तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [वल्ली १
४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [_वल्ली १ धर्मविशिष्टं साक्षादुपलभ्यते | ब्रह्म हथेलीपर रखे हुए आँवलेके पाणाविवामलकम् । मार्गश्च | समान साक्षात् उपलब्ध होता है । सर्वात्मभावप्रतिपत्तये वक्तव्य | इसके सिवा सर्वात्मभावकी प्राप्तिके लिये मार्ग भी बतलाना है, इसलिये इस . इत्यनुवाक आरभ्यते— | अनुवाकका आरम्भ किया जाता है— स य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः । तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः । अमृतो हिरण्मयः । अन्तरेण तालुके । य एष स्तन इवावलम्बते । सेन्द्रयोनिः । यत्रासौ केशान्तो विवर्तते । व्यपोह्य शीर्षकपाले । भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति । भुव इति वायौ ॥ १ ॥ सुवरित्यादित्ये । मह इति ब्रह्मणि । आप्नोति स्वाराज्यम् । आप्नोति मनसस्पतिम् । वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः । श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः । एतत्ततो भवति । आकाशशरीरं ब्रह्म । सत्यात्म प्राणारामं मन आनन्दम् । शान्ति- समृद्धममृतम् । इति प्राचीनयोग्योपास्स्व ॥ २ ॥ यह जो हृदयके मध्यमें स्थित आकाश है उसमें ही यह मनोमय अमृत- स्वरूप हिरण्मय पुरुष रहता है । तालुओंके बीचमें और [ उनके मध्य ] यह जो स्तनके समान [ मांसखण्ड ] लटका हुआ है [ उसमें होकर जो सुषुम्ना नाडी ] जहाँ केशोंका मूलभाग विभक्त होकर रहता है उस मूर्धप्रदेशमें मस्तकके कपालोंको विदीर्ण करके निकल गयी है वह इन्द्रयोनि [ अर्थात् परमात्माकी प्राप्तिका मार्ग ] है । [ इस प्रकार उपासना करनेवाला पुरुष प्राणप्रयाणके समय मूर्धाका भेदन कर ] 'भूः' इस व्याहृतिरूप अग्निमें स्थित होता है [ अर्थात् 'भूः' इस व्याहृतिका चिन्तन करनेसे अग्नि- रूप होकर इस लोकको व्याप्त करता है ] । इसी प्रकार 'भुवः' इस CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९ व्याहृतिका ध्यान करनेसे वायुमें ॥ १ ॥ 'सुवः' इस व्याहृतिका चिन्तन करनेसे आदित्यमें तथा 'महः' की उपासना करनेसे ब्रह्ममें स्थित हो जाता है। इस प्रकार वह स्वाराज्य प्राप्त कर लेता है तथा मनके पति (ब्रह्म) को पा लेता है। तथा वाणीका पति, चक्षुका पति, श्रोत्रका पति और सारे विज्ञानका पति हो जाता है। यही नहीं; इससे भी बड़ा हो जाता है। वह आकाश शरीर, सत्यस्वरूप, प्राणाराम, मनआनन्द (जिसके लिये मन आनन्दस्वरूप है), शान्तिसम्पन्न और अमृतस्वरूप ब्रह्म हो जाता है। हे प्राचीनयोग्य शिष्य ! तू इस प्रकार [ उस ब्रह्मकी ] उपासना कर ॥ २ ॥
'सः' इति व्युत्क्रम्य 'अयं हृदयाकाशतस्त्य- पुरुषः' इत्यनेन सं- जीवयोः स्वरूपम् बध्यते। य एषो- ऽन्तर्हृदये हृदयस्यान्तर्हृदयमिति पुण्डरीकाकारो मांसपिण्डः प्रा- णायतनोऽनेकनाडीसुषिर ऊर्ध्व- नालोऽधोमुखो विशस्यमाने पशौ प्रसिद्ध उपलभ्यते। तस्यान्तर्य एष आकाशः प्रसिद्ध एव कर- काकाशवत्, तस्मिन्सोऽयं पुरुषः। पुरि शयनात्पूर्णा वा भूरादयो लोका येनेति पुरुषः । मनोमयो
'सः' इस पहले पदका, पाठ- क्रमको छोड़कर आगेके 'अयं पुरुषः' इस पदसे सम्बन्ध है। जो यह अन्तर्हृदयमें हृदयके भीतर [ आकाश है ]। हृदय अर्थात् श्वेत कमलके आकारवाला मांस- पिण्ड, जो प्राणका आश्रय, अनेकों नाड़ियोंके छिद्रवाला तथा ऊपरको नाल और नीचेको मुखवाला है, जो कि पशुका आलभन (वध) किये जानेपर स्पष्टतया उपलब्ध होता है। उसके भीतर जो यह कमण्डलुके अन्तर्वर्ती आकाशके समान प्रसिद्ध आकाश है उसीमें यह पुरुष रहता है, जो शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण अथवा उसने भूः आदि सम्पूर्ण लोकोंको पूरित किया हुआ है इसलिये 'पुरुष' कहलाता है। वह मनोमय
तै० उ० ७-८- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
५० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
५० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
[संस्कृत-भाष्यम्]
मनो विज्ञानम् मनुतेर्ज्ञान- कर्मणः, तन्मयस्तत्प्रायस्तदुपल- भ्यत्वात्। मनुतेऽनेनेति वा मनो- ऽन्तःकरणं तदभिमानी तन्मय- स्तल्लिङ्गो वा; अमृतोऽमरणधर्मा हिरण्मयो ज्योतिर्मयः । तस्यैवंलक्षणस्य हृदयाकाशे (पार्श्व-टिप्पणी: हृदयाकाशस्थ-जीवोपलब्धये मार्गः) साक्षात्कृतस्य विदुष आत्मभूतस्येन्द्रस्यै- द्यस्वरूपप्रतिपत्तये मार्गोऽभिधीयते। हृदयादूर्ध्वं प्रवृ- त्ता सुषुम्ना नाम नाडी योग- शास्त्रेषु च प्रसिद्धा । सा चान्त- रेण मध्ये प्रसिद्धे तालुके तालु- कयोर्गता । यश्चैष तालुकयोर्मध्ये स्तन इवावलम्बते मांसखण्डस्त- स्य चान्तरेणेत्येतत् । यत्र च केशान्तः केशानामन्तोऽवसानं मूलं केशान्तो विवर्तते विभागेन वर्तते मूर्धप्रदेश इत्यर्थः तं देशं प्राप्य तत्र विनिःसृता व्यपोह्य विभज्य विदार्य शीर्षकपाले
[हिन्दी-अनुवाद]
—ज्ञानवाची 'मन्' धातुसे सिद्ध होनेके कारण 'मन' शब्दका अर्थ 'विज्ञान' है, तन्मय–तत्प्राय अर्थात् विज्ञान- मय है; क्योंकि उस (विज्ञानस्वरूप) से ही वह उपलब्ध होता है; अथवा जिसके द्वारा जीव मनन करता है वह अन्तःकरण ही 'मन' है उसका अभि- मानी, तन्मय अथवा उससे उपलक्षित होनेवाला अमृत—अमरणधर्मा और हिरण्मय—ज्योतिर्मय है । हृदयाकाशमें साक्षात्कार किये हुए उस ऐसे लक्षणोंवाले तथा विद्वान्- के आत्मभूत इन्द्र ( ईश्वर ) के ऐसे स्वरूपकी प्राप्तिके लिये मार्ग बतलाया जाता है—हृदयदेशसे ऊपरकी ओर जानेवाली सुषुम्ना नामकी नाडी योग- शास्त्रमें प्रसिद्ध है । वह 'अन्तरेण तालुके' अर्थात् दोनों तालुओंके बीचमें होकर गयी है। और तालुओंके बीचमें यह जो स्तनके समान मांस- खण्ड लटका हुआ है उसके भी बीचमें होकर गयी है । तथा जहाँ यह केशान्त—केशोंके मूलभागका नाम 'केशान्त' है वह जिस स्थानपर विभक्त होता है अर्थात् जो मूर्ध- प्रदेश है, उस स्थानमें पहुँचकर जो निकल गयी है, अर्थात् जो शीर्षकपालों—मस्तकके कपालोंको
अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
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शिरःकपाले विनिर्गता या सेन्द्र- | पार-विभक्त यानी विदीर्ण करती हुई योनिरिन्द्रस्य ब्रह्मणो योनिर्मार्गः | बाहर निकल गयी है वही इन्द्रयोनि— स्वरूपप्रतिपत्तिद्वारमित्यर्थः । | इन्द्र अर्थात् ब्रह्मकी योनि—मार्ग यानी | ब्रह्मस्वरूपकी प्राप्तिका द्वार है । तयैवं विद्वान्मनोमयात्मदर्शी | इस प्रकार उस सुषुम्ना नाडीद्वारा [सुषुम्नाद्वारा] मूर्ध्ना विनिष्क्रम्या- | जाननेवाला अर्थात् मनोमय आत्मा- [चतुर्व्याहृतिरूप-] स्य लोकस्याधिष्ठा- | का साक्षात्कार करनेवाला पुरुष [ब्रह्मप्राप्तिः] ता भूरिति व्याहृति- | मूर्धद्वारसे निकलकर इस लोकका | अधिष्ठाता जो महान् ब्रह्मका अङ्ग- रूपो योऽग्निर्महतो ब्रह्मणोऽङ्गभूत- | भूत 'भूः' ऐसा व्याहृतिरूप अग्नि स्तस्मिन्नग्नौ प्रतितिष्ठत्यग्न्यात्मनेमं | है उस अग्निमें स्थित हो जाता है; | अर्थात् अग्निरूप होकर इस लोक- लोकं व्याप्नोतीत्यर्थः । तथा भुव | को व्याप्त कर लेता है । इसी प्रकार इति द्वितीयव्याहृत्यात्मनि वायौ । | वह 'भुवः' इस द्वितीय व्याहृति- | रूप वायुमें स्थित हो जाता है—इस प्रतितिष्ठतीत्यनुवर्तते । सुवरिति | प्रकार 'प्रतितिष्ठति' इस क्रियाकी | अनुवृत्ति की जाती है । तथा [ ऐसे तृतीयव्याहृत्यात्मन्यादित्ये । मह | ही ] 'सुवः' इस तृतीय व्याहृति- इत्यङ्गिनि चतुर्थव्याहृत्यात्मनि | रूप आदित्यमें और 'महः' इस | चतुर्थ व्याहृतिरूप अङ्गी ब्रह्ममें स्थित ब्रह्मणि प्रतितिष्ठति । | होता है । तेष्वात्मभावेन स्थित्वाप्नोति | उनमें आत्मस्वरूपसे स्थित हो वह [ब्रह्मभूतस्य] ब्रह्मभूतः स्वाराज्यं | ब्रह्मभूत हुआ स्वाराज्य—स्वराड्भावको [विदुष ऐश्वर्यम्] स्वराड्भावं स्वयमेव | प्राप्त कर लेता है अर्थात् जिस प्रकार | ब्रह्म अङ्गभूत देवताओंका अधिपति राजाधिपतिर्भवति । अङ्गभूतानां | है उसी प्रकार स्वयं उनका राजा— देवानां यथा ब्रह्म । देवाश्च | अधिपति हो जाता है । तथा उसके
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५२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
५२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ सर्वेऽस्मै बलिमावहन्त्यङ्गभूता | अङ्गभूत देवगण जिस प्रकार ब्रह्मको यथा ब्रह्मणे । आप्नोति | उसी प्रकार इस अपने अङ्गीके लिये मनसस्पतिम् । सर्वेषां हि | उपहार लाते हैं । तथा वह मनस्पति- मनसां पतिः सर्वात्मकत्वाद्व्र- | को प्राप्त हो जाता है । ब्रह्म सर्वात्मक ह्मणः । सर्वैर्हि मनोभिस्तन्मनुते । | होनेके कारण सम्पूर्ण मनोंका पति तदाप्नोत्येवं विद्वान् । किं च वा- | है, वह सारे ही मनोंद्वारा मनन क्पतिः सर्वासां वाचां पतिर्भवति । | करता है । इस प्रकार उपासनाद्वारा तथैव चक्षुष्पतिश्चक्षुषां पतिः । | विद्वान् उसे प्राप्त कर लेता है । यही श्रोत्रपतिः श्रोत्राणां पतिः । | नहीं, वह वाक्पति-सम्पूर्ण वाणियों- विज्ञानपतिर्विज्ञानानां च पतिः । | का पति हो जाता है, तथा चक्षु- सर्वात्मकत्वात्सर्वप्राणिनां करणै- | ष्पति-नेत्रोंका स्वामी, श्रोत्रपति- स्तद्वान्भवतीत्यर्थः । | कानोंका स्वामी और विज्ञानपति- किं च ततोऽप्यधिकतरमेतद्भवति । | विज्ञानोंका स्वामी हो जाता है । किं तत् ? उच्यते । आकाश- | तात्पर्य यह है कि सर्वात्मक होनेके शरीरमाकाशः शरीरमस्याकाश- | कारण वह समस्त प्राणियोंकी वद्वा सूक्ष्मं शरीरमस्येत्याकाश- | इन्द्रियोंसे इन्द्रियवान् होता है । शरीरम् । किं तत् ? प्रकृतं ब्रह्म । | यही नहीं, वह तो इससे भी बड़ा सत्यात्म सत्यं मूर्तामूर्तमवितथं | हो जाता है । सो क्या ? बतलाते स्वरूपं चात्मा स्वभावोऽस्य तदिदं | हैं—आकाशशरीर—आकाश जिसका सत्यात्म । प्राणारामं प्राणेष्वारा- | शरीर है अथवा आकाशके समान | जिसका सूक्ष्म शरीर है वही आकाश- | शरीर है । वह है कौन ? प्रकृत | ब्रह्म [ अर्थात् वह ब्रह्म जिसका यहाँ | प्रकरण है ] । सत्यात्म—जिसका | मूर्तामूर्तरूप सत्य अर्थात् अमिथ्या | 'सत्यात्म' कहते हैं । प्राणाराम—
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अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
[मूल संस्कृत / भाष्य] राम आक्रीडा यस्य तत्प्राणा- रामम् । प्राणानां वारामो यस्मिं- स्तत्प्राणारामम् । मनआनन्दम् ; आनन्दभूतं सुखकृदेव यस्य मनस्तन्मनआनन्दम् । शान्ति- समृद्धं शान्तिरूपशमः, शान्तिश्च तत्समृद्धं च शान्तिसमृद्धम् । शान्त्या वा समृद्धं तदुपलभ्यत इति शान्तिसमृद्धम् । अमृतम- मरणधर्मि । एतच्चाधिकरण- विशेषणं तत्रैव मनोमय इत्यादौ द्रष्टव्यमिति । एवं मनोमयत्वा- दिधर्मैर्विशिष्टं यथोक्तं ब्रह्म हे प्राचीनयोग्य, उपास्स्वेत्याचार्य- वचनोक्तिरादरार्था । उक्तस्तू- पासनाशब्दार्थः ॥ १-२ ॥
[हिन्दी अनुवाद] प्राणोंमें जिसका रमण अर्थात् क्रीडा है अथवा जिसमें प्राणोंका आरमण है उसे प्राणाराम कहते हैं । मन- आनन्दम्—जिसका मन आनन्दभूत अर्थात् सुखकारी ही है वह मन- आनन्द कहलाता है । शान्तिसमृद्धम् —शान्ति उपशमको कहते हैं, जो शान्ति भी है और समृद्ध भी वह शान्तिसमृद्ध है अथवा शान्तिके द्वारा उस समृद्ध ब्रह्मकी उपलब्धि होती है, इसलिये उसे शान्तिसमृद्ध कहते हैं । अमृत—अमरणधर्मी । ये अधिकरणमें आये हुए विशेषण उस मनोमय आदिमें ही जानने चाहिये । इस प्रकार मनोमयत्व आदि धर्मोंसे विशिष्ट उपर्युक्त ब्रह्मकी, हे प्राचीन- योग्य ! तू उपासना कर—यह आचार्यकी उक्ति [ उपासनाके ] आदरके लिये है । ‘उपासना’ शब्दका अर्थ तो पहले बतलाया ही जा चुका है ॥ १–२ ॥
इति शीक्षावल्ल्यां षष्ठोऽनुवाकः ॥ ६ ॥
सप्तम अनुवाक
पाङ्क्तरूपसे ब्रह्मकी उपासना
यदेतद्व्याहृत्यात्मकं ब्रह्मो- | यह जो व्याहृतिरूप उपास्य पास्यमुक्तं तस्यैवेदानीं पृथिव्या- | ब्रह्म बतलाया गया है अब पृथिवी दिपाङ्क्तरूपेणोपासनमुच्यते । | आदि पाङ्क्तरूपसे उसीकी उपासना- पञ्चसंख्यायोगात्पङ्क्तिच्छन्दः- | का वर्णन किया जाता है—[पृथिवी संपत्तिः । ततः पाङ्क्तत्वं | आदि पाँच-पाँच संख्यावाले पदार्थ हैं सर्वस्य । पाङ्क्तश्च यज्ञः । | तथा पङ्क्तिछन्द भी पाँच पदोंवाला “पञ्चपदा पङ्क्तिः पाङ्क्तो | है, अतः] 'पाँच' संख्याका योग होनेसे यज्ञः” इति श्रुतेः । तेन यत्सर्वं | [उन पृथिवी आदिसे] पङ्क्तिछन्द लोकाद्यात्मान्तं च पाङ्क्तं परि- | सम्पन्न होता है । इसीसे उन सबका कल्पयति यज्ञमेव तत्परिकल्प- | पाङ्क्तत्व है । यज्ञ भी पाङ्क्त है, जैसा यति । तेन यज्ञेन परिकल्पितेन | कि “पङ्क्तिछन्द पाँच पदोंवाला है, पाङ्क्तात्मकं प्रजापतिमभि- | यज्ञ पाङ्क्त है” इस श्रुतिसे ज्ञात संपद्यते । तत्कथं पाङ्क्तमिदं | होता है । अतः जो लोकसे लेकर सर्वमित्यत आह— | आत्मापर्यन्त सबको पाङ्क्तरूपसे | कल्पना करता है वह यज्ञकी ही | कल्पना करता है । उस कल्पना | किये हुए यज्ञसे वह पाङ्क्तस्वरूप | प्रजापतिको प्राप्त हो जाता है । | अच्छा तो यह सब किस प्रकार | पाङ्क्त है ? सो अब बतलाते हैं—
पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशः । अग्निर्वायुरा- दित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि । आप ओषधयो वनस्पतय-
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अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५ आकाश आत्मा । इत्यधिभूतम् । अथाध्यात्मम् । प्राणो व्यानोऽपान उदानः समानः । चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक् । चर्म माग्ँस्नावास्थि मज्जा । एतदधिविधाय ऋषिरवोचत् । पाङ्क्तं वा इदग्ँसर्वम् । पाङ्क्तेनैव पाङ्क्तग्ँस्पृणोतीति ॥ १ ॥ पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, दिशाएँ और अवान्तर दिशाएँ [—यह लोकपाङ्क्त ]; अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा और नक्षत्र [—यह देवता- पाङ्क्त ] तथा आप, ओषधि, वनस्पति, आकाश और आत्मा—ये अधिभूतपाङ्क्त हैं। अब अध्यात्मपाङ्क्त बतलाते हैं—प्राण, व्यान, अपान, उदान और समान [ —यह वायुपाङ्क्त ]; चक्षु, श्रोत्र, मन, वाक् और त्वचा [—यह इन्द्रियपाङ्क्त ] तथा चर्म, मांस, स्नायु, अस्थि और मज्जा [—यह धातुपाङ्क्त—ये सब मिलाकर अध्यात्मपाङ्क्त हैं ] । इस प्रकार पाङ्क्तोपासनाका विधानकर ऋषिने कहा—'यह सब पाङ्क्त ही है; इस [ आध्यात्मिक ] पाङ्क्तसे ही उपासक [ बाह्य ] पाङ्क्तको पूर्ण करता है' ॥ १ ॥ पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवा- | पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, त्रिविध- न्तरदिश इति लो- | दिशाएँ और अवान्तर दिशाएँ—ये भूतपाङ्क्तम् कपाङ्क्तम् । अग्नि- | लोकपाङ्क्त हैं; अग्नि, वायु, आदित्य, वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणीति | चन्द्रमा और नक्षत्र—ये देवतापाङ्क्त देवतापाङ्क्तम् । आप ओषधयो | हैं; जल, ओषधि, वनस्पति, आकाश वनस्पतय आकाश आत्मेति | और आत्मा—ये भूतपाङ्क्त हैं । यहाँ भूतपाङ्क्तम् । आत्मेति विराड् | 'आत्मा' विराट्को कहा है; क्योंकि भूताधिकारात् । इत्यधिभूतमि- | यह भूतोंका अधिकरण है 'इत्यधि- | भूतम्' यह वाक्य अधिलोक और
५६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
५६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
त्यधिलोकाधिदैवतपाङ्क्तद्वयोप- | अधिदैवत-इन दो पाङ्क्तोंका भी लक्षणार्थम् । लोकदेवतापाङ्क्त- | उपलक्षण करानेके लिये है; क्योंकि योश्चाभिहितत्वात् । | इनमें लोक और देवतासम्बन्धी दो | पाङ्क्तोंका भी वर्णन किया गया है । अथानन्तरमध्यात्मं पाङ्क्त- | अब आगे तीन अध्यात्मपाङ्क्तों- (त्रिविधाध्यात्म-पाङ्क्तम्) त्रयमुच्यते-प्राणा- | का वर्णन किया जाता है-प्राणादि दि वायुपाङ्क्तम् । | वायुपाङ्क्त, चक्षु आदि इन्द्रियपाङ्क्त चक्षुरादीन्द्रियपाङ्क्तम् । चर्मादि | और चर्मादि धातुपाङ्क्त-बस ये धातुपाङ्क्तम् । एतावद्धीदं | इतने ही अध्यात्म और बाह्य पाङ्क्त सर्वमध्यात्मम्, बाह्यं च | हैं । इनका इस प्रकार त्रिधान अर्थात् पाङ्क्तमेवेत्येतदेवमधिविधाय | कल्पना करके ऋषि-वेद अथवा परिकल्प्यर्षिर्वेद एतद्दर्शनसंपन्नो | इस दृष्टिसे सम्पन्न किसी ऋषिने वा कश्चिदृषिरवोचदुक्तवान् । | कहा । क्या कहा ? सो बतलाते किमित्याह-पाङ्क्तं वा इदं सर्वं | हैं-निश्चय ही यह सब पाङ्क्त ही पाङ्क्तेनैवाध्यात्मिकेन संख्या- | है । आध्यात्मिक पाङ्क्तसे ही, सामान्यात्पाङ्क्तं बाह्यं स्पृणोति | संख्यामें समानता होनेके कारण बलयति पूरयति । एकात्मतयो- | उपासक बाह्यपाङ्क्तको बलवान्- पलभ्यत इत्येतत् । एवं पाङ्क्त- | पूरित करता है अर्थात् उसके साथ मिदं सर्वमिति यो वेद स प्रजा- | एकरूपसे उपलब्ध करता है । इस पत्यात्मैव भवतीत्यर्थः ॥ १ ॥ | प्रकार 'यह सब पाङ्क्त है' ऐसा | जो पुरुष जानता है वह प्रजापति- | स्वरूप ही हो जाता है-ऐसा इसका | तात्पर्य है ॥ १ ॥ इति शीक्षावल्ल्यां सप्तमोऽनुवाकः
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अष्टम अनुवाक ओङ्कारोपासनाका विधान व्याहृत्यात्मनो ब्रह्मण उपा- | व्याहृतिरूप ब्रह्मकी उपासनाका सनमुक्तम् । अनन्तरं च पाङ्क्त- | निरूपण किया गया; उसके पश्चात् स्वरूपेण तस्यैवोपासनमुक्तम् । | उसीकी उपासनाका पाङ्क्तरूप से इदानीं सर्वोपासनाङ्गभूतस्योङ्का- | वर्णन किया । अब सम्पूर्ण रस्योपासनं विधित्स्यते । परापर- | उपासनाओंके अङ्गभूत ओंकारकी ब्रह्मदृष्ट्या उपास्यमान ओङ्कारः | उपासनाका विधान करना चाहते शब्दमात्रोऽपि परापरब्रह्मप्राप्ति- | हैं । पर एवं. अपर ब्रह्मदृष्टिसे साधनं भवति । स ह्यालम्बनं | उपासना किये जानेपर ओंकार— ब्रह्मणः परस्यापरस्य च, प्रति- | केवल शब्दमात्र होनेपर भी पर मेव विष्णोः । "एतेनैवायतने- | और अपर ब्रह्मकी प्राप्तिका साधन नैकतरमन्वेति” ( प्र० उ० ५ । | होता है । वही पर और अपर ब्रह्मका २) इति श्रुतेः । | आलम्बन है, जिस प्रकार कि | विष्णुका आलम्बन प्रतिमा है । | “इसी आलम्बनसे उपासक [ पर | या अपर ] किसी एक ब्रह्मको प्राप्त | हो जाता है" इस श्रुतिसे यही | बात प्रमाणित होती है । ओमिति ब्रह्म । ओमितीदꣳसर्वम् । ओमित्ये- तदनुकृतिर्ह स्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति । ओमिति सामानि गायन्ति । ओꣳशोमिति शस्त्राणि शꣳसन्ति । ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति ब्रह्मा प्रसौति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति । ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति । ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ 'ॐ' यह शब्द ब्रह्म है, क्योंकि 'ॐ' यह सर्वरूप है; 'ॐ' यह अनुकृति ( अनुकरण—सम्मतिसूचक संकेत ) है—ऐसा प्रसिद्ध है । [ याज्ञिकलोग ] “ओ श्रावय” ऐसा कहकर श्रवण कराते हैं । ‘ॐ’ ऐसा कहकर सामगान करते हैं।' ‘ॐ शोम् ऐसा कहकर शस्त्रों (गीति- रहित ऋचाओं) का पाठ करते हैं। अध्वर्यु प्रतिगर (प्रत्येक कर्म) के प्रति ‘ॐ’ ऐसा उच्चारण करता है। 'ॐ' ऐसा कहकर ब्रह्मा अनुज्ञा देता है; 'ॐ' ऐसा कहकर वह अग्निहोत्रके लिये आज्ञा देता है । वेदाध्ययन करनेवाला ब्राह्मण 'ॐ' ऐसा उच्चारण करता हुआ कहता है—'मैं ब्रह्म (वेद अथवा परब्रह्म) को प्राप्त करूँ।' इससे वह ब्रह्मको ही प्राप्त कर लेता है ॥ १ ॥
ॐमिति । इतिशब्दः स्वरूप- | ‘ओमिति' इसमें 'इति' शब्द ओङ्कारस्य परिच्छेदार्थः, ओ- | ओंकारके स्वरूपका परिच्छेद सर्वात्म्यम् मित्येतच्छब्दरूपं | (निर्देश) करनेके लिये है। अर्थात् ब्रह्मति मनसा धारयेदुपासीत । | 'ॐ' यह शब्दरूप ब्रह्म है—ऐसा यत ओमितीदं सर्वं हि शब्दरूप- | इसका मनसे ध्यान—उपासना करे; मोङ्कारेण व्याप्तम् । "तद्यथा | क्योंकि 'ॐ' यही सब कुछ है, कारण, समस्त शब्दरूप प्रपञ्च शङ्कुना" (छा० उ० २ । २३ । | ओंकारसे व्याप्त है, जैसा कि 'जिस प्रकार शंकुसे पत्ते व्याप्त रहते हैं' ३) इति श्रुत्यन्तरात् । अभि- | इत्यादि एक दूसरी श्रुतिसे सिद्ध धानतन्त्रं ह्यभिधेयमित्यत इदं | होता है । सम्पूर्ण वाच्य वाचकके सर्वमोङ्कार इत्युच्यते । | ही अधीन होता है, इसलिये यह सब ओंकार ही कहा जाता है । ओङ्कारस्तुत्यर्थमुत्तरो ग्रन्थः । | आगेका ग्रन्थ ओंकारकी स्तुतिके उपास्यत्वात्तस्य । | लिये है; क्योंकि वह उपासनीय ओङ्कारमहिमा ओमित्येतदनुकृति- | है । ‘ॐ' यह अनुकृति यानी रनुकऱणम् । करोमि यास्यामि | अनुकरण है । इसीसे किसीके द्वारा 'मैं करता हूँ, मैं जाता
अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९ चेति कृतमुक्तमोमित्यनुकरोत्य- | इस प्रकार किये हुए कथनको सुनकर दूसरा पुरुष [उसको न्यः । अत ओङ्कारोऽनुकृतिः । स्वीकृत करते हुए] 'ॐ' ऐसा अनुकरण करता है । इसलिये ह स्म वा इति प्रसिद्धार्थव- ओंकार अनुकृति है । 'ह' 'स्म' और 'वै'—ये निपात प्रसिद्धिके सूचक द्योतकाः । प्रसिद्धमोङ्कारस्यानु- हैं; क्योंकि ओंकारका अनुकृतित्व तो प्रसिद्ध ही है । कृतित्वम् । अपि च 'ओ श्रावय' इति | इसके सिवा 'ओ श्रावय' इस प्रकार प्रेरणापूर्वक याज्ञिकलोग प्रैषपूर्वकमाश्रावयन्ति । तथोमिति | प्रतिश्रवण कराते हैं । तथा 'ॐ' ऐसा कहकर सामगान करनेवाले सामानि गायन्ति सामगाः । सामका गान करते हैं । शस्त्र शंसन करनेवाले भी 'ॐ शोम्' ॐशोमिति शस्त्राणि शंसन्ति शस्त्र- ऐसा कहकर शस्त्रोंका पाठ करते हैं । तथा अध्वर्युंलोग प्रतिगरके शंसितारोऽपि । तथोमित्यध्वर्युः प्रति 'ॐ' ऐसा उच्चारण करते प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति हैं । 'ॐ' ऐसा कहकर ब्रह्मा अनुज्ञा देता है अर्थात् प्रेरणापूर्वक ब्रह्मा प्रसौत्यनुजानाति प्रैषपूर्व- आश्रवण करता है; और 'ॐ' कहकर वह अग्निहोत्रके लिये आज्ञा कमाश्रावयति । ओमित्यग्नि- देता है । अर्थात् यजमानके यों कहनेपर कि 'मैं हवन करता हूँ' होत्रमनुजानाति । जुहोमीत्युक्त वह 'ॐ' ऐसा कहकर उसे ओमित्येवानुज्ञां प्रयच्छति । अनुज्ञा देता है ।
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६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
ओमित्येव ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन् | प्रवचन अर्थात् अध्ययन करनेवाला प्रवचनं करिष्यन्नध्येष्यमाण | ब्राह्मण ‘ॐ’ ऐसा उच्चारण करता ओमित्येवाह । ओमित्येव प्रति- | है; अर्थात् ‘ॐ’ ऐसा कहकर ही पद्यतेऽध्येतुमित्यर्थः । ब्रह्मवेद- | वह अध्ययन करनेके लिये प्रवृत्त होता मुपाप्नवानीति प्राप्नुयां ग्रही- | है । ‘मैं ब्रह्म यानी वेदको प्राप्त करूँ ष्यामीत्युपाप्नोत्येव ब्रह्म । | अर्थात् उसे ग्रहण करूँ’ ऐसा कहकर अथवा ब्रह्म परमात्मा तमु- | वह ब्रह्मको प्राप्त कर ही लेता है । पाप्नवानीत्यात्मानं प्रवक्ष्यन्प्राप- | अथवा [ यों समझो कि ] ‘मैं ब्रह्म- यिष्यन्नोमित्येवाह । स च तेनो- | परमात्माको प्राप्त करूँ’ इस प्रकार ङ्कारेण ब्रह्म प्राप्नोत्येव । ओङ्का- | आत्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे वह रपूर्वं प्रवृत्तानां क्रियाणां फलवत्त्वं | ‘ॐ’ ऐसा ही कहता है और यस्मात्तस्मादोङ्कारं ब्रह्मेत्युपासी- | उस ॐकारके द्वारा वह ब्रह्मको तेति वाक्यार्थः ॥ १ ॥ | प्राप्त कर ही लेता है । इस प्रकार | क्योंकि ॐकारपूर्वक प्रवृत्त होनेवाली | क्रियाएँ फलवती होती हैं इसलिये | ‘ॐकार ब्रह्म है’ इस तरह उसकी | उपासना करे—यह इस वाक्यका | अर्थ है ॥ १ ॥
इति शीक्षावल्ल्यामष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥
नवम अनुवाक ऋतादि शुभकर्मोंकी अवश्यकर्तव्यताका विधान विज्ञानादेवाप्नोति स्वाराज्य- | विज्ञानसे ही स्वाराज्य प्राप्त कर | लेता है-ऐसा [छठे अनुवाकमें] कहे मित्युक्तत्वाच्छ्रौतस्मार्तानां कर्म- | जानेके कारण श्रौत और स्मार्त कर्मों- | की व्यर्थता प्राप्त होती है । वह णामानर्थक्यं प्राप्तमित्यतस्तन्मा | प्राप्त न हो, इसलिये पुरुषार्थके प्रति प्रापदिति कर्मणां पुरुषार्थं प्रति | कर्मोंका साधनत्व प्रदर्शित करनेके | लिये यहाँ उनका उल्लेख किया साधनत्वप्रदर्शनार्थमिहोपन्यासः- | जाता है— ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यं च स्वाध्याय- प्रवचने च । तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च । दमश्च स्वाध्याय- प्रवचने च । शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्च स्वाध्याय- प्रवचने च । अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः । तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः । तद्धि तपस्तद्धि तपः ॥ १ ॥ ऋत (शास्त्रादिद्वारा बुद्धिमें निश्चय किया हुआ अर्थ) तथा स्वाध्याय (शास्त्राध्ययन) और प्रवचन (अध्यापन अथवा वेदपाथरूप ब्रह्मयज्ञ) [ये अनुष्ठान किये जाने योग्य हैं] । सत्य (सत्यभाषण) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [अनुष्ठान किये जाने चाहिये] । दम CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
( इन्द्रियदमन ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इन्हें सदा करता रहे ] । शम ( मनोनिग्रह ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ ये सर्वदा कर्तव्य हैं ] । अग्नि ( अग्न्याधान ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इनका अनुष्ठान करे ] । अग्निहोत्र तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ ये नित्य कर्तव्य हैं ] । अतिथि ( अतिथिसत्कार ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इनका नियम- से अनुष्ठान करे ] । मानुषकर्म ( विवाहादि लौकिक व्यवहार ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इन्हें करता रहे ] । प्रजा ( प्रजा उत्पन्न करना ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [-ये सदा ही कर्तव्य हैं ] । प्रजन ( ऋतु- कालमें भार्यागमन ) तथा [ इसके साथ ] स्वाध्याय और प्रवचन [ करता रहे ] । प्रजाति ( पौत्रोत्पत्ति ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इनका नियतरूपसे अनुष्ठान करे ] । सत्य ही [ अनुष्ठान करने योग्य है ] ऐसा रथीतरका पुत्र सत्यवचा मानता है । तप ही [ नित्य अनुष्ठान करने योग्य है ] ऐसा नित्य तपोनिष्ठ पौरुशिष्ठिका मत है । स्वाध्याय और प्रवचन ही [ कर्त्तव्य हैं ] ऐसा मुद्गलके पुत्र नाकका मत है । अतः वे ( स्वाध्याय और प्रवचन ) ही तप हैं, वे ही तप हैं ॥ १ ॥
| [मूल भाष्य] | [हिन्दी अनुवाद] |
|---|---|
| ऋतमिति व्याख्यातम् । स्वा-<br>ध्यायोऽध्ययनम् । प्रवचनमध्या-<br>पनं ब्रह्मयज्ञो वा । एतान्यता-<br>दीन्यनुष्ठेयानीति वाक्यशेषः ।<br>सत्यं च सत्यवचनं यथाव्या-<br>ख्यातार्थं वा । तपः कृच्छ्रादि ।<br>दमो बाह्यकरणोपशमः । शमो-<br>ऽन्तःकरणोपशमः । अग्नय आधा- | 'ऋत'—इसकी व्याख्या पहले<br>[ ऋतं वदिष्यामि—इस वाक्यमें ] की<br>जा चुकी है । 'स्वाध्याय' अध्ययनको<br>कहते हैं, तथा 'प्रवचन' अध्यापन<br>या ब्रह्मयज्ञका नाम है । ये ऋत<br>आदि अनुष्ठान किये जाने योग्य<br>हैं—यह वाक्यशेष है । सत्य—सत्य-<br>वचन अथवा जैसा पहले [ सत्यं<br>वदिष्यामि—इस वाक्यमें ] व्याख्या<br>की गयी है, वह; तप—कृच्छ्रादि; दम—<br>बाह्य इन्द्रियोंका निग्रह; शम—चित्त-<br>**की शान्ति; |
अनु० ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
तव्याः । अग्निहोत्रं च होतव्यम् । | हैं ] । अग्नियोंका आधान करना अतिथयश्च पूज्याः । मानुषमिति | चाहिये। अग्निहोत्र होम करने योग्य लौकिकः संव्यवहारः, तच्च | है । अतिथियोंका पूजन करना चाहिये । मानुष यानी लौकिक यथाप्राप्तमनुष्ठेयम् । प्रजा चोत्पा- | व्यवहार; उसका भी यथाप्राप्त द्या । प्रजननश्च प्रजननमृतौ | अनुष्ठान करना चाहिये । प्रजा उत्पन्न करनी चाहिये । प्रजन- भार्यागमनमित्यर्थः । प्रजातिः | प्रजनन-ऋतुकालमें भार्यागमन और पौत्रोत्पत्तिः पुत्रो निवेशयितव्य | प्रजाति-पौत्रोत्पत्ति अर्थात् पुत्रको इत्येतत् । | स्त्रीपरिग्रह कराना चाहिये । सर्वैरेतैः कर्मभिर्युक्तस्यापि | इन सब कर्मोंसे युक्त पुरुषको [स्वाध्यायप्रवचन-सहयोगकारणम्] स्वाध्यायप्रवचने | भी स्वाध्याय और प्रवचनका यत्न- यत्ततोऽनुष्ठेये इत्येव- | पूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये-इसी- मर्धं सर्वेण सह स्वाध्यायप्रवचन- | लिये इन सबके साथ स्वाध्याय और प्रवचनको ग्रहण किया गया है । ग्रहणम् । स्वाध्यायाधीनं ह्यर्थ- | स्वाध्यायके अधीन ही अर्थज्ञान है ज्ञानम्, अर्थज्ञानायत्तं च परं | और अर्थज्ञानके अधीन ही परमश्रेय श्रेयः; प्रवचनं च तदविस्मरणार्थं | है, तथा प्रवचन उसकी अविस्मृति और धर्मकी वृद्धिके लिये है; इसलिये धर्मप्रवृद्ध्यर्थं च । अतः स्वाध्या- | स्वाध्याय और प्रवचनमें आदर यप्रवचनयोरादरः कार्यः । | ( श्रद्धा ) रखना चाहिये । सत्यमिति सत्यमेवानुष्ठातव्य- | सत्य अर्थात् सत्य ही अनुष्ठान [सत्यादिप्राधान्ये मुनीनां मतभेदाः] मिति सत्यमेव | किये जाने योग्य है-ऐसा सत्यवचा वचो यस्य सोऽयं | -सत्य ही जिसका वचन हो वह अथवा जिसका नाम ही सत्यवचा है सत्यवचा नाम वा तस्य । राथी- | वह राथीतर अर्थात् रथीतरके वंशमें तरो रथीतरस्य गोत्रो राथीतरा- | उत्पन्न हुआ राथीतर आचार्य मानता चार्यो मन्यते । तप इति तप एव | है । तप यानी तप ही कर्त्तव्य है-
६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ कर्तव्यमिति तपोन्नित्यस्तपसि । ऐसा तपोन्नित्य-नित्य तपोनिष्ठ नित्यस्तपःपरस्तपोनित्य इति वा अथवा तपोन्नित्य नामवाला पौरुशिष्टि नाम पौरुशिष्टिः पुरुशिष्टस्या- -पुरुशिष्टका पुत्र पौरुशिष्टि आचार्य पत्यं पौरुशिष्टिराचार्यो मन्यते । मानता है । स्वाध्याय और प्रवचन स्वाध्यायप्रवचने एवानुष्ठेये इति ही अनुष्ठान किये जाने योग्य हैं- नाको नामतो मुद्गलस्यापत्यं ऐसा नाक नामवाला मुद्गलका मौद्गल्य आचार्यो मन्यते । तद्धि पुत्र मौद्गल्य आचार्य मानता है । तपस्तद्धि तपः । हि यस्मात्स्वा- वही तप है, वही तप है । ध्यायप्रवचने एव तपस्तस्मात्ते इसका तात्पर्य यह है-क्योंकि एवानुष्ठेये इति । उक्तानामपि स्वाध्याय और प्रवचन ही तप हैं, सत्यतपःस्वाध्यायप्रवचनानां पु- इसलिये वे ही अनुष्ठान किये जाने नर्ग्रहणमादरार्थम् ॥ १ ॥ योग्य हैं । पहले कहे हुए भी सत्य, तप, स्वाध्याय और प्रवचनोंका पुनर्ग्रहण उनके आदरके लिये है ॥१॥
इति शीक्षावल्ल्यां नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥
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| मन्त्राम्नाय स्वाध्याय ( जप ) के
दशम अनुवाक त्रिशङ्कुका वेदानुवचन अहं वृक्षस्य रेरिवेति स्वाध्या- | ‘अहं वृक्षस्य रेरिवा’ आदि | मन्त्राम्नाय स्वाध्याय ( जप ) के यार्थो मन्त्राम्नायः । स्वाध्यायश्च | लिये है । तथा स्वाध्याय विद्या | ( ज्ञान ) की उत्पत्तिके लिये बतलाया विद्योत्पत्तये । प्रकरणात् । | गया है; यह प्रकरणसे ज्ञात होता | है; क्योंकि यह प्रकरण विद्याके विद्यार्थं हीदं प्रकरणम् । न | लिये ही है, इसके सिवा उसका | कोई और प्रयोजन नहीं जान पड़ता; चान्यार्थत्वमवगम्यते । स्वाध्या- | क्योंकि स्वाध्यायके द्वारा जिसका | चित्त शुद्ध हो गया है उसीको येन च विशुद्धसत्त्वस्य विद्योत्प- | विद्याकी उत्पत्ति होना सम्भव है । त्तिरवकल्प्यते । | अहं वृक्षस्य रेरिवा । कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव । ऊर्ध्व- पवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि । द्रविणꣳसवर्चसम् । सुमेधा अमृतोक्षितः । इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम् ॥ १ ॥ मैं [ अन्तर्यामीरूपसे उच्छेदस्वरूप संसार- ] वृक्षका प्रेरक हूँ । मेरी कीर्ति पर्वतशिखरके समान उच्च है । ऊर्ध्वपवित्र ( परमात्मारूप कारण- वाला ) हूँ । अन्नवान् सूर्यमें जिस प्रकार अमृत है उसी प्रकार मैं भी शुद्ध अमृतमय हूँ । मैं प्रकाशमान [ आत्मतत्त्वरूप ] धन, सुमेधा ( सुन्दर मेधावाला ) और अमरणधर्मा तथा अक्षित ( अव्यय ) हूँ, अथवा अमृतसे सिक्त ( भीगा हुआ ) हूँ—यह त्रिशङ्कु ऋषिका वेदानुवचन है ॥ १ ॥ तै० उ० ९—१०— CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
अहं वृक्षस्योच्छेदात्मकस्य | मैं अन्तर्यामीरूपसे वृक्ष अर्थात् संसारवृक्षस्य रेरिवा प्रेरयिता- | उच्छेदात्मक संसाररूप वृक्षका प्रेरक ऽन्तर्याम्यात्मना । कीर्तिः ख्या- | हूँ । मेरी कीर्ति-प्रसिद्धि पर्वतके तिर्गिरेः पृष्ठमिवोच्छ्रिता मम । | पृष्ठभागके समान ऊँची है । मैं ऊर्ध्व- ऊर्ध्वपवित्र ऊर्ध्वं कारणं पवित्रं | पवित्र हूँ—पवित्र—पावन अर्थात् पावनं ज्ञानप्रकाश्यं पवित्रं परं | ज्ञानसे प्रकाशित होने योग्य पवित्र ब्रह्म यस्य सर्वात्मनो मम सो- | परब्रह्म जिस मुझ सर्वात्माका ऽहमूर्ध्वपवित्रः । वाजिनीव वाज- | ऊर्ध्व यानी कारण है वह वतीव । वाजमन्नं तद्वति सवित- | मैं ऊर्ध्वपवित्र हूँ । 'वाजिनि रीत्यर्थः । यथा सवितर्यमृतमा- | इव'—वाजवान्के समान--वाज अर्थात् त्मतत्त्वं विशुद्धं प्रसिद्धं श्रुति- | अन्न उससे युक्त सूर्यके समान, स्मृतिशतेभ्य एवं स्वमृतं शोभनं | जिस प्रकार सैकड़ों श्रुति-स्मृतियों- विशुद्धमात्मतत्त्वमस्मि भवामि । | के अनुसार सूर्यमें विशुद्ध द्रविणं धनं सवर्चसं दीप्ति- | अमृत यानी आत्मतत्त्व प्रसिद्ध है मत्तदेवात्मतत्त्वमस्मीत्यनुवर्तते । | उसी प्रकार मैं भी सु अमृत अर्थात् ब्रह्मज्ञानं वात्मतत्त्वप्रकाश- | शोभन-विशुद्ध आत्मतत्त्व हूँ । कत्वात्सवर्चसम् । द्रविणमिव | वही मैं आत्मतत्त्व सवर्चस— द्रविणं मोक्षसुखहेतुत्वात् । | दीप्तिशाली द्रविण यानी धन हूँ—इस अस्मिन्पक्षे प्राप्तं मयेत्यध्याहारः | प्रकार यहाँ 'अस्मि (हूँ)' क्रिया- कर्तव्यः । | की अनुवृत्ति की जाती है । अथवा | आत्मतत्त्वका प्रकाशक होनेसे तेजस्वी | ब्रह्मज्ञान, जो मोक्षसुखका हेतु होने- | के कारण धनके समान धन है, | [ मुझे प्राप्त हो गया है ]—इस | पक्षमें [ 'अस्मि' क्रियाकी अनुवृत्ति | न करके ] 'मया प्राप्तम्' ( वह | मुझे प्राप्त हो गया है ) इसका | अध्याहार करना चाहिये ।
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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७
| [शाङ्करभाष्यम्] | [भाष्यार्थ] |
|---|---|
| सुमेधाः शोभना मेधा सर्व-<br>ज्ञलक्षणा यस्य मम सोऽहं<br>सुमेधाः । संसारस्थित्युत्पत्त्युप-<br>संहारकौशल्योगात्सुमेधस्त्वम् ।<br>अत एवामृतोऽमरणधर्माक्षितो-<br>ऽक्षीणोऽव्ययः, अक्षतो वा; अमृतेन<br>वोक्षितः सिक्तः । “अमृतोक्षितो-<br>ऽहम्” इत्यादि ब्राह्मणम् ।<br><br>इत्येवं त्रिशङ्कोऋर्षेर्ब्रह्मभूतस्य<br>ब्रह्मविदो वेदानुवचनम्; वेदो<br>वेदनमात्मैकत्वविज्ञानं तस्य<br>प्राप्तिमनु वचनं वेदानुवचनम् ।<br>आत्मनः कृतकृत्यताख्यापनार्थं<br>वामदेववत्त्रिशङ्कुनार्षेण दर्शनेन<br>दृष्टो मन्त्राम्नाय आत्मविद्या-<br>प्रकाशक इत्यर्थः ।<br><br>अस्य च जपो विद्योत्पत्त्य-<br>र्थोऽवगम्यते । ऋतं चेत्यादि- | सुमेधा—जिस मेरी मेधा शोभन अर्थात् सर्वज्ञत्वलक्षणवाली है वह मैं सुमेधा हूँ । संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और संहार—इसका कौशल होनेके कारण मेरा सुमेधस्त्व है । इसीसे मैं अमृत—अमरणधर्मा और अक्षित—अक्षीण यानी अव्यय अथवा अक्षय हूँ । अथवा, [ तृतीयातत्पुरुष समास माननेपर ] अमृतेन उक्षितः अमृतसे सिक्त हूँ । “ मैं अमृतसे उक्षित हूँ” ऐसा ब्राह्मणवाक्य भी है ।<br><br>इस प्रकार यह ब्रह्मभूत ब्रह्मवेत्ता त्रिशङ्कु ऋषिका वेदानुवचन है । वेद वेदन अर्थात् आत्मैकत्वविज्ञानको कहते हैं उसकी प्राप्तिके अनु—पीछेका वचन ‘वेदानुवचन’ कहलाता है । तात्पर्य यह है कि अपनी कृतकृत्यता प्रकट करनेके लिये वामदेवके समान * त्रिशङ्कु ऋषिद्वारा आर्षदृष्टिसे देखा हुआ यह मन्त्राम्नाय आत्मविद्याका प्रकाश करनेवाला है ।<br><br>इसका जप विद्याकी उत्पत्तिके लिये माना जाता है । इस ‘ऋतं |
* देखिये ऐतरेयोपनिषद् २ । १ । ५