भारतकोश
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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

विष्णु की स्तुति १८-२१ ६८ सविता से सहायता के लिए प्रार्थना २२ ६८-६९ अनिष्टकारी प्रयोगों को उखाड़ फेंकना २३ ६९ विशाल गर्त एवं विष्णु की प्रतिष्ठा २४-२५ ६९ सविता देव की स्तुति २६ ६९-७० गूलर की लकड़ी से सृष्टि विस्तार की कामना २७-२८ ७० इंद्र की स्तुति २९-३० ७० अग्नि की स्तुति ३१-३२ ७०-७१ ब्रह्मासन का स्वरूप ३३ ७१ अग्नि की स्तुति ३४-३८ ७१-७२ सविता की प्रशंसा ३९ ७२ अग्नि की स्तुति एवं उन का स्वरूप ४०-४१ ७२-७३ यूपवृक्ष की स्तुति एवं स्वरूप ४२-४३ ७३ छठा अध्याय यज्ञ साधनों की महत्ता १-२ ७४ विष्णु धाम का निरूपण ३-५ ७४-७५ यज्ञ की सर्वव्यापकता ६ ७५ सर्वगुण संपन्न त्वष्टा ७ ७५ पशुओं की मुक्ति ८ ७५ संतुष्टि के लिए यज्ञ ९ ७५-७६ यज्ञ एवं पशुओं की स्तुति १०-१२ ७६ आचरण शुद्धि का आग्रह १३-१५ ७६-७७ त्यागे हुए तृण की निंदा १६ ७७ याजक और यजमान १७-१९ ७७-७८ अंगअंग में इंद्र की व्यापकता २० ७८ हवि के विस्तार की कामना २१ ७८-७९ वरुण की कृपा की इच्छा २२ ७९ हवि की श्रेष्ठता २३ ७९ अग्नि की महत्ता २४ ७९ यज्ञ की सफलता के लिए प्रार्थना २५ ७९ जल, अग्नि तथा सोम की स्तुतियां २६-३६ ७९-८१ इंद्र की स्तुति ३७ ८२

सातवां अध्याय

सातवां अध्याय सोम की स्तुति १-३ ८३ सोम तथा यजमानों की रक्षा के लिए इंद्र से प्रार्थना ४ ८३ इंद्र का विस्तार ५ ८३-८४ सुभव का स्वयं प्रकाश ६ ८४ वायु की स्तुति ७ ८४ इंद्र और वायु से सोमरस पीने का आग्रह ८ ८४ मित्र और वरुण की स्तुति ९-१० ८४-८५ अश्विनी देवों की उपासना ११ ८५ इंद्र के गुणों का वर्णन १२-१३ ८५ सोम की शक्ति १४ ८५-८६ इंद्र के लिए यज्ञ १५ ८६ प्रसन्नतादायक जल वर्षा १६ ८६ सोम से अनुरोध १७ ८६ श्रेष्ठ संतान और धन के लिए देव प्रार्थना १८ ८६ दिव्य देव १९ ८६-८७ यज्ञ के लिए ग्रहों का आमंत्रण २० ८७ सर्वसंतोष कारक सोमरस २१ ८७ दीर्घ जीवन की कामना से सोमपान २२-२३ ८७-८८ अग्नि की प्रशंसा २४ ८८ ध्रुव नाम से प्रसिद्ध सोम २५-२६ ८८ वर्चस्व की कामना २७-२८ ८८-८९ सर्वव्यापी सोम २९ ८९ सोम का ग्रहण ३०-३२ ८९-९० विश्वे देव का आह्वान ३३-३४ ९० सोम की रक्षा के लिए इंद्र व मरुद् देव से प्रार्थना ३५ ९०-९१ इंद्र की स्तुति ३६-३७ ९१ जल बरसाने वाले मरुद्गण ३८ ९१ इंद्र की महानता ३९-४० ९१-९२ सूर्य की सर्वज्ञता ४१ ९२ मित्र देव का वर्णन ४२ ९२ अग्नि की स्तुति ४३-४४ ९२-९३ देवकृपा ४५-४६ ९३ कामना का महत्त्व ४७-४८ ९३

आठवां अध्याय

आठवां अध्याय सोमरस की रक्षा के लिए विष्णु से प्रार्थना १ ९४ इंद्र की उपासना २ ९४ कल्याणकारक आदित्य देव की स्तुति ३-५ ९४-९५ सुख के लिए सविता से प्रार्थना ६-७ ९५ सोम की स्तुति ८-१२ ९५-९६ पाप से मुक्त करने की याचना १३ ९६ वर्चस्व की कामना १४-१६ ९६-९७ सविता देव की उपासना १७ ९७ देवों के लिए सुगम यज्ञ सदन १८ ९७ अग्नि से हवि ग्रहण करने की प्रार्थना १९-२० ९७ शुद्ध वायु के लिए प्रार्थना २१ ९७ यज्ञ देव की स्तुति २२ ९७-९८ वरुण की उपासना २३ ९८ असुरों से यज्ञ की रक्षा २४ ९८ सोम की स्तुति २५-२७ ९८-९९ गर्भ एवं जरायु की पूर्णता एवं विविधता २८-३० ९९ मरुद्गण की स्तुति ३१-३२ ९९ सोलह कलाओं वाले इंद्र की स्तुति ३३-३७ ९९-१०० वर्चस्ववान अग्नि ३८ १००-१०१ इंद्र और सोम की स्तुति ३९-४१ १०१ महिमाशालिनी देवी की स्तुति ४२ १०२ गोवध निषेध ४३ १०२ इंद्र की स्तुति ४४ १०२ वाचस्पति की स्तुति ४५ १०२ विश्वकर्मा की उपासना ४६ १०२-१०३ सोम का वर्णन ४७-५० १०३ गायों की स्तुति ५१ १०३-१०४ सोम की स्तुति ५२ १०४ इंद्र की स्तुति ५३ १०४ विभिन्न देवों की स्तुति ५४-६१ १०४-१०६ यज्ञ का विस्तार ६२ १०६ पशु व अन्नादि की याचना ६३ १०६ नौवां अध्याय सविता देव की स्तुति १ १०७

सोम और सोम पात्र का वर्णन २-४ १०७-१०८ हविष्यान्न से पूर्ण रथ की स्थापना ५ १०८ यज्ञ वृद्धि की कामना ६ १०८ बलवान अग्नि का वर्णन ७-९ १०८-१०९ सत्यमार्ग के प्रेरक सविता देव की स्तुति १० १०९ बृहस्पति की विजय कामना ११-१२ १०९-११० युद्ध में विजय की कामना १३-१९ ११०-१११ सुख एवं आयु वृद्धि की कामना २०-२१ १११ पृथ्वी की उपासना २२ १११-११२ सोम का राजत्व २३ ११२ परमात्मा की स्तुति २४-२७ ११२ अग्नि देव की स्तुति २८ ११३ इच्छापूर्ति की कामना २९ ११३ विभिन्न विजयों का वर्णन ३०-३४ ११३-११४ देवों और दिशाओं के लिए आहुतियां ३५-३६ ११४-११५ अग्नि से शत्रुओं को हराने का निवेदन ३७ ११५ सुख एवं समृद्धि के लिए प्रार्थना ३८-४० ११५ दसवां अध्याय राष्ट्रदायी जल की महत्ता १-४ ११६-११७ विभिन्न देवों के लिए आहुति समर्पण ५ ११७-११८ कुशों की पवित्रता ६ ११८ जल की स्थापना ७-८ ११८ यज्ञ स्थल की रक्षा के लिए प्रार्थना ९-१५ ११८-१२० मित्र और वरुण की स्तुति १६ १२० यजमान का अभिषेक १७ १२० शक्ति प्राप्ति के लिए प्रार्थना १८ १२० जलधाराओं का वर्णन १९ १२०-१२१ प्रजापति से प्रार्थना २० १२१ इंद्र देव से ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रार्थना २१-२२ १२१ आहुति समर्पण २३ १२१ परमात्मा की स्तुति २४-२५ १२२ सुखदायी आसन २६ १२२ व्रतधारी यजमान २७-२८ १२२ अग्नि की महिमा का वर्णन २९ १२२-१२३

ग्यारहवां अध्याय

प्रेरणादायक देव ३० १२३ हवि की परिपक्वता के लिए प्रार्थना ३१ १२३ प्रजा के कल्याण के लिए सोम ग्रहण ३२ १२३ इंद्र रक्षक अश्विनीकुमार ३३-३४ १२३-१२४ ग्यारहवां अध्याय सविता देव की प्रशंसा १-११ १२५-१२७ अग्नि की स्तुति १२ १२७ पुरोहित और यजमान के लाभ की कामना १३ १२७ रक्षा के लिए इंद्र का आह्वान १४ १२७ वाजिन तथा अग्नि की स्तुति एवं महिमा १५-३८ १२७-१३१ पृथ्वी की स्तुति ३९ १३१ अग्नि की महिमा और स्तुति ४०-४९ १३१-१३३ जल देव की स्तुति ५०-५२ १३३ कल्याणकारी अग्नि ५३ १३३-१३४ रुद्रगणों द्वारा पृथ्वी की रचना ५४-५५ १३४ देवमाता सिनीवाली देवी ५६-५७ १३४ उखा देव की स्तुति ५८-६१ १३४-१३६ ऐश्वर्य की कामना ६२ १३६ उखा की स्तुति ६३-६५ १३६ अग्नि के लिए आहुति समर्पण ६६ १३६-१३७ परमेश्वर के लिए आहुति समर्पण ६७ १३७ उखा देव की स्तुति ६८-६९ १३७ पराक्रम में बढ़ोतरी के लिए अग्नि की स्तुति ७०-८३ १३७-१३९ बारहवां अध्याय सूर्य की महिमा का वर्णन १-३ १४० सविता देव का विस्तार ४ १४०-१४१ अग्नि की महिमा ५-११ १४१-१४२ बंधन दूर करने के लिए वरुण से प्रार्थना १२ १४२ अग्नि का जन्म एवं विस्तार १३-४४ १४२-१४७ यमदूतों से आग्रह ४५ १४७ उषा देवी से प्रार्थना ४६ १४७

अग्नि का वर्चस्व ४७-५४ १४८-१४९ स्वर्गिक जल से शोभायमान सोम ५५ १४९ वाणी विस्तार ५६ १४९ इंद्र की स्तुति ५७ १४९ अग्नि की स्तुति ५८-६० १४९-१५० उखा की मुक्ति कामना ६१ १५० निर्ऋत देवी की उपासना ६२-६५ १५०-१५१ इंद्र की स्तुति ६६-६७ १५१ हल जोतने के लिए किसानों का आह्वान ६८-७२ १५१-१५२ ईश्वर से कृपा की कामना ७३ १५२ विभिन्न देवों के लिए आहुतियां ७४ १५२ ओषधि वर्णन ७५-१०१ १५२-१५६ प्रथम जन्मा के लिए आहुति १०२ १५६ पृथ्वी की स्तुति १०३ १५६ बहुगुणी अग्नि १०४-१११ १५६-१५८ सोम की स्तुति ११२-११३ १५८ अग्नि की स्तुति ११४-११७ १५८-१५९ तेरहवां अध्याय अग्नि की महिमा १ १६० सृष्टि की उत्पत्ति एवं विकास २-५ १६०-१६१ सर्पों को नमन ६-८ १६१ अग्नि की स्तुति ९-१६ १६१-१६२ देवी की उपासना १७-१९ १६२-१६३ दूर्वा की स्तुति २०-२१ १६३ इंद्र, अग्नि और बृहस्पति की स्तुति २२-२३ १६३ प्रजापति की स्तुति २४ १६३-१६४ पारस्परिक सहयोग की कामना २५ १६४ प्रकृति में माधुर्य की कामना २६-२९ १६४ कूर्म की वंदना ३०-३२ १६४-१६५ विष्णु एवं इंद्र की एकता ३३ १६५ उखा का वर्णन ३४-३५ १६५ अग्नि की उपासना ३६-५४ १६५-१६९ विभिन्न उत्पत्तियां ५५-५८ १६९-१७०

चौदहवां अध्याय

चौदहवां अध्याय इष्टकाओं की प्रतिष्ठा एवं महिमा १-८ १७१-१७३ प्रजापति द्वारा गायत्री छंद से मूर्धन्य ब्राह्मणों की उत्पत्ति ९ १७३ प्रजापति द्वारा जानवरों की उत्पत्ति १० १७३-१७४ इष्टका स्थापित करने का अनुरोध ११ १७४ इष्टका की स्तुति १२-१४ १७४ मास वर्णन १५ १७५ इष्टका से रक्षा की कामना १६-२७ १७५-१७८ विभिन्न देवलोकों की उत्पत्ति २८-३१ १७८-१८० पंद्रहवां अध्याय अग्नि की स्तुति १ १८१ अग्नि से शत्रु के नाश की कामना २-३ १८१ अग्नि की स्थापना ४-५ १८१-१८२ सत्य के लिए रश्मियों का प्रचारप्रसार ६ १८२-१८३ इष्टका की स्तुति ७-१४ १८३-१८५ रक्षा के लिए अग्नि से प्रार्थना १५ १८५ रक्षा के लिए विश्वकर्मा से प्रार्थना १६ १८५ आदित्य देव का वर्णन १७ १८६ अग्नि देव की स्तुति एवं स्वरूप निरूपण १८-६० १८६-१९३ इंद्र की स्तुति ६१ १९३ अग्नि परम इष्ट है ६२-६५ १९३-१९४ सोलहवां अध्याय रुद्र देव की उपासना तथा वर्णन १-५ १९५ विभिन्न दिशाओं में फैली शक्तियां ६ १९५-१९६ रुद्र देव से रक्षा के लिए प्रार्थना ७-१६ १९६-१९७ रुद्र देव व गणपति आदि के लिए नमन १७-४६ १९७-२०३ रुद्र देव का स्वरूप निरूपण ४७-६४ २०३-२०६ रुद्र देव के लिए नमन ६५-६६ २०६ सत्रहवां अध्याय अग्नि से कल्याणकारी होने के लिए कामना १-१६ २०७-२०९ 632/1

परम शक्ति की उत्पत्ति एवं विकास १७-२१ २०९-२१० विश्वकर्मा की स्तुति २२-२३ २१०-२११ परम तत्त्व की विवेचना २४-३२ २११-२१२ इंद्र की वीरता ३३-३५ २१२-२१३ बृहस्पति देव की उपासना ३६ २१३ इंद्र व वरुण आदि देवों का पराक्रम ३७-४९ २१३-२१५ अग्नि की स्तुति ५० २१५ इंद्र की स्तुति ५१ २१५ अग्नि से कल्याण कामना ५२-५५ २१५-२१६ यज्ञ की महत्ता ५६-५७ २१६ सूर्य देव की उपासना ५८-६० २१६-२१७ इंद्र की स्तुति ६१-६४ २१७ अग्नि की महिमा एवं उपासना ६५-७३ २१७-२१९ सविता देव की स्तुति ७४ २१९ अग्नि की स्तुति ७५-७७ २१९ यज्ञ में देवों का आह्वान ७८ २२० अग्नि का स्वरूप ७९-८५ २२०-२२१ मरुद्गण की सेना ८६ २२१ घी की धाराएं ८७-९८ २२१-२२३ अग्नि की स्तुति ९९ २२३ अठारहवां अध्याय यज्ञ के सर्वविध फलीभूत होने की कामना १-२७ २२४-२३० विभिन्न महीनों के लिए आहुति समर्पण २८ २३० देवत्व प्राप्ति की कामना २९ २३० पृथ्वी तथा प्रकृति की अनुकूलता हेतु प्रार्थना ३०-३४ २३०-२३१ अग्नि एवं सविता देव से कृपा की कामना ३५-३८ २३१-२३२ रक्षा के लिए सूर्य से प्रार्थना ३९-४० २३२ गंधर्वों के लिए आहुति अर्पण ४१-४३ २३२-२३३ प्रजापति के लिए आहुति अर्पण ४४-४५ २३३ तेजस्विता के लिए अग्नि से प्रार्थना ४६-४८ २३३-२३४ वरुण देव की वंदना ४९ २३४ सूर्य के लिए स्वाहा ५० २३४ अग्नि की स्तुति ५१-५७ २३४-२३५

उन्नीसवां अध्याय

परम शक्ति की वंदना ५८-६० २३५-२३६ बहुरूपा अग्नि ६१-६७ २३६-२३७ शत्रु विनाश के लिए इंद्र का आह्वान ६८-७१ २३७ विश्व कल्याण के लिए अग्नि से प्रार्थना ७२-७७ २३७-२३८ उन्नीसवां अध्याय औषध देव की स्तुति १ २३९ सोम सिंचन २ २३९ इंद्र सखा वायु की शुद्धता ३ २३९ सोम की स्तुति ४-५ २३९-२४० किसान और अन्न ६ २४० सोम से प्रार्थना ७-९ २४० शक्ति की उपासना १० २४०-२४१ कल्याणकारी मातापिता ११ २४१ यज्ञ का विस्तार १२ २४१ सोम का स्वरूप १३-१६ २४१ यज्ञ व कुशा आदि से प्राप्ति १७-२० २४२ धान व लपसी आदि सोम का रूप हैं २१-२३ २४२-२४३ ऋचाओं के विविध रूप २४-२५ २४३ यज्ञ के विभिन्न अवयवों से प्राप्तियां २६-३१ २४३-२४४ सोम निरूपण ३२-३५ २४४-२४५ पितरों के लिए आहुतियां ३६-३७ २४५ अग्नि का पवित्र स्वरूप ३८-४२ २४५-२४६ सविता व विश्वे देवी आदि से पवित्रता के लिए प्रार्थना ४३-४४ २४६ पितृ एवं देव मार्ग ४५-४७ २४६ बढ़ोतरी के लिए अग्नि से प्रार्थना ४८ २४६-२४७ रक्षा एवं कल्याण के लिए पितृ वंदना ४९-५१ २४७ सोम की स्तुति ५२-५४ २४७-२४८ पितरों का आह्वान ५५-६३ २४८-२४९ अग्नि की उपासना ६४-७० २४९-२५० इंद्र की स्तुति ७१ २५० सोम आदि से उपलब्धियां ७२-७९ २५०-२५२ तनमन के विविध अवयवों की उत्पत्ति ८०-९३ २५२-२५४ सरस्वती देवी और अश्विनीकुमार ९४ २५४ शक्तिवर्धक सोमरस ९५ २५४

बीसवां अध्याय

बीसवां अध्याय वेदिका स्वरूप निरूपण १-४ २५५ बल व पुरुषार्थ की कामना ५-१० २५५-२५६ रक्षा के लिए देवों से प्रार्थना ११ २५६-२५७ परस्पर संयोजन की कामना १२-१३ २५७ पापों से मुक्ति की कामना १४-१७ २५७-२५८ जल संचरण १८-२२ २५८ बढ़ोतरी के लिए अग्नि से याचना २३-२४ २५९ ज्ञानमय लोक पाने की इच्छा २५-२६ २५९ ओषधियों का रस २७-२८ २५९ इंद्र की स्तुति २९ २५९-२६० मरुद्गण की स्तुति ३० २६० अध्वर्यु की स्तुति ३१ २६० प्राणियों के अधिपति की उपासना ३२ २६० ओषधि रूप रस ३३-३५ २६० वृत्रहंता इंद्र ३६-४० २६०-२६१ उषा की वंदना ४१ २६१ इंद्र की स्थापना ४२ २६१-२६२ विघ्न दूर करने के लिए तीन देवियों से प्रार्थना ४३ २६२ त्वष्टा देव की स्तुति ४४ २६२ रक्षा के लिए इंद्र का आह्वान ४५-५४ २६२-२६४ समिधा से अग्नि प्रज्वलन ५५ २६४ तन रक्षक अश्विनीकुमार ५६ २६४ ओषधि से युक्त सोमरस ५७ २६४ सरस्वती के माध्यम से इंद्र का आह्वान ५८ २६४ सरस्वती द्वारा सोम का हरण ५९ २६४ सरस्वती द्वारा स्वर्ग और पृथ्वीलोकों का दोहन ६० २६४ इंद्र के लिए विशेष बल का समय ६१ २६५ रक्षा के लिए त्रिदेव से प्रार्थना ६२ २६५ ओषधि से युक्त सोम ६३ २६५ मधुर रस का दोहन ६४-६५ २६५ सरस्वती द्वारा नमुचि से हवि प्राप्त करना ६६-६८ २५५-२६६ सरस्वती तथा अश्विनीकुमारों द्वारा इंद्र को हवि अर्पण ६९ २६६ इंद्र द्वारा हविपति की रक्षा ७० २६६

इंद्र द्वारा नमुचि से रक्षा ७१ २६६ वरुण देव का आह्वान ७२ २६६ अश्विनीकुमारों द्वारा यजमान के पराक्रम की वृद्धि ७३ २६६ देवों से यज्ञ में पधारने का अनुरोध ७४ २६६-२६७ अश्विनीकुमारों की स्तुति ७५-७७ २६७ अग्नि द्वारा सोम को ग्रहण करना ७८-७९ २६७ अश्विनीकुमारों से प्रार्थना ८०-८३ २६८ सरस्वती देवी की उपासना ८४-८६ २६८ यज्ञ में इंद्र देव का आह्वान ८७-९० २६८-२६९ उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय वरुण देव की उपासना १-२ २७० अग्नि देव की स्तुति ३-४ २७० अदिति देवी की स्तुति तथा आह्वान ५-६ २७०-२७१ मित्र और वरुण देव की आराधना ७-११ २७१-२७२ रक्षा के लिए अग्नि से प्रार्थना १२-१५ २७२ बल एवं आयु वृद्धि की याचना १६-२८ २७२-२७४ सर्व कल्याण के लिए यज्ञ की कामना २९-५६ २७४-२८२ देवगणों द्वारा पराक्रम धारण ५७-५८ २८२ देवगणों को सोम की भेंट ५९-६० २८२ देवगणों का आह्वान ६१ २८३ बाईसवां अध्याय तेजोमय देव की उपासना १ २८४ यज्ञ से ज्ञान की वृद्धि २ २८४ अग्नि से देवताओं तक पहुंचने की प्रार्थना ३-४ २८४ प्रजापति की संतुष्टि के लिए अभिषेक ५ २८४-२८५ विभिन्न देवों के लिए आहुति अर्पण ६-८ २८५-२८६ सविता देव की स्तुति ९-१४ २८६ अग्नि की महिमा एवं वंदना १५-१९ २८६-२८७ विभिन्न देवों के लिए आहुति अर्पण २० २८७-२८८ संसार के नायक २१ २८८

तेईसवां अध्याय

ब्राह्मणों की स्तुति २२ २८८ विभिन्न देवों एवं कर्मों के लिए स्वाहा २३-३४ २८८-२९१ तेईसवां अध्याय परमात्मा की उत्पत्ति १ २९२ परमात्मा और प्रजापति के लिए हवि का विधान २-४ २९२-२९३ यज्ञ के साधनों का संयोजन ५ २९३ यज्ञ रूपी अश्व ६-८ २९३ ब्रह्मा होता संवाद ९-१२ २९३-२९४ अग्नि को नमन १३ २९४ यज्ञ रूपी रथ की प्रशंसा १४ २९४ यज्ञ ऊर्जा की महिमा १५ २९४-२९५ परम शक्ति की अनश्वरता १६ २९५ विजय के लिए ऊर्जा १७ २९५ अंबा की स्तुति १८ २९५ गणपति का आह्वान १९ २९५-२९६ यज्ञ शक्ति और देव शक्ति २० २९६ दुष्टों का दमन करने वाली परम शक्ति २१ २९६ शक्तिशाली जल २२ २९६ यज्ञ के बारे में निरर्थक बातें न करें २३ २९६ पूर्वजों की प्रसन्नता २४ २९६ कम बोलने की सलाह २५ २९६ राष्ट्र के लिए प्रजापति से प्रार्थना २६-२७ २९७ पाप भेदक यज्ञाग्नि २८ २९७ परमानंददायी गतिविधियां २९ २९७ अपनी हानि से दुःख ३०-३१ २९७-२९८ यज्ञ देव की कृपा ३२ २९८ यज्ञाग्नि की शांति ३३-३७ २९८-२९९ सोम का आह्वान ३८ २९९ सुखदाता परमात्मा की वंदना ३९-४४ २९९-३०० ब्रह्मा होता संवाद ४५-४८ ३०० विष्णु के तीन पैर ४९-५० ३००-३०१ पंचमहाभूतों में परम पुरुष का रमण ५१-५२ ३०१ ब्रह्मा होता संवाद ५३-६५ ३०१-३०३

चौबीसवां अध्याय

चौबीसवां अध्याय विभिन्न देवी देवताओं के लिए अलगअलग जीव जंतु १-४० ३०४-३११ पच्चीसवां अध्याय विभिन्न अंगों से देवी की प्रसन्नता १ ३१२ विभिन्न देवों के लिए आहुति अर्पण २-३ ३१२-३१३ अस्थि और देव ४-६ ३१३-३१४ शारीरिक अंगों से देवों का संबंध ७-९ ३१४ देवों के लिए हवि का विधान १०-१३ ३१५ कल्याण व रक्षा की कामना १४-२२ ३१५-३१७ सृष्टि की अनश्वरता २३ ३१७ देवों का पराक्रम २४ ३१७ यज्ञ का प्रिय पदार्थ पुरोडाश २५-२६ ३१७ यज्ञ से इच्छित उद्देश्यों की प्राप्ति २७-२८ ३१७-३१८ यज्ञ के हित साधक कार्य २९ ३१८ यज्ञ पशु पर नियंत्रण ३० ३१८ यज्ञ पशु के अंग देवों को समर्पित ३१-३४ ३१८-३१९ पुरोडाश की परिपक्वता ३५-३७ ३१९ यज्ञ के अश्व का व्यवहार एवं श्रृंगार ३८-४१ ३१९-३२० कालगत विभाजन ४२ ३२० अश्व की स्तुति ४३-४५ ३२०-३२१ इंद्र तथा अन्य देवों की उपासना ४६-४७ ३२१ छब्बीसवां अध्याय अग्नि आदि देवों से अनुकूलता के लिए प्रार्थना १-२ ३२२ बृहस्पति देव की उपासना ३ ३२२-३२३ इंद्र देव की स्तुति ४-५ ३२३ अग्नि देव की स्तुति ६-९ ३२३-३२४ इंद्र की स्तुति १०-११ ३२४ अग्नि से अन्न व बल की याचना १२-१३ ३२४ यज्ञ विस्तार की कामना १४ ३२४-३२५ ब्राह्मणों में बुद्धि १५ ३२५ सोम की स्तुति १६-१९ ३२५

सत्ताईसवां अध्याय

अग्नि की स्तुति २०-२२ ३२५-३२६ सोमरस की रक्षा करना २३ ३२६ देव पत्नियों से हवि ग्रहण की प्रार्थना २४ ३२६ मददायी व रक्षक सोम २५-२६ ३२६ सत्ताईसवां अध्याय अग्नि की उपासना १-७ ३२७-३२८ बृहस्पति देव तथा सविता देव की स्तुति ८-९ ३२८ सूर्य की आराधना १० ३२८ अग्नि और उन की दिव्य देवियों का आह्वान ११-२४ ३२९-३३० जल की अपारता २५-२६ ३३०-३३१ वायु की स्तुति २७-३४ ३३१-३३२ इंद्र देव की स्तुति ३५-४१ ३३२-३३३ अग्नि से रक्षा की कामना ४२-४५ ३३३ अट्ठाईसवां अध्याय इंद्र की उपासना १-६ ३३४-३३५ अश्विनीकुमारों के लिए यज्ञ ७ ३३५ तीन देवियों के लिए यज्ञ ८ ३३५ त्वष्टा देव की महिमा का गान ९ ३३५ शांतिदाता वनस्पति देव १० ३३६ विभिन्न देवों के लिए आहुति अर्पण ११ ३३६ इंद्र के लिए यज्ञ कामना १२-१३ ३३६ उषा देवी और रात्रि देवी के लिए यज्ञ की कामना १४-१८ ३३६-३३७ इंद्र के लिए यज्ञ कामना १९ ३३८ वनस्पति देव के लिए यज्ञ की कामना २० ३३८ वैभव के लिए यज्ञ कामना २१ ३३८ अग्नि के लिए यज्ञ कामना २२ ३३८ अग्नि द्वारा होता का वरण २३ ३३८-३३९ अग्नि और इंद्र आदि के लिए यज्ञ २४-४६ ३३९-३४३ उनतीसवां अध्याय अग्नि की स्तुति १-३ ३४४

अदिति की विशालता ४-५ ३४४ रात्रि और उषा देवी का वर्णन ६ ३४५ अग्नि और वायु की वंदना ७ ३४५ भारती देवी से यज्ञ की रक्षा की कामना ८ ३४५ त्वष्टा देव के लिए यज्ञ कामना ९ ३४५ वनस्पति देव से प्रार्थना १० ३४५ अग्रगामी अग्नि ११ ३४५ मेघ देव की महिमा १२ ३४६ इंद्र देव का रथ १३ ३४६ मेघ देव के तीन बंधन १४-१७ ३४६ वायु की स्तुति १८ ३४७ अर्वन् देव की स्तुति १९-२४ ३४७-३४८ अग्नि की स्तुति २५-२८ ३४८ कुशों का सुखासन २९ ३४८ दिव्य द्वार वाली देवियां ३० ३४९ दिव्य कार्य करने वाली देवियां ३१ ३४९ विराट् यज्ञ के दो दिव्य होता ३२ ३४९ तीन देवियों का आह्वान ३३ ३४९ त्वष्टा देव का पूजन ३४ ३४९ यजमानों से निवेदन ३५ ३४९ अग्नि की स्तुति ३६-३७ ३४९-३५० वीरों के लिए विजय कामना ३८-४६ ३५०-३५१ रक्षा के लिए देवों से प्रार्थना ४७ ३५१ बाणों से कल्याण कामना ४८ ३५१ चाबुक, रथ व दुंदुभि आदि युद्ध साधनों का वर्णन ४९-५७ ३५१-३५३ विभिन्न देवताओं से संबंध ५८-६० ३५३-३५४ तीसवां अध्याय सविता देव की स्तुति १-४ ३५५ चारों वर्णों के कर्तव्य ५ ३५५ उपयुक्त संबंधों की विवेचना ६-२२ ३५५-३६० इकतीसवां अध्याय परम पुरुष का वर्णन १-३ ३६१

बत्तीसवां अध्याय

परम पुरुष के तीन पैर ४ ३६१ विराट् की उत्पत्ति ५-७ ३६१-३६२ पृथ्वी तथा अन्य जीवों की उत्पत्ति ८-१८ ३६२-३६३ प्रजापति की महिमा १९ ३६३-३६४ परम पुरुष से इच्छा पूर्ति करने का अनुरोध २०-२२ ३६४ बत्तीसवां अध्याय परम पुरुष का वर्णन १-६ ३६५-३६६ परम पुरुष की शक्ति ७ ३६६ परम पुरुष की व्यापकता एवं अमरता ८-१४ ३६६-३६७ बुद्धि की कामना १५ ३६७ ब्रह्मज्ञान की कामना १६ ३६७ तैंतीसवां अध्याय अग्नि की स्तुति और महिमा का गान १-१७ ३६८-३७० इंद्र देव का ध्यान १८ ३७१ यज्ञ रक्षक सूर्य की किरणें १९ ३७१ श्रेष्ठ कार्य हेतु देवों से अनुरोध २० ३७१ स्वर्ग और पृथ्वीलोकों के संरक्षक सोम २१ ३७१ इंद्र का गुणगान २२-३० ३७१-३७३ सर्व प्रकाशक सूर्य ३१ ३७३ भरणपोषण कर्ता वरुण ३२ ३७३ दिव्य अश्विनीकुमार ३३ ३७३ कल्याणकारी सविता ३४ ३७३ शत्रुनाशी इंद्र ३५ ३७३ सूर्य की महानता ३६-४४ ३७३-३७५ इंद्र, वायु, अग्नि व बृहस्पति आदि देवों का आह्वान ४५-५४ ३७५-३७६ वैभवशाली पुरोहित ५५ ३७६-३७७ इंद्र से सोमरस पीने का आग्रह ५६ ३७७ मित्र और वरुण का ध्यान ५७ ३७७ अश्विनीकुमारों से सोमपान का आग्रह ५८ ३७७ श्रेष्ठ वर्णीय मंत्रों से देवस्तुति ५९ ३७७ अग्नि का गुणगान ६०-६१ ३७७

सोम के लिए यजमानों से संबोधन ६२ ३७८ इंद्र की स्तुति ६३-६७ ३७८ सुमति के लिए आदित्य से प्रार्थना ६८ ३७८-३७९ सविता देव से घरों की रक्षा की कामना ६९ ३७९ सोमरस के लिए पुरोहित से प्रार्थना ७०-७१ ३७९ यज्ञ की पूर्णता के लिए देवों से प्रार्थना ७२ ३७९ यज्ञ के लिए पुरोहितों का आह्वान ७३ ३७९ सोम की पवित्रता ७४ ३७९ यज्ञ के लिए अग्नि का वरण ७५ ३७९-३८० इंद्र की महिमा ७६-८३ ३८०-३८१ सविता देव की आराधना ८४ ३८१ वायु देव की आराधना ८५ ३८१ इंद्र का आह्वान ८६-८७ ३८१ अश्विनीकुमारों से आगमन का अनुरोध ८८-८९ ३८२ चमकदार सोम देव ९० ३८२ बुद्धि के देवता को हवि देना ९१ ३८२ वैश्वानर की वंदना ९२ ३८२ पैर रहित उषा देवी की गति ९३ ३८२ वैभव पाने के लिए देव वंदना ९४ ३८२-३८३ इंद्र आदि देवों की महिमा ९५-९७ ३८३ चौंतीसवां अध्याय कल्याणकारी संकल्पों की आधारशिला मन १-६ ३८४-३८५ इंद्र की स्तुति ७ ३८५ अनुमति देवी से प्रार्थना ८-९ ३८५ सिनीवाली देवी १० ३८५ पांच रूपों वाली सरस्वती ११ ३८५ प्रथम पूजनीय अग्नि की स्तुति १२-१५ ३८५-३८६ इंद्र की स्तुति १६-१९ ३८६-३८७ शत्रुजयी सोम का वर्णन २०-२३ ३८७-३८८ सविता देव की स्तुति २४-२५ ३८८ सूर्य देव की महिमा २६ ३८८ सविता देव के अनुकरण की कामना २७ ३८८ अश्विनीकुमारों से यज्ञस्थलों में पधारने की कामना २८-३० ३८८-३८९ सविता देव की प्रशंसा ३१ ३८९

रात्रि देवी की प्रशंसा ३२ ३८९ उषा देवी की प्रशंसा ३३ ३८९ प्रातःकाल विभिन्न देवों का आह्वान ३४-३५ ३८९-३९० भग देव की स्तुति ३६ ३९० सूर्य देव की कृपा से धनवान होने की कामना ३७ ३९० भग देव का आह्वान ३८-३९ ३९० प्रभात वेला से कल्याण कामना ४० ३९० पूषा देव से बुद्धि को श्रेष्ठ कार्यों में लगाने की कामना ४१-४२ ३९१ विष्णु द्वारा विश्व धारण ४३-४४ ३९१ स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक ४५ ३९१ देवों से शत्रु पराजय की कामना ४६ ३९१ देवताओं सहित अश्विनीकुमारों से आने का अनुरोध ४७ ३९१-३९२ मरुद्गणों की स्तुति ४८ ३९२ दिव्य सृष्टि ४९ ३९२ स्वर्णमय धन ५०-५१ ३९२ चिरायु कामना से रक्षा बंधन ५२ ३९२ सभी देवों की स्तुति ५३-५४ ३९३ शरीर में विद्यमान सात प्राण व सात ऋषि ५५ ३९३ देवत्व धारण के लिए ब्रह्मणस्पति का आह्वान ५६ ३९३ मंत्रों में देवों का वास ५७ ३९३ संसार के नियंत्रक देवगण ५८ ३९४ पैंतीसवां अध्याय देवपुत्रों का लोक १-३ ३९५ पीपल और पलाश वृक्षों पर वास करने वाली ओषधियां ४ ३९५ सुखदायी पृथ्वी का आह्वान ५ ३९५ प्रजापति से जलधारा के लिए प्रार्थना ६ ३९५-३९६ मृत्यु का पथ ७ ३९६ सर्वकल्याणकारी कामना ८-१० ३९६ पापकर्मों को दूर हटाने का आग्रह ११ ३९६ जल एवं ओषधियों से मैत्री १२ ३९६-३९७ बछड़े का आह्वान १३ ३९७ प्रकाशमय स्वर्गलोक १४ ३९७ मर्यादा रूपी परिधि १५ ३९७

छत्तीसवां अध्याय

अग्नि की स्तुति १६-२० ३९७-३९८ पृथ्वी देवी से सुख प्रदान करने की प्रार्थना २१ ३९८ अग्नि के लिए आहुति अर्पण २२ ३९८ छत्तीसवां अध्याय नेत्रों और कानों की सामर्थ्य प्राप्त करने की कामना १ ३९९ बृहस्पति देव से विभिन्न दोष दूर करने का आग्रह २ ३९९ स्वयंभू शक्तिमान परमात्मा ३-४ ३९९ इंद्र से धन की कामना ५-७ ३९९-४०० विश्व की शोभा इंद्र ८ ४०० इंद्र, वरुण, अग्नि व मित्र आदि देवों की स्तुति ९-११ ४०० जल और पृथ्वी से कल्याण कामना १२-१६ ४०१ स्वर्गलोक और अंतरिक्षलोक १७ ४०१ परमात्मा की स्तुति १८-१९ ४०१-४०२ अग्नि की स्तुति २० ४०२ परमात्मा की स्तुति २१-२२ ४०२ जल व ओषधियों आदि से मैत्री कामना २३ ४०२ हितकारी सूर्य २४ ४०२ सैंतीसवां अध्याय सविता देव की स्तुति १ ४०३ सर्वविद परमात्मा २ ४०३ दिव्य शक्तियों को यज्ञ में आने के लिए आमंत्रण ३ ४०३ दिव्य यज्ञ में अग्नि शिरोधार्य ४-६ ४०३-४०४ यज्ञ में विभिन्न देवी देवताओं का आह्वान ७ ४०४ अग्नि की स्तुति ८ ४०४ परमात्मा की स्तुति ९ ४०५ सुरक्षा के लिए सामर्थ्यशाली देव की अर्चना १०-११ ४०५ पृथ्वी देवी की स्तुति १२ ४०६ मरुद्गणों के लिए आहुति अर्पण १३ ४०६ परमात्मा बुद्धि के पिता हैं १४-१७ ४०६-४०७ सर्वरक्षक सूर्य देव १८ ४०७ परमात्मा की स्तुति १९-२१ ४०७

अड़तीसवां अध्याय

अड़तीसवां अध्याय यज्ञ ऊर्जा को ग्रहण करना १ ४०८ इड़ा एवं सरस्वती देवी का आह्वान २ ४०८ पोषक यज्ञ ऊर्जा ३ ४०८ अश्विनी व इंद्र आदि देवों के लिए आहुति ४ ४०८ सरस्वती देवी का दिव्य ज्ञान ५ ४०८ इंद्र देव की गायत्री छंद से स्तुति ६ ४०९ वायु के लिए आहुति अर्पण ७ ४०९ इंद्र देव के लिए आहुति ८ ४०९ यम देव के लिए आहुति ९ ४०९ यज्ञ विस्तार के लिए रसमयी आहुतियां १० ४१० सुखशांति के लिए आहुति अर्पण ११ ४१० अश्विनीकुमारों से यज्ञ की रक्षा करने की प्रार्थना १२-१३ ४१० परब्रह्म से प्रजा की रक्षा के लिए आग्रह १४ ४१० विभिन्न देवों के लिए आहुति अर्पण १५ ४१०-४११ दिव्य गुण वाली परम शक्ति १६ ४११ अग्नि की स्तुति १७-१८ ४११ परम शक्ति की स्तुति १९-२० ४११-४१२ यज्ञ देव का आह्वान एवं उन की स्तुति २१-२८ ४१२-४१३ उनतालीसवां अध्याय समृद्धि एवं कल्याण के लिए देवों को आहुतियां १-७ ४१४-४१५ विभिन्न शारीरिक अंगों से देवों की प्रसन्नता ८-९ ४१५-४१६ विभिन्न देवों के लिए आहुतियां १०-१३ ४१६ चालीसवां अध्याय ईश्वर की आराधना १ ४१७ कर्म करते हुए सौ वर्षों तक जीने की इच्छा २ ४१७ अजन्मा ईश्वर एक है ३-४ ४१७ परम शक्ति की व्यापकता ५-८ ४१७-४१८ सृजन और विनाश ९-१२ ४१८