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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

परिलेखाधिकार ५४६ परन्तु उसमें अंगुल का जो मान दिया गया है वह उन्नत काल के अनुसार बदलता हुआ बतलाया गया है (देखो पृष्ठ ४८१)। परन्तु मैं समझता हूँ कि यदि अंगुल का परिमाण सदा ३ कला का माना जाय तो विशेष हानि नहीं हो सकती क्योंकि जैसा पृष्ठ ४८२ में बतलाया गया है वर्तन के कारण सूर्य या चन्द्रबिम्ब के आकारों में उदय या अस्त काल में ही अधिक अन्तर देख पड़ता है । अन्य समय में यह अन्तर इतना कम होता है कि उस पर विचार करने की आवश्यकता ही नहीं जान पड़ती । इसलिए यहां मैं ३ कला का एक अंगुल मानना सुगम समझता हूँ, इसमें कुछ संस्कार करने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती । श्लोक ४—इसके पूर्वार्द्ध में यह बतलाया गया है कि जिस विन्दु को केन्द्र मानकर वलनाश्रित वृत्त, समास-वृत्त और ग्राह्यबिम्ब-वृत्त खींचने को कहा गया है उसी विन्दु से उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पच्छिम रेखाएं त्रि० प्र०-श्लोक २-४ तथा चित्र ४४ के अनुसार खींचना चाहिए । उत्तरार्ध में यह बतलाया गया है कि चन्द्रग्रहण में स्पर्श चन्द्र-विम्ब के पूर्व भाग में होता है और मोक्ष पच्छिम भाग में होता है; परन्तु सूर्यग्रहण में स्पर्श सूर्य-बिम्ब के पच्छिम भाग में होता है और मोक्ष पूर्व भाग में होता है । इसका कारण स्पष्ट है । चन्द्रमा आकाश में पूर्व की ओर चलता हुआ पृथ्वी की परिक्रमा करता है इसलिए जिस समय वह पृथ्वी की छाया में प्रवेश करने लगता है उस समय उसका पूरब वाला भाग ही पहले पहल छाया में घुसता है । इसी प्रकार चंद्र बिम्ब का पच्छिम वाला भाग ही मोक्ष के समय छाया से अलग होता है । परन्तु सूर्य ग्रहण में चन्द्रबिम्ब पच्छिम से पूर्व की ओर बढ़ता हुआ सूर्य बिम्ब को ढक लेता है इसलिए स्पर्श के समय सूर्य बिम्ब का पच्छिम वाला भाग ढकने लगता है और मोक्ष के समय सूर्य बिम्ब का पूर्व वाला भाग चन्द्र बिम्ब से अलग होता है । श्लोक ५—चन्द्रग्रहण के स्पर्शकाल में चंद्रमा के स्फुटवलन की जो दिशा होती है पूर्व विन्दु से उसी दिशा में स्फुटवलन के अंतर पर वलनाश्रित वृत्त पर चिह्न करना चाहिए । परन्तु मोक्षकाल में स्फुट वलन की जो दिशा हो उसके विरुद्ध दिशा में पच्छिम विन्दु से यह चिह्न करना चाहिए । इन चिन्हों को वलनाग्र-विन्दु कहते हैं । मोक्ष काल में दिशा के उलट देने का कारण पृष्ठ ४७६ के चित्र १०१ के स्पष्ट हो जाता है । वहां यह दिखलाया गया है कि ग्रह के प्राची अर्थात् पूर्व बिन्दु से जिस समय क्रान्तिवृत्त उत्तर की ओर होता है उसी समय प्रतीची अर्थात् पच्छिम बिन्दु से क्रान्तिवृत्त दक्खिन को ओर है । इसलिए जिस समय स्फुटवलन की दिशा उत्तर कही जाती है उस समय वह पूर्व विन्दु से उत्तर की ओर होती है न कि पच्छिम विन्दु से । परन्तु स्फुट वलन की जो दिशा चन्द्रग्रहणाधिकार के २४-२५ श्लोकों से सिद्ध होती है वह पूर्व बिन्दु से ही समझी जाती है इसलिए उस नियम

५५० सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार मोक्षकालिक वलन को जो दिशा आती है वह पूर्व विन्दु के ही अनुसार आती है परन्तु चन्द्रग्रहण में मोक्ष पश्चिम विन्दु की ओर होता है इसलिए इस विन्दु से स्फुटवलन का कोण बनाने के बिए अथवा क्रान्तिवृत्त की दिशा जानने के लिए स्फुटवलन की दिशा उलट दी जाती हैं । ऊपर जो कुछ लिखा गया है उसके विपरीत सूर्यग्रहण में करना चाहिए । अर्थात् स्पर्श काल में स्फुटवलन की जो दिशा हो उसके विपरीत दिशा में पच्छिम विन्दु से वलनाग्र विन्दु बनाना चाहिए, परन्तु मोक्ष काल में पूर्व विन्दु से स्फुटवलन की दिशा में ही वलनाग्र विन्दु बनाना चाहिए । इसका कारण स्पष्ट है । सूर्यग्रहण में स्पर्श सूर्यबिम्ब के पच्छिम की ओर और मोक्ष पूर्व की ओर होता है । परन्तु पच्छिम की ओर स्फुटवलन की दिशा उलट जाती है जैसा ऊपर कहा गया है । इस- लिए सूर्यग्रहण में स्पर्शकालिक वलन की दिशा को उलटना पड़ता है परन्तु मोक्ष- कालिक वलन की दिशा में कोई फेरफार नहीं करना पड़ता । श्लोक ६-८—वलनाग्र विन्दु से जो रेखा वलनाश्रित वृत्त अथवा समास- वृत्त था ग्राह्यबिम्ब के केन्द्र तक खींची जाती है उससे केवल यह जाना जा सकता है कि क्रान्तिवृत्त की दिशा क्या है । सूर्यग्रहण में ग्राह्यबिम्ब सूर्य ही होता है और सूर्य सदैव क्रान्तिवृत्त पर रहता है इसलिए केन्द्र से वलनाग्र विन्दु तक जानेवाली रेखा क्रान्तिवृत्त ही समझी जा सकती है । परन्तु चन्द्रग्रहण में ग्राह्यबिम्ब चन्द्रमा होता है और चन्द्रमा क्रान्ति वृत्त से अपने शर के समान अन्तर पर उत्तर या दक्षिण होता है इसलिए चन्द्र बिम्ब के केन्द्र से वलनाग्र विन्दु तक जाने वाली रेखा क्रान्ति- वृत्त कदापि नहीं हो सकती । यह इसके समानान्तर होती है । चाहे सूर्यग्रहण हो चाहे चन्द्रग्रहण, दोनों दशाओं में छादक का केन्द्र वलनाग्र विन्दु से केन्द्र तक जाने वाली रेखा पर नहीं होता क्योंकि सूर्यग्रहण में छादक चन्द्रमा होता है जो क्रान्ति- वृत्त पर नहीं चलता और चन्द्रग्रहण में छादक भूछाया होती है जो चंद्रमा की कक्षा में नहीं चलती इसलिए स्पर्श या मोक्ष काल में छादक के केन्द्र का पता लगाने के लिए उस विन्दु से जहाँ वलनाग्र रेखा समास-वृत्त को काटती है चन्द्र-विक्षेप के अन्तर पर समास-वृत्त तक केन्द्र से एक रेखा खींचते हैं । यह रेखा समास-वृत्त को जहाँ काटती है उसे विक्षेपाग्र बिंदु कहते हैं । स्पर्श या मोक्ष के समय छादक का केन्द्र इसी विन्दु पर होता है । इसलिए यदि इस विन्दु को केन्द्र मानकर छादक के व्यासार्ध से एक वृत्त खींचा जाय तो यह ग्राह्यविम्ब को जहाँ स्पर्श करेगा वहीं ग्रहण का स्पर्श या मोक्ष होगा । विक्षेपाग्र विन्दु से केन्द्र तक जो रेखा खींची जाती है उससे भी स्पर्श या मोक्ष का स्थान जाना जा सकता है क्योंकि जिस विन्दु पर छादक और छाद्य बिम्ब स्पर्श करते हैं उसी विन्दु पर विक्षेपाग्र विन्दु से केन्द्र तक

परिलेखाधिकार ५५१ खींची जाने वाली रेखा भी ग्राह्य बिम्ब को काटती है (देखो पृष्ठ ४६७ चित्र १००) । इस चित्र में च को ग्राह्य बिम्ब का केन्द्र समझ लिया जाय तो च से क्रान्तिवृत्त छ प के समानान्तर जो रेखा खींची जायगी वह केन्द्र से वलनाग्र बिन्दु तक जानेवाली रेखा कही जा सकती है। भूछाया छ से इस रेखा का जो अंतर होता है वह च के शर के समान होता है। च को केन्द्र मानकर च छ के व्यासार्ध से जो वृत्त खींचा जायगा वही समासवृत्त होगा। च से जानेवाली वलनाग्र रेखा समास वृत्त को जहाँ काटेगी वहाँ से च छ का अंतर भी चन्द्रमा के शर के समान होगा। इस प्रकार सातवें श्लोक में बतलाये गये नियम की उपपत्ति सिद्ध हुई । छठें श्लोक में यह नहीं बतलाया गया है कि वलनाग्र रेखा की किस दिशा में विक्षेपाग्र रेखा खींचनी चाहिए। यह ८वें श्लोक में बतलाया गया है। सूर्य-ग्रहण में विक्षेपाग्र रेखा उसी दिशा में खींचनी चाहिए जिस दिशा में चन्द्रमा का शर हो अर्थात् यदि चन्द्र शर की दिशा उत्तर हो तो विक्षेपाग्र रेखा भी वलनाग्र रेखा से उत्तर होनी चाहिए, और यदि चन्द्र शर दक्खिन हो तो विक्षेपाग्र रेखा वलनाग्र रेखा से दक्खिन खींचनी चाहिए। इसका कारण चित्र १०० पृष्ठ ४६७ से स्पष्ट है। यदि इस चित्र में छ को सूर्य बिम्ब का केन्द्र १ मान लिया जाय और क्रान्तिवृत्त छ प को चन्द्र की कक्षा च प से उत्तर में मान लिया जाय तो चन्द्र शर दक्खिन होता है। ऐसी दशा में चन्द्रमा सूर्यबिम्ब को ऐसे बिन्दु पर स्पर्श करता है जो सूर्य बिम्ब के दक्षिणार्ध में है। अर्थात् जब चन्द्रशर दक्खिन होता है तब चन्द्रमा सूर्य- बिम्ब को दक्षिण की ओर स्पर्श करता है। इसी प्रकार यह सिद्ध हो सकता है कि यदि चन्द्रमा का शर उत्तर हो तो यह सूर्यबिम्ब को उत्तर की ओर स्पर्श करेगा । परन्तु चन्द्रग्रहण में इसके विपरीत होता है। यह भी इसी चित्र से स्पष्ट होता है, यदि छ को भूछाया का केन्द्र मान लिया जाय । चित्र में चन्द्रशर दक्खिन दिखलाया गया है। ऐसी दशा में भूछाया चन्द्रबिम्ब को ऐसे बिन्दु पर स्पर्श करती है जो चन्द्र बिम्ब के उत्तर की ओर है। इसी प्रकार यदि चन्द्रशर उत्तर हो तो सिद्ध हो सकता है कि भूछाया चन्द्रबिम्ब को दक्षिण की ओर स्पर्श करेगी । इसलिये यह नियम हो गया कि चन्द्रग्रहण में स्पर्शबिन्दु की दिशा चन्द्र शर की दिशा के विपरीत होनी चाहिये अर्थात चंद्रग्रहण में विक्षेपाग्र रेखा वलनाग्र रेखा से उस दिशा में खींचनी चाहिये जो चन्द्रशर की दिशा के विपरीत हो। १. यदि छ को सूर्य बिम्ब का केन्द्र तथा इसके वृत्त को सूर्य बिम्ब मान लिया जाय तो इसी चित्र से सूर्यग्रहण के सम्बन्ध की सारी बातें जानी जा सकती हैं।

५५२ सूर्य-सिद्धान्त मोक्ष काल के विक्षेप की दिशा भी इसी नियम के अनुसार निश्चय करनी चाहिये । यदि चन्द्रशर की दिशा दक्षिण हो तो चन्द्रग्रहण में चन्द्रमा का मोक्ष चन्द्र बिम्ब के उत्तरार्ध में होता है जैसा कि उपर्युक्त चित्र में चन्द्रमा को ची स्थिति में दिखलाया गया है । परन्तु सूर्यग्रहण में सूर्य का मोक्ष सूर्यबिम्ब के दक्षिणार्ध में होता है । इसी प्रकार यदि चन्द्रशर की दिशा उत्तर हो तो चन्द्रमा का मोक्ष चन्द्रबिम्ब के दक्षिणार्ध में और सूर्य का मोक्ष सूर्य बिम्ब के उत्तरार्ध में होता है । मध्य ग्रहण काल में भी विक्षेप की दिशा इसी नियम से निश्चय की जा सकती है । उसी चित्र से यह प्रकट है कि जब चन्द्र शर दक्षिण होता है तब चन्द्र ग्रहण के मध्य काल में भू छाया का केन्द्र चन्द्र-बिम्ब से उत्तर होता है परन्तु सूर्य ग्रहण के मध्य काल में चन्द्रमा सूर्य-बिम्ब के केन्द्र से दक्षिण होता है । इसी प्रकार जब चंद्र शर उत्तर होता है तब चंद्र ग्रहण के मध्य काल में भू छाया का केन्द्र बिम्ब से दक्षिण होता है और सूर्य ग्रहण के मध्य काल में चंद्रमा सूर्य बिम्ब के केन्द्र से उत्तर होता है । श्लोक ६—चन्द्रमा के मध्यग्रहणकाल में यदि चन्द्रशर और स्फुट वलन की दिशा एक हो तो वलनाग्र विन्दु उत्तर-दक्षिण रेखा से पूर्व बनाना चाहिये परन्तु यदि इनकी दिशाओं में भिन्नता हो अर्थात् स्फुटवलन उत्तर और चन्द्रशर दक्षिण हो अथवा स्फुटवलन दक्षिण और चन्द्रशर उत्तर हो तो वलनाग्र विन्दु उत्तर दक्षिण रेखा से पच्छिम होना चाहिये । परन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि यदि चन्द्रशर दक्षिणं हो तो उत्तर बिन्दु के पूर्व या पच्छिम की ओर वलनाग्र विन्दु बनाया जाय और यदि चन्द्रशर उत्तर हो तो दक्षिण-विन्दु से पूर्व या पच्छिम की ओर वलनाग्र- विन्दु बनाया जाय । परन्तु सूर्य-ग्रहण के मध्यकाल का परिखेल खींचने के लिए ऊपर जो कुछ चन्द्रग्रहण के सम्बन्ध में कहा गया है उसके विपरीत होना चाहिये । अर्थात् यदि चन्द्रशर और स्फुटवलन की दिशा एक हो तो वलनाग्र विन्दु उत्तर-दक्षिण रेखा से पच्छिम की ओर और यदि इनकी दिशाओं में भिन्नता हो तो वलनाग्र विन्दु उत्तर- दक्खिन रेखा से पूर्व की ओर होना चाहिये । साथ ही साथ यह भी ध्यान रहे कि यदि चन्द्रशर दक्खिन हो तो दक्खिन-विन्दु से पूर्व या पच्छिम की ओर वलनाग्र विन्दु बनाया जाय और यदि चन्द्रशर उत्तर हो तो उत्तर विन्दु से पूर्व या पच्छिम वलनाग्र विन्दु बनाया जाय । चित्र १०२ से इसका ठीक ठीक ज्ञान सहज ही हो सकता है । चन्द्रग्रहण के सम्बन्ध में जो भूछाया है वही सूर्यग्रहण के सम्बन्ध में सूर्य बिम्ब समझ लेने से यही चित्र चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण दोनों के लिए काम दे सकता है ।

परिलेखाधिकार ५५३ चित्र नं० १०२ छ = भू छाया या सूर्य विम्ब का केन्द्र । च = चन्द्र विम्ब का केन्द्र जब चन्द्रशर दक्षिण है । चा = चन्द्र विम्ब का केन्द्र जब चन्द्रशर उत्तर है । पू = उस विम्ब का पूर्व विन्दु जिसकी परिधि पर यह अक्षर है । प = उस विम्ब का पच्छिम विन्दु जिसकी परिधि पर यह अक्षर है । उ = उस विम्ब का उत्तर विन्दु जिसकी परिधि पर यह अक्षर है । द = उस विम्ब का दक्षिण विन्दु जिसकी परिधि पर यह अक्षर है । क्राक्रा = क्रान्तिवृत्त कक = कदम्बप्रोत वृत्त क्रिक्रि या क्रिक्री चन्द्रमा के केन्द्र से जाता हुआ क्रान्तिवृत्त के समानान्तर वृत्त इस चित्र में स्फुटवलन उत्तर की ओर दिखलाया गया है । इसलिए प्रत्येक विम्ब के केन्द्र से जाती हुई पू प रेखा के पू विन्दु से क्रान्तिवृत्त क्र क्रा उत्तर की ओर है । इस चित्र से नीचे लिखी बातें स्वयंसिद्ध हैं :— (१) चन्द्र ग्रहण के समय जब चन्द्रमा च पर और भू छाया छ पर हो— चन्द्र शर दक्षिण \quad \Big} \quad भू छाया का केन्द्र छ चन्द्रमा के उत्तर विन्दु स्फुटवलन उत्तर \quad \Big} \quad उ से पच्छिम की ओर

५५४ सूर्य-सिद्धान्त (२) चन्द्रग्रहण के समय जब चन्द्रमा चा पर और भू छाया छ पर हो - चन्द्र शर उत्तर \ भू छाया का केन्द्र छ चन्द्रमा के दक्षिण स्फुटवलन उत्तर / विन्दु द से पूर्व की ओर (३) सूर्य ग्रहण के समय जब चन्द्रमा च पर और सूर्य छ पर हो— चन्द्र शर दक्षिण \ चन्द्रमा का केन्द्र च सूर्य विम्ब के स्फुटवलन उत्तर / दक्षिण विन्दु द से पूर्व की ओर (४) सूर्यग्रहण के समय जब चन्द्रमा धा पर और सूर्य छ पर हो— चन्द्र शर उत्तर | चन्द्र का केन्द्र चा सूर्य विम्ब के उत्तर स्फुटवलन उत्तर | विन्दु उ से पच्छिम की ओर इसी प्रकार यदि प्रत्येक विम्ब के केन्द्र से जाने वाली क्रा क्रा रेखा पू प रेखा के पू विन्दु से दक्षिण की ओर खींची जाय तो स्फुट वलन की दिशा दक्खिन की ओर होगी । इस दशा में भी यह स्पष्ट हो जायगा कि श्लोक ६ का नियम बिलकुल ठीक उतरता है । चित्र खींचते समय इस बात का ध्यान रहना आवश्यक है कि छ से च वा च को जाने वाली रेखा क्रान्तिवृत्त से समकोण पर अथवा कदम्बप्रोत वृत्त पर हो । श्लोक १०—जब श्लोक ६ के अनुसार मध्य ग्रहण काल का वलनाग्र विन्दु जान लिया जाय तब केवल यह जानना रह जाता है कि इस वलनाग्र विन्दु से ग्राह्य विम्ब के केन्द्र तक जाने वाली रेखा के किस विन्दु पर ग्राहक का केन्द्र है। यह तो प्रत्यक्ष ही है कि मध्य ग्रहण काल में ग्राह्य और ग्राहक विम्बों के केन्द्रों का अन्तर चन्द्रमा के शर के समान होता है । इसलिये ग्राह्य विम्ब के केन्द्र से वलनाग्र विन्दु की दिशा में चन्द्रशर के अन्तर पर ग्राहक का केन्द्र नाप कर स्थिर कर लेना चाहिए । श्लोक ११—ग्राहक के इसी केन्द्र पर ग्राहक विम्ब के व्यासार्ध से जो वृत्त खींचा जायगा वही ग्राहक का विम्ब सूचित करेगा । यह वृत्त ग्राह्य विम्ब का जितना भाग ढक लेगा वही विम्ब का ग्रस्त भाग होगा । यदि ग्राह्य का पूरा विम्ब ग्राहक वृत्त से ढक जायगा तो सर्वग्रास ग्रहण लगेगा, नहीं तो खंडग्रास ग्रहण होगा । इसकी उपपत्ति पृष्ठ ४६१ के चित्र ६६ के सम्बन्ध में बतलायी जा चुकी है । श्लोक १२—इस श्लोक में यह बतलाया गया है कि समतल भूमि पर अथवा काठ या किसी अन्य वस्तु की तख्ती पर परिलेख खींचा जा सकता है । फलक की जगह काग़ज़ भी आजकल सुगमता से प्रयोग किया जा सकता है ।

परिलेखाधिकार ५५५ इस श्लोक के उत्तरार्ध में यह बतलाया गया है कि पूर्व कपाल के परिलेख में दिशाओं का जो क्रम हो पच्छिम कपाल के परिलेख में उसके विपरीत होना चाहिये । परन्तु यह बात समझ में नहीं आती क्योंकि यदि ग्रहण का स्पर्श पूर्व कपाल में हो और मोक्ष पच्छिम कपाल में, जैसा कि प्रायः होता है, तो एक ही ग्रहण के स्पर्शकाल या सम्मीलन काल का परिलेख उन्मीलन या मोक्षकाल के परिलेख से भिन्न होना चाहिये । परन्तु ऐसी बात न तो व्यवहार में सुविधाजनक है और न बहुत आवश्यक ही है। इनके सिवा अगले श्लोकों में सम्मीलन और उन्मीलन की दिशाएँ जानने की जो रीतियाँ बतलायी गयी हैं वे तभी सम्भव हैं जब एक ही परिलेख से काम लिया जाय । अन्य आचार्यों ने इस सम्बन्ध में कुछ नहीं लिखा है। केवल ब्रह्म स्फुट सिद्धांत के ग्रहणोत्तराध्याय के श्लोक १ २६ में यह लिखा हुआ है कि फलक पर यदि परिलेख बनाया जाय तो इस पर जो दिशाएँ अंकित की जायँगी वे भूमि के परिलेख की दिशाओं के विपरीत होंगी। इसका कारण यह है कि भूमि के परिलेख में दिशाओं का क्रम वह है जो त्रिप्रश्नाधिकार के श्लोक १-४ में बतलाया गया है। परन्तु फलक के परिलेख में यह सुविधा भी होती है कि उसको हम ग्राह्य विम्ब की ओर उलट कर रख सकते हैं और स्पर्श या मोक्ष विन्दु की दिशा का ज्ञान सहज ही कर सकते हैं। ऐसी दशा में फलक पर हमारे बायें हाथ की ओर पूर्व, दाहिने हाथ की ओर पच्छिम, ऊपर की ओर उत्तर और नीचे की ओर दक्खिन होगा। परन्तु भूमि के परिलेख में हमारे दाहिने हाथ की ओर पूरब, बायें हाथ की ओर पच्छिम, उत्तर की ओर उत्तर और दक्षिण की ओर दक्षिण होता है। सूर्य-सिद्धान्त के टीकाकारों ने तो यही लिखा है कि पूर्व या पच्छिम कपाल के भेद से दिशाओं के क्रम में भिन्नता कर देनी चाहिये । परन्तु मुझे इसके कारण का ज्ञान अभी तक नहीं हुआ इसलिए मैं इसका अर्थ पद्धति के विरुद्ध जैसा कि ब्रह्म स्फुट सिद्धान्त में बतलाया गया है करता हूँ । आशा है इस पर कोई सज्जन अपना मत प्रकट करेंगे और इसका कारण बतलाने की कृपा करेंगे। ग्रहण देखना कब सम्भव है :– स्वच्छत्वात्षोडशांशोऽपि ग्रस्तश्चन्द्रस्य दृश्यते । लिप्तात्रयमपि ग्रस्तं तीक्ष्णत्वान्न विवस्वतः ।।१३।। १. प्राच्यपरे विपरीते विपरीतं मध्यवलनमर्केन्द्वोः । पूर्ववदन्तत् सर्वं फलके स्वे ग्रहण परिलेखाः ।। २६ ।। जिसकी टीका सुधाकरजी इस प्रकार करते हैं—फल के प्राच्यपरे विपरीते कार्ये । भूमौ यः प्राग्विन्दुः पश्चिम विन्दुश्च फलके पश्चिम विन्दुः प्राग्विन्दुः कार्य इति । अर्केन्दोर्मध्यवलनं यथादिशमागतं विपरीतं कार्यम् ।

५. सूर्य-चन्द्र उदयास्त व शृङ्गोन्नति अधिकार

५५६ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—(१३) चन्द्रमा का १२वाँ भाग भी ग्रस्त हो तो स्वच्छता के कारण देखा जा सकता है परन्तु सूर्य की तीन कला भी ग्रस्त हो तो सूर्य की तीक्ष्णता के कारण नहीं देख पड़ता । विज्ञान भाष्य—इसका अर्थ करने में टीकाकारों ने बड़ा मत-भेद प्रकट किया है । आचार्य रंगनाथ जी, तथा उनके अनुयायी माधव पुरोहित जी और पंडित इन्द्र- नारायण द्विवेदी जी यह अर्थ लगाते हैं कि चन्द्रमा का १२ वाँ भाग भी ग्रस्त हो तो स्वच्छता के कारण नहीं देख पड़ता । परन्तु यह अर्थ मेरी समझ में ठीक नहीं जंचता । स्वच्छता का अर्थ तीक्ष्णता नहीं लिया जा सकता । स्वच्छता के शब्द से ही यह बोध होता है कि चन्द्रमा की ज्योति स्वच्छ या स्पष्ट होती है इसलिए बारहवाँ भाग भी ग्रस्त हो तो स्वच्छतापूर्वक स्पष्ट देखा जा सकता है । जैसा अर्थ मैंने ऊपर लिखा है वैसा ही अर्थ श्री विज्ञानानन्द स्वामी ने अपने बंगला अनुवाद के पृष्ठ २०३ पर किया है । इस सम्बन्ध में भास्कराचार्य१, ब्रह्मगुप्त इत्यादि ने लिखा है कि चंद्रमा के १६वें भाग से कम ग्रहण हो तो नहीं देखा जा सकता और सूर्य के १२वें भाग से कम ग्रहण हो तो नहीं देखा जा सकता । इससे भी सूर्य-सिद्धान्त के पूर्वोक्त श्लोक का अर्थ वही ठीक जान पड़ता है जो मैंने किया है । ब्रह्मगुप्त जी ने स्वच्छता का शब्द इसी अर्थ में प्रयोग किया है जैसा कि इनके अवतरणों से प्रकट होता है । छादक के केन्द्र का मार्ग खींचना— स्वसंज्ञिताः त्रयः कार्या विक्षेपाग्रेषु विन्दवः । तत्र प्राङ्मध्ययोर्मध्ये तथा मौक्षिक मध्ययोः ॥१४॥ लिखेन्मत्स्यो तयोर्मध्यमुखपुच्छविनिर्गतम् । प्रसार्य सूत्र द्वितयं तयोर्यंत्र युतिर्भवेत् ॥१५॥ सूत्रेण विलिखेद्वृत्तं तत्र विन्दुत्रयं स्पृशन् । स पन्था ग्राहकस्योक्तः तेनाऽसौ सम्प्रयास्यति ॥१६॥ १. इन्दोर्भागः षोडसः खण्डितोऽपि तेजः पुञ्जच्छन्नभावान्न लक्ष्यः । तेजस्तैक्ष्ण्यात् तीक्ष्णगोद्वादशांशो नादेश्योतोऽल्पोग्रहो बुद्धि मद्धिः ॥३७॥ —सिद्धान्त शिरोमणि, गणिताध्याय चन्द्रग्रहणाधिकार वलनादि शशिवदन्यद् ग्रहणं तैक्ष्ण्याद्रवेरनादेश्यम् । द्वादशभागादूनं स्वच्छत्वात् षोडशादिन्दोः ॥२०॥ —ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त; सूर्यग्रहणाधिकार

परिलेखाधिकार ५५७ अनुवाद—(१४) स्पर्श, मध्य और मोक्षकाल में ग्राहक का केन्द्र जहाँ-जहाँ होता है उन बिन्दुओं का पता विक्षेपाग्र बिन्दुओं से ही लगाया जाता है । इन तीन बिन्दुओं में से स्पर्श और मध्य बिन्दुओं से तथा मध्य और मोक्ष बिन्दुओं से (१५) मत्स्य बनावे । प्रत्येक मत्स्य को दो समान भागों में विभाजित करने वाली और उसके मुख और पुच्छ से होकर निकलने वाली रेखाएँ बढ़ाने पर जिस बिन्दु पर मिलती हैं (१६) उसको केन्द्र मानकर एक ऐसा धनु बनावे जो पूर्वोक्त तीन बिन्दुओं को स्पर्श करे तो इसी धनु पर ग्रहणकाल में छादक के केन्द्र का मार्ग होता है। विज्ञान भाष्य-- यदि दो बिन्दुओं में से प्रत्येक को केन्द्र मानकर दूसरे बिन्दु की दूरी पर दो धनु खींचे जाँय तो उनके बीच में जो क्षेत्र बनता है वह मछली के आकार का होता है। ऐसे आकार को तिमि या मत्स्य कहा जाता है (देखो पृष्ठ २२३) इसी प्रकार का मत्स्य बनाने का नियम १४वें श्लोक में बतलाया गया है। स्पर्श और मध्यकाल के छादक के केन्द्रों से तथा मध्य और मोक्षकाल के छादक के केन्द्रों से जो दो मत्स्य बनाए जाते हैं उनकी सामान्य जीवाएँ (common chords) बढ़ाने पर जिस बिन्दु पर मिलती हैं उसको छादक के केन्द्र के मार्ग का केन्द्र माना गया है और इसी केन्द्र से छादक के केन्द्रों को स्पर्श करने वाला धनु छादक के केन्द्र का मार्ग माना गया है। यह त्रिप्रश्नाधिकार के ४१वें श्लोक के भाभ्रम-रेखा के खींचने के नियम की तरह है, और उसी प्रकार स्थूल भी है। इस नियम से छादक के केन्द्र का जो मार्ग सिद्ध होता है उससे यथार्थ मार्ग का अंतर बहुत कम होता है। इसलिए आगे लिखे हुए श्लोकों के अनुसार इससे जो काम लिया जाता है वह व्यवहार के लिए पर्याप्त शुद्ध है। किसी इष्टकाल में ग्रहण का परिलेख खींचना - ग्राह्यग्राहकयोगाधार्त्प्रोज्झयेदिष्टग्रासमागतम् । अवशिष्टाङ्‌गुलसमां शलाकां मध्यविन्दुतः ॥१७॥ तमोमार्गोन्मुखों दद्याद्ग्रसतः प्रग्रहाश्रितम् । विमुञ्चतो मोक्षदिशं ग्राहकाध्वानमेव वा ॥१८॥ स्पृशेद्यत्र ततो वृत्तं ग्राहकार्धेन संलिखेत् । तेन ग्राह्यं यदाक्रान्तं तत्तदा ग्रासमादिशेत् ॥१९॥ अनुवाद-(१७) गणित से जाने गये इष्टकाल के ग्रास को मानैक्य खंड से घटाने पर जो शेष आवे उसके अंगुल बनाकर इसी के समान एक शलाका अथवा सीधी लकड़ी लेकर परिलेख के केन्द्र से (१८) यदि इष्टकाल ग्रहण के मध्यकाल से पहले हो तो स्पर्श बिन्दु की ओर और यदि इष्टकाल मध्यकाल के उपरान्त हो तो मोक्ष बिन्दु

५५८ सूर्य-सिद्धान्त की ओर छादक के केन्द्र के मार्ग पर रखो और देखो कि जब शलांका का एक सिरा केन्द्र पर है तब इसका दूसरा सिरा छादक के केन्द्र के मार्ग को कहाँ छूता है, (१६) जहाँ छुवे वहीं इष्टकाल में छादक का केन्द्र होगा । इसी विन्दु को केन्द्र मानकर छादक के व्यासार्ध से जो वृत्त खींचा जायगा वही इष्टकाल में छादक का बिम्ब होगा। यह छाद्य बिम्ब को जितना ढक लेगा उतना ही भाग इष्टकाल में ग्रस्त होगा और इस समय का जो परिलेख होगा वही इष्ट ग्रास का परिलेख होगा । विज्ञान भाष्य—यह काम आजकल परकार की सहायता से सहज ही हो सकता है । इन तीन श्लोकों का सार यह है कि जब हमें चन्द्रग्रहणाधिकार के श्लोक १८-२० के अनुसार इष्ट काल का ग्रास ज्ञात हो जाय तब इसका परिलेख कैसे खींचना चाहिए । पृष्ठ ४६१ के चित्र ६६ के संबंध में बतलाया गया है कि चन्द्रमा का ग्रस्त भाग ज झ = छझ + चज - च छ = मानैक्यार्ध - चन्द्रमा के केन्द्र से भूछाया के केन्द्र का अंतर । इसलिए यदि मानैक्यार्ध से ग्रस्त भाग घटाया जाय तो छादक और छाद्य के केन्द्रों की दूरी ज्ञात हो सकती है। जब यह दूरी जान ली गयी और छाद्य का केन्द्र तथा छादक का मार्ग ज्ञात ही है तब छादक का स्थान जान लेना कुछ कठिन नहीं है। यदि परकार के दोनों भुजों की नोकों की दूरी छादक और छाद्य के केन्द्रों की दूरी के समान कर ली जाय और छाद्य के केन्द्र को केन्द्र मानकर एक धनु खींचा जाय तो यह छादक के मार्ग को दो बिन्दुओं पर काटेगा । जो विन्दु मध्यविन्दु से स्पर्शविन्दु की ओर होता है वहाँ छादक मध्यकाल के पहले रहता है और जो विन्दु मध्यविन्दु से मोक्ष विन्दु की ओर होता है वहाँ छादक मध्यकाल के पीछे रहता है । इस विन्दु को जानकर छादक के व्यासार्ध से जो वृत्त खींचा जायगा वह छाद्य को जहाँ तक ढक लेगा वही ग्रस्त भाग होगा । इस प्रकार किसी इष्टकाल का परिलेख सहज ही खींचा जा सकता है । सर्वग्रास ग्रहण के आरंभ या अंत का परिलेख खींचने की रीति— मानान्तरार्धकमितं शलाकां ग्रासदिक्मुखीम् । निमीलनाख्यां दद्यात्सा तन्मार्गे यत्र संस्पृशेत् ॥२०॥ तेतो ग्राहकखण्डेन प्राग्वन्मण्डलमालिखेत् । तद्ग्राह्यमण्डलयुतिर्यन्त्र तत्र निमीलनम् ॥२१॥ एवमुन्मीलने मोक्षदिक्मुखं संप्रसारयेत् । विलिखेन्मण्डलं प्राग्वदुन्मीलनमथोक्तवत् ॥२२॥ अनुवाद--(२०) परिलेख के केन्द्र से अर्थात् ग्राह्य बिम्ब के केन्द्र से मानान्तर खंड के समान एक शलाका छादक के मार्ग पर स्पर्शविन्दु की ओर इस प्रकार रखे

परिलेखाधिकार ५५६ कि शलाका का एक सिरा केन्द्र पर और दूसरा सिरा छादक के मार्ग को स्पर्श करे । इसी स्थान पर सम्मीलन के समय छादक का केन्द्र होता है । (२१) इसको केन्द्र मानकर ग्राहक के बिम्बार्ध के व्यासार्ध से जो वृत्त खींचा जायगा वह ग्राह्य बिम्ब के जिस बिन्दु पर स्पर्श करेगा उसी स्थान पर सम्मीलन का आरम्भ होगा । (२२) इसी प्रकार मानान्तर खंड के समान शलाका को मोक्ष बिन्दु की ओर रक्खा जाय तो शलाका का सिरा छादक के मार्ग को जहाँ स्पर्श करेगा उस बिन्दु को केन्द्र मानकर ग्राहक के व्यासार्ध के समान त्रिज्या से जो वृत्त खींचा जायगा वह ग्राह्य बिम्ब को जहाँ स्पर्श करेगा वहीं उन्मीलन होगा अर्थात् इसी बिन्दु से सर्वग्रास ग्रहण का अंत होगा । विज्ञान भाष्य—इसकी व्याख्या करने की बहुत आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह चित्र १०० से स्वयम् स्पष्ट है । सम्मीलन या उन्मीलन काल के समय छाद्य और छादक के केन्द्रों का अंतर मानान्तर खंड के समान होता है। इसलिए जब हमें छाद्य का केन्द्र, छादक का मार्ग तथा छाद्य, और छादक के केन्द्रों का अंतर ज्ञात है तब छादक का केन्द्र स्थिर करना कठिन नहीं हो सकता । हाँ, इतना ध्यान रखना चाहिए कि जब हमें सम्मीलन काल का परिलेख खींचना हो तब स्पर्श की दिशा में और जब उन्मीलन काल का परिलेख खींचना हो तब मोक्ष की दिशा में शलाका रखनी चाहिए । यह काम भी आजकल परकार से सहज ही लिया जा सकता है । परकार की दोनों नोकों का अंतर मानान्तर खंड के समान करके इसकी एक नोक को केन्द्र पर रखकर दूसरी नोक से एक धनु खींचे जो छादक के मार्ग को दो बिन्दुओं पर काटेगी । जो बिन्दु स्पर्श की ओर होगा वहीं सम्मीलन काल में छादक का केन्द्र होगा और जो बिन्दु मोक्ष की ओर होगा वहीं उन्मीलन काल में छादक का केन्द्र होगा । जब छादक का केन्द्र स्थिर कर लिया गया तब छादक के बिम्बार्ध के समान त्रिज्या से वृत्त खींचकर सर्वग्रास ग्रहण के आरंभ और अंत का स्थान जान लेना कुछ भी कठिन नहीं होता । ग्राह्य बिम्ब का रंग कैसा होता है-- अर्धादूनं च धूम्रं स्यात्कृष्णमर्धाधिकं भवेत् । विमुञ्चतः कृष्णधूम्रं कपिल सकलग्रहे ।।२३।। अनुवाद—(२३) जब चन्द्र बिम्ब का आधे से कम भाग ग्रस्त होता है तब ग्रस्त भाग का रंग धुएँ की तरह होता है । आधे से अधिक ग्रस्त होने पर ग्रस्त भाग काला देख पड़ता है । जब चन्द्र विम्ब का बहुत सा भाग ग्रस्त हो जाता है और थोड़ा ही सा बचा रहता है तब ग्रस्त भाग का रंग लाली लिये हुए काला होता है। परन्तु

५६० सूर्य-सिद्धान्त सर्वग्रास ग्रहण का रंग लाली हुए भूरा होता है। (सूर्यग्रहण में सूर्य के ग्रस्त भाग का रंग सदैव काला होता है ।) विज्ञान भाष्य—जब तक चन्द्रमा का प्रकाश तेज रहता है तब तक इसकी तुलना में ग्रस्त भाग का रंग धूम्र या काला देख पड़ता है। परन्तु जब चन्द्रमा का थोड़ा ही सा भाग बचा रहता है तब इसका प्रकाश तेजरहित हो जाता है। इसलिए ग्रस्त भाग का रंग कुछ-कुछ लाल भी देख पड़ता है। लाली का कारण यह है कि सूर्य का सूक्ष्म प्रकाश वायुमंडल से वर्तित होकर चन्द्र बिम्ब पर पड़ता है इसलिए काले ग्रस्त भाग पर कुछ लाली आ जाती है। जिस समय पूरा चन्द्र बिम्ब छाया में आ जाता है उस समय चन्द्र बिम्ब काला न होकर लाली लिए हुए भूरा देख पड़ता है। इसका कारण भी सूर्य का वर्तित प्रकाश है जो पृथ्वी के वायुमण्डल से घूमकर चन्द्रमा पर पड़ता है। यदि वायुमण्डल न होता तो चन्द्रमा के ग्रस्त भाग का रंग भी सदैव काला ही होता जैसा कि ग्रस्त सूर्य का रंग होता है। वायुमण्डल के वर्तन के कारण कभी-कभी एक आश्चर्यजनक घटना और भी देख पड़ती है। उदय या अस्त काल में जब ग्रहण लगता है तब कभी-कभी चमकते हुए सूर्य की उपस्थिति में ग्रस्त चन्द्रमा देख पड़ता है जिससे एक ओर चन्द्रमा में ग्रहण लगा रहता है और दूसरी ओर सूर्य अपने तेज से पृथ्वी को प्रकाशमान किये रहता है। ऐसी १ घटनाएँ सन् १६६६, १६६८ और १७५० ईस्वी में देख पड़ी थीं । परिलेख खींचने का रहस्य गुप्त रखना चाहिए— रहस्यमेतद्देवानां न देयं यस्य कस्यचित् । सुपरीक्षितशिष्याय दातव्यं ज्ञानमुत्तमम् ॥२४॥ अनुवाद—(२४) परिलेख खींचने की विद्या देवताओं की गोप्य वस्तु है। यह विद्या ऐसे-वैसे आदमी को न बतलानी चाहिए । अच्छी तरह परीक्षा किये हुए शिष्य को यह उत्तम विद्या बतलानी चाहिए । विज्ञान भाष्य—इसका सार यही जान पड़ता है कि परिलेख खींचने की रीति सुगमतापूर्वक समझ में नहीं आ सकती इसलिए जो इसके तत्व को अच्छी तरह नहीं समझ सकता उसको बतलाने से कोई लाभ नहीं है। इस विद्या का अधिकारी वही शिष्य हो सकता है जो इसके रहस्य को समझ सकता है । परिलेखाधिकार नामक ६ठे अध्याय का अनुवाद समाप्त हुआ । १. देखो Parker's Astronomy, page 171.

परिलेखाधिकार ५६१ अब चन्द्रग्रहण का परिलेख खींचने का एक उदाहरण देकर यह बतलाया जायगा कि पाश्चात्य अर्वाचीन ज्योतिषी सूर्य-ग्रहण की गणना कैसे करते हैं और यह कैसे मालूम करते हैं कि भूभाग के किन किन स्थानों में सर्वग्रास ग्रहण देख पड़ता है तथा किन-किन स्थानों में कितना ग्रास देख पड़ता है। इसके उपरान्त संक्षेप में यह भी बतलाया जायगा कि खाल्दिया और यूनान देश वाले ग्रहण की गणना कैसे करते थे । सूर्य-ग्रहण का परिलेख खींचने का उदाहरण विस्तारभय से छोड़ दिया जाता है। उदाहरण—संवत् १९८१ वि० की श्रावणी पूर्णिमा के चंद्रग्रहण का परिलेख खींचना — यह तो प्रकट ही है कि परिलेख खींचने के लिए तात्कालिक स्फुटवलन और चन्द्रमा के शर के ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है और छादक ग्रह के केन्द्र का मार्ग खींचने के लिए स्पर्शकाल, मध्यकाल और मोक्षकाल के स्फुटवलनों और चंद्र-शरों के ज्ञान की आवश्यकता होती है। इनमें से स्पर्श और मोक्षकाल के स्फुटवलनों की गणना चन्द्रग्रहणाधिकार पृष्ठ ४९९-५०५ में की गयी है। इसलिए अब ग्रहण के मध्यकाल के स्फुटवलन की गणना भी कर लेनी चाहिये । आक्षवलन की गणना चन्द्रमा का पूर्णिमान्तकालिक शर = ८.७६ अथवा ८.८ कला (पृष्ठ ४९५) पूर्णिमान्तकालिक चंद्र-भोगांश २९८°३४' (पृष्ठ ४९५) अयनांश २२°४०' (पृष्ठ ४९८-४९९) पूर्णिमांतकालिक चन्द्र सायनभोग ३२१°१४' पूर्णिमान्तकालिक चन्द्र मध्यम कान्तिज्या =ज्या २३°२७' ज्या ३२१°१४' =•३९७६ X ज्या ३८°४६' =•३९७६ X •६२६१ =•२४६१ ∴ पूर्णिमान्तकालिक चन्द्र माध्यम क्रान्ति = १४°२५'•३ दक्षिण ,, ,, शर ८'•८ उत्तर ∴ ,, ,, स्पष्ट क्रान्ति = १४°१६'•५ दक्षिण काशी के सूर्योदय से स्पर्शकाल तक का समय = ४५ घड़ी ५४ पल स्थित्यर्ध = ४ '' ४२ '' सूर्योदय से ग्रहण के मध्यकाल का समय = ५० '' ३६ '' सूर्योदय से मध्यरात्रि का समय (पृष्ठ ५००) = ४६ ११ मध्यरात्रि के उपरान्त ग्रहण का मध्यकाल = ४ '' २५ ''

५६२ सूर्य-सिद्धान्त इसलिए ग्रहण के मध्यकाल में पृथ्वी की छाया के केन्द्र का 'पश्चिम नतकाल ४ घड़ी २५ पल अथवा २६५ पल या १५६० असु हुआ । यही मध्यग्रहणकालिक चन्द्रमा का भी नतकाल हुआ क्योंकि इस समय भूछाया और चन्द्रमा के केन्द्रों के भोगांश समान होते हैं। इसलिए मध्यग्रहणकालिक चन्द्रमा का नतकाल = १५६० असु = १५६०' = २६°३०' चन्द्रमा की मध्यग्रहणकालिक चर ज्या = स्परे २५°२०' स्परे १४°१६'·५ = ·४७३४ x ·२५४४ = ·१२०४ ∵ मध्यग्रहणकालिक चरांश = ६°५५' पृष्ठ २६२ के समीकरण (ग) के अनुसार, मध्यकाल के चन्द्रमा की नतांश कोटिज्या = (कोज्या २६°३०' - ज्या ६°५५') x कोज्या २५°२०' x कोज्या १४°१६'·५ = (·८६४६ - ·१२०४) x ·६०३८ x ·६६६१ = ·७७४५ x ·६०३८ x ·६६६१ = ·६७८४ ∴ मध्यग्रहणकालिक नतांश = ४७°१७' पृष्ठ २७६ के अनुसार, ज्या अग्रा = ज्या १४°१६'·५ / ज्या ४७°१७' x कोज्या २५°२०' + कोस्परे ४७°१७' x स्परे २५°२०' = ·२४६५ / ·७३४७ x ·६०३८ + ·६२३३ x ·४७३४ = ·३७१२ + ·४३७१ = ·८०८३ ∴ अग्रा = ५३°५६' ∴ पश्चिम विन्दु से चन्द्रमा का मध्यग्रहणकालीन दिगंश = ५३°५६' दक्षिण ∵ चित्र १०१ के अनुसार, स्परे (ख उ ग) = अग्रा कोटिज्या x नतांश स्पर्शरेखा = कोज्या ५३°५६' स्परे ४७°१७' = ·५८८७ x १·०८३१ = ·६३७६

परिलेखाधिकार ५६३ ∵ ख उ ग = ३२° ३१' ∴ मध्यकालिक चन्द्रमा के समप्रोतवृत्त का नतांश = ३२° ३१' ∴ ज्या (आक्षवलन) = ज्या ३२° ३१' × ज्या २५° २०' / कोज्या १४° १६'·५ = ·५३७५ × ·४२७६ / ·९६६१ = ·२३०० / ·९६६१ = ·२३७३ ∴ आक्षवलन = १३° ४४' दक्षिण, क्योंकि चन्द्रमा पच्छिम कपाल में है। मध्यग्रहणकालिक चन्द्रमा का सायन भोगांश = ३२१° १४' इसमें ६०° जोड़ने पर चन्द्रमा का सायन भोगांश = ५१° १४' जिसकी क्रान्ति उत्तर होगी इसलिए आयनवलन उत्तर होगा। ज्या (आयनवलन) = ज्या २३° २७' × ज्या ५१° १४' / कोज्या १४° १६'·५ = ·३९७६ × ·७७६७ / ·९६६१ = ·३१०२ / ·९६६१ = ·३२०१ ∴ आयनवलन = १८° ४०' उत्तर इसलिए मध्यग्रहणकालिक स्फुटवलन = १३° ४४' दक्षिण + १८° ४०' उत्तर = ४° ५६' उत्तर इसलिए स्पर्श, मध्य और मोक्षकाल के परिलेख के आवश्यक अङ्क यह हुए :- स्पर्शकाल सम्बन्धी— स्फुटवलन = १६° १०' उत्तर (पृष्ठ ५०४) ∵ ज्या १६° १०' = ११२८'' = ११२८ / ७० = १६ अंगुल चन्द्रशर = १४'·६ उत्तर (पृष्ठ ५००) = १४·६ / ३ अंगुल = ४·८७ अंगुल

५६४ सूर्य-सिद्धान्त मध्यकाल सम्बन्धी— स्फुटवलन = ४° ५६' उत्तर ∵ ज्या स्फुटवलन = ज्या ४° ५६' = २४६' = २४६ / ७० = ४·२३ अंगुल चन्द्रशरः = = ८'·८ उत्तर (पृष्ठ ४६५) = ८·८ / ३ = २·६३ अंगुल मोक्ष काल सम्बन्धी— स्फुटवलन = ३° ५६' दक्षिण (पृष्ठ ५०५) ∵ ज्या ३° ५६' = २३६' = २३६ / ७० = ३·४ अंगुल चन्द्रशर = ३' उत्तर (पृष्ठ ५००) = १ अंगुल

[चित्र के अक्षर / लेबल:] ख, उ, सू, सू, क, ढ, वू, प, मा, वी, मो, च, उ, म, सां, नि, सवि, पू, पु, पू, द, वा

चित्र १०३

परिलेखाधिकार ५६५ उ पू द प = वलनाश्रित वृत्त उ, पू, द, प, = उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पच्छिम विन्दु स वि वी मा = समासवृत्त जिसका व्यासार्ध मानैक्य खंड के समान है सबसे छोटा वृत्त = चन्द्रविम्ब च = चन्द्रविम्ब, समास वृत्त और वलनाश्रित वृत्त का केन्द्र च व = वलनाग्र रेखा अथवा वलनाश्रितवृत्त की त्रिज्या जिसका पूर्व विन्दु से अन्तर स्पर्शकाल के स्फुट वलन की ज्या पू क के समान है पू च व = स्पर्शकालिक वलन व = स्पर्शकाल का वलनाग्र विन्दु स = स्पर्शकाल की वलनाग्र रेखा और समासवृत्त का युतिविन्दु स वि = स्पर्शकालिक चन्द्रविक्षेप या शर । यह वलनाग्र रेखा के दक्षिण की ओर खींचा गया है क्योंकि चन्द्रशर उत्तर है और यह परिलेख चन्द्रग्रहण का है (श्लोक ८) वि = स्पर्शकालिक विक्षेपाग्र विन्दु अथवा स्पर्शकालिक भूछाया का केन्द्र वि च = स्पर्शकालिक विक्षेपाग्र रेखा सा = विक्षेपाग्र रेखा और चन्द्रविम्ब का युति-विन्दु अथवा ग्रहण का स्पर्श विन्दु द च वा = मध्यग्रहणकालिक वलन च वा = मध्यग्रहणकालिक वलनाग्र रेखा (श्लोक ६) च म = च वा रेखा पर मध्यग्रहणकालिक चन्द्र विक्षेप (श्लोक १०) म = मध्य ग्रहण काल में भूछाया का केन्द्र । इसको केन्द्र मानकर भूछाया के व्यासार्ध से जो वृत्त खींचा जाता है उसी से मध्यकालिक या परम ग्रास का परिमाण जाना जाता है । प च वू = मोक्षकालिक वलन च वू = मोक्षकालिक वलनाग्र रेखा मा = मोक्ष काल की वलनाग्र रेखा और समास वृत्त का युतिविन्दु मा वी = मोक्षकालिक चन्द्र विक्षेप । यह भी वलनाग्र रेखा के दक्षिण की ओर खींचा गया है च वी = मोक्षकालिक विक्षेपाग्र रेखा मी = मोक्षकालिक विक्षेपाग्र रेखा और समासवृत्त का युतिविन्दु अथवा ग्रहण का मोक्षविन्दु वी = मोक्षकालिक भूछाया का केन्द्र

५६६ सूर्य-सिद्धान्त मु, पु = मध्य ग्रहण तथा मोक्षकाल के भूछाया के केन्द्रों म और वी पर खींचे हुए मत्स्य के मुख और पुच्छ विन्दु मू पू = मध्य ग्रहण तथा स्पर्शकाल के भूछाया के केन्द्रों म और वि पर खींचे हुए मत्स्य के मुख और पुच्छ विन्दु ख = मु पु और मू पू का युति-विन्दु वि म वी = ख को केन्द्र और ख वि को त्रिज्या मानकर खींचा हुआ धनु जो ग्रहण काल में भूछाया के केन्द्र का मार्ग है (श्लोक १४-१६) च नि अथवा च उ = मानान्तर खंड नि = निमीलन या सम्मीलन काल में भूछाया का केन्द्र । इसको केन्द्र मान कर भूछाया के व्यासार्ध से जो वृत्त खींचा जाता है वह चन्द्रविम्ब को जिस विन्दु पर स्पर्श करता है वहीं सर्वग्रास ग्रहण का आरंभ होता है। (श्लोक २०-२१) उ = उन्मीलन काल में भूछाया केन्द्र । इसको केन्द्र मानकर भूछाया के व्यासार्ध से जो वृत्त खींचा जाता है वह चन्द्र-विम्ब को जिस विन्दु पर स्पर्श करता वहीं सर्वग्रास का अन्त होता है। (श्लोक २२) सब के लिए (देखो पृष्ठ ४६०) भू भा का व्यासार्ध = ४३'·६७ = ४३·६७/३ = १४·५६ अंगुल चन्द्रविम्ब का व्यासार्ध = १६'·६६ = १६·६६ ÷ ३ = ५·५५ अंगुल मानैक्य खंड = ६०'·६३ = ६०·६३ ÷ ३ = २०·२१ अंगुल मानान्तर खंड = २७'·३१ = २७·३१ ÷ ३ = ९·१ अंगुल यहाँ मैंने विम्बों या शरों का अंगुलात्मक परिमाण जानने के लिए प्रत्येक को ३ से भाग दिया है और ३ कला का अंगुल समझा है जैसा कि ऊपर श्लोक ३ के विज्ञान भाष्य में बतलाया गया है। इस परलेख में वलनाश्रित वृत्त का एक अंगुल १ मिलीमीटर के समान लिया जाता है और अन्य वृत्तों या शरों के खींचने के लिए एक अंगुल डेढ़ मिलीमीटर के समान माना जाता है । अर्वाचीन रीति से स्पर्शबिन्दु की दिशा की गणना— पाश्चात्य ज्योतिषी समप्रोत वृत्त की दिशा से स्पर्शविन्दु की दिशा की गणना नहीं करते वरन् ध्रुवप्रोत वृत्त की दिशा से स्पर्श या मोक्ष विन्दु की दिशा की गणना करते हैं। इसलिए इनकी गणना में स्फुटवलन के जानने की आवश्यकता नहीं पड़ती । नीचे संक्षेप में यह रीति भी बतला दी जाती है :—

परिलेखाधिकार ५६७ चित्र १०४ छ = भू छाया का केन्द्र ध = उत्तरी आकाशीय ध्रुव च = स्पर्शकाल में चन्द्रमा का केन्द्र चा = मोक्षकाल में चन्द्रमा का केन्द्र स = स्पर्शविन्दु म = मोक्ष विन्दु च उ ध = स्पर्श काल के चन्द्रमा के केन्द्र का ध्रुवप्रोत वृत्त चा ऊ ध = मोक्षकाल के " " " उ = स्पर्शकाल के चन्द्रबिम्ब का उत्तर विन्दु ऊ = मोक्षकाल के " "

५६८ सूर्य-सिद्धान्त छ ल या छ ला = छ से चन्द्र केन्द्र के ध्रुवप्रोतवृत्त का लम्बान्तर (Perpen- dicular distance) ∠ उ च स = चन्द्रमा के उत्तर विन्दु से पूर्व की ओर स्पर्श विन्दु की दिशा ∠ ऊ चा म = चन्द्रमा के उत्तर विन्दु से पच्छिम की ओर मोक्ष विन्दु की दिशा च ध = स्पर्शकाल में चन्द्रबिम्ब के केन्द्र का ध्रुवांतर = ९०° - चन्द्रमा की स्पर्श कालिक क्रान्ति छ ध = भूछाया के केन्द्र का ध्रुवान्तर = ९०° -- भूछाया की क्रान्ति चा ध = मोक्षकाल में चन्द्रबिम्ब के केन्द्र का ध्रुवान्तर = ९०° - चंद्रमा की मोक्षकालिक क्रान्ति यह स्पष्ट है कि स्पर्श या मोक्षकाल में चन्द्रमा भूछाया के बहुत निकट रहता है और इन दोनों की दूरी च छ मानैक्यखंड के समान होती है जिसका परिमाण एक अंश के लगभग होता है इसलिए इसकी तुलना में चन्द्रमा या भूछाया का ध्रुवान्तर छ ध बहुत होता हैं। इसलिए छ ल, छ च या छ ला, छ चा धनु को सीधी रेखाएँ तथा गोलीय त्रिभुज च छ ल या चा छ ला को सरल त्रिभुज (Plane triangle) मान लेने में कोई हानि नहीं हो सकती । इसी तर्क से छ ध को ल ध के समान माना जा सकता है क्योंकि च ध पर छ ल लम्ब खींचा गया है । इसलिये यदि चन्द्रमा की क्रान्ति क और भूछाया की क्रान्ति का हो तो, च ल = च ध - ध ल = च ध - छ ध यदि चन्द्रमा और भूछाया दोनों की क्रान्तियाँ उत्तर हों तो, च ध - छ ध = (९०° - क) - (९०° - का) = का - क और यदि दोनों की क्रान्तियां दक्खिन हों तो, च ध - छ ध = (९०° + क) - (९०° + का) = क - का == - का - (- क) अर्थात् दोनों दशाओं में च ल का परिमाण जानने के लिए भूछाया की क्रान्ति से चन्द्रमां की क्रान्ति घटानी चाहिए । यह याद रखना चाहिए कि उत्तर क्रान्ति धनात्मक और दक्षिण क्रान्ति ऋणात्मक लिखी जाय । ∴ कोज्या उ च स = कोज्या ल च छ = च ल / च छ = (का - क) / मानैक्य खंड = (भूछाया की क्रान्ति - चन्द्रमा की क्रान्ति) / मानैक्य खंड