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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

२०४ उपदेशसाहस्री न येषामेक एवात्मा निर्दुःखोऽविक्रियः सदा । तेषां स्याच्छब्दवाच्यत्वं ज्ञेयत्वं चात्मनः सदा ॥५७॥ नेति—जिनके मत में 'आत्मा' एक है, सर्वदा ही निर्दुःख और निर्विकार है, उनके अनुसार आत्मा का शब्दवाच्यत्व और ज्ञेयत्व होना कदापि सम्भव नहीं है ॥ ५७ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार मुख्यवृत्ति से 'आत्मा' जानादि शब्दों का वाच्य नहीं है, यह कहने पर यदि कहें कि यह तो तुम्हारे मत में भी होगा, तो उसका इष्टापत्ति के द्वारा परिहार करते हैं। जिनके मत में सर्वदा एक ही निर्दुःख और निर्विकार आत्मा है, उनके सिद्धान्त के अनुसार आत्मा का शब्दवाच्य होना और ज्ञेय होना कभी संभव नहीं है। अथवा आत्मा में बताये गये मुख्य शब्दप्रवृत्ति के अभाव को ही व्यतिरेक के द्वारा बता रहे हैं—जिनके मत में एक ही अर्थात् यथानिर्दिष्ट आत्मा नहीं है, उनके मत में वह शब्द से वाच्य और ज्ञेय सर्वदा हो सकता है। क्योंकि वहाँ कर्त्रादि व्युत्पत्तियों का संभव है। किन्तु श्रौत एकात्मवाद में उसका संभव नहीं है ॥ ५७ ॥ यदाऽहंकर्तुरात्मत्वं तदा शब्दार्थमुख्यता । नाशनायादिमत्त्वात्तु श्रुतौ तस्यात्मतेष्यते ॥५८॥ यदेति—जब अहङ्कार को 'आत्मा' माना जाय, तभी शब्दार्थ की मुख्यता हो सकती है। किन्तु वह भूख- प्यास से युक्त है। इसलिए श्रुति के द्वारा उसका आत्मत्व नहीं माना जाता ॥ ५८ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि शब्दार्थ की मुख्यता के लिये आत्मा को सविकार ही मान लिया जाय, इस आशंका का उत्तर दे रहे हैं कि शब्दार्थ की मुख्यता तो तभी हो सकती है, जब अहंकार को आत्मा माना जाय। वह अहंकार तो क्षुधा-पिपासादि से युक्त है। अतः उसे श्रुति ने 'आत्मा' शब्द से नहीं कहा। 'अहं कर्ता' इस प्रकार अभिमन्यमान आकार को आत्मा कहा ही नहीं जा सकता। क्योंकि श्रुति¹ ने तो उसे अशनाया आदि से परे बताया है। अतः ज्ञान आदि शब्दों की आत्मा में साक्षात् प्रवृत्ति नहीं होती, इसीलिये आभास द्वारा उनकी प्रवृत्ति बताई गई है ॥ ५८ ॥ हन्त तर्हि न मुख्यार्थो नापि गौणः कथंचन । जानातीत्यादिशब्दस्य गतिर्वाच्या तथापि तु ॥५९॥ हन्तेति—हे भगवन् ! तब तो 'जानाति' आदि शब्द का मुख्यार्थ या गौणार्थ कुछ भी सम्भव नहीं है, तथापि उसकी कोई न कोई गति तो बतानी ही होगी ॥ ५९ ॥ हृदयस्पर्शिनी शब्द के मुख्यार्थ के अभाव में गौण अर्थ भी नहीं हो सकेगा। अर्थात् जानाति आदि शब्दों की आत्मा में और अन्यत्र भी मुख्यता यदि संभव नहीं है तो अन्य वृत्ति से भी आत्मा में उसकी प्रवृत्ति अनुपपन्न ही होगी। क्योंकि जो अमुख्य है उसका अन्यत्र उपचार भी संभव नहीं होता है। अतः जानाति आदि शब्द का मुख्यार्थ या गौणार्थ कुछ भी संभव नहीं है, तथापि उसकी कोई गति तो बतानी ही चाहिये ॥ ५९ ॥ शब्दानामयथार्थत्वे वेदस्याप्यप्रमाणता । सा च नेष्टा ततो ग्राह्या गतिरस्य प्रसिद्धितः ॥६०॥ शब्दानामिति—इस प्रकार शब्दों की अयथार्थता स्वीकार करने पर वेद को अप्रामाण्य प्राप्त होगा, किन्तु वह अभीष्ट नहीं है। अतः लोकप्रसिद्धि के माध्यम से ही उनकी गति समझनी चाहिए। अर्थात् लोकव्यवहार में जो शब्द जिस अर्थ में प्रसिद्ध हो, वही उस शब्द का वाच्य समझना चाहिए ॥ ६० ॥ १. (बृ. उ. ३।५।१)

तत्त्वमसिप्रकरणम् २०५ हृदयस्पशिनी यदि जानाति आदि लौकिक शब्दों की कोई गति नहीं बताई जायगी तो केवल लौकिक शब्दों की ही अप्रमाणता नहीं होगी अपितु वेद की भी अप्रमाणता सिद्ध होगी। वैदिक शब्द भी लोकसिद्ध व्युत्पत्ति की ही अपेक्षा रखते हैं। इस प्रकार वेद का अप्रामाण्य तो किसी को अभीष्ट नहीं है। आत्मा के विषय में तो वेद का ही प्रामाण्य सभी को अभीष्ट है। अतः वेदप्रामाण्यांगीकार के लोभ से ही इन लौकिक शब्दों की गति बतानी ही होगी। एवं च लोक- प्रसिद्धि से ही उन शब्दों की गति स्वीकार करनी चाहिये। अर्थात् लोकव्यवहार में जो शब्द जिस अर्थ में प्रसिद्ध है, उसी को उसका अर्थ मानना चाहिये ॥ ६० ॥ प्रसिद्धिमूढलोकस्य यदि ग्राह्या निरात्मता। लोकायतिकसिद्धान्तः *स चानिष्टः प्रसज्यते ॥६१॥ प्रसिद्धिरिति-यदि मूर्ख लोगों को प्रसिद्धि का स्वीकार करते हैं, तो लोकायतिक (नास्तिक) के देहात्मवाद का सिद्धान्त प्रसक्त होगा, जो किसी को अभीष्ट नहीं है ॥ ६१ ॥ हृदयस्पशिनी पूर्वपक्षवादी ने जो ऊपर कहा कि 'जानाति' आदि शब्दों की गति को लोकप्रसिद्धि से ही समझनी चाहिये । किन्तु प्रश्न यह उपस्थित होता है कि लौकिक शब्दों की गति जानने के लिये प्राकृत पुरुषों की प्रसिद्धि का स्वीकार किया जाय, या पाणिनि आदि अभियुक्त (विद्वान्) को प्रसिद्धि को माना जाय ? उनमें प्रथम प्रसिद्धि का खण्डन करते हैं-यदि प्राकृत (मूर्ख) पुरुषों की प्रसिद्धि को मानते हैं तो देहात्मप्रसिद्धि का भी अभ्युपगम हो जाने से नास्तिकों के अनात्मवाद का सिद्धान्त प्रसक्त होता है। किन्तु वह किसी को अभीष्ट नहीं है। क्योंकि अज्ञानी लोग तो देहादि को ही आत्मा मानते हैं ॥ ६१ ॥ अभियुक्तप्रसिद्धिश्चेत्पूर्ववद्दुर्विवेsingle। गतिशून्यं न वेदोऽयं प्रमाणं संवदत्युत ॥६२॥ अभियुक्तति-यदि अभियुक्तों (पण्डितों) के प्रसिद्ध व्यवहार का ग्रहण करते हैं, तो आत्मा और बुद्धि में किसका ज्ञातृत्व है ? यह विवेक करना कठिन है। प्रमाणभूत वेद भी गतिशून्य के समान आत्मा के ज्ञातृत्व का अनुवाद नहीं कर सकता ॥ ६२ ॥ हृदयस्पशिनी द्वितीय पक्ष का अनुवाद करके उसका भी उत्तर दे रहे हैं-यदि पाणिनि आदि विद्वानों की प्रसिद्धि का स्वीकार करते हैं तो पूर्ववत् (आत्मा और बुद्धि इनमें से किसका ज्ञातृत्व है इस बात का) विवेक करना कठिन है, क्योंकि पूर्वोक्त दोषों की प्रसक्ति होगी। यदि कहें कि गतिशून्य के समान आत्मा के ज्ञातृत्व का अनुवाद वेद करेगा, तो वह भी ठीक नहीं है। क्योंकि वेद प्रमाण हैं, अतः प्रमाणभूत वेद आत्मा के ज्ञातृत्व का गतिशून्य के समान अनुवाद नहीं कर सकता ॥ ६२ ॥ †आदर्शमुखसामान्यं मुखस्येष्टं हि मानवैः। मुखस्य प्रतिबिम्बो हि मुखाकारेण दृश्यते ॥६३॥ आदर्श इति-शीशे में प्रतिफलित हुए मुख के साथ अपने ग्रीवास्थ मुख की समानता समझते हैं। मुख के प्रतिबिम्ब को ही अपने मुख के रूप में देखते हैं ॥ ६३ ॥ हृदयस्पशिनी लौकिक 'जानाति' आदि शब्दों की गति लगाने की पद्धति को बता रहे हैं। चिदात्मा में ही 'जानाति' आदि शब्दों का औपाधिक प्रयोग संभव हो सकता है, उसे दृष्टान्त देकर समझाते हैं। लोग दर्पण में प्रतिबिम्बित मुख के साथ ग्रीवास्थ मुखबिम्ब की समानता (एकता) समझते हैं, किन्तु वहाँ मुख का प्रतिबिम्ब ही मुख के रूप में देखा

  • सा चानिष्टा० - पाठान्तरम् । † आदर्श० - पाठान्तरम् ।

२०६ उपदेशसाहस्री जाता है। तात्पर्य यह है कि आदर्श में जो मुख का प्रतिबिम्ब देखते हैं, वह औपाधिक है और वह ग्रीवास्थ मुख से सर्वथा भिन्न है। तथापि उससे एकता (समानता) होने के कारण लोगों को 'यह मेरा मुख है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है। उसी प्रकार यद्यपि आत्मा और आत्माभास परस्पर भिन्न हैं, तथापि उनका विवेक न होने के कारण साधारण लोगों को 'आत्माभास' में ही आत्मत्व का भ्रम होता है, जिससे वे लोग आत्मा में उसके कर्तृत्वादि का आरोप करते रहते हैं ॥ ६३ ॥ यत्र यस्यावभासस्तु तयोरेवाविवेकतः । जानातीति क्रियां सर्वो लोको वक्ति स्वभावतः ॥ ६४॥ यत्रेति—जिसमें जिसका अवभास होता है, उन दोनों पदार्थों के अविवेक से ही सब लोग स्वाभाविक रूप से 'जानाति' आदि क्रिया का प्रयोग किया करते हैं ॥ ६४ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे कल्पित मुख और वास्तविक मुख दोनों के परस्पर अविवेक से 'मलिनं मुखं, अल्पं मुखं, वक्रं मुखं' आदि औपाधिक व्यवहार होते हैं, उसी तरह आत्मा में भी ज्ञातृत्वादि व्यपदेश (व्यवहार) उपाधि-निबन्धन ही है। अर्थात् चिदाभास की उपाधिरूप बुद्धि के कर्तृत्वादि धर्मों का आत्मा में आरोप किया जाता है ॥ ६४ ॥ बुद्धेः कर्तृत्वमध्यक्ष्य जानातीति ज्ञ उच्यते । तथा चैतन्यमध्यक्ष्य ज्ञातृत्वं बुद्धेरिहोच्यते ॥६५॥ बुद्धेरिति—बुद्धि के कर्तृत्व का आत्मा में अध्यास (आरोप) करके ही 'आत्मा जानता है'—यह कहा जाता है, और बुद्धि में चैतन्य का अध्यास (आरोप) करके उसका 'ज्ञत्व' (ज्ञानवत्त्व) कहा जाता है ॥ ६५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अवभास, आभास, प्रतिबिम्बभाव ये सभी समानार्थक हैं। इनके द्वारा आत्मा-अनात्मा के अन्योन्य धर्माध्यास से 'जानाति' आदि शब्दों का व्यवहार होता रहता है। बुद्धि और आत्मा का परस्पर तादात्म्याध्यास होने पर अन्योन्य धर्मों का संकर होने से 'आत्मा जानाति', 'अहं जानामि' आदि व्यवहार होते हैं। आत्मा तो चेतन है और बुद्धि जड़ है। आत्मा में जड़ बुद्धि के कर्तृत्वादि धर्म का आरोप करके उसे 'जानाति' शब्द द्वारा 'ज्ञ' कहा जाता है। उसी तरह बुद्धि में आत्मचैतन्य का अध्यास (आरोप) होता है, इस कारण उसे भी 'ज्ञ' कहा जाता है ॥ ६५ ॥ स्वरूपं चात्मनो ज्ञानं नित्यं ज्योतिःश्रुतेर्यतः । न बुद्ध्या क्रियते तस्मान्नात्मनान्येन वा सदा ॥६६॥ स्वरूपमिति—'ज्ञान' आत्मा का स्वरूप है। इसलिये वह नित्य है। क्योंकि श्रुति ने उसे (आत्मा को) स्वयंज्योति कहा है। अतः बुद्धि के द्वारा आत्मा में 'ज्ञान' को उत्पन्न नहीं किया जाता, और उसी तरह आत्माके द्वारा अथवा अन्य किसी इन्द्रिय आदि के द्वारा भी उसको उत्पन्न नहीं किया जाता ॥ ६६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि बुद्धि आदि के द्वारा तो आत्मा में ज्ञान उत्पन्न किया जाता है, तब यह कैसे कह रहे हैं कि आत्मचैतन्य का बुद्धि में आरोप (अध्यास) किया जाता है ? इसका समाधान यह है कि बृहदारण्यक श्रुति १ ने बताया है—'ज्ञान' आत्मा का स्वरूप है। इसी को बताने वाली अन्यान्य श्रुतियाँ २ भी हैं। अतः ज्ञान नित्य है। इससे यह प्रतीत होता है कि बुद्धि के द्वारा ज्ञान उत्पन्न नहीं किया जाता। तथा आत्मा या अन्य किसी चक्षुरादि के द्वारा भी उसकी कभी उत्पत्ति नहीं होती है ॥ ६६ ॥ १. "तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिः"—(बृ. उ. ४।४।१६) २. "आत्मैवास्य ज्योतिः"—(बृ. उ. ४।३।६), "अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः"—(बृ. उ. ४।३।९), “साक्षी चेता— (श्वे. उ. ६।११)

तत्त्वमसिप्रकरणम् २०७ देहेऽहंप्रत्ययो यद्वज्जानातीति च लौकिकाः। वदन्ति ज्ञानकर्तृत्वं तद्वद्बुद्धेस्तथात्मनः॥६७॥ देह इति—बुद्धि और आत्मा दोनों में दोनों का परस्पर अध्यास होता है, उस कारण ज्ञातृत्वादि व्यवहार होता रहता है। एक दृष्टान्त से यह समझ में आ सकता है—जिस प्रकार प्राकृत पुरुषों को देह (शरीर) में 'अहम्' प्रत्यय होता है, उसके होने से ही वे पुरुष अपने को मोटा, दुबला, गोरा, साँवला, काला, रोगी, स्वस्थ आदि समझते रहते हैं। उसी प्रकार लौकिक पुरुष 'बुद्धि' में आत्मत्व का अध्यास करके 'जानाति' शब्द से बुद्धि में ज्ञानकर्तृत्व का प्रदर्शन करते हैं और बुद्धि के कर्तृत्व का 'आत्मा' में आरोप करके उसे ज्ञानाश्रय कहा करते हैं ॥ ६७ ॥ हृदयस्पर्शिनी बुद्धि और आत्मा के अन्योन्यधर्माध्यास से ही ज्ञातृत्व, कर्तृत्वादि व्यवहार होता है, यह बता चुके हैं। उसी में दृष्टान्त दे रहे हैं—जैसे घट आदि का रूपादिमत्त्वेन व्यवहार होता है, वैसे ही यह देह अहम्प्रत्यय के योग्य न होते हुए भी उसमें चेतना का अध्यास करके साधारण लोग देह में ही अहम्प्रत्यय करते हैं, और उसी के कारण वे अपने को कृश, स्थूल, गौर, श्याम, रोगी, निरोग आदि समझते हैं। उसी प्रकार बुद्धि जड़ होने से उसमें ज्ञातृत्व की योग्यता न रहने पर भी, चिदाभास की व्याप्ति के कारण ज्ञातृत्व का आरोप किया जाता है और 'जानामि' कहकर ज्ञानकर्तृत्व प्रदर्शित करते हैं। उसी प्रकार बुद्धि के कर्तृत्व का आत्मा में आरोप कर आत्मा को भी ज्ञानाश्रय कह देते हैं। वस्तुतः आत्मा तो अविकारी (विकाररहित) है और चित्त (बुद्धि) विकारी (विकार सहित) है, किन्तु साधारण लोगों को उन दोनों में विवेक न हो पाने से वे लोग आत्मा को ही विकारी समझते हैं और कहते भी हैं। तात्पर्य यह है कि शास्त्रसंस्कार से रहित लोग 'देवदत्तो जानाति मनुते' इस प्रकार देह को ही ज्ञाता समझते हैं। वैसे ही बुद्धि में ज्ञानकर्तृत्व (बुद्धि ज्ञान की कर्त्री है, ऐसा) कहते हैं और आत्मा को ज्ञान का आश्रय तथा विकारवान् (विकारी) कहते हैं ॥ ६७ ॥ बौद्धैस्तु प्रत्ययैरेवं क्रियमाणैश्च चिन्निभैः । मोहिताः क्रियते ज्ञानमित्याहुस्तार्किका जनाः ॥६८॥ बौद्धैरिति—चेतन के समान प्रतीत होने वाली बुद्धि से प्रत्यय (वृत्तिविशेष) उत्पन्न होते रहते हैं। उन उत्पद्यमान प्रत्ययों से मोहित हुए तार्किक (नैयायिक) लोग आत्मा से 'ज्ञान' का उत्पन्न होना समझने लगते हैं। आत्मा तो नित्य ज्ञानस्वरूप ही है। चिदाभासविशिष्ट बुद्धि से वृत्तिज्ञानों की उत्पत्ति होती है। किन्तु तार्किक लोग इस रहस्य को नहीं समझ पाते ॥ ६८ ॥ हृदयस्पर्शिनी पुनरपि शंका होती है कि तार्किक लोग ज्ञान की उत्पत्ति और विनाश को देखकर आत्मा के द्वारा ज्ञान का किया जाना (उत्पन्न होना) बताते हैं, तब ज्ञान को नित्य समझकर उसे आत्मस्वरूप कैसे कहा जाय ? समाधान यह है कि चेतन के तुल्य प्रतीयमान बुद्धि के उत्पद्यमान प्रत्ययों से मोहित हुए तार्किक लोग 'ज्ञान उत्पन्न होता है' ऐसा कहते हैं। आत्मा तो नित्यज्ञानस्वरूप है। जब बुद्धि में आत्मा का प्रकाश पड़ता है, तब वह चेतन के समान प्रतीत होने लगती है और उसी से घटाकार-पटाकार ज्ञान जैसे वृत्तियों (ज्ञानों) की उत्पत्ति होती रहती है। बुद्धि और आत्मा के परस्पराध्यास से ही यह सब खेल होता है। किन्तु तार्किक लोग (नैयायिक गण) ऐसा न मानकर उस वृत्तिज्ञान को आत्मकतृत्व ही समझते हैं। वे यह नहीं सोच पाते कि यदि आत्मा में कर्तृत्वादि विकार माना जायगा तो आत्मा को अनित्य कहना पड़ेगा। अतः इन तार्किकों को अध्यास से मोहित हुए ही समझना चाहिये। कर्तृत्वादि धर्म तो चिदाभासविशिष्ट बुद्धि के ही हैं। जिस प्रकार एक ही अखण्ड आकाश घटादि से नाना प्रतीत होता है, उसी प्रकार बुद्धिरूप उपाधि के कारण (अनेकविध वृत्तिज्ञान के कारण) एक ही नित्यज्ञानस्वरूप आत्मा विभिन्न-सा जान पड़ता है ॥ ६८ ॥

२०८ | उपदेशसाहस्री तस्माज्ज्ञाभासबुद्धीनामविवेकात्प्रवर्तितः । जानातीत्यादिशब्दश्च प्रत्ययो या च तत्स्मृतिः ॥६९॥ तस्मादिति-अतः यह निश्चित रूप से समझना होगा कि 'चेतन' (ज्ञ), चिदाभास, और बुद्धि इन तीनों का विवेक न हो पाने से ही 'जानाति' इत्यादि शब्द, तद्विषयक ज्ञान, और उसकी स्मृति हुआ करती हैं ॥ ६९ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसलिये चेतन, चिदाभास, बुद्धि इन तीनों के अविवेक के कारण ही 'जानाति' आदि शब्द, तद्विषयक ज्ञान, और उसकी स्मृति की प्रवृत्ति हुई है। आत्मा की जो कूटस्थता है, वह प्रमाण से सिद्ध है। किन्तु उसका विकारित्व प्रमाण से सिद्ध नहीं है। जब कि ज्ञान में आत्मस्वरूपता का श्रवण होता है, अतः वह तो नित्य ही है। उसे किसी के द्वारा उत्पन्न नहीं किया जाता । बुद्धिसंसर्ग हुए बिना आत्मा में ज्ञातृत्व की उपलब्धि नहीं हो पाती, क्योंकि सुषुप्ति में ज्ञातृत्व की उपलब्धि नहीं होती है। बुद्धि की उपलब्धि भी आत्मा से भिन्न आकार में नहीं होतो। इस कारण आत्मा, बुद्धि, तत्स्थ आभास इन तीनों का विवेकग्रह न होने से यथाप्रसिद्ध बुद्धि और आत्मा के व्यावहारिक एकत्व का ग्रहण कर 'जानाति' आदि शब्दों का व्यवहार उपपन्न होता है । कोई भी अन्य आलम्बन परमार्थतः मुख्य नहीं है ॥ ६९ ॥ आदर्शानुविधायित्वं छायाया अस्यते मुखे । बुद्धिधर्मानुकारित्वं ज्ञभासस्य तथेष्यते ॥७०॥ आदर्शोति - मुखाभास में दर्पण का अनुविधायित्व रहता है और उसका मुख में आरोप करते हैं, वैसे ही बुद्धि के धर्मों का अनुकरण करने वाला जो चिदाभास है, उसका चेतन में आरोप किया जाता है ॥ ७० ॥ हृदयस्पर्शिनी ज्ञ, आभास और बुद्धि के अविवेक से जो समस्त व्यवहार चलता है, वह पारमार्थिक नहीं है, इसे दृष्टान्त के द्वारा स्पष्ट कर रहे हैं- जिस प्रकार छाया में (मुखाभास अर्थात् प्रतिबिम्ब में) दर्पण का अनुवर्तन रहता है, उसी का मुख में आरोप किया जाता है। उसी प्रकार बुद्धि के धर्मों का अनुकरण करने वाले अध्यस्त चिदाभास को भी चेतन में अध्यस्त मानकर व्यवहार किया जाता है ॥ ७० ॥ बुद्धेस्तु प्रत्ययास्तस्मादात्माभासेन दीपिताः । ग्राहका इव भान्ते दहन्तीवोल्मुकादयः ॥७१॥ बुद्धेरिति-अग्नि से व्याप्त हुआ अंगार, दाहक के रूप में प्रतीत होता है, उसी प्रकार चिदाभास से प्रकाशित होने वाले बुद्धि के प्रत्यय, प्रकाशकर्ता के रूप में जान पड़ते हैं ॥ ७१ ॥ हृदयस्पर्शिनी जिस प्रकार उल्मुक (जलती हुई लकड़ी, अंगार) आदि अग्नि से व्याप्त होने के कारण जलाते हुए से प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार चिदाभास के द्वारा प्रकाशित हुए बुद्धि के परिणामरूप प्रत्यय प्रकाशकर्ता की तरह प्रतीत होते हैं ॥ ७१ ॥ स्वयमेवावभास्यन्ते ग्राहकाः स्वयमेव च । इत्येवं ग्राहकास्तित्वं प्रतिषेधन्ति सौगताः ॥७२॥ स्वयमिति-ग्राहक (ज्ञान) स्वयं ही प्रकाशित होते हैं और वे स्वयं ही प्रकाशरूप हैं-यह कहनेवाले बौद्ध विद्वान् प्रत्यय (ज्ञान) के अतिरिक्त किसी अन्य प्रकाशक के अस्तित्व (सत्ता) का निषेध करते हैं ॥ ७२ ॥ हृदयस्पर्शिनी आभास से विविक्त (पृथक्) पदार्थ के स्वरूप का ज्ञान न होने से जैसे तार्किकों को व्यामोह होकर वे 'ज्ञानं क्रियते' कहते हैं, उसी प्रकार बौद्धों को भी 'बुद्धि से व्यतिरिक्त (पृथक्) अन्य कोई ग्राहक नहीं है', इस प्रकार का व्यामोह

तत्त्वमसिप्रकरणम् २०९ ही है। ग्राहक (प्रत्यय = ज्ञान) स्वयंप्रकाश होता हैं अर्थात् ज्ञानमात्र स्वयं प्रकाशित होते हैं और वे स्वयं भी प्रकाशरूप हैं, ऐसा बौद्ध कहते हैं और वे प्रत्यय (विज्ञान) से भिन्न किसी अन्य प्रकाशक (ग्राहक) की सत्ता का निषेध करते हैं।। ७२ ॥ यद्येवं नान्यदृश्यास्ते किं तद्धारणमुच्यताम् । भावाभावौ हि तेषां यौ नान्यग्राह्यौ सता यदि ॥७३॥ यदीति—बौद्ध विद्वान् यदि ऐसा कहते हैं कि वे प्रत्यय (विज्ञान) समूह किसी अन्य के दृश्य नहीं हैं, तो यह बताओ कि उसका निवारण कैसे किया जाय ? उसके उत्तर में कहते हैं कि उन प्रत्ययों के उत्पत्ति और विनाश यदि किसी अन्य स्वतःसिद्ध साक्षी से ग्राह्य नहीं हैं तो भी उन्हें चिदाभास से ग्राह्य समझने की कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ७३ ॥ हृदयस्पर्शनी प्रत्ययों (ज्ञानों) के ग्राहक के रूपमें किसी अन्य स्थिर पदार्थ को न मानकर प्रत्यय (ज्ञान) को ही ग्राह्य और ग्राहक के आकार में बौद्ध मानते हैं, तो उनका मत अनुभवानुसारी होने से आभास का अभ्युपगम न करने में उनका निराकरण किस प्रकार करना चाहिये ? इस आशय से अपने यूथ से पूछते हैं—यदि बौद्ध लोग यह कहते हैं कि प्रत्यय (ज्ञान) किसी अन्य के दृश्य नहीं हैं, तो उनके इस कथन का किस प्रकार से निषेध किया जाय ? ऐसा पूछने पर यूथ्य ने उत्तर दिया कि उन प्रत्ययों के जो भाव और अभाव (उत्पत्ति और विनाश) हैं, वे यद्यपि किसी अन्य स्वतःसिद्ध साक्षी से सर्वदा ग्राह्य नहीं होते, तथापि जिसमें प्रत्ययों के भावाभाव होते हैं, उनका ग्राहक 'सोऽहम्' इस प्रत्यभिज्ञान के बल से अन्वयी स्थायी आत्मा सिद्ध हो जाता है, तो आभासकी कल्पना करने की क्या आवश्यकता ? अर्थात् उन्हें चिदाभास से ग्राह्य मानने की कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ७३ ॥ अन्वयी ग्राहकस्तेषामित्येतदपि तत्समम् । *अचित्तित्वस्य तुल्यत्वादन्यस्मिन् ग्राहके सति ॥७४॥ अन्वयीति—उन ग्राह्यों का ग्राहक यदि किसी स्थायी को माना जाय तो वह भी उन ग्राह्य प्रत्ययों के समान जड़ ही होगा, क्योंकि उस स्थायी ग्राहक का कोई अन्य ग्राहक रहने पर उसका जड़त्व (अचेतनत्व) भी उन प्रत्ययों के समान ही है ॥ ७४ ॥ हृदयस्पर्शनी इस प्रकार स्वयूथ्य के द्वारा कहे जानेपर सिद्धान्ती सोचता है कि इतने मात्र उत्तर से बौद्धमत का निवारण होना शक्य नहीं है, अतः पूर्वोक्त उत्तर में दोषप्रदर्शन कर रहे हैं। प्रत्यभिज्ञा के बलपर किसी स्थायी ग्राहक को सिद्ध करने पर भी उन प्रत्ययों के तुल्य वह भी जड़ ही कहा जायगा, क्योंकि उसका कोई अन्य ग्राहक होनेपर उसका अचेतनत्व भी प्रत्ययों के समान ही होगा। बौद्धलोग विषय और उसके ग्राहक दोनों को ही विज्ञानरूप मानते हैं। उनके इस मतका खण्डन करते हुए यह बताया जा रहा है कि जो लोग केवल बुद्धि और कूटस्थ चेतन की ही सत्ता स्वीकार करते हैं, उनका मत भी समीचीन नहीं है। बुद्धि के प्रत्ययों को ग्रहण करनेवाली वस्तु या तो स्वयंप्रकाश होगी या परप्रकाश्य होगी। यदि वह परप्रकाश्य है तो जड़ होने के कारण वह प्रत्ययों का प्रकाशन नहीं कर सकती, और यदि किसी प्रकार उसमें ऐसा सामर्थ्य माना भी जाय, तो यह प्रश्न होगा कि जिससे वह प्रकाशित होती है, वह वस्तु परप्रकाश्य है या स्वयंप्रकाश ? यदि उसे भी परप्रकाश्य कहें तो अनवस्था दोष उपस्थित होता है। और यदि स्वयंप्रकाश कहते हैं तो साक्षी चेतन की सत्ता सिद्ध होती है। इस श्लोक में परप्रकाश्य वस्तु के प्रकाशक का खण्डन करने के बाद उन लोगों के मत का खण्डन करते हैं, जो साक्षी चेतन की सत्ता तो स्वीकार करते हैं, किन्तु चिदाभास को मानने की आवश्यकता नहीं समझते ॥ ७४ ॥ अध्यक्षस्य समीपे तु सिद्धिः स्यादिति चेन्मतम् । नाध्यक्षेऽनुपकारित्वादन्यत्रापि प्रसङ्गतः ॥७५॥

  • अचित्त्वस्यापि तु० — पाठान्तरम् । २७

२१० उपदेशसाहस्री अध्यक्षस्येति—यदि यह कहें कि साक्षी चेतन के सन्निध रहने मात्र से प्रत्ययों का प्रकाशन हो जायगा, चिदाभास की कल्पना करने की आवश्यकता नहीं होगी । किन्तु यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि अध्यक्ष में अर्थात् निर्विकार कूटस्थ साक्षी में उपकारित्व की सम्भावना नहीं कर सकते, क्योंकि उसमें उपकारित्व को मानने पर अन्यत्र लोष्ठकाष्ठादि में भी प्रत्ययप्रकाशकत्व मानना होगा, क्योंकि साक्षी की सन्निधि तो सर्वत्र समान ही है ॥ ७५ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि यह कहें कि स्वप्रकाश साक्षी के न रहने पर प्रत्ययों का भावाभाव (उत्पत्ति-विनाश) नहीं हो पायेगा, तो साक्षी के सान्निध्यमात्र से ही प्रत्ययों का भावाभाव (प्रकाशनादि) का होना उपपन्न हो जायगा, तब आभास (चिदाभास) को मानने की क्या आवश्यकता ? किन्तु यह शंका उचित नहीं प्रतीत हो रही है। क्योंकि निर्विकार कूटस्थ साक्षी में किसी प्रकार के उपकारकत्व की संभावना नहीं हो सकती। यदि हठात् उसमें उपकारकत्व धर्म को स्वीकार करें तो उसकी सन्निधि सभी के साथ समान रहने से काष्ठ-लोष्ठादि में भी प्रत्ययप्रकाशन का सामर्थ्य मानना होगा ॥ ७५ ॥ अर्थी दुःखी च यः श्रोता स त्वध्यक्षोऽथवेतरः । अध्यक्षस्य च दुःखित्वमर्थित्वं च न ते मतम् ॥७६॥ अर्थीति—इसी प्रसंग में एक प्रश्न यह भी हो सकता है कि मुमुक्षु, जो अर्थी कहलाता है, वह संसार के दुःखों से दुःखी हुआ जो गुरुपदेश का श्रोता है, वह कौन है ? क्या वह बुद्धि है ? साक्षी है ? अथवा कोई अन्य है ? तुम्हें अध्यक्ष का यानी साक्षी का दुःखित्व और मुमुक्षुत्व तो मान्य नहीं है ॥ ७६ ॥ हृदयस्पर्शिनी आभास के न मानने पर बौद्ध मत की समानता के दोष का परिहार नहीं हो सकेगा, यह कहने पर शास्त्रीय बन्ध-मोक्ष व्यवहार भी नहीं हो पायगा। मोक्ष की इच्छा करने वाला और सांसारिक दुःखों से दुःखी हुआ जो गुरुपदेश का श्रोता है, वह कौन है ? जो श्रोता है, वही अध्यक्ष है या उससे अन्य और कोई है ? प्रथम कल्प (पक्ष) में तुम्हारे निरनुग्राह्याध्यक्षवादी सिद्धान्त का भंग हो जायगा, अर्थात् तुम्हें साक्षी का दुःखित्व और मुमुक्षत्व तो स्वीकार है नहीं। आत्माभास का अंगीकार न करने वाले तुम्हारे मत में द्वार न होने से अविद्यातत्कार्य सम्बन्ध की सिद्धि नहीं होगी, उसके बिना मोक्षार्थित्व भी सिद्ध नहीं होगा, अर्थात् आभास के स्वीकार करने का प्रसंग प्राप्त होगा ॥ ७६ ॥ कर्ताध्यक्षः सदस्मीति नैव सद्ग्रहमर्हति । सदेवासीति मिथ्योक्तिः श्रुतेरपि न युज्यते ॥७७॥ कर्तेति—'मैं कर्ता और साक्षी सत् हूँ'—यह कहने से 'आत्मा' का, 'सत्' शब्द से निर्दिष्ट जो 'ब्रह्म' है, उस रूप से ग्रहण नहीं हो सकता, और 'तू सत् ही है'—इस वेदवचन को तो मिथ्या कहना भी उचित नहीं है। इसलिये शुद्ध चेतन में कर्तृत्व, दुःखित्व तथा अर्थित्वादि विकारी धर्मों का होना संभव नहीं हो सकता ॥ ७७ ॥ हृदयस्पर्शिनी द्वितीय कल्प को दूषित करते हैं—'मैं कर्ता और साक्षी सत् हूँ' ऐसा स्वीकार करने से आत्मा का 'सत्' शब्द से निर्दिष्ट हुए ब्रह्मरूप से ग्रहण नहीं किया जा सकता। और 'तू सत् ही है' यह श्रुतिवाक्य भी मिथ्या नहीं माना जा सकता। अतः शुद्ध चेतन में कर्तृत्व, दुःखित्व एवं अर्थित्वादि विकारी धर्मों का होना असंभव है। क्योंकि एक ही वस्तु एक साथ 'कर्ता' और 'साक्षी' नहीं होती है। ये दोनों धर्म परस्परविरुद्ध हैं। एक ही वस्तु में दो विरोधी धर्मों का एक साथ रहना संभव नहीं है। कर्ता कर्तृत्वधर्म से युक्त होने से विकारी होता है, किन्तु साक्षी कर्तृत्वादि धर्म से रहित होता है ॥ ७७ ॥ अविविच्योभयं वक्ति श्रुतिश्चेत्स्याद्ग्रहस्तथा । अस्मदस्त्व विविच्यैव त्वमेवेति वदेद्यदि । प्रत्ययान्वयिनिष्ठत्वमुक्तदोषः प्रसज्यते ॥७८॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् २११ अविविच्येति—आत्मा और अहङ्कार दोनों का विवेक न करके यदि श्रुति ऐसा कहती है तो उक्त वाक्य के अर्थ का ग्रहण हो सकता है, और यदि अहमर्थ (शुद्ध चेतन) से अहंकार का विवेक करके उसके विषय में 'तत् त्वमसि तू वह (ब्रह्म) है, इस प्रकार श्रुति, यदि ब्रह्म का अहङ्कारनिष्ठत्व बताती है तो उक्त दोष (मिथ्याभाषण का दोष) का प्रसङ्ग प्राप्त होता है ॥ ७८ ॥ हृदयस्पर्शिनी चिदाभास के अनभ्युपगमपक्ष में बन्ध-मोक्ष की अनुपपत्ति बताकर अपने पक्ष में उसकी उपपत्ति बताते हैं। यदि श्रुति, आत्मा और अहंकार दोनों का विवेक न करके ऐसा कहती है, तब तो इस वाक्य के अर्थ का ग्रहण हो सकता है। 'तत्त्वमसि' तू ब्रह्म है—इस प्रकार का श्रुति का कथन चिदाभास के द्वारा आत्मा और अहंकार का अविवेक होने पर ही सार्थक हो सकता है। क्योंकि संसारदुःख से दुःखी हुआ अहंकार ही मोक्ष की इच्छा कर सकता है और आत्मज्ञान द्वारा उसी का मोक्ष होना संभव हो सकता है। यदि अहमर्थ (शुद्ध चेतन) से अहंकार का विवेक कर उसके विषय में 'तू वह (ब्रह्म) है' इस प्रकार ब्रह्म का अहंकारनिष्ठत्व श्रुति ने बताया हो तो उपर्युक्त मिथ्या भाषण का दोष आता है। तात्पर्य यह है कि यदि 'आत्मा' शब्द से अहंकार को मानकर उसे ब्रह्मरूप कहते हैं तो श्रुति को मिथ्या कहना पड़ेगा। अतः श्रुति का यह 'तत्त्वमसि' उपदेश उसी के लिये है, जिसने अध्यास के द्वारा अविवेकवशात् अहंकार के दुःखित्वादि का आत्मा में आरोप किया है। अर्थात् सांख्य का कहना है कि अहंकार को ही श्रोता मान लिया जाय तो आत्माभास के स्वीकार करने की क्या आवश्यकता है ? उसपर कहते हैं कि यदि श्रुतिवाक्य प्रत्यक्चैतन्य से अहंकार को, पाते से गन्ने के समान पृथक् करके केवल अहंकार को 'तू ही ब्रह्म है' इस प्रकार श्रुतिद्वारा आचार्य यदि कहें, तब तो 'तत्त्वमसि' श्रुति के अहंकारनिष्ठ होने से मिथ्यावादित्व का दोष प्रसक्त हो सकेगा, अन्यथा नहीं ॥ ७८ ॥ त्वमित्यध्यक्षनिष्ठश्चेदहमध्यक्षयोः कथम्। सम्बन्धो वाच्य एवात्र येन त्वमिति लक्ष्येत् ॥७९॥ त्वमिति—'त्वम्' पद अहङ्कार का वाचक होने पर भी उसे साक्षोपरक भी यदि स्वीकार कर लिया जाय तो यह बताना होगा कि साक्षी और अहङ्कार का सम्बन्ध किस प्रकार का है, जिससे कि 'त्वम्' पद 'साक्षी' को लक्षित कर सकेगा ॥ ७९ ॥ हृदयस्पर्शिनी अहङ्कर्तृविषयक 'त्वं' शब्द से अध्यक्ष (साक्षी) लक्ष्यमाण होने से यह अहङ्कर्तृविषयक उपदेश तो अध्यक्ष (साक्षी) में ही पर्यवसित होगा, आभास को मानने की क्या आवश्यकता है ? इस शंका का समाधान कर रहे हैं—यदि यह कहें कि 'त्वं' यह पद अहंकारवाचक होकर अध्यक्ष को बोधित करता है, तथापि अहंकार और अध्यक्ष दोनों के सम्बन्धग्रह के बिना वाक्यार्थबोध का होना संभव नहीं। अहं और अध्यक्ष का सम्बन्ध तो बताना ही होगा। जिस संबंध से त्वं-पद अध्यक्ष को लक्षित कर सके, वह सम्बन्ध कैसे उपपन्न होगा ? अतः सम्बन्ध बताना आवश्यक है ॥ ७९ ॥ द्रष्टृदृश्यत्वसम्बन्धो यद्यध्यक्षेऽक्रिये कथम् ॥८०॥ द्रष्ट्रीति—यदि दोनों का 'द्रष्टृ-दृश्यत्व' सम्बन्ध कहा जाय तो साक्षी में उस सम्बन्ध का ग्रहण कैसे होगा ? क्योंकि वह अक्रिय है ॥ ८० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर यदि पूर्वपक्षी कहे कि 'हाँ, सम्बन्ध है', तो उसकी शंका को दूर करते हैं। यदि अहंकार और अध्यक्ष (साक्षी) का द्रष्टृ-दृश्यत्वरूप सम्बन्ध कहें तो वह भी संभव नहीं है। क्योंकि साक्षी (अध्यक्ष) तो विकाररहित (निर्विकार) है, उस कारण उसमें सम्बन्धग्रहणकर्तृत्वरूप धर्म (विकार) नहीं रह सकता। तथा अहंकार जड़ हैं, उस कारण वह भी उस सम्बन्ध का ग्रहण नहीं कर सकता। अतः उक्त सम्बन्ध अनुपपन्न है ॥ ८० ॥

२१२ उपदेशसाहस्री *अविक्रियत्वेऽपि तादात्म्यमध्यक्षस्य भवेद्यदि । आत्माध्यक्षो ममास्तीति सम्बन्धाग्रहणे न धीः ॥८१॥ अक्रियत्वे इति—यदि यह कहें कि साक्षी चेतन (अध्यक्ष) के अक्रिय होने पर भी उसका अहङ्कार के साथ तादात्म्य का उपदेश श्रुति करती है, तो सम्बन्ध का ग्रहण न होने पर ‘मेरा आत्मा साक्षी है’—यह बुद्धि भी नहीं होगी ॥ ८१ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वोक्त रीति के अनुसार सम्बन्धग्रहण भले ही न हो, अर्थात् सम्बन्धग्रहण का कर्तृत्वरूप विकार साक्षी में न रहने पर भी अहंकार के साथ साक्षी के तादात्म्यसम्बन्ध का उपदेश तो श्रुति ने किया ही है। अतः सम्बन्ध का ग्रहण यदि नहीं मानेंगे तो 'मेरा आत्मा साक्षी है, यह बुद्धि कैसे उत्पन्न हो सकेगी ? जैसे लोकव्यवहार में ‘घटस्य शौक्ल्यम्’- घट की शुक्लता कहने पर घट और शुक्लता का सम्बन्ध यदि न जाना जाय तो दोनों के तादात्म्य का ज्ञान होना संभव नहीं, वैसे ही 'ममात्मा अध्यक्षः अस्ति'—मेरा आत्मा साक्षी है, यहाँ पर भी अपना और आत्मा दोनों के सम्बन्ध का ज्ञान हुए बिना दोनों में तादात्म्य बुद्धि कैसे हो पायेगी ॥ ८१ ॥ सम्बन्धग्रहणं शास्त्रादिति चेन्मन्यसे न हि । पूर्वोक्ताः †स्युस्त्रिधा दोषा ग्रहो वा स्यान्ममेति च ॥८२॥ सम्बन्धेति—यदि यह कहें कि उनके सम्बन्ध का ज्ञान तो शास्त्र से ही हो जायगा, तो पूर्वोक्त तीन दोष ( १-अहंकार जड़ है, २-साक्षी निर्विकार है, ३-जड़ के प्रति श्रुति का बोधकत्व सिद्ध नहीं होना ) प्राप्त होंगे। तथा उसका ग्रहण भी 'मेरा आत्मा साक्षी है' इस प्रकार से ही हो सकेगा, यानी 'मैं साक्षी हूँ' ऐसा नहीं हो सकता ॥ ८२ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि दोनों के (अहंकार और साक्षी) के सम्बन्ध का ज्ञान “एष म आत्मान्तर्हृदये अणीयान्”१, “एष म आत्मान्तर्हृदये एतद्ब्रह्म”२ इस शास्त्र से ही हो जायगा, तो पूर्वोक्त तीन दोष उपस्थित होंगे। (१) अहंकार तो जड़ है, अतः उससे सम्बन्ध का ग्रहण नहीं किया जा सकता। (२) आत्मा (साक्षी) निर्विकार है, इस कारण वह भी सम्बन्ध का ग्रहण नहीं कर सकता। (३) जड़ (अहंकार) के प्रति श्रुति का बोधन करना (बोधक होना) संभव नहीं। यदि कथंचित् सम्बन्धग्रहण की कल्पना कर भी लें तो भी तादात्म्याध्यास को न मानने के कारण ‘एष म आत्मान्तर्हृदये अणीयान्.........एतद् ब्रह्म”—यह मेरा सूक्ष्म आत्मा हृदय के अन्तर्गत है, यह ब्रह्म है, —इस श्रुति वाक्य में ‘मेरा आत्मा' ऐसा पद होने के कारण 'मैं साक्षी हूँ' यह ग्रहण नहीं हो सकता, किन्तु 'मेरा आत्मा साक्षी है' इस प्रकार ही हो सकता है। श्लोक गत 'च' से प्रतीत होता है कि ‘ममाध्यक्षः अस्ति’ यह ग्रहण भी नहीं हो सकता है, क्योंकि अहंकार तो जड़ है ॥ ८२ ॥ अदृशिर्दृशिरूपेण भाति बुद्धैर्यदा तदा । प्रत्यया अपि तस्याः स्युस्तप्तायोविस्फुलिङ्गवत् ॥८३॥ अदृशिरिति—चेतन का प्रतिबिम्ब पड़ने से जब अचेतन बुद्धि भी चेतन के समान प्रकाशयुक्त होती है, तो तप्त हुए लोहे के विस्फुलिङ्गों के समान उसकी वृत्तियाँ भी चेतनरूप हो जाती हैं ॥ ८३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार आत्मा और अनात्मा का परपक्ष में सम्बन्ध ही नहीं बन सकता, यह बताकर अब अपने पक्ष में मिथ्या तादात्म्यसम्बन्ध की उपपत्ति को बनाते हैं, क्योंकि जड़ (अचेतन) बुद्धि, चेतन का प्रतिबिम्ब पड़ने से उसके १. ( छा. उ. ३।१४।३ ) २. ( छा. उ. ३।१४।४ ) * अक्रियस्वेऽपि०—पाठान्तरम् । † स्युस्त्रयो ०—पाठान्तरम् ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २१३ (चेतन के) समान दृशिरूप से (प्रकाशयुक्त) भासित होती है। अतः अति सन्तप्त हुए लोहे के स्फुलिंगों के (चिनगारियों के) समान उसकी (बुद्धि की) वृत्तियाँ भी चेतनरूप हो जाती हैं। तात्पर्य यह है कि दाह करना अग्नि का कार्य है, किन्तु जिस समय अयःपिण्ड में अग्नि का तादात्म्य हो जाता है, तब 'अयो दहति'—लोहा जलाता है, ऐसा कहते हैं। उसी प्रकार चिदाभास से व्याप्त हुई बुद्धि की जो वृत्तियाँ हैं, उनमें जो ज्ञानकर्तृत्व है, वह चिदाभास का ही धर्म है, बुद्धि में तो अविवेक के कारण उसका आरोप मात्र किया जाता है ॥ ८३ ॥ आभासस्तदभावश्च दृशेः सीम्नो न चान्यथा । लोकस्य युक्तितः स्यातां तद्ग्रहश्च तथा सति ॥८४॥ आभास इति—समस्त वस्तुओं की अवधि 'आत्मा' ही है। उस अवधिभूत आत्मा के प्रति लोक का आभास तथा अभाव का होना युक्ति से सिद्ध हो सकता है, उसकी सिद्धि अन्य किसी प्रकार से नहीं हो सकती। ऐसी स्थिति में ही 'मैं हूँ' इस प्रकार 'आत्मा' का ग्रहण हो सकता है ॥ ८४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पक्ष में लौकिक-वैदिक व्यवहार की सिद्धि भी सहज उपपन्न हो पाती है। सबके अवधिभूत चिदात्मा (दृशि) से ही लोक का आभास तथा उसका अभाव (प्रत्यय और उसका अभाव) युक्ति से सिद्ध हो सकता है, उसे सिद्ध करने का अन्य कोई प्रकार नहीं है। तथा इस अवस्था में ही 'मैं हूँ' इस प्रकार आत्मा का ग्रहण हो सकता है। निष्कर्ष यह है कि 'आत्मा' समस्त वस्तुओं की परमावधि है, क्योंकि समस्त वस्तुओं का निषेध कर देने पर एकमात्र आत्मा ही शेष रह जाता है। और उसका निषेध भी नहीं किया जा सकता। लोक का आभास तथा उसका अभाव बुद्धिवृत्तिरूप है, किन्तु वे बुद्धिवृत्तियाँ न तो जड़ बुद्धि की ही विषय हो सकती हैं और न निर्विकार आत्मा की ही विषय हो सकती हैं। अतः उनकी सिद्धि के लिये चिदाभास को स्वीकार करना ही होगा। उसीके द्वारा आत्मा, बुद्धि- वृत्तियों का साक्षी होता है, और उसी से 'अहमस्मि'—मैं हूँ—इस प्रकार विशेषरूप से आत्मसत्ता का ग्रहण होता है ॥ ८४ ॥ नन्वेवं दृशिसंक्रान्तिरयःपिण्डेऽग्निवद्भवेत् । मुखाभासवदित्येतदादर्शं तन्निराकृतम् ॥८५॥ नन्विति—पूर्वपक्षो का कहना है कि इस प्रकार लोहे के गोले में अग्नि के समान बुद्धि में आत्मा का प्रवेश (संक्रमण) सिद्ध होता है। उस पर सिद्धान्ती का कहना है कि ऐसी बात नहीं है। शीशे में मुख के प्रतिबिम्ब के समान अर्थात् बुद्धि में आत्मा का जो आभास पड़ता है उसके समान—यह दृष्टान्त बताया है। इस दृष्टान्त के द्वारा पूर्वपक्षी के कथन का निराकरण कर दिया गया है ॥ ८५ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'प्रतप्त लोहपिण्ड में अग्नस्फुलिङ्ग के समान' इस दृष्टान्त के बताने से आत्मा के विकारी होने की शंका होती है कि बुद्धि (अहंकार) में आत्मा का प्रवेश (सङ्क्रमण) सिद्ध होता है। अर्थात् तप्त लोहपिण्ड में अग्नि का जैसे प्रवेश होता है, वैसे ही बुद्धि में दृशिसङ्क्रान्तिरूप विकार (आत्मा का संक्रमण = प्रवेशरूप विकार) होगा। तब सिद्धान्ती ने उत्तरार्ध के द्वारा उत्तर दिया कि आदर्श (दर्पण) में मुखाभास (मुखप्रतिबिम्ब) के समान बुद्धि में आत्मा का आभास (प्रतिबिम्ब) पड़ता है। अर्थात् आदर्श में प्रतिबिम्बित मुख, आदर्शस्थत्वेन रूपेण मिथ्या है, उसी प्रकार बुद्धि में प्रतिबिम्बित हुआ आत्मा का प्रतिबिम्ब, बुद्धिधर्मत्वेन रूपेण मिथ्या है, इस तरह शंका का निराकरण हो जाता है। अतः आत्मा के विकारी होने की शंका नहीं करनी चाहिये ॥ ८५ ॥ कृष्णायो लोहिताभासमित्येतद्दृष्टमुच्यते । दृष्टदृष्टान्ततुल्यत्वं न तु सर्वात्मना क्वचित् ॥८६॥ कृष्णेति—काले लोहे में लाल वर्ण का आभास होता है। इसलिये वह केवल दृष्टान्त मात्र है। दृष्टान्त और दाष्ट्रान्त की सर्वथा (पूर्ण रूप से) समानता नहीं हुआ करती ॥ ८६ ॥

२१४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी यदि सिद्धान्ती के कथनानुसार आत्मा विकारी नहीं है, तो सन्तप्त लोहपिण्ड के विस्फुलिंग का दृष्टान्त क्यों बताया गया है ? वे तो विकार के रूप में प्रसिद्ध हैं, अतः यह दृष्टान्त तो दाष्ट्रान्तिक के अनुरूप नहीं हुआ । उत्तर में यह कहा जा रहा है कि कृष्णवर्ण के लोहे का लोहितवर्ण (लाल रंग) आभास मात्र है, अतः यह केवल दृष्टान्तमात्र है। जड़ बुद्धि में भी चैतन्य का आभास मात्र है। दृष्टान्त और दाष्ट्रान्त की सर्वथा (पूर्णरूप में) समानता कभी नहीं हुआ करती। अन्यथा अप्रकाशरूप मुख के लिये चन्द्र का दृष्टान्त ही नहीं दिया जायगा, किन्तु दिया जाता है, अतः आंशिक समानता ही विवक्षित होती है ॥ ८६ '। तथैव चेतनाभासं चित्तं चैतन्यवद्द्भवेत् । मुखाभासो यथाऽऽदर्शे आभासश्चोदितो मृषा ॥८७॥ तथैवेति—उसी प्रकार चिदाभासविशिष्ट चित्त चैतन्यवत् प्रतीत होता है तथा जिस प्रकार शीशे में मुख का प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसी प्रकार उस चिदाभास को मिथ्या (असत्य) ही बताया गया है ॥ ८७ ॥ हृदयस्पर्शिनी दृष्टान्त में विवक्षित अंश बताकर दाष्ट्रान्तिक में भी उस प्रकार के अंश का प्रदर्शन करते हैं। जिसमें चेतना का आभासमात्र है, ऐसा जो चेतनाभास चित्त (बुद्धि) है, वह चैतन्य की तरह अर्थात् चेतन के तुल्य हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि चिदाभासविशिष्ट चित्त चैतन्यवत् प्रतीत होने लगता है। जिस प्रकार दर्पण में मुखाभास विकृत है, उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिये। उपाधिस्थ के रूप में आभास दिखाई देता है, अतः वह मृषा ( मिथ्या ) है। चिदाभास को मिथ्या बता ही चुके हैं ॥ ८७ ॥ चित्तं चेतनमित्येतच्छास्त्रयुक्तिविवर्जितम् । देहस्यापि प्रसङ्गः स्याच्चक्षुरादेस्तथैव च ॥८८॥ चित्तमिति—'चित्त' को चेतन बताना शास्त्र और युक्ति के विरुद्ध है। चित्त को चेतन कहने पर तो देह और चक्षुरादि इन्द्रियों को भी चेतन कहा जा सकेगा, किन्तु वह अभीष्ट नहीं है ॥ ८८ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि चिदाभास की व्याप्ति से चित्त को चेतन के तुल्य क्यों माना जाता है ? उसे (चित्त को) ही स्वतः चेतन मानने में क्या आपत्ति है। इसका उत्तर यह कि है उसे स्वतः (स्वयं) चेतन मानने में न कोई प्रमाण है, और न कोई न्याय ही है। अर्थात् चित्त को ही चेतन कहना शास्त्र और युक्ति के विरुद्ध है। क्योंकि चित्त तो अन्य- दृश्य होने से उत्पत्ति-विनाशशील है। चेतनता को चित्त का ही स्वभाव माना जाय तो चक्षुरादि इन्द्रियों को भी चेतन कहना पड़ेगा। इस प्रकार अतिप्रसंग होगा, जो दुष्परिहर होगा ॥ ८८ ॥ तदप्यस्त्विति चेत्तन्न लोकायतिकसङ्गतेः । न च धीर्दृशिरस्मीति यद्याभासो न चेतसि ॥८९॥ तदिति—देहेन्द्रियादि को चेतन समझना तो अनुचित होगा। अन्यथा चार्वाक मत का अंगीकार किया समझा जायगा। यदि चित्त में चिदाभास का अस्तित्व स्वीकार न किया जाय तो 'मैं चेतन हूँ'—यह बुद्धि (प्रतीति) न हो सकेगी ॥ ८९ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि इष्टापत्ति कहे तो वह उचित न होगी। क्योंकि जड़ चित्त को ही चेतन कहने पर चार्वाक के अवैदिक सिद्धान्त को मान लिया-सा होगा। चित्त में चिदाभास को यदि न माने तो किसी द्वार (माध्यम) के न होने से 'अहं

तत्त्वमसिप्रकरणम् २१५ ब्रह्मास्मि' - मैं चेतन (ब्रह्म) हूँ, यह आगन्तुकवाक्यजन्य ऐक्यज्ञान नहीं हो सकेगा। अर्थात् चित्त में चिदाभास की सत्ता यदि न हो तो 'मैं दृशि (आत्मा) ब्रह्म हूँ', यह बुद्धि (ज्ञान) नहीं होगी। केवल चित्त तो जड़ है और चिन्मात्र (आत्मा) कूटस्थ है ॥ ८९ ॥ सदस्मीति धियोऽभावे व्यर्थं स्यात्तत्त्वमस्यपि । युष्मदस्मद्विभागज्ञे स्यादर्थवदिदं वचः ॥९०॥ सदिति—'मैं सत्स्वरूप हूँ' इस प्रकार की बुद्धि के अभाव में 'तत्त्वमसि' यह महावाक्य भी व्यर्थ हो जायगा । यह महावाक्य तो युष्मत्पदवाच्य 'जड़ वस्तु' और अस्मत्पदलक्ष्य 'आत्मा' का विभाग (विवेक, भेद) समझने वाले पुरुष के लिये ही सार्थक हो सकता है ॥ ९० ॥ हृदयस्पर्शिनी 'अहं ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान यदि न हो तो क्या हानि है ? इस प्रश्न के होनेपर यह उत्तर दिया है कि 'अहं ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान नहीं हुआ तो ऐक्यग्राहक 'तत्त्वमसि' यह महावाक्य ही व्यर्थ (अप्रमाण) हो जायगा। यदि कहें कि वह वाक्य व्यर्थ हो जाय तो क्या क्षति है ? क्योंकि उस वाक्य के सभी श्रोताओं को तत्काल 'ब्रह्मास्मि' इस प्रकार की बुद्धि उत्पन्न होती दिखाई भी तो नहीं देती। इसका उत्तर यह है कि 'अधिकारिणः प्रमितिजनको वेदः' अधिकारियों को ज्ञान करानेवाला 'वेद' होता है' इस न्याय से सम्यक्पदार्थविज्ञान वाले का ही वाक्यार्थ बोध (वाक्यार्थ ज्ञान) में अधिकार होता है। अतः अनात्म पदवाच्य (युष्मत्पदवाच्य) जड़ वस्तु और आत्मा के भेद का ज्ञान रखने वाले पुरुष के प्रति ही यह वाक्य अर्थवत् (सार्थक) होता है, सभी के लिये (अनधिकारियों के लिये) यह वाक्य झटिति बोधक नहीं है ॥ ९० ॥ ममेदंप्रत्ययौ ज्ञेयौ युष्मद्येव न संशयः । अहमित्यस्मदोष्ठः स्यादयमस्मीति चोभयोः ॥९१॥ ममेति—जिन वस्तुओं के विषय में 'मम' (मेरा) और 'इदम्' (यह) ज्ञान होता है, उन्हें युष्मत्पदवाच्य ही समझना चाहिये, इसमें सन्देह नहीं है। तथा 'अहम्' (मैं) यह ज्ञान, अस्मत्पदवाच्य 'व्यावहारिक आत्मा' में होता है। उसी तरह 'यह' (देहादि) में हूँ'-यह ज्ञान, आत्मा और अनात्मा दोनों ही में हो सकता है ॥ ९१ ॥ हृदयस्पर्शिनी उसी युष्मद्-अस्मत् के विवेक को बताते हैं। जिन पुत्रादि अनात्म पदार्थों में 'इदम्' 'मम' (यह-मेरा) यह ज्ञान (प्रत्यय) होता है, निःसन्देह उन्हें 'युष्मत्' पदवाच्य ही समझना चाहिये । पुत्रादि बाह्य पदार्थों का देहाध्यास- परंपरा से ही अस्मदर्थ में प्रवेश होता है। अतः बाह्यार्थ सम्बन्ध भी अनात्मधर्म ही है, यह उचित ही कहा गया है। 'अहम्' (मैं) यह ज्ञान, अस्मत्पदवाच्य व्यावहारिक आत्मा में (अहंकार में) माना जाता है। तथा 'यह (देहादि) मैं हूँ' ऐसा ज्ञान, आत्मा और अनात्मा दोनों में ही हो सकता है ॥ ९१ ॥ अन्योन्यापेक्षया तेषां प्रधानगुणतेष्यते । विशेषणविशेष्यत्वं तथा ग्राह्यं हि युक्तितः ॥९२॥ अन्योन्येति- इन आत्मविषयक और अनात्मविषयक ज्ञानों (प्रत्ययों) में एक-दूसरे की अपेक्षा से प्रधानता और अप्रधानता मानी जाती है। उसी प्रकार इनके विशेषण-विशेष्य भाव को भी युक्तिसहित समझना चाहिये ॥ ९२ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मानात्मविषयक प्रत्ययों के संकीर्ण और असंकीर्णरूप विषयों को बताकर उक्त विवेक के लिये गुण-प्रधान भाव से विशेषण-विशेष्यभाव को स्पष्ट करते हैं । इन आत्मविषयक और अनात्मविषयक प्रत्ययों

२१६ उपदेशसाहस्री में एक-दूसरे की अपेक्षा से प्रधानता और अप्रधानता मानी जाती है। इसी प्रकार युक्तिपूर्वक इनके विशेष्य- विशेषणभाव को भी समझना चाहिये ॥ ९२ ॥ ममेदं द्वयमप्येतन्मध्यमस्य विशेषणम् । धनी गोमान्यथा तद्वद्देहोऽहंकर्तुरेव च ॥९३॥ ममेति—'मम' और 'इदम्'—ये दोनों पूर्व श्लोक (९१) के मध्य में निर्दिष्ट 'अहमर्थ' के विशेषण हैं। जिस प्रकार 'धनी' और 'गोमान्' इनमें 'धन' और 'गो' दोनों 'पुरुष' के विशेषण हैं, उसी प्रकार 'शरीर' भी 'अहंकार' का विशेषण है ॥ ९३ ॥ हृदयस्पर्शिनो उक्त विशेष्य-विशेषणभाव का विवेचन करते हैं—'मम' और 'इदम्' ये दोनों पूर्व श्लोक (९१) के मध्य में निर्दिष्ट अहमर्थ के विशेषण हैं। जिस प्रकार 'धनी' तथा 'गायवाला' इनमें 'धन' और 'गो' पुरुष के विशेषण हैं, उसी प्रकार शरीर, अहंकार का विशेषण है। श्लोक ९२ और ९३ में यह आशय व्यक्त किया गया है कि जिन लोगों को आत्मा और अनात्मा (देहादि) के भेद का ज्ञान रहता है, वे लोग बाह्य पदार्थों की अपेक्षा उत्तरोत्तर आभ्यन्तर पदार्थों को प्रधान मानते हैं। अतः जिस प्रकार धन के कारण मनुष्य को धनी तथा गौ के कारण गायवाला कहते हैं, और ये शब्द उसके विशेषण होते हैं, उसी प्रकार 'मम' 'इदम्' आदि समस्त प्रत्यय 'आत्मा' के विशेषण हैं। यहाँ प्रधान को विशेष्य और अप्रधान को विशेषण समझना चाहिए। 'आत्मा' सभी की अपेक्षा प्रधान और आन्तरतम है। इसलिए वही सबका विशेष्य है ॥ ९३ ॥ बुद्धयारूढं सदा सर्वं साहंकर्त्रा च साक्षिणः । तस्मात्सर्वोवभासो ज्ञः किञ्चिदप्यस्पृशन्सदा ॥९४॥ बुद्धचेति—बुद्धिवृत्ति के विषयभूत सभी पदार्थ और उसी प्रकार 'अहंकार' के सहित सूक्ष्म विषय, ये सभी 'साक्षी आत्मा' के विशेषण हैं। अतः 'आत्मा' उनमें से किसी का भी स्पर्श नहीं करता, तथापि सबको प्रकाशित करता रहता हैं। क्योंकि वह (आत्मा) ज्ञानस्वरूप है ॥ ९४ ॥ हृदयस्पर्शिनी समस्त पदार्थ बुद्धिवृत्ति के विषय हैं। वे अहंकार के सहित सबके साक्षी, अतिसूक्ष्म आत्मा के विशेषण हैं। अतः आत्मा किसी को भी स्पर्श न करता हुआ सर्वदा सबको प्रकाशित करता हुआ ज्ञानस्वरूप है ॥ ९४ ॥ प्रतिलोममिदं सर्वं यथोक्तं लोकबुद्धितः । अविवेकधियामस्ति नास्ति सर्वं विवेकिनाम् ॥९५॥ प्रतिलोममिति—साधारण लोगों की बुद्धि के अनुसार पूर्व बताया हुआ सम्पूर्ण विशेषण-विशेष्य भाव विपरीत (प्रतिलोम) है। वास्तव में वह विशेषण-विशेष्य भाव का क्रम विवेकरहित पुरुषों की दृष्टि से होता है, किन्तु विवेकी पुरुषों की दृष्टि में वह सब नहीं है ॥ ९५ ॥ हृदयस्पर्शिनी यह उक्त मार्ग विवेकी लोगों का है। किन्तु अविवेकियों का उसके विपरीत है। अर्थात् उक्त विशेष्य- विशेषणभाव लौकिक व्यवहार में विपरीत दिखाई देता है। वास्तव में यह विशेष्य-विशेषणादि क्रम विवेकहीन पुरुषों की दृष्टि से है। निष्कर्ष यह है कि यह विशेष्य-विशेषणभाव उन्हीं की दृष्टि से है, जो आत्मा और अनात्मा दोनों की स्वतन्त्र सत्ता मानते हैं, और आत्मा की अपेक्षा अनात्मा को प्रधान समझते हैं। किन्तु तत्त्वज्ञों की दृष्टि में तो आत्मा से भिन्न किसी भी वस्तु की सत्ता ही नहीं है। इस कारण यह विशेष्य-विशेषणभाव भी नहीं है। संसारी पुरुष तो

तत्त्वमसिप्रकरणम् २१७ शरीरादि अनात्मा को ही प्रधान समझते हैं, इसलिए उनकी दृष्टि में आत्मा ही अनात्मा का विशेषण है। अतः अध्या- रोपापवादन्याय से यथाप्रतीति सत्ता को लेकर विवेकियों की आत्मविषयक बुद्धि कराने के लिये विशेषण-विशेष्यादि प्रबन्ध कल्पना की गई है ।। ९५ ।। अन्वयव्यतिरेकौ हि पदार्थस्य पदस्य च । स्यादेतदहमित्यत्र युक्तिरेवावधारणे ।।९६।। अन्वयेति—आत्मानात्मरूप पदार्थ तथा पद के अन्वय-व्यतिरेक, ये 'अहम्' इस वस्तु की अवधारणा (निश्चय) करने में युक्ति मात्र हैं ।। ९६ ।। हृदयस्पर्शिनो पद-पदार्थ के अन्वय-व्यतिरेक से ही सर्वसंसारविनिर्मुक्त आत्मा का ज्ञान हो ही जायगा, तब वाक्य की क्या आवश्यकता ? पदार्थ का अन्वय-व्यतिरेक इस प्रकार है—आत्मपदार्थ सबका द्रष्टा (साक्षी) है, वह कभी भी दृश्य अथवा साक्ष्य नहीं होता, क्योंकि वह अलुप्तप्रकाशसन्मात्र होने से स्वयंप्रकाश है। अतः अन्याश्रय न होने से कभी भी और किसी का भी विशेषण होकर वह नहीं रहता। तथा अहंकार से लेकर उनके अपने विषयों तक सब साक्ष्य (साक्षीभास्य) हैं, उनका प्रकाश अन्याधीन होने से अन्याश्रय है अर्थात् अन्याश्रित है। इसलिए अप्रधान होने के कारण वह अहंकारादि विषयान्तपदार्थ सर्वदा आत्मा का विशेषण होकर ही रहता है। तस्मात् अनागमापायी वह दृगात्मरूप (आत्मा) शुक्ति के समान सत्य है। और उससे विपरीत जो भी अतिरिक्त पदार्थ है, वह सभी रजत के समान असत्य हैं और अनृत, जड़, परिच्छिन्न, पराधीन, पराक् अर्थ से व्यावृत्त (भिन्न) सत्य, ज्ञान, अनन्त, प्रत्यक्, आनन्दरूप 'आत्मा' है, इस प्रकार से पराक् और प्रत्यक् का विवेचन करना ही पदार्थ का अन्वय-व्यतिरेक कहा जाता है। 'तथा' पद का अन्वय-व्यतिरेक इस प्रकार है—आत्मा, चैतन्य, प्रज्ञान, ब्रह्म, सत् आदि पद, कर्ता आदि उपपदों से रहित रहते हैं, तब वे शुद्ध आत्मा के बोधक होते हैं। इसीलिए किसी के विशेषण न होने से वे तद्विशिष्ट किसी अन्य वस्तु का ज्ञान (बोध) नहीं करा सकते। क्योंकि विशिष्ट का बोधन कराने की सामर्थ्य उन शब्दों में नहीं है। किन्तु कर्ता, भोक्ता, ज्ञाता, द्रष्टा, श्रोता, वक्ता, गन्ता, कृश, स्थूल-ये शब्द (पद) देहेन्द्रियादिविशिष्ट आत्मा के बोधक हुआ करते हैं, शुद्ध आत्मा के बोधक नहीं होते हैं। क्योंकि इन शब्दों का प्रयोग, अन्य के अधीन क्रिया आदि की उपरागदशा में ही हुआ करता है। इस प्रकार के विवेचन को ही पद का अन्वय-व्यतिरेक कहा करते हैं। इस रीति से पद और उसके अर्थों के अन्वय-व्यतिरेक को समझ लेने से ही आत्मज्ञान सहज हो सकता है, तब वाक्य की क्या आवश्यकता ? इस प्रकार पद या पदार्थ का जो अन्वय-व्यतिरेक है, वह तो अस्मदर्थ विषय के अवधारण करने में युक्ति- रूप ही है, अर्थात् विवेकावधारण का उपायमात्र है; वाक्यार्थ की एकता में, पदार्थ की एकता में उसका व्यापार नहीं है। तस्मात् इतने विवेक से आत्मा का देहादि से वैलक्षण्य का अवधारण हो जाने पर भी 'मैं कौन हूँ' यह जिज्ञासा बनी ही रहती है। 'तत्त्वमसि' यह वाक्य जिज्ञासित स्वरूपविशेष का समर्पक है, अतः उसकी अपेक्षा तो अवश्य ही करनी होगी ।। ९६ ।। नाद्राक्षमहमित्यस्मिन्सुषुप्तेऽन्यन्मनागपि । न वारयति दृष्टिं स्वां प्रत्ययं तु निषेधति ॥९७॥ नाद्राक्षमिति—इस सुषुप्ति की स्थिति में 'अन्यत् मनागपि अहम् नाद्राक्षम्'—मैंने कुछ भी अन्य वस्तु नहीं देखी—यह जो अनुभव है, वह अपनी दृष्टि का निषेध नहीं कर रहा है, वह केवल प्रत्यय का ही निषेध करता है, अर्थात् प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयात्मक त्रिपुटी का ही निषेध करता है ।। ९७ ।। हृदयस्पर्शिनो तीन अवस्थाएँ परस्पर व्यभिचारी हैं, किन्तु चैतन्यात्मा कदापि व्यभिचारी नहीं है, इस प्रकार प्रकारान्तर से आत्मानात्म-विवेक को बताते हैं। इस सुषुप्त में (इस आत्मा में) या इस सुषुप्ति अवस्था में 'आत्मस्वरूप के २८

२१८ उपदेशसाहस्री अतिरिक्त किंचिन्मात्र भी मैंने नहीं देखा' ऐसा परामर्श करनेवाला मनुष्य, अपनी दृष्टि (चैतन्य) का निषेध नहीं करता। किन्तु केवल प्रत्यय का निषेध करता है। 'प्रतीयते इति प्रत्ययः' इस व्युत्पत्ति से प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय रूप सभी विशेष का ग्रहण किया जाता है। तस्मात् परस्परव्यभिचारिता होने से दृष्ट, नष्ट स्वभाववाली मिथ्याभूत अवस्थाओं से भिन्न अव्यभिचारी, चिद्रूप, साक्षी, सत्य आत्मा है, यह विवेक सिद्ध होता है॥ ९७॥ स्वयंज्योतिर्न हि द्रष्टुरित्येवं संविदोऽस्तिताम् । कौटस्थ्यं च तथा तस्याः प्रत्ययस्य तु लुप्तताम् ॥ स्वयमेवाब्रवीच्छास्त्रं प्रत्ययावगती पृथक् ॥९८॥ स्वयमिति—इस अवस्था में 'यह पुरुष स्वयंप्रकाश है', उसी तरह 'द्रष्टा की दृष्टि का लोप नहीं होता'—ये श्रुति वचन स्वयं ही उस अवस्था में चैतन्य के अस्तित्व और कौटस्थ्य (कूटस्थता) और उसके प्रत्यय के लोप को बताते हैं। इसलिये 'प्रत्यय' और 'ज्ञान' परस्पर भिन्न हैं॥ ९८॥ हृदयस्पर्शिनी ऊपर निर्दिष्ट किये गये अन्वय-व्यतिरेक शास्त्रसम्मत हैं, केवल अपनी बुद्धि का कल्पनाविलास मात्र नहीं है, यह विश्वास दिलाने के लिये शास्त्र बताते हैं। "अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः"१ "नहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते"२ ये शास्त्रवाक्य बता रहे हैं कि इस अवस्था में यह पुरुष स्वयंप्रकाश होता है तथा द्रष्टा की दृष्टि का लोप नहीं होता। इस प्रकार चेतना के सद्भाव (अस्तिता) को और उसकी कूटस्थता (निर्विकारता) को श्रुति ने बताया है। तथा प्रत्यय (प्रमाण-प्रमाता-प्रमेय) की लुप्तता (लोप) अर्थात् असत्ता को "न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तम्"३—इत्यादि शास्त्र ने स्वयं ही बताया है। अतः प्रत्यय और अवगति (ज्ञान) पृथक् (असंकीर्ण) हैं, शास्त्र ने ही इनका विवेचन किया है॥ ९८॥ एवं विज्ञातवाक्यार्थे* श्रुतिलोकप्रसिद्धितः । श्रुतिस्तत्त्वमसीत्याह श्रोतुर्मोहापनुत्तये ॥९९॥ एवमिति—इस प्रकार श्रुतिवचन और लोकप्रसिद्धि अर्थात् 'अन्वय-व्यतिरेक' के द्वारा वाक्यार्थ का जिसे ज्ञान हो गया हो, उसी पुरुष के मोह (अज्ञान) की निवृत्ति के लिये श्रुति 'तत्त्वमसि' का उपदेश करती है॥ ९९॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार अवान्तरवाक्यकृत युष्मदस्मद् विवेक को उपपत्ति से बताकर, पदार्थतत्व का ज्ञान जिसे हो चुका है, ऐसे पुरुष में ही यह महावाक्य सफल विज्ञान को उत्पन्न करता है। इस प्रकार श्रुति और लोक की प्रसिद्धि से अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा जिसे अवान्तर वाक्यार्थ का ज्ञान हो गया है, उस पुरुष के मोह की निवृत्ति के लिये (सकार्य अविद्या की निवृत्ति के लिये) महावाक्यात्मिका 'तत्त्वमसि' श्रुति 'तू ब्रह्म है' ऐसा उपदेश करती है॥ ९९॥ ब्रह्मा दाशरथेर्यद्वदुक्त्यैवापानुदत्तमः । तस्य विष्णुत्वसंबोधे न यत्नान्तरमूचिवान् ॥१००॥ ब्रह्मेति—जिस तरह ब्रह्मदेव ने 'हे राम ! तुम विष्णु हो'—इस वाक्य को कह कर ही दशरथकुमार राम का 'अज्ञान' दूर कर दिया था। ब्रह्मा जी को उन्हें 'विष्णु' होने का बोध कराने में किसी अन्य प्रयत्न का आश्रय नहीं करना पड़ा॥ १००॥ १. (वृ. उ. ४।३।९, १४) २. (वृ. उ. ४।३।२३) ३. (वृ. उ. ४।३।२३-३०)

  • वाक्यार्थे—इति नै. सि. ४।२४ पाठः ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २१९ हृदयस्पर्शिनी वाक्यश्रवणमात्र से मोह के अपोहन में पुराणसिद्ध दृष्टान्त को बता रहे हैं। दाशरथी राम ने देवकार्य संपादन करने के लिये मनुष्यावतार के अभिनय द्वारा संकल्प पूर्वक अपने माहात्म्य का आच्छादन जो किया था, उसे ही यहाँ पर अज्ञान (तमस्) शब्द से कहा गया है। क्योंकि परमेश्वर को संमोह होना संभव नहीं है। संक्षेपशारीरक में कहा गया है- “संकल्पपूर्वकमभूद् रघुनन्दनस्य नाहं विजान इति कांचन कालमेतत् । ब्रह्मोपदेशमुपलभ्य निमित्तमात्रं तच्चोत्ससर्ज स कृते सति देवकार्ये”॥ ब्रह्मदेव ने 'हे राम ! तुम विष्णु हो, केवल दशरथपुत्र नहीं हो।' इस वाक्य के द्वारा ही दशरथकुमार राम का अज्ञान निवृत्त कर दिया था। ब्रह्मा ने उनके विष्णुत्व का बोध कराने में उक्त वाक्यार्थ का उपदेश करने के अतिरिक्त कोई अन्य प्रयत्न नहीं किया था ॥ १०० ॥ अहंशब्दस्य निष्ठा या ज्योतिषि प्रत्यगात्मनि । सैवोक्ता सदसीत्येवं फलं तत्र विमुक्तता ॥१०१॥ अह्मिति—उसी प्रकार 'अहम्' शब्द की जो निष्ठा है, उसी का 'तू सत्स्वरूप है'—इस वाक्य के द्वारा उपदेश किया गया है और उसका फल 'मोक्ष' है ॥ १०१ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसी प्रकार पराक् (बाह्य) अर्थों से व्यावृत्त निरुपाधिक ज्योतिःस्वरूप, साक्षित्वप्रकाशस्वभाव प्रत्यगात्मा में 'अहं' शब्द की जो निष्ठा है, अर्थात् 'अहं' शब्द से जो स्वयंप्रकाश सर्वसाक्षी परब्रह्म लक्षित होता है, उसी निष्ठा का 'त्वं तदसि' 'अहं तत् ब्रह्मास्मि' इस वाक्य के द्वारा उपदेश किया गया है। उससे विमुक्तता अर्थात् मोह का अपोह- रूप फल प्राप्त होता है। अथवा इसी को एक अन्य प्रकार से भी बताया जा सकता है। तथाहि—दाशरथी राम को विष्णुत्व के उपदेशमात्र से 'विष्णुरहमस्मि'-मैं विष्णु हूँ—इस प्रकार का बोध तत्काल हो सकता है, क्योंकि वह दाशरथी राम महान् महिमा से सम्पन्न है। किन्तु आज के जो लोग हैं; जो कर्ता, भोक्ता आदि प्रत्यक्ष की तरह अनुभव में आनेवाले परन्तु वस्तुतः मिथ्या प्रत्यय से ग्रसित हैं; उनको ब्रह्मोपदेशमात्र से 'अहं ब्रह्मास्मि'—मैं ब्रह्म हूँ, इस प्रकार का निर्विचिकित्स ज्ञान होना कैसे संभव हो सकता है? यह शंका हो सकती है। किन्तु त्वं-पदार्थ का शोधन जिसने कर लिया है, ऐसे पुरुष को ही अर्थात् जो अपने को कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि का साक्षीमात्र समझता है, जिसे अहं आदि शब्द लक्षणा के द्वारा बताते हैं, उसी के लिये यह ब्रह्मात्मोपदेश है, अन्य के लिये नहीं, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है ॥ १०१ ॥ श्रुतमात्रेण चेन्न स्यात्कार्यं तत्र भवेद् ध्रुवम् । व्यवहारात्पुरापीष्टः सद्भावः स्वयमात्मनः ॥१०२॥ श्रुतमिति—वाक्य के सुनने मात्र से यदि ज्ञान की उत्पत्ति न हो तो ज्ञानोत्पत्त्यर्थ उसे कार्य की आवश्यकता पड़ सकती है, किन्तु प्रत्यगात्मा की सत्ता तो वाक्योपदेशात्मक व्यवहार के पूर्व भी निश्चित रूप से है, यह सभी जानते हैं ॥ १०२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पद-पदार्थ का ज्ञान जिसे हो गया है, उसे वाक्य से ही 'अहं ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान हो जाता है, किन्तु उस ज्ञान से यदि समूल संसार की निवृत्ति न मानी जाय तो वेदप्रामाण्य की सिद्धि के लिये उसे कार्यपरक ही मान लेना चाहिए। किन्तु यह कथन विद्वानों के अनुभव के विरुद्ध होने से उचित नहीं है, अथवा इस तरह से भी कह सकते हैं कि पदार्थतत्त्व का ज्ञान प्राप्त किये हुए पुरुष को वाक्य से ही समूल संसारनिवृत्तिरूप फलात्मक ज्ञान हो ही जाता है, तब उस स्थिति में प्रामाण्यसिद्ध्यर्थ श्रुति को कार्यपरक मानने का आग्रह करना व्यर्थ है। उक्त न्याय से

वाक्य के श्रवणमात्र से विज्ञानरूप उक्त फल न हो तो वहाँ कार्य की कल्पना अवश्य करनी होगी। अन्यथा अर्थवादादि- वाक्य के तुल्य स्वार्थ में उसका प्रामाण्य उपपन्न न हो सकेगा। यहाँ तो तत्क्षण ही फल का अनुभव होने से वैसी कल्पना की कोई आवश्यकता ही नहीं है। किञ्च यदि वाक्यश्रवण को सिद्ध ब्रह्मात्मज्ञानरूप तत्त्वज्ञान की उत्पत्ति में प्रमाण न माना जाय तो उसका अप्रामाण्य चार प्रकार से होगा—(१) विपर्यासलक्षण, (२) निष्फलत्वलक्षण, (३) संशय- लक्षण, (४) अनुपपत्तिलक्षण। उक्त चार प्रकारों में से प्रथम प्रकार के विपर्यासलक्षण अप्रामाण्य का खण्डन इस पद्य के उत्तरार्ध से किया गया है। अभिप्राय यह है कि 'तत्त्वमसि' इस वाक्योपदेश से पूर्व आत्मा की सत्ता है ही, क्योंकि कोई बाधक नहीं है। अतः 'तत्त्वमसि' इस वाक्योपदेश के द्वारा उसके यथावस्थित अज्ञान की निवृत्ति हो जाने पर आत्मस्वरूप का ही जो ज्ञान होता है, वह शुक्ति-रजत के समान अप्रामाणिक नहीं हो सकता। क्योंकि 'अहं ब्रह्मास्मि' इस अनुभववाक्य से यथावस्थित आत्मस्वरूप का ही अनुभव होता रहता है ॥ १०२ ॥

अशनायादिनिर्मुक्त्यै तत्काला जायते प्रमा। तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थे त्रिषु कालेष्वसंशयः ॥१०३॥

अशनायेति—किञ्च आप्तवाक्य के श्रवण से जो 'तत्त्वज्ञान' होता है, वह भी क्षुधा-पिपासामय संसार की निवृत्ति का कारण होता है। उसी तरह 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य के अर्थ में कभी किसी काल में भी किसी को संदेह नहीं होता है ॥ १०३ ॥

हृदयस्पर्शिनी

अप्रामाण्य का द्वितीय प्रकार भी ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभवविरोध होता है। आप्तवाक्यश्रवण काल में ही होनेवाला तत्त्वज्ञान क्षुत्पिपासादिरूप संसार की निवृत्ति कराने में हेतु होता है। अतः वह निष्फल नहीं है। एवञ्च वाक्योपदेश के निष्फलत्वरूप अप्रामाण्य का भी खण्डन हो गया। क्योंकि विद्वानों का यह प्रत्यक्ष अनुभव है। इसी प्रकार तृतीय प्रकार के अप्रामाण्य का भी अनुभवविरोध होने से खण्डन करते हैं। क्योंकि 'तत्त्वमसि' आदि वाक्य के अर्थ में किसी प्रकार का और कभी भी (तीनों कालों में) संशय नहीं है। अतः इसका संशयलक्षण अप्रामाण्य भी नहीं कहा जा सकता ॥ १०३ ॥

प्रतिबन्धविहीनत्वात्स्वयं चानुभवात्मनः। जायेतैव प्रमा तत्र स्वात्मन्येव न संशयः ॥१०४॥

प्रतिबन्धेति—किञ्च पदार्थों के अज्ञान रूप प्रतिबन्ध के न रहने से तथा स्वयं ज्ञान रूप होने के कारण आत्मा में तत्त्वज्ञान की उत्पत्ति भी हो जाती है, इस विषय में भी संशय नहीं है ॥ १०४ ॥

हृदयस्पर्शिनी

पदार्थ का अज्ञान ही, वाक्यार्थज्ञान के होने में प्रतिबन्धक हुआ करता है। पदार्थ का अज्ञान न रहने पर अर्थात् पद-पदार्थ का ज्ञान प्राप्त किये हुए पुरुष को वाक्यश्रवणकाल में ही आत्मविषयक प्रमाज्ञान (यथार्थ ज्ञान) हो ही जाता है, इसमें किञ्चिन्मात्र भी संशय नहीं है। अतः वाक्यार्थोपदेशमात्र से तत्त्वज्ञान की उत्पत्ति होगी या नहीं, ऐसा संदेह नहीं करना चाहिये। उस कारण 'हुँ फट्' आदि शब्द की तरह अनुपत्तिलक्षण अप्रामाण्य भी नहीं कहा जा सकता ॥ १०४॥

किं सदेवाह्मस्मीति किंवाऽन्यत्प्र तिपद्यते। सदेव चेदहंशब्दः सता मुख्यार्थ इष्यताम् ॥१०५॥

किमिति—'तत्त्वमसि' वाक्य के अर्थ को सुनकर 'मैं सत् ही हूँ'यह ज्ञान हो होता है, अथवा अन्य कोई ज्ञान होता है ? यदि 'अहम्' शब्द 'सत्' से भिन्न नहीं है, तो 'सत्' के साथ ही उसका मुख्यार्थ जानना चाहिये ॥ १०५ ॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् २२१ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार प्रमाणस्वरूपनिरूपण के द्वारा 'अहं ब्रह्मास्मि' इस ज्ञान का उपपादन करके अब प्रतिपत्तव्य ( ज्ञातव्य ) अर्थ के स्वरूपनिरूपण के द्वारा भी उसे बताना प्रारंभ कर रहे हैं। 'तत्त्वमसि' वाक्य के अर्थ का श्रवण करने के बाद 'अहमस्मि'-मैं सत् ही हूँ, ऐसा ज्ञान होता है, या अन्य कोई और ज्ञान होता है ? यदि 'अहम्' शब्द सत् ही है, तो सत् के साथ ही उसका मुख्य अर्थ समझना चाहिये। अर्थात् 'सत्' शब्द और 'अहम्' शब्द दोनों का एक ही अर्थ में पर्यवसान होने से 'एकात्मता' ही वाक्यार्थ है। 'संसर्ग' वाक्यार्थ नहीं है। इस प्रकार अपरोक्ष ज्ञान की सिद्धि हो जाती है ॥ १०५ ॥ अन्यच्चेत् *सदहंग्राहप्रतिपत्तिर्मृषैव सा। तस्मान्मुख्यग्रहे नास्ति वारणाऽवगतेरिह ॥१०६॥ अन्यदिति-यदि 'सत्' कोई अन्य वस्तु है, अर्थात् आत्मा से भिन्न वस्तु है, तो उसमें जो यह 'अहम्' इत्या- कारक ज्ञान होता है, उसे मिथ्या ही कहना होगा। इसलिये इस वाक्य का मुख्यर्थि ग्रहण करने में यथार्थ ज्ञान का निषेध नहीं होता है। तात्पर्य यह है कि 'मैं सत् हूँ' इस वाक्य का मुख्यार्थ ग्रहण करने पर इस वाक्य की सार्थकता हो पाती है, अन्यथा नहीं ॥ १०६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि 'सत्', वस्तु, आत्मा से भिन्न कोई और है, तो उसमें यह 'अहंग्रहरूप जो प्रतिपत्ति' अर्थात् अहंग्ज्ञान है, वह संपदादि ज्ञान के समान मृषा (मिथ्या) ही होगा, तब वाक्य को अप्रमाण ही कहना पड़ेगा। प्रमाण-प्रमेय के स्वभाव की पर्यालोचना करने पर प्रतीत होता है कि अपरोक्ष फलवत् आत्मतत्त्वज्ञान वाक्य से ही उत्पन्न होता है। अतः इस वाक्य का मुख्य अर्थ ग्रहण करने में यथार्थ ज्ञान का निषेध नहीं होता। अर्थात् 'मैं सत् हूँ' इस वाक्य का मुख्यार्थ ग्रहण करने पर ही उसकी सार्थकता है, अर्थात् यथार्थ अनुभव का निवारण नहीं होता। और वही संसार- दुःख से पीड़ित हुए मुमुक्षु के लिये अभीष्ट भी है ॥ १०६ ॥ प्रत्ययी प्रत्ययश्चैव यदाभासौ तदर्थता। तयोरचितिमत्त्वाच्च चैतन्ये कल्प्यते फलम् ॥१०७॥ प्रत्ययीति- 'प्रत्ययी' (अन्तःकरण) और 'प्रत्यय' (उसकी वृत्तियाँ) जिनके आभास हैं, उसी के ये शेष- भूत भी हैं। इन दोनों के जड़ (अचेतन) होने के कारण इस वाक्य का फल (तात्पर्य) चैतन्य आत्मा में ही समझा जाता है ॥ १०७ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि यह कहें कि 'आत्मा' कूटस्थ होने के कारण ज्ञाता नहीं हो सकता, तब फलसम्बन्ध भी उपपन्न नहीं होगा। इस प्रकार आत्मज्ञानरूप यथार्थ ज्ञान का निवारण हो जायगा। किन्तु यह शंका उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्ययी अर्थात् परिणामी अन्तःकरण और प्रत्यय अर्थात् उसकी वृत्तियाँ (परिणाम), जिस चिदात्मा के आभास हैं, उसी के ये शेषभूत भी हैं। इन दोनों के अचेतन (जड़) होने के कारण इस वाक्य का फल, चैतन्य आत्मा में ही माना जाता है। क्योंकि जड़ वस्तु फलस्वरूप अथवा फल का उपादान नहीं हो सकती। अतः अन्तःकरण और चिदाभास में फल संभव न होने के कारण निर्व्यापार होने पर भी उनके अधिष्ठानभूत चेतन आत्मा में ही उसका तात्पर्य प्रतीत होता है ॥ १०७ ॥ कूटस्थेऽपि फलं योग्यं राजनीव जयादिकम्। †तदन्तात्मत्वहेतुभ्यां क्रियायाः प्रत्ययस्य च ॥१०८॥

  • ग्राहि०-पाठन्तरम् । † तदनात्म०-पाठान्तरम् ।

२२२ उपदेशसाहस्री कूटस्थे इति—जिस प्रकार सेना के जय-पराजय का राजा पर आरोप किया जाता है, उसी प्रकार अन्तः- करण की 'अहम्' इत्याकारिका वृत्ति और चिदाभास 'अनात्मरूप' (जड़) होने से कूटस्थ आत्मा में ही फल समझना चाहिये ॥ १०८ ॥ हृदयस्पर्शिनी व्यापारशून्य का भी फल के साथ संबंध होने में दृष्टान्त बता रहे हैं। जिस प्रकार सेना के जय- पराजय का राजा पर आरोप किया जाता है, उसी प्रकार अन्तःकरण की अहमात्मिका वृत्ति और चिदाभास, ये दोनों अनात्मभूत जड़ होने के कारण कूटस्थ आत्मा में फल का संबंध समझना चाहिये। यहाँ यह शंका हो सकती है कि दृष्टान्त में तो स्व-स्वामिभावसम्बन्ध निमित्त हो सकता है, किन्तु प्रकृत में अध्यक्ष और अध्यक्ष्य में वैसा सम्बन्ध न दिखाई देने से उपर्युक्त दृष्टान्त कैसे संगत हो सकेगा ? उक्त शंका के समाधान में कहा गया है कि यहाँ भी अधिष्ठान-अधिष्ठेयभावरूप सम्बन्ध, फलसम्बन्ध होने में हेतु हो सकता है। मूल में उक्त 'हेतुभ्यां' को 'हेतुत्वाभ्यां' ऐसा भावप्रधान समझना चाहिये । उसी तरह 'क्रिया' को 'अहमात्मिका वृत्ति' समझनी चाहिये । और 'प्रत्यय' शब्द से 'प्रत्यर्थमयति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'अन्तःकरणसाभास' अर्थात् वृत्ति और वृत्तिमान् का साभास समझना चाहिए । उसी तरह आत्मत्वं च हेतुत्वं च आत्महेतुत्वे, तस्य = फलस्य न आत्महेतुत्वे, तदनात्मत्वहेतुत्वे ताभ्यां तदनात्मत्वहेतुत्वाभ्याम् । तथाच जड़भूत क्रिया और प्रत्यय, दोनों फलस्वरूप न होने से और फल के उपादन भी न होने से तद्व्यापारनिबन्धन फल, उसके अधिष्ठानरूप कूटस्थ के निर्व्यापार रहने पर भी उसी में होगा। अतः दृष्टान्त यहाँ पर संगत हो जाता है ॥ १०८॥ आदर्शस्तु यदाभासो मुखाकारः स एव सः । यथैवं प्रत्ययादर्शो यदाभासस्तदा ह्यहम् ॥१०९॥ आदर्श इति—आदर्श (दर्पण) जिसके आभास से युक्त होता है, उसी का आकार भी प्रतीत होता है। जैसे जब दर्पण, मुख के आभास से युक्त होता है, तब उसमें ग्रीवास्थ मुख का आकार भी प्रतीत होता है, उसी प्रकार अहंकार जिस चेतन के प्रतिबिम्ब द्वारा प्रकाशित होता है, वह 'परमात्मा' ही है। अतः 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों का फल चिदात्मा में होना योग्य ही है ॥ १०९ ॥ हृदयस्पर्शिनी शुद्ध आत्मा में प्रमातृत्व नहीं होने से ही यह कहा गया कि कूटस्थ में विशिष्ट प्रमातृकृत फल का उपचार किया जाता है। यह बात राजा के दृष्टान्त से बताई गई है। वस्तुतः स्वात्मा में अध्यस्त स्वोपाधि के व्यापार से चित्प्रतिबिम्ब में ही प्रमातृत्व रहता है। अतः प्रतिबिम्बभावनिबन्धन फलसम्बन्ध अविकृत चिदात्मा से ही होता है। इसे दृष्टान्त देकर बता रहे हैं—जैसे आदर्श (दर्पण) जिस मुख के आभास से विशिष्ट हुआ प्रतीत होता है, वही ग्रीवास्थ मुख का आकार भी होता है, उसी प्रकार अहंकार जिस चेतन के प्रतिबिम्ब द्वारा प्रकाशित है, वह परमात्मा ही है। अतः 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्यों का फल चिदात्मा में होना उचित ही है ॥ १०९ ॥ इत्येवं प्रतिपत्तिः स्यात्सदस्मीति च नान्यथा । तत्त्वमित्युपदेशोऽपि द्वाराभावादनर्थकः ॥११०॥ इतीति—चिदाभास का जब स्वीकार करते हैं, तभी 'मैं सत्स्वरूप हूँ'—यह ज्ञान होना संभव हो सकता है, अन्यथा नहीं । चिदाभास के स्वीकार न करने पर कोई रहेगा ही नहीं, तब 'तू सत्स्वरूप है'—यह उपदेश ही व्यर्थ हो जायगा ॥ ११० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस रीति से चिदाभास का स्वीकार करने पर ही 'मैं सत्स्वरूप हूँ' यह ज्ञान हो सकता है, अन्यथा नहीं हो सकता । क्योंकि आभास को न मानने पर किसी के न रहने से 'तू सत्स्वरूप है' यह उपदेश भी व्यर्थ हो जायगा ॥ ११० ॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् २२३ श्रोतुः स्यादुपदेशश्चेदर्थवत्त्वं *तथा भवेत् । अध्यक्षस्य न चेदिष्टं श्रोतृत्वं कस्य तद्भवेत् ॥१११॥ श्रोतुरिति—उपदेश, श्रोता को किये जाने पर ही सार्थक हो सकता है। यदि कूटस्थ साक्षी आत्मा में श्रोतृत्व न स्वीकार किया जाय तो वह और किसका हो सकता है ? ॥ १११ ॥ अध्यक्षस्य समीपे स्याद्बुद्धेरेवेति चेन्मतम् । न तत्कृतोपकारोऽस्ति काष्ठाद्यद्वन्न कल्प्यते ॥११२॥ अध्यक्षेति— यह कहें कि साक्षी के सन्निध रहने से 'बुद्धि' में ही श्रोतृत्व की कल्पना की जा सकती है किन्तु यह कथन उचित न होगा, क्योंकि जिस प्रकार काष्ठ के समीप रहने से 'बुद्धि' का कोई उपकार नहीं होता, उसी प्रकार 'साक्षी' के द्वारा भी कोई उपकार नहीं हो सकता ॥ ११२ ॥ हृदयस्पर्शिनी अध्यक्ष के लिये उपदेश को न मानने पर भी उसकी (उपदेश की) व्यर्थता कैसे हो सकती है ? हम, साक्षी का सान्निध्य होने से बुद्धि में ही श्रोतृत्व कहेंगे । इस प्रकार शंका करने पर शंका करनेवाले से यह पूछ सकते हैं कि बुद्धि का श्रोतृत्व, क्या अध्यक्ष की सन्निधि की सत्तामात्र की अपेक्षा करता है ? या उसके द्वारा किये गये उपकार की अपेक्षा करता है ? प्रथम पक्ष तो इसलिए ठीक नहीं कि सन्निहित रहनेवाले अध्यक्ष के द्वारा किया गया उपकाररूप कोई अतिशय बुद्धि में नहीं दिखाई देता । जिस प्रकार काष्ठ आदि की सन्निधि से बुद्धि का कोई उपकार नहीं होता है, उसी प्रकार साक्षी के द्वारा भी बुद्धि का कोई उपकार नहीं होता है ॥ ११२ ॥ बुद्धौ चेत्कृतः कश्चिन्नन्वेवं परिणामिता । आभासेऽपि च को दोषः सति श्रुत्याद्यनुग्रहे ॥११३॥ बुद्धाविति—यदि यह कहें कि 'साक्षी' के द्वारा 'बुद्धि' में कोई विशेषता उत्पन्न हो जाती है, तो 'साक्षी' को परिणामी कहना होगा । अतः श्रुतिप्रमाण के अनुरोध से 'चिदाभास' के स्वीकारने में क्या हानि है ? ॥ ११३ ॥ हृदयस्पर्शिनी द्वितीय पक्ष में भी दोष देते हैं। यदि यह कहें कि साक्षी के द्वारा बुद्धि में कोई विशेषता उत्पन्न होती है, अतः आभास स्वीकार करने की कोई आवश्यकता नहीं। किन्तु ऐसा कहने पर अध्यक्ष को परिणामी कहना होगा । ऐसी परिस्थिति में श्रुति प्रमाण का अवलम्ब कर 'चिदाभास' ही क्यों न माना जाय ? क्योंकि आभास पक्ष निर्दुष्ट है, अतः वही उपादेय है। अथवा अध्यक्ष की परिणामिता भी मान ली जाय तो भी श्रुतिप्रमाण से सिद्ध आभास को मान लेने में भी तुम्हारी कौन-सी हानि है ? ॥ ११३ ॥ आभासे परिणामश्चेन्न रज्ज्वादिन्निभत्ववत् । सर्पादिश्च तथाऽवोचमादर्शं च मुखत्ववत् ॥११४॥ आभासे इति—यदि यह कहें कि 'चिदाभास' को स्वीकार करने पर भी 'आत्मा' का परिणामित्व सिद्ध होता है, किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि रज्जु आदि की समानता से जैसे सर्प आदि की कल्पना की जाती है, उसी तरह तथा आदर्श (शीशे) में मुख के प्रतिबिम्ब के समान उसे मिथ्या बता चुके हैं ॥ ११४ ॥ १. 'रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव' — (बृ. उ. २।५।१९ तथा कठ. उ. ५।९।१०) और 'एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् — (ब्रह्म बिन्दु उ. १२)

  • तदा०—पाठान्तरम् ।