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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

१५६ | वेदान्तपरिभाषा | [ व्याप्तिसंस्कारस्य कारणत्वम्

यद्यपि संस्कारध्वंस, संस्कारजन्य है तथापि संस्कारमात्रजन्य (केवल संस्कारजन्य) नहीं है। क्योंकि संस्कारध्वंस के प्रति चिरतरकालीन उद्बोधाभाव (चिरकाल तक संस्कारों का उद्बोध न होना) भी कारण होता है। परन्तु स्मृति को संस्कार के सिवाय किसी भी कारण की अपेक्षा नहीं होती। अनुमिति, लिङ्गज्ञानादि असाधारण कारणजन्य है अर्थात् संस्कारमात्रजन्य नहीं है। इसलिए उसे स्मृतित्व प्राप्त नहीं होता। 'संस्कारमात्रजन्यत्व' का अर्थ है कि संस्कार से जो अन्य, उससे जन्य न होकर केवल संस्कारजन्य। अनुमिति, संस्कारजन्य होने पर भी, संस्कार से भिन्न जो व्याप्ति-ज्ञान उससे भी वह उत्पन्न होती है। इसलिए अनुमिति को स्मृति नहीं कह सकते, क्योंकि दोनों के लक्षण भिन्न-भिन्न हैं।

शंका—अनुमिति में स्मृतित्वापत्ति न होने पर भी आपके पक्ष में अन्यान्य दोष तो आते ही हैं। क्योंकि जब व्याप्तिस्मरण से अनुमिति होती है तब संस्कार, स्मृति को उत्पन्न कर नष्ट हो जाते हैं। परन्तु ऐसे स्थल में अनुमति का होना तो अनुभव-सिद्ध है। किन्तु आपके कथनानुसार संस्कार (व्यापार) तो वहाँ है नहीं। इस कारण संस्कारजन्यत्व व्यभिचरित होता है।

ग्रन्थकार इस शंका का अनुवाद कर समाधान करते हैं—

न च यत्र व्याप्तिस्मरणादनुमितिस्तत्र कथं^१ संस्कारो हेतुरिति वाच्यम्। व्याप्ति-स्मृतिस्थलेऽपि ^२तत्संस्कारस्यैवानुमितिहेतुत्वात्। न हि स्मृतेः सस्कारनाशकत्व-नियमः, स्मृतिधारादर्शनात्। न^३ चानुद्बुद्धसंस्कारादप्यनुमित्यापत्तिः, तदुद्बोधस्यापि सहकारित्वात्।

**अर्थ—**जहाँ व्याप्तिस्मरण से अनुमिति होती है वहाँ संस्कार को ही उसकी कारणता कैसे? यह शंका आपको नहीं करनी चाहिये। क्योंकि जहाँ व्याप्तिस्मृति से अनुमिति होती है वहाँ भी व्याप्ति के संस्कार को ही अनुमिति-हेतुत्व होता है। स्मृति को नियम से संस्कारनाशकत्व भी नहीं होता। अर्थात् स्मृति के प्रति कारणीभूत अनुभव-जन्य संस्कार का स्मृति उत्पन्न होने पर नाश होने का कोई नियम नहीं है। क्योंकि


१. कथं संस्कारो हेतुः अत्र अनुमितिपूर्ववर्तित्वाऽभावादित्यध्याहार्यम्।
२. संस्कारस्यैव व्याप्तिज्ञानजन्यसंस्कारस्यैव। एवकारेण व्याप्तिस्मृतिजन्य-सस्कारो व्यावत्यंते।
३. व्याप्तिसंस्कारो न व्यापारः, सत्यपि संस्कारे तदनुद्बोधे अनुमित्यनुदयाद् इति शंकाग्रन्थस्याशयः। उद्बुद्धसंस्कारस्यैव अनुमितिहेतुत्वान्न दोष इति समाधानग्रन्थस्याभिप्रायः। उद्बोधः अभिव्यक्तिः, फलजननाभिमुखत्वमित्यर्थः।

व्याप्तिसंस्कारस्य कारणत्वम् ] अनुमानपरिच्छेदः १५७

धारावाहिक ( स्मृति का सतत होते रहना ) स्मृति का सभी को अनुभव है। यह भी शंका ठीक नहीं होगी कि 'स्मृति में संस्कारनाशकत्व यदि न मानें तो अनुद्बुद्ध ( उद्बुद्ध न हुए ) संस्कार से भी अनुमिति होने का प्रसंग आवेगा।'

क्योंकि स्मृति के प्रति संस्कारोद्बोध में भी सहकारि-कारणतया होने से स्मृति होने से पूर्व संस्कारोद्बोध होना ही चाहिये।

संस्कारोद्बोध का अर्थ है कि संस्कारों की जागृति = कार्योन्मुखत्व।

**विवरण—**व्याप्ति का स्मरण होने पर जहाँ अनुमिति होती है वहाँ संस्कार-जन्यत्व कहाँ है? इससे यह प्रतीत होता है कि संस्कारजन्यत्व व्यभिचरित है। क्योंकि व्याप्ति का स्मरण होने पर संस्कार का नाश हो जाता है। परन्तु ऐसी शंका करना ठीक नहीं।

क्योंकि व्याप्तिस्मृति से जहाँ अनुमिति होती है वहाँ भी हम व्याप्ति के संस्कार को ही अनुमिति में हेतु मानते हैं। क्योंकि 'स्मृति के होने पर उसके कारणभूत संस्कार नष्ट होते हैं' ऐसा सिद्धान्त हमारा नहीं है। इस कारण संस्कारजन्यत्व व्यभिचरित नहीं होता।

उपर्युक्त सिद्धान्त न मानने में दो कारण हैं—एक लाघव और दूसरा अनुभव। 'स्मृति होते ही पूर्व संस्कार नष्ट होते हैं।' यह मानने पर उसी विषय की पुनः स्मृति होने पर अग्रिम स्मृति में कारण होनेवाला दूसरा ही संस्कार मानना पड़ेगा। अग्रिम स्मृति होने पर पूर्वस्मृतिजन्य संस्कार भी नष्ट हो गया, तब तीसरी स्मृति के समय दूसरी स्मृति से उत्पन्न हुआ संस्कार मानना होगा। ऐसे अनन्त संस्कारों की कल्पना करने की अपेक्षा एक व्याप्ति संस्कार को ही अनुमिति के प्रति कारण मानने में लाघव है, और अनुभव भी ऐसा ही है। व्याप्ति के संस्कार से व्याप्ति का स्मरण होता है—यह अनुभव कहीं भी बाधित नहीं है। स्मृति परम्परा का अनुभव होने से स्मृति को संस्कार-नाशकत्व नहीं है। परन्तु तार्किक लोग 'स्मृति को उत्पन्न कर स्मृतिजनक संस्कार नष्ट हो जाता है, क्योंकि संस्कार स्मृति के लिए ही रहता है और स्मृति को उत्पन्न कर वह कृतकार्य हो जाता है। इस कारण संस्कार से स्मृति की उत्पत्ति होने पर संस्कार का नाश होना अवश्यम्भावी है' ऐसा मानते हैं।

तार्किकों के इस ( स्मृति के होते हुए पूर्व संस्कार का नाश होता है ) अभ्युपगम के अनुसार यदि विचार किया जाय तो स्मृति परम्परा में द्वितीय, तृतीय स्मृति की उत्पत्ति का कोई कारण ही नहीं रहता। पहली स्मृति में कारण बने हुए एक संस्कार का नाश होने पर भी दूसरे संस्कार से स्मृति होगी' यह भी नहीं कह सकते। क्योंकि इस पक्ष में अनन्त संस्कारों की कल्पना करनी पड़ती है, जो कि गौरव दोष से दूषित है। और ऐसा मानने में अनुभव या अन्य कोई प्रमाण भी नहीं है।

**शंका—**संस्कार-व्यक्तियों का आनन्त्य न होने पर भी उद्बोधक के सहित स्थित एक संस्कार से जो एक स्मृति उत्पन्न होती है, वह ही स्वयं नष्ट होते-होते दूसरे

१५८ | वेदान्तपरिभाषा | [ व्याप्तिसंस्कारस्य कारणत्वम्

संस्कार को उत्पन्न कर के नष्ट होती है । फिर वह उत्पन्न हुआ संस्कार उसने अग्रिम स्मृति को उत्पन्न करता है । इस प्रकार स्मृतिपरम्परा ( धारा ) का होना युक्तियुक्त होता है ।

समाधान—तार्किकों की यह कल्पना उचित प्रतीत नहीं होती । स्मृति के होते ही उसके कारणभूत संस्कार का नाश होता है ऐसी कल्पना करने की अपेक्षा जिस अनुभव से जो संस्कार उत्पन्न हुआ वही संस्कार, उद्बोधक निमित्त से युक्त होने पर उससे स्मृति उत्पन्न होती है । परन्तु उस संस्कार से उत्पन्न हुई स्मृति, अपने उत्पादक संस्कार का नाश नहीं करती, बल्कि उस स्वजनक संस्कार को अधिक दृढ़ करती है । अतः स्मृति, स्वजनक संस्कार का नाश करती है, ऐसी कल्पना करने की अपेक्षा वह स्वजनक संस्कार को दृढ़ करती है, ऐसी कल्पना करने में ही अतिशय लाघव है । कल सुने हुए शास्त्रार्थ का आज स्मरण होता है और उस स्मरण से पूर्व संस्कार दृढ़ होता है । इससे यह स्पष्ट है कि स्मृति, स्वजनक संस्कार का नाश नहीं करती । श्रुत-शास्त्रार्थ का स्मरण होने पर यदि उसके कारणभूत संस्कारों का नाश हुआ होता, और उस स्मृति के द्वारा अन्य नवीन ही संस्कार उत्पन्न किया होता तो शास्त्रार्थ में दृढ़त्व कैसे आता ?

शिवाय संस्कार से स्मृति की उत्पत्ति, और स्मृति के होने पर उत्पन्न होनेवाले संस्कार के द्वारा ही स्मृति का नाश होता है, यह यदि माना जाय तो संस्कार को ही स्मृतिजनकत्व और उसका विनाशकत्व है, यह कहना होगा । इसी प्रकार स्मृति से उत्पन्न हुए संस्कार में ही स्मृतिजन्यत्व और नाश्यत्व है, यह भी कहना होगा । इस प्रकार अनेक विरुद्ध पदार्थों की कल्पना करनी पड़ती है । ‘स्मृति को संस्कारनाशकत्व है’ यह पक्ष श्रेयोवह नहीं है ।

‘संस्कार ही अनुमिति में हेतु है’ यह मानने पर उद्बुद्ध न हुए संस्कार से अनुमिति होने लगेगी—यह आशंका उचित नहीं है । क्योंकि पक्षधर्मताज्ञानजन्य संस्कार का उद्बोध होना भी अनुमिति में सहकारि-कारण है, अर्थात् उद्बुद्ध संस्कार से ही अनुमिति होती है ।

एवं¹ च अयं धूमवानिति पक्ष²धर्मताज्ञाने³न, धूमो⁴ वह्निव्याप्य


१. एवं च—अनुमिति परामर्शस्य कारणत्वे निराकृते उद्बुद्धसंस्कारस्य कारणत्वे सिद्धे च । ‘पर्वतो वह्निमान्’ इत्यनुमितौ असाधारणकारणस्य पक्षधर्मताज्ञानस्य आकारः ‘अयं धूमवान्’ इति ।
२. पक्षधर्मताज्ञाने—पक्षस्य धर्म एव पक्षधर्मता, स्वार्थे ‘तल्’ प्रत्ययः । सा च धूमादिरूपलिङ्गवत्ता, तस्या ज्ञाने अर्थात् लिङ्गप्रकारक-पक्षविशेष्यकज्ञाने । अत एव—‘अयं धूमवान्’ इत्याकारः प्रदर्शितः ।
३. ‘ने धूमोः’ इति पाठान्तरम् ।
४. अनुमितौ द्वितीयमसाधारणं कारणं दर्शयति ‘धूमो वह्निव्याप्यः’ इति महान-

व्याप्तिसंस्कारस्य कारणत्वम् ] अनुमानपरिच्छेदः १५९

इत्यनुभवाहितसंस्कारोद्बोधे च सति, वह्निमानित्यनुमितिर्भवति, न तु मध्ये व्याप्तिस्मरणं तज्जन्य¹वह्निव्याप्य धूमवानित्यादि²विशेषणविशिष्टं ज्ञानं वा हेतुत्वेन कल्पनीयम्, गौरवात् मानाभावाच्च ।

अर्थ--इस प्रकार 'यह धूमवान् है' ऐसा पक्षधर्मताज्ञान होने पर और 'धूम वह्निव्याप्य है' इस अनुभव से उत्पन्न हुए संस्कार का उद्बोध होने पर 'वह्निमान्' इत्याकारक अनुमिति होती है । परन्तु पक्षधर्मताज्ञान और अनुमितिज्ञान इन दोनों में व्याप्ति का स्मरण या तज्जन्य ( व्याप्तिजन्य ) वह्निव्याप्य धूमवान् इत्यादि विशेषण-विशिष्ट ज्ञान, इनमें से किसी की भी अनुमिति के प्रति हेतुरूप से कल्पना करना योग्य नहीं है । क्योंकि कल्पना करने में गौरव दोष है तथा कोई प्रमाण भी नहीं है ।

विवरण--पूर्वोक्त प्रकार से व्याप्तिज्ञान में अनुमिति का करणत्व है । और व्या-प्तिज्ञान का संस्कार, व्यापार है । तथा पक्षधर्मताज्ञानजन्य-संस्कारोद्बोध, सहकारी है । इतना होनेपर 'यह पर्वत वह्निमान् है' ऐसी अनुमिति होती है ।


सादिषु धूमे हेतौ साध्यसहचारदर्शनात् साध्यव्यभिचाराऽदर्शनाच्च साध्यसामानाधि-करण्यरूपाया व्याप्तेरनुभवो जायते, तेन तद्विषयकः संस्कारो जन्यते । अथ तद्व्या-प्तिसंस्कारवतः पुरुषस्य लिङ्गदर्शनात् तत्संस्कारस्य असाधारणकारणत्वं प्रदर्शितम् । तथा च 'पर्वतो धूमवान्' इति पक्षधर्मताज्ञाने 'धूमो वह्निव्याप्यः' इति व्याप्ति-संस्का-रोद्बोधे च सति 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यनुमितिर्जायते इति मध्ये (पक्षधर्मताज्ञानानु-मित्योर्मध्ये) व्याप्तिस्मरणं (धूमो वह्निव्याप्यः-इत्याद्याकारकं स्मरणं) तज्जन्यं व्याप्तिस्मरणजन्यं इत्यादि विशिष्टज्ञानं (वह्निव्याप्य धूमवानयं पर्वत: इत्याद्याकारकं परामर्शज्ञानं) न कल्पनीयमिति निष्कर्षः । अत्र च १-पक्षधर्मताज्ञानं २-व्याप्तिसंस्का-रोद्बोधः इति कारणद्वयादेव अनुमितिः, व्याप्तिसंस्कारोद्बोधस्तु धूमज्ञानमात्रेणैव, न तु पक्षधर्मताज्ञानेन । अत एव पक्षधर्मताज्ञानव्याप्तिसंस्कारयोर्द्वयोरेवानुमितिकारणत्व-मिति लघुचन्द्रिकायामुक्तम् ।

नैयायिकास्तु--व्याप्तिज्ञानं, व्याप्तिस्मरणं, पक्षधर्मताज्ञानं, लिङ्गपरामर्शश्च अनु-मितिसामग्रीति मन्यन्ते । पक्षधर्मताज्ञानोद्बुद्धसंस्कारेतिसामग्रीद्वितयेनानुमित्युपपत्तौ अधिकसामग्रीकल्पने गौरवं बाधकम् । यदि व्याप्तिस्मरणस्य परामर्शज्ञानस्य चानुमिति-हेतुत्वं प्रामाणिकं भवेत् तदा तद्गौरवं प्रामाणिकत्वादबाधकं भवेदपि । किन्तु व्याप्ति-स्मरणादेरनुमितिहेतुत्वे किञ्चित् प्रमाणं नास्ति । तस्मात् अप्रामाणिकगौरवस्य बाधक-त्वमुचितमेवेत्यवगन्तव्यम् ।


१. 'न्यं'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'दि विशिष्टज्ञानं वा०'- इति पाठान्तरम् ।

१६० | वेदान्तपरिभाषा | [ पर्वतांशे प्रत्यक्षत्वम्

इस कारण पूर्वोक्त अनुमिति की सामग्री और अनुमिति इन दोनों में गौरव दोष के तथा प्रमाणाभाव के कारण परामर्श आदि की कल्पना की आवश्यकता नहीं है। 'पर्वतो वह्निमान्' इसे एक ही अनुमित्यात्मक ज्ञान समझने वालों के निराकरणार्थ सिद्धान्ती कहता है—

तच्च^१ व्याप्तिज्ञानं वह्निविषयक^२ज्ञानांश एव करणम्, न तु पर्वतविषयक^३ज्ञानांश इति। पर्वतो वह्निमानिति ज्ञानस्य वह्न्यंश एवाऽनुमितित्वं न पर्वताद्यंशे, तदंशे प्रत्यक्षत्वस्योपपादितत्वात्।

**अर्थ—**और वह व्याप्तिज्ञान वह्निविषयक ज्ञान अंश में ही करण है, पर्वतविषयक ज्ञान अंश में नहीं। इसलिये 'पर्वतवह्निमान् है' इस ज्ञान को वह्नि अंश में ही अनुमितित्व है, पर्वत आदि अंश में नहीं। पर्वत आदि अंश में उस ज्ञान को प्रत्यक्षत्व है। यह यह हमने प्रत्यक्षपरिच्छेद में उपपादन किया है।

**विवरण—**प्रत्यक्ष परिच्छेद में—जिस अनुमितिज्ञान में पक्ष, इन्द्रियसन्निकृष्ट रहता है उस अनुमितिज्ञान में अनुमित वह्नि-आदि अंश में ज्ञान को अनुमितित्व रहता है और इन्द्रियसन्निकृष्ट पर्वत आदि अंश में प्रत्यक्षत्व रहता है—उपपादन किया है। 'मैं पर्वत को देखता हूँ और वह्नि का अनुमान करता हूँ' यही अनुभव में आता है। इसलिये वहां अनुमिति और प्रत्यक्ष, दो प्रकार का ज्ञान मानना पड़ता है। जातित्व, उपाधित्व आदि तार्किकों की परिभाषा में कोई प्रमाण नहीं है, यह पीछे कह चुके हैं। इस कारण एक ही ज्ञान में अंश भेद से परोक्षत्व तथा अपरोक्षत्व के होने में कोई विरोध नहीं है।

उपर्युक्त उपपादन से 'अनुमिति में कारण व्याप्तिज्ञान है'—यह सिद्ध होने पर भी व्याप्ति का स्वरूप क्या है? यह प्रश्न पैदा होता है। इसलिये ग्रंथकार अग्रिम ग्रन्थ से से व्याप्ति का स्वरूप बताते हैं।


१. 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यस्य ज्ञानस्य अंशद्वयम्—एकः पर्वतविषयकत्वांशः, द्वितीयः वह्निविषयकत्वांशः। तत्र वह्निविषयकत्वांशे एव ज्ञाने व्याप्तिज्ञानं करणम्। न सन्निकृष्टपक्षकांशे पर्वताद्यंशे व्याप्तिज्ञानं करणम् व्याप्तिज्ञानाऽजन्यत्वात्, तस्य तु प्रत्यक्षत्वेन इन्द्रियजन्यत्वात्। एवं च पर्वतांशे ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं, वह्न्यंशे च अनुमितित्वम्। वह्निविषयकत्वांशे--पर्वतवह्निसम्बन्धांशे इत्यमरः। तदुक्तं शास्त्रदीपिकायाम्—"यथा दध्ना जुहोति इति विशिष्टविषयोऽपि विधिः विशेषणपरो भवति तथैव इहापि विशिष्टविषयमेव अनुमानं विशेष्य-विशेषणयोः प्राप्तत्वात् सम्बन्धविषयं भवति।" २. 'कत्वांश एव कारणम्'—इति पाठान्तरम्। ३. 'कत्वांश इति'—इति पाठान्तरम्।

व्याप्तिलक्षणम् ] अनुमानपरिच्छेदः १६१

व्याप्तिश्च^१ अशेष-साधनाश्रयाश्रित-साध्य-सामानाधिकरण्यरूपा । सा च व्यभिचारादर्शने सति सहचारदर्शनेन गृह्यते । तच्च सहचारदर्शनं भूयो दर्शनं सकृद्दर्शनं वेति^२ विशेषो नादरणीयः, सहचारदर्शनस्यैव प्रयोजकत्वात् ।

**अर्थ—**अशेष साधनों का जो आश्रय, तदाश्रित जो साध्य, उससे हेतु का जो सामानाधिकरण्य—यही व्याप्ति है। और उस व्याप्ति का ग्रहण, व्यभिचार के अदर्शन के साथ सहचार के दर्शन से होता है। उस सहचारदर्शन में भूयोदर्शन या सकृद्दर्शन रूप विशेष का कोई आदर नहीं है क्योंकि उस व्याप्ति में प्रयोजक सहचारदर्शन ही है।

**विवरण—**व्याप्तिस्वरूप क्या है? यह प्रश्न है। उसका उत्तर यह है कि—'अशेषसाधनाश्रयाश्रितसाध्यसामानाधिकरण्यम्' इसका अर्थ इस प्रकार है—अशेष = समस्त, साधन = धूम, के आश्रय = पर्वत आदि, के आश्रित = अग्न्यादि साध्य, के साथ हेतु (धूम) का सामानाधिकरण्य हो जिसका रूप है, वह व्याप्ति है। इसी का निकृष्ट लक्षण इस प्रकार है—'साधनतावच्छेदकावच्छिन्नसाधनाश्रयाश्रितसाध्यतावच्छेदकावच्छिन्नसाध्यसामानाधिकरण्यरूपा'। इस लक्षण का समन्वय इस प्रकार होगा। 'वह्निमान् धूमात्'—इस अनुमिति में धूम, साधन है। साधनता, धूमनिष्ठ है। साधनता का अवच्छेदक धूमत्व है। उस धूमत्व से अवच्छिन्न (पर्वत, चत्वर आदि भिन्न-भिन्न स्थान के साधनरूप) धूम व्यक्तियाँ हैं। उनकी आश्रय पर्वत आदि पदार्थ हैं, उन्हीं का आश्रय की हुई, साध्यतावच्छेदकरूप वह्नित्व से अवच्छिन्न वह्नित्वरूप साध्य व्यक्तियों, के साथ धूमव्यक्तियों का सामानाधिकरण्य (पर्वतादि समान अधिकरण पर वृत्तित्व) होना ही व्याप्ति का स्वरूप है। अर्थात् पर्वत आदि पक्ष पर, धूम और अग्नि का होना 'यत्र-यत्र धूमः तत्र-तत्र वह्निः' इस आकार का जो सामाधिकरण्य (एकाधिकरणवृत्तित्व) वही व्याप्ति का स्वरूप है। इस प्रकार व्याप्ति का लक्षण करने से, किसी एक वह्न्यादि साधन व्यक्ति के आश्रय महानसादि में रहनेवाले किसी


१. ननु व्याप्तिज्ञानं न संभवति, व्याप्तिग्राहकाऽनिरूपणात् । न च तर्कः व्याप्तिग्राहकः, तर्कस्यापि व्याप्तिमूलकत्वेन तस्यापि तर्कापेक्षायामनवस्थानात् न च सहचारदर्शनं तद्ग्राहकम्, सकृत् असकृद् वा सहचारदर्शने सत्यपि व्यभिचारज्ञाने सति व्याप्तिग्रहाभावः, इत्यतो व्याप्तिस्वरूपं प्रतिपादयति साचेति ग्रन्थेन । व्यभिचाराज्ञाने साध्यवदन्यवृत्तित्वज्ञानाभावे सति । तस्मात् व्यभिचाराऽदर्शनसहकृत-सहचारदर्शनस्यैव व्याप्तिज्ञानहेतुत्वमवगन्तव्यम् । एतेन "कार्यकारणभावाद्वा स्वभावाद्वा नियामकात् । अविनाभावनियमोऽदर्शनान्न न दर्शनात् ।" इति बौद्धोक्तं तादात्म्य-तदुत्पत्त्योर्व्याप्तिग्राहकत्वं निराकृतं भवति ।
२. 'सकृद्दर्शनं भूयोदर्शनं वेति'-इति पाठान्तरम् ।
११ व० प०

१६२ | वेदान्तपरिभाषा | [ व्याप्तिलक्षणम्

एक धूमादि साध्य का सामानाधिकरण्य ग्रहण कर 'पर्वतो धूमवान् वह्नेः' यह यदि किसी ने अनुमान किया तो वह्निरूप असद्हेतु में व्याप्तिलक्षण की अतिव्याप्ति होगी—ऐसी आशंका करने पर उसका निवारण इस प्रकार होगा—महानस में अग्नि है, इसलिये महानस उसका आश्रय है। महानस में उसके आश्रय से धूम भी रहता है। इसलिये महानस की अग्नि को साधन बनाकर और महानस के ही धूम को साध्य बनाकर उन दोनों का सामानाधिकरण्य है अर्थात् ये दोनों एक ही अधिकरण महानस में रहते हैं। इसी आधार पर जहाँ अग्नि वहाँ धूम, ऐसी व्याप्ति मानकर '(१) पर्वत धूमवान् है (२) क्योंकि उस पर अग्नि है' यह अनुमान यदि कोई करे तो इसमें अग्नि रूप हेतु सत् न होकर असत् है, क्योंकि वह्नि-व्याप्य धूम की तरह धूम-व्याप्य वह्नि नहीं है। अयोगोलक में (तपाकर लाल किये हुए लोहे के गोले में) अग्नि होता है, किन्तु धूम नहीं होता। इसलिए वह्नि सत् हेतु नहीं है, किन्तु व्यभिचारी है। यहाँ पर साधनतावच्छेदक (वह्नित्व) से अवच्छिन्न—समस्त वह्नियों के आश्रय महानस, पर्वत, तप्तायोगोलक आदि इनमें से आयोगोलक रूप आश्रय पर साध्यतावच्छेदक (धूमत्व) से अवच्छिन्न हुआ एक भी धूम नहीं है। इस कारण उनका (वह्नि और धूम का) पूर्वोक्त सामानाधिकरण्य नहीं दिखाया जा सकता। इसलिये व्याप्ति का लक्षण वह्निरूप असत् हेतु पर अतिव्याप्त नहीं है।

शंका—ऐसी व्याप्ति का ग्रहण किस प्रमाण से होता है ? तर्क से उसका ग्रहण नहीं हो सकता। क्योंकि व्याप्य के आरोप से व्यापक का आरोप करना रूप जो तर्क है, वह व्याप्ति के अधीन है। सहचारदर्शन से भी व्याप्ति का ग्रहण नहीं हो सकता। क्योंकि दो पदार्थों का साहचर्य एक बार या बार-बार दीखने पर भी उसका (साहचर्य का) क्वचित् व्यभिचार भी दिखाई देता है। इस शंका का समाधान 'सा च०' ग्रंथ से किया है। व्यभिचार के अदर्शन के साथ सहचारदर्शन से उस व्याप्ति का ग्रहण किया जाता है।' जैसे धूम अग्नि का व्यभिचार दिखाई न देते हुए उनका सहचार दीखने से ही धूम-वह्नि-व्याप्य है, यह ज्ञान होता है। जहाँ धूम हो वहाँ अग्नि अवश्य ही होती है। धूम है और अग्नि न हो, यह कभी नहीं होता। इस रीति से धूम और अग्नि के व्यभिचार का अनुभव न आकर सहचार के अनुभव होने से ही धूम और अग्नि की व्याप्ति का ज्ञान हो जाता है। दो पदार्थों का नियमेन एकत्र दीखना ही सहचारदर्शन है। चाहे वह अनेक बार देखने से हुआ हो या एक बार के देखने से हुआ हो। केवल व्यभिचारशून्य सहचारदर्शन की आवश्यकता है अर्थात् जिनका सहचार ज्ञात हुआ हो, उनकी व्याप्ति का ग्रहण होता है और जिनका सहचार ज्ञात नहीं हुआ उनकी व्याप्ति का ग्रहण नहीं होता। इस अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा सहचारदर्शन ही व्याप्तिज्ञान में हेतु है, यह लाघव से सिद्ध होता है। इसलिये सहचारदर्शन में ही व्याप्ति का प्रयोजकत्व है। भूयोदर्शन या सकृद्दर्शन उसमें प्रयोजक नहीं है।

अनुमानत्रैविध्यानङ्गीकारः ] अनुमानपरिच्छेदः १६३

इस रीति से अनुमिति में व्याप्तिज्ञान करण होने से उसे ही अनुमानत्व है। यह सिद्ध कर अब वेदान्त-सिद्धान्त में नैयायिकों की तरह अनुमान का त्रिविधत्व ( तीन प्रकार ) स्वीकार नहीं किया है, इस आशय से ग्रन्थकार कहते हैं—

'तच्चानुमानमन्वयिरूपमेकमेव, न तु केवलान्वयि। सर्वस्यापि धर्मस्यास्मन्मते ब्रह्मनिष्ठात्यन्ताभाव-प्रतियोगित्वेन अत्यन्ताभावाप्रतियोगि-साध्यकत्वरूप-केवलान्वयित्वस्याऽसिद्धेः।

**अर्थ—**और वेदान्तमत में वह अनुमान अन्वयिरूप एक ही है। केवलान्वयि नहीं। क्योंकि हमारे मत में समस्त धर्म, ब्रह्मनिष्ठ अत्यन्ताभाव के प्रतियोगी होने से, जिस अनुमान का साध्य, अत्यन्ताभाव का अप्रतियोगी हो ऐसे केवलान्वयी की असिद्धि है।

**विवरण--**नैयायिक केवलान्वयि, केवलव्यतिरेक ओर अन्वयव्यतिरेकि भेद से तीन प्रकार का लिंग ( हेतु ) मानते हैं। किन्तु वेदान्त सिद्धान्त में अन्वयिरूप एक ही लिङ्ग का स्वीकार किया गया है। अन्वयिरूप का अर्थ है अन्वयमुख व्याप्तिज्ञानरूप।

**शंका—**नैयायिकों के बताये हुए लिंग के तीन भेद लोक में प्रसिद्ध हैं, तब आप एक ही प्रकार का अनुमान किस तरह स्वीकार कर रहे हैं?

**समाधान—**नैयायिकों के पहले भेद का निराकरण 'न तु केवलान्वयि'-ग्रन्थ से किया है। नैयायिकों के कथनानुसार—केवलान्वयि-लिंग हमें मान्य नहीं है। हम तो अन्वयिरूप एक ही लिंग मानते हैं। क्योंकि उनके स्वीकृत केवलान्वयि लिंग का साध्य, अत्यन्ताभाव का अप्रतियोगी होता है, अर्थात् केवलान्वयि लिंग का साध्य, कभी भी अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी नहीं हुआ करता। ( केवलान्वयि लिंग के साध्य का अभाव


१. अनुमानत्रैविध्यमपि नैयायिकवत् वेदान्तिनां मते नास्ति। नैयायिकास्तु अनुमानं त्रिविधम्-अन्वयव्यतिरेकि केवलान्वयि केवलव्यतिरेकि चेति वदन्ति। तत्र साधनसत्त्वे साध्यसत्त्वमन्वयः, तन्मूलिका या व्याप्तिः, सा च अशेषसाधनाश्रयाश्रितसाध्यसामानाधिकरण्यरूपा, तन्मात्रमूलकं यदनुमानं तत् केवलान्वयि। साध्याभावे साधनाभावो व्यतिरेकः, तन्मूलिका व्याप्तिः व्यतिरेकव्याप्तिः, सा च साध्याभावव्यापकसाधनाभावप्रतियोगित्वरूपा, तन्मात्रनिबन्धनमनुमानं केवलव्यतिरेकि। उभयव्याप्तिमूलकमनुमानमन्वयव्यतिरेकि। तत्र 'सर्वं वाच्यं प्रमेयत्वात्' इति प्रथममनुमानम्। 'पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात्' इति द्वितीयमनुमानम्। 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' इति तृतीयमनुमानम्।

मीमांसकास्तु--व्यतिरेकव्याप्तिज्ञानेन नानुमितिः, साध्याभाव-साधनाभावयोर्व्याप्तिग्रहेण कथं साधनेन साध्यान्मानं भवेत् ? अतोऽन्वयिरूपमेकमेवानुमानं, नान्वयव्यतिरेकि केवलव्यतिरेकि वानुमानं किञ्चिदस्तीति वदन्ति। तन्मीमांसकमतमेव मनसि निधाय ग्रन्थकारः 'तच्चानुमान'मिति वर्णयति।

१६४ | वेदान्तपरिभाषा | [ अनुमानत्रैविध्यानङ्गीकारः

कभी नहीं रहता )। परन्तु हमारे मत में ऐसा कोई साध्य पदार्थ ही सम्भव नहीं है। क्योंकि 'नेह नानास्ति किञ्चन' इस श्रुति से ब्रह्मातिरिक्त समस्त वस्तुओं में ब्रह्मनिष्ठ अत्यन्ताभाव का प्रतियोगित्व रहता है। अर्थात् ब्रह्म रहने वाला समस्त वस्तुओं का जो अत्यन्ताभाव, उसकी प्रतियोगिता समस्त वस्तुओं में है। (ब्रह्म में कोई भी द्वैत वस्तु नहीं होती) इस कारण अत्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यक ऐसे केवलान्वयित्व की सिद्धि नहीं हो पाती।

इस प्रकार नैयायिकाभिमत तीनों लिङ्गों में केवलान्वयी रूप पहले भेद का निराकरण कर केवल-व्यतिरेकी रूप दूसरे भेद का निराकरण करते हैं—

नाप्यनुमानस्य व्यतिरेकि-रूपत्वम् । साध्याभावे साधनाऽभाव-निरूपित-व्याप्तिज्ञानस्य साधनेन साध्यानुमितावनुपयोगात् । कथं तर्हि धूमादावन्वय-व्याप्तिमविदुषोऽपि व्यतिरेक-व्याप्तिज्ञानादनुमितिः ? अर्थापत्ति-प्रमाणादिति वक्ष्यामः ।

अर्थ-- केवलव्यतिरेकि-अनुमान भी नहीं हो सकता (अनुमान में केवलव्यतिरेकि रूपता भी नहीं है) क्योंकि साध्य के अभाव में साधनाभाव निरूपित व्याप्तिज्ञान का, साधन के द्वारा साध्य की अनुमिति कर्तव्य होने पर (करनी हो तो) कोई उपयोग नहीं है।

शंका— धूमादि हेतु के होने पर अन्वय व्याप्ति का ज्ञान न रखने वाले व्यक्ति को भी व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान से ही अग्नि की अनुमिति कैसे हो जाती है ?

समाधान— वह अनुमिति अर्थापत्ति प्रमाण से होती है यह हम आगे बतावेंगे ।

विवरण— व्यतिरेक-व्याप्ति ज्ञान से उत्पन्न होने वाली अनुमिति का कारणत्व हो, व्यतिरेकित्व है। नैयायिकों ने व्यतिरेकव्याप्ति का परिष्कृत लक्षण किया है— 'साध्याभावव्यापकीभूताभाव-प्रतियोगित्वं-व्यतिरेकव्याप्तिः' साध्य का अभाव जहाँ हो वहाँ नियम से रहने वाला जो साधन का अभाव, उसका प्रतियोगित्व ही व्यतिरेक व्याप्ति कहलाती है। यथा—साध्य (अग्नि) का जहाँ अभाव रहता है वहाँ साधन (धूम) का भी अभाव रहता है। इसलिये धूम, साध्याभावव्यापकीभूत अभाव का प्रतियोगी होता है। उसका इस प्रकार प्रतियोगी होना (जहाँ वह्नि का अभाव हो वहाँ धूम का भी अभाव रहना) ही व्यतिरेकव्याप्ति है। धूम का सत्त्व (अस्तित्व) यदि हो तो वह्नि का भी सत्त्व (अस्तित्व) रहता है। इस कारण, व्याप्य (धूम) व्यापक (वह्नि) की कल्पना हो सकती है। परन्तु दो अभावों का कार्यकारणभाव और व्याप्यव्यापकभाव इसके विपरीत रहता है। यथा—जहाँ जहाँ वह्नि का अभाव रहता है, वहाँ वहाँ धूम का भी अभाव रहता है। इस कारण साध्य जो अग्नि, उसके अभाव से,

अनुमानत्रैविध्यानङ्गीकारः ] अनुमानपरिच्छेदः १६५

साधन जो धूम; उसका अभाव, सिद्ध किया जाता है। परन्तु उसका अनुमिति के लिए क्या उपयोग ? अर्थात् कोई उपयोग नहीं। इससे अधिक से अधिक लाभ हुआ तो साध्य के अभाव से साधन का अभाव सिद्ध होगा, परन्तु साध्य की सिद्धि नहीं होगी। क्योंकि साधन से साध्य का अनुमान किया जाता है। यह प्रसिद्ध है, और उस अनुमिति में साध्य-साधन का व्याप्तिज्ञान, उपयुक्त है। परन्तु साध्याभाव और साधनाभाव के—व्याप्तिज्ञान का अनुमिति में कोई उपयोग नहीं है। ( १ ) पृथ्वी, इतर ( अन्य ) से भिन्न है, ( २ ) गन्धत्व के कारण, ( ३ ) जो इतर से भिन्न नहीं रहता, वह गन्धवत् भी नहीं रहता जैसे जलादि' इत्यादि केवल व्यतिरेकिलिंग के उदाहरण नैयायिकों ने दिये हैं। परन्तु वास्तव में ये सब उदाहरण, अर्थापत्ति प्रमाण के उदाहरण हैं, क्योंकि गन्धत्व, इतर भेद का उपपादक है, अर्थात् पृथ्वी का गन्धत्व ही 'पृथ्वी इतरों से भिन्न है' यह ज्ञान करा सकता है।

शंका—अन्वय व्याप्ति का ज्ञान न रहने पर भी व्यतिरेकव्याप्ति के ज्ञान से भी अनुमिति होती है। अर्थात् 'जहाँ धूम रहता है वहाँ अग्नि होता है' इत्याकारक अन्वय व्याप्ति का जिसे ज्ञान नहीं है ऐसे व्यक्ति को भी 'जहाँ अग्नि नहीं है वहाँ धूम भी नहीं है—इत्याकारक व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान से भी अनुमिति हो सकती है। परन्तु अन्वयिरूप एक ही लिंग को मानने वाले आप के मत में वह अनुमिति कैसे उत्पन्न हो सकेगी ?

समाधान—जिसे 'अन्वयव्याप्ति का ज्ञान नहीं रहता उसे अर्थापत्ति प्रमाण से अग्नि आदि का ज्ञान होता है। अनुमान से नहीं। इस कारण आप की उपर्युक्त शंका ही ठीक नहीं है। अर्थापत्तिप्रमाण की आवश्यकता को हम आगे बतावेंगे। आप के व्यतिरेक-अनुमान का अर्थापत्ति प्रमाण में अन्तर्भाव हो सकता है। इसलिये व्यतिरेक-अनुमान, पृथक्तया मानने की कोई आवश्यकता नहीं।

अब नैयायिकों के माने हुए तीसरे भेद का निराकरण करते हैं।

अत एवाऽनुमानस्य नान्वयव्यतिरेकि-रूपत्वं व्यतिरेकव्याप्ति-ज्ञानस्यानुमित्यहेतुत्वात् ।

**अर्थ—**इसीलिए अनुमान को अन्वय-व्यतिरेकिरूपता भी नहीं है। क्योंकि व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान में अनुमिति के प्रति हेतुत्व नहीं है।

**विवरण—**जब कि व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान में अनुमिति-जनकत्व नहीं है तब नैयायिकों द्वारा मानी हुई अन्वय, व्यतिरेक-उभयरूपता, अनुमान से सम्भव नहीं होती। क्योंकि अन्वयरूप ओर व्यतिरेकरूप दोनों में से एक अन्वयव्याप्तिज्ञान से ही यदि अनुमिति हो सकती है तो व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान को अनुमिति के प्रति हेतु मानना व्यर्थ

१६६ वेदान्तपरिभाषा [ अनुमानभेदः

है। 'व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान को अनुमिति के प्रति हेतुत्व नहीं है' यह बात केवल व्यति-रेकिं का निराकरण करते समय हम बता चुके हैं।

इस प्रकार 'अन्वयिरूप एक ही अनुमान है' यह सिद्ध कर अब उसका द्विविधत्व बताते हैं—

तच्चानुमानं¹ स्वार्थ-परार्थ-भेदेन² द्विविधम्। तत्र स्वार्थं तूक्तमेव, परार्थं तु न्यायसाध्यम्। न्यायो नामावयव-समुदायः। अवयवाश्च त्रय एव³ प्रसिद्धाः—प्रतिज्ञाहेतूदाहरण-रूपाः, उदाहरणोपनय-निगमन-रूपा वा, न तु पञ्चावयव⁴रूपाः। अवयव-त्रयेणैव व्याप्ति-पक्षधर्मतयोरुपदर्शन-सम्भवेनाऽधिकावयव-द्वयस्य व्यर्थत्वात्।

अर्थ—और वह अनुमान, स्वार्थ और परार्थ भेद से दो प्रकार की (स्वार्थानुमान


१. अन्वय-व्यतिरेक-व्याप्तिद्वयमूलकमनुमानं स्वार्थ-परार्थभेदेन द्विविधम्। तत्र धूमेन्द्रियसन्निकर्षदशायामुत्पन्नं स्वार्थानुमानम्, तच्च न्यायप्रयोगानपेक्षं स्वमात्रनिष्ठप्रतीतिफलम् परार्थानुमानं च न्यायप्रयोगापेक्षं परपुरुषनिष्ठप्रतीतिफलम्। अत्र नैयायिकाः प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमाः पंचावयवाः परार्थानुमाने अपेक्षिता भवन्तीति वदन्ति। तत्र साध्यनिर्देशरूप-प्रतिज्ञया यो यो धूमवान् स सोऽग्निमान् इत्युदाहरणेन धूमादिति हेतूपन्यासेन च व्याप्ति-पक्षधर्मताज्ञानयोरुत्पत्त्या अनुमिति-संभवात् नोपनय-निगमनयोरपेक्षा। अथवा उदाहरणोपनयनिगमनैरेवाऽनुमिति-संभवात् न प्रतिज्ञा-हेतुवाक्ययोरुपयोगः इति शास्त्रदीपिकोक्तिमनुसरति ग्रन्थकारः 'अवयवाश्चे'त्यादि ग्रन्थेन।

ननु अनुमानलक्षणादिनिरूपणस्य वेदान्तग्रन्थेषु क उपयोगः ? ब्रह्मस्वरूपज्ञानस्य उपनिषदेकसमधिगम्यत्वान्न तत्रोपयोगः। अपि तु द्वैतमिथ्यात्वतात्पर्यग्राहकतया उपपत्तिपदाभिधेयस्य अनुमानस्य अपेक्षणीयत्वात्। तदुक्तमद्वैतसिद्धौ—"अद्वैतसिद्धेर्द्वैतमिथ्यात्वसिद्धिपूर्वकत्वात् द्वैतमिथ्यात्वमेव प्रथममुपपादनीयम्" इति। अत्र उपपादनीयमित्यस्य अनुमानेन साधनीयमित्यर्थः। एवं च द्वैतमिथ्यात्वनिर्णये अनुमानस्योपयोगः। यद्यपि श्रुतिरेव अद्वैतिनां मुख्यं प्रमाणम्, तथापि तत्तात्पर्यनिर्णायकतया उपपत्तिपदाभिधेयमनुमानमपि सार्थंकम्। तदुक्तम्—

"उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम्।
अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्पर्य-निर्णये॥" इति।

२. 'दाद्'—इति पाठान्तरम्।
३. 'एव-प्रति०'—इति पाठान्तरम्।
४. 'वा:'—इति पाठान्तरम्।

अनुमानभेदः ] | अनुमानपरिच्छेदः | १६७

तथा परार्थानुमान) है। उनमें से स्वार्थानुमान तो बता ही चुके हैं। इसलिये परार्थानुमान को ही बताते हैं। वह न्यायसाध्य है। न्याय का अर्थ है अवयवों का समूह। अनुमान के अवयव तीन ही प्रसिद्ध हैं। प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरण अथवा उदाहरण, उपनय और निगमन—उन अवयवों के ये तीन स्वरूप हैं। तार्किक लोग पाँच अवयव मानते हैं। परन्तु हमारे मत में अनुमान के पाँच अवयव नहीं हैं। क्योंकि उपर्युक्त किन्हीं तीन अवयवों से ही व्याप्ति और पक्षधर्मता का ठीक-ठीक ज्ञान होने के कारण अधिक दो अवयवों की कल्पना करना व्यर्थ है।

विवरण—अपने विवाद का विषय बने हुए अर्थ के साधक अनुमान को स्वार्थानुमान कहते हैं। अर्थात् अपने मन में किसी विशिष्ट स्थान पर विशिष्ट पदार्थ है या नहीं—ऐसा संशय उत्पन्न होने पर जिस बाह्य प्रत्यक्ष लिंग के ज्ञान से वह निवृत्त हो, वह स्वार्थानुमान है। इस स्वार्थानुमान को पहले ही ('व्यभिचार के अदर्शन के साथ सहचार के दर्शन से व्याप्ति का ग्रहण होता है' पीछे बताया है। यह व्याप्तिज्ञान ही स्वार्थानुमान है) बता चुके हैं।

दूसरी व्यक्ति के विवाद का विषय बने हुए पदार्थ के साधक अनुमान को परार्थानुमान कहते हैं। वह परार्थानुमान न्याय से सिद्ध होता है। यहाँ 'न्याय' शब्द का अर्थ अवयव-समुदाय है, यह मूल में ही बताया है। अर्थात् अवयवघटित वाक्य ही 'न्याय' है। न्याय का परिष्कृत लक्षण इस प्रकार है—'अनुमान-प्रयोजक-वाक्यार्थ-ज्ञान-जनक-वाक्यत्वं न्यायत्वम्'—अनुमान प्रयोजक जो वाक्यार्थ ज्ञान, उसे उत्पन्न करने वाले वाक्य को ही न्याय कहते हैं। ऐसे ही न्याय से उत्पन्न हुए ज्ञान का प्रयोज्य (कार्य) व्याप्तिज्ञान है और वही परार्थानुमान है। परार्थानुमान के अवयव तीन ही प्रसिद्ध हैं। प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरण, या उदाहरण, उपनय और निगमन। यथा—'पर्वत वह्निमान् है' यह प्रतिज्ञा रूप अवयव का उदाहरण है। 'क्योंकि उस पर धूम है' यह हेतुरूप अवयव है। 'जो जो धूमवान् रहता है वह वह अग्निमान् रहता है, जैसे महानस' यह उदाहरण रूप अवयव है। 'वैसे ही यह पर्वत वह्निव्याप्य धूमवान् है' यह उपनय रूप अवयव है। 'इसलिये वह अग्निमान् हैं' यह निगमन रूप अवयव है। अनुमान के इन पाँचों अवयवों को नैयायिक मानते हैं। परन्तु वेदान्ती इस प्रकार पाँच अवयव नहीं मानते। किन्तु धर्ममीमांसकों के तीन अवयवों का स्वीकार करते हैं। क्योंकि तीन अवयव-समुदाय से ही व्याप्ति और पक्षधर्मता (व्याप्ति विशिष्ट हेतु का पक्ष पर रहना) का ज्ञान यदि होता है तो अधिक दो अवयवों को मानना व्यर्थ है। मीमांसकों के द्वारा स्वीकृत किये गये पूर्वोक्त दो पक्षों में से पहले पक्ष में उपनय और निगमन का कार्य, हेतु और प्रतिज्ञा के द्वारा हो सकता है। और दूसरे पक्ष में हेतु और प्रतिज्ञा का कार्य, उपनय और निगमन से हो सकता है। इसलिए प्रतिज्ञा और हेतु इन दो अवयवों को मानने पर

१६८ वेदान्तपरिभाषा [ प्रकृते अनुमानोपयोगः

उपनय और निगमन रूप अधिक अवयवों के मानने की आवश्यकता नहीं है, और उनका स्वीकार करने पर प्रतिज्ञा और हेतुरूप अवयवों की आवश्यकता नहीं होती । अनुमिति ज्ञान के उपयुक्त ज्ञान को पैदा करना ही सब अवयवों का कार्य है ।

इस प्रकार अनुमान का निरूपण कर उसका प्रकृत प्रसंग में उपयोग बताते हैं—

एवमनुमाने निरूपिते $^१$तस्माद् ब्रह्मभिन्न-निखिल-प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वसिद्धिः । तथा हि—ब्रह्मभिन्नं सर्वं मिथ्या, ब्रह्मभिन्नत्वात्, यदेवं तदेवं यथा शुक्तिरूप्यम् । न च दृष्टान्ताऽसिद्धिः, तस्यसाधितत्वात् । न $^२$चाप्रयोजकत्वं, शुक्तिरू$^३$प्यरज्जुसर्पादीनां मिथ्यात्वे ब्रह्मभिन्नत्वस्यैव लाघवेन प्रयोजकत्वात् ।

**अर्थ—**इस रीति से अनुमान का निरूपण कर चुकने पर अब उसी अनुमान के द्वारा ब्रह्म-भिन्न समस्त प्रपञ्च की मिथ्यात्व-सिद्धि हो जाती है । तथाहि—ब्रह्मभिन्न ( ब्रह्म से भिन्न ) सर्व ( समस्त पदार्थजात ) मिथ्या ( असत्य ) है । क्योंकि वह सब ब्रह्मभिन्न है । जो ब्रह्मभिन्न रहता है वह मिथ्या होता है, जैसे शुक्तिरूप्य । 'इस अनुमान में तीसरे दृष्टान्त रूप अवयव की सिद्धि नहीं होती' । ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये । क्योंकि शुक्तिरूप्य का मिथ्यात्व हमने प्रत्यक्ष परिच्छेद में सिद्ध कर दिखाया है । उसी तरह 'ब्रह्मभिन्नत्व' हेतु अप्रयोजक ( साध्य की सिद्धि करने में असमर्थ) है, यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि शुक्तिरूप्य, रज्जुसर्प आदि के मिथ्यात्व में लाघव से ब्रह्मभिन्नत्व हेतु में ही प्रयोजकत्व है ।

**विवरण—**यहाँ तक अपने पक्ष में अनुमान का स्वरूप क्या है—बताया । इस तरह के अनुमान से ही 'ब्रह्मभिन्न सर्व प्रपंच मिथ्या है,' यह सिद्ध होता है । मीमांसकों को मान्य ऐसे दो पक्षों में से प्रथम पक्ष, हमें अधिक संमत है इसलिए प्रतिज्ञादि अवयव-त्रयात्मक वाक्य का मूल में उपयोग किया गया है । इस अनुमान में 'ब्रह्मभिन्न


१. तस्मात् अनुमानात् । पूर्वोक्तेषु त्रिषु अवयवेषु प्रतिज्ञाद्यवयवत्रये स्वसम्मतिम्प्रदर्शयितुमाह—'ब्रह्मभिन्नं सर्वं मिथ्या ब्रह्मभिन्नत्वात्' इति । शुक्तिरूप्यादौ सिद्धसाधन-वारणाय सर्वमिति । ब्रह्मणि बाधनिरासाय ब्रह्मभिन्नमिति । न च दृष्टान्तासिद्धिः, तस्य दृष्टान्तस्य प्रत्यक्षपरिच्छेदे साधितत्वात् ।

२. अविद्या-तत्कार्यसाधारणस्य ब्रह्मभिन्नत्वस्य प्रयोजकत्वे न गौरवम् अपितु लाघवम् । अतस्तस्य मिथ्यात्व-प्रयोजकत्वम् । न च तत्र व्यभिचार-शङ्कोदयः, 'ब्रह्मभिन्नत्वं यदि मिथ्यात्वव्यभिचारि स्यात्, तदा दृग्-दृश्ययोः सम्बन्धो न स्यात्' इत्याकारकस्य व्यभिचारशंकानिवर्तकस्य अनुकूलतर्कस्य जागरूकत्वात् ।

३. 'प्यादीनां मि०'— इति पाठान्तरम् ।

मिथ्यात्वलक्षणम् ] अनुमानपरिच्छेदः १६९

सर्व' पक्ष है। इसमें 'सर्व' शब्द का प्रयोग, शुक्तिरूप्यादि उदाहरण में सिद्धसाधन दोष के निवारणार्थ किया गया है। और ब्रह्म में बाध-प्रसंग के निवारणार्थ 'ब्रह्मभिन्न' कहा गया है। रज्जुसर्पादि उदाहरणों में मिथ्यात्वरूप साध्य की सिद्धि होने पर भी सिद्धसाधन दोष नहीं आ पाता। क्योंकि अन्यान्यवादियों ने भी 'वाक् और मन दोनों अनित्य हैं', इस प्रतिज्ञा में अंशतः 'सिद्धसाधन-दोष' का स्वीकार किया है।

शंका—शुक्तिरूप्य के मिथ्यात्व में कोई प्रमाण न होने से शुक्तिरूप्य का दृष्टान्त असिद्ध है। उसके मिथ्यात्व में अनुमान प्रमाण कहें तो अनवस्था दोष होगा।

समाधान—शुक्तिरूप्य के मिथ्यात्व का प्रतिपादन हमने प्रथम परिच्छेद में किया है। इसलिये दृष्टान्त 'असिद्ध' नहीं है।

शंका—यह अनुमान, अप्रयोजक है अर्थात् सर्व, ब्रह्मभिन्न रहे, परन्तु मिथ्या नहीं। इससे अन्यान्य पदार्थों में सत्यत्व होने पर भी ब्रह्मभिन्नत्व हो सकता है।

समाधान—यह शंका ठीक नहीं। क्योंकि शुक्तिरजतादि के मिथ्यात्व में कारण, अविद्या' से अतिरिक्त दोषजन्यत्व न होकर लाघव से 'ब्रह्मभिन्नत्व' ही है। ऐसा लाघव-रूप अनुकूल तर्क होने से अनुमान, मिथ्यात्व साधन में अप्रयोजक नहीं है।

शंका—शुक्तिरूप्यादि प्रातिभासिक पदार्थों में जो प्रत्यक्षसिद्ध मिथ्यात्व है, उसका क्या लक्ष्य है ? जिस मिथ्यात्व को आप समस्त प्रपंच में अनुमान से साधन करना चाह रहे हैं।

इस शंका का समाधान—

'मिथ्यात्वं (२) च स्वाश्रयत्वेनाऽभिमत यावन्निष्ठात्यन्ता-


१. चित्सुखाचार्योक्तिमनुस्मरन् साध्यं मिथ्यात्वं निर्वक्ति—'स्वाश्रयत्वेनाऽभिमत-यावन्निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वम्, स्वस्य आश्रयत्वेन अभिमताः यावन्तः तेषु निष्ठः यः अत्यन्ताभावः तत्प्रतियोगित्वम्, । अत्र 'स्व' पदं, यस्य मिथ्यात्वं साधनीयं तत्परम्। अभिमतपदं प्रमितिव्यावृत्ति-प्रतीति विशेष्यपरम्। यावत् पदमशेषपरम्। तथा च-स्वाश्रयत्वेन स्वप्रकारक-प्रतीतिविशेष्यत्वेन अभिमते प्रतीते यावति सकले निष्ठः स्थितः विद्यमानः यः स्वात्यन्ताभावः तत्प्रतियोगित्वं स्वस्य मिथ्यात्वमित्यर्थः। यथा 'इदं रजतम्' इत्यत्र स्वं शुक्तिरूप्यं तदाश्रयत्वेन तत्प्रकारकप्रतीतिविशेष्यत्वेन अभिमतं प्रतीत यद् यद् इदमात्मकं पुरोवर्तिद्रव्यं, तस्मिन् यावति समस्ते पुरोवर्तिनि द्रव्ये निष्ठः स्थितः यः स्वस्य शुक्तिरूप्यस्य अत्यन्ताभावः तत्प्रतियोगित्वं शुक्तिरूप्यस्य इति मिथ्याभूते प्रातिभासिके लक्षण-समन्वयः। एवं स्वप्रकारकप्रतीतिविशेष्ये स्वाधिष्ठान-चैतन्ये सर्वस्यापि व्यावहारिकाभावस्य विद्यमानत्वात् तत्प्रतियोगित्वं सर्वस्यैव व्यावहारिकस्येति व्यावहारिकऽपि लक्षणसमन्वयः।

१७० | वेदान्तपरिभाषा | [ मिथ्यात्वलक्षणम्

भाव-प्रतियोगित्वम्। अभिमतपदं¹ वस्तुतः स्वाश्रयाप्रसिद्ध्या असंभव-वारणाय। यावत्पदमर्थान्तर-वारणाय। तदुक्तम्— ²सर्वेषामेव भावानां स्वाश्रयत्वेन सम्मते। प्रतियोगित्वमत्यन्ताभावं प्रति मृषात्मता ॥ इति। चि० ७।

**अर्थ—**मिथ्यात्व से यह विवक्षित है कि स्वाश्रय से अभिमत जितनी वस्तु हो, तन्निष्ठ (उसमें रहनेवाला) अत्यन्ताभाव का प्रतियोगित्व। इस मिथ्यात्व के लक्षण में 'अभिमत' पद, वस्तुतः स्व-श्रय की अप्रसिद्धि होने से उस पर आनेवाले असंभव दोष की निवृत्ति करने के लिये है और 'यावत्' पद, अर्थान्तर का निवारण करने के लिये है। इस विषय में चित्सुखी में इस प्रकार कहा है—'स्वाश्रय से सम्मत पदार्थ में स्थित अत्यन्ताभाव का सब पदार्थों में प्रतियोगित्व रहता है, यही सब पदार्थों का मिथ्यात्व है।

**विवरण—**घटादि किसी कार्य की समवाय से स्थिति, कपालादि अपने कारण-प्रदेश के अतिरिक्त प्रदेश में नहीं हुआ करती। अर्थात् कपाल, तन्तु आदि कारण, जिस स्थान में होते हैं उससे भिन्न स्थान में घट, पट आदि कार्य हुआ करते हैं ऐसा कोई नहीं मानता, और वे कार्य, कपालादि कारणों में भी नहीं रहते, यह प्रमाणसिद्ध है। परन्तु उसके विपरीत प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। इसलिये सब कार्य मिथ्या हैं। इस विषय में "यदसद्भासमानं तन्मिथ्या स्वप्नगजादिवत्।" जो वास्तव में न होकर भी भासता हो वह मिथ्या है। जैसे स्वप्नगजादि—यह सांप्रदायिकों का अभ्युपगम है। ब्रह्मभिन्न समस्त पदार्थों का मिथ्यात्व बतानेवाले अनुमान-प्रमाण का उपन्यास ऊपर हम कर ही चुके हैं। 'परन्तु उस अनुमान का प्रत्यक्ष प्रमाण से बाध होता है, क्योंकि सृष्टि में सभी पदार्थ प्रत्यक्ष प्रतीत होते हैं। इसलिये पूर्वोक्त अनुमान से उनका मिथ्यात्व सिद्ध नहीं हो सकता' परन्तु यह आक्षेप उचित नहीं है। क्योंकि चन्द्रबिम्ब, एक प्रादेशमात्र हमें प्रत्यक्ष दीखता है। परन्तु शब्द-प्रमाण से उस प्रत्यक्ष-प्रत्यय का बाध हो जाता है। इससे जो प्रत्यक्ष दिखाई दे वह सत्य ही है—यह नियम नहीं। 'नेह नानास्ति किञ्चन' इस ब्रह्म में नानात्व (द्वैत) का लेश तक नहीं है। इत्यादि अर्थ के आगम, ब्रह्म


१. दमसंभव०'—इति पाठान्तरम्। २. सर्वेषामपि भावानामाश्रयत्वेन सम्मते अत्यन्ताभावं प्रति यत् प्रतियोगित्वम्, तदेव तेषां मृषात्मत्वं मिथ्यात्वमितियावत्। भावानां सताम्। सत्त्वञ्च कालसंबन्धित्वम्, तेन अभावस्यापि परिग्रहः स्वाश्रयत्वेन स्वोपादानत्वेन, 'स्वपदं मिथ्यात्वेन अभिमतपरम्। सम्मते प्रतीते, न तु प्रमिते। तेन च बाधः परिहृतः। सप्तम्यर्थो निष्ठात्वम्। तथा च सर्वेषां घटपटादीनां भावानां सतां स्वाश्रयत्वेन स्वोपादानत्वेन सम्मताः प्रतीता ये तन्त्वादयः तन्निष्ठः यः स्वात्यन्ताभावः तत्प्रतियोगित्वमेव तेषां मिथ्यात्वमिति श्लोकार्थः।

मिथ्यात्वलक्षणम् ] अनुमानपरिच्छेदः १७१

आगम, ब्रह्म भिन्न वस्तु का निषेध करते हैं। इस कारण समस्त द्वैत, मिथ्या है, यह सिद्ध होता है। इस प्रकार हमने यहाँ पर घटादि पदार्थों के मिथ्यात्व का केवल दिग्दर्शन करा दिया है।

अब मूल ग्रन्थ को विवृत करते हैं—

स्वाश्रयत्व से अभिमत जितना पदार्थ हो उसमें स्थित जो ‘स्व’ का (आश्रित का) अत्यन्ताभाव, उसका प्रतियोगित्व ही मिथ्यात्व है। भाव रूप से स्वीकार किये हुए घटादि पदार्थों के आश्रय रूप से (अधिकरण) अभिमत कपालादि उपादान-कारणभूत पदार्थ में विद्यमान, वास्तविक रूप से (वस्तुतः) घट का जो अत्यन्ताभाव, उसका प्रतियोगित्व (घट का वस्तुतः वहाँ न रहना) ही मिथ्यात्व है। इसी का प्रकृत विषय से सम्बन्धित दूसरा उदाहरण—उपर्युक्त लक्षण में ‘स्व’ शब्द से समस्त प्रपञ्च की विवक्षा है। उसके आश्रय रूप से ब्रह्म है। इस प्रकार स्वाश्रयत्व से अभिमत ब्रह्म में स्थित समस्त-प्रपंच का अत्यन्ताभाव, उसका प्रतियोगित्व समत-प्रपंच में है। अर्थात् ब्रह्म में प्रपञ्च का लेश तक नहीं है, यही प्रपंच का मिथ्यात्व है।

**शंका—**इस मिथ्यात्व के लक्षण में ‘अभिमत’ पद का क्यों निवेश किया है ? ‘स्वाश्रययावन्निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वम्’ इतना ही मिथ्यात्व का लक्षण किया जाय।

**समाधान—**ऐसी शंका करना ठीक नहीं। क्योंकि सभी स्वाश्रयों में स्वात्यन्ताभाव का असंभव (स्वयं के ही अत्यन्ताभाव का जो असम्भव, उसका निवारण करने के लिये लक्षण में ‘अभिमत’ पद की आवश्यकता है। अन्यथा ‘जितना भी स्वाश्रय’ शब्द से शुक्त्यादि भी गृहीत हो सकते हैं, उनमें रहने वाला जो अत्यन्ताभाव शुक्त्यादिकों का ही अत्यन्ताभाव लेना होगा, परन्तु यह तो असम्भव ही है। इसलिये लक्षण, असम्भव दोष से दूषित होता है, उसके निवारणार्थ ‘अभिमत’ पद का निवेश, लक्षण में किया गया है। वस्तुतः शुक्त्यादि, रजतादिकों का आश्रय नहीं है, तथापि ‘इदं रजतम्’ यह भ्रम होने पर शुक्ति को उसका आश्रय मानना पड़ता है। इस प्रकार स्वाश्रयत्व से अभिमत शुक्ति आदि पदार्थों में जो रजतादिकों का अत्यन्ताभाव उसका प्रतियोगित्व, शुक्तिरूप्यादिकों में है, इसलिये लक्षण में ‘अभिमत’ पद का निवेश करना उचित ही है।

**शंका—**यदि ‘अभिमत’ पद के निवेश करने से ही मिथ्यात्व लक्षण का निर्वाह हो जाता है तो पुनः ‘यावत्’ पद के निवेश की क्या आवश्यकता ?

**समाधान—**लक्षण में ‘अभिमत’ पद के निवेश करने पर भी जब तक ‘यावत्’ पद का निवेश न किया जाय, तब तक लक्षण निर्दुष्ट नहीं हो पाता। लक्षण में ‘यावत्’ पद के निवेश न करने पर कपि-संयोग के आश्रय रूप से अभिमत जो वृक्ष है, उस पर मूलावच्छेद से (मूल प्रदेश में विद्यमान) विद्यमान जो कपि-संयोग का अत्यन्ताभाव, उसका प्रतियोगित्व शाखावच्छेद से विद्यमान कपिसंयोग में है। इस कारण सामाना-

१७२ | वेदान्तपरिभाषा | [ मिथ्यात्वानुमानम्

धिकरणरूप अर्थान्तर की सिद्धि हो जाती है। इस अर्थान्तर के निवारणार्थ लक्षण में ‘यावत्’ पद का निवेश अवश्य करना चाहिये। जिससे, स्वाश्रयत्व से अभिमत जितना भी शाखादि पदार्थ है उसमें कपि-संयोग का अत्यन्ताभाव नहीं है। इस कारण अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी, कपिसंयोग नहीं बन पाता। इसलिये ‘अर्थान्तरसिद्धि’ रूप दोष नहीं है। हमारे मत में ‘तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः’ पूर्वोक्त सत्य-ज्ञानानन्त-लक्षण ब्रह्माख्य आत्मा में आकाश उत्पन्न हुआ। ऐसी श्रुति होने से तार्किकों के द्वारा नित्य माने गये आकाशादि में भी जन्यत्व ज्ञात होता है। जन्य होने से वे कार्य हैं। कोई भी कार्य, अपने कारण के आश्रित रहता है। इस कारण आकाशादि सभी कार्य, ब्रह्मरूप आश्रय में स्थित है। इसलिये पूर्वोक्त लक्षण पर अव्याप्ति दोष नहीं आ पाता। यह लक्षण, प्राचीन विद्वानों को भी सम्मत है। इस विषय में ‘सर्वेषामेव’ इत्यादि चित्सुखाचार्य की कारिका उद्धृत की गई है।

इस प्रकार प्राचीन वेदान्तियों के द्वारा किये गये जगन्मिथ्यात्व-साधक अनुमान का उपपादन कर, नवीन वेदान्तियों का मिथ्यात्व के अनुमान का प्रकार बताते हैं—

¹यद्वा-अयं पटः एतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभाव-प्रतियोगी पटत्वात् पटान्तरवदित्या²द्यनुमानं मिथ्यात्वे प्रमाणम् । तदुक्तम्— ³अंशिनः स्वांशगात्यन्ताभावस्य प्रतियोगिनः । अंशित्वादितरांशिव दिगेषैव गुणादिषु ॥ इति । चि० ८ ।

**अर्थ—**अथवा ( १ ) यह पट, एतत्तन्तुनिष्ठ अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी है। (२) क्योंकि उसमें पटत्व है। ( ३ ) अन्य पट के समान। यह अनुमान, मिथ्यात्व में प्रमाण है। इस विषय में चित्सुखाचार्य ने इस प्रकार कहा है—( १ ) अवयवी पदार्थ में, उसके अवयव में विद्यमान जो अत्यन्ताभाव, उसकी प्रतियोगिता होती है। ( २ ) क्योंकि उसमें अवयवित्व है। ( ३ ) अन्य अवयवी के समान। गुणादिकों के मिथ्यात्व का अनुमान करने का यही मार्ग है।


१. प्राचीनोक्तमनुमानप्रयोगमुपपाद्य नवीनोक्तमनुमानप्रयोगमाह—यद्वेति ।
२. ‘त्यनुमा०’—इति पाठान्तरम् ।
३. चित्सुखाचार्योक्तेन श्लोकेन अनुमानप्रयोगं दर्शयति—अंशिन इति । अंशिनः अवयविनः । स्वांशगात्यन्ताभावस्य स्वोपादाननिष्ठात्यन्ताभावस्य । ‘स्वपदं पक्षीभूत-पटविशेषपरम् । अनेन अवयविविशेषस्य पक्षत्वं—स्वोपादाननिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वस्य च साध्यत्वं दर्शितम् । अंशित्वात् इति हेतुः । कार्यत्वेन सम्मतत्वादित्यर्थः । इतरांशिव इतरांशिन इवेत्यर्थः । यथा इतरांशिनमंशित्वात् एतदवयवनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वं, तद्वत् एतदंशिनोऽपि अंशित्वात् एतदवयव-निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वसिद्धौ मिथ्यात्वसिद्धिः ।

मिथ्यात्वानुमानम् ] अनुमानपरिच्छेदः १७३

विवरण—यहाँ '(१) यह पट, इस तन्तुनिष्ठ अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी है। (२) क्योंकि उसमें पटत्व है। (३) अन्य पटों के समान। इस अनुमान में 'अयं पटः' इस शब्द से वह पूरा (सम्पूर्ण) पट विवक्षित है। उसका उसी पट में विद्यमान किसी एक तन्तु में अत्यन्ताभाव है। इस कारण वह पट एक तन्तु में विद्यमान अपने अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी होता है। यहाँ पर एक तन्तु के अवच्छेद से रहने वाला पट का जो अत्यन्ताभाव, वह 'तादात्म्य' सम्बन्ध से रहता है, यह समझना चाहिये। जिससे पहले की तरह अर्थान्तरता नहीं हो पायेगी। यथा— एक तन्तु पर संयोग सम्बन्ध से जैसे पट रहता है वैसे ही उस पट का अत्यन्ताभाव भी रहता है। अतः प्रतियोगी और उसके अभाव का सामानाधिकरण्य ही अर्थान्तर है। और इस अनुमान से उसी की सिद्धि होती है। मिथ्यात्व की सिद्धि नहीं हो पाती। परन्तु 'तादात्म्य संबन्ध से वृत्ति' विशेषण देने पर, अर्थान्तर की सिद्धि नहीं होगी। क्योंकि तादात्म्य सम्बन्ध से ही अभाव लेना अभीष्ट होने से संयोग सम्बन्ध से अभाव का ग्रहण ही नहीं किया जा सकेगा।

इसी तरह एक और 'व्यधिकरण-धर्मानवच्छिन्न-प्रतियोगिताकत्व' विशेषण, अत्यन्ताभाव में जोड़ देना चाहिए। (व्यधिकरण धर्मावच्छिन्न अभाव का ग्रहण करने पर अर्थान्तर नहीं होता)। तथा हि—तन्तु पर तादात्म्य-सम्बन्ध से तथा पटत्व धर्म से पट का अत्यन्ताभाव न रहने पर भी 'घटत्व' धर्म से वह रहता है, क्योंकि 'घटत्वेन पटो नास्ति' इस तन्तु पर घटत्वरूप से पट नहीं है, प्रतीति होती है। ऐसे अभाव को ही व्यधिकरण-धर्मावच्छिन्न-प्रतियोगिताक अभाव कहते हैं। अर्थात् 'घटत्वेन पाटो नास्ति' इस अभाव की पट में रहने वाली जो प्रतियोगिता, वह पट के व्यधिकरण (पट पर न रहने वाले घटत्व) धर्म से, अवच्छिन्न (युक्त) है। ऐसे अभाव का ग्रहण कर मिथ्यात्व-साधक पूर्वोक्त अनुमान से तन्तु पर घटत्वेन पट का अभाव रूप अर्थान्तर की ही सिद्धि होती है। इस दोष के निवारणार्थ 'व्यधिकरण धर्म से जिसकी प्रतियोगिता अवच्छिन्न नहीं है' इतना विशेषण लगाकर अत्यन्ताभाव का ग्रहण करना चाहिए। जिससे व्यधिकरणधर्मावच्छिन्न अभाव को लेकर अर्थान्तरसिद्धि रूप दोष, उपर्युक्त अनुमान पर नहीं आता। क्योंकि अब उस अभाव का ग्रहण ही नहीं हो सकेगा।

अब 'पटः' शब्द से जिस किसी भी पट को पक्ष न बनाकर 'अयं पटः' इसे पक्ष बनाया है। कारण यह है कि जिस किसी पट को पक्ष बनाकर 'एतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्व' को साध्य किया जाय तो वही अर्थान्तर दोष पुनः प्राप्त होता है। क्योंकि अन्य कोई भी पट, एतत्तन्तुनिष्ठ नहीं होता। इसलिये 'अयं पटः' इतना पक्ष कोटि में रखना पड़ा। इसी प्रकार इसी दोष के निवारणार्थ 'एतत्कालिनत्व' विशेषण भी देना चाहिये। इस पर कदाचित् आप यह कहें कि 'इस तन्तु में पट का समवाय है' इस प्रत्यक्ष अनुभव का बाध होगा। परन्तु यह भी उचित नहीं। क्योंकि प्रत्यक्ष

१७४ | वेदान्तपरिभाषा | [ अनुमानस्य प्रत्यक्षाऽविरोधः

प्रमाण, भ्रम और प्रमा दोनों के लिए साधारण होने से 'चन्द्र प्रादेशमात्र है' इस प्रत्यक्ष अनुभव का शास्त्र से जैसा बाध होता है वैसे समवाय से प्रत्यक्ष का कहीं बाध तो नहीं होता, इस प्रकार के सन्देह मात्र से ही समवाय का प्रत्यक्ष, बाधित समझा जाता है । इसलिए तन्तु और पट के समवाय के प्रत्यक्ष का बाघ रूप दोष नहीं होता । इस विषय में चित्सुखाचार्य की सम्मति ऊपर निर्दिष्ट कर ही चुके हैं । इसी प्रकार अन्यान्य अनुमानों में भी बताया जा सकता है । 'रूप, रूपी पदार्थ में विद्यमान अपने अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी है । क्योंकि उस पर गुणत्व है । स्पर्श के समान । क्रिया आदि में भी ऐसी ही अनुमानों की कल्पना कर लेनी चाहिए ।

किन्तु आपका यह मिथ्यात्वानुमान 'सन् घट:' इत्यादि प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित होता है । यह शङ्का और उसका समाधान ग्रन्थकार स्वयं करते हैं--

न च घटादेर्मिथ्यात्वे सन् घट इति प्रत्यक्षेण¹ बाधः । अधिष्ठानब्रह्मसत्तायास्तत्र विषयतया घटादेः सत्यत्वासिद्धेः । न च नीरूपस्य ब्रह्मणः कथं चाक्षुषादिज्ञान-विषयतेति वाच्यम् । नीरूपस्यापि रूपादेः प्रत्यक्षविषयत्वात् । न च नीरूपस्य द्रव्यस्य चक्षुराद्ययोग्यत्वमिति नियमः । ²मन्मते ब्रह्मणो द्रव्यत्वासिद्धेः । गुणाश्रयत्वं समवायिकारणत्वं वा द्रव्यत्वमिति तेऽभिमतम् । न हि निर्गुणस्य ब्रह्मणो गुणाश्रयता । नापि समवायिकारणता, समवायासिद्धेः । अस्तु वा द्रव्यत्वं ब्रह्मणः, तथाऽपि नीरूपस्य कालस्येव चाक्षुषादि-ज्ञान-विषयत्वेऽपि न विरोधः ।

अर्थ— घटादि ब्रह्माभिन्न पदार्थों में, ब्रह्मभिन्नत्व होने से ही मिथ्यात्व है, इस प्रकार अनुमान करने पर 'सन् घट:'--विद्यमान-घट,-इस प्रत्यक्ष ज्ञान से उसका बाध होता है, यह कहना ठीक नहीं प्रतीत होता है । क्योंकि यह 'विद्यमान घट' इस ज्ञान में अधिष्ठानरूप ब्रह्मसत्ता विषय है, इस कारण उस सत्ता से पृथक् स्थित घटादि पदार्थों के सत्यत्व की सिद्धि नहीं होती ।


१. 'क्षविरोध:'-इति पाठान्तरम् ।
२. मन्मते अद्वैतवेदान्तिमते । तथा च द्रव्यप्रत्यक्षे चक्षुषो रूपापेक्षा, न तु अन्यप्रत्यक्षे । ब्रह्म तु न द्रव्यम् । तथा चोक्तं विवरणे "ब्रह्म तु न द्रव्यं प्रमाणाभावात् । समवायिकारणत्वाद् द्रव्यमिति चेत्, न, आरम्भवादानभ्युपगमात् । उपादानकारणत्वाद् द्रव्यमिति चेत्, न, गुणादीनामपि ग्रहणधर्मत्वादि-धर्मोपादानत्वात्" इति । तस्मात् तस्य प्रत्यक्षत्वं युक्तमितिभावः ।

अनुमानस्य प्रत्यक्षाऽविरोधः ] अनुमानपरिच्छेदः १७५

इस पर आप यदि पूछें कि रूपरहित ब्रह्म, चाक्षुष ज्ञान का विषय कैसे होता है ? तो उसका उत्तर यह होगा कि रूपरहित रूप में प्रत्यक्षविषयता जैसी आपने मानी है। वैसी ही रूपरहित ब्रह्म में चाक्षुषज्ञान-विषयता के होने में कोई विरोध नहीं है।

परन्तु नीरूप-रूप, गुण है, और नीरूप-द्रव्य में चाक्षुष प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं होती—ऐसा हमारा विशेष नियम है, तो यह कहना भी ठीक नहीं। क्योंकि हमारे मत में 'ब्रह्म' द्रव्य नहीं है। कारण यह है कि 'गुणाश्रयत्व या समवायि-कारणत्व को ही तार्किकों ने 'द्रव्य' माना है।' परन्तु निर्गुण-ब्रह्म में गुणाश्रयत्व का सम्भव नहीं। समवायिकारणत्व रूप लक्षण का ब्रह्म में सम्भव नहीं। क्योंकि 'समवाय' नामक कोई पदार्थ ही नहीं है। अथवा 'तुष्यतु दुर्जनन्याय' से 'ब्रह्म' को द्रव्य मान लेने पर भी जैसे रूपरहित काल का प्रत्यक्ष होता है वैसे ही 'ब्रह्म' का भी यदि चाक्षुष-प्रत्यक्ष हो तो इसमें किसी प्रकार का विरोध नहीं है।

विवरण—"ब्रह्म से भिन्न समस्त प्रपंच मिथ्या" यह अनुमान ऊपर किया गया है। परन्तु ब्रह्म से भिन्न घट-पटादि समस्त पदार्थ, 'असत्' न होकर, 'सत्' हैं। यह अनुभव प्रत्यक्ष है और इस प्रत्यक्ष ज्ञान से अनुमान का बाध हो जाता है।

परन्तु ऐसा समझना अनुचित है, क्योंकि 'सन् घटः' इत्यादि प्रत्यक्षज्ञान में 'सन्' और 'घट' ये दो विषय हैं। उनमें 'सन्' इस ज्ञान का विषय 'सत् ब्रह्म' है और 'घट' इस ज्ञान का विषय, 'सद्भिन्न असत् घट' है। इसलिए 'सन् घटः' इस प्रत्यक्षज्ञान का विषय, अधिष्ठान 'ब्रह्मसत्ता' होने से, उससे भिन्न की (घटादि असत् पदार्थों की) सत्यता सिद्ध नहीं होती।

शंका—रूपरहित ब्रह्म का चाक्षुष-प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, तब 'सन् घटः' इस प्रत्यक्ष का विषय 'सत् ब्रह्म' है, कैसे कह सकते हैं ?

समाधान—'नीरूप पदार्थ का प्रत्यक्ष नहीं होता' आपका यह नियम, अव्यभिचारी नहीं है, किन्तु व्यभिचारी है। क्योंकि रूप स रहित रूपादिकों का प्रत्यक्ष होता है। अतः नीरूप-पदार्थ का प्रत्यक्ष-ज्ञान नहीं होता, यह नियम व्यभिचरित है।

इस पर आप यह कहें कि 'रूपरहित रूपादि गुणों का प्रत्यक्ष नहीं होता' ऐसा नियम हमारा नहीं है, किन्तु 'रूपरहित द्रव्य में चाक्षुष-प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं होती' यह नियम है।

तों यह भी ठीक नहीं, क्योंकि हमारे मत में 'ब्रह्म' की द्रव्य में गणना नहीं है। अतः द्रव्य के विषय में आपका विशेष नियम होने पर भी हमारी कोई हानि नहीं है।

शंका—'ब्रह्म' में द्रव्यत्व नहीं है, यह आप कैसे कहते हैं ?

समाधान—तार्किकों ने द्रव्य के दो लक्षण दिये हैं, उन दोनों की ब्रह्म में सम्भावना न हो सकने से उसमें द्रव्यत्व नहीं है। आपके यहाँ 'गुणाश्रयत्वं द्रव्यत्वम्'-गुण के