योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
५६४ ❈ योगवाशिष्ठ ❈
आकाश में दूसरा चन्द्रमा दिखता है, वैसे ही भ्रम में अपने में आधि- भौतिक शरीर भासित होता है। हे राम! यह आश्चर्य है कि सत्य वस्तु असत्य लगती है, और जो असत्य वस्तु है वह सत्य लगती है। इसका कारण अविचार है। यह मोह का माहात्म्य है कि सब का आदि जो प्रत्यक्ष आत्मा है, उसको लोग अप्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष जगत् को प्रत्यक्ष जानते हैं। हे राम! यह जगत् भ्रम में भासित होता है और स्वप्न की नाईं मिथ्या है। जिन पदार्थों को लोग सुखरूप मानते हैं, वे दुःख के कारण हैं; क्योंकि उनका परिणाम दुःख है। इनमें प्रथम क्षण- सुख लगता है और फिर उनके वियोग से दुःख होता है, इसी कारण इनका नाम आपातरमणीय है—इनको पाकर शान्तिमान् कोई नहीं होता। जैसे मृगतृष्णा का क्षणसुख होता है और फिर उनके वियोग से दुःख होता है; क्योंकि उस जल को पाकर कोई तृप्त नहीं होता, वैसे ही विषय के सुखों से कोई तृप्त नहीं होता। जो उनमें लगते हैं, वे मूर्ख हैं। जो अत्युत्तम सुख है, वह अनुभव से प्रकाशित होता है। उसको त्यागकर विषय के सुख में जो लगते हैं वे मूर्ख हैं; वे शुद्ध आकाशरूप अनात्मरूप में जगत् देखते हैं। हे राम! जगत् जाल हुए की नाईं भासते हैं तो भी हुए नहीं—जैसे स्थाणु में पुरुष दिखता है तो भी हुआ नहीं, और जैसे सुवर्ण में भूषण दिखते हैं, वैसे ही यह जगत् प्रत्यक्ष दिखता है, पर कुछ नहीं है। हे राम! प्रत्यक्ष प्रमाण भी नहीं है, तब अनुमानादिक प्रमाण कहाँ से सत्य हों? जैसे विम नदी में हाथी बह जाते हैं, उनमें रुई के बहने में क्या आश्चर्य है, वैसे ही प्रत्यक्ष प्रमाण के विषय जगत् को जब असत्य माना तब अनुमानप्रमाण से क्या वह सत होता है?
हे राम! केवल बोधमात्र में जगत् कुछ बना नहीं। हमको तो सदा ऐसे ही लगता है। पर अज्ञानी को जगत् भासित होता है—जैसे किसी पुरुष को स्वप्न में पर्वत देख पड़ते हैं और जाग्रत् पुरुष को नहीं दिखते, वैसे ही अज्ञानी को यह जगत् दिखता है, पर हमको तो आकाश, समुद्र, पर्वत, सब केवल बोधमात्र लगते हैं। जैसे कथा के
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५६५
अर्थ श्रोता के हृदय में होते हैं, और जिसने नहीं सुनी, उसके हृदय में नहीं होते, वैसे ही मेरे सिद्धान्त को ज्ञानवान जानते हैं; अज्ञानी नहीं जान सकते। हे राम! जितना कुछ आधिभौतिक जगत् दिखता है वह अप्रत्यक्ष है और आत्मा सदा प्रत्यक्ष है। जो इस लोक अथवा परलोक का अर्थ है वह अनुभव से सिद्ध होता है; क्योंकि सबका आदि अनुभव प्रत्यक्ष है। उसको त्यागकर जो देहादिक दृश्य को अपना रूप जानते हैं और इन्हीं को प्रत्यक्ष जानते हैं, वे मूर्ख पशु और पत्थर से हैं और सूखे तृण की नांई तुच्छ हैं। जैसे भ्रमण से पर्वत आदि पदार्थ घूमते लगते हैं, वैसे ही अज्ञानी को आधिभौतिक भासित होते हैं। हे राम! यह सब जगत् परोक्ष है; क्योंकि इन्द्रियों से प्रत्यक्ष होता है। जो नेत्र होते हैं तो रूप दिखता है और जो नेत्र न हों तो न दिखे, इसी प्रकार सब इन्द्रियों के विषय हैं। जो हों तो दिखें, नहीं तो न दिखें। आत्मा सदा प्रत्यक्ष है। उसके देखने में किसी और की अपेक्षा नहीं। हे राम! जो इन्द्रियों से सिद्ध हो वह असत् है। जो जगत् ही असत् हुआ तो उसके पदार्थ कैसे सत् हों? इससे इस जगत् की सत्यता छोड़कर शुद्धबोध में स्थित होओ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे प्रत्यक्षप्रमाणजगन्निराकरणं नाम शताधिकषड्षष्टितमस्सर्गः ॥ १६६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब मैं उस शिला को बोधदृष्टि से देखता, तब वह मुझको ब्रह्मरूप लगती और जब संकल्पदृष्टि से देखता, तब पृथ्वी, द्वीप, समुद्र, पर्वत, लोक, लोकपाल, सूर्य, चन्द्रमा, तारागण, पातालसंयुक्त जगत् दिखता। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब दिखता है, वैसे ही आत्मारूपी आदर्श में जगत् दिखता है। तब देवी ने शिला में प्रवेश किया और मैं भी संकल्परूपी शरीर से उसके साथ चला गया। हम दोनों जगत् के व्यवहार को लाँघते गये और जहाँ परमेष्ठी ब्रह्मा का स्थान था, वहाँ जा बैठे। तब देवी ने कहा, हे भगवन्! तुम परमेष्ठी से ऐसे कहना कि मुझको यह ले आई है और यह पूछना कि इसको जो तुमने विवाह के निमित्त उपजाया था तो फिर क्यों इसका त्याग
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किया ? हे मुनीश्वर ! उसने मुझको विवाह के अर्थ उत्पन्न किया था, पर जब मैं बड़ी हुई तब उसने मेरा त्याग किया है। उसको वैराग्य उपजा है और उसे देखकर अब मुझको भी वैराग्य उपजा है। इसी से मैं परम-पद की इच्छा रखती हूँ, जहाँ न द्रष्टा है, न दृश्य है, और न शून्य है, केवल शान्तरूप है, और जो सर्ग के आदि और महाकल्प के अन्त में रहता है उसमें स्थित होने की इच्छा है, जिसमें स्थित होने पर पहाड़ की भी निश्चल समाधि हो जाती है। ऐसे परमपद का उपदेश करो। हे राम ! इस प्रकार कहकर वह भर्त्ता के जगाने के लिए निकट जाकर बोली, हे नाथ ! तुम जागो; तुम्हारे गृह में दूसरे सृष्टि के ब्रह्मा के पुत्र वशिष्ठमुनि आये हैं। तुम उठकर इनका अर्ध्यपाद्य से पूजन करो; क्योंकि गृह में अतिथि आये हैं। महापुरुष केवल पूजा से ही प्रसन्न होते हैं।
हे राम ! जब इस प्रकार देवी ने कहा तब ब्रह्माजी समाधि से उठे और उनके प्राण देह और नाड़ियों में आकर स्थित हुए। जैसे वसन्त ऋतु से सब वृक्षों में रस हो आता है, वैसे ही उनकी दसों इन्द्रियों और चारों अन्तःकरण में शनैःशनैः करके प्राण स्थित हुए और सब इन्द्रियाँ खिल आईं। तब उन्होंने मुझको और देवी को अपने सम्मुख देखा और ज्ञान में ॐकार का उच्चारण करके सिंहासन पर बैठे। ब्रह्माजी के जागने से बड़ा शब्द होने लगा और विद्याधर, गन्धर्व, ऋषि मुनि आकर प्रणाम करके स्तुति और ध्वनि से वेद पाठ करने लगे। ब्रह्मा बोले हे ऋषि ! कुशल तो है ? तुम इतनी दूर से क्यों आये हो ? तुम तो सार असार को जाननेवाले हो। जैसे हाथ में बेल का फल होता है, वैसे ही तुमको सम्पूर्ण ज्ञान है, बल्कि तुम ज्ञान के समुद्र हो। ऐसे कहकर उन्होंने अपने निकट आसन दिया और नेत्रों से आज्ञा की कि इस पर विश्राम करो। हे राम ! जब इस प्रकार उन्होंने मुझसे कहा, तब मैं प्रणाम करके उनके निकट जा बैठा और एक मुहूर्तपर्यन्त देवता, सिद्ध और ऋषियों के प्रणाम होते रहे।
उसके अनन्तर जब विद्याधर और देवता सब चले गये, तब मैंने कहा, हे भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों कालों के ज्ञाता ईश्वर परमेष्ठी ! तुम ऊँचे
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आसन पर विराजमान हो और साक्षात् ब्रह्मज्ञान के समुद्र हो यह तुम्हारी शक्ति देवी है, जिसको तुमने भार्या बनाने के लिए उत्पन्न किया था और फिर उसे विरस जानकर त्याग दिया । तुम्हारे वैराग्य से इसको भी वैराग्य उपजा है । इसलिए यह मुझको यहाँ ले आई है कि तुम परमात्मतत्त्व की वाणी से हमको उपदेश करो । सो इसमें इसका क्या अभिप्राय है ? ब्रह्मा बोले, हे मुनीश्वर ! मैं शान्त, अजर-अमररूप हूँ और मुझमें उदय-अस्त कदापि नहीं होता । मैं परम आकाशरूप हूँ और अपने आपमें स्थित हूँ । न मेरी कोई स्त्री है और न मैंने किसी को उत्पन्न किया है, तथापि जो वृत्तान्त हुआ है, वह मैं कहता हूँ, क्योंकि महापुरुष के सामने ज्यों का त्यों कहना चाहिए । हे मुनीश्वर ! आदि शुद्ध चिदात्मा चिन्मात्र पद है । उसका किञ्चन जो अहं होकर फुरा है, उसका नाम आदि ब्रह्मा है । वही मैं हूँ, जैसे अविष्यत् सृष्टि का हो-मतलब यह कि मैं संकल्प-रूप द्रष्टा और संकल्परूप हूँ-पर वास्तव में आकाशरूप सदा निरावरण हूँ और अपने आप ही में मेरी अहंप्रतीति है । उसमें आदि जो संकल्प का फुरना हुआ है, उसमें जगत्-भ्रम रचा है और उस जगत्भ्रम में मर्यादा हुई है । संकल्प की अधिष्ठात्री जो ब्रह्मशक्ति है, वह भी शुद्ध है । हे मुनीश्वर, उस मर्यादा को युगों की सहस्र चौकड़ी बीती हैं-अब कलियुग है । कल्प और महाकल्प की मर्यादा पूरी हुई है, इससे मुझको परम चिदाकाश में स्थित होने की इच्छा हुई है और इसी से इसको नीरस जानकर मैंने त्याग किया है । जब इसका त्याग करूँगा, तब निर्वाणपद को प्राप्त होऊँगा, क्योंकि यह मेरी इच्छा वासनारूप है । वासना का त्याग हो तो निर्वाणपद प्राप्त हो । यह जो शुद्ध चित्तकला है, इसने धारणा का अभ्यास किया था, इससे इसमें अन्तवाहक शक्ति प्राप्त हुई है । अन्तवाहक शक्ति से यह आकाश में उपजी है और संसार से विरक्त हुई है । आकाशमार्ग में इसको तुम्हारी सृष्टि दिखी और परमपद पाने की इच्छा से इसको तुम्हारी संगति प्राप्त हुई-इससे तुम्हारी शरण आई है और तुमको ले आई है । जो श्रेष्ठ हैं वे बड़ों की शरण जाते हैं । यह अपने कल्याण के लिए तुमको ले आई है ।
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हे मुनीश्वर ! यह मेरी मूर्तिरूप वासनाशक्ति है । पहले मैंने इसको उत्पन्न करके इस जगत्-जाल को रचा, पर अब मुझको निर्विकल्प निर्वाणपद की इच्छा हुई है, इससे मैंने इसका त्याग किया है । अब इसका भी वैराग्य उपजा है, उस कारण बोधरूप तुम्हारी शरण में आई हूँ । हे मुनीश्वर ! यह जगत् विलास संकल्प से हुआ है; वास्तव में कुछ हुआ नहीं; परमात्मतत्त्व ज्यों का त्यों अपने आपमें स्थित है । मैं, तुम, मेरा, तेरा इत्यादिक शब्द समुद्र के तरङ्ग की नाईं हैं । जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजकर शब्द करते हैं और फिर लीन हो जाते हैं, वैसे ही हमारा तुम्हारा बोलना और मिलाप होना है । हे मुनीश्वर ! वास्तव में न कोई उपजा है और न कोई लीन होता है जैसे तरङ्ग जलरूप है-भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है-भिन्न कुछ नहीं । इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि सब वही हैं । हे मुनीश्वर ! मैं चिदाकाश हूँ और चिदाकाश में स्थित हूँ । यह ब्रह्मशक्ति है, जिसने जगत् रचा है । यह भी अजर और अमर है । न कभी उपजी है और न इसका नाश होगा । शुद्ध आत्मा किञ्चन द्वारा जगत् होकर भासित होता है जैसे सूर्य की किरणें जल होकर भासित होती हैं, परन्तु जल कुछ हुआ नहीं, वैसे ही सब आत्मा ही है; विश्व कुछ हुआ नहीं । हे मुनीश्वर ! जगत्जाल होकर आत्मा ही दिखता है, पर जगत् के उदय अस्त होने से आत्मा में कुछ क्षोभ नहीं होता; वह ज्यों का त्यों एकरस स्थित है । जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजते और लीन होते हैं, परन्तु समुद्र ज्यों का त्यों रहता है, वैसे ही जगत् कुछ उपजा नहीं, संकल्प से उपजे की नाईं लगता है । जैसे दृढ़ता से जल ओला हो जाता है, वैसे ही चिन्मात्र में चैतन्य में पिण्डाकार भासित होता है, परन्तु उपजा कुछ नहीं ।
हे मुनीश्वर ! यह जो शिला है, जिसमें हमारी सृष्टि है, सो केवल चिद्घनरूप है । तुम्हारी दृष्टि में यह शिला है और हम चैतन्य घन हैं । चैतन्य आकाश आत्मा ही शिला होकर भासित होती है । जैसे स्वप्न में सब सृष्टि जाग्रतरूप दिखती है वह बोधरूप है-बोध ही जगत् सा भासित होता है, वैसे ही यह जगत् और शिलारूप होकर
* निर्वाण प्रकरण *
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बोध ही भासित होता है। हे मुनीश्वर ! जैसे स्वप्न में ग्रह-चक्र फिरता दिखता है, वैसे ही सूर्य, चन्द्रमा, पर्वत, नदी, वरुण, कुबेर आदि जगत् जो भ्रम से दृष्टिगोचर होता है सो कुछ बना नहीं—चैतन्य का किञ्चन ही ऐसे भासित होता है। जैसे सूर्य की किरणों में किञ्चन जलाभास होता है, वैसे ही जहाँ आत्मसत्ता है, वहाँ जगत् दिखता है, सब पदार्थ आत्मसत्ता से ही भासित होते हैं, ब्रह्मसत्ता सबमें अनुस्यूत है, इससे सब ओर सृष्टि बसती है। जैसे इस शिला में हमारी सृष्टि में जो कुछ पदार्थ दिखते हैं और इनमें सृष्टि बसती है, सो परिच्छिन्न दृष्टि से नहीं दिखती, पर जब अन्तर्वाहक दृष्टि से देखिये, तब प्रतीत होती है। घटों में, मठों में और पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन, आकाश आदि स्थानों में सृष्टि है, पर बना कुछ नहीं। जैसे जहाँ समुद्र है वहाँ तरङ्ग भी होते हैं, परन्तु समुद्र से भिन्न तरङ्ग नहीं—वही रूप हैं, वैसे ही यह जगत् उपजा नहीं और न लीन होता है; ज्यों का त्यों आत्मसमुद्र अपने आप में स्थित है।
जगत् संकल्प से फुरता है, और संकल्प ही अहरूपी किञ्चनमात्र उदय हुआ। जैसे कमल से सुगन्ध लेकर तरियाँ निकलती हैं, वैसे ही मूल से देवी जगतरूपी सुगन्ध को लेकर उदय हुई है, परन्तु वास्तव जगत् कुछ बना नहीं, केवल संकल्प से बने की नाईं भासित होता है। हे मुनीश्वर ! वास्तव में न कोई संकल्प है और न प्रलय, ज्यों का त्यों ब्रह्म अपने स्वभाव में स्थित है। जैसे आकाश में आकाश और समुद्र में समुद्र स्थित है, वैसे ही ब्रह्म में ब्रह्म स्थित है। हे मुनीश्वर ! यह जगत् न सत्य है और न असत्य; आत्मा में न यह उदय हुआ और न अस्त होवेगा। जैसे आकाश में नीलता न सत्य है, न असत्य, वैसे ही ब्रह्म में जगत् न सत्य है और न असत्य। मैं उस ब्रह्म का किञ्चन ब्रह्मा हूँ, और यह जगत् मेरे संकल्प से उत्पन्न हुआ है। अब मैं संकल्प को निर्वाण करता हूँ। जब संकल्प निर्वाण होगा, तब जैसे कमल का नाश होने पर सुगन्ध का अभाव हो जाता है, वैसे ही जगत् का अभाव हो जायगा। मुझसे इच्छा फुरी थी, उस वासना में जगत् है। अब मैं इसका निर्वाण करता हूँ।
५७० ☸ योगवाशिष्ठ ☸
जब इच्छा निर्वाण होगी, तब जगत् का भी स्वाभाविक अभाव हो जायगा। तुम्हारा शरीर संकल्प से भासित होता है, इससे तुम अपनी सृष्टि में जाओ। ऐसा न हो कि तुम्हारा शरीर भी यहाँ निर्वाण हो जावे। हे राम! इस प्रकार वह मुझसे कहकर फिर देवी से बोले, हे देवि! अब तू निर्वाण हो और अपने आपमें बोध आदिक को भी लीन कर।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शुकान्तरवशिष्ठब्रह्मसंवाद- वर्णनन्नाम शताधिकसप्तशीतितमस्सर्गः ॥१७७॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस प्रकार कहकर ब्रह्मा ने पद्मासन लगाया और सब जनों के साथ 'अकार', 'उकार', 'मकार' को छोड़कर अर्धमात्रा में स्थित हुए। तब उनकी मूर्ति ऐसी दिखने लगी, जैसे कागज पर मूर्ति लिखी होती है। उन्हें सम्पूर्ण जगत्जाल का ज्ञान भूल गया। देवी भी उसी प्रकार पद्मासन बाँधकर ब्रह्माजी के निश्चय में लीन हो जाने लगी। जब ब्रह्माजी निर्वेदनरूप ब्रह्म में लीन होने लगे उस समय जितने उपद्रव थे, सब उदय हुए। मनुष्य पाप करने लगे। स्त्रियाँ दुराचारिणी हो गईं। सब जीवों ने धर्म को त्याग दिया। कामी पुरुष बहुत हुए जो परनारियों के साथ भोग करते थे और पुरुष स्त्रियाँ किसी की शङ्का न करती थीं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, राग, द्वेष बढ़ गये और शास्त्र की मर्यादा त्यागकर लोग अनीश्वरवादी हुए। वर्षा बन्द हो गई और कुहरा पड़ने लगा। दुष्काल पड़ा। दुष्टजन धनपात्र होने लगे। धर्मात्मा आपदा भोगने लगे। चोर चोरी करने लगे। राजा मद्यपान करने लगे। जीवों को बड़े दुःख प्राप्त होने लगे, वे तीनों तापों से जलने लगे। राजाओं ने न्याय को त्याग दिया। निदान जो पाप आचार थे, वे उदय हुए और धर्म छिप गया। अज्ञानी राज्य करते; पण्डित ज्ञानी टहल करते, दुर्जनों की मानपूजा होती; सत् पण्डितों का निरादर होता; जीवों के समूह इकट्ठे हुए और पृथ्वी ने अपनी सत्ता को त्याग दिया क्योंकि पृथ्वी ब्रह्मा के संकल्प में थी। जब उन्होंने अपना संकल्प खींचा, तब वह निर्जीव हो गई और चेतनता निकल गई। जो स्थान मृतकों के विचरने के थे, वे खाईं की
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५७१
नाईं हो गये । भूत नष्ट हो गये और पृथ्वी भी नष्ट होने लगी । पर्वत काँपने लगे, भूचाल और हाहाकार शब्द होने लगे । जैसे शरत्काल में बेल सूख कर जर्जर हो जाती है, वैसे ही पृथ्वी जर्जर हुई, क्योंकि चेतनता रूप शरीरों का और सब जगत् का कारण ब्रह्मा है । ज्यों-ज्यों संकल्परूपी चेतनता क्षीण होती गई, त्यों-त्यों पृथ्वी जर्जर होती गई ।
जैसे किसी पुरुष का अर्धाङ्ग मारा जाता है, तब वह अङ्ग शव-सा हो जाता है और फुरना उसमें नहीं रहता, वैसे ही ब्रह्मा की संकल्परूप चेतनता पृथ्वी से निकलती जाती थी, इस कारण पृथ्वी दुःखी हुई । धूल उड़ने लगी और नगर नष्ट होने लगे । इस प्रकार उपद्रव हुए, क्योंकि पृथ्वी के नाश का समय निकट आ गया था । समुद्र जो अपनी मर्यादा में स्थित थे, उन्होंने भी अपनी मर्यादा त्याग दी । जैसे कामी पुरुष मद्यपान कर अपनी मर्यादा को छोड़ देता है, वैसे ही समुद्र उछले, किनारे गिर गये और पर्वत कन्दरा से निकलकर पृथ्वी का नाश करने लगे । राजा और नगरवासी भागने लगे और उनके पीछे तीव्र वेग से जल चलने लगा; बड़े पर्वत गिरने लगे और चक्र की नाईं घूमने लगे । समुद्र की लहरों से पर्वत गिरते और उड़ते थे । लहरें उछलकर पाताल को गईं और पाताल का नाश होने लगा । बड़े रत्नों के पर्वत जब गिरे, तब रत्नों की ऐसी चमक हुई, जैसी तारामण्डल की होती है । इसी प्रकार बड़ा क्षोभ होने लगा और तरङ्ग उछलकर सूर्य-चन्द्रमा के मण्डल को जाने लगे । उनका प्रकाश जाता रहा । बड़वाग्नि प्रकट हुई, तब वरुण, कुबेर आदि देवताओं के वाहन डरे । जल के वेग से पर्वत नृत्य करने लगे—मानों पर्वतों के पंख लगे हैं । स्वर्ग के कल्पतरु समुद्र में गिर पड़े । चिन्तामणि, सिद्ध और गन्धर्व भी गिरने लगे । समुद्र इकट्ठे हो गये । जैसे गङ्गा, यमुना और सरस्वती एकत्र होती हैं, वैसे ही समुद्र भी मिलकर शब्द करने लगे । उनमें से ऐसे मच्छ निकले जिनकी पूँछों के लगने से पर्वत उड़ जावें । कन्दरा में जो हाथी थे, वे चिघारने लगे और सूर्य, चन्द्रमा तारागण क्षोभ को प्राप्त होकर समुद्र में गिरने लगे । हे राम ! इस प्रकार प्रलय के क्षोभ से जितने लोकपाल थे, वे
५७२ ॐ योगवासिष्ठ ॐ
सब समुद्र के मुख में आ पड़े और मत्स्य उनको भक्षण कर गये । तरङ्ग आपस में टकराने लगे, जैसे मतवाले हाथी शब्द करते हैं ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे शताधिकाष्टाशीतितमःसर्गः ॥ १८८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! उस विराटरूप ब्रह्मा ने, जिसकी देह सम्पूर्ण जगत् था, अपने श्वास को खींचा, तब नक्षत्र-चक्र को घुमाने-वाला वायु अपनी मर्यादा त्यागकर क्षोभ करने लगा, और वे चक्र नष्ट होने लगे; क्योंकि वे ब्रह्मा के संकल्प में थे । किसी की सामर्थ्य नहीं कि उनको रक्खे । तेजोमय देवता जो पवन के आधार थे, पवन के निकलने से निराधार होकर समुद्र में गिरने लगे और जैसे वृक्ष से फल गिरते हैं, वैसे ही गिरने लगे । जैसे संकल्प का नाश होने पर संकल्प का वृक्ष गिरता है और जैसे पका फल समय पर वृक्ष से गिरता है, वैसे ही सब गिरने लगे । सुमेरु की कन्दरा गिरी । पवन का बड़ा क्षोभ और शब्द हुआ । जैसे पवन में तृण घूमता है, वैसे ही आकाश में पवन घूमने लगा । देवताओं का घर सुमेरु पर्वत भी गिर पड़ा । राम ने पूछा, हे भगवन् ! संकल्परूप जो ब्रह्मा था, वह तो विराट् आत्मा है और सब जगत् उसकी देह है । अब बताइये, भूमण्डल, पाताल और स्वर्ग-लोक उसके कौन अङ्ग हैं और संकल्परूप कैसे अङ्ग होते हैं ? संकल्प तो आकाशरूप होता है और जगत् प्रत्यक्ष पिण्डाकार दिखता है ? जो जिसमें उपजता है, वह वैसा ही होता है, तो यह जगत् ब्रह्मा के अङ्ग कैसे है ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस जगत् में पहले केवल चिन्मात्र था और उसमें जगत् न सत्य था, न असत्य; केवल आत्मसत्तामात्र अपने आपमें स्थित था, जैसे आकाश अपने आपमें स्थित है और एक और दो शब्द से रहित है । तब केवल चिन्मात्र का किञ्चन अहं होकर स्थित हुआ है । उसका दृश्य से सम्बन्ध हुआ और उसके अनुभव ग्रहण से जो निश्चय हुआ, उसका नाम बुद्धि है । जब मनन हुआ, उसका नाम मन है । उस मन के फुरने से जगत् दृश्य हुआ है । हे राम ! शुद्ध चिन्मात्र में जो वेद्य है, वही ब्रह्मा कहलाता है । उसके फुरने पर फिर
☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ ५७३
जगत् हुआ है। उस संकल्परूप जगत् का वह विराट् है, परन्तु आकाश-रूप है, और कुछ नहीं बना। यह जो आकारसहित जगत् दिखता है, सो भ्रम से। पर सब संकल्प आकाशरूप हैं। जैसे स्वप्न में जगत् दिखता है सो सब आकाशरूप होता है, परन्तु निद्रादोष से पिण्डाकार भासित होता है और आत्मसत्ता सदा ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है। हे राम ! अहं जो फुरा है, वह मिथ्या है, अज्ञान से दृढ़ स्थित हुआ है, और असम्यग्दर्शी को दृढ़ भासित होता है। सो केवल संकल्पमात्र है, और कुछ नहीं बना। इससे जितना जगत् भासता है, सो सब चिदाकाश है। एक और द्वैतकल्पना सब शब्दों से रहित आत्मत्वमात्र है। मैं और तुम शब्द कोई नहीं। यह जगत् उनका किञ्चन है। जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा का आभास जगत् है। संकल्प की दृढ़ता से यह दृश्य दिखता है, पर वास्तव में है नहीं। जैसे संकल्परूप गन्धर्वनगर और स्वप्नपुर होते हैं, वैसे ही यह जगत् है।
हे राम ! जिस प्रकार मैंने जगत् का वर्णन किया है, उसे जो पुरुष मेरे कहे के अनुसार ज्यों का त्यों धारण करे तो उसकी वासना नष्ट हो जावे और पूर्ववत् आत्मा ज्यों का त्यों भासित हो। तब जैसे जगत् के आदि में आत्मत्वमात्र था, वैसे ही भासित होगा; क्योंकि और कुछ हुआ नहीं, केवल आत्मत्वमात्र ज्यों का त्यों स्थित है। जो आत्मा ही है तो समवायकारण और निमित्तकारण कैसे हों ? जगत् का उदय और नाश होना असत्य है, और अद्वैत और अनन्त कहना भी ठीक नहीं। जब सब शब्दों का अभाव होता है, तब परम चिदाकाश अनुभवसत्ता ही शेष रहती है। इसी का नाम मोक्ष है। हे राम ! मुझको तो अब भी संवित्सत्ता ही भासित होती है। मैं शुद्ध हूँ; सब कल्पना से रहित और चिदाकाश हूँ। मुझमें जो वशिष्ठ अहं फुरा है, वह फुरा नहीं, फुरे की नाईं लगता है और आत्मा का ही किञ्चन है; हुआ कुछ नहीं। इससे तुम भी इसी प्रकार जागकर निर्वासनिक हो जाओ और अपने प्रकृत आचार को करो अथवा न करो, जो इच्छा हो सो करो, परन्तु करने और न करने का संकल्प मत करो और परम मौन में स्थित हो रहो।
५७२ ❁ योगवासिष्ठ ❁
ज्ञानवान् को यही अनुभव होता है, इसमें तुम भी ऐसे ही समझो।
इति श्री० यो० निर्वाणप्रकरणे नवमशताधिकनवाशीतितमस्सर्गः॥ १८६ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! बन्धनमोक्ष जगत्-बुद्धि न सत् है और न असत्। उदय भी नहीं हुआ और अस्त भी नहीं होता। केवल ज्यों का त्यों आत्मा स्थित है। ऐसे आपने मुझको उपदेश किया है। इसलिए मैंने जाना है कि आत्मा में जगत् न उपजता है और न मिटता है, पर तुम्हारे अमृतरूपी वचनों को सुनता हुआ भी मैं तृप्त नहीं होता और अमृत की नाईं पान करता हूँ। जगत् सत्-असत् से रहित सन्मात्र है, उसको मैंने जाना है। अब यह कहिये कि संसार भ्रम कैसे उपजता है और उसका अनुभव कैसे होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो कुछ तुमको स्थावर-जङ्गम जगत् सब प्रकार देशकाल-संयुक्त दीखता है, उसके नाश का नाम महाप्रलय है। उसमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्र भी लीन हो जाते हैं। उसके पीछे जो शेष रहता है, वह स्वच्छ, अज, अनादि, केवल आत्मतत्त्वमात्र है—उसमें वाणी की गति नहीं। वह केवल अपने आपमें स्थित और परम सूक्ष्म है, जिसमें आकाश भी स्थूल है। जैसे सुमेरुपर्वत के आगे राई का दाना सूक्ष्म है, वैसे ही आकाश से भी आत्मा सूक्ष्म है और संवेदन से रहित चिन्मात्र है। उसमें अहं किञ्चन होकर फुरा है। आत्मा सदा निर्विकल्प और समुद्र-सदृश, देशकाल के भ्रम से रहित और केवल चैतन्यघन अपने आपमें स्थित है। जैसे स्वप्न में अपने भाव को लेकर जीव स्थित होता है, वैसे ही आत्मा अपने भाव को लेकर चेतन किञ्चन होता है। उसी का नाम ब्रह्मा है, और वह भी चिद्रूप है। हे राम ! चित्अणु जो अपने भाव को लेकर उदय हुआ है, उसने चैत्यनाम दृश्य को देखा। इससे उसका अनुभव मिथ्या हुआ। जैसे स्वप्न में कोई अपना मरण देखता है, सो वह अनुभव मिथ्या है; वैसे ही चित्अणु दृष्टि से दृश्य को देखता है। यह मिथ्यादृष्टि है। चित्अणु अपने स्वरूप को देखता है, सो केवल निराकाररूप है, परन्तु अहंरूप बीज दृढ़ होता है, उससे अपने आपसे निकल संकल्प से दृश्य को देखता है।
❇ निर्वाण प्रकरण ❇
५७५
जैसे बीज से अंकुर निकलता है, वैसे ही संकल्प के फुरने से देश, काल, द्रव्य, द्रष्टा दर्शन और दृश्य होता है। वास्तव में हुआ कुछ नहीं। आत्मा सदा अपने स्वभाव में स्थित है, परन्तु संकल्प मे हुए की नाईं भासित होता है। जहाँ चित्अणु भासित हो, वह देश है। जिस समय भासित हो, वह काल है। जो भान हो, वह क्रिया हुई। भान का ग्रहण द्रव्य है और देखने को जो वृत्ति दौड़ती है, वह नेत्र होकर स्थित हुई है। जिसको देखते हैं, वह भी शून्य है और देखनेवाले भी शून्य हैं। सब असत् है-कुछ बना नहीं। जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही आत्मा अपने में स्थित है। संकल्प द्वारा सब कुछ बनता जाता है। चित्अणु जो भासित हुआ, वह दृश्यरूप होकर स्थित हुआ है। जब चित्अणु में स्वरूप की वृत्ति फुरती है, तब चक्षु इन्द्रिय स्थित होती है। जब सुनने की वृत्ति फुरती है, तब श्रोत इन्द्रिय स्थित होती है। जब स्पर्श की वृत्ति फुरती है, तब त्वक् इन्द्रिय स्थित होती है। जब सुगन्ध लेने की वृत्ति फुरती है, तब नामिका इन्द्रिय स्थित होती है। और जब रस लेने की इच्छा होती है, तब जिह्वा इन्द्रिय स्वाद लेती है। हे राम ! प्रथम यह चित्अणु नाम से रहित फुरा है। सम्पूर्ण जगत् भी तद्रूप ही था और अब भी वही केवल आकाशरूप है। संकल्प से अपने में पिण्डघन देखकर शरीर और इन्द्रियाँ देखीं, अनादि सत्स्वरूप चित्अणु इन्द्रियों के संयोग से पदार्थों को ग्रहण करता है। स्पन्दनरूप जो वृत्ति फुरी, उसी का नाम मन हुआ। जब निश्चयात्मक बुद्धि होकर स्थित हुई, तब चित्अणु में यह निश्चय हुआ कि मैं द्रष्टा हूँ-यही अहंकार हुआ। जब अहंकार से चित्अणु का संयोग हुआ, तब अपने में देशकाल का परिच्छेद देखा। आगे दृश्य और पूर्व उत्तरकाल देखा कि इस देश में बैठा हूँ और यह कर्म मैंने किया है-यह विषम अहंकार हुआ। निदान देश, काल, क्रिया, द्रव्य के अर्थ को भिन्न-भिन्न ग्रहण करता है और आकाश होकर आकाश को ग्रहण करता है।
हे राम ! आदि स्फुरण से चित्अणु में प्रथम अन्तवाहक शरीर हुआ। फिर संकल्प के दृढ़ अभ्यास से आधिभौतिक भासित होने लगा।
५७६ ❊ योगवासिष्ठ ❊
जैसे आकाश में और आकाश ही, वैसे ही यह आकाश अनहोते भ्रम से उदय हुए हैं और मरु की नाईं भासते हैं। जैसे मरुस्थल में भ्रम से नदी दिखती है, वैसे ही अविचार से संकल्प की दृढ़ता से पाञ्चभौतिक आकार भासित होते हैं। उनमें अहं प्रत्यय होने से जीव देखता है कि यह मेरा सिर है; ये मेरे चरण हैं; यह अमुक देश है इत्यादि। यह जीव शब्द-अर्थ और नाना प्रकार का जगत् और भाव-अभाव ग्रहण करता है और कहता है कि यह देश है, यह काल है, यह क्रिया है और यह पदार्थ है। हे राम! जब इस प्रकार जगत् के पदार्थों का ज्ञान होता है, तब चित्त विषयों की ओर दौड़ता है और रागद्वेष को ग्रहण करता है। जो कुछ देहादिक भूत फुरने से भासते हैं, वे केवल संकल्पमात्र हैं और संकल्प की दृढ़ता से दृढ़ हुए हैं। हे राम! इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र उत्पन्न हुए हैं। इसी प्रकार कीट और पतंग भी उत्पन्न हुए हैं, परन्तु प्रमाद-अप्रमाद का भेद है। जो अप्रमादी हैं, वे सदा आनन्दरूप स्वतन्त्र ईश्वर हैं। उनको यह जगत् और यह जगत् अपना ही रूप प्रतीत होता है। और जो प्रमादी हैं, वे तुच्छ और सदा दुःखी हैं, पर वास्तव में परमात्मतत्त्व से भिन्न कुछ हुआ नहीं। जैसे आकाश अपनी शून्यता में नित्य स्थित है, वैसे ही आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। सबका बीज, त्रिलोकीरूप बूँद का मेघ, कारण का कारण, काल में नीति और क्रिया में क्रिया वही है। आदि-विराट् पुरुष का शरीर भी नहीं और हम तुम भी नहीं-केवल चिदाकाश-रूप है। अब भी इनका शरीर आकाशरूप है और आत्मसत्ता भिन्न अवस्था को नहीं प्राप्त हुई-केवल आकाशरूप है। स्वप्न में युद्ध होते और मेघ गरजते इत्यादि शब्द-अर्थ भासित होते हैं, सो वे केवल आकाशरूप हैं, बना कुछ नहीं, परन्तु निद्रादोष से भासते हैं और मनुष्य जब जागता है, तब जानता है कि हुआ कुछ न था-आकाश रूप है, वैसे ही जो पुरुष अनादि अविद्या में जागा है, उसको जगत् आकाशरूप भासित होता है। हे राम! बहुत योजन पर्यन्त विराट् पुरुष का देह है, तो भी वह ब्रह्म आकाश के सूक्ष्म अणु में स्थित है।
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५७७
यह त्रिलोकी एक चितअणु में स्थित है और इसका विराट् पुरुष ऐसा है, जिसका आदि, अन्त और मध्य नहीं देख पड़ता, तौ भी एक चावल के समान भी नहीं है ।
हे रामचन्द्र ! यह जगत् और जगत् के भोग विस्तीर्ण दिखते हैं, पर जैसे स्वप्न के पर्वत जाग्रत् के एक अणु के समान नहीं, वैसे ही विचाररूपी तराजू से तोलिये तो परमार्थसत्ता में इनकी कुछ सत्यता नहीं देख पड़ती; परन्तु आत्मसत्ता से कुछ भिन्न नहीं हुआ, आत्मसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है । इसी का नाम स्वायम्भुव मनु और विराट् है, और इसी को जगत् कहते हैं । जगत् और विराट् में कुछ भेद नहीं—वास्तव में आकाशरूप है । सनातन भी इसी को कहते हैं । रुद्र, इन्द्र, उपेन्द्र, पवन, मेघ, पर्वत, जल आदि जितने भूत हैं, वे उसका शरीर हैं । हे राम ! इसका आदि शरीर जो चिन्मात्ररूप है, उसमें चेतनता से अपना अणु भी देह देखता है—जैसे तेज का कणका होता है । उस तेज-अणु से चेतनता—और क्रम से अपना बड़ा शरीर जगत्-रूप देखता है । जैसे स्वप्न में कोई पुरुष अपने को पर्वत देखे, वैसे ही वह अपने को विराट् रूप देखता है । जैसे पवन के दो रूप हैं—चलता है तो भी पवन है और नहीं चलता तो भी पवन है—वैसे ही जब चित्त फुरता है, तब भी ब्रह्मसत्ता ज्यों की त्यों है और जब चित्त नहीं फुरता, तब भी ज्यों की त्यों है । परन्तु जब स्पन्दन फुरता है, तब विराट् रूप होकर स्थित होता है, और जब चित्त नहीं फुरता, तब अद्वैतसत्ता भासित होती है और सदा अद्वैत ही विराट्स्वरूप है । हे राम ! इस दृष्टि से उसके सिर और पैर नहीं दिखते । जितनी ब्रह्माण्ड की पृथ्वी है, वह उसका मांस है । सब समुद्र उसका रुधिर है । नदी नाड़ी है । दशों दिशा वक्षःस्थल है । तारागण रोमावली हैं । सुमेरु आदिक अँगुलियाँ हैं । सूर्यादिक तेज पित्त हैं । चन्द्रमा कफ है । पवन प्राणवायु है । सम्पूर्ण जगत्जाल उसका शरीर है । ब्रह्मा हृदय है, सो आकाशरूप है, पर संकल्प से नानारूप भासित होता है, स्वरूप में कुछ बना नहीं । आकाश आदिक सब जगत् चिदाकाशरूप और अपने आप ही में स्थित है ।
इति श्री० नि० विरादात्मवर्णनन्नाम शताधिकनावेनामसर्गः॥ १४०॥
५७८ ✲ योगवाशिष्ठ ✲
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आदि विराट् ब्रह्मा है । उसका आदि-अन्त नहीं । यह जगत् उसका छोटा शरीर है । उसी चैतन्य वपु का किञ्चन ब्रह्मरूप हुआ है । उसके विस्तार का क्रम सुनो—उस ब्रह्मा ने जिसका वपु संकल्पमात्र है, अपने संकल्प से एक अण्ड रचा और उसको तोड़-फोड़ डाला । ऊर्ध्वभाग ऊपर गया और नीचे का भाग नीचे गया । पाताल ब्रह्मा का चरण हुआ । ऊर्ध्व सिर हुआ । मध्य आकाश उदर हुआ । दशों दिशा वक्षःस्थल, हाथ सुमेरु आदिक पर्वत, मांस पृथ्वी, समुद्र और सब नदियाँ नाड़ी, जल रुधिर, प्राण अपान वायु पवन, हिमालय पर्वत कफ, सब तेज पित्त, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र, तारागण स्थूल लार है । लार प्राण के बल से निकलती है—जैसे ताराचक्र को पवन फेरता है । ऊर्ध्व-लोक उसकी शिखा है । मनुष्य, पशु और पक्षी रोम हैं । सब भूतों की चेष्टा उसका व्यवहार है । पर्वत उसकी अस्थि, ब्रह्मलोक उसका मुख और सब जगत् उस विराट् का वपु है । रामजी बोले, हे भगवन् ! यह जो आपने संकल्परूप ब्रह्मा और जगत् उनका वपु कहा, इसे तो मानता हूँ; परन्तु यह जगत् जो उसी का शरीर हुआ; फिर ब्रह्मलोक में ब्रह्मा कैसे बैठता है और अपने शरीर से भिन्न होकर कैसे स्थित होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसमें क्या आश्चर्य है ? जो तुम ध्यान लगाकर बैठो और अपनी मूर्ति अपने हृदय में रच कर स्थित हो तो बन जाय । जैसे मनुष्य को स्वप्न आता है और उसमें जगत् भासित होता है सो सब अपना स्वरूप है । परन्तु अपनी मूर्ति रखकर और को देखता है । वैसे ही ब्रह्मा का एक शरीर ब्रह्मलोक में भी होता है । ब्रह्मा और जीव में इतना भेद है कि जीव भी अपनी स्वप्नसृष्टि का विराट् है, परन्तु उसको प्रमाद से नहीं भासित होती और ब्रह्मा सदा आत्मदर्शी है उसको सब जगत् अपना शरीर भासित होता है ।
हे राम ! देवता, सिद्ध, ऋषीश्वर और विद्याधर उस विराट् पुरुष की ग्रीवा में स्थित हैं । भूत, प्रेत, पिशाच सब उस विराट् पुरुष के मल से उपजे हैं और कीट की नाईं उदर में स्थित हैं । सब स्थावर-जङ्गम जगत् संकल्प से रचा हुआ विराट् में स्थित है—सब उसी के अङ्ग हैं ।
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५७६
जो जगत् है तो विराट् भी है, और जगत् नहीं तो विराट् भी नहीं । जगत्, ब्रह्म और विराट् तीनों पर्याय हैं । इससे सम्पूर्ण जगत् विराट् का शरीर है । निराकार क्या और आकार क्या—सब भीतर बाहर विराट् का शरीर है । जैसे भीतर-बाहर आकाश में भेद नहीं, वैसे ही विराट् आत्मा में भेद नहीं । जैसे पवन के चलने और ठहरने में भेद नहीं वैसे ही विराट् और आत्मा में भेद नहीं है । जैसे चलना और ठहरना दोनों पवन के रूप हैं, वैसे ही साकार-निराकार सब विराट् का शरीर है । हे राम ! इस प्रकार जगत् हुआ है, सो कुछ उपजा नहीं, संकल्प से उपजे की नाईं भानित होता है । जैसे सूर्य की किरणों में जल नहीं है, और हुए की नाईं लगता है, वैसे ही ब्रह्मसत्ता में जगत् उपजे की नाईं जान पड़ता है । पर उपजा कुछ नहीं—केवल अपने आपमें स्थित है । वह शिला की नाईं स्थित है, अर्थात तुम्हारा संकल्प-विकल्प और चैतन्यरूप चैत्य से रहित चिन्मात्रस्वरूप है—इससे कलना को त्याग-कर अपने स्वभाव में स्थित होओ ।
इति श्री० नि० विराटशरीरवर्णनंनामशताधिकैकनवतितमस्सर्गः ॥ १६१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! प्रथम प्रलय का प्रसंग फिर सुनो । मैं ब्रह्म-पुरी में ब्रह्मा के पास बैठा था । जब मैंने नेत्र खोलकर देखा कि मध्याह्न का समय है और दूसरा सूर्य पश्चिम दिशा में उदय हुआ है, उसका बड़ा प्रकाश है—मानो सम्पूर्ण तेज इकट्ठा हुआ है या बड़वाग्नि की नाईं प्रकाश हुआ है और बिजली की नाईं स्थित हुआ है उसको देखकर मैं विस्मित हुआ । देख ही रहा था कि एक ओर सूर्य उदय हुआ । फिर उत्तर दिशा की ओर और सूर्य उदय हुआ । इसी प्रकार प्रथम के अलावा दस सूर्य आकाश में और प्रकट हुए । बड़वाग्नि समुद्र से प्रकट हुई । उसमें एक सूर्य निकला । सब द्वादश सूर्य इकट्ठे होकर विश्व को तपाने लगे । हे राम ! प्रलय के तीन नेत्र उदय हुए—एक नेत्र सूर्य, दूसरा नेत्र बड़वाग्नि और तीसरा नेत्र बिजली । वे तीनों विश्व को जलाने लगे । दिशा सब लाल हो गईं । अटट्-अटट् शब्द होने लगे । नगर, बन, कन्दरा, पृथ्वी जलने लगीं । देवताओं
५८० ✵ योगवाशिष्ट ✵
के स्थान जल जलकर गिरने लगे। पर्वत जलकर श्याम हो गये। ज्वाला के कण निकलकर पाताल को गये। वह भी जल गया। समुद्र जलकर सूख गये और हिमालय पर्वत के बर्फ का जल होकर जलने लगा—जैसे दुर्जनों से संगकर साधु का हृदय तृप्त होता है। जब इसी प्रकार बड़ी अग्नि प्रज्वलित हुई, तब मुझको भी तपन आने लगी और मैं वहाँ से दौड़कर नीचे जाकर स्थित हुआ। वहाँ मैंने देखा कि अस्ता- चल पर्वत जलता हुआ उदयाचल पर्वत के पास आ पड़ा। मन्दराचल और सुमेरु पर्वत जलकर गिरने लगे और अग्नि की ज्वाला ऊँचे उठकर भड़भड़ शब्द करने लगी।
हे राम ! इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व जलने लगा। बड़ा क्षोभ हुआ और जहाँ कुछ रस था सो सब सूख गया। हे राम ! जिसको अज्ञानी रस कहते हैं, वह सब विरस है। परन्तु अपने-अपने काल में सब रस- संयुक्त दिखते हैं। उस समय में मुझको सब ऐसे लगे, जैसे जली हुई बेल होती है। हे राम ! इस प्रकार मैंने सब विश्व जलता देखा, परन्तु ज्ञान से जिसका अज्ञान नष्ट हुआ था, वह सुखी दिखता था और सब अग्नि में जलते देख पड़ते थे और बड़े भयानक शब्द होते थे। शिव का जो कैलास पर्वत है, उसके निकट जब अग्नि आई, तब सदाशिव ने अपने नेत्र से अग्नि प्रकट की, जिससे बड़ा क्षोभ हुआ और ब्रह्माण्ड जलने लगा। तब महापवन चला जिससे बड़े पर्वत उड़ने लगे—जैसे तृण उड़ते हैं। जो स्थान जले थे, उनकी आँधी होकर वृक्षों के स्थान भी उड़ने लगे। निदान बड़ा क्षोभ प्रकट हुआ और इन्द्रियादिक देवता अपने स्थान को त्यागकर ब्रह्मलोक में चले गये। बड़े मेघ, जो जल से पूर्ण थे, सूखकर जलने लगे। कल्परूपी पुतली नृत्य करने लगी। जले स्थानों में जो धुआँ निकलता था, वह उसके केश थे और प्रलय का शब्द उसका बोलना था। बड़ा पवन चलने लगा, पर्वत जलकर उड़ने लगे और सुमेरु आदिक पर्वत तृणों की नाईं उड़ते थे। निदान जीवों को बड़ा कष्ट हुआ, जो कहा नहीं जाता।
इति० नि० जगद्ब्रह्मप्रलयवर्णनन्नामशताधिकद्विनवतितमस्सर्गः ॥ १६२ ॥
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५८१
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब अग्नि से सब स्थान जल गये, तब उसके उपरान्त पुष्कल मेघ गर्जकर वर्षने लगे । प्रथम मूसल सी, फिर खंभा सी धारा वर्षी । फिर नदी की नाईं और फिर महानद् की नाईं मेघ बरसने लगे, जिनका गङ्गा यमुना नदी लहरें थीं । उनमे सब स्थान शीतल हो गये—जैसे तीनों तापों से जला हुआ अज्ञानी सन्तों के संग से शीतल होता है । हे राम ! फिर ऐसा जल बढ़ा, जिससे सुमेरु आदि पर्वत नृत्य करने लगे । जैसे समुद्र में झाग होते हैं, वैसे ही हो गये, अथवा ऐसे जान पड़ते थे, जैसे जलचर होते हैं । हे राम ! ऐसा जल बढ़ा कि कहा नहीं जाता । बड़े-बड़े स्थान और देवता, सिद्ध, गन्धर्व बहे जाते थे । जिनको अज्ञानी परमार्थ जानकर सेवन करते हैं, वे भी बहते देख पड़े । जैसे कोई पुरुष कष्टक के अन्धे कूप में गिरके दुःख पावे, वैसे ही वे दीखे, पर मुझको सब ब्रह्म ही देख पड़ता था । पर जब संकल्प की ओर देखता, तब महाप्रलय दीखता और मेघ गर्जते घटा होकर दिखाई देते थे । निदान ब्रह्मलोक तक जल चढ़ गया और मैं देखकर आश्चर्य को प्राप्त हुआ ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मजलमयवर्णनं नाम शताधिकत्रिनवतितमसर्गः ॥ १६३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! उस ब्रह्मा का जगत् जलमय हो गया और मुझे जल से भिन्न कुछ न देख पड़ा, सब शून्य ही देख पड़ा । ऊपर, नीचे और मध्य दिशा भी न दिखती थी । न कोई तत्त्व, न कोई पर्वत, न कोई देवता, न पशु और न पक्षी देख पड़ते थे । तब मैंने ब्रह्मपुरी को देखा कि इसकी क्या दशा है । फिर जैसे प्रातःकाल का सूर्य अपनी ज्योति को फैलाता है, वैसे ही मैंने ब्रह्मपुरी को दृष्टि फैलाकर देखा । तब ब्रह्माजी मुझको परम समाधि में देख पड़े, और भी जो जीवन्मुक्त ब्रह्मा के सभासद थे, वे भी सब पद्मासन से परमसमाधि लगाये बैठे थे । जैसे पत्थर की मूर्ति हो, वैसे ही सब परमसमाधि में अचल स्थित थे । उनमें संवेदन का फुरना नहीं था । चारों वेद मूर्ति धारण किये और बृहस्पति, वरुण, कुबेर, इन्द्र, यम, चन्द्रमा, अग्नि, देवता इत्यादि ऋषीश्वर मुनीश्वर
५८२ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
आदि सब जीवन्मुक्तों को मैंने ध्यान में स्थित देखा। द्वादश सूर्य भी जो विश्व को तपाते थे, वे पद्मासन लगाकर समाधि में स्थित थे। एक मुहूर्त तक मैंने इसी प्रकार देखा। जब एक मुहूर्त बीता, तब सूर्य के सिवा सब अन्तर्धान हो गये। जैसे स्वप्न की सृष्टि अपने में विद्यमान होती है और जागने से उसकी अभावना हो जाती है, वैसे ही मेरे देखते-देखते ब्रह्मपुरी शून्य वन की नाईं उजाड़ हो गई। जैसे राजपातन में मार्गप्रलय हो जाते हैं, वैसे प्रलय हो गया।
हे राम ! जैसे स्वप्न में मेघ गर्जते दिखते हैं, और यह दृष्टान्त तो बालक भी जानते हैं कि प्रत्यक्ष अनुभव को छिपाते हैं, वे मूर्ख हैं। मैं अनुभव से भी जानता हूँ, स्मृति भी होती है और सुना भी है कि जब तक निद्रा है, तब तक स्वप्न की सृष्टि दिखती है और जागने पर उसका अभाव होता है, वैसे ही जब तक ब्रह्मा की वासना थी, तब तक सृष्टि थी, जब वासना क्षय हुई, तब सृष्टि कहाँ रही ? जब वासना नष्ट होती है, तब आन्तर्वाहक आधिभौतिक शरीर नहीं रहते। हे राम ! जब शुद्धमात्र पद में चित्तशक्ति स्फूरती है, तब पिण्डाकार होकर भासित होती है। और जबतक वह शरीर है, तबतक संसार उपजता है और नष्ट भी होता है। वैसे ही ब्रह्मा की सुषुप्ति में जगत् लीन हो जाता है और जाग्रत में उत्पन्न होता है; क्योंकि ब्रह्मा के शरीर का सुषुप्ति में लीन होना ही प्रलय है। यदि कहिये कि इस शरीर के नाश का नाम महाप्रलय हो तो ऐसा नहीं है; क्योंकि मृतक हुए शरीर का नाश होता है और फिर लोक भासित होता है। और जो कहिये कि जैसे वह परलोक भ्रममात्र है, वैसे ही यह भी भ्रान्तिमात्र है, इसी का नाम महाप्रलय है, तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि श्रुति, स्मृति और पुराण सब कहते हैं कि महाप्रलय में कुछ नहीं रहता, केवल आत्मसत्ता ही रहती है। और जो कहिये कि परलोक भ्रान्तिमात्र है, इसका नाश होना क्या है तो श्रुति और शास्त्र का कहना व्यर्थ होता है और जो उनका कहना व्यर्थ हो तो उनके कहने से ब्रह्माकार वृत्ति किसी की उत्पन्न न हो। जो तुम कहो कि जैसे अङ्गवाला अङ्ग को सिकोड़ लेता है, वैसे ही स्थूल भूत
- निर्वाण प्रकरण * ५८३
सिमट कर अपने सूक्ष्मकारण में जाकर लीन होते हैं, इसी का नाम महाप्रलय है, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सूक्ष्मभूत के रहने महाप्रलय नहीं होता । और जो तुम कहो कि संवेदन जो अज्ञान है, जिसमें अहं फुरता है, उसका नाम महाप्रलय है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि मूर्च्छा में जीव को अज्ञान होता है, परंतु फिर सृष्टि भासित होती है और मृत्यु होती है । सो मृत्यु वही मूर्च्छा है । पर उसमें भी फिर पाञ्च-भौतिक शरीर भासित होता है और आगे जगत् भासित होता है । इसमें इसका नाम भी महाप्रलय नहीं । जो तुम कहो कि जबतक यह पाञ्च-भौतिक शरीर है, तबतक जगत् है और इसका अभाव होने पर महाप्रलय होता है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि जब शरीर को जीव छोड़ता है और उसकी क्रिया नहीं होती तो वह पिशाच होता है ।
इस शरीर का जब नीरूप होना है और मनुष्य शव हो जाता है, तब क्षत्रिय-ब्राह्मण की संज्ञा नहीं रहती । इससे तुम देखो कि केवल देह का नाश भी महाप्रलय नहीं है और प्रमाद से विपर्यय का नाम भी महाप्रलय नहीं है । महाप्रलय उसको कहते हैं, जिसमें सबका अभाव हो जाय । और सबका अभाव तब होता है, जब वासना का क्षय हो जाता है । इसलिए वासना के क्षय को ज्ञानी लोग निर्वाण कहते हैं । जैसे जबतक निद्रा है, तब तक स्वप्न का जगत् दिखता है और जाग्रत में स्वप्न के जगत् का अभाव हो जाता है, वैसे ही जबतक वासना है, तबतक जगत् है, जब वासना का क्षय होता है, तब जगत् का अभाव होता है । हे राम ! वासना भी फुरती नहीं, आभासमात्र है । जो तुम कहो कि आमता क्यों है ? तो जो कुछ भासित होता है, वह सर्व अपने भाव में आप स्थित है । हे राम ! उत्थान होने का नाम बन्धन है और उत्थान के मिटने का नाम मोक्ष है । हे राम ! नेत्र के खोलने और मूँदने में भी कुछ यत्न है, पर मुक्त होने में कुछ यत्न नहीं । जो वृत्ति बहिर्मुख हुई तो बन्धन हुआ और वृत्ति अन्तर्मुख हुई तो मुक्त हुआ । इसमें क्या यत्न है । इसलिए सुषुप्त की नाईं निर्वासनिक हो जाओ । जब अहंसंवेदन फुरता है, तब मिथ्या जगत् सत्य सा भासित होता है । आगे तुम्हारी जो