भारतकोश
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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

१५४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३४ ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा विष्णोः स्थानमनुत्तमम् । सवनं नाम विख्यातं यत्र संनिहितो हरिः ॥ १४ विमले च नरः स्नात्वा दृष्ट्वा च विमलेश्वरम् । निर्मलं स्वर्गमायाति रुद्रलोकं च गच्छति ॥ १५ हरिं च बलदेवं च एकत्राससमन्वितौ । दृष्ट्वा मोक्षमवाप्नोति कलिकल्मषसम्भवैः ॥ १६ ततः पारिप्लवं गच्छेत् तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् । तत्र स्नात्वा च दृष्ट्वा च ब्रह्माणं वेदसंयुतम् ॥ १७ ब्रह्मवेदफलं प्राप्य निर्मलं स्वर्गमाप्नुयात् । तत्रापि संगमं प्राप्य कौशिक्स्यां तीर्थसम्भवम् । संगमे च नरः स्नात्वा प्राप्नोति परमं पदम् ॥ १८ धरण्यास्तीर्थमासाद्य सर्वपापविमोचनम् । क्षान्तियुक्तो नरः स्नात्वा प्राप्नोति परमं पदम् ॥ १९ धरण्यामपराधानि कृतानि पुरुषेण वै। सर्वाणि क्षमते तस्य स्नानमात्रस्य देहिनः ॥ २० ततो दक्षाश्रमं गत्वा दृष्ट्वा दक्षेश्वरं शिवम् । अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ २१ ततः शालूकिनीं गत्वा स्नात्वा तीर्थे द्विजोत्तमाः । हरिं हरेण संयुक्तं पूज्य भक्तिसमन्वितः । प्राप्नोत्यभिमताँल्लोकान् सर्वपापविवर्जितान् ॥ २२ सर्पिर्दधि समासाद्य नागानां तीर्थमुत्तमम् । तत्र स्नानं नरः कृत्वा मुक्तो नागभयाद् भवेत् ॥ २३ ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा द्वारपालं तु रन्तुकम् । तत्रोष्य रजनीमेकां स्नात्वा तीर्थवरे शुभे ॥ २४ द्वितीयं पूजयेद् यत्र द्वारपालं प्रयत्नतः । ब्राह्मणान् भोजयित्वा च प्रणिपत्य क्षमापयेत् ॥ २५ तव प्रसादाद् यक्षेन्द्र मुक्तो भवति किल्बिषैः । सिद्धिर्मयाभिलषिता तया सार्द्धं भवाम्यहम् । एवं प्रसाद्य यक्षेन्द्रं ततः पञ्चनदं व्रजेत् ॥ २६ पञ्चनदाश्च रुद्रेण कृता दानवभीषणाः । तत्र सर्वेषु लोकेषु तीर्थं पञ्चनदं स्मृतम् ॥ २७ कोटितीर्थानि रुद्रेण समाहृत्य यतः स्थितम् । तेन त्रैलोक्यविख्यातं कोटितीर्थं प्रचक्षते ॥ २८ आरूढ़ होता है। विप्रेन्द्रो ! इसके बाद 'सवन' नामसे विख्यात सर्वोत्तम विष्णु-स्थानको जाना चाहिये, जहाँ भगवान् हरि सदा संनिहित रहते हैं। विमल तीर्थमें स्नानकर विमलेश्वरका दर्शन करनेसे मनुष्य निर्मल हो जाता है तथा रुद्रलोकमें जाता है। एक आसनपर स्थित कृष्ण और बलदेवका दर्शन करनेसे मनुष्य कलिके दुष्कर्मोंसे उत्पन्न पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १३-१६ ॥ उसके पश्चात् तीनों लोकोंमें विख्यात पारिप्लव नामक तीर्थमें जाय । वहाँ स्नान करनेके पश्चात् वेदों- सहित ब्रह्माका दर्शन करनेसे अथर्ववेदका ज्ञान प्राप्त कर निर्मल स्वर्गको प्राप्त करता है। कौशिकी-संगम तीर्थमें जाकर स्नान कर मनुष्य परम पदको प्राप्त करता है। समस्त पापोंसे मुक्त करनेवाले धरणीके तीर्थमें जाकर स्नान करनेसे क्षमाशील मनुष्य परम पदकी प्राप्ति करता है। वहाँ स्नान करनेमात्रसे पृथ्वीपर मनुष्यद्वारा किये गये समस्त अपराध क्षमा कर दिये जाते हैं ॥ १७-२० ॥ उसके बाद दक्षाश्रममें जाकर दक्षेश्वर शिवका दर्शन करनेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है। द्विजोत्तमो ! तदनन्तर शालूकिनी तीर्थमें जाकर स्नान करनेके उपरान्त भक्तिपूर्वक हरसे संयुक्त हरिका पूजन कर मनुष्य समस्त पापोंसे रहित इच्छाके अनुकूल लोकोंको प्राप्त करता है। सर्पिर्दधि नामवाले नागोंके उत्तम तीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य नाग-भयसे मुक्त हो जाता है। विप्रश्रेष्ठो ! तदनन्तर रन्तुक नामक द्वारपालके पास जाय। वहाँ एक रात्रि निवास करे तथा कल्याणकारी (उस) श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करनेके बाद दूसरे दिन प्रयत्नपूर्वक (निष्ठाके साथ मन लगाकर) द्वारपालका पूजन करे एवं ब्राह्मणोंको भोजन कराये। फिर उन्हें प्रणाम कर इस प्रकार क्षमा-प्रार्थना करे-'हे यक्षेन्द्र ! तुम्हारी कृपासे मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है। मैं अपनी अभीष्ट सिद्धिको प्राप्त करूँ (मेरी मनःकामना पूर्ण हो)।' इस प्रकार यक्षेन्द्रको प्रसन्न करनेके पश्चात् पञ्चनद तीर्थमें जाना चाहिये। जहाँ भगवान् रुद्रने दानवोंके लिये भयंकर पाँच नदोंका निर्माण किया है, उस स्थानपर समस्त संसारमें प्रसिद्ध पञ्चनद तीर्थ है; ॥ २१-२७ ॥ क्योंकि करोड़ों तीर्थोंको एकत्र (स्थापित) कर भगवान् वहाँ स्थित हैं, अतः उसे त्रैलोक्य-प्रसिद्ध

अध्याय ३४] कुरुक्षेत्रके सात प्रसिद्ध वनों, नौ नदियों एवं सम्पूर्ण तीर्थोंका माहात्म्य १५५ तस्मिन् तीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा कोटीश्वरं हरम् । कोटितीर्थ कहा जाता है। मनुष्य श्रद्धापूर्वक उस तीर्थमें पञ्चयज्ञानवाप्नोति नित्यं श्रद्धासमन्वितः ॥ २९ स्नान कर तथा कोटीश्वर हरका दर्शन कर पाँच प्रकारके (महा) यज्ञोंके अनुष्ठानका फल प्राप्त करता है। उसी तत्रैव वामनो देवः सर्वदेवैः प्रतिष्ठितः । स्थानपर सब देवताओंने भगवान् वामनदेवकी स्थापना तत्रापि च नरः स्नात्वा ह्यग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ ३० की है। वहाँ भी स्नान करनेसे मनुष्यको अग्निष्टोम यज्ञका फल प्राप्त होता है। श्रद्धावान् जितेन्द्रिय मनुष्य अश्विनोस्तीर्थमासाद्य श्रद्धावान् यो जितेन्द्रियः । अश्विनीकुमारोंके तीर्थमें जाकर रूपवान् और यशस्वी रूपस्य भागी भवति यशस्वी च भवेन्नरः ॥ ३१ होता है॥ २८-३१॥ वाराहं तीर्थमाख्यातं विष्णुना परिकीर्तितम् । विष्णुद्वारा वर्णित वाराह नामक विख्यात तीर्थ है। तस्मिन् स्नात्वा श्रद्धधानः प्राप्नोति परमं पदम् ॥ ३२ श्रद्धालु पुरुष उसमें स्नान कर परमपदको प्राप्त करता ततो गच्छेत विप्रेन्द्राः सोमतीर्थमनुत्तमम् । है। विप्रेन्द्रो ! उसके बाद श्रेष्ठ सोमतीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ चन्द्रमा पूर्वकालमें तपस्या कर व्याधिसे मुक्त हुए यत्र सोमस्तपस्तप्त्वा व्याधिमुक्तोऽभवत् पुरा ॥ ३३ थे। उस शुभ तीर्थमें स्नान कर सोमेश्वर भगवान्का दर्शन तत्र सोमेश्वरं दृष्ट्वा स्नात्वा तीर्थवरे शुभे । करनेसे मनुष्य राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त करता है तथा राजसूयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ३४ व्याधियों और सभी दोषोंसे मुक्त होकर सोमलोकमें व्याधिभिश्च विनिर्मुक्तः सर्वदोषविवर्जितः । जाता एवं चिरकालतक वहाँ सानन्द विहार करता सोमलोकमवाप्नोति तत्रैव रमते चिरम् ॥ ३५ है॥ ३२-३५॥ भूतेश्वरं च तत्रैव ज्वालामालेश्वरं तथा। वहींपर भूतेश्वर एवं ज्वालामालेश्वर नामक तावुभौ लिङ्गावभ्यर्च्य न भूयो जन्म चाप्नुयात् ॥ ३६ लिङ्ग है। उन दोनों लिङ्गोंकी पूजा करनेसे (मनुष्य) पुनर्जन्म नहीं पाता। एकहंस (सरोवर)-में स्नान कर एकहंसे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् । मनुष्य हजारों गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। कृतशौचं समासाद्य तीर्थसेवी द्विजोत्तमः ॥ ३७ 'कृतशौच' नामक तीर्थमें जाकर मनोयोगपूर्वक तीर्थकी सेवा करनेवाला द्विजोत्तम 'पुण्डरीक' यज्ञविशेषके फलको पुण्डरीकमवाप्नोति कृतशौचो भवेन्नरः । प्राप्त करता है तथा उसकी शुद्धि हो जाती है (-वह ततो मुञ्जवटं नाम महादेवस्य धीमतः ॥ ३८ पवित्र हो जाता है)। उसके बाद बुद्धिमान् महादेवके उपोष्य रजनीमेकां गाणपत्यमवाप्नुयात् । मुञ्जवट नामक तीर्थमें एक रात्रि निवास करके मनुष्य तत्रैव च महाग्राही यक्षिणी लोकविश्रुता ॥ ३९ गाणपत्य (गणनायके पदको) प्राप्त करता है। वहीं विश्वप्रसिद्ध महाग्राही यक्षिणी है। वहाँ जाकर स्नान स्नात्वाऽभिगत्वा तत्रैव प्रसाद्य यक्षिणीं ततः । करनेके बाद यक्षिणीको प्रसन्न कर उपवास करनेसे उपवासं च तत्रैव महापातकनाशनम् ॥ ४० महान् पातकोंका नाश होता है॥ ३६-४०॥ कुरुक्षेत्रस्य तद् द्वारं विश्रुतं पुण्यवर्धनम् । पुण्यकी वृद्धि करनेवाले कुरुक्षेत्रके उस विख्यात प्रदक्षिणमुपावर्त्य ब्राह्मणान् भोजयेत् ततः । द्वारकी प्रदक्षिणा कर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। फिर पुष्करं च ततो गत्वा अभ्यर्च्य पितृदेवताः ॥ ४१ पुष्करमें जाकर पितृदेवोंकी अर्चना करे। उस तीर्थका महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामजीने निर्माण किया था। जामदग्न्येन रामेण आहृतं तन्महात्मना । वहाँ (जाकर) मनुष्य सफल-मनोरथ हो जाता है और कृतकृत्यो भवेद् राजा अश्वमेधं च विन्दति ॥ ४२ राजाको अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। कार्तिकी कन्यादानं च यस्तत्र कार्तिकायां वै करिष्यति । पूर्णिमाको जो मनुष्य वहाँ कन्यादान करेगा, उसके ऊपर प्रसन्ना देवतास्तस्य दास्यन्त्यभिमतं फलम् ॥ ४३ देवता प्रसन्न होकर उसे मनोवाञ्छित फल देंगे। वहाँ

३७- कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य और क्रमका पूर्वानुक्रान्त वर्णन

१५६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कपिलश्च महायक्षो द्वारपालः स्वयं स्थितः।<br>विघ्नं करोति पापानां दुर्गतिं च प्रयच्छति॥ ४४<br><br>पत्नी तस्य महायक्षी नाम्नोदूखलमेखला।<br>आहत्य दुन्दुभिं तत्र भ्रमते नित्यमेव हि॥ ४५<br><br>सा ददर्श स्त्रियं चैकां सपुत्रां पापदेशजाम्।<br>तामुवाच तदा यक्षी आहत्य निशि दुन्दुभिम्॥ ४६<br><br>युगन्धरे दधि प्राश्य उषित्वा चाच्युतस्थले।<br>तद्वद् भूतालये स्नात्वा सपुत्रा वस्तुमिच्छसि॥ ४७<br><br>दिवा मया ते कथितं रात्रौ भक्ष्यामि निश्चितम्।<br>एतच्छ्रुत्वा तु वचनं प्रणिपत्य च यक्षिणीम्॥ ४८<br><br>उवाच दीनया वाचा प्रसादं कुरु भामिनि।<br>ततः सा यक्षिणी तां तु प्रोवाच कृपयान्विता॥ ४९<br><br>यदा सूर्यस्य ग्रहणं कालेन भविता क्वचित्।<br>सन्निहत्यां तदा स्नात्वा पूता स्वर्गं गमिष्यसि॥ ५०कपिल नामक महायक्ष स्वयं द्वारपालके रूपमें स्थित हैं, जो पापियोंके मार्गमें विघ्न उपस्थित कर उनकी दुर्गति करते हैं (जिससे वे पापाचरण न करें तथा धर्मकी मर्यादा स्थित रहे)। 'उदूखलमेखला' नामक उनकी महायक्षी पत्नी दुन्दुभि बजाकर वहाँ नित्य भ्रमण करती रहती है॥ ४१-४५॥<br><br>उस यक्षीने पापवाले देशमें उत्पन्न पुत्रके साथ एक रात्रिमें स्त्रीको देखनेके बाद दुन्दुभि बजाकर उससे कहा—युगन्धरमें दही खाकर तथा अच्युतस्थलमें निवास करनेके बाद भूतालयमें स्नान कर तुम पुत्रके साथ निवास करना चाहती हो। मैंने दिनमें यह बात तुमसे कही है। रात्रिमें मैं अवश्य तुमको खा जाऊँगी।* उसकी यह बात सुननेके बाद यक्षिणीको प्रणाम कर उसने दीन वाणीमें उससे कहा—'हे भामिनि! मेरे ऊपर दया करो।' फिर उस यक्षिणीने उससे कृपापूर्वक कहा—जब किसी समय सूर्य-ग्रहण होगा, उस समय सान्निहत्य (सरोवर)-में स्नान करके पवित्र होकर तुम स्वर्ग चली जाओगी॥ ४६-५०॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३४॥


पैंतीसवाँ अध्याय

कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका वर्णन

लोमहर्षण उवाचलोमहर्षणने कहा—
ततो रामह्रदं गच्छेत् तीर्थसेवी द्विजोत्तमः।<br>यत्र रामेण विप्रेण तरसा दीप्ततेजसा॥ १<br><br>क्षत्रमुत्साद्य वीरेण ह्रदाः पञ्च निवेशिताः।<br>पूरयित्वा नरव्याघ्र रुधिरेणेति नः श्रुतम्॥ २<br><br>पितरस्तर्पितास्तेन तथैव प्रपितामहाः।<br>ततस्ते पितरः प्रीता राममूचुर्द्विजोत्तमाः॥ ३<br><br>राम राम महाबाहो प्रीताः स्मस्तव भार्गव।<br>अनया पितृभक्त्या च विक्रमेण च ते विभो॥ ४इसके बाद तीर्थका सेवन करनेवाले उत्तम द्विजको रामकुण्ड नामक स्थानमें जाना चाहिये, जहाँ उद्दीप्त तेजस्वी विप्र-वीर राम (परशुराम)-ने बलपूर्वक क्षत्रियोंका संहारकर पाँच कुण्डोंको स्थापित किया था। पुरुषसिंह! हमलोगोंने ऐसा सुना है कि परशुरामने उन (कुण्डों)-को रक्तसे भरकर उसने अपने पितरों एवं प्रपितामहोंका तर्पण किया था। द्विजोत्तमो! उसके बाद उन प्रसन्न पितरोंने परशुरामसे कहा था कि महाबाहु भार्गव राम! परशुराम! विभो! तुम्हारी इस पितृभक्ति और पराक्रमसे हम सब तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हैं॥ १-४॥

* इन सबकी सटिप्पण विस्तृत व्याख्या गीताप्रेसके महाभारत वनपर्व १२९। ९-१० में द्रष्टव्य है।

अध्याय ३५ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका वर्णन [ १५७


श्लोकअर्थ
वरं वृणीष्व भद्रं ते किमिच्छसि महायशः।<br>एवमुक्तस्तु पितृभी रामः प्रभवतां वरः॥ ५<br>अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं स पितॄन् गगने स्थितान्।<br>भवन्तो यदि मे प्रीता यद्यनुग्राह्यता मयि॥ ६<br>पितृप्रसादादिच्छेयं तपसाप्यायनं पुनः।<br>यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं मया॥ ७<br>ततश्च पापान्मुच्येयं युष्माकं तेजसा ह्यहम्।<br>ह्रदाश्चैते तीर्थभूता भवेयुर्भुवि विश्रुताः॥ ८महायशस्विन्! तुम्हारा कल्याण हो। तुम वर माँगो। क्या चाहते हो? पितरोंके इस प्रकार कहनेपर प्रभावशालियोंमें श्रेष्ठ रामने आकाशमें स्थित पितरोंसे हाथ जोड़कर कहा—यदि आपलोग मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तथा मुझपर आप सबकी दया है तो आप पितरोंके प्रसादसे मैं पुनः तपसे पूर्ण हो जाऊँ। रोषसे अभिभूत होकर मैंने जो क्षत्रियोंका विनाश किया है, आपके तेजद्वारा मैं उस पापसे मुक्त हो जाऊँ एवं ये कुण्ड संसारमें विख्यात तीर्थस्वरूप हो जायँ॥ ५—८॥
एवमुक्ताः शुभं वाक्यं रामस्य पितरस्तदा।<br>प्रत्यूचुः परमप्रीता रामं हर्षपुरस्कृताः॥ ९<br>तपस्ते वर्द्धतां पुत्र पितृभक्त्या विशेषतः।<br>यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं त्वया॥ १०<br>ततश्च पापान्मुक्तस्त्वं पातितास्ते स्वकर्मभिः।<br>ह्रदाश्च तव तीर्थत्वं गमिष्यन्ति न संशयः॥ ११<br>ह्रदेष्वेतेषु ये स्नात्वा स्वान् पितॄंस्तर्पयन्ति च।<br>तेभ्यो दास्यन्ति पितरो यथाभिलषितं वरम्॥ १२<br>ईप्सितान् मानसान् कामान् स्वर्गवासं च शाश्वतम्।<br>एवं दत्त्वा वरान् विप्रा रामस्य पितरस्तदा॥ १३<br>आमन्त्र्य भार्गवं प्रीतास्तत्रैवान्तर्हितास्तदा।<br>एवं रामह्रदाः पुण्या भार्गवस्य महात्मनः॥ १४परशुरामके इस प्रकारके मङ्गलमय वचन कहनेपर उनके परम प्रसन्न पितरोंने हर्षपूर्वक उनसे कहा—'पुत्र! पितृभक्तिसे तुम्हारा तप विशेषरूपसे बढ़े। क्रोधसे अभिभूत होनेके कारण तुमने क्षत्रियोंका जो विनाश किया है उस पापसे तुम मुक्त हो; क्योंकि ये क्षत्रिय अपने कर्मसे ही मारे गये हैं। तुम्हारे ये कुण्ड निःसंदेह तीर्थके गुणोंको प्राप्त करेंगे। जो इन कुण्डोंमें स्नान कर अपने पितरोंका तर्पण करेंगे, उन्हें (उनके) पितृगण मनकी इच्छाके अनुसार वर देंगे, उनकी मनोऽभिलषित कामनाएँ पूर्ण करेंगे एवं उन्हें स्वर्गमें शाश्वत निवास प्रदान करेंगे।' विप्रो! इस प्रकार वर देकर परशुरामके पितर उनसे अनुमति लेकर प्रसन्नतापूर्वक वहीं अन्तर्हित हो गये। इस प्रकार महात्मा परशुरामके ये रामह्रद परम पवित्र हैं॥ ९—१४॥
स्नात्वा ह्रदेषु रामस्य ब्रह्मचारी शुचिव्रतः।<br>राममभ्यर्च्य श्रद्धावान् विन्देद् बहु सुवर्णकम्॥ १५<br><br>वंशमूलं समासाद्य तीर्थसेवी सुसंयतः।<br>स्ववंशसिद्धये विप्राः स्नात्वा वै वंशमूलके॥ १६<br><br>कायशोधनमासाद्य तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>शरीरशुद्धिमाप्नोति स्नातस्तस्मिन् न संशयः॥ १७<br><br>शुद्धदेहश्च तं याति यस्मान्नावर्तते पुनः।<br>तावद् भ्रमन्ति तीर्थेषु सिद्धास्तीर्थपरायणाः।<br>यावन्न प्राप्नुवन्तीह तीर्थं तत्कायशोधनम्॥ १८श्रद्धालु पवित्रकर्मा व्यक्ति ब्रह्मचर्यपूर्वक परशुरामजीके ह्रदोंमें स्नान करनेके बाद परशुरामका अर्चन कर प्रचुर सुवर्ण प्राप्त करता है। ब्राह्मणो! तीर्थसेवी जितेन्द्रिय मनुष्य वंशमूलक नामक तीर्थमें जाकर उसमें स्नान करनेसे अपने वंशकी सिद्धि प्राप्त करता है। तीनों लोकोंमें विख्यात कायशोधन नामक तीर्थमें जाकर उसमें स्नान करनेसे मनुष्यको निस्संदेह शरीरकी शुद्धि प्राप्त होती है और वह शुद्धदेही मनुष्य उस स्थानको जाता है, जहाँसे वह पुनः नहीं लौटता (जन्म-मरणके चक्करमें नहीं पड़ता)। तीर्थपरायण सिद्ध पुरुष तीर्थोंमें तबतक भ्रमण करते रहते हैं, जबतक वे उस कायशोधन नामक तीर्थमें नहीं पहुँचते॥ १५—१८॥
१५८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्मिंस्तीर्थे च संप्लाव्य कायं संयतमानसः।<br>परं पदमवाप्नोति यस्मान्नावर्तते पुनः॥ १९<br><br>ततो गच्छेत विप्रेन्द्रास्तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>लोका यत्रोद्धृताः सर्वे विष्णुना प्रभविष्णुना॥ २०<br><br>लोकोद्धारं समासाद्य तीर्थस्मरणतत्परः।<br>स्नात्वा तीर्थवरे तस्मिन् लोकान् पश्यति शाश्वतान्॥ २१<br><br>यत्र विष्णुः स्थितो नित्यं शिवो देवः सनातनः।<br>तौ देवौ प्रणिपातेन प्रसाद्य मुक्तिमाप्नुयात्॥ २२<br><br>श्रीतीर्थं तु ततो गच्छेत शालग्राममनुत्तमम्।<br>तत्र स्नातस्य सांनिध्यं सदा देवी प्रयच्छति॥ २३मनको नियन्त्रित करनेवाला मनुष्य उस तीर्थमें शरीरको धोकर (प्रक्षालित कर) उस परम पदको प्राप्त करता है, जहाँसे उसे पुनः परावर्तित नहीं होना पड़ता। विप्रवरो! उसके बाद तीनों लोकोंमें विख्यात लोकोद्धार नामके तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ सर्वसमर्थ विष्णुने समस्त लोकोंका उद्धार किया था। तीर्थका स्मरण करनेमें तत्पर मनुष्य लोकोद्धार नामके तीर्थमें जाकर उसमें स्नान करनेसे शाश्वत लोकोंका दर्शन प्राप्त करता है। वहाँ विष्णु एवं सनातनदेव शिव —ये दोनों ही स्थित हैं। उन दोनों देवोंको प्रणामद्वारा प्रसन्न कर फिर मुक्तिका फल प्राप्त करे। तदनन्तर अनुत्तम शालग्राम एवं श्रीतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नान करनेवालोंको भगवती (लक्ष्मी) अपने निकट निवास प्रदान करती हैं॥ १९-२३॥
कपिलाह्रदमासाद्य तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च दैवतानि पितूंस्तथा॥ २४<br><br>कपिलानां सहस्त्रस्य फलं विन्दति मानवः।<br>तत्र स्थितं महादेवं कापिलं वपुरास्थितम्॥ २५<br><br>दृष्ट्वा मुक्तिमवाप्नोति ऋषिभिः पूजितं शिवम्।<br>सूर्यतीर्थं समासाद्य स्नात्वा नियतमानसः॥ २६<br><br>अर्चयित्वा पितॄन् देवानुपवासपरायणः।<br>अग्निष्टोममवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति॥ २७फिर त्रैलोक्यप्रसिद्ध कपिलाह्रद नामक तीर्थमें जाकर उसमें स्नान करनेके पश्चात् देवता तथा पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्यको सहस्र कपिला गायोंके दानका फल प्राप्त होता है। वहाँपर स्थित ऋषियोंसे पूजित कपिल शरीरधारी महादेव शिवका दर्शन करनेसे मुक्तिकी प्राप्ति होती है। स्थिर अन्तःकरणवाला एवं उपवास-परायण व्यक्ति सूर्यतीर्थमें जाकर स्नान करनेके बाद पितरोंका अर्चन करनेसे अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त करता है एवं सूर्यलोकको जाता है॥ २४-२७॥
सहस्त्रकिरणं देवं भानुं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>दृष्ट्वा मुक्तिमवाप्नोति नरो ज्ञानसमन्वितः॥ २८<br><br>भवानीवनमासाद्य तीर्थसेवी यथाक्रमम्।<br>तत्राभिषेकं कुर्वाणो गोसहस्त्रफलं लभेत्॥ २९<br><br>पितामहस्य पिबतो ह्यमृतं पूर्वमेव हि।<br>उद्गारात् सुरभिर्जाता सा च पातालमाश्रिता॥ ३०<br><br>तस्याः सुरभयो जाताः तनया लोकमातरः।<br>ताभिस्तत्सकलं व्याप्तं पातालं सुनिरन्तरम्॥ ३१तीनों लोकोंमें विख्यात हजारों किरणोंवाले सूर्यदेव भगवान्‌का दर्शन करनेसे मनुष्य ज्ञानसे युक्त होकर मुक्तिको प्राप्त करता है। तीर्थसेवन करनेवाला मनुष्य क्रमानुसार भवानीवनमें जाकर वहाँ (भवानीका) अभिषेक करनेसे सहस्र गोदानका फल प्राप्त करता है। प्राचीन कालमें अमृत-पान करते हुए ब्रह्माके उद्गार (डकार)-से सुरभिकी उत्पत्ति हुई और वह पाताल लोकमें चली गयी। उस सुरभिसे लोकमाताएँ (सुरभिकी पुत्रियाँ) (गायें) उत्पन्न हुईं। उनसे समस्त पाताल लोक व्याप्त हो गया॥ २८-३१॥
पितामहस्य यजतो दक्षिणार्थमुपाहृताः।<br>आहूता ब्रह्मणा ताश्च विभ्रान्ता विवरेण हि॥ ३२पितामहके यज्ञ करते समय दक्षिणाके लिये लायी गयी एवं ब्रह्माके द्वारा बुलायी ये गायें विवरके कारण

३८- मङ्कणक-प्रसङ्ग, मङ्कणकका शिवस्तवन और उनकी अनुकूलता प्राप्ति

| अध्याय ३५ ] | कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका वर्णन | १५९ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्मिन् विवरद्वारे तु स्थितो गणपतिः स्वयं।<br>यं दृष्ट्वा सकलान् कामान् प्राप्नोति संयतेन्द्रियः॥ २३भटकने लगीं। उस विवरके द्वारपर स्वयं गणपति भगवान् स्थित हैं। जितेन्द्रिय मनुष्य उनका दर्शन करके समस्त कामनाओंको प्राप्त करता है।
सङ्गिनीं तु समासाद्य तीर्थं मुक्तिसमाश्रयम्।<br>देव्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा लभते रूपमुत्तमम्॥ ३४<br><br>अनन्तां श्रियमाप्नोति पुत्रपौत्रसमन्वितः।<br>भोगांश्च विपुलान् भुक्त्वा प्राप्नोति परमं पदम्॥ ३५मुक्तिके आश्रयस्वरूप देवीके संगिनीतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्यको सुन्दर रूपकी प्राप्ति होती है तथा वह स्नानकर्ता पुरुष पुत्र-पौत्रसमन्वित होकर अनन्त ऐश्वर्यको प्राप्त करता है और विपुल भोगोंका उपभोग कर परम पदको प्राप्त करता है॥ ३२-३५॥
ब्रह्मावर्त्ते नरः स्नात्वा ब्रह्मज्ञानसमन्वितः।<br>भवते नात्र संदेहः प्राणान् मुञ्चति स्वेच्छया॥ ३६<br><br>ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा द्वारपालं तु रन्तुकम्।<br>तस्य तीर्थं सरस्वत्यां यक्षेन्द्रस्य महात्मनः॥ ३७<br><br>तत्र स्नात्वा महाप्राज्ञ उपवासपरायणः।<br>यक्षस्य च प्रसादेन लभते कामिकं फलम्॥ ३८<br><br>ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा ब्रह्मावर्त्तं मुनिस्तुतम्।<br>ब्रह्मावर्त्ते नरः स्नात्वा ब्रह्म चाप्नोति निश्चितम्॥ ३९ब्रह्मावर्त नामक तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य निःसंदेह ब्रह्मज्ञानी हो जाता है एवं वह निज इच्छाके अनुसार अपने प्राणोंका परित्याग करता है। हे विप्रश्रेष्ठो ! संगिनीतीर्थके बाद द्वारपाल रन्तुकके तीर्थमें जाय। उन महात्मा यक्षेन्द्रका तीर्थ सरस्वती नदीमें है। वहाँ स्नान करके उपवास-व्रतमें निरत परमज्ञानी व्यक्ति यक्षके प्रसादसे इच्छित फल प्राप्त करता है। हे विप्रवरो ! फिर मुनियोंद्वारा प्रशंसा-प्राप्त ब्रह्मावर्त्त तीर्थमें जाना चाहिये। ब्रह्मावर्त्तमें स्नान करनेसे मनुष्य निश्चय ही ब्रह्मको प्राप्त करता है॥ ३६-३९॥
ततो गच्छेत विप्रेन्द्राः सुतीर्थकमनुत्तमम्।<br>तत्र संनिहिता नित्यं पितरो दैवतैः सह॥ ४०<br><br>तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः।<br>अश्वमेधमवाप्नोति पितॄन् प्रीणाति शाश्वतान्॥ ४१<br><br>ततोऽम्बुवनं धर्मज्ञ समासाद्य यथाक्रमम्।<br>कामेश्वरस्य तीर्थं तु स्नात्वा श्रद्धासमन्वितः॥ ४२<br><br>सर्वव्याधिविनिर्मुक्तो ब्रह्मावाप्तिर्भवेद् ध्रुवम्।<br>मातृतीर्थं च तत्रैव यत्र स्नातस्य भक्तितः॥ ४३<br><br>प्रजा विवर्द्धते नित्यमनन्तां चाप्नुयाच्छ्रियम्।<br>ततः शीतवनं गच्छेन्नियतो नियताशनः॥ ४४<br><br>तीर्थं तत्र महाविप्रा महदन्यत्र दुर्लभम्।<br>पुनाति दर्शनादेव दण्डकं च द्विजोत्तमाः॥ ४५हे विप्रश्रेष्ठो ! उसके बाद श्रेष्ठ सुतीर्थक नामके स्थानपर जाना चाहिये। उस स्थानमें देवताओंके साथ पितृगण नित्य स्थित रहते हैं। पितरों एवं देवोंकी अर्चनामें लगा रहनेवाला व्यक्ति वहाँ स्नानकर अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है तथा शाश्वत पितरोंको प्रसन्न करता है। धर्मज्ञ! उसके बाद क्रमानुसार कामेश्वर तीर्थके अम्बुवनमें जाकर श्रद्धापूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य सभी व्याधियोंसे छूटकर निश्चय ही ब्रह्मकी प्राप्ति करता है। उसी स्थानमें स्थित मातृतीर्थमें भक्तिपूर्वक स्नान करनेसे मनुष्यकी प्रजा (संतति)-की नित्य वृद्धि होती है तथा उसे अनन्त लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। उसके बाद नियत आहार करनेवाला एवं जितेन्द्रिय व्यक्ति शीतवन नामक तीर्थमें जाय। हे महाविप्रो! वहाँ दण्डक नामक एक महान् तीर्थ है; वह अत्यन्त दुर्लभ है। द्विजोत्तमो ! वह दण्डक नामका महान् तीर्थ दर्शनमात्रसे मनुष्यको पवित्र कर देता है॥ ४०-४५॥
केशानभ्युक्ष्य वै तस्मिन् पूतो भवति पापतः।<br>तत्र तीर्थवरं चान्यत् स्वानुलोमायनं महत्॥ ४६<br><br>तत्र विप्रा महाप्राज्ञा विद्वांसस्तीर्थतत्पराः।<br>स्वानुलोमायने तीर्थे विप्रास्त्रैलोक्यविश्रुते॥ ४७उस तीर्थमें केशोंका मुण्डन करानेसे मनुष्य अपने पापोंसे मुक्त हो जाता है। वहाँ स्वानुलोमायन नामका एक दूसरा महान् तीर्थ है। हे द्विजोत्तमो ! वहाँ तीर्थ-सेवन करनेमें तत्पर परमज्ञानी विद्वान् लोग रहते हैं। त्रिलोकविख्यात
१६०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३६
प्राणायामैर्निह॑रन्ति स्वलोमानि द्विजोत्तमाः।<br>पूतात्मानश्च ते विप्राः प्रयान्ति परमां गतिम्॥ ४८<br><br>दशाश्वमेधिकं चैव तत्र तीर्थं सुविश्रुतम्।<br>तत्र स्नात्वा भक्तियुक्तस्तदेव लभते फलम्॥ ४९<br><br>ततो गच्छेत श्रद्धावान् मानुषं लोकविश्रुतम्।<br>दर्शनात् तस्य तीर्थस्य मुक्तो भवति किल्बिषैः॥ ५०<br><br>पुरा कृष्णमृगास्तत्र व्याधेन शरपीडिताः।<br>विगाह्य तस्मिन् सरसि मानुषत्वमुपागताः॥ ५१<br><br>ततो व्याधाश्च ते सर्वे तानपृच्छन् द्विजोत्तमान्।<br>मृगा अनेन वै याता अस्माभिः शरपीडिताः॥ ५२<br><br>निमग्नास्ते सरः प्राप्य क्व ते याता द्विजोत्तमाः।<br>तेऽब्रुवंस्तत्र वै पृष्टा वयं ते च द्विजोत्तमाः॥ ५३<br><br>अस्य तीर्थस्य माहात्म्यान्मानुषत्वमुपागताः।<br>तस्माद् यूयं श्रद्दधानाः स्नात्वा तीर्थे विमत्सराः॥ ५४<br><br>सर्वपापविनिर्मुक्ता भविष्यथ न संशयः।<br>ततः स्नाताश्च ते सर्वे शुद्धदेहा दिवं गताः॥ ५५<br><br>एतत् तीर्थस्य माहात्म्यं मानुषस्य द्विजोत्तमाः।<br>ये शृण्वन्ति श्रद्दधानास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥ ५६उस तीर्थमें वे प्राणायामोंके द्वारा अपने लोमोंका परित्याग करते हैं और वे पवित्रात्मा विप्रगण परम गतिको प्राप्त करते हैं। वहींपर परम प्रसिद्ध दशाश्वमेधिक तीर्थ है। भक्तिपूर्वक उसमें स्नान करनेसे पूर्वोक्त फलकी ही प्राप्ति होती है। फिर श्रद्धालु मनुष्यको लोक-प्रसिद्ध मानुषतीर्थमें जाना चाहिये। उस तीर्थका दर्शन करनेसे ही पापोंसे मुक्ति हो जाती है॥४६—५०॥<br><br>पूर्वकालमें व्याधद्वारा बाणसे विद्ध कृष्णमृग (काला हरिण) उस सरोवरमें स्नानकर मनुष्यत्वको प्राप्त हुए थे। उसके बाद उन सभी व्याधोंने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे पूछा—द्विजोत्तमो! हमलोगोंद्वारा बाणसे पीडित मृग इस मार्गसे जाते हुए सरोवरमें निमग्न होकर कहाँ चले गये? उनके पूछनेपर उन्होंने उत्तर दिया—हम द्विजोत्तम वे (कृष्ण) मृग ही थे। इस तीर्थके माहात्म्यसे हम सब मनुष्य बन गये हैं। अतएव मत्सरसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक इस तीर्थमें स्नान करनेसे तुमलोग निःसंदेह समस्त पापोंसे विनिर्मुक्त हो जाओगे। फिर स्नान करनेसे शुद्ध-देह होकर वे सभी (व्याध) स्वर्ग चले गये। द्विजोत्तमो! जो श्रद्धापूर्वक मानुष तीर्थके इस माहात्म्यको सुनते हैं, वे भी परम गतिको प्राप्त करते हैं॥ ५१—५६॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३५॥


छत्तीसवाँ अध्याय

कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन

लोमहर्षण उवाच<br>मानुषस्य तु पूर्वेण क्रोशमात्रे द्विजोत्तमाः।<br>आपगा नाम विख्याता नदी द्विजिनषेविता॥ १<br>श्यामाकं पयसा सिद्धमाज्येन च परिप्लुतम्।<br>ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्तेषां पापं न विद्यते॥ २<br>ये तु श्राद्धं करिष्यन्ति प्राप्य तामापगां नदीम्।<br>ते सर्वकामसंयुक्ता भविष्यन्ति न संशयः॥ ३<br>शंसन्ति सर्वे पितरः स्मरन्ति च पितामहाः।<br>अस्माकं च कुले पुत्रः पौत्रो वापि भविष्यति॥ ४लोमहर्षण बोले— द्विजोत्तमो! मानुषतीर्थके पूर्व दिशामें एक कोसपर द्विजोंसे पूजित 'आपगा' नामकी एक विख्यात नदी है। वहाँ साँवाके चावलको दूधमें सिद्धकर और उसमें घी मिलाकर जो ब्राह्मणको देते हैं, उनके पाप नहीं रह जाते। जो व्यक्ति उस आपगा नदीके तटपर जाकर श्राद्ध करेंगे, वे निःसंदेह समस्त (शुभ) कामनाओंसे पूर्ण होंगे। सभी पितर कहते हैं तथा पितामह लोग स्मरण करते हैं कि हमारे कुलमें कोई

३९- कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन

अध्याय ३६ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन १६१ य आपगां नदीं गत्वा तिलैः संतर्पयिष्यति । तेन तृप्ता भविष्यामो यावत्कल्पशतं गतम् ॥ ५ नभस्ये मासि सम्प्राप्ते कृष्णपक्षे विशेषतः । चतुर्दश्यां तु मध्याह्ने पिण्डदो मुक्तिमाप्नुयात् ॥ ६ ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् । ब्रह्मोदुम्बरमित्येवं सर्वलोकेषु विश्रुतम् ॥ ७ तत्र ब्रह्मर्षिकुण्डेषु स्नातस्य द्विजसत्तमाः । सप्तर्षीणां प्रसादेन सप्तसोमफलं भवेत् ॥ ८ भरद्वाजो गौतमश्च जगदग्निश्च कश्यपः । विश्वामित्रो वसिष्ठश्च अत्रिश्च भगवानृषिः ॥ ९ एतैः समेत्य तत्कुण्डं कल्पितं भुवि दुर्लभम् । ब्रह्मणा सेवितं यस्माद् ब्रह्मोदुम्बरमुच्यते ॥ १० तस्मिंस्तीर्थवरे स्नातो ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । ब्रह्मलोकमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ११ देवान् पितॄन् समुद्दिश्य यो विप्रं भोजयिष्यति । पितरस्तस्य सुखिता दास्यन्ति भुवि दुर्लभम् ॥ १२ सप्तर्षींश्च समुद्दिश्य पृथक् स्नानं समाचरेत् । ऋणीणां च प्रसादेन सप्तलोकाधिपो भवेत् ॥ १३ कपिस्यलेति विख्यातं सर्वपातकनाशनम् । यस्मिन् स्थितः स्वयं देवो वृद्धकेदारसंज्ञितः ॥ १४ तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च रुद्रं दिण्डिसमन्वितम् । अन्तर्धानमवाप्नोति शिवलोके स मोदते ॥ १५ यस्तत्र तर्पणं कृत्वा पिबते चुलकत्रयम् । दिण्डिदेवं नमस्कृत्य केदारस्य फलं लभेत् ॥ १६ यस्तत्र कुरुते श्राद्धं शिवमुद्दिश्य मानवः । चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां प्राप्नोति परमं पदम् ॥ १७ कलस्यां तु ततो गच्छेद यत्र देवी स्वयं स्थिता । दुर्गा कात्यायनी भद्रा निद्रा माया सनातनी ॥ १८ कलस्यां च नरः स्नात्वा दृष्ट्वा दुर्गां तटे स्थिताम् । संसारगहनं दुर्गं निस्तरेन्नात्र संशयः ॥ १९ ऐसा पुत्र या पौत्र उत्पन्न होगा, जो आपगा नदीके तटपर जाकर तिलसे तर्पण करेगा, जिससे हम सभी सैकड़ों कल्पतक (अनन्त कालतक) तृप्त रहेंगे ॥ १-५ ॥ भाद्रपदके महीनेमें, विशेषकर कृष्णपक्षमें, चतुर्दशी तिथिको मध्याह्न कालमें पिण्डदान करनेवाला मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है। विप्रवरो ! उसके बाद समस्त लोकोंमें 'ब्रह्मोदुम्बर' नामसे प्रसिद्ध ब्रह्माके श्रेष्ठ स्थानमें जाना चाहिये। द्विजवरो ! वहाँ ब्रह्मर्षिकुण्डमें स्नान करनेवाले व्यक्तिको सप्तर्षियोंकी कृपासे सात सोमयज्ञोंका फल प्राप्त होता है। भरद्वाज, गौतम, जमदग्नि, कश्यप, विश्वामित्र, वसिष्ठ एवं भगवान् अत्रि (-इन सात) ऋषियोंने मिलकर पृथ्वीमें दुर्लभ इस कुण्डको बनाया था। ब्रह्माद्वारा सेवित होनेके कारण यह स्थान 'ब्रह्मोदुम्बर' कहलाता है ॥ ६-१० ॥ अव्यक्त जन्मवाले ब्रह्माके उस श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है- इसमें कोई संदेहकी बात नहीं है। जो मनुष्य वहाँ देवताओं और पितरोंके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको भोजन करायेगा, उसके पितर सुखी होकर उसे संसारमें दुर्लभ वस्तु प्रदान करेंगे। सात ऋषियोंके उद्देश्यसे जो (व्यक्ति) अलगसे स्नान करेगा, वह ऋषियोंके अनुग्रहसे सात लोकोंका स्वामी होगा। वहाँ सभी पापोंका विनाश करनेवाला विख्यात कपिस्थल नामक तीर्थ है, जहाँ वृद्धकेदार नामके देव स्वयं विद्यमान हैं। वहाँ स्नान करनेके बाद दिण्डिके साथ रुद्रदेवका अर्चन करनेसे मनुष्यको अन्तर्धानकी शक्ति प्राप्त होती है और वह शिवलोकमें आनन्द प्राप्त करता है ॥ ११-१५ ॥ जो व्यक्ति उस स्थानपर तर्पण करके दिण्डि भगवान्को प्रणाम कर तीन चुल्लू जल पीता है, वह केदार्तीर्थमें जानेका फल प्राप्त करता है। जो व्यक्ति वहाँ शिवजीके उद्देश्यसे चैत्र शुक्ला चतुर्दशी तिथिमें श्राद्ध करता है, वह परम पद (मोक्ष) -को प्राप्त कर लेता है। उसके बाद कलसी नामके तीर्थमें जाना चाहिये जहाँ भद्रा, निद्रा, माया, सनातनी, कात्यायनीरूपा दुर्गादेवी स्वयं अवस्थित हैं। कलसी तीर्थमें स्नानकर उसके तीरपर स्थित दुर्गादेवीका दर्शन करनेवाला मनुष्य दुस्तर संसार- दुर्ग (सांसारिक भवबन्धन) -को पार कर जाता है। इसमें (तनिक भी) संदेह नहीं करना चाहिये ॥ १६-१९ ॥

१६२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३६ ततो गच्छेत सरकं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम्। दुर्गदेवीके दर्शनके बाद तीनों लोकोंमें दुर्लभ कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् ॥ २० सरकतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको माहेश्वरदेवका दर्शन करके मनुष्य (अपने) लभते सर्वकामांश्च शिवलोकं स गच्छति । सभी मनोरथोंको प्राप्त करता और (अन्तमें) शिवलोकमें तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां सरके द्विजसत्तमाः ॥ २१ चला जाता है। द्विजश्रेष्ठो! सरकतीर्थमें तीन करोड़ तीर्थ विद्यमान हैं। सरके बीच कूपमें रुद्रकोटि स्थित रुद्रकोटिस्तथा कूपे सरोमध्ये व्यवस्थिता। है। उस सरमें यदि व्यक्ति स्नान कर रुद्रकोटिका तस्मिन् सरे च यः स्नात्वा रुद्रकोटिं स्मरेन्नरः ॥ २२ स्मरण करता है तो निःसंदेह (उसके द्वारा) रुद्रकोटि पूजिता रुद्रकोटिश्च भविष्यति न संशयः। पूजित हो जाते हैं और रुद्रोंके प्रसादसे वह व्यक्ति रुद्राणां च प्रसादेन सर्वदोषविवर्जितः ॥ २३ समस्त दोषोंसे छूट जाता है। वह इन्द्रसम्बन्धी ज्ञानसे पूरित होकर परम पदको प्राप्त कर लेता है। वहीं ऐन्द्रज्ञानेन संयुक्तः परं पदमवाप्नुयात्। पापों और भयोंका दूर करनेवाला इडास्पद नामका इडास्पदं च तत्रैव तीर्थ पापभयापहम्॥ २४ तीर्थ वर्तमान है॥ २०–२४॥ अस्मिन् मुक्तिमवाप्नोति दर्शनादेव मानवः। इस इडास्पद नामके तीर्थके दर्शनसे ही मनुष्य तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च पितृदेवगणानपि ॥ २५ मुक्तिको प्राप्त कर लेता है। वहाँ स्नान करके पितरों एवं देवोंका पूजन करनेसे मनुष्यकी दुर्गति नहीं होती और न दुर्गतिमवाप्नोति मनसा चिन्तितं लभेत्। उसे मनोवाञ्छित वस्तु प्राप्त होती है। सभी पापोंका केदारं च महातीर्थं सर्वकल्मषनाशनम् ॥ २६ विनाश करनेवाला केदार नामक महातीर्थ है। वहाँ जाकर स्नान करनेसे मनुष्यको सभी प्रकारके दानोंका तत्र स्नात्वा तु पुरुषः सर्वदानफलं लभेत्। फल प्राप्त होता है। वहींपर पृथ्वीमें दुर्लभ किंरूप किंरूपं च महातीर्थं तत्रैव भुवि दुर्लभम्। नामका (भी) तीर्थ है। उसमें स्नान करनेवाले मनुष्यको तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषः सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ २७ सभी प्रकारके यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। सरकके सरकस्य तु पूर्वेण तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्। पूर्वमें तीनों लोकोंमें सुप्रसिद्ध सम्पूर्ण पापोंका विनाश अन्यजन्म सुविख्यातं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २८ करनेवाला अन्यजन्म नामका तीर्थ है॥ २५-२८॥ नारसिंहं वपुः कृत्वा हत्वा दानवमूर्जितम्। नरसिंहका शरीर धारण कर शक्तिशाली दानव तिर्यग्योनौ स्थितो विष्णुः सिंहैषु रतिमाप्नुवन् ॥ २९ (हिरण्याक्ष)-का वध करनेके बाद विष्णु पशुयोनिमें स्थित सिंहोंमें प्रेम करने लगे। उसके बाद गन्धर्वोंके ततो देवाः सगन्धर्वा आराध्य वरदं शिवम्। साथ सभी देवताओंने वरदाता शिवकी आराधना कर ऊचुः प्रणतसर्वाङ्गा विष्णुदेहस्य लम्भने ॥ ३० साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुए विष्णुसे पुनः स्वदेह (स्वरूप) ततो देवो महात्माऽसौ शारभं रूपमास्थितः । धारण करनेकी प्रार्थना की। उसके बाद (फिर) युद्धं च कारयामास दिव्यं वर्षसहस्रकम्। महादेवने शरभ (सिंहोंसे भी बलवान् पशु-विशेष)-का युध्यमानौ तु तौ देवौ पतितौ सरमध्यतः ॥ ३१ रूप धारण करके (नरसिंहसे) हजारों दिव्य वर्षोंतक युद्ध किया-कराया। दोनों देवता (आपसमें) युद्ध करते तस्मिन् सरस्तटे विप्रो देवर्षिर्नारदः स्थितः । हुए सरोवरमें गिर पड़े। उस सरोवरके तीरपर (स्थित) अश्वत्थवृक्षमाश्रित्य ध्यानस्थस्तौ ददर्श ह ॥ ३२ अश्वत्थ (पीपल)-वृक्षके नीचे देवर्षि नारद ध्यान लगाये

अध्याय ३६ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन १६३ विष्णुश्चतुर्भुजो जज्ञे लिङ्गाकारः शिवः स्थितः । तौ दृष्ट्वा तत्र पुरुषौ तुष्टाव भक्तिभावितः ॥ ३३ नमः शिवाय देवाय विष्णवे प्रभविष्णवे । हरये च उमाभर्त्रे स्थितिकालभृते नमः ॥ ३४ हराय बहुरूपाय विश्वरूपाय विष्णवे । त्र्यम्बकाय सुसिद्धाय कृष्णाय ज्ञानहेतवे ॥ ३५ धन्योऽहं सुकृती नित्यं यद् दृष्टौ पुरुषोत्तमौ । ममाश्रममिदं पुण्यं युवाभ्यां विमलीकृतम् । अद्यप्रभृति त्रैलोक्ये अन्यजन्मेति विश्रुतम् ॥ ३६ य इहागत्य स्नात्वा च पितॄन् संतर्पयिष्यति । तस्य श्रद्धान्वितस्येह ज्ञानमैन्द्रं भविष्यति ॥ ३७ अश्वत्थस्य तु यन्मूलं सदा तत्र वसाम्यहम् । अश्वत्थवन्दनं कृत्वा यमं रौद्रं न पश्यति ॥ ३८ ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा नागस्य ह्रदमुत्तमम् । पौण्डरीके नरः स्नात्वा पुण्डरीकफलं लभेत् ॥ ३९ दशम्यां शुक्लपक्षस्य चैत्रस्य तु विशेषतः । स्नानं जपं तथा श्राद्धं मुक्तिमार्गप्रदायकम् ॥ ४० ततस्त्रिविष्टपं गच्छेत् तीर्थं देवनिषेवितम् । तत्र वैतरणी पुण्या नदी पापप्रमोचनी ॥ ४१ तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च शूलपाणिं वृषध्वजम् । सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छत्येव परां गतिम् ॥ ४२ ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा रसावर्त्तमनुत्तमम् । तत्र स्नात्वा भक्तियुक्तः सिद्धिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥ ४३ बैठे थे। उन्होंने उन दोनोंको देखा। (फिर तो) विष्णु चतुर्भुजरूपमें और शिव लिङ्गरूपमें (परिवर्तित) हो गये। उन दोनों पुरुषों (देवों)-को देखकर उन्होंने भक्तिभावसे उनकी स्तुति की ॥ २९-३३ ॥ [ नारदजीने स्तुति की ] - देवाधिदेव शिवको नमस्कार है। प्रभावशाली विष्णुको नमस्कार है। स्थिति (प्रजापालन) करनेवाले श्रीहरिको नमस्कार है। संहारके आधारभूत उमापति भगवान् शिवको नमस्कार है। बहुरूपधारी शङ्करजी एवं विश्वरूपधारी (विश्वात्मा) विष्णुको नमस्कार है। परमसिद्ध (योगीश्वर) शङ्कर एवं ज्ञानके मूल कारण भगवान् कृष्णको नमस्कार है। मैं धन्य तथा सदा पुण्यवान् हूँ; क्योंकि मुझे (आज) आप दोनों (श्रेष्ठ) पुरुषों (देवों)-के दर्शन प्राप्त हुए। आप दोनों पुरुषोंद्वारा पवित्र किया गया मेरा यह आश्रम पुण्यमय हो गया। आजसे तीनों लोकोंमें यह 'अन्यजन्म' नामसे प्रसिद्ध हो जायगा। जो व्यक्ति यहाँ आकर इस तीर्थमें स्नान कर अपने पितरोंका तर्पण करेगा श्रद्धासे सम्पन्न उस पुरुषको यहाँ इन्द्र-सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त हो जायगा ॥ ३४-३७ ॥ मैं पीपल वृक्षके मूलमें सदा निवास करूँगा। उस अश्वत्थ (पीपल वृक्ष) -को प्रणाम करनेवाला व्यक्ति भयंकर यमराजको नहीं देखेगा। श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! उसके बाद (उस तीर्थसेवीको) उत्तम नागह्रदमें जाना चाहिये। पौण्डरीकमें स्नान करके मनुष्य पुण्डरीक (एक प्रकारके यज्ञ)-का फल प्राप्त करता है। शुक्लपक्षकी दशमी, विशेषकर चैत्रमासकी (शुक्ला) दशमी तिथिमें वहाँ किया गया स्नान, जप और श्राद्ध मोक्षपथकी प्राप्ति करानेवाला होता है। पुण्डरीकमें स्नान करनेके बाद देवताओंद्वारा पूजित 'त्रिविष्टप' नामक तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ पापोंसे विमुक्त करनेवाली पवित्र वैतरणी नदी है। वहाँ स्नानकर शूलपाणि वृषध्वज (शिव)-की पूजा कर मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा विशुद्ध होकर निश्चय ही परमगतिको प्राप्त कर लेता है ॥ ३८-४२ ॥ विप्रश्रेष्ठो ! तत्पश्चात् सर्वश्रेष्ठ रसावर्त (तीर्थ)-में जाना चाहिये। वहाँ भक्तिसहित स्नान करनेवाला सर्वश्रेष्ठ

४०- वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति-प्रसङ्ग

१६४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३६
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां तीर्थे स्नात्वा ह्यलेपके।<br>पूजयित्वा शिवं तत्र पापलेपो न विद्यते॥ ४४<br><br>ततो गच्छेत विप्रेन्द्राः फलकीवनमुत्तमम्।<br>यत्र देवाः सगन्धर्वाः साध्याश्च ऋषयः स्थिताः।<br>तपश्चरन्ति विपुलं दिव्यं वर्षसहस्रकम्॥ ४५<br><br>दृषद्वत्यां नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः।<br>अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति मानवः॥ ४६सिद्धि (मुक्ति) प्राप्त करता है। चैत्रमासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशी (चौदस) तिथिको 'अलेपक' नामक तीर्थमें स्नान कर वहाँ शिवकी पूजा करनेसे पापसे लिप्त नहीं होता—पाप दूर भाग जाता है। विप्रवरो! वहाँसे उत्तम फलकीवनमें जाना चाहिये। वहाँ देवता, गन्धर्व, साध्य और ऋषिलोग रहते हैं एवं दिव्य सहस्र वर्षोंतक बहुत तप करते हैं। दृषद्वती (कग्गर) नदीमें स्नानकर देवताओंका तर्पण करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम और अतिरात्र नामक यज्ञोंसे मिलनेवाले फलको प्राप्त करता है॥ ४३—४६॥
सोमक्षये च सम्प्राप्ते सोमस्य च दिने तथा।<br>यः श्राद्धं कुरुते मर्त्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु॥ ४७<br><br>गयायां च यथा श्राद्धं पितॄन् प्रीणाति नित्यशः।<br>तथा श्राद्धं च कर्तव्यं फलकीवनमाश्रितैः॥ ४८<br><br>मनसा स्मरते यस्तु फलकीवनमुत्तमम्।<br>तस्यापि पितरस्तृप्तिं प्रयास्यन्ति न संशयः॥ ४९<br><br>तत्रापि तीर्थं सुमहत् सर्वदेवैरलंकृतम्।<br>तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो गोसहस्रफलं लभेत्॥ ५०<br><br>पाणिखाते नरः स्नात्वा पितॄन् संतर्प्य मानवः।<br>अवाप्नुयाद् राजसूयं सांख्यं योगं च विन्दति॥ ५१सोमवारके दिन चन्द्रमाके क्षीण हो जानेपर अर्थात् सोमवती अमावास्याको जो मनुष्य श्राद्ध करता है, उसका पुण्यफल सुनो। जैसे गया-क्षेत्रमें किया गया श्राद्ध पितरोंको नित्य तृप्त करता है, वैसे ही फलकीवनमें रहनेवालोंको श्राद्ध करनेसे पितरोंको तृप्ति होती है। जो मनुष्य मनसे फलकीवनका स्मरण करता है, उसके भी पितर निःसंदेह तृप्ति प्राप्त करते हैं। वहीं सभी देवोंसे सुशोभित एक 'सुमहत्' तीर्थ है; उसमें स्नान करनेवाला पुरुष हजारों गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। मानव पाणिखात तीर्थमें स्नान करके एवं पितरोंका तर्पण कर राजसूय-यज्ञ तथा सांख्य (ज्ञान) और योग (कर्म)-के अनुष्ठान करनेसे होनेवाले फलको प्राप्त करता है॥ ४७—५१॥
ततो गच्छेत सुमहत्तीर्थं मिश्रकमुत्तमम्।<br>तत्र तीर्थानि मुनिना मिश्रितानि महात्मना॥ ५२<br><br>व्यासेन मुनिशार्दूला दधीच्यर्थं महात्मना।<br>सर्वतीर्थेषु स स्नाति मिश्रके स्नाति यो नरः॥ ५३<br><br>ततो व्यासवनं गच्छेद्व्रियतो नियताशनः।<br>मनोजवे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवमणिं शिवम्॥ ५४<br><br>मनसा चिन्तितं सर्वं सिध्यते नात्र संशयः।<br>गत्वा मधुवटीं चैव देव्यास्तीर्थं नरः शुचिः॥ ५५<br><br>तत्र स्नात्वाऽर्चयेद् देवान् पितॄंश्च प्रयतो नरः।<br>स देव्या समनुज्ञातो यथा सिद्धिं लभेन्नरः॥ ५६पाणिखातके बाद 'मिश्रक' नामक महान् एवं श्रेष्ठ तीर्थमें जाना चाहिये। मुनिश्रेष्ठो! वहाँ महात्मा व्यासदेवने दधीचिऋषिके हेतु तीर्थोंको एकमें मिश्रित किया था। इस मिश्रकतीर्थमें स्नान कर लेनेवाला मनुष्य (मानो) सभी तीर्थोंमें स्नान कर लेता है। फिर संयमशील तथा नियमित आहार करनेवाला होकर व्यासवनमें जाना चाहिये। 'मनोजव' तीर्थमें स्नानकर 'देवमणि' शङ्करका दर्शन करनेसे मनुष्यको अभीष्ट-सिद्धिकी प्राप्ति होती है—इसमें संदेह नहीं। मनुष्यको देवीके मधुवटी नामक तीर्थमें जाकर स्नान करके संयत होकर देवों एवं पितरोंकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला व्यक्ति देवीकी आज्ञासे (जैसी चाहता है, वैसी) सिद्धि प्राप्त कर लेता है॥ ५२—५६॥
कौशिक्याः संगमे यस्तु दृषद्वत्यां नरोत्तमः।<br>स्नायीत नियताहारः सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ५७जो मनुष्य 'कौशिकी' और 'दृषद्वती' (कग्गर) नदियोंके संगममें स्नान करता और नियत भोजन करता है, वह श्रेष्ठ पुरुष सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।

| अध्याय ३६ ] | कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन | १६५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततो व्यासस्थली नाम यत्र व्यासेन धीमता।<br>पुत्रशोकाभिभूतेन देहत्यागाय निश्चयः ॥ ५८<br><br>कृतो देवैश्च विप्रेन्द्राः पुनरुत्थापितस्तदा।<br>अभिगम्य स्थलीं तस्य पुत्रशोकं न विन्दति ॥ ५९<br><br>किंदत्तं कूपमासाद्य तिलप्रस्थं प्रदाय च।<br>गच्छेत परमां सिद्धिं ऋणैर्मुक्तिमवाप्नुयात् ॥ ६०<br><br>अहं च सुदिनं चैव द्वे तीर्थे भुवि दुर्लभे।<br>तयोः स्नात्वा विशुद्धात्मा सूर्यलोकमवाप्नुयात् ॥ ६१श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! 'व्यासस्थली' नामका एक स्थान है, जहाँ पुत्रशोकसे दुःखी होकर वेदव्यासने अपने शरीरत्यागका निश्चय कर लिया था, पर देवोंने उन्हें पुनः सँभाल लिया। उसके बाद उस भूमिमें जानेवाले मनुष्यको पुत्रशोक नहीं होता। 'किंदत्त कूप'में जाकर एक पसर (तौलका एक परिमाण) तिलका दान करनेसे मनुष्य परमसिद्धि और ऋणसे मुक्ति प्राप्त करता है। 'अह' एवं 'सुदिन' नामक ये दो तीर्थ पृथ्वीमें दुर्लभ हैं। इन दोनोंमें स्नान करनेसे मनुष्य विशुद्धात्मा होकर सूर्यलोकको प्राप्त करता है॥ ५७—६१॥
कृतजप्यं ततो गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>तत्राभिषेकं कुर्वीत गङ्गायां प्रयतः स्थितः ॥ ६२<br><br>अर्चयित्वा महादेवमश्वमेधफलं लभेत्।<br>कोटितीर्थं च तत्रैव दृष्ट्वा कोटीश्वरं प्रभुम् ॥ ६३<br><br>तत्र स्नात्वा श्रद्धधानः कोटियज्ञफलं लभेत्।<br>ततो वामनकं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ६४<br><br>यत्र वामनरूपेण विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>बलेरपहृतं राज्यमिन्द्राय प्रतिपादितम् ॥ ६५उसके बाद तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध 'कृतजप्य' नामके तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ नियमपूर्वक संयत रहते हुए गङ्गामें स्नान करना चाहिये। वहाँपर महादेवका पूजन करनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। वहींपर कोटितीर्थ स्थित है। वहाँ श्रद्धापूर्वक स्नानकर 'कोटीश्वर' नाथका दर्शन करनेसे मनुष्य कोटि यज्ञोंका फल प्राप्त कर लेता है। उसके बाद तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध 'वामनक' तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ प्रभावशाली विष्णुने वामनरूप धारणकर बलिको राज्य छीन कर इन्द्रको दे दिया था॥ ६२—६५॥
तत्र विष्णुपदे स्नात्वा अर्चयित्वा च वामनम्।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥ ६६<br><br>ज्येष्ठाश्रमं च तत्रैव सर्वपातकनाशनम्।<br>तं तु दृष्ट्वा नरो मुक्तिं संप्रयाति न संशयः ॥ ६७<br><br>ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे एकादश्यामुपोषितः।<br>द्वादश्यां च नरः स्नात्वा ज्येष्ठत्वं लभते नृषु ॥ ६८<br><br>तत्र प्रतिष्ठिता विप्रा विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>दीक्षाप्रतिष्ठासंयुक्ता विष्णुप्रीणनतत्पराः ॥ ६९वहाँ 'विष्णुपद' तीर्थमें स्नान कर वामनदेवकी पूजा कर समस्त पापोंसे शुद्ध होकर (छूटकर) मनुष्य विष्णुके लोकको प्राप्त कर लेता है। वहींपर सभी पापोंको नष्ट करनेवाला ज्येष्ठाश्रम नामका तीर्थ है, उसका दर्शन कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है—इसमें संदेह नहीं। ज्येष्ठ महीनेके शुक्लपक्षकी एकादशी तिथिको उपवास कर द्वादशी तिथिके दिन स्नानकर मानव मनुष्योंमें श्रेष्ठता (बड़प्पन) प्राप्त करता है। वहाँ (सर्वाधिक) प्रभावशाली विष्णुभगवान्‌ने यज्ञादिमें दीक्षित (लगे हुए), प्रतिष्ठित एवं सम्मान्य तथा विष्णु-भगवान्‌की आराधनामें परायण ब्राह्मणोंको सम्मानित किया था॥ ६६—६९॥
तेभ्यो दत्तानि श्राद्धानि दानानि विविधानि च।<br>अक्षयाणि भविष्यन्ति यावन्मन्वन्तरस्थितिः ॥ ७०<br><br>तत्रैव कोटितीर्थं च त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा कोटियज्ञफलं लभेत् ॥ ७१उन्हें दिये गये (पात्रक) श्राद्ध और अनेक प्रकारके दान अक्षय एवं मन्वन्तरतक स्थिर रहते हैं। वहीं तीनों लोकोंमें विख्यात 'कोटितीर्थ' है। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य करोड़ों यज्ञोंके फल प्राप्त करता है।

१६६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३७ कोटिश्वरं नरो दृष्ट्वा तस्मिंस्तीर्थे महेश्वरम् । महादेवप्रसादेन गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥ ७२ तत्रैव सुमहत् तीर्थं सूर्यस्य च महात्मनः । तस्मिन् स्नात्वा भक्तियुक्तः सूर्यलोके महीयते ॥ ७३ ततो गच्छेत विप्रेन्द्रास्तीर्थं कल्मषनाशनम् । कुलोत्तारणनामानं विष्णुना कल्पितं पुरा ॥ ७४ वर्णानामाश्रमाणां च तारणाय सुनिर्मलम् । ब्रह्मचर्यात्परं मोक्षं य इच्छन्ति सुनिर्मलम् । तेऽपि तत्तीर्थमासाद्य पश्यन्ति परमं पदम् ॥ ७५ ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा । कुलानि तारयेत् स्नातः सप्त सप्त च सप्त च ॥ ७६ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा ये तत्परायणाः । स्नाता भक्तियुताः सर्वे पश्यन्ति परमं पदम् ॥ ७७ दूरस्थोऽपि स्मरेद् यस्तु कुरुक्षेत्रं सवामनम् । सोऽपि मुक्तिमवाप्नोति किं पुनर्निवसन्नरः ॥ ७८ उस तीर्थमें 'कोटिश्वर' महादेवका दर्शन कर मनुष्य उन महादेवकी कृपासे गाणपत्य पद (गणनायक्त्वकी उपाधि) प्राप्त करता है। और वहीं महात्मा सूर्यदेवका महान् तीर्थ है। उसमें भक्तिपूर्वक स्नानकर मनुष्य सूर्यलोकमें महान् माना जाता है॥ ७०-७३॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणो! कोटि तीर्थके बाद पापका नाश करनेवाले 'कुलोत्तारण तीर्थ' में जाना चाहिये, जिसे प्राचीनकालमें विष्णुने वर्णाश्रम-धर्मका पालन करनेवाले मनुष्योंको तारनेके लिये बनाया था। जो मनुष्य ब्रह्मचर्यव्रतसे विशुद्ध मुक्तिकी इच्छा करते हैं ऐसे लोग भी उस तीर्थमें जाकर परम पदका दर्शन कर लेते हैं। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी और संन्यासी वहाँ स्नानकर अपने कुलके (७+७+७=२१) इक्कीस पूर्व पुरुषोंका उद्धार कर देते हैं। जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र उस तीर्थमें तीर्थपरायण होकर एवं भक्तिसे स्नान करते हैं, वे सभी परम पदका दर्शन करते हैं। और जो दूर रहता हुआ भी वामनसहित कुरुक्षेत्रका स्मरण करता है, वह भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है; फिर वहाँ निवास करनेवालेका तो कहना ही क्या? ॥ ७४-७८॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३६ ॥ सैंतीसवाँ अध्याय कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य और क्रमका पूर्वानुक्रान्त वर्णन लोमहर्षण उवाच पवनस्य हृदे स्नात्वा दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् । विमुक्तः कलुषैः सर्वैः शैवं पदमवाप्नुयात् ॥ १ पुत्रशोकेन पवनो यस्मिंल्लीनो बभूव ह । ततः सब्रह्मकैर्देवैः प्रसाद्य प्रकटीकृतः ॥ २ अतो गच्छेत अमृतं स्थानं तच्छूलपाणिनः । यत्र देवैः सगन्धर्वैः हनुमान् प्रकटीकृतः ॥ ३ लोमहर्षण बोले- पवनके हृदमें, पुत्र (हनुमान्जी)- के शोकके कारण जिस सरोवरमें पवन लीन हो गये थे, उसमें स्नान करके महेश्वरदेवका दर्शन कर मनुष्य समस्त पापोंसे विमुक्त हो शिवपदको प्राप्त करता है। उसके बाद ब्रह्माके साथ सभी देवोंने मिलकर उन्हें प्रसन्न एवं प्रत्यक्ष प्रकट किया। यहाँसे शूलपाणि (भगवान् शंकर)- के अमृत नामक स्थानमें जाना चाहिये, जहाँ गन्धर्वोंके साथ देवताओंने हनुमान्जीको प्रकट किया था।

अध्याय ३७ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य और क्रमका पूर्वानुक्रान्त वर्णन १६७ तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा अमृतत्वमवाप्नुयात्। कुलोत्तारणमासाद्य तीर्थसेवी द्विजोत्तमः ॥ ४ कुलानि तारयेत् सर्वान् मातामहपितामहान्। शालिहोत्रस्य राजर्षेस्तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ ५ तत्र स्नात्वा विमुक्तस्तु कलुषैर्देहसंभवैः । श्रीकुञ्जं तु सरस्वत्यां तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ ६ तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या अग्निष्टोमफलं लभेत् । ततो नैमिषकुञ्जं तु समासाद्य नरः शुचिः ॥ ७ नैमिषस्य च स्नानेन यत् पुण्यं तत् समाप्नुयात् । तत्र तीर्थं महाख्यातं वेदवत्या निषेवितम् ॥ ८ रावणेन गृहीतायाः केशेषु द्विजसत्तमाः। तद्ध्याय च सा प्राणान् मुमुचे शोककर्शिता ॥ ९ ततो जाता गृहे राज्ञो जनकस्य महात्मनः। सीता नामेति विख्याता रामपत्नी पतिव्रता ॥ १० सा हृता रावणेनेह विनाशाय आत्मनः स्वयम्। रामेण रावणं हत्वा अभिषिच्य विभीषणम् ॥ ११ समानीता गृहं सीता कीर्तिरात्मवता यथा। तस्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा कन्यायज्ञफलं लभेत् ॥ १२ विमुक्तः कलुषैः सर्वैः प्राप्नोति परं पदम्। ततो गच्छेत सुमहद् ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् ॥ १३ यत्र वर्णावरः स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते नरः। ब्राह्मणश्च विशुद्धात्मा परं पदमवाप्नुयात् ॥ १४ ततो गच्छेत सोमस्य तीर्थं त्रैलोक्यदुर्लभम् । यत्र सोमस्तपस्तप्त्वा द्विजराज्यमवाप्नुयात् ॥ १५ तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च स्वपितॄन् दैवतानि च । निर्मलः स्वर्गमायाति कार्तिकां चन्द्रमा यथा ॥ १६ उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य अमृतपदको पा लेता है। नियमानुसार तीर्थका सेवन करनेवाला श्रेष्ठ ब्राह्मण 'कुलोत्तारण' तीर्थमें जाकर अपने मातामह और पितामहके समस्त वंशोंका उद्धार कर देता है। तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध राजर्षि शालिहोत्रके तीर्थमें स्नान कर मुक्त हो मनुष्य शारीरिक पापोंसे सर्वथा छूट जाता है। सरस्वती-क्षेत्रमें तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध श्रीकुञ्ज नामक तीर्थ है। उसमें भक्तिपूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त कर लेता है। मनुष्य वहाँसे नैमिषकुञ्जतीर्थमें जाकर पवित्र हो जाता है और नैमिषारण्यतीर्थमें स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, उसे प्राप्त कर लेता है। वहाँपर 'वेदवती' से निषेवित बहुत प्रसिद्ध तीर्थ है ॥ १-८ ॥ द्विजश्रेष्ठो ! रावणके द्वारा अपने केशके पकड़े जानेपर शोकसे संतप्त होकर (वेदवतीने) उसके (रावणके) वधके लिये अपने प्राणोंको छोड़ दिया था और उसके बाद महात्मा राजा जनकके घरमें वे उत्पन्न हुईं और उनका नाम 'सीता' विख्यात हुआ तथा वे रामकी पतिव्रता पत्नी हुईं। उस सीताको रावणने स्वयं अपने विनाशके लिये अपहृत कर लिया। सीताके अपहरण हो जानेपर राम-रावण-युद्ध हुआ, जिसमें रावणको मारनेके बाद विभीषणको (लङ्काके राज्यपर) अभिषिक्त कर राम सीताको वैसे ही घर लौटा लाये, जैसे आत्मवान् (जितेन्द्रिय) पुरुष कीर्तिको प्राप्त करता है। उनके तीर्थमें स्नान कर मनुष्य कन्यायज्ञ (कन्यादान)- का फल एवं समस्त पापोंसे मुक्त होकर परम पदको प्राप्त करता है। उस वेदवतीतीर्थके बाद ब्रह्माके उत्तम और महान् स्थानमें जाना चाहिये, जहाँ स्नान करनेसे अवर-वर्णका व्यक्ति (जन्मान्तरमें) ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेता है और ब्राह्मण विशुद्ध अन्तःकरणवाला होकर परम पदकी प्राप्ति करता है ॥ ९-१४ ॥ उस ब्रह्माके तीर्थस्थलपर जानेके बाद तीनों लोकोंमें दुर्लभ 'सोमतीर्थ' में जाना चाहिये, जहाँ चन्द्रमाने तपस्या करके द्विजराजत्व-पदको प्राप्त किया था। वहाँ स्नानकर अपने पितरों और देवताओंकी पूजा करनेसे मनुष्य कार्तिककी पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान निर्मल

४१- कुरुक्षेत्रके तीर्थों—शतसाहस्रिक, शांतिक, रेणुका, ऋणमोचन, ओजस, संनिहति, प्राची सरस्वती, पञ्चवट, कुरुतीर्थ, अनरकतीर्थ, काम्यकवन आदिका वर्णन

१६८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३७

| सप्तसारस्वतं तीर्थं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम्।<br>यत्र सप्त सरस्वत्य एकीभूता वहन्ति च॥ १७<br><br>सुप्रभा काञ्चनाक्षी च विशाला मानसह्नदा।<br>सरस्वत्योधनामा च सुरेणुर्विमलोदका॥ १८ | होकर स्वर्गको प्राप्त कर लेता है। तीनों लोकोंमें दुर्लभ 'सप्तसारस्वत' नामक एक तीर्थ है, जहाँ सुप्रभा, काञ्चनाक्षी, विशाला, मानसह्नदा, सरस्वती, ओघवती, विमलोदका एवं सुरेणु नामकी सातों सरस्वतियाँ (नदियाँ) एकत्र मिलकर प्रवाहित होती हैं॥ १५–१८॥ | | पितामहस्य यजतः पुष्करेषु स्थितस्य ह।<br>अब्रुवन् ऋषयः सर्वे नाऽयं यज्ञो महाफलः॥ १९<br><br>न दृश्यते सरिच्छ्रेष्ठा यस्मादिह सरस्वती।<br>तच्छ्रुत्वा भगवान् प्रीतः सस्माराथ सरस्वतीम्॥ २०<br><br>पितामहेन यजता आहूता पुष्करेषु वै।<br>सुप्रभा नाम सा देवी तत्र ख्याता सरस्वती॥ २१<br><br>तां दृष्ट्वा मुनयः प्रीता वेगयुक्तां सरस्वतीम्।<br>पितामहं मानयन्तीं ते तु तां बहु मेनिरे॥ २२ | पुष्करतीर्थमें स्थित ब्रह्माजीके यज्ञके अनुष्ठानमें लग जानेपर सभी ऋषियोंने उनसे कहा—आपका यह यज्ञ महाफलजनक नहीं होगा; क्योंकि यहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती (नदी) नहीं दिखलायी पड़ रही है। उसे सुनकर भगवान्ने प्रसन्नतापूर्वक सरस्वतीका स्मरण किया। पुष्करमें यज्ञ कर रहे ब्रह्माजीद्वारा आहूत की गयी 'सुप्रभा' नामकी देवी वहाँ सरस्वती नामसे प्रसिद्ध हुई। ब्रह्माजीका मान करनेवाली उस वेगवती सरस्वतीको देखकर मुनिजन प्रसन्न हो गये और उन सबोंने उनका अत्यधिक सम्मान किया॥ १९–२२॥ | | एवमेषा सरिच्छ्रेष्ठा पुष्करस्था सरस्वती।<br>समानीता कुरुक्षेत्रे मङ्कणेन महात्मना॥ २३<br><br>नैमिषे मुनयः स्थित्वा शौनकाद्यास्तपोधनाः।<br>ते पृच्छन्ति महात्मानं पौराणं लोमहर्षणम्॥ २४<br><br>कथं यज्ञफलोऽस्माकं वर्ततां सत्पथे भवेत्।<br>ततोऽब्रवीन्महाभागः प्रणम्य शिरसा ऋषीन्॥ २५<br><br>सरस्वती स्थिता यत्र तत्र यज्ञफलं महत्।<br>एतच्छ्रुत्वा तु मुनयो नानास्वाध्यायवेदिनः॥ २६<br><br>समागम्‍य ततः सर्वे सस्मरुस्ते सरस्वतीम्।<br>सा तु ध्याता ततस्तत्र ऋषिभिः सत्रयाजिभिः॥ २७<br><br>समागता प्लावनार्थं यज्ञे तेषां महात्मनाम्।<br>नैमिषे काञ्चनाक्षी तु स्मृता मङ्कणकेन सा॥ २८<br><br>समागता कुरुक्षेत्रं पुण्यतोया सरस्वती।<br>गयस्य यजमानस्य गयेष्वेव महाक्रतुम्॥ २९<br><br>आहूता च सरिच्छ्रेष्ठा गययज्ञे सरस्वती।<br>विशालां नाम तां प्राहुर्ऋषयः संशितव्रताः॥ ३० | इस प्रकार पुष्करतीर्थमें स्थित एवं नदियोंमें श्रेष्ठ इस सरस्वतीको महात्मा मङ्कण कुरुक्षेत्रमें लाये। एक समय नैमिषारण्यमें रहनेवाले तपस्याके धनी शौनक आदि मुनियोंने पुराणोंके ज्ञाता महात्मा लोमहर्षणसे पूछा—सत्पथगामी हमलोगोंको यज्ञका फल कैसे प्राप्त होगा? (—इसे कृपाकर समझाइये।) उसके बाद महानुभाव लोमहर्षणजीने ऋषियोंको सिरसे प्रणाम कर कहा कि ऋषियो! जहाँ सरस्वती नदी अवस्थित है, वहाँ (रहनेसे) यज्ञका महान् फल प्राप्त होता है। इसको सुनकर विविध वेदोंका स्वाध्याय करनेवाले मुनियोंने एकत्र होकर सरस्वतीका स्मरण किया। दीर्घकालिक यज्ञ करनेवाले उन ऋषियोंके ध्यान (स्मरण) करनेपर वे (सरस्वती) वहाँ नैमिषक्षेत्रमें उन महात्माओंके यज्ञमें प्लावन करनेके लिये काञ्चनाक्षी नामसे उपस्थित हो गयीं। वे ही प्रसिद्ध नदी मङ्कणके द्वारा स्मृत होनेपर पवित्र-सलिला सरस्वतीके रूपमें कुरुक्षेत्रमें (भी) आयीं और महान् व्रती ऋषियोंने गया-क्षेत्रमें महायज्ञका अनुष्ठान करनेवाले गयके यज्ञमें आहूत की गयी उन श्रेष्ठ सरस्वती नदीको 'विशाला'के नामसे स्मरण किया॥ २३–३०॥ | | सरित् सा हि समाहूता मङ्कणेन महात्मना।<br>कुरुक्षेत्रं समायाता प्रविष्टा च महानदी॥ ३१<br><br>उत्तरे कोशलाभागे पुण्ये देवर्षिसेविते।<br>उद्दालकेन मुनिना तत्र ध्याता सरस्वती॥ ३२ | महात्मा मङ्कण ऋषिद्वारा समाहूत की गयी वही नदी कुरुक्षेत्रमें आकर प्रवेश कर गयी। (फिर) उद्दालक मुनिने देवर्षियोंके द्वारा सेवित परम पवित्र उत्तरकोसल |

अध्याय ३८ ] मङ्कणक-प्रसङ्ग, मङ्कणकका शिवस्तवन और उनकी अनुकूलता प्राप्ति [ १६९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आजगाम सरिच्छ्रेष्ठा तं देशं मुनिकारणात्।<br>पूज्यमाना मुनिगणैर्वल्कलाजिनसंवृतैः॥ ३३<br>मनोहरेति विख्याता सर्वपापक्षयावहा।<br>आहूता सा कुरुक्षेत्रे मङ्कणेन महात्मना।<br>ऋषेः संमाननार्थाय प्रविष्टा तीर्थमुत्तमम्॥ ३४<br>सुवेणुरिति विख्याता केदारे या सरस्वती।<br>सर्वपापक्षया ज्ञेया ऋषिंसिद्धनिषेविता॥ ३५प्रदेशमें सरस्वतीका ध्यान किया। उन मुनिके कारण नदियोंमें श्रेष्ठ वह सरस्वती नदी उस देशमें आ गयी एवं वह वल्कल तथा मृगचर्मको धारण करनेवाले मुनियोंद्वारा पूजित हुई। तब सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाली वह ‘मनोहरा’ नामसे विख्यात हुई। फिर वह महात्मा मङ्कणद्वारा आहूत होकर ऋषिको सम्मानित करनेके लिये कुरुक्षेत्रके उत्तम तीर्थमें प्रविष्ट हुई। केदारतीर्थमें जो सरस्वती ‘सुवेणु’ नामसे प्रसिद्ध है, वह ऋषियों और सिद्धोंके द्वारा सेवित तथा सर्वपापनाशक रूपसे जानी जाती है॥ ३१—३५॥
सापि तेनेह मुनिना आराध्य परमेश्वरम्।<br>ऋषीणामुपकारार्थं कुरुक्षेत्रं प्रवेशिता॥ ३६<br>दक्षेण यजता सापि गङ्गाद्वारे सरस्वती।<br>विमलोदा भगवती दक्षेण प्रकटीकृता॥ ३७<br>समाहूता ययौ तत्र मङ्कणेन महात्मना।<br>कुरुक्षेत्रे तु कुरुणा यजिता च सरस्वती॥ ३८<br>सरोमध्ये समानीता मार्कण्डेयेन धीमता।<br>अभिष्टूय महाभागां पुण्यतोयां सरस्वतीम्॥ ३९<br>यत्र मङ्कणकः सिद्धः सप्तसारस्वते स्थितः।<br>नृत्यमानश्च देवेन शंकरेण निवारितः॥ ४०परमेश्वरकी आराधना कर उन मुनिने उसे (सुवेणुको) भी ऋषियोंका उपकार करनेके लिये इस कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित कराया। गङ्गाद्वारमें यज्ञ कर रहे दक्षने ‘विमलोदा’ नामसे भगवती सरस्वतीको प्रकट किया। कुरुक्षेत्रमें कुरुद्वारा पूजित सरस्वती मङ्कणद्वारा बुलायी जानेपर वहाँ गयी। फिर बुद्धिमान् मार्कण्डेयजी उस पवित्र जलवाली महाभागा सरस्वतीकी स्तुति कर उसे सरोवरके मध्यमें ले गये। वहीं सप्तसारस्वततीर्थमें उपस्थित एवं नृत्य करते हुए सिद्ध मङ्कणकको नृत्य करनेसे शंकरजीने रोका था॥ ३६—४०॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३७॥


अड़तीसवाँ अध्याय

मङ्कणक-प्रसङ्ग, मङ्कणकका शिवस्तवन और उनकी अनुकूलता प्राप्ति

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>कथं मङ्कणकः सिद्धः कस्माज्जातो महानृषिः।<br>नृत्यमानस्तु देवेन किमर्थं स निवारितः॥ १ऋषियोंने कहा—(प्रभो!) मङ्कणक किस प्रकार सिद्ध हुए? वे महान् ऋषि किससे उत्पन्न हुए थे? नृत्य करते हुए उन मङ्कणकको महादेवने क्यों रोका?॥ १॥
लोमहर्षण उवाच<br>कश्यपस्य सुतो जज्ञे मानसो मङ्कणो मुनिः।<br>स्नानं कर्तुं व्यवसितो गृहीत्वा वल्कलं द्विजः॥ २<br>तत्र गता ह्यप्सरसो रम्भाद्याः प्रियदर्शनाः।<br>स्नायन्ति रुचिराः स्निग्धास्तेन सार्धमनिन्दिताः॥ ३लोमहर्षणने कहा—(ऋषियो!) मङ्कणकमुनि महर्षि कश्यपके मानसपुत्र थे। (एक समय) वे ब्राह्मण देवता वल्कल-वस्त्र लेकर स्नान करने गये। वहाँ रम्भा आदि सुन्दरी अप्सराएँ भी गयी थीं। अनिन्द्य, कोमल एवं मनोहर (रूपवाली वे सभी) अप्सराएँ उनके साथ (ही)

४२- काम्यकवन तीर्थका प्रसङ्ग, सरस्वती नदीकी महिमा और तत्सम्बद्ध तीर्थोंका वर्णन

१७०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३८
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततो मुनेस्तदा क्षोभाद्रेतः स्कन्नं यदम्भसि।<br>तद्रेतः स तु जग्राह कलशे वै महातपाः॥ ४<br><br>सप्तधा प्रविभागं तु कलशस्थं जगाम ह।<br>तत्रर्षयः सप्त जाता विदुर्यान् मरुतां गणान्॥ ५<br><br>वायुवेगो वायुबलो वायुहा वायुमण्डलः।<br>वायुज्वालो वायुरेतो वायुचक्रश्च वीर्यवान्॥ ६<br><br>एते ह्यपत्यास्तस्यर्षेर्धारयन्ति चराचरम्।<br>पुरा मङ्कणकः सिद्धः कुशाग्रेणेति मे श्रुतम्॥ ७<br><br>क्षतः किल करे विप्रास्तस्य शाकरसोऽस्रवत्।<br>स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टः प्रनृत्तवान्॥ ८स्नान करने लगीं। उसके बाद मुनिके मनमें विकृति हो गयी; फलतः उनका शुक्र जलमें स्खलित हो गया। उस रेतको उन महातपस्वीने उठाकर घड़ेमें रख लिया। वह कलशस्थ (रेत) सात भागोंमें विभक्त हो गया। उससे सात ऋषि उत्पन्न हुए, जिन्हें मरुद्गण कहा जाता है। (उनके नाम हैं—) वायुवेग, वायुबल, वायुहा, वायुमण्डल, वायुज्वाल, वायुरेता एवं वीर्यवान् वायुचक्र। उन (मङ्कणक) ऋषिके ये सात पुत्र चराचरको धारण करते हैं। ब्राह्मणो! मैंने यह सुना है कि प्राचीन कालमें सिद्ध मङ्कणकके हाथमें कुशके अग्रभागसे छिद जानेके कारण घाव हो गया था; उससे शाकरस निकलने लगा। वे (अपने हाथसे निकलते हुए उस) शाकरसको देखकर प्रसन्न हो गये और नाचने लगे॥ २—८॥
ततः सर्वं प्रनृत्तं च स्थावरं जङ्गमं च यत्।<br>प्रनृत्तं च जगद् दृष्ट्वा तेजसा तस्य मोहितम्॥ ९<br><br>ब्रह्मादिभिः सुरैस्तत्र ऋषिभिश्च तपोधनैः।<br>विज्ञाप्तो वै महादेवो मुनेरर्थे द्विजोत्तमाः॥ १०<br><br>नायं नृत्येद् यथा देव तथा त्वं कर्तुमर्हसि।<br>ततो देवो मुनिं दृष्ट्वा हर्षाविष्टमतीव हि॥ ११<br><br>सुराणां हितकामार्थं महादेवोऽभ्यभाषत।<br>हर्षस्थानं किमर्थं च तवेदं मुनिसत्तम।<br>तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम॥ १२इससे (उनके नृत्य करनेसे उनके साथ) सम्पूर्ण अचर-चर जगत् भी नाचने लगा। उनके तेजसे मोहित जगत्को नाचते देखकर ब्रह्मा आदि देव एवं तपस्वी ऋषियोंने मुनिके (हितके) लिये महादेवसे कहा—देव! आप ऐसा (कार्य) करें, जिससे ये नृत्य न करें (उन्हें नृत्यसे विरत करनेका उपाय करें)। उसके बाद हर्षसे अधिक मग्न उन मुनिको देखकर एवं देवोंके हितकी इच्छासे महादेवने कहा—मुनिसत्तम! ब्राह्मणश्रेष्ठ! आप तो तपस्वी एवं धर्मपथमें स्थित रहनेवाले हैं। फिर आपके इस हर्षका क्या कारण है?॥ ९—१२॥
ऋषिरुवाच<br>किं न पश्यसि मे ब्रह्मन् कराच्छाकरसं स्रुतम्।<br>यं दृष्ट्वाऽहं प्रनृत्तो वै हर्षेण महताऽन्वितः॥ १३<br><br>तं प्रहस्याब्रवीद् देवो मुनिं रागेण मोहितम्।<br>अहं न विस्मयं विप्र गच्छामीह प्रपश्यताम्॥ १४<br><br>एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं देवदेवो महाद्युतिः।<br>अङ्गुल्यग्रेण विप्रेन्द्राः स्वाङ्गुष्ठं ताडयद् भवः॥ १५<br><br>ततो भस्म क्षतात् तस्मान्निर्गतं हिमसंनिभम्।<br>तद् दृष्ट्वा व्रीडितो विप्रः पादयोः पतितोऽब्रवीत्॥ १६ऋषिने कहा— ब्रह्मन्! क्या आप नहीं देखते कि मेरे हाथसे शाकका रस चू रहा है; जिसे देखकर मैं अत्यन्त आनन्दमग्न होकर नृत्य कर रहा हूँ। महादेवजीने हँसकर आसक्तिसे मोहित हुए उन मुनिसे कहा—विप्रवर! मुझे आश्चर्य नहीं हो रहा है। (किंतु) आप इधर देखें। विप्रेन्द्रो! श्रेष्ठ मुनिसे ऐसा कहकर देदीप्यमान भगवान् देवाधिदेव महादेवने अपनी अंगुलिके अग्रभागसे अपने अंगूठेको ठीक किया। उसके बाद उस चोटसे हिमतुल्य (स्वच्छ) भस्म निकलने लगा। उसे देखनेके बाद ब्राह्मण लज्जित होकर (महादेवके) चरणोंमें गिर पड़े और बोले—॥ १३—१६॥
नान्यं देवादहं मन्ये शूलपाणेर्महात्मनः।<br>चराचरस्य जगतो वरस्त्वमसि शूलधृक्॥ १७मैं महात्मा शूलपाणि महादेवके अतिरिक्त किसीको नहीं मानता। शूलपाणे! मेरी दृष्टिमें आप ही चराचर
अध्याय ३९ ]कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन१७१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्वदाश्रयाश्च दृश्यन्ते सुरा ब्रह्मादयोऽनघ।<br>पूर्वस्त्वमसि देवानां कर्त्ता कारयिता महत्॥ १८<br><br>त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे मोदन्ते ह्यकुतोभयाः।<br>एवं स्तुत्वा महादेवमृषिः स प्रणतोऽब्रवीत्॥ १९<br><br>भगवंस्त्वत्प्रसादाद्धि तपो मे न क्षयं व्रजेत्।<br>ततो देवः प्रसन्नात्मा तमृषिं वाक्यमब्रवीत्॥ २०समस्त संसारमें सर्वश्रेष्ठ हैं। अनघ! ब्रह्मा आदि देवता आपके ही आश्रित देखे जाते हैं। आप ही देवताओंमें प्रथम हैं और आप (सब कुछ) करने एवं करानेवाले तथा महत्वस्वरूप हैं। आपकी कृपासे सभी देवगण निर्भय होकर मोदमग्न होते रहते हैं। ऋषिने इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करनेके बाद उन्हें प्रणामकर कहा—भगवन्! आपकी कृपासे मेरे तपका क्षय न हो। तब महादेवजीने प्रसन्न होकर उन ऋषिसे यह वचन कहा—॥ १७–२०॥
ईश्वर उवाच<br>तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात् सहस्रधा।<br>आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सार्द्धमहं सदा॥ २१<br>सप्तसारस्वते स्नात्वा यो मामर्चिष्यते नरः।<br>न तस्य दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च॥ २२<br>सारस्वतं च तं लोकं गमिष्यति न संशयः।<br>शिवस्य च प्रसादेन प्राप्नोति परमं पदम्॥ २३(सदाशिव) ईश्वरने कहा— विप्र! मेरी कृपासे तुम्हारी तपस्या सहस्रों प्रकारसे बढ़े। मैं तुम्हारे साथ इस आश्रममें सदा निवास करूँगा। जो मनुष्य इस सप्तसारस्वततीर्थमें स्नान करके मेरी पूजा करेगा, उसे इस लोक और परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा। वह निःसंदेह उस सारस्वतलोकको जायगा एवं (मुझ) शिवके अनुग्रहसे परम पदको प्राप्त करेगा॥ २१–२३॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३८॥


उनतालीसवाँ अध्याय

कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
लोमहर्षण उवाच<br>ततस्त्वौशनसं तीर्थं गच्छेत्तु श्रद्धयान्वितः।<br>उशना यत्र संसिद्धो ग्रहत्वं च समाप्तवान्॥ १<br><br>तस्मिन् स्नात्वा विमुक्तस्तु पातकैर्जन्मसंभवैः।<br>ततो याति परं ब्रह्म यस्मान्नावर्तते पुनः॥ २<br><br>रहोदरो नाम मुनिर्यत्र मुक्तो बभूव ह।<br>महता शिरसा ग्रस्तस्तीर्थमाहात्म्यदर्शनात्॥ ३लोमहर्षणने कहा— (ऋषियो!) सप्तसारस्वतके बाद श्रद्धासे युक्त होकर 'औशनस'तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ शुक्र सिद्धि प्राप्तकर ग्रहत्वको प्राप्त हो गये। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य अनेक जन्मोंमें किये हुए पातकोंसे छूटकर परब्रह्मको प्राप्त करता है, जहाँसे पुनः (जन्म-मरणके चक्करमें) लौटना नहीं पड़ता। (वह तीर्थ ऐसा है) जहाँ तीर्थ-दर्शनकी महिमासे भारी सिरसे जकड़े हुए रहोदर नामके एक मुनि उससे मुक्त हो गये थे॥ १–३॥
ऋषय ऊचुः<br>कथं रहोदरो ग्रस्तः कथं मोक्षमवाप्तवान्।<br>तीर्थस्य तस्य माहात्म्यमिच्छामः श्रोतुमादरात्॥ ४ऋषियोंने कहा (पूछा)— रहोदर मुनि सिरसे ग्रस्त कैसे हो गये थे? और वे उससे मुक्त कैसे हुए? हमलोग उस तीर्थके माहात्म्यको आदरके साथ सुनना चाहते हैं (जिसकी महिमासे ऐसा हुआ।)॥ ४॥

१७२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३९ लोमहर्षण उवाच पुरा वै दण्डकारण्ये राघवेण महात्मना। वसता द्विजशार्दूला राक्षसास्तत्र हिंसिताः॥ ५ तत्रैकस्य शिरश्छिन्नं राक्षसस्य दुरात्मनः। क्षुरेण शितधारेण तत् पपात महावने॥ ६ रहोदरस्य तल्लग्नं जङ्घायां वै यदृच्छया। वने विचरतस्तत्र अस्थि भित्त्वा विवेश ह॥ ७ स तेन लग्नेन तदा द्विजातिर्न शशाक ह। अभिगन्तुं महाप्राज्ञस्तीर्थान्यायधनानि च॥ ८ स पूतिना विस्रवता वेदनात्तो महामुनिः। जगाम सर्वतीर्थानि पृथिव्यां यानि कानि च॥ ९ ततः स कथयामास ऋषीणां भावितात्मनाम्। तेऽब्रुवन् ऋषयो विप्रं प्रयाह्यौशनसं प्रति॥ १० तेषां तद्वचनं श्रुत्वा जगाम स रहोदरः। ततस्त्वौशनसे तीर्थे तस्योपस्पृशतस्तदा॥ ११ तच्छिरश्शरणं मुक्त्वा पपातान्तर्जले द्विजाः। ततः स विरजो भूत्वा पूतात्मा वीतकल्मषः॥ १२ आजगामाश्रमं प्रीतः कथयामास चाखिलम्। ते श्रुत्वा ऋषयः सर्वे तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्। कपालमोचनमिति नाम चक्रुः समागताः॥ १३ तत्रापि सुमहत्तीर्थं विश्वामित्रस्य विश्रुतम्। ब्राह्मण्यं लब्धवान् यत्र विश्वामित्रो महामुनिः॥ १४ तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते ध्रुवम्। ब्राह्मणस्तु विशुद्धात्मा परं पदमवाप्नुयात्॥ १५ ततः पृथूदकं गच्छेन्नियतो नियताशनः। तत्र सिद्धस्तु ब्रह्मर्षी रुषङ्गुर्नाम नामतः॥ १६ जातिस्मरो रुषङ्गुस्तु गङ्गाद्वारे सदा स्थितः। अन्तकालं ततो दृष्ट्वा पुत्रान् वचनमब्रवीत्। इह श्रेयो न पश्यामि नयध्वं मां पृथूदकम्॥ १७ लोमहर्षणजी बोले- द्विजश्रेष्ठो ! प्राचीन कालमें दण्डकारण्यमें रहते हुए रघुवंशी महात्मा रामचन्द्रने बहुत-से राक्षसोंको मारा था। वहाँ एक दुष्टात्मा राक्षसका सिर तीक्ष्णधारवाले क्षुर नामक बाणसे कटकर उस महावनमें गिरा। (फिर वह) संयोगवश वनमें विचरण करते हुए रहोदर मुनिकी जंघामें उनकी हड्डीको तोड़कर उससे चिपट गया। महाप्राज्ञ वे ब्राह्मणदेव (जंघेकी टूटी हड्डीमें) उस मस्तकके लग जानेके कारण तीर्थों और देवालयोंमें नहीं जा पाते थे॥ ५-८॥ वे महामुनि दुर्गन्धपूर्ण पीब आदि बहनेके कारण तथा वेदनासे अत्यन्त दुःखी रहते थे। पृथ्वीके जिन-जिन तीर्थोंमें वे गये, वहाँ-वहाँ उन्होंने पवित्रात्मा ऋषियोंसे (अपना दुःख) कहा। ऋषियोंने उन विप्रसे कहा- ब्राह्मणदेव ! आप औशनस (तीर्थ)-में जाइये। (लोमहर्षणने कहा-) द्विजो ! उनका यह वचन सुनकर रहोदर मुनि वहाँसे औशनसतीर्थमें गये। वहाँ उन्होंने तीर्थ-जलका स्पर्श किया। उनके द्वारा (जलका) स्पर्श होते ही वह मस्तक उनसे (जाँघ)-को छोड़कर जलमें गिर गया। उसके बाद वे मुनि पापसे रहित निर्मल रजोगुणसे रहित अतएव पवित्रात्मा होकर प्रसन्नतापूर्वक (अपने) आश्रममें गये और उन्होंने (ऋषियोंसे) सारी आपबीती कह सुनायी। फिर तो उन आये हुए सभी ऋषियोंने औशनसतीर्थके इस उत्तम माहात्म्यको सुनकर उसका नाम 'कपालमोचन' रख दिया॥ ९-१३॥ वहीं (कपालमोचन तीर्थमें ही) महामुनि विश्वामित्रका बहुत बड़ा तीर्थ है, जहाँ विश्वामित्रने ब्राह्मणत्वको प्राप्त किया था। उस श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको निश्चय रूपसे ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है और वह ब्राह्मण विशुद्धात्मा होकर ब्रह्मके परम पदको प्राप्त करता है। कपालमोचनके बाद पृथूदक नामके तीर्थमें जाय और नियमपूर्वक नियत मात्रामें आहार करे। वहाँ रुषङ्गु नामके ब्रह्मर्षिने सिद्धि पायी थी। सदा गङ्गाद्वारमें स्थित रहते हुए पूर्वजन्मके वृत्तान्तको स्मरण रखनेवाले रुषङ्गुने (अपना) अन्तकाल आया देखकर (अपने) पुत्रोंसे कहा कि यहाँ (मैं) अपना कल्याण नहीं देख रहा हूँ। मुझे पृथूदक

सम्बन्धमें प्रश्न और ब्रह्माके हवालेसे लोमहर्षणका उत्तर

अध्याय ३९] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन १७३ विज्ञाय तस्य तद्भावं रुषङ्गोस्ते तपोधनाः । तं वै तीर्थे उपानिन्युः सरस्वत्यास्तपोधनम् ॥ १८ स तैः पुत्रैः समानीतः सरस्वत्यां समाप्लुतः । स्मृत्वा तीर्थगुणान् सर्वान् प्राहेदृषिसत्तमः ॥ १९ सरस्वत्युत्तरे तीर्थे यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् । पृथूदके जप्यपरो नूनं चामरतां व्रजेत् ॥ २० तत्रैव ब्रह्मयोन्यस्ति ब्रह्मणा यत्र निर्मिता। पृथूदकं समाश्रित्य सरस्वत्यास्तटे स्थितः ॥ २१ चातुर्वर्ण्यस्य सृष्ट्यर्थमात्मज्ञानपरोऽभवत्। तस्याभिधायतः सृष्टिं ब्रह्मणो व्यक्तजन्मनः ॥ २२ मुखतो ब्राह्मणा जाता बाहुभ्यां क्षत्रियास्तथा । ऊरुभ्यां वैश्यजातीयाः पद्भ्यां शूद्रास्ततोऽभवन् ॥ २३ चातुर्वर्ण्यं ततो दृष्ट्वा आश्रमस्थं ततस्ततः। एवं प्रतिष्ठितं तीर्थं ब्रह्मयोनीति संज्ञितम् ॥ २४ तत्र स्नात्वा मुक्तिकामः पुनर्योनिं न पश्यति। तत्रैव तीर्थं विख्यातमवकीर्णेति नामतः ॥ २५ यस्मिंस्तीर्थे वको दाल्भ्यो धृतराष्ट्रममर्षणम् । जुहाव वाहनैः सार्धं तत्राबुध्यत् ततो नृपः ॥ २६ ऋषय ऊचुः कथं प्रतिष्ठितं तीर्थमवकीर्णेति नामतः। धृतराष्ट्रेण राज्ञा च स किमर्थं प्रसादितः ॥ २७ लोमहर्षण उवाच ऋषयो नैमिषेया ये दक्षिणार्थं ययुः पुरा। तत्रैव च वको दाल्भ्यो धृतराष्ट्रमयाचत ॥ २८ तेनापि तत्र निन्दार्थमुक्तं पश्चानृतं तु यत्। ततः क्रोधेन महता मांसमुत्कृत्य तत्र ह ॥ २९ पृथूदके महातीर्थे अवकीर्णेति नामतः । जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं नरपतेस्ततः ॥ ३० हूयमाने तदा राष्ट्रे प्रवृत्ते यज्ञकर्मणि । अक्षीयत ततो राष्ट्रं नृपतेर्दुष्कृतेन वै ॥ ३१ (तीर्थ)-में ले चलो। रुषङ्गुके उस भावको जानकर वे तपोधन (पुत्र) उन तपके धनीको सरस्वतीके तीर्थमें ले गये ॥ १४ - १८॥ उन पुत्रोंद्वारा लाये गये उन ऋषिश्रेष्ठने सरस्वतीमें स्नान करनेके पश्चात् उस तीर्थके सब गुणोंका स्मरण कर यह कहा था-'सरस्वतीके उत्तरकी ओर स्थित पृथूदक नामके तीर्थमें अपने शरीरका त्याग करनेवाला जपपरायण मनुष्य निश्चय ही देवत्वको प्राप्त होता है।' वहीं ब्रह्माद्वारा निर्मित 'ब्रह्मयोनितीर्थ' है, जहाँ सरस्वतीके किनारे अवस्थित पृथूदकमें स्थित होकर ब्रह्मा चारों वर्णोंकी सृष्टिके लिये आत्मज्ञानमें लीन हुए थे। सृष्टिके विषयमें अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके चिन्तन करनेपर उनके मुखसे ब्राह्मण, भुजाओंसे क्षत्रिय, दोनों ऊरुओंसे वैश्य और दोनों पैरोंसे शूद्र उत्पन्न हुए ॥ १९-२३॥ उसके बाद उन्होंने चारों वर्णोंको विभिन्न आश्रमोंमें स्थित हुआ देखा। इस प्रकार ब्रह्मयोनि नामक तीर्थकी प्रतिष्ठा हुई थी। मुक्तिकी कामना करनेवाला व्यक्ति वहाँ स्नान करनेसे पुनर्जन्म नहीं देखता। वहीं अवकीर्ण नामक एक विख्यात तीर्थ भी है, जहाँपर दाल्भ्य (दल्भ या दल्भि गोत्रमें उत्पन्न) वक नामक ऋषिने क्रोधी धृतराष्ट्रको उसके वाहनोंके साथ हवन कर दिया था, तब कहीं राजाको (अपने किये कर्मका) ज्ञान हुआ था ॥ २४ - २६ ॥ ऋषियोंने पूछा- अवकीर्ण नामक तीर्थ कैसे प्रतिष्ठित हुआ एवं राजा धृतराष्ट्रने उन (वक दाल्भ्य मुनि)-को क्यों प्रसन्न किया था ? ॥ २७ ॥ लोमहर्षणने कहा- प्राचीन कालमें नैमिषारण्य- निवासी जो ऋषि दक्षिणा पानेके लिये (राजा धृतराष्ट्रके यहाँ) गये थे, उनमेंसे दल्भिवंशीय वक ऋषिने धृतराष्ट्रसे (धनकी) याचना की। उन्होंने (धृतराष्ट्रने) भी निन्दापूर्ण ग्राम्य और असत्य बात कही। उसके बाद वे (वक दाल्भ्य) अत्यन्त क्रुद्ध होकर पृथूदकमें स्थित अवकीर्ण नामक तीर्थमें जा करके मांस काट-काटकर धृतराष्ट्रके राष्ट्रके नाम हवन करने लगे। तब यज्ञमें राष्ट्रका हवन प्रारम्भ होनेपर राजाके दुष्कर्मके कारण राष्ट्रका क्षय होने लगा ॥ २८-३१ ॥