सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
३१८ सूर्य-सिद्धान्त निरयन मेष के आदि विन्दु की क्रान्तिज्या = ज्या २२°४१' X ज्या २३° २७' [पृष्ठ ३०५] = .३८५६ X .३९७६ = .१५३४ ∵ निरयन मेष के आदि विन्दु की क्रान्ति = ८° ४६' निरयन वृष के आदि विन्दु की क्रान्ति ज्या = ज्या ५२° ४१' X ज्या २३° २७' = .३१६५ ∵ निरयन वृष के आदि विन्दु की क्रान्ति = १८° २७' यही निरयन मेष के अन्तिम विन्दु की क्रान्ति भी है। निरयन मेष के आदि विन्दु के विषुवांश की ज्या ज्या २२°४१' X कोज्या २३°२७' = ——————————————————————— कोज्या ८°४६' ·३८५६ X ·९१७५ = ———————————————— ·९८८२ = ·३५८० ∵ विषुवांश = २०°५८' = १२५८' ∵ लंका में अयन भाग के उदयासु = १२५६ प्रयाग में निरयन मेष के आदि विन्दु की चरज्या = स्परे ८°४६' X स्परे २५°२५' = ·१५५१ X ·४७५२ = ·०७३७ ∵ चरांश = ४°१४ ∵ निरयन मेष के आदि विन्दु के चरासु = २५४ ∵ प्रयाग में अयन भाग के उदयासु = १२५६ - २५४ = १००२ इसी प्रकार निरयन मेष के अन्तिम विन्दु अथवा निरयन वृष के आदि विन्दु के विषुवांश की ज्या ज्या ५२°४१' X कोज्या २३°२७' = ——————————————————————— कोज्या १८°२७' ·७९५३ X ·९१७५ = ———————————————— ·९४८६ = ·७६६२
त्रिपश्नाधिकार ३१६ ∵ विषुवांश = ५०°१७' = ३०१७' इसलिए लंका में अयन भाग और निरयन मेष के उदयासु = ३०१७ परन्तु प्रयाग में निरयन मेष के अन्तिम विन्दु की चरज्या = स्परे १८°२७' × स्परे २५°२५' = '३३३७ × '४७५२ = ०।१५८६ चरांश = ९°७' = ५४७' ∴ प्रयाग में अयन भाग और निरयन मेष के उदयासु = ३०१७ - ५४७ = २४७० परन्तु प्रयाग में अयन भाग के उदयासु = १००५ ∴ ,, निरयन मेष के ,, = १४६५ ∴ ,, ,, ,, का उदयकाल = २४४ पल = ४ घड़ी ४ पल यदि प्रत्येक निरयन राशि के उदयासु जानने की रीति उपर्युक्त विवरण के साथ लिखी जायगी तो पुस्तक का आकार बढ़ने के सिवा कोई विशेष लाभ नहीं होगा। इसी रीति से आगे की सारिणी बनायी गयी है जिससे यह पता चल जायगा कि निरयन राशि के उदयासु या उदय काल किसी स्थान में कैसे निकाले जा सकते हैं :— दूसरे स्तम्भ में क्रान्ति के पहले धन का चिह्न यह प्रकट करता है कि क्रान्ति उत्तर दिशा में है और ऋण का चिह्न यह प्रकट करता है कि क्रान्ति दक्षिण दिशा में है। सातवीं राशि तुला से क्रान्तियों का क्रम पहली ६ राशियों के क्रम की तरह है केवल दिशा में भिन्नता है । तीसरे स्तम्भ में प्रत्येक राशि के आदि विन्दु का चरांश दिया हुआ है जिसको कलाओं में लिखने से जो संख्या मिलती है वही उस विन्दु के चरासु अथवा चर प्राण है । जब क्रान्ति उत्तर होती है तब उत्तरी गोलार्ध में चरासु घटाने पड़ते हैं और जब क्रान्ति दक्षिण होती है तब उत्तरी गोलार्ध में चरासु जोड़ने पड़ते हैं (देखो पृष्ठ २०६- २१०) । इसीलिए चरांश पहली ६ राशियों में ऋणात्मक और पिछली ६ राशियों में धनात्मक लिखा गया है । यह प्रयाग के चरांश है । अन्य स्थान के चरांश जानने के लिए चरज्या = क्रान्ति स्पर्शरेखा × अक्षांश स्पर्शरेखा वाले सूत्र में इष्ट स्थान का जो अक्षांश हो वह लिखकर गणना करना चाहिए ।
३२० | सूर्य-सिद्धांत
| निरयन राशियां | आदि बिंदु की कान्ति | प्रयाग में आदि बिंदु का चरांश | प्रयाग में चर खंड | आदि बिंदु का विषुवांश | लंका में उद-यांश | प्रयाग में उद-यांश | प्रयाग में उद-यकाल (नाक्षत) | प्रयाग में मेष के आदि से राशि के उदय का समय | |||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अंश | कला | अंश | कला | कला | अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | घड़ी | पल | घड़ी | पल | |
| मेष | + ८ | ४६ | - ४ | १४ | - ४ ५३ | २० | ५६ | २६ | १८ | २१ | २५ | ३ | ३४ | ३ | ३४ |
| वृष | + १८ | २७ | - ६ | ९ | - २ ४० | ५० | १७ | ३१ | ४३ | २९ | ३ | ४ | ५१ | ८ | २५ |
| मिथुन | + २३ | १५.३ | - ११ | ४७ | + ० ५८ | ९० | ० | ३२ | २० | ३३ | १८ | ५ | ३३ | १३ | ५८ |
| कर्क | + २१ | ३२.७ | - १० | ४६ | + २ २ | १२१ | ३० | ३० | ३३ | ३२ | ३५ | ५ | २६ | १९ | २४ |
| सिंह | + १३ | ५८ | - ६ | ४७ | + ५ २४ | १५५ | ३ | २८ | १४ | ३३ | ३८ | ५ | ३६ | २५ | ० |
| कन्या | + २ | ५४ | - २ | २३ | + ५ ३७ | १८३ | १७ | २७ | ४२ | ३३ | १९ | ५ | ३२ | ३० | ३२ |
| तुला | - ८ | ४६ | + ४ | १४ | + ४ ५३ | २०० | ५६ | २६ | १८ | ३१ | ११ | ५ | १२ | ३५ | ४४ |
| वृश्चिक | - १८ | २७ | + ६ | ७ | + २ ४० | २३० | १७ | ३१ | ४३ | ३४ | २३ | ५ | ४४ | ४१ | २८ |
| धनु | - २३ | १५.३ | + ११ | ४७ | - ० ५८ | २७० | ० | ३२ | २० | ३१ | २२ | ५ | १५ | ४६ | ४३ |
| मकर | - २१ | ३२.७ | + १० | ४६ | - २ २ | २९८ | ३० | ३० | ३३ | २८ | ३१ | ४ | ४५ | ५१ | २८ |
| कुम्भ | - १३ | ५८ | + ६ | ४७ | - ५ २४ | ३२५ | ३ | २८ | १४ | २२ | ५० | ३ | ४८ | ५५ | १६ |
| मीन | - २ | ५४ | + २ | २३ | - ५ ३७ | ३५३ | १७ | २७ | ४२ | २२ | ५ | ३ | ४१ | ६० | ०० |
| मेष | + ८ | ४६ | - ४ | १४ | ३६० | ५६ |
त्रिप्रश्नाधिकार ३२१ ४थे स्तम्भ में जो चरखंड दिया हुआ है वह पासवाली दो राशियों के आदि बिंदुओं के चरांशों का अन्तर है जिससे जाना जाता है कि पहली राशि के आदि बिन्दु से अन्तिम बिन्दु तक चरांश में क्या अन्तर पड़ता है। जैसे- मेष राशि का चर खंड = वृषराशि के आदि बिंदु का चरांश = मेषराशि के आदि बिंदु का चरांश = - ६°७' - (४°१४') = - ६°७' + ४°१४' = - ४°५३' सिंह राशि का चरखंड = कन्या राशि के आदि बिंदु का चरांश - सिंह राशि के आदि बिंदु का चरांश = - १°२३' - (- ६°४७') = - १°२३' + ६°४७' = + ५°२४' ध्यान देने से प्रकट होता है कि पहली ६ राशियों के चरखंड दूसरी ६ राशियों के चरखंडों के परिमाण में क्रमानुसार समान हैं। केवल + या - चिह्नों में अन्तर है। ५वें स्तम्भ में प्रत्येक राशि के आदि विन्दु का विषुवांश दिया हुआ है। यदि इसको कलाओं में लिखा जाय तो इतने ही असुओं में वसन्त सम्पात से उस राशि का आदि बिन्दु लंका में उदय होगा। यदि पास वाली दो राशियों के विषुवांशों का अन्तर निकाला जाय तो यही ऊपरवाली राशि के उदयांश लंका में होंगे जो ६ठें स्तम्भ में दिया हुआ है। इसको कला में लिखा जाय तो यही संख्या लंका में उस राशि के उदयासु होंगे। लंका में राशि का जो उदयांश हो उसमें उसी राशि का चरखण्ड यदि धनात्मक हो तो जोड़ने और ऋणात्मक हो तो घटाने से इष्ट स्थान में उस राशि का उदयांश आता है जिसको कला में लिखने से उस राशि के उदयासुओं की संख्या भी प्राप्त हो जायगी। ८वें स्तम्भ में प्रत्येक राशि का उदयकाल उदयासुओं में न लिखकर घड़ी, पलों में लिखा गया है जो अधिक व्यवहारात्मक है परन्तु कुछ स्थूल है क्योंकि ६ असुओं का १ पल होता है और ६ से भाग देने पर पूरे पल जब नहीं आये हैं तब आधे से अधिक को १ मान लिया गया है और आधे से जो कम आये हैं उनको छोड़ दिया गया है। २१
३२२ सूर्य-सिद्धान्त ६वें स्तम्भ में यह दिखलाया गया है कि मेष के आदि से पूरी राशि के उदय होने में क्या समय लगता है। जैसे यदि जानना है कि मेष के आदि से पूरे सिंह के उदय होने तक क्या समय लगता है तो सिंह के सामने ६वें स्तम्भ में २५ घड़ी ५२ पल इसका उत्तर है अर्थात् मेष, वृष, मिथुन, कर्क और सिंह राशियाँ प्रयाग में २५ घड़ी ५२ पल में उदय होती हैं । इस स्तम्भ से लग्न जानने में बड़ी सहायता मिलेगी । इसलिए यह भी यहाँ दे दिया गया है । यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि यह समय नाक्षत्र मान के अनुसार है जो सावन मान से कुछ भिन्न होता है । (देखो पृष्ठ ७, ८) । इस सारिणी से यह बात सिद्ध होती है कि किसी स्थान में राशियों के उदयासु जानने के लिये केवल चरांश जान लेने से आवश्यक संशोधन सुगमतापूर्वक हो सकते हैं । परन्तु यह सारिणी सदैव काम नहीं दे सकती क्योंकि अयन चलन के कारण प्रत्येक निरयण राशि के आदि विन्दु के भोगांश और विषुवांश बढ़ते रहते हैं । इससे क्रान्ति, चरांश और चरखंडों में कुछ अन्तर होता जाता है । परन्तु यह अन्तर बहुत सूक्ष्म होता है क्योंकि अयन चलन के कारण भोगांश में प्रतिवर्ष केवल १ कला के लगभग वृद्धि होती रहती है इसलिए कम से कम २५ वर्ष से बाद सारणी में एक बार संशोधन कर देना आवश्यक है । यह जानना कि किस समय क्रान्तिवृत्त का कौन विन्दु पूर्व क्षितिज में लग्न है गतगम्यासवः कार्या भास्करादिष्टकालिकात् । स्वोदयासुकृता भुक्तभोग्या भक्ता खवह्निभिः ॥४५॥ अभीष्टघटिकासुभ्यो भोग्यासून् प्रविशोधयेत् । तद्वैध्यभलग्नासून् एवं यातांस्तथोत्क्रमात् ॥४६॥ शेषं त्रिंशत्क्रमाभ्यस्तमभुक्तोदयभाजितम् । भागादिहीनं युक्तं च तल्लग्नं क्षितिजे तथा । ४७॥ अनुवाद-(४५) जिस समय का लग्न जानना हो उस समय के स्पष्ट सूर्य से गतासु और भोग्यासु जानना चाहिये । सूर्य राशि के जितने अंश पर होता है उसको गतांश और राशि का जितना अंश सूर्य के भोगने को शेष रह जाता है उसको भोग्यांश कहते हैं । राशि के उदयासुओं को गतांश से गुणा करके ३० से भाग देने पर गतासु और भोग्यांश से गुणा करके ३० से भाग देने पर भोग्यासु जाने जाते हैं। (४६) सूर्योदय से जितनी घड़ी (समय) इष्ट काल तक बीत चुकी हो उसमें से भोग्यासुओं को घटा देना चाहिये । जो शेष हो उसमें से आगे आनेवाली राशि के उदयासुओं को घटाना
त्रिप्रश्नाधिकार ३२३ चाहिये । शेष में से इससे आगे की राशि के उदयासुओं को घटाना चाहिये । इसी प्रकार आगे आने वाली राशियों के उदयासुओं को घटाते जाने से जब शेष इतना रह जाय कि फिर आगे की राशि के उदयासु न घटे तो यही अशुद्ध राशि (न घटने वाली राशि) कही जायगी । परन्तु यदि गतासु से लग्न जानना हो तो जो राशियां सूर्योदय के पहले उदय हो चुकी रहती हैं उनके उदयासुओं को सूर्योदय होने में जितना समय हो उसमें से उलटे क्रम से घटना चाहिये अर्थात् पहले तो गतासु घटावे, फिर सूर्य की राशि से जो राशि पीछे हो उसके उदयासुओं को घटाना चाहिये फिर उससे पीछे की राशि के उदयासुओं को घटाना चाहिये इत्यादि, (४७) अंत में यदि कुछ शेष रह जाय तो उसको ३० से गुणा करके अशुद्ध राशि के उदयासुओं से भाग देना चाहिये । यदि क्रिया गतासु से की गयी हो तो भागफल को अशुद्ध राशि से घटाने पर और यदि यह क्रिया भोग्यासु से की गयी हो तो भागफल को जोड़ने से यह ज्ञात हो जाता है कि उस समय क्षितिज में क्रान्तिवृत्त का कौन विन्दु लग्न है । विज्ञान भाष्य —४७वें श्लोक के उत्तरार्द्ध का अर्थ करने में कई टीकाकारों ने अयनांश के जोड़ने-घटाने की भी चर्चा की है जो मेरी समझ में व्यर्थ है क्योंकि जब स्पष्ट सूर्य की राशि से लग्न जाना जाता है और सभी ग्रहों का स्पष्ट निरयन राशियों में किया जाता है तब सायन सूर्य से लग्न जानने की क्या आवश्यकता है । इसके अर्थ में भ्रम इसलिए होता है कि इन तीन श्लोकों में लग्न निकालने की दो रीतियां जो प्रायः एक ही सी हैं दी हुई हैं । यदि सूर्योदय से इष्टकाल तक का समय ३० घड़ी से कम हो तो भोग्यासुओं से काम लेना सुगम होगा और यदि इष्ट काल अगले सूर्योदय के निकट हो तो अगले सूर्योदय के गतासुओं से काम लेने में सुविधा होगी । इसीलिए अन्तिम लब्धि के जोड़ने घटाने की आवश्यकता पड़ती है । यह बात नीचे के २ उदाहरणों से स्पष्ट हो जायगी । उदाहरण १.—सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल और ५२ घड़ी १० पल पर कौन-कौन लग्न होंगे जब कि सूर्योदय काल में सूर्य का निरयन भोगांश ३रा ५° १' ६" और सूर्य की स्पष्ट दैनिक गति ५७' २१" है । विकलाओं की गणना करने में गुणा भाग बहुत करना पड़ेगा इसलिए आगे चलकर सूर्य का निरयन भोगांश केवल कलाओं तक लिया जायगा । १ली रीति— पहिले यह जानना चाहिए कि सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल पर सूर्य का निरयन भोगांश क्या होगा ।
३२४ सूर्य-सिद्धान्त ६० घड़ी में सूर्य ५७' २१" आगे बढ़ता है $\therefore$ १५ घड़ी में ,, १४' २०" १५"' ,, * और १ घड़ी में ,, ५७" २१"' ,, और १५ पल में ,, १४" २०"' ,, $\therefore$ १६ घड़ी १५ पल में १५' ३२" सूर्य आगे बढ़ता है। इसलिए सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल पर सूर्य का निरयन भोगांश $= ३ रा ५^\circ १६' ३८''$ $= ३ रा ५^\circ १७'$ $\therefore$ इष्ट काल में कर्क राशि में सूर्य का गतांश ५° १७' और भोग्यांश ३०° - ५° १७' = २४° ४३' = १४८३' परन्तु कर्क राशि के उदयासु$^\dagger$ (प्रयाग में) २०७५ हैं। इसलिए जब कर्क के ३०° अंश अथवा १८०० कला २०७५ असुओं में उदय होता है तब २४° ४३' या १४८३' कितने समय में उदय होगा, अर्थात् भोग्यासु $= \frac{१४८३ \times २०७५}{१८००}$ $= १७१०$ $\therefore$ भोग्यकाल $= २८५ पल$ $= ४ घड़ी ४५ पल$ अर्थात् सूर्योदय से ४ घड़ी ४५ पल तक कर्क राशि उदय होती रहेगी । फिर सिंह राशि का उदय आरम्भ होगा । इष्टकाल १६ घड़ी १५ पल कर्क का भोग्यकाल ४ ,, ४५ ,, अंतर ११ ,, ३० ,, सिंह का उदयकाल ५ ,, ३६ ,, अंतर ५ ,, ५४ ,, कन्या का उदयकाल ५ ,, ३३ ,, अंतर २१ पल यही तुला का गत काल है ।
- जैसे कला के ६०वें भाग को विकला कहते हैं वैसे ही विकला के ६०वें भाग को प्रतिविकला समझना चाहिए जिसके लिए तीन चिन्हों (''') का प्रयोग किया गया है । $\dagger$ यदि उदयासु की जगह उदयकाल पल में लिखा जाय तो गणना में सरलता होगी परन्तु कुछ स्थूलता आ जायगी ।
त्रिप्रश्नाधिकार ३२५ इसलिए इष्टकाल में तुला राशि २१ पल तक उदय हो चुकी है और ५ घड़ी २१ पल तक और उदय होगी क्योंकि तुला का उदय काल प्रयाग में ५ घड़ी ४२ पल है। इसलिए इष्टकाल में तुला राशि पूर्व क्षितिज में लगी हुई है अर्थात् लग्न है। यह जानने के लिए कि तुला का कौन बिन्दु लग्न है फिर अनुपात से काम लेना होगा। क्योंकि जब ५ घड़ी ४२ पल अर्थात् ३४२ पल में तुला के ३० अंश उदय होते हैं तब २१ पल में कितने उदय हो चुकेेंगे। ३४२ : २१ : : ३० : तुला का गतांश ∴ तुला का गतांश = $\frac{२१\times३०}{३४२}$ = १°५०′३१″ = १°५१′ ∴ सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल पर ६रा १°५१′ लग्न है। यहाँ १°५१′ उदित राशियों में जोड़ा गया है। २री रीति— यदि यह जानना हो कि सूर्योदय से ५२ घड़ी १० पल पर क्या लग्न है तो अगले दिन के सूर्योदय के गतांश से काम लेने में अधिक सुविधा होगी। इष्टकाल से अगले सूर्योदय का समय = ६० घड़ी - ५२ घड़ी १० पल = ७ घड़ी ५० पल अगले सूर्योदय काल में सूर्य का निरयन भोगांश = ३रा ५°१′६″ + ५७′२१″ = ३रा ५°५८′२७″ ६० घड़ी में सूर्य की गति = ५७′२१″ ∵ ७३⁄४ ,, ,, = ७′१०′′८′′′ २० पल में ,, = १६′′७′′′ ∴ ७ घड़ी ५० पल में ,, = ७′२६″ ∴ इष्टकाल में सूर्य का निरयन भोगांश = ३रा ५°५८′२७″ - ७′२६″ = ३रा ५°५१′ ∴ इष्टकाल में कर्क राशि में सूर्य का गतांश ५°५१′ = ३५१′ इसलिए पहले की तरह गतासु = $\frac{३५१\times२०७५}{१८००}$
३२६ सूर्य-सिद्धान्त = ४०५ ∴ गतकाल = ६७ पल = १ घड़ी ७ पल सूर्योदय होने में ७ घड़ी ५० पल है सूर्योदय से १ घड़ी ७ पल पहले कर्क का आरंभ होगा ———————— अंतर ६ घड़ी ४३ पल मिथुन का उदयकाल ५ घड़ी ३५ पल ———————— अंतर १ घड़ी ८ पल ∴ इष्टकाल में पूरे वृष के उदय होने में १ घड़ी ८ पल शेष है । परन्तु वृष के ३०° या १८००' का उदय २६१ पल में होता है । ∴ २६१ : ६८ : : १८०० : लग्न का भोग्यांश ६८ × १८०० ∴ लग्न का भोग्यांश = —————— २६१ = ४२१' = ७° १' और वृष का भुक्तांश (गतांश) = ३०° - ७° १' = २२° ५९' ∴ इष्टकाल का लग्न = १^{रा} २२° ५९' यहाँ अन्तिम लब्धि घटाई गयी है । इस संबंध में यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि राशियों के उदयासु अथवा उदयकाल नाक्षत्रकाल में प्रकट किये जाते हैं और इष्टकाल धूपघड़ी के अनुसार जाना जाता है इसलिये यह सावन काल में होता है (देखो पृ० ७, ८ तथा २१२) । १ सावन दिन = ६० सावन घड़ी = २१६५६.१४ असु = ३६१० पल (नाक्षत्र) स्थूल रूप से = ६० घड़ी १० पल (नाक्षत्र) ∴ ६ सावन घड़ी = ६ नाक्षत्र घड़ी + १ नाक्षत्र पल जिससे सिद्ध होता है कि सावन काल को नाक्षत्र काल में बदलना हो तो प्रति ६ सावन घड़ियों के लिए १ पल और बढ़ा देने से नाक्षत्र काल आ जाता है । परन्तु इष्टकाल का स्पष्ट सूर्य निकाल कर लग्न की गणना करने में यह अन्तर नहीं पड़ता इसलिए सूर्य-सिद्धान्त का नियम बिल्कुल शुद्ध है क्योंकि जब
त्रिप्रश्नाधिकार ३२७ इष्टकाल का स्पष्ट सूर्य निकाल लिया जाता है तब प्रश्न यह रहता है कि उस विन्दु से जिस जगह सूर्य इष्टकाल में है क्रान्तिवृत्त के उदय-विन्दु तक जो क्षितिज में लगा रहता है क्या अन्तर है। क्रान्तिवृत्त का वह भाग जो तात्कालिक या इष्ट- कालिक सूर्य और क्रान्तिवृत्त के उदय-विन्दु के बीच में है जितने नाक्षत्र काल में उदय होता है उतने ही सावन काल में सूर्य सूर्योदय काल के स्थान से इष्टकाल के स्थान तक पहुँचता है। हाँ यदि यह जानना हो कि सूर्योदय काल से इष्टकाल तक कितना नाक्षत्र काल बीता, तब यह गणना करनी पड़ेगी कि सूर्योदय काल में क्रान्तिवृत्त का जो विन्दु उदय हो रहा था उससे इष्टकालिक उदय-विन्दु तक के उदयासु क्या हैं। क्रान्तिवृत्त का सूर्योदय कालिक विन्दु इष्टकाल में सूर्य से कुछ पच्छिम हो जाता है क्योंकि इष्टकाल तक सूर्य कुछ पूरब हट जाता है। इस बात का विचार उस समय अवश्य करना पड़ेगा जब कि उदयकालिक सूर्य के निरयण भोगांश से ही इष्टकाल का लग्न निकालना हो। नीचे इस रीति से भी लग्न जानने का उदाहरण दिया जाता है :— ३री रीति— सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल पर लग्न क्या है ? उदयकालिक सूर्य का निरयण भोगांश = ३^रा ५° १' ६" ⸫ कर्क का भोगांश = ३०° - ५° १' = २४° ५६' = १४६६' १८०० : १४६६ : : २०७५ : भोग्यासु ⸫ भोग्यासु = (१४६६ × २०७५) / १८०० = १७२८ = २८८ पल १६ घड़ी १५ पल धूपघड़ी के अनुसार होता है इसलिए यह सावन काल की इकाई में है। सावन नाक्षत्र ६ घड़ी = ६ घड़ी १ पल ⸫ १६ घड़ी १५ पल = १६ घड़ी १८ पल (स्थूल रूप से) अब इसमें कर्क के भोग्यासु तथा सिंह, कन्या के उदयासु क्रमशः पूर्ववत् घटाने चाहिये । १६ घड़ी १८ पल कर्क का भोग्यकाल ४ घड़ी ४८ पल ─────────────────────── अन्तर ११ घड़ी ३० पल सिंह का उदयकाल ५ " ३६ पल ───────────────────────
३२८ सूर्य-सिद्धान्त अन्तर ५ घड़ी ५४ पल कन्या का उदयकाल ५ ,, ३३ पल . तुला का गतकाल २१ पल इसके बाद की गणना पहले की ही तरह है। इससे सिद्ध होता है कि चाहे तात्कालिक सूर्य का निरयन भोगांश जानकर सावनकाल को ही नाक्षत्रकाल समझकर काम निकाला जाय अथवा उदयकालिक सूर्य के निरयन भोगांश जानकर इष्टकालिक सायनकाल को नक्षत्रकाल में बदल कर काम निकाला जाय दोनों में कोई अन्तर नहीं पड़ता। हाँ सावनकाल से नाक्षत्रकाल बनाकर काम निकालने में कुछ सुगमता होती है। इस रीति में प्रत्येक राशि का उदयकाल इष्टकाल में घटाना पड़ता है। यदि ३२०वें पृष्ठ को सारिणी के ६वें स्तम्भ से काम लिया जाय तो और भी सुविधा हो सकती है। सूर्योदय काल में कर्क का भोग्यकाल = ४ घड़ी ४८ पल परन्तु कर्क का उदयकाल = ५ घड़ी ४६ पल दोनों का अन्तर = ० घड़ी ५८ पल ∴ सूर्योदय काल में कर्क का गतकाल = ० घड़ी ५८ पल निरयन मेष के आदि से मिथुन के अन्त तक का उदयकाल = १४ घड़ी ३० पल ∴ सूर्योदय काल में क्रान्तिवृत्त के उदित भाग का उदयकाल = १५ घड़ी २८ पल इष्टकाल १६ घड़ी १८ पल इष्टकाल में क्रान्तिवृत्त के उदित भाग का उदयकाल = ३१ घड़ी ४६ पल जिससे कन्या तक का उदयकाल घट सकता है क्योंकि वह ३१ घड़ी २५ पल है ∴ तुला का गतकाल = २१ पल अर्थात् इष्टकाल में तुला राशि लग्न है। तुला राशि का कौन बिन्दु लग्न है यह जानने के लिए पहले की तरह आगे की क्रिया भी करनी चाहिए। भास्कराचार्य ने सायन सूर्य से लग्न साधन की रीति बतलायी है जो अधिक शुद्ध है क्योंकि यह बतलाया जा चुका है कि किसी राशि के ३० अंश के प्रत्येक अंश समानकाल में उदय नहीं होते इसलिए उचित यह है कि प्रत्येक अंश के उदयासु
त्रिप्रश्नाधिकार ३२६ अलग-अलग जाने जायें। परन्तु यह काम कष्टप्रद है इसलिए यदि प्रत्येक अंश का उदयकाल समान समझकर अनुपात से काम लिया जाय जैसा कि सब करते हैं तो लग्न की राशि में कोई अन्तर नहीं पड़ेगा हाँ राशि के उदय-बिंदु के निश्चय करने में तनिक सा अन्तर पड़ जायगा । इसलिए यदि लग्न का नवांश या द्वादशांश शुद्धता- पूर्वक जानना हो तो सायन सूर्य से ही पूर्ववत् काम लेना चाहिए । ऐसी दशा में अयनांश का संस्कार करने पर निरयन लग्न का ज्ञान होगा । मध्य लग्न जानने की रीति— प्राक्पश्चान्नतनाडोभिः तस्माल्लंकोदयासुभिः । भानौक्षयधने कृत्वा मध्यलग्नं तथाभवेत् ॥४८॥ चित्र ६३ उ, प, द, पू=प्रयाग के क्षितिजवृत्त के उत्तर, पच्छिम, दक्षिण और पूर्व बिन्दु । क व का=क्रान्तिवृत्त । उ ध ख म द=यामोत्तरवृत्त । का =उदय लग्न । क=अस्त लग्न । म=मध्य या दशमलग्न । व=वसन्त सम्पात । वि = वित्रिभ लग्न । ख = खस्वस्तिक ।
३३० सूर्य-सिद्धान्त
अनुवाद—(८) पूर्व या पश्चिम नतकाल, तात्कालिक सूर्य और लंका के उदयासुओं से तात्कालिक सूर्य और यामोत्तर वृत्त के बीच के क्रान्तिवृत्त के खंड को जान लो। पूर्व नतकाल हो तो इसको तात्कालिक सूर्य से घटा दो अन्यथा जोड़ दो तो मध्य लग्न ज्ञात हो जायगा ।
विज्ञान भाष्य—क्रान्तिवृत्त का जो विन्दु यामोत्तरवृत्त पर होता है वही मध्यलग्न या दशमलग्न (Culminating point) कहलाता है। क्रान्तिवृत्त का जो विन्दु खस्वस्तिक से अत्यन्त निकट रहता है उसे विक्षेभ लग्न कहते हैं। उदयलग्न में ३ राशि घटाने से अथवा अस्तलग्न में तीन राशि जोड़ने से विक्षेभ लग्न ज्ञात होता है।
लंका में राशियों के उदय होने में जितना समय लगता है उतना ही समय उनके याम्योत्तरवृत्त के उल्लंघन करने में भी लगता है। यह सब स्थानों के लिए वही होता है। जैसे निरयन मेष राशि का उदयांश लंका में २६°१८′ है। इसलिए लंका में मेष के उदयासु १७५८ हुए। इतने ही समय में मेषराशि सब स्थानों में यामोत्तरवृत्त का उल्लंघन करता है। इसी तरह अन्य राशियों के बारे में समझना चाहिए।
इसका कारण यह है कि लंका में किसी राशि का उदयांश विषुवद्वृत्त का वह खंड है जिसके उदय होने में उतना ही समय लगता है जितने समय में वह राशि क्षितिज के ऊपर आती है। विषुवद्वृत्त के इस खंड को यामोत्तर उल्लंघन करने में भी इतना ही समय लगता है। इसलिए यह राशि यामोत्तर के उल्लंघन करने में भी इतना ही समय लेगी।
उदाहरण २.—सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल और ५२ घड़ी १० पल उपरान्त कौन-कौन मध्यलग्न होंगे जब कि सूर्योदयकाल में सूर्य का निरयन भोगांश ३रा५°१′६″ और सूर्य की स्पष्ट दैनिक गति ५७′२१″ है ?
प्रथम खण्ड— पहले यह जानना होगा कि सूर्योदयकाल से १६ घड़ी १५ पल पर नतकाल क्या है अर्थात् इस समय के कितना पीछे या पहले ठीक मध्याह्न होगा । इसलिए यह जानना आवश्यक है कि सूर्योदय से कितनी घड़ी, पल पर मध्याह्न होगा । इसके लिए चरप्राण की गणना करनी होगी। परन्तु चरज्या सूर्य की क्रान्ति और स्थान के अक्षांश पर अवलम्बित है। इसलिए पहले यही जानना चाहिए कि सूर्योदय काल के सूर्य की क्रान्ति क्या है।
त्रिप्रश्नाधिकार ३३१ सूर्य का निरयन भोगांश = ३^रा ५° १' ६" अयनांश = २२° ४१' ∴ सूर्य का सायन भोगांश = ३^रा २७° ४२' = ११७° ४२' ∴ क्रान्तिज्या = ज्या ११७° ४२' × ज्या २३ २७' = ज्या (१८०° - ११७° ४२') × ज्या २३ २७' = ज्या ६२° १८' × ज्या २३° २७' = .८८५४ × .३९७६ = .३५२३ ∴ क्रान्ति = २०° ३८' उत्तर ∴ चरज्या = स्परे २०° ३८' × स्परे २५° २५' = .३७६६ × .४७५२ = .१७६० ∴ चरांश = १०° १८' = ६१८' ∴ चरकाल = ६१८ असु = १०३ पल = १ घड़ी ४३ पल ∴ दिनार्द्धमान = १५ घड़ी + १ घड़ी ४३ पल = १६ घड़ी ४३ पल अर्थात् सूर्योदय से १६ घड़ी ४३ पल पर ठीक मध्याह्न होगा । परन्तु इष्टकाल १६ घड़ी १५ पल है जिस समय सूर्य का निरयन भोगांश ३^रा ५° १६' ३८" अथवा ३^रा ५° १७' है (देखो ४५-४७ श्लोकों का विज्ञान भाष्य) इसलिए पूर्व नतकाल = २८ पल = १६८ असु सूर्य कर्क राशि में है जिसके लंका के उदयासु १८३३ हैं (सारिणी के ६ठें स्तम्भ के मान को कलाओं में लिखने से असुओं की संख्या आ जाती है) । अब यह देखना है कि जब १८३३ असुओं में पूरी कर्कराशि अर्थात् १८०० कला यामोत्तर वृत्त को उल्लंघन करती है तब १६८ असुओं में कर्क राशि का कौन भाग उल्लंघन करेगा । १८८३ : १६८ : : १८०० : इष्ट भाग । ∴ इष्टभाग = (१६८ × १८००) / १८३३ = १६५' = २° ४५' यही यामोत्तर वृत्त और सूर्य के बीच का क्रान्तिवृत्त का खंड है । परन्तु सूर्य ३^रा ५° १७' पर है । इसलिए ३^रा ५° १७' - २° ४५' = ३^रा २° ३२' यामोत्तर लग्न है ।
३३२ सूर्य-सिद्धान्त दूसरा खण्ड— जब इष्टकाल ५२ घड़ी १० पल होगा तब पच्छिम नतकाल = ५२ घड़ी १० पल - १६ घड़ी ४३ पल अर्थात् मध्याह्न के उपरान्त ३५ घड़ी २७ पल भर सूर्योदय से ५२ घड़ी १० पल बीता रहेगा । इस समय सूर्य का निरयन भोगांश = ३^रा ५° ५१' इसलिए कर्क राशि का भोगांश = २४°६' जब पूरी कर्क राशि १८३३ असुओं में यामोत्तर वृत्त का उल्लंघन करती है तब इसकी २४°६' कितने असुओं में उल्लंघन करेगी । १८०० : १४४६ : : १८३३ : भोगांश का उल्लंघन काल ∴ भोगांश का उल्लंघन काल = १४४६ x १८३३ / १८०० = १४७६ असु = २४६ पल = ४ घड़ी ६ पल अब पच्छिम नतकाल = ३५ घड़ी २७ पल मध्याह्न के बाद कर्क के उल्लंघन में ४ घड़ी ६ पल लगेगा अन्तर ३१ घड़ी २१ पल सिंह का यामोत्तर उल्लंघन ४ घड़ी ४२ पल में होता है अन्तर २६ घड़ी ३९ पल कन्या का यामोत्तर उल्लंघन ४ घड़ी ३७ पल में होता है अन्तर २२ घड़ी २ पल तुला का यामोत्तर उल्लंघन ४ घड़ी ५३ पल में होता है अन्तर १७ घड़ी ६ पल वृश्चिक का यामोत्तर उल्लंघन ५ घड़ी १७ पल में होता है अन्तर ११ घड़ी ५२ पल धनु का यामोत्तर उल्लंघन ५ घड़ी २५ पल में होता है अन्तर ६ घड़ी २७ पल मकर का यामोत्तर उल्लंघन ५ घड़ी ५।। पल में होता है अन्तर १ घड़ी २१।। पल ∴ कुम्भ राशि यामोत्तर वृत्त पर लग्न है । क्योंकि अन्तिम अन्तर से कुम्भ राशि का यामोत्तर उल्लंघन काल नहीं घटता है इसलिए यही अशुद्ध राशि है । अब यह देखना है कि इसका कौन बिन्दु यामोत्तर वृत्त पर है ।
त्रिप्रश्नाधिकार ३३३ कुम्भ का यामोत्तर उल्लंघन काल = ४ घड़ी ४२ पल = १६६४ असु १ घड़ी २१।। पल = ८१।। पल = ४८६ असु इसलिए जब १६६४ असुओं में १८०० कला का उल्लंघन होता है तब ४८६ असुओं में कितना होगा । १६६४ : ४८६ : : १८०० : गतांश ∴ गतांश = (४८६ × १८००) / १६६४ = ५२०' = ८°४०' ∴ कुम्भ राशिका ८°४०' यामोत्तर उल्लंघन कर चुका ∴ मध्यम या दशम लग्न = १०^{रा} ८°४०' स्पष्ट सूर्य और लग्न से समय जानना— भोग्याशेनूनकस्याथ भुक्तासूनधिकस्य च । संपिण्ड्यान्तरलग्नासूनवं स्यात्कालसाधनम् ॥४६॥ सूर्यादूने निशाशेषे लग्नेऽर्काधिके दिवा । भचक्रार्धयुताद्भानोः अधिकेऽस्तमयात्परम् ॥५०॥ अनुवाद—(४६) लग्न और स्पष्ट सूर्य की राशियों में जो कम हो उसके भोग्पासुओं और जो अधिक हो उसके भुक्तासुओं को जोड़कर दोनों के बीच में जो पूरी राशियां हों उनके उदयासुओं को भी जोड़ लो । इसी योगफल से इष्टकाल जाना जाता है । (५०) रात्रि कुछ शेष रहने पर अर्थात् मध्य रात्रि के पीछे और सूर्योदय के पहले सूर्य की राशि से लग्न की राशि कम होती है, सूर्योदय के पीछे दिन में सूर्य की राशि लग्न की राशि से कम होती है और सूर्यास्त के पीछे सूर्य की राशि में ६ राशि जोड़ने पर भी लग्न की राशि अधिक होती है । इति त्रिप्रश्नाधिकार नामक तीसरे अध्याय का अनुवाद समाप्त हुआ । विज्ञान भाष्य—इष्टकाल और उसके स्पष्ट सूर्य से लग्न जानने की जो रीति ४५-४७ श्लोकों में दी गयी है उसी की विलोम (उलटा) क्रिया ४६-५० श्लोकों में बतलायी गयी है । इसलिए इसकी उपपत्ति समझाने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती । दिन में सूर्य की राशि से उदय लग्न आगे होती है इसलिए सूर्य की राशि लग्न से कम होता है । मध्य रात्रि के बाद उदय लग्न के आगे सूर्य रहता है इसलिए उस समय लग्न सूर्य से कम होती है । सूर्यास्त के समय उदय लग्न सूर्य से ठीक ६ राशि आगे रहती है इसलिए इसके उपरान्त उदय लग्न ६ राशि युक्त स्पष्ट सूर्य (सषड्भ सूर्य) से अधिक होती है ।
३३४ सूर्य-सिद्धान्त इस नियम से मध्य रात्रि के पीछे का जो इष्टकाल आता है वह उस समय से सूर्योदय तक का समय होता है और दिन में या सूर्यास्त के बाद जो इष्टकाल होता है वह सूर्योदय से उस समय तक का काल होता है। यह नियम एक उदाहरण से स्पष्ट हो जायगा :- उदाहरण—सूर्योदय काल का स्पष्ट सूर्य ३^{रा}५°१'६", स्पष्ट दैनिक गति ५७'२१" है। प्रयाग में किस समय उदय लग्न ६ ^{रा}१°५१' और १^{रा}२२°५६' होंगी ? पहला खंड— यहाँ उदय लग्न स्पष्ट सूर्य से अधिक है इसलिए सूर्य की राशि के भोग्यासु और लग्न की राशि के भुक्तासुओं को जोड़ना चाहिए। इन भोग्यासु और भुक्तासुओं को पहले की तरह जानना चाहिए। कर्क का भोग्यांश = २४°५८'५४" = २४°५६' तुला का भुक्तांश = १°५१' ∴ कर्क का भोग्यकाल = २८५ पल और तुला का भुक्तकाल = २१ पल दोनों का जोड़ = ३०६ पल = ५ घड़ी ६ पल कर्क और तुला के बीच में सिंह और कन्या हैं जिनमें सिंह का उदयकाल = ५ घड़ी ३६ पल कन्या का उदयकाल = ५ घड़ी ३३ पल कुल का योग = १६ घड़ी १५ पल दूसरा खंड— यहाँ उदय लग्न सूर्य की राशि से कम है। इसलिए उदय लग्न के भोग्यासुओं को सूर्य की राशि के भुक्तासुओं में जोड़ना चाहिए। इनके मान पहले की तरह जानना होता है। जिस समय लग्न १^{रा}२२°५६' होगी वह मध्यरात्रि के बाद का समय है इसलिए अगले सूर्योदय के स्पष्ट सूर्य के भुक्तासुओं से काम लेना चाहिए। उसी दिन के सूर्योदय काल का स्पष्ट सूर्य = ३^{रा}५°१'६' स्पष्ट दैनिक गति = ५७°२१' ∴ अगले दिन के सूर्योदय काल का स्पष्ट सूर्य = ३^{रा}५°५८'२७" = ३^{रा}५°५८' स्थूलतः
विप्रश्नाधिकार ३३५ ∴ सूर्य का भुक्तांश = ५° ५८' = ३५८' लग्न का भोग्यांश = ३०° - २२°५६' = ७° १' = ४२१' सूर्य के भुक्तासु = ३५८ × २०७५ / १८०० = ४१३ = ६६ पल लग्न का भोग्य काल = ४२१ × २६१ / १८०० पल = ६८ पल ∴ सूर्य का भुक्तकाल और लग्न का भोग्यकाल = ६६ + ६८ पल = २ घड़ी १७ पल सूर्य और लग्न के बीच मिथुन राशि का उदयकाल = ५ घड़ी ३५ पल दोनों का योग = ७ घड़ी ५२ पल इसलिए सूर्योदय होने में ७ घड़ी ५२ पल रह गया है। लग्न से समय जानने की रीति तभी व्यवहार में लायी जा सकती है जब राशि और नक्षत्रों की पहचान अच्छी तरह हो । इसलिए यह आवश्यक है कि राशि, नक्षत्र तथा अन्य प्रसिद्ध तारों की पूरी जानकारी हो । सूर्य-सिद्धान्त के नक्षत्र ग्रह युत्यधिकार नामक ८वें अध्याय में कुछ नक्षत्रों और तारों की चर्चा है इसलिए वहीं यह भी बतलाया जायगा कि प्रसिद्ध प्रसिद्ध तारे कौन हैं जिनसे राशि में समय का ज्ञान सहज ही हो सकता है । यहाँ केवल यह बतला देना पर्याप्त है कि मध्य लग्न से समय जानने में अधिक सुविधा होती है । यदि यह मालूम हो कि मध्याह्न काल में सूर्य का विषुवांश क्या था और रात्रि में कौन तारा जिसका विषुवांश ज्ञात है यामोत्तर वृत्त पर है तो यह सहज ही जाना जा सकता है कि मध्याह्न से कितना समय बीता है क्योंकि तारा के विषुवांश से सूर्य के विषुवांश को घटाने पर जो अन्तर कलाओं में होता है उतने ही असुओं में वह तारा मध्याह्न के उपरान्त यामोत्तर वृत्त पर आता है । यदि किसी तारे का विषुवांश न ज्ञात हो तो केवल क्रान्तिवृत्त के तारा- समूहों को पहचान लेने से भी समय का स्थूल ज्ञान हो सकता है । इसके लिए सूर्य किस नक्षत्र पर है यह भी जानना आवश्यक होता है । यह तो पहले ही कहा जा चुका है कि क्रान्तिवृत्त के २७वें भाग को नक्षत्र कहते हैं और पूरा क्रान्तिवृत्त एक
३३६ सूर्य-सिद्धान्त नाक्षत्र दिन में में पृथ्वी की परिक्रमा करता हुआ जान पड़ता है इसलिए एक नक्षत्र ६०/२७ घड़ी = २ २/९ घड़ी या सवा दो घड़ी में यामोत्तर उल्लंघन करता है अथवा ९ नक्षत्र २० घड़ी या ८ घंटे में यामोत्तर उल्लंघन करते हैं। इस प्रकार की गणना से जो समय जाना जायगा उसमें और यथार्थ समय में आधे घंटे से अधिक अन्तर नहीं पड़ सकता। उदाहरण—सूर्य पुनर्वसु नक्षत्र में है तो किस समय श्रवण नक्षत्र यामोत्तर वृत्त पर होगा ? २१३ पृष्ठ की नक्षत्र सारिणी में पुनर्वसु ७वां नक्षत्र और श्रवण २२वां नक्षत्र है। इसलिए इन दोनों में १५ नक्षत्रों का अन्तर है। ९ नक्षत्रों का अन्तर २० घड़ी या ८ घंटे में पड़ता है। ६ ,, ,, १३ १/३ ,, या ५ १/३ ,, ,, ∵ १५ ,, ,, ३३ १/३ ,, १३ १/३ ,, ,, ∴ मध्याह्न से १३ १/३ घंटे पीछे अथवा मध्यरात्रि से १ १/३ घंटे पर सवा बजे रात्रि में श्रवण नक्षत्र यामोत्तर वृत्त पर होगा। आजकल धूप-घड़ी से समय का ज्ञान नहीं होता वरन् कमानी के बल पर चलनेवाली घड़ियों से होता है जिसका समय धूप-घड़ी से कुछ भिन्न होता है इसलिए जो लोग आजकल की प्रचलित घड़ियों से लग्न की गणना करके फलित ज्योतिष के फल बतलाते हैं उनको लग्न का ठीक ठीक ज्ञान नहीं होता। काशी के महामहो- पाध्याय बापूदेवजी शास्त्री के पंचांग के अतिरिक्त अन्य पंचांग ऐसे देखने में नहीं आये जिनमें इस बात का अच्छा विवेचन हो। इसलिए यहाँ यह बतलाना बहुत आवश्यक है कि धूप-घड़ी और आजकल की कमानीदार घड़ियों में परस्पर क्या सम्बन्ध है। स्पष्टकाल, मध्यकाल और काल-समीकरण— मध्यमाधिकार पृष्ठ ७, ८ में बतलाया गया है कि किसी तारे के उदय होने के समय से उसके फिर उदय होने तक के समय को नाक्षत्र दिन और सूर्य के एक उदय से लेकर दूसरे उदय तक के समय को सावन दिन कहते हैं। परन्तु उदय होने का समय ठीक-ठीक जानना बड़ा कठिन होता है क्योंकि इस काम के लिए ऐसा क्षितिज होना चाहिए जहाँ वृक्ष इत्यादि न हों जो सब जगह के लिए प्रायः असम्भव है क्योंकि ऐसा मैदान साधारणतः बहुत कम मिलता है जहाँ कई कोस तक पूर्व या पश्चिम दिशा में कोई वृक्ष न हों। यदि ऐसा क्षितिज भी मिल जाय तो प्रकाश की किरणों के झुक जाने से सूर्य या तारे का उदय उचित समय से कुछ पहले ही हो जाता है जिसका परिमाण वातावरण की भिन्न-भिन्न दशाओं के अनुसार घटता बढ़ता रहता
त्रिप्रश्नाधिकार ३३७ है। इसलिए बहुत सूक्ष्म गणना के लिए उदयकाल से समय की परीक्षा नहीं की जाती वरन् मध्यान्ह काल से की जाती है। इसलिए सावन या नाक्षत्र दिन की परिभाषा आजकल यों की जाती है :— सूर्य का केन्द्र जिस क्षण यामोत्तर वृत्त पर आता है उस क्षण से लेकर फिर उसका केन्द्र जिस क्षण यामोत्तर वृत्त पर आता है उस क्षण तक के समय को 'स्पष्ट सावन दिन' कहते हैं। वसंत सम्पात बिन्दु जिस क्षण यामोत्तर वृत्त पर आता है उस क्षण से लेकर फिर यह बिन्दु जिस क्षण यामोत्तर वृत्त पर आता है उस क्षण तक के समय को 'नाक्षत्र दिन' कहते हैं। वसंत सम्पात बिन्दु की गति प्रायः समान होती है। इसलिए नाक्षत्र दिन सदा समान* होता है। परन्तु सावन दिन के परिमाण में बहुत भेद पड़ जाता है क्योंकि सूर्य की दैनिक गति निरंतर बदला करती है। इसका पता नाक्षत्र काल सूचित करने वाली घड़ियों से सहज ही लग सकता है। यदि घड़ी ऐसी बनायी जाय कि वसंत सम्पात बिन्दु के यामोत्तर वृत्त पर आने के समय उसमें ठीक १२ बजा करे तो ऐसी घड़ी को नाक्षत्र घड़ी (घटिका यंत्र) कहते हैं। इस तरह के घटिका यंत्र से सहज ही जाना जा सकता है कि सावन दिनों के परिमाणों में कितना अन्तर हो जाता है। उदाहरण के लिए '१८६६ ई० के चार सावन दिनों के† परिमाण दिये जाते हैं :— १८०६ ई० (नाक्षत्रकाल) घंटा मिनट सेकंड १ली जनवरी के स्पष्ट मध्याह्न से २री जनवरी के स्पष्ट मध्याह्न तक का समय २४ ४ २४.६ २री अप्रैल के स्पष्ट मध्याह्न से ३री अप्रैल के स्पष्ट मध्याह्न तक का समय २४ ३ ३८.५ ३री जुलाई के स्पष्ट मध्याह्न से ४थी जुलाई के स्पष्ट मध्याह्न तक का समय २४ ४ ७.५ २री अक्टूबर के स्पष्ट मध्याह्न से ३री अक्टूबर के स्पष्ट मध्याह्न तक का समय २४ ३ ३७.६
- अक्ष विचलन के कारण वसन्त सम्पात का स्पष्ट स्थान से पूर्व मध्यम स्थान या पच्छिम हो जाता है (देखो पृष्ठ २४७) । परन्तु इससे नाक्षत्र दिन के परिमाण में इतना कम अन्तर पड़ता है कि उसको नहीं के समान समझ लेने में कोई हानि नहीं होती । †Ball's Spherical Astronomy पृष्ठ २१५ २२