भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

त्रिप्रश्नाधिकार २८३ ज्या (अक्षांश) = $\frac{पलभा}{विषुवतकर्ण}$ [श्लोक १३] ज्या (क्रान्ति) = $\frac{१२\timesअग्रज्या}{विषुवतकर्ण}$ [श्लोक २२] कोज्या (अक्षांश) = $\frac{१२}{विषुवतकर्ण}$ [श्लोक १३] समीकरण (ग) से सिद्ध है कि ज्या (अग्रा) $\times$ ज्या (नतांश) $\times$ कोज्या अक्षांश $=$ ज्या (क्रान्ति) $-$ कोज्या (नतांश) $\times$ ज्या अक्षांश इसमें ज्या (अग्रा), ज्या (अक्षांश) इत्यादि के मान उत्थापन करने से $\frac{१}{\sqrt{२}}\timesज्या(नतांश)\times\frac{१२}{विषुवतकर्ण}$ $=\frac{१२\timesअग्र ज्या}{विषुवतकर्ण}-कोज्या (नतांश)\times\frac{पलभा}{विषुवतकर्ण}$ इसी समीकरण के दूसरे पक्ष में जो अग्र ज्या है वह सूर्य की उदयकालिक अग्रा की ज्या है। इस समीकरण के प्रत्येक पद के हर में विषुवतकर्ण है इसलिए इस सामान्य संख्या को हटा देने में कोई अंतर नहीं पड़ेगा। यदि पलभा, नतांश और अग्र ज्या को क्रम से प, न और अ अक्षरों से सूचित किया जाय और विषुवतकर्ण हटा दिया जाय तो $\frac{१}{\sqrt{२}}\timesज्या (न)\times१२=१२\timesअ-कोज्या (न)\timesप$ दोनों पक्षों का वर्ग करने से, ३ $\times$ ज्या$^२$ (न) $\times$ १२$^२$ $=$ १२$^२$ $\times$ अ$^२$ $\times$ प$^२$ $\times$ को ज्या$^२$(न) $-$ २ $\times$ १२ $\times$ अ $\times$ प $\times$ कोज्या (न) परंतु १६वें श्लोक के आधार पर ज्या$^२$ (न) $=$ त्रिज्या$^२$ $-$ कोज्या$^२$ (न) इसलिए उपयुक्त समीकरण का रूप यह होगा ३ $\times$ १२$^२$ $\times$ [त्रिज्या$^२$ $-$ कोज्या$^२$ (न)] $=$ १२$^२$ अ$^२$ + प$^२$ $\times$ कोज्या$^२$ (न) $-$ २ $\times$ १२ $\times$ अ $\times$ प $\times$ कोज्या (न)

२८४ सूर्य-सिद्धान्त अथवा सरल करने पर १२२ [ त्रिज्या२/२ - अ२ ] = कोज्या२ (न) [ १२२/२ + प२ ] - २ x १२ x अ x प x कोज्या (न) प्रत्येक पक्ष को १२२/२ + प२ से भाग देने पर और आवश्यक पदों को एक पक्ष से दूसरे पक्ष में ले जाने पर कोज्या२ (न) - २ x १२ x अ x प / (१२२/२ + प२) कोज्या (न)

  • १२२ [ त्रिज्या२/२ - अ२ ] / (१२२/२ + प२) = ० तीसरे पद की जगह करणी और दूसरे पद के १२ x अ x प / (१२२/२ + प२) की जगह फल लिखने से इसका रूप होगा कोज्या२ (न) - २ x फल x कोज्या (न) - करणी = ० या कोज्या२ (न) - २ फल x कोज्या (न) = करणी पहले पक्ष को पूर्ण वर्ग बनाने के लिए प्रत्येक पद में (फल)२ जोड़ने से कोज्या२ (न) - २ फल x कोज्या (न) + फल२ = करणी + फल२ इस समीकरण का पहला पक्ष = [कोज्या (न) - फल]२ ∴ कोज्या (न) - फल = √करणी + फल२ अथवा कोज्या (न) = फल + √करणी + फल२ परंतु कोज्या (न) = कोज्या (नतांश) = ज्या (उन्नतांश) = कोण शंकु ∴ कोण शंकु = √करणी + फल२ + फल इसलिए यह सिद्ध हुआ कि जब सूर्य की क्रान्ति उत्तर होती है तब फल के वर्ग को करणी में जोड़कर और योगफल का वर्गमूल निकालकर फल में जोड़ देने से कोण शंकु आ जाता है। यदि सूर्य की क्रान्ति दक्षिण हो तो चित्र ५८ के अनुसार

त्रिप्रश्नाधिकार २८५ — ज्या (अग्रा) x ज्या (नतांश) x कोज्या (अक्षांश) = — ज्या (क्रान्ति) — कोज्या (नतांश) x ज्या (अक्षांश) जिसमें ज्या अग्रा, ज्या क्रान्ति इत्यादि के मान उत्थापन करने और सरल करने से — १/√२ x ज्या (न) x १२ = — १२ अ — प x कोज्या (न) अथवा १/√२ x १२ x ज्या (न) = १२ अ + प x कोज्या (न) दोनों पक्षों का वर्ग करने से १२²/२ x ज्या² (न) = १२² अ² + प² x कोज्या² (न) + २ x १२ x अ x प x कोज्या न अथवा १२²/२ [ त्रिज्या² — कोज्या² (न) ] = १२² अ² + प² x कोज्या² (न) + २ x १२ x अ x प x कोज्या (न) ∴ १२² [ त्रिज्या²/२ — अ² ] = कोज्या² (न) [ १२²/२ + प² ] + २ x १२ x अ x प x कोज्या न ∴ कोज्या² (न) + (२ x १२ x अ x प) / (१२²/२ + प²) कोज्या (न) = (१२² [ त्रिज्या²/२ — अ² ]) / (१२²/२ + प²) अथवा कोज्या² (न) + २ x फल x कोज्या (न) = करणी ∴ [कोज्या (न) + फल]² = करणी + फल² ∴ कोज्या (न) + फल = √(करणी + फल²) ∴ कोज्या (न) = √(करणी + फल²) — फल इसलिए यह सिद्ध होता है कि जब सूर्य की क्रान्ति दक्षिण होती है तब फल घटाना पड़ता है ।

२८६ सूर्य-सिद्धान्त स्वशंकुना विभज्याप्ते दृक्त्रिज्ये द्वादशाहते । छायाकणौ तु कोणेषु यथास्वं देशकालयोः ।।३३।। अनुवाद—(३३) दृग्ज्या और त्रिज्या को १२ से गुणा करके कोण शंकु से भाग दो । भागफल क्रमानुसार इष्ट स्थान के यथासमय छाया और कर्ण होंगे । विज्ञान भाष्य—२८-३२ श्लोकों में यह बतलाया गया है कि जब सूर्य आग्नेयादि विदिशाओं में हो तब उस समय की उन्नतांश ज्या (कोण शंकु) और नतांश ज्या (दृग्ज्या) कैसे निकालते हैं । ३३वें श्लोक में यह बतलाया गया है कि दृग्ज्या और कोण शंकु से उस समय की छाया या छायाकर्ण कैसे निकाला जाता है । इस नियम का सार यह है :— (कोण) छाया = दृग्ज्या x १२ / कोण शंकु (कोण) छायाकर्ण = त्रिज्या x १२ / कोण शंकु यह २१वें श्लोक से मिलता-जुलता है । इसलिए इसकी उपपत्ति भी उसी तरह है । उदाहरण—जब सूर्य की क्रान्ति १५° उत्तर या दक्षिण हो तो प्रयाग में (अक्षांश २५° २५') कोण शंकु और दृग्ज्या क्या होंगे ? प्रयाग का विषुवतकर्ण = १३.२८ अंगुल ,, की पलभा = ५.६८ अंगुल इसलिए उस दिन की उदयकालिक अग्राज्या = (ज्या १५° x १३.२८) / १२ [ देखो श्लोक २२ ] = (८६० x १३.२८) / १२ = ६८५' करणी = ((त्रिज्या² / २) - अग्राज्या²) x १४४ / (७२ + पलभा²) = ((५६०६६२२ - ४७०२२५) १४४) / (७२ + ३२.२६) = (४६३६६६७ x १४४) / १०४.२६ = ६८२२५२४

त्रिप्रश्नाधिकार २८७ फल = १२ × पलभा × अग्राज्या / ७२ + पलभा २ = १२ × ५.६८ × ६८५ / १०४.२६ = ६४४ ∴ कोण शंकु = √करणी + फल २ ± फल = √६८२२५२४ + ४१४७३६ ± ६४४ = √७२३७२६० ± ६४४ = २६६० ± ६४४ = ३३३४' या २०४६' इसलिए जब क्रान्ति उत्तर होगी तब कोण शंकु ३३३४' और जब क्रान्ति दक्षिण होगी तब कोण शंकु २०४६' होगी । यह बतलाया गया है कि कोण शंकु नतांश की कोटिज्या अथवा उन्नतांश की ज्या को कहते हैं इसलिए यदि नतांश या उन्नतांश जानना हो तो कोण शंकु का धनु बनाना होगा । यहाँ, कोण शंकु = उन्नतांश की ज्या = ३३३४' ∴ उन्नतांश = ७५° ५७' ∴ नतांश = ९०° - ७५° ५७' = १४° ३' जब क्रान्ति दक्षिण होगी तब उन्नतांश की ज्या = २०४६' ∴ उन्नतांश = ३६° ३२' और नतांश = ९०° - ३६° ३२' = ५३° २८' जब सूर्य की क्रान्ति उत्तर होगी तब, दृग्ज्या = √त्रिज्या २ - कोण शंकु २ = √३४३८ २ - ३३३४ २ = √(३४३८ + ३३३४) (३४३८ - ३३३४) = √६७७२ × १०४ = ८३६ कला परन्तु दृग्ज्या = नतांश की ज्या = ८३६' ∴ नतांश = १३° ५६'

३. चन्द्रग्रहण व सूर्यग्रहणाधिकार (ग्रहण गणित)

२८८ सूर्य-सिद्धान्त दोनों उत्तरों में ४ कला का अंतर है क्योंकि वर्गमूल निकालने में दशमलव के अंक छोड़ दिये गये हैं। यदि यह जानना हो कि कोणों (विदिशाओं) पर शंकु की छाया या छाया- कर्ण क्या होंगे तो ३३वें श्लोक से काम लेना होगा। जब सूर्य की क्रान्ति उत्तर होगी तब छाया = दृग्ज्या × १२ / कोण शंकु = ८३६ × १२ / ३३३४ = ३.०२ अंगुल छायाकर्ण = त्रिज्या × १२ / कोण शंकु = ३४३८ × १२ / ३३३४ = १२.३७ अंगुल नवीन रीति से कोण शंकु का मान जानने में कोई विशेष सुविधा नहीं है फिर भी उदाहरण दे देना अच्छा होगा। यह पहले सिद्ध हो चुका है कि जब सूर्य ईशान या वायव्य कोण में होगा तब अग्रा की ज्या + १/√२ और जब अग्नि या नैऋत्य कोण में होगा तब अग्रा की ज्या - १/√२ होगी (देखो चित्र ५७, ५८) इसलिए २२–२४ श्लोकों के समीकरण (ग) के अनुसार, ± १/√२ = (±ज्या १५° — कोज्या (न) × ज्या २५°२५') / (ज्या (न) × कोज्या २५°२५') † या ±·७०७१ = (±·२५८८ — कोज्या (न) × ·४२६२) / (ज्या (न) × ·६०३२) ∴ ±·७०७१ × ·६०३२ × ज्या (न) = ±·२५८८ — ·४२६२ × कोज्या (न) † १५° क्रान्ति की ज्या धनात्मक तब होगी जब क्रान्ति उत्तर होगी अर्थात् जब सूर्य उत्तर गोल में होगा। परंतु जब क्रान्ति दक्षिण होगी तब इसकी ज्या ऋणात्मक होगी।

त्रिप्रश्नाधिकार २८६ दोनों पक्षों का वर्ग करने पर, ·४०७६ ज्या² (न) = ·०६७० ∓ ·२२२२ कोज्या (न)

  • ·१८४२ कोज्या² (न) या ·४०७६ (१ - कोज्या² न) = ·०६७० ± ·२२२२ कोज्या न + ·१८४२ कोज्या² न ∴ ·५६२१ कोज्या² न ∓ ·२२२२ कोज्या न - ·३४०६ = ० ∴ कोज्या न = ± ·२२२२ ± √(·२२२२)² + ४ × ·५६२१ × ·३४०६ / २ × ·५६२१ = ± ·२२२२ ± ·६२५६ / १·१८४२ = ·१०४७८ / १·१८४२ या ·७०३४ / १·१८४२ ∴ उन्नतांशकी ज्या = ·९६६३ या ·५६४० ∴ उन्नतांश = ७५° ४६' या ३६° २७' इससे दृग्ज्या, छाया, इत्यादि भी जानी जा सकती हैं । इष्टकाल, अक्षांश और क्रान्ति जान कर उन्नतांश, छाया इत्यादि जानने की रीति— त्रिज्वोदक्चरजायुक्ता याम्यायां तु विवर्जिता । अन्त्या नतोत्क्रमज्योना स्वाहोरात्रार्धताडिता ॥३४॥ त्रिज्याभक्ता भवेच्छे दो लम्बज्याघ्नोऽथ भाजितः ।। त्रिभज्यया भवेच्छङ्कस्तद्वर्गं प्रविशोधयेत् । त्रिज्यावर्गात्पदं दृग्ज्या छायाकणौ तु पूर्ववत् ॥ ३५॥ अनुवाद—(३४) यदि सूर्य उत्तर गोल में हो तो चरज्या को त्रिज्या में जोड़ने और यदि सूर्य दक्षिण गोल में हो तो घटाने से अन्त्या आती है। इससे नत काल की उत्क्रमज्या को घटाकर शेष को द्युज्या से गुणां कर दो (३५) और त्रिज्या से भाग दे दो तो छेद आता है । इसको लम्ब ज्या से गुणा करके त्रिज्या के भाग दे देने पर शंकु (इष्टकाल की उन्नतांश की ज्या) आता है। शंकु के वर्ग को त्रिज्या के वर्ग से घटाकर शेष का वर्गमूल निकालने पर जो आता है वह दृग्ज्या (इष्टकाल की नतांश ज्या) है जिनसे छाया और छायाकर्ण पहले की तरह जान लेना चाहिए । विज्ञान भाष्य —इन दो श्लोकों का सार यह है :— (१) अन्त्या = त्रिज्या ± चरज्या १६

२६० सूर्य-सिद्धान्त (२) छेद = (अन्त्या - नतोत्क्रमज्या) ✕ द्युज्या त्रिज्या (३) शंकु = छेद ✕ लम्बज्या त्रिज्या (४) दृग्ज्या = √त्रिज्या² — शंकु ² समीकरण (३) में समीकरण (२) और (१) के मान उत्थापन करने से, शंकु = (अन्त्या - नतोत्क्रमज्या) ✕ द्युज्या ✕ लम्बज्या त्रिज्या त्रिज्या = (त्रिज्या ± चर ज्या - नतोत्क्रमज्या) ✕ द्युज्या ✕ लम्बज्या त्रिज्या त्रिज्या = (त्रिज्या - नतोत्क्रमज्या ± चरज्या) द्युज्या ✕ लम्बज्या त्रिज्या² = (नतकोटिज्या ± चरज्या) द्युज्या ✕ लम्बज्या † त्रिज्या² = (नतकोटिज्या ± चरज्या) ✕ क्रान्तिकोटिज्या त्रिज्या² ✕ अक्षांश कोटिज्या................(क)* यह बात गोलीय त्रिकोणमिति से सहज ही सिद्ध हो सकती है । यहाँ कुछ नये शब्द आये हैं इसलिए पहले उनका समझाना आवश्यक है:— अन्त्या—चित्र ४२ में चरज्या चा श और च श है और वि श त्रिज्या है । इसलिए चा वि और च वि क्रम से अन्त्या हुए । नत काल—किसी समय से जितनी देर में कोई ग्रह या तारा याम्योत्तर वृत्त पर आता है उसको उस ग्रह या तारे का पूर्व नत काल कहते हैं और उस तारे या ग्रह के याम्योत्तर वृत्त लांघने के बाद जितना समय बीता रहता है उसको उस तारे या ग्रह का पच्छिम नत काल कहते हैं । किसी ग्रह या तारे का नत काल (hour angle) और क्रान्ति दी हुई हो तो उसका स्थान सहज ही निश्चय किया जा सकता है । नत काल का परिमाण उस कोण से जाना जाता है जो ग्रह या तारे के ध्रुवप्रात वृत्त और याम्योत्तर वृत्त के बीच में होता है । ध्रुवप्रातवृत्त विषुवद्वृत्त से समकोण बनाता है, इसलिए नत काल विषुवद्वृत्त के उस धनु से भी जो तारे या ग्रह के ध्रुव †देखो चित्र २४ और पृष्ठ ११६, ११८-११६

  • देखो पृष्ठ २०८

त्रिप्रश्नाधिकार २६१ प्रोत वृत्त और यामोत्तर वृत्त के बीच में होता है, जाना जा सकता है। चित्र ५७ में ख ध र, ख ध स और ख ध रा कोण सूर्य के नत काल हैं जबकि सूर्य क्रम से र, स और रा बिन्दुओं पर रहता है। यह स्थान यामोत्तर वृत्त के पूर्व हैं इसलिए यह सूर्य के पूर्व नत काल हैं। जब ग्रह या तारा यामोत्तर वृत्त पर होता है तब उसका नत काल शून्य होता है। नत काल साधारणतः अंश में लिखा जाता है। यदि किसी तारे या ग्रह का पूर्व नत काल १५° हो तो समझना चाहिए कि वह १५ x ४ मिनट अथवा १ घंटे (नाक्षत्र) में यामोत्तर वृत्त पर आवेगा। उन्नत काल—दिनमान के आधे से नत काल घटाने पर जो आता है वह उन्नत काल कहलाता है। पूर्व उन्नत काल ग्रह या तारे के उदयकाल से इष्ट काल तक के समय को कहते हैं और पच्छिम उन्नत काल इष्ट काल से अस्त होने तक के समय को कहते हैं। पच्छिम उन्नत काल उस समय होता है जब ग्रह या तारा यामोत्तर वृत्त के पच्छिम होता है। उन्नत काल या इसके संक्षिप्त रूप उन्नत को उन्नतांश से भिन्न समझना चाहिए जैसे नत को नतांश से। ३४-३५ श्लोकों में यह बतलाया गया है कि यदि किसी ग्रह या तारे का नत काल, अक्षांश और क्रान्ति ज्ञात हो तो उसका उन्नतांश, नतांश इत्यादि कैसे जान सकते हैं। इसकी उपपत्ति गोलीय त्रिकोण-मिति के आधार पर यह है। (देखो चित्र ५७) मान लो सूर्य र पर है। गोलीय त्रिभुज ध ख र में कोज्या ∠ ख ध र कोज्या (ख र) – कोज्या (ध ख) x कोज्या (ध र) = ----------------------------------------- ज्या (ध ख) x ज्या (ध र) ˙ कोज्या (नत काल) कोज्या (नतांश) – कोज्या (लम्बांश) x कोज्या (ध्रुवांतर) = ---------------------------------------------------- ज्या (लम्बांश) x ज्या (ध्रुवांतर) कोज्या (नतांश) – ज्या (अक्षांश) x ज्या (क्रान्ति) = ----------------------------------------------- (१) कोज्या (अक्षांश) x कोज्या (क्रान्ति) कोज्या (नतांश) = ----------------------------------- कोज्या अक्षांश x कोज्या क्रान्ति ज्या (अक्षांश) ज्या (क्रान्ति) – --------------- x ------------------ कोज्या (अक्षांश) कोज्या क्रान्ति) कोज्या (नतांश) = ---------------------------------- स्परे (अक्षांश) कोज्या (अक्षांश) x कोज्या (क्रान्ति) x स्परे (क्रान्ति) (२)

२६२ सूर्य-सिद्धान्त और चरज्या* = क्रान्ति स्पर्श रेखा × अक्षांश स्पर्शरेखा (३) समीकरण (२) और (३) के समान पक्षों को जोड़ने से, कोज्या (नतकाल) + चरज्या = कोज्या (नतांश) ————————————————— कोज्या (अक्षांश) × कोज्या (क्रान्ति) अथवा नतकोटिज्या + चरज्या = कोज्या (नतांश) —————————————————— अक्षांश कोटिज्या × क्रान्ति कोटिज्या ∵ नतांश कोटिज्या = (नतकोटिज्या + चरज्या) × अक्ष कोटिज्या × क्रांति कोटिज्या (ख) नतांश कोटिज्या को भी शंकु कहते हैं। इस सूत्र से शंकु का मान आजकल की रीति के अनुसार दशमलव भिन्न में होगा। यदि भारतीय रीति के अनुसार लिखना हो तो इसको त्रिज्या (३४३८) के वर्ग से भाग देना होगा। यह सूत्र उस समय काम देगा जब कि सूर्य उत्तर गोल में हो। यदि सूर्य दक्षिण गोल में हो तो चरज्या ऋणात्मक होगी (देखो चित्र ४२ की व्याख्या)। ऐसी दशा में ध्रुवांतर घ र ९०° से अधिक होगा जिससे कोज्या (घ र) ऋणात्मक होगी। इसलिए समीकरण (२) के दाहिने पक्ष का स्परे (अक्षांश) × स्परे (क्रान्ति) भी धनात्मक होगा जिससे समीकरण (ख) में चरज्या ऋणात्मक रहेगी परन्तु और कहीं अंतर न पड़ेगा। इसलिए समीकरण (ख) का व्यापक रूप यह होगा— नतांश कोटिज्या = (नत कोटिज्या ± चरज्या) × अक्षकोटिज्या × क्रान्तिकोटिज्या (ग) जिसमें धन चिह्न उस समय लिया जायगा जब सूर्य या ग्रह की क्रान्ति उत्तर होगी और ऋण चिह्न उस समय जब क्रान्ति दक्षिण होगी। नतांश कोटिज्या अथवा शंकु का मान जान लेने पर दृग्ज्या, छाया, छायाकर्ण इत्यादि पहले की ही तरह जाने जा सकते हैं इसलिए विस्तार की आवश्यकता नहीं है। उदाहरण—यदि सूर्य की क्रान्ति १५° उत्तर या दक्षिण हो तो प्रयाग में जिस समय सूर्य का पूर्वनतकाल ३ घंटा ३० मिनट होगा उस समय उसका नतांश क्या होगा ? सूर्य सिद्धान्त की रीति से चरज्या = क्रान्तिज्या × पलभा × त्रिज्या [ देखो पृष्ठ २०८ ] ————————————— १२ × क्रान्तिकोटिज्या


*देखो पृष्ठ २०६

त्रिप्रश्नाधिकार २६३ = ज्या १५° X ५.७ X ३४३८ १२ X कोज्या १५° = ८६० X ५.७ X ३४३८ १२ X ३३२१ = ४३८ परन्तु अन्त्या = त्रिज्या +- चरज्या ∴ अन्त्या = ३४३८ +- ४३८ = ३८७६ या ३००० नतकाल = ३ घंटा ३० मिनट = ५२° ३० नतोत्क्रम ज्या = उत्ज्या ५२° ३०' = १३४५ ∴ छेद = (३८७६ - १३४५) X ३३२१ / ३४३८ या (३००० - १३४५) X ३३२१ / ३४३८ = २५३१ X ३३२१ / ३४३८ अथवा १६५५ X ३३२१ / ३४३८ ∴ शंकु = छेद X लम्बज्या / त्रिज्या = २५३१ X ३३२१ X ३१०६ / ३४३८ X ३४३८ अथवा १६५५ X ३३२१ X ३१०६ / ३४३८ X ३४३८ = २२०६ अथवा १४४४ परन्तु यहाँ शंकु उन्नतांश की ज्या के लिए प्रयुक्त है । इसलिए जब सूर्य उत्तर गोल में होगा तब इष्टकाल में उन्नतांश की ज्या २२०६ कला और जब सूर्य दक्षिण गोल में होगा तब उन्नतांश की ज्या १४४४ कला होगी । इसलिए पहली दशा में- उन्नतांश = ४०° और नतांश = ६०° - ४०° = ५०° और दूसरी दशा में उन्नतांश = २४° ५२' और नतांश = १५°८' पहली दशा में दृग्ज्या = √त्रिज्या^२ - शंकु^२ = √११८१६८४४ - २२०६^२ = √११८१६८४४ - ४८७६६८१ = √६६४ १६३ = २५३४

२६४ सूर्य-सिद्धान्त ∴ पहली दशा में छाया = दृग्ज्या × १२ ———————— शंकु = २६३४ × १२ ———————— २२०६ = १४·३१ अंगुल दूसरी दशा में दृग्ज्या = √ त्रिज्या² — १४४४² = √ ११८१६८४१ — २०८५१३६ = ३१२० ∴ दूसरी दशा में छाया = ३१२० × १२ ———————— १४४४ = २५·६३ अंगुल नवीन रीति से— समीकरण (ख) के आधार पर, नतांश कोटिज्या = ( नतकोटिज्या ∓ चरज्या ) × अक्षकोटिज्या × क्रान्ति- कोटिज्या परन्तु चरज्या = स्परे क्रान्ति × स्परे अक्षांश [देखो पृष्ठ २०६ = स्परे १५° × स्परे २५° २५' = ·२६७६ × ·४७५२ = ·१२७३ ∴ नतांश कोटिज्या = (कोज्या ५२° ३०' ∓ ·१२७३) × कोज्या २५° २५' कोज्या १५° = (·६०८८ ∓ ·१२७३) × ·६०३२ × ·६६५६ = ·७३६१ × ·६०३२ × ·६६५६ या ·४८१५ × ·६०३२ × ·६६५६ = ·६४२२ या ·४२०१ ∵ जब क्रान्ति उत्तर होगी तब नतांश ५०° ३' होगा, और जब क्रान्ति दक्षिण होगी तब नतांश ६५° ६' होगा। पहली दशा में १२ अंगुल शंकु की छाया = १२ स्परे ५०° ३' = १२ × १·१९४० = १४·३२८ अंगुल दूसरी दशा में, छाया = १२ × स्परे ६५° ६' = १२ × २·१५६४ = २५·६१३ अंगुल

त्रिप्रश्नाधिकार २६५ किसी समय की छाया नापकर नतकाल जानना — अभीष्टच्छायाऽभ्यस्ता त्रिज्या तत्कर्णभाजिता । दृग्ज्या तद्वर्गसंशुद्धात् त्रिज्यावर्गाच्च यत्पदम् ॥३६॥ शङ्कुस्य त्रिभजीवाघ्नः स्वलम्बज्याविभाजितः । फलं त्रिभज्ययाऽभ्यस्तं स्वाहोरात्रार्धभाजितम् ॥३७॥ उन्नतज्या तया हीना स्वान्त्या शेषस्य कार्मुकम् । उत्क्रमज्या।भरेवं स्यात्प्राक्पश्चाच्च नतासवः ॥३८॥ अनुवाद—(३६) इष्टकाल की छाया को त्रिज्या से गुणा करके छायाकर्ण से भाग देने पर दृग्ज्या आती है। त्रिज्या के वर्ग से दृग्ज्या के वर्ग को घटा कर वर्गमूल निकालने से (३७) शंकु प्राप्त होता है। शंकु को त्रिज्या से गुणा करके इष्ट स्थान की लम्बज्या से भाग देने पर छेद आता है। छेद को त्रिज्या से गुणा करके द्युज्या से भाग देने पर (३८) उन्नतज्या आती है। इसको अन्त्या से घटाने पर जो शेष बचता हो उसको उत्क्रमज्या समझ कर उत्क्रमज्या पिंड से धनु बनावे तो पूर्व या पच्छिम नतकाल ज्ञात होता है । विज्ञान भाष्य—इन तीनों श्लोकों का सारांश यह है :— (१) छाया × त्रिज्या / छाया कर्ण = दृग्ज्या (२) √(त्रिज्या² - दृग्ज्या²) = शंकु (३) शंकु × त्रिज्या / लम्बज्या = छेद (४) छेद × त्रिज्या / द्युज्या = उन्नतज्या (५) अन्त्या - उन्नत ज्या = नतोत्क्रमज्या इन तीन श्लोकों के नियम ३४-३५ श्लोकों में लिखे हुए नियम के विलोम हैं इसलिए उनकी उपपत्ति भी वही है । हाँ, यहाँ छाया से दृग्ज्या अर्थात् नतांश ज्या का मान १३वें श्लोक में बतलाये गये नियम की तरह जानना चाहिए । यह पहले ही बतलाया गया है कि शंकु और छायाकर्ण के बीच का कोण नतांश होता है इसलिए छाया को छाया कर्ण से भाग देने पर दशमलव भिन्न में तथा इस फल को त्रिज्या से गुणा करने पर कलाओं में नतांश ज्या का मान निकल आवेगा । इस रीति के सम्बन्ध में पंडित इन्द्रनारायण जी द्विवेदी लिखते हैं, "यद्यपि ३४-३५ श्लोकों के विपरीत गणना से ही ऊपर के श्लोकों में नतकाल बनाने की

२६६ सूर्य-सिद्धान्त विधि कही गयी है तथापि इसी रीति से नतकाल में कुछ अंतर आ जाता है इसी से भास्कराचार्य ने इसे सुधार दिया है (देखो सिद्धान्त शिरोमणि) ।''* परन्तु मेरी समझ में यह अंतर इसलिए नहीं पड़ता कि नियम अशुद्ध है वरन् इसका कारण छाया की नाप की स्थूलता है । यदि छाया दो तीन दशमलव स्थान तक ठीक-ठीक नापी जाय और गुणा भाग में भी स्थूलता न आने पावे तो इस रीति से नतकाल जानने में कोई अशुद्धि नहीं हो सकती । उदाहरण १—यदि प्रयाग में किसी समय छाया १४.३३ अंगुल हो और सूर्य की क्रान्ति १५° उत्तर हो तो पूर्व या पच्छिम नतकाल बताओ और यह भी बतलाओ कि घड़ी में क्या बजा है ? सिद्धान्तीय रीति— छाया = १४.३३ अंगुल ∵ छाया कर्ण = √१२² + (१४.३३)² = १८.६६ अंगुल ∵ दृग्ज्या = १४.३३ × ३४३८ / १८.६६ = २६३६ कला ∵ शंकु = √३४३८² - २६३६² = २२०७ कला ∵ छेद = २२०७ × ३४३८ / ३१०६ और उन्नतज्या = २२०७ × ३४३८ / ३१०६ × ३४३८ / ३३२१ = २५२६ कला अन्त्या = ३८७६ (पहिले की तरह) ∵ नतोत्क्रमज्या = ३८७६ - २५२६ = १३४७ कला ∵ नतकाल = १३४७ कला का (उत्क्रम ज्या के अनुसार) धनु = ५२° ३२′ [देखो पृष्ठ १२०-१२१] = ३ घंटा ३० मिनट ८ सेकंड यदि नतकाल पूर्व हो तो १२ घंटे में से घटाने पर और पच्छिम हो तो १२ घंटे में जोड़ने पर धूपघड़ी का समय ज्ञात होगा । ∵ यदि पूर्व नतकाल हो तो धूप-घड़ी में १२ घंटा - ३ घंटा ३० मि० ८ सेकंड = ८ घंटा २६ मि० ५२ सेकंड होगा । और यदि पच्छिम नतकाल हो तो धूप-घड़ी में मध्याह्न के उपरान्त ३ घंटा ३० मिनट ८ सेकंड बीता है अर्थात् ३ बजकर ३० मिनट और ८ सेकंड हुआ है ।

  • देखो हिन्दी साहित्य सम्मेलन से प्रकाशित सूर्य-सिद्धान्त पृष्ठ ६६ ।

त्रिप्रश्नाधिकार २६७ यह ध्यान रखना चाहिए कि घड़ी का यह समय शुद्ध स्थानीय काल है । इसको रेलवे के समय से मिलाने के लिए काल-समीकरण संस्कार तथा देशान्तर संस्कार करना पड़ेगा जिसकी चर्चा इसी अध्याय के अंत में की जायगी । नवीन रीति— छाया १४.३३ स्परे (नतांश) = ──── = ───── = १.१६४१ १२ १२ ∵ नतांश = ५२° ३' ∵ शंकु = नतांश कोटि ज्या = कोज्या ५०° ३' = .६४२१ समीकरण (ख) में सिद्ध किया गया है कि नतांश कोटिज्या = (नतकोटिज्या + चरज्या) × अक्ष कोटिज्या × क्रान्ति कोटिज्या ∵ .६४२१ = (नत कोटिज्या + .१२७३) × .९०३२ × .९६५६ = (नत कोटिज्या + .१२७३) × .८७२४ .६४२१ ∵ नत कोटिज्या + .१२७३ = ───── = .७३६० .८७२४ ∵ नत कोटिज्या = .७३६० - .१२७३ = .६०८७ ∵ नत काल = ५२° ३०' = ३ घंटा ३० मिनट इसलिए यदि पूर्व नत है तो समय होगा ८ बज कर ३० मिनट और पच्छिम नत है तो साढ़े तीन बजा रहेगा । नवीन रीति से नत काल निकालने में और सरलता होगी यदि समीकरण (१) से सीधे ही काम लिया जाय । इसका एक उदाहरण नीचे दिया जाता है :— उदाहरण २—छाया = १४.३३ अंगुल और क्रान्ति = १५° उत्तर तो प्रयाग में नत काल क्या है ? छाया १४.३३ स्परे (नतांश) = ──── = ───── = १.१६४१ १२ १२ ∵ नतांश = ५०° ३' ∵ कोज्या (नत काल) कोज्या ५०° ३' - ज्या २५° २५' × ज्या १५° = ────────────────────────────────────────── कोज्या २५° २५' × कोज्या १५°

२६८ सूर्य-सिद्धान्त ·६४२१ - ·४२६२ × ·२५८८ = ────────────────────────── ·६०३२ × ·६६५६ ·६४२१ - ·११११ = ────────────────── ·८७२४ ·५३१० = ──────── ·८७२४ = ·६०८७ ∴ नत काल = ५२° ३०' = ३ घंटा ३० मिनट उदाहरण ३—यदि छाया २५·६१३ अंगुल और सूर्य की दक्षिण क्रान्ति १५° हो तो नत काल बतलाओ । स्परे नतांश = छाया / १२ = २५·६१३ / १२ = २·१५६४ ∴ नतांश = ६५° ६' यहाँ क्रान्ति दक्षिण है इसलिए ध्रुवांतर ६०° से अधिक है और समीकरण (१) में कोज्या (ध्रुवांतर) अथवा ज्या (क्रान्ति) ऋणात्मक होगी । इसलिए कोज्या (नत काल) कोज्या नतांश + ज्या (अक्षांश) + ज्या (क्रान्ति) = ────────────────────────────────────────────────── कोज्या (अक्षांश) × कोज्या (क्रान्ति) कोज्या ६५° ६' + ज्या २५° २५' × ज्या १५° = ───────────────────────────────────────────────── कोज्या २५° २५' × कोज्या १५° ·४२०२ + ·४२६२ × ·२५८८ = ────────────────────────── ·६०३२ × ·६६५६ ·४२०२ + ·११११ ·५३१३ = ──────────────── = ──────── = ·६०६० ·८७२४ ·८७२४ ∴ नत काल = ५२° २६' = ३ घंटा २६ मिनट ५६ सेकंड किसी समय की कर्णाग्रा जानकर सूर्य का भोगांश निकालना— इष्टाग्राघ्ना स्वलम्बज्या स्वकर्णाङ्गुलभाजिता । क्रान्तिज्या सात्रिजीवाघ्नी परमापक्रमोद्धृता ॥४०॥ तच्चापं भादिकं क्षेत्रं पदे र्भध्याद्वित्तिको रविः । अनुवाद—(४०) इष्टकाल की अग्रा अर्थात् कर्णाग्रा को लम्बज्या से गुणा करके इष्टकाल के छाया-कर्ण से भाग दे दो तो भागफल सूर्य की क्रान्तिज्या होगी । इसको त्रिज्या से गुणा करके परमाप क्रम ज्या से भाग देकर भागफल का धनु

. त्रिप्रश्नाधिकार २६६ बनाओ । फिर सूर्य जिस राशि में हो उसका पद बनाकर सायन भोग का निश्चय (१७-१६) श्लोकों के अनुसार करो । विज्ञान भाष्य—इसका सारांश यह है :— कर्णाग्रा × लम्बज्या / छायाकर्ण = क्रान्ति ज्या क्रान्तिज्या × त्रिज्या / परमापक्रम ज्या = सूर्य का सायन भोगांश ज्या पहले नियम में इष्टकाल की अग्रा (कर्णाग्रा अथवा कर्णवृत्ताग्रा) से सूर्य की क्रान्ति जानने की रीति बतलायी गया है जो २७वें और २२वें श्लोकों का विलोम रूप है [देखो २७वें श्लोक का समीकरण (४)] दूसरा नियम जिससे क्रान्ति जानकर सूर्य का सायन भोगांश निकाला जाता है इसी अध्याय के १७-१६ श्लोकों में तथा स्पष्टाधिकार के २८वें श्लोकों में आ गया है । इसलिए यहाँ दुहराने की आवश्यकता नहीं है । छाया की नोक जिस मार्ग पर चलता है वह खींचना— इष्टे हि मध्ये प्राक्पश्चाद् वृत्ते बाहुत्रयान्तरे ॥४१॥ मत्स्यद्वयान्तरयुते स्त्रिसृक्सूत्रेण भाभ्रमः । अनुवाद—जिस दिन शंकु की छाया की नोक का मार्ग खींचना हो उस दिन मध्याह्न के पहले और पीछे छाया की नोक के तीन बिन्दु निश्चित करो । पहले और दूसरे तथा दूसरे और तीसरे बिन्दुओं से तिमि बनाओ । प्रत्येक तिमि के सामान्य बिंदुओं पर जाती हुई रेखाओं को इतना बढ़ाओ कि वे मिल जायें । जिस बिन्दु पर मिलें उसको केन्द्र मानकर छाया की नोक के तीनों बिन्दुओं पर जाती हुई एक परिधि खींचो । बस यही परिधिखंड छाया की नोक का मार्ग भाभ्रम रेखा उस दिन होगा । विज्ञान भाष्य – यथार्थ में छाया की नोक का मार्ग वृत्ताकार नहीं होता वरन् अतिपरवलय (hyperbola) के आकार का होता है । इसलिए यह नियम अशुद्ध है जिसको भास्कराचार्य, रंगनाथ जी इत्यादि सभी ने स्वीकार किया है । इसलिए इस पर बहुत विचार करने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती । लंका और इष्ट स्थान में सायन मेषादि राशियों के उदयकाल जानने की रीति— त्रिभद्यकर्णार्धगुणाः स्वाहोरात्रार्धभाजिताः ॥४२॥ क्रमादेकद्वित्रिभज्यास्तच्चापानि पृथक् पृथक् ।

३०० सूर्य-सिद्धान्त स्वाधोऽधः प्रविशोध्यथ मेषाल्लङ्कोदयासवः ॥४२॥ खागाष्टयोऽर्धगोऽनैकाशशरत्र्यङ्कहिमांशवः । स्वदेशचरखण्डोना भवन्तीष्टोदयासवः ॥४३॥ व्यस्ता व्यस्तैर्युतास्तैस्तैः कर्काद्यसवस्मृताः । व्युत्क्रमेण षडेवैते भवन्तीष्टास्तुलादय ॥४४॥ अनुवाद- (४१, ४२) एक, दो और तीन राशियों की ज्याओं को क्रम से तीन राशियों की द्युज्या से गुणा कर दो और गुणनफलों को क्रम से एक, दो और तीन राशियों के अहोरात्रार्धों (द्युज्याओं) से भाग दे दो, भजनफलों के धनु बनाकर अलग अलग रखो । पहला लंका में मेष राशि का उदयासु है, पहले को दूसरे से घटाने पर जो शेष आता है वह लंका में वृष राशि का उदयासु है और दूसरे को तीसरे से घटाने पर जो शेष होता है वह लंका में मिथुन राशि का उदयासु है । (४३) इनके मान क्रमानुसार १६७०, १७६५ और १८३५ असु अथवा प्राण हैं। इनसे इष्ट स्थान के अपने अपने चरखण्ड घटाने पर इष्ट स्थान के मेष, वृष और मिथुन राशियों के उदयासु जाने जाते हैं। (४४) यहीं उलटे क्रम से कर्कादि तीन राशियों के लंका में उदयासु हैं। इन्हीं में उलटे क्रम से अपने अपने चरखंडों को जोड़ने से इष्ट स्थान के कर्क, सिंह और कन्या के उदयासु होंगे । यही ६ उदयासु उलटे क्रम से तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन के उदयासु हैं । विज्ञान भाष्य—सायन मेष अर्थात् वसंत संपात विन्दु क्षितिज के पूर्व विन्दु पर जिस क्षण आता है उस समय से सायन मेष राशि का उदय होने लगता है और जिस क्षण तक वसंत सम्पात से क्रान्ति वृत्त का ३० अंश क्षितिज के ऊपर नहीं आ जाता उस समय तक सायन मेष राशि का उदय होता रहता है । जितने समय में वसंत सम्पात विन्दु से क्रान्ति वृत्त का ३० अंश उदय होता है उसको सायन मेष राशि का उदयकाल कहते हैं। यह सूक्ष्मता के लिए असुओं में प्रकट किया जाता है । इसीलिए इस समय को सायन मेषराशि का उदयासु कहते हैं । इसके पश्चात् क्रान्ति वृत्ति का अगला ३० अंश जितने समय में उदय होता है उसको सायन वृष राशि का उदय काल या उदयासु कहते हैं। इसी प्रकार अन्य सायन राशियों के उदयासुओं के बारे में समझना चाहिए । किसी स्थान में कौन राशि कितने समय में उदय होती है यह जानने के लिए पहले यह जानना सुगम होता है कि वह राशि विषुवत् रेखा (निरक्षदेश equator) पर कितने समय में उदय होती है। जब यह ज्ञात हो गया तब अपने स्थान का उदय काल जानने के लिए निरक्षदेश के उदय काल में कुछ संस्कार करना पड़ता है ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३०१ हमारे ज्योतिष सिद्धान्त में विषुवत् रेखा और उज्जैन को जाती हुई देशान्तर रेखा के सामान्य बिन्दु पर लंका स्थित मानी गयी है। इसलिए निरक्षदेश के उदयासु को लंका के उदयासु कहा गया है। लंका में मेष, वृष और मिथुन राशियों के उदयासु जानने का नियम ४१ श्लोक के उत्तरार्द्ध और ४२वें श्लोक में दिया हुआ है जिसकी उपपत्ति चित्र ५६ से समझ में आवेगी । चित्र—५६ उ, प, द, पू—लंका के क्षितिज के क्रम से उत्तर, पच्छिम, दक्षिण और पूर्व बिन्दु । प व पू--विषुवद्वृत्त जो लंका में सममण्डल भी होता है । क व का--क्रान्ति वृत्त । व—बसन्त सम्पात अथवा सायन मेष राशि का आदि बिन्दु । उ—उत्तरी ध्रुव का भी स्थान है । पृथ्वी की दैनिक गति के कारण जितने समय में विषुद्यवृत्त का व पू भाग क्षितिज के ऊपर आता है उतने ही समय में क्रान्ति वृत्तको व का भाग भी क्षितिज के ऊपर आता है। इसलिए व का के उदय होने में उतना ही समय लगता है जितना ब

३०२ सूर्य-सिद्धान्त पू के उदय होने में लगता है । परन्तु पूरे विषुवद्वृत्त (३६०°) के उदय होने के समय को एक नाक्षत्र दिन* कहते हैं जो २१६०० असुओं के समान होता है (पृष्ठ ६); इसलिए विषुवद्वृत्त के ३६०° अथवा २१६०० कला के उदय होने में जब २१६०० असुओं का समय बीतता है तब १ कला के उदय होने में १ असु का समय लगेगा । इसलिए यदि व पू का मान कलाओं में ज्ञात हो जाय तो उतने ही असुओं में व का का उदय काल निकल आवेगा । अब देखना है कि व का और व पू का परस्पर क्या सम्बन्ध है । व पू का एक समकोण गोलीय त्रिभुज है जिसका व पू का कोण समकोण है और पू व का कोण विषुवद्वृत्त और क्रान्ति वृत्त के बीच का कोण अर्थात् सूर्य की परम क्रान्ति है । इस गोलीय त्रिभुज का भुज पू का क्रान्ति वृत्त के का विन्दु की क्रान्ति, भुज व का, का विन्दु का सायन भोगांश और भुज व पू, का विन्दु का विषुवांश है (देखो पृष्ठ २०१) इसलिए नेपियर के पहले नियम के आधार पर व का और व पू का सम्बन्ध जाना जा सकता है क्योंकि कोटि ज्या ∠ का व पू = स्पर्शरेखा (व पू) × कोटि स्पर्शरेखा (व का) अथवा, विषुवांश की स्पर्शरेखा = परम क्रान्ति कोटिज्या / सायन भोगांश की कोटि स्पर्शरेखा = कोज्या २३° २७' / कोस्परे (सायन भोगांश) परन्तु हमारे आचार्य स्पर्शरेखा या कोटि स्पर्शरेखा का व्यवहार नहीं करते थे इसलिए उन्होंने गोलीय त्रिभुज उ व का से इनका सम्बन्ध इस प्रकार निकाला था :— ज्या (उ का) / ज्या (उ व का) = ज्या (व का) / ज्या (व उ का)


  • पृष्ठ ७ पर बतलाया गया है कि किसी तारे के उदय होने के समय से उसके फिर उदय तक के समय को नाक्षत्र अहोरात्र या नाक्षत्र दिन कहते हैं । इसलिए वसन्त सम्पात विन्दु के उदय होने के समय से उसके फिर उदय होने तक के समय को भी नाक्षत्र दिन नहीं समझना चाहिए क्योंकि इतने समय में यह विन्दु अयन चलन के कारण लगभग ०.१४ विकला पच्छिम हो जाने के कारण ०.००२ असु पहले उदय होगा । परन्तु यह भेद इतना सूक्ष्म है कि व्यवहार में दोनों परिभाषाओं को एक ही समझ लेने में कोई हानि नहीं । आजकल पाश्चात्य ज्योतिषी नाक्षत्र दिन की परिभाषा वही करते हैं जो पीछे दी हुई है ।