सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
स्पष्टाधिकार १०१ पहले से मन्द पड़ गयी । ३ से ४ तक पहुँचने में बुध राशि-चक्र बहुत ही कम आगे बढ़ा, इसलिये यदि यह कहा जाय कि बुध की चाल नहीं के समान है तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी । ऐसी दशा में बुध कुछ ठहरा हुआ जान पड़ता है । जब बुध अपनी कक्षा में ४ से ५ पर जायगा, पृथ्वी भी अपनी कक्षा में ४ से ५ पर आयगी और पृथ्वी निवासियों की बुध राशि-चक्र में उलटा ४ से ५ तक जाता हुआ दिखाई पड़ेगा अर्थात् बुध वक्री हो गया, ऐसा जान पड़ेगा । जब बुध ५ से ६ पर अपनी कक्षा में जायगा तब पृथ्वी भी अपनी कक्षा में ५ से ६ पर जायगी और हम लोगों को बुध राशि चक्र में ५ से ६ तक उलटा मीन से कुम्भ राशि में जाता हुआ दिखाई पड़ेगा, परंतु चाल बहुत तीव्र हो जायगी। यहाँ भी बुध वक्री कहा जायगा, यद्यपि वह अपनी कक्षा में उसी क्रम से जा रहा है । जब बुध ६ से ७ तक जाता है, राशि चक्र में ६ से ७ तक उलटा जाता हुआ दिखाई पड़ता है । परन्तु अपनी कक्षा में ८ से ६ तक जाते-जाते यह राशि चक्र में ८ से ६ तक सीधा आता दिखाई देगा अर्थात् बुध की चाल मार्गी हो जायगी, परन्तु रहेगी बहुत मन्द । अब यह स्पष्ट हो गया होगा कि यद्यपि सूर्य के विचार से बुध और पृथ्वी दोनों एक ही दिशा में जाते हुए दिखाई पड़ते हैं तथापि पृथ्वी निवासियों को बुध राशि चक्र में एक से ४ तक आगे बढ़ता हुआ जान पड़ता है और ४ से ७ तक पीछे हटता हुआ जान पड़ता है। जब आगे बढ़ता है तब मार्गी कहलाता है और पीछे हटता है तब वक्री हो जाता है । जब मार्गी रहता है तब भी इसकी चाल एक सी नहीं दीखती वरन् कभी बहुत शीघ्र बढ़ती हुई जान पड़ती है, कभी मन्द पड़ जाती है और कभी ठहरी सी जान पड़ती है। और जब वक्री होता है तब भी चाल द्रुत, द्रुततर, मंद, मंदतर तथा स्थिर सी जान पड़ती है । यहाँ एक बात और जानने योग्य है। जब पृथ्वी प¹ पर होती है और बुध ब¹ पर तब सूर्य और पृथ्वी को मिलाने वाली रेखा मकर के अन्त पर पहुँचती है अर्थात् सूर्य मकर में दिखाई देता है, परन्तु बुध कुम्भ के अन्त में। इसलिए बुध सूर्य के पूरब रहता है और सूर्यास्त के बाद पच्छिम में दिखाई देता है । प² से सूर्य कुम्भ राशि के आदि में दिखाई पड़ता है और बुध मीन के आदि में, प³ से सूर्य कुम्भ में कुछ और आगे बढ़ा हुआ जान पड़ता है, परन्तु बुध मीन के अन्त तक पहुँचा हुआ दिखाई पड़ता है और इसी के पास सूर्य और बुध का अन्तर सबसे अधिक होता है । ऐसी दशा में यदि पृथ्वी और बुध को मिलाने वाली रेखा बढ़ायी जाय तो वह बुध की कक्षा को स्पर्श करती हुई जायगी, और पृथ्वी और सूर्य को मिलाने वाली रेखा से जो कोण बनायेगी वह सबसे बड़ा होगा । इसी को सूर्य और बुध का महत्तम अन्तर (Greatest elongation) कहते हैं और यह अन्तर सूर्य के पूर्व की ओर होता है । महत्तम अन्तर के कुछ दिन पीछे ही बुध की गति वक्री हो जाती है और अन्तर
१०२ सूर्य-सिद्धान्त घटने लगता है और घटते-घटते बुध पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है अर्थात् अन्तर शून्य हो जाता है। ऐसी दशा में बुध सूर्य के साथ उदय और अस्त होता है। इसी को बुध की भीतरी युति (Inferior conjunction) कहते हैं। जब सूर्य से बुध का अन्तर १२° के लगभग हो जाता है तब सूर्य के निकट होने से उसके प्रकाश के कारण कोरी आंख से बुध नहीं दिखाई पड़ता। इसलिए कहा जाता है कि बुध का अस्त पच्छिम में हो जाता है क्योंकि बुध पच्छिम में ही दीखते-दीखते छिप जाता है। भीतरी युति के समय से कुछ पहिले वक्री होने पर बुध दाहिने हाथ की ओर जाता है और सूर्य बायें हाथ की ओर, इसलिये सूर्य से बुध बहुत ही शीघ्र हटता है अर्थात् पच्छिम में अस्त होने के बाद थोड़े ही दिनों में वह सूर्य से पच्छिम चला आता है और सूर्योदय के पहले ही उदय होकर पूर्व में दिखाई देने लगता है, तब कहते हैं कि बुध का पूर्व में उदय हो गया। जब बुध १२° सूर्य से पच्छिम हो जाता है तब फिर दिखाई पड़ने लगता है। तभी उसका उदय मानते हैं, गति भी वक्री से कुछ ही दिनों में मार्गी होने लगती है। इस प्रकार मार्गी होने के पीछे बुध क्रमशः सूर्य से दूर होता जाता है और जब वह अपनी कक्षा में बिन्दु ७ और ८ के बीच में जाता है तब भी सूर्य से इसका अन्तर महत्तम हो जाता है। फिर बुध सूर्य के पास होता जाता है और डेढ़ महीने में सूर्य के इतना पास हो जाता है कि आंख से दिखाई नहीं पड़ता। सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार जब अन्तर १४° का रह जाता है तब अस्त होना मानते हैं। जब बुध और सूर्य का अन्तर शून्य हो जाता है तब दोनों एकसाथ क्षितिज के ऊपर आते हैं। ऐसी दशा में बुध और सूर्य की बाहरी युति (Superior conjunction) होती है। बाहरी युति के समय बुध मार्गी रहता है। बाहरी युति के समय बुध और सूर्य दोनों बायीं ओर को जाते हुए दिखाई पड़ते हैं, इसलिये बुध को सूर्य से दूर होने में अधिक दिन लगते हैं अर्थात् जब बुध पूर्व में अस्त होता है तब पच्छिम के अस्त काल से अधिक काल तक अस्त रहता है और पच्छिम में देर में उदय होता है। यह लिखा गया है कि पच्छिम में बुध तब अस्त होता है जब सूर्य और बुध का अन्तर १२° से कम हो जाता है और पूर्व में अस्त तब होता है जब दोनों का अन्तर १४° से कम हो जाता है। इसका कारण यह है कि भीतरी युति के समय बुध पृथ्वी से बहुत पास रहता है इसलिये उसका बिम्ब बड़ा दिखाई पड़ता है और जब तक सूर्य से १२° की दूरी तक नहीं हो जाता तब तक दिखाई पड़ता है। परन्तु बाहरी युति के समय बुध सूर्य से भी दूर हो जाता है इसलिये उसका बिम्ब छोटा
स्पष्टाधिकार १०३ दिखाई पड़ता है और जब उसकी दूरी १४° रहती है तभी छिप जाता है । शुक्र भी भीतरी युति के समय सबसे बड़ा दीखता है और बाहरी युति के समय सबसे छोटा । इससे सिद्ध हो गया होगा कि ग्रह अस्त होने के पीछे कहीं चले नहीं जाते वरन् सूर्य के इतने पास हो जाते हैं कि आंख से दिखाई नहीं पड़ते । हाँ दूरबीन से यह सूर्य के चाहे जितने पास हों दिखाई पड़ सकते हैं। बुध और शुक्र दोनों ग्रहों की कक्षाएँ पृथ्वी की कक्षा के भीतर हैं इसलिए जो बात बुध के लिए कही गयी है वह शुक्र के लिए भी लागू है । अन्तर केवल इतना है कि शुक्र की कक्षा बुध की कक्षा से बड़ी है इसलिए भीतरी युति के समय शुक्र पृथ्वी से अत्यन्त निकट हो जाता है। दूरबीन से देखने पर बुध और शुक्र दोनों में उसी प्रकार कलायें दिखाई पड़ती हैं जैसी चन्द्रमा में बाहरी युति के समय दोनों ग्रह पूर्ण गोल दीखते हैं, क्योंकि उस समय पूरा प्रकाशित बिम्ब हमारे सामने रहता है। जब ग्रह कुछ बगल में हो जाता है तब पूरा प्रकाशित भाग हम लोगों को नहीं दीखता, दिन-दिन बिम्ब कुछ खंडित होता जाता है। परन्तु प्रकाश अधिक मिलता है, क्योकि दूरी कम होती जाती है इसलिए खंडित ग्रह भी पास होने के कारण अधिक प्रकाश देता है। भीतरी युति के समय ग्रह का प्रकाशित भाग सूर्य की ओर होता है इसलिए हमको ग्रह से ज़रा भी प्रकाश नहीं मिलता और वह एक काले धब्बे की तरह दूरबीन में दिखाई पड़ता है । शुक्र की कलायें चित्र २२ में दिखाई गई हैं। चित्र २३ में राशि-चक्र का केवल वह भाग दिखाया गया है जहाँ मंगल वक्री और फिर मार्गी होता हुआ जान पड़ता है । स सूर्य केन्द्र में है । पृथ्वी अपनी कक्षा में और मंगल अपनी कक्षा में सूर्य की परिक्रमा इस प्रकार करते हैं कि वह राशि चक्र में मेष से वृष, वृष से मिथुन में जाते हुये (सूर्य से) दिखाई देते हैं । सूर्य में स्थित मनुष्य को कोई ग्रह वक्री होते हुये नहीं दीख सकते; उसे सब ग्रह एक ही तरफ से परिक्रमा करते हुये देख पड़ते हैं । हाँ पृथ्वी निवासियों को मंगल मार्गी, शीघ्रगामी, मन्दगामी, स्थिर तथा वक्री, मन्द गामी, फिर मार्गी दिखाई पड़ता है । मंगल की एक परिक्रमा ६८६ दिन में पूरी होती है इसलिए १०° की परिक्रमा वह ६८६ × १० / ३६० दिन वा १६ दिन में कर लेता है और इतने समय में पृथ्वी १६° के लगभग चलती है, क्योंकि पृथ्वी की एक परिक्रमा ३६५ दिन में पूरी होती है अर्थात् १ दिन में प्रायः १° परिक्रमा होती है । मान लीजिये पृथ्वी अपनी कक्षा में विन्दु १ पर है और मंगल भी अपनी कक्षा में विन्दु १ पर है तब पृथ्वी निवासियों को मंगल राशि चक्र में १ विन्दु पर
१०४ सूर्य-सिद्धान्त चित्र २९—शुक्र की कलाएँ चित्र २३'—मंगलकी भिन्न भिन्न गति दिखाई देगा । जब पृथ्वी १६ दिन में अपनी कक्षा के विन्दु २ पर पहुँचती है, मंगल भी १०° चलकर अपनी कक्षा में विन्दु २ पर पहुँचेगा और हम लोगों को दिखाई पड़ेगा कि वह राशि चक्र में विन्दु २ पर है । जब पृथ्वी अगले १६ दिन में विन्दु ३
स्पष्टाधिकार १०५ पर पहुँचेगी, मंगल भी विन्दु ३ पर अपनी कक्षा में पहुँचेगा और दिखाई पड़ेगा कि राशि चक्र में वह २ विन्दु के पास ही ज़रा सा आगे हटा है। यहाँ मंगल कुछ दिनों तक स्थिर सा जान पड़ेगा, क्योंकि १६ दिन के भीतर राशि चक्र में २ से ३ तक बहुत कम गया है। जब पृथ्वी और मंगल अपनी अपनी कक्षा में विन्दु ४ पर पहुँचेंगे तब मंगल राशि चक्र में विन्दु ४ पर अर्थात् पीछे हटा हुआ दिखाई पड़ेगा। इसी को कहते हैं कि मंगल वक्री है यद्यपि मंगल की चाल अपनी कक्षा में वैसी ही सीधी है। ४ विन्दु पर पृथ्वी, मंगल और सूर्य के बीच में हो जाती है, अर्थात् पृथ्वी के दाहिने सूर्य होता है और बायें मंगल। इस प्रकार सूर्य का अन्तर ६ राशि या १८०० का हो जाता है। इसी स्थिति को कहते हैं कि मंगल सूर्य से षडभान्तर पर (In opposition) है। जब सूर्य अस्त होता है तभी मंगल पूर्व में उदय होता है और जब सूर्य उदय होता है तभी मंगल पश्चिम में अस्त होता है। इस स्थिति में मंगल पृथ्वी से अत्यन्त निकट होता है, इसलिए इसका बिम्ब बहुत बड़ा दिखाई पड़ता है और दूरबीन से देखने पर उसी समय मंगल ग्रह की बहुत सी बातें दिखाई देती हैं। जब पृथ्वी और मंगल अपनी-अपनी कक्षा में ५ विन्दु पर होते हैं तब हम लोगों को मंगल राशि चक्र में ५ विन्दु पर और पीछे हटा हुआ देख पड़ता है। दोनों ग्रह अपनी-अपनी कक्षा में जब ६ विन्दु पर आते हैं तब मंगल राशि चक्र में कुछ आगे खसका हुआ ६ विन्दु पर दिखाई देता है, यहाँ भी मंगल कुछ देर के लिए स्थिर सा जान पड़ता है, फिर आगे बढ़ता हुआ दिखाई पड़ता है। जब पृथ्वी और मंगल के बीच में सूर्य होता है अर्थात् जब पृथ्वी ४ पर और मंगल 'म' पर होता है तब मंगल की दूरी पृथ्वी से अत्यन्त अधिक होती है। ऐसी स्थिति को 'मंगल की सूर्य से युति होती है', ऐसा कहते हैं। इस दशा में मंगल का बिम्ब बहुत छोटा दीखता है। इन दोनों चित्रों से प्रकट है कि भूकक्षा के भीतरवाले ग्रह उस समय वक्री होते दिखाई देते हैं जब भीतरी युति होने को होती है और भीतरी युति के समय वह वक्री ही रहते हैं। परन्तु भू कक्षा के बाहर वाले ग्रह उस समय वक्री होते हैं जब वह सूर्य से ६ राशि अथवा १८०° के लगभग दूरी पर होते हैं और जिस समय वह ठीक आमने सामने (In opposition) होते हैं, उस समय वक्री ही रहते हैं। भीतरी ग्रह (Inferior planets) प्रत्येक परिक्रमा की भीतरी और बाहरी दोनों युतियों के समय अस्त रहते हैं अर्थात् सूर्य के पास रहने के कारण सूर्य के प्रचण्ड प्रकाश में कोरी आंख से नहीं दिखाई देते हैं परन्तु बाहरी ग्रह (Superior planets) की एक परिक्रमा में केवल एक युति होती है, तभी यह अस्त हुए कहे जाते हैं।
१०६ सूर्यसिद्धान्त इस प्रकार यह प्रकट है कि पृथ्वी को चलती हुई मान लेने से ग्रहों की विलक्षण गतियों का समझना बड़ा ही सहज है। यदि पृथ्वी अचला मानी जाय तो यह किसी प्रकार नहीं समझाया जा सकता कि ग्रहों की वक्री गति क्यों होती है । तत्तद्गतिवशन्नित्यं यथा दृक्तुल्यतां ग्रहाः । प्रयान्ति तत्प्रवक्ष्यामि स्फुटीकरणमादरात् ॥१४॥ अनुवाद-(१४) इन इन गतियों के वश होकर ग्रह जिस प्रकार दृक्तुल्यता को प्राप्त होते हैं अर्थात् वेध के स्थान में पहुँचकर प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं वही स्पष्ट करने के (उसी को गणित से जानने के) नियम आदर के साथ कहता हूँ । विज्ञान भाष्य - यह श्लोक बड़े महत्व का है। इससे सिद्ध होता है कि हमारे पुराने आचार्य ग्रहों के स्पष्ट स्थान इसीलिए निकालते थे जिससे गणित और प्रत्यक्ष वेध में कोई अंतर न पड़े। इसके लिए स्पष्टाधिकार में सूक्ष्म से सूक्ष्म नियम बनाये गये । परन्तु जैसा कि मध्यमाधिकार के ६वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में मैं बतला चुका हूँ कि चाहे यंत्र स्थूल हों चाहे सूक्ष्म, इनसे बेध करने में कुछ न कुछ प्रयोगात्मक अशुद्धि (Experimental error) रह ही जाती है इसलिए काल पाकर कुछ भेद पड़ जाता है, जिससे समय-समय पर संशोधन करना पड़ता है। इसी को 'बीज' संस्कार कहते हैं । उदाहरण के लिए मान लीजिये कि कोई घड़ी प्रति दिन एक सेकंड मंद होती हो तो ६० दिन में वह १ मिनट और १ वर्ष में ६ मिनट पीछे हो जायगी । परन्तु व्यवहार में यही कहा जायगा कि घड़ी बहुत शुद्ध है; क्योंकि ६० दिन में १ मिनट का अंतर या प्रतिदिन एक सेकंड का अंतर नहीं के समान है। यदि यह अंतर सदैव होता जाय और घड़ी में संशोधन न किया जाय तो कई वर्षों में इतना अंतर पड़ जायगा कि उसको भी नहीं के समान समझना असम्भव होगा और संशोधन करना ही पड़ेगा । जैसे घड़ी में प्रतिदिन १ सेकंड का अंतर कुछ काल में बड़ा भारी रूप धारण कर सकता है उसी प्रकार सूर्य चन्द्रमा इत्यादि ग्रहों के भगणकालों में १ पल का भी अंतर सैकड़ों वर्षों में बहुत बड़ा हो जाता है। इसीलिए बीज संस्कार करना पड़ता है । बीच-बीच में संशोधन करने की प्रथा हमारे प्राचीन आचार्यों को मान्य थी, जिनके अवतरण मैं नीचे दूंगा; परन्तु कुछ दिनों से इस विषय पर मतभेद हो गया है। एक पक्ष कहता है कि आर्ष ग्रन्थों पर किसी प्रकार की टीका टिप्पणी करने का अथवा संशोधन करने का अधिकार नहीं है, उनमें जो कुछ है उसको वैसा ही मानना चाहिये । दूसरा पक्ष कहता है कि संशोधन करना सर्वथा उचित है । नीचे दोनों पक्षों के तर्क मुझे जहाँ तक मिले हैं दिये जाते हैं : -
स्पष्टाधिकार १०७ प्रयाग निवासी पंडित इन्द्रनारायण द्विवेदी ज्योतिष भूषण, इसी श्लोक के अनुवाद के साथ साथ यह टिप्पणी देते हैं— "यहाँ अनेक लोग "दृक्तुल्यतः" से दृश्य गणना का अर्थ लगाते हैं; किन्तु यह उनका भ्रम है। पूर्वापर के देखने से स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि दृक्तुल्यतां का अर्थ यहाँ जिस गणना का वर्णन करते हैं उसके अनुसार अदृश्य दृष्टि से अपने स्पष्ट किये हुए स्थान पर दिखाई देना है अन्यथा इस गणना के अनुसार कभी भी दृश्य ग्रह सिद्ध नहीं हो सकते थे क्योंकि जितने संस्कार दृश्य ग्रहों के लिए आज निकाले गये हैं ये ही सदा होने चाहिये ये यह गोल विद्या के जानने वालों को ज्ञात ही है"१ इस अवतरण का भांवार्थ कदाचित यह है कि ग्रहों का स्पष्ट स्थान निकालने के लिए जो नियम इस ग्रन्थ में बतलाये गये हैं उनके अनुसार ग्रहों का स्थान वही नहीं निकलता जो प्रत्यक्ष वेध से देखा जाता है। इसलिए दृक्तुल्यता का अर्थ प्रत्यक्ष वेध नहीं है वरन् वह अदृश्य वेध है जिसे ऋषियों ने अपने योगबल के द्वारा जाना था । इस पक्ष के ज्योतिषाचार्य पं० गिरिजाप्रसाद जी द्विवेदी जो आजकल लखनऊ के नवल किशोर विद्यालय के प्रधानाध्यापक हैं अपने सिद्धान्त शिरोमणि गोलाध्याय के 'प्रभा भाषा भाष्य' २ पृष्ठ ६, ७ में बहुत स्पष्ट शब्दों में यों लिखते हैं :— "...दृष्टादृष्टभेदेन गणितस्य द्वैविध्यं तावच्चतुरस्रम् । तत्र 'अदृष्टफलसिद्धयर्थं यथाकार्द्युक्तिः कुरु । गणितं यद्धि दृष्टार्थं तद्दृष्ट्युद्भवतः सदा' ।। तथा अदृष्टफल सिद्धयर्थं निर्बीजार्कोक्तमेवहि ।' इति तत्वविवेकीय कमलाकरोक्त्या महर्षि दर्शित पथानुसारिण एवं स्फुटाः खेटाः फलादेशायोपयुज्यन्ते नतु सांप्रतिकोपलब्ध संस्कार संस्कृताः । निर्बीजार्कोक्तिमित्युक्त्या तन्निरासात् । फलविषयेऽनार्षगणिताङ्गीकारे बहुत्र श्रौतस्मार्तकर्मानुष्ठानसमयादिषु विप्लवः संजायते । तस्माद्धर्माभिमानिभिः सुधीभिः सकलं परीक्ष्य निष्कण्टकः पन्था अनुसरणीयः । तत्तत्संस्कारोत्पन्नाः खेटास्तु केवलं ग्रह- णोदयास्तादि दृष्टगणितएवोपयुज्यन्ते । दृष्टगणिताभिमानिनोऽदृष्टगणितोन्मूलनाय बहुधा विवदन्ते । परमुभयो स्वीकारेणैव निर्बाहो नत्वन्यतरस्याङ्गीकारेणेत्यन्यत्र विस्तरः । "दृष्ट और अदृष्ट के भेद से गणित दो प्रकार का है । दृष्ट जो आँखों से देखा जाय, जैसे ग्रहण, उदयास्त, युति और श्रृङ्गोन्नति आदि । और अदृष्ट जो देखने में न आवे, जैसे तिथियोग आदि । ग्रहण आदि के देखने से ही उसका फल होता है । और व्रत उपवास आदि का फल बिना देखे ही होता है। फल का आदेश केवल ऋषियों १. प्रयाग के हिन्दी साहित्य सम्मेलन से प्रकाशित सूर्य सिद्धान्त पृष्ठ ३५ । २. लखनऊ से नवल किशोर प्रेस में १६११ ई० में प्रकाशित ।
१०८ सूर्य सिद्धान्त के अनुभवसिद्ध वाक्यों से होता है । जो कुछ ग्रहों की स्थिति के अनुसार फल लिखा उपलब्ध होगा, मनुष्य वही जान सकेगा । इस फल की कल्पना ऋषियों के सिवा कोई नहीं कर और जान सकता । “आर्ष ग्रन्थों में जो ग्रह स्पष्ट बनाने की रीति है उसी रीति से स्पष्ट किये ग्रह फलादेश में उपयुक्त हैं। क्योंकि उन्हीं स्पष्ट ग्रहों के आधार पर श्रौत और स्मार्त कर्मों के समय 'बंटे हैं। इसलिए उसी गणित से जो तिथि आदि सिद्ध हों उन्हीं से धर्म व्यवस्था और उसका आचरण करना उचित है । “सांप्रत में यूरोप के विद्वानों ने सूक्ष्म यन्त्र द्वारा बहुत से नवीन संस्कार निश्चित किये हैं और उनका ग्रहों में उपयोग लाकर सूक्ष्म-स्पष्ट ग्रह सिद्ध करते हैं । इस स्पष्ट विधि को लेकर अंग्रेजी गणित विद्या विशारद आजकल कई एक पञ्चाङ्गों में ग्रह स्पष्ट सिद्ध करके उनसे तिथि आदि का साधन करते हैं और उसी के अनुसार धर्म व्यवस्था करते हैं। परन्तु यह सर्वथा अनुचित और धर्म में बाधा डालना है । क्योंकि आर्ष गणित के अनुसार जब एकादशी आदि का उपवास आदि सिद्ध होगा उस काल में इस नवीन सूक्ष्म गणित से उसका सिद्ध होना असम्भव होगा। इस प्रकार ऋषियों के वचन में बाधा डालने से धर्म का विप्लव होगा । ऋषियों के वाक्य उन्हीं की रीति पर चलने से घट सकेंगे । इससे स्पष्ट है कि धर्म व्यवस्था के लिए ऋषिप्रोक्त गणित का ही आश्रय उचित है । “नवीन वेधसिद्ध संस्कारों को ही प्राचीन ग्रन्थों में ‘बीज’ नाम से लिखा है । और वेध से प्राचीनों ने इसका साधन भी किया है । परन्तु इस बीज को ग्रहणादि दृष्टगणित के ठीक समय ज्ञान के लिए उपयुक्त किया है। अदृष्ट गणित में, आजकल की तरह नहीं घुसेड़ा । इसलिए आजकल के यूरोप के नये संस्कार केवल दृष्ट गणित में उपयुक्त हैं। उसमें इसका उपयोग लेने से कोई बाधा नहीं है । क्योंकि इसकी व्यवस्था ही इसी प्रकार से आचार्यों ने की है । जैसा —‘अदृष्ट फल सिद्ध्यर्थं निर्बीजाकेक्तिमेवहि । गणितं यद्धि दृष्टार्थं तद्दृष्ट्युद्भवतः सदा ॥’ अर्थात् अदृष्ट गणित के लिए केवल निर्बीज, सूर्योक्ति, सूर्य सिद्धान्त के गणित का आश्रय करना चाहिये और दृष्ट गणित के लिए जिससे ठीक आकाश और गणित का संवाद हो उसी से सदा गणित करना चाहिये । “इस प्रकार निष्पक्षपात और धर्मबुद्धि से यह सिद्ध होता है कि प्रत्येक विचारशील पुरुषों को, दृष्ट और अदृष्ट गणित उक्त नियमों के अनुसार मानना
स्पष्टाधिकार १०६ चाहिये । केवल दृष्टमात्र को ही चार्वाकों की तरह सर्वत्र मानना महा अनुचित और सत्य का अपलाप करना है ।" इस लम्बे अवतरण में प्रमाण के लिए संस्कृत का जो श्लोक दिया हुआ है वह आचार्य कमलाकर के सिद्धान्त-तत्वविवेक का है जो शक १५८० तथा विक्रमीय १७१५ में लिखा गया था। इस ग्रन्थ में आचार्य कमलाकरजी ने सूर्य सिद्धान्त का कहीं-कहीं अनुचित पक्ष किया है जिसका प्रमाण म० म० सुधाकर द्विवेदी के शब्दों में यह है :- "अत्र यावच्छक्यं सूर्य्यसिद्धान्तमत मण्डनं भास्कर मुनीश्वरादीनां खंडनं च कृतं ग्रन्थ कृता । बहुत्र परदूषणाभिलाषेणान्यथैव भास्कर कृतोद्यान्तर कर्मादि खण्डनमस्य गोले गणितेचाद्वितीय पण्डितस्यानेक कल्पनाकुशलस्य न शोभते ।"१ इस पक्ष में और भी कोई प्राचीन मत है या नहीं इसका मुझे ज्ञान नहीं । यदि कोई महानुभाव बतलाने की कृपा करेंगे तो मैं बड़ा अनुगृहीत हूँगा और धन्यवाद- पूर्वक स्वीकार करूँगा। इस पर यह भी जानने की अभिलाषा है कि आचार्य कमलाकरजी के इस नियमों को कि 'निर्बीजोक्त' ग्रह स्पष्ट ही धर्म के कामों में व्यवहार करना चाहिये किसी ने स्वीकार भी किया है या नहीं क्योंकि इनके पहले से ही सैकड़ों वर्षों से मकरंद सारिणी और ग्रहलाघव इत्यादि ज्योतिष के करण ग्रन्थ ही पंचांगादि बनाने के लिए व्यवहार में आते हैं, जिनमें 'बीज संस्कार' किया गया है। इसके कुछ प्रमाण नीचे दिये जाते हैं :- (१) "ज्योतिष के करण ग्रन्थ कई हैं; परन्तु पठनपाठन में जितना ग्रहलाघव का प्रचार है उतना औरों का नहीं। उसके आधार पर कई देशों में पञ्चाङ्ग बनते हैं और उनके अनुसार सब लोग बेखटके श्रौत स्मार्त कर्म करते हैं। यह सौर पक्षीय करण ग्रन्थ है। यद्यपि इसमें ग्रन्थकर्ता ने आर्य पक्ष और ब्रह्मपक्ष का भी किसी अंश में आश्रयण किया है। इस समय ही नहीं बहुत प्राचीन काल से सौरपक्ष का ही प्राधान्य चला आता है। आर्य ब्रह्मपक्ष का गणित तो आचार्य बराह मिहिर (शक ४२७) के समय में ही गड़बड़ हो चुका था । कहीं-कहीं ब्रह्मपक्षीय पंचांग भी प्रचलित हैं। जैसे जोधपुर का चंड नामक ज्योतिषी का चलाया 'चंडू' पंचांग परन्तु अनार्षमूलक होने से मान्य नहीं है ।"२ १. गणक तरंगिणी पृष्ठ ६८ २. उल्लिखित पं० गिरिजाप्रसाद द्विवेदी द्वारा १६८० वि० के कार्तिक की 'माधुरी' पृष्ठ ५०५ में लिखा गया ।
११० सूर्य-सिद्धान्त मकरंद सारिणी में बीज संस्कार के विषय में यह अवतरण प्रमाण है । (२) “…कलिगतस्य सहस्रांशों १००० शादि ४ । ४२ । ४६ शनि बीज धनं ॥ एतद्यंशे १ । ३५ । १५ सहितं जातं बुधोच्च धनं ६ । १७ । १ शनिबीज व्यंशेन रहितं जातं ३ । ८ । ३१ ऋणंगुरोः शनिबीजं शुक्रोच्च ऋणं ४। ४२ । ४६ बीज संस्कृतं बुधोच्चं …”१ प्रसिद्ध ज्योतिषी शंकर बालकृष्ण दीक्षित अपने मराठी भारतीय ज्योतिः शास्त्र पृष्ठ १८४ तथा २५७ में लिखते हैं :- (३) “मकरंदग्रंथां। सूर्यसिद्धान्तोक्त ग्रहादिकांस बीज संस्कार आहे”...; “मकरंदकारानें सूर्यसिद्धांतास बीजसंस्कारदिलाआहे, त्या विषयीं पूर्वी लिहिलेंच आहे” इन अवतरणों से सिद्ध है कि सैकड़ों वर्षों से मकरंदसारिणी अथवा ग्रहलाघव के अनुसार जितने पंचांग बनते हैं सबमें बीज संस्कार के अनुसार संशोधन रहता है । इसलिए कमलाकर जी की उक्ति व्यवहार में कभी नहीं मानी गयी, ऐसा मेरा विचार है । कमलाकर जी ने आचार्य वशिष्ठ के इस श्लोक को "इत्थं माण्डव्य संक्षेपा- दुक्तं शास्त्रमयोदितं । विस्रस्ती रविचन्द्राद्यैर्भविष्यति युगे युगे” के ‘विस्रस्ती’ पद को ‘विस्तृती’ कहकर श्लोक का अर्थ कुछ और कर दिया है परन्तु यह सर्वथा अवैज्ञानिक, भ्रमजनक तथा प्राचीन वैज्ञानिक पद्धति के विरुद्ध है और केवल अपने पक्ष को पुष्ट करने के लिए लिखा गया है । अब मैं दूसरे पक्ष के समर्थन में जो कुछ प्रायः डेढ़ हजार वर्षों से कहा गया है वह लिख रहा हूँ, जिससे सिद्ध होगा कि हमारे प्राचीन ज्योतिषी ज्योतिष के आर्ष ग्रन्थों को किस दृष्टि से देखते रहे हैं और इनको समय-समय पर संशोधन करने के पक्ष में कौन-कौन सी युक्तियाँ लिख गये हैं । जिस समय सूर्यांश पुरुष मयासुर को सूर्य-सिद्धान्त का उपदेश देने लगे उस समय कहा था, ‘शास्त्रमाद्यं तदेवेदं यत्पूर्वं प्राह भास्करः । युगानां परिवर्तैन कालभेदोत्र केवलं ॥” यह मध्यमाधिकार का ६वां श्लोक है; जिसकी व्याख्या की जा चुकी है । फिर जब ऋषियों ने मयासुर से ज्योतिष का उपदेश ग्रहण किया था तब पहले मयासुर ने जो कुछ सूर्यांश पुरुष से सीखा था वह सब कह कर अन्त में बीजोप- नयनाध्याय का उपदेश २१ श्लोकों में दिया जिसका कारण यह बतलाया था, १. मकरंद सारिणी पृष्ठ ३६, बंबई की छपी ।
स्पष्टाधिकार १११ “चक्रानुपातजोमध्यो मध्यवृत्तांशजः स्फुटः । कालेन दृक्समो न स्यात् ततो बीजक्रियोच्यते ॥ ५ ॥ बीजं निःशेष सिद्धान्त रहस्य परमं स्फुटं । यात्रापाणिग्रहादीनां कार्याणां शुभसिद्धिदम् ॥ २१ ॥” अर्थात् काल पाकर दृक्तुल्यता नहीं होती है इसलिए बीज क्रिया की रीति बतलायी जाती है । बीज क्रिया से संस्कृत स्फुट ग्रहों से ही यात्रा विवाह तथा अन्य शुभ काम फलदायक होते हैं । परन्तु खेद है कि पहले पक्ष के पंडित इस अध्याय को क्षेपक मानते हैं । मेरी समझ में तो यह बात आती है कि सूर्यांश पुरुष ने जो कुछ कहा था उसके अनुसार यह अवश्य क्षेपक है क्योंकि यह मयासुर का बीज संस्कार है न कि सूर्यांश पुरुष का । परन्तु यदि यह मान लिया जाय कि मयासुर ने ऋषियों से जैसा कहा था वैसा ही ऋषियों का पाया हुआ सूर्य सिद्धान्त इस समय प्रचलित है तब इसको क्षेपक मानने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । बात भी यथार्थ में यही है कि प्रचलित सूर्य सिद्धान्त वही है जिसका उपदेश मयासुर ने ऋषियों को दिया था । इसमें बीजो- पनयनाध्याय अंत में इसलिए कहा जिसमें यह स्पष्ट रहे कि मयासुर को सूर्यांश पुरुष से क्या उपदेश मिला था और मयासुर ने स्वयं अपने अनुभव से क्या बढ़ाया था । दृक्तुल्यता के सम्बन्ध में ब्रह्मगुप्त जी शक ५५०, संवत ६८५ वि०, में लिखते हैं :— “प्रतिदिवस विसंवादाद् ग्रह तिथि करणक्षं दिवसमासानाम् । ग्रहणग्रह- योगादिषु पादं पादेन कः स्पृशति ॥ ५७ ॥ तन्त्रभ्रन्शे प्रतिदिनमेवं विज्ञाय धीमता यत्नः । कार्यस्तस्मिन् यस्मिन् दृग्गणितैक्यं सदा भवति ।। इन दोनों श्लोकों के तिलक में म० म० सुधाकर द्विवेदी जी लिखते हैं :— "ग्रह-तिथि-करण-ऋक्ष-दिवस मासानां तथा ग्रहण-ग्रह योगादिषु च प्रतिदिवस विसंवादात् प्रत्यहं दृग्विरोधात् पादं करणाधमं कः पादेनापि स्पृशति अर्थात्थाऽङ्गेषु अधोवृत्तित्वात् पादोऽधमस्तथा दृग्गणितयोरसाम्यात् पादमधमं यत् करणं तत् पादेनापि स्पर्शनार्हं 'प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम्'-इतिन्यायात्” "तन्त्रभ्रंशे सति तदीयतन्त्रगणनया दृग्विरोधे सति एवं पूर्वोक्तं प्रतिदिनं स्पष्टीकरणार्थं वेधादिना विज्ञाय तस्मिन् तन्त्रे वीजादिना तथा यत्नः कार्यो यथा
११२ सूर्य सिद्धान्त दृग्गणितैक्यं भवति । एवं यस्मिन् तन्त्रे सदा दृग्गणितैक्यं भवति तदेव तन्त्रमादरणीय- मिति ।"१ ऊपर के अवतरण में ग्रह, युति इत्यादि के साथ साथ तिथि, करण, ऋक्ष ( नक्षत्र ) शब्द भी आये हैं; जिससे प्रकट है कि जिसको पंडित गिरिजाप्रसाद जी ने अदृष्ट कहा है उसके लिए भी दृग्गणितैक्य का विधान है और बीज संस्कार करने की आवश्यकता बतलायी गयी है । इसलिए दृक्तुल्यता के लिए संस्कार करना ब्रह्मगुप्त जी शास्त्र विरुद्ध या आर्ष वचनों के विरुद्ध नहीं समझते थे । जिसको इन्होंने शास्त्र विरुद्ध समझा था उसका बड़े जोरों से खण्डन किया है । प्रसिद्ध भास्कराचार्य जी शक १०७२ संवत् १२०७ वि० में लिखते हैं :— "यात्रा विवाहोत्सवजातकादौ खेटैः स्फुटैरेव फलस्फुटत्वं । स्यात् प्रोच्यते तेन नभश्चराणां स्फुटक्रिया दृग्गणितैक्य कृद्या ।"२ जिसका अर्थ यह है कि यात्रा विवाह उत्सव जातक इत्यादि कामों के लिए ग्रह स्पष्ट करने से अधिक फल होता है और ग्रह स्पष्ट करने की रीति वही शुद्ध है जिससे दृग्गणितैक्य हो । ऊपर इस बात का प्रमाण दिया गया है कि आजकल ग्रहलाघव कितना मान्य समझा जाता है । इसी ग्रहलाघव के कर्ता आचार्य गणेश दैवज्ञ के पिता आचार्य केशव ने प्राचीन ग्रन्थों में संशोधन करने के पक्ष में शक १४१८ संवत् १५५३ वि० में ग्रह-कौतुक नामक ग्रन्थ में यों लिखा है :— "ब्राह्मार्यभट सौराद्येष्वपि ग्रहकरणेषु बुधशुक्रयोर्महदंतरं अंकतया दृश्यते । मंदे आकाशे नक्षत्र ग्रहयोगे उदयेऽस्ते च पंच भागा अधिकाः प्रत्यक्षमंतरं दृश्यते ।······एवं क्षेपेष्वंतरं वर्ष भोगेष्वपि अंतरमस्ति । एवं बहुकाले बह्वंतरं भविष्यति । यतो ब्राह्माद्ये- ष्वपि भगणानां सावनादीनां च बह्वतरं दृश्यते एवं बहुकाले बह्वंतरं भवत्येव ।······ एवं बह्वंतरं भविष्येः सुगणकैः नक्षत्रयोग ग्रहयोगोदयास्तादिभि वर्तमान घटनामवलोक्य न्यूनाधिक भगणाद्यैर्ग्रहगणितानि कार्याणि । यद्वा तत्काल क्षेपक वर्ष भोगान् प्रकल्प्य लघु करणानि कार्याणि ।······एवं मया परम फल स्थाने चन्द्र ग्रहण तिथ्यंताद् विलोमविधिना मध्यमचंद्रोज्ञातः तन्न फल हास वृद्ध्यभावात् । केन्द्रगोलादि स्थाने ग्रहण तिथ्यंताद्विलोम विधिना चंद्रोच्चमाकलितं । तन्न फलस्य परम हास वृद्धित्वात् । १. तन्त्रपरीक्षाध्याय पृष्ठ १६६-१७०, म० म० सुधाकर द्विवेदी द्वारा सम्पादित ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त । २, सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय पृष्ठ ५६ ।
स्पष्टाधिकार ११३ तत्र चंद्रः सूर्यपक्षात्पंचकलोनो दृष्टः । उच्चं ब्रह्मपक्षाश्रितं । सूर्यः सर्वपक्षेपीषदंतरः स सौरो गृहीतः । अन्ये ग्रहा नक्षत्र ग्रहयोगास्तोदयादिभिर्वर्तमानघटनामवलोक्य साधिताः । तत्रेदानों भोमेज्यो ब्राह्मपक्षाश्रितो घटतः । ब्राह्मो बुधः । ब्राह्मार्थमध्य शुक्रः । शनि पक्षत्रयात्पंचभागाधिको दृष्टः । एवं वर्तमान घटनामवलोक्य लघुकर्मणा ग्रह गणितं कृतं ।"१ इस लम्बे अवतरण से यह अच्छी तरह स्पष्ट होता है कि वर्तमान आकाशीय घटनाओं को किस प्रकार वेध द्वारा देखकर सूर्य चन्द्रमा इत्यादि ग्रहों के भगण कालों का संशोधन करना चाहिये । भविष्य के लिए भी ऐसा करने को आदेश किया गया है । इस अवतरण में सूर्य-सिद्धान्त का भी स्पष्ट उल्लेख है । पिता के इन्हीं वेधों और बीजों के आधार पर आचार्य गणेश दैवज्ञ ने 'ग्रहलाघव' बनाया जिसके मध्यमा- धिकार के १६वें श्लोक में शक १४४२, संवत् १५७७ वि० में लिखा है । "सौरोंऽर्कोऽपि विधूच्चमङ्क कलिकोनाब्जो गुरुस्त्वार्यजो, ऽ सृग राहु च कजं ज्ञकेन्द्रक्रमयार्ये सेषुभागः शनिः । शौक्रं केन्द्रम नार्यमध्यगमिती मे यान्ति दृक्तुल्यतां, सिद्धैस्तैरहिपर्व धर्म नय सत्कार्यादिकं त्वादिशेत् ॥"२ जिससे प्रकट है कि गणेश जी पर्व धर्म, उत्सव इत्यादि सभी शुभ काम दृग्गणितैक्य से ही निश्चय करने का आदेश करते हैं न कि 'निर्बीज' सूर्य-सिद्धान्त से । इसकी टीका में मल्लारि जी शक १५४७ संवत् १६८० वि० में लिखते हैं, "......इति तेभ्यः पक्षेभ्यः साधिता इमे ग्रहाः दृशितुल्यतां दृग्गणितैक्यं यान्ति...... इहा स्मिन् ग्रन्थे सिद्धैस्तैर्ग्रहैः पर्व धर्मनयसत्कार्यादिकमादिशेत् । पर्व ग्रहण धम्मों यज्ञानुष्ठानेकादशी व्रतादिकम् । नयो नीतिः । राजनीति दण्डनीत्यादिकः । सत्कार्यं शुभं कार्यंत्रतबन्ध विवाहादि । एभ्यो ग्रन्थेभ्य एतदुत्पन्न तिथ्यादेरेवादिशेत् अयं भावः । यतो यस्मिन् यस्मिन् काले यद्यद् दृग्गणितैक्यकृतद्देवग्राह्यं घटमानत्वात् ।"३ फिर मल्लारि जी कहते हैं, "अहर्गणात्साधितो यो ग्रहः स मध्यमो यतो यन्त्र- वेधेनाकाशे विलोक्यमाने तावान् ग्रहो न दृष्टः किञ्चिदंतरं दृष्टं प्रत्यहं गतेर्विसदृ- शत्वात् । एवं प्रत्यहं ग्रहान् गोलेन चक्रयन्त्रेण वा विदृश्वा अहर्गणोत्पन्न मध्यम ग्रह वेधित स्पष्टग्रहयोरन्तराणि साधितानि ।"४ १. मराठी भारतीय ज्योतिःशास्त्र पृष्ठ २५६ में उद्धृत । २. म० म० सुधाकर द्विवेदी सम्पादित ग्रहलाघव पृष्ठ ७० । ३. वही, ग्रहलाघव पृष्ठ ७० । ४. वही, ग्रहलाघव पृष्ठ ७२ । ८
११४ सूर्य सिद्धान्त मल्लारि जी एक जगह और लिखते हैं “एवं ग्रहभगणभोगपर्यन्तं ग्रहगतीरानीय तासु मध्ये या परमाधिका गतिर्याच परमाल्पा तयोर्योगाधं मध्यगतिरेवाङ्गी कृता । सा दुःसाध्या सूक्ष्माणां विकला कोट्यं शादीनामलक्ष्यत्वात् । सा स्थूला जाता सैवाङ्गी- कृता । एवं कियत्यपि काले जाते वसिष्ठादिभिर्विलोक्यमाने गतेरन्तरं दृष्टम् । एव- मन्यैरपि ।...............अस्मिन्काले एतद्द्ग्गोचराः एवमग्रेऽपि भविष्यन्महागण- कैर्नलिकाबन्धादिना ग्रहवेधं कृत्वाऽन्तरानि लक्ष्यित्वा ग्रहकरणानि कार्याणीत्यग्रे ग्रन्थ समाप्तावाचार्येणायुक्तमस्ति ।"१ इस अवतरण में जिस तर्क से मल्लारि जी ने काम लिया है उसको सिद्ध करने के लिए वराह-मिहिर, वशिष्ट, सूर्यसिद्धान्त, ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त सभी के अवतरण दिये हैं जो इस जगह छोड़ दिये गये हैं, क्योंकि इनको मैंने पहले ही दे दिया है । दृक्तुल्यता के लिए वेध करके ही परीक्षा ली जा सकती है इसलिए गणित और वेध में जब समता हो तभी नियम शुद्ध कहा जा सकता है । मल्लारि जी की यह बात १६ आने पावरत्ती ठीक है कि वेध द्वारा प्राप्त हुई संख्याओं में कुछ न कुछ स्थूलता 'विकलाकोट्यंशादीनामलक्ष्यत्वात्' रह ही जाती है, जिसके लिए समय समय पर वर्तमान घटनाओं को देखकर संशोधन करना चाहिये । अनेक लम्बे अवतरणों से पाठक ऊब गये होंगे, इसलिए मैं आचार्य गणेश दैवज्ञ की पुस्तक वृहत्तिथिचिन्तामणि से अवतरण न दूंगा । यद्यपि इसमें संक्षेप में ब्रह्माचार्य, वशिष्ठ, कश्यप, मयासुर, आर्यभट, दुर्गसिंह मिहिर, ब्रह्मगुप्त, केशव, इत्यादि सब के अवलोकनों की चर्चा करते हुए बतलाया गया है कि इनमें अंतर क्यों पड़ गया और उनको नये ग्रन्थ के बनाने की उस समय क्यों आवश्यकता पड़ी तथा जब आगे आवश्यकता पड़ेगी तब कैसे संशोधन करना चाहिये । फिर भी अन्त का एक श्लोक दिये बिना रहा नहीं जाता जो यों है :- “कथमपि यदिदं चेद्भूूरिकाले श्लथंस्यान्, मुहुरपि परिलक्ष्येन्दु ग्रहाद्युक्षयोगम् ॥ सदमलगुरुतुल्यप्राप्तबुद्धिप्रकाशैः कथित सदुपपत्या शुद्धिकेन्द्रे प्रचाल्ये ।।”२ इन अवतरणों को पढ़कर कौन ऐसा होगा जो न मानेगा कि हमारे पुराने आचार्य और वैज्ञानिक युक्तियुक्त तर्कों से यह आवश्यकता दिखला गये हैं कि दृग्गणि- १. म० म० सुधाकर द्विवेदी सम्पादित ग्रहलाघव पृष्ठ ५५ । २. म० म० सुधाकर द्विवेदी सम्पादित गणकतरंगणी पृष्ठ ६३ ।
स्पष्टाधिकार ११५ तैक्य के लिए समय-समय पर सिद्धान्त ग्रन्थों में भी संशोधन करने की आवश्यकता है और इसी संशोधन के साथ तिथि, योग, करण, नक्षत्र इत्यादि जानकर सभी लौकिक काम करने चाहिये ? आजकल का कोई “अंग्रेजी गणितविद्याविशारद" भी अपने पक्ष के समर्थन में पुराने आचार्य जो कुछ कह गये हैं उससे अधिक कहने की अवश्कता नहीं समझ सकता । राशिलिप्ताष्टमो भागः प्रथमं ज्यार्धमुच्यते । तत्तद्विभक्त लब्धोनमिश्रितं तद् द्वितीयकम् ।।१५।। आद्येनैवं क्रमात्पिण्डान्भक्त्वा लब्धोनितैर्युतैः । खण्डकैस्स्युश्चतुर्विशज्ज्यार्धपिण्डाः क्रमादमी ।।१६।। अनुवाद—(१५) एक राशि में जितनी कलाएँ होती हैं उसके आठवें भाग को पहली 'ज्या' कहते हैं । इसको इसी से भाग देकर लब्धि को इसी में घटाकर शेष को इसी में (पहली ज्या में) जोड़ देने से दूसरी ज्या निकल आती है । (१६) इसी प्रकार आदि से लेकर सब ज्याओं को पहली ज्या से भाग देकर भाग फलों को जोड़ कर, योगफल को पहली ज्या में से घटाकर शेष को अन्तिम ज्या में जोड़ दो तो जो योगफल मिलेगा वही अगली ज्या होगी । इस प्रकार क्रम से २४ ज्याओं के पिंड होंगे । विज्ञान भाष्य—ज्या किसको कहते हैं और इसका मान रेखागणित से कैसे निकाला जाता है इसका विवेचन मध्यमाधिकार के ६० वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में किया गया है । उस श्लोक के नीचे जो दूसरा चित्र दिया गया है उसको देखना चाहिये । ऊपर १५ वें श्लोक में 'ज्या' के स्थान में 'ज्यार्ध' शब्द का प्रयोग हुआ है, इससे भ्रम में न पड़ना चाहिये । दोनों के अर्थ समान माने गये हैं । 'ज्या' के लिए 'ज्यार्ध' इसलिए कहा गया है कि किसी कोण उ अ आ को 'ज्या' जानने के लिए सबसे सरल रीति यह है कि एक ऐसा वृत्तखंड (Sector) उ अ ऊ बनाओ जिसका केन्द्रीय कोण अ अभीष्ट कोण का दूना हो, फिर इस वृत्तखंड की जीवा या ज्या उ ऊ खींच लो और उसका आधा कर दो । बस इसी जीवा का आधा (ज्यार्ध) उ इ अभीष्ट कोण की ज्या है । इसीलिए ज्यार्ध और ज्या समानार्थवाची हैं (चित्र २४) । इस श्लोक से यह भी पता चलता है कि आचार्य ने एक राशि के ८वें भाग अर्थात् ३ ३/४ अंश या २२५ कला के धनु (arc) और ज्या (line) में कोई अन्तर नहीं समझा है । इसके बाद ३ ३/४ अंश के दूने, तिगुने, चौगुने, इत्यादि अंशों की ज्याएँ कैसे ज्ञात की जाती हैं इसकी रीति बतलायी गयी है । संक्षेप में, बीजगणित की भाषा में रीति यों लिखी जा सकती है:—
११६ सूर्य सिद्धान्त उ अ इ आ ऊ चित्र २४ यदि प = ३ ३/४ अंश = २२५' तो ज्या प = २२५' ज्या प ज्या ७ १/२ अंश = ज्या २ प = ज्या प + ज्या प - ――― = २२५' + २२५' - १' ज्या प = ४४६'; ज्या प + ज्या २ प ज्या ११ १/४ अंश = ज्या ३ प = ज्या २ प + ज्या प - ――――――― ज्या प = ४४६' + २२५' - ३ = ६७१' ; ज्या प + ज्या २ प + ज्या ३ प ज्या १५° = ज्या ४ प = ज्या ३ प + ज्या प - ――――――――――― ज्या प = ६७१' + २२५' - (१ + २ + ३) = ८६०' ; इसी प्रकार ज्या (स + १) प ज्या प + ज्या २ प + ... ज्या (स प) = ज्या ( स प ) + ज्या प - ――――――――――――――― ज्या प इसकी उपपत्ति महामहोपाध्याय बापूदेव शास्त्रीजी के अनुसार १ यह है :-- कल्पना करो, ज्या प - ज्या ० = त१, ज्या २ प - ज्या प = त२, ज्या ३ प - ज्या २ प = त३,
१. देखो सूर्य सिद्धान्त का बापूदेवजी शास्त्री द्वारा अंग्रेजी अनुवाद
स्पष्टाधिकार ११७ ज्या नप - ज्या (न - १) प = त_{न} और ज्या (न + १) प - ज्या न प = त_{न+१} तब, त_{१} - त_{२} = २ ज्या प - ज्या २ प = २ ज्या प - २ ज्या प कोज्या प* = २ ज्या प ( १ - कोज्या प ) = २ ज्या प × उज्या प** (१) त_{२} - त_{३} = २ ज्या २ प - ज्या प - ज्या ३ प = २ ज्या २ प - ज्याप - (३ ज्या प - ४ ज्या³ प) = २ ज्या २ प - ४ ज्या प + ४ ज्या³ प = २ ज्या २ प - ४ ज्या प (१ - ज्या² प) = २ ज्या २ प - ४ ज्या प × कोज्या² प = २ ज्या २ प - २ ज्या प × कोज्या प × २ कोज्या प = २ ज्या २ प - २ ज्या २ प × कोज्या प = २ ज्या २ प (१ - कोज्या प) = २ ज्या २ प × उज्या प (२) त_{३} - त_{४} = २ ज्या ३ प - ज्या २ प - ज्या ४ प = २ ज्या ३ प - (ज्या २ प + ज्या ४ प) = २ ज्या ३ प - २ ज्या ३ प × कोज्या प*** = २ ज्या ३ प (१ - कोज्या प) = २ ज्या ३ प × उज्या प (३) इसी प्रकार त_{न} - त_{न+१} = २ ज्या नप - ज्या (न - १) प - ज्या (न + १) प = २ ज्या नप - {ज्या (न - १) प + ज्या (न + १) प} = २ ज्या नप - २ ज्या नप कोज्या प = २ ज्या नप (१ - कोज्या प) = २ ज्या नप × उज्या प (न)
- कोज्या = कोटिज्या = cosine × × उज्या = उत्क्रमज्या = versed sine = (1 - cosine) = १ - कोज्या × × × देखो Hall and Knight's Trigonometry page 113.
११८ सूर्य सिद्धान्त अब (१), (२), (३)...(न) समीकरणों के सम पक्षों को जोड़ने से त₁ - त_{न+१} = २ उज्या प (ज्या प + ज्या २ प ,
- ज्या ३ प +...ज्या नप) परन्तु त₁ - त_{न+१} = ज्या प + ज्या नप - ज्या (न + १) प ∵ ज्या प + ज्या नप - ज्या (न + १) प = २ उज्या प × (ज्या प + ज्या २ प +...ज्या नप) ∵ ज्या (न + १) प = ज्या नप + ज्या प - २ उज्या प (ज्या प + ज्या २ प +...ज्या नप) यहाँ प = ३°४५' = २२५' ∴ २ उज्या प = २ उज्या २२५' = २ (१ - कोज्या २२५') = २ (१ - .९९७८) = २ × .००२२ = ४४ / १०००० = १ / २२७ = १ / २२५ स्वल्पान्तर से ∴ ज्या (न + १) प = ज्या नप + ज्या प - १ / २२५ × (ज्या प + ज्या २प +...ज्या नप) तत्त्वाश्विनोऽङ्काब्धिवेदा रूपभूमिधरर्तवः । खाङ्काष्टौ पञ्चशून्येशा वाणभूमिगुणेन्दवः ॥१७॥ शून्यलोचनपञ्चैकाश्छिद्ररूपमुनीन्दवः । वियच्चन्द्रातिधृतयो गुणरन्ध्राम्बराशिषः ॥१८॥ मुनिषड्यमनेत्राणि चन्द्राग्निकृतदस्रकाः । पञ्चाष्टविषयाक्षोणि कुञ्जराश्विनगश्विनः ॥१९॥ रन्ध्रपञ्चाष्टकयमा वस्वद्र्यङ्कयमास्तथा । कृताष्टशून्यज्वलना नगाद्रिशशिवह्नयः ॥२०॥ षट्पञ्चलोचनगुणाश्चन्द्रनेत्राग्निवह्नयः । यमाद्रिवह्निज्वलना रन्ध्रशून्यार्णवाग्नयः ॥२१॥ रूपाग्निसागरगुणा वसुत्रिकृतवह्नयः । प्रोज्झ्योत्क्रमेण व्यासार्धादुत्क्रमज्यार्धपिण्डकाः ॥२२॥ अनुवाद—(१७) २२५, ४४६, ६७१, ८६०, ११०५, १३१५; (१८) १५२०, १७१६, १९१०, २०६३; (१९) २२६७, २४३१, २५८५, २७२८; (२०) २८५६,
२६७८, ३०८४, ३१७७; (२१) ३२५६, ३३२१, ३३७२, ३४०६; (२२) ३४३१, ३४३८ कलाएं क्रम से ३¾ अंश, ७½ अंश, ११¼ अंश, १५ अंश इत्यादि एक समकोण के २४ पिंडों की ज्याएं हैं। यदि इनको उलटे क्रम से (उत्क्रम से) एक त्रिज्या की कलाओं से अर्थात् ३४३८ से घटा दो तो एक समकोण के २४ पिंडों की क्रम से उत्क्रम ज्याएं ज्ञात हो जायंगी । इनके मान भी आगे के पांच श्लोकों में दिये हुए हैं । विज्ञान भाष्य - इस सम्बन्ध में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती है। अगले पांच श्लोकों के बाद इन ज्याओं और उत्क्रम ज्याओं के मानों की तुलना आजकल की रीति से निकाले हुए मानों से की जायगी। उत्क्रम ज्या के मान जानने के लिए जो नियम लिखा गया है वह बहुत ही सरल और मौलिक है। यदि ३४३८ में से अंतिम संख्या ३४३८ घटायी जाय तो शून्य बचेगा जो शून्य अंश की उत्क्रम ज्या है और यदि ३४३१ घटाया जाय तो ७ बचेगा जो २२५ कला की उत्क्रम ज्या है। इसको रेखागणित के आधार पर इस प्रकार जान सकते हैं—चित्र २४ में यदि उ अ आ २२५' कला का कोण हो तो उ आ का मान २२५', उ इ का २२५' (स्वल्पान्तर से ), अ इ का ३४३१' और इ आ का ७' है। यही इ आ का मान उ अ इ कोण की उत्क्रम ज्या है। इसी प्रकार अन्य पिण्डों की ज्याएं और उत्क्रम ज्याएं जानी जा सकती हैं। मुनयो रन्ध्रयमला रसषट्का मुनीश्वराः । द्व्यष्टैका रूपषड्दस्त्राः सागरेषुहुताशनाः ॥२३॥ ऋर्तुवेदा नवाद्र्यथां दिङ्नागास्त्वथकुञ्जराः । नगाम्बरवियच्चन्द्रा रूपभूधरशङ्कराः ॥२४॥ शरार्णवहुताशैका भुजङ्गाक्षिशरेन्दवः । नवरूपमहीध्रैका गजैकाङ्कनिशाकराः ॥२५॥ गुणाश्विरूपनेत्राणि पावकाग्निगुणाश्विनः । वस्वर्णवार्थयमलास्तुरगर्तु नगाश्विनः ॥२६॥ रन्ध्राष्टनबनेत्राणि पावकैकयमाग्नयः । अष्टाग्निसामरगुणा उत्क्रमज्यार्धपिण्डकाः ॥२७॥ अनुवाद—(२३) ७, २६, ६६, ११७, १८२, २६१, ३५४; (२४) ४६०, ५७६, ७१०, ८५३, १०००, ११७१; (२५) १३४५, १५२८, १७१६, १६१८; (२६) २१२३, २३३३, २५४८, २७६७; (२७) २६८६, ३२१३, और ३४३८ कलाएँ क्रम से उत्क्रम ज्याओं के पिंड हैं। नीचे एक सारिणी दी जाती है जिसमें ऊपर के ग्यारह श्लोकों का सार है :—
१२० सूर्य-सिद्धान्त
| पिंडों का क्रम | धनु अथवा कोण | भारतीय रीति से ज्या के मान जब त्रिज्या = ३४३८ | आजकल की रीति से ज्या के मान जब त्रिज्या = ३४३८ | आजकल की रीति से ज्या के मान जब त्रिज्या = १ | भारतीय रीति से उत्क्रम ज्या के मान जब त्रिज्या = ३४३८ | आजकल की रीति से उत्क्रम ज्या के मान जब त्रिज्या = १ |
|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ |
| १ | ३°४५' | २२५ | २२४.८५ | .०६५४ | ७ | .००२२ |
| २ | ७°३०' | ४४६ | ४४८.६५ | .१३०५ | २६ | .००८६ |
| ३ | ११°१५' | ६७१ | ६७०.७२ | .१९५१ | ६६ | .०१९२ |
| ४ | १५° | ८९० | ८८६.८२ | .२५८८ | ११७ | .०३४१ |
| ५ | १८°४५' | ११०५ | ११०५.०१ | .३२१४ | १८२ | .०५३१ |
| ६ | २२°३०' | १३१५ | १३१५.०५ | .३८२७ | २६१ | .०७६१ |
| ७ | २६°१५' | १५२० | १५२०.५८ | .४४२३ | ३५४ | .१०३१ |
| ८ | ३०°१५' | १७१६ | १७१६.०० | .५००० | ४६० | .१३४० |
| ९ | ३३°४५' | १६१० | १६१०.०५ | .५५५५ | ५७६ | .१६८५ |
| १० | ३७°३०' | २०६३ | २०६३.०५ | .६०८८ | ७१० | .२०६६ |
* देखिये चित्र १ = पृष्ठ १६६ 'विज्ञान' भाग १८ संख्या ५