भारतकोश
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वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

प्रार्थना करने लगा। उसने द्वार बन्द करना चाहा और ऋषिने सिर अड़ा कर घुसना चाहा। उसने जोरसे द्वार बन्द करने की चेष्टा की। इससे ऋषिका सिर कट गया और वह वहीं मर गया। ऐसे-ऐसे बूढ़े और अम्यासी जितेन्द्रिय पुरुष जब स्त्रियों-को देखते ही पागल हो जाते हैं, तब औरोंका क्या कहना?

यद्यपि कामको काव्यमें करना भ्राकठिन है ;

तथापि कामदेव को वशमें करो ; क्योंकि स्त्री

संसार-वन्धनकी मूल या जन्म-मरणकी कारण है।

स्त्री भक्ति-भुक्ति और सुख-शान्तिकी नाशक है। जिनके स्त्री हैं, वे परमेश्वरकी भक्ति कर नहीं सकते, क्योंकि उन्हें जड़ालोंसे ही पुरसत नहीं मिल सकती। यों तो सभी विषय विषके समान घातक हैं, पर स्त्री सबसे ऊपर है। जहाँ स्त्री है, वहाँ सभी विषय हैं। विषय दुःख और तापके कारण हैं, अतः बुद्धिमानोंको विषयोंसे बचना चाहिये। मोक्ष चाहने वालोंको तो स्त्री के दर्शन भी न करने चाहियें। कहा है :—

संभावयेत् स्त्रियं नौव पूर्वदृष्टां च न स्मेत् ।

कथां च वज्रेयतासां तां पश्येद्विखितामपि ॥

न तो स्त्रीके साथ बात करनी चाहिये, न पहलेकी देखी स्त्रीकी याद करनी चाहिये और न उसकी चर्चा करनी चाहिये। यहाँ तक कि, उसका चित्र भी न देखना चाहिये।

( ५८ )

जो स्त्री-जातिसे इस तरह अलग रहेंगे, वे ही कदाचित् इस बलासे बच सकेंगे। इसे देखकर मनको वशमें रखना बड़ा कठिन काम है। सभी भीष्म और अर्जुन नहीं हो सकते। संसारी लोग कितने ही दुःख, ताप और कष्ट क्यों न पावें ; किन्तु उनका मन उस ऊर्टकी तरह है, जो काँटेदार वृक्षोंको खाना पसन्द करता है ; काँटेदार वृक्षोंके खानेसे उसके मुँह से खून बहने लगता है, पर वह उनका खाना नहीं छोड़ता ; इसी तरह जिन्हें विषयोंका स्वाद आ गया है, वे अनेक तरह के कष्ट भोगने पर भी उन्हें नहीं त्यागते ; किन्तु जब उनमें विवेक आ जाता है, उनमें सत-असतके विचारकी शक्ति हो जाती है, तब उन्हें उनसे विरक्ति हो जाती है। उस अवस्थामें स्त्री जातिसे नफ़रत हो जाती है।

शिक्षा-विषय विष है। इनका त्याग हो सुखकी जड़ है। जो विषयी हैं, उन्हें कहीं सुख नहीं है। अतः कामको जीतो। जिसने कामको जीत लिया, उसने सबको जीत लिया।

छण्पय ।

भीख-अन्न इकवार, लौन दिन खाय रहत हूँ । फटी गुदरी ओढ़, वृक्ष की छाँह गहत हूँ । घास पात कहु डारि, धूमि पर नित प्रति सोवत । राख्यौ तन परिवार, भार यह ताको ढोवत ।

( ५६ )

इहि भौति रहत चाहत न कहु, तज, विषय बाधा करत । हरि ! हाय २ तेरी शरणा, आय पर्यो इनसे डरत ॥१६॥

19. A man may go a-begging for his food and get a tasteless meal once a day, he may have earth only for his bed and his own body for his servant. His clothes may only consist of an old and dirty sheet with hundreds of rags hanging from it, But what a pity that the objects of pleasure do not desert even such a man.

स्तनौ मांसग्रन्थी कनककलशाविस्तुपमितौ

मुखं श्लेष्मागारं तदपि च शशकेन तुलितम् ॥

सबन्मूलकिन्नं करिवरकरस्पर्द्धिं जयन-

महो निन्यं रूपं कविजनविशेषैर्गुरु कृतम् ॥१०॥

स्त्रियोंके स्तन मांसके लौदे हैं, पर कवियोंने उन्हें सोनेके कलशोंकी उपमा दी है। स्त्रियोंका मुँह कफका घर है, पर कवि उसे चन्द्रमाके समान बताते हैं और उनकी आँखोंको, जिनमें पेशाव प्रभृति बहते रहते हैं, श्रेष्ठ हाथीकी सूँडके समान कहते हैं। स्त्रियोंका रूप घृणायोग्य है, पर कवियोंने उसकी कैसी तारीफ़ की है ! ॥१०॥

स्त्री नरककुण्ड है ।

स्त्रियोंकी छातियाँ—जिनपर विषयी मरे मिटते हैं, जिनकी कवियोंने बड़ी-बड़ी प्रशंसायें की हैं, जिन्हें वे सोनेके कलसों अथवा अनार और नारङ्गियोंके समान बताते हैं—वास्तवमें

( ६० )

जो स् इस बला बड़ा कठि संसारी ; किन्तु उ खाना प से खून इसी तर के कष्ट विवेक अ जाती है, खी जा शिक्षा है, उन्हें लिया, उ

मांसकी पोटली हैं । उनके मुखको वे चन्द्रमाके समान बताते हैं, पर वास्तवमें वे कफके आगार हैं । जिन जाँघों को वे गजवरकी सूँडके समान बताते हैं, वास्तवमें वे मृत और सफेदेके टपकनेसे सगली रहती हैं । स्त्रियोंका शरीर सर्वथा निन्दायोग्य है, उसमें प्रशंसा की कोई बात नहीं ; पर अज्ञानो और सूखे विषयी उन पर मरे मिटते हैं !! यह उनकी भारी भूल है । महात्मा सुन्दर दासजी कहते हैं—

( १ )

कामिनीको तन, मानु कहिये सघन बन । वहाँ काउ जाय, सेा तौ भूले ही परत है ॥ कुञ्जर है गात, कटि-केहरीका भय जामें । वेनी काली नागिनीज, फनिऊँ धरत है ॥ कुच है पहार जहाँ, काम-चोर बसे तहाँ । सन्धिके कटाक्ष बाण, प्राण ऊँ हरत हैं ॥ सुन्दर कहत, एक और डर जामें अति । राक्षसी-बदन, खाउँ-खाउँ ही करतु है ॥ १ ॥

( २ )

कामिनीको अंग, अति मलिन महा अशुद्ध । राम-राम मलिन, मलिन सब द्वार हैं ॥

वराभ्यशतक

तपस्वी स्त्रीपर मुग्ध होकर जबरदस्ती उसके घरमें घुसने लगा। स्त्रीने द्वार बन्द करना चाहा और ऋषिने सिर अड़ा कर घुसना चाहा। स्त्री ने जोर से द्वार बन्द करने की चेष्टा की; इससे ऋषिका सिर कट गया।

पृष्ठ ५५

Popular Press, Calcutta.

इस

बड़ा

संसा

किन्तु

खाना

से ।

इसी

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निवे

जार

खी

वैराग्यशतक

महापुरुष ज्ञान-दृष्टिसे कामिनी की असलियत को देख रहे हैं। कामी लोग भी स्त्रियों की असलियत को बगौर देखें और इनसे घृणा करें। वास्तवमें, स्त्री में कुछ भी नहीं है। सांस्वर्भ-हीन स्त्री कंकाल है।

(पृ० ५८)

Popular Press, Calcutta.

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( ६१ )

हाड़ मांस मज्जा मेद, चाममुँ लपेटि राखै । ठोर-ठोर रक्तके, भेड़ भगडार हैं ॥ मूत्रह पुरीष आत, एकमेक मिलि रहौं । और ही उदर माँहि, विविध विकार हैं ॥ सुन्दर कहत, नारी नखशिख निन्दा-रूप । ताहि जा सराहै, सो तो बड़ेई गँवार है ॥२॥

( ३ )

( राग सोरठ )

अनाड़ी मन ! नारी नरकका मूल । रंग रूप पर भया लुभाना, क्यों मूल गया हरि नाम दिवाना ? । इस धन यौवनका नाहि ठिकाना, दो दिनमें हो जाय घूल ॥१॥ कंचन भरे दो कलश बतावे, ताहि पकड़ आनन्द मनावे । यह तो चमड़ेकी थैली हैं मूरख, जिन पै रहो तू भूल ॥२॥ जा सुखको तू चन्दा कर माने, थूक राल वामें लिपटाने । धिक धिक धिक ! तेरे या सुख पै, मिथामें रहो तू भूल ॥३॥

( ६२ )

कैसा भारी घोका खाया,

तन पर कायिनके ललचाया ! ।

कहैं कवीर आँखसे देखा,

यह तो माटीका स्थूल ॥४॥

( ४ )

उदरमें नरक, अर्ध द्वारनमें नरक,

कुचनमें नरक, नरक भरी छाती है ।

कयठमें नरक, गाल चिबुक नरक-बिम्ब,

मुखमें नरक, जीभ लालहू चुवाती है ।

नाकमें नरक, आंख कानमें नरक बहें,

हाथ पाँउ नखशिख, नरक दिखाती है ।

सुन्दर कहत, नारी नरकको कुण्ड यह,

नरकमें जाइ परे, सो नरक पाती है ॥

स्त्रीमें रूप नहीं ।

स्त्रियोंके जिस शरीरकी कामियोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की है, तत्त्वविद् वेदान्तियोंने उसीकी पेट-भर निन्दा की है । वास्तवमें बात भी ऐसी ही है । असलमें नारी उतनी सुन्दरी नहीं, जितनी कि कवियोंने लिखी है । गुम्बद पर कलई है । सचमुच ही नारी नरकका रूप है ; इसके भीतर मल-मूत्र शूक और खवार भरे हैं । पर लोग ऊपरकी चमक-दमक पर मरे मिटते

बेरास्युहाटक

महात्मा कहते हैं—“सैया ! सव आपने मलबक्स प्रीति करते है । अगर निश्वास न हो तो फरीवा कर लो । पृष्ठ ६६

बहुँ आपनी सेवा-दहला कोर नाच- नखरुसि पलिको बरामि करती है ।

Popular Press—Calcutta.

पृष्ठ ६५

तत्त्व बात जितन ही ना

वैराग्यशतक

लड़का ससल चढ़कर पड़ गया और मुर्छा सा हो गया । आवाज़ देने पर जब बह खासिको न आया ; खोने जाकर देखा और उसे मरा हुआ पाया । ( पृष्ठ ६५ )

झपार में पहलें रोना पिटना आरंभ कर दें; तो न जाने कब तक भूखी मरूँगी, हसीलिये पहले खीर खा लें और बचे सो बकि पर घर दूँ । ( पृष्ठ ६६ )

Popular Press—Calcutta.

तस्व

बात

जि

वाहिये। किसी ही पुण्यात्मा को ऐसी स्त्री मिलती है, जो उसे दिलसे चाहती हो। स्त्री का स्वभाव है कि, वह देखती किसी को है, बात किसी से करती है और चाहती किसी को है।

स्त्री की प्रीति-परीक्षा ।

एक सेठ का पुत्र, सत्संगके लिये, नित्य किसी महात्मा के पास जाया करता था। माँ-बापको उसका महात्मा के पास जाना पसन्द न था। उन्हें भय था कि, हमारा पुत्र वैरागियों की संगतिमें कहीं वैरागी न हो जाय, इसलिये उन्होंने शीघ्र ही उसकी शादी कर दी। घर में वह आ गयी। फिर भी लड़के का महात्माके पास जाना कम न हुआ। तब सेठ-सेठानीने बहुसे कहा कि, तू इसकी ऐसी सेवा कर, जो यह महात्माके पास जाना छोड़ दे। बहुने अपनी सेवा-टहल और नाज़-नखरों से पति को वशमें कर लिया। लड़के का मन महात्माकी संगतिसे हटने लगा। पहले वह रोज जाता था, आगे दूसरे-तीसरे दिन जाने लगा। एक दिन स्त्रीने कहा—“आप जब रातको चले जाते हैं, मैं अकेली पड़ी रहती हूँ। रात में स्त्रीका अकेला रहना अच्छा नहीं; इसके सिवा, रातको मुझे डर भी लगता है। यह बात सुन कर, लड़केने महात्माके पास जाना कृतई छोड़ दिया।

एक दिन महात्मा कहीं जा रहे थे। राहमें वही लड़का उन्हें मिल गया। उन्होंने उससे न आनेको वजह पूछी। लड़केने कहा—“महाराज ! मेरी खी बड़ी ही पतिव्रता है। वह मुझे हर तरह सुखी रखती है। मेरे बिना वह क्षण-भर भी अकेली नहीं रह सकती। मेरे लिये वह प्राण देती हैं। उसको सच्ची प्रीति देखकर, मैं उसके वशमें हो गया हूँ और इसीसे आपकी सेवामें नहीं आ सकता।”

महात्माने कहा—“भैया ! सब अपने मतलबसे प्रीति करते हैं। तुम्हारी खी भी अपने सुखके लिये तुमसे प्रीति करती है, तुम्हारे सुखके लिये नहीं। अगर विश्वास न हो, तो आज-माइश कर लो।” लड़का इस बात पर राजी हो गया। महात्मा ने उसे श्वास रोकनेकी विधि समझा दी और कहा,—“एक दिन तुम अपनी खीसे कहना कि, आज हम खीर-पूरी खायेंगे। जब वह खीरपूरी बनाने लगे, तब तुम श्वास रोककर लम्बे पड़ जाना। जब वह संभस्केगी कि तुम मर गये, तब हमारी बातकी सवाईकी परीक्षा हो जायगी।”

त वा जि ही खर

एक दिन लड़केने घर पहुँचतेही खीसे कहा—“आज हमारा मन खीर-पूरी खाने पर है।” खीने कहा—“खामिन् ! अभी बनाती हूँ।” यह कह वह खीर-पूरी बनाने लगी। उधर लड़का साँस चढ़ाकर पड़ गया और मुर्दा हो गया। थोड़ी देर बाद जब खीर-पूरी बन गयी, खीने आवाज़ दी,—“आईये, खाना खा लीजिये।” जब वह न आया, तो खी स्वयम् आयी। देखा

( ६७ )

तो लड़का मरा पड़ा है। कहीं साँस नहीं है। स्त्री ने विचार किया, यह तो मर गया। अगर मैं अभी रोना-पीटना आरम्भ करती हूँ, तो न जाने कब तक भूखी मरूँगी, और खीर भी बिगड़ जायगी। इसलिये पहले खातूँ और जो बचे उसे डींकि पर रख दूँ। स्त्री ने अपने विचारानुसार पहले खूब खीर-पूरी खाई, और शेष रख दी। इसके बाद रोना और छाती-माथा कुटना शुरू किया। उसका रोना सुन, घरके लोग इकट्ठे हो गये और पूछा, "यह कैसे मर गया?" स्त्री ने कहा—"पेटमें दर्द बताते थे, शायद उसीसे मरे हैं।" लोगोंने कहा—"अब दैर करना व्यर्थ है। इसे शीघ्र शमशान पर ले चलो।" वे लोग उसे उठाने लगे, लेकिन उसके पैर दो खंभोंमें फँस जानेसे न निकले। तब लोगोंने कहा कि, इन खंभोंको काटकर पाँव निकालने चाहिये। यह सुनते ही स्त्री ने कहा—"ऐसा न करो ; खंभे कट जायँगे, तो फिर कौन बनवा देगा ? इसलिये खंभ न कटाकर, इनके पैर ही काट डालो ; क्योंकि पाँव आखिर जलाये ही जायेगे।" लोगोंने कहा "ठीक है।" ज्योंही उन्होंने पैर काटनेको कुल्हाड़ा उठाया कि, लड़का उठ बैठा और बोला—"मेरा दर्द मिट गया।" यह देख, लोग अपने-अपने ठिकाने चले गये। लड़का महात्म्याके पास गया और कहने लगा—"महात्मन् ! आपका कहना राई रत्नी सब है। अब मुझे ज़रा भी शक नहीं। निस्सन्देह स्त्री अपने ही लिये पतिको प्यार करती है। सबकी प्रीति भटी है। अब मैं गृहस्थाश्रममें न

( ६८ )

रहूंगा। बस, उसी दिनसे उसने अपनी स्त्रीको त्यागकर वैराग्य ले लिया।

स्त्री आफ़्तोंकी जड़ है।

स्त्री अनेक आपदाओं की मूल है। अनेक रूपवती स्त्रियाँ के कारण उनके पतियोंके प्राण नष्ट हुए हैं। नूरजहाँके कारण शेर अफ़ग़ानकी जान मारी गई। स्त्रीके पीछे सुन्द-उपसुन्द आपसमें लड़कर मर गये। स्त्रीके पीछे राजा नहुषको स्वर्ग से गिरना पड़ा। स्त्रीके कारण बालि मारा गया और रावण का सर्वनाश हुआ एवं शिशुपालका खिर काटा गया। स्त्री के पीछे ही भारतको भारत करने वाला महाभारत हुआ। स्त्री साँपसे भी भयङ्कर है। साँपके तो काटनेसे मनुष्य मरता है, पर स्त्रीकी रूप-चिन्तना-मात्रसे ही मनुष्य मर जाता है। विष खानेसे मनुष्य एक बार ही मरता है, पर स्त्री-विष के सम्बन्धसे मनुष्यको बारबार जन्म लेना और मरना पड़ता है; क्योंकि मरते समय पुरुष का मन अपनी स्त्रीमें ज़रूर जाता है। मरण-समय जिसकी वासना जिसमें रहती है, वह उसे अवश्य मिलता है। कहा है :—

वासना यत्र यस्य स्यात्संतं स्वप्नेषु परयति । स्वप्नवन्तरणो ह्येवं वासनातो वपुर्नृणाम् ॥

( ७२ )

( ३ )

कामिनि काली नागिनी, तीन लोक मंझारि । नाम-सनेही ऊवरा, विषिया खाये भारि ॥

( ४ )

नारी कहुँ कि नाहरी, नख-सिरखसों यह खाय । जल बूड़ा तो ऊवरे, भग बूड़ा बहि जाय ॥

( ५ )

एक कनक अरु कामिनी, तजिये भगिये दूर । हरि विच परें अन्तरा, यम देसी मुख धूर ॥

( ६ )

जहाँ काम तहाँ राम नहीं, राम तहाँ नहीं काम । दोऊ कजहुँ ना रहें, काम राम इक ठाम ॥

( ७ )

अविनाशी विच धार तिन, कुल कंचन अरु नार । जो कोई इन ते बचै, सोई उतरे पार ॥

( १ )

स्त्रीको घूर कर न देखना चाहिये और देख कर उसके पीछे न लगना चाहिये ; क्योंकि स्त्रीको देखने-मात्रसे ही जहर चढ़ जाता है और मन और ही तरहका ही जाता है ।

( ७२ )

( २ )

सुन्दरों सोनेकी ही क्यों न हो और उसमें मनभावन सुगंध भी क्यों न आती हो, यदि वह अपनी जननी भी हो, तोभी उसके पास न बैठे।

( ३ )

स्त्री काली नागिन है। केवल ईश्वरका नाम अपने वाले उससे बचे; विषय-भोगियोंको तो वह एकदमसे खागई—कोई न छोड़ा।

( ४ )

इसे मैं नारी कहूँ या नाहरी—सिंहनी कहूँ? क्योंकि यह नख-सिखसे खा जाती है। जलमें डूबा बच जाता है; पर स्त्रीमें डूबा नहीं बचता।

( ५ )

• एक सुवर्ण और दूसरी स्त्री इनसे बच कर रहा। यह भगवान् के और जीवके बीचमें खाई बताते हैं, जिससे यमराज मुँहमें धूल डालता है।

( ६ )

जहाँ स्त्री है वहाँ राम नहीं है और जहाँ राम है वहाँ स्त्री नहीं। स्त्री और राम दोनों एक जगह नहीं रह सकते।

( ७ )

अविनाशी भगवान् और जीवके बीचमें तीन खाहूँयाँ हैं:— (१) कुल, (२) कंचन, और (३) कामिनी। जो इन तीनों से बचता है, वही पार होकर भगवान् तक पहुँच जाता है।