हंसी शत्रुओं के दुष्कीर्तिरुपी कीचड़ में पड़े हुये उनके बचे खुचे यश रूपी कमलतन्तुओं को खा- जाने के लिये ढूंढ़ती हुई सारे विश्व में घूम रही है— 'दुष्कीर्तिपङ्कगतवैरियशोमृणाललेशानशेषयितुमाशु गवेषयन्ती । यस्योल्लसद्विशदवारिगर्भशुभ्रा बभ्राम विश्वमखिलं किल कीर्तिहंसी ।।' (१,१५) एक साथ दानवीर और युद्धवीर का उदाहरण देखिये— यदि वासुदेव राजा बलात् घेरे गये शत्रुओं की ललनाओं के आँसुओं से चम्बल नदी को वापस न भर देते तो निःसन्देह चम्बल का सारा पानी उनके दानसंकल्पों के जल में खर्च हो जाता और चम्बल में कीचड़ ही कीचड़ रह जाता— 'एतस्य दानसलिलव्ययितप्रवाहा चर्मण्वती ध्रुवमधास्यत पङ्कभावम् । नाऽपूरयिष्यत यदि प्रसभोपरुद्धविद्वेषिवामनयनानयनाम्बुपूरैः ।।' (१, १८) हम्मीरदेव के प्रताप के विषय में कवि लिखते हैं—स्नानार्थ आई हुईं देवाङ्गनाओं द्वारा अर्पित पारिजात पुष्पों से प्रवृद्ध शोभा वाली और मंगलमय प्रवाह वाली चम्बल आज भी वीर हम्मीरदेव के यश को अपने कलकल शब्दों से मानों वीणा बजाती हुई गा रही है— 'सुराङ्गनावर्जितपारिजातप्रसूनपर्याप्ततरङ्गशोभा । चर्मण्वती शर्ममयप्रवेणी प्रवीणयामास यशांसि यस्य ।।' (११, ४०) कवि ने हम्मीरदेव के मुख से कितनी सुन्दर वीरोक्ति कहलाई है—चौहाण वंश या तो शत्रुमंडल को भेद कर विजय प्राप्त करता है और या युद्ध में वीरगति पाकर आदित्यमंडल को भेदता हुआ स्वर्ग प्राप्त करता है; चौहाण वंश अपने आगे विनीत होने वाले पुरुष को करावलम्ब (हाथ का सहारा) देकर उठाता है, वह किसी दूसरे राजा को करदान नहीं देता— 'रिपुमण्डलमर्कमण्डलं वा तरसोच्चैःपदलब्धये भिनत्ति । तनुते प्रणते करावलम्बं करदानं नहि चाहुवाणवंशः ।।' (१२, २६) अन्य उक्ति देखिये—इससे बढ़ कर और क्या अपमान और लज्जा की बात हो सकती है कि लोग वीरों की युद्ध में पीठ और कुलीन स्त्रियों का वक्षःस्थल देख सकें ? — 'अतः परं किन्नु विडम्बनं स्यादपत्रपायाः परमावधिर्वा । पृष्ठं परे यत् समितौ भटानां पश्यन्ति वक्षोऽपि कुलाङ्गनानाम् ।।' (१७,४३) कवि की कल्पना का एक और उत्कृष्ट उदाहरण देखिये—युद्धभूमि में विजयी राजा की सेना से जो धूल (रजः) उठी वह शत्रुओं के लिये अन्धकार (तमः) बन गई और अपनी सेना के लिये साहस तथा बल (सत्व) बन गई तथा शत्रुओं की स्त्रियों के हारों के सूत्र (गुण) को तोड़ कर उन्हें निर्गुण बना देने वाली बन गई । राजा की रजोगुणजन्य शत्रुमारणप्रवृत्ति शत्रुओं के लिये तमोगुणजन्य किंकर्तव्यविमूढ़ता, अपनी सेनाओं के लिये सत्वगुणजन्य उत्साह और शत्रु-

१७ ललनाओं के लिये भावि वैधव्यसूचक स्तनहारनिर्गुणत्व बन गई । आश्चर्य है कि एक रजोगुण ही तमोगुण, सत्वगुण और निर्गुण बन गया ! — ‘यस्मिन् जयाहितमतौ समराजिरेषु जातं रजः प्रतिभटेषु तमस्तदेव । सत्वं सपत्नपृतनासुविपक्षजायावक्षोजहारलतिकास्र्वपि निर्गुणत्वम् ॥' (१,३९) राजा को प्रस्थान के समय शुभशकुनरूप जल से भरे हुये घड़े मिले । कवि कहते हैं कि कुम्भस्तनी स्त्रियों से आलिङ्गित कण्ठ वाले ये घड़े मानों अपने परिपाक के लिये किये गये अग्नि- प्रवेश रूपी तप का फल भोग रहे हैं— ‘समश्नुवानान् स्वपरोपतापाद्वह्निप्रवेशोग्रतपःफलानि । कुम्भस्तनीभिः परिरब्धकण्ठान् संभावयामास स पूर्णकुम्भान् ॥' (३,५) कवि ने कितने सरल और सरस शब्दों में पूर्वराग का चित्र खींचा है। दूती नायक से नायिका की दशा का वर्णन कर रही है—घुटने पर कुहनी, शिथिल हाथ पर गाल

१८ पुष्कर सरोवर में खिले हुये सफेद कमल पर काला भ्रमरसमूह इस प्रकार शोभित हो रहा है मानों सूर्य की गरमी से घबरा कर शरद् ऋतु का सफेद बादल अपने साथ काले आकाश के टुकड़े को लेकर पुष्कर के जल में आ गिरा हो !— 'अत्रावदातं शतपत्रजातं भृङ्गैः क्वचित् मेचकितं चकास्ति । सव्योम शङ्के शरदभ्रखण्डं सूर्यांशुतापात् पतितं पयःसु ।।' (७, ४२) नीली यमुना के किनारे किनारे लाल कमल खिल रहे हैं और उनके कारण यमुना पापों के खून से लाल धार वाली धर्मराज की तलवार लग रही है— 'रक्तोत्पलैरभिनवैरभितः स्फुरद्भिः स्फीतेन्द्रनीलमणिमेदुरमुग्धवेणिः । आभाति पातकततिक्षतजाक्तधारा धर्मस्य खड्गलतिकेव कलिन्दकन्या ।। (१८, २७) यद्यपि यमुना और गंगा दोनों ही संसार को पवित्र करने वाली हैं, तथापि भगवान् कृष्ण ने गंगा में तो केवल पाँव ही धोया (गंगा विष्णु के पैर से निकली है) किन्तु यमुना में गोपियों के साथ वारिविहार किया— 'इयञ्च गीर्वाणतरङ्गिणी च कामं जगत्पावनतां दधाते । परन्तु धौतं पदमेव तस्याम्यज्जगाहे हरिणा विहारे ।।' (१८, २९) जिनके स्मरणमात्र से द्रौपदी का वस्त्र असीम बन गया, वे भगवान् कृष्ण वृन्दावन में गोपियों वस्त्र चुराया करते थे— 'यस्य स्मृतावपि सपत्नतिरस्कृताया निःसीममम्बरमभूद् द्रुपदात्मजायाः । यत्राम्बराणि स लसत्कलस्तनीनामस्तेनयद् विकचनीपवनीविलासी ।।' (१८,५३) वृन्दावनवासी मोर अपने मित्र मेघ की ओर भी, घनश्याम का स्मरण हो जाने के कारण— उन घनश्याम का जो उन मोरों के स्वयं गिरे हुये पंखों को अपने मस्तक का आभूषण बनाते थे, नाचना छोड़ कर बड़ी कठिनता से आँसू बहाते हुये देख पाते थे— 'बर्हेण येषां विदधे वतंसं कंसस्य शत्रुः स्वयमुज्झितेन । कलापिनः प्रोज्झितताण्डवास्ते विलोकयन्ति स्म घनं संवाष्पाः ।।' (१८,६७) गंगा का वर्णन करते हुये कवि कहते हैं—ब्रह्मा जी के कमण्डलु में रहने के कारण यह गंगा तो पहले ही पवित्र थी, फिर विष्णु भगवान् का चरण धोकर यह और अधिक पवित्र हुई और फिर भगवान् शिव की जटा में रहने के कारण इसकी पवित्रता अनिर्वचनीय बन गई ; फिर जब यह काशी से मिल गई तो इसका जल, जल न रह कर, द्रवीभूत धर्म हो गया; ऐसी गंगा के माहात्म्य का वर्णन कौन कर सकता है?— 'प्रागेव पुण्यसलिलाथ हरेः पदाब्जं प्राप्ता ततोऽनुपरिपृष्टहरोत्तमाङ्गी । धर्मद्रवी यदि पुनर्मिलितेह काश्यां कोऽस्या महित्वमभिधातुमहो क्षमः स्यात् ।।' (१९,२८)

१९ राव सुर्जन के काशी में प्रतिदिन असीम वस्त्र बाँटने के कारण एक स्वतन्त्र भगवान् शिव ही ऐसे बच गये थे जो अपनी आदत से मज़बूर होकर गजचर्म पहनते थे— 'विश्राणयत्यनुदिनं ननु दीनबन्धौ तस्मिन्नसीमवसनान्यविशेषदृष्ट्या। आत्मस्वभावपरतन्त्रतया स्वतन्त्रोऽप्येकः परं पुरहरोऽजनि कृत्तिवासाः ॥' (१९,३४) कवि ने भगवान् शिव की क्या मीठी चुटकी ली है—स्वामी चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो और चाहे कितना ही प्रसन्न क्यों न हो जाय, किन्तु वह अपने वैभव के अनुसार ही पुरस्कार दे सकता है; यही कारण था कि भगवान् शिव ने राव सुर्जन से अत्यन्त प्रसन्न होकर भी उनको पहिनने के लिये गजचर्म और सवारी के लिये बैल ही दिया ! — 'भूरिप्रसादसुमुखोऽपि सदीश्वरोऽपि भृत्यं यथाविभवमेव पुरस्करोति । यद् वाहनं वृषभमम्बरमैभकृत्तिं तस्मै ददे प्रमुदितोऽपि स कृत्तिवासाः ॥' (१९, ४४) राव भोज के शुभ्र यश को प्रसन्न किन्नर कामिनियां विन्ध्याचल पर बैठ कर गाती है; इसलिये वह यश शुभ्र हिम के समान जम कर विन्ध्याचल पर व्याप्त हो गया है; शायद यही कारण है कि पिता के पास रहने की इच्छुक भगवती विन्ध्यवासिनी, विन्ध्याचल को हिमालय समझ कर उसे छोड़ना नहीं चाहती— पिण्डीभूततुषारपाण्डरतरे यस्यानुविन्ध्यं यशः- स्तोमे किन्नरकामिनीभिरभितः प्रोद्गीयमाने मुदा । प्रालेयाचलशङ्कया पितृगृहावासाय बद्धस्पृहा शैलेन्द्रं तमपोहितुं न सहते मन्ये नगेन्द्रात्मजा ॥' (२०, ५६) ओज और शब्दाडम्बर का नमूना भी देखिये— 'कोदण्डं गाण्डिवस्याप्युपचितयशसचण्डतां खण्डयन्तं दोर्दण्डोद्दण्डदर्पप्रकटितविकटध्वानधन्यं धुनानः । काण्डीरः काण्डपातैरथ रिपुरथिनां खण्डयन् मुण्डजालं । तस्तार स्फारधारोद्धुररुधिरधुनीधोरणीभिर्धरित्रीम् ॥' (४, ३९) विविध स्वरों, शब्दों और नादों के वर्णन में हमारे कवि ने कमाल किया है। तृतीय सर्ग में (श्लोक ४६–५०) देवी के मन्दिर में होने वाली विविध ध्वनियों और शब्दों का वर्णन ; अट्ठारहवें सर्ग में (श्लोक ४५–४९) वृन्दावन में भ्रमरों की गूँज, मयूरों की केका, कोयलों की काकली, शुकसारिकाओं की कथा, कपोती का घूत्कार, सारसों और हंसों के शिञ्जित तथा दात्यूह, कबूतर, तीतर आदि के स्वरों का वर्णन; एवं सत्तरहवें सर्ग में (श्लोक ८–१०) युद्ध में होने वाले विविध घोषों का वर्णन बहुत सुन्दर है। ऊपर दिये गये उद्धरणों से पाठकों को हमारे कवि की प्रतिभा का कुछ परिचय प्राप्त हो जायगा। यदि इसका विस्तृत वर्णन और आलोचना की जाय तो भूमिका का कलेवर बहुत बढ़ जायगा। महाकवि चन्द्रशेखर को संस्कृत साहित्य में निःसन्देह बहुत उच्च स्थान प्राप्त होगा। 0

२० इस अमूल्य ग्रन्थरत्न के इतिहास पक्ष का इतिहास के विद्वान् और साहित्यिक पक्ष का साहित्य के विद्वान् विवेचन करें। मेरा कार्य तो इस महान् महाकाव्य को प्रकाश में लाना है। इस ग्रन्थ को हिन्दी अनुवाद और संस्कृत टिप्पणी सहित प्रकाशित करके मैंने संस्कृत-साहित्य और हिन्दी-साहित्य की कुछ सेवा करने का प्रयास किया है। कुछ शब्द अपने अनुवाद के विषय में भी कह दूं । अनुवाद अनुवाद ही होता है और उसमें मूल का सौन्दर्य कदापि नहीं आ सकता । अनुवाद भावों का हो सकता है; शब्द-लालित्य का नहीं हो सकता । और फिर प्रत्येक साहित्य की अपनी अपनी परम्परा होती है जिसका सौन्दर्य अनुवाद में नहीं आ सकता। मेरे सामने कठिनाई यह थी कि यदि संस्कृत का शाब्दिक अनुवाद करूँ तो हिन्दी की हत्या होती है और यदि हिन्दी का ध्यान रखूँ तो संस्कृत का यथार्थ अनुवाद नहीं होता । अपने अनुवाद में मैंने संस्कृत और हिन्दी दोनों का ध्यान रखने का प्रयत्न किया है। जो संस्कृत साधारण जानते हैं वे इस अनुवाद की सहायता से श्लोकों को समझ लेंगे और जो संस्कृत बिलकुल नहीं जानते वे भी, केवल अनुवाद ही पढ़ कर, मेरे विचार से, साहित्य का कुछ रसास्वाद ले सकेंगे । सबसे पहले मैं श्रीमान् दानवीर, गुणग्राही, विद्या-प्रेमी और उदार कोटानरेश के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ क्योंकि उन्हीं की कृपापूर्ण आर्थिक सहायता के कारण यह ग्रन्थ प्रकाशित हो रहा है। इस सत्कार्य में श्रीमान् कोटानरेश के प्रातिस्विक अमात्य और मेरे परम- स्नेहास्पद साहित्य-प्रेमी श्रीमान् आप दलेलसिंह जी साहब ने अत्यन्त सहायता दी है और एतदर्थ उनको हार्दिक धन्यवाद देता हूँ । एक ही आदर्शपुस्तक होने पर पाठसंशोधन आदि का कार्य अत्यन्त जटिल हो जाता है । कहीं कहीं पाठ खण्डित हो रहा है । जो श्लोक आधे से अधिक छूट रहे हैं उनको मैंने वैसे ही रहने दिया है। जहाँ जहाँ कुछ कुछ लेख-त्रुटि हुई है उसे अपनी बुद्धि के अनुसार शुद्ध और पूर्ण कर दिया है। कहीं कहीं जो पाठ मैंने अधिक उचित समझा उसे ही दिया है। पाठ संशोधन और संस्कृत-टिप्पण आदि सत्कार्य में मुझे महामहोपाध्याय वाचस्पति श्रीमान् पण्डित गिरि- धर जी शर्मा चतुर्वेदी और सर्वतन्त्रस्वतन्त्र कवितार्किकचक्रवर्ती श्रीमान् पण्डित महादेव जी पाण्डेय से अत्यधिक सहायता मिली है। इन दोनों गुरुजनों की मुझ पर पूर्ण कृपा रही है और इन दोनों की सहायता और आशीर्वाद के कारण ही यह ग्रन्थ इतने शुद्ध और सुन्दर रूप में निकल रहा है। मैं इन दोनों गुरुजनों के प्रति हार्दिक आभार प्रदर्शित करता हूँ । मैं अपने स्नेही श्रीयुत पं० गौरीशङ्कर जी मिश्र और भार्गव भूषण प्रेस के सर्वस्व श्रीयुत पं० पृथ्वीनाथ जी भार्गव को धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकता क्योंकि इस ग्रन्थ की इतनी सुन्दर छपाई का सारा श्रेय इन सज्जनों को ही है। हिन्दू विश्वविद्यालय, चन्द्रधर शर्मा काशी २५-११-५२

विषयानुक्रमः प्रथमः सर्गः विषयः पृष्ठसंख्या श्लोकसंख्या मङ्गलाचरणम् ... ... ... ... ... ... ... १-२ १-४ सज्जनप्रशंसा ... ... ... ... ... ... ... २ ५ काव्यस्य रचनाहेतुः ... ... ... ... ... ... ... २ ७ खलनिन्दा ... ... ... ... ... ... ... ३ ८ आद्यचौहाननृपतेर्वासुदेवस्य वर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ३-५ ९-१९ तत्पुत्रनरदेववर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ५ २० तत्पुत्रश्रीचन्द्रवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ५ २१ तत्पुत्रस्याऽजयपालस्य वर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ५-६ २२-२३ तत्पुत्रजयराजवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ६ २४ तत्पुत्रसामन्तसिंहवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ६ २५ तत्पुत्रगुर्वकवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ६ २६ तत्पुत्रस्य चन्दनस्य वर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ६-७ २७-२८ तत्पुत्रवज्रस्य वर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ७ २९ तत्पुत्रविश्वपतेः प्रतापवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ७-१० ३०- द्वितीयः सर्गः अन्यभूभृतामविशिष्टतया राज्ञो विश्वपतेर्निर्वेदवर्णनम् ... ... ... ११-१२ १-१२ विश्वपतेर्गुरुपुत्रस्य सुनयस्य वर्णनम् ... ... ... ... १२-१३ १३-२० सुनयस्य रहसि राज्ञे निर्वेदानौचित्यनिवेदनम् ... ... ... १४-१६ २१-४१ सुनयं प्रति विश्वपतेरचलकीर्तिलिप्सोपस्थापनम् ... ... ... १७ ४२-४५ विश्वपतिं प्रति सुनयस्य शाकम्भरीदेव्या आराधनोपदेशः ... १७-२० ४६-६३ तृतीयः सर्गः विश्वपतेः सुनयेन सह शाकम्भरीमन्दिरं प्रति प्रस्थानवर्णनम् .... ... २१-२२ १-१० विश्वपतेः शाकम्भरीप्रदेशप्रवेशवर्णनम् ... ... ... २२-२३ ११-१४ शाकम्भरीमन्दिरपुष्पवाटिकावर्णनम् ... ... ... २३-२४ १५-२२ सुनयकृतं देवीमन्दिरवर्णनम् ... ... ... २४-२९ २३-५० विश्वपतेर्देव्याराधनवर्णनम् ... ... ... २९-३० ५१-६२ देव्याः प्रादुर्भावः ... ... ... ३१ ६३-६९ चतुर्थः सर्गः विश्वपतिकृता देवीस्तुतिः ... ... ... ३२-३५ १-२३ देव्या वरदानं लवणसमुद्रनिर्माणञ्च ... ... ३५-३६ २४-२९

लदेव"? Look at the letter: 'दु' or 'गु'? In 'गुन्ददेव' (line 17), 'गु' has a straight left stem and curved bottom. In line 22, the letter starts with a top horizontal, goes down slightly, curves right and has a tail like 'द', with a 'ु' (u matra). Wait, look at line 21: 'दु' in 'दुर्लभराज'. It is identical! So it is definitely 'दु': 'दुलसदेववर्णनम्'!

Wait, look at line 28: "तत्पुत्रवल्हणप्रतापवर्णनम् ... ... ... ... ६०-६१ ८३-८६" There is a hyphen before ६०: "-६०-६१".

Wait, look at the page number in line 25: ५८-६० The '५' has an ink smudge: looks like ५८-६०.

Let's check line 35: "तदानीमेव सूर्यमण्डलादवतीर्णस्य चतुर्बाहुमतश्चौहाणवंशप्रवर्तकस्य" Wait, does it have dots and page number on line 35? No, line 35 wraps into line 36: "तेजोमयपुरुषस्य वर्णनम् ... ... ... ... ७१ ५८-६०" This is a two-line entry.

Line 37: "पुरोधसा पुष्कर

१. सर्ग १-५: चाहमान (चौहान) वंशोत्पत्ति, शाकम्भरी, अजमेर एवं बूँदी हाड़ा राज्य-स्थापना

२३ विषयः पृष्ठसंख्या श्लोकसंख्या अष्टमः सर्गः अनलदेवेन पुष्करतीर्थे षट्प्रासादमन्दिरोद्याननिर्माणम् ... ... ... ७३-७६ १-२५ तत्पुत्रजगदेववर्णनम् ... ... ... ... ... ७६ २६-२७ तत्पुत्रवीसलदेववर्णनम् ... ... ... ... ... ७६ २८-३१ तत्पुत्राजयपालवर्णनम् ... ... ... ... ... ७६-७७ २९-३१ वसन्तवर्णनम् ... ... ... ... ... ७७-८० ३२-५६ नवमः सर्गः अजयपालस्य कामिनीभिः सह वसन्तशोभादर्शनार्थमुद्यानप्रवेशस्ताभिः सह केलिवर्णनञ्च ... ... ... ८१-८३ १-१८ राज्ञा कस्याश्चिदलौकिकसुन्दर्या दर्शनं राज्ञः कामपीडावर्णनञ्च ... ... ८३-८५ १९-२९ सुन्दर्याः सरोवरेऽन्तर्धानम् ... ... ... ... ८५ ३० राज्ञो विह्वलत्वं तत्प्राप्त्युपायचिन्तनञ्च ... ... ... ८५ ३१-३३ राज्ञः सदसि सिद्धपुरुषागमनं तस्य च सुन्दर्या नागकन्यात्वमुपपाद्य तत्प्राप्त्यर्थं भगवदाराधनमुपदिश्यान्तर्धानम् ... ... ... ८५-८७ ३४-४७ अजयपालस्य भगवत्प्रसादेन सरसि प्रविश्य नागलोकगमनम् ... ... ८७ ४८-४९ नागलोकवर्णनम् ... ... ... ... ... ८७-८८ ५०-५४ राज्ञा शेषनागदर्शनं शेषवर्णनञ्च ... ... ... ८८-८९ ५५- शेषप्रसादेन सुदामनागस्य दुहितरं विजयां परिणीय तया सह राज्ञः स्वराजधानीपरावर्तनम् तत्पुत्रगंगदेववर्णनञ्च ... ... ८९-९० ६२- दशमः सर्गः तत्पुत्रसोमेश्वरवर्णनम् कर्पूरदेव्याः पाणिग्रहणम् ... ... ... ९१ १-६ तयोः पृथ्वीराजमाणिक्यराजयोरुत्पत्तिः ... ... ... ९२ ७-९ पृथ्वीराजवर्णनम् ... ... ... ... ... ९२ १० पृथ्वीराजसविधे कान्यकुब्जेश्वरकन्यकाकान्तिमतीसख्या आगमनं तया कृतं कान्तिमतीसौन्दर्यवर्णनञ्च ... ... ... ... ९२-९३ ११-१८ कान्तिमत्याः पृथ्वीराजेऽनुरागवर्णनं तस्याः पूर्वरागदशाया वर्णनञ्च ... ९३-९७ १९-४६ राज्ञा दूतीमाश्वास्य विसर्जनं छद्मवेशेन सामन्तमुख्यैः सह कान्यकुब्जप्रवेशश्च ९७-९९ ४७-६२ गंगायां मीनैः क्रीडतः पृथ्वीराजस्य कान्तिमत्या दर्शनं तत्सविधे सखीप्रेषणं राज्ञः सखीसंभाषणञ्च ... ... ... ९९-१०४ ६३-९७ राज्ञःप्रच्छन्नवेशेनान्तःपुरे प्रवेश कान्तिमत्या सह स्वपुरं प्रति पलायनञ्च १०४-१०६ ९८-११८ तत्सामन्तानां कान्यकुब्जेश्वरसेनया सह युद्धवर्णनं तेषां वीरगतिश्च ... १०७ ११९-१२२ राजेन्द्रप्रस्थं प्राप्य तत्र कान्यकुब्जेश्वरसेनामन्यनं कान्यकुब्जेश्वरपराजयश्च १०७ १२३-१२५ पृथ्वीराजेन कृतो यवनपतिशहाबुद्दीनपराजयः ... ... ... १०८ १२६-१२८ शहाबुद्दीनेन पृथ्वीराजं निर्जित्य स्वदेशं नीत्वा तस्याऽन्धीकरणम् ... ... १०८ १२९-१३२

२४ विषयः पृष्ठसंख्या श्लोकसंख्या तत्र पृथ्वीराजस्य चन्देन समागमः तत्साहाय्येन शहाबुद्दीनवधश्च ... ... १०८–११३ १३३–१६४ स्वदेशमागत्य पृथ्वीराजस्य स्वर्गमनम् ... ... ... ... ११३ १६५–१६६ एकादशः सर्गः तत्सुतप्रह्लादवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ११४ १–२ तत्सुतगोविन्दराजवर्णनम् ... ... ... ... ... ११४ ३ तत्सुतवीरनारायणवर्णनम् ... ... ... ... ... ११४ ४ तत्सुतवाग्भटवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ११४ ५ तत्सुतजैत्रसिंहवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ११४ ६ जैत्रसिंहात् हम्मीरदेवस्योत्पत्तिः ... ... ... ... ... ११४ ७ हम्मीरदेवयशोवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ११५–११७ ८–२१ हम्मीरदेवस्य पट्टनपुरं प्रति प्रस्थानम् ... ... ... ... ११७ २२–२५ तिलद्रोणिनदीवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ११७–११८ २६–२७ पारियात्रगिरिवर्णनम् तत्र राज्ञा कृताया बिल्वेश्वरपूजाया वर्णनञ्च ... ११८–११९ २८–३७ पट्टपुरवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ११९ ३८ हम्मीरस्य पट्टनपुरप्रवेशश्चर्मण्वतीस्नानं मृत्युञ्जयार्चनञ्च ... ... १२० ३९–४१ हम्मीरस्य सूर्यग्रहणे तुलादानवर्णनम् ... ... ... ... १२०–१२२ ४२–५६ हम्मीरकृतयज्ञस्य वर्णनम् ... ... ... ... ... १२२–१२३ ५७–६३ अलाउद्दीनभ्रातुरुलूगखानस्य रणस्तम्भपुराक्रमणं हम्मीरदेवसेनापतिना रणमल्लेन पराजितस्य तस्य पलायनञ्च ... ... ... १२४ ६४–७० अलाउद्दीनस्य रणस्तम्भपुराक्रमणम् ... ... ... १२४–१२५ ७०–७३ तच्छ्रुत्वा हम्मीरस्य रणस्तम्भपुरं प्रति प्रस्थानम् ... ... ... १२५ ७४ द्वादशः सर्गः हम्मीरस्य रणस्तम्भपुरप्रवेशः ... ... ... ... १२६ १–२ अलाउद्दीनेन प्रेषितस्य दूतस्य हम्मीरसविधे आगमनं स्वस्वामिसन्देशवर्णनं तत्सन्देशमस्वीकृत्य हम्धीरेण दूतविसर्जनञ्च ... ... ... १२६–१३२ ३–४३ स्वपक्षविद्रोहिणा रणमल्लेन सहितस्य अलाउद्दीनस्य विशालसेनाया वर्णनम् ... १३२–१३३ ४४–४७ हम्मीरकृतं समयनृशंसतावर्णनं कृतघ्नमहिमाशाहोदिभिर्यवनवीरैः सह हम्मीर- देवस्य दुर्गादियुद्धभूमावतारश्च ... ... ... ... १३३–१३४ ४८–५४ हम्मीरमहिषीणां 'जौहर' वर्णनम् ... ... ... ... १३४ ५५ हम्मीरस्यालाउद्दीनेन सह युद्धवर्णनं हम्मीरदेवस्य वीरगतिप्राप्तिश्च ... १३४–१३७ ५७–७७ त्रयोदशः सर्गः हम्मीरदेवस्य सप्तमपूर्वजस्य पृथ्वीराजस्य भ्रातुर्माणि क्यराजस्य तद्वंश्यानां . चन्दराज-भीमराज-विजयराज-रयण-कोह्लणगङ्गदेवानाञ्च वर्णनम् ... १३८–१३९ १–१२ गङ्गदेवसुतदेवसिंहवर्णनम् ... ... ... ... ... १३९ १३ तत्सुतसमरसिंहवर्णनम् ... ... ... ... ... १३९ १४

२५ विषयः पृष्ठसंख्या श्लोकसंख्या तत्सुतनरपालवर्णनम् ... ... ... ... ... ... १३९ १५ तत्सुतहम्मीरवर्णनम् ... ... ... ... ... ... १४० १६ तत्सुतवरसिंहवर्णनम् ... ... ... ... ... ... १४० १७ तत्सुतभारमल्लवर्णनम् ... ... ... ... ... ... १४० १८ तत्सुतनर्मदवर्णनम् ... ... ... ... ... ... १४० १९ तत्सुतस्यार्जुनस्य वर्णनम् ... ... ... ... ... ... १४०-१४१ २०-२८ अर्जुनेन जयन्त्याः पाणिग्रहणम् तस्याः सौन्दर्यवर्णनञ्च ... ... ... १४१-१४२ २९-३३ पुत्रप्राप्त्यर्थं राज्ञोऽर्जुनस्य तपोवर्णनं भगवतो विष्णोः प्रसादात् जयन्त्यां सुर्जनस्योत्पत्तिश्च ... ... ... ... ... ... १४२-१४३ ३४-४५ सुर्जनस्य शैशवयौवनयोः राज्याभिषेकस्य च वर्णनम् ... ... ... १४४-१४६ ४६-६७ सुर्जनमहाराजस्य प्रतापवर्णनम् ... ... ... ... ... १४७-१५० ६८-८० चतुर्दशः सर्गः सुर्जनस्य जगमालसुतां कनकावतीं परिणेतुं जगमालपुरं प्रति प्रस्थानम् तत्र प्रवेशश्च ... ... ... ... ... १५१ १-५ विवाहोत्सवे गीतनृत्यादिवर्णनम् वध्वास्तैलमर्दनस्नानादिवर्णनञ्च ... १५१-१५२ ६-१३ कनकावतीशृङ्गारवर्णनं तस्याः विवाहमण्डपं प्रति प्रस्थानञ्च ... ... १५३-१५५ १४-२८ सन्ध्यावर्णनं रात्रिवर्णनं चन्द्रोदयवर्णनञ्च ... ... ... १५५-१६१ ३१-६४ कनकावतीपरिणयः सुर्जनकनकावतीदेव्योर्मिथः स्नेहवर्णनञ्च ... ... १६१-१६५ ६५-१०१ पञ्चदशः सर्गः सूर्योदयवर्णनम् ... ... ... ... ... ... १६६-१६८ १-६ यानोन्मुखीं कनकावतीं प्रति तन्मातुरुपदेशः ... ... ... १६८-१७० १६-३३ सुर्जनस्य भार्यया सह स्वराजधानीपरावर्तनम् ... ... ... १७१ ३५-३६ ग्रीष्मवर्णनम् ... ... ... ... ... ... १७१-१७४ ३८-५५ सुर्जनस्य वारिविहारवर्णनम् ... ... ... ... ... १७४-१७८ ५६-८० षोडशः सर्गः सुर्जनकनकावत्योः पुत्रस्य भोजस्य पराक्रमवर्णनम् ... ... ... १७९ १-४ अकबरसेनायाः रणस्तम्भपुराक्रमणं तत्पराजयंश्च ... ... ... १७९-१८० ५-११ ततः प्रभूतसेनान्वितस्याकबरस्य रणस्तम्भपुराक्रमणम् तच्छ्रुत्वा सुर्जनस्य सेनया सह पट्टनपुररात् रणस्तम्भपुरं प्रति प्रस्थानम् ... ... ... १८०-१८४ ११-४२ सुर्जनसेनया नद्युत्तरणम् रणस्तम्भपुरप्रवेशश्च ... ... ... १८४-१८७ ४३-५५ सप्तदशः सर्गः अकबरसेनाया वर्णनम् ... ... ... ... ... १८८-१८९ १-१० सुर्जनाकबरसेनयोस्तुमुलयुद्धवर्णनम् ... ... ... ... १८९-१९१ ११-२६ युद्धभूमी सुर्जनपराक्रमवर्णनम् ... ... ... ... १९१-१९६ २७-५६ Dr. Urmila Sharma Collection, Varanasi