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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

५० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

५० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


[संस्कृत-भाष्यम्]

मनो विज्ञानम् मनुतेर्ज्ञान- कर्मणः, तन्मयस्तत्प्रायस्तदुपल- भ्यत्वात्। मनुतेऽनेनेति वा मनो- ऽन्तःकरणं तदभिमानी तन्मय- स्तल्लिङ्गो वा; अमृतोऽमरणधर्मा हिरण्मयो ज्योतिर्मयः । तस्यैवंलक्षणस्य हृदयाकाशे (पार्श्व-टिप्पणी: हृदयाकाशस्थ-जीवोपलब्धये मार्गः) साक्षात्कृतस्य विदुष आत्मभूतस्येन्द्रस्यै- द्यस्वरूपप्रतिपत्तये मार्गोऽभिधीयते। हृदयादूर्ध्वं प्रवृ- त्ता सुषुम्ना नाम नाडी योग- शास्त्रेषु च प्रसिद्धा । सा चान्त- रेण मध्ये प्रसिद्धे तालुके तालु- कयोर्गता । यश्चैष तालुकयोर्मध्ये स्तन इवावलम्बते मांसखण्डस्त- स्य चान्तरेणेत्येतत् । यत्र च केशान्तः केशानामन्तोऽवसानं मूलं केशान्तो विवर्तते विभागेन वर्तते मूर्धप्रदेश इत्यर्थः तं देशं प्राप्य तत्र विनिःसृता व्यपोह्य विभज्य विदार्य शीर्षकपाले


[हिन्दी-अनुवाद]

—ज्ञानवाची 'मन्' धातुसे सिद्ध होनेके कारण 'मन' शब्दका अर्थ 'विज्ञान' है, तन्मय–तत्प्राय अर्थात् विज्ञान- मय है; क्योंकि उस (विज्ञानस्वरूप) से ही वह उपलब्ध होता है; अथवा जिसके द्वारा जीव मनन करता है वह अन्तःकरण ही 'मन' है उसका अभि- मानी, तन्मय अथवा उससे उपलक्षित होनेवाला अमृत—अमरणधर्मा और हिरण्मय—ज्योतिर्मय है । हृदयाकाशमें साक्षात्कार किये हुए उस ऐसे लक्षणोंवाले तथा विद्वान्- के आत्मभूत इन्द्र ( ईश्वर ) के ऐसे स्वरूपकी प्राप्तिके लिये मार्ग बतलाया जाता है—हृदयदेशसे ऊपरकी ओर जानेवाली सुषुम्ना नामकी नाडी योग- शास्त्रमें प्रसिद्ध है । वह 'अन्तरेण तालुके' अर्थात् दोनों तालुओंके बीचमें होकर गयी है। और तालुओंके बीचमें यह जो स्तनके समान मांस- खण्ड लटका हुआ है उसके भी बीचमें होकर गयी है । तथा जहाँ यह केशान्त—केशोंके मूलभागका नाम 'केशान्त' है वह जिस स्थानपर विभक्त होता है अर्थात् जो मूर्ध- प्रदेश है, उस स्थानमें पहुँचकर जो निकल गयी है, अर्थात् जो शीर्षकपालों—मस्तकके कपालोंको

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१ ............................................~

शिरःकपाले विनिर्गता या सेन्द्र- | पार-विभक्त यानी विदीर्ण करती हुई योनिरिन्द्रस्य ब्रह्मणो योनिर्मार्गः | बाहर निकल गयी है वही इन्द्रयोनि— स्वरूपप्रतिपत्तिद्वारमित्यर्थः । | इन्द्र अर्थात् ब्रह्मकी योनि—मार्ग यानी | ब्रह्मस्वरूपकी प्राप्तिका द्वार है । तयैवं विद्वान्मनोमयात्मदर्शी | इस प्रकार उस सुषुम्ना नाडीद्वारा [सुषुम्नाद्वारा] मूर्ध्ना विनिष्क्रम्या- | जाननेवाला अर्थात् मनोमय आत्मा- [चतुर्व्याहृतिरूप-] स्य लोकस्याधिष्ठा- | का साक्षात्कार करनेवाला पुरुष [ब्रह्मप्राप्तिः] ता भूरिति व्याहृति- | मूर्धद्वारसे निकलकर इस लोकका | अधिष्ठाता जो महान् ब्रह्मका अङ्ग- रूपो योऽग्निर्महतो ब्रह्मणोऽङ्गभूत- | भूत 'भूः' ऐसा व्याहृतिरूप अग्नि स्तस्मिन्नग्नौ प्रतितिष्ठत्यग्न्यात्मनेमं | है उस अग्निमें स्थित हो जाता है; | अर्थात् अग्निरूप होकर इस लोक- लोकं व्याप्नोतीत्यर्थः । तथा भुव | को व्याप्त कर लेता है । इसी प्रकार इति द्वितीयव्याहृत्यात्मनि वायौ । | वह 'भुवः' इस द्वितीय व्याहृति- | रूप वायुमें स्थित हो जाता है—इस प्रतितिष्ठतीत्यनुवर्तते । सुवरिति | प्रकार 'प्रतितिष्ठति' इस क्रियाकी | अनुवृत्ति की जाती है । तथा [ ऐसे तृतीयव्याहृत्यात्मन्यादित्ये । मह | ही ] 'सुवः' इस तृतीय व्याहृति- इत्यङ्गिनि चतुर्थव्याहृत्यात्मनि | रूप आदित्यमें और 'महः' इस | चतुर्थ व्याहृतिरूप अङ्गी ब्रह्ममें स्थित ब्रह्मणि प्रतितिष्ठति । | होता है । तेष्वात्मभावेन स्थित्वाप्नोति | उनमें आत्मस्वरूपसे स्थित हो वह [ब्रह्मभूतस्य] ब्रह्मभूतः स्वाराज्यं | ब्रह्मभूत हुआ स्वाराज्य—स्वराड्भावको [विदुष ऐश्वर्यम्] स्वराड्भावं स्वयमेव | प्राप्त कर लेता है अर्थात् जिस प्रकार | ब्रह्म अङ्गभूत देवताओंका अधिपति राजाधिपतिर्भवति । अङ्गभूतानां | है उसी प्रकार स्वयं उनका राजा— देवानां यथा ब्रह्म । देवाश्च | अधिपति हो जाता है । तथा उसके

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५२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

५२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ सर्वेऽस्मै बलिमावहन्त्यङ्गभूता | अङ्गभूत देवगण जिस प्रकार ब्रह्मको यथा ब्रह्मणे । आप्नोति | उसी प्रकार इस अपने अङ्गीके लिये मनसस्पतिम् । सर्वेषां हि | उपहार लाते हैं । तथा वह मनस्पति- मनसां पतिः सर्वात्मकत्वाद्व्र- | को प्राप्त हो जाता है । ब्रह्म सर्वात्मक ह्मणः । सर्वैर्हि मनोभिस्तन्मनुते । | होनेके कारण सम्पूर्ण मनोंका पति तदाप्नोत्येवं विद्वान् । किं च वा- | है, वह सारे ही मनोंद्वारा मनन क्पतिः सर्वासां वाचां पतिर्भवति । | करता है । इस प्रकार उपासनाद्वारा तथैव चक्षुष्पतिश्चक्षुषां पतिः । | विद्वान् उसे प्राप्त कर लेता है । यही श्रोत्रपतिः श्रोत्राणां पतिः । | नहीं, वह वाक्पति-सम्पूर्ण वाणियों- विज्ञानपतिर्विज्ञानानां च पतिः । | का पति हो जाता है, तथा चक्षु- सर्वात्मकत्वात्सर्वप्राणिनां करणै- | ष्पति-नेत्रोंका स्वामी, श्रोत्रपति- स्तद्वान्भवतीत्यर्थः । | कानोंका स्वामी और विज्ञानपति- किं च ततोऽप्यधिकतरमेतद्भवति । | विज्ञानोंका स्वामी हो जाता है । किं तत् ? उच्यते । आकाश- | तात्पर्य यह है कि सर्वात्मक होनेके शरीरमाकाशः शरीरमस्याकाश- | कारण वह समस्त प्राणियोंकी वद्वा सूक्ष्मं शरीरमस्येत्याकाश- | इन्द्रियोंसे इन्द्रियवान् होता है । शरीरम् । किं तत् ? प्रकृतं ब्रह्म । | यही नहीं, वह तो इससे भी बड़ा सत्यात्म सत्यं मूर्तामूर्तमवितथं | हो जाता है । सो क्या ? बतलाते स्वरूपं चात्मा स्वभावोऽस्य तदिदं | हैं—आकाशशरीर—आकाश जिसका सत्यात्म । प्राणारामं प्राणेष्वारा- | शरीर है अथवा आकाशके समान | जिसका सूक्ष्म शरीर है वही आकाश- | शरीर है । वह है कौन ? प्रकृत | ब्रह्म [ अर्थात् वह ब्रह्म जिसका यहाँ | प्रकरण है ] । सत्यात्म—जिसका | मूर्तामूर्तरूप सत्य अर्थात् अमिथ्या | 'सत्यात्म' कहते हैं । प्राणाराम—

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अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३


[मूल संस्कृत / भाष्य] राम आक्रीडा यस्य तत्प्राणा- रामम् । प्राणानां वारामो यस्मिं- स्तत्प्राणारामम् । मनआनन्दम् ; आनन्दभूतं सुखकृदेव यस्य मनस्तन्मनआनन्दम् । शान्ति- समृद्धं शान्तिरूपशमः, शान्तिश्च तत्समृद्धं च शान्तिसमृद्धम् । शान्त्या वा समृद्धं तदुपलभ्यत इति शान्तिसमृद्धम् । अमृतम- मरणधर्मि । एतच्चाधिकरण- विशेषणं तत्रैव मनोमय इत्यादौ द्रष्टव्यमिति । एवं मनोमयत्वा- दिधर्मैर्विशिष्टं यथोक्तं ब्रह्म हे प्राचीनयोग्य, उपास्स्वेत्याचार्य- वचनोक्तिरादरार्था । उक्तस्तू- पासनाशब्दार्थः ॥ १-२ ॥


[हिन्दी अनुवाद] प्राणोंमें जिसका रमण अर्थात् क्रीडा है अथवा जिसमें प्राणोंका आरमण है उसे प्राणाराम कहते हैं । मन- आनन्दम्—जिसका मन आनन्दभूत अर्थात् सुखकारी ही है वह मन- आनन्द कहलाता है । शान्तिसमृद्धम् —शान्ति उपशमको कहते हैं, जो शान्ति भी है और समृद्ध भी वह शान्तिसमृद्ध है अथवा शान्तिके द्वारा उस समृद्ध ब्रह्मकी उपलब्धि होती है, इसलिये उसे शान्तिसमृद्ध कहते हैं । अमृत—अमरणधर्मी । ये अधिकरणमें आये हुए विशेषण उस मनोमय आदिमें ही जानने चाहिये । इस प्रकार मनोमयत्व आदि धर्मोंसे विशिष्ट उपर्युक्त ब्रह्मकी, हे प्राचीन- योग्य ! तू उपासना कर—यह आचार्यकी उक्ति [ उपासनाके ] आदरके लिये है । ‘उपासना’ शब्दका अर्थ तो पहले बतलाया ही जा चुका है ॥ १–२ ॥


इति शीक्षावल्ल्यां षष्ठोऽनुवाकः ॥ ६ ॥

सप्तम अनुवाक

पाङ्क्तरूपसे ब्रह्मकी उपासना

यदेतद्व्याहृत्यात्मकं ब्रह्मो- | यह जो व्याहृतिरूप उपास्य पास्यमुक्तं तस्यैवेदानीं पृथिव्या- | ब्रह्म बतलाया गया है अब पृथिवी दिपाङ्क्तरूपेणोपासनमुच्यते । | आदि पाङ्क्तरूपसे उसीकी उपासना- पञ्चसंख्यायोगात्पङ्क्तिच्छन्दः- | का वर्णन किया जाता है—[पृथिवी संपत्तिः । ततः पाङ्क्तत्वं | आदि पाँच-पाँच संख्यावाले पदार्थ हैं सर्वस्य । पाङ्क्तश्च यज्ञः । | तथा पङ्क्तिछन्द भी पाँच पदोंवाला “पञ्चपदा पङ्क्तिः पाङ्क्तो | है, अतः] 'पाँच' संख्याका योग होनेसे यज्ञः” इति श्रुतेः । तेन यत्सर्वं | [उन पृथिवी आदिसे] पङ्क्तिछन्द लोकाद्यात्मान्तं च पाङ्क्तं परि- | सम्पन्न होता है । इसीसे उन सबका कल्पयति यज्ञमेव तत्परिकल्प- | पाङ्क्तत्व है । यज्ञ भी पाङ्क्त है, जैसा यति । तेन यज्ञेन परिकल्पितेन | कि “पङ्क्तिछन्द पाँच पदोंवाला है, पाङ्क्तात्मकं प्रजापतिमभि- | यज्ञ पाङ्क्त है” इस श्रुतिसे ज्ञात संपद्यते । तत्कथं पाङ्क्तमिदं | होता है । अतः जो लोकसे लेकर सर्वमित्यत आह— | आत्मापर्यन्त सबको पाङ्क्तरूपसे | कल्पना करता है वह यज्ञकी ही | कल्पना करता है । उस कल्पना | किये हुए यज्ञसे वह पाङ्क्तस्वरूप | प्रजापतिको प्राप्त हो जाता है । | अच्छा तो यह सब किस प्रकार | पाङ्क्त है ? सो अब बतलाते हैं—

पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशः । अग्निर्वायुरा- दित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि । आप ओषधयो वनस्पतय-

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अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५ आकाश आत्मा । इत्यधिभूतम् । अथाध्यात्मम् । प्राणो व्यानोऽपान उदानः समानः । चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक् । चर्म माग्ँस्नावास्थि मज्जा । एतदधिविधाय ऋषिरवोचत् । पाङ्क्तं वा इदग्ँसर्वम् । पाङ्क्तेनैव पाङ्क्तग्ँस्पृणोतीति ॥ १ ॥ पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, दिशाएँ और अवान्तर दिशाएँ [—यह लोकपाङ्क्त ]; अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा और नक्षत्र [—यह देवता- पाङ्क्त ] तथा आप, ओषधि, वनस्पति, आकाश और आत्मा—ये अधिभूतपाङ्क्त हैं। अब अध्यात्मपाङ्क्त बतलाते हैं—प्राण, व्यान, अपान, उदान और समान [ —यह वायुपाङ्क्त ]; चक्षु, श्रोत्र, मन, वाक् और त्वचा [—यह इन्द्रियपाङ्क्त ] तथा चर्म, मांस, स्नायु, अस्थि और मज्जा [—यह धातुपाङ्क्त—ये सब मिलाकर अध्यात्मपाङ्क्त हैं ] । इस प्रकार पाङ्क्तोपासनाका विधानकर ऋषिने कहा—'यह सब पाङ्क्त ही है; इस [ आध्यात्मिक ] पाङ्क्तसे ही उपासक [ बाह्य ] पाङ्क्तको पूर्ण करता है' ॥ १ ॥ पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवा- | पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, त्रिविध- न्तरदिश इति लो- | दिशाएँ और अवान्तर दिशाएँ—ये भूतपाङ्क्तम् कपाङ्क्तम् । अग्नि- | लोकपाङ्क्त हैं; अग्नि, वायु, आदित्य, वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणीति | चन्द्रमा और नक्षत्र—ये देवतापाङ्क्त देवतापाङ्क्तम् । आप ओषधयो | हैं; जल, ओषधि, वनस्पति, आकाश वनस्पतय आकाश आत्मेति | और आत्मा—ये भूतपाङ्क्त हैं । यहाँ भूतपाङ्क्तम् । आत्मेति विराड् | 'आत्मा' विराट्को कहा है; क्योंकि भूताधिकारात् । इत्यधिभूतमि- | यह भूतोंका अधिकरण है 'इत्यधि- | भूतम्' यह वाक्य अधिलोक और

५६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

५६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

त्यधिलोकाधिदैवतपाङ्क्तद्वयोप- | अधिदैवत-इन दो पाङ्क्तोंका भी लक्षणार्थम् । लोकदेवतापाङ्क्त- | उपलक्षण करानेके लिये है; क्योंकि योश्चाभिहितत्वात् । | इनमें लोक और देवतासम्बन्धी दो | पाङ्क्तोंका भी वर्णन किया गया है । अथानन्तरमध्यात्मं पाङ्क्त- | अब आगे तीन अध्यात्मपाङ्क्तों- (त्रिविधाध्यात्म-पाङ्क्तम्) त्रयमुच्यते-प्राणा- | का वर्णन किया जाता है-प्राणादि दि वायुपाङ्क्तम् । | वायुपाङ्क्त, चक्षु आदि इन्द्रियपाङ्क्त चक्षुरादीन्द्रियपाङ्क्तम् । चर्मादि | और चर्मादि धातुपाङ्क्त-बस ये धातुपाङ्क्तम् । एतावद्धीदं | इतने ही अध्यात्म और बाह्य पाङ्क्त सर्वमध्यात्मम्, बाह्यं च | हैं । इनका इस प्रकार त्रिधान अर्थात् पाङ्क्तमेवेत्येतदेवमधिविधाय | कल्पना करके ऋषि-वेद अथवा परिकल्प्यर्षिर्वेद एतद्दर्शनसंपन्नो | इस दृष्टिसे सम्पन्न किसी ऋषिने वा कश्चिदृषिरवोचदुक्तवान् । | कहा । क्या कहा ? सो बतलाते किमित्याह-पाङ्क्तं वा इदं सर्वं | हैं-निश्चय ही यह सब पाङ्क्त ही पाङ्क्तेनैवाध्यात्मिकेन संख्या- | है । आध्यात्मिक पाङ्क्तसे ही, सामान्यात्पाङ्क्तं बाह्यं स्पृणोति | संख्यामें समानता होनेके कारण बलयति पूरयति । एकात्मतयो- | उपासक बाह्यपाङ्क्तको बलवान्- पलभ्यत इत्येतत् । एवं पाङ्क्त- | पूरित करता है अर्थात् उसके साथ मिदं सर्वमिति यो वेद स प्रजा- | एकरूपसे उपलब्ध करता है । इस पत्यात्मैव भवतीत्यर्थः ॥ १ ॥ | प्रकार 'यह सब पाङ्क्त है' ऐसा | जो पुरुष जानता है वह प्रजापति- | स्वरूप ही हो जाता है-ऐसा इसका | तात्पर्य है ॥ १ ॥ इति शीक्षावल्ल्यां सप्तमोऽनुवाकः

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अष्टम अनुवाक ओङ्कारोपासनाका विधान व्याहृत्यात्मनो ब्रह्मण उपा- | व्याहृतिरूप ब्रह्मकी उपासनाका सनमुक्तम् । अनन्तरं च पाङ्क्त- | निरूपण किया गया; उसके पश्चात् स्वरूपेण तस्यैवोपासनमुक्तम् । | उसीकी उपासनाका पाङ्क्तरूप से इदानीं सर्वोपासनाङ्गभूतस्योङ्का- | वर्णन किया । अब सम्पूर्ण रस्योपासनं विधित्स्यते । परापर- | उपासनाओंके अङ्गभूत ओंकारकी ब्रह्मदृष्ट्या उपास्यमान ओङ्कारः | उपासनाका विधान करना चाहते शब्दमात्रोऽपि परापरब्रह्मप्राप्ति- | हैं । पर एवं. अपर ब्रह्मदृष्टिसे साधनं भवति । स ह्यालम्बनं | उपासना किये जानेपर ओंकार— ब्रह्मणः परस्यापरस्य च, प्रति- | केवल शब्दमात्र होनेपर भी पर मेव विष्णोः । "एतेनैवायतने- | और अपर ब्रह्मकी प्राप्तिका साधन नैकतरमन्वेति” ( प्र० उ० ५ । | होता है । वही पर और अपर ब्रह्मका २) इति श्रुतेः । | आलम्बन है, जिस प्रकार कि | विष्णुका आलम्बन प्रतिमा है । | “इसी आलम्बनसे उपासक [ पर | या अपर ] किसी एक ब्रह्मको प्राप्त | हो जाता है" इस श्रुतिसे यही | बात प्रमाणित होती है । ओमिति ब्रह्म । ओमितीदꣳसर्वम् । ओमित्ये- तदनुकृतिर्ह स्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति । ओमिति सामानि गायन्ति । ओꣳशोमिति शस्त्राणि शꣳसन्ति । ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति ब्रह्मा प्रसौति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति । ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति । ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ 'ॐ' यह शब्द ब्रह्म है, क्योंकि 'ॐ' यह सर्वरूप है; 'ॐ' यह अनुकृति ( अनुकरण—सम्मतिसूचक संकेत ) है—ऐसा प्रसिद्ध है । [ याज्ञिकलोग ] “ओ श्रावय” ऐसा कहकर श्रवण कराते हैं । ‘ॐ’ ऐसा कहकर सामगान करते हैं।' ‘ॐ शोम् ऐसा कहकर शस्त्रों (गीति- रहित ऋचाओं) का पाठ करते हैं। अध्वर्यु प्रतिगर (प्रत्येक कर्म) के प्रति ‘ॐ’ ऐसा उच्चारण करता है। 'ॐ' ऐसा कहकर ब्रह्मा अनुज्ञा देता है; 'ॐ' ऐसा कहकर वह अग्निहोत्रके लिये आज्ञा देता है । वेदाध्ययन करनेवाला ब्राह्मण 'ॐ' ऐसा उच्चारण करता हुआ कहता है—'मैं ब्रह्म (वेद अथवा परब्रह्म) को प्राप्त करूँ।' इससे वह ब्रह्मको ही प्राप्त कर लेता है ॥ १ ॥

ॐमिति । इतिशब्दः स्वरूप- | ‘ओमिति' इसमें 'इति' शब्द ओङ्कारस्य परिच्छेदार्थः, ओ- | ओंकारके स्वरूपका परिच्छेद सर्वात्म्यम् मित्येतच्छब्दरूपं | (निर्देश) करनेके लिये है। अर्थात् ब्रह्मति मनसा धारयेदुपासीत । | 'ॐ' यह शब्दरूप ब्रह्म है—ऐसा यत ओमितीदं सर्वं हि शब्दरूप- | इसका मनसे ध्यान—उपासना करे; मोङ्कारेण व्याप्तम् । "तद्यथा | क्योंकि 'ॐ' यही सब कुछ है, कारण, समस्त शब्दरूप प्रपञ्च शङ्कुना" (छा० उ० २ । २३ । | ओंकारसे व्याप्त है, जैसा कि 'जिस प्रकार शंकुसे पत्ते व्याप्त रहते हैं' ३) इति श्रुत्यन्तरात् । अभि- | इत्यादि एक दूसरी श्रुतिसे सिद्ध धानतन्त्रं ह्यभिधेयमित्यत इदं | होता है । सम्पूर्ण वाच्य वाचकके सर्वमोङ्कार इत्युच्यते । | ही अधीन होता है, इसलिये यह सब ओंकार ही कहा जाता है । ओङ्कारस्तुत्यर्थमुत्तरो ग्रन्थः । | आगेका ग्रन्थ ओंकारकी स्तुतिके उपास्यत्वात्तस्य । | लिये है; क्योंकि वह उपासनीय ओङ्कारमहिमा ओमित्येतदनुकृति- | है । ‘ॐ' यह अनुकृति यानी रनुकऱणम् । करोमि यास्यामि | अनुकरण है । इसीसे किसीके द्वारा 'मैं करता हूँ, मैं जाता

अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९ चेति कृतमुक्तमोमित्यनुकरोत्य- | इस प्रकार किये हुए कथनको सुनकर दूसरा पुरुष [उसको न्यः । अत ओङ्कारोऽनुकृतिः । स्वीकृत करते हुए] 'ॐ' ऐसा अनुकरण करता है । इसलिये ह स्म वा इति प्रसिद्धार्थव- ओंकार अनुकृति है । 'ह' 'स्म' और 'वै'—ये निपात प्रसिद्धिके सूचक द्योतकाः । प्रसिद्धमोङ्कारस्यानु- हैं; क्योंकि ओंकारका अनुकृतित्व तो प्रसिद्ध ही है । कृतित्वम् । अपि च 'ओ श्रावय' इति | इसके सिवा 'ओ श्रावय' इस प्रकार प्रेरणापूर्वक याज्ञिकलोग प्रैषपूर्वकमाश्रावयन्ति । तथोमिति | प्रतिश्रवण कराते हैं । तथा 'ॐ' ऐसा कहकर सामगान करनेवाले सामानि गायन्ति सामगाः । सामका गान करते हैं । शस्त्र शंसन करनेवाले भी 'ॐ शोम्' ॐशोमिति शस्त्राणि शंसन्ति शस्त्र- ऐसा कहकर शस्त्रोंका पाठ करते हैं । तथा अध्वर्युंलोग प्रतिगरके शंसितारोऽपि । तथोमित्यध्वर्युः प्रति 'ॐ' ऐसा उच्चारण करते प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति हैं । 'ॐ' ऐसा कहकर ब्रह्मा अनुज्ञा देता है अर्थात् प्रेरणापूर्वक ब्रह्मा प्रसौत्यनुजानाति प्रैषपूर्व- आश्रवण करता है; और 'ॐ' कहकर वह अग्निहोत्रके लिये आज्ञा कमाश्रावयति । ओमित्यग्नि- देता है । अर्थात् यजमानके यों कहनेपर कि 'मैं हवन करता हूँ' होत्रमनुजानाति । जुहोमीत्युक्त वह 'ॐ' ऐसा कहकर उसे ओमित्येवानुज्ञां प्रयच्छति । अनुज्ञा देता है ।

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६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

ओमित्येव ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन् | प्रवचन अर्थात् अध्ययन करनेवाला प्रवचनं करिष्यन्नध्येष्यमाण | ब्राह्मण ‘ॐ’ ऐसा उच्चारण करता ओमित्येवाह । ओमित्येव प्रति- | है; अर्थात् ‘ॐ’ ऐसा कहकर ही पद्यतेऽध्येतुमित्यर्थः । ब्रह्मवेद- | वह अध्ययन करनेके लिये प्रवृत्त होता मुपाप्नवानीति प्राप्नुयां ग्रही- | है । ‘मैं ब्रह्म यानी वेदको प्राप्त करूँ ष्यामीत्युपाप्नोत्येव ब्रह्म । | अर्थात् उसे ग्रहण करूँ’ ऐसा कहकर अथवा ब्रह्म परमात्मा तमु- | वह ब्रह्मको प्राप्त कर ही लेता है । पाप्नवानीत्यात्मानं प्रवक्ष्यन्प्राप- | अथवा [ यों समझो कि ] ‘मैं ब्रह्म- यिष्यन्नोमित्येवाह । स च तेनो- | परमात्माको प्राप्त करूँ’ इस प्रकार ङ्कारेण ब्रह्म प्राप्नोत्येव । ओङ्का- | आत्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे वह रपूर्वं प्रवृत्तानां क्रियाणां फलवत्त्वं | ‘ॐ’ ऐसा ही कहता है और यस्मात्तस्मादोङ्कारं ब्रह्मेत्युपासी- | उस ॐकारके द्वारा वह ब्रह्मको तेति वाक्यार्थः ॥ १ ॥ | प्राप्त कर ही लेता है । इस प्रकार | क्योंकि ॐकारपूर्वक प्रवृत्त होनेवाली | क्रियाएँ फलवती होती हैं इसलिये | ‘ॐकार ब्रह्म है’ इस तरह उसकी | उपासना करे—यह इस वाक्यका | अर्थ है ॥ १ ॥

इति शीक्षावल्ल्यामष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥

नवम अनुवाक ऋतादि शुभकर्मोंकी अवश्यकर्तव्यताका विधान विज्ञानादेवाप्नोति स्वाराज्य- | विज्ञानसे ही स्वाराज्य प्राप्त कर | लेता है-ऐसा [छठे अनुवाकमें] कहे मित्युक्तत्वाच्छ्रौतस्मार्तानां कर्म- | जानेके कारण श्रौत और स्मार्त कर्मों- | की व्यर्थता प्राप्त होती है । वह णामानर्थक्यं प्राप्तमित्यतस्तन्मा | प्राप्त न हो, इसलिये पुरुषार्थके प्रति प्रापदिति कर्मणां पुरुषार्थं प्रति | कर्मोंका साधनत्व प्रदर्शित करनेके | लिये यहाँ उनका उल्लेख किया साधनत्वप्रदर्शनार्थमिहोपन्यासः- | जाता है— ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यं च स्वाध्याय- प्रवचने च । तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च । दमश्च स्वाध्याय- प्रवचने च । शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्च स्वाध्याय- प्रवचने च । अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः । तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः । तद्धि तपस्तद्धि तपः ॥ १ ॥ ऋत (शास्त्रादिद्वारा बुद्धिमें निश्चय किया हुआ अर्थ) तथा स्वाध्याय (शास्त्राध्ययन) और प्रवचन (अध्यापन अथवा वेदपाथरूप ब्रह्मयज्ञ) [ये अनुष्ठान किये जाने योग्य हैं] । सत्य (सत्यभाषण) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [अनुष्ठान किये जाने चाहिये] । दम CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

( इन्द्रियदमन ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इन्हें सदा करता रहे ] । शम ( मनोनिग्रह ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ ये सर्वदा कर्तव्य हैं ] । अग्नि ( अग्न्याधान ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इनका अनुष्ठान करे ] । अग्निहोत्र तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ ये नित्य कर्तव्य हैं ] । अतिथि ( अतिथिसत्कार ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इनका नियम- से अनुष्ठान करे ] । मानुषकर्म ( विवाहादि लौकिक व्यवहार ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इन्हें करता रहे ] । प्रजा ( प्रजा उत्पन्न करना ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [-ये सदा ही कर्तव्य हैं ] । प्रजन ( ऋतु- कालमें भार्यागमन ) तथा [ इसके साथ ] स्वाध्याय और प्रवचन [ करता रहे ] । प्रजाति ( पौत्रोत्पत्ति ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इनका नियतरूपसे अनुष्ठान करे ] । सत्य ही [ अनुष्ठान करने योग्य है ] ऐसा रथीतरका पुत्र सत्यवचा मानता है । तप ही [ नित्य अनुष्ठान करने योग्य है ] ऐसा नित्य तपोनिष्ठ पौरुशिष्ठिका मत है । स्वाध्याय और प्रवचन ही [ कर्त्तव्य हैं ] ऐसा मुद्गलके पुत्र नाकका मत है । अतः वे ( स्वाध्याय और प्रवचन ) ही तप हैं, वे ही तप हैं ॥ १ ॥


[मूल भाष्य][हिन्दी अनुवाद]
ऋतमिति व्याख्यातम् । स्वा-<br>ध्यायोऽध्ययनम् । प्रवचनमध्या-<br>पनं ब्रह्मयज्ञो वा । एतान्यता-<br>दीन्यनुष्ठेयानीति वाक्यशेषः ।<br>सत्यं च सत्यवचनं यथाव्या-<br>ख्यातार्थं वा । तपः कृच्छ्रादि ।<br>दमो बाह्यकरणोपशमः । शमो-<br>ऽन्तःकरणोपशमः । अग्नय आधा-'ऋत'—इसकी व्याख्या पहले<br>[ ऋतं वदिष्यामि—इस वाक्यमें ] की<br>जा चुकी है । 'स्वाध्याय' अध्ययनको<br>कहते हैं, तथा 'प्रवचन' अध्यापन<br>या ब्रह्मयज्ञका नाम है । ये ऋत<br>आदि अनुष्ठान किये जाने योग्य<br>हैं—यह वाक्यशेष है । सत्य—सत्य-<br>वचन अथवा जैसा पहले [ सत्यं<br>वदिष्यामि—इस वाक्यमें ] व्याख्या<br>की गयी है, वह; तप—कृच्छ्रादि; दम—<br>बाह्य इन्द्रियोंका निग्रह; शम—चित्त-<br>**की शान्ति;

अनु० ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३

तव्याः । अग्निहोत्रं च होतव्यम् । | हैं ] । अग्नियोंका आधान करना अतिथयश्च पूज्याः । मानुषमिति | चाहिये। अग्निहोत्र होम करने योग्य लौकिकः संव्यवहारः, तच्च | है । अतिथियोंका पूजन करना चाहिये । मानुष यानी लौकिक यथाप्राप्तमनुष्ठेयम् । प्रजा चोत्पा- | व्यवहार; उसका भी यथाप्राप्त द्या । प्रजननश्च प्रजननमृतौ | अनुष्ठान करना चाहिये । प्रजा उत्पन्न करनी चाहिये । प्रजन- भार्यागमनमित्यर्थः । प्रजातिः | प्रजनन-ऋतुकालमें भार्यागमन और पौत्रोत्पत्तिः पुत्रो निवेशयितव्य | प्रजाति-पौत्रोत्पत्ति अर्थात् पुत्रको इत्येतत् । | स्त्रीपरिग्रह कराना चाहिये । सर्वैरेतैः कर्मभिर्युक्तस्यापि | इन सब कर्मोंसे युक्त पुरुषको [स्वाध्यायप्रवचन-सहयोगकारणम्] स्वाध्यायप्रवचने | भी स्वाध्याय और प्रवचनका यत्न- यत्ततोऽनुष्ठेये इत्येव- | पूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये-इसी- मर्धं सर्वेण सह स्वाध्यायप्रवचन- | लिये इन सबके साथ स्वाध्याय और प्रवचनको ग्रहण किया गया है । ग्रहणम् । स्वाध्यायाधीनं ह्यर्थ- | स्वाध्यायके अधीन ही अर्थज्ञान है ज्ञानम्, अर्थज्ञानायत्तं च परं | और अर्थज्ञानके अधीन ही परमश्रेय श्रेयः; प्रवचनं च तदविस्मरणार्थं | है, तथा प्रवचन उसकी अविस्मृति और धर्मकी वृद्धिके लिये है; इसलिये धर्मप्रवृद्ध्यर्थं च । अतः स्वाध्या- | स्वाध्याय और प्रवचनमें आदर यप्रवचनयोरादरः कार्यः । | ( श्रद्धा ) रखना चाहिये । सत्यमिति सत्यमेवानुष्ठातव्य- | सत्य अर्थात् सत्य ही अनुष्ठान [सत्यादिप्राधान्ये मुनीनां मतभेदाः] मिति सत्यमेव | किये जाने योग्य है-ऐसा सत्यवचा वचो यस्य सोऽयं | -सत्य ही जिसका वचन हो वह अथवा जिसका नाम ही सत्यवचा है सत्यवचा नाम वा तस्य । राथी- | वह राथीतर अर्थात् रथीतरके वंशमें तरो रथीतरस्य गोत्रो राथीतरा- | उत्पन्न हुआ राथीतर आचार्य मानता चार्यो मन्यते । तप इति तप एव | है । तप यानी तप ही कर्त्तव्य है-

६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ कर्तव्यमिति तपोन्नित्यस्तपसि । ऐसा तपोन्नित्य-नित्य तपोनिष्ठ नित्यस्तपःपरस्तपोनित्य इति वा अथवा तपोन्नित्य नामवाला पौरुशिष्टि नाम पौरुशिष्टिः पुरुशिष्टस्या- -पुरुशिष्टका पुत्र पौरुशिष्टि आचार्य पत्यं पौरुशिष्टिराचार्यो मन्यते । मानता है । स्वाध्याय और प्रवचन स्वाध्यायप्रवचने एवानुष्ठेये इति ही अनुष्ठान किये जाने योग्य हैं- नाको नामतो मुद्गलस्यापत्यं ऐसा नाक नामवाला मुद्गलका मौद्गल्य आचार्यो मन्यते । तद्धि पुत्र मौद्गल्य आचार्य मानता है । तपस्तद्धि तपः । हि यस्मात्स्वा- वही तप है, वही तप है । ध्यायप्रवचने एव तपस्तस्मात्ते इसका तात्पर्य यह है-क्योंकि एवानुष्ठेये इति । उक्तानामपि स्वाध्याय और प्रवचन ही तप हैं, सत्यतपःस्वाध्यायप्रवचनानां पु- इसलिये वे ही अनुष्ठान किये जाने नर्ग्रहणमादरार्थम् ॥ १ ॥ योग्य हैं । पहले कहे हुए भी सत्य, तप, स्वाध्याय और प्रवचनोंका पुनर्ग्रहण उनके आदरके लिये है ॥१॥

इति शीक्षावल्ल्यां नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥

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| मन्त्राम्नाय स्वाध्याय ( जप ) के

दशम अनुवाक त्रिशङ्कुका वेदानुवचन अहं वृक्षस्य रेरिवेति स्वाध्या- | ‘अहं वृक्षस्य रेरिवा’ आदि | मन्त्राम्नाय स्वाध्याय ( जप ) के यार्थो मन्त्राम्नायः । स्वाध्यायश्च | लिये है । तथा स्वाध्याय विद्या | ( ज्ञान ) की उत्पत्तिके लिये बतलाया विद्योत्पत्तये । प्रकरणात् । | गया है; यह प्रकरणसे ज्ञात होता | है; क्योंकि यह प्रकरण विद्याके विद्यार्थं हीदं प्रकरणम् । न | लिये ही है, इसके सिवा उसका | कोई और प्रयोजन नहीं जान पड़ता; चान्यार्थत्वमवगम्यते । स्वाध्या- | क्योंकि स्वाध्यायके द्वारा जिसका | चित्त शुद्ध हो गया है उसीको येन च विशुद्धसत्त्वस्य विद्योत्प- | विद्याकी उत्पत्ति होना सम्भव है । त्तिरवकल्प्यते । | अहं वृक्षस्य रेरिवा । कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव । ऊर्ध्व- पवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि । द्रविणꣳसवर्चसम् । सुमेधा अमृतोक्षितः । इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम् ॥ १ ॥ मैं [ अन्तर्यामीरूपसे उच्छेदस्वरूप संसार- ] वृक्षका प्रेरक हूँ । मेरी कीर्ति पर्वतशिखरके समान उच्च है । ऊर्ध्वपवित्र ( परमात्मारूप कारण- वाला ) हूँ । अन्नवान् सूर्यमें जिस प्रकार अमृत है उसी प्रकार मैं भी शुद्ध अमृतमय हूँ । मैं प्रकाशमान [ आत्मतत्त्वरूप ] धन, सुमेधा ( सुन्दर मेधावाला ) और अमरणधर्मा तथा अक्षित ( अव्यय ) हूँ, अथवा अमृतसे सिक्त ( भीगा हुआ ) हूँ—यह त्रिशङ्कु ऋषिका वेदानुवचन है ॥ १ ॥ तै० उ० ९—१०— CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

अहं वृक्षस्योच्छेदात्मकस्य | मैं अन्तर्यामीरूपसे वृक्ष अर्थात् संसारवृक्षस्य रेरिवा प्रेरयिता- | उच्छेदात्मक संसाररूप वृक्षका प्रेरक ऽन्तर्याम्यात्मना । कीर्तिः ख्या- | हूँ । मेरी कीर्ति-प्रसिद्धि पर्वतके तिर्गिरेः पृष्ठमिवोच्छ्रिता मम । | पृष्ठभागके समान ऊँची है । मैं ऊर्ध्व- ऊर्ध्वपवित्र ऊर्ध्वं कारणं पवित्रं | पवित्र हूँ—पवित्र—पावन अर्थात् पावनं ज्ञानप्रकाश्यं पवित्रं परं | ज्ञानसे प्रकाशित होने योग्य पवित्र ब्रह्म यस्य सर्वात्मनो मम सो- | परब्रह्म जिस मुझ सर्वात्माका ऽहमूर्ध्वपवित्रः । वाजिनीव वाज- | ऊर्ध्व यानी कारण है वह वतीव । वाजमन्नं तद्वति सवित- | मैं ऊर्ध्वपवित्र हूँ । 'वाजिनि रीत्यर्थः । यथा सवितर्यमृतमा- | इव'—वाजवान्के समान--वाज अर्थात् त्मतत्त्वं विशुद्धं प्रसिद्धं श्रुति- | अन्न उससे युक्त सूर्यके समान, स्मृतिशतेभ्य एवं स्वमृतं शोभनं | जिस प्रकार सैकड़ों श्रुति-स्मृतियों- विशुद्धमात्मतत्त्वमस्मि भवामि । | के अनुसार सूर्यमें विशुद्ध द्रविणं धनं सवर्चसं दीप्ति- | अमृत यानी आत्मतत्त्व प्रसिद्ध है मत्तदेवात्मतत्त्वमस्मीत्यनुवर्तते । | उसी प्रकार मैं भी सु अमृत अर्थात् ब्रह्मज्ञानं वात्मतत्त्वप्रकाश- | शोभन-विशुद्ध आत्मतत्त्व हूँ । कत्वात्सवर्चसम् । द्रविणमिव | वही मैं आत्मतत्त्व सवर्चस— द्रविणं मोक्षसुखहेतुत्वात् । | दीप्तिशाली द्रविण यानी धन हूँ—इस अस्मिन्पक्षे प्राप्तं मयेत्यध्याहारः | प्रकार यहाँ 'अस्मि (हूँ)' क्रिया- कर्तव्यः । | की अनुवृत्ति की जाती है । अथवा | आत्मतत्त्वका प्रकाशक होनेसे तेजस्वी | ब्रह्मज्ञान, जो मोक्षसुखका हेतु होने- | के कारण धनके समान धन है, | [ मुझे प्राप्त हो गया है ]—इस | पक्षमें [ 'अस्मि' क्रियाकी अनुवृत्ति | न करके ] 'मया प्राप्तम्' ( वह | मुझे प्राप्त हो गया है ) इसका | अध्याहार करना चाहिये ।

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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७


[शाङ्करभाष्यम्][भाष्यार्थ]
सुमेधाः शोभना मेधा सर्व-<br>ज्ञलक्षणा यस्य मम सोऽहं<br>सुमेधाः । संसारस्थित्युत्पत्त्युप-<br>संहारकौशल्योगात्सुमेधस्त्वम् ।<br>अत एवामृतोऽमरणधर्माक्षितो-<br>ऽक्षीणोऽव्ययः, अक्षतो वा; अमृतेन<br>वोक्षितः सिक्तः । “अमृतोक्षितो-<br>ऽहम्” इत्यादि ब्राह्मणम् ।<br><br>इत्येवं त्रिशङ्कोऋर्षेर्ब्रह्मभूतस्य<br>ब्रह्मविदो वेदानुवचनम्; वेदो<br>वेदनमात्मैकत्वविज्ञानं तस्य<br>प्राप्तिमनु वचनं वेदानुवचनम् ।<br>आत्मनः कृतकृत्यताख्यापनार्थं<br>वामदेववत्त्रिशङ्कुनार्षेण दर्शनेन<br>दृष्टो मन्त्राम्नाय आत्मविद्या-<br>प्रकाशक इत्यर्थः ।<br><br>अस्य च जपो विद्योत्पत्त्य-<br>र्थोऽवगम्यते । ऋतं चेत्यादि-सुमेधा—जिस मेरी मेधा शोभन अर्थात् सर्वज्ञत्वलक्षणवाली है वह मैं सुमेधा हूँ । संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और संहार—इसका कौशल होनेके कारण मेरा सुमेधस्त्व है । इसीसे मैं अमृत—अमरणधर्मा और अक्षित—अक्षीण यानी अव्यय अथवा अक्षय हूँ । अथवा, [ तृतीयातत्पुरुष समास माननेपर ] अमृतेन उक्षितः अमृतसे सिक्त हूँ । “ मैं अमृतसे उक्षित हूँ” ऐसा ब्राह्मणवाक्य भी है ।<br><br>इस प्रकार यह ब्रह्मभूत ब्रह्मवेत्ता त्रिशङ्कु ऋषिका वेदानुवचन है । वेद वेदन अर्थात् आत्मैकत्वविज्ञानको कहते हैं उसकी प्राप्तिके अनु—पीछेका वचन ‘वेदानुवचन’ कहलाता है । तात्पर्य यह है कि अपनी कृतकृत्यता प्रकट करनेके लिये वामदेवके समान * त्रिशङ्कु ऋषिद्वारा आर्षदृष्टिसे देखा हुआ यह मन्त्राम्नाय आत्मविद्याका प्रकाश करनेवाला है ।<br><br>इसका जप विद्याकी उत्पत्तिके लिये माना जाता है । इस ‘ऋतं

* देखिये ऐतरेयोपनिषद् २ । १ । ५

६८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

६८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ कर्मोपन्यासादनन्तरं च वेदानु- | च' इत्यादि अनुवाकमें धर्मका वचनपाठादेतदवगम्यत एवं | उपन्यास ( उल्लेख ) करनेके | अनन्तर वेदानुवचनका पाठ करनेसे श्रौतस्मार्तेषु नित्येषु कर्मसु | यह जाना जाता है कि इस प्रकार युक्तस्य निष्कामस्य परं ब्रह्म | श्रौत और स्मार्त नित्यकर्मोंमें लगे विविदिषोराणानि दर्शनानि प्रा- | हुए परब्रह्मके निष्काम जिज्ञासुके प्रति | आत्मा आदिसे सम्बन्धित आर्षदर्शनों- दुर्भवन्त्यात्मादिविषयाणीति॥१॥ | का प्रादुर्भाव हुआ करता है ॥ १ ॥ इति शीक्षावल्ल्यां दशमोऽनुवाकः ॥ १० ॥ एकादश अनुवाक वेदाध्ययनके अनन्तर शिष्यको आचार्यका उपदेश वेदमनूच्येत्येवमादिकर्तव्य- | ब्रह्मात्मैक्यविज्ञानसे पूर्व श्रौत प्राग्ब्रह्मविज्ञानात् कर्मविधिः | तोपदेशारम्भः प्रा- | और स्मार्तकर्मोंका नियमसे अनुष्ठान | ग्ब्रह्मविज्ञानान्निय- | करना चाहिये— इसीलिये ‘वेदम- मेन कर्तव्यानि श्रौतस्मार्त- | नूच्य’ इत्यादि श्रुतिसे उनकी | कर्तव्यताके उपदेशका आरम्भ किया कर्माणीत्येवमर्थः। अनुशासनश्रुतेः | जाता है; क्योंकि [ ‘अनुशास्ति’ पुरुषसंस्कारार्थत्वात् । संस्कृतस्य | ऐसी ] जो अनुशासन-श्रुति है वह | पुरुषके संस्कारके लिये है; क्योंकि जो हि विशुद्धसत्त्वस्यात्मज्ञानमञ्ज- | पुरुष संस्कारयुक्त और विशुद्धचित्त सैवोत्पद्यते । “तपसा कल्मषं | होता है उसे अनायास ही आत्मज्ञान हन्ति विद्ययामृतमश्नुते” ( मनु० | प्राप्त हो जाता है । इस सम्बन्धमें | “तपसे पापका नाश करता है और १२ ! १०४ ) इति स्मृतिः । | ज्ञानसे अमरत्व लाभ करता है” ऐसी वक्ष्यति च-“तपसा ब्रह्म विजि- | स्मृति है । आगे ऐसा कहेंगे भी कि

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अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९

ज्ञासस्व" (तै० उ० ३ । २ । ५) | “तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर” इति । अतो विद्योत्पत्त्यर्थमनुष्ठे- | अतः ज्ञानकी उत्पत्तिके लिये कर्म यानि कर्माणि । अनुशास्तीत्यनु- | करने चाहिये । ‘अनुशास्ति’ इसमें शासनशब्दादनुशासनातिक्रमे हि | ‘अनुशासन’–ऐसा शब्द होनेके दोषोत्पत्तिः । | कारण उस अनुशासनका अति- | क्रमण करनेपर दोषकी उत्पत्ति | होगी । प्रागुपन्यासाच्च कर्मणाम् । | कर्मोंका उपन्यास पहले किया केवलब्रह्मविद्यारम्भाच्च पूर्वं | जानेके कारण भी [ यह निश्चय कर्माण्युपन्यस्तानि । उदितायां | होता है कि ये कर्म विद्याकी उत्पत्ति- च ब्रह्मविद्यायाम् “अभयं प्रतिष्ठां | के लिये हैं ] । कर्मोंका उपन्यास विन्दते” (तै० उ० २ । ७ । १) | केवल ब्रह्मविद्याका निरूपण “न बिभेति कुतश्चन” (तै० उ० | आरम्भ करनेसे पूर्व ही किया २।९।१) “किमहं साधु नाक- | गया है । ब्रह्मविद्याका उदय रवम्” (तै० उ० २ । ९ । १) | होनेपर तो “अभय प्रतिष्ठाको प्राप्त इत्येवमादिना कर्मनैष्किञ्चन्यं | कर लेता है” “किसीसे भी भय दर्शयिष्यति; इत्यतोऽवगम्यते | नहीं मानता” “मैंने कौन-सा शुभ पूर्वोपचितदुरितक्षयद्वारेण | कर्म नहीं किया” इत्यादि वाक्योंद्वारा विद्योत्पत्त्यर्थानि कर्माणीति । | कर्मोंकी निष्किञ्चनता ही दिखलायेंगे । मन्त्रवर्णाच्च—“अविद्यया मृत्युं | इससे विदित होता है कि कर्म पूर्व- तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते” | सञ्चित पापोंके क्षयके द्वारा ज्ञानकी (ई० उ० ११) इति । ऋता- | प्राप्तिके ही लिये हैं । “अविद्या | ( कर्म ) से मृत्यु ( अधर्म ) को | पार करके विद्या ( उपासना ) से | अमरत्व लाभ करता है” इस मन्त्र- | वर्णसे भी यही बात प्रमाणित होती | है । अतः पहले ( नवम अनुवाकमें )