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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय हम प्रजा के कल्याण के लिए अग्नि को प्रकाशित करते हैं. आप सम्यक् रूप से उत्पन्न हैं. आप सर्वविद् हैं. हम यक्ष्मा ( रोग ) नाश के लिए आप को सिरजते हैं. ( ५३ ) रुद्राः स ँ४ सृज्य पृथिवीं बृहज्ज्योतिः समीधिरे. तेषां भानुरजस्र ऽ इच्छुक्रो देवेषु रोचते.. (५४) रुद्रगणों ने पृथ्वी को सिरजा और विशाल ज्योति से लोक को प्रदीप्त किया ( चमकाया ). सूर्य की अजस्र ( लगातार ) ज्योति देवताओं को चमकाती है. ( ५४ ) स ँ४ सृष्टां वसुभी रुद्रैर्धीरैः कर्मण्यां मृदम्. हस्ताभ्यां मृद्वीं कृत्वा सिनीवाली कृणोतु ताम्.. (५५) धैर्यशाली वसुओं और रुद्रगणों द्वारा कर्मपूर्वक मिट्टी सिरजी गई है ( तैयार की गई है ). सिनीवाली देवी हाथों से उस मिट्टी को पात्र बनाने लायक तैयार करें तथा पात्र बनाने की कृपा करें. ( ५५ ) सिनीवाली सुकपर्दा सुकुरीरा स्वौपशा. सा तुभ्यमदिते मह्योखां दधातु हस्तयोः.. (५६) सिनीवाली देवी सुंदर केशों, सुंदर अंगों व सुंदर आभूषणों वाली हैं. वे देवताओं की माता हैं. वे हम लोगों को लिए हाथों में उखा ( पुरोडाश पकाने का पात्र ) धारण करने की कृपा करें. ( ५६ ) उखां कृणोतु शक्त्या बाहुभ्यामदितिर्धिया. माता पुत्रं यथोपस्थे साग्निं बिभर्तु गर्भ ऽ आ. मखस्य शिरो ऽ सि.. (५७) देवमाता उखा पात्र को शक्ति व सुमतिपूर्वक बाहु से धारण करने की कृपा करें. माता जैसे पुत्र को गोद में बैठाती है, वैसे ही आप अपने गर्भ ( बीच ) में अग्नि को धारने की कृपा करें. आप यज्ञ के सिर ( मुख्य ) हैं. ( ५७ ) वसवस्त्वा कृण्वन्तु गायत्रेण छन्दसाङ्गिरस्वद्द्ध्रुवासि पृथिव्यसि धारया मयि प्रजा ँ४ रायस्पोषं गौपत्य ँ४ सुवीर्यं ँ४ सजातान्यजमानाय रुद्रास्त्वा कृण्वन्तु त्रैष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वद्द्ध्रुवास्यन्तरिक्षमसि धारया मयि प्रजा ँ४ रायस्पोषं गौपत्य ँ४ सुवीर्य ँ४ सजातान्यजमानायादित्यास्त्वा कृण्वन्तु जागतेन छन्दसाङ्गिरस्वद्द्ध्रुवासि द्यौरसि धारया मयि प्रजा ँ४ रायस्पोषं गौपत्य ँ४ सुवीर्य ँ४ सजातान्यजमानाय विश्वे त्वा देवा वैश्वानराः कृण्वन्त्वानुष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वद्द्ध्रुवासि दिशोसि धारया मयि प्रजा ँ४ रायस्पोषं गौपत्य ँ४ सुवीर्य ँ४ सजातान्यजमानाय.. (५८) हे उखा देव! वसुगण गायत्री छंद से अंगिरा के समान आप को निर्मित करने की कृपा करें. आप ध्रुव व पृथ्वी हैं. आप हमारी प्रजा, यजमान व हमारे सजातियों १३४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय

के लिए धन धारिए. आप हमारी प्रजा का पोषण व उसे गोपति बनाने की कृपा कीजिए. आप हमारी प्रजा को श्रेष्ठ बलशाली बनाने की कृपा कीजिए. रुद्रगण त्रिष्टुप् छंद से अंगिरा के समान आप को निर्मित करने की कृपा करें. आप ध्रुव व अंतरिक्ष के समान हैं. अंगिरा के समान आप को निर्मित करने की कृपा करें. आदित्यगण जगती छंद की सामर्थ्य से अंगिरा के समान आप को निर्मित करने की कृपा करें. आप ध्रुव व स्वर्गलोक हैं. अंगिरा के समान आप को निर्मित करने की कृपा करें. आप विश्वे देवा अनुष्टुप् से अंगिरा के समान आप को निर्मित करने की कृपा करें. आप ध्रुव व दिशा रूप हैं. याजकों के लिए संतान, धन, पराक्रम सजातीय बांधवों का यथोचित सौहार्द दीजिए. (५८) अदित्यै रास्नास्यदितिष्टे बिलं गृभ्णातु. कृत्वाय सा महीमुखां मृण्मयीं योनिमग्नये. पुत्रेभ्यः प्रायच्छददितिः श्रपयानिति.. (५९) आप उखा की मेखला में हैं. आप बीच के स्थान में ग्रहण किए जाएं. देवमाता पृथ्विी की मिट्टी से अग्नि की आधारभूत उखा बनाने की कृपा करें. मिट्टी से निर्मित इसे पकाने के लिए पुत्रों को देने की कृपा करें. (५९) वसवस्त्वा धूपयन्तु गायत्रेण छन्दसाङ्गिरस्वद्रुद्रास्त्वा धूपयन्तु त्रैष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वदादित्यास्त्वा धूपयन्तु जागतेन छन्दसाङ्गिरस्वद्विश्वे त्वा देवा वैश्वानरा धूपयन्त्वानुष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वदिन्द्रस्त्वा धूपयतु वरुणस्त्वा धूपयतु विष्णुस्त्वा धूपयतु.. (६०) हे उखा देव! वसुगण गायत्री छंद से आप को धूप प्रदान करें. वसुगण अंगिरा जैसे आप को धूप प्रदान करें. रुद्रगण त्रिष्टुप् छंद से आप को धूप प्रदान करें. आदित्यगण जगती छंद से आप को धूप प्रदान करें. वैश्वानर अनुष्टुप् छंद से आप को धूप प्रदान करें. इंद्र देव आप को धूप प्रदान करें. वरुण देव आप को धूप प्रदान करें. विष्णु आप को धूप प्रदान करें. (६०) अदितिष्ट्वा देवी विश्वदेव्यावती पृथिव्याः सधस्थे अङ्गिरस्वत् खनत्वट देवानां त्वा पत्नीर्देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थे अङ्गिरस्वद्दधतूखे धिषणास्त्वा देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थे अङ्गिरस्वदभीन्धतामुखे वरूत्रीष्ट्वा देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थे अङ्गिरस्वच्छपयन्तूखे ग्नास्त्वा देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थे अङ्गिरस्वत्पचन्तूखे जनयस्त्वाच्छिन्नपत्रा देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थे अङ्गिरस्वत्पचन्तूखे.. (६१) हे मिट्टी देव! देवमाता सब की इष्ट व सभी दैवी गुणों की खान हैं. आप भूमि पर सधने की कृपा कीजिए. देवमाता अंगिरा की तरह आप को खोदने की कृपा करें. देवपत्नी सभी दिव्य गुणों के साथ आप को पृथ्विी पर स्थापित (साधने) यजुर्वेद - १३५

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय करने की कृपा करें. अंगिरा के समान आप को धारने व खोदने की कृपा करें. विश्व देवी सभी दिव्यगुणों की कृपा करें. अंगिरा की तरह आप को प्रज्वलित करने व खोदने की कृपा करें. विश्व देवी दिव्य गुणों सहित धारने की कृपा करें. हे मिट्टी देव! अंगिरा ऋषि की तरह आप को पकाने की कृपा प्रदान करें. विश्व देवी निरंतर गतिशील करने की कृपा प्रदान करें. ( ६१ ) मित्रस्य चर्षणीधृतो ऽ वो देवस्य सानसि. द्युम्नं चित्रश्रवस्तमम्.. (६२) हम पोषक शक्ति से प्रकाशवान, मित्र देवता के शाश्वत तथा आश्चर्यजनक पदार्थों से युक्त ऐश्वर्य धारण करें. ( ६२ ) देवस्त्वा सवितोद्वपतु सुपाणिः स्वङ्गुरिः सुबाहुरुत शक्त्या. अव्यथमाना पृथिव्यामाशा दिश ऽ आपृण.. (६३) हे उखे! सब को पैदा करने वाले सविता अपनी उत्तम भुजाओं और अंगुलियों यानी दिव्य किरणों से, अपनी सामर्थ्य एवं बुद्धि कौशल से आप को प्रकाशित करें. आप पृथ्वी पर दुःखरहित हो कर अपनी अच्छी इच्छाओं और ऊंचे उद्देश्य प्राप्त करें ( ६३ ) उत्थाय बृहती भवोदु तिष्ठ ध्रुवा त्वम्. मित्रैतां त ऽ उखां परिददाम्यभित्या ऽ एषा मा भेदि.. (६४) हे उखे! आप गर्त से निकल कर बड़े हों. आप स्थायी हो कर काम करें. हे मित्र देव! हम इस पवित्र बरतन को नष्ट होने के डर से आप को सौंपते हैं. यह टूटे नहीं. यह अच्छी तरह से कार्य करे. ( ६४ ) वसवस्त्वाच्छन्दन्तु गायत्रेण छन्दसाङ्गिरस्वद्रुद्रास्त्वाच्छन्दन्तु त्रैष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वदादित्यास्त्वाच्छन्दन्तु जागतेन छन्दसाङ्गिरस्वद्विश्वे त्वा देवा वैश्वानरा ऽ आच्छन्दन्त्वानुष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वत्.. (६५) हे उखे! गायत्री छंद के स्तोत्रों से वसुगण आप को अभिषिक्त ( सम्मानित ) करें. त्रिष्टुप् छंद से रुद्रगण आप का सम्मान करें. जगती छंद के प्रभाव से आदित्यगण आप का सम्मान करें. अनुष्टुप् छंद की सामर्थ्य से विश्वे देवा अंगिरा के समान आप का सम्मान करें. ( ६५ ) आकूतिमग्निं प्रयुज ᳪ स्वाहा मनो मेधामग्निं प्रयुज ᳪ स्वाहा चित्तं विज्ञातमग्निं प्रयुज ᳪ स्वाहा वाचो विधृतिमग्निं प्रयुज ᳪ स्वाहा प्रजापतये मनवे स्वाहाग्नये वैश्वानराय स्वाहा.. (६६) अग्नि अच्छे कामों में लगाने वाले हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. अग्नि अच्छे कामों में मन और बुद्धि को लगाने वाले हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. अग्नि चित्त को विशेष ज्ञान के लिए प्रेरित करते हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. अग्निवाणी को विशेष रूप से १३६ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय

धारण करते हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. प्रजापति मनु देव के लिए स्वाहा. प्रजापति अग्नि के लिए स्वाहा. प्रजापति वैश्वानर के लिए स्वाहा. ( ६६ )

विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरी॑त स॒ख्यम्. विश्वो राय ऽ इषुध्यति द्यु॒म्नं वृणीत पुष्यसे स्वाहा.. (६७)

सभी जन देवताओं के नेता परमेश्वर का सखि भाव ( उन की कृपा से ) पा जाएं. ( उन की कृपा से ) संसार के सब वैभव पा जाएं. ( उन की कृपा से ) संसार की सारी शान शौकत पा जाएं. ( उन की कृपा से ) संसार के तेजों को पा जाएं. परमेश्वर के लिए स्वाहा. ( ६७ )

मा सु भित्था मा सु रिषो ऽ म्ब धृष्णु वीरयस्व सु. अग्निश्चेदं करिष्यथः.. (६८)

हे उखा देव! आप का कभी भी भेदन न हो. आप कभी भी नष्ट न हों. आप धैर्यशाली वीर, कर्तव्यपरायण हैं. हे उखा देव! आप और अग्नि इस यज्ञ कार्य को संपादित कराने की कृपा करें. ( ६८ )

दृ ६४ हस्व देवि पृथिवि स्वस्तय ऽ आसुरी माया स्वधया कृतासि. जुष्टं देवेभ्य ऽ इदमस्तु हव्यमरिष्टा त्वमुदिहि यज्ञे अस्मिन्.. (६९)

हे पृथिवी देवी! आप असुरों की तरह मायावी रूप बदलने में समर्थ हैं. आप ने कल्याण हेतु उखा का रूप धारण किया है. आप सुदृढ़ होइए व इष्ट हवि का भोग लगाइए. आप आनंद देने व यज्ञ के समाप्त होने तक यज्ञ में उपस्थित रहने की कृपा कीजिए. ( ६९ )

द्र्वन्नः सर्पिरासुतिः प्रत्नो होता वरेण्यः. सहसस्पुत्रो अद्भुतः.. (७०)

हे अग्नि! आप धनवान, घी पीने वाले, होता, श्रेष्ठ, अद्भुत व साहस के पुत्र हैं. आप इस यज्ञ को सफल बनाने की कृपा कीजिए. ( ७० )

परस्या ऽ अधि संवतो ऽ वराँ २ अभ्यातर. यत्राहमस्मि ताँ २ अव.. (७१)

हे अग्नि! शत्रुओं के साथ संघर्षशील हमारे समीप के सैनिकों की रक्षा करने की कृपा कीजिए. जहां हम हैं, आप उस स्थान की भी रक्षा करने की कृपा कीजिए. ( ७१ )

परमस्याः परावतो रोहिदश्व ऽ इहा गहि. पुरीष्यः पुरुप्रियोग्ने त्वं तरा मृधः.. (७२)

हे अग्नि! आप रोहित नामक घोड़े की कांति से घिरे हुए हैं. आप यहां पधारने की कृपा कीजिए. आप धनवान व परम प्रिय हैं. आप शत्रुओं का नाश और हमारे यज्ञ को सफल बनाने की कृपा कीजिए. ( ७२ )

यजुर्वेद – १३७

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय यदग्ने कानि कानि चिदा ते दारूणि दध्मसि. सर्वं तदस्तु ते घृतं तज्जुषस्व यविष्ठ्य.. (७३) हे अग्नि! आप को कौनकौन सी लकड़ियां ( समिधा ) समर्पित की जाएं. हे अग्नि! आप उन सभी को घी की आहुति की तरह अत्यंत प्रिय भाव से ग्रहण करने की कृपा करें. ( ७३ ) यदत्त्युपजिह्विका यद्वम्रो अतिसर्पति. सर्वं तदस्तु ते घृतं तज्जुषस्व यविष्ठ्य.. (७४) हे अग्नि! जैसे दीमक लकड़ी को खा जाती है, वैसे आप उसे खा जाएं. जैसे घुन लकड़ी को खा जाता है, वैसे ही आप उसे खा जाएं. हे अग्नि! समिधाएं आप को घी की तरह प्रिय हों. आप यज्ञ में उन सब को अत्यंत प्रिय भाव से ग्रहण करने की कृपा करें. ( ७४ ) अहरहरप्रयावं भरन्तोश्वायेव तिष्ठते घासमस्मै. रायस्पोषेण समिषा मदन्तोग्ने मा ते प्रतिवेशा रिषाम.. (७५) हे अग्नि! जैसे घुड़साल में हर दिन घोड़े को घास प्रदान करते हैं तथा ( घास से ) उस का भरणपोषण करते हैं, वैसे ही हम यजमान आप के संरक्षण में रहते हैं. आप वैसे ही धन से हमारा पोषण करने की कृपा कीजिए. हम आप के लिए हर दिन समिधाओं का आहार भेंट करें. हम आप की कृपा से कभी भी दुःखी न हों. सब प्रकार के सुख प्राप्त करें. ( ७५ ) नाभा पृथिव्याः समिधाने अग्नौ रायस्पोषाय बृहते हवामहे. इरम्मदं बृहदुक्थं यजत्रं जेतारमग्निं पृतनासु सासहिम्.. (७६) हे अग्नि! आप पृथ्व़ी की नाभि हैं. आप समिधा रूपी धन से पोषण पाते हैं. हम विशाल अग्नि का बारबार आह्वान करते हैं. हम बड़ी ( लंबी ) स्तुतियों से आप की प्रशंसा करते हैं. हम यहां विजेता अग्नि का आह्वान करते हैं. हम साहसी विजेता अग्नि का आह्वान करते हैं. हम यहां ऐश्वर्य प्राप्ति हेतु अग्नि का आह्वान करते हैं. ( ७६ ) याः सेना ऽ अभीत्वरीराव्याधिनीरुगणा ऽ उत. ये स्तेना ये च तस्करास्ताँस्ते अग्नेपि दधाम्यास्ये.. (७७) हे अग्नि! शत्रुओं की जो सेना युद्ध हेतु तैयार होती है, उसे आप रोगों के मुख में झोंक देते हैं. शत्रुओं की जो सेना युद्ध हेतु तैयार होती, उसे चोर डाकुओं के मुख में झोंक देते हैं. हे अग्नि! हम आप को इसी उद्देश्य के लिए धारण करते हैं. ( ७७ ) १३८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय द १४ ष्ट्राभ्यां मलिम्लूञ्जम्भ्यैस्तस्कराँ २ उत. हनुभ्या १४ स्तेनान् भगवस्ताँस्तव खाद सुखादितान्.. (७८) हे अग्नि! आप दुष्टों को अपनी दाढ़ों से समूल नष्ट करने की कृपा करें. आप डाकुओं को अपने दांतों से समूल नष्ट करने की कृपा करें. आप चोरों को अपनी दाढ़ी से समूल नष्ट करने की कृपा करें. आप गड्ढा खोद कर शत्रुओं को गाड़ दीजिए. आप सत्कर्म की कृपा करें. ( ७८ ) ये जनेषु मलिम्लव: स्तेनासस्तस्करा वने. ये कक्षेष्वधायवस्ताँस्ते दधामि जम्भयो:.. (७९) हे अग्नि! जो मनुष्य में मलिन, चोर, जो मनुष्य में डाकू, वनचर डाकू, जो मनुष्यों की कांख में घात कर के मारने वाले हैं, उन्हें आप अपनी दाढ़ों में धारण कर के मार डालिए. ( ७९ ) यो अस्मभ्यमरातीयाद्यश्च नो द्वेषते जन:. निन्दाद्यो अस्मान्धित्साच्च सर्वं तं मस्मसा कुरु.. (८०) हे अग्नि! जो लोग हम से द्वेष करें, आप उन सब का नाश करने की कृपा कीजिए. आप उन सभी का नाश करने की कृपा कीजिए, जो हमारी निडरता में बाधक बनें और जो हमारी निंदा करते हैं. ( ८० ) स १४ शितं मे ब्रह्म स १४ शितं वीर्यं बलम्. स १४ शितं क्षत्रं जिष्णु यस्याहमस्मि पुरोहित:.. (८१) हे अग्नि! आप की कृपा से जिस यजमान के यज्ञ के हम पुरोहित हैं, उस यजमान के वीर्य, बल, ज्ञान व जीतने योग्य क्षात्रबल की बढ़ोतरी करने की कृपा कीजिए. आप उस यजमान को विजयशील बनाने की कृपा कीजिए. ( ८१ ) उदेषां बाहू अतिरमुद्धर्षो अथो बलम्. क्षिणोमि ब्रह्मणा ऽ मित्रान्नुन्नयामि स्वाँ २ अहम्.. (८२) हे अग्नि! आप की कृपा से उन दुष्ट शत्रुओं के बाहुबल की बजाय हमारे पराक्रम की बढ़ोतरी हो. आप की कृपा से हमारे अर्थ व बल की बढ़ोतरी हो. अपने ब्रह्मज्ञान से अमित्रों का नाश करें. हम अपने स्वजनों को ऊंचा उठा सकें. ( ८२ ) अन्नपतेन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिण:. प्रप्र दातारं तारिष ऽ ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे.. (८३) हे अग्नि! आप अन्नपति हैं. आप हमें रोग रहित बनाने व पोषकता देने की कृपा कीजिए. हे अग्नि! आप दाता को पोषण देने की कृपा कीजिए. हे अग्नि! आप दोपायों व चौपायों के लिए ऊर्जा धारण की कृपा कीजिए. ( ८३ ) यजुर्वेद - १३९

बारहवां अध्याय

बारहवां अध्याय दृशानो रुक्म ऽ उर्व्या व्यद्यौद् दुर्मर्षमायुः श्रिये रुचानः. अग्निरमृतो अभवद्वयोभिर्यदेनं द्यौरजनयत्सुरेताः.. ( १ ) सूर्य पूर्व दिशा में दृष्टिगोचर हो रहे हैं. उन की आज की दिनभर की आयु संघर्षपूर्ण है. वे शोभा के लिए प्रकाशित हो रहे हैं. यजमानों ने जब स्वर्गलोक से सूर्य को प्रकट किया तब हवि ग्रहण करने के लिए वे अग्निरूप में आ गए. ( १ ) नक्तोषासा समनसा विरूपे धापयेते शिशुमेक ँ४ समीची. द्यावाक्षामा रुक्मो अन्तर्विभाति देवा ऽ अग्निं धारयन्द्रविणोदाः.. ( २ ) सूर्य समान मन से सुबह और दिन की यात्रा करते हैं. एक दूसरे से बिलकुल अलग रूप वाले एक शिशु को ये देव उपयुक्त रीति से पोषित करते हैं. सूर्य स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के बीच चमकते हैं. वैसे ही धनदाता देवगण अग्नि को धारते हैं. ( २ ) विश्वा रूपाणि प्रति मुञ्चते कविः प्रासावीद्भद्रं द्विपदे चतुष्पदे. वि नाकमख्यत्सविता वरेण्योऽनु प्रयाणमुषसो वि राजति.. ( ३ ) सूर्य विश्व रूप व कवि हैं. वे दोपायों और चौपायों का कल्याण करते हैं. वे वरेण्य हैं. वे सभी को प्रेरित करते हैं. वे उषा देवी के जाने के बाद आकाश में शोभित होते हैं. ( ३ ) सुपर्णोऽसि गरुत्माँस्त्रिवृत्ते शिरो गायत्रं चक्षुर्बृहद्रथन्तरे पक्षौ. स्तोम ऽ आत्मा छन्दा ँ४ स्यङ्गानि यजू ँ४ षि नाम. साम ते तनूर्वामदेव्यं यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः शफाः. सुपर्णोऽसि गरुत्मान्दिवं गच्छ स्वः पत.. ( ४ ) हे सविता देव! आप गरुड़ स्वरूप हैं. त्रिवृत् स्तोम आप का सिर है. गायत्री छंद आप के नेत्र हैं. बृहत्साम और रथंतर साम आप के दोनों पंख हैं. पंचदश स्तोम आप की आत्मा हैं. छंद आप के अंग हैं. सब यजु आप के नाम हैं. साम आप का शरीर है. यज्ञायज्ञिय साम आप की पूंछ हैं. धिष्णियों में निहित अग्नि १४० - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय आप के पंख हैं. आप शुभ गतिवान हैं. आप स्वर्गलोक में उड़िए. आप स्वेच्छा से उड़ान भरिए. ( ४ ) विष्णोः क्रमोसि सपत्नहा गायत्रं छन्द ऽ आरोह पृथिवीमनु विक्रमस्व विष्णोः क्रमोस्यभिमातिहा त्रैष्टुभं छन्द ऽ आरोहान्तरिक्षमनु विक्रमस्व विष्णोः क्रमोस्यरातीयतो हन्ता जागतं छन्द ऽ आरोह दिवमनु विक्रमस्व विष्णोः क्रमोसि शत्रूयतो हन्तानुष्टुभं छन्द ऽ आरोह दिशोनु विक्रमस्व.. (५) हे अग्नि! आप विष्णु के पदव्यास व शत्रुनाशी हैं. आप गायत्री छंद पर आरूढ़ होने व पृथ्वी का अनुकरण करने की कृपा कीजिए. आप विष्णु देव का क्रम न्यास व शत्रु का अभिमान नष्ट करने वाले हैं. आप त्रिष्टुप् छंद पर आरूढ़ होने तथा अंतरिक्ष का अनुकरण करने की कृपा कीजिए. आप विष्णु का पदव्यास और न करने योग्य आचरण करने वाले के नाशक हैं. आप जगती छंद पर आरूढ़ होने और स्वर्गलोक का अनुकरण करने की कृपा कीजिए. आप विष्णु का पदव्यास तथा शत्रुनाशक हैं. आप अनुष्टुप् छंद पर आरूढ़ होने और सारी दिशाओं का अनुकरण करने की कृपा कीजिए. ( ५ ) अक्रन्ददग्निः स्तनयन्निव द्यौः क्षामा रेरिहद्वीरुधः समञ्जन्. सद्यो जज्ञानो वि हीमिद्धो अख्यदा रोदसी भानुना भात्यन्तः.. (६) अग्नि बादल के समान गरजते हैं. स्वर्गलोक से वह पृथ्वी पर व्याप्त होते हैं. वे लताओं को घेर लेते हैं व शीघ्र जलते हैं. वे समिधावान और सब को प्रकाशित करते हैं. वे अपने प्रकाश से सब को प्रकाशित करते हैं. ( ६ ) अग्नेभ्यावर्त्तिन्नभि मा निवर्त्तस्वायुषा वर्चसा प्रजया धनेन. सन्या मेधया रय्या पोषेण.. (७) हे अग्नि! आप हमारे सम्मुख पधारते हैं. आप आयु, वर्चस्व, संतान व धन के साथ हमारे पास पधारिए. आप बुद्धि, ऐश्वर्य व पोषण के साथ हमारे पास पधारिए. ( ७ ) अग्ने अङ्गिरः शतं ते सन्त्वावृतः सहस्रं त ऽ उपावृतः. अधा पोषस्य पोषेण पुनर्नो नष्टमाकृधि पुनर्नो रयिमाकृधि.. (८) हे अग्नि! आप श्रेष्ठ अंग वाले हैं. हम आप की सैकड़ों, हजारों परिक्रमाएं करते हैं. आप हमें पोषकता देने वाला पोषण व नष्ट हुआ पशुधन और धन प्राप्त कराने की कृपा कीजिए. ( ८ ) पुनरूर्जा निवर्त्तस्व पुनरग्न ऽ इषायुषा पुनर्नः पाह्य १७ हसः... (९) हे अग्नि! आप हमें ऊर्जस्वी बनाइए. आप हमें बारबार संपन्न व आयु संपन्न यजुर्वेद - १४१

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय बनाने की कृपा कीजिए. आप बारबार पाप से बचाने की कृपा कीजिए. ( ९ ) सह रय्या निवर्तस्वाग्ने पिन्वस्व धारया. विश्वप्सन्या विश्वतस्परि.. (१०) हे अग्नि! आप धन के साथ पधारिए. आप पृथ्वी को जलधार से सींचिए. यह जलधार प्यास बुझाने वाली है. आप पूरे संसार को इस से सींचिए. ( १० ) आ त्वाहार्षमन्तरभूर्ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलि:. विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधिभ्रशत्.. (११) हे अग्नि! हम ने आप को आमंत्रित किया है. आप उखा के भीतर स्थित व ध्रुव ( स्थिर ) होइए. आप अविचल हो कर रहिए. सभी आप को चाहें. यज्ञ की कृपा से पूरा राष्ट्र भ्रष्ट ( और कलंकित ) होने से बचे. ( ११ ) उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यम ँ४ श्रथाय. अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम.. (१२) हे वरुण! आप हमारे ऊपर, बीच व नीचे के बंधन दूर कीजिए. आप अदिति के पुत्र हैं. हम अदिति के प्रति अनागस हो जाएं. ( १२ ) अग्रे बृहन्नुषसामूर्ध्वो अस्थान्निर्जगन्वान् तमसो ज्योतिषागात्. अग्निर्भानुना रुशता स्वङ्ग ऽ आ जातो विश्वा सद्मान्यप्रा:... (१३) अग्नि विशाल, प्रज्वलित, ऊषा के आगे स्थित और अंधकार से ज्योति की ओर जाते हैं. वे सूर्य के साथ सामने प्रकटे. वे अंधकार नाशक के साथ प्रकटे. उन्होंने उत्पन्न होते ही सभी लोकलोकांतरों को व्याप्त कर लिया. ( १३ ) ह ँ४ स: शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्. नृषद्वरसद्दृतसद् व्योमसदब्जा गोजा ऽ ऋतजा ऽ अद्रिजा ऽ ऋतं बृहत्.. (१४) अग्नि गमनशील, पवित्र स्थान में रहने वाले, धनवर्षक. वे सब को बसाने वाले व अंतरिक्ष में होने वाले हैं. वे देवों के आह्वाहक हैं. वे वेदी में स्थित रहने वाले, अतिथि, सर्वत्र पूज्य हैं. वे यज्ञगृह में रहने वाले हैं. वे मनुष्यों में प्राण के रूप में रहते हैं. वे व्योमवासी हैं और चिनगारी से उत्पन्न हैं. वे ऋत और पत्थर से उत्पन्न हैं. वे विशाल हैं. ( १४ ) सीद त्वं मातुरस्या ऽ उपस्थे विश्वान्यग्ने वयुनानि विद्वान्. मैनां तपसा मार्चिषाभि शोचीरन्तरस्या ँ४ शुक्रज्योतिर्विभाहि.. (१५) हे अग्नि! माता की गोद में बैठने की तरह आप इस आसन पर विराजिए. आप सर्वज्ञ और विद्वान् हैं. आप अपने ताप से इस मचिया को मत तपाइए. आप अपनी भीतरी ज्योति से हमेशा चमकिए. ( १५ ) १४२ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय अन्तरग्ने रुचा त्वमुखायाः सदने स्वे. तस्यास्त्व ꣳ हरसा तपञ्जातवेदः शिवो भव.. (१६) हे अग्नि! यह उखा आप का घर है, इस में चमकिए. आप अपने ताप से इसे तपाइए. आप सर्वज्ञ हैं. आप कल्याणकारी होइए. ( १६ ) शिवो भूत्वा मह्यमग्ने अथो सीद शिवस्त्वम्. शिवाः कृत्वा दिशः सर्वाः स्वं योनिमिहासदः.. (१७) हे अग्नि! आप मेरे प्रति भी कल्याणमय हो कर इस उखे के घर में विराजिए. यहां भी कल्याणकारी हो कर ही रहिए. आप सभी दिशाओं को कल्याणकारी बनाइए. अग्नि! यह उखा आप का मूल स्थान है. आप इस में स्थित होने की कृपा कीजिए. ( १७ ) दिवस्परि प्रथमं जज्ञे अग्निरस्मद् द्वितीयं परि जातवेदाः. तृतीयमप्सु नृमणा ऽ अजस्रमिन्धान ऽ एनं जरते स्वाधीः.. (१८) सर्वप्रथम स्वर्गलोक में अग्नि का जन्म हुआ! दोबारा हमारे पास मनुष्यलोक में उन का जन्म हुआ. मेघ के रूप में उन का जन्म हुआ! तीसरी बार निरंतर प्रवाहित होने वाले जलों में उन का जन्म हुआ. वे निरंतर प्रवहमान हैं. ( १८ ) विद्या ते अग्ने त्रेधा त्र्याणि विद्या ते धाम विभृता पुरुत्रा. विद्या ते नाम परमं गुहा यद्विद्या तमुत्सं यत ऽ आजगन्थ.. (१९) हे अग्नि! हम आप को तीन प्रकार से तीन रूपों में जानते हैं. आप रक्षक व सर्वत्र व्याप्त हैं. हम आप के परम गुप्त रूप को भी जानते हैं. हम आप के मूल उत्स ( स्रोत ) को भी जानते हैं, जहां आप इन रूपों में प्रकट हुए हैं. ( १९ ) समुद्रे त्वा नृमणा ऽ अप्स्वन्तर्नृचक्षा ऽ ईंधे दिवो अग्न ऽ ऊधन्. तृतीये त्वा रजसि तस्थिवा ꣳ समपामुपस्थे महिषा अवर्धन्.. (२०) हे अग्नि! प्रजापति देव सब के कल्याणकारक हैं. वे आप को ईंधनमय बनाते हैं. परमात्मा सर्वद्रष्टा हैं. वही आप को प्रज्वलित करते हैं. आप स्वर्गलोक के स्तन जैसे हैं. आप ही सब की बढ़ोत्तरी करते हैं. ( २० ) अक्रन्ददग्निः स्तनयन्निव द्यौः क्षामा रेरिहद्वीरुधः समञ्जन्. सद्यो जज्ञानो वि हीमिद्धो अख्यदा रोदसी भानुना भात्यन्तः.. (२१) अग्नि के गरजने की आवाज मेघ के गरजने की आवाज के समान है. पृथ्वी को मेघ के समान ही भिगाते हैं. समिधावान अग्नि स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को प्रकाशित व उन के मध्य चमकते हैं. ( २१ ) यजुर्वेद - १४३

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय श्रीणामुदारो धरुणो रयीणां मनीषाणां प्रार्पणः सोमगोपाः. वसुः सूनुः सहसो अप्सु राजा वि भात्यग्र ऽ उषसामिधानः.. (२२) अग्नि उदारता से धन देने वाले, धनधारी, मनुष्यों को स्वर्ग प्राप्त कराने वाले और सोम के पालक हैं. वे बल के पुत्र, जलों के राजा और प्रदीप्त होने वाले हैं. वे सब से आगे शोभित होने वाले हैं. ( २२ ) विश्वस्य केतुर्भुवनस्य गर्भ ऽ आ रोदसी अपृणाज्जायमानः. वीडुं चिदद्रिमभिनत् परायञ्जना यदग्निमयजन्त पञ्च.. (२३) अग्नि संसार की पताका और उस का गर्भ हैं. उत्पन्न हो कर वे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को व्याप्त कर लेते हैं. इंद्र देव जैसे देवराज रूप में वे बड़े से बड़े पर्वत को भी भेद देते हैं. पांच व्यक्ति अग्नि की पूजा करते हैं. ( २३ ) उशिकपावको अरतिः सुमेधा मर्त्येष्वग्निरमृतो नि धायि. इयर्त्ति धूममरुषं भरिभ्रदुच्छुक्रेण शोचिषा द्यामिनक्षन्.. (२४) अग्नि इच्छा करने योग्य, पवित्र, दुष्टों के प्रति प्रेमहीन और श्रेष्ठ बुद्धि वाले हैं. वे अमर व मनुष्यों के इच्छापूरक हैं. उन का धुआं ऊपर की ओर जाता है. वे चमकीले हैं. अग्नि अपनी शोभा स्वर्गलोक तक फैलाते हैं. ( २४ ) दृशानो रुक्म ऽ उर्व्या व्यद्यौद्दुर्मर्षमायुः श्रिये रुचानः. अग्निरमृतो अभवद्वयोभिर्यदेनं द्यौरजनयत्सुरेताः.. (२५) अग्नि दर्शनीय हैं व रुक्म जैसी आभावाले हैं. अग्नि अपनी आभा से पृथ्वी पर शोभित होते हैं. चमकते हैं. अमर हैं. श्रेष्ठ वीर्य वाले हैं. वे पृथ्वी और स्वर्ग दोनों लोकों के बीच शोभायमान हैं. ( २५ ) यस्ते अद्य कृणवद्भद्रशोचेऽपूपं देव घृतवन्तमग्ने. प्र तं नय प्रतरं वस्यो अच्छाभि सुम्नं देवभक्तं यविष्ठ.. (२६) हे अग्नि! आप शोभादायक हैं. आज यजमान ने आप के लिए विधिविधान और पवित्रतापूर्वक भोग की सामग्री बनाई है. आप घी से युक्त उस सामग्री को ग्रहण करने और अपने यजमानों को स्वर्ग के सुख प्राप्त कराने की कृपा कीजिए. ( २६ ) आ तं भज सौश्रवसेष्वग्न ऽ उक्थ ऽ उक्थ ऽ आ भज शस्यमाने. प्रियः सूर्ये प्रियो अग्ना भवात्युज्जातेन भिनददुज्जनित्वैः.. (२७) हे अग्नि! आप यजमान को श्रेष्ठ यशदायी कामों व शास्त्र के पठनपाठन में लगाने की कृपा कीजिए. सूर्य और अग्नि प्रिय हैं. इन की कृपा से हम उन्नतिशील पुत्र और पौत्र प्राप्त करते हैं. इन की कृपा से हम अतीव अभ्युदय को प्राप्त करते हैं. ( २७ ) १४४ - यजुर्वेद 632/9

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय त्वामग्ने यजमाना ऽ अनु द्यून् विश्वा वसु दधिरे वार्याणि. त्वया सह द्रविणमिच्छमाना व्रजं गोमन्तमुशिजो विवव्रुः.. (२८) हे अग्नि! हम यजमान प्रतिदिन आप का अनुसरण करते हैं. यजमान आप की कृपा से सभी प्रकार के धन प्राप्त करते हैं. आप के साथ हम सभी प्रकार के धन की इच्छा करते हुए उशिजों की तरह गायों के बाड़े में चले जाएं. ( २८ ) अस्ताव्यग्निन॑रा ᳪ सुशेवो वैश्वानर ऽ ऋषिभिः सोमगोपाः. अद्वेषे द्यावापृथिवी हुवेम देवा धत्त रयिमस्मे सुवीरम्.. (२९) अग्नि यजमानों के द्वारा सेवन योग्य हैं. अग्नि विद्वानों के द्वारा स्तुति किए जाने योग्य हैं. अग्नि नायक और सोम पालक हैं. हम द्वेष रहित स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक का आह्वान करते हैं. हे देव! आप हमें सुवीर बनाइए और हमारे लिए धन धारिए. ( २९ ) समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्. आस्मिन् हव्या जुहोतन.. (३०) हे अग्नि! आप समिधावान हैं. हम आप की परिक्रमा करते हैं. आप हमारे अतिथि हैं. हम घी से आप को जगाते हैं. आप इस में हवि होमने की कृपा कीजिए. ( ३० ) उदु त्वा विश्वे देवा ऽ अग्ने भरन्तु चित्तिभिः. स नो भव शिवस्त्व ᳪ सुप्रतीको विभावसुः... (३१) हे अग्नि! आप प्राणस्वरूप हैं. आप को अपनी बुद्धि से ऊपर की ओर धारण करने की कृपा करें. आप हमारे प्रति कल्याणकारी होने की कृपा कीजिए. आप सुमुख और ज्योति रूप धन वाले हैं. ( ३१ ) प्रेदग्ने ज्योतिष्मान् याहि शिवेभिरर्चिभिष्ट्वम्. बृहद्भिर्भानुभिर्भासन्मा हि ᳪ सीस्तन्वा प्रजाः... (३२) हे अग्नि! आप ज्योतिष्मान हैं. आप इसी रूप में यहां से प्रस्थान करने की कृपा कीजिए. हम कल्याणकारी स्तुतियों से आप की अर्चना करते हैं. आप की ये बड़ी- बड़ी लपटें सूर्य की तरह चमकती हैं. आप अपनी इन लपटों से अपनी संतान के प्रति हिंसा मत कीजिए. ( ३२ ) अक्रन्ददग्निः स्तनयन्निव द्यौः क्षामा रेरिहद्वीरुधः समञ्जन्. सद्यो जज्ञानो वि हीमिद्धो अख्यदा रोदसी भानुना भात्यन्तः... (३३) अग्नि के गरजने की आवाज मेघ के गरजने की आवाज के समान है. पृथ्‍वी को मेघ के समान ही भिगाते हैं. समिधावान अग्नि स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को यजुर्वेद - १४५

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय प्रकाशित करते हैं. वे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के मध्य चमकते हैं. ( ३३ ) प्र प्रायमग्निर्भरतस्य शृण्वे वि यत्सूर्यो न रोचते बृहद्भाः. अभि यः पूरुं पृतनासु तस्थौ दीदाय दैव्यो अतिथिः शिवो नः.. (३४) अग्नि द्वारा बुलाने के लिए बोले गए मंत्र को सुनते हैं. अग्नि सूर्य के समान भासित होते हैं. वे युद्ध में पुरु के सहायक रहे. वे राजा, दिव्य और हमारे अतिथि हैं. हमारे प्रति कल्याणकारी होने की कृपा करें. ( ३४ ) आपो देवीः प्रतिगृह्णीत भस्मैतत्स्योने कृणुध्व १४ सुरभा ऽ उ लोके. तस्मै नमन्तां जनयः सुपत्नीर्मातेव पुत्रं बिभृताप्स्वेनत्.. (३५) हे जलदेवी! आप इस भस्म को स्वीकारने और इस से लोकों को सुगंधित बनाने की कृपा कीजिए. वरुण देव पत्नियों सहित इस के प्रति नमें तथा इसे उसी प्रकार धारें, जैसे माता पुत्र को धारण करती है. ( ३५ ) अप्स्वग्ने सधिष्टव सौषधीरनु रुध्यसे. गर्भे सञ्जायसे पुनः.. (३६) हे अग्नि! जल में आप की सहस्थिति है. आप जल के साथ ओषध धारण करते हैं. वनस्पतियों के गर्भ से बारबार प्रकट होते हैं. ( ३६ ) गर्भो अस्योषधीनां गर्भो वनस्पतीनाम्. गर्भो विश्वस्य भूतस्याग्ने गर्भो अपामसि.. (३७) हे अग्नि! आप ओषधियों का गर्भ हैं. आप वनस्पतियों का गर्भ हैं. आप सभी प्राणियों का गर्भ हैं. आप सभी जलों का गर्भ हैं. ( ३७ ) प्रसद्य भस्मना योनिमपश्च पृथिवीमग्ने. स १४ सृज्य मातृभिष्ट्वं ज्योतिष्मान् पुनरा सदः.. (३८) हे अग्नि! भस्म से आप अपने मूल स्थान पृथ्वी को प्राप्त होइए. आप जल के साथ मिलिए और पुनः ज्योतिष्मान होइए. आप पुनः अपने सदन में प्रवेश कीजिए. ( ३८ ) पुनरासद्य सदनमपश्च पृथिवीमग्ने. शेषे मातुरथोपस्थेन्तरस्या १४ शिवतमः.. (३९) हे अग्नि! आप पुनः अपने सदन में प्रवेश कीजिए. आप पृथ्वी पर ऐसे शयन कर रहे हैं, जैसे संतान मां की गोद में सो रही हो. आप हमारे प्रति कल्याणकारी होने की कृपा कीजिए. ( ३९ ) पुनरुर्जा निवर्त्तस्व पुनरग्न ऽ इषायुषा. पुनर्नः पाह्य १४ हसः.. (४०) १४६ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय हे अग्नि! आप हमें पुनः ऊर्जस्वी और आयुष्मान बनाइए. आप हमें पुनः पाप से बचाइए. (४०) सह रय्या निवर्त्तस्वाग्ने पिन्वस्व धारया. विश्वप्सन्या विश्वतस्परि.. (४१) हे अग्नि! आप हमें पुनः धन के साथ प्राप्त होइए. आप वर्षा की धारा से पृथ्वी पर सारी वनस्पति को बढ़ाने की कृपा करें. (४१) बोधा मे अस्य वचसो यविष्ठ म ँ४ हिष्ठस्य प्रभृतस्य स्वधावः. पीयति त्वो अनु त्वो गृणाति वन्दारुष्टे तन्वं वन्दे अग्ने.. (४२) हे अग्नि! आप हमारे इन वचनों को सुनिए. प्रसन्न व्यक्ति आप की और रुष्ट व्यक्ति आप को कोसते हैं. हम आप के तन का वंदन करते हैं. (४२) स बोधि सूरिर्मघवा वसुपते वसुदावन्. युयोध्यस्मद् द्वेषा ँ४ सि विश्वकर्मणे स्वाहा.. (४३) हे अग्नि! आप धन के स्वामी और धनदाता हैं. आप हमारे द्वेषियों को दूर करने की कृपा कीजिए. सर्वकर्मा अग्नि के लिए स्वाहा. (४३) पुनस्त्वादित्या रुद्रा वसवः समिन्धतां पुनर्ब्रह्माणो वसुनीथ यज्ञैः. घृतेन त्वं तन्वं वर्धयस्व सत्याः सन्तु यजमानस्य कामाः.. (४४) हे अग्नि! आप को आदित्य, रुद्र, वसु पुनः प्रज्वलित करने की कृपा करें. अग्नि धन के नेता हैं. वे यज्ञ से यजमान आप को बारबार प्रज्वलित करने की कृपा करें. वे घी से आप अपने शरीर की बढ़ोतरी करने और अपने यजमान की कामनाएं पूरी करने की कृपा करें. (४४) अपेत वीत वि च सर्पतातो येत्र स्थ पुराणा ये च नूतनाः. अदाद्यमोवसानं पृथिव्या ऽ अक्रन्निमं पितरो लोकमस्मै.. (४५) नए पुराने जो भी यमदूत यहां हों वे दूर, बहुत दूर चले जाएं. बहुत दूर हट जाएं. पृथ्वी का यह स्थान यमराज ने स्वयं यज्ञ हेतु हमारे पूर्वजों को देने की कृपा की है. (४५) संज्ञानमसि कामधरणं मयि ते कामधरणं भूयात्. अग्नेर्भस्मास्यग्नेः पुरीषमसि चित स्थ परिचित ऽ ऊर्ध्वचितः श्रयध्वम्.. (४६) हे उषा! आप सम्यक् ज्ञान हैं. आप कामनाएं धारण करती हैं. आप हमारे लिए भी कामना धारण करने वाली हों. आप भस्म और अग्नि की पूरक हैं. धरती पर बालू की पतली रेखाएं बिछाई गई हैं. आप चारों ओर तथा ऊपर की ओर स्थापित होने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ को श्रेयस्कर बनाइए. (४६) यजुर्वेद - १४७

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय अय छ्ष सो अग्निर्यस्मिन्त्सोममिन्द्रः सुतं दधे जठरे वावशानः. सहस्रियं वाजमत्यं न सप्ति छ्ष ससवान्त्सन्स्तूयसे जातवेदः.. (४७) यह वही अग्नि है, जिसे सोम के रूप में इंद्र देव अपनी जठराग्नि में भरते हैं. यह हजार गुना है. यह अन्नमय, बलदायी और सर्वज्ञ है. हजारों के द्वारा इन की स्तुति की जाती है. ( ४७ ) अग्ने यत्ते दिवि वर्चः पृथिव्यां यदोषधीष्वप्स्वा यजत्र. येनान्तरिक्षमुर्वाततन्थ त्वेषः स भानुरर्णवो नृचक्षाः.. (४८) हे अग्नि! आप का जो वर्चस्व स्वर्गलोक में है, वही वर्चस्व पृथ्वीलोक में है. वही वर्चस्व ओषधियों व जलों में है. जिस से आप ने अंतरिक्ष का विस्तार किया वही यह सूर्य है. वह सभी मनुष्यों को देखने वाला है. ( ४८ ) अग्ने दिवो अर्णमच्छा जिगास्यच्छा देवाँ २ ऊचिषे धिष्ण्या ये. या रोचने परस्तात् सूर्यस्य याश्चावस्तादुपतिष्ठन्त ऽ आपः.. (४९) हे अग्नि! आप स्वर्गलोक से सीधे जल पाते हैं. देवगण हमारी बुद्धि को ऊंचाई की ओर प्रेरित करते हैं. जो सामने सूर्य के रूप को भासित है और जो नीचे जल के रूप में स्थित है, आप दोनों प्रकार के जलों की बरसात करने की कृपा करते हैं. ( ४९ ) पुरीष्यासो अग्नयः प्रावणेभिः सजोषसः. जुषन्तां यज्ञमद्रुहोनमीवा ऽ इषो महीः.. (५०) हे अग्नि! पशुओं का हित साधने वाली, लोक में व्यापक मन के साथ प्रेम रखने वाली, बीमारियां दूर करने वाली, अन्न देने वाली, वर्षा करने वाली, इष्ट सिद्धि करने वाली अग्नियां प्रेमपूर्वक इस यज्ञ का सेवन करने की कृपा करें. ( ५० ) इडामग्ने पुरुद छ्ष स छ्ष सनिं गोः शश्वत्तम छ्ष हवमानाय साध. स्यानः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (५१) हे अग्नि! आप बहुकर्मा हैं. आप यजमान के लिए गाय के ( दूध, दही ) घी आदि का दान कीजिए. हमें पुत्र संतान दीजिए. हमारी संतान हमारा और आगे वंश बढ़ाए. अपनी वह कल्याणकारी बुद्धि हमें प्राप्त कराइए. ( ५१ ) अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः. तं जानन्नग्न ऽ आ रोहाथा नो वर्धया रयिम्.. (५२) हे अग्नि! आप की यह वेदी ऋतु को जन्म देने वाली है. इसी से उत्पन्न हो कर आप चमकते हैं. आप यह जानते हुए इस पर चढ़ने की कृपा कीजिए. आप हमारे धन की बढ़ोतरी करने की कृपा कीजिए. ( ५२ ) १४८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय चिदसि तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद. परिचिदसि तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद.. (५३) हे अग्नि! अब आप की स्थापना कर दी गई है. अब आप अंगअंग में रमने की कृपा कीजिए. आप चित्त हैं. अब आप विराजिए. आप को चारों ओर स्थापित कर दिया गया है. आप चित्त से स्थापित होने की कृपा कीजिए. ( ५३ ) लोकं पृण छिद्रं पृणाथो सीद ध्रुवा त्वम्. इन्द्राग्नी त्वा बृहस्पतिरस्मिन् योनावसीषदन्.. (५४) हे अग्नि! लोक को पूरने से जो जगह रह गई आप उन छेदों को भरने की कृपा कीजिए. आप वहां स्थिर हो कर स्थापित होने की कृपा कीजिए. आप को इंद्र देव अग्नि और बृहस्पति देव ने यहां स्थापित किया है. ( ५४ ) ता ऽ अस्य सूददोहसः सोम १७ श्रीणन्ति पृश्नयः. जन्मन्देवानां विशस्त्रिष्वा रोचने दिवः.. (५५) स्वर्गलोक से जो जल मिलता है, उस से सोम शोभा पाते हैं. देवों के जन्मजन्म और प्रत्येक यज्ञ में यह सोम इस स्वर्गिक जल से परिपक्व होता है. ( ५५ ) इन्द्रं विश्वा ऽ अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः. रथीतम १७ रथीनां वाजाना १७ सत्पतिं पतिम्.. (५६) सभी वाणियां समुद्र के समान विस्तृत हैं. वे वाणियां रथियों में महारथी इंद्र देव की महिमा का गुणगान करती हैं. इंद्र देव बलवानों में सर्वाधिक बलशाली हैं. इंद्र देव पालकों में श्रेष्ठ पालक हैं. ( ५६ ) समित १७ सङ्कल्पेथा १७ संप्रीयौ रोचिष्णू सुमनस्यमानौ. इषमूर्जमभि संवसानौ.. (५७) हे इंद्र देव! हम समान मति वाले हों. हम सब आपस में प्रिय हों. हम सब प्रकाशवान हों. हम सब एक साथ प्रेरित हों. हम सब समान ऊर्जस्वी हों. हमारे यज्ञ का सफलतापूर्वक समापन हो. ( ५७ ) सं वां मना १७ सि सं व्रता समु चित्तान्याकरम्. अग्ने पुरीष्याधिपा भव त्वं न ऽ इषमूर्जं यजमानाय धेहि.. (५८) हे अग्नि! हमारे मन समान हों. हमारे संकल्प समान हों. हे अग्नि! आप पुरियों के स्वामी हैं. आप हमें ऊर्जस्वी बनाइए. आप यजमान के लिए ऊर्जा धारिए. ( ५८ ) अग्ने त्वं पुरीष्यो रयिमान् पुष्टिमाँ २ असि. शिवाः कृत्वा दिशः सर्वाः स्वं योनिमिहासदः.. (५९) यजुर्वेद - १४९

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय हे अग्नि! आप नगरों के स्वामी हैं. आप धनवान हैं. आप पुष्टिमान हैं. आप सभी दिशाओं को कल्याणकारी बनाइए. आप यहां अपने मूल स्थान में प्रतिष्ठित होने की कृपा कीजिए. (५९) भवतन्नः समनसौ सचेतसावरेपसौ. मा यज्ञ १४ हि १४ सिष्टं मा यज्ञपतिं जातवेदसौ शिवौ भवतमद्य नः.. (६०) हे अग्नि! आप सर्वज्ञ हैं. आप हमें समान मन वाला बनाइए. आप हमें समान चित्त वाला बनाइए. आप हमें समान श्रद्धा वाला बनाइए. आप यज्ञ में हिंसा मत कीजिए. आप यज्ञपति हैं. आप आज हमारे प्रति कल्याणकारी होने की कृपा कीजिए. (६०) मातेव पुत्रं पृथिवी पुरीष्यमग्नि १४ स्वे योनावभारुखा. तां विश्वैर्देवैर्ऋतुभिः संविदानः प्रजापतिर्विश्वकर्मा वि मुञ्चतु.. (६१) जैसे माता पुत्र को धारती है, वैसे ही उखा कल्याणकारी अग्नि को धारती है. समस्त देवगणों और ऋतु द्वारा ऐक्य भाव से प्रेरित उखा को प्रजापति विश्वकर्मा पाश से मुक्त करने की कृपा करें. (६१) असुन्वन्तमयजमानमिच्छ स्तेनस्येत्यामन्विहि तस्करस्य. अन्यमस्मदिच्छ सा त ऽ इत्या नमो देवि निर्ऋते तुभ्यमस्तु.. (६२) हे दुष्ट दलन में समर्थ! आप चोरों और तस्करों का नाश करने में समर्थ हैं. आप विशिष्ट शक्तिवान हैं. आप चोरडाकू छोड़ कर अन्य लोग हमें दीजिए. हे देवी! आप के लिए हमारा नमस्कार. (६२) नमः सु ते निर्ऋते तिग्मतेजो ऽ यस्मयं विचृता बन्धमेतम्. यमेन त्वं यम्या संविदानोत्तमे नाके अधि रोहयैनम्.. (६३) हे निर्ऋते! आप तेजस्वी हैं. आप शक्तिमान हैं. आप लोहे जैसी दृढ़ हैं. आप हमें सांसारिक सत्व बंधन से मुक्त कीजिए. यजमान को यमलोक से उत्तम स्वर्गलोक में पहचानने की कृपा कीजिए. (६३) यस्यास्ते घोर ऽ आसञ्जुहोम्येषां बन्धानामवसर्जनाय. यां त्वा जनो भूमिरिति प्रमन्दते निर्ऋतिं त्वाहं परिवेद विश्वतः.. (६४) हे निर्ऋते! आप क्रूर स्वभाव वाली हैं. हम जन्ममरण के बंधन से मुक्त होने के लिए आप को आहुति भेंट करते हैं. भले ही लोग आप को भूमि कहते हैं, पर वे आप को सब ओर से सर्वज्ञ मानते हैं. (६४) यं ते देवी निर्ऋतिराबबन्ध पाशं ग्रीवास्वविचृत्यम्. तं ते विष्याम्यायुषो न मध्यादथैतं पितुमद्धि प्रसूतः. नमो भूत्यै येदं चकार.. (६५) १५० - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय निर्ऋत देवी उन बंधनों को हटाती हैं जिन पाशों ने आप की गरदन को जकड़ रखा था, आप उन बंधनों से छूटिए. आप पोषक अन्न को ग्रहण कीजिए. आप हमें धन दीजिए. देवी को हमारा नमन. ( ६५ ) निवेशनः सङ्गमनो वसूनां विश्वा रूपाभिचष्टे शचीभिः. देव ऽ इव सविता सत्यधर्मेन्द्रो न तस्थौ समरे पथीनाम्.. (६६) हे अग्नि! आप वासदाता, धनदाता, रूपवान और अभीष्ट फलदाता हैं. आप सविता देव जैसे प्रकाशवान हैं. सत्य रूपी धर्म वाले हैं. युद्ध में इंद्र देव की भांति स्थिर रहने वाले हैं. ( ६६ ) सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वितन्वते पृथक्. धीरा देवेषु सुम्नया.. (६७) आप कवि व धीर हैं. देवों के अच्छे मन के लिए आप हल को बैल के जोड़े के साथ जोतते हैं. ( ६७ ) युनक्त सीरा वि युगा तनुध्वं कृते योनौ वपतेह बीजम्. गिरा च श्रुष्टिः सभरा असन्नो नेदीय ऽ इत्सृण्यः पक्वमेयात्.. (६८) हे किसानो! आप हल को जोड़िए. बैल के कंधों पर जुआ रखिए. आप खेत को जोतिए. आप बीज बोइए. सृष्टि में अच्छी फसल के लिए स्तुति कीजिए. अन्न भरभर कर तैयार हो. अन्न अच्छी तरह पके. ( ६८ ) शुन १४ सु फाला वि कृषन्तु भूमि १४ शुनं कीनाशा ऽ अभि यन्तु वाहैः. शुनासीरा हविषा तोशमाना सुपिप्पला ऽ ओषधीः कर्तनास्मे.. (६९) भूमि को हल के फाल से अच्छी तरह जोतिए. किसान बैलों के साथ आराम से जाएं. हे वायु! हे सूर्य! आप हवि से प्रसन्न होइए. आप पृथ्वी को जल से सींचिए. आप ओषध उपजाइए. आप पृथ्वी को श्रेष्ठ फलों से पूरिए. ( ६९ ) घृतेन सीता मधुना समंज्यतां विश्वैर्देवैरनुमता मरुद्भिः. ऊर्जस्वती पयसा पिन्वमानास्मान्त्सीते पयसाभ्याववृत्स्व.. (७०) विश्व और मरुद्गण हल के फाल को अनुमति देने की कृपा करें. उसे शहद से सींचने की कृपा करें. आप ऊर्जस्वी होइए. आप दूध से दिशाओं को और हमें घी व दूध से सींचिए. ( ७० ) लाङ्गलं पवीरवत्सुशेव १४ सोमपित्सरु. तदुद्वपति गामविं प्रफर्व्यं च पीवरीं प्रस्थावद्रथवाहनम्.. (७१) हल फाल युक्त हैं. पृथ्वी को खोदते हैं. सोम के रक्षक और कल्याणकारी हैं. कृषि उत्पादन के साथ ही भेड़, बकरी पुष्ट, गौएं रथ वहन करने वाले उत्तम घोड़े प्रदान करते हैं. ( ७१ ) यजुर्वेद - १५१

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय कामं कामदुघे धुक्ष्व मित्राय वरुणाय च. इन्द्रायाश्विभ्यां पूष्णे प्रजाभ्य ऽ ओषधीभ्यः.. (७२) हल सभी कामनाओं का दोहन करने वाले हैं. मित्र देव और वरुण देव के लिए इंद्र देव तथा अश्विनी देव के लिए पूषा देव एवं प्रजागण के लिए ओषधियां उपलब्ध कराने वाले हैं. ( ७२ ) विमुच्यध्वमघ्न्या देवयाना ऽ अगन्म तमस्सपारमस्य. ज्योतिरापाम.. (७३) मनुष्य अवध्य और यज्ञ के द्वारा देव मार्ग पर ले जाते हैं. आप संसार के पार ले जाने वाले हैं. हम ईश्वर की कृपा से ज्योति को प्राप्त करें. ( ७३ ) सजूरब्दो अयवोभिः सजूरुषा ऽ अरुणीभिः. सजोषसावाश्विना द ँश्व सोभिः सजूः सूर ऽ एतशेन सजूर्वैश्वानर ऽ इडया घृतेन स्वाहा.. (७४) महीने, दिन और वर्ष से प्रेम रखने वाले के लिए स्वाहा. लाल किरणों से प्रेम रखने वाली उषा देवी के लिए स्वाहा. चिकित्सकीय कार्यों से प्रेम रखने वाले अश्विनी देवों के लिए स्वाहा. घोड़ों से प्रेम रखने वाले सूर्य देवों के लिए स्वाहा. घी से प्रेम रखने वाले अग्नि देव के लिए स्वाहा. ( ७४ ) या ऽ ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा. मनै नु बभ्रूणामह ँश्व शतं धामानि सप्त च.. (७५) पहले देवताओं के लिए तीन युग में ओषधियां उत्पन्न हुई हैं. हमें सैकड़ों धाम और सात धान्यों की क्षमता का ज्ञान है. ओषधियां पक कर भूरेपीले रंग की हो जाती हैं. ( ७५ ) शतं वो अम्ब धामानि सहस्रमुत वो रुहः. अधा शतक्रत्वो यूयमिमं मे अगदं कृत.. (७६) ओषधियों के सैकड़ों नाम हैं. मां के समान गुण युक्त हैं. उन के सैकड़ों धाम हैं. वे सैकड़ों यज्ञ कराने वाली हैं. आप हमारे अंगों को पुष्ट करने की कृपा कीजिए. ( ७६ ) ओषधीः प्रति मोदध्वं पुष्पवतीः प्रसूवरीः. अश्वा ऽ इव सजित्त्वरीर्वीरुधः पारयिष्ण्वः.. (७७) ओषधियां पुष्पवती हैं. फल उपजाने वाले गुणों से युक्त हैं. ओषधियां हमें आनंद प्रदान करने वाली और घोड़े की तरह वेगवती हैं. रुकावटों ( बीमारियों ) को तेजी से दूर ( नष्ट ) करने की कृपा करें. ( ७७ ) १५२ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय ओषधीरिरिति मातरस्तद्वो देवीरुप ब्रुवे. सनेयमश्वं गां वास ऽ आत्मानं तव पूरुष.. (७८) ओषधियां मातापिता के समान और दिव्य गुणों से संपन्न हैं. हम उन के गुणों के बारे में कहते रहते हैं. हे यज्ञ पुरुष! आप से प्राप्त घोड़े, गाय और आत्मिक सुखों का उपभोग करें. ( ७८ ) अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता. गोभाज ऽ इत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम्.. (७९) ओषधियों का निवास पीपल और पत्तों में है. आप गो भाजन बनिए. आप आकाश का सेवन कीजिए. आप वर्षा करिए. आप यजमान को अन्नधन संपन्न बनाइए. ( ७९ ) यत्रौषधी: समग्मत राजान: समिताविव. विप्र: स ऽ उच्यते भिषग्रक्षोहामीवचातन:... (८०) जैसे राजा राक्षसों पर विजय पाने के लिए युद्ध में जाते हैं, वैसे ही ओषधियां रोगी और रोग के पास जाती हैं. रोगनाशक होने के ही कारण उन्हें वैद्य और विप्र कहा जाता है. ( ८० ) अश्वावती ४ सोमावतीमूर्जयन्तीमुदोजसम्. आवित्सि सर्वा ऽ ओषधीरस्मा ऽ अरिष्टतातये.. (८१) अनिष्ट का निवारण करने के लिए अश्ववती और सोमवती ऊर्जा से हम परिचित हैं. यह ऊर्जा ओजस्विता की पोषक है. ( ८१ ) उच्छुष्मा ऽ ओषधीनां गावो गोष्ठादिवेरते. धन ४ सनिष्यन्तीनामात्मानं तव पूरुष.. (८२) जैसे गोशाला से गाएं जंगल में जाती हैं, वैसे ही यज्ञ का धुआं वायुमंडल में जाता है. अग्नि के शरीर से निकलती हुई लपट से उन की शक्ति और सामर्थ्य प्रकट होती है. ( ८२ ) इष्कृतिर्नाम वो माताथो यूय ४ स्थ निष्कृती:. सीरा: पतत्रिणी स्थन यदामयति निष्कृथ.. (८३) आप रोग निवारक हैं. आप माता जैसी हैं. आप विकारनाशक हैं. आप अन्न की भांति मनुष्य को शक्तिमान बनाने की कृपा करें. ( ८३ ) अति विश्वा: परिष्ठा स्तेन ऽ इव व्रजमक्रमू:. ओषधी: प्राचुच्यवुर्यत्किं च तन्वो रप:... (८४) यजुर्वेद - १५३