सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
१२४ सूरसागर सार सटीक ऐसैं जनि बोलहु नंद-लाला । छाँड़ि देहु अँचरा मेरौ नीकैं, जानत और सी वाला । बार-बार मै तुमहिं कहत हौं, परिहौ बहुरि जँजाला । जोवन, रूप देखि ललचाने, अवहीं तैं ये ख्याला । तरुनाई तनु आवन दीजै, कत जिय होत विहाला । सूर स्याम उर तैं कर टारहु, टूटै मोतिनि-माला ॥११२॥ अर्थ—(गोपी कहती है) हे नन्दलाल ऐसे मत कहो । मेरे सुन्दर अंचल को छोड़ दो, मुझे अन्य बालाओं के समान (तो नहीं) समझ रहे हो । मैं वार-वार तुमसे कहती हूँ कि फिर तुम जंजाल मे पड़ जाओगे । यौवन रूप को देखकर (आप) ललचा गये और अभी से ये बाते सोचने लगे । शरीर मे जवानी आने दीजिए; मन (अभी से) आकुल क्यों होता है । सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) वक्षस्थल से हाथ हटा लो (नही तो) मोतियो की माला टूट जायेगी ॥११२॥ तैं कत तोर्यौ हार नौ सरि कौ । मोती वगरि रहे सब-वन मैं, गयौ कान कौ तरिकौ । ये अवगुन जु करत गोकुल मैं, तिलक दिये केसरि कौ । ढीठ गुवाल दही कौ मातौ, ओढ़नहार कमरि कौ । जाइ पुकारैं जसुमति आगैं, कहति जु मोचन लरिकौ । सूर स्याम जानी चतुराई, जिहिँ अभ्यास महुअरि कौ ॥११३॥ अर्थ—तुमने नव लड़ियो का हार क्यों तोड़ दिया ? (टूटकर) सब मोती वन में बिखर गये । कान का तरीना भी (चला) गया । केसर का तिलक देकर गोकुल मे इन अवगुणो को करते हो । (तुम) दही से मस्त, तथा कमरी के ओढ़ने वाले ढीठ ग्वाल हो । जाकर पुकार कर यशोदा के आगे कहूँगी जो मोहन को बालक कहती हैं । सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) कृष्ण चतुरता जान गये जिन्हे महुअर (बाजा) का अभ्यास हो गया है ॥११३॥ आपुन भईं सवै अब भोरी । तुम हरि कौ पीताम्बर झटक्यौ, उन तुम्हरी मोतिनि लर तोरी । माँगत दान ज्वाव नहिं देतीं, ऐसी तुम जोवन की जोरी । डर नहिं मानतिं नंद-नंदन कौ, करतिं आनि झकझोरा झोरी । इक तुम नारि गँवारि भली हौ, त्रिभुवन मैं इनकी सरि को री । सूर सुनहु लैहैं छँडाइ सब, अवहिँ फिरौगी दौरी दौरी ॥११४॥ अर्थ—अब सभी अपने आप अनजान (भोली) हो गयी, तुमने कृष्ण का पीतांबर झटका, उन्होने तुम्हारी मोतियो की लड़ी तोड़ी । (उनके) दान मांगने पर (तुम लोग) जवाब नहीं देती, (तुम) ऐसी यौवन के जोर वाली हो गयी हो । तुम नन्द के नन्दन (कृष्ण) का डर नही मानती जो इस तरह आकर धक्का-मुक्की करती हो ।
वृन्दावन लीला १२५ एक तो तुम स्त्री. हो, दूसरे मूर्खा भी भली भांति हो भला संसार मे इनके समान कौन है। सूरदास कहते है अभी सब छुड़ा लेंगे तो दौड़ी-दौड़ी फिरोगी ॥११४॥ हँसत सखनि यह कहत कन्हाई । जाइ चढ़ी तुम सघन द्रुमनि पर, जहँ तहँ रहौ छपाई । तब लौँ बैठि रहौ मुख मूंदे, जब जानहु सब आई । कूदि परौ तब द्रुमनि-द्रुमनि तैं, दै दै नंद दुहाई । चकित होहिं जैसैं जुवती-गन, डरनि जाहिं अकुलाई । बेनु-विषाण-मुरलि-धुन कीजौ, संख-सब्द गहनाई । नित प्रति जाति हमारै मारग, यह कहियौ समुझाई । सूर स्याम माखनदधि दानी, यह सुधि नाहिँ न पाई ? ॥११५॥ अर्थ -- हँसते हुए मित्रो से कृष्ण यह कहते है । तुम जाकर घने वृक्षो पर चढ़कर जहां-तहां छिप रहो । तब तक मुंह मूंद कर बैठे रहो और जब जानो कि सब (गोपियां) आ गई तब पेड-पेड़ से नन्द की दुहाई देकर कूद पड़ो । जैसे युवतियों का समूह चकित और आकुल होकर डर से घबरा जाय तो बंशी, विषाण, मुरली की ध्वनि करना और शंख का गहन शब्द करना । नित्य प्रति (तुम लोग) हमारे मार्ग से जाती हो यह समझा कर कहना । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण माखन और दही के दानी हैं क्या यह खबर नहीं है ॥११५॥ ग्वारिनि जब देखे नंद-नंदन । मोर मुकुट पीताम्बर काछे, खौरि किए तन चंदन । तब यह कह्यौ कहाँ अब जैहौ, आगैँ कुँवर कन्हाई । यह सुनि मन आनन्द बढ़ायौ, मुख कहैं, बात डराई । कोउ-कोउ कहति चलौ री जैये, कोउ कहै घर फिरि जैये । कोउ-कोउ कहति कहा करिहैं हरि, इनसौँ कहा परैयै । कोउ-कोउ कहति कालिहीँ हमकौँ, लूटि लई नंद लाल । सूर स्याम के ऐसे गुन हैं, घरहिँ फिरौ ब्रज-बाल । ११६०। अर्थ - ग्वालिनो ने जब कृष्ण को देखा जो मोर मुकुट तथा पीताम्बर से सजे थे तथा शरीर पर चन्दन का लेप किये थे तो कहा कि अब कहाँ जायेगे, आगे कुंवर कृष्ण हैं। यह सुनकर मन मे आनन्द बढ़ गया और मुख से डरती हुई बात कहती है । कोई कोई कहती हैं (आगे) चली चलो । कोई कहती है घर वापस चलिये ! कोई कहती है कृष्ण क्या करेगे इनसे कैसे भागा जाय । कोई कहती है कि कल ही हमको कृष्ण ने लूट लिया था। सूरदास कहते है कि कृष्ण के ऐसे ही गुण है इसलिए ब्रज- बालाएँ घर की ओर वापस चली गई ॥११६॥ कान्ह कहत दधि-दान न दैहौ ? लैहौँ छीनि दूध दधि माखन, देखति ही तुम रैहौ ।
१२६ सूरसागर सार सटीक सब दिन की भरि लेउँ आजुहीं, तब छाड़ी, मैं तुमकौ। उघटति हो तुम मातु-पिता लौं, नहिं जानत हो हमकौ। हम जानति हैं तुमकौ मोहन, लै-लै गोद खिलाए। सूर स्याम अब भये जगाती, वै दिन सब विसराए ॥११७॥ अर्थ—कृष्ण कहते हैं कि (यदि) तुम दही का दान नहीं दोगी तो दूध, दही, मक्खन छीन लूंगा (तुम) देखती ही रह जाओगी। सब दिन (की कमी) आज ही पूरी कर लूंगा तब मैं तुमको छोड़ूँगा। तुम माता-पिता तक को बुरा-भला कहती हो (लेकिन) मुझे जानती नहीं हो। (गोपियाँ कहती हैं) हम मोहन तुमको जानती हैं तुम्हें गोद मे लेकर खिलाया है। सूरदास कहते हैं (गोपियाँ कहती हैं) अब तुम कर उगाहने वाले हो गये हो, उन दिनो को भुला दिया ॥११७॥ जाइ सबै कंसहि गुहरावहु। दधि माखन घृत लेत छुड़ाए, आजु हजूर बुलावहु। ऐसे कौं कहि मोहिं बतावति, पल भीतर गहि मारौं। मथुरापतिहिं सुनौगी तुमहीं, जब धरि केस पछारौं। बार-बार दिन हमहिं बतावति, अपनौ दिन न विचार्यौ। सूर इन्द्र ब्रज जबहिं बहावत, तब गिरि राखि उबार्यौ ॥११८॥ अर्थ—जाकर तुम सब लोग कंस को गुहारो। दही, माखन, घी, छुड़ाए लेते हैं; आज हुज़ूर को बुलाओ। ऐसे आदमी को मुझसे कहकर बताती हो जिसे पल भर मे मार डालूं। तुम ही सुनोगी जब मथुरा पति को बाल पकड़कर पछाड़ूँगा। बार- बार हमसे दिन बताती हो अपना दिन नहीं विचारती। सूरदास कहते हैं कि जब इन्द्र ने ब्रज को बहाना चाहा तब मैंने (कृष्ण ने) गिरि के द्वारा रक्षा की थी ॥११८॥ मोसौँ बात सुनहु ब्रज-नारी। इक उपखान चलत त्रिभुवन मैं, तुमसों कहौं उघारी। कबहूँ बालक मुँह न दीजिये, मुँह न दीजिये नारी। जोइ मन करै सोइ करि डारैं, मूँड़ चढ़त हैं भारी। बात कहत अँठिलाति जाति सब, हँसति देति कर तारी। सूर कहा ये हमकौँ जानैँ, छाँछहिँ बेंचैनहारी ॥११९॥ अर्थ—हे ब्रज की नारियो मुझसे (एक) बात सुनो। तीनो लोकों में एक उपाख्यान (कहावत) चलता है उसे उघाड़कर कहता हूँ। कभी बालक तथा स्त्री को मुंह नही लगाना चाहिए। जो (ये) करना चाहे वही कर डाले तो सिर पर सवार हो जाते हैं। बात कहने पर (गोपियाँ) हँसती, ताली देती ओर अठिलाती चली जाती हैं। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण कहते हैं) ये छाछ बेचने वाली स्त्रियां हमको क्या जाने ॥११९॥
[वृन्दावन लीला ५२७ यह जानति तुम नंदमहर-सुत । धेनु दुहत तुमकौं हम देखतिं, जबहिं जाति खरिकहिं उत । चोरी करत यहौ पुनि जानति, घर-घर ढूँढ़त भाँड़े। मारग रोकि भए अब दानी, वे ढँग कब तैं छाँड़े। और सुनौ जसुमति जब बांधे, हम कियौ सहाइ । सूरदास-प्रभु यह जानति हम, तुम ब्रज रहत कन्हाइ ॥१२०॥ अर्थ—यह जानती है कि तुम नन्द महर के पुत्र हो। तुमको गाय दुहते हुए हम देखते है जब भी गायो के रहने के स्थान से होकर जाती हैं। फिर यह जानती है कि तुम चोरी करते हो और घर-घर बर्तन ढूंढते फिरते हो। अब दानी होकर मार्ग रोकने लगे हो। उन कार्यों (ढगो) को कब से छोड़ दिया। और सुनो, यशोदा जब बांधती थी तब हम ही सहायक होती थी। सूरदास कहते है कि (हम गोपी) यह जानती हैं कि तुम कृष्ण ब्रज मे रहते हो ॥१२०॥ को माता को पिता हमारैं । कब जनमत हमकौं तुम देख्यौ, हँसियत बचन तुम्हारैं । कब माखन चोरी करि खायौ, कब बाँधे महतारी । दुहत कौन गैया चारत, बात कहो यह भारी । तुम जानत मोहिं नंद-दुठौना, नंद कहाँ तैं आए । मैं पूरन अविगत, अविनासी, माया सबनि भुलाए । यह सुनि ग्वालि सबै मुसुक्यानी, ऐसे गुन हौ जानत । सूर स्याम जो निदर्यौ सबही, मात-पिता नहिं मानत ॥१२१॥ अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) मेरी कौन माता है और कौन पिता है। हमको कब जन्मते देखा, तुम्हारी बातो पर हँसी आती है।—कब माखन चुराकर खाया, कब माता ने हमे बांधा। किसकी गाय दुहता और चराता हूँ, तुमने यह बडी बात कही। तुम मुझे नन्द का पुत्र समझती हो लेकिन नन्द कहां से आये। मैं पूर्ण, अविगत, अविनाशी (हूँ) माया से सभी भूले हैं। यह सुनकर सभी ग्वालिने मुसकायी, ऐसे गुण को हम जानती हैं। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है) जो सबका निरादर करता है तथा माता-पिता को नही मानता (ऐसे तुम्हे जानती हूँ) ॥१२१॥ भक्त हेत अवतार धरौं । कर्म-धर्म कैं वस मैं नाहीं, जोग जज्ञ मन मैं न करौं । दीन-गुहारि सुनौं श्रवननि भरि, गर्व-वचनसुनि हृदय जरौं । भाव-अधीन रहौं सबही कै, और न काहू नैंकु डरौं । ब्रह्मा कीट आदि लौं व्यापक, सबकौं सुख दै दुखहिं हरौं । सूर स्याम तब कही प्रगटही, जहाँ भाव तहँ तैं न टरौं ॥१२२॥
५२८ सूरसागर सार सटीक अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) भक्त के लिए अवतार धरता हूँ । धर्म-कर्म के वश में नही रहता हूँ । योग और यज्ञ को मन में (धारण) नही करता । दीन की पुकार को कान भर के सुनता हूँ । गर्व के वचन सुनकर हृदय से जल जाता हूँ । सब के (भक्ति) भाव के अधीन रहता हूँ, और किसी से तनिक भी नही डरता । ब्रह्मा से लेकर कीट तक व्याप्त हूँ, सब को सुख देकर दुःख को हरता हूँ । सूरदास कहते हैं तब कृष्ण ने प्रत्यक्ष ही (सब कुछ कहा) कि जहाँ भाव है वहाँ से मै नही टलता ॥१२२॥ जौ तुमहीं हौ सबके राजा। तौ बैठौ सिहासन चढ़ि कै, चँवर, छत्र, सिर भ्राजा । मोर-मुकुट, मुरली पीतावर, छाड़ी नटवर-साजा । वेनु, विषाण, सख क्यों पूरत, वाजै नौवत वाजा। यह जु सुनैं हमहूँ सुख पावैं, सग करैं कछु काजा । सूर स्याम ऐसी बातैं सुनि, हमकौं आवति लाजा ॥१२३॥ अर्थ—(गोपियां कहती हैं) जब तुम ही सब के राजा हो तो सिहासन पर चढ़कर बैठो, ओर सिर पर चंवर तथा छत्र सुशोभित हो । मोर-मुकुट, मुरली, पीताम्बर और नटवर के वेश को छोड़ दो । बंशी, विषाण शंख क्यों बजाते हो, नौवत बजे । यह जो सुने तो हम भी सुख पाये, और साथ मे कुछ काम करें । सूरदास कहते है कि यह बाते सुनकर हमको लज्जा आती है ॥१२३॥ हमहिं और सो रोकै कौन । रोकनहारौ नदमहर सुत, कान्ह नाम जाकौ है तौन । जाकैं वल है कामनृपति कौ, ठगत फिरत जुवतिनि कौं जोन । टोना डारि देत सिर ऊपर, आपु रहत ठाढ़ौ ह्वै मौन । सुनहु स्याम ऐसी न बूझियै, वानि परी तुमकौं यह कौन । सूरदास-प्रभु कृपा करहु अब, कैसेंहु जाहिं अपनै भौन ॥१२४॥ अर्थ - (गोपियां कहती हैं) हमको और कौन रोक सकता है । रोकने वाले वही महर नन्द के पुत्र हैं, जिनका नाम कृष्ण है । जिनके पास राजा के समान काम करने का बल है, जो युवतियो को ठगते फिरते है । सिर के ऊपर टोना डालकर स्वयं मौन होकर खडे रहते है । हे कृष्ण सुनो समझ मे नही आता कि तुम्हारी यह कौन सी आदत पड़ गयी है । हे कृष्ण अब कृपा करो किसी प्रकार हम अपने घर जायें ॥१२४॥ राधा सौं माखन हरि माँगत । औरनि की मटुकी कौ खायौ, तुम्हरौ कैसी लागत । लै आई वृषभानु-सुता, हँसि, सद लवनो है मेरौ । लै दीन्हौ अपनैं कर हरि-मुख, खात अल्प हँसि हेरौ । सबहिनि तैं मीठौ दधि है यह, मधुरैं कह्यौ सुनाइ । सूरदास-प्रभु सुख उपजायौ, ब्रज ललना मनभाइ ॥१२५॥
वृन्दावन लीला १५५ अर्थ-कृष्ण राधा से मक्खन मांगते है। और कहा कि औरों की मटकी का (मक्खन) खाया । (देखूं) तुम्हारा कैसा लगता है। वृषभानु की पुत्री (मक्खन) ले आयी और हँस कर (बोली) मेरा मक्खन ताजा है। (राधा ने मक्खन) लेकर अपने हाथ से हरि के मुंह में दिया, और खाते हुए थोड़ा हँस कर देखा। कृष्ण ने कहा सबसे अधिक मीठा दही है, यह मीठी बात कहकर (कृष्ण ने) सुनायो । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने ब्रज की स्त्री (राधा) के मन को अच्छा लगने वाले सुख को उत्पन्न किया ॥१२५॥ मेरे दधि कौ हरि स्वाद न पायौ । जानत इन गुजरिनि कौ सौ है, लयौ छिड़ाइ मिलि ग्वालनि खायौ । धौरी धेनु दुहाइ छानि पय, मधुर ऑचि मैं औटि सिरायौ । नई दोहनी पोंछि पखारी, धरि निरधूम खिरनि पै तायौ । तामैं मिलि मिस्रित मिसिरी करि, दै कपूर पुट जावन नायौ । सुलभ ढकनियाँ ढाँकि बाँधि पट, जतन राखि छीकैं समुदायौ । हौं तुम कारन लै आई गृह, मारग मैं न कहूँ दरसायौ । सूरदास-प्रभु रसिक-सिरोमनि, कियौ कान्ह ग्वालिनि मन भायौ ॥१२६॥ अर्थ-(एक ग्वालिन कहती है) मेरे दही का स्वाद कृष्ण ने नही पाया । समझा कि मेरा दही अन्य गुजरियों जैसा है। लेकर सब ग्वालो मे वांट कर खाया । धौरी (सफेद गाय) को दुहाकर, दूध को छानकर, हल्की आंच में गरम करके फिर ठंडा किया । नयी दोहनी को पोछकर धोया और बिना धुएँ की अंगीठी पर ताया। उसमें मिसरी मिलाकर कपूर के पुट के साथ जावन दिया । अच्छी ढकनियां से ढाँक कर कपड़े से बांधा और चिन्ता के साथ छीके पर रख दिया। मैं तुम्हारे ही कारण (इसे) ले आँई, घर ओर रास्ते में किसी को नहीं दिखाया । सूरदास कहते है कि कृष्ण रसिकों में शिरोमणि हैं, उन्होंने ग्वालिन के मन की बात की ॥१२६॥ गोपी कहति धन्य हम नारी । धन्य दूध, धनि दधि, धनि माखन,हम परूसति जेंवत गिरिधारी । धन्य घोष, धनि दिन, धनि निसि वह, धनि गोकुल प्रगटे वनवारी । धन्य सुकृत पाँछिलौ, धन्य धनि नँद, धन्य जसुमति महतारी । धनि धनि ग्वाल, धन्य वृन्दावन, धन्य भूमि यह अति सुखकारी । धन्य दान, धनि कान्ह मँगैया, धन्य सूर त्रिन-द्रुम बन-डारी ॥१२७॥ अर्थ-गोपियां कहती है कि हम स्त्रियाँ धन्य हैं, दूध धन्य है, दही धन्य है, माखन धन्य है जिन्हे हम परोसती है और गिरधारी खाते है। अहीरों का गांव धन्य है, दिन धन्य है और वह रात्रि धन्य है, गोकुल धन्य है, जहां कृष्ण प्रकट हुए । पिछला पुण्य धन्य है, नन्द धन्य हैं, यशोदा माता धन्य है, वृन्दावन धन्य है, अत्यधिक सुख देने वाली यह भूमि धन्य है। दान धन्य है, मांगने वाले कृष्ण धन्य हैं। सूरदास कहते हैं कि तृण, वृक्ष तथा वन की डाले धन्य है ॥१२७॥ दं
१३० सूरसागर सार सटीक गन गंधर्व देखि सिहात । धन्य ब्रज-ललनानि कर तें, ब्रह्म माखन खात । नहीं रेख, न रूप, नहिं तनु, बरन नहिं अनुहारि । मातु-पितु नहिं दोउ जाकैं, हरत-मरत न जारि । आपु कर्त्ता आपु हर्त्ता, आपु त्रिभुवन नाथ । आपुहीँ सब घट कौ व्यापी, निगम गावत गाथ । अंग प्रति-प्रति रोम जाकै, कोटि-कोटि ब्रह्मांड । कीट ब्रह्म प्रजंत जल-थल, इनहिं तैं यह मंड । येइ विस्वंभरन नायक, ग्वाल-संग-विलास । सोइ प्रभु दधि दान माँगत, धन्य सूरजदास ॥१२८॥ अर्थ—गन्धर्वगण देखकर सिहाते है कि ब्रज की स्त्रियो से ब्रह्म (कृष्ण) मक्खन खाते हैं । जिनकी न कोई रेखा, न रूप है, न शरीर का कोई रङ्ग है, जिनकी समता नही है । माता-पिता दोनो जिसके नही हैं, जिसे न कोई हरता है और न जो स्वयं मरता है, न नष्ट होता है । जो स्वयं कर्त्ता है, स्वयं हर्त्ता है और तीनों लोकों का स्वामी है । स्वयं सब घटों मे व्याप्त है । वेद-शास्त्र जिनकी गाथा गाते हैं, जिनके एक-एक रोम मे करोडों ब्रह्माण्ड है । कीट से ब्रह्म तक जल, थल और नभ की इन्ही से शोभा है, यही विश्वम्भर नायक कृष्ण ग्वालो के साथ खेलते हैं । वही प्रभु दही का दान मांगते हैं । सूरदास कहते हैं कि (गोपियां) धन्य हैं ॥१२८॥ ब्रह्म जिनहिं यह आयसु दीन्हौ । तिन तिन सग जन्म लियौ परगट, सखी सखा करि कीन्हौ । गोपी ग्वाल कान्ह द्वै नाहीं, ये कहुँ नैंकु न न्यारे । जहाँ-जहाँ अवतार धरत हरि, ये नहिं नैंकु बिसारे । एकै देह बहुत करि राखे, गोपी ग्वाल मुरारी । यह सुख देखि सूर कै प्रभु कौँ, थकित अमर-संग-नारी ॥१२६॥ अर्थ—ब्रह्म (कृष्ण) ने जिन (लोगो) को आज्ञा दी, उन-उन (लोगो) ने इनके साथ जन्म लिया । (कृष्ण ने) इन्हे सखा और सखी करके (यथा उचित) माना । गोपी-ग्वाल और कृष्ण दो नही है । ये कही तनिक भी अलग नही है। जहां-जहां कृष्ण (अवतार) धरते हैं इन्हे तनिक भी नही भूलते । एक ही शरीर है उसे गोपी, ग्वाल और मुरारी के बहुत (रूपो) मे बना रखा है । सूरदास कहते है कि कृष्ण के इस सुख को देखकर देवताओ के साथ की स्त्रियां थकित (बेचैन) हो जाती हैं ॥१२६॥ यह महिमा येई पै जानैं । जोग-यज्ञ तप ध्यान न आवत, सो दधि-दान लेत सुख मानैं । खात परस्पर ग्वालनि मिलि कै, मीठौ कहि कहि आप बखानैं । विस्वंभर जगदीस कहावत, ते दधि दोना माँझ अघानैं ।
वृन्दावन लीला १३१ आपुहिं करता, आपुहिं हरता, आपु बनावत, आपुहिँ भाने । ऐसे सूरदास के स्वामी, ते गोपिनि कैँ हाथ बिकाने ॥१३०॥ अर्थ-यह महिमा ये ही जानते हैं। योग, यज्ञ, तप, ध्यान में जो नही आते वे ही (कृष्ण) दही का दान लेते सुख मानते हैं। आपस मे ग्वालों के साथ (दही) खाते हैं और मीठा कह कहकर स्वयं बखान करते है। (जो) जगदीश विश्व का भरण करने वाले कहाते हैं वही दोना भर दही से अघा जाते हैं। स्वयं कर्त्ता है, स्वयं हर्त्ता हैं, स्वयं बनाते है और स्वयं नष्ट करते है। सूरदास कहते हैं कि ऐसे स्वामी कृष्ण गोपियो के हाथ बिक गये हैं ॥१३०॥ सुनहु बात जुवती इक मेरी । तुमतेँ दूरि होत नहिँ कबहूँ, तुम राख्यो मोहिं घेरी । तुम कारन बैकुंठ तजत हौं, जनम लेत ब्रज आइ । वृन्दावन राधा-गोपी सँग, यहि नहिँ बिसरचौ जाइ । तुम अंतर-अंतर कह भाषति; एक प्रान द्वै देह । क्यों राधा ब्रज बसैँ बिसारौँ, सुमिरि पुरातन नेह । अब घर जाहु दान मैं पायौ, लेखा कियौ न जाइ । सूर स्याम हँसि-हँसि जुवतिनि सौँ, ऐसी कहत बनाइ ॥१३१॥ अर्थ-(कृष्ण कहते है) हे युवतियों, मेरी एक बात सुनो । (मैं) कभी तुमसे दूर नही होता हूँ। तुमने मुझे चारो ओर से घेर रखा है। तुम्हारे लिए बैकुण्ठ छोडकर ब्रज मे आकर जन्म लेता हूँ। राधा और गोपियो के साथ यह वृन्दावन भूल नही जाता । तुम भेद-भेद कहती हो (किन्तु) (दोनो) मे एक ही प्राण हैं (केवल) शरीर दो है। पुराने स्नेह को याद करके राधा के ब्रज के निवास को क्यो भूलूंगा। अब घर जाओ, मैंने दान पा लिया क्योकि (दान का) हिसाब नही किया जा सकता । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण हँस-हँसकर युवतियो से इस प्रकार (बात) बनाकर कहते हैं ॥१३१॥ तुमहिँ बिना मन धिक अरु धिक घरु । तुमहिँ बिना धिक-धिक माता पितु, धिक कुल-कानि, लाज, डरु । धिक सुत पति, धिक जीवन जग कौ, धिक तुम बिनु संसार । धिक सौ दिवस, पहर, घटिका, पल जो बिनु नंद-कुमार । धिक धिक स्रवन कथा बिनु हरि कै, धिक लोचन बिनु रूप । सूरदास प्रभु तुम बिनु घर ज्यौं, बन भीतर के कूप ॥१३२॥ अर्थ-(गोपियां कहती है) तुम्हारे बिना मन ओर घर (सबको) धिक्कार है। तुम्हारे बिना माता और पिता धिक्कार योग्य है ओर कुल की मर्यादा, लज्जा, डर सबको धिक्कार है। तुम्हारे बिना पुत्र, पति, जग का जीवन तथा संसार को धिक्कार है । वह दिन, पहर, घड़ी, पल सब धिक्कारने योग्य हैं जो बिना नदकिशोर (कृष्ण) के हैं। कानो को धिक्कार है जो कृष्ण की कथा के बिना है तथा नयनो को धिक्कार है
१३२ सूरसागर सार सटीक जिनमें आपका रूप नहीं । सूरदास कहते है कि कृष्ण तुम्हारे बिना घर वैसे ही है जैसे वन के भीतर कुँआ (निरर्थक) हो ॥१३२॥ रीती मटुकी सीस धरैं । वन की घर की सुरति न काहूँ, लेहु दही या कहति फिरैं । कवहूँक जाति कुंज भीतर कीँ, तहाँ स्याम की सुरति करैं । चौँकि परतिं, कछु तन सुधि आवति, जहाँ तहां मुख सुनति ररैं । तब यह कहतिं कहीं मैं इनसौँ, भ्रमि भ्रमि वन में वृथा मरैं । सूर स्याम कैं रस पुनि छाकतिं, वैसे हीं ढँग बहुरि ढरैं ॥१३३॥ अर्थ - (गोपियां) खाली मटुकी सिर पर घर लेती है । वन की ओर घर की (उन्हे) याद नही, लो दही यह कहती फिरती हैं । कभी कुंज के भीतर जाती हैं और वहाँ कृष्ण की याद करती हैं । कुछ शरीर की याद आने पर चौंक पड़ती हैं ओर जहाँ तहां सखियो को सुनाते हुए वार-वार कहती हैं । तब यह कहती हैं कि मुझे इनसे क्या करना है जो वन घूम-घूमकर व्यर्थ मरती हूँ । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के रस से पुनः मस्त हो जाती हैं वैसा ही ढङ्ग फिर धर लेती हैं ॥१३३॥ तरुनी स्याम-रस मतवारि । प्रथम जोवन-रस चढ़ायौ, अतिहि भई खुमारि । दूध नहिं दधि नहीँ, माखन नहीं रीती माट । महा-रस अँग-अंग पूरन, कहाँ घर, कहँ वाट । मातु-पितु गुरुजन कहाँ के, कौन पति को नारि । सूर प्रभु कैं प्रेम पूरन, छकि रहीं ब्रजनारि ॥१३४॥ अर्थ - तरुणिंयां कृष्ण के रस मे मतवाली हो गई हैं । प्रथम यौवन के रस के चढ़ जाने से वे अत्यधिक शिथिल हो गयी । दूध नही, दही नही, मक्खन नही, मटुकी खाली है। अंग-अंग मे महारस भर गया है । कहां घर और कहां रास्ता, कहाँ के माता-पिता, कौन पति और कौन स्त्री (उन्हे कुछ भी ज्ञात नही) । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के प्रेम-रस से पूर्ण ब्रज नारियां मस्त हो गयी हैं ॥१३४॥ कोउ माई लैहै री गोपालहिं । दधि की नाम स्यामसुंदर-रस, विसरि गयौ ब्रज-वालहिँ । मटुकी सीस, फिरति ब्रज-वीथिनि, बोलति बचन रसालहिँ । उफनत तक्र चहूँ दिसि चितवत, चित लाग्यौ नँद-लालहिँ । हँसति, रिसाति, बुलावति, वरजति, देखहु इनकी चालहिँ । सूर स्याम बिनु और न भावै, या विरहिनि बेहालहिँ ॥१३५॥ अर्थ- सखी, कोई गोपाल को लेगा । श्यामसुन्दर के रस मे ब्रज की युवती को दही का नाम ही भूल गया । मटुकी को सिर पर (धर के) ब्रज की गलियो मे रस से भरी बाते कहती है । मट्ठा के उफनते समय चारों दिशाओ मे देखती है उसका मन
नन्दलाल में (ही) लगा है। (वह) हंसती है, नाराज होती है, बुलाती है और रोकती हुई कहती है कि इनकी चाल देखो। सूरदास कहते हैं कि इस व्याकुल विरहिणी को कृष्ण के बिना कुछ अच्छा नही लगता ॥१३५॥ गोपिका अनुराग लोक-सकुच कुल-कानि तजो। जैसेँ नदी सिंधु कौं धावै, वैसेहिं स्याम भजी। मातु-पिता बहु त्रास दिखायौ, नैकुँ न डरी, लजी। हारि मानि बैठे, नहिँ लागति, बहुतै बुद्धि संजी। मानत नहीं लोक मरजादा, हरि कैँ रङ्ग मजी। सूर स्याम कौं मिलि, चूनौ हरदी ज्यौँ रँजी ॥१३६॥ अर्थ-लोक के संकोच और कुल की मर्यादा को छोड़ दिया। जैसे नदी समुद्र की ओर उमडती है वैसे ही (गोपियो ने) कृष्ण को भजा। माता-पिता ने बहुत डराया (लेकिन वे) तनिक भी न डरी और न लजायी। (सब) हार मानकर बैठ गये, बहुत बुद्धि लगायी। (लेकिन बुद्धि) लगती नही। (गोपियां) लोक की मर्यादा नही मानती (वे) कृष्ण के रंग में रंग गयी। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण से मिलकर चूना और हल्दी की तरह रंग रंगित हो गयी ॥१३६॥ कहा कहति तू मोहिँ, री माई। नँद-नंदन मन हरि लियौ मेरौ, तब तैं मोकौँ कछु न सुहाई। अब लौं नहिँ जानति मैं को ही, कब तैं तू मेरैँ ढिग आई। कहाँ गेह, कहँ मातु-पिता हैं, कहाँ सजन, गुरुजन कहूँ भाई। कैसी लाज, कानि है कैसी, कहा कहति ह्वै ह्वै रिसहाई? अब तौ सूर भजी नँद-लालहिँ, की लघुता की होइ बड़ाई ॥१३७॥ अर्थ - हे सखी, तुम मुझे क्या कहती हो ? कृष्ण ने (जब से) मेरा मन हर लिया तब से मुझे कुछ भी अच्छा नही लगता। अब तक मैं नही जान पाई कि मैं कौन थी, तू कब से मेरे पास आयी। कहां घर, कहां माता-पिता है, पति कहां और गुरुजन तथा भाई कहां हैं। (मुझे कुछ भी नही मालूम) कैसी लज्जा, मर्यादा कैसी है, तुम लोग नाराज होकर क्या कह रहे हो ? सूरदास कहते है कि (गोपियां कहती हैं) अब तो कृष्ण को भजा है चाहे छोटाई हो चाहे बड़ाई ॥१३७॥ मेरे कहे मैं कोउ नाहिं। कहा कहौं, कछु कहि न आवै, नैकहुँ न डराहिँ। नैन ये हरि-दरस-लोभी, श्रवन सब्द-रसाल। प्रथमहीँ बन गयौ तन तजि, तब भई बेहाल। इन्द्रियनि पर भूप मन है, सबनि लियौ बुलाइ। सूर प्रभु कौँ मिले सब ये, मोहिँ करि गए बाइ ॥१३८॥
१३४ सूरसागर सार सटीक अर्थ—(गोपी कहती है) मेरे बहने मे कोई नही है । क्या कहूँ, कुछ कहा नही जाता, ये (इन्द्रियाँ) तनिक भी नही डरती । ये आंखे कृष्ण के दर्शन की लालची हैं, कान रसयुक्त शब्दो के (लालची हैं) । मन पहले ही शरीर को छोड़कर चला गया तब मैं बेहाल हो गयी । इन्द्रियो का राजा मन है (उसने) सब को बुला लिया । सूरदास कहते है कि (गोपी कहती है) ये सब जाकर कृष्ण से मिल गये । मेरे लिये बला कर गये ॥१३८॥ अब तौ प्रगट भई जग जानी। वा मोहन सौं प्रीति निरन्तर, क्योंऽब रहैगी छानी । कहा करौं सुन्दर मूरति, इन नैननि माँझ समानी । निकसति नहीं बहुत पचि हारी, रोम-रोम अरुझानी । अब कैसे निरवारि जाति है, मिली दूध ज्यों पानी । सूरदास प्रभु अन्तरजामी, उर अन्तर की जानी ॥१३६॥ अर्थ—अब तो (प्रेम) प्रकट हो गया और ससार जान गया । उस कृष्ण से निरन्तर प्रेम अब क्योकर छिपा रहेगा ? क्या करूं सुन्दर मूर्ति इन आंखो के बीच समा गयी है। बहुत (प्रयास) करके हार गयी (यह) निकलती नही (बल्कि) रोम-रोम मे उलझ गयी है। दूध और पानी के समान एक मे मिल जाने पर अलग कैसे किया जाय ? सूरदास कहते हैं कि कृष्ण अन्तरयामी है इसलिए हृदय के अन्दर की बात जान गये ॥१३६॥ सखि मोहिं हरिदरस रस प्याइ । हौं रँगी अब स्याम-मूरति, लाख लोग रिसाइ । स्याम सुन्दर मदन मोहन, रंग रूप सुभाइ । सूर स्वामी-प्रीति-कारन, सीस रही कि जाइ ॥१४०॥ अर्थ-सखी मुझे कृष्ण के दर्शन रूपी रस को पिलाओ । मैं श्याम के रंग मे रग गयी हूँ (चाहे) लाखो लोग नाराज हो जायें। श्यामसुन्दर का स्वाभाविक रूप और रग कामदेव को भी मोहित करने वाला है। सूरदास कहते हैं कि गोपी कह रही है कि स्वामी के प्रेम के कारण अब चाहे मेरा सिर रहे या (चला) जाय ॥१४०॥ नन्दलाल सौं मेरौ मन मान्यौ, कहा करैगौ कोउ । मैं तौ चरन-कमल लपटानी, जो भावै सो होउ । बाप रिसाइ, माइ घर मारै, हँसैं विराने लोग । अब तौ स्यामहिं सौं रति बाढ़ी, विधना रच्यौ सँजोग । जाति महति पति जाइ न मेरी, अरु परलोक नसाइ । गिरिधर वर मैं नैंकु न छाँड़ौं, मिली निसान बजाइ । बहुरि कवहिं यह तन धरि पैहौं, कहँ पुनि श्रीवनवारि । सूरदास स्वामी कें ऊपर, यह तन डारौं वारि ॥१४१॥
वृन्दावन लीला १३५ अर्थ—(गोपी कहती है) कृष्ण पर मेरा मन रीझ गया है (अब) कोई क्या करेगा। मैं तो चरण रूपी कमल से लिपट गयी जो होना हो सो हो। (चाहे) पिता नाराज हो जायें, घर में माता मारे, तथा पराये लोग हँसी करे। अब तो कृष्ण से प्रेम बढ गया है। ब्रह्मा ने यह संयोग रचा है। मेरी जाति की प्रतिष्ठा तथा लाज (भले ही) न रहे तथा मेरा परलोक नष्ट हो जाय (फिर भी) मैं (पति) कृष्ण को तनिक भी छोड़ नहीं सकती। (मैं उनसे) नगाड़ा बजाकर (घोषित करके) मिली हूँ। फिर यह तन कहाँ धर पाऊँगी ओर बनवारी कृष्ण फिर कहाँ मिलेंगे। सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) कृष्ण के ऊपर (मैं) यह शरीर न्योछावर करती हूँ ॥१४१॥ करन दै लोगनि कौं उपहास । मन क्रम वचन नद-नंदन कौ, नैंकु न छाड़ौँ पास। सब या ब्रज के लोग चिकनियां, मेरे भाएँ घास। अब तौ यहै बसी री माई, नहिं मानौँ गुरु त्रास। कैसेँ रह्यौ परै री सजनी, एक गाँव कै बास। स्याम मिलन की प्रीति सखी री, जानत सूरजदास ॥१४२॥ अर्थ—(गोपी कहती है) लोगो को हँसी करने दो। मन, कर्म तथा वचन से कृष्ण की निकटता तनिक भी नही छोड़ सकती। इस ब्रज के सब लोग छैला हैं ! (लेकिन) मेरी बुद्धि से (सब) घास है (नगण्य है)। अब तो यही (कृष्ण) मन में बस गये हैं। (अब) गुरुजनो का भय नही मानती हूँ। एक ही गाँव का निवास (बिना मिलन के) कैसे रहा जा सकता है। हे सखी, कृष्ण से मिलने की प्रीति को सूरदास (जैसे भक्त ही) जानते हैं ॥१४२॥ एक गाउँ कै वास बसौ हौँ, कैसेँ धीर धरौँ । लोचन-मधुप अटक नहिं मानत, जद्यपि जतन करौँ। वै इहिं मग नित प्रति आवत हैं, हौँ दधि लै निकरौँ। पुलकित रोम-रोम, गदगद सुर, आनँद उमंग भरौँ। पर अन्तर चलि जात, कलप बर, बिरहा अनल जरौँ। सूर सकुच कुल-कानि कहाँ लगि, आरज-पथहिँ डरौँ ॥१४३॥ अर्थ—हे सखी एक ही गाँव का बास (होते हुए) मैं कैसे धीरज धरूँ। (मेरे) आंख रूपी भौंरे प्रयत्न करने पर भी रोक नही मानते। वे इसी मार्ग से रोज आते हैं, मैं दही लेकर निकलती हूँ। (देखकर मेरे) रोम-रोम पुलकित हो जाते है आवाज गद्गद् हो जाती है तथा (मैं) आनन्द तथा उमग से भर जाती हूँ। (क्षण भर) ओट मे चले जाने पर एक कल्प से भी अधिक (जान पडने वाले समय की कल्पना से) विरह की अग्नि में जलती हूँ। सूरदास कहते हैं (गोपी कहती है) संकोच, कुल की मर्यादा तथा श्रेष्ठ पथ से कहाँ तक डरूँ ॥१४३॥
१३६ सूरसागर सार सटीक हौं संग साँवरे के जैहौँ । होनी होइ होइ सो अबहीँ, जस अपजस काहूँ न डरैहौँ । कहा रिसाइ करे कोउ मेरौ, कछु जो कहै प्रान तिहिँ दैहौँ । दैहौँ त्यागि राखिहौँ यह व्रत, हरि-रति बीज बहुरि कब वैहौँ । का यह ब्रज-बापी क्रीड़ा जल, भजि नंद-नंद सबै सुख लैहौँ ॥१४४॥ अर्थ—मैं कृष्ण के साथ जाऊँगी । जो होना हो अभी हो जाय । यश-अपयश किसी को नही डरूँगी । कोई नाराज होकर मेरा क्या कर सकता है ? अगर कोई कुछ कहता है तो उस पर प्राण दे दूँगी । शरीर को त्याग कर भी यह व्रत रखूँगी । कृष्ण के प्रेम के बीज को फिर कब बोऊँगी ? सूरदास कहते हैं (गोपी कहती है) यह नश्वर पृथ्वी (कृष्ण-सुख की तुलना मे) क्या है, (मैं तो उस सुख के लिए) शरीर को भी त्याग कर प्रिय कृष्ण के भवन आकाश मे समा जाऊँगी । (उस सुख के बिना) ब्रज- सरोवर की जल-क्रीड़ा का भी आनन्द नगण्य है। अतः नन्द नन्दन (कृष्ण) को भजकर सब सुख पाऊँगी ॥१४४॥ रूप-वर्णन देखौ माई सुन्दरता कौ सागर । बुधि-विवेक बल पार न पावत, मगन होत मन नागर । तनु अति स्याम अगाध अंबु-निधि, कटि पट पीत तरंग । चितवत चलत अधिक रुचि उपजत, भँवर परति सब अंग । नैन-मीन, मकराकृत कुडल, भुज सरि सुभग भुजंग । मुक्ता-माला मिलीँ मानौ द्वै, सुरसरि एकै संग । कनक खचित मनिमय आभूषण, मुख, श्रम-कन सुख देत । जनु जल-निधि मथि प्रकट कियौ ससि, श्री अरु सुधा समेत । देखि सरूप सकल गोपी जन, रहीं विचारि-विचारि । तदपि सूर तरि सकीँ न सोभा, रहीं प्रेम पचि हारि ॥१४५॥ अर्थ— (गोपी कहती है) सखी, सुन्दरता के सागर कृष्ण को देखो । बुद्धि तथा विवेक के बल से चतुर मन पार न पाकर इसमे डूब जाता है । अत्यधिक साँवलापन गहरा जलनिधि है, कमर का पीला वस्त्र तरङ्ग के समान है। देखते हुए जब चलते हैं तो अधिक रुचि पैदा होती है और सब अङ्ग मे भँवर (निगाह) पड़ जाते हैं। नेत्र मछली (के समान) है, मगर के आकार का कुडल (मगर) है । भुजाये सुन्दर सांप के समान हैं । मुक्ता की माला इस प्रकार मिली है जैसे दो गङ्गा (एक साथ मिली हो) । सोने से जडे हुए मणिमय आभूषण हैं, मुख पर श्रम से उत्पन्न पसीना सुख देता है, मानो समुद्र को मथकर चन्द्रमा को लक्ष्मी तथा अमृत के साथ निकाला हो । सुन्दर रूप को देख कर सभी गोपियां सोच-सोच कर रह जाती हैं। सूरदास कहते है कि वे शोभा (के सागर) को तर नही सकीं। प्रेम मे अधिक परिश्रम से हार कर रह गयी ॥१४५॥
वृन्दावन लीला १३७ स्याम भुजनि की सुन्दरताई । चन्दन खौरि अनूपम राजति, सो छवि कही न जाई । बड़े बिसाल जानु लौं परसत, इक उपमा मन आई । मनौ भुजंग गगन तैं उतरत, अधमुख रह्यौ झुलाई । रत्न-जटित पहुँची कर राजति, अँगुरी सुन्दर भारी । सूर मनौ फनि-सिर मनि सोभित, फन-फन की छबि न्यारी ॥१४६॥ अर्थ-कृष्ण की भुजाओ की सुन्दरता तथा मस्तक पर लगे हुए चन्दन के तिलक की शोभा कही नही जा सकती । (भुजाएँ) बहुत विशाल हैं और घुटने तक छूती हैं । एक उपमा मन मे आती है मानो आकाश से उतरता हुआ सर्प अधोमुख झूल रहा हो । हाथ में रत्न जड़ित पहुँची शोभित है। अँगुलियां अत्यन्त सुन्दर हैं। सूरदास कहते हैं कि यह (ऐसे शोभित है) मानो सर्प के सिर पर मणि शोभित हो तथा प्रति फण की शोभा न्यारी हो ॥१४६॥ स्याम-अंग जुवती निरखि भुलानी । कोउ निरखति कुंडल की आभा, इतनेहिं माँझ बिकानी । ललित कपोल निरखि कोउ अटकी, सिथिल भई ज्यौं पानी । देह-गेह की सुधि नहिँ काहूँ, हरषत कोउ पछितानी । कोउ निरखति रही ललित नासिका, यह काहू नहिँ जानी । कोउ चक्रित भइ दसन-चमक पर, चकचौंधी अकुलानी । कोउ निरखति दुति चिबुक चारु की, सूर तरुनि बिततानी ॥१४७॥ अर्थ-कृष्ण के अंगों को देखकर युवतियां भूल गयीं । कोई कुंडल की कान्ति देखती है, इसी बीच बिक गयी । सुन्दर कपोल को देखकर कोई उलझ गयी और पानी की तरह शिथिल हो गयी । किसी को शरीर और घर की याद नही । कोई पछताती हैं, कोई प्रसन्न होती हैं । कोई सुन्दर नाक को देखती रही, यह कोई (अन्य) न जान पायी । कोई ओठों की शोभा देखती है और मुख से वाणी नही फूटती । कोई दाँतो की चमक से चकित होकर चकाचौंध से आकुल हो गयी । कोई सुन्दर ठोढ़ी की कान्ति देखती हैं । सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार तरुणियां व्याकुल हो गयी ॥१४७॥ मैं बलि जाउँ स्याम-मुख-छबि पर । बलि-बलि जाउँ कुटिल कच बिथुरे, बलि-बलि भुकुटी ललाट पर । बलि-बलि जाउँ चारु अवलोकनि, बलि-बलि कुडल-रबि को । बलि-बलि जाउँ नासिका सुललित, बलिहारी वा छबि की । बलि-बलि जाउँ अरुन अधरनि की, विद्रुम-बिंब लजावन । मैं बलि जाउँ दसन चमकनि की, वारौं तड़ितनि सावन ।
१३८ सूरसागर सार सटीक मैँ बलि जाउँ ललित ठोड़ी पर, वलि मोतिन की माल । सूर निरखि तन-मन बलिहारौँ, बलि बलि जसुमति-लाल ॥१४८॥ अर्थ - मैं कृष्ण के मुख की शोभा पर वलि जाती हूँ। विखरे हुए कुटिल बालों पर वलि जाती हूँ। भौह तथा मस्तक पर न्यौछावर होती हूँ। सुन्दर चितवन पर बलि जाती हूँ। कुंडल के प्रकाश पर बलि जाती हूँ। सुन्दर नासिका पर न्यौछावर होती हूँ। उसकी छवि की बलिहारी है। मूँगा और बिम्बाफल को लज्जित करने वाले लाल अधरों पर बलि जाती हूँ। मैं कृष्ण के दाँतो की चमक पर बलिहारी हूँ। उस पर सावन की बिजली को न्योछावर करती हूँ। मैं सुन्दर ठोढी तथा मोतियों की माला पर बलि जाती हूँ। सूरदास कहते है कि मैं गोपी (कृष्ण) को देखकर तन मन सब की बलि देती हूँ। हे यशोदा के लाल (तुम पर) निछावर हूँ ॥१४८॥ नटवर वेप धरे ब्रज आवत । मोर मुकुट मकराकृत कुंडल, कुटिल अलक मुख पर छवि पावत । भृकुटी बिकट नैन अति चंचल, इहिँ छविपर उपमा इक धावत । धनुष देखि खंजन विधि डरपत, उड़ि न सकत उड़िबौ अकुलावत । अधर अनूप मुरलि-सुर पूरत, गौरी राग अलापि बजावत । सुरभी-वृन्द गोप-बालक-सँग, गावत अति आनन्द बढावत । कनक-मेखला कटि पीतांवर, निर्तत मन्द-मन्द सुर गावत । सूर-स्याम-प्रति-अंग-माधुरी, निरखत ब्रज-जन कैँ मन भावत ॥१४६॥ अर्थ—कृष्ण नटवर का वेष धर कर ब्रज आते हैं। (सिर पर) मोर का मुकुट, (कान मे) मकर के आकार का कुंडल, घुंघराले बाल मुख पर शोभा पाते हैं। (उनकी) भौह विकट (वक्र) तथा नेत्र चंचल हैं। इस पर एक उपमा (मन मे) आती है जैसे धनुष को देखकर खंजन का एक जोडा डर कर उड़ना चाहता हो पर उड न पाने से आकुल हो । ओठ अनुपम ओर मुरली के स्वर से पूर्ण है तथा गौरी राग को अलाप कर बजाते हैं। गायो तथा गोप बालको के साथ गाते हुए वे अत्यधिक आनन्द बढाते हैं। कमर मे सोने की करधनी ओर पीताम्बर शोभित है नाचते हुए मन्द-मन्द सुर से गाते हैं। सूरदास कहते है कि कृष्ण के प्रत्येक अंग की मधुरता को देखकर ब्रज के लोगों का मन भा जाता है ॥१४६॥ आवत मोहन धेनु चराए। मोर मुकुट सिर, उर वनमाला, हाथ लकुट गोरज लपटाए । कटि काछनी किंकनि-धुनि बाजनि, चरन चलत नूपुर रव लाए । ग्वाल-मंडली मध्य स्यामघन, पीत बसन दामिनिहिँ लजाए। गोप सखा आवत गुन गावत, मध्य स्याम हलधर छवि छाए। सूरदास प्रभु असुर सँहारे, ब्रज आवत मन हरष बढ़ाए ॥१५०॥ अर्थ-मोहन गाय चराकर आ रहे है। सिर पर मोर का मुकुट, वक्ष स्थल
वृन्दावन लीला १३६ पर वन माला, हाथ में लाठी और गायों से उड़ायी गयी धूल शोभित है। कमर में पहनी गयी कछनी और उस पर किंकिणि की ध्वनि बजती है। चलते समय चरणो से नूपुर की ध्वनि होती है। ग्वालों की मंडली के बीच कृष्ण अपने पीताम्बर से बिजली को लजाते है। गोप मिल कर गुण गाते हुए आते हैं। बीच में बलभद्र और कृष्ण की शोभा छायी है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने असुरों का संहार किया और मन के हर्ष को बढ़ाते हुए ब्रज आते हैं ॥१५१॥ उपमा हरि-तनु देखि लजानी । कोउ जल मैंँ, कोउ बननि रहीँ दुरि, कोउ कोउ गगन समानी । मुख निरखत ससि गयौ अम्बर कौँ, तड़ित दसन-छवि हेरि । मीन कमल कर-चरन नयन डर, जल मैंँ कियौ बसेरि । भुजा देखि अहिराज लजाने, बिबरन पैठे धाइ । कटि निरखत केहरि डर मान्यौ, बन-बन रहे दुराइ । गारी देहिँ कबिनि कैँ बरनत, श्री-अँग पटतर देत । सूरदास हमकौँ सरमावत, नाउँ हमारौ लेत ॥१५१॥ अर्थ-कृष्ण के शरीर को देखकर (सारी) उपमाये लजा गयीं । कोई जल में, कोई वन में छिपी रही, कोई-कोई आकाश में समा गयी। मुख को देखकर चन्द्रमा आकाश मे चला गया और दांतो को देखकर बिजली (आकाश मे चली गयी) । नेत्रो के डर से मीन, हाथ तथा चरणो के डर से कमलो ने पानी मे जाकर बसेरा लिया। भुजा को देखकर सर्पों के राजा (शेषनाग) लजाकर बिल मे जाकर बैठ गये । कमर को देखकर सिंह ने डर माना और वन-वन छिपता रहा । अङ्ग शोभा की समता करते समय कवियों को (उपमान) गाली देते है । और वे कहते है कि हमारी चर्चा करके हमें (कविगण) लज्जित करते है । १५१॥ स्याम सुख-रासि, रस-रासि भारी । रूप की रासि, गुन-रासि, जोबन-रासि, थकित भईँ निरखि नव तरुन नारी । सील की रासि, जस-रासि, आनंद रासि, नील नव-जलद छवि वरनकारी । दया की रासि, विद्या-रासि, बल-रासि, निर्दयारति दनुकुल-प्रहारी । चतुराई-रासि, छल-रासि, कल-रासि, हरि भजैँ जिहिँ हेत तिहिँ देन हारी । सूर-प्रभु स्याम सुख-धाम पूरन काम, वसन-कटि-पीत मुख मुरलीधारी॥१५२॥ अर्थ-कृष्ण सुख की और रस की भारी राशि (हैं) । (कृष्ण के) रूप की राशि, गुण की राशि, यौवन की राशि को देखकर तरुणी नारियां थकित हो गयीं । (कृष्ण) शील की राशि, यश की राशि, आनन्द की राशि हैं तथा नीले नये बादल के समान शोभा वाले है । (वे) दया की राशि, विद्या की राशि, बल की राशि हैं, शत्रुओं के लिए निर्दयी तथा राक्षसो का नाश करने वाले हैं। चतुरता की राशि, छल की राशि, कला की राशि कृष्ण को जिस हेतु भेजा जाता है उसी को पूरा करते हैं ।
१४० सूरसागर सार सटीक सूरदास कहते हैं कृष्ण सुख के धाम तथा इच्छा को पूरा करने वाले, कमर में पीतांबर और मुँह में मुरली धारण करने वाले हैं ॥१५२॥ स्याम-कमल-पद-नख की सोभा । जे नख-चंद्र इन्द्र-सर परसे, सिव विरंचि मन लोभा । जे नख-चंद्र सनक मुनि ध्यावत, नहिं पावत भरमाहीं । ते नख-चंद्र प्रकट ब्रज-जुवती, निरखि निरखि हरषाहीं । जे नख-चंद्र फनिंद-हृदय तैं, एकौ निमिष न टारत । जे नख-चंद्र महामुनि नारद, पलक न कहूँ विसारत । जे नख-चंद्र-भजन खल नासत, रमा हृदय जे परसति । सूर स्याम-नख-चंद्र विमल छवि, गोपीजन मिलि दरसति ॥१५३॥ अर्थ- कृष्ण के कमल के समान चरणों के नखों की शोभा (अनुपम) है। जिन नख रूपी चन्द्रों को इन्द्र ने सिर से स्पर्श किया, और जिन नख-रूपी चन्द्रों की सनक मुनि ध्यान धरते हैं और (उन्हें) न पाकर भरमते हैं। वही नख रूपी चन्द्रमा प्रकट (हुआ) देख-देखकर ब्रज की युवतियां हर्षित होती हैं। जिन नख-चन्द्रो को शेषनाग अपने हृदय से एक भी क्षण नही हटाते । जिन नख चन्द्रों को महा मुनि नारद पल भर भी नही बिसारते हैं। जो नख-चन्द्र भजन करने पर दुष्टो का नाश करते हैं, और लक्ष्मी के हृदय का स्पर्श करते है। सूरदास कहते हैं कि गोपियां मिलकर कृष्ण के नख रूपी चन्द्र की शोभा को देखती हैं ॥१५३॥ स्याम-हृदय जल-सुत की माला, अतिहिं अनूपम छाजै (री) । मनहुँ बलाकपाँति नवधन पर, यह उपमा कछु भ्राजै (री) । पीत, हरित, सित, अरुन मालवन, राजति हृदय विसाल(री) । मानहुँ इन्द्रधनुष नभमंडल, प्रगट भयौ तिहिं काल (री) । भृगु पद-चिन्ह उरस्थल प्रगटे, कौस्तुभ मनि ढिग दरसत (री) । बैठे मानौ षट बिधु एक सँग, अर्द्ध निसा मिलि हरषत (री) । भुजा बिसाल स्याम सुन्दर की, चन्दन खौरि चढ़ाये (री) । सूर सुभग अँग-अँग की सोभा, ब्रज-ललना ललचाए (री) ॥१५४॥ अर्थ - कृष्ण के हृदय पर मोती की माला अत्यधिक अनुपम शोभा (देती) है। मानो नये बादलों पर बगुलो की पंक्ति हो, यह उपमा कुछ उचित लगती है। पीली, हरी, सफेद, लाल वनमाला विशाल हृदय पर शोभित है। मानो उस समय आकाश मंडल मे इन्द्र धनुष उदित हो । भृगु के पैरो के (प्रहार) का चिह्न वक्ष स्थल पर स्पष्ट है और उसके निकट ही कौस्तुभ मणि दिखाई पडती है। मानो आधी रात मे छह चन्द्रमा (पांचो अंगुलियो से युक्त चरम चिह्न एवं कौस्तुभ-मणि) बैठे हुए मिलकर प्रसन्न हो रहे है। कृष्ण की भुजा चन्दन का लेप किए विलसित है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के अङ्ग-अङ्ग की शोभा ब्रज की स्त्रियो को ललचा देने वाली है ॥१५४॥
वृन्दावन लीला १४१ मुख पर चंद डारौँ वारि। कुटिल कच पर भौँर वारौँ, भौंह पर धनु वारि। भाल-केसरि-तिलक छवि पर, मदन-सर सत वारि। मनु चली बहि सुधा-धारा, निरखि मन द्यौँ वारि। नैन सुरसति-जमुन-गंगा, उपम डारौँ वारि। मीन खंजन मृगज वारौँ, कमल के कुल वारि। निरखि कुंडल तरनि वारौँ, कूप स्रवननि वारि। झलक ललित कपोल-छवि पर, मुकुट सत-सत वारि। नासिका पर कीर वारौँ, अधर बिद्रुम वारि। दसन पर कन-बज्र वारौँ, बीज दाड़िम वारि। चिबुक पर चित-बित्त धारौँ, प्रान डारौँ वारि। सूर हरि की अंग-सोभा, को सकै निरवारि ॥१५५॥ अर्थ—कृष्ण के मुख पर चन्द्रमा को निछावर कर दूँ। कुटिल लटों पर भौंरे को तथा भौंह पर धनुष निछावर (करती हूँ)। मस्तक पर केसर के तिलक की शोभा पर मदन के सैकड़ो बाण निछावर हैं। (वह ऐसा प्रतीत होता है) मानो अमृत की धारा बह चली हो और उसे देखकर मन को निछावर कर दूँ। नैनों पर सरस्वती, यमुना और गङ्गा को उपमा निछावर कर दूँ। तब मछली, खंजन, मृग शावक तथा कमल के समूह निछावर (है)। कुंडल को देखकर सूर्य को निछावर कर दूं और कानों पर कुआं को निछावर देती हूँ। सुन्दर कपोल की शोभा की झलक पर सैकड़ों मुकुट निछावर हैं। नासिका पर तोता तथा ओंठ पर मूँगे को वारती हूँ। दांतो पर हीरे के दानो तथा अनार के बीज को निछावर करती हूँ। ठुड्डी पर चित्त की वृत्ति को धरती हूँ और प्राणो को निछावर करती हूँ। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के अङ्ग की शोभा का निर्णय कौन कर सकता है ॥१५५॥ नेत्र अनुराग नैन न मेरे हाथ रहे। देखत दरस स्याम सुन्दर कौ, जल की ढरनि बहे। वह नीचे कौँ धावत आतुर, वैसेहि नैन भए। वह तो जाइ समात उदधि मैं, ये प्रति अंग रए। यह अगाध कहुँ वार पार नहिँ, येउ सोभा नहिँ पार। लोचन मिले त्रिवेनी ह्वैकै, सूर समुद्र अपार ॥१५६॥ अर्थ-(गोपियां कहती हैं) आँखें मेरे वश मे नही रहती। सुन्दर कृष्ण का दर्शन करते ही जल की तरह ढल कर बह जाती हैं। वह (जल) नीचे की ओर आतुर होकर दौड़ता है वैसे ही नेत्र भी हो गये है। वह तो जाकर समुद्र में समा- जाता है, किन्तु ये (नेत्र) कृष्ण के हर अङ्ग पर मोह गये हैं। यह (समुद्र) अगाध है
१४२ सूरसागर सार सटीक इसका कोई वार-पार नहीं है । इन (कृष्ण) की शोभा की भी कोई सीमा नहीं है । सूरदास कहते हैं कि (गोपियों के) नेत्र त्रिवेणी होकर अपार समुद्र (रूपी कृष्ण) से मिल गये ॥१५६॥ इन नैननि मोहिं बहुत सतायाँ । अब लौं कानि करी मैं सजनी, बहुते मूँढ़ चढ़ायाँ । निदरे रहत गहे रिस मोसों, मोहिं दोष लगायी । लूटत आपुन श्री-अँग-सोभा, ज्यों निधनी धन पायाँ । निसिहूँ दिन ये करत अचगरी, मनहिँ कहा धीँ आयी । सुनहु सूर इनकी प्रतिपालत, आलस नैंकु न लायी ॥१५७॥ अर्थ—इन नैनों ने मुझे बहुत सताया । अब तक हे सखी मैंने मर्यादा रखी, (इन्हें) बहुत सिर पर चढ़ाया । (लेकिन अब) ये मुझसे क्रोध करके रूठे रहते हैं और हम को ही दोष लगाते हैं । स्वयं सुन्दर अंगों की शोभा को लूटते हैं जैसे निर्धन को धन मिल गया हो । रात-दिन ये शरारत करते हैं (न मालूम) इनके मन को क्या हो गया है (क्या समा गया है) । (गोपी कहती है) सूरदास सुनो इनका पालन करते हुए मैं तनिक भी आलस नहीं लायी ॥१५७॥ नैन करैं सुख, हम दुख पावैं । ऐसो को पर-वेद न जानै, जासों कहि जु सुनावैं । तातैं मौन भलौ सबही तें, कहि कै मान गँवावैं । लोचन, मन, इंद्री हरि कीं भजि, तजि हमकोँ सुख पावैं । ये तो गए आपने कर तैं, वृथा जीव भरमावैं । सूर स्याम हैं चतुर सिरोमनि, तिनसों भेद जनावैं ॥१५८॥ अर्थ—आंखें सुख करती हैं और हम दुःख पाते हैं । ऐसा कौन है जो दूसरे के दुःख को समझे, जिससे (अपना दुख) कहकर सुनाऊँ । सबसे अच्छा है मौन रहना, कह कर कौन आदर गँवाये । आंख, मन, इन्द्रियां कृष्ण के होकर हमको छोड़कर सुख पाते हैं । ये तो अपने हाथ से निकल गये अब जीव को व्यर्थ ही भरमाते हैं । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण चतुर शिरोमणि हैं, उनसे (ये सब) (गोपियो का) भेद जानते हैं ॥१५८॥ ऐसे आपु स्वारथी नैन । अपनौइ पेट भरत हैं निसि-दिन, और न लैन न दैन । वस्तु अपार परी ओछैं कर, ये जानत घटि जैहैं । को इनसे समझाइ कहै यह, दीन्हें ही अधिकैहैं । सदा नहीं रैहैं अधिकारी, नाऊँ राखि जी लेते । सूर स्याम सुख लूटैं आपुन, औरनि हूँ कौं देते ॥१५९॥ अर्थ—ये नेत्र स्वयं कितने स्वार्थी हैं । रात-दिन अपना ही पेट भरते रहते हैं और (से कुछ उनका) लेना-देना नहीं है । अपार वस्तु नीच के हाथ पड़ गई है, ये समझते हैं कि घट जायेगी । कौन इनसे समझाकर कहे कि देने से अधिकाई ही होगी ।
सदा अधिकारी नहीं रहेंगे जो (चाहें तो) नाम रख लें। सूरदास कहते हैं कि औरो को भी देते हुए स्वयं सुख लूटे ॥१५८॥ नैन भए बस मोहन तैं। ज्यौँ कुरंग बस होत नाद के, टरत नहीं ता गोहन तैं। ज्यौँ मधुकर बस कमल-कोस के, ज्यौँ बस चंद चकोर । तैसेहि ये बस भए स्याम के, गुड़ी-वस्य ज्यौँ डोर । ज्यौँ बस स्वाँति-बूँद कै चातक, ज्यौँ बस जल के मीन । सूरज-प्रभु के बस्य भए ये, छिनु-छिनु प्रीति नवीन ॥१६०॥ अर्थ—नैन मोहन के वश मे हो गये । जैसे मृग नाद के वश में होकर उसके पास से नही टलता । जैसे भौंरा कमल की कली के वश में होता है और चकोर पक्षी चन्द्रमा के (वश मे होता है) । वैसे ही ये कृष्ण के वश मे हो गये हैं, जैसे पतंग डोरी के वश में रहती है। जैसे स्वाती नक्षत्र की बूंद के वश में पपीहा और जल के वश मे मछली उसी तरह ये कृष्ण के वश मे हो गये और क्षण-क्षण नयी प्रीति (का अनुभव) करते हैं ॥१६०॥ तब तैं नैन रहे इकटकहीं । जब तैं दृष्टि परे नँद-नंदन, नैंकु न अत मटकहीँ । मुरली घरे अरुन अधरनि पर, कुडल झलक कपोल । निरखत इकटक पलक भुलाने, मनौँ बिकाने मोल । हमकौँ वै काहैँ न बिसारैं, अपनी सुधि उन नाहिं । सूर स्याम- छवि-सिंधु सामने, वृथा तरुनि पछिताहिं ॥१६१॥ अर्थ—तब से नेत्र एकटक ही हैं, जब से कृष्ण पर नजर पडी (तब से) तनिक भी अन्यत्र नही हिलते । लाल ओठो पर मुरली घरे हुए, कपोल पर झलकते कुण्डल वाले (कृष्ण) को पलक भांजना भूलकर एकटक देख रहे हैं मानो कीमत पर बिक गये है। हमको वे क्यो न भुला दे जबकि उन्हे अपनी ही सुध नही है। सूरदास कहते है कि कृष्ण के शोभा-समुद्र मे (ये नेत्र) समा गये हैं, युवतियाँ व्यर्थ ही पछताती हैं ॥१६१॥ नैननि सौँ झगरौ करिहौँ री । कहा भयौ जौ स्याम-संग हैं, बाँह पकरि सम्मुख लरिहौँ री । जन्महिं तैं प्रतिपालि बड़े किये, दिन-दिन कौ लेखौ करिहौँ री । रूप-लूट कीन्ही तुम काहैँ, अपने बाँटे कौँ धरिहौँ री । एक मातु पितु भवन एक रहे, मैं काहैँ उनकौँ डरिहौँ री । सूर अंस जौ नहीँ देहिंगे, उनकेँ रँग मैं हूँ ढरिहौँ री ॥१६२॥ अर्थ—आंखों से झगड़ा करूंगी। क्या हुआ जो वे कृष्ण के साथ हैं। बांह पकड़कर सामने लडूंगी । जन्म से पालकर वड़ा किया है, उनसे एक-एक दिन का हिसाब करूंगी। (कृष्ण) के रूप को लूट कर तुमने अपना क्यो कर लिया (उनसे)