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विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

७६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५


अन्योन्यमूचुस्ते सर्वे सम्यगाह महामुनिः।
भ्रातॄणां पदवी चैव गन्तव्या नात्र संशयः॥ ९८
ज्ञात्वा प्रमाणं पृथ्व्याश्च प्रजास्त्रक्ष्यामहे ततः।
तेऽपि तेनैव मार्गेण प्रयाताः सर्वतोमुखम्।
अद्यापि न निवर्त्तन्ते समुद्रेभ्य इवापगाः॥ ९९
ततः प्रभृति वै भ्राता भ्रातुरन्वेषणे द्विज।
प्रयातो नश्यति तथा तन्न कार्यं विजानता॥ १००
तांश्चापि नष्टान् विज्ञाय पुत्रान् दक्षः प्रजापतिः।
क्रोधं चक्रे महाभागो नारदं स शशाप च॥ १०१
सर्गकामस्ततो विद्वान्स मैत्रेय प्रजापतिः।
षष्टिं दक्षोऽसृजत्कन्या वैरुण्यामिति नः श्रुतम्॥ १०२
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।
सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने॥ १०३
द्वे चैव बहुपुत्राय द्वे चैवाङ्गिरसे तथा।
द्वे कृशाश्वाय विदुषे तासां नामानि मे शृणु॥ १०४
अरुन्धती वसुर्यामिर्लम्बा भानुर्मरुत्वती।
सङ्कल्पा च मुहूर्त्ता च साध्या विश्वा च तादृशी।
धर्मपत्न्यो दश त्वेतास्तास्वपत्यानि मे शृणु॥ १०५
विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्या साध्यानजायत।
मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोश्च वसवः स्मृताः।
भानोस्तु भानवः पुत्रा मुहूर्तायां मुहूर्त्तजाः॥ १०६
लम्बायाश्चैव घोषोऽथ नागवीथी तु यामिजा॥ १०७
पृथिवीविषयं सर्वमरुन्धत्यामजायत।
सङ्कल्पायास्तु सर्वात्मा जज्ञे सङ्कल्प एव हि॥ १०८
ये त्वनेकवसुप्राणदेवा ज्योतिःपुरोगमाः।
वसवोऽष्टौ समाख्यातास्तेषां वक्ष्यामि विस्तरम्॥ १०९
आपो ध्रुवश्च सोमश्च धर्मश्चैवानिलोऽनलः।
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवो नामभिः स्मृताः॥ ११०
आपस्य पुत्रो वैतण्डः श्रमः शान्तो ध्वनिस्तथा।
ध्रुवस्य पुत्रो भगवान्कालो लोकप्रकालनः॥ १११
सोमस्य भगवान्वर्चा वर्चस्वी येन जायते॥ ११२
धर्मस्य पुत्रो द्रविणो हुतहव्यवहस्तथा।
मनोहरायां शिशिरः प्राणोऽथ वरुणस्तथा॥ ११३


तब वे सब आपसमें एक-दूसरेसे कहने लगे—'महामुनि नारदजी ठीक कहते हैं; हमको भी, इसमें सन्देह नहीं, अपने भाइयोंके मार्गका ही अवलम्बन करना चाहिये। हम भी पृथिवीका परिमाण जानकर ही सृष्टि करेंगे।' इस प्रकार वे भी उसी मार्गसे समस्त दिशाओंको चले गये और समुद्रगत नदियोंके समान आजतक नहीं लौटे॥ ९७—९९॥ हे द्विज! तबसे ही यदि भाईको खोजनेके लिये भाई ही जाय तो वह नष्ट हो जाता है, अतः विज्ञ पुरुषको ऐसा न करना चाहिये॥ १००॥

महाभाग दक्ष प्रजापतिने उन पुत्रोंको भी गये जान नारदजीपर बड़ा क्रोध किया और उन्हें शाप दे दिया॥ १०१॥ हे मैत्रेय! हमने सुना है कि फिर उस विद्वान् प्रजापतिने सर्गवृद्धिकी इच्छासे वैरुणीसे साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं॥ १०२॥ उनमेंसे उन्होंने दस धर्मको, तेरह कश्यपको, सत्ताईस सोम (चन्द्रमा)-को और चार अरिष्टनेमिको दीं॥ १०३॥ तथा दो बहुपुत्र, दो अंगिरा और दो कृशाश्वको विवाहीँ। अब उनके नाम सुनो॥ १०४॥ अरुन्धती, वसु, यामी, लम्बा, भानु, मरुत्वती, संकल्पा, मुहूर्त्ता, साध्या और विश्वा—ये दस धर्मकी पत्नियाँ थीं; अब तुम इनके पुत्रोंका विवरण सुनो॥ १०५॥ विश्वाके पुत्र विश्वेदेवा थे, साध्यासे साध्यगण हुए, मरुत्वतीसे मरुत्वान् और वसुसे वसुगण हुए तथा भानुसे भानु और मुहूर्तासे मुहूर्त्ताभिमानी देवगण हुए॥ १०६॥ लम्बासे घोष, यामीसे नागवीथी और अरून्धतीसे समस्त पृथिवी-विषयक प्राणी हुए तथा संकल्पासे सर्वात्मक संकल्पकी उत्पत्ति हुई॥ १०७-१०८॥

नाना प्रकारका वसु (तेज अथवा धन) ही जिनका प्राण है ऐसे ज्योति आदि जो आठ वसुगण विख्यात हैं, अब मैं उनके वंशका विस्तार बताता हूँ॥ १०९॥ उनके नाम आप, ध्रुव, सोम, धर्म, अनिल (वायु), अनल (अग्नि), प्रत्यूष और प्रभास कहे जाते हैं॥ ११०॥ आपके पुत्र वैतण्ड, श्रम, शान्त और ध्वनि हुए तथा ध्रुवके पुत्र लोक-संहारक भगवान् काल हुए॥ १११॥ भगवान् वर्चा सोमके पुत्र थे जिनसे पुरुष वर्चस्वी (तेजस्वी) हो जाता है और धर्मके उनकी भार्या मनोहरासे द्रविण, हुत एवं हव्यवह तथा शिशिर, प्राण और वरुण नामक पुत्र हुए॥ ११२-११३॥

अ० १५] * प्रथम अंश * ७७

अनिलस्य शिवा भार्या तस्याः पुत्रो मनोजवः। अविज्ञातगतिश्चैव द्वौ पुत्रावनिलस्य तु ॥ ११४ अग्निपुत्रः कुमारस्तु शरस्तम्बे व्यजायत। तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठजाः ॥ ११५ अपत्यं कृत्तिकानां तु कार्तिकेय इति स्मृतः ॥ ११६ प्रत्यूषस्य विदुः पुत्रमृषि नाम्नाथ देवलम्। द्वौ पुत्रौ देवलस्यापि क्षमावन्तौ मनीषिणौ ॥ ११७ बृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मचारिणी। योगसिद्धा जगत्कृत्स्नमसक्ता विचरत्युत। प्रभासस्य तु सा भार्या वसूनामष्टमस्य तु ॥ ११८ विश्वकर्मा महाभागस्तस्यां जज्ञे प्रजापतिः। कर्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशानां च वर्द्धकी ॥ ११९ भूषणानां च सर्वेषां कर्ता शिल्पवतां वरः। यः सर्वेषां विमानानि देवतानां चकार ह। मनुष्याश्चोपजीवन्ति यस्य शिल्पं महात्मनः ॥ १२० तस्य पुत्रास्तु चत्वारस्तेषां नामानि मे शृणु। अजैकपादहिर्बुध्न्यस्त्वष्टा रुद्रश्च वीर्यवान्। त्वष्टुश्चाप्यात्मजः पुत्रो विश्वरूपो महातपाः ॥ १२१ हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः। वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतः स्मृतः ॥ १२२ मृगव्याधश्च शर्वश्च कपाली च महामुने। एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः। शतं त्वेकं समाख्यातं रुद्राणाममितौजसाम् ॥ १२३ कश्यपस्य तु भार्या यास्तासां नामानि मे शृणु। अदितिर्दितिर्दनुश्चैवारिष्टा च सुरसा खसा ॥ १२४ सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा। कद्रुर्मुनिश्छ धर्मज्ञ तदपत्यानि मे शृणु ॥ १२५ पूर्वमन्वन्तरे श्रेष्ठा द्वादशासन्सुरोत्तमाः। तुषिता नाम तेऽन्योऽन्यमूचुर्वैवस्वतेऽन्तरे ॥ १२६ उपस्थितेऽतियशसश्चाक्षुषस्यान्तरे मनोः। समवायीकृताः सर्वे समागम्य परस्परम् ॥ १२७

अनिलकी पत्नी शिवा थी; उससे अनिलके मनोजव और अविज्ञातगति—ये दो पुत्र हुए ॥ ११४ ॥ अग्नि के पुत्र कुमार शरस्तम्ब (सरकण्डे)-से उत्पन्न हुए थे, ये कृत्तिकाओंके पुत्र होनेसे कार्तिकेय कहलाये। शाख, विशाख और नैगमेय इनके छोटे भाई थे॥ ११५-११६॥ देवल नामक ऋषिको प्रत्यूषका पुत्र कहा जाता है। इन देवलके भी दो क्षमाशील और मनीषी पुत्र हुए ॥ ११७॥

बृहस्पतिजीकी बहिन वरस्त्री, जो ब्रह्मचारिणी और सिद्ध योगिनी थी तथा अनासक्त भावसे समस्त भूमण्डलमें विचरती थी, आठवें वसु प्रभासकी भार्या हुई ॥ ११८ ॥ उससे सहस्रों शिल्पों (कारीगरियों)-के कर्ता और देवताओंके शिल्पी महाभाग प्रजापति विश्वकर्माका जन्म हुआ॥ ११९॥ जो समस्त शिल्पकारोंमें श्रेष्ठ और सब प्रकारके आभूषण बनानेवाले हुए तथा जिन्होंने देवताओंके सम्पूर्ण विमानोंकी रचना की और जिन महात्माकी [ आविष्कृता ] शिल्पविद्याके आश्रयसे बहुत-से मनुष्य जीवन-निर्वाह करते हैं ॥ १२०॥ उन विश्वकर्माके चार पुत्र थे; उनके नाम सुनो। वे अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, त्वष्टा और परम पुरुषार्थी रुद्र थे। उनमेंसे त्वष्टाके पुत्र महातपस्वी विश्वरूप थे॥ १२१॥ हे महामुने! हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली—ये त्रिलोकीके अधीश्वर ग्यारह रुद्र कहे गये हैं। ऐसे सैकड़ों महातेजस्वी एकादश रुद्र प्रसिद्ध हैं ॥ १२२-१२३॥

जो [ दक्षकन्याएँ ] कश्यपजीकी स्त्रियाँ हुईं उनके नाम सुनो—वे अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, खसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रु और मुनि थीं। हे धर्मज्ञ! अब तुम उनकी सन्तानका विवरण श्रवण करो ॥ १२४-१२५॥

पूर्व (चाक्षुष) मन्वन्तरमें तुषित नामक बारह श्रेष्ठ देवगण थे। वे यशस्वी सुरश्रेष्ठ चाक्षुष मन्वन्तरके पश्चात् वैवस्वत-मन्वन्तरके उपस्थित होनेपर एक-दूसरेके पास जाकर मिले और परस्पर कहने लगे—॥१२६-१२७॥

७८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५

आगच्छत द्रुतं देवा अदितिं सम्प्रविश्य वै।<br>मन्वन्तरे प्रसूयामस्तन्नः श्रेयो भवेदिति ॥ १२८"हे देवगण! आओ, हमलोग शीघ्र ही अदितिके गर्भमें प्रवेश कर इस वैवस्वत-मन्वन्तरमें जन्म लें, इसमें हमारा हित है" ॥ १२८ ॥ इस प्रकार चाक्षुष-मन्वन्तरमें निश्चयकर उन सबने मरीचिपुत्र कश्यपजीके यहाँ दक्षकन्या अदितिके गर्भसे जन्म लिया ॥ १२९ ॥ वे अति तेजस्वी उससे उत्पन्न होकर विष्णु, इन्द्र, अर्यमा, धाता, त्वष्टा, पूषा, विवस्वान्, सविता, मैत्र, वरुण, अंशु और भग नामक द्वादश आदित्य कहलाये ॥ १३०-१३१ ॥ इस प्रकार पहले चाक्षुष-मन्वन्तरमें जो तुषित नामक देवगण थे वे ही वैवस्वत-मन्वन्तरमें द्वादश आदित्य हुए ॥ १३२ ॥
एवमुक्त्वा तु ते सर्वे चाक्षुषस्यान्तरे मनोः।<br>मारीचात्कश्यपाज्जाता आदित्या दक्षकन्यया ॥ १२९
तत्र विष्णुश्च शक्रश्च जज्ञाते पुनरेव हि।<br>अर्यमा चैव धाता च त्वष्टा पूषा तथैव च ॥ १३०
विवस्वान्सविता चैव मित्रो वरुण एव च।<br>अंशुर्भगश्चातितेजा आदित्या द्वादश स्मृताः ॥ १३१
चाक्षुषस्यान्तरे पूर्वमासन्ये तुषिताः सुराः।<br>वैवस्वतेऽन्तरे ते वै आदित्या द्वादश स्मृताः ॥ १३२
याः सप्तविंशतिः प्रोक्ताः सोमपत्न्योऽथ सुव्रताः।<br>सर्वा नक्षत्रयोगिन्यस्तन्नाम्यश्चैव ताः स्मृताः ॥ १३३सोमकी जिन सत्ताईस सुव्रता पत्नियोंके विषयमें पहले कह चुके हैं वे सब नक्षत्रयोगिनी हैं और उन नामोंसे ही विख्यात हैं ॥ १३३ ॥ उन अति तेजस्विनियोंसे अनेक प्रतिभाशाली पुत्र उत्पन्न हुए। अरिष्टनेमिकी पत्नियोंके सोलह पुत्र हुए। बुद्धिमान् बहुपुत्रकी भार्या [ कपिला, अतिलोहिता, पीता और असिता *नामक ] चार प्रकारकी विद्युत् कही जाती हैं ॥ १३४-१३५ ॥ ब्रह्मर्षियोंसे सत्कृत ऋचाओंके अभिमानी देवश्रेष्ठ प्रत्यंगिरासे उत्पन्न हुए हैं तथा शास्त्रोंके अभिमानी देवप्रहरण नामक देवगण देवर्षि कृशाश्वकी सन्तान कहे जाते हैं ॥ १३६ ॥ हे तात ! [ आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, प्रजापति और वषट्कार] ये तैंतीस वेदोक्त देवता अपनी इच्छानुसार जन्म लेनेवाले हैं। कहते हैं, इस लोकमें इनके उत्पत्ति और निरोध निरन्तर हुआ करते हैं। ये एक हजार युगके अनन्तर पुनः-पुनः उत्पन्न होते रहते हैं ॥ १३७-१३८ ॥ हे मैत्रेय ! जिस प्रकार लोकमें सूर्यके अस्त और उदय निरन्तर हुआ करते हैं उसी प्रकार ये देवगण भी युग-युगमें उत्पन्न होते रहते हैं ॥ १३९ ॥
तासामपत्यान्यभवन्दीप्तान्यमिततेजसाम्।<br>अरिष्टनेमिपत्नीनामपत्यानीह षोडश ॥ १३४
बहुपुत्रस्य विदुषश्चतस्रो विद्युतस्स्मृताः ॥ १३५
प्रत्यङ्गिरसजाः श्रेष्ठा ऋचो ब्रह्मर्षिसत्कृताः।<br>कृशाश्वस्य तु देवर्षेर्देवप्रहरणाः स्मृताः ॥ १३६
एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव हि।<br>सर्वे देवगणास्तात त्रयस्त्रिंशत्तु छन्दजाः ॥ १३७
तेषामपीह सततं निरोधोत्पत्तिरुच्यते ॥ १३८
यथा सूर्यस्य मैत्रेय उदयास्तमनाविह।<br>एवं देवनिकायास्ते सम्भवन्ति युगे युगे ॥ १३९
दित्या पुत्रद्वयं जज्ञे कश्यपादिति नः श्रुतम्।<br>हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षश्च दुर्जयः ॥ १४०हमने सुना है दितिके कश्यपजीके वीर्यसे परम दुर्जय हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र तथा सिंहिका नामकी एक कन्या हुई जो विप्रचित्तिको विवाही गयी ॥ १४०-१४१ ॥ हिरण्यकशिपुके अति तेजस्वी और महापराक्रमी अनुह्लाद, ह्लाद, बुद्धिमान् प्रह्लाद और संह्लाद नामक चार पुत्र हुए जो दैत्यवंशको बढ़ानेवाले थे ॥ १४२ ॥
सिंहिका चाभवत्कन्या विप्रचित्तेः परिग्रहः ॥ १४१
हिरण्यकशिपोः पुत्राश्चत्वारः प्रथितौजसः।<br>अनुह्लादश्च ह्लादश्च प्रह्लादश्चैव बुद्धिमान्।<br>संह्लादश्च महावीर्या दैत्यवंशविवर्द्धनाः ॥ १४२

* ज्योतिःशास्त्रमें कहा है— वातं कपिला विद्युद्दातपायातिलोहिता। पीता वर्षाय विज्ञेया दुर्भिक्षाय सिता भवेत् ॥

अर्थात् कपिल (भूरी) वर्णकी बिजली वायु लानेवाली, अत्यन्त लोहित धूप निकालनेवाली, पीतवर्णा वृष्टि लानेवाली और सिता (श्वेत) दुर्भिक्षकी सूचना देनेवाली होती है।

अ० १५ ] * प्रथम अंश * ७९


तेषां मध्ये महाभाग सर्वत्र समदृग्वशी।
प्रह्लादः परमां भक्तिं य उवाच जनार्दने ॥ १४३
दैत्येन्द्रदीपितो वह्निः सर्वाङ्गोपचितो द्विज।
न ददाह च यं विप्र वासुदेवे हृदि स्थिते ॥ १४४
महार्णवान्तःसलिले स्थितस्य चलतो मही।
चचाल सकला यस्य पाशबद्धस्य धीमतः ॥ १४५
न भिन्नं विविधैः शस्त्रैर्यस्य दैत्येन्द्रपातितैः।
शरीरमद्रिकठिनं सर्वत्राच्युतचेतसः ॥ १४६
विषानलोज्ज्वलमुखा यस्य दैत्यप्रचोदिताः।
नान्ताय सर्पपतयो बभूवुरुरुतेजसः ॥ १४७
शैलैराक्रान्तदेहोऽपि यः स्मरन्पुरुषोत्तमम्।
तत्याज नात्मनः प्राणान् विष्णुस्मरण दंशितः ॥ १४८
पतन्तमुच्चादवनिर्मुपेत्य महामतिम्।
दधार दैत्यपतिना क्षिप्तं स्वर्गनिवासिना ॥ १४९
यस्य संशोषको वायुर्देहे दैत्येन्द्रयोजितः।
अवाप सङ्क्षयं सद्यश्चित्तस्थे मधुसूदने ॥ १५०
विषाणभङ्गमुन्मत्ता मदहानिं च दिग्गजाः।
यस्य वक्षःस्थले प्राप्ता दैत्येन्द्रपरिणामिताः ॥ १५१
यस्य चोत्पादिता कृत्या दैत्यराजपुरोहितैः।
बभूव नान्ताय पुरा गोविन्दासक्तचेतसः ॥ १५२
शम्बरस्य च मायानां सहस्रमतिमायिनः।
यस्मिन्प्रयुक्तं चक्रेण कृष्णस्य वितथीकृतम् ॥ १५३
दैत्येन्द्रसूदोपहृतं यस्य हालाहलं विषम्।
जरयामास मतिमानविकारममत्सरी ॥ १५४
समचेता जगत्यस्मिन्यः सर्वेष्वेव जन्तुषु।
यथात्मनि तथान्येषां परं मैत्रगुणान्वितः ॥ १५५
धर्मात्मा सत्यशौर्यादिगुणानामाकरः परः।
उपमानमशेषाणां साधूनां यः सदाभवत् ॥ १५६

हे महाभाग! उनमें प्रह्लादजी सर्वत्र समदर्शी और जितेन्द्रिय थे, जिन्होंने श्रीविष्णुभगवान्‌की परम भक्तिका वर्णन किया था ॥ १४३ ॥ जिनको दैत्यराजद्वारा दीप्त किये हुए अग्निने उनके सर्वांगमें व्याप्त होकर भी, हृदयमें वासुदेव भगवान्‌के स्थित रहनेसे नहीं जला पाया ॥ १४४ ॥ जिन महाबुद्धिमान्‌के पाशबद्ध होकर समुद्रके जलमें पड़े-पड़े इधर-उधर हिलने-डुलनेसे सारी पृथिवी हिलने लगी थी ॥ १४५ ॥ जिनका पर्वतके समान कठोर शरीर, सर्वत्र भगवच्चित्त रहनेके कारण दैत्यराजके चलाये हुए अस्त्र-शस्त्रोंसे भी छिन्न-भिन्न नहीं हुआ ॥ १४६ ॥ दैत्यराजद्वारा प्रेरित विषाग्निसे प्रज्वलित मुखवाले सर्प भी जिन महातेजस्वीका अन्त नहीं कर सके ॥ १४७ ॥ जिन्होंने भगवत्स्मरणरूपी कवच धारण किये रहनेके कारण पुरुषोत्तम भगवान्‌का स्मरण करते हुए पत्थरोंकी मार पड़नेपर भी अपने प्राणोंको नहीं छोड़ा ॥ १४८ ॥ स्वर्गनिवासी दैत्यपतिद्वारा ऊपरसे गिराये जानेपर जिन महामतिको पृथिवीने पास जाकर बीचहीमें अपनी गोदमें धारण कर लिया ॥ १४९ ॥ चित्तमें श्रीमधुसूदनभगवान्‌के स्थित रहनेसे दैत्यराजका नियुक्त किया हुआ सबका शोषण करनेवाला वायु जिनके शरीरमें लगनेसे शान्त हो गया ॥ १५० ॥ दैत्येन्द्रद्वारा आक्रमणके लिये नियुक्त उन्मत्त दिग्गजोंके दाँत जिनके वक्षःस्थलमें लगनेसे टूट गये और उनका सारा मद चूर्ण हो गया ॥ १५१ ॥ पूर्वकालमें दैत्यराजके पुरोहितोंकी उत्पन्न की हुई कृत्या भी जिन गोविन्दासक्तचित्त भक्तराजके अन्तका कारण नहीं हो सकी ॥ १५२ ॥ जिनके ऊपर प्रयुक्त की हुई अति मायावी शम्बरासुरकी हजारों मायाएँ श्रीकृष्णचन्द्रके चक्रसे व्यर्थ हो गयीं ॥ १५३ ॥ जिन मतिमान् और निर्मत्सरने दैत्यराजके रसोइयोंके लाये हुए हलाहल विषको निर्विकार-भावसे पचा लिया ॥ १५४ ॥ जो इस संसारमें समस्त प्राणियोंके प्रति समानचित्त और अपने समान ही दूसरोंके लिये भी परमप्रेमयुक्त थे ॥ १५५ ॥ और जो परम धर्मात्मा महापुरुष, सत्य एवं शौर्य आदि गुणोंकी खानि तथा समस्त साधु-पुरुषोंके लिये उपमानस्वरूप हुए थे ॥ १५६ ॥


इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेऽंशे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

८० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १६


सोलहवाँ अध्याय

नृसिंहावतारविषयक प्रश्न


श्रीमैत्रेय उवाचश्रीमैत्रेयजी बोले—
कथितो भवता वंशो मानवानां महात्मनाम् ।<br>कारणं चास्य जगतो विष्णुरेव सनातनः ॥ १आपने महात्मा मनुपुत्रोंके वंशोंका वर्णन किया और यह भी बताया कि इस जगत्के सनातन कारण भगवान् विष्णु ही हैं ॥ १ ॥
यत्त्वेतद् भगवानाह प्रह्लादं दैत्यसत्तमम् ।<br>ददाह नाग्निर्नार्स्त्रैश्च क्षुण्णस्तत्याज जीवितम् ॥ २किन्तु, भगवन् ! आपने जो कहा कि दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लादजीको न तो अग्निने ही भस्म किया और न उन्होंने अस्त्र-शस्त्रोंसे आघात किये जानेपर ही अपने प्राणोंको छोड़ा ॥ २ ॥
जगाम वसुधा क्षोभं यत्राब्धिसलिले स्थिते ।<br>पाशैर्बद्धे विचलति विक्षिप्ताङ्गैः समाहता ॥ ३तथा पाशबद्ध होकर समुद्रके जलमें पड़े रहनेपर उनके हिलते-डुलते हुए अंगोंसे आहत होकर पृथिवी डगमगाने लगी ॥ ३ ॥
शैलैराक्रान्तदेहोऽपि न ममार च यः पुरा ।<br>त्वया चातीव माहात्म्यं कथितं यस्य धीमतः ॥ ४और शरीरपर पत्थरोंकी बौछार पड़नेपर भी वे नहीं मरे। इस प्रकार जिन महाबुद्धिमान्का आपने बहुत ही माहात्म्य वर्णन किया है ॥ ४ ॥
तस्य प्रभावमतुलं विष्णोर्भक्तिमतो मुने ।<br>श्रोतुमिच्छामि यस्यैतच्चरितं दीप्ततेजसः ॥ ५हे मुने ! जिन अति तेजस्वी माहात्माके ऐसे चरित्र हैं, मैं उन परम विष्णुभक्तका अतुलित प्रभाव सुनना चाहता हूँ ॥ ५ ॥
किन्निमित्तमसौ शस्त्रैर्विक्षिप्तो दितिजैर्मुने ।<br>किमर्थं चाब्धिसलिले विक्षिप्तो धर्मतत्परः ॥ ६हे मुनिवर ! वे तो बड़े ही धर्मपरायण थे; फिर दैत्योंने उन्हें क्यों अस्त्र-शस्त्रोंसे पीड़ित किया और क्यों समुद्रके जलमें डाला ? ॥ ६ ॥
आक्रान्तः पर्वतैः कस्माद्दष्टश्चैव महोरगैः ।<br>क्षिप्तःकिमद्रिशिखरात्किं वा पावकसञ्चये ॥ ७उन्होंने किसलिये उन्हें पर्वतोंसे दबाया ? किस कारण सर्पोंसे डँसाया ? क्यों पर्वतशिखरसे गिराया और क्यों अग्निमें डलवाया ? ॥ ७ ॥
दिग्दन्तिनां दन्तभूमिं स च कस्मान्निरूपितः ।<br>संशोषकोऽनिलश्चास्य प्रयुक्तः किं महासुरैः ॥ ८उन महादैत्योंने उन्हें दिग्गजोंके दाँतोंसे क्यों रुँधवाया और क्यों सर्व शोषक वायुको उनके लिये नियुक्त किया ? ॥ ८ ॥
कृत्यां च दैत्यगुरवो युयुजुस्तत्र किं मुने ।<br>शम्बरश्चापि मायानां सहस्रं किं प्रयुक्तवान् ॥ ९हे मुने ! उनपर दैत्यगुरुओंने किसलिये कृत्याका प्रयोग किया और शम्बरासुरने क्यों अपनी सहस्रों मायाओंका वार किया ? ॥ ९ ॥
हालाहलं विषमहो दैत्यसूदैर्महात्मनः ।<br>कस्माद्दत्तं विनाशाय यज्जीर्णं तेन धीमता ॥ १०उन महात्माको मारनेके लिये दैत्यराजके रसोइयोंने, जिसे वे महाबुद्धिमान् पचा गये थे ऐसा हलाहल विष क्यों दिया ? ॥ १० ॥
एतत्सर्वं महाभाग प्रह्लादस्य महात्मनः ।<br>चरितं श्रोतुमिच्छामि महामाहात्म्यसूचकम् ॥ ११हे महाभाग ! महात्मा प्रह्लादका यह सम्पूर्ण चरित्र, जो उनके महान् माहात्म्यका सूचक है, मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ११ ॥
न हि कौतूहलं तत्र यद्दैत्यैर्न हतो हि सः ।<br>अनन्यमनसो विष्णौ कः समर्थो निपातने ॥ १२यदि दैत्यगण उन्हें नहीं मार सके तो इसका मुझे कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि जिसका मन अनन्यभावसे भगवान् विष्णुमें लगा हुआ है उसको भला कौन मार सकता है ? ॥ १२ ॥
तस्मिन्धर्मपरे नित्यं केशवाराधनोद्यते ।<br>स्ववंशप्रभवैर्दैत्यैः कृतो द्वेषोऽतिदुष्करः ॥ १३[ आश्चर्य तो इसीका है कि ] जो नित्यधर्मपरायण और भगवदाराधनामें तत्पर रहते थे, उनसे उनके ही कुलमें उत्पन्न हुए दैत्योंने ऐसा अति दुष्कर द्वेष किया ! [ क्योंकि ऐसे समदर्शी और धर्मभीरु पुरुषोंसे तो किसीका भी द्वेष होना अत्यन्त कठिन है ] ॥ १३ ॥
धर्मात्मनि महाभागे विष्णुभक्ते विमत्सरे ।<br>दैत्यैः प्रहृतं कस्मात्तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥ १४उन धर्मात्मा, महाभाग, मत्सरहीन विष्णु-भक्तको दैत्योंने किस कारणसे इतना कष्ट दिया, सो आप मुझसे कहिये ॥ १४ ॥

अ० १७ ] * प्रथम अंश * ८१


प्रहरन्ति महात्मानो विपक्षा अपि नेदृशे ।
गुणैस्समन्विते साधौ किं पुनर्यः स्वपक्षजः ॥ १५
तदेतत्कथ्यतां सर्वं विस्तरान्मुनिपुङ्गव ।
दैत्येश्वरस्य चरितं श्रोतुमिच्छाम्यशेषतः ॥ १६

महात्मालोग तो ऐसे गुण-सम्पन्न साधु पुरुषोंके विपक्षी होनेपर भी उनपर किसी प्रकारका प्रहार नहीं करते, फिर स्वपक्षमें होनेपर तो कहना ही क्या है? ॥ १५ ॥ इसलिये हे मुनिश्रेष्ठ ! यह सम्पूर्ण वृत्तान्त विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। मैं उन दैत्यराजका सम्पूर्ण चरित्र सुनना चाहता हूँ ॥ १६ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेऽंशे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥


सत्रहवाँ अध्याय

हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित

श्रीपराशर उवाच

मैत्रेय श्रूयतां सम्यक् चरितं तस्य धीमतः ।
प्रह्लादस्य सदोदारचरितस्य महात्मनः ॥ १
दितेः पुत्रो महावीर्यो हिरण्यकशिपुः पुरा ।
त्रैलोक्यं वशमानिन्ये ब्रह्मणो वरदर्पितः ॥ २
इन्द्रत्वमकरोद्दैत्यः स चासीत्सविता स्वयम् ।
वायुरग्निरपां नाथः सोमश्चाभून्महासुरः ॥ ३
धनानामधिपः सोऽभूत्स एवासीत्स्वयं यमः ।
यज्ञभागानशेषांस्तु स स्वयं बुभुजेऽसुरः ॥ ४
देवाः स्वर्गं परित्यज्य तत्रासान्मुनिसत्तम ।
विचेरुरवनौ सर्वे बिभ्राणा मानुषीं तनुम् ॥ ५
जित्वा त्रिभुवनं सर्वं त्रैलोक्यैश्वर्यदर्पितः ।
उपगीयमानो गन्धर्वैर्बुभुजे विषयान्प्रियान् ॥ ६
पानासक्तं महात्मानं हिरण्यकशिपुं तदा ।
उपासान् चक्रिरे सर्वे सिद्धगन्धर्वपन्नगाः ॥ ७
अवादयन् जगुश्चान्ये जयशब्दं तथापरे ।
दैत्यराजस्य पुरतश्चक्रुः सिद्धा मुदान्विताः ॥ ८
तत्र प्रनृत्ताप्सरसि स्फाटिकाभ्रमयेऽसुरः ।
पपौ पानं मुदा युक्तः प्रासादे सुमनोहरे ॥ ९
तस्य पुत्रो महाभागः प्रह्लादो नाम नामतः ।
पपाठ बालपाठ्यानि गुरुगेहङ्गतोऽर्भकः ॥ १०
एकदा तु स धर्मात्मा जगाम गुरुणा सह ।
पानासक्तस्य पुरतः पितुर्दैत्यपतेस्तदा ॥ ११

**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय ! उन सर्वदा उदारचरित परमबुद्धिमान् महात्मा प्रह्लादजीका चरित्र तुम ध्यानपूर्वक श्रवण करो ॥ १ ॥ पूर्वकालमें दितिके पुत्र महाबली हिरण्यकशिपुने ब्रह्माजीके वरसे गर्वयुक्त (सशक्त) होकर सम्पूर्ण त्रिलोकीको अपने वशीभूत कर लिया था ॥ २ ॥ वह दैत्य इन्द्रपदका भोग करता था। वह महान् असुर स्वयं ही सूर्य, वायु, अग्नि, वरुण और चन्द्रमा बना हुआ था ॥ ३ ॥ वह स्वयं ही कुबेर और यमराज भी था और वह असुर स्वयं ही सम्पूर्ण यज्ञ-भागोंको भोगता था ॥ ४ ॥ हे मुनिसत्तम ! उसके भयसे देवगण स्वर्गको छोड़कर मनुष्य-शरीर धारणकर भूमण्डलमें विचरते रहते थे ॥ ५ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण त्रिलोकीको जीतकर त्रिभुवनके वैभवसे गर्वित हुआ और गन्धर्वोंसे अपनी स्तुति सुनता हुआ वह अपने अभीष्ट भोगोंको भोगता था ॥ ६ ॥

उस समय उस मद्यपानासक्त महाकाय हिरण्यकशिपुकी ही समस्त सिद्ध, गन्धर्व और नाग आदि उपासना करते थे ॥ ७ ॥ उस दैत्यराजके सामने कोई सिद्धगण तो बाजे बजाकर उसका यशोगान करते और कोई अति प्रसन्न होकर जयजयकार करते ॥ ८ ॥ तथा वह असुरराज वहाँ स्फटिक एवं अभ्र-शिलाके बने हुए मनोहर महलमें, जहाँ अप्सराओंका उत्तम नृत्य हुआ करता था, प्रसन्नताके साथ मद्यपान करता रहता था ॥ ९ ॥ उसका प्रह्लाद नामक महाभाग्यवान् पुत्र था। वह बालक गुरुके यहाँ जाकर बालोचित पाठ पढ़ने लगा ॥ १० ॥ एक दिन वह धर्मात्मा बालक गुरुजीके साथ अपने पिता दैत्यराजके पास गया जो उस समय मद्यपानमें लगा हुआ था ॥ ११ ॥

८२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १७


पादप्रणामावनतं तमुत्थाप्य पिता सुतम्।
हिरण्यकशिपुः प्राह प्रह्लादममितौजसम्॥ १२

हिरण्यकशिपुरुवाच
पठ्यतां भवता वत्स सारभूतं सुभाषितम्।
कालेनैतावता यत्ते सदोद्युक्तेन शिक्षितम्॥ १३

प्रह्लाद उवाच
श्रूयतां तात वक्ष्यामि सारभूतं तवाज्ञया।
समाहितमना भूत्वा यन्मे चेतस्यवस्थितम्॥ १४
अनादिमध्यान्तमजमवृद्धिक्षयमच्युतम्।
प्रणतोऽस्म्यन्तसन्तानं सर्वकारणकारणम्॥ १५

श्रीपराशर उवाच
एतन्निशम्य दैत्येन्द्रः सकोपो रक्तलोचनः।
विलोक्य तद्गुरुं प्राह स्फुरिताधरपल्लवः॥ १६

हिरण्यकशिपुरुवाच
ब्रह्मबन्धो किमेतत्ते विपक्षस्तुतिसंहितम्।
असारं ग्राहितो बालो मामवज्ञाय दुर्मते॥ १७

गुरुस्वाच
दैत्येश्वर न कोपस्य वशमागन्तुमर्हसि।
ममोपदेशजनितं नायं वदति ते सुतः॥ १८

हिरण्यकशिपुरुवाच
अनुशिष्टोऽसि केनेदृग्वत्स प्रह्लाद कथ्यताम्।
मयोपदिष्टं नेत्येष प्रब्रवीति गुरुस्तव॥ १९

प्रह्लाद उवाच
शास्ता विष्णुरशेषस्य जगतो यो हृदि स्थितः।
तमृते परमात्मानं तात कः केन शास्यते॥ २०

हिरण्यकशिपुरुवाच
कोऽयं विष्णुः सुदुर्बुद्धे यं ब्रवीषि पुनः पुनः।
जगतामीश्वरस्येह पुरतः प्रसभं मम॥ २१

प्रह्लाद उवाच
न शब्दगोचरं यस्य योगिध्येयं परं पदम्।
यतो यश्च स्वयं विश्वं स विष्णुः परमेश्वरः॥ २२

हिरण्यकशिपुरुवाच
परमेश्वरसंज्ञोऽज्ञ किमन्यो मय्यवस्थिते।
तथापि मर्तुकामस्त्वं प्रब्रवीषि पुनः पुनः॥ २३


तब अपने चरणोंमें झुके हुए अपने परम तेजस्वी पुत्र प्रह्लादजीको उठाकर पिता हिरण्यकशिपुने कहा॥ १२॥

**हिरण्यकशिपु बोला—**वत्स! अबतक अध्ययनमें निरन्तर तत्पर रहकर तुमने जो कुछ पढ़ा है उसका सारभूत शुभ भाषण हमें सुनाओ॥ १३॥

**प्रह्लादजी बोले—**पिताजी! मेरे मनमें जो सबके सारांशरूपसे स्थित है वह मैं आपकी आज्ञानुसार सुनाता हूँ, सावधान होकर सुनिये॥ १४॥ जो आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अजन्मा, वृद्धि-क्षय-शून्य और अच्युत हैं, समस्त कारणोंके कारण तथा जगत्‌के स्थिति और अन्तकर्ता उन श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ॥ १५॥

**श्रीपराशरजी बोले—**यह सुन दैत्यराज हिरण्यकशिपुने क्रोधसे नेत्र लाल कर प्रह्लादके गुरुकी ओर देखकर काँपते हुए ओठोंसे कहा॥ १६॥

**हिरण्यकशिपु बोला—**रे दुर्बुद्धि ब्राह्मणाधम! यह क्या? तूने मेरी अवज्ञा कर इस बालकको मेरे विपक्षीकी स्तुतिसे युक्त असार शिक्षा दी है!॥ १७॥

**गुरुजीने कहा—**दैत्यराज! आपको क्रोधके वशीभूत न होना चाहिये। आपका यह पुत्र मेरी सिखायी हुई बात नहीं कह रहा है॥ १८॥

**हिरण्यकशिपु बोला—**बेटा प्रह्लाद! बताओ तो तुमको यह शिक्षा किसने दी है? तुम्हारे गुरुजी कहते हैं कि मैंने तो इसे ऐसा उपदेश दिया नहीं है॥ १९॥

**प्रह्लादजी बोले—**पिताजी! हृदयमें स्थित भगवान् विष्णु ही तो सम्पूर्ण जगत्‌के उपदेशक हैं। उन परमात्माको छोड़कर और कौन किसीको कुछ सिखा सकता है?॥ २०॥

**हिरण्यकशिपु बोला—**अरे मूर्ख! जिस विष्णुका तू मुझ जगदीशवरके सामने धृष्टतापूर्वक निश्शंक होकर बारम्बार वर्णन करता है, वह कौन है?॥ २१॥

**प्रह्लादजी बोले—**योगियोंके ध्यान करनेयोग्य जिसका परमपद वाणीका विषय नहीं हो सकता तथा जिससे विश्व प्रकट हुआ है और जो स्वयं विश्वरूप है वह परमेश्वर ही विष्णु है॥ २२॥

**हिरण्यकशिपु बोला—**अरे मूढ़! मेरे रहते हुए और कौन परमेश्वर कहा जा सकता है? फिर भी तू मौतके मुखमें जानेकी इच्छासे बारम्बार ऐसा बक रहा है॥ २३॥

अ० १७] * प्रथम अंश * ८३


प्रह्लाद उवाच
न केवलं तात मम प्रजानां
स ब्रह्मभूतो भवतश्च विष्णुः।
धाता विधाता परमेश्वरश्च
प्रसीद कोपं कुरुषे किमर्थम्॥ २४

प्रह्लादजी बोले— हे तात! वह ब्रह्मभूत विष्णु तो केवल मेरा ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रजा और आपका भी कर्ता, नियन्ता और परमेश्वर है। आप प्रसन्न होइये, व्यर्थ क्रोध क्यों करते हैं॥ २४॥


हिरण्यकशिपुरुवाच
प्रविष्टः कोऽस्य हृदये दुर्बुद्धेरतिपापकृत्।
येनेदृशान्यसाधूनि वदत्याविष्टमानसः॥ २५

हिरण्यकशिपु बोला— अरे कौन पापी इस दुर्बुद्धि बालकके हृदयमें घुस बैठा है जिससे आविष्टचित्त होकर यह ऐसे अमंगल वचन बोलता है?॥ २५॥


प्रह्लाद उवाच
न केवलं मद्धृदयं स विष्णु-
राक्रम्य लोकानखिलानवस्थितः।
स मां त्वदादींश्च पितस्समस्ता-
न्समस्तचेष्टासु युनक्ति सर्वगः॥ २६

प्रह्लादजी बोले— पिताजी! वे विष्णुभगवान् तो मेरे ही हृदयमें नहीं, बल्कि सम्पूर्ण लोकोंमें स्थित हैं। वे सर्वगामी तो मुझको, आप सबको और समस्त प्राणियोंको अपनी-अपनी चेष्टाओंमें प्रवृत्त करते हैं॥ २६॥


हिरण्यकशिपुरुवाच
निष्कास्यतामयं पापः शास्यतां च गुरोर्गृहे।
योजितो दुर्मतिः केन विपक्षविषयस्तुतौ॥ २७

हिरण्यकशिपु बोला— इस पापीको यहाँसे निकालो और गुरुके यहाँ ले जाकर इसका भली प्रकार शासन करो। इस दुर्मतिको न जाने किसने मेरे विपक्षीकी प्रशंसामें नियुक्त कर दिया है?॥ २७॥


श्रीपराशर उवाच
इत्युक्तोऽसौ तदा दैत्यैर्नीतो गुरुगृहं पुनः।
जग्राह विद्यामनिशं गुरुशुश्रूषणोद्यतः॥ २८
कालेऽतीतेऽपि महति प्रह्लादमसुरेश्वरः।
समाहूयाब्रवीद्गाथा काचित्पुत्रक गीयताम्॥ २९

श्रीपराशरजी बोले— उसके ऐसा कहनेपर दैत्यगण उस बालकको फिर गुरुजीके यहाँ ले गये और वे वहाँ गुरुजीकी रात-दिन भली प्रकार सेवा-शुश्रूषा करते हुए विद्याध्ययन करने लगे॥ २८॥ बहुत काल व्यतीत हो जानेपर दैत्यराजने प्रह्लादजीको फिर बुलाया और कहा—‘बेटा! आज कोई गाथा (कथा) सुनाओ’॥ २९॥


प्रह्लाद उवाच
यतः प्रधानपुरुषौ यतश्चैतच्चराचरम्।
कारणं सकलस्यास्य स नो विष्णुः प्रसीदतु॥ ३०

प्रह्लादजी बोले— जिनसे प्रधान, पुरुष और यह चराचर जगत् उत्पन्न हुआ है वे सकल प्रपंचके कारण श्रीविष्णुभगवान् हमपर प्रसन्न हों॥ ३०॥


हिरण्यकशिपुरुवाच
दुरात्मा वध्यतामेष नानेनार्थोऽस्ति जीवता।
स्वपक्षहानिकर्तृत्वाद्यः कुलाङ्गारतां गतः॥ ३१

हिरण्यकशिपु बोला— अरे! यह बड़ा दुरात्मा है। इसको मार डालो; अब इसके जीनेसे कोई लाभ नहीं है, क्योंकि स्वपक्षकी हानि करनेवाला होनेसे यह तो अपने कुलके लिये अंगाररूप हो गया है॥ ३१॥


श्रीपराशर उवाच
इत्याज्ञप्तास्ततस्तेन प्रगृहीतमहायुधाः।
उद्यतास्तस्य नाशाय दैत्याः शतसहस्रशः॥ ३२

श्रीपराशरजी बोले— उसकी ऐसी आज्ञा होनेपर सैकड़ों-हजारों दैत्यगण बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्र लेकर उन्हें मारनेके लिये तैयार हुए॥ ३२॥


प्रह्लाद उवाच
विष्णुः शस्त्रेषु युष्मासु मयि चासौ व्यवस्थितः।
दैतेयास्तेन सत्येन माक्रमन्त्वायुधानि मे॥ ३३

प्रह्लादजी बोले— अरे दैत्यो! भगवान् विष्णु तो शस्त्रोंमें, तुमलोगोमें और मुझमें—सर्वत्र ही स्थित हैं। इस सत्यके प्रभावसे इन अस्त्र-शस्त्रोंका मेरे ऊपर कोई प्रभाव न हो॥ ३३॥

८४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १७


श्रीपराशर उवाच ततस्तैश्शतशो दैत्यैः शस्त्रौघैराहतोऽपि सन्। नावाप वेदनामल्पामभूच्चैव पुनर्नवः॥ ३४

हिरण्यकशिपुरुवाच दुर्बुद्धे विनिवर्तस्व वैरिपक्षस्तवादतः। अभयं ते प्रयच्छामि मातिमूढमतिर्भव॥ ३५

प्रह्लाद उवाच भयं भयानामपहारिणि स्थिते मनस्यनन्ते मम कुत्र तिष्ठति। यस्मिन्स्मृते जन्मजरान्तकादि- भयानि सर्वाण्यपयान्ति तात॥ ३६

हिरण्यकशिपुरुवाच भो भो सर्पाः दुराचारमेनमत्यन्तदुर्मतिम्। विषज्वालाकुलैर्वक्त्रैः सद्यो नयत सङ्क्षयम्॥ ३७

श्रीपराशर उवाच इत्युक्तास्ते ततः सर्पाः कुहकास्तक्षकादयः। अदशन्त समस्तेषु गात्रेष्वतिविषोल्बणाः॥ ३८ स त्वासक्तमतिः कृष्णे दश्यमानो महोरगैः। न विवेदात्मनो गात्रं तत्स्मृत्याह्लादसुस्थितः॥ ३९

सर्पा ऊचुः दंष्ट्रा विशीर्णा मणयः स्फुटन्ति फणेषु तापो हृदयेषु कम्पः। नास्य त्वचः स्वल्पमपीह भिन्नं प्रशाधि दैत्येश्वर कार्यमन्यत्॥ ४०

हिरण्यकशिपुरुवाच हे दिग्गजाः सङ्कटदन्तमित्रा घ्नैतन्मस्मद्रिपुपक्षभिन्नम्। तज्जा विनाशाय भवन्ति तस्य यथारणेः प्रज्वलितो हुताशः॥ ४१

श्रीपराशर उवाच ततः स दिग्गजैर्बालो भूभृच्छिखरसन्निभैः। पातितो धरणीपृष्ठे विषाणैर्वावपीडितः॥ ४२ स्मरतस्तस्य गोविन्दमभिदन्ताः सहस्रशः। शीर्णा वक्षःस्थलं प्राप्य स प्राह पितरं ततः॥ ४३


**श्रीपराशरजी बोले—**तब तो उन सैकड़ों दैत्योंके शस्त्र-समूहका आघात होनेपर भी उनको तनिक-सी भी वेदना न हुई, वे फिर भी ज्यों-के-त्यों नवोन बल-सम्पन्न ही रहे॥ ३४॥

**हिरण्यकशिपु बोला—**रे दुर्बुद्धे! अब तू विपक्षीकी स्तुति करना छोड़ दे; जा, मैं तुझे अभयदान देता हूँ, अब और अधिक नादान मत हो॥ ३५॥

**प्रह्लादजी बोले—**हे तात! जिनके स्मरणमात्रसे जन्म, जरा और मृत्यु आदिके समस्त भय दूर हो जाते हैं, उन सकल-भयहारी अनन्तके हृदयमें स्थित रहते मुझे भय कहाँ रह सकता है॥ ३६॥

**हिरण्यकशिपु बोला—**अरे सर्पो! इस अत्यन्त दुर्बुद्धि और दुराचारीको अपने विषाग्नि-सन्तप्त मुखोंसे काटकर शीघ्र ही नष्ट कर दो॥ ३७॥

**श्रीपराशरजी बोले—**ऐसी आज्ञा होनेपर अतिक्रूर और विषधर तक्षक आदि सर्पोंने उनके समस्त अंगोंमें काटा॥ ३८॥ किन्तु उन्हें तो श्रीकृष्णचन्द्रमें आसक्तचित्त रहनेके कारण भगवत्स्मरणके परमानन्दमें डूबे रहनेसे उन महासर्पोंके काटनेपर भी अपने शरीरकी कोई सुधि नहीं हुई॥ ३९॥

**सर्प बोले—**हे दैत्यराज! देखो, हमारी दाढ़ें टूट गयीं, मणियाँ चटकने लगीं, फणोंमें पीड़ा होने लगी और हृदय काँपने लगा, तथापि इसकी त्वचा तो जरा भी नहीं कटी। इसलिये अब आप हमें कोई और कार्य बताइये॥ ४०॥

**हिरण्यकशिपु बोला—**हे दिग्गजो! तुम सब अपने संकीर्ण दाँतोंको मिलाकर मेरे शत्रु-पक्षद्वारा [बहकाकर] मुझसे विमुख किये हुए इस बालकको मार डालो। देखो, जैसे अरणीसे उत्पन्न हुआ अग्नि उसीको जला डालता है उसी प्रकार कोई-कोई जिससे उत्पन्न होते हैं उसीके नाश करनेवाले हो जाते हैं॥ ४१॥

**श्रीपराशरजी बोले—**तब पर्वत-शिखरके समान विशालकाय दिग्गजोंने उस बालकको पृथिवीपर पटककर अपने दाँतोंसे खूब रौंदा॥ ४२॥ किन्तु श्रीगोविन्दका स्मरण करते रहनेसे हाथियोंके हजारों दाँत उनके वक्षःस्थलसे टकराकर टूट गये; तब उन्होंने पिता हिरण्यकशिपुसे कहा—॥ ४३॥

अ० १७ ] * प्रथम अंश * ८५

दन्ता गजानां कुलिशाग्रनिष्ठुराः शीर्णा यदेते न बलं ममैतत् । महाविपत्तापविनाशनोऽयं जनार्दनानुस्मरणानुभावः ॥ ४४

हिरण्यकशिपुरुवाच ज्वाल्यतामसुरा वह्निरपसर्पंत दिग्गजाः। वायो समेधयाग्निं त्वं दह्यतामेष पापकृत् ॥ ४५

श्रीपराशर उवाच महाकाष्ठचयस्थं तमसुरेन्द्रसुतं ततः। प्रज्वाल्य दानवा वह्निं ददहुः स्वामिनोदिताः ॥ ४६

प्रह्लाद उवाच तातैष वह्निः पवनेरितोऽपि न मां दहत्यत्र समन्ततोऽहम् । पश्यामि पद्मास्तरणास्तृतानि शीतानि सर्वाणि दिशामुखानि ॥ ४७

श्रीपराशर उवाच अथ दैत्येश्वरं प्रोचुर्भार्गवस्यात्मजा द्विजाः। पुरोहिता महात्मानः साम्ना संस्तूय वाग्मिनः ॥ ४८

पुरोहिता ऊचुः राजनियम्यतां कोपो बालेऽपि तनये निजे। कोपो देवनिकायेषु तेषु ते सफलो यतः ॥ ४९ तथातथैनं बालं ते शासितारो वयं नृप। यथा विपक्षनाशाय विनीतस्ते भविष्यति ॥ ५० बालत्वं सर्वदोषाणां दैत्यराजास्पदं यतः। ततोऽत्र कोपमत्यर्थं योक्तुमर्हसि नार्भके ॥ ५१ न त्यक्ष्यति हरेः पक्षमस्माकं वचनाद्यदि । ततः कृत्यां वधायास्य करिष्यामोऽनिवर्त्तिनीम् ॥ ५२

श्रीपराशर उवाच एवमभ्यर्थितस्तैस्तु दैत्यराजः पुरोहितैः। दैत्यैर्निष्कासयामास पुत्रं पावकसञ्चयात् ॥ ५३ ततो गुरुगृहे बालः स वसन्बालदानवान् । अध्यापयामास मुहुरुपदेशान्तरे गुरोः ॥ ५४

"ये जो हाथियोंके वज्रके समान कठोर दाँत टूट गये हैं इसमें मेरा कोई बल नहीं है; यह तो श्रीजनार्दनभगवान्‌के महाविपत्ति और क्लेशोंके नष्ट करनेवाले स्मरणका ही प्रभाव है" ॥ ४४ ॥

हिरण्यकशिपु बोला-अरे दिग्गजो! तुम हट जाओ। दैत्यगण! तुम अग्नि जलाओ, और हे वायु! तुम अग्निको प्रज्वलित करो जिससे इस पापीको जला डाला जाय ॥ ४५ ॥

श्रीपराशरजी बोले-तब अपने स्वामीकी आज्ञासे दानवगण काष्ठके एक बड़े ढेरमें स्थित उस असुर राजकुमारको अग्नि प्रज्वलित करके जलाने लगे ॥ ४६ ॥

प्रह्लादजी बोले-हे तात! पवनसे प्रेरित हुआ भी यह अग्नि मुझे नहीं जलाता। मुझको तो सभी दिशाएँ ऐसी शीतल प्रतीत होती हैं मानो मेरे चारों ओर कमल बिछे हुए हों ॥ ४७ ॥

श्रीपराशरजी बोले-तदनन्तर, शुक्रजीके पुत्र बड़े वाग्मी महात्मा [ षण्डामर्क आदि ] पुरोहितगण सामनीतिसे दैत्यराजकी बड़ाई करते हुए बोले ॥ ४८ ॥

पुरोहित बोले-हे राजन्! अपने इस बालक पुत्रके प्रति अपना क्रोध शान्त कीजिये; आपको तो देवताओंपर ही क्रोध करना चाहिये, क्योंकि उसकी सफलता तो वहीं है ॥ ४९ ॥ हे राजन्! हम आपके इस बालकको ऐसी शिक्षा देंगे जिससे यह विपक्षके नाशका कारण होकर आपके प्रति अति विनीत हो जायगा ॥ ५० ॥ हे दैत्यराज! बाल्यावस्था तो सब प्रकारके दोषोंका आश्रय होती ही है, इसलिये आपको इस बालकपर अत्यन्त क्रोधका प्रयोग नहीं करना चाहिये ॥ ५१ ॥ यदि हमारे कहनेसे भी यह विष्णुका पक्ष नहीं छोड़ेगा तो हम इसको नष्ट करनेके लिये किसी प्रकार न टलनेवाली कृत्या उत्पन्न करेंगे ॥ ५२ ॥

श्रीपराशरजीने कहा-पुरोहितोंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दैत्यराजने दैत्योंद्वारा प्रह्लादको अग्निसमूहसे बाहर निकलवाया ॥ ५३ ॥ फिर प्रह्लादजी, गुरुजीके यहाँ रहते हुए उनके पढ़ा चुकनेपर अन्य दानवकुमारोंको बार-बार उपदेश देने लगे ॥ ५४ ॥

८६* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १७ ]
प्रह्लाद उवाचप्रह्लादजी बोले—हे दैत्यकुलोत्पन्न असुर-बालको!
श्रूयतां परमार्थो मे दैतेया दितिजात्मजाः।<br>न चान्यथैतन्मन्तव्यं नात्र लोभादिकारणम् ॥ ५५सुनो, मैं तुम्हें परमार्थका उपदेश करता हूँ, तुम इसे अन्यथा न समझना, क्योंकि मेरे ऐसा कहनेमें किसी प्रकारका लोभादि कारण नहीं है॥ ५५॥
जन्म बाल्यं ततः सर्वो जन्तुः प्राप्नोति यौवनम्।<br>अव्याहतैव भवति ततोऽनुदिवसं जरा॥ ५६सभी जीव जन्म, बाल्यावस्था और फिर यौवन प्राप्त करते हैं, तत्पश्चात् दिन-दिन वृद्धावस्थाकी प्राप्ति भी अनिवार्य ही है॥ ५६॥
ततश्च मृत्युमभ्येति जन्तुर्दैत्येश्वरात्मजाः।<br>प्रत्यक्षं दृश्यते चैतदस्माकं भवतां तथा॥ ५७और हे दैत्यराजकुमारो! फिर यह जीव मृत्युके मुखमें चला जाता है, यह हम और तुम सभी प्रत्यक्ष देखते हैं॥ ५७॥
मृतस्य च पुनर्जन्म भवत्येतच्च नान्यथा।<br>आगमोऽयं तथा यच्च नोपादानं विनोद्भवः॥ ५८मरनेपर पुनर्जन्म होता है, यह नियम भी कभी नहीं टलता। इस विषयमें [ श्रुति-स्मृतिरूप ] आगम भी प्रमाण है कि बिना उपादानके कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होती* ॥ ५८॥
गर्भवासादि यावत्तु पुनर्जन्मोपपादनम्।<br>समस्तावस्थकं तावद्दुःखमेवावगम्यताम् ॥ ५९पुनर्जन्म प्राप्त करानेवाली गर्भवास आदि जितनी अवस्थाएँ हैं उन सबको दुःखस्वरूप ही जानो॥ ५९॥
क्षुत्तृष्णोपशमं तद्वच्छीताद्युपशमं सुखम्।<br>मन्यते बालबुद्धिस्त्वाह्दुःखमेव हि तत्पुनः ॥ ६०मनुष्य मूर्खतावश क्षुधा, तृष्णा और शीतादिकी शान्तिको सुख मानते हैं, परन्तु वास्तवमें तो वे दुःखमात्र ही हैं॥ ६०॥
अत्यन्तस्तिमिताङ्गानां व्यायामेन सुखैषिणाम्।<br>भ्रान्तिज्ञानावृताक्षाणां दुःखमेव सुखायते ॥ ६१जिनका शरीर [ वातादि दोषसे ] अत्यन्त शिथिल हो जाता है उन्हें जिस प्रकार व्यायाम सुखप्रद प्रतीत होता है उसी प्रकार जिनकी दृष्टि भ्रान्तिज्ञानसे ढँकी हुई है उन्हें दुःख ही सुखरूप जान पड़ता है॥ ६१॥
क्व शरीरमशेषाणां श्लेष्मादीनां महाचयः।<br>क्व कान्तिशोभासौन्दर्यरमणीयादयो गुणाः ॥ ६२अहो! कहाँ तो कफ आदि महाघृणित पदार्थोंका समूहरूप शरीर और कहाँ कान्ति, शोभा, सौन्दर्य एवं रमणीयता आदि दिव्य गुण? [ तथापि मनुष्य इस घृणित शरीरमें कान्ति आदिका आरोप कर सुख मानने लगता है ] ॥ ६२॥
मांसासृक्पूयविण्मूत्रस्नायुमज्जास्थिसंहतौ।<br>देहे चेत्प्रीतिमान् मूढो भविता नरकेऽप्यसौ ॥ ६३यदि किसी मूढ पुरुषकी मांस, रुधिर, पीब, विष्ठा, मूत्र, स्नायु, मज्जा और अस्थियोंके समूहरूप इस शरीरमें प्रीति हो सकती है तो उसे नरक भी प्रिय लग सकता है॥ ६३॥
अग्नेः शीतेन तोयस्य तृषा भक्तस्य च क्षुधा।<br>क्रियते सुखकर्तृत्वं तद्विलोमस्य चेतरैः ॥ ६४अग्नि, जल और भात क्रमशः शीत, तृषा और क्षुधाके कारण ही सुखकारी होते हैं और इनके प्रतियोगी जल आदि भी अपनेसे भिन्न अग्नि आदिके कारण ही सुखके हेतु होते हैं॥ ६४॥
करोति हे दैत्यसुता यावन्मात्रं परिग्रहम्।<br>तावन्मात्रं स एवास्य दुःखं चेतसि यच्छति ॥ ६५हे दैत्यकुमारो! विषयोंका जितना-जितना संग्रह किया जाता है उतना-उतना ही वे मनुष्यके चित्तमें दुःख बढ़ाते हैं॥ ६५॥
यावतः कुरुते जन्तुः सम्बन्धान्मनसः प्रियान्।<br>तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकशाङ्कवः॥ ६६जीव अपने मनको प्रिय लगनेवाले जितने ही सम्बन्धियोंको बढ़ाता जाता है उतने ही उसके हृदयमें शोकरूपी शल्य (काँटे) स्थिर होते जाते हैं॥ ६६॥
यद्यद्गृहे तन्मनसि यत्र तत्रावतिष्ठतः।<br>नाशदाहोपकरणं तस्य तत्रैव तिष्ठति ॥ ६७घरमें जो कुछ धन धान्यादि होते हैं मनुष्यके जहाँ-तहाँ (परदेशमें) रहनेपर भी वे पदार्थ उसके चित्तमें बने रहते हैं, और उनके नाश और दाह आदिकी सामग्री भी उसीमें मौजूद रहती है। [ अर्थात् घरमें स्थित पदार्थोंके सुरक्षित रहनेपर भी मनःस्थिति पदार्थोंके नाश आदिकी भावनासे पदार्थ-नाशका दुःख प्राप्त हो जाता है ] ॥ ६७॥

* यह पुनर्जन्म होनेमें युक्ति है क्योंकि जबतक पूर्व-जन्मके किये हुए शुभाशुभ कर्मरूप कारणका होना न माना जाय तबतक वर्तमान जन्म भी सिद्ध नहीं हो सकता। इसी प्रकार, जब इस जन्ममें शुभाशुभका आरम्भ हुआ है तो इसका कार्यरूप पुनर्जन्म भी अवश्य होगा।

अ० १७ ] * प्रथम अंश * ८७


जन्मन्यत्र महद्दुःखं म्रियमाणस्य चापि तत्।
यातनासु यमस्योग्रं गर्भसङ्क्रमणेषु च॥ ६८

गर्भेषु सुखलेशोऽपि भवद्भिरनुमीयते।
यदि तत्कथ्यतामेवं सर्वं दुःखमयं जगत्॥ ६९

तदेवमतिदुःखानामास्पदेऽत्र भवार्णवे।
भवतां कथ्यते सत्यं विष्णुरेकः परायणः॥ ७०

मा जानीत वयं बाला देही देहेषु शाश्वतः।
जरायौवनजन्माद्या धर्मा देहस्य नात्मनः॥ ७१

बालोऽहं तावदिच्छातो यतिष्ये श्रेयसे युवा।
युवाहं वार्द्धके प्राप्ते करिष्याम्यात्मनो हितम्॥ ७२

वृद्धोऽहं मम कार्याणि समस्तानि न गोचरे।
किं करिष्यामि मन्दात्मा समर्थेन न यत्कृतम्॥ ७३

एवं दुराशया क्षिप्तमानसः पुरुषः सदा।
श्रेयसोऽभिमुखं याति न कदाचित्पिपासितः॥ ७४

बाल्ये क्रीडनकासक्ता यौवने विषयोन्मुखाः।
अज्ञा नयन्त्यशक्त्या च वार्द्धकं समुपस्थितम्॥ ७५

तस्माद्बाल्ये विवेकात्मा यतेत श्रेयसे सदा।
बाल्ययौवनवृद्धाद्यैर्देहभावैरसंयुतः ॥ ७६

तदेतद्भो मयाख्यातं यदि जानीत नानृतम्।
तदस्मत्प्रीतये विष्णुः स्मर्यतां बन्धमुक्तिदः॥ ७७

प्रयासः स्मरणे कोऽस्य स्मृतो यच्छति शोभनम्।
पापक्षयश्च भवति स्मरतां तमहर्निशम्॥ ७८

सर्वभूतस्थिते तस्मिन्मतिमैत्री दिवानिशम्।
भवतां जायतामेवं सर्वक्लेशान्प्रहास्यथ॥ ७९

तापत्रयेणाभिहतं यदेतदखिलं जगत्।
तदा शोच्येषु भूतेषु द्वेषं प्राज्ञः करोति कः॥ ८०


इस प्रकार जीते-जी तो यहाँ महान् दुःख होता ही है, मरनेपर भी यम-यातनाओंका और गर्भ-प्रवेशका उग्र कष्ट भोगना पड़ता है॥ ६८॥ यदि तुम्हें गर्भवासमें लेशमात्र भी सुखका अनुमान होता हो तो कहो। सारा संसार इसी प्रकार अत्यन्त दुःखमय है॥ ६९॥ इसलिये दुःखोंके परम आश्रय इस संसार-समुद्रमें एकमात्र विष्णुभगवान् ही आप लोगोंकी परमगति हैं—यह मैं सर्वथा सत्य कहता हूँ॥ ७०॥

ऐसा मत समझो कि हम तो अभी बालक हैं, क्योंकि जरा, यौवन और जन्म आदि अवस्थाएँ तो देहके ही धर्म हैं, शरीरका अधिष्ठाता आत्मा तो नित्य है, उसमें यह कोई धर्म नहीं है॥ ७१॥ जो मनुष्य ऐसी दुराशाओंसे विक्षिप्तचित्त रहता है कि 'अभी मैं बालक हूँ इसलिये इच्छानुसार खेल-कूद लूँ, युवावस्था प्राप्त होनेपर कल्याण-साधनका यत्न करूँगा।' [फिर युवा होनेपर कहता है कि] 'अभी तो मैं युवा हूँ, बुढ़ापेमें आत्मकल्याण कर लूँगा।' और [वृद्ध होनेपर सोचता है कि] 'अब मैं बूढ़ा हो गया, अब तो मेरी इन्द्रियाँ अपने कर्मोंमें प्रवृत्त ही नहीं होतीं, शरीरके शिथिल हो जानेपर अब मैं क्या कर सकता हूँ? सामर्थ्य रहते तो मैंने कुछ किया ही नहीं।' वह अपने कल्याण-पथपर कभी अग्रसर नहीं होता; केवल भोग-तृष्णामें ही व्याकुल रहता है॥ ७२—७४॥ मूर्खलोग अपनी बाल्यावस्थामें खेल-कूदमें लगे रहते हैं, युवावस्थामें विषयोंमें फँस जाते हैं और बुढ़ापा आनेपर उसे असमर्थताके कारण व्यर्थ ही काटते हैं॥ ७५॥ इसलिये विवेकी पुरुषको चाहिये कि देहकी बाल्य, यौवन और वृद्ध आदि अवस्थाओंकी अपेक्षा न करके बाल्यावस्थामें ही अपने कल्याणका यत्न करे॥ ७६॥

मैंने तुमलोगोंसे जो कुछ कहा है उसे यदि तुम मिथ्या नहीं समझते तो मेरी प्रसन्नताके लिये ही बन्धनको छुटानेवाले श्रीविष्णुभगवान्‌का स्मरण करो॥ ७७॥ उनका स्मरण करनेमें परिश्रम भी क्या है? और स्मरणमात्रसे ही वे अति शुभ फल देते हैं तथा रात-दिन उन्हींका स्मरण करनेवालोंका पाप भी नष्ट हो जाता है॥ ७८॥ उन सर्वभूतस्थ प्रभुमें तुम्हारी बुद्धि अहर्निश लगी रहे और उनमें निरन्तर तुम्हारा प्रेम बढ़े; इस प्रकार तुम्हारे समस्त क्लेश दूर हो जायँगे॥ ७९॥

जब कि यह सभी संसार तापत्रयसे दग्ध हो रहा है तो इन बेचारे शोचनीय जीवोंसे कौन बुद्धिमान् द्वेष करेगा?॥ ८०॥

८८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १७


अथ भद्राणि भूतानि हीनशक्तिरहं परम्।
मुदं तदापि कुर्वीत हानिर्द्वेषफलं यतः॥ ८१
बद्धवैराणि भूतानि द्वेषं कुर्वन्ति चेत्ततः।
सुशोच्यान्यतिमोहेन व्याप्तानीति मनीषिणाम्॥ ८२
एते भिन्नदृशां दैत्या विकल्पाः कथिता मया।
कृत्वाभ्युपगमं तत्र सङ्क्षेपः श्रूयतां मम॥ ८३
विस्तारः सर्वभूतस्य विष्णोः सर्वमिदं जगत्।
द्रष्टव्यमात्मवत्तस्मादभेदेन विचक्षणैः॥ ८४
समुत्सृज्यासुरं भावं तस्माद्ययं तथा वयम्।
तथा यत्नं करिष्यामो यथा प्राप्स्याम निर्वृतिम्॥ ८५
या नाग्निना न चार्केण नेन्दुना च न वायुना।
पर्जन्यवरुणाभ्यां वा न सिद्धैर्न च राक्षसैः॥ ८६
न यक्षैर्न च दैत्येन्द्रैर्नोरगैर्न च किन्नरैः।
न मनुष्यैर्न पशुभिर्दोषैर्नैवात्मसम्भवैः॥ ८७
ज्वराक्षिरोगातीसारप्लीहगुल्मादिकैस्तथा।
द्वेषेष्र्याँमत्सराद्यैर्वा रागलोभादिभिः क्षयम्॥ ८८
न चान्यैर्नीयते कैश्चिन्नित्या यात्यन्तनिर्मला।
तामाप्नोत्यमले न्यस्य केशवे हृदयं नरः॥ ८९
असारसंसारविवर्तनेषु
मा यात तोषं प्रसभं ब्रवीमि।
सर्वत्र दैत्यास्समतामुपेत
समत्वमाराधनमच्युतस्य॥ ९०
तस्मिन्प्रसन्ने किमिहास्त्यलभ्यं
धर्मार्थकामैरलमल्पकास्ते।
समाश्रिताद्ब्रह्मतरोरनन्ता-
न्निःसंशयं प्राप्स्यथ वै महत्फलम्॥ ९१

यदि [ ऐसा दिखायी दे कि ] 'और जीव तो आनन्दमें हैं, मैं ही परम शक्तिहीन हूँ' तब भी प्रसन्न ही होना चाहिये, क्योंकि द्वेषका फल तो दुःखरूप ही है॥ ८१॥ यदि कोई प्राणी वैरभावसे द्वेष भी करें तो विचारवानोंके लिये तो वे 'अहो! ये महामोहसे व्याप्त हैं!' इस प्रकार अत्यन्त शोचनीय ही हैं॥ ८२॥

हे दैत्यगण! ये मैंने भिन्न-भिन्न दृष्टिवालोंके विकल्प (भिन्न-भिन्न उपाय) कहे। अब उनका समन्वयपूर्वक संक्षिप्त विचार सुनो॥ ८३॥ यह सम्पूर्ण जगत् सर्वभूतमय भगवान् विष्णुका विस्तार है, अतः विचक्षण पुरुषोंको इसे आत्माके समान अभेदरूपसे देखना चाहिये॥ ८४॥ इसलिये दैत्यभावको छोड़कर हम और तुम ऐसा यत्न करें जिससे शान्ति लाभ कर सकें॥ ८५॥ जो [ परम शान्ति ] अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, वायु, मेघ, वरुण, सिद्ध, राक्षस, यक्ष, दैत्यराज, सर्प, किन्नर, मनुष्य, पशु और अपने दोषोंसे तथा ज्वर, नेत्ररोग, अतिसार, प्लीहा (तिल्ली) और गुल्म आदि रोगोंसे एवं द्वेष, ईर्ष्या, मत्सर, राग, लोभ और किसी अन्य भावसे भी कभी क्षीण नहीं होती, और जो सर्वदा अत्यन्त निर्मल है उसे मनुष्य अमलस्वरूप श्रीकेशवमें मनोनिवेश करनेसे प्राप्त कर लेता है॥ ८६-८९॥

हे दैत्यो! मैं आग्रहपूर्वक कहता हूँ, तुम इस असार संसारके विषयोंमें कभी सन्तुष्ट मत होना। तुम सर्वत्र समदृष्टि करो, क्योंकि समता ही श्रीअच्युतकी [ वास्तविक ] आराधना है॥ ९०॥ उन अच्युतके प्रसन्न होनेपर फिर संसारमें दुर्लभ ही क्या है? तुम धर्म, अर्थ और कामकी इच्छा कभी न करना; वे तो अत्यन्त तुच्छ हैं। उस ब्रह्मरूप महावृक्षका आश्रय लेनेपर तो तुम निःसन्देह [ मोक्षरूप ] महाफल प्राप्त कर लोगे॥ ९१॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥


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अ० १८ ] * प्रथम अंश * ८९

अठारहवाँ अध्याय

प्रह्लादको मारनेके लिये विष, शस्त्र और अग्नि आदिका प्रयोग एवं प्रह्लादकृत भगवत्-स्तुति

श्रीपराशर उवाच
तस्यैतां दानवाश्चेष्टां दृष्ट्वा दैत्यपतेर्भयात्।
आचचक्षुः स चोवाच सूदानाहूय सत्वरः ॥ १

हिरण्यकशिपुरुवाच
हे सूदा मम पुत्रोऽसावन्येषामपि दुर्मतिः।
कुमार्गदेशिको दुष्टो हन्यतामविलम्बितम् ॥ २
हालाहलं विषं तस्य सर्वभक्षेषु दीयताम्।
अविज्ञातमसौ पापो हन्यतां मा विचार्यताम् ॥ ३

श्रीपराशर उवाच
ते तथैव ततश्चक्रुः प्रह्लादाय महात्मने।
विषदानं यथाज्ञप्तं पित्रा तस्य महात्मनः ॥ ४
हालाहलं विषं घोरमनन्तोच्चारणेन सः।
अभिमन्त्र्य सहान्नेन मैत्रेय बुभुजे तदा॥ ५
अविकारं स तद्भुक्त्वा प्रह्लादः स्वस्थमानसः।
अनन्तख्यातिनिर्वीर्यं जरयामास तद्विषम् ॥ ६
ततः सूदा भयत्रस्ता जीर्णं दृष्ट्वा महद्विषम्।
दैत्येश्वरमुपागम्य प्रणिपत्येदमब्रुवन्॥ ७

सूदा ऊचुः
दैत्यराज विषं दत्तमस्माभिरतिभीषणम्।
जीर्णं तेन सहान्नेन प्रह्लादेन सुतेन ते॥ ८

हिरण्यकशिपुरुवाच
त्वर्यतां त्वर्यतां हे हे सद्यो दैत्यपुरोहिताः।
कृत्यां तस्य विनाशाय उत्पादयत मा चिरम् ॥ ९

श्रीपराशर उवाच
सकाशमागम्य ततः प्रह्लादस्य पुरोहिताः।
सामपूर्वमथोचुस्ते प्रह्लादं विनयान्वितम् ॥ १०

पुरोहिता ऊचुः
जातस्त्रैलोक्यविख्यात आयुष्मान्ब्रह्मणः कुले।
दैत्यराजस्य तनयो हिरण्यकशिपोर्भवान्॥ ११
किं देवैः किमनन्तेन किमन्येन तवाश्रयः।
पिता ते सर्वलोकानां त्वं तथैव भविष्यसि ॥ १२


**श्रीपराशरजी बोले—**उनकी ऐसी चेष्टा देख दैत्यों ने दैत्यराज हिरण्यकशिपुसे डरकर उससे सारा वृत्तान्त कह सुनाया, और उसने भी तुरन्त अपने रसोइयोंको बुलाकर कहा॥ १॥

**हिरण्यकशिपु बोला—**अरे सूदगण! मेरा यह दुष्ट और दुर्मति पुत्र औरोंको भी कुमार्गका उपदेश देता है, अतः तुम शीघ्र ही इसे मार डालो॥ २॥ तुम उसे उसके बिना जाने समस्त खाद्यपदार्थों में हलाहल विष मिलाकर दो और किसी प्रकारका सोच-विचार न कर उस पापीको मार डालो॥ ३॥

**श्रीपराशरजी बोले—**तब उन रसोइयोंने महात्मा प्रह्लादको, जैसी कि उनके पिताने आज्ञा दी थी उसीके अनुसार विष दे दिया॥ ४॥ हे मैत्रेय! तब वे उस घोर हलाहल विषको भगवन्नामके उच्चारणसे अभिमन्त्रित कर अन्नके साथ खा गये॥ ५॥ तथा भगवन्नामके प्रभावसे निस्तेज हुए उस विषको खाकर उसे बिना किसी विकारके पचाकर स्वस्थ चित्तसे स्थित रहे॥ ६॥ उस महान् विषको पचा हुआ देख रसोइयोंने भयसे व्याकुल हो हिरण्यकशिपुके पास जा उसे प्रणाम करके कहा॥ ७॥

**सूदगण बोले—**हे दैत्यराज! हमने आपकी आज्ञासे अत्यन्त तीक्ष्ण विष दिया था, तथापि आपके पुत्र प्रह्लादने उसे अन्नके साथ पचा लिया॥ ८॥

**हिरण्यकशिपु बोला—**हे पुरोहितगण! शीघ्रता करो, शीघ्रता करो! उसे नष्ट करनेके लिये अब कृत्या उत्पन्न करो; और देरी न करो॥ ९॥

**श्रीपराशरजी बोले—**तब पुरोहितोंने अति विनीत प्रह्लादसे, उसके पास जाकर शान्तिपूर्वक कहा॥ १०॥

**पुरोहित बोले—**हे आयुष्मन्! तुम त्रिलोकीमें विख्यात ब्रह्माजीके कुलमें उत्पन्न हुए हो और दैत्यराज हिरण्यकशिपुके पुत्र हो॥ ११॥ तुम्हें देवता, अनन्त अथवा और भी किसीसे क्या प्रयोजन है? तुम्हारे पिता तुम्हारे तथा सम्पूर्ण लोकोंके आश्रय हैं और तुम भी ऐसे ही होगे॥ १२॥

९० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १८


तस्मात्परित्यजैनां त्वं विपक्षस्तवसंहिताम्।
श्लाघ्यः पिता समस्तानां गुरूणां परमो गुरुः॥ १३

प्रह्लाद उवाच

एवमेतन्महाभागाः श्लाघ्यमेतन्महाकुलम्।
मरीचेः सकलेऽप्यस्मिंस्त्रैलोक्ये नान्यथा वदेत्॥ १४

पिता च मम सर्वस्मिञ्जगत्युत्कृष्टचेष्टितः।
एतदप्यवगच्छामि सत्यमत्रापि नानृतम्॥ १५

गुरूणामपि सर्वेषां पिता परमो गुरुः।
यदुक्तं भ्रान्तिस्तत्रापि स्वल्पापि हि न विद्यते॥ १६

पिता गुरुर्न सन्देहः पूजनीयः प्रयत्नतः।
तत्रापि नापराध्यामीत्येवं मनसि मे स्थितम्॥ १७

यत्त्वेतत्किमनन्तेनेत्युक्तं युष्माभिरीदृशम्।
को ब्रवीति यथान्याय्यं किं तु नैतद्वचोऽर्थवत्॥ १८

इत्युक्त्वा सोऽभवन्मौनी तेषां गौरवयन्त्रितः।
प्रहस्य च पुनः प्राह किमनन्तेन साध्विति॥ १९

साधु भो किमनन्तेन साधु भो गुरवो मम।
श्रूयतां यदनन्तेन यदि खेदं न यास्यथ॥ २०

धर्मार्थकाममोक्षाश्च पुरुषार्था उदाहृताः।
चतुष्टयमिदं यस्मात्तस्मात्किं किमिदं वचः॥ २१

मरीचिमिश्रैर्दक्षाद्यैस्तथैवान्यैरनन्तः।
धर्मः प्राप्तस्तथा चान्यैरर्थः कामस्तथाऽपरैः॥ २२

तत्तत्त्ववेदिनो भूत्वा ज्ञानध्यानसमाधिभिः।
अवापुर्मुक्तिमपरे पुरुषा ध्वस्तबन्धनाः॥ २३

सम्पदैश्वर्यमाहात्म्यज्ञानसन्ततिकर्मणाम्।
विमुक्तेश्चैकतो लभ्यं मूलमाराधनं हरेः॥ २४

यतो धर्मार्थकामाख्यं मुक्तिश्चापि फलं द्विजाः।
तेनापि किं किमित्येवमनन्तेन किमुच्यते॥ २५

किं चापि बहुनोक्तेन भवन्तो गुरवो मम।
वदन्तु साधु वासाधु विवेकोऽस्माकमल्पकः॥ २६


इसलिये तुम यह विपक्षकी स्तुति करना छोड़ दो। तुम्हारे पिता सब प्रकार प्रशंसनीय हैं और वे ही समस्त गुरुओंमें परम गुरु हैं॥ १३॥

प्रह्लादजी बोले— हे महाभागगण! यह ठीक ही है। इस सम्पूर्ण त्रिलोकीमें भगवान् मरीचिका यह महान् कुल अवश्य ही प्रशंसनीय है। इसमें कोई कुछ भी अन्यथा नहीं कह सकता॥ १४॥ और मेरे पिताजी भी सम्पूर्ण जगत्में बहुत बड़े पराक्रमी हैं; यह भी मैं जानता हूँ। यह बात भी बिलकुल ठीक है, अन्यथा नहीं॥ १५॥ और आपने जो कहा कि समस्त गुरुओंमें पिता ही परम गुरु हैं—इसमें भी मुझे लेशमात्र सन्देह नहीं है॥ १६॥ पिताजी परम गुरु हैं और प्रयत्नपूर्वक पूजनीय हैं—इसमें कोई सन्देह नहीं। और मेरे चित्तमें भी यही विचार स्थित है कि मैं उनका कोई अपराध नहीं करूँगा॥ १७॥ किन्तु आपने जो यह कहा कि 'तुझे अनन्तसे क्या प्रयोजन है?' सो ऐसी बातको भला कौन न्यायोचित कह सकता है? आपका यह कथन किसी भी तरह ठीक नहीं है॥ १८॥

ऐसा कहकर वे उनका गौरव रखनेके लिये चुप हो गये और फिर हँसकर कहने लगे—'तुझे अनन्तसे क्या प्रयोजन है? इस विचारको धन्यवाद है!॥ १९॥ हे मेरे गुरुगण! आप कहते हैं कि तुझे अनन्तसे क्या प्रयोजन है? धन्यवाद है आपके इस विचारको! अच्छा, यदि आपको बुरा न लगे तो मुझे अनन्तसे जो प्रयोजन है सो सुनिये॥ २०॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चार पुरुषार्थ कहे जाते हैं। ये चारों ही जिनसे सिद्ध होते हैं, उनसे क्या प्रयोजन?—आपके इस कथनको क्या कहा जाय!॥ २१॥ उन अनन्तसे ही दक्ष और मरीचि आदि तथा अन्यान्य ऋषीश्वरोंको धर्म, किन्हीं अन्य मुनीश्वरोंको अर्थ एवं अन्य किन्हींको कामकी प्राप्ति हुई है॥ २२॥ किन्हीं अन्य महापुरुषोंने ज्ञान, ध्यान और समाधिके द्वारा उन्हींके तत्त्वको जानकर अपने संसार-बन्धनको काटकर मोक्षपद प्राप्त किया है॥ २३॥ अतः सम्पत्ति, ऐश्वर्य, माहात्म्य, ज्ञान, सन्तति और कर्म तथा मोक्ष—इन सबकी एकमात्र मूल श्रीहरिकी आराधना ही उपार्जनीय है॥ २४॥ हे द्विजगण! इस प्रकार, जिनसे अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष ये चारों ही फल प्राप्त होते हैं उनके लिये भी आप ऐसा क्यों कहते हैं कि 'अनन्तसे तुझे क्या प्रयोजन है?'॥ २५॥ और बहुत कहनेसे क्या लाभ? आपलोग तो मेरे गुरु हैं; उचित-अनुचित सभी कुछ कह सकते हैं। और मुझे तो विचार भी बहुत ही कम है॥ २६॥

अ० १८ ] * प्रथम अंश * ९१


बहुनात्र किमुक्तेन स एव जगतः पतिः।
स कर्ता च विकर्ता च संहर्ता च हृदि स्थितः॥ २७

स भोक्ता भोज्यमप्येवं स एव जगदीश्वरः।
भवद्भिरेतत्क्षन्तव्यं बाल्यादुक्तं तु यन्मया॥ २८

पुरोहिता ऊचुः
दह्यमानस्त्वमस्माभिरग्निना बाल रक्षितः।
भूयो न वक्ष्यसीत्येवं नैव ज्ञातोऽस्यबुद्धिमान्॥ २९

यदस्मद्वचनान्मोहग्राहं न त्यक्ष्यते भवान्।
ततः कृत्यां विनाशाय तव स्त्रक्ष्याम दुर्मते॥ ३०

प्रह्लाद उवाच
कः केन हन्यते जन्तुर्जन्तुः कः केन रक्ष्यते।
हन्ति रक्षति चैवात्मा ह्यसत्साधु समाचरन्॥ ३१

कर्मणा जायते सर्वं कर्मैव गतिसाधनम्।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन साधुकर्म समाचरेत्॥ ३२

श्रीपराशर उवाच
इत्युक्तास्तेन ते क्रुद्धा दैत्यराजपुरोहिताः।
कृत्यामुत्पादयामासुर्ज्वालामालोज्ज्वलाकृतिम्॥ ३३

अतिभीमा समागम्य पादन्यासक्षतक्षितिः।
शूलेन साधु सङ्क्रुद्धा तं जघानाशु वक्षसि॥ ३४

तत्तस्य हृदयं प्राप्य शूलं बालस्य दीप्तिमत्।
जगाम खण्डितं भूमौ तत्रापि शतधा गतम्॥ ३५

यत्रानपायी भगवान् हृद्यास्ते हरिरीश्वरः।
भङ्गो भवति वज्रस्य तत्र शूलस्य का कथा॥ ३६

अपापे तत्र पापैश्च पातिता दैत्ययाजकैः।
तानेव सा जघानाशु कृत्या नाशं जगाम च॥ ३७

कृत्यया दह्यमानांस्तान्विलोक्य स महामतिः।
त्राहि कृष्णोत्यनन्तेति वदन्नभ्यवपद्यत॥ ३८

प्रह्लाद उवाच
सर्वव्यापिन् जगद्रूप जगत्स्रष्टर्जनार्दन।
पाहि विप्रानिमानस्माद्दुःसहान्मन्त्रपावकात्॥ ३९


इस विषयमें अधिक क्या कहा जाय ? [मेरे विचारसे तो] सबके अन्तःकरणोंमें स्थित एकमात्र वे ही संसारके स्वामी तथा उसके रचयिता, पालक और संहारक हैं॥ २७॥ वे ही भोक्ता और भोज्य तथा वे ही एकमात्र जगदीश्वर हैं। हे गुरुगण! मैंने बाल्यभावसे यदि कुछ अनुचित कहा हो तो आप क्षमा करें"॥ २८॥

पुरोहितगण बोले— अरे बालक! हमने तो यह समझकर कि तू फिर ऐसी बात न कहेगा तुझे अग्निमें जलनेसे बचाया है। हम यह नहीं जानते थे कि तू ऐसा बुद्धिहीन है?॥ २९॥ रे दुर्मते! यदि तू हमारे कहनेसे अपने इस मोहमय आग्रहको नहीं छोड़ेगा तो हम तुझे नष्ट करनेके लिये कृत्या उत्पन्न करेंगे॥ ३०॥

प्रह्लादजी बोले— कौन जीव किससे मारा जाता है और कौन किससे रक्षित होता है? शुभ और अशुभ आचरणोंके द्वारा आत्मा स्वयं ही अपनी रक्षा और नाश करता है॥ ३१॥ कर्मोंके कारण ही सब उत्पन्न होते हैं और कर्म ही उनकी शुभाशुभ गतियोंके साधन हैं। इसलिये प्रयत्नपूर्वक शुभकर्मोंका ही आचरण करना चाहिये॥ ३२॥

श्रीपराशरजी बोले— उनके ऐसा कहनेपर उन दैत्यराजके पुरोहितोंने क्रोधित होकर अग्निशिखाके समान प्रज्वलित शरीरवाली कृत्या उत्पन्न कर दी॥ ३३॥ उस अति भयंकरीने अपने पादाघातसे पृथिवीको कम्पित करते हुए वहाँ प्रकट होकर बड़े क्रोधसे प्रह्लादजीकी छातीमें त्रिशूलसे प्रहार किया॥ ३४॥ किन्तु उस बालकके वक्षःस्थलमें लगते ही वह तेजोमय त्रिशूल टूटकर पृथिवीपर गिर पड़ा और वहाँ गिरनेसे भी उसके सैकड़ों टुकड़े हो गये॥ ३५॥ जिस हृदयमें निरन्तर अक्षुण्णभावसे श्रीहरिभगवान् विराजते हैं उसमें लगनेसे तो वज्रके भी टूक-टूक हो जाते हैं, त्रिशूलकी तो बात ही क्या है?॥ ३६॥

उन पापी पुरोहितोंने उस निष्पाप बालकपर कृत्याका प्रयोग किया था; इसलिये तुरन्त ही उसने उनपर वार किया और स्वयं भी नष्ट हो गयी॥ ३७॥ अपने गुरुओंको कृत्याद्वारा जलाये जाते देख महामति प्रह्लाद 'हे कृष्ण ! रक्षा करो ! हे अनन्त ! बचाओ!' ऐसा कहते हुए उनकी ओर दौड़े॥ ३८॥

प्रह्लादजी कहने लगे— हे सर्वव्यापी, विश्वरूप, विश्वस्रष्टा जनार्दन ! इन ब्राह्मणोंकी इस मन्त्राग्निरूप दुःसह दुःखसे रक्षा करो॥ ३९॥

९२* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १९
संस्कृतहिन्दी
यथा सर्वेषु भूतेषु सर्वव्यापी जगद्गुरुः।<br>विष्णुरेव तथा सर्वे जीवन्त्वेते पुरोहिताः॥ ४०<br>यथा सर्वगतं विष्णुं मन्यमानोऽनपायिनम्।<br>चिन्तयाम्यरिपक्षेऽपि जीवन्त्वेते पुरोहिताः॥ ४१<br>ये हन्तुमागता दत्तं यैर्विषं यैर्हुताशनः।<br>यैर्दिग्गजैरहं क्षुण्णो दष्टः सर्पैश्च यैरपि॥ ४२<br>तेष्वहं मित्रभावेन समः पापोऽस्मि न क्वचित्।<br>यथा तेनाद्य सत्येन जीवन्त्वसुरयाजकाः॥ ४३'सर्वव्यापी जगद्गुरु भगवान् विष्णु सभी प्राणियोंमें व्याप्त हैं'—इस सत्यके प्रभावसे ये पुरोहितगण जीवित हो जायँ॥ ४०॥ यदि मैं सर्वव्यापी और अक्षय श्रीविष्णुभगवान्‌को अपने विपक्षियोंमें भी देखता हूँ तो ये पुरोहितगण जीवित हो जायँ॥ ४१॥ जो लोग मुझे मारनेके लिये आये, जिन्होंने मुझे विष दिया, जिन्होंने आगमें जलाया, जिन्होंने दिग्गजोंसे पीड़ित कराया और जिन्होंने सर्पोंसे डँसाया उन सबके प्रति यदि मैं समान मित्रभावसे रहा हूँ और मेरी कभी पाप-बुद्धि नहीं हुई तो उस सत्यके प्रभावसे ये दैत्यपुरोहित जी उठें॥ ४२-४३॥
श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तास्तेन ते सर्वे संस्पृष्टाश्च निरामयाः।<br>समुत्तस्थुर्द्विजा भूयस्तमूचुः प्रश्रयान्वितम्॥ ४४**श्रीपराशरजी बोले—**ऐसा कहकर उनके स्पर्श करते ही वे ब्राह्मण स्वस्थ होकर उठ बैठे और उस विनयावनत बालकसे कहने लगे॥ ४४॥
पुरोहिता ऊचुः<br>दीर्घायुरप्रतिहतो बलवीर्यसमन्वितः।<br>पुत्रपौत्रधनैश्वर्यैर्युक्तो वत्स भवोत्तमः॥ ४५**पुरोहितगण बोले—**हे वत्स! तू बड़ा श्रेष्ठ है। तू दीर्घायु, निर्द्वन्द्व, बल-वीर्यसम्पन्न तथा पुत्र, पौत्र एवं धन-ऐश्वर्यादिसे सम्पन्न हो॥ ४५॥
श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्त्वा तं ततो गत्वा यथावृत्तं पुरोहिताः।<br>दैत्यराजाय सकलमाचचक्षुर्महामुने॥ ४६**श्रीपराशरजी बोले—**हे महामुने! ऐसा कह पुरोहितोंने दैत्यराज हिरण्यकशिपुके पास जा उसे सारा समाचार ज्यों-का-त्यों सुना दिया॥ ४६॥
<div align="center">

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥


उन्नीसवाँ अध्याय

प्रह्लादकृत भगवत्-गुण-वर्णन और प्रह्लादकी रक्षाके लिये भगवान्‌का सुदर्शनचक्रको भेजना

</div>
संस्कृतहिन्दी
श्रीपराशर उवाच<br>हिरण्यकशिपुः श्रुत्वा तां कृत्यां वितथीकृताम्।<br>आहूय पुत्रं पप्रच्छ प्रभावस्यास्य कारणम्॥ १**श्रीपराशरजी बोले—**हिरण्यकशिपुने कृत्याको भी विफल हुई सुन अपने पुत्र प्रह्लादको बुलाकर उनके इस प्रभावका कारण पूछा॥ १॥
हिरण्यकशिपुरुवाच<br>प्रह्लाद सुप्रभावोऽसि किमेतत्ते विचेष्टितम्।<br>एतन्मन्त्रादिजनितमुताहो सहजं तव॥ २**हिरण्यकशिपु बोला—**अरे प्रह्लाद! तू बड़ा प्रभावशाली है! तेरी ये चेष्टाएँ मन्त्रादिजनित हैं या स्वाभाविक ही हैं॥ २॥
श्रीपराशर उवाच<br>एवं पृष्टस्तदा पित्रा प्रह्लादोऽसुरबालकः।<br>प्रणिपत्य पितुः पादाविदं वचनमब्रवीत्॥ ३**श्रीपराशरजी बोले—**पिताके इस प्रकार पूछनेपर दैत्यकुमार प्रह्लादजीने उसके चरणोंमें प्रणाम कर इस प्रकार कहा— ॥ ३॥

अ० १९] * प्रथम अंश * ९३


न मन्त्रादिकृतं तात न च नैसर्गिकं मम।<br>प्रभाव एष सामान्यो यस्य यस्याच्युतो हृदि॥ ४<br>अन्येषां यो न पापानि चिन्तयत्यात्मनो यथा।<br>तस्य पापागमस्तात हेत्वभावान्न विद्यते॥ ५<br>कर्मणा मनसा वाचा परपीडां करोति यः।<br>तद्बीजं जन्म फलति प्रभूतं तस्य चाशुभम्॥ ६<br>सोऽहं न पापमिच्छामि न करोमि वदामि वा।<br>चिन्तयन्सर्वभूतस्थमात्मन्यपि च केशवम्॥ ७<br>शारीरं मानसं दुःखं दैवं भूतभवं तथा।<br>सर्वत्र शुभचित्तस्य तस्य मे जायते कुतः॥ ८<br>एवं सर्वेषु भूतेषु भक्तिरव्यभिचारिणी।<br>कर्तव्या पण्डितैर्ज्ञात्वा सर्वभूतमयं हरिम्॥ ९<br>श्रीपराशर उवाच<br>इति श्रुत्वा स दैत्येन्द्रः प्रासादशिखरे स्थितः।<br>क्रोधान्धकारितमुखः प्राह दैतेयकिङ्करान्॥ १०<br>हिरण्यकशिपुरुवाच<br>दुरात्मा क्षिप्यतामस्मात्प्रासादाच्छतयोजनात्।<br>गिरिपृष्ठे पतत्वस्मिन् शिलाभिन्नाङ्गसंहतिः॥ ११<br>ततस्तं चिक्षिपुः सर्वे बालं दैतेयदानवाः।<br>पपात सोऽधधः क्षिप्तो हृदयेनोद्वहन्हरिम्॥ १२<br>पतमानं जगद्धात्री जगद्धातरि केशवे।<br>भक्तियुक्तं दधारैनमुपसङ्गम्य मेदिनी॥ १३<br>ततो विलोक्य तं स्वस्थमविशीर्णास्थिपञ्जरम्।<br>हिरण्यकशिपुः प्राह शम्बरं मायिनां वरम्॥ १४<br>हिरण्यकशिपुरुवाच<br>नास्माभिः शक्यते हन्तुमसौ दुर्बुद्धिबालकः।<br>मायां वेत्ति भवांस्तस्मान्माययैनं निष्षूदय॥ १५<br>शम्बर उवाच<br>सूदयाम्येव दैत्येन्द्र पश्य मायाबलं मम।<br>सहस्रमत्र मायानां पश्य कोटिशतं तथा॥ १६<br>श्रीपराशर उवाच<br>ततः स ससृजे मायां प्रह्लादे शम्बरोऽसुरः।<br>विनाशमिच्छन्दुबुद्धिः सर्वत्र समदर्शिनि॥ १७"पिताजी! मेरा यह प्रभाव न तो मन्त्रादिजनित है<br>और न स्वाभाविक ही है, बल्कि जिस-जिसके हृदयमें<br>श्रीअच्युतभगवान्‌का निवास होता है उसके लिये यह सामान्य<br>बात है॥ ४॥ जो मनुष्य अपने समान दूसरोंका बुरा नहीं<br>सोचता, हे तात! कोई कारण न रहनेसे उसका भी कभी<br>बुरा नहीं होता॥ ५॥ जो मनुष्य मन, वचन या कर्मसे<br>दूसरोंको कष्ट देता है उसके उस परपीडारूप बीजसे ही<br>उत्पन्न हुआ उसको अत्यन्त अशुभ फल मिलता<br>है॥ ६॥ अपने सहित समस्त प्राणियोंमें श्रीकेशवको वर्तमान<br>समझकर मैं न तो किसीका बुरा चाहता हूँ और न कहता<br>या करता ही हूँ॥ ७॥ इस प्रकार सर्वत्र शुभचित्त होनेसे<br>मुझको शारीरिक, मानसिक, दैविक अथवा भौतिक दुःख<br>किस प्रकार प्राप्त हो सकता है?॥ ८॥ इसी प्रकार भगवान्‌को<br>सर्वभूतमय जानकर विद्वानोंको सभी प्राणियोंमें अविचल<br>भक्ति (प्रेम) करनी चाहिये"॥ ९॥<br> **श्रीपराशरजी बोले—**अपने महलकी अट्टालिकापर<br>बैठे हुए उस दैत्यराजने यह सुनकर क्रोधान्ध हो<br>अपने दैत्य अनुचरोंसे कहा॥ १०॥<br> **हिरण्यकशिपु बोला—**यह बड़ा दुरात्मा है, इसे<br>इस सौ योजन ऊँचे महलसे गिरा दो, जिससे यह इस<br>पर्वतके ऊपर गिरे और शिलाओंसे इसके अंग-अंग छिन्न-<br>भिन्न हो जायँ॥ ११॥<br> तब उन समस्त दैत्य और दानवोंने उन्हें महलसे<br>गिरा दिया और वे भी उनके ढकेलनेसे हृदयमें श्रीहरिका<br>स्मरण करते-करते नीचे गिर गये॥ १२॥ जगत्कर्ता भगवान्<br>केशवके परमभक्त प्रह्लादजीके गिरते समय उन्हें जगद्धात्री<br>पृथिवीने निकट जाकर अपनी गोदमें ले लिया॥ १३॥<br>तब बिना किसी हड्डी-पसलीके टूटे उन्हें स्वस्थ देख दैत्यराज<br>हिरण्यकशिपुने परममायावी शम्बरासुरसे कहा॥ १४॥<br> **हिरण्यकशिपु बोला—**यह दुर्बुद्धि बालक कोई<br>ऐसी माया जानता है जिससे यह हमसे नहीं मारा जा<br>सकता, इसलिये आप मायासे ही इसे मार डालिये॥ १५॥<br> **शम्बरासुर बोला—**हे दैत्येन्द्र! इस बालकको मैं<br>अभी मारे डालता हूँ, तुम मेरी मायाका बल देखो। देखो,<br>मैं तुम्हें सैकड़ों-हजारों-करोड़ों मायाएँ दिखलाता हूँ॥ १६॥<br> **श्रीपराशरजी बोले—**तब उस दुर्बुद्धि शम्बरासुरने<br>समदर्शी प्रह्लादके लिये, उनके नाशकी इच्छासे बहुत-<br>सी मायाएँ रचीं॥ १७॥

९४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १९


समाहितमतिर्भूत्वा शम्बरेऽपि विमत्सरः ।
मैत्रेय सोऽपि प्रह्लादः सस्मार मधुसूदनम् ॥ १८

ततो भगवता तस्य रक्षार्थं चक्रमूत्तमम् ।
आजगाम समाजप्तं ज्वालामालि सुदर्शनम् ॥ १९

तेन मायासहस्रं तच्छम्बरस्याशुगामिना ।
बालस्य रक्षता देहमेकैकं च विशोधितम् ॥ २०

संशोषकं तथा वायुं दैत्येन्द्रस्त्विदमब्रवीत् ।
शीघ्रमेष ममादेशादुरात्मा नीयतां क्षयम् ॥ २१

तथेत्युक्त्वा तु सोऽप्येनं विवेश पवनो लघु ।
शीतोऽतिरूक्षः शोषाय तद्देहस्यातिदुःसहः ॥ २२

तेनाविष्टमथात्मानं स बुद्ध्वा दैत्यबालकः ।
हृदयेन महात्मानं दधार धरणीधरम् ॥ २३

हृदयस्थस्ततस्तस्य तं वायुमतिभीषणम् ।
पपौ जनार्दनः क्रुद्धः स ययौ पवनः क्षयम् ॥ २४

क्षीणासु सर्वमायासु पवने च क्षयं गते ।
जगाम सोऽपि भवनं गुरोरेव महामतिः ॥ २५

अहन्यहन्यथाचार्यो नीतिं राज्यफलप्रदाम् ।
ग्राहयामास तं बालं राज्ञामुशनसा कृताम् ॥ २६

गृहीतनीतिशास्त्रं तं विनीतं च यदा गुरुः ।
मेने तदैनं तत्पित्रे कथयामास शिक्षितम् ॥ २७

आचार्य उवाच

गृहीतनीतिशास्त्रस्ते पुत्रो दैत्यपते कृतः ।
प्रह्लादस्तत्त्वतो वेत्ति भार्गवेण यदीरितम् ॥ २८

हिरण्यकशिपुरुवाच

मित्रेषु वर्तेत कथमरिवर्गेषु भूपतिः ।
प्रह्लाद त्रिषु लोकेषु मध्यस्थेषु कथं चरेत् ॥ २९

कथं मन्त्रिष्वमात्येषु बाह्येष्वाभ्यन्तरेषु च ।
चारेषु पौरवर्गेषु शङ्कितेष्वितरेषु च ॥ ३०

कृत्याकृत्यविधानञ्च दुर्गाटविकसाधनम् ।
प्रह्लाद कथ्यतां सम्यक् तथा कण्टकशोधनम् ॥ ३१


किन्तु, हे मैत्रेय! शम्बरासुरके प्रति भी सर्वथा द्वेषहीन रहकर प्रह्लादजी सावधान चित्तसे श्रीमधुसूदनभगवान्का स्मरण करते रहे ॥ १८ ॥ उस समय भगवान्की आज्ञासे उनकी रक्षाके लिये वहाँ ज्वाला-मालाओंसे युक्त सुदर्शनचक्र आ गया ॥ १९ ॥ उस शीघ्रगामी सुदर्शनचक्रने उस बालककी रक्षा करते हुए शम्बरासुरकी सहस्रों मायाओंको एक-एक करके नष्ट कर दिया ॥ २० ॥

तब दैत्यराजने सबको सुखा डालनेवाले वायुसे कहा कि मेरी आज्ञासे तुम शीघ्र ही इस दुरात्माको नष्ट कर दो ॥ २१ ॥ अतः उस अति तीव्र शीतल और रूक्ष वायुने, जो अति असहनीय था 'जो आज्ञा' कह उनके शरीरको सुखानेके लिये उसमें प्रवेश किया ॥ २२ ॥ अपने शरीरमें वायुका आवेश हुआ जान दैत्यकुमार प्रह्लादने भगवान् धरणीधरको हृदयमें धारण किया ॥ २३ ॥ उनके हृदयमें स्थित हुए श्रीजनार्दनने क्रुद्ध होकर उस भीषण वायुको पी लिया, इससे वह क्षीण हो गया ॥ २४ ॥

इस प्रकार पवन और सम्पूर्ण मायाओंके क्षीण हो जानेपर महामति प्रह्लादजी अपने गुरुके घर चले गये ॥ २५ ॥ तदनन्तर गुरुजी उन्हें नित्यप्रति शुक्राचार्यजीकी बनायी हुई राज्यफलप्रदायिनी राजनीतिका अध्ययन कराने लगे ॥ २६ ॥ जब गुरुजीने उन्हें नीतिशास्त्रमें निपुण और विनयसम्पन्न देखा तो उनके पितासे कहा—'अब यह सुशिक्षित हो गया है' ॥ २७ ॥

आचार्य बोले— हे दैत्यराज ! अब हमने तुम्हारे पुत्रको नीतिशास्त्रमें पूर्णतया निपुण कर दिया है, भृगुनन्दन शुक्राचार्यजीने जो कुछ कहा है उसे प्रह्लाद तत्त्वतः जानता है ॥ २८ ॥

हिरण्यकशिपु बोला— प्रह्लाद ! [ यह तो बता ] राजाको मित्रोंसे कैसा बर्ताव करना चाहिये? और शत्रुओंसे कैसा? तथा त्रिलोकीमें जो मध्यस्थ (दोनों पक्षोंके हितचिन्तक) हों, उनसे किस प्रकार आचरण करे? ॥ २९ ॥ मन्त्रियों, अमात्यों, बाह्य और अन्तःपुरके सेवकों, गुप्तचरों, पुरवासियों, शंकितों (जिन्हें जीतकर बलात् दास बना लिया हो) तथा अन्यान्य जनोंके प्रति किस प्रकार व्यवहार करना चाहिये? ॥ ३० ॥ हे प्रह्लाद! यह ठीक-ठीक बता कि करने और न करनेयोग्य कार्योंका विधान किस प्रकार करे, दुर्ग और आटविक (जंगली मनुष्य) आदिको किस प्रकार वशीभूत करे और गुप्त शत्रुरूप काँटेको कैसे निकाले? ॥ ३१ ॥

अ० १९ ] * प्रथम अंश * ९५


एतच्चान्यच्च सकलमधीतं भवता यथा ।<br>तथा मे कथ्यतां ज्ञातुं तवेच्छामि मनोगतम् ॥ ३२यह सब तथा और भी जो कुछ तूने पढ़ा हो वह सब मुझे सुना, मैं तेरे मनके भावोंको जाननेके लिये बहुत उत्सुक हूँ॥ ३२॥
श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**तब विनयभूषण प्रह्लादजीने पिताके चरणोंमें प्रणाम कर दैत्यराज हिरण्यकशिपुसे हाथ जोड़कर कहा॥ ३३ ॥
प्रणिपत्य पितुः पादौ तदा प्रश्रयभूषणः ।<br>प्रह्लादः प्राह दैत्येन्द्रं कृताञ्जलिपुटस्तथा ॥ ३३
प्रह्लाद उवाच**प्रह्लादजी बोले—**पिताजी ! इसमें सन्देह नहीं, गुरुजीने तो मुझे इन सभी विषयोंकी शिक्षा दी है, और मैं उन्हें समझ भी गया हूँ; परन्तु मेरा विचार है कि वे नीतियाँ अच्छी नहीं हैं॥ ३४॥ साम, दान तथा दण्ड और भेद—ये सब उपाय मित्रादिके साधनेके लिये बतलाये गये हैं॥ ३५॥ किन्तु, पिताजी ! आप क्रोध न करें, मुझे तो कोई शत्रु-मित्र आदि दिखायी ही नहीं देते; और हे महाबाहो! जब कोई साध्य ही नहीं है तो इन साधनोंसे लेना ही क्या है? ॥ ३६ ॥ हे तात! सर्वभूतात्मक जगन्नाथ जगन्मय परमात्मा गोविन्दमें भला शत्रु-मित्रकी बात ही कहाँ है? ॥ ३७ ॥ श्रीविष्णुभगवान् तो आपमें, मुझमें और अन्यत्र भी सभी जगह वर्तमान हैं, फिर 'यह मेरा मित्र है और यह शत्रु है' ऐसे भेदभावको स्थान ही कहाँ है? ॥ ३८ ॥ इसलिये, हे तात ! अविद्याजन्य दुष्कर्मोंमें प्रवृत्त करनेवाले इस वाग्जालको सर्वथा छोड़कर अपने शुभके लिये ही यत्न करना चाहिये ॥ ३९ ॥ हे दैत्यराज ! अज्ञानके कारण ही मनुष्योंकी अविद्यामें विद्या-बुद्धि होती है। बालक क्या अज्ञानवश खद्योतको ही अग्नि नहीं समझ लेता? ॥ ४० ॥ कर्म वही है जो बन्धनका कारण न हो और विद्या भी वही है जो मुक्तिकी साधिका हो। इसके अतिरिक्त और कर्म तो परिश्रमरूप तथा अन्य विद्याएँ कला-कौशलमात्र ही हैं ॥ ४१ ॥<br><br>हे महाभाग ! इस प्रकार इन सबको असार समझकर अब आपको प्रणाम कर मैं उत्तम सार बतलाता हूँ, आप श्रवण कीजिये ॥ ४२ ॥ राज्य पानेकी चिन्ता किसे नहीं होती और धनकी अभिलाषा भी किसको नहीं है? तथापि ये दोनों मिलते उन्हींको हैं जिन्हें मिलनेवाले होते हैं॥ ४३ ॥ हे महाभाग ! महत्त्व-प्राप्तिके लिये सभी यत्न करते हैं, तथापि वैभवका कारण तो मनुष्यका भाग्य ही है, उद्यम नहीं ॥ ४४॥ हे प्रभो! जड, अविवेकी, निर्बल और अनीतिज्ञोंको भी भाग्यवश नाना प्रकारके भोग और राज्यादि प्राप्त होते हैं ॥ ४५ ॥ इसलिये जिसे महान् वैभवकी इच्छा हो उसे केवल पुण्यसंचयका ही यत्न करना चाहिये; और जिसे मोक्षकी इच्छा हो उसे भी समत्वलाभका ही प्रयत्न करना चाहिये ॥ ४६ ॥
ममोपदिष्टं सकलं गुरुणा नात्र संशयः ।<br>गृहीतं तु मया किन्तु न सदेतन्मतं मम ॥ ३४
साम चोपप्रदानं च भेददण्डौ तथापरौ ।<br>उपायाः कथिताः सर्वे मित्रादीनां च साधने ॥ ३५
तानेवाहं न पश्यामि मित्रादींस्तात मा क्रुधः ।<br>साध्याभावे महाबाहो साधनैः किं प्रयोजनम् ॥ ३६
सर्वभूतात्मके तात जगन्नाथे जगन्मये ।<br>परमात्मनि गोविन्दे मित्रामित्रकथा कुतः ॥ ३७
त्वय्यस्ति भगवान् विष्णुर्मयि चान्यत्र चास्ति सः ।<br>यतस्ततोऽयं मित्रं मे शत्रुश्चेति पृथक्कुतः ॥ ३८
तदेभिरलमल्यर्थं दुष्टारम्भोक्तिविस्तरैः ।<br>अविद्यान्तर्गतैर्यत्नैः कर्त्तव्यस्तात शोभने ॥ ३९
विद्याबुद्धिरविद्यायामज्ञानात्तात जायते ।<br>बालोऽग्निं किं न खद्योतमसुरेश्वर मन्यते ॥ ४०
तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये ।<br>आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम् ॥ ४१
तदेतदवगम्याहमसारं सारमुत्तमम् ।<br>निशामय महाभाग प्रणिपत्य ब्रवीमि ते ॥ ४२
न चिन्तयति को राज्यं को धनं नाभिवाञ्छति ।<br>तथापि भव्यमेवैतदुभयं प्राप्यते नरैः ॥ ४३
सर्व एव महाभाग महत्त्वं प्रति सोद्यमाः ।<br>तथापि पुंसां भाग्यानि नोद्यमा भूतिहेतवः ॥ ४४
जडानामविवेकानामशूराणामपि प्रभो ।<br>भाग्यभोज्यानि राज्यानि सन्त्यनीतिम तामपि ॥ ४५
तस्माद्यतेत पुण्येषु य इच्छेन्महतीं श्रियम् ।<br>यतितव्यं समत्वे च निर्वाणमपि चेच्छता ॥ ४६