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स्वदेशी उत्पाद बनाने की विधि (भाग 1)

Swadeshi Utpad Banane Ki Vidhi (Bhag 1)

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Utpad Series Part 1 · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished79 पृष्ठ

सामग्री -

1. स्लरी-1 लीटर
2. कास्टिक सोडा-200 ग्राम
3. यूरिया-200 ग्राम
4. पानी-5 लीटर
5. कलर-आवश्यकतानुसार
6. सेण्ट-आवश्यकतानुसार

बनाने की विधि -

सर्वप्रथम पानी में कास्टिक सोडा और यूरिया मिलाएं। यह पानी स्लरी में धीरे- धीरे छोड़िए और सेण्ट व कलर दीजिए, वाटर प्रूफ लिक्विड तैयार है।

(75) उदरशोधन चूर्ण

सामग्री -

1. बाल हरड (छोटी हरड)-200 ग्राम
2. आँवला कंठी-200 ग्राम
3. सोनामुखी-200 ग्राम
4. इन्द्र जौ-200 ग्राम
5. काला नमक-100 ग्राम
6. बड़ी हरड-100 ग्राम
7. एरण्ड तेल-आवश्यकतानुसार

बनाने की विधि -

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  1. 1. बाल हरड को एरण्ड तेल में तलकर महीन चूर्ण बना लें।
  2. 2. इसके बाद अन्य सभी चीजों का कपड़छन चूर्ण में मिलाकर रख लें।
  3. 3. इसके एक चम्मच की मात्रा में सोते समय गुनगुने पानी के साथ लेना चाहिए। हफ्ते में एक बार लेते रहने से पेट साफ रहता है। इससे बुखार आदि उपद्रव भी नही हो पाते।

(76) पोटीन (पुट्ठी-1)

लकड़ी आदि का छेद भरने को

सामग्री -

  1. 1. चाइना कले मिट्टी - 1 किलो
  2. 2. सोयाबीन का तेल - 1 किलो

बनाने की विधि -

दोनों एक साथ अच्छी तरह पीसने से पोटीन तैयार होती है।

(77) पोटीन (पुट्ठी-2)

सामग्री -

  1. 1. चाइना कले मिट्टी - 1 किलो
  2. 2. रेजिन - 250 ग्राम
  3. 3. ग्रे कलर - 50 ग्राम

बनाने की विधि

सबको एक साथ पीसें, पोटीन तैयार हो जाएगी।

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(78) लिक्विड कोलतार

सामग्री -

  • 1. रोडटार(तारकोल) - 100 किलो
  • 2. केरोसिन - 100 किलो
  • 3. चूना पाउडर - 5 किलो

बनाने की विधि

  • 1. तारकोल गरम करें, जब पतला हो जाए तो भट्टी बुझा दें। केरोसीन में चूना मिलाकर तारकोल में मिला दें।
  • 2. इसे लगाने से लकड़ी , टीन आदि सुरक्षित रहते हैं, सड़ते नहीं हैं।

(79) पेण्ट में डालने का टर्पेण्टाइन

सामग्री -

  • 1. व्हाइट केरोसीन - 200 लीटर
  • 2. पाइन ऑइल - 5 लीटर

बनाने की विधि -

दोनों को मिलाकर 24 घण्टे के लिए एअरटाइट बंद रख दें। इसके बाद पैकिंग करें।

(80) बेकरी उत्पाद डबलरोटी(ब्रेड)

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सामग्री -

1. मैदा-1 किलो
2. ईस्ट ग्राम(गर्मी में)-8 से 10
ग्राम(सर्दी में)-10 से 15
3. चीनी-30 ग्राम
4. नमक-20 ग्राम
5. घी-20 ग्राम
6. पानी-600 मि. लीटर

बनाने की विधि -

  1. 1. एक बर्तन में एक कप साधारण गरम पानी लेकर उसमें 15 ग्राम पीसी चीनी घोलें। इसमें ईस्ट डालकर 10 मिनट तक ढँककर रख दें।
  2. 2. दूसरे बर्तन में बचें हुए पानी में 20 ग्राम नमक एवं 15 ग्राम चीनी डालकर शर्बत जैसी घोल तैयार करें
  3. 3. जब ईस्ट, साबुन या दही के झाग समान फूलकर ऊपर आ जाए तब उसमें 50 से 100 ग्राम मैदा डालकर , किसी चीज से अच्छी तरह चलाकर पतला घोल तैयार करें तथा पुन 10 से 15 मिनट तक ढककर रख दें।
  4. 4. अबे मैदा में ईस्ट वाला घोल , नमक व चीनी का घोल तथा घी डालकर अच्छी तरह गूँथ ले। मैदे को गूँथने में रोटी के आटे से थोडा मुलायम रखें। तैयार मैदे को 2 से 2.5 घण्टे तक खमीर उठने (फूलने) के लिए ढँककर रख दें।
  5. 5. इसको हल्का सा मसलकर उसमें से 400 ग्राम वजन की मात्रा तौलकर उसकी गोल लोई बनाकर 5 मिनट के लिए रख दें।

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  1. 6. इस बीच ब्रेड पकाने वाले साँचे में घी या तेल लगाकर तैयार कर लें ताकि ब्रेड साँचे से चिपके नहीं और आसानी से बाहर निकल सकें।
  2. 7. 5 मिनट बाद इस मैदा को मोल्डिंग करके(साँचे की आकृति देंने को मोल्डिंग कहते हैं।) साँचे में रखे तथा ऊपर से ढक्कन लगाकर साँचे को बन्द करें। 2 से 2.5 घण्टे तक साँचे को ऐसे ही रहने दें।
  3. 8. साँचा जब मैदा से अच्छी तरह भर जाए तब उसे 400 डिग्री फ़रेनहाइट गर्म भट्टी में 20 मिनट तक पकाकर निकाल लें।

1 किलो मैदा के मिश्रण से 4 ब्रेड तैयार होते हैं। ब्रेड के मैदे में से बंद बर्गर व पीजा इत्यादि भी बना सकते हैं।

(81) कैक

सामग्री -

1. मैदा-1 किलो
2. घी-600 ग्राम
3. चीनी-1 किलो
4. मिल्क पाउडर-200 ग्राम
5. कार्न फ्लोर-50 से 100 ग्राम
6. बेकिंग पाउडर-10 ग्राम
7. वेनिला एसेन्स-10 ग्राम
8. दूध या पानी-750 मि. ली० से 1 ली०

बनाने की विधि-

  1. 1. एक बर्तन में मैदा को छानकर रखें

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  1. 2. दूसरे बर्तन में घी लेकर (जमा हुआ) अच्छी तरह फेंटें तथा उसमें पीसी चीनी धीरे-धीरे मिलाते जाए। आवश्यकतानुसार इसमें थोड़ी मात्रा में दूध या पानी डालकर मिश्रण को घोटकर क्रीम जैसा तैयार करें।
  2. 3. इस मिश्रण में कार्न फ्लोर एवं मिल्क पाउडर अच्छी तरह फेंटे। अच्छी तरह मिल जाने के बाद बैंकिंग पाउडर एवं वेनिला एसेन्स या छोटी इलायची पीसकर डालें। बैंकिंग पाउडर डालने के बाद मिश्रण को एक ही दिशा में फेंटें।
  3. 4. अंत में थोडा- थोडा मैदा एवं थोडा-थोडा दूध या पानी डालते हुए मिश्रण को हल्के हाथों से उँगलियों की सहायता से मिलाते जाएं। यह ध्यान रखें कि मिश्रण ज्यादा पतला था। ज्यादा कडा (टाइट) न होने पावे। इस मिश्रण को पकोडे के घोल की तरह तैयार करें।
  4. 5. केक पकाने वाले साँचे में घी अथवा तेल लगाकर तैयार करें ताकि केक साँचे में चिपके नही तथा आसानी से बाहर निकल सके ।
  5. 6. तैयार ट्रे में उपरोक्त मिश्रण को 1 इंच या 1.5 इंच की मोटाई में साँचे में चारों तरह बराबर डालें तथा 300 फारेनहाइट गरम भट्टी में 25 से 30 मिनट तक पकाकर निकाल लें। इसे रैक या जाली में रखे।
  6. 7. केक जब पूरी तरह ठण्डी हो जाय तब उसे ट्रे से बाहर निकालें और यदि आवश्यक हो तो पैक करें

केक पर आयसिंग (सजावट) -

यदि केक पर आइसिंग करना चाहते हैं तो निम्न विधि से की जाती है- एक बर्तन में 200 ग्राम मलाई, मक्खन या घी लेकर अच्छी तरह फेंटें । इसमें 50 ग्राम आइसिंग शुगर या 100 ग्राम पिसी चीनी डालकर अच्छी तरह फेंटें । इस मिश्रण में 5 बूँद बेनाना एसेंस या वेनिला एसेंस एवं थोड़ी मात्रा

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मे दूध डालकर अच्छी तरह फेंटकर क्रीम तैयार करें। क्रीम में खाने वाला रंग डाल सकते हैं। अब तैयार क्रीम को केक के ऊपर अपने मनपसंद ढंग से सजाएं।

(82) बिस्कुट (मीठे बिस्कुट)

सामग्री -

1.आटा या मैदा-1 किलो
2.घी-400 ग्राम
3.चीनी-500 ग्राम
4.बेकिंग पाउडर-10 ग्राम
5.अमोनिया बाई कार्ब-10 ग्राम
6.कस्टर्ड पाउडर-50 ग्राम
7.वेनिला एसेंस-5 मि. लीटर
8.नमक-5 ग्राम
9.दूध या पानी-250 से 300 मि.लीटर

बनाने की विधि -

  1. 1. मैदा या आटा को छानकर रखें।
  2. 2. एक बर्तन में घी लेकर (जमा हुआ) अच्छी तरह फेंटें तथा उसमें पिंसी चीनी धीरे-धीरे मिलाते जाए जब तक कि सारी चीनी मिल जाए।
  3. 3. इस मिश्रण में थोड़ी मात्रा में दूध या पानी मिलाकर मिश्रण को अच्छी तरह फेंटें इसमें क्रमशः कस्टर्ड पाउडर, बेकिंग पाउडर, अमोनिया बाइकार्ब या (मीठा सोडा), नमक, वेनिला एसेंस, या छोटी इलायची पीसकर डालें तथा मिश्रण को अच्छी तरह मिला लें।

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4. अंत में मैदा या आटा डालकर आवश्यकतानुसार दुध या पानी से मिश्रण को अच्छी तरह मिलाएँ एवं मसलें। इस मिश्रण को रोटी के आटे से हल्का नरम रखें।

5. तैयार मिश्रण की बड़ी-बड़ी लोई बनाकर बेलन की सहायता से 1 बटे 8 की मोटाई में बेलकर बिस्कुट साँचे से बिस्कुट काटे। कटे हुए बिस्कुटो को घी लगी एल्यूमीनियम ट्रे में एक-एक इंच की दूरी में सजाएं।

6. ट्रे को 350 डीग्री फारेनहाइट गर्म भट्टी में 10 से 15 मिनट तक पकाकर निकालें। ठण्डा करके बिस्कुटो को आवश्यकतानुसार पैक अथवा संग्रहण करें। 1 किलो मैद में 750 ग्राम बिस्कुट तैयार हो जाते हैं।

(83) कोकोनेट बिस्कुट

सामग्री -

1.मैदा-800 ग्राम
2.घी-300 ग्राम
3.चीनी-500 ग्राम
4.नारियल बुरादा-200 ग्राम
5.बेकिंग पाउडर-10 ग्राम
6.अमोनिया बाई कार्ब-10 ग्राम
7.नमक-5 ग्राम
8.कोका पाउडर-5 ग्राम
9.दूध पाउडर-25 ग्राम
10.कोकोनेट एसेंस-5 मि. लीटर
11.दूध या पानी-250 से 300 मि. लीटर

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बनाने की विधि

बनाने की विधि मीठे बिस्कुट की तरह ही है।

(84) नमकीन बिस्कुट

सामग्री -

  • 1. मैदा या आटा - 1 किलो
  • 2. घी - 400 ग्राम
  • 3. चीनी - 25 ग्र। से 200 ग्राम (इच्छानुसार)
  • 4. नमक - 25 ग्राम
  • 5. बेकिंग पाउडर - 10 ग्राम
  • 6. अमोनिया बाई कार्ब - 10 ग्राम
  • 7. अजवायन या जीरा - 10 ग्राम
  • 8. दूध या पानी - 250 ग्राम से 300 ग्राम

बनाने की विधि

उपरोक्तानुसार मीठे बिस्कुट की तरह ।

(85) नान खटाई

सामग्री -

  • 1. मैदा - 600 ग्राम
  • 2. घी - 700 ग्राम

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  1. | बेसन | - | 200 ग्राम ---|---|---|---
  2. | सूजी | - | 200 ग्राम
  3. | चीनी | - | 500 ग्राम
  4. | जायफल | - | 1 बटे 2 (आधा)
  5. | अमोनिया बाईकार्ब | - | 2.5 ग्राम
  6. | बेकिंग पाउडर | - | 2.5 चम्मच
  7. | वनिला एसेस | - | 1 चम्मच

बनाने की विधि -

  1. 1. मैदा को छानकर रखें।
  2. 2. एक बर्तन में घी लेकर अच्छी तरह फेंटे तथा उसमें पिंसी चीनी डालकर अच्छी तरह मिलाते जाएं और क्रीम जैसा मिश्रण तैयार करें।
  3. 3. इस क्रीम में क्रमशः बेसन, सूजी डालकर अच्छी तरह मिलाएं। अच्छी तरह मिल जाने के बाद इस मिश्रण में अमोनिया बाईकार्ब, बेकिंग पाउडर, वनिला एसेस एवं जायफल पीसकर डालें तथा अच्छी तरह मसलें।
  4. 4. अंत में मैदा डालकर बिस्कुट के आटे की तरह तैयार करें। तैयार आटे से छोटी छोटी लोई काटकर सुपारी या आँवले की तरह गोल बनाकर पकाने वाली घी लगी ट्रे (एल्युमीनियम ट्रे) में दो- दो इंच की दूरी में रखें।
  5. 5. ट्रे को 275 डिग्री फ़रेनहाइट गरम भट्ठी में रखें 10 से 15 मिनट तक पकाकर निकालें। ठण्डा होने पर डिब्बे में पैकिंग करें।

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(86) मोमबत्ती

सामग्री -

1. पैराफिन वैक्स (मोम)-आवश्यकतानुसार
2. खाने वाला तेल-आवश्यकतानुसार
3. हल्का बटा हुआ सूती धागा-आवश्यकतानुसार
4. रंग (यदि रंगीन बनाना हो)

विधि -

  1. 1. पैराफिन वैक्स को किसी गहरे बर्तन में पिघलाने के लिए रख दें। इसे वनस्पति घी की तरह पिघलाएं।
  2. 2. मोम पिघलने तक मोमबत्ती साँचे को कर लें। साँचे को पुराने कपड़े की सहायता से अच्छी तरह साफ करके उसमें (कपड़े अथवा रूई से) खाने वाला तेल लगाएं। ताकि मोम साँचे से न चिपके।
  3. 3. इसके बाद साँचे में बने चिह्नों की सहायता से खाँचे के बीच से ले जाते हुए हैण्डिल में बने गुव में ले जाकर लपेटते जाते हैं। अन्त में दूसरे सिरे बाँध देते हैं।
  4. 4. इसके बाद पुराने सूती कपड़े को गीला करके समतल जमीन या बैच पर बिछाएं फिर उसके ऊपर साँचे को रखें। इतना करने तक हमारा मोम पिघल जाएगा।
  5. 5. अब पिघले हुए मोम को चम्मच या कटोरी की सहायता से साँचे में डालें। जो मोम नीचे बह जाता है, उसे सूती कपड़े में पुनः प्रयोग हेतु इकट्ठा कर लें।
  6. 6. साँचे को पानी से भरी बाल्टी में ठण्डा होने के लिए रख दें। मोम को साँच में जमने के लिए कम से कम 10-15 मिनट तक पानी में रखें।

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  1. 7. यदि पहली बार मोम डालने पर साँचे में मोम की मात्रा कुछ कम रह गयी हो तो पुनः पिघला मोम साँचे में डालकर ऊपर तक भर लें तथा जमने के लिए फिर पानी में रख दें।
  2. 8. अब साँचे को (जिसमें मोमबत्ती जम चुकी है) पानी से निकालकर साँचे के दो तरफ के धागे (बीच से) ब्लेड या कैंची से काटें।
  3. 9. साँचे के ऊपर की तरफ जमे हुए मोम को बीचों-बीच चाकू से काटकर साँचे के दोनों भागों को क्लैम्प खोलकर अलग करें।
  4. 10. बनी हुई मोमबत्तियों को साँचे से बाहर निकालकर, दूसरे सिरों को ब्लेड से काटकर प्लेन कर लें तथा आवश्यकतानुसार पैकिंग करें।

सावधानियाँ -

  1. 1. साँचे में धागा कसकर लपेटना चाहिए।
  2. 2. पानी से भरी बाल्टी में साँचे को अधिक से अधिक डुबोएँ, पूरा न डुबोएँ।
  3. 3. मोम को केवल पिघलाया जाता है, उबालना नहीं है।

निर्माण सामग्री के प्राप्ति स्थान

1. निम्न वस्तुओं के लिए किराना की दुकान पर संपर्क करें - आरारोट, सैक्रीन, भीमसेनी कपूर, अजवाइन फूल, ठंडई(मेन तोल), पिपरमिंट, सुहागी (बोरेक्स पाउडर), नमक, गेरू पाउडर, लाल फिटकरी, अकराकरा, सोना, सुखी, बाल हरड, आँवला कंठी, काला नमक, हरड पाउडर, गुड़ शहद, मैदा लकड़ी पाउडर, चंदन पाउडर, गुग्गुल, नागर मोथा, इमली छिलका, संतरे के छिलके, गंदा बिरोजा, सोयाबीन तेल, तिल्ली तेल, एरण्ड तेल, खोपरा तेल, पाम तेल, गोंद का बारीक पाउडर, कत्था, सुपारी, हरी सॉफ मोटी, हल्दी, सेवरधनी सुपारी, गुलाब पत्ती, शक्कर, बॉर्नवीटा, कोको, कॉफी, सॉठ, काली मिर्च, लॉंग, जायफल, इलायची, नीला थोथा, बबूल गोंद इत्यादि।

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2- स्टेरिक एसिड, टिटैनियम, बोरिक पाउडर, डोडेसिल बैजीन, सल्फ्यूरिक एसिड, स्लॉरी, कलर, एस एल एस, सोडियम लारेल सल्फेट, रोजिन, कास्टिक सोडा, यूरिया, क्रियासुट ऑइल, ग्रेफाइट, सी एम सी जैसी चीजें अपने शहर की केमिकल की दुकानों से लीजिए अथवा नागपुर में रेशमवाली गली के ठक्कर ब्रदर्स व स्वास्थ्य केमिकल्स बुधवारी, दिल्ली के तिलक बाजार तथा बंबई में अमृतलाल भूरा भाई प्रिंस स्ट्रीट से भी संपर्क कर सकते हैं।

घरेलू उद्योग सम्बन्धी बुनियादी बातें

नागपुरवासी श्री अनिल प्रसाद पहले तकनीक क्षेत्र में छोटी सी नौकरी करते थे। नौकरी में उन्हें लगा कि पर्याप्त बचन नहीं हो पा रही है तो उन्होंने फुरसत के समय में कोई और धंधा शुरू करने का विचार बनाया। एक बार डिटर्जेंट पाउडर की एक दुकान पर उन्हें मालूम चला कि वहाँ इसे बनाने की सामग्री भी मिलती है तो उनके मन में आया कि क्यों ना यही का किया जाए। और फिर, जरूरी जानकारी हासिल करके अनिल जी ने खाली समय में डिटर्जेंट पाउडर बनाकर बेचना शुरू कर दिया।

प्रारम्भिक दिनों में अनिल जी घर-घर जाकर अपना उत्पाद बेचते थे। उधार देना पड़े तो उधार भी देते थे। यहाँ तक कि गुणवत्ता परखने के लिए लोगों के बीच नमूने के पैकेट भी बाँटे। धीरे-धीरे उपभोक्ताओं का विश्वास उनके उत्पादन पर जमने लगा तो बात आगे चल निकली। इसी दौरान ऐक्सीडेण्ट में अनिल जी के एक हाथ की तीन उँगलियाँ कट गईं तो मालिक ने उन्हें अनुपयोगी समझकर नौकरी से निकाल दिया। यह उनके लिए चुनौती भरा समय था। लेकिन इस चुनौती को स्वीकार करते हुए उन्होंने अपने आपको पूरी तरह से ही डिटर्जेंट निर्माण के लिए समर्पित कर दिया। आज स्थिति यह है कि इस घरेलू रोजगार की बदौलत अनिल जी अपना तथा अपने परिवार का मजे में भरना-पोषण तो कर ही रहे हैं, साथ ही अब

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उन्होंने अपने व्यवसाय को विस्तार देकर कुछ और भी चीजों का उत्पादन शुरू कर दिया हैं।

गुलबर्गा (कर्नाटक) के निवासी श्री सुनील शाबादी की कहानी तो और भी चुनौती भरी हैं। एक समय था कि वे बेरोजगारी से तंग आकर और परिवार वालों के ताने सुन-सुनकर आत्महत्या कर लेने का मन बना चुके थे। लेकिन संयोगवश उन्हीं दिनों गुलबर्गा में ही आयोजित एक कार्यक्रम में आजादी बचाओं आंदोलन के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री राजीव दीक्षित का व्याख्यान उन्हें सुनने को मिला तो जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण ही बदल गया। बाद में आन्दोलन के स्थानीय कार्यकर्ताओं से सुनील जी ने संपर्क किया तो कार्यकर्ताओं ने उनकी व्यथा-कथा सुनने के बाद उन्हें डिटर्जेंट पाउडर बनाने का फार्मूला उपलब्ध कराया तथा कुछ आर्थिक सहायता देकर छोटे स्तर से घरेलू रोजगार शुरू करने का परामर्श दिया। आज स्थिति यह है कि सुनील शाबादी का कारोबार लाखों में पहुँच चुका है और वे एक साथ दर्जन भर परिवारों का भरण-पोषण करने में सक्षम हैं।

इस पुस्तक की सबसे खास बात यह है कि इसमें सिर्फ उन्हीं वस्तुओं के फार्मूले दिये गए हैं, जिनके निर्माण में कम पूँजी लगती है, बड़ी मशीनों की जरूरत नहीं होती, बनाने में आसानी रहती है और कोई भी व्यक्ति घरेलू स्तर पर बनाकर अपनी आजीविका चला सकता है।

कोई भी उद्यम शुरू करने के पहले उससे सम्बन्धित कुछ बुनियादी बातें अवश्य जान लेनी चाहिए। जिस वस्तु का उत्पादन करना हो, उसके निर्माण सम्बन्धी पर्याप्त ज्ञान का होना भी जरूरी है ही, साथ ही उत्पाद की खपत समुचित ढंग से हो सके, इसके लिए बाजार का अध्ययन-सर्वेक्षण और उपभोक्ताओं की मानसिकता व उनकी जरूरतों की समझ बनानी भी जरूरी है। यह जानना चाहिए कि लोगों की पसन्द क्या है। मान लीजिए कि डिटर्जेंट पाउडर का उत्पादन करना है तो उपभोक्ताओं की मानसिकता की पकड़ होनी चाहिए कि उन्हें कैसा पाउडर पसन्द है, पाउडर का कैसा रंग

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अच्छा लगता है, कैसी खुशबू लोग पसन्द करते हैं, या कि पाउडर में झाग कितनी होनी चाहिए। अपने उत्पाद का मूल्य आपको अपने उपभोक्ताओं की जेबी हालत और बाजार में पहले से मौजूद अन्य उत्पादकों की नीतियाँ देखते हुए ही तय करती पड़ेगी। डिटर्जेंट पाउडर का उदाहरण लें तो यह समझना जरूरी है इसके उपभोक्ता मुख्यतः निम्न तथा मध्यम श्रेणी के ही लोग होंगे। उच्च तबके के लोग सामान्यतः डिटर्जेंट पाउडर का इस्तेमाल बंद ही कर चुके हैं और वे अब वाशिंग मशीनों का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं। ऐसे में निम्न तथा मध्य वर्ग की आवश्यकताओं को ही ध्यान में रखकर चलना होगा।

बिना मशीनों की सहायता लिए हाथ से बुनाई जाने वाली चीजों का स्वयं परीक्षण कर पाना मुश्किल होता है, इसलिए ग्रहकों में अपने उत्पाद का नमूना वितरित करके प्रतिक्रिया अवश्य जाननी चाहिए। आज के समय में गुणवत्ता (क्वालिटी नियंत्रण) अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि बाजार में बड़ी-बड़ी कंपनियाँ मौजूद हैं, जिनसे कि हमेशा ही प्रतियोगिता का सामना करना पड़ेगा। किसी समय उत्पाद की बिक्री आसान थी और उत्पादक का महत्व बहुत ज्यादा था, क्योंकि तब उद्योग बहुत कम थे और प्रतियोगिता लगभग न के बराबर थी।

वर्तमान में बड़ी-बड़ी कंपनियों में अपना वर्चस्व बनाने के लिए जिस तरह से विज्ञापनी युद्ध चल रहा है, वह भी छोटे उद्यमियों के लिए एक बड़ी समस्या है। छोटे उद्यमी के पास इतना धन नहीं होता कि वह इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के जरिए विज्ञापनों के ऊपर ही लाखों करोड़ों रुपये खर्च कर सके। ऐसे में वह क्या करें, यह एक सवाल है? इस विषय में विशेष बात यह है सीमित पूँजी वाले उद्यमी को शुरुआत में विज्ञापनों के पीछे बहुत परेशान होने की कतई जरूरत नहीं है। बल्कि गुणवत्ता (क्वालिटी), व्यवहारकुशलता, कार्यकुशलता और व्यापक जन सम्पर्क की क्षमता पैदा करना सफल होने के लिए सबसे जरूरी है। अगर किसी व्यक्ति में ये सभी गुण मौजूद हैं तो तमाम मुश्किलों में भी वह स्थापित हो ही जाएगा और ये ही

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गुण उसके लिए सबसे बड़े विज्ञापन के माध्यम बन जाएंगे। बाद में जब स्थिति मजबूत होने लगे तो और तेजी से बाजार में व्यापक पहुँच बनाने के लिए आकर्षक पैकिंग, विज्ञापन आदि पर ध्यान दिया जा सकता है। इन सबमें गुणवत्ता बनाये रखना और उसे बेहतर करते रहना सबसे जरूरी बात है, क्योंकि अंततः कोई ग्राहक आपके उत्पाद का बार-बार इस्तेमाल तभी करना चाहेगा, जबकि उसे दूसरी अन्य कंपनियों से तुलनात्मक रूप से बेहतर पाएगा।

स्वानंद अपनाइये

राष्ट्रधर्म निभाइये

स्वदेशी माल पर लगा गौरव चिन्ह.... स्वानंद।

ऊँचे दर्जे के स्वदेशी माल की पहचान.... स्वानंद।

उत्पादन - ग्राहक के परस्पर विश्वास का प्रतीक.... स्वानंद।

स्वदेशी और स्वराज एक ही सिकके के दो पहलू हैं

भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बनाए रखने के लिए, हमारे उद्योग, हमारी संस्कृति टिकाए रखने के लिए स्वदेशी अपनाना हमारा कर्तव्य बनता है, और स्वदेशी अपनाने के लिए सबसे आसान रास्ता है..... स्वानंद

“स्वानंद पीठम” के मुख्य उद्देश्य हैं.....

इस देश में हर हाथ को काम मिले

इस देश में केवल ऊँचे दर्जे के माल का ही उत्पादन हो

इस देश का व्यापारी स्वदेशी माल की बिक्री करने में गौरव अनुभव करे

इस देश का उपभोक्ता केवल स्वदेशी माल खरीदकर राष्ट्रधर्म निभाए

इस देश का उद्योग विश्व में स्पर्धा योग्य बने।

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स्वानंद पीठम की ओर से स्वदेशी उत्पादन की प्रयोगशाला में गहरी जाँच करके प्रमाणीकरण प्रदान किया जाता है, प्रमाणीकरण प्राप्त करने पर उत्पादक अपने माल पर स्वानंद की मोहर लगाकर उसे ऊँचे दर्जे के स्वदेशी माल की पहचान दिला सकते हैं, परंतु स्वानंद केवल मानक नहीं है, वह तो है एक गौरव चिन्ह जो पहचान दिलाएगा हमारे राष्ट्रीय चारित्र की।

स्वानंद से क्या फायदा?

स्वानंद चिन्ह लगने से....

ग्राहक को स्वदेशी माल पहचानना आसान होगा।

माल की बिक्री बढ़ेगी।

देश की संपत्ति देश में रहेगी।

राष्ट्रहित की रक्षा होगी।

उत्पादक का सम्मान बढ़ेगा।

अधिक जानकारी के लिए निम्न पते पर संपर्क करें -

श्री सुरेश पिंगले,

स्वानंद अनुसंधान पीठम, 440, यशोधाम, विद्यापीठ मार्ग (मफतलाल बंगले के पीछे), पुणे (महाराष्ट्र) - 411017

फोन - 5658


स्वरोजगार के प्रशिक्षण शिविरों में भाग लें

आजादी बचाओ आंदोलन पिछले 8-10 वर्षों से विदेशी कंपनियों के खिलाफ लगातार जनजागृति और संघर्ष का काम करता रहा है। शुरुआत के 3-4 वर्षों में आंदोलन बहुत व्यापक नहीं था। न तो आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि बहुत व्यापक थी और न ही आंदोलन का विस्तार। 1995 के बाद धीरे-धीरे

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आंदोलन ने लोगों के बीच अपनी उपस्थिति का आभास कराना शुरू कर दिया। शुरुआत में तो आंदोलन केवल उत्तर प्रदेश और उसके आस-पास के क्षेत्र में ही सक्रिय था। लेकिन 1995 के बाद महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान में सक्रियता शुरू हुई। 1998 के बाद तो इन राज्यों के अलावा कर्नाटक, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिण भाषी इलाकों में भी आंदोलन बहुत तेजी से फैला।

विदेशी कंपनियों के सामानों का बहिष्कार करवाने के लिए गाँव-गाँव घूमने के दौरान नये-नये अनुभव हुए। अधिकांश अनुभवों में ऐसा महसूस होता था कि हिन्दुस्तान के गाँवों में रहने वाली आबादी शहरी विकास से बहुत दूर है। इसका सबसे बड़ा कारण यह समझ में भी आया कि देश का विकास शहर केन्द्रित विकास है। इसलिए इस विकास में गाँव की उपेक्षा स्वाभाविक है।

गाँव के सभी तरह के संसाधन शहर की ओर जा रहे हैं। गाँव के नौजवान क्या बूढ़े तक शहरों में काम करने के लिए जाते हैं और न्यूनतम मजदूरी पर काम करते हैं। शहरों में उनका शोषण ही होता है।

इसलिए हमें लगने लगा कि अब हमें अपने आंदोलन की दिशा बदलनी पड़ेगी। अभी तक तो हमारे आंदोलन में केवल विदेशी कंपनियों के बहिष्कार की बात दिखाई देती थी। लेकिन अब आंदोलन में केवल विदेशी कंपनियों के बहिष्कार की बात दिखाई देती थी। लेकिन अब आंदोलन स्वदेशी उत्पादकों की फौज का निर्माण करने के लिए एक नई दिशा की ओर बढ़ने के लिए तैयार है।

यह दिशा स्वदेशी और स्वावलंबन की दिशा होगी। जिसमें आंदोलन गाँव-गाँव में जाकर नौजवानों को स्वदेशी रोजगार के लिए तैयार करेगा और उन्हें अपने जीवनयापन के लिए आवश्यक आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लायक बनायेगा। इस अभियान में आंदोलन जगह-जगह स्वावलंबन शिविरों का आयोजन भी करेगा, जिसमें नौजवान प्रशिक्षित होकर निकलेंगे और देश भर में स्वदेशी की अलख जगाएंगे।

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प्रशिक्षण का स्वरूप

प्रशिक्षण शिविर वर्ष में तीन बार लगाये जायेंगे। ये तीनों शिविर देश के अलग-अलग भागों में लगेंगे।

प्रशिक्षण शिविर 15 दिन का होगा। इन 15 दिनों में स्वदेशी उत्पाद की निर्माण प्रक्रिया, रोजगार के लिए का प्रशिक्षण, और आवश्यक आय-व्यय संबंधी बातों का ज्ञान कराया जायेगा। इसके अलावा प्रशिक्षणार्थी को स्वदेशी विचार से परिपूर्ण करने की कोशिश की जायेगी।

इन प्रशिक्षण शिविरों में प्रवेश लेने के लिए आंदोलन की स्थानीय समिति की मंजूरी आवश्यक होगी। अर्थात् स्थानीय समितियां ही प्रशिक्षणार्थियों का चयन करेंगी।

प्रशिक्षण शिविर का शुल्क न्यूनतम होगा।

प्रशिक्षण शिविर में देश के उन प्रतिष्ठित उत्पादकों को भी बुलाया जायेगा। जिन्होंने अपनी मेहनत से अपना व्यापारिक प्रतिष्ठान खड़ा किया है। वे प्रशिक्षणार्थियों को अपने अनुभव का लाभ देंगे।

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स्वदेशी अपनाएं, विदेशी भगाएं

स्वदेशी उत्पादों का ही प्रयोग करे

  • - यानी देश का पैसा देश में

  • - भारत के कुटी उद्योगों को बढ़ावा

  • - विदेशी दबाव के कारण बढ़ रही महंगई खत्म

  • - बेरोजगारी पर अंकुश

  • - सच्चे स्वदेशी होने का गौरव

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धन्यवाद

स्वदेशी क्रान्तिकारी रोबिन सिराना

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