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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

३०८ सूर्य-सिद्धान्त अब वह देखना है कि विषुवत् रेखा के सिवा किसी अन्य स्थान में जिसका उत्तरी अक्षांश अ है सायन मेषादि तीन राशियों के उदयासु क्या हैं ।

चित्र ६०

उ पू द प—उस स्थान का क्षितिज वृत्त जिसका उत्तरी अक्षांश अ है ध—उत्तरी आकाशीय ध्रुव व—वसन्त सम्पात प व पू—विषुवद्वृत्त क व का—क्रान्तिवृत्त पू च—का विन्दु का चर जो क्षितिज के नीचे है । जिस समय वसन्त सम्पात विन्दु उदय होता रहता है उस समय वह ठीक पूर्व विन्दु पर होता है । इसलिए इस समय क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त दोनों पूर्व विन्दु पर रहते हैं । जितने समय में क्रान्तिवृत्त का व का भाग क्षितिज के ऊपर आता है उतने ही समय में विषुवद्वृत्त का व पू भाग क्षितिज के ऊपर आता है इसलिए व का में उदयासु व पू के उदयासु के समान है । क्रान्तिवृत्त के का विन्दु से जो ठीक क्षितिज पर है ध का च ध्रुवप्रोतवृत्त खींचा गया है जो विषुवद्वृत्त से क्षितिज के नीचे च

त्रिप्रश्नाधिकार ३०६ विन्दु पर मिलता है । इसलिए विषुवद्वृत्त का व पू च भाग का विन्दु का विषुवांश है । लंका में क्रान्तिवृत्त का का विन्दु और विषुवद्वृत्त का च विन्दु एक साथ क्षितिज पर आते हैं जैसा कि अभी बतलाया गया है । परन्तु अ अक्षांश पर पू च भाग क्षितिज के नीचे ही रहता है जब का विन्दु अ अक्षांश में क्षितिज पर आ जाता है । इसलिए अ अक्षांश के स्थान में व का के उदयासु व पू के उदयासुओं के समान हैं जो व पू च से पू च घटाने पर आता है। पृष्ठ २०६—२१० में बतलाया गया है कि यही पू च का विन्दु का चर-काल है। इसलिए यह सिद्ध हुआ कि लंका के उदयासुओं में से चर- काल घटाने पर इष्ट स्थान के उदयासु निकलेंगे । पृष्ठ २१० में बतलाया गया है कि चर ज्या = क्रान्ति स्पर्शरेखा X अक्षांश स्पर्शरेखा । (१) जब व का = ३०° तब का की क्रान्ति = ११°२६′ इसलिए प्रयाग में जिसका अक्षांश २५°२५′ है, का विन्दु की चर ज्या = स्परे ११°२६′ X स्परे २५°२५′ = •२०३२ X •४७५२ = •०९६६ ∴ चरांश = ५°३३′ ∴ का विन्दु के चरासु = ३३३ ∴ प्रयाग में व का के उदयासु = १६७५ - ३३३ = १३४२ अर्थात् प्रयाग में सायन मेष के उदयासु = १३४२ (२) जब व का = ६०° तब का की क्रान्ति = २०°६′·७ = २०°१०′ इसलिए तब प्रयाग में का की चरज्या = स्परे २०°१०′ X स्परे २५°२५′ = •३६७१ X •४७५२ = •१७४५ ∴ का का चरांश = १०°३′ ∴ का के चरासु = ६०३ ∴ प्रयाग में व का के उदयासु = ३४६६ - ६०३ = २८६६ अर्थात् प्रयाग में सायन मेष और वृष राशियां २८६६ असुओं में उदय होंगी । परन्तु सायन मेष राशि १३४२ असुओं में उदय होती है । इसलिए सायन वृष राशि २८६६ - १३४२ = १४२४ असुओं में उदय होगी ।

३१० सूर्य-सिद्धान्त (३) जब व का = ९०° तब का की क्रान्ति = २३°२७' ∴ प्रयाग में का की चरज्या = स्परे २३°२७' x स्परे २५°२५' = ४३३७ x ४७५२ = २०६१ ∴ का का चरांश = ११°५४' ∴ का के चरासु = ७१४ ∴ प्रयाग में व का के उदयासु = ५४०० - ७१४ = ४६८६ अर्थात् प्रयाग में सायन मेष, वृष और मिथुन राशियाँ ४६८६ असुओं में उदय होंगी । परन्तु सायन मेष और वृष राशियाँ २८६६ असुओं में उदय होती हैं, इसलिए सायन मिथुन राशि ४६८६ - २८६६ = १८२० असुओं में उदय होंगी । इस तरह यह प्रकट है कि सायन मेष के अन्तिम विन्दु के चरासु ३३३, सायन वृष के अन्तिम विन्दु के चरासु ६०३ और सायन मिथुन के अन्तिम विन्दु के चरासु ७१४ हैं। पहले और दूसरे का अन्तर २७०, तथा दूसरे और तीसरे का अन्तर १११ है । इन्हीं को वृष और मिथुन के चरखंड ४३वें श्लोक के उत्तरार्ध में कहा गया है जिसका तात्पर्य नीचे के कोष्ठक से स्पष्ट हो जायगा :—

सायन राशियाँलंका में उदयासुचरखंड असुओं मेंप्रयाग में उदयासु
मेष१६७५- ३३३१३४२
वृष१७९४- २७०१५२४
मिथुन१९३१- ११११८२०

४४वें श्लोक के पूर्वार्ध में यह बतलाया गया है कि सायन कर्क, सिंह और कन्या राशियों के उदयासु किस प्रकार ज्ञात होंगे। लंका में कर्क के उदयासु वही होंगे जो मिथुन के हैं, सिंह के वह होंगे जो वृष के हैं और कन्या के वह होंगे जो मेष के हैं। इनमें अपने-अपने चरखंड जोड़ने पर इष्ट स्थान के उदयासु निकल आवेंगे जो आगे के कोष्ठक से स्पष्ट होगा :—

त्रिप्रश्नाधिकार ३११

सायन राशियांलंका में उदयासुचरखंड असुओं मेंप्रयाग में उदयासु
कर्क१६३१+१११२०४२
सिंह१७६४+२७०२०६४
कन्या१६७५+३३३२००८
इसकी उपपत्ति यों है :—
क्रान्तिवृत्त के किसी बिन्दु का का विषुवांश जानने के लिए समीकरण (१) का प्रयोग किया जाता है जो यह है
ज्या (व पू) = (का के भोगांश की ज्या x परमक्रान्ति कोटिज्या) / (का की क्रान्ति कोटिज्या)
प्राचीन तथा अर्वाचीन दोनों रीतियों से यह सिद्ध है कि किसी कोण की ज्या उसके परिपूरक (Supplementary) कोण की ज्या के समान होती है [देखो पृष्ठ १२६-१२८] अर्थात् ज्या (क) = ज्या (१८०° - क) जहाँ क किसी कोण का मान है। इसलिए यह सिद्ध है कि
ज्या (व पू) = ज्या (१८०° - व पू)
और ज्या (काका भोगांश) = ज्या (१८०° - का का भोगांश)
इसलिए ज्या (१८०° - व पू)
= ज्या (१८०° - का का भोगांश) परम क्रान्ति कोटिज्या / का की क्रान्ति कोटिज्या (२)
ऊपर बतलाया गया है कि जब का का भोगांश अर्थात् व का ६०° होता है तब का का विषुवांश अर्थात् व पू ५७°४६' होता है, इसलिए समीकरण (२) के अनुसार जब का का भोगांश १८०° - ६०° = १२०° होगा तब इसका विषुवांश १८०° - ५७°४६' = १२२°११' होगा । इसका अर्थ यह हुआ कि जितने समय में वसंत संपात से क्रान्तिवृत्त का १२० अंश लंका में उदय होता है उतने समय में विषुवद्वृत्त का १२२°११' उदय होता है । परन्तु क्रान्तिवृत्त की पहिली तीन राशियां जितनी देर में उदय होती हैं उतनी देर में विषुवद्वृत्त का भी ६०° उदय होता है । इसलिए चौथी राशि जितने समय में उदय होती है उतने समय में विषुवद्-वृत्त का १२२°११' - ६०° = ३२°११' उदय होता है । परन्तु विषुवद्वृत्त का

३१२ सूर्य-सिद्धान्त ३२°११' = १६३१', इसलिए इसके ३२°११' के उदय होने का समय = १६३१ असु । इसलिए सायन कर्क राशि के उदयासु १६३१ हैं जो सायन मिथुन के भी उदयासु हैं। इसी प्रकार यह सिद्ध हो सकता है कि सायन सिंह राशि के उदयासु सायन वृष राशि के उदयासुओं के और सायन कन्या राशि के उदयासु सायन मेष राशि के उदयासुओं के समान हैं। अब यह जानना है कि सायन कर्क राशि के उदयासु किसी अन्य स्थान में, मान लो प्रयाग में, क्या होंगे । चित्र ६१ यह चित्र ६०वें चित्र के ही समान है अन्तर केवल यह है कि उसमें व का ६०° से कम है और यहाँ व का १२०° के समान है । चित्र से यह प्रकट है कि व का जो १२०° के समान है प्रयाग में उतने ही समय में उदय होगा जितने समय में व पू उदय होता है। परन्तु व का का विषुवांश व पू च के समान है जिसमें पू च चरांश क्षितिज के नीचे है। इसलिए

त्रिप्रश्नाधिकार ३१३ व पू = व पू च — पू च परन्तु का बिन्दु की क्रान्ति सायन वृष के अन्तिम बिन्दु की क्रान्ति के समान अर्थात् २०°१०' है क्योंकि वसंत संपात बिन्दु से ६०° के भोगांश तक क्रान्ति जिस क्रम से बढ़ती है उसी क्रम से ६०° से १८०° तक के भोगांश तक वह घटती भी है अर्थात् सायन वृष के अन्तिम बिन्दु की क्रान्ति सायन कर्क के अन्तिम बिन्दु की क्रान्ति के समान होती है और सायन मेष के अन्तिम बिन्दु की क्रान्ति सायन सिंह के अन्तिम बिन्दु की क्रान्ति के समान होती है, इत्यादि । इसलिए पू च = १०°३' परन्तु व पू च = १२२°११' क्योंकि यह १२०° के भोगांश का विषुवांश है । इसलिए व पू = १२२°११' - १०°३' = ११२°८' = ६७२८' ∴ १२० भोगांश के उदयासु = ६७२८ परन्तु प्रथम तीन राशियों के उदयासु = ४६८६ ∴ कर्क राशि के उदयासु = ६७२८ - ४६८६ = २०४२ जो लंका में कर्क के उदयासुओं में १११ जोड़ने से आता है । इसी प्रकार यह भी सिद्ध किया जा सकता है कि १५० भोगांश अर्थात् मेष से सिंह ५ राशियों तक के उदयासु प्रयाग मे क्या होंगे । फिर प्रथम चार राशियों के उदयासु घटाने पर सिंह राशि के उदयासु निकल आवेंगे जो लंका में सिंह के उदयासुओं में २७० जोड़ने से भी प्राप्त सो सकते हैं । सायन कन्या राशि का अन्तिम बिन्दु जिसका भोगांश १८० है विषुवद्वृत्त से फिर मिल जाता है अर्थात् यही शरद संपात का स्थान है इसलिए यह वसंत संपात की तरह ठीक पूर्व में उदय होता है और इसका विषुवांश भी १८०° होता है । इसी प्रकार सायन मेष से सायन कन्या तक की प्रत्येक राशि के उदयासु लंका में तथा उत्तरी गोलार्द्ध के अन्य स्थानों में क्या होते हैं जाना जा सकता है । अब यह दिखलाना है कि सायन तुला से लेकर सायन मीन तक की प्रत्येक राशि के उदयासु क्या हैं । ४४वें श्लोक के उत्तरार्द्ध में इसके लिए बहुत ही सरल नियम यह दिया हुआ है कि मेष से कन्या तक के जो उदयासु हैं वही उलटे क्रम से तुला से मीन तक के उदयासु हैं अर्थात् कन्या के उदयासु तुला के उदयासु के समान हैं, सिंह के उदयासु वृश्चिक के समान हैं, इत्यादि ।

३१४ सूर्य-सिद्धान्त नीचे के कोष्ठक से यह और भी स्पष्ट होगा —

सायन राशियांलंका में उदयासुचरखंड असुओं मेंप्रयाग में उदयासुसायन राशियां
१ मेष१६७५- ३३३१३४२१२ मीन
२ वृष१७६४- २७०१५२४११ कुंभ
३ मिथुन१९३१- ११११८२०१० मकर
४ कर्क१९३१+ १११२०४२६ धनु
५ सिंह१७६४+ २७०२०६४८ वृश्चिक
६ कन्या१६७५+ ३३३२००८७ तुला

इसकी उपपत्ति बतलाने के लिये केवल यह बतलाना पर्याप्त होगा कि तुला के उदयासु क्या हैं । चित्र ६२ से प्रकट है कि जितनी देर में शरद-संपात से क्रान्तिवृत्त का श का भाग प्रयाग के क्षितिज पर आवेगा उतनी ही देर में विषुवद्वृत्त का श पू भाग भी क्षितिज पर आवैगा । परन्तु श पू = श च + च पू यदि का विन्दु सायन तुला का अन्तिम विन्दु माना जाय तो श का ३० अंश के समान होगा । श च का समकोण गोलीय त्रिभुज है क्योंकि का च ध, का विन्दु का ध्रुवप्रोत वृत्त है जो विषुवद्वृत्त से समकोण पर होता है । इसलिए इस समकोण गोलीय त्रिभुज में नेपियर के नियमों के अनुसार कोज्या (च श का) = स्परे (च श) × कोस्परे (श का) अर्थात् स्परे (च श) = कोज्या २३°२७' / कोस्परे ३०° = .५२६७ [देखो पृष्ठ ३०७] ∵ च श = २७°५४'.५ = १६७४.५ जो लंका में कन्या के उदयासु हैं ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३१५ चित्र ६२ यह चित्र ५६, ६० चित्रों के समान है अन्तर केवल इतना है कि यहाँ श शरद का सम्पात का स्थान है जहाँ से क्रान्तिवृत्त विषुवद्वृत्त के दखिन हो जाता है। का च ध क्रान्तिवृत्त के का विन्दु का ध्रुवप्रोतवृत्त । चरांश च पू का मान जानने के लिए समकोण गोलीय त्रिभुज पू च का से काम लेना चाहिए जिसमें च का का विन्दु की दक्षिण क्रान्ति है। यह ११°२६′ के समान होती है जब शका ३०° के समान होता है। च पू का कोण विषुवद्वृत्त और क्षितिजवृत्त के बीच का कोण है जो प्रयाग के लम्बांश के समान होता है (देखो पृ० २५७) इसलिये नेपियर के नियम के अनुसार ज्या (च पू) = स्परे (च का) x कोस्परे (च पू का) = स्परे ११°२६′ x कोस्परे (६०° - २५°२५′) = स्परे ११°२६ x स्परे २५°२५′ = .०६६६ ∴ च पू = ५°३३′ = ३३३′ [देखो पृष्ठ ३०६] इसलिए श पू = १६७४.५ + ३३३ = २००८ कला

३१६ सूर्य-सिद्धान्त इसलिए श का अर्थात् सायन तुला के उदयासु (प्रयाग मे) वही हैं जो सायन कन्या के उदयासु हैं । इसी प्रकार यह भी सिद्ध हो सकता है कि सायन वृश्चिक, धनु इत्यादि के उदय सु भी क्रमानुसार सायन सिंह, कर्क इत्यादि के उदयासु हैं ।

भोगांशविषुवांशक्रान्ति उत्तर
अंशकलाअंशकलाअंशकला
३०२७५५११२६
६०५७४६२०१०
९०९०२३२७
१२०१२२११२०१०
१५०१५२११२६
१८०१८०
क्रान्ति दक्षिण
२१०२०७५५११२६
२४०२३७४६२०१०
२७०२७०२३२७
३००३०२११२०१०
३३०३३२११२६
३६०३६०

• त्रिप्रश्नाधिकार ३१७ ऊपर की सारिणी से यह प्रकट होगा कि क्रान्तिवृत्त के १२ प्रधान बिन्दुओं के भोगांश, विषुवांश, क्रान्ति क्या हैं । इससे प्रकट है कि लंका में सायन मेष, वृष इत्यादि राशियों के जो उदयासु हैं उन्हीं को कला समझ कर जोड़ लेने से विषुवांश आते हैं । परन्तु यह ध्यान रहे कि यदि क्रान्तिवृत्त के किसी ऐसे बिन्दु का विषुवांश जानना है जो उपर्युक्त १२ प्रधान बिन्दुओं के सिवा अन्य बिन्दु हैं तो अनुपात की रीति से काम नहीं चलेगा, क्योंकि कुछ स्थूलता हो जाती है। इसके लिए सबसे अच्छी रीति यही है कि चित्र ५६ और समीकरण (१) की रीति से काम लिया जाय । अब तक जो कुछ लिखा गया है उससे सायन राशियों के उदयासु जाने जा सकते हैं परन्तु आजकल निरयन राशियों का भी प्रचार है जिनका आरम्भ मेष तथा अश्विनी के आदिविन्दु से होता है। यह बिन्दु विक्रम की ६ठीं शताब्दी में वसंत संपात का स्थान था (देखो ६-१० श्लोकों का विज्ञान भाष्य) । इसलिये आवश्यक है कि निरयन राशियों के उदयासु भी संक्षेप में बतला दिये जायें । यह बतलाया गया है कि सायन भोगांश से अयनांश घटा दिया जाय तो निरयन भोगांश आता है, परन्तु अयनांश प्रतिवर्ष ५८″.६६ के लगभग बढ़ता है (देखो पृष्ठ ५०) और १६८२ वि० की मेष संक्रान्ति के समय यह २२°४१′ के लगभग था (देखो पृष्ठ २५२) । सुविधा के लिये विकलाओं की गणना छोड़ दी गई है जिससे व्यवहार में बहुत कम अन्तर पड़ता है । अयनांश २२°४१′ मानने का अर्थ यह है कि जब सायन भोगांश २२°४१′ होता है तब निरयन भोगांश शून्य होता है अर्थात् तब निरयन मेष राशि का आरम्भ होता है, और जब सायन भोगांश ५२°४१′ होता है तब निरयन मेष राशि का अंत तथा निरयन वृष का आरम्भ होता है। इसी तरह मिथुन, कर्क इत्यादि निरयन राशियों का निश्चय कर लेना चाहिए । निरयन मेष राशि के उदयासु जानने के लिए यह देखना पड़ता है कि क्रान्तिवृत्त का वह भाग जो २२°४१′ और ५२°४१′ सायन भोगांशों के बीच में है कितने समय में उदय होता है। इसलिए पहले यह जानना आवश्यक है कि वसंत सम्पात और निरयन मेष के आदि बिन्दु के बीच का भाग कितने समय में उदय होता है । फिर यह जानना पड़ता है कि वसंत सम्पात और निरयन मेष के अन्तिम बिन्दु के बीच का भाग कितने समय में उदय होता है। दोनों का जो अंतर आता है वही निरयन मेष के उदयासु हैं। इसके लिए निरयन मेष के आदि और अन्तिम बिन्दु की क्रान्तियां भी जाननी पड़ती हैं ।

३१८ सूर्य-सिद्धान्त निरयन मेष के आदि विन्दु की क्रान्तिज्या = ज्या २२°४१' X ज्या २३° २७' [पृष्ठ ३०५] = .३८५६ X .३९७६ = .१५३४ ∵ निरयन मेष के आदि विन्दु की क्रान्ति = ८° ४६' निरयन वृष के आदि विन्दु की क्रान्ति ज्या = ज्या ५२° ४१' X ज्या २३° २७' = .३१६५ ∵ निरयन वृष के आदि विन्दु की क्रान्ति = १८° २७' यही निरयन मेष के अन्तिम विन्दु की क्रान्ति भी है। निरयन मेष के आदि विन्दु के विषुवांश की ज्या ज्या २२°४१' X कोज्या २३°२७' = ——————————————————————— कोज्या ८°४६' ·३८५६ X ·९१७५ = ———————————————— ·९८८२ = ·३५८० ∵ विषुवांश = २०°५८' = १२५८' ∵ लंका में अयन भाग के उदयासु = १२५६ प्रयाग में निरयन मेष के आदि विन्दु की चरज्या = स्परे ८°४६' X स्परे २५°२५' = ·१५५१ X ·४७५२ = ·०७३७ ∵ चरांश = ४°१४ ∵ निरयन मेष के आदि विन्दु के चरासु = २५४ ∵ प्रयाग में अयन भाग के उदयासु = १२५६ - २५४ = १००२ इसी प्रकार निरयन मेष के अन्तिम विन्दु अथवा निरयन वृष के आदि विन्दु के विषुवांश की ज्या ज्या ५२°४१' X कोज्या २३°२७' = ——————————————————————— कोज्या १८°२७' ·७९५३ X ·९१७५ = ———————————————— ·९४८६ = ·७६६२

त्रिपश्नाधिकार ३१६ ∵ विषुवांश = ५०°१७' = ३०१७' इसलिए लंका में अयन भाग और निरयन मेष के उदयासु = ३०१७ परन्तु प्रयाग में निरयन मेष के अन्तिम विन्दु की चरज्या = स्परे १८°२७' × स्परे २५°२५' = '३३३७ × '४७५२ = ०।१५८६ चरांश = ९°७' = ५४७' ∴ प्रयाग में अयन भाग और निरयन मेष के उदयासु = ३०१७ - ५४७ = २४७० परन्तु प्रयाग में अयन भाग के उदयासु = १००५ ∴ ,, निरयन मेष के ,, = १४६५ ∴ ,, ,, ,, का उदयकाल = २४४ पल = ४ घड़ी ४ पल यदि प्रत्येक निरयन राशि के उदयासु जानने की रीति उपर्युक्त विवरण के साथ लिखी जायगी तो पुस्तक का आकार बढ़ने के सिवा कोई विशेष लाभ नहीं होगा। इसी रीति से आगे की सारिणी बनायी गयी है जिससे यह पता चल जायगा कि निरयन राशि के उदयासु या उदय काल किसी स्थान में कैसे निकाले जा सकते हैं :— दूसरे स्तम्भ में क्रान्ति के पहले धन का चिह्न यह प्रकट करता है कि क्रान्ति उत्तर दिशा में है और ऋण का चिह्न यह प्रकट करता है कि क्रान्ति दक्षिण दिशा में है। सातवीं राशि तुला से क्रान्तियों का क्रम पहली ६ राशियों के क्रम की तरह है केवल दिशा में भिन्नता है । तीसरे स्तम्भ में प्रत्येक राशि के आदि विन्दु का चरांश दिया हुआ है जिसको कलाओं में लिखने से जो संख्या मिलती है वही उस विन्दु के चरासु अथवा चर प्राण है । जब क्रान्ति उत्तर होती है तब उत्तरी गोलार्ध में चरासु घटाने पड़ते हैं और जब क्रान्ति दक्षिण होती है तब उत्तरी गोलार्ध में चरासु जोड़ने पड़ते हैं (देखो पृष्ठ २०६- २१०) । इसीलिए चरांश पहली ६ राशियों में ऋणात्मक और पिछली ६ राशियों में धनात्मक लिखा गया है । यह प्रयाग के चरांश है । अन्य स्थान के चरांश जानने के लिए चरज्या = क्रान्ति स्पर्शरेखा × अक्षांश स्पर्शरेखा वाले सूत्र में इष्ट स्थान का जो अक्षांश हो वह लिखकर गणना करना चाहिए ।

३२० | सूर्य-सिद्धांत


निरयन राशियांआदि बिंदु की कान्तिप्रयाग में आदि बिंदु का चरांशप्रयाग में चर खंडआदि बिंदु का विषुवांशलंका में उद-यांशप्रयाग में उद-यांशप्रयाग में उद-यकाल (नाक्षत)प्रयाग में मेष के आदि से राशि के उदय का समय
अंशकलाअंशकलाकलाअंशकलाअंशकलाअंशकलाघड़ीपलघड़ीपल
मेष+ ८४६- ४१४- ४ ५३२०५६२६१८२१२५३४३४
वृष+ १८२७- ६- २ ४०५०१७३१४३२९५१२५
मिथुन+ २३१५.३- ११४७+ ० ५८९०३२२०३३१८३३१३५८
कर्क+ २१३२.७- १०४६+ २ २१२१३०३०३३३२३५२६१९२४
सिंह+ १३५८- ६४७+ ५ २४१५५२८१४३३३८३६२५
कन्या+ २५४- २२३+ ५ ३७१८३१७२७४२३३१९३२३०३२
तुला- ८४६+ ४१४+ ४ ५३२००५६२६१८३११११२३५४४
वृश्चिक- १८२७+ ६+ २ ४०२३०१७३१४३३४२३४४४१२८
धनु- २३१५.३+ ११४७- ० ५८२७०३२२०३१२२१५४६४३
मकर- २१३२.७+ १०४६- २ २२९८३०३०३३२८३१४५५१२८
कुम्भ- १३५८+ ६४७- ५ २४३२५२८१४२२५०४८५५१६
मीन- २५४+ २२३- ५ ३७३५३१७२७४२२२४१६०००
मेष+ ८४६- ४१४३६०५६

त्रिप्रश्नाधिकार ३२१ ४थे स्तम्भ में जो चरखंड दिया हुआ है वह पासवाली दो राशियों के आदि बिंदुओं के चरांशों का अन्तर है जिससे जाना जाता है कि पहली राशि के आदि बिन्दु से अन्तिम बिन्दु तक चरांश में क्या अन्तर पड़ता है। जैसे- मेष राशि का चर खंड = वृषराशि के आदि बिंदु का चरांश = मेषराशि के आदि बिंदु का चरांश = - ६°७' - (४°१४') = - ६°७' + ४°१४' = - ४°५३' सिंह राशि का चरखंड = कन्या राशि के आदि बिंदु का चरांश - सिंह राशि के आदि बिंदु का चरांश = - १°२३' - (- ६°४७') = - १°२३' + ६°४७' = + ५°२४' ध्यान देने से प्रकट होता है कि पहली ६ राशियों के चरखंड दूसरी ६ राशियों के चरखंडों के परिमाण में क्रमानुसार समान हैं। केवल + या - चिह्नों में अन्तर है। ५वें स्तम्भ में प्रत्येक राशि के आदि विन्दु का विषुवांश दिया हुआ है। यदि इसको कलाओं में लिखा जाय तो इतने ही असुओं में वसन्त सम्पात से उस राशि का आदि बिन्दु लंका में उदय होगा। यदि पास वाली दो राशियों के विषुवांशों का अन्तर निकाला जाय तो यही ऊपरवाली राशि के उदयांश लंका में होंगे जो ६ठें स्तम्भ में दिया हुआ है। इसको कला में लिखा जाय तो यही संख्या लंका में उस राशि के उदयासु होंगे। लंका में राशि का जो उदयांश हो उसमें उसी राशि का चरखण्ड यदि धनात्मक हो तो जोड़ने और ऋणात्मक हो तो घटाने से इष्ट स्थान में उस राशि का उदयांश आता है जिसको कला में लिखने से उस राशि के उदयासुओं की संख्या भी प्राप्त हो जायगी। ८वें स्तम्भ में प्रत्येक राशि का उदयकाल उदयासुओं में न लिखकर घड़ी, पलों में लिखा गया है जो अधिक व्यवहारात्मक है परन्तु कुछ स्थूल है क्योंकि ६ असुओं का १ पल होता है और ६ से भाग देने पर पूरे पल जब नहीं आये हैं तब आधे से अधिक को १ मान लिया गया है और आधे से जो कम आये हैं उनको छोड़ दिया गया है। २१

३२२ सूर्य-सिद्धान्त ६वें स्तम्भ में यह दिखलाया गया है कि मेष के आदि से पूरी राशि के उदय होने में क्या समय लगता है। जैसे यदि जानना है कि मेष के आदि से पूरे सिंह के उदय होने तक क्या समय लगता है तो सिंह के सामने ६वें स्तम्भ में २५ घड़ी ५२ पल इसका उत्तर है अर्थात् मेष, वृष, मिथुन, कर्क और सिंह राशियाँ प्रयाग में २५ घड़ी ५२ पल में उदय होती हैं । इस स्तम्भ से लग्न जानने में बड़ी सहायता मिलेगी । इसलिए यह भी यहाँ दे दिया गया है । यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि यह समय नाक्षत्र मान के अनुसार है जो सावन मान से कुछ भिन्न होता है । (देखो पृष्ठ ७, ८) । इस सारिणी से यह बात सिद्ध होती है कि किसी स्थान में राशियों के उदयासु जानने के लिये केवल चरांश जान लेने से आवश्यक संशोधन सुगमतापूर्वक हो सकते हैं । परन्तु यह सारिणी सदैव काम नहीं दे सकती क्योंकि अयन चलन के कारण प्रत्येक निरयण राशि के आदि विन्दु के भोगांश और विषुवांश बढ़ते रहते हैं । इससे क्रान्ति, चरांश और चरखंडों में कुछ अन्तर होता जाता है । परन्तु यह अन्तर बहुत सूक्ष्म होता है क्योंकि अयन चलन के कारण भोगांश में प्रतिवर्ष केवल १ कला के लगभग वृद्धि होती रहती है इसलिए कम से कम २५ वर्ष से बाद सारणी में एक बार संशोधन कर देना आवश्यक है । यह जानना कि किस समय क्रान्तिवृत्त का कौन विन्दु पूर्व क्षितिज में लग्न है गतगम्यासवः कार्या भास्करादिष्टकालिकात् । स्वोदयासुकृता भुक्तभोग्या भक्ता खवह्निभिः ॥४५॥ अभीष्टघटिकासुभ्यो भोग्यासून् प्रविशोधयेत् । तद्वैध्यभलग्नासून् एवं यातांस्तथोत्क्रमात् ॥४६॥ शेषं त्रिंशत्क्रमाभ्यस्तमभुक्तोदयभाजितम् । भागादिहीनं युक्तं च तल्लग्नं क्षितिजे तथा । ४७॥ अनुवाद-(४५) जिस समय का लग्न जानना हो उस समय के स्पष्ट सूर्य से गतासु और भोग्यासु जानना चाहिये । सूर्य राशि के जितने अंश पर होता है उसको गतांश और राशि का जितना अंश सूर्य के भोगने को शेष रह जाता है उसको भोग्यांश कहते हैं । राशि के उदयासुओं को गतांश से गुणा करके ३० से भाग देने पर गतासु और भोग्यांश से गुणा करके ३० से भाग देने पर भोग्यासु जाने जाते हैं। (४६) सूर्योदय से जितनी घड़ी (समय) इष्ट काल तक बीत चुकी हो उसमें से भोग्यासुओं को घटा देना चाहिये । जो शेष हो उसमें से आगे आनेवाली राशि के उदयासुओं को घटाना

त्रिप्रश्नाधिकार ३२३ चाहिये । शेष में से इससे आगे की राशि के उदयासुओं को घटाना चाहिये । इसी प्रकार आगे आने वाली राशियों के उदयासुओं को घटाते जाने से जब शेष इतना रह जाय कि फिर आगे की राशि के उदयासु न घटे तो यही अशुद्ध राशि (न घटने वाली राशि) कही जायगी । परन्तु यदि गतासु से लग्न जानना हो तो जो राशियां सूर्योदय के पहले उदय हो चुकी रहती हैं उनके उदयासुओं को सूर्योदय होने में जितना समय हो उसमें से उलटे क्रम से घटना चाहिये अर्थात् पहले तो गतासु घटावे, फिर सूर्य की राशि से जो राशि पीछे हो उसके उदयासुओं को घटाना चाहिये फिर उससे पीछे की राशि के उदयासुओं को घटाना चाहिये इत्यादि, (४७) अंत में यदि कुछ शेष रह जाय तो उसको ३० से गुणा करके अशुद्ध राशि के उदयासुओं से भाग देना चाहिये । यदि क्रिया गतासु से की गयी हो तो भागफल को अशुद्ध राशि से घटाने पर और यदि यह क्रिया भोग्यासु से की गयी हो तो भागफल को जोड़ने से यह ज्ञात हो जाता है कि उस समय क्षितिज में क्रान्तिवृत्त का कौन विन्दु लग्न है । विज्ञान भाष्य —४७वें श्लोक के उत्तरार्द्ध का अर्थ करने में कई टीकाकारों ने अयनांश के जोड़ने-घटाने की भी चर्चा की है जो मेरी समझ में व्यर्थ है क्योंकि जब स्पष्ट सूर्य की राशि से लग्न जाना जाता है और सभी ग्रहों का स्पष्ट निरयन राशियों में किया जाता है तब सायन सूर्य से लग्न जानने की क्या आवश्यकता है । इसके अर्थ में भ्रम इसलिए होता है कि इन तीन श्लोकों में लग्न निकालने की दो रीतियां जो प्रायः एक ही सी हैं दी हुई हैं । यदि सूर्योदय से इष्टकाल तक का समय ३० घड़ी से कम हो तो भोग्यासुओं से काम लेना सुगम होगा और यदि इष्ट काल अगले सूर्योदय के निकट हो तो अगले सूर्योदय के गतासुओं से काम लेने में सुविधा होगी । इसीलिए अन्तिम लब्धि के जोड़ने घटाने की आवश्यकता पड़ती है । यह बात नीचे के २ उदाहरणों से स्पष्ट हो जायगी । उदाहरण १.—सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल और ५२ घड़ी १० पल पर कौन-कौन लग्न होंगे जब कि सूर्योदय काल में सूर्य का निरयन भोगांश ३रा ५° १' ६" और सूर्य की स्पष्ट दैनिक गति ५७' २१" है । विकलाओं की गणना करने में गुणा भाग बहुत करना पड़ेगा इसलिए आगे चलकर सूर्य का निरयन भोगांश केवल कलाओं तक लिया जायगा । १ली रीति— पहिले यह जानना चाहिए कि सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल पर सूर्य का निरयन भोगांश क्या होगा ।

३२४ सूर्य-सिद्धान्त ६० घड़ी में सूर्य ५७' २१" आगे बढ़ता है $\therefore$ १५ घड़ी में ,, १४' २०" १५"' ,, * और १ घड़ी में ,, ५७" २१"' ,, और १५ पल में ,, १४" २०"' ,, $\therefore$ १६ घड़ी १५ पल में १५' ३२" सूर्य आगे बढ़ता है। इसलिए सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल पर सूर्य का निरयन भोगांश $= ३ रा ५^\circ १६' ३८''$ $= ३ रा ५^\circ १७'$ $\therefore$ इष्ट काल में कर्क राशि में सूर्य का गतांश ५° १७' और भोग्यांश ३०° - ५° १७' = २४° ४३' = १४८३' परन्तु कर्क राशि के उदयासु$^\dagger$ (प्रयाग में) २०७५ हैं। इसलिए जब कर्क के ३०° अंश अथवा १८०० कला २०७५ असुओं में उदय होता है तब २४° ४३' या १४८३' कितने समय में उदय होगा, अर्थात् भोग्यासु $= \frac{१४८३ \times २०७५}{१८००}$ $= १७१०$ $\therefore$ भोग्यकाल $= २८५ पल$ $= ४ घड़ी ४५ पल$ अर्थात् सूर्योदय से ४ घड़ी ४५ पल तक कर्क राशि उदय होती रहेगी । फिर सिंह राशि का उदय आरम्भ होगा । इष्टकाल १६ घड़ी १५ पल कर्क का भोग्यकाल ४ ,, ४५ ,, अंतर ११ ,, ३० ,, सिंह का उदयकाल ५ ,, ३६ ,, अंतर ५ ,, ५४ ,, कन्या का उदयकाल ५ ,, ३३ ,, अंतर २१ पल यही तुला का गत काल है ।


  • जैसे कला के ६०वें भाग को विकला कहते हैं वैसे ही विकला के ६०वें भाग को प्रतिविकला समझना चाहिए जिसके लिए तीन चिन्हों (''') का प्रयोग किया गया है । $\dagger$ यदि उदयासु की जगह उदयकाल पल में लिखा जाय तो गणना में सरलता होगी परन्तु कुछ स्थूलता आ जायगी ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३२५ इसलिए इष्टकाल में तुला राशि २१ पल तक उदय हो चुकी है और ५ घड़ी २१ पल तक और उदय होगी क्योंकि तुला का उदय काल प्रयाग में ५ घड़ी ४२ पल है। इसलिए इष्टकाल में तुला राशि पूर्व क्षितिज में लगी हुई है अर्थात् लग्न है। यह जानने के लिए कि तुला का कौन बिन्दु लग्न है फिर अनुपात से काम लेना होगा। क्योंकि जब ५ घड़ी ४२ पल अर्थात् ३४२ पल में तुला के ३० अंश उदय होते हैं तब २१ पल में कितने उदय हो चुकेेंगे। ३४२ : २१ : : ३० : तुला का गतांश ∴ तुला का गतांश = $\frac{२१\times३०}{३४२}$ = १°५०′३१″ = १°५१′ ∴ सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल पर ६रा १°५१′ लग्न है। यहाँ १°५१′ उदित राशियों में जोड़ा गया है। २री रीति— यदि यह जानना हो कि सूर्योदय से ५२ घड़ी १० पल पर क्या लग्न है तो अगले दिन के सूर्योदय के गतांश से काम लेने में अधिक सुविधा होगी। इष्टकाल से अगले सूर्योदय का समय = ६० घड़ी - ५२ घड़ी १० पल = ७ घड़ी ५० पल अगले सूर्योदय काल में सूर्य का निरयन भोगांश = ३रा ५°१′६″ + ५७′२१″ = ३रा ५°५८′२७″ ६० घड़ी में सूर्य की गति = ५७′२१″ ∵ ७३⁄४ ,, ,, = ७′१०′′८′′′ २० पल में ,, = १६′′७′′′ ∴ ७ घड़ी ५० पल में ,, = ७′२६″ ∴ इष्टकाल में सूर्य का निरयन भोगांश = ३रा ५°५८′२७″ - ७′२६″ = ३रा ५°५१′ ∴ इष्टकाल में कर्क राशि में सूर्य का गतांश ५°५१′ = ३५१′ इसलिए पहले की तरह गतासु = $\frac{३५१\times२०७५}{१८००}$

३२६ सूर्य-सिद्धान्त = ४०५ ∴ गतकाल = ६७ पल = १ घड़ी ७ पल सूर्योदय होने में ७ घड़ी ५० पल है सूर्योदय से १ घड़ी ७ पल पहले कर्क का आरंभ होगा ———————— अंतर ६ घड़ी ४३ पल मिथुन का उदयकाल ५ घड़ी ३५ पल ———————— अंतर १ घड़ी ८ पल ∴ इष्टकाल में पूरे वृष के उदय होने में १ घड़ी ८ पल शेष है । परन्तु वृष के ३०° या १८००' का उदय २६१ पल में होता है । ∴ २६१ : ६८ : : १८०० : लग्न का भोग्यांश ६८ × १८०० ∴ लग्न का भोग्यांश = —————— २६१ = ४२१' = ७° १' और वृष का भुक्तांश (गतांश) = ३०° - ७° १' = २२° ५९' ∴ इष्टकाल का लग्न = १^{रा} २२° ५९' यहाँ अन्तिम लब्धि घटाई गयी है । इस संबंध में यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि राशियों के उदयासु अथवा उदयकाल नाक्षत्रकाल में प्रकट किये जाते हैं और इष्टकाल धूपघड़ी के अनुसार जाना जाता है इसलिये यह सावन काल में होता है (देखो पृ० ७, ८ तथा २१२) । १ सावन दिन = ६० सावन घड़ी = २१६५६.१४ असु = ३६१० पल (नाक्षत्र) स्थूल रूप से = ६० घड़ी १० पल (नाक्षत्र) ∴ ६ सावन घड़ी = ६ नाक्षत्र घड़ी + १ नाक्षत्र पल जिससे सिद्ध होता है कि सावन काल को नाक्षत्र काल में बदलना हो तो प्रति ६ सावन घड़ियों के लिए १ पल और बढ़ा देने से नाक्षत्र काल आ जाता है । परन्तु इष्टकाल का स्पष्ट सूर्य निकाल कर लग्न की गणना करने में यह अन्तर नहीं पड़ता इसलिए सूर्य-सिद्धान्त का नियम बिल्कुल शुद्ध है क्योंकि जब

त्रिप्रश्नाधिकार ३२७ इष्टकाल का स्पष्ट सूर्य निकाल लिया जाता है तब प्रश्न यह रहता है कि उस विन्दु से जिस जगह सूर्य इष्टकाल में है क्रान्तिवृत्त के उदय-विन्दु तक जो क्षितिज में लगा रहता है क्या अन्तर है। क्रान्तिवृत्त का वह भाग जो तात्कालिक या इष्ट- कालिक सूर्य और क्रान्तिवृत्त के उदय-विन्दु के बीच में है जितने नाक्षत्र काल में उदय होता है उतने ही सावन काल में सूर्य सूर्योदय काल के स्थान से इष्टकाल के स्थान तक पहुँचता है। हाँ यदि यह जानना हो कि सूर्योदय काल से इष्टकाल तक कितना नाक्षत्र काल बीता, तब यह गणना करनी पड़ेगी कि सूर्योदय काल में क्रान्तिवृत्त का जो विन्दु उदय हो रहा था उससे इष्टकालिक उदय-विन्दु तक के उदयासु क्या हैं। क्रान्तिवृत्त का सूर्योदय कालिक विन्दु इष्टकाल में सूर्य से कुछ पच्छिम हो जाता है क्योंकि इष्टकाल तक सूर्य कुछ पूरब हट जाता है। इस बात का विचार उस समय अवश्य करना पड़ेगा जब कि उदयकालिक सूर्य के निरयण भोगांश से ही इष्टकाल का लग्न निकालना हो। नीचे इस रीति से भी लग्न जानने का उदाहरण दिया जाता है :— ३री रीति— सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल पर लग्न क्या है ? उदयकालिक सूर्य का निरयण भोगांश = ३^रा ५° १' ६" ⸫ कर्क का भोगांश = ३०° - ५° १' = २४° ५६' = १४६६' १८०० : १४६६ : : २०७५ : भोग्यासु ⸫ भोग्यासु = (१४६६ × २०७५) / १८०० = १७२८ = २८८ पल १६ घड़ी १५ पल धूपघड़ी के अनुसार होता है इसलिए यह सावन काल की इकाई में है। सावन नाक्षत्र ६ घड़ी = ६ घड़ी १ पल ⸫ १६ घड़ी १५ पल = १६ घड़ी १८ पल (स्थूल रूप से) अब इसमें कर्क के भोग्यासु तथा सिंह, कन्या के उदयासु क्रमशः पूर्ववत् घटाने चाहिये । १६ घड़ी १८ पल कर्क का भोग्यकाल ४ घड़ी ४८ पल ─────────────────────── अन्तर ११ घड़ी ३० पल सिंह का उदयकाल ५ " ३६ पल ───────────────────────