स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
गोबर गैस से चलाकर दिखा दी ॥ जज ने तीन महीने गाड़ी चलाई और ये सब देख अपने दाँतों तले उंगली दबा ली ॥ अधिक जानकारी आपको राजीव भाई के व्याख्यान में मिलेगी ॥ ( Gau Hatya Rajniti Supreme Court mein ladai at Aurngabad.mp3)
राजीव भाई को जब पता चला कि रासायनिक खाद बनाने वाली कंपनियों के बाद देश की सबसे अधिक हजारों करोड़ रुपए की लूट दवा बनाने वाली सैकड़ों विदेशी कंपनियाँ कर रही है । और इसके इलावा ये बड़ी बड़ी कंपनियाँ वो दवाये भारत में बेच रहे हैं जो अमेरिका और यूरोप के बहुत से देशों में बैन है और जिससे देशवासियों को भयंकर बीमारियाँ हो रही है तब राजीव भाई ने इन कंपनियों के खिलाफ भी आंदोलन शुरू कर दिया ॥ राजीव भाई ने आयुर्वेद का अध्ययन किया और 3500 वर्ष पूर्व महाऋषि चरक के शिष्य वागभट्ट जी को महीनों महीनों तक पढ़ा, और बहुत ज्ञान अर्जित किया । फिर घूम घूम कर लोगों को आयुर्वेदिक चिकित्सा के बारे में बताना शुरू किया की कैसे बिना दवा खाये आयुर्वेद के कुछ नियमों का पालन कर हम सब बिना डॉक्टर के स्वस्थ रह सकते हैं और जीवन जी सकते हैं इसके अलावा हर व्यक्ति अपने शरीर की 85% चिकित्सा स्वयं कर सकता है ॥ राजीव भाई खुद इन नियमों का पालन 15 वर्ष से लगातार कर रहे थे जिस कारण वे पूर्ण स्वस्थ थे 15 वर्ष तक किसी डॉक्टर के पास नहीं गए थे ॥ वो आयुर्वेद के इतने बड़े ज्ञाता हो गए थे कि लोगों की गम्भीर से गम्भीर बीमारियाँ जैसे शुगर, बीपी, दमा, अस्थमा, हार्ट ब्लॉकेज, कोलेस्ट्रॉल आदि का इलाज करने लगे थे और लोगों को सबसे पहले बीमारी होने का असली कारण समझाते थे और फिर उसका समाधान बताते थे ॥ लोग उनके हेल्थ के लेक्चर सुनने के लिए दीवाने हो गए थे इसके इलावा वो होमोपैथी चिकित्सा के भी बड़े ज्ञाता थे होमोपैथी चिकित्सा में तो उन्हें डिग्री भी हासिल थी ॥
एक बार उनको खबर मिली कि उनके गुरु धर्मपाल जी को लकवा का अटैक आ गया है और उनके कुछ शिष्य उनको अस्पताल ले गए थे । राजीव भाई ने जाकर देखा तो उनकी आवाज पूरी जा चुकी थी हाथ पाँव चलने पूरे बंद हो गए थे । अस्पताल में उनको बांध कर रखा हुआ था । राजीव भाई धर्मपाल जी को घर ले आए और उनको एक होमियोपैथी दवा दी मात्र 3 दिन उनकी आवाज वापिस आ गई और एक सप्ताह में वो वैसे चलने फिरने लगे कि कोई देखने वाला मानने को तैयार नहीं था कि इनको कभी लकवा का अटैक आया था ॥ कर्नाटक राज्य एक बार बहुत भयंकर चिकन-गुनिया फैल गया हजारों की संख्या में लोग मरे । राजीव भाई अपनी टीम के साथ वहाँ पहुँच कर हजारों हजारों लोगों इलाज करे मृत्यु से बचाया । ये देख कर कर्नाटक सरकार ने अपनी डॉक्टरों की टीम राजीव भाई के पास भेजी और कहा कि जाकर देखो कि वो किस ढंग से इलाज कर रहे हैं । (अधिक जानकारी के लिए आप राजीव भाई के हेल्थ के लेक्चर सुन सकते हैं घंटो घंटो उन्होने स्वस्थ रहने और रोगों की चिकित्सा के व्याख्यान दिये हैं)
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इसके इलावा राजीव भाई ने यूरोप और भारत की स्मृति संस्कृति और इनकी भिन्नताओं पर गहरा अध्ययन किया और लोगों को बताया कि कैसे भारतवासी यूरोप के लोगों की मजबूरी को अपना फैशन बना रहे हैं और कैसे उनकी नकल कर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं ।। राजीव भाई का कहना था कि देश में आधुनिकीकरण के नाम पर पश्चिमीकरण हो रहा है । और इसका एक मात्र कारण देश में चल रहा अंग्रेज मैकॉले का बनाया हुआ Indian Education System है । क्योंकि आजाद भारत में सारे कानून अंग्रेजों के चल रहे हैं इसी लिए ये मैकॉले द्वारा बनाया गया शिक्षा तंत्र भी चल रहा है ।
राजीव भाई कहते थे कि इस अंग्रेज मैकॉले ने जब भारत का शिक्षा तंत्र का कानून बनाया और शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार किया तब इसने एक बात कही कि मैंने भारत का शिक्षा तंत्र ऐसा बना दिया है की इसमें पढ़ के निकलने वाला व्यक्ति शकल से तो भारतीय होगा पर अकल से पूरा अंग्रेज होगा हो उसकी आत्मा अंग्रेजों जैसी होगी उसको भारत की हर चीज में पिछड़ापन दिखाई देगा ।। और उसको अंग्रेज और अंग्रेजियत ही सबसे बढ़िया लगेगी ।।
इसके इलावा राजीव भाई का कहना था कि इसी अंग्रेज मैकॉले ने भारत की न्याय व्यवस्था को तोड़ कर IPC, CPC जैसे कानून बनाये और उसके बाद ब्यान दिया की मैंने भारत की न्याय पद्धति को ऐसा बना दिया है कि इसमें किसी गरीब को ईसाफ नहीं मिलेगा । सालों साल मुकदमे लटकते रहेंगे ।। मुकदमों के सिर्फ फैसले आएंगे न्याय नहीं मिलेगा ।। इस अंग्रेज शिक्षा पद्धति और अंग्रेजी न्यायव्यवस्था के खिलाफ लोगों को जागरूक करने के लिए राजीव भाई ने मैकॉले शिक्षा और भारत की प्राचीन गुरुकुल शिक्षा पर बहुत व्याख्यान दिये और इसके अतिरिक्त अपने एक मित्र आजादी बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता पवन गुप्ता जी के साथ मिल कर एक गुरुकुल की स्थापना की वहाँ वो फेल हुए बच्चों को ही दाखिल करते थे कुछ वर्ष उन बच्चों को उन्होंने प्राचीन शिक्षा पद्धति से पढ़ाया । और बच्चे बाद में इतने ज्ञानी हो गए की आधुनिक शिक्षा में पढ़े बड़े बड़े वैज्ञानिक उनके आगे दाँतों तले उंगली दबाते थे ।
राजीव जी ने रामराज्य की कल्पना को समझना चाहा । इसके लिए वे भारत अनेकों साधू संतों, रामकथा करने वालों से मिले और उनसे पूछते थे की भगवान श्री राम रामराज्य के बारे क्या कहा है ?? लेकिन कोई भी उत्तर उनको संतुष्ट नहीं कर पाया । फिर उन्होंने भारत में लिखी सभी प्रकार की रामायणों का अध्ययन किया और खुद ये हैरान हुए कि रामकथा में से भारत की सभी समस्याओं का समाधान निकलता है । फिर राजीव भाई घूम घूम कर खुद रामकथा करने लगे और उनकी रामकथा सभी संत और बाबाओं से अलग होती वो सिर्फ उसी बात पर अधिक चर्चा करते जिसे अन्य सत्य तो बताते नहीं या वो खुद ही ना जानते हैं । राजीव भाई लोगों को बताते कि किस प्रकार रामकथा में भारत की सभी समस्याओं का समाधान निकलता है । (इस बारे में अधिक जानकारी के लिए आप राजीव भाई की रामकथा वाला व्याख्यान सुन सकते हैं)
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2009 में राजीव भाई बाबा रामदेव के संपर्क में आए और बाबा रामदेव को देश की गंभीर समस्याओं और उनके समाधानों से परिचित करवाया और विदेशों में जमा कालेधन आदि के विषय में बताया और उनके साथ मिल कर आंदोलन को आगे बढ़ाने का फैसला किया ॥ आजादी बचाओ के कुछ कार्यकर्ता राजीव भाई के इस निर्णय से सहमत नहीं थे ॥ फिर भी राजीव भाई ने 5 जनवरी 2009 को भारत स्वाभिमान आंदोलन की नींव रखी ॥ जिसका मुख्य उद्देश्य लोगों को अपनी विचार धारा से जोड़ना, उनको देश की मुख्य समस्याओं का कारण और समाधान बताना ॥ योग और आयुर्वेद से लोगों को निरोगी बनाना और भारत स्वाभिमान आंदोलन के साथ जोड़ कर 2014 में देश से अच्छे लोगों को आगे लाकर एक नई पार्टी का निर्माण करना था जिसका उद्देश्य भारत में चल रही अंग्रेजी व्यवस्थाओं को पूर्ण रूप से खत्म करना, विदेशों में जमा काला धन, वापिस लाना, गौ हत्या पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाना, और एक वाक्य में कहा जाए ये आंदोलन सम्पूर्ण आजादी को लाने के लिए शुरू किया गया था ॥
राजीव भाई के व्याख्यान सुन कर मात्र ढाई महीने में 6 लाख कार्यकर्ता पूरे देश में प्रत्यक्ष रूप में इस अंदोलन से जुड़ गए थे राजीव भाई पंतजलि में भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ताओं के बीच व्याख्यान दिया करते थे जो पंतजलि योगपीठ के आस्था चैनल पर के माध्यम से भारत के लोगों तक पहुंचा करते थे इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से भारत स्वाभिमान अंदोलन के साथ 3 से 4 करोड़ लोग जुड़ गए थे । फिर राजीव भाई भारत स्वाभिमान आंदोलन के प्रतिनिधि बनकर पूरे भारत की यात्रा पर निकले गाँव-गाँव शहर-शहर जाया करते थे पहले की तरह व्याख्यान देकर लोगों को भारत स्वाभिमान से जुड़ने के लिए प्रेरित करते थे ॥
लगभग आधे भारत की यात्रा करने के बाद राजीव भाई 26 नवंबर 2010 को उड़ीसा से छत्तीसगढ़ राज्य के एक शहर रायगढ़ पहुंचे वहाँ उन्होंने 2 जन सभाओं को आयोजित किया । इसके पश्चात अगले दिन 27 नवंबर 2010 को जंजगीर जिले में दो विशाल जन सभाएं की इसी प्रकार 28 नवंबर बिलासपुर जिले में व्याख्यान देने से पश्चात 29 नवंबर 2010 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में पहुंचे । उनके साथ छत्तीसगढ़ के राज्य प्रभारी दया सागर और कुछ अन्य लोग साथ थे । दुर्ग जिले में उनकी दो विशाल जन सभाएं आयोजित थी पहली जनसभा तहसील बेमतरा में सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक थी । राजीव भाई ने विशाल जन सभा को आयोजित किया ॥ इसके बाद का कार्यक्रम सायं 4 बजे दुर्ग में था ॥ जिसके लिए वह दोपहर 2 बजे बेमतरा तहसील से रवाना हुए ।
(इसके बात की घटना विश्वास योग्य नहीं है इसके बाद की सारी घटना उस समय उपस्थित छत्तीसगढ़ के प्रभारी दयासागर और कुछ अन्य साथियों द्वारा बताई गई है) उन लोगों का कहना है गाड़ी में बैठने के बाद उनका शरीर पसीना पसीना हो गया । दयासागर ने राजीव जी से पूछा तो जवाब मिला की मुझे थोड़ी गैस सीने में चढ़ गई है शोचलाय जाऊँ तो ठीक हो जाऊंगा । फिर दयासागर तुरंत उनको दुर्ग के अपने आश्रम में ले गए वहाँ राजीव भाई शोचालय गए और जब कुछ देर बाद बाहर नहीं आए तो दयासागर ने उनको आवाज दी राजीव भाई ने दबी दबी आवाज में कहा गाड़ी स्टार्ट करो मैं निकल रहा हूँ । जब काफी देर
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बाद राजीव भाई बाहर नहीं आए तो दरवाजा खोला गया राजीव भाई पसीने से लथपत होकर नीचे गिरे हुए थे। उनको बिस्तर पर लिटाया गया और पानी छिड़का गया दयासागर ने उनको अस्पताल चलने को कहा। राजीव भाई ने मना कर दिया उन्होंने कहा होमियोपैथी डॉक्टर को दिखाएंगे। थोड़ी देर बाद होमियोपैथी डॉक्टर आकर उनको दवाईयाँ दीं। फिर भी आराम ना आने पर उनको भिलाई से सेक्टर 9 में इस्प्यात स्वयं अस्पताल में भर्ती किया गया। इस अस्पताल में अच्छी सुविधाइए ना होने के कारण उनको। अच्छे हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया। राजीव भाई एलोपैथी चिकित्सा लेने से मना करते रहे। उनका संकल्प इतना मजबूत था कि वो अस्पताल में भर्ती नहीं होना चाहते थे। उनका कहना था कि सारी जिंदगी एलोपैथी चिकित्सा नहीं ली तो अब कैसे ले लू?। ऐसा कहा जाता है कि इसी समय बाबा रामदेव ने उनसे फोन पर बात की और उनको आईसीयु में भर्ती होने को कहा।
फिर राजीव भाई 5 डॉक्टरों की टीम के निरीक्षण में आईसीयु भर्ती करवाएंगे। उनकी अवस्था और भी गंभीर होती गई और रात्रि एक से दो के बीच डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित किया। (बेमेतरा तहसील से रवाना होने के बाद की ये सारी घटना राज्य प्रभारी दयासागर और अन्य अधिकारियों द्वारा बताई गई है अब ये कितनी सच है या झूठ ये तो उनके नार्को टेस्ट करने ही पता चलेगा।) क्योंकि राजीव जी की मृत्यु का कारण दिल का दौरा बता कर सब तरफ प्रचारित किया गया। 30 नवंबर को उनके मृत शरीर को पतंजलि लाया गया जहां हजारों की संख्या में लोग उनके। और 1 दिसंबर राजीव जी का दाह किया गया।
अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे संस्कार कनखल हरिद्वार में
राजीव भाई के चाहने वालों का मे राजीव जी का चेहरा पूरा हल्का नीला, काला पड़ गया था। उनके चाहने वालों ने बार-बार उनका पोस्टमार्टम करवाने का आग्रह किया लेकिन पोस्टमार्टम नहीं करवाया गया। राजीव भाई की मौत लगभग भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत से मिलती जुलती है आप सबको याद होगा ताशकंद से जब शास्त्री जी का मृत शरीर लाया गया था तो उनके भी चेहरे का रंग नीला, काला पड़ गया था। और अन्य लोगों की तरह राजीव भाई भी ये मानते थे कि शास्त्री जी को विष दिया गया था। राजीव भाई और शास्त्री जी की मृत्यु में एक जो समानता है कि दोनों का पोस्टमार्टम नहीं हुआ था। राजीव भाई ने अपने पूरे जीवन में देश भर में घूम घूम कर 5000 से ज्यादा व्याख्यान दिये। सन् 2005 तक वह भारत के पूर्व से पश्चिम उत्तर से दक्षिण चार बार भ्रमण कर चुके थे। उन्होंने विदेशी कंपनियों की नाक में दम कर रखा था।
भारत के किसी भी मीडिया चैनल ने उनको दिखाने का साहस नहीं किया। क्योंकि वह देश से जुड़े ऐसे मुद्दों पर बात करते थे की एक बार लोग सुन लें तो देश में 1857 से बड़ी क्रान्ति हो जाती। वह ऐसे ओजस्वी वक्ता थे जिनकी वाणी पर माँ सरस्वती साक्षात निवास करती थी। जब वे बोलते थे तो सोता घण्टों मन्त्र-मुग्ध होकर उनको सुना करते थे। 30
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नवम्बर 1967 को जन्मे और 30 नवंबर 2010 को ही संसार छोड़ने वाले ज्ञान के महासागर श्री राजीव दीक्षित जी आज केवल आवाज के रूप में हम सबके बीच जिंदा है उनके जाने के बाद भी उनकी आवाज आज देश के लाखों करोड़ों लोगों का मार्गदर्शन कर रही है और भारत को भारत की मान्यताओं के आधार पर खड़ा करने आखिरी उम्मीद बनी हुई है।
राजीव भाई को शत शत नमन ॥
पूरे Internet पर राजीव भाई के केवल 55 से 60 व्याख्यान ही उपलब्ध थे लेकिन उनके कुछ समर्थकों ने उनकी मृत्यु के बाद से दो ढाई साल की मेहनत कर जहां जहां राजीव भाई घूमे थे वहाँ अलग अलग लोगों से संपर्क कुल 150 व्याख्यान जुटा लिए हैं । जो नीचे दी गई website पर उपलब्ध है ॥
भारत की आजादी का असली इतिहास
आज से लगभग 400 साल पहले, वास्कोडीगामा आया था हिंदुस्तान, इतिहास की चोपड़ी में, इतिहास की किताब में हमसब ने पढ़ा होगा कि सन् 1498 में मई की 20 तारीख को वास्कोडीगामा हिंदुस्तान आया था।
इतिहास की चोपड़ी में हमको ये बताया गया कि वास्कोडीगामा ने हिंदुस्तान की खोज की, पर ऐसा लगता है कि जैसे वास्कोडीगामा ने जब हिंदुस्तान की खोज की, तो शायद उसके पहले हिंदुस्तान था ही नहीं। हजारों साल का ये देश है, जो वास्कोडीगामा के बाप दादाओं के पहले से मौजूद है इस दुनिया में, तो इतिहास कि चोपड़ी में ऐसा क्यों कहा जाता है कि वास्कोडीगामा ने हिंदुस्तान की खोज की,
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भारत की खोज की, और मैं मानता हूँ कि वो एकदम गलत है, वास्कोडीगामा ने भारत की कोई खोज नहीं की, हिंदुस्तान की भी कोई खोज नहीं की, हिंदुस्तान पहले से था, भारत पहले से था।
वास्कोडीगामा यहाँ आया था भारतवर्ष को लूटने के लिए, एक बात और जो इतिहास में, मेरे अनुसार बहुत गलत बताई जाती है कि वास्कोडीगामा एक बहुत बहादुर नाविक था, बहादुर सेनापति था, बहादुर सैनिक था, और हिंदुस्तान की खोज के अभियान पर निकला था, ऐसा कुछ नहीं था, सच्चाई ये है कि पुर्तगाल का वो उस ज़माने का डॉन था, माफ़िया था। जैसे आज के ज़माने में हिंदुस्तान में बहुत सारे माफ़िया किंग रहे हैं, उनका नाम लेने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मंदिर की पवित्रता खत्म हो जाएगी, ऐसे ही बहुत सारे डॉन और माफ़िया किंग 15वीं शताब्दी में होते थे यूरोप में और 15वीं शताब्दी का जो यूरोप था। वहाँ दो देश बहुत ताकतवर थे उस ज़माने में, एक था स्पेन और दूसरा था पुर्तगाल। तो वास्कोडीगामा जो था वो पुर्तगाल का माफ़िया किंग था। सन् 1490 के आस पास से वास्को डी गामा पुर्तगाल में चोरी का काम, लुटेरे का काम, डकैती डालने का काम ये सब किया करता था, और अगर सच्चा इतिहास उसका आप खोजिए तो एक चोर और लुटेरे को हमारे इतिहास में गलत तरीके से हीरो बना कर पेश किया गया और ऐसा जो डॉन और माफ़िया था उस ज़माने का पुर्तगाल का ऐसा ही एक दुसरा लुटेरा और डॉन था, माफ़िया था उसका नाम था कोलंबस, वो स्पेन का था।
तो हुआ क्या था, कोलंबस गया था अमेरिका को लूटने के लिए और वास्कोडीगामा आया था भारतवर्ष को लूटने के लिए, लेकिन इन दोनों के दिमाग में ऐसी बात आई कहीं से, कोलंबस के दिमाग में ये किसने डाला की चलो अमेरिका को लुटा जाए, और वास्कोडीगामा के दिमाग में किसने डाला कि चलो भारतवर्ष को
लुटा जाए, तो इन दोनों को ये कहने वाले लोग कौन थे? अतुल भाई जो बता रहे थे, वही बात मैं आपसे दोहरा रहा हूँ। हुआ क्या था कि 14वीं और 15वीं शताब्दी के बीच का जो समय था, यूरोप में दो ही देश थे जो ताकतवर माने जाते थे, एक देश था स्पेन, दूसरा था पुर्तगाल, तो इन दोनों देशों के बीच में अक्सर लड़ाई झगड़े होते थे, लड़ाई झगड़े किस बात के होते थे कि स्पेन के जो लुटेरे थे, वो कुछ जहाँजो को लूटते थे तो उसकी संपत्ति उनके पास आती थी, ऐसे ही पुर्तगाल के कुछ लुटेरे हुआ करते थे वो जहाँजो को लूटते थे तो उनके पास संपत्ति आती थी, तो संपत्ति का झगड़ा होता था कि कौन-कौन संपत्ति ज्यादा रखेगा। स्पेन के पास ज्यादा संपत्ति जाएगी या पुर्तगाल के पास ज्यादा संपत्ति जाएगी, तो उस संपत्ति का बटवारा करने के लिए कई बार जो झगड़े होते थे वो वहाँ की धर्मसत्ता के पास ले जाए जाते थे, और उस ज़माने की वहाँ की जो धर्मसत्ता थी, वो क्रिस्चियनिटी की सत्ता थी, और क्रिस्चियनिटी की सत्ता 1492 में के आसपास पोप होता था जो सिक्स्थ कहलाता था, छठवा पोप।
तो एक बार ऐसे ही झगड़ा हुआ, पुर्तगाल और स्पेन की सत्ताओं के बीच में, और झगड़ा किस बात को ले कर था? झगड़ा इस बात को ले कर था कि लूट का माल जो मिले वो किसके हिस्से में ज्यादा जाए, तो उस ज़माने के पोप ने एक अध्यादेश जारी किया, आदेश जारी किया, एक नोटिफिकेशन
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जारी किया। सन्. 1492 में, और वो नोटिफिकेशन क्या था? वो नोटिफिकेशन ये था कि 1492 के बाद, सारी दुनिया की संपत्ति को उन्होंने दो हिस्सों में बाँटा, और दो हिस्सों में ऐसा बाँटा कि दुनिया का एक हिस्सा पूर्वी हिस्सा, और दुनिया का दूसरा हिस्सा पश्चिमी हिस्सा, तो पूर्वी हिस्से की संपत्ति को लूटने का काम पुर्तगाल करेगा और पश्चिमी हिस्से की संपत्ति को लूटने का काम स्पेन करेगा, ये आदेश 1492 में पोप ने जारी किया, ये आदेश जारी करते समय, जो मूल सवाल है वो ये है कि क्या किसी पोप को ये अधिकार है कि वो दुनिया को दो हिस्सों में बाँटे, और उन दोनों हिस्सों को लूटने के लिए दो अलग अलग देशों की नियुक्ति कर दे? स्पेन को कहा की दुनिया के पश्चिमी हिस्से को तुम लूटो, पुर्तगाल को कहा की दुनिया के पूर्वी हिस्से को तुम लूटो और 1492 में जारी किया हुआ वो आदेश और बुल आज भी एजिस्ट करता है।
ये क्रिस्चियनिटी की धर्मसत्ता कितनी खतरनाक हो सकती है उसका एक अंदाजा इस बात से लगता है कि उन्होंने मान लिया कि सारी दुनिया तो हमारी है और इस दुनिया को दो हिस्सों में बाँट दो पुर्तगाली पूर्वी हिस्से को लूटेंगे, स्पेनिश लोग पश्चिमी हिस्से को लूटेंगे। पुर्तगालियों को चूँकि दुनिया के पूर्वी हिस्से को लूटने का आदेश मिला पोप की तरफ से तो उसी लूट को करने के लिए वास्को डी गामा हमारे देश आया था, क्योंकि भारतवर्ष दुनिया के पूर्वी हिस्से में पड़ता है, और उसी लूट के सिलसिले को बरकरार रखने के लिए कोलंबस अमरीका गया, इतिहास बताता है कि 1492 में कोलंबस अमरीका पहुंचा, और 1498 में वास्को डी गामा हिंदुस्तान पहुंचा, भारतवर्ष पहुंचा। कोलंबस जब अमरीका पहुंचा तो उसने अमरीका में, जो मूल प्रजाति थी रेड इंडियन्स जिनको माया सभ्यता के लोग कहते थे, उन माया सभ्यता के लोगों से मार कर पिट कर सोना चांदी छिनने का काम शुरू किया। इतिहास में ये बराबर गलत जानकारी हमको दी गई कि कोलंबस कोई महान व्यक्ति था, महान व्यक्ति नहीं था, अगर गुजराती में मैं शब्द इस्तेमाल करू तो नराधम था, और वो किस दर्जे का नराधम था, सोना चांदी लूटने के लिए अगर किसी की हत्या करनी पड़े तो कोलंबस उसमे पीछे नहीं रहता था।
उस आदमी ने 14 – 15 वर्षों तक बराबर अमेरीका के रेड इंडियन लोगों को लुटा, और उस लूट से भर – भर कर जहांजब जब स्पेन गए तो स्पेन के लोगों को लगा कि अमेरिका में तो बहुत सम्पत्ति है, तो स्पेन की फ़ौज और स्पेन की आर्मी फिर अमरीका पहुंची, और स्पेन की फ़ौज और स्पेन की आर्मी ने अमेरीका में पहुँच कर 10 करोड़ रेड इंडियन्स को मौत के घाट उतार दिया, 10 करोड़ और ये दस करोड़ रेड इंडियन्स मूल रूप से अमरीका के बाशिंदे थे, ये जो अमरीका का चेहरा आज आपको दिखाई देता है, ये अमरीका 10 करोड़ रेड इंडियन की लाश पर खड़ा हुआ एक देश है, कितने हैवानियत वाले लोग होंगे, कितने नराधम किस्म के लोग होंगे, जो सबसे पहले गए अमरीका को बसाने के लिए, उसका एक अंदाजा आपको लग सकता है, आज स्थिति क्या है कि जो अमरीका की मूल प्रजा है, जिनको रेड इंडियन कहते हैं, उनकी संख्या मात्र 65000 रह गई है।
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10 करोड़ लोगों को मौत के घाट उतारने वाले लोग आज हमको सिखाते है कि हिंदुस्तान में ह्यूमन राईट की स्थिति बहुत खराब है। जिनका इतिहास ही ह्यूमन राईट के वोइलेसन्. पे टिका हुआ है, जिनकी पूरी की पूरी सभ्यता 10 करोड़ लोगों की लाश पर टिकी हुई है, जिनकी पूरी की पूरी तरक्की और विकास 10 करोड़ रेड इंडियनों लोगों के खून से लिखा गया है, ऐसे अमरीका के लोग आज हमको कहते है कि हिंदुस्तान में साहब, ह्यूमन राईट की बड़ी खराब स्थिति है, कश्मीर में, पंजाब में, वगेरह वगेरह, और जो काम मारने का, पीटने का, लोगों की हत्याएं कर के सोना लूटने का, चांदी लूटने का काम कोलंबस और स्पेन के लोगों ने अमेरीका में किया, ठीक वही काम वास्कोडीगामा ने 1498 में हिंदुस्तान में किया।
ये वास्कोडीगामा जब कालीकट में आया, 20 मई, 1498 को, तो कालीकट का राजा था उस समय झामोरिन, तो झामोरिन के राज्य में जब ये पहुंचा वास्को डी गामा, तो उसने कहा कि मैं तो आपका मेहमान हूँ, और हिंदुस्तान के बारे में उसको कहीं से पता चल गया था कि इस देश में “अतिथि देवो भव” की परंपरा, तो झामोरिन ने बेचारे ने, ये अतिथि है ऐसा मान कर उसका स्वागत किया, वास्को डी गामा ने कहा कि मुझे आपके राज्य में रहने के लिए कुछ जगह चाहिए, आप मुझे रहने की इजाजत दे दो, परमिशन दे दो। झामोरिन बेचारा सीधा सदा आदमी था, उसने कालीकट में वास्को डी गामा को रहने की इजाजत दे दी। जिस वास्को डी गामा को झामोरिन के राजा ने अतिथि बनाया, उसका आथित्य ग्रहण किया, उसके यहाँ रहना शुरू किया, उसी झामोरिन की वास्को डी गामा ने हत्या करायी, और हत्या करा के खुद वास्को डी गामा कालीकट का मालिक बना, और कालीकट का मालिक बनने के बाद उसने क्या किया कि समुद्र के किनारे है कालीकट केरल में, वहां से जो जहांज आते जाते थे, जिसमे हिन्दुस्तानी व्यापारी अपना माल भर-भर के साउथ ईस्ट एशिया और अरब के देशों में व्यापार के लिए भेजते थे, उन जहांजो पर टैक्स वसूलने का काम वास्को डी गामा करता था, और अगर कोई जहांज वास्को डी गामा को टैक्स ना दे, तो उस जहांज को समुद्र में डुबोने का काम वास्कोडीगामा करता था, और वास्कोडीगामा हिंदुस्तान में आया पहली बार 1498 में, और यहाँ से जब लूट के सम्पत्ति ले गया, तो 7 जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी। पोर्तुगीज सरकार के जो डॉक्यूमेंट है वो बताते है कि वास्कोडीगामा पहली बार जब हिंदुस्तान से गया, लूट कर सम्पत्ति को ले कर के गया, तो 7 जहांज भर के सोने की अशर्फिया, उसके बाद दुबारा फिर आया वास्कोडीगामा। वास्कोडीगामा हिंदुस्तान में 3 बार आया लगातार लूटने के बाद, चौथी बार भी आता लेकिन मर गया, दूसरी बार आया तो हिंदुस्तान से लूट कर जो ले गया वो करीब 11 से 12 जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी, और तीसरी बार आया और हिंदुस्तान से जो लूट कर ले गया वो 21 से 22 जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी। इतना सोना चांदी लूट कर जब वास्को डी गामा यहाँ से ले गया तो पुर्तगाल के लोगों को पता चला कि हिंदुस्तान में तो बहुत सम्पत्ति है, और भारतवर्ष की सम्पत्ति के बारे में उन्होंने पुर्तगालियों ने पहले भी कहीं पढ़ा था, उनको कहीं से ये टेक्स्ट मिल गया था कि भारत एक ऐसा देश है, जहाँ पर महमूद गजनवी नाम का एक व्यक्ति आया,
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17 साल बराबर आता रहा, लूटता रहा इस देश को, एक ही मंदिर को, सोमनाथ का मंदिर जो वेंगवेल में है,
उस सोमनाथ के मंदिर को एक व्यक्ति, एक वर्ष आया अरबों चला गया, दूसरे साल आया, फिर गया, तीसरे साल आया, फिर लूट वो बराबर आता रहा, और लूट कर ले जाता रहा। तो वो टेक्स्ट भी उनको मिल गए थे कि एक-एक मंदिर में इतनी सम्पत्ति, इतनी पूंजी है, इतना पैसा है भारत में, तो चलो इस देश को लुटा जाए और उस ज़माने में एक जानकारी और दे दूँ, ये जो यूरोप वाले अमरीका वाले जितना अपने आप को विकसित कहे, सच्चाई ये है कि 14 वीं। और 15 वीं। शताब्दी में दुनिया में सबसे ज्यादा गरीबी यूरोप के देशों में थी, खाने पीने को भी कुछ होता नहीं था। प्रकृति ने उनको हमारी तरह कुछ भी नहीं दिया, न उनके पास नेचुरल रिसोर्सेस है, जितने हमारे पास है। न मौसम बहुत अच्छा है, न खेती बहुत अच्छी होती थी और उद्योगों का तो प्रश्न ही नहीं उठता। 13 वीं। और 14 वीं। शताब्दी में तो यूरोप में कोई उद्योग नहीं होता था, तो उनलोगों का मूलतः जीविका का जो साधन था जो वो लुटेरे बन के काम से जीविका चलाते थे, चोरी करते थे, डकैती करते थे, लूट डालते थे, ये मूल काम वाले यूरोप के लोग थे। तो उनको पता लगा कि हिंदुस्तान और भारतवर्ष में इतनी सम्पत्ति है तो उस देश को लूटा जाए, और वास्को डी गामा ने आ कर हिंदुस्तान में लूट का एक नया इतिहास शुरू किया।
महमूद गजनवी नाम का खरबों की सम्पत्ति ले कर अरबों खरबों की सम्पत्ति ले कर ले गया। और 17 साल
उससे पहले भी लूट चली हमारी, महमूद गजनवी जैसे लोग हमको लूटते रहे। लेकिन वास्को डी गामा ने आकर लूट को जिस तरह से केन्द्रित किया और ओर्गनाइजड किया वो समझने की जरूरत है, उसके पीछे पीछे क्या हुआ, पुर्तगाली लोग आए, उन्होंने 70-80 वर्षों तक इस देश को खूब जम कर लूटा। पुर्तगाली चले गए इस देश को लूटने के बाद, फिर उसके पीछे फ्रांसिसी आए, उन्होंने इस देश को खूब जमकर लुटा 70-80 वर्ष उन्होंने भी पुरे किए। उसके बाद डच आ गये हॉलैंड वाले, उन्होंने इस देश को लुटा, उसके बाद फिर अंग्रेज आ गए हिंदुस्तान में लूटने के लिए ही नहीं बल्कि इस देश पर राज्य भी करने के लिए, पुर्तगाली आए लूटने के लिए, फ्रांसिसी आए लूटने के लिए, डच आए लूटने के लिए, और फिर पीछे से अंग्रेज चले आए लूटने के लिए, अंग्रेजो ने लूट का तरीका बदल दिया। ये अंग्रेजो से पहले जो लूटने के लिए आए वो आर्मी ले कर के आए थे बंदूक ले कर के आये थे, तलवार ले के आए थे, और जबरदस्ती लूटते थे। अंग्रेजो ने क्या किया कि लूट का सिलसिला बदल दिया, और उन्होंने अपनी एक कंपनी बनाई, उसका नाम ईस्ट इंडिया रखा। ईस्ट इंडिया कंपनी को ले के सबसे पहले सुरत में आए इसी गुजरात में, ये बहुत बड़ा दुर्भाग्य है इस देश का कि जब जब इस देश की लूट हुई है इस देश की गुजरात के रास्ते हुई है।
जितने लोग इस देश को लूटने के लिए आए बाहर से वो गुजरात के रास्ते घुसे इस देश में, इसको समझिए क्यों ? क्योंकि गुजरात में सम्पत्ति बहुत थी, और आज भी है, तो अंग्रेजो को लगा कि सबसे
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पहले लूटने के लिए चलो सूरत, पूरे हिंदुस्तान में कहीं नहीं गए, सबसे पहले सूरत में आए और सूरत में आकर ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए कोठी बनानी है, ऐसा वहां के नवाब के आगे उन्होंने फरमान रखा, बेचारा नवाब सीधा सदा था, उसने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को कोठी बनाने के लिए जमीन दे दी, कभी आप जाइए सूरत में, वो कोठी आज भी खड़ी हुई है, उसका नाम है, कुपर विला। एक अंग्रेज था उसका नाम था जेम्स कुपर, 6 अधिकारी आए थे सबसे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के, उनमें से एक अधिकारी था जेम्स कूपर, तो जेम्स कूपर ने अपने नाम पर उस कोठी का नाम रख दिया कुपर विला, तो ईस्ट इंडिया कंपनी की सबसे पहली कोठी बनी सूरत में, सूरत के लोगों को मालूम नहीं था, कि जिन अंग्रेजों को कोठी बनाने के लिए हम जामीन दे रहे हैं, बाद में यही अंग्रेज हमारे खून के प्यासे हो जाएंगे, अगर ये पता होता तो कभी अंग्रेजों को सूरत में ठहरने की भी जमीन नहीं मिलती।
अंग्रेजों ने फिर वही किया जो उनका असली चरित्र था। पहले कोठी बनाई, व्यापार शुरू किया, धीरे धीरे पूरे सूरत शहर में उनका व्यापार फैला, और फिर सन्। 1612 में सूरत के नवाब की हत्या करायी, जिस नवाब से जमीन लिया कोठी बनाने के लिए, उसी नवाब की हत्या करायी अंग्रेजों ने और 1612 में जब नवाब की हत्या करा दी उन्होंने, तो सूरत का पूरा एक पूरा बंदरगाह अंग्रेजों के कब्जे में चला गया। और अंग्रेजों ने जो काम सूरत में किया था सन्। 1612 में, वही काम कलकत्ता में किया, वही काम मद्रास में किया, वही काम दिल्ली में किया, वही काम आगरा में किया, वही काम लखनऊ में किया, माने जहाँ भी अंग्रेज जाते थे अपनी कोठी बनाने के लिए अपनी ईस्ट इंडिया कंपनी को ले के, उस हर शहर पर अंग्रेजों का कब्जा होता था, और ईस्ट इंडिया कंपनी का झंडा फहराया जाता था। 200 वर्षों के अंदर व्यापार के बहाने अंग्रेजों ने सारे देश को अपने कब्जे में ले लिया, 1750 तक आते आते सारा देश अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का गुलाम हो गया।
किसी को नहीं मालूम था कि जिस ईस्ट इंडिया कम्पनी को हम व्यापार के लिए छुट दे रहे हैं, जिन अंग्रेजों को हम व्यापार के लिए जमीन दे रहे हैं, जिन अंग्रेजों को व्यापार के लिए हिंदुस्तान में हम बुला के ला रहे हैं, वही अंग्रेज इस देश के मालिक हो जाएंगे, ऐसा किसी को
अंदाजा नहीं था, अगर ये अंदाजा होता तो शायद कभी उनको छुट न मिलती, लेकिन 1750 में ये अंदाजा हुआ, और अंदाजा हुआ 1 व्यक्ति को, उसका नाम था सिराजुद्दौला,
बंगाल का नवाब था, गया कि अंग्रेज इस बनाने आए है, इस बहुत है, क्योंकि इस अंग्रेजों के खिलाफ
तो बंगाल का नवाब था सिराजुद्दौला, उसको ये अंदाजा हो देश में व्यापार करने नहीं आए है, इस देश को गुलाम देश को लूटने के लिए आए है। क्योंकि इस देश में सम्पत्ति देश में पैसा बहुत है, तो सिराजुद्दौला ने फैसला किया कि कोई बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ेगी, और उस बड़ी को लड़ाई लड़ने के लिए सिराजुद्दौला ने युद्ध किया अंग्रेजों के खिलाफ, इतिहास की चोपड़ी में आपने पढ़ा
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होगा कि प्लासी का युद्ध हुआ, 1757 में, लेकिन इस युद्ध की एक खास बात है जो मैं आपको याद दिलाना चाहता हूँ, आज के समय में भी वो बहुत महत्वपूर्ण है। मैं बचपन में जब विद्यार्थी था कक्षा 9 में पढ़ता था, तो मैं मेरे इतिहास के अध्यापक से ये पूछता था कि सर मुझे ये बताइए कि प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से कितने सिपाही थे लड़ने वाले, तो मेरे अध्यापक कहते थे कि मुझको नहीं मालूम, तो मैं कहता था क्यों नहीं मालूम, तो कहते थे कि मुझे किसी ने नहीं पढ़ाया तो मैं तुमको कहाँ से पढ़ा दूँ, तो मैं उनको बराबर एक ही सवाल पूछता था कि सर आप जरा ये बताइये कि बिना सिपाही के कोई युद्ध हो सकता है कि नहीं तो फिर हमको ये क्यों नहीं पढ़ाया जाता है कि युद्ध में कितने सिपाही अंग्रेजों के पास और उसके दूसरी तरफ एक और सवाल मैं पूछता था कि अच्छा ये बताइये कि अंग्रेजों के पास कितने सिपाही थे ये तो हमको नहीं मालूम सिराजुद्दौला जो लड़ रहा था हिंदुस्तान की तरफ से उनके पास कितने सिपाही थे? तो कहते थे कि वो भी नहीं मालूम। प्लासी के युद्ध के बारे में इस देश में इतिहास की 150 किताबें हैं जो मैंने देखी है, उन 150 में से एक भी किताब में ये जानकारी नहीं दी गई है कि अंग्रेजों की तरफ से कितने सिपाही लड़ने वाले थे और हिंदुस्तान की तरफ से कितने सिपाही लड़ने वाले थे और मैं आपको सच बताऊं मैं मेरे बचपन से इस सवाल से बहुत परेशान रहा और इस सवाल का जवाब अभी 3 साल पहले मुझे मिला, वो भी हिंदुस्तान में नहीं मिला लन्दन में मिला।
लन्दन में एक इंडिया हाउस लाइब्रेरी है बहुत बड़ी लाइब्रेरी है, उस इंडिया हाउस लाइब्रेरी में हिंदुस्तान के गुलामी के 20000 से भी ज्यादा दस्तावेज़ रखे हुए हैं, जो हमारे देश में नहीं हैं वहां रखे हुए हैं, भारतवर्ष को अंग्रेजों ने कैसे तोड़ा कैसे गुलाम बनाया इसकी पूरी विस्तृत जानकारी उन 20000 दस्तावेजों में इंडिया हाउस लाइब्रेरी में मौजूद है। मेरे एक परिचित है प्रोफेसर धर्मपाल, वो 40 वर्ष तक यूरोप में रहे हैं, मैंने एक बार उनको एक चिट्ठी लिखी, मैंने कहा सर, मैं ये जानना चाहता हूँ बेसिक प्रश्न कि प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों के पास कितने सिपाही थे? तो उन्होंने कहा देखो राजीव, अगर तुमको ये जानना है तो बहुत कुछ जानना पड़ेगा, और तुम तैयार हो जानने के लिए, तो मैंने कहा मैं सब जानना चाहता हूँ। मैं इतिहास का विद्यार्थी नहीं लगा लेकिन इतिहास को समझना चाहता हूँ कि ऐसी कौन सी खास बात थी जो हम अंग्रेजों के गुलाम हो गए, ये समझ में तो आना चाहिए अपने को, कि कैसे हम अंग्रेजों के गुलाम हो गए, ये इतना बड़ा देश, 34 करोड़ की आबादी वाला देश 50 हजार अंग्रेजों का गुलाम कैसे हो गया ये समझना चाहिए, तो वो प्लासी के युद्ध पर से वो समझ में आया। उन्होंने कुछ दस्तावेज़ मुझे भेजे, फोटोकॉपी करा के और मेरे पास अभी भी है। उन दस्तावेजों को जब मैं पढ़ता था तो मुझे पता चला कि प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों के पास मात्र 300 सिपाही थे, 300 और सिराजुद्दौला के पास 18000 सिपाही थे। अब किसी भी सामने के विद्यार्थी से, बच्चे से, या सामान्य बुद्धि के आदमी से आप ये पूछें के एक बाजू में 300 सिपाही, और दूसरे बाजू में 18000 सिपाही, कौन जीतेगा? 18000 सिपाही जिनके पास हैं वो जीतेगा।
लेकिन जीता कौन ? जिनके पास मात्र 300 सिपाही थे वो जीत गए, और जिनके पास 18000 सिपाही थे वो हार गए और हिंदुस्तान के, भारतवर्ष के एक एक सिपाही के बारे में अंग्रेजों के पार्लियामेंट में ये कहा जाता था कि भारतवर्ष का 1 सिपाही अंग्रेजों के 5 सिपाही को मारने के लिए
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काफी है, इतना ताकतवर, तो इतने ताकतवर 18000 सिपाही अंग्रेजों के कमजोर 300 सिपाहियों से कैसे हारे ये बिलकुल गम्भीरता से समझने की जरूरत है, और उन दस्तावेजों को देखने के बाद मुझे पता चला कि हम कैसे हारे? अंग्रेजों की तरफ से जो लड़ने आया था उसका नाम था रोबर्ट क्लाइव, वो अंग्रेजी सेना का सेनापति था और भारतवर्ष की तरफ से जो लड़ रहा था सिराजुद्दौला, उसका भी एक सेनापति था, उसका नाम था मीर जाफर, तो हुआ क्या था रोबर्ट क्लाइव ये जनता था कि अगर भारतीय सिपाहियों से सामने से हम लड़ेंगे तो हम 300 लोग है मारे जाएंगे, 2 घंटे भी युद्ध नहीं चलेगा और क्लाइव ने इस बात को कई बार ब्रिटिश पार्लियामेंट को चिट्ठी लिख के कहा था। क्लाइव की 2 चिट्ठियाँ हैं उन दस्तावेजों में, एक चिट्ठी में क्लाइव ने लिखा कि हम सिर्फ 300 सिपाही है, और सिराजुद्दौला के पास 18000 सिपाही है। हम युद्ध जीत नहीं सकते हैं, अगर ब्रिटिश पार्लियामेंट अंग्रेजी पार्लियामेंट ये चाहती है कि हम प्लासी का युद्ध जीते, तो जरूरी है कि हमारे पास और सिपाही भेजे जाए।
उस चिट्ठी के जवाब में क्लाइव को ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक चिट्ठी मिली थी और वो बहुत मजेदार है उसको समझना चाहिए। उस चिट्ठी में ब्रिटिश पार्लियामेंट के लोगों ने ये लिखा कि हमारे पास इससे ज्यादा सिपाही है नहीं, क्यों नहीं है ? क्योंकि 1757 में जब प्लासी का युद्ध शुरू होने वाला था उसी समय अंग्रेजी सिपाही फ्रांस में नेपोलियन बोनापार्ट के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे और नेपोलियन बोनापार्ट क्या था अंग्रेजों को मार मार के फ्रांस से भगा रहा था, तो पूरी की पूरी अंग्रेजी ताकत और सेना नेपोलियन बोनापार्ट के खिलाफ फ्रांस में लड़ती थी इसी लिए वो ज्यादा सिपाही दे नहीं सकते थे, तो उन्होंने कहा अपने पार्लियामेंट में कि हम इससे ज्यादा सिपाही आपको दे नहीं सकते हैं, जो 300 सिपाही है उन्हीं से आपको प्लासी का युद्ध जीतना होगा, तो रोबर्ट क्लाइव ने अपने दो जासूस लगाए, उसने कहा देखो युद्ध लड़ेंगे तो मारे जाएंगे, अब आप एक काम करो, उसने दो अपने साथियों को कहा कि आप जाओ और सिराजुद्दौला की आर्मी में पता लगाओ कि कोई ऐसा आदमी है क्या जिसको रिश्त दे दें, जिसको लालच दे दें और रिश्त के लालच में जो अपने देश से गद्दारी करने को तैयार हो जाए, ऐसा आदमी तलाश करो। उसके दो जासूसों ने बराबर सिराजुद्दौला की आर्मी में पता लगाया कि हां एक आदमी है, उसका नाम है मीर जाफर, अगर आप उसको रिश्त दे दो, तो वो हिंदुस्तान को बेंच डालेगा। इतना लालची आदमी है और अगर आप उसको कुर्सी का लालच दे दो, तब तो वो हिंदुस्तान की 7 पुश्तों को बेंच देगा और मीर जाफर क्या था, मीर जाफर ऐसा आदमी था जो रात दिन एक ही सपना देखता था कि एक न एक दिन मुझे बंगाल का नवाब बनना है और उस ज़माने में बंगाल का नवाब बनना ऐसा ही होता था जैसे आज के ज़माने में बहुत नेता ये सपना देखते हैं कि मुझे हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री बनना है, चाहे देश बेंचना पड़े, तो मीर जाफर के मन का ये जो लालच था कि मुझे बंगाल का नवाब बनना है, माने कुर्सी चाहिए, और मुझे पूंजी चाहिए, पैसा चाहिए, सत्ता चाहिए और पैसा चाहिए। ये दोनों लालच उस समय मीर जाफर के मन में सबसे ज्यादा प्रबल थे, तो उस लालच को रोबर्ट क्लाइव ने बराबर भांप लिया।
Mir Jafar
तो रोबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर को चिट्ठी लिखी है, वो चिट्ठी दस्तावेजों में मौजूद है और उसकी फोटोकोपी
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मेरे पास है, उसने चिट्ठी में दो ही बातें लिखी है, देखो मीर जाफर अगर तुम अंग्रेजों के साथ दोस्ती करोगे, और ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ समझौता करोगे, तो हम तुमको युद्ध जीतने के बाद बंगाल का नवाब बनाएंगे और दूसरी बात कि जब आप बंगाल के नवाब हो जाओगे तो सारी की सारी सम्पत्ति आपकी हो जाएगी। इस सम्पत्ति में से 5 टका हमको दे देना, बाकि तुम जितना लूटना चाहो लूट लो। मीर जाफर चूँकि रात दिन ये ही सपना देखता था कि किसी तरह कुर्सी मिल जाए, और किसी तरह पैसा मिल जाए, तुरंत उसने वापस रोबर्ट क्लाइव को चिट्ठी लिखी और उसने कहा कि मुझे आपकी दोनों बातें मंजूर है, बताइए करना क्या है ? तो आखरी चिट्ठी लिखी है रोबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर को कि आपको सिर्फ इतना करना है कि युद्ध जिस दिन शुरू होगा, उस दिन आप अपने 18000 सिपाहियों को कहिए की वो मेरे सामने सरेंडर कर दें बिना लड़े।
मीर जाफर ने कहा कि आप अपनी बात पे कायम रहोगे ? मुझे नवाब बनाना है आपको, तो रोबर्ट ने कहा कि बराबर हम अपनी बात पे कायम है, आपको हम बंगाल का नवाब बना देंगे, बस आप एक ही काम करो कि अपनी आर्मी से कहो, क्योंकि वो सेनापति था आर्मी का, तो आप अपनी आर्मी को आदेश दो कि युद्ध के मैदान में वो मेरे सामने हथियार डाल दे, बिना लड़े, मीर जाफर ने कहा कि ऐसा ही होगा और युद्ध शुरू हुआ 23 जून 1757 को। इतिहास की जानकारी के अनुसार २३ जून 1757 को युद्ध शुरू होने के 40 मिनट के अंदर भारतवर्ष के 18000 सिपाहियों ने मीर जाफर के कहने पर अंग्रेजों के 300 सिपाहियों के सामने सरेंडर कर दिया।
रोबर्ट क्लाइव ने क्या किया कि अपने 300 सिपाहियों की मदद से हिंदुस्तान के 18000 सिपाहियों को बंदी बनाया, और कलकत्ता में एक जगह है उसका नाम है फोर्ट विलियम, आज भी है, कभी आप जाइए, उसको देखिए उस फोर्ट विलियम में 18000 सिपाहियों को बंदी बना कर ले गया। 10 दिन तक उसने भारतीय सिपाहियों को भूखा रखा और उसके बाद ग्यारहवे दिन सबकी हत्या कराई और उस हत्या कराने में मीर जाफर रोबर्ट क्लाइव के साथ शामिल था, उसके बाद रोबर्ट क्लाइव ने क्या किया, उसने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की हत्या कराई मुर्शिदाबाद में, क्योंकि उस जमाने में बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद होती थी, कलकत्ता नहीं। सिराजुद्दौला की हत्या कराने में रोबर्ट क्लाइव और मीर जाफर दोनों शामिल थे। और नतीजा क्या हुआ ? बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला मारा गया, ईस्ट इंडिया कंपनी को भागने का सपना देखता था इस देश में वो मारा गया, और जो ईस्ट इंडिया कंपनी से दोस्ती वो बंगाल का नवाब हो गया, मीर
करने की बात करता था जाफर।
इस पूरे इतिहास की दुर्घटना को देखता हूँ। मैं कई बार ऐसा जाफर को मालूम नहीं था कि दोस्ती करेंगे तो इस देश की गुलामी आएगी ? मीर जाफर जानता था कि मैं मेरे कुर्सी के लालच में जो खेल खेल रहा हूँ उस खेल में इस देश को सैकड़ों वर्षों की गुलामी आ सकती है, ये वो जनता था और ये भी जानता था कि अपने स्वार्थ में, अपने लालच में मैं जो गद्दारी करने जा रहा हूँ इस देश के साथ उसके क्या दुष्परिणाम होंगे, वो भी उसको मालूम थे।
मैं एक विशेष नजर से सोचता हूँ कि क्या मीर ईस्ट इंडिया कंपनी से
इस्ट इंडिया कंपनी से
मैं ऐसा सोचता हूँ कि हम गुलामी से आजाद हो जाते, क्योंकि 18000 सिपाही हमारे पास थे और 300 अंग्रेज सिपाहियों को मारना बिलकुल आसन् काम था हमारे लिए, हम 1757 में ही अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो जाते एक बात और दूसरी बात ये जो 200 वर्षों की गुलामी हमको झेलनी पड़ी 1757 से 1947 तक, और उस 200 वर्ष की गुलामी को भागने के लिए 6 लाख लोगों की जो कुर्बानियां हमको देनी पड़ी, वो बच गया होता। भगत सिंह, चंद्रशेखर, उधम सिंह, तात्या टोपे, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, सुभाष चन्द्र बोस, ऐसे ऐसे नौजवानों की कुर्बानिया दी है ये कोई छोटे मोटे लोग नहीं थे। सुभाष चन्द्र बोस तो आईपीएस टोपर थे, उधम सिंह चाहता तो आध्याशी कर सकता था, बड़े बाप का बेटा था। भगत सिंह और चंद्रशेखर की भी यही हैसियत थी, चाहते तो जिन्दगी की, जवानी की रंगरलियां मानते और अपनी नौजवानी को ऐसे फंदे में नहीं फ़साते, ये सारे वो नौजवान थे जिनका खून इस देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। 6 लाख ऐसे नौजवानों की कुर्बानियां जो हमने दी, वो नहीं देनी पड़ती और अंग्रेजों की जो यातनाएँ सही, जो अपमान हमने बर्दास्त किया, वो नहीं करना पड़ता अगर एक आदमी नहीं होता, मीर जाफ़र। लेकिन चूँकि मीर जाफ़र था, मीर जाफ़र का लालच था, कुर्सी का और पैसे का, उस लालच ने इस देश को 200 वर्ष के लिए गुलाम बना दिया।।।
और मैं आपसे यही कहने आया हूँ कि 1757 में तो एक मीर जाफ़र था आज हिंदुस्तान में हज़ारों मीर जाफ़र है। जो देश को वैसे ही गुलाम बनाने में लगे हुए है जैसे मीर जाफ़र ने बनाया था, मीर जाफ़र ने क्या किया था, विदेशों कंपनी को समझौता किया था बुला के, और विदेशी कंपनी से समझौता करने के चक्कर में उसे कुर्सी मिली थी और पैसा मिला था। आज जानते हैं हिंदुस्तान का जो नेता प्रधानमंत्री बनता है, हिंदुस्तान का जो नेता मुख्यमंत्री बनता है वो सबसे पहला काम जानते हैं क्या करता है ? प्रेस कॉन्फ़्रेंस करता है और कहता है विदेशी कंपनी वालो तुम्हारा स्वागत है, आओ यहाँ पर और बराबर इस बात को याद रखिए ये बात 1757 में मीर जाफ़र ने कही थी ईस्ट इंडिया कंपनी से कि अंग्रेजों तुम्हारा स्वागत है, उसके बदले में तुम इतना ही करना कि मुझे कुर्सी दे देना और पैसा दे देना। आज के नेता भी वही कह रहे हैं, विदेशी कंपनी वालों तुम्हारा स्वागत है।
और हमको क्या करना, हमको कुछ नहीं, मुख्यमंत्री बनवा देना, प्रधानमंत्री बनवा देना। 100 – 200 करोड़ रूपये की रिश्त दे देना, बेफ़ोर्स के माध्यम से हो के एनरों के माध्यम से हो। हम उसी में खुश हो जाएँगे, सारा देश हम आपके हवाले कर देंगे। ये इस समय चल रहा है। और इतिहास की वही दुर्घटना दोहराइ जा रही है जो 1757 में हो चुकी है। और मैं आपसे मेरे दिल का दर्द रहा रहा हूँ कि एक ईस्ट इंडिया कंपनी इस देश को 200 – 250 वर्ष इस देश को गुलाम बना सकती है, लूट सकती है तो आज तो इन मीर जफ़रों ने 8992 विदेशी कम्पनियों को बुलाया है। ।।
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विश्व को भारत की देन
हम सभी विद्यार्थी रहे है, सभी पढ़ाई करके निकले है, हम सभी उच्च शिक्षा व माध्यम शिक्षा से निकले है। लेकिन जो बात हमें पढ़ाई जाती है, कि भारत सबसे ज्यादा पिछड़ा देश रहा। फिर पढ़ाया जाता है कि दुनिया में सबसे ज्यादा गरीब देश भारत रहा, भारत ने दुनिया को कुछ नहीं दिया, फिर पढ़ाया जाता है कि यदि अंग्रेज भारत नहीं आते तो कुछ नहीं होता, अंग्रेज नहीं आते तो शिक्षा नहीं होती, अंग्रेज नहीं आते तो विज्ञान नहीं आता, अंग्रेज नहीं आते तो टेक्नोलॉजी नहीं आती, अंग्रेज नहीं आते तो ट्रेन नहीं आती, अंग्रेज नहीं आते तो हवाई जहाज नहीं होता, ऐसी बातें हम बचपन से पढ़ते आते है, सुनते आते हैं, और आपस में चर्चाये भी करते हैं। लेकिन सबसे ज्यादा दुख और दुर्भाग्य इस बात का है कि अध्यापक हम सब को यह पढ़ाते हैं। गुरु जो हमारे वर्तमान में है, वे गुरु कम हो गये है शिक्षक ज्यादा हो गये है, वर्तमान में जो शिक्षक है वही हमें ये सब पढ़ाते है, और इस तरह से पढ़ाते है कि दिमाग में घुस जाता है। आपने मनोविज्ञान की बात सुनी होगी कि यदि एक झूठ को बार-बार बोला जाता है, तो थोड़ी दिन में झूठ सुनते सुनते सच लगने लगता है। तो भारत के बारे में करीब 200-300 वर्षों से एक झूठ पूरी दुनिया में बोला जाता है, कि भारत एक गरीब देश, भारत एक पिछड़ा देश, भारत एक अवैज्ञानिक देश, भारत एक ऐसा देश जहाँ तकनीक नहीं, जहाँ गणित नहीं, जहाँ भौतिक शास्त्र नहीं, कुछ भी नहीं।
भारत एक ऐसा देश हर समय दूसरों पर निर्भर, भारत एक ऐसा देश जो हर समय परावलंबी, भारत एक ऐसा देश जिसकी सभ्यता और संस्कृति गौरव करने लायक कुछ नहीं, और जो कुछ गौरव करने लायक है वो सब पाखंड हैं। और हमारे शिक्षकों को जब हम ये प्रश्न करते है कि आप हमें ये सब क्यों पढ़ाते है तो वे कहते है कि हमें भी यही पढ़ाया गया है इसलिए हम तुम सब को यही पढ़ाते है। तो हमारे शिक्षकों के शिक्षक रहे है, उन्हें भी इसी तरह पढ़ाया गया हैं। लेकिन सबसे ज्यादा कष्ट जब होता है जब कोई साधारण व्यक्ति भारत के बारे में ये कहता है कि हमारे पास ज्ञान नहीं, हमारे पास तकनीकी नहीं, हमारे पास विज्ञान नहीं, हमारे पास अर्थशास्त्र नहीं, धन नहीं, कुछ नहीं। हम तो हमेशा से पिछड़े और गरीब लोग है। साधारण व्यक्ति को तो माफ किया जा सकता है, लेकिन भारत का प्रधानमंत्री तब ये कहने लगे तो दिल को बहुत चोट पहुँचती है। हमारे देश के कई प्रधानमंत्रियों के मुहँ से यही सुना है कि भारत देश में ना तो ज्ञान है, ना शिक्षा, ना विज्ञान, ना तकनीक, जो कुछ भी हमारे पास है वो अंग्रेजों की देन है। पूरी दुनिया के सामने हमारे प्रधानमंत्रियों ने बोला है- “सपेरो का देश, लुटेरो का देश, अंधेरे का देश, ठगों का देश”, इस तरह की बातें पूरी दुनिया में भारत के बारे में प्रचारित हुई है। हमारे प्रधानमंत्री के द्वारा लंदन के ऑक्सफोर्ड में भाषण दिया कि “हम अंग्रेजों के बहुत आभारी है, यदि अंग्रेज भारत ना आते तो हमें तो ना विज्ञान पता था, ना तकनीकी पता थी, ना शिक्षा व्यवस्था होती, ना अर्थव्यवस्था होती, ना डाक विभाग होता, ना रेलवे विभाग होता”। 40 मिनट तक वे अंग्रेजों का गुणगान करते रहे, कि अंग्रेजों का आना भारत के लिए वरदान था। बिल्कुल ऐसा ही भाषण हमारे प्रथम प्रधानमंत्री ने भी संसद में दिया, उन्होंने अपनी संसद में कहा कि “यदि अंग्रेजों का भारत के साथ संयोग नहीं होता तो भारत तो हमेशा अंधकार और अंधेरे में डूबा हुआ देश ही रहता है, इसलिए भारत का विकास कराना है तो अंग्रेजों जैसा बनाना है, भारत को आगे बढ़ाना है
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तो अंग्रेजों के रास्ते पर चलकर ही उसको लेकर चलना है। 2 या 3 प्रधानमंत्री को छोड़ दिया जाये तो सभी इसी मानसिकता के प्रधानमंत्री रहे। लेकिन एक प्रधानमंत्री थे जिन्हें अपनी संस्कृति पर बहुत गर्व होता था उनका नाम था “श्री लाल बहादुर शास्त्री”।
उन्होंने एक फैसला लिया था कि अमेरिका से लाल गेहूँ भारत में आता था, जिस गेहूँ को अमेरिका में जानवर भी नहीं खाते थे, वो गेहूँ हमें खिलाया जाता था, श्री शास्त्री जी ने फैसला लिया कि ये गेहूँ खाना हमें मंजूर नहीं है, क्योंकि अपमानजनक तरीके से आता है, और सबसे खराब है, उस समय गेहूँ का उत्पादन कम था, लोगो ने कहा कि हम क्या खायेगे, तो शास्त्री जी ने कहा की हमें भूखे मरना पसंद है, लेकिन अपमानजनक तरीके से विदेशी घटिया गेहूँ खाना मंजूर नहीं है, इस बात पर संसद पर बहस चल रही थी, तो संसद में बैठे लोगो ने शास्त्री जी से कहा कि यदि ये अमेरिका और यूरोप के देश ना होते तो हम तो कहीं के ना रहते, तभी शास्त्री जी ने कहा कि अमेरिका और यूरोप के पास ऐसा कुछ नहीं है जो वे भारत को दे सके, हमारे पास ही है जो हम उन्हें दे सकते हैं।
इसी तरह एक और प्रधानमंत्री हुए इस देश में उनका नाम था ‘मोरारजी देसाई’। वे भी यही कहते थे कि दुनिया में अगर सबसे ज्यादा ज्ञान है तो वो भारत के पास है, लेकिन इस बात का दुर्भाग्य है कि उस ज्ञान को दुनिया में स्थापित करने में पीछे रह गये। इसी तरह एक और प्रधानमंत्री हुए जो केवल 4 महीने के लिए रहे, उनका नाम था चंद्रशेखर, वे भी यही कहते थे कि यूनान से पुरानी संस्कृति हमारी रही है, यूरोप के ज्ञान से पहले वो ज्ञान भारत में मौजूद रहा है, इसलिए हमें विदेशियों से लेनी की कोई जरूरत नहीं है। इसी दृष्टि से मैं आपके सामने कुछ तथ्य पेश करना चाहता हूँ, जिसे पढ़कर आप भारत देश पर गर्व करेंगे। मैं शुरुआत करता हूँ, भारत ने दुनिया को क्या दिया?
सबसे पहले हम दुनिया के सामने कह सकते हैं गर्व से, जिसे दुनिया ने भी स्वीकार किया है कि सबसे पहली भाषा और सबसे पहली लिपि(लिखना) दुनिया को दी है तो वो भारत ने दी है, हमारी सबसे पहली भाषा जो है वो संस्कृत है और सबसे पहली लिपि देवनागरी है। लेकिन कुछ इतिहासकार कहते हैं कि देवनागरी लिपि से भी बहुत पुरानी लिपि रही है जो ब्राह्मी लिपि है। ब्राह्मी लिपि के बारे में सारी दुनिया के वैज्ञानिकों ने जो बात स्वीकारी है वो है कि ब्राह्मी लिपि उतनी ही पुरानी है जितना पुराना भारत। लगभग 2 अरब साल पहले का ये हमारा ब्राह्मण है, प्रकृति है जिसमें भारत बसता है, लगभग उतनी ही पुरानी ब्राह्मी लिपि है। पूरी दुनिया भी यही मानती है कि लिखना यदि सिखाया है किसी देश ने तो भारत ने ही सिखाया है। क्योंकि भारत से पहले लिखने की कला किसी को नहीं आती थी, इसलिए भारत ने ही सबको लिखना सिखाया, पढ़ना और बोलना थोड़ा आसान होता है लेकिन लिखना थोड़ा कठिन माना जाता है जो लिपि द्वारा संभव है। फिर यहीं लिपि हमारी चीन में गयी, चीन ने हमसे लिखना सीखा, चीन के वैज्ञानिक ईमानदारी से इस बात को स्वीकार करते हैं, कि चीन के महर्षि भारत आये उन्होंने लिपि का अध्ययन किया, फिर चीन वापस लौटकर वहाँ अपनी लिपि का अविष्कार किया।
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भाषा भी भारत ने ही दी है पूरी दुनिया को तो जाहिर सी बात है कि बोलना भी सबसे पहले भारत ने ही सिखाया है। दुनिया की जो विशिष्ट भाषा मानी जाती है अंग्रेजी को छोड़कर जैसे – जर्मन, फ्रेंच, स्पेनिश, पोर्तुगिस, रसियन, डेनिस आदि। अंग्रेजी की सामान्य भाषा में गिनती होती है। क्योंकि अंग्रेजी दूसरों की नकल हैं। विशिष्ट (मूल) भाषा के वैज्ञानिक यही कहते हैं कि हमारी भाषाएं संस्कृत भाषा से ली गयी है। आपको सुनकर हैरानी होगी, दुनिया में कम्प्यूटर को चलाने वाली एलोरिथम संस्कृति में ही तैयार की है और कुछ सालों में सारी दुनिया में छा जायेगी। सभी वैज्ञानिक इस बात को स्वीकार करते हैं, वे कहते हैं कि इस भाषा में 2 चीजे महत्व की है पहली विशेषता इसका जो व्याकरण है वो एकदम पक्का है, इतना पक्का है कि लाखों करोड़ों वर्ष पहले किसी ऋषि मुनि ने जो व्याकरण में कर दिया है, जो 21 वीं शताब्दी में उतना ही सच है। जो लाखों करोड़ों वर्ष पहले था। महर्षि पाणिनी के सूत्र हजारों वर्ष पुराने हैं, महर्षि पाणिनी के सूत्रों में एक कोमा तक बदलने की जरूरत आज तक किसी को नहीं लगती। दुनिया के बाकि सभी भाषाओं में बदलाव होते हैं। लेकिन संस्कृत दुनिया की अकेली एवं विशिष्ट भाषा जिसका व्याकरण एकदम पक्का है, और अगले लाखों करोड़ों वर्ष तक उतना ही पक्का रहेगा।
इसलिए फ्रांससियों ने जो भाषा बनायी फ्रेंच उसे संस्कृत का आधार दिया, जर्मनी को संस्कृत का आधार दिया। आप कभी जर्मन व फ्रेंच भाषा को पढ़ने की कोशिश करेंगे बिल्कुल ऐसी हैं जैसी संस्कृत। दुनिया की लगभग 56 ऐसी भाषाएं हैं जिनके शब्द रूप, धातु रूप संस्कृत जैसे हैं।
दूसरी विशेषता यह है कि भारत की अकेली विशिष्ट भाषा संस्कृत है। जिसके पास शब्दों का सबसे बड़ा भण्डार है। दुनिया में बोली जाने वाली भाषा जिसको हम अंग्रेजी कहते हैं, रसियन, जर्मन, फ्रेंच, डच, स्पेनिश, डेनिस या चाइनीज। इन सब भाषाओं से हजारों गुणा ज्यादा शब्द संस्कृत भाषा में हैं। महर्षि पाणिनी से लेकर आज तक यदि संस्कृत के उपयोग किये गये शब्दों की गणना की जाए, कि कितने शब्द भाषा के स्तर पर उपयोग किये हैं। 102 अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्दों का उपयोग अब तक हो चुका है। संस्कृत भाषा बहुता समृद्धशाली है। जब भाषा समृद्ध होती है तो साहित्य भी समृद्ध होता है। संस्कृत भाषा में जितना साहित्य लिखा गया है पूरी दुनिया में शायद ही किसी भाषा में लिखा गया है। फिर आप कहोंगे की ये दिखाई क्यों नहीं देता। इसका कारण है हमारी लापरवाही का नतीजा है कि हम अपने साहित्य को बचाकर नहीं रख सके। हमारे साहित्य का बहुत नुकसान हुआ है पिछले 1000 वर्षों में। आपको जानकर हैरानी होगी कि विदेशी लुटेरों ने भारत में आकर लूटना शुरू किया तो केवल सम्पत्ति नहीं लूटी बल्कि साहित्य को भी लूटा, क्योंकि ज्ञान यहाँ भरा पड़ा है, और कई विदेशी अक्रान्ता ऐसे आये थे कि जिन्होंने हमारे साहित्य को जला दिया, आपने सुना होगा तक्षशिला की कहानी, भारत के सबसे बड़े पुस्तकालय की कितनी बड़ी दुर्दशा हुई थी, कि उसको जला दिया गया था और तक्षशिला की पुस्तकों को जला देने की बात यह है कि 6 महीने तक विदेशी अक्रन्ताओं ने उन किताबों के पत्रे को जला-जला कर पानी गर्म किया था। ये इतना बड़ा ज्ञान का भण्डार था जो 6 महीने तक जलता रहा था। कल्पना कीजिये लाखों करोड़ों पेज रहे होंगे। कई विदेशी लुटेरे ऐसे आये कि हमारा साहित्य लूट लिया, कई विदेशी लुटेरे ऐसे आये की हमारा साहित्य जला दिया, कई विदेशी अक्रान्ताएं ऐसे आये जिन्होंने हमारे साहित्य को तोड़-मरोड़ करके, उसको ऐसा प्रस्तुत कर दिया कि वो हमें सबसे ज्यादा खराब दिखता है। जैसे
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वेदों की बात करें, हमारे मूल वेद मुश्किल से मिलते हैं। यदि वेदों की प्रतिलिपि पायी जाती है तो पता चलता है कि वे मैक्समूलर रचित हैं और मैक्समूलर ऐसा व्यक्ति था जो भारत को जानना चाहता था लेकिन कभी भारत आया नहीं, घर बैठे उसे जो कुछ भी भारत के बारे में मिला वो उसने लिख दिया। वेदों को उसने पढ़ा पूरी रूचि से, संस्कृत भी सीखी उसने, लेकिन उसे अधिकांश समझ में नहीं आया वेदों में, तो उसने अपने तरीको से लिख दिया, और आज हमें ये दिखाई देता है तो हमें ये सब विरोधाभासी दिखायी देती है क्योंकि हमारे मूल ग्रन्थों के साथ छेड़छाड़ कर दी, ज्ञान के भण्डार के साथ छेड़छाड़ कर दी, हमारे शास्त्रों के साथ छेड़छाड़ कर दी।
यदि हम मूल वेदों को देखो और मैक्समूलर रचित वेदों को देखे तो जमीन आसमान का अंतर है, जैसे मूल मनुस्मृति और अंग्रेजों द्वारा रचित मनुस्मृति में जमीन-आसमान का फर्क है। अंग्रेजों ने हमारे ग्रन्थों में बहुत कुछ मिलावट कर दी है। जैसे ये हमारे वेदों में से कोट कर देते है कि भारतवासी मांस खाते थे, गाय का मांस खाते थे, तो हमारे पास जो ज्ञान का भण्डार रहा संस्कृत भाषा में, इसमें बहुत नुकसान हो गया। ज्ञान हमारे यहाँ दुनिया में सबसे ज्यादा रहा है, क्योंकि भारत एक तरह से ज्ञान का ही हिस्सा है, 'भा' माने होता है "ज्ञान" और 'रत' माने होता है "लगा हुआ"। ये सब हमारे लिए चुनौती की बात है कि जो हमारे वेद रहे हैं, हमारे शास्त्र रहे हैं, उन सब को खोज कर दुनिया के सामने लाना है।
यदि विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो भारत विज्ञान के क्षेत्र में भी सबसे अग्रणी रहा है। स्वास्थ्य को सही रखने हेतु आचार्य चरक ने 'चरक संहिता' की रचना की है।
उसमे आयुर्वेद से सभी बीमारियों का उपचार करने का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है। रसोई में काम आने वाले मसालों (फारसी शब्द) अर्थात औषधियों का उपयोग किस मात्रा में करने से कौन सा रोग दूर होता है सब बताया गया है। महर्षि वाग्भट ने बताया कि जीवन शैली कैसे होनी चाहिए, कितनी मात्रा में जल लेना चाहिए, कैसे जल पीना चाहिए इत्यादि का विस्तार पूर्वक विवरण अष्टांगसंग्रह और अष्टांगहृदयसंहिता में दिया है। उदाहरणार्थ बताता हूँ महर्षि वाग्भट ने कहा था कि भोजन बनाने समय सूर्य का प्रकाश और पवन का स्पर्श आवश्यक है और हमारे गावों में भोजन ऐसे ही पकाया जाता है, जापानियों ने अरबों रुपये खर्च कर के बताया है कि खुले में भोजन बनाने से सम्पूर्ण पौष्टिक तत्व भोजन में आते हैं।
ऐसे बहुत सी बातों का उल्लेख इसमें मिलता है। आयुर्वेद में सभी बिमारियों का पूर्णतया उपचार है अगर आज की चिकित्सा विज्ञान 'एलोपैथी' और 'आयुर्वेद' का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि एलोपैथी में सिर्फ बीमारी से लड़ा जाता है पूर्णतया इलाज नहीं होता। चिकित्सा विज्ञान की सबसे मुश्किल शाखा शल्य चिकित्सा (सर्जरी) होती है, वह भी विश्व को भारत की ही देन है। आचार्य सुश्रुत ने 'सुश्रुत संहिता' में शल्य चिकित्सा की विधि का वर्णन विस्तारपूर्वक किया है।
आचार्य सुश्रुत ने 125 उपकरणों का किया है जिनसे शल्य चिकित्सा की जाती थी उपकरणों का प्रयोग हो रहा है। शल्य मुश्किल भाग है प्लास्टिक शल्य चिकित्सा वह उदाहरण से यह बात बताना चाहूँगा " 1770
उल्लेख सुश्रुत संहिता में और आज भी उन 125 चिकित्सा का एक और भी भारत की देन है। एक ई० में एक राजा था हैदर
अली, वह कर्नाटक का राजा था। अंग्रेजों ने कर्नाटक को अपने अंतर्गत मिलाने के लिए हैदर अली पर खूब आक्रमण किये परन्तु हर बार अंग्रेजों को मुहँ की खानी पड़ी। 1775 ई० में प्रो० कूट भारत में अधिकारी बनकर आया। उसने भी हैदर अली पर आक्रमण किया हैदर अली ने उसे पराजित कर उसकी नाक काट दी। वह कटी नाक लेकर वापस आ रहा था तो बेलगाम के एक वैद्य ने उसकी दशा पर दया कर के उसकी नाक प्लास्टिक सर्जरी से जोड़ दी। इस घटना का विवरण प्रो० कूट ने ब्रिटिश सभा में किया, तब ब्रिटिश दल भारत उस वैद्य के पास आया और पूछा के यह विद्या आपने कहाँ से सीखी तब उसने बताया कि "यह कार्य मैं क्या कोई भी वैद्य कर सकता है"। तब प्रो० कूट ने यह विद्या पूना में सीख कर इंग्लैंड में सीखाई। यह सब जानकारी प्रो० कूट ने अपनी डायरी में लिखी है। ऐसे ही टीकाकरण की शुरुआत भी भारत में ही हुयी। डॉ. ओलिव ने अपनी डायरी में लिखा है कि "जहाँ विश्व में लोग चेचक से मर रहे है वही यहाँ भारत में चेचक नगण्य के बराबर है और यहाँ इसके लिए टीकाकरण किया जाता है।" यह घटना 1710 की कलकत्ता की है यह तो सिर्फ कुछ ही उदाहरण है जो ये बताते है कि भारत कितना समृद्ध था और यह ज्ञान भारत में लाखों वर्षों से चला आ रहा है। ये सब घटनाओं का पता विदेशी यात्रिओं के विवरण से चलता है। अब थोड़ा तकनीक की और देखते है। भारत ने विश्व को लोहा (इस्पात या स्टील) बनाना सिखाया। 1795 में एक अंग्रेज अधिकारी ने सर्वेक्षण किया और अपनी यात्रा विवरण में लिखा है कि " भारत में इस्पात का काम कम से कम पिछले 1500 वर्षों से हो रहा है।" उसके अनुसार " पश्चिमी, पूर्वी, दक्षिणी भारत में 15000 छोटे बड़े कारखाने चल रहे है और हर कारखाने में रोजाना 500 कि०ग्रा० इस्पात बनाया जाता है। भारत में किसी भी कारखाने की भट्टी में लागत का खर्च 15 रुपये आता है। एक भट्टी से एक टन इस्पात बनाया जाता है और इस्पात बनाने का खर्च 80 रुपये आता है। इस इस्पात से बना सरिया यूरोप के बाजार में बिकता है और इस इस्पात की सबसे बड़ी विशेषता है कि उस पर कभी जंग नहीं लगता है।"
इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण दिल्ली के महरोली पूर्व (लगभग) बना था और आज तक उस पर जंग नहीं खगोल विज्ञान के क्षेत्र में गुरुत्वाकर्षण से सम्बन्धित और आर्यभट ने न्यूटन से 4000 वर्ष पूर्व ही प्रतिपादित के बीच की दूरी, शनि के उपग्रहों की संख्या, आदि जो आज का विज्ञान मानता है। आर्यभट ने सबसे पहले ब्लैक होल थ्योरी दी। स्पष्ट है कि ये सभी गणना बिना किसी टेलिस्कोप के सम्भव नहीं है अर्थात टेलिस्कोप का आविष्कार भी भारत में ही हुआ था। आर्यभट ने बहुत सारे रहस्य खगोल विज्ञान के बारे में बताये थे जिनमे पृथ्वी के घूर्णन का समय, दिन रात और वार या यूँ कहें दिन की संख्या बताई थी। हम कह सकते है कि कलेंडर भी भारत की ही देन है।
में ध्रुव स्तम्भ है जो 1500 वर्ष लगा है। सभी नियम वराहमिहिर कर दिए थे। सूर्य से पृथ्वी सभी गणना उतनी सटीक है
अगर अब बात आर्यभट्ट की हो रही है तो यह तो सर्व विदित है कि शुन्य का आविष्कार भारत ने किया। विश्व को गणना करना भारत ने सिखाया। महर्षि भरद्वाज ने एक ग्रन्थ 'लीलावती' की रचना की उसमे उन्होंने अवकलन के सूत्रों का वर्णन किया है। समाकलन गणित की रचना महर्षि माधवाचार्य ने की है। गणित की बहुत ही सरल शाखा है
त्रिकोणमिति उसकी रचना बोधायन ने की थी और किसी भी निर्माण कार्य के लिए त्रिकोणमिति का ज्ञान होना आवश्यक है। बीज गणित की रचना भी महर्षि भरद्वाज ने की थी। बीज गणित में समस्त गणित का छोटा रूप है।
वैदिक गणित एक ऐसी देन है जिसके द्वारा किसी भी गणना को कम से कम समय में किया जा सकता है।
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रसायन शास्त्र में भारत के नागार्जुन का नाम अग्रणी है। नागार्जुन राख से सोना बनाने की विधि को जानते थे। भारत ने ही पारा बनाने की विधि का वर्णन विश्व को दिया है। सबसे पहले बर्फ बनाने की विधि चक्रवर्ती सम्राट हर्षवर्धन के द्वारा खोजी गयी। वह बहुत बड़ा रसायन शास्त्री था। शुष्क सेल का आविष्कार भी भारत में महर्षि अगस्त्य के द्वारा हुआ था। अगस्त्य संहिता में शुष्क सेल बनाने की विधि का पूर्ण विवरण है। डायरेक्ट करंट (दिष्ट धारा) की जानकारी महर्षि अगस्त्य ने ही दी थी। रसरत्न समुच्चय में जस्ता बनाने की विधि का उल्लेख मिलता है।
अर्थशास्त्र में सबसे बड़ा ग्रन्थ " अर्थशास्त्र" आचार्य चाणक्य के द्वारा दिया गया है जो कि ईसा से 400 वर्ष पूर्व दिया जा चुका है।
विश्व को सिकका बनाना भारत ने सिखाया इसका प्रमाण मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से प्राप्त अवशेषों से चलता है। भारत से कई वर्षों से मसालों का निर्यात किया जा रहा है। भारत के इस्पात का विवरण हम पहले ही दे चुके हैं जो यूरोप के बाजारों में बहुत ही ऊँचे दामों पर बेचा जाता था।
स्पष्ट है कि भारत में कितना ज्ञान था और यह ज्ञान पूरे भारत में शिक्षण व्यवस्था से दिया जाता था। 1868 में ब्रिटेन में पहला विद्यालय एक कानून के तहत खुला था, उस समय भारत में लगभग 7 लाख 18 हजार 568 गुरुकुल चला करते थे
और उन गुरुकुलों में सिर्फ एक आचार्य होते थे और हर गुरुकुल में विद्यार्थियों की संख्या हजारों में हुआ करती थी। कक्षा नायक ही अपने साथी विद्यार्थियों को सिखाया करता था। यह शिक्षण व्यवस्था विश्व को भी भारत ने ही दी थी। प्रो० कूट ने अपनी डायरी में लिखा है कि जिस आचार्य से उसने प्लास्टिक सर्जरी सीखी थी तो सीखाने वाला आचार्य जाती से नाई था अर्थात स्पष्ट है कि जातिगत शिक्षण व्यवस्था भारत में
नहीं थी। आज भी ब्रिटेन में भारत की कक्षा नायक वाली शिक्षण व्यवस्था चलती है। जिस समय हेनसांग भारत आया था तब उसने अपने विवरण में लिखा है कि कलकत्ता में 20,000 विद्यार्थी अपनी शिक्षा पूर्ण कर अपने देश लौटने की तैयारी कर रहे हैं अर्थात भारत से ही समस्त ज्ञान विश्व में फैला है।
कृषि क्षेत्र में खेती करने के तरीके, पहला अविष्कार पहिया, उपयुक्त फसल प्राप्त करने के तरीके भारत ने ही दिए थे। कुछ अन्य अविष्कार जैसे हवाई जहाज भारत में हुए। 1895 में विश्व का सबसे पहला विमान मुंबई की चौपाटी पर शिवकर बापूजी तलपडे ने उड़ाया था।
विमान शास्त्र (महर्षि भारद्वाज द्वारा रचित) के अनुसार विमान बनाने के 500 सिद्धांत हैं और हर सिद्धांत से 32 अलग अलग तरह के विमान बनाये जा सकते हैं। 1895 में जो विमान उड़ा वह 1500 फीट उपर उड़ाया गया था और वह भी बिना चालक के उड़ाया गया था, उस विमान को सुरक्षित तरीके से उतारा भी गया था। इस विमान को उड़ते हुए राजकोट के राजा अशोक गायकवाड, मुंबई हार्ड कोर्ट के जज गोपाल रानाडे, और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने देखा था। हमारी लापरवाही के कारण यह
अविष्कार (1903) राईट बंधू के नाम दर्ज हुआ। उन्होंने जो विमान बनाया वह 120 फीट उपर उड़कर नीचे गिर गया था। बारूद का आविष्कार भी भारत में हुआ। भारत में बारूद का उपयोग 6वीं शताब्दी में पटाखे बनाने के लिए किया जाता था। अंग्रेजों ने बारूद बनाना भारत में सीखा और उसका उपयोग हथियार बनाने के लिए किया।
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