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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पूर्वार्ध आठवां अध्याय उपयामगृहीतोसि हरिरसि हारियोजनो हरिभ्यां त्वा. हर्योर्धाना स्थ सहसोमा ऽ इन्द्राय.. (११) हे सोम! आप को कलश में ग्रहण किया है. आप हरे रंग के हैं. आप योजन दूर से अपने घोड़ों की सहायता से पधारिए. आप इंद्र देव के साथ हरे रंग के घोड़ों वाले रथ पर पधारिए. (११) यस्ते अश्वसनिर्भक्षो यो गोसनिस्तस्य त ऽ इष्टयजुष स्तुतस्तोमस्य शस्तोक्थस्योपहूतस्योपहूतो भक्षयामि.. (१२) हे सोम! आप उपासना योग्य हैं. हम बारबार आप को आमंत्रित करते हैं. हम उक्त मंत्र से आप की उपासना करते हैं. आप घोड़ों व गायों के प्रेरक हैं. हम यजुर्वेद के मंत्रों से आप की उपासना करते हैं. हम अपने अभीष्ट की पूर्ति चाहते हैं. (१२) देवकृतस्यैनसोवयजनमसि मनुष्यकृतस्यैनसोवयजनमसि पितृकृतस्यैनसो- वयजनमस्यात्मकृतस्यैनसोवयजनमस्येनस ऽ एनसोवयजनमसि. यच्चाहमेनो विद्वाँश्चकार यच्चाविद्वाँस्तस्य सर्वस्यैनसोवयजनमसि.. (१३) आप देवताओं के प्रति यज्ञ आदि से संबंधित पापों को दूर करने वाले हैं. आप यज्ञ आदि से संबंधित मनुष्य के पापों को दूर करने वाले हैं. पितरों के प्रति किए गए पापों को दूर करने वाले हैं. आप अपनेआप के प्रति किए गए पापों को दूर करने वाले हैं. आप जानेअनजाने में किए गए पापों को दूर करने वाले हैं. आप हमें सभी पापों से मुक्त करने की कृपा कीजिए. (१३) सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा स ँ४ शिवेन. त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोनुमार्ष्टु तन्वो यद्विलिष्टम्.. (१४) हम वर्चस्वी, दूधपूर्ण, श्रेष्ठ शरीर वाले और मन से कल्याणकारी रहें. त्वष्टा देव हमारे लिए धन धारिए. आप हमें धन देने व कष्ट विहीन करने की कृपा कीजिए. (१४) समिन्द्र णो मनसा नेषि गोभिः स ँ४ सूरिभिर्मघवन्तस् ँ४ स्वस्त्या. सं ब्रह्मणा देवकृतं यदस्ति सं देवाना ँ४ सुमतौ यज्ञियाना ँ४ स्वाहा.. (१५) हे इंद्र देव! आप हमें अच्छा मन, इष्ट गाएं व वीरता वाली भावना दीजिए. आप हमें कल्याणकारी भावनाओं से भरिए. आप ब्राह्मणों द्वारा देवताओं के लिए किए गए कार्यों के प्रति श्रेष्ठ बुद्धि से जोड़िए. यजमानों की ओर से भेंट की गई आहुति स्वीकार कीजिए. (१५) सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा स ँ४ शिवेन. त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोनुमार्ष्टु तन्वो यद्विलिष्टम्.. (१६) ९६ - यजुर्वेद 632/6

पूर्वार्ध आठवां अध्याय हम वर्चस्वी, दूधपूर्ण, श्रेष्ठ शरीर वाले मन से कल्याणकारी रहें. त्वष्टा देव! हमारे लिए धन धारिए. आप हमें धन दीजिए. आप हमें कष्ट विहीन करने की कृपा कीजिए. ( १६ ) धाता रातिः सवितेदं जुषन्तां प्रजापतिर्निधिपा देवो अग्निः. त्वष्टा विष्णुः प्रजया स १४ रराणा यजमानाय द्रविणं दधात स्वाहा.. (१७) हे सविता देव! आप धन धारणकर्ता हैं. हम आप के लिए यज्ञ करते हैं. प्रजापति निधिवान व पालक हैं. अग्नि, त्वष्टा देव विष्णु यजमान के लिए श्रेष्ठ संतान व धन धारने की कृपा करें. हम इन सब देवताओं के लिए आहुतियां भेंट करते हैं. ( १७ ) सुगा वो देवाः सदना ऽ अकर्म य ऽ आजग्मेद १४ सवनं जुषाणाः. भरमाणा वहमाना हवी १४ ष्यस्मे धत्त वसवो वसूनि स्वाहा.. (१८) हे देवो! यज्ञ सदन आप के लिए सुगम बना दिए हैं. आप आसानी से यज्ञ- सेवन करने का काम कर सकते हैं. आप के लिए पात्र हवि से भरे हैं. आप के लिए हवि वहन कर रहे हैं. आप हमारे लिए धन धारिए. ये सभी आहुतियां धन के लिए अर्पित हैं. ( १८ ) याँ २ आवह ऽ उशतो देव देवाँस्तान् प्रेरय स्वे अग्ने सधस्थे. जक्षिवा १४ सः पपिवा १४ सश्च विश्वेसुं घर्म १४ स्वरातिष्ठतानु स्वाहा.. (१९) हे अग्नि! आप ने जिन का आह्वान किया है, उन देवों को अपनेअपने स्थान पर प्रतिष्ठित करने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ में दी गई हवि सारे यज्ञ की आहुतियां ग्रहण करने की कृपा कीजिए. हम आप के लिए आहुतियां अर्पित करते हैं. ( १९ ) वय १४ हि त्वा प्रयति यज्ञे अस्मिन्नग्ने होतारमवृणीमहीह. ऋधगया ऽ ऋधगुताशमिष्ठाः प्रजानन् यज्ञमुपयाहि विद्वान्स्वाहा.. (२०) हे अग्नि! जिस यज्ञ के लिए आप को यहां आमंत्रित किया गया है, उसे आप ने अच्छी तरह पूरा किया. इसलिए अब ज्ञान संपन्न आप अपने स्थान की ओर प्रस्थान करते हुए यह आहुति स्वीकार करें. ( २० ) देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित. मनसस्पत ऽ इमं देव यज्ञ १४ स्वाहा वाते धाः.. (२१) हे देवतागण! आप यज्ञ के ज्ञाता हैं. आप अपने ज्ञात स्थान की ओर गमन कीजिए. आप मन के स्वामी हैं. इस यज्ञ में आप के लिए आहुति अर्पित करते हैं. आप हमारे लिए शुद्ध वायु धारिए. ( २१ ) यज्ञ यज्ञं गच्छ यज्ञपतिं गच्छ स्वां योनिं गच्छ स्वाहा. एष ते यज्ञो यज्ञपते सहसूक्तवाकः सर्ववीरस्तं जुषस्व स्वाहा.. (२२) यजुर्वेद - ९७

पूर्वार्ध आठवां अध्याय हे यज्ञ देव! आप यज्ञ की ओर जाइए. आप यज्ञपति को प्राप्त होइए. आप अपने मूल स्थान को जाइए. यह आप का यज्ञ है. आप यज्ञपति के पास जाइए. हम आप को आहुति भेंट करते हैं. हम हजारों वाणियों से आप की स्तुति करते हैं. आप सर्वाधिक वीर हैं. हम इस यज्ञ में आप के लिए आहुति अर्पित करते हैं. ( २२ ) माहिर्भूर्मा पृदाकुः. उरु १७ हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थामन्वेतवा उ. अपदे पादा प्रतिधातवेकरुतापवक्ता हृदयाविधश्चित्. नमो वरुणायाधिष्ठितो वरुणस्य पाशः.. ( २३) आप पृथ्वी पर अजगर के समान खतरनाक मत बनिए. सूर्य के प्रस्थान के लिए वरुण देव मार्ग को सुगम बनाने की कृपा करें. वरुण देव जहां पैर न रखे जा सकते हैं, वहां भी मार्ग बना देते हैं, प्रतिघात कर देते हैं. हृदय के कष्ट दूर करते हैं. उन के पाश दुष्टनाशी हैं. वे प्रतिष्ठित देव हैं. हमारा उन्हें नमन. ( २३ ) अग्नेरनीकमप ऽ आ विवेशापां नपात् प्रतिरक्षन्नसुर्यम्. दमेदमे समिधं यक्ष्यग्ने प्रति ते जिह्वा घृतमुच्चरण्यत् स्वाहा.. (२४) हे अग्नि! आप जल में प्रवेश कीजिए. ताकि जलधार नीचे न गिर पाए. आप असुरों से यज्ञ की रक्षा कीजिए. आप समिधा को ग्रहण करने की कृपा कीजिए. आप की जिह्वा यज्ञ का घी धारण करने के लिए प्रेरित हो. हम अग्नि के लिए आहुति अर्पित करते हैं. ( २४ ) समुद्रे ते हृदयमप्स्वन्तः सं त्वा विशन्त्वोषधीरुपताः. यज्ञस्य त्वा यज्ञपते सूक्तोक्तौ नमोवाके विधेम यत् स्वाहा.. (२५) हे सोम! आप का हृदय समुद्र व जलमय हैं. आप को हम वहां स्थापित करते हैं. आप की ओषधियां और जल हमारे लिए प्रवाहित होते रहें. हे यज्ञपति! हम आप के लिए सूक्त उच्चारते हैं. विधिविधानपूर्वक आहुति अर्पित करते हैं. आप के लिए नमन. ( २५ ) देवीराप ऽ एष वो गर्भस्त १७ सुप्रीत १७ सुभृतं बिभृत. देव सोमैष ते लोकस्तस्मिञ्छं च वक्ष्व परि च वक्ष्व.. (२६) हे दिव्य जल! यह सोमपात्र आप का गर्भ है. आप प्रेम से व इस का पोषण करते हुए ग्रहण करें. हे सोम! जल आप का लोक है. आप उस की इच्छा करिए. आप भी सुखी रहिए. हमें भी सुखी रखिए. संरक्षण दीजिए. ( २६ ) अवभृथ निचम्पुण निचेरुरसि निचम्पुणः. अव देवैर्देवकृतमेनोयासिषमव मर्त्यैर्मर्त्यकृतं पुरुराव्णो देव रिषस्पाहि. देवाना १७ समिदसि.. (२७) ९८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध आठवां अध्याय हे अवभृथ ( स्नान यज्ञ ) ! आप निचोड़ने व निरंतर बहने वाले हैं. आप दैवकृपा से देवों के प्रति हमारे पाप दूर करने की कृपा कीजिए. आप मनुष्यों के प्रति किए गए हमारे पापों को दूर करने की कृपा कीजिए. आप परेशान करने वाले शत्रुओं को दूर करने की कृपा कीजिए. आप की कृपा से देवत्व बढ़ता है. ( २७ ) एजतु दशमास्यो गर्भो जरायुणा सह. यथायं वायुरेजाति यथा समुद्र ऽ एजति. एवायं दशमास्यो अस्रज्जरायुणा सह.. ( २८) दस माह के गर्भ के जरायु के साथ जाइए. जैसे यह वायु जाती है, जैसे यह समुद्र जाता है, वैसे ही आप दस मास के जरायु के साथ उत्पन्न हुए. ( २८ ) यस्यै ते यज्ञियो गर्भो यस्यै योनिर्हिरण्ययी. अङ्गान्यहुता यस्य तं मात्रा समजीगम १७ स्वाहा.. (२९) हे देवी! इसी से आप का गर्भ यज्ञ से संबंधित भावनाएं रखने वाला है. आप की योनि इसी से स्वर्गमयी है. अंग अग्नि की तरह पवित्र हैं. मंत्रों से आप का पवित्र समागम होता है. आप के लिए यह आहुति समर्पित है. ( २९ ) पुरुदस्मो विषुरूप ऽ इत्दुरन्तर्महिमानमानञ्ज धीरः. एकपदीं द्विपदीं त्रिपदीं चतुष्पदीमष्टापदीं भुवनानु प्रथन्ता १७ स्वाहा.. (३०) गर्भ दानी रूपवान, बुद्धिमान, महिमावान और धीर है. एक पद वाली, दो पद वाली, तीन पद वाली, चार पद वाली, आठ पद वाली, प्रार्थनाएं भुवनों में प्रसारित हों. आप के लिए यह आहुति समर्पित है. ( ३० ) मरुतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो विमहसः. स सुगोपातमो जनः.. (३१) हे मरुद्गण! आप दिव्य व विशिष्ट हैं. आप लोगों के कष्ट दूर करते हैं. आप लोगों की गायों के अच्छे रक्षक हैं. ( ३१ ) मही द्यौः पृथिवी च न ऽ इमं यज्ञं मिमिक्षताम्. पिपृतां नो भरीमभिः.. (३२) महान् पृथ्वी, स्वर्गलोक इस यज्ञ की रक्षा करने की कृपा करें. धन पिपासुओं ( प्यासों ) को भरपूर धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( ३२ ) आ तिष्ठ वृत्रहन्न्रथं युक्ता ते ब्रह्मणा हरी. अर्वाचीन १७ सु ते मनो ग्रावा कृणोतु वग्नुना. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने.. (३३) हे इंद्र देव! आप वृत्रनाशक हैं. आप के घोड़े संकेत मात्र से चलने वाले हैं. आप अपने ब्रह्मज्ञानी घोड़ों को रथ में जोतिए. प्राचीन सोम को पत्थर से कूटने पर यजुर्वेद - ९९

पूर्वार्ध आठवां अध्याय

पूर्वार्ध आठवां अध्याय होने वाली ध्वनियों से आप का मन यज्ञ की ओर आकर्षित हो. हे सोम! आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप सोलह कलाओं वाले हैं. आप को इंद्र देव के लिए इस पात्र में लिया गया है. सोलह कलाओं वाले इंद्र देव के लिए आप को इस पात्र में ग्रहण किया गया है. ( ३३ ) युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा. अथा न ऽ इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने.. (३४) हे इंद्र! आप हरि नामक घोड़े हैं. आप शत्रुनाशी हैं. तेज गति वाले घोड़े आप को मनुष्यों के यज्ञ में लेने आते हैं. यजमान ऋषियों की श्रेष्ठ प्रार्थनाओं से आप की उपासना करते हैं. सोमरस को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. यह इंद्र देव के लिए मूल स्थान है. वे सोलह कलाओं वाले हैं. हम सोलह कलाओं वाले इंद्र के लिए आप को ग्रहण करते हैं. ( ३४ ) इन्द्रमिद्धरी वहतोप्रतिधृष्टशवसम्. ऋषीणां च स्तुतीरुप यज्ञं च मानुषाणाम्. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने.. (३५) हे इंद्र! आप शत्रुओं का नाश करने वाले और सोम पीने वाले हैं. तेज गति वाले दो घोड़े आप को यज्ञ स्थल तक ले जाते हैं. हे सोम! आप कलश में ग्रहण करने योग्य हैं. यह आप का आश्रय स्थल है. इसलिए हम सोलह कलाओं वाले इंद्र की प्रसन्नता हेतु आप को ग्रहण करते हैं. ( ३५ ) यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति य ऽ आविवेश भुवनानि विश्वा. प्रजापतिः प्रजया स १४ रराणस्त्रीणि ज्योति १४ षि सचते स षोडशी.. (३६) इंद्र देव से परम श्रेष्ठ और कोई देव नहीं है. वे सभी लोकों में व्यापक हैं. प्रजापति प्रजा के साथ रमण करते हैं. वे सोलह कलाओं वाले हैं. तीनों ज्योतियों को अपने में धारे हुए हैं. ( ३६ ) इन्द्रश्च सम्राड् वरुणश्च राजा तौ ते भक्षं चक्रतुरग्र ऽ एतम्. तयोरहमनु भक्षं भक्षयामि वाग्देवी जुषाणा सोमस्य तृप्यतु सह प्राणेन स्वाहा.. (३७) इंद्र सम्राट् हैं. वरुण देव राजा हैं. वे दोनों देव पहले भोग लगाते हैं. उस के बाद हम उस सामग्री का सेवन करते हैं. वाग् देवी प्राण के साथ जुड़ कर सोमरस तृप्ति देने की कृपा करें. हम उन के लिए आहुति भेंट करते हैं. ( ३७ ) अग्ने पवस्व स्वपा ऽ अस्मे वर्चः सुवीर्यम्. दधद्रयिं मयि पोषम्. १०० - यजुर्वेद

पूर्वार्ध आठवां अध्याय उपयामगृहीतोस्यग्नये त्वा वर्चस ऽ एष ते योनिरग्नये त्वा वर्चसे. अग्ने वर्चस्विन्वर्चस्वाँस्त्वं देवेष्वसि वर्चस्वानहं मनुष्येषु भूयासम्.. (३८) हे अग्नि! आप अपना काम करने में कुशल व पवित्र हैं. आप हमें पूरा वर्चस्व दीजिए. आप हमें श्रेष्ठ वीर्यवान बनाइए. आप हमारे लिए धन धारिए. आप हमें पोषण दीजिए. हे सोम! आप को अग्नि के लिए कलश में ग्रहण करते हैं. हम वर्चस्व के लिए आप को ग्रहण करते हैं. यह आप का मूल स्थान है. आप वर्चस्वियों में वर्चस्ववान देव हैं. हमें भी इसी तरह मनुष्यों में बारबार वर्चस्वी बनाइए. ( ३८ ) उत्तिष्ठन्नोजसा सह पीत्वी शिप्रे अवेपयः. सोममिन्द्र चमू सुतम्. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वौजस ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वौजसे. इन्द्रौजिष्ठौजिष्ठस्त्वं देवेष्वस्योजिष्ठोऽहं मनुष्येषु भूयासम्.. (३९) हे इंद्र देव! आप ओज के साथ उठिए. आप सुंदर ठोड़ी वाले हैं. आप इस पेय का पान कीजिए. हे सोम! इंद्र के लिए आप को चुआ रहे हैं. सोम को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. यह इंद्र देव का मूल निवास है. हम ओज के लिए आप को ग्रहण करते हैं. इंद्र देव ओजवान हैं. वे देवताओं में ओजवान हैं, वैसे ही हम मनुष्यों में ओजवान हो जाएं. ( ३९ ) अदृश्रमस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ २ अनु. भ्राजन्तो अग्नयो यथा. उपयामगृहीतोसि सूर्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजाय. सूर्य भ्राजिष्ठ भ्राजिष्ठस्त्वं देवेष्वसि भ्राजिष्ठोहं मनुष्येषु भूयासम्.. (४०) अदृश्य रश्मियों ( किरणों ) की अग्निपताका अनुकरण करती है. वह मनुष्यों को नहीं दिखाई देती है. आप को सूर्य के लिए कलश में ग्रहण किया है. आप चमकते रहिए. कलश आप का मूल स्थान है. सूर्य प्रकाशमान है. वह देवों में प्रकाशमान है, वैसे ही हम मनुष्यों में प्रकाशमान हो जाएं. ( ४० ) उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः. दृशे विश्वाय सूर्यम्. उपयामगृहीतोसि सूर्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजाय.. (४१) ये सूर्य की किरणें विश्वविख्यात हैं. ये दिव्यता वहन करती हैं. सूर्य की किरणें सारे संसार को दृष्टि प्रदान करती हैं. हे सोम! आप को कलश में ग्रहण किया है. आप को प्रकाशमान सूर्य के लिए ग्रहण किया है. यही आप का मूल स्थान है. आप सूर्य के लिए प्रकाशित होइए. ( ४१ ) यजुर्वेद - १०१

पूर्वार्ध आठवां अध्याय आजिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः. पुनरूर्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः.. (४२) हे महिमाशालिनी! आप इस कलश को पूरी तरह सूंघिए. इस के सोम आदि आप में प्रवेश करें. आप पुनः उस ऊर्जा को लौटाइए. वह ऊर्जा हमें हजारों धाराओं के रूप में मिले. हमें दुधारी गाएं व धन मिलें. (४२) इडे रन्ते हव्ये काम्ये चन्द्रे ज्योते ऽदिते सरस्वति महि विश्रुति. एता ते अघ्न्ये नामानि देवेभ्यो मा सुकृतं ब्रूतात्.. (४३) हे गोमाता! आप हवन में काम्य हैं. आप चंद्रमा और सूर्य की ज्योति की तरह हैं. आप सरस, पृथ्‍वी पर विख्यात व वध योग्य नहीं हैं. आप हमारे नाम से अच्छी वाणी से देवताओं को बुलाने के लिए बोलिए. (४३) वि न ऽइन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः. यो अस्माँ २ अभिदासत्यधरं गमया तमः. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा विमृध ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा विमृधे.. (४४) हे इंद्र देव! आप हमारे शत्रुओं व नीचों को मारिए. जो हमें दासता और अंधकार देना चाहते हैं. आप उन्हें अंधकार में ले जाइए. आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप यहां स्थित रहिए. यह आप का मूल स्थान है, आप यहां स्थित रहिए. (४४) वाचस्पतिं विश्वकर्माणमूतये मनोजुवं वाजे अद्या हुवेम. स नो विश्वानि हवनानि जोषद्विश्वशम्भूरवसे साधुकर्मा. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा विश्वकर्मण ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे.. (४५) हे वाचस्पति! आप विश्व के कर्मों के सर्जक हैं. आप मन जैसे हैं. आज हम जो अन्न हवन कर रहे हैं. उसे स्वीकारिए. आप सज्जनता भरे काम करते हैं. आप विश्व का भरणपोषण करते हैं. आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया है. आप को विश्वकर्मा के लिए कलश में ग्रहण किया है. यह आप का मूल स्थान है. आप को विश्वकर्मा इंद्र देव के लिए समर्पित किया जाता है. (४५) विश्वकर्मन् हविषा वर्धनेन त्रातारमिन्द्रमकृणोरवध्यम्. तस्मै विशः समनमन्त पूर्वीरयमुरो विहव्यो यथासत्. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा विश्वकर्मण ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे.. (४६) हे विश्वकर्मा! हम हवि से आप की बढ़ोतरी करते हैं. आप दुःख दूर करने वाले हैं. आप यज्ञ के कर्ताधर्ता, अपूर्व, उग्र व विशेष आदरणीय हैं. हम आप का विशेष १०२ – यजुर्वेद

पूर्वार्ध आठवां अध्याय आह्वान करते हैं. आप को इंद्र देव व विश्वकर्मा के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. यह आप का मूल स्थान है. आप को विश्वकर्मा के लिए स्थापित किया जाता है. ( ४६ ) उपयामगृहीतोस्यग्नये त्वा गायत्रच्छन्दसं गृह्णामीन्द्राय त्वा त्रिष्टुप्छन्दसं गृह्णामि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यो जगच्छन्दसं गृह्णाम्यनुष्टुप्तेभिगरः.. (४७) आप को इस अग्नि के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. हम इंद्र देव के लिए गायत्री छंद से आप को ग्रहण करते हैं. हम आप को त्रिष्टुप् छंद से ग्रहण करते हैं. हम आप को सभी देवों के लिए ग्रहण करते हैं. हम आप को सभी देवों के लिए जगती छंद से ग्रहण करते हैं. हम आप के प्रति अनुष्टुप् छंद में वाणीमय स्तुति करते हैं. ( ४७ ) व्रेेशीनां त्वा पत्मन्ना धूनोमि कुकूननानां त्वा पत्मन्ना धूनोमि भन्दनानां त्वा पत्मन्ना धूनोमि मदिन्तमानां त्वा पत्मन्ना धूनोमि मधुन्तमानां त्वा पत्मन्ना धूनोमि शुक्रं त्वा शुक्र ऽ आ धूनोम्यह्नो रूपे सूर्यस्य रश्मिषु.. (४८) हे सोम! हम जल बरसाने के लिए आप को कंपाते हैं. हम संसार के कल्याण के लिए आप को कंपाते हैं. हम मेघों के जल के लिए आप को कंपाते हैं. आप आनंददायी हैं. हम जल बरसाने के लिए आप को कंपाते हैं. आप मधुमान ( मधुरता से लबालब भरे हुए हैं ). हम आप को मधु ( मधुरता ) बरसाने के लिए कंपाते हैं. आप प्रकाशमान हैं. हम प्रकाश की वर्षा के लिए आप को कंपाते हैं. हम दिन स्वरूप सूर्य की किरणों के लिए आप को कंपाते हैं. ( ४८ ) ककुभ ४९ रूपं वृषभस्य रोचते बृहच्छुक्रः शुक्रस्य पुरोगाः सोमः सोमस्य पुरोगाः. यत्ते सोमादाभ्यं नाम जागृवि तस्मै त्वा गृह्णामि तस्मै ते सोम सोमाय स्वाहा.. (४९) सोम बलवान, प्रकाशमान, विशाल व प्रकाश के आगे गमन करने वाले हैं. सोम सोम के आगे गमन करने वाले अभयदाता व जाग्रत हैं. हम आप को ग्रहण करते हैं. इसीलिए हे सोम! हम आप के लिए आहुति भेंट करते हैं. ( ४९ ) उशिक् त्वं देव सोमाग्नेः प्रियं पाथोपीहि वशी त्वं देव सोमेन्द्रस्य प्रियं पाथोपीह्यस्मत्सखा त्वं देव सोम विश्वेषां देवानां प्रियं पाथोपीहि.. (५०) हे सोम! आप अग्नि का ( मन भाता ) आहार बनिए. आप पथ के भोजन के रूप में प्राप्त होइए. आप वंशवर्ती व सोम के प्रिय हैं. हे सोम! आप हमारे मित्र, आप सभी को प्रिय व सब के लिए तृप्तिदायी हैं. ( ५० ) इह रतिरिह रमध्वमिह धृतिरिह स्वधृतिः स्वाहा. उपसृजन् धरुणं मात्रे धरुणो मातरं धयन्. रायस्पोषमस्मासु दीधरत् स्वाहा.. (५१) यजुर्वेद - १०३

पूर्वार्ध आठवां अध्याय हे गौओ! इन यज्ञ करने वालों के प्रति आप की प्रीति बनी रहे. घी से भरी हुई यह आहुति आप के लिए अर्पित है. आप इसे अपने लिए धैर्य से ग्रहण कीजिए. जगत् को धारण करने वाली पृथ्वी माता के लिए जल धारण करें और उन के लिए उस जल को बरसाएं. आप हमारे लिए पौष्टिक धन धारिए. आप के लिए स्वाहा. (५१) सत्रस्य ऋद्धिरस्यगन्म ज्योतिरमृता ऽ अभूम. दिवं पृथिव्या ऽ अध्यारुहामाविदाम देवान्त्स्वर्ज्योति:... (५२) हे सोम! आप यज्ञ की समृद्धि करने वाले हैं. आप की कृपा से हम प्रकाशित हों. आप की कृपा से हम अमरता पाएं. पृथ्वी से स्वर्गलोक तक आरोहण करें. हम देवताओं के ज्योतिर्मय लोक को देखने में समर्थ हों. (५२) युवं तमिन्द्रापर्वता पुरोयुधा यो नः पृतन्यादप तं तमिद्धतं वज्रेण तं तमिद्धतम्. दूरे चत्ताय छन्तसद्गहनं यदिनक्षत्. अस्माक १४ शत्रून्परि शूर विश्वतो दर्मा दर्षीष्ट विश्वतः. भूर्भुवः स्वः सुप्रजाः प्रजाभिः स्याम सुवीरा वीरैः सुपोषः पोषैः.. (५३) हे इंद्र देव! आप युवा, पर्वतवासी व श्रेष्ठ योद्धा हैं. आप शत्रुओं को पूरी तरह तपाइए और उन पर वज्र से प्रहार करिए. आप हमें शत्रुओं द्वारा घेरे जाने व छिपाए जाने से दूर ही रखिए. आप हमारे शत्रुओं पर सब ओर से आक्रमण कीजिए. आप पृथ्वी, स्वर्ग आदि सब जगह व्याप्त हैं. आप हमें अच्छी व श्रेष्ठ पराक्रमी संतान दीजिए. हमें वीर बनाइए और अच्छी तरह पुष्ट कीजिए. (५३) परमेष्ठ्यभिधीतः प्रजापतिर्वाचि व्याहृतायामन्धो अच्छेतः. सविता सन्यां विश्वकर्मा दीक्षायां पूषा सोमक्रयण्यामिन्द्रश्च.. (५४) परमेष्ठी नामक यज्ञ में प्रजापति के लिए मंत्र से आहुति दी जा रही है. सोम के लिए अंधसा नामक मंत्र से आहुति दीजिए. सविता देव के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. विश्वकर्मा देव के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. पूषा देव के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. (५४) इन्द्रश्च मरुतश्च क्रयायोपोत्थितोसुरः पण्यमानो मित्रः क्रीतो विष्णुः शिपिविष्ट ऽ ऊरावासन्नो विष्णुर्न्रन्धिषः.. (५५) खरीद के लिए इंद्र और मरुत् को उन के नाम से आहुति दीजिए. खरीद के लिए असुर के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. खरीदे हुए मित्र के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. गोद में बैठे विष्णु के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. अरु पर बैठे विष्णु के लिए नरंधिष मंत्र से आहुति दीजिए. (५५) प्रोह्यमाणः सोम ऽ आगतो वरुण ऽ आसन्द्यामासन्नोग्निराग्नीध्र ऽ इन्द्रो हविर्धाने थर्वोपावहियमाणः.. (५६) १०४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध आठवां अध्याय गाड़ी से लाए जाने वाले और आसन पर बैठे हुए सोम हेतु उन के नाम से आहुति दीजिए. अगिंध में स्थित सोम के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. इंद्र देव के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए अथवा नाम से ले जाए जा रहे सोम के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. (५६) विश्वे देवा ऽ अ १४ शुषु न्युप्तो विष्णुराप्रीतपा ऽ आप्याय्यमानो यमः सूयमानो विष्णुः सम्भ्रियमाणो वायुः पूयमानः शुक्रः पूतः शुक्रः क्षीरश्रीर्मन्थी सक्तुश्रीः.. (५७) विश्वे देव को उन के नाम से आहुति दीजिए. हमारे प्रति प्रेम रखने वाले और पालनहार विष्णु को उन के नाम से आहुति दीजिए. सोम से सींचे जा रहे यम को उन के नाम से आहुति दीजिए. सोम से अभिषिक्त किए जा रहे विष्णु को उन के नाम से आहुति दीजिए. पवित्र किए जा रहे वायु को उन के नाम से आहुति दीजिए. पवित्र शुक्र के लिए नाम से आहुति दीजिए. दूध में गूंधे हुए सोम के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. सत्तू मिला कर तैयार किए हुए सोम के लिए उन के नाम से आहुति दे कर शोभा बढ़ाइए. (५७) विश्वे देवाश्चमसेषूनीतोसुर्होमायोद्यतो रुद्रो हूयमानो वातोभ्यावृत्तो नृचक्षाः प्रतिख्यातो भक्षो भक्ष्यमाणः पितरो नाराश १४ साः.. (५८) विश्वे देव के लिए चमस में रख कर आहुति दीजिए. मायावी असुर के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. रुद्र के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. घिर जाने पर वात देव के नाम से आहुति दीजिए. नृचक्ष के लिए उस के नाम से आहुति दीजिए. खाने से बचे हुए सोम हेतु उस के नाम से आहुति दीजिए. (५८) सन्नः सिन्धुरवभृथायोद्यतः समुद्रोभ्यवहियमाणः सलिलः प्रप्लुतो ययोरोजसा स्कभिता रजा १४ सि वीर्यैर्भीवीरतमा शविष्ठा. या पत्येते अप्रतीता सहोभिर्विष्णू अगन्वरुणा पूर्वहूतो.. (५९) स्नान के लिए तैयार (उद्यत) सोम सिंधु है. उन्हें उन के नाम से आहुति दीजिए. समुद्र (घड़े) में रखे हुए सोम के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. जल में व्याप्त सोम को उन के नाम से आहुति दीजिए. जिन दोनों देवों (वरुण-विष्णु) के ओज से ओजवान हैं, उन्हें उन के नाम से आहुति दीजिए. जिन के पराक्रम से पराक्रमी हैं. जिन की क्षमता से सामर्थ्यवान हैं, यज्ञ में प्रथम आहुति पाने वाले देवों के लिए यह आहुति अर्पित की जा रही है. (५९) देवान्दिवमगन्द्यज्ञस्ततो मा द्रविणमष्टु मनुष्यानन्तरिक्षमगन्द्यज्ञस्ततो मा द्रविणमष्टु पितॄन्पृथिवीमगन्द्यज्ञस्ततो मा द्रविणमष्टु यं कं च लोकमगन्द्यज्ञस्ततो मे भद्रमभूत्.. (६०) जो यज्ञ स्वर्ग में देवों के पास जाता है, वह यज्ञ (फल) हमें प्राप्त कराइए. हमें इष्ट द्रव्य (धन) प्राप्त कराइए. अंतरिक्ष को मिलने वाला यज्ञ फल मनुष्यों यजुर्वेद - १०५

पूर्वार्ध आठवां अध्याय को प्राप्त कराइए. पितरों और पृथ्वी वाला यज्ञ फल मनुष्यों को प्राप्त कराइए. इष्ट धन प्राप्त कराइए. जोजो यज्ञ फल जिसजिस लोक में गया है, उस से हमारा कल्याण हो. ( ६० ) चतुस्त्रि ᳵ शतन्तवो ये वितत्निरे य ऽ इमं यज्ञं ᳵ स्वधया ददन्ते. तेषां छिन्न ᳵ सम्वेतद्दधामि स्वाहा घर्मो अप्येतु देवान्.. ( ६१ ) चौंतीस देव जो इस यज्ञ का विस्तार करते हैं, जो यजमानों को पौष्टिक पदार्थ प्रदान करते हैं, उन देवताओं के लिए ये आहुतियां अर्पित हैं. यज्ञ जैसे कार्यों से हम जो धन धारण करते हैं, वह हम ऐसे ही शुभ कार्यों में खर्च करते हैं. यह आहुति देवों को तृप्त प्रसन्न करने की कृपा करे. ( ६१ ) यज्ञस्य दोहो विततः पुरुत्रा सो अष्टधा दिवमन्वाततान. स यज्ञ धुक्ष्व महि मे प्रजाया ᳵ रायस्पोषं विश्वमायुरशीय स्वाहा.. ( ६२ ) हम यज्ञ का दोहन व उस का विस्तार करें. वह सभी का दुःख दूर करें. यह यज्ञ आठ प्रकार से ( संपूर्ण ब्रह्मांड में ) विस्तार पाए. यह यज्ञ स्वर्गलोक तक विस्तृत हो. यह यज्ञ हमें श्रेष्ठ संतान प्रदान करे. यह यज्ञ हमें धन प्रदान करे. यह यज्ञ हमें पोषकता दे. यह यज्ञ हमें पूर्णायु प्रदान करे. इस यज्ञ हेतु यह आहुति अर्पित है. ( ६२ ) आ पवस्व हिरण्यवदश्ववत्सोम वीरवत्. वाजं गोमन्तमा भर स्वाहा.. ( ६३ ) हे सोम! आप आइए. आप इस यज्ञ को पवित्र करने की कृपा कीजिए. आप हमें सोना, घोड़े, गौ, धन आदि भरपूर वैभव दीजिए. आप के लिए हम यह आहुति अर्पित करते हैं. ( ६३ ) १०६ – यजुर्वेद

नौवां अध्याय

नौवां अध्याय देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञपतिं भगाय. दिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतं नः पुनातु वाचस्पतिर्वाजं नः स्वदतु स्वाहा.. (१) हे सविता! हम आप की कृपा से इस यज्ञ को विधिवत पूरा करें. आप यज्ञपति को सौभाग्यवान बनाने की कृपा कीजिए. आप की किरणें दिव्य हैं. आप उन किरणों से हमारे अन्न को पवित्र कीजिए. हमारा वह अन्न वाचस्पति देव को भी बलवान बनाने वाला हो. वाचस्पति देव के लिए स्वाहा. वह अन्न हमें भी स्वादिष्ट लगे. ( १ ) ध्रुवसदं त्वा नृषदं मनःसद्मुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टमम्. अप्सुषदं त्वा घृतसदं व्योमसद्मुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टमम्. पृथिविसदं त्वान्तरिक्षसदं दिविसदं देवसदं नाकसदमुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टमम्.. (२) हे सोम! आप ध्रुव ( स्थिर ) रूप से प्रतिष्ठा प्राप्त हैं. आप मनुष्यों के मन में रमते हैं. आप इंद्र देव की योनि हैं. इंद्र देव भी आप को ग्रहण करते हैं. आप उपयाम ( पात्र ) में पधारिए. आप सर्वाधिक चाहे गए देव हैं. आप जल, घी व व्योम ( आकाश ) में वास करते हैं. हम आप को इंद्र के लिए ग्रहण करते हैं. आप इंद्र देव की योनि व इष्टतम हैं. आप बरतन में पधारने की कृपा कीजिए. आप पृथ्वी, अंतरिक्ष व स्वर्गलोक में निवास करते हैं. आप देवों के योग्य हैं. आप सोम को इंद्र देव के लिए ग्रहण करते हैं. आप इंद्र देव की योनि और आप इष्टतम हैं. ( २ ) अपा ँश रसमुद्वयस ँश सूर्ये सन्त ँश समाहितम्. अपा ँश रसस्य यो रसस्तं वो गृह्णाम्युत्तममुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टमम्.. (३) हे सोम! आप जल और रसों के सार, सूर्य में समाए व जल के सार के भी सार हैं. उस रस को हम पात्र में ग्रहण करते हैं. हम आप को इंद्र देव के लिए बरतन में ग्रहण यजुर्वेद - १०७

पूर्वार्ध नौवां अध्याय करते हैं. हम आप को वायु के लिए बरतन में ग्रहण करते हैं. आप इंद्र देव के इष्टतम और इंद्र की योनि हैं. हम यजमान इंद्र देव के लिए आप को ग्रहण करते हैं. ( ३ ) ग्रहा ऽ ऊर्जाहुतयो व्यन्तो विप्राय मतिम्. तेषां विशिप्रियाणां वोहमिषमूर्ज ꣳ समग्रभमुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम्. सम्पृचौ स्थः सं मा भद्रेण पृङ्क्तं विपृचौ स्थो वि मा पाप्मना पृङ्क्तं.. (४) हे सोम और सोमरस के पात्रो! हम ऊर्जा पाने के लिए आप का आह्वान करते हैं. आप ब्राह्मणों की बुद्धि विस्तृत करते हैं. आप यजमानों के लिए ऊर्जस्वी रस को भलीभांति स्थापित करते हैं. हम आप दोनों को इंद्र देव के लिए उपयाम पात्र में स्थापित करते हैं. आप इंद्र देव की योनि हैं. आप दोनों इंद्र देव के अभीष्ट हैं. आप दोनों संपृक्त ( साथसाथ ) रह कर हमारा कल्याण व हमें सुख प्रदान कीजिए. आप दोनों पृथक् ( अलग ) रह कर हमें पापों से दूर करने की कृपा कीजिए. ( ४ ) इन्द्रस्य वज्रोसि वाजसास्त्वयायं वाज ꣳ सेत्. वाजस्य नु प्रसवे मातरं महीमदितिं नाम वचसा करामहे. यस्यामिदं विश्वं भुवनमाविवेश तस्यां नो देवः सविता धर्म ꣳ साविषत्.. (५) आप इंद्र देव के वज्र और अन्नमय हैं. आप से यजमान को भी अन्न प्राप्त हो. हम अपनी ( मंत्रमय ) वाणी से धरती को अन्न उपजाने के लिए प्रेरित करते हैं. पृथ्वी को देवों की माता अदिति के समान प्रेरित करते हैं. सारा संसार ( लोक ) सविता देव के वश में है. सविता हमें धार्मिक बनाएं. वे हमें गतिशील बनाने की कृपा करें. ( ५ ) अप्सवन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तिष्वश्वा भवत वाजिनः. देवीरापो यो व ऽ ऊर्मिः प्रकूर्त्तिः ककुन्मान् वाजसास्तेनायं वाज ꣳ सेत्.. (६) जल के भीतर अमृत व ओषधियां हैं. हम उन का सेवन कर के घोड़े की तरह बलवान हो जाएं. हे जल समूह! आप की तरंगें ऊंची हैं और लहरें वेगशाली हैं. आप की ऊंचीऊंची तरंगें हमें अन्न प्रदान करने की कृपा करें. ( ६ ) वातो वा मनो वा गन्धर्वाः सप्तवि ꣳ शतिः. ते अग्रेऽश्वमयुञ्जँस्ते अस्मिञ्जवमादधुः.. (७) वायु, मन, गंधर्व आदि ने पहले ही सात से तिगुने यानी सत्ताईस घोड़े अपने साथ जोत लिए हैं. वे आगेआगे ( जल्दीजल्दी ) आ कर हमारे यज्ञ की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. ( ७ ) वातर ꣳ हा भव वाजिन्युज्यमान ऽ इन्द्रस्येव दक्षिणः श्रियैधि. युञ्जन्तु त्वा मरुतो विश्ववेदस ऽ आ ते त्वष्टा पत्सु जवं दधातु.. (८) १०८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध नौवां अध्याय

पूर्वार्ध नौवां अध्याय हे अग्नि! आप बलवान हैं. आप रथ में जुत कर वायु की तरह वेगवान बन जाइए. आप इंद्र देव के दक्षिणी भाग की शोभा बढ़ाने की कृपा कीजिए. आप को मरुद्गण रथ में जोतने की कृपा करें. त्वष्टा देव! आप पैरों में बल धारण कीजिए. ( ८ ) जवो यस्ते वाजिन्निहितो गुहा यः श्येने परीत्तो अचरच्च वाते. तेन नो वाजिन् बलवान् बलेन वाजजिच्च भव समने च पारयिष्णुः. वाजिनो वाजजितो वाज ँ४ सरिष्यन्तो बृहस्पतेर्भागमवजिघ्रत.. (९) हे बलशाली! आप हमें भी अपने बल से बलवान बनाइए. हमें अपना वह वेग दे दीजिए जो आप के हृदय में है, श्येन पक्षी के उड़ने में है और वायु की गति में है. आप हमें बलवान बनाइए ताकि हम शत्रुओं के पार जा सकें. हे अन्न जीतने वाले! आप हमें बलदायी अन्न दीजिए. हम अन्न की चाह से बृहस्पति के भाग को सूंघ सकें. ( ९ ) देवस्याह ँ४ सवितुः सवे सत्यसवसो बृहस्पतेरुत्तमं नाक ँ४ रुहेयम्. देवस्याह ँ४ सवितुः सवे सत्यसवस ऽ इन्द्रस्योत्तमं नाक ँ४ रुहेयम्. देवस्याह ँ४ सवितुः सवे सत्यप्रसवसो बृहस्पतेरुत्तमं नाकमरुहम्. देवस्याह ँ४ सवितुः सवे सत्यप्रसवस ऽ इन्द्रस्योत्तमं नाकमरुहम्.. (१०) सविता देव की कृपा से हम सत्य मार्ग पर चल सकें. बृहस्पति के उत्तम स्वर्ग का आरोहण कर सकें. सविता देव की कृपा से हम सत्य मार्ग पर चल सकें. इंद्र देव के उत्तम स्वर्ग का आरोहण कर सकें. सत्य उपजाने वाले सविता देव की कृपा से हम बृहस्पति के श्रेष्ठ स्वर्ग में चढ़ गए. सत्य उपजाने वाले सविता देव की कृपा से इंद्र देव के श्रेष्ठ स्वर्ग में चढ़ गए. ( १० ) बृहस्पते वाजं जय बृहस्पतये वाचं वदत बृहस्पतिं वाजं जापयत. इन्द्र वाजं जयेन्द्राय वाचं वदतेन्द्रं वाजं जापयत.. (११) हे बृहस्पति! आप विजय पाइए. हे यजमानो! आप बृहस्पति देव के लिए मंत्र गाइए. आप व बृहस्पति देव को और अधिक बल मिल सके, इस के लिए जप कीजिए. हे इंद्र देव! आप विजय पाइए. हे यजमानो! आप इंद्र देव के लिए मंत्र गाइए. इंद्र देव को और अधिक बल मिल सके, इस के लिए आप जप कीजिए. ( ११ ) एषा वः सा सत्या संवागभूद्यया बृहस्पतिं वाजमजीजपताजीजपत बृहस्पतिं वाजं वनस्पतयो विमुच्यध्वम्. एषा वः सा सत्या संवागभूद्ययेन्द्रं वाजमजीजपताजीजपतेन्द्रं वाजं वनस्पतयो विमुच्यध्वम्.. (१२) हे वादको, वाद्य यंत्र बजाने वालो! आप एक साथ ऐसा स्वर निकालिए, जिस यजुर्वेद - १०९

पूर्वार्ध नौवां अध्याय से बृहस्पति देव की विजय हो. हे वनस्पतियो! हे वन के स्वामी! आप अपने घोड़े आदि छोड़ दीजिए. जिस से इंद्र देव की विजय हो सके. इस विजय के बाद हे सेनापतियो! आप घोड़े, हाथी आदि को आराम देने की कृपा कीजिए. ( १२ ) देवस्याह १४ सवितुः सवे सत्यप्रसवसो बृहस्पतेर्वाजजितो वाजं जेष्म्. वाजिनो वाजजितोध्वन स्कम्भुवन्तो योजना मिमानाः काष्ठां गच्छत.. (१३) सविता देव! सत्य मार्ग के प्रेरक व सभी को प्रकाशित करने वाले हैं. युद्ध में विजयी होने वाले बृहस्पति देव का बल पा कर हम भी युद्ध में विजय पाएं. हमारे बलशाली घोड़े बहुत वेगवान हैं. उन की कृपा से हम युद्ध में विजय पाते हैं. हम शत्रुओं का मार्ग रोक कर इन्हीं घोड़ों के कारण कोसों की दूरी नापते हैं. सीमा के पार पहुंच सकते हैं. ( १३ ) एष स्य वाजी क्षिपणिं तुरण्यति ग्रीवायां बद्धो अपिकक्ष ऽ आसनि. क्रतुं दधिक्रा ऽ अनु स १४ सनिष्यदत्पथामङ्का १४ स्यन्वापनीफणत् स्वाहा.. (१४) गरदन से लगाम, जीन आदि से बंधा हुआ यह घोड़ा वेग से चलता है. यह रास्ते की सभी बाधाओं को पार कर लेता है. यह यज्ञ का अनुकरण और घोड़े पर बैठा वीर शत्रुओं पर ( सफलता से ) प्रहार करता है. इस ( अश्व ) के लिए स्वाहा. ( १४ ) उत स्मास्य द्रवतस्तुरण्यतः पर्णं न वेरनुवाति प्रगर्धिनः. श्येनस्येव ध्रजतो अङ्कसं परि दधिक्राव्णः सहोर्जा तरित्रतः स्वाहा.. (१५) हे यजमानो! जो पराक्रमी है, जो तीर की तरह वेगवान है, जो घोड़े की तरह वेगशाली है, जो सत्यवादी है, जो बाज पक्षी की तरह वेगवान है, जिस घोड़े पर बैठ कर वीर युद्धों में शत्रुओं पर विजय पाता है, यह आहुति उसी के लिए समर्पित है. ( १५ ) शं नो भवन्तु वाजिनो हवेषु देवताता मितद्रवः स्वर्काः. जम्भयन्तोहिं वृक १७ रक्षा १७ सि सनेम्यस्मद्युयवनमीवाः... (१६) बलवान घोड़े हमारे लिए सुखदायी हों. वे दैवी आहुतियों में और भी सुशोभित हों. ये घोड़े भेड़ियों की तरह आक्रमण करने वाले शत्रुओं को दूर करने की कृपा करें. सांप जैसे विश्वासघातियों से हमारी रक्षा करें. विघ्न करने वालों को हम से दूर करने की कृपा करें. ( १६ ) ते नो अर्वन्तो हवनश्रुतो हवं विश्वे शृण्वन्तु वाजिनो मितद्रवः. सहस्रसा मेधसाता सनिष्यवो महो ये धन १४ समिथेषु जभ्रिरे.. (१७) हे यजमानो! वीर घोड़े पर सवारी करने वाले हैं. वे बहुत अधिक वेगवान हैं. वे वीर हमारी वाणी को सुनने की कृपा करें. जो वीर हजारों को आनंद देते हैं, जो ११० - यजुर्वेद

पूर्वार्ध नौवां अध्याय वीर लोगों की आवश्यकता की पूर्ति करते हैं, जो वीर यज्ञ के अधिष्ठाता हैं, वे वीर धनवान व महिमावान होते हैं. ( १७ ) वाजे-वाजे ऽ वत वाजिनो नो धनेषु विप्रा ऽ अमृता ऽ ऋतज्ञाः. अस्य मध्वः पिबत मादयध्वं तृप्ता यात पथिभिर्देवयानैः.. (१८) हे अश्वो! आप बलवान हैं. ब्राह्मण, सत्य के ज्ञाता हमें धनधान्यमय बनाएं. हमारा पालनपोषण करने की कृपा करें. बलवान घोड़े मधुर रस पी कर मदमस्त हो कर तृप्त होते हुए देवयान पथ से आगे बढ़ने की कृपा करें. ( १८ ) आ मा वाजस्य प्रसवो जगम्यादेमे द्यावापृथिवी विश्वरूपे. आ मा गन्तां पितरा मातरा चा मा सोमो अमृतत्वेन गम्यात्. वाजिनो वाजजितो वाज ꣳ ससृवा ꣳ सो बृहस्पतेर्भागमवजिघ्रत निमृजानाः.. (१९) स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक हमारी रक्षा के लिए पधारें. सभी देवता हमारी रक्षा के लिए आएं. मातापिता हमारी रक्षा के लिए आएं. हमें सोम रस के रूप में अमृत प्राप्त हो. युद्ध में जीतने वाले वीर और बलशाली हों. बृहस्पति देव के अन्न भाग को पवित्र मन से प्राप्त करने की कृपा कीजिए. ( १९) आपये स्वाहा स्वापये स्वाहापिजाय स्वाहा क्रतवे स्वाहा वसवे स्वाहाहर्पतये स्वाहाह्ने मुग्धाय स्वाहा मुग्धाय वैन् ꣳ शिनाय स्वाहा विन् ꣳ शिन ऽ आन्त्यायनाय स्वाहान्त्याय भौवनाय स्वाहा भुवनस्य पतये स्वाहाधिपतये स्वाहा.. (२०) देवताओं की कृपा के लिए स्वाहा. अपने सुख के लिए स्वाहा. बारबार जन्म लेने वाले देवता के लिए स्वाहा. यज्ञ देव के लिए स्वाहा. वसु देव के लिए स्वाहा. दिनपति के लिए स्वाहा. मोहित करने वाले दिन के लिए स्वाहा. अंतगति तक पहुंचाने वाले अविनाशी हेतु स्वाहा. लोक के लिए स्वाहा. भुवनपति के लिए स्वाहा. अधिपति के लिए स्वाहा. ( २० ) आयुर्यज्ञेन कल्पतां प्राणो यज्ञेन कल्पतां चक्षुर्यज्ञेन कल्पता ꣳ श्रोत्रं यज्ञेन कल्पतां पृष्ठं यज्ञेन कल्पतां यज्ञो यज्ञेन कल्पताम्. प्रजापतेः प्रजा ऽ अभूम स्वर्देवा ऽ अगन्मामृता ऽ अभूम.. (२१) यज्ञ से हमारी आयु बढ़े. यज्ञ से हमारे प्राणों की बढ़ोतरी हो. यज्ञ से हमारी नेत्रज्योति बढ़े. यज्ञ से हमारी श्रवणशक्ति बढ़े. यज्ञ से हमारी पीठ बढ़े. यज्ञ से हमारे यज्ञ का विस्तार हो. हम प्रजापति की प्रजा हों. हम अपने में देवत्व पाएं. हम अमरता पाएं. ( २१ ) अस्मे वो ऽ अस्त्विन्द्रियमस्मे नृम्णमुत क्रतुरस्मे वर्चा ꣳ सि सन्तु वः. नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रे पृथिव्या ऽ इयं ते राड्यन्तासि यमनो ध्रुवोसि धरुणः. कृष्यै त्वा क्षेमाय त्वा रय्यै त्वा पोषाय त्वा.. (२२) यजुर्वेद - १११

पूर्वार्ध नौवां अध्याय पृथ्वी माता आप को नमस्कार. पृथ्वी माता के लिए नमस्कार. आप के धन हमें प्राप्त हों. आप की क्षमता, तेजस्विता व अनुशासन हमें प्राप्त हो. आप स्थिर और धारणशील हैं. हम कृषि और अपनी कुशल क्षेम के लिए आप की शरण में आते हैं. हम धन प्राप्ति व अपने पोषण के लिए आप की शरण में आते हैं. ( २२ ) वाजस्येमं प्रसवः सुषुवे ऽ ग्रे सोम १७ राजानमोषधीष्वप्सु. ता ऽ अस्मभ्यं मधुमतीर्भवन्तु वय १७ राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः स्वाहा.. (२३) सोम ओषधियों, जल समूह के राजा और बलवान हैं. परमपिता ने सब से पहले सोम को प्रकटाया. वे सोमरस वाली ओषधियां हमें मधुमान बनाएं. हम राष्ट्र को जागृत कर सकें. पुरोहितों के लिए स्वाहा. ( २३ ) वाजस्येमां प्रसवः शिश्रिये दिवमिमा च विश्वा भुवनानि सम्राट्. अदित्सन्तं दापयति प्रजानन्स नो रयि १७ सर्ववीरं नियच्छतु स्वाहा.. (२४) परमात्मा ने अन्न उपजाया है. उन्होंने सारे लोकों को शरण दी है. उन्होंने स्वर्गलोक को शरण दी है. परमपिता देवताओं को आहुति प्रदान करने के लिए हमें धन प्रदान करने की कृपा करें. परमपिता हमें सर्वाधिक वीर संतति प्रदान करें. परमपिता ( शुभ कार्यों ) के लिए हमारी बुद्धि को प्रेरित करने की कृपा करें. ( २४ ) वाजस्य नु प्रसव ऽ आबभूवेमा च विश्वा भुवनानि सर्वतः. सनेमि राजा परियाति विद्वान् प्रजां पुष्टिं वर्धयमानो अस्मे स्वाहा.. (२५) परमपिता ने अन्न उपजाया. सारे लोकों को उपजाया. सब ओर से लोकों को उपजाया. परमपिता सर्वज्ञाता, विद्वान्, प्रजा पालक और बढ़ोतरी करने वाले हैं. उन परमपिता के लिए यह आहुति अर्पित है. ( २५ ) सोम १७ राजानमवसेग्निमन्वारभामहे. आदित्यान्विष्णु १७ सूर्य ब्रह्माणं च बृहस्पति १७ स्वाहा.. (२६) परमपिता ने हमारे लिए राजा, अग्नि आदि देवों को उपजाया. हम यज्ञ के आरंभ में उन देवताओं की उपासना करते हैं. आदित्य देवता के लिए स्वाहा. विष्णु देवता के लिए स्वाहा. सूर्य देवता के लिए स्वाहा. ब्रह्म देवता के लिए स्वाहा बृहस्पति देव के लिए स्वाहा. ( २६ ) अर्यमणं बृहस्पतिमिन्द्रं दानाय चोदय. वाचं विष्णु १७ सरस्वती १७ सवितारं च वाजिन १७ स्वाहा.. (२७) हे परमात्मा! आप अर्यमा बृहस्पति और इंद्र देव को दान के लिए प्रेरित करने की कृपा कीजिए. विष्णु देव, सरस्वती देवी, सविता देव के लिए वाणी सहित स्वाहा. ( २७ ) ११२ - यजुर्वेद 632/7

पूर्वार्ध नौवां अध्याय अग्ने अच्छा वदेह नः प्रति नः सुमना भव. प्र नो यच्छ सहस्रजित्त्व १४ हि धनदा ऽ असि स्वाहा.. (२८) हे अग्नि! आप हमारे प्रति अच्छा मन रखिए. आप हमारे लिए अच्छी तरह मार्ग निर्देश और उपदेश कीजिए. आप अकेले ही हजारों को जीत सकते हैं. आप धनदाता हैं. आप के लिए स्वाहा. ( २८ ) प्र नो यच्छत्वर्यमा प्र पूषा प्र बृहस्पतिः. प्र वाग्देवी ददातु नः स्वाहा.. (२९) अर्यमा देव, पूषा देव, बृहस्पति देव व वाग् देवी हमारी अभिलाषा पूरी करें. हम आप सब को आहुतियां प्रदान करते हैं. ( २९ ) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. सरस्वत्यै वाचो यन्तुर्यन्त्रिये दधामि बृहस्पतेष्ट्वा साम्राज्येनाभिषिञ्चाम्यसौ.. (३०) सविता देव सब को उपजाने वाले हैं. हम अश्विनीकुमार की बाहु और पूषा देव के हाथों से यज्ञ देव की ऊर्जा को धारण करते हैं. सरस्वती देवी वाणी से नियंत्रित करती हैं. बृहस्पति देव श्रेष्ठ साम्राज्य के नियंत्रक हैं, संचालक हैं. हम आप को सींचते हैं. ( ३० ) अग्निरेकाक्षरेण प्राणमुदजयत्तमुज्जेषमश्विनौ द्व्यक्षरेण द्विपदो मनुष्यानुदजयतां तानुज्जेषं विष्णुस्त्र्यक्षरेण त्रींल्लोकानुदजयत्तानुज्जेष १४ सोमश्चतुरक्षरेण चतुष्पदः पशूनुदजयत्तानुज्जेषम्.. (३१) अग्नि ने एक अक्षर से ऊर्ध्वगामी प्राण पर विजय हासिल की वैसे ही हम भी विजय पाएं. दो अक्षर से अश्विनीकुमारों ने दो पैरों वाले मनुष्यों को जीता. हम भी उस जीत का अनुकरण करें. विष्णु देव ने तीन अक्षरों से तीनों लोकों पर विजय पाई. हम भी उस जीत का अनुसरण करें. सोम ने चार अक्षरों से चौपायों को जीता, उसी प्रकार हम भी उन की कृपा से उस जीत का अनुकरण करें. ( ३१ ) पूषा पञ्चाक्षरेण पञ्च दिश ऽ उदजयत्ता ऽ उज्जेष १४ सविता षडक्षरेण षडृतूनुदजयत्तानुज्जेषं मरुतः सप्ताक्षरेण सप्त ग्राम्यान् पशूनुदजयँस्तानुज्जेषं बृहस्पतिरष्टाक्षरेण गायत्रीमुदजयत्तामुज्जेषम्.. (३२) पूषा देवता ने पांच अक्षरों से पांचों दिशाओं पर विजय पाई, वैसे ही हम भी विजय पाएं. सविता देव ने छह अक्षरों से छह ऋतुओं पर विजय पाई, वैसे ही हम भी विजय पाएं. मरुद्गणों ने सात अक्षरों से सात गांवों और पशुओं पर विजय पाई. बृहस्पति देव ने आठ अक्षरों से गायत्री पर विजय पाई, उसी प्रकार हम भी विजय पाएं. ( ३२ ) यजुर्वेद - ११३

पूर्वार्ध नौवां अध्याय मित्रो नवाक्षरेण त्रिवृत ँ४ स्तोममुदजयत्तमुज्जेषं वरुणो दशाक्षरेण विराजमुदजयत्तामुज्जेषमिन्द्र ऽ एकादशाक्षरेण त्रिष्टुभमुदजयत्तामुज्जेषं विश्वेदेवा द्वादशाक्षरेण जगतीमुदजयँस्तामुज्जेषम्.. ( ३३ ) मित्र देव ने नव अक्षर से ज्ञान, कर्म और भक्ति पर विजय पाई, उसी प्रकार हम भी उस पर विजय प्राप्त करें. वरुण देव ने दस अक्षरों से विराट् पर विजय पाई, हम भी उसी प्रकार विजय पाएं. इंद्र देव ने ग्यारह अक्षर से त्रिष्टुभ् पर विजय पाई, वैसे ही हम भी विजय प्राप्त करें. विश्व ने बारह अक्षर से जगती पर विजय पाई, हम भी वैसे ही विजय पाएं. ( ३३ ) वसवस्त्रयोदशाक्षरेण त्रयोदश ँ४स्तोममुदजयँस्तमुज्जेष ँ४ रुद्राश्चतुर्दशाक्षरेण चतुर्दश ँ४ स्तोममुदजयँस्तमुज्जेषमादित्याः पञ्चदशाक्षरेण पञ्चदश ँ४ स्तोममुदजयँस्तमुज्जेषमदितिः षोडशाक्षरेण षोडश ँ४ स्तोममुदजयत्तमुज्जेषं प्रजापतिः सप्तदशाक्षरेण सप्तदश ँ४ स्तोममुदजयत्तमुज्जेषम्.. ( ३४ ) तेरह अक्षरों से वसुदेव ने त्रयोदश स्तोम को जीता, वैसे ही हम भी विजय प्राप्त करें. रुद्र देव ने चौदह अक्षरों के प्रभाव से चौदह स्तोम ( गुणगान ) पर विजय पाई, हम भी उस के प्रभाव से विजय पाएं. आदित्य देव ने पंद्रह अक्षरों के प्रभाव से पंद्रह स्तोत्रों पर विजय पाई, हम भी वैसे ही विजय पाएं. अदिति देवता ने सोलह स्तोम पर विजय पाई, हम भी उन पर विजय प्राप्त करें. सत्रह अक्षर से प्रजापति ने सत्रह स्तोम पर विजय पाई, हम भी उस विजय का अनुकरण करें. ( ३४ ) एष ते निर्ऋते भागस्तं जुषस्व स्वाहाग्निनेत्रेभ्यो देवेभ्यः पुरः सद्भ्यः स्वाहा यमनेत्रेभ्यो देवेभ्यो दक्षिणासद्भ्यः स्वाहा विश्वदेवनेत्रेभ्यो देवेभ्यः पश्चात्सद्भ्यः स्वाहा मित्रावरुणनेत्रेभ्यो वा मरुन्नेत्रेभ्यो वा देवेभ्य ऽ उत्तरासद्भ्यः स्वाहा सोमनेत्रेभ्यो देवेभ्य ऽ उपरिसद्भ्यो दुवस्वद्भ्यः स्वाहा.. ( ३५ ) हे पृथ्वी! यह आप का हिस्सा है. आप इसे स्वीकारिए. पृथ्वी माता के लिए स्वाहा. पूर्व दिशा का नेतृत्व करने वाले अग्नि के लिए स्वाहा. दक्षिणी दिशा का नेतृत्व करने वाले यम देव के लिए स्वाहा. पश्चिम दिशा में विश्व के लिए स्वाहा. उत्तर दिशा का नेतृत्व करने वाले मित्र और वरुण देव या मरुद्गणों के लिए स्वाहा. ऊपर और स्वर्गलोक में सोम के लिए स्वाहा. सभी देवगणों के लिए स्वाहा. ( ३५ ) ये देवा ऽ अग्निनेत्राः पुरःसदस्तेभ्यः स्वाहा ये देवा यमनेत्रा दक्षिणासदस्तेभ्यः स्वाहा ये देवा विश्वदेवनेत्राः पश्चात्सदस्तेभ्यः स्वाहा ये देवा मित्रावरुणनेत्रा वा मरुन्नेत्रा वोत्तरासदस्तेभ्यः स्वाहा ये देवाः सोमनेत्रा ऽ उपरिसदो दुवस्वन्तस्तेभ्यः स्वाहा.. ( ३६ ) अग्नि के साथ पूर्व दिशा का नेतृत्व करने वाले देवों के लिए स्वाहा. दक्षिण दिशा का नेतृत्व करने वाले यम देव के लिए स्वाहा. पश्चिम दिशा का नेतृत्व करने ११४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध नौवां अध्याय वाले विश्वे देव सहित देवों के लिए स्वाहा. उत्तर दिशा का नेतृत्व करने वाले मित्रावरुण देव और मरुद्गण के लिए स्वाहा. ऊपर और स्वर्गलोक का नेतृत्व करने वाले सोम सहित अन्य देवों के लिए स्वाहा. ( ३६ ) अग्ने सहस्व पृतना ऽ अभिमातीरपास्य. दुष्टरस्तरन्नरातीयर्चोधा यज्ञवाहसि.. ( ३७) हे अग्नि! आप शत्रुओं को हराइए. आप शत्रुओं का नाश कीजिए. हे अग्नि! आप को जीतना दुर्लभ है. हे अग्नि! आप मंत्रपूर्वक यज्ञ करने वाले यजमान को अन्न दीजिए. तेजस्वी बनाइए. ( ३७ ) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. उपा २४ शोर्वीर्येण जुहोमि हत २४ रक्षः स्वाहा रक्षासं त्वा वधायावधिष्म रक्षोवधिष्मामुमसौ हतः... ( ३८) हे सविता देव! आप संसार को उपजाने वाले हैं. हम अश्विनीकुमारों की भुजाओं और पूषा देवता के हाथों से आप को हवि चढ़ाते हैं. आप ने शूरवीरता से शत्रुओं को खदेड़ा, मारा. जैसे यह राक्षस मारा गया वैसे ही शत्रु भी मारे जाएं. ( ३८ ) सविता त्वा सवाना २४ सुवतामग्निर्गृहपतीना २४ सोमो वनस्पतीनाम्. बृहस्पतिर्वाच ऽ इन्द्रो ज्यैष्ठ्याय रुद्रः पशुभ्यो मित्रः सत्यो वरुणो धर्मपतीनाम्.. ( ३९) हे सविता देव! आप यजमानों को यज्ञ के लिए प्रेरित करने की कृपा कीजिए. हे अग्नि! आप गृहपतियों को ( यज्ञ के लिए ) प्रेरित करने की कृपा कीजिए. सोम यजमानों को वनस्पति प्रदान करने की कृपा करें. बृहस्पति देव हमें वाणी प्रदान करने की कृपा करें. इंद्र देव हमें ज्येष्ठता ( बड़ाई ) प्रदान करें. रुद्र देव हमें पशु प्रदान करने की कृपा करें. मित्र देव हमें सत्यवादी बनाने की कृपा करें. वरुण देव हमें धर्म पालक बनाने की कृपा करें. ( ३९ ) इमं देवा ऽ असपत्न २४ सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायैन्द्रस्येन्द्रियाय. इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश ऽ एष वोमी राजा सोमोस्माकं ब्राह्मणाना २४ राजा.. (४०) हे यजमानो! सोम राजा हैं. सोम हम ब्राह्मणों के राजा हैं. सोम अमुक पुत्र अमुक के पुत्र पर अपनी कृपा बनाए रखें. ये देवगण महान् क्षत्रिय जैसा बल पाने के लिए प्रेरित करें. महान् राज्य व महान जन राज्य के लिए प्रेरित करने की कृपा करें. हमें इंद्र देव जैसा समृद्धिशाली बनाने की कृपा करें. ( ४० ) यजुर्वेद - ११५