योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
अनुक्रमणिका ३
| सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क | सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क | सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| निर्वाणप्रकरण उत्तरार्द्ध | पादन | ५८४ | २२४ | महाशववृत्तान्त | ७०७ | |||
| १६६ | स्वभावसत्तायोगोपदेश | ५०० | १९६ | देवीरुद्रोपाख्यान | ५८७ | २२५ | स्वयंमाहात्म्यवृत्तान्त | ७०८ |
| १६७ | मोक्षोपदेश | ५०२ | १९७ | अन्तरोपाख्यान | ५९० | २२६ | मल्लरणव्याध | ७११ |
| १६८ | विवेकद्रुम | ५०७ | १९८ | पुरुषप्रकृतिविचार | ५९२ | २२७ | हृदयन्तरस्वप्नमहाप्रलय | ७१४ |
| १६९ | सर्वसमताउपदेश | ५१० | १९९ | अनन्तजगत् | ६०२ | २२८ | हृदयन्तरप्रलयाग्निदाह | ७२२ |
| १७० | सप्तप्रकारजीवसृष्टि | ५१४ | २०० | अन्तरोपाख्याने पृथ्वीधातु | ६०५ | २२९ | कर्मनिर्णय | ७२६ |
| १७१ | सर्वशान्तिउपदेश | ५१६ | २०१ | अन्तरोपाख्याने जलरूप | ६०८ | २३० | महाशवोपाख्याने निःसङ्गोपदेश | ७३० |
| १७२ | ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादन | ५२१ | २०२ | अन्तरोपाख्याने चिद्रूप | ६१० | २३१ | कार्यकारणनिर्णय | ७३६ |
| १७३ | निर्वाणनिरूपण | ५२४ | २०३ | ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादन | ६१३ | २३२ | जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिविचार | ७४० |
| १७४ | द्वैतएकताप्रतिपादन | ५२५ | २०४ | आकाशकुटीसिद्धसमाधियोग | ६१५ | २३३ | जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति | ७४१ |
| १७५ | परमशान्तिनिर्वाण | ५२७ | २०५ | अन्तरोपाख्यान | ६२१ | २३४ | सुषुप्ति | ७४४ |
| १७६ | आकाशकुटीविशिष्टसमाधि | ५२८ | २०६ | अन्तरोपाख्यान समाप्ति | ६२६ | २३५ | तथा | ७४६ |
| १७७ | विदितवेद्यअहंकार | ५३१ | २०७ | मुक्तसंज्ञा | ६२६ | २३६ | स्वप्ननिर्णय | ७४७ |
| १७८ | ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादन | ५३३ | २०८ | जीवन्मुक्त व्यवहार | ६३४ | २३७ | स्वप्नविचार | ७५२ |
| १७९ | जगज्जालसमूह | ५३५ | २०९ | परमार्थरूप | ६३६ | २३८ | रात्रिसंवाद | ७५५ |
| १८० | जगज्जालनिरूपण | ५३८ | २१० | नास्तिकवादीनिराकरण | ६४० | २३९ | रात्रिप्रबोध | ७६० |
| १८१ | बोधजगदेकताप्रतिपादन | ५४२ | २११ | परमउपदेश | ६४५ | २४० | यथार्थोपदेश | ७६१ |
| १८२ | जगदेकताप्रतिपादन | ५४५ | २१२ | चैतन्य आकाशपरमज्ञान | ६४७ | २४१ | भविष्यत्कथा | ७६३ |
| १८३ | विद्याधरीविशोक | ५४८ | २१३ | सर्वपदार्थभाव | ६५४ | २४२ | सिद्धिनिर्वाण | ७६७ |
| १८४ | विद्याधरीवेग | ५५२ | २१४ | जाग्रत्स्वप्नेकताप्रतिपादन | ६६३ | २४३ | विपश्चित्देशान्तरभ्रम | ७७१ |
| १८५ | विद्याधरी अभ्यास | ५५७ | २१५ | जगन्निर्वाण | ६६७ | २४४ | स्वर्गनरकप्रारब्ध | ७७५ |
| १८६ | प्रत्यक्षप्रमाणजगतन्निशकरण | ५६१ | २१६ | कारणकार्याभाव | ६६६ | २४५ | निर्वाणउपदेश | ७८१ |
| १८७ | शिलास्तरवशिष्ठब्रह्मसंवाद | ५६५ | २१७ | अभावप्रतिपादन | ६७२ | २४६ | अविद्यानाशोपदेश | ७८४ |
| १८८ | अन्यजगतप्रलय | ५७० | २१८ | विपश्चित्समुद्रप्राप्ति | ६७३ | २४७ | इन्द्रिययज्ञ | ७८७ |
| १८९ | निर्वाणनिरूपण | ५७२ | २१९ | जीवन्मुक्तलक्षण | ६७८ | २४८ | ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादन | ७९२ |
| १९० | विराट् आत्मा | ५७४ | २२० | विपश्चिदुपाख्यान | ६८० | २४९ | जाग्रत्स्वप्नप्रतिपादन | ७९४ |
| १९१ | विराट् शरीर | ५७८ | २२१ | विपश्चित्शरीरप्राप्ति | ६८५ | २५० | शिलोपाख्यानसमाप्ति | ७९५ |
| १९२ | जगत्त्रयप्रलय | ५७६ | २२२ | वटधानोपाख्यान | ७०० | २५१ | जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिअभाव | ७९८ |
| १९३ | ब्रह्मजलमय | ५८१ | २२३ | विपश्चित्कथा | ७०३ | २५२ | शालभञ्जनकोपदेश | ८०२ |
| १९४ | वासनाक्षयप्रतिपादन | ५८१ | २५३ | जीवन्मुक्तलक्षण | ८०७ | |||
| १९५ | जगन्मिथ्यात्वप्रति- |
४ योगवासिष्ठ
| सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क | सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क | सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २५४ | जीवन्मुक्तिबाह्य-लक्षणव्यवहार | ८१० | २६६ | ब्राह्मणसद्विषयत-राज्यप्राप्ति | ८४६ | २७८ | गुरुशास्त्रउपमा | ८९५ |
| २५५ | द्वैतएकताअभाव | ८१३ | २६७ | कुन्ददन्तोपदेश | ८५३ | २७९ | विश्रामप्रकटी-करण | ८९८ |
| २५६ | स्मृतिअभावजगत्-परमाकाश | ८१६ | २६८ | कुन्ददन्तविश्राम-प्राप्ति | ८५८ | २८० | निर्माणनिरूपण | ९०७ |
| २५७ | ब्रह्मजगदेकताप्रति-पादन | ८२० | २६९ | ब्रह्मप्रतिपादन | ८६० | २८१ | चिदाकाशजगदेकता प्रतिपादन | ९०६ |
| २५८ | ब्रह्मगीतापरम-निर्वाण | ८२२ | २७० | जीवसंस्मरण | ८६८ | २८२ | जगदभाव | ९११ |
| २५९ | परमार्थगीता | ८२५ | २७१ | सब्रह्मरूपप्रति-पादन | ८७२ | २८३ | प्रश्न | ९१४ |
| २६० | ब्रह्माण्डोपाख्यान | ८२६ | २७२ | विद्यावादप्रबोधो-पदेश | ८७४ | २८४ | प्रश्नोत्तर | ९१६ |
| २६१ | ब्रह्मगीता | ८३१ | २७३ | रामविश्रान्ति | ८८५ | २८५ | द्वितीय प्रश्नोत्तर | ९१८ |
| २६२ | इन्द्राख्यान | ८३५ | २७४ | तथा | ८८७ | २८६ | राजप्रश्नोत्तर-समाप्ति | ९२० |
| २६३ | सर्वब्रह्मप्रतिपादन | ८३६ | २७५ | तथा | ८८८ | २८७ | पूर्व रामकथा | ९२३ |
| २६४ | ब्रह्मगीतोपाख्यान | ८४१ | २७६ | तथा | ८९० | २८८ | उत्साह | ९२७ |
| २६५ | ब्राह्मणकथा | ८४६ | २७७ | चिन्तामणिसमाप्ति | ८९३ | २८९ | मोक्षोपाय<br>इति | ९२८ |
श्रीगणेशाय नमः
श्रीयोगवाशिष्ठ
द्वितीय भाग
निर्वाण प्रकरण प्रारम्भ
वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! उपशम प्रकरण के अनन्तर अब तुम निर्वाण प्रकरण सुनो, जिसके जानने से तुमको निर्वाणपद प्राप्त होगा । मुनिनायक ने रामजी से बड़े उत्तम वचन कहे और रामजी ने सब ओर से मन खींचकर मुनीश्वर के वाक्यों में लगाया । राजा लोग भी निस्पन्द हो गये, मानों कागज पर चित्र लिखे हैं—और वशिष्ठजी के वचनों को विचारने लगे । राजकुमार भी विचारते, गर्दन हिलाते और अपने सिर पर हाथ फेरते विस्मय-मग्न हो गये । उन्हें यह जानकर प्रसन्नता के साथ ही आश्चर्य भी हुआ कि जिस जगत् को सत्य जानकर वे तल्लीन हो रहे थे वह है ही नहीं । तब दिन का चतुर्थ भाग रह गया और सूर्य अस्त हुए—मानों वशिष्ठजी के वचन सुनकर सूर्य भी कृतार्थ हुए । उनका ताप घट गया और शीतलता प्राप्त हुई । स्वर्ग से जो सिद्ध और देवता आये थे, उनके गले में मन्दार आदि वृक्षों के फूलों की मालाएँ थीं । उनसे पवन के द्वारा सब स्थान सुगन्धित हो गये । भँवरे फूलों पर गुञ्जार करने लगे । झरोखों के मार्ग से सूर्य की किरणें जो आती थीं, उनसे सूर्यमुखी कमल, जो राजा और देवताओं के सीस पर थे, वैसे ही सूख गये, जैसे मन से जगत् की सत्ता निवृत्त हो जाती है और वृत्ति सकुचती जाती है । सभा में जो बालक और पिञ्जरों में जो पक्षी बैठे थे, उनके भोजन का समय हुआ । बालकों को भोजन कराने के निमित्त माताएँ उठीं । जब चौथे पहर राजद्वार पर नौबत, नगाड़े, भेरी, शहनाई आदि बाजे बजने लगे और
२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
वशिष्ठजी, जो बड़े ऊँचे स्वर से कथा कहते थे, उनका शब्द नगाड़े और बाजों से दब गया, तब—जैसे वर्षाकाल का मेघ गरजता है और मोर बोलकर चुप हो जाते हैं, वैसे ही वशिष्ठजी चुप हो गये । ऐसा शब्द हुआ जो आकाश, पृथ्वी और सब दिशाओं में भर गया । पिञ्जरों में पक्षी पंखों को फैलाकर भड़ भड़ शब्द करने लगे—जैसे भूकम्प में लोग काँपते और शब्द करते हैं । बालक माताओं के शरीर से लपट गये ।
इसके अनन्तर मुनिशार्दूल वशिष्ठजी बोले कि हे निष्पाप, रघु-नाथ ! मैंने तुम्हारे चित्तरूपी पक्षी को फँसाने के निमित्त अपना वाकरूपी जाल फैलाया है, इससे अपने चित्त को वश करके तुम आत्मपद में लगो । हे राम ! यह जो मैंने तुमको उपदेश किया है, उसके सार में, दुर्बुद्धि को त्यागकर, चित्त लगाओ । जैसे हंस जल को त्यागकर दूध पान करता है, वैसे ही आदि से अन्त पर्यन्त सब उपदेश बारम्बार विचारकर सार को अङ्गीकार करो । इस प्रकार संसार-समुद्र से तरकर परमपद को प्राप्त होगे । अन्यथा नहीं । हे राम ! जो इन वचनों को अङ्गीकार करेगा, वह संसारसमुद्र तर जावेगा और जो अङ्गीकार न करेगा वह नीच गति को प्राप्त होगा । जैसे विन्ध्याचल पर्वत की खाईं में हाथी गिरकर कष्ट पाता है वैसे ही वह संसार में कष्ट पावेगा । हे राम ! ये जो मेरे वचन हैं, इनको ग्रहण न करोगे तो वैसे ही नीचे गिरोगे जैसे पथिक हाथ से दीपक त्याग कर रात को गढ़े में गिरता है । जो असंग होकर व्यवहार में विचरोगे तो आत्मसिद्धि को प्राप्त होगे । यह जो मैंने तुमको तत्त्वज्ञान, मन का दमन और वासना का क्षय कहा है, इसके अभ्यास से सिद्धि को प्राप्त होगे । यह शास्त्र का सिद्धान्त है। हे सभासदो ! हे महाराजौ, हे राम, लक्ष्मण और भूपति लोगो, जो कुछ मैंने तुमसे कहा है उसको तुम विचारो; जो कुछ और कहना है उसे मैं प्रातःकाल कहूँगा ।
इतना कह वाल्मीकिजी बोले, हे साधो ! इस प्रकार जब मुनीश्वर ने कहा तब सब सभा उठ खड़ी हुई और वशिष्ठजी के वचनों को सुन-
❁ निर्वाण प्रकरण ❁
३
कर सब वैसे ही खिल उठे, जैसे सूर्य को पाकर कमल खिल उठता है । वशिष्ठ और विश्वामित्र दोनों एक साथ उठे । वशिष्ठजी विश्वामित्र को अपने आश्रम में ले गये । आकाशचारी देवता और सिद्ध वशिष्ठजी को नमस्कार करके अपने अपने स्थानों को गये । राजा दशरथ अर्घ्य और पाद्य से वशिष्ठजी का पूजन करके अपने अन्तःपुर में गये । श्रोता लोग भी आज्ञा लेकर और वशिष्ठजी का पूजन करके अपने अपने स्थान को गये । राजकुमार अपने मण्डल को गये, मुनीश्वर वन में गये और राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न वशिष्ठजी के आश्रम को गये । फिर पूजा करके अपने गृह में आये । सब श्रोता अपने अपने स्थान में जाकर स्नानसन्ध्यादिक कर्म करने लगे । पितरों और देवताओं की पूजा और ब्राह्मणों से लेकर भृत्यपर्यन्त सबको भोजन कराकर उन्होंने अपने अपने मित्रों और भाइयों के साथ भोजन किया और यथाशक्ति अपनेवर्णाश्रम धर्म को साधा । सूर्य भगवान् अस्त हुए और दिन की क्रिया निवृत्त हो गई । रात्रि हुई और निशाचर विचरने लगे । तब भूचर, राजऋषि और राजपुत्र आदि जो श्रोता थे वे रात्रि को एकान्त में अपने अपने आसन पर बैठकर विचारने लगे । राजकुमार और राजा अपने अपने स्थान पर बैठे । ब्राह्मण, तपस्वी कुशासन आदि बिछाकर बैठे विचारते थे कि वशिष्ठजी ने संसार से उद्धार का क्या उपाय कहा है । वशिष्ठजी ने जो कहा था उसमें चित्त को एकाग्र कर और भले प्रकार विचार कर सब सो गये । जैसे सूर्य उदय होने पर कोकावेली मूँद जाती हैं, वैसे ही वे सब निद्रित हुए । पर राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न तीन पहर वशिष्ठजी के उपदेश को विचारते रहे और आधे पहर सोकर फिर उठे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे दिवसरात्रिव्यापारवर्णनं नाम प्रथमस्सर्गः ॥ १ ॥
वाल्मीकिजी बोले, हे साधो ! इस प्रकार सब रात व्यतीत हुई और तम का नाश हुआ तब राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न आदि स्नान और सन्ध्या आदि कर्म करके वशिष्ठजी के आश्रम में उपस्थित हुए । वशिष्ठजी भी सन्ध्यादिक करके अग्निहोत्र करने लगे । जब वह नित्यकर्म कर
४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
चुके तब राम आदि ने उनकी अर्घ्य पाद्य से पूजा की और चरणों पर सिर रखकर प्रणाम किया। जब रामजी गये थे, तब वशिष्ठजी के पास कोई न था; पर एक घड़ी में अनेक सहस्र प्राणी आ गये। वशिष्ठजी राम आदि को साथ लेकर राजा दशरथ के भवन में आये। तब राजा दशरथ उनके स्वागत और अगवानी को आगे आये। उन्होंने वशिष्ठजी का आदर व पूजन किया। दूसरे लोगों ने भी बहुत पूजन किया। निदान नभचर और भूचर जितने श्रोता थे, वे सब आये और नमस्कार करके निस्पन्द और एकाग्र होकर बैठे। जैसे वायु के न चलने पर कमलों की पंक्ति अचल होती है वैसे ही निश्चल होकर वे सब बैठे। भाटजन जो स्तुति करने वाले थे वे भी एक ओर बैठे। सूर्य की किरणें झरोखों के मार्ग से आईं—मानों किरणें भी वशिष्ठजी के वचन सुनने को आई हैं। तब वशिष्ठजी की ओर रामजी ने वैसे ही देखा, जैसे स्वामिकार्त्तिक शंकर की ओर, कच बृहस्पति की ओर और प्रह्लाद शुक्र की ओर देखें। जैसे भ्रमर भ्रमता भ्रमता आकाशमार्ग से कमल पर आ बैठता है वैसे ही रामजी की दृष्टि औरों को देखते-देखते वशिष्ठजी पर आकर टिक गई।
तब वशिष्ठजी ने रामजी की ओर देखा और बोले, हे रघुनन्दन! मैंने जो तुमको उपदेश किया है, वह तुमको कुछ स्मरण है? वे वचन परमार्थबोध के कारण, आनन्दरूप और महा गम्भीर हैं। अब और भी बोध देनेवाले और अज्ञानरूपी शत्रु के नाशक वचनों को सुनो। निरन्तर आत्मसिद्धान्त शास्त्र मैं तुमसे कहता हूँ। हे रामजी! जीव वैराग्य और तत्त्व के विचार से संसारसमुद्र को तरता है। सम्यक्तत्त्व के बोध से जब दुर्बोध निवृत्त हो जाता है, तब वासना का आवेश नष्ट हो जाता है और परमानन्द पद प्राप्त होता है। वह पद देशकाल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है। वही एकमात्र ब्रह्म जगतरूप होकर स्थित है और भ्रम से द्वैत की भाँति प्रतीत होता है। वह सब भावों से अविच्छिन्न सर्वत्र व्याप्त ब्रह्म है, इस प्रकार महत् स्वरूप जानकर शान्ति पाओ। हे राम! केवल ब्रह्मतत्त्व अपने आप में स्थित है। न
❊ निर्वाण प्रकरण ❊
५
कुछ चित्त है, न अविद्या है, न मन है, न जीव है। यह सब कलना ब्रह्म में भ्रम से फुरती है। जो स्पन्द फुरना दृश्य और चित्त है सो कलनारूप संभ्रम है। केवल ब्रह्म में कोई पदार्थ नहीं। हे राम ! स्वर्ग, पाताल और भूमि में सदाशिव से तृण पर्यन्त जो कुछ दृश्य है वह सब परब्रह्म है—चिद्रूप से अन्य नहीं। उदासीन और मित्र बांधव से लेकर सब कुछ ब्रह्म ही है। जब तक अज्ञान कलना से जगत् में बुद्धि स्थित है और ब्रह्मभाव में नानात्व है, तभी तक चित्तादि की कलना होती है। जब तक देह में अहंभाव है और अनात्मदृश्य में ममत्व है तभी तक चित्त आदि का भ्रम होता है और जब तक सन्त जन और सत्-शास्त्रों के उपदेश से ऊँचे पद को जीव नहीं पाता और मूर्खता क्षीण नहीं होती तभी तक चित्त आदि का भ्रम होता है।
हे राम ! जब तक देहाभिमान शिथिल नहीं होता, संसार की भावना नहीं मिटती और सम्यक्ज्ञान द्वारा स्थिति नहीं प्राप्त होती, जब तक चित्त आदिक प्रकट हैं, तभी तक जीव अज्ञान से अन्धा होकर विषयों की आशा के आवेश से मूर्च्छित रहता है और मोह मूर्च्छा से नहीं उठ पाता, तभी तक चित्त आदि की कलना होती है। हे राम ! जब तक आशारूपी विष की गन्ध हृदयरूपी वन में होती है तबतक विचाररूपी चकोर नहीं प्राप्त होता और भोगवासना नहीं मिटती। जब भोगों की आशा मिट जाती है और सत्य शीतलता और सन्तोष हृदय में उत्पन्न होती है, तब चित्तरूपी भ्रम निवृत्त हो जाता है। जब जीव का मोह और तृष्णा निवृत्त होकर नित्य अभ्यास हो जाता है, तब चित्त शान्त भूमिका को प्राप्त होता है। हे राम ! जो पुरुष स्वरूप में स्थित होता है वह अपने को देह से भिन्न देखता है। उस सम्यक्दर्शी के चित्त की भूमिका सुनो। जब अनन्त चेतनतत्त्व की भावना होती है और जीव दृश्य को त्यागकर आत्मरूप को जान लेता है, तब वह सब जगत् को अपना अंग ही देखता है अर्थात् सर्वत्र अपना स्वरूप देखता है। ऐसे जो आत्मरूप देखता है, उसको जीवत्वादिक भ्रम कहाँ है ? जब अज्ञान भ्रम निवृत्त होता है तब परम अद्वैत पद उदय होता है। जैसे
६
<div align="center">☸ योगवाशिष्ट ☸</div>रात्रि के क्षीण होने पर सूर्य उदय होता है वैसे ही मोह के निवृत्त होने पर आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होता है और जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है तब चित्त नष्ट हो जाता है। जैसे सूखा पत्ता अग्नि में जल जाता है वैसे ही ज्ञानवान् की चित्त उपाधि नष्ट हो जाती है।
हे राम! जो जीवन्मुक्त महात्मा और परावरदर्शी पुरुष है, जिसको सर्वत्र ब्रह्म ही दीखता है। उसका चित्त सत्यपद को प्राप्त होता है। वह चित्त सत्य कहाता है और उसमें वासना भी नहीं देख पड़ती। वह चैतन्य मन है और वह चित्त सत्यपद को प्राप्त हुआ होता है। यह जगत् ज्ञानवान् को लीलामात्र भासित होता है। वह हृदय से शान्तिरूप और नित्य तृप्त है। उसको सर्वदा आत्मज्योति भासित होती है। विवेक द्वारा उसके चित्त से जगत् की सत्ता निवृत्त हो गई है और उसने स्व-रूप में स्थिति पाई है। यह चित्तसत्ता कहाती है। फिर वह कर्म-चेष्टा करता भी देख पड़ता है और मोह को नहीं प्राप्त होता। जैसे भुना बीज नहीं उगता, वैसे ही ज्ञानी की चेष्टा जन्म का कारण नहीं होती। पर जो अज्ञानी हैं उनकी वासना मोहसंयुक्त है। जैसे कच्चा बीज उगता है, वैसे ही अज्ञानी वासना से फिर फिर जन्म लेता है। पर जिस चित्त की आसक्ति निवृत्त हो गई है उसकी वासना जन्म का कारण नहीं होती। वह चित्तसत्ता कहाती है। हे राम! जिन पुरुषों ने पाने योग्य पद पाया है और ज्ञानाग्नि से चित्त दग्ध किया है वे फिर जन्म नहीं लेते। जो कुछ जगत् है, वही सब उनकी दृष्टि में ब्रह्मरूप है, जैसे वृक्ष और तरु नाममात्र को दो हैं पर वास्तव में एक ही हैं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् नाममात्र को दो हैं पर वास्तव में एक ही हैं। जैसे जल में तरङ्ग और बुलबुले जलरूप हैं वैसे ही ब्रह्म में जगत् ब्रह्मरूप है। चैतन्य आत्मारूपी मिरच में जगत्रूपी तीक्ष्णता है।
हे राम! ऐसे ब्रह्म तुम हो। जो तुम कहो कि मैं चित्त नहीं, तो यह कुछ माना जाता है, क्योंकि जो तुम कहो कि मैं जड़ हूँ तो तुम आकाशवत् हुए। तुम में फिर कलना का उल्लेख कैसे हो? जो चैतन्य हो तो शोक किसका करते हो और जो चिन्मय हो तो निरायास
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ <span style="float:right;">७</span>
आदि अन्त से रहित हुए। निदान सब तुम ही हो। अपने स्वरूप को स्मरण करो, तब शान्ति पाओगे। तुम सब भावों में स्थित हो और सबको उदय करनेवाले शान्तरूप, चैतन्य ब्रह्मरूप हो। हे रामजी ! ऐसी जो चैतन्यरूपी शिला है उसके उदय में वासनारूपी फुरना कहाँ हो ? वह तो महाघनरूप है। हे राम ! जो तुम हो वही ब्रह्म है, उसमें और तुम में कुछ भेद नहीं। वही ब्रह्म सत् और असतरूप होकर भासता है। उसके भीतर सब पदार्थ हैं, उसमें नानात्व और 'अहं' 'त्वं', 'अज्ञ', 'तज्ञ' की कुछ कलना नहीं। ऐसा जो सत्यरूप चिद्धन ब्रह्ममय आत्मा है, उसको नमस्कार है। हे राम ! तुम्हारी जय हो। तुम आदि और अन्त से रहित विशाल हो, शिला की तरह ठोस चिद्धनस्वरूप और आकाश की भाँति निर्मल हो। जैसे समुद्र में तरंगें हैं, वैसे ही तुम में जो जगत् है सो लीलामात्र है। तुम अपने घनस्वरूप में स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्रामदृढ़ीकरणं नाम द्वितीयसर्गः ॥ २ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे निष्पाप राम ! जिस चैतन्यरूपी समुद्र में जगतरूपी तरङ्ग उठते और लीन हो जाते हैं उस अनन्त आत्मभाव की भावना से मुक्त और भाव-अभाव से रहित तुम हो। ऐसा जो चिदात्म तुम्हारा स्वरूप है वही सब जगतरूप है; तब वासनादिक आवरण कहाँ हैं ? जीव और वासना सब आत्मा का किञ्चन है दूसरी वस्तु कुछ नहीं, तब और कथा और प्रसंग कैसे हो ? हे राम ! महासरल गम्भीर और प्रकाशरूप जो चैतन्य समुद्र है वह तुम्हारा रूप है और रामरूपी एक तरङ्ग उठ आया है। सो समुद्र तुम हो। ऐसा जो आत्मतत्त्व है वह जगतरूपी होकर व्यापारयुक्त भासित होता है। जैसे अग्नि से उष्णता, फूल से सुगन्ध, कज्जल से कालापन, बर्फ से सफेदी, गुड़ से मधुरता और सूर्य से प्रकाश भिन्न नहीं, वैसे ही ब्रह्म से अनुभव भिन्न नहीं। वह नित्य रूप है। अनुभव से अहं भिन्न नहीं, अहं जीव से भिन्न नहीं, जीव से मन भिन्न नहीं, मन से इन्द्रियाँ भिन्न नहीं, इन्द्रियों से देह भिन्न नहीं और देह से जगत् भिन्न नहीं। इस प्रकार महाचक्र जो प्रवृत्त
८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
हुआ है सो कुछ हुआ नहीं । न शीघ्र प्रवर्तन है न चिरकाल का प्रवर्त्ता है । न कोई न्यून है और न अधिक है । सर्वदा एक अखण्डसत्ता परमात्मात्त्व है । जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही ब्रह्मसत्ता अपने आप में स्थित है । वही सत्ता वज्रभूत और वही पूर्ण होकर स्थित है । द्वैतकल्पना कुछ नहीं । ऐसे जो पुरुष अपने स्वरूप में स्थित है, वह जीवन्मुक्त है । ऐसा जो ज्ञानवान् है वह मन, इन्द्रिय और शरीर की चेष्टा भी करता है, पर उसको कर्तव्य का लेप नहीं लगता ।
हे राम ! ज्ञानवान् को न कुछ त्यागने योग्य रहता है और न ग्रहण करने योग्य । यह सब पदार्थों से निर्लिप्त रहता है । जब तक इसको ग्रहण और त्याग की बुद्धि होती है तब तक यह संसार के सुख-दुःख का भागी होता है । जिसके लिए हेय ( त्यागने योग्य ) और उपादेश ( ग्रहण करने योग्य ) कुछ नहीं रहता, वह सुख-दुख का भागी नहीं होता । हे राम ! जो कुछ जगत् है, वह एक अद्वैत आत्मतत्त्व है, अन्य कुछ नहीं । जैसे घट मठ की उपाधि से आकाश नाना प्रकार का और समुद्र तरङ्गों से अनेक रूप भासित होता है पर नानात्वभाव को नहीं प्राप्त होता, वैसे ही आत्मा में नाना प्रकार का जगत् भासता है और नानात्व को नहीं प्राप्त होता । तुम ऐसे स्वरूप को जानकर उसमें स्थित हो, बाहर से अपने वर्णाश्रम का व्यवहार करो, पर हृदय से पत्थर की नाईं हर्ष-शोक से रहित स्थित हो । संवित्मात्र आत्मा को जो अपना रूप देखता है वही सम्यक्दर्शी है, उसका अज्ञान और मोह नष्ट हो जाता है । जैसे नदी का वेग मूलसहित तट के वृक्ष को काटता है वैसे ही आत्म-ज्ञान मोहसहित अज्ञान को काटता है । मित्रता, वैर, हर्ष, शोक, राग, द्वेष आदिक जो विकार हैं वे चित्त में रहते हैं, उसका तो चित्त नष्ट हो जाता है ।
हे राम ! ज्ञानी सोता भी देख पड़ता है, पर कदाचित् नहीं सोता । जिसका अनात्मा में अहंभाव निवृत्त हुआ है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह पुरुष चाहे इस लोक को मार डाले तो भी उसने किसी को नहीं मारा और न उसे कर्मबन्धन होता है । हे राम ! जो वस्तु न
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६
हो और न भासित हो उसको मायामात्र जानिये। ज्ञान से वह नष्ट हो जायगी। जैसे तेल के बिना दीपक शान्त हो जाता है वैसे ही ज्ञान से वासना का क्षय हो जाता है और चित्त अचित्त हो जाता है। जिसके लिए सुख-दुःख का ग्रहण-त्याग नहीं, वह जीवनमुक्त आत्मस्थित है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मैकप्रतिपादनं नाम तृतीयसर्गः ॥ ३ ॥
वशिष्टजी बोले, हे राम ! मन, बुद्धि, अहंकार और इन्द्रिय आदिक जो दृश्य पदार्थ हैं, वे सब वही अचिन्त्य चिन्मात्र है और जीव भी इससे अभिन्न है। जैसे सुवर्ण और भूषण में कुछ भेद नहीं, वैसे ही चिन्मात्र और जीवादिक अभिन्न हैं। जब तक चित्त अज्ञान में होता है तब तक जगत् (जन्म-मरण) का कारण होता है; पर जब ज्ञान अज्ञान नष्ट हो जाता है, तब चित्तादिक का अभाव हो जाता है। अध्यात्म-विद्या जो वेदान्तशास्त्र है उसके अभ्यास से अज्ञान नष्ट हो जाता है। जैसे अग्नि के तेज से शीत का अभाव हो जाता है वैसे ही अध्यात्म-विद्या के विचार और अभ्यास से अज्ञान नष्ट हो जाता है। जब तक अज्ञान का कारण तृष्णा उपशम को नहीं प्राप्त होती तभी तक अज्ञान है। जब तृष्णा नष्ट हो तब जानिये कि अज्ञान का अभाव हुआ। हे राम ! तृष्णारूपी विशूचिका रोग नष्ट करने का मन्त्र अध्यात्मशास्त्र ही है। उसके अभ्यास से तृष्णा क्षीण हो जाती है। जैसे शरत्काल में कुहरा नष्ट हो जाता है, वैसे ही आत्म अभ्यास से चित्त शान्त हो जाता है; और जैसे शरत्काल में मेघ नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही विचार से मूर्खता नष्ट हो जाती है। जब चित्त अचित्तता को प्राप्त होता है तब वासना-भ्रम क्षीण हो जाता है। जैसे तागे से मोती पिरोये होते हैं और तागे के टूटने से मोती भिन्न भिन्न हो जाते हैं, वैसे ही अज्ञान के नष्ट होने पर मन आदिक सब नष्ट हो जाते हैं। जो पुरुष अध्यात्मशास्त्र के अर्थ को नहीं धारण करते और न प्रीति ही करते हैं वे पापी कीटादिक नीचयोनि को प्राप्त होंगे।
हे कमलनयन ! तुममें जो कुछ मूर्खता और चञ्चलता थी, वह
१० ❊ योगवाशिष्ठ ❊
नष्ट हो गई है और जैसे पवन के ठहरने से जल अचल होता है, वैसे ही तुम स्थिर और भाव-अभाव से रहित परम आकाश के समान निर्मल पद को प्राप्त हुए हो । हे राम ! मैं ऐसा मानता हूँ कि मेरे वचनों से तुमको बोध हुआ है और विस्तृत अज्ञानरूपी निद्रा से तुम जागे हो । साधारण जीव भी मेरी वाणी से जग जाते हैं । फिर तुम तो अति उदार-बुद्धि हो । तुम्हारे जागने में क्या आश्चर्य है ? हे राम ! जब गुरु दृढ़ होता है और शिष्य भी शुद्धपात्र होता है, तब गुरु के वचन उसके हृदय में प्रवेश करते हैं । सो मैं गुरु भी समर्थ हूँ, मुझको अपना स्वरूप सदा प्रत्यक्ष है और सतशास्त्र के अनुसार मैंने वचन कहे हैं । तुम्हारा हृदय भी शुद्ध है, उसमें वे प्रवेश कर गये हैं । जैसे तप्त पृथ्वी के खेत में जल प्रवेश कर जाता है, वैसे ही तुम्हारे हृदय में हमारे वचनों ने प्रवेश किया है । हे राघव ! हम महानुभाव रघुवंशकुल के बड़े गुरु के गुरु हैं; तुमको हमारे वचन ग्रहण करना आता है । अब खेद से रहित होकर अपने प्रकृत आचार को करो । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार मुनीश्वर ने कहा । तब सूर्य अस्त होने लगे और सब सभा परस्पर नमस्कार करके अपने अपने स्थान को गई । रात्रि व्यतीत होने पर सूर्य की किरणों के निकलते ही सब फिर आ बैठे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्तभावाभाववर्णनं नाम चतुर्थःसर्गः ॥ ४ ॥
रामजी बोले, हे मुनीश्वर ! मैं परम स्वस्थ होकर अपने स्वरूप में स्थित हूँ और आपके वचनों की भावना से जगज्जाल के रहते भी मुझको शान्ति मिल गई है । आत्मानन्द से मैं तृप्त हुआ हूँ—जैसे बड़ी वर्षा से पृथ्वी तृप्त होती है—और प्रसन्नता को पाकर स्थित हूँ । सब ओर से केवल आत्मरूप मुझको भासता है और नानात्व का अभाव हुआ है । जैसे कुहरे से रहित दिशा और आकाश निर्मल भासता है वैसे ही सम्यकज्ञान से मुझको शुद्ध आत्मा भासता है और मोह निवृत्त हो गया है । मोहरूपी जङ्गल में जो तृष्णारूपी मृग और राग-
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ११
द्वेष आदिक धूल और कुहरा था सो सब निवृत्त हो गया है और ज्ञान-रूपी वर्षा से वह शान्त हो गया है। अब मैं आत्मानन्द को प्राप्त हुआ हूँ, जो आदि अन्त से रहित और अमृत है; बल्कि अमृत का स्वाद भी उसके आगे तुच्छ लगता है। ऐसे आनन्द से मैं अपने स्वभाव में प्राप्त हुआ हूँ। मैं राम अर्थात् सबमें रमनेवाला हूँ; मेरा मुझको नमस्कार है।
अब मैं सब सन्देह से रहित हूँ और सब संशय और विकार मेरे नष्ट हो गये हैं। जैसे प्रातःकाल होने से निशाचर और बैताल आदिक छिप जाते हैं, वैसे ही राग-द्वेषादिक विकारों का अभाव हुआ है और निर्मल विस्तीर्ण हिम की नाईं हृदयकमल में मैं स्थित हूँ। जैसे भँवरा फिरता फिरता कमल में आकर टिकता है, वैसे ही मैं आत्मरूपी सार में स्थित हूँ। अविद्यारूपी कलङ्क आत्मा को कहाँ था ? मैं तो निश्चय से निर्मल हूँ। जैसे सूर्य के उदय होने पर तम का अभाव हो जाता है वैसे ही मेरा संशय और अविद्या नष्ट हुई है। अब मुझे सर्वत्र आत्मा भासता है और कलना कोई नहीं है। भावित आकार अपने स्वरूप को प्राप्त हुआ। मैं पूर्व प्रकृति को देखकर हँसता हूँ कि क्या जानता था और क्या करता था। मैं तो नित्य शुद्ध, ज्यों का त्यों, आदि-अन्त से रहित हूँ। हे मुनीश्वर ! तुम्हारे वचनरूपी अमृत के समुद्र में मैंने स्नान किया है और उससे अजर अमर आनन्दपद को पाकर सूर्य से भी ऊँचे पद को प्राप्त हुआ हूँ। मैं वीतशोक होकर परम शुद्धता, समता, शीतलता और अद्वैत अनुभव को पा गया हूँ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे राघवविश्रान्तिवर्णनं नाम पञ्चमसर्गः ॥ ५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे महाबाहो ! फिर भी मेरे परम श्रेष्ठ वचन सुनो; यह तुम्हारे हित की कामना से मैं कहता हूँ। अब तुम आत्मपद को प्राप्त हुए हो; परन्तु बोध की वृद्धि के निमित्त फिर सुनो। इसके सुनने से अल्पबुद्धि भी आनन्दपद को प्राप्त होता है। हे राम ! जिसको अनात्म में आत्माभिमान है और आत्मज्ञान नहीं हुआ, उसको इन्द्रियरूपी शत्रु दुःख देते हैं; जैसे निर्बल पुरुष को चोर दुःख देते हैं। पर जो
१२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
आत्मपद में स्थित हुआ है, उसको इन्द्रियाँ दुःख नहीं देतीं । जैसे दृढ़ राजा के शत्रु भी मित्र हो जाते हैं, वैसे ही ज्ञानवान् के इन्द्रियगण मित्र होते हैं। जिन पुरुषों की देह में स्थिति-बुद्धि है और इन्द्रियों के विषय का सेवन करते हैं उनको बड़े दुःख प्राप्त होते हैं । हे राम ! आत्मा और शरीर का सम्बन्ध कुछ नहीं है । जैसे तम और प्रकाश परस्पर विलक्षण स्वभाव हैं, वैसे ही आत्मा और देह का परस्पर विलक्षण स्वभाव है ।
आत्मा सब विकारों से रहित, नित्यमुक्त, उदय-अस्त से रहित और सबसे निर्लिप्त है और सदा ज्यों का त्यों प्रकाशरूप भगवान् आत्मा सद्रूप है । उसका सम्बन्ध किससे हो ? देह जड़ और असत्य, अज्ञान-रूप, तुच्छ, विनाशी और अकृतज्ञ है । उसका उससे संयोग किस भाँति हो ? आत्मा चैतन्य, ज्ञान, सत् और प्रकाशरूप है । उसका देह के साथ कैसे संयोग हो ? अज्ञान से देह और आत्मा का संयोग भासता है । सम्यक्ज्ञान से संयोग का अभाव जान पड़ता है । हे राम ! ये मैंने निपुण वचन कहे हैं; बारम्बार इनका अभ्यास करने से संसारकृत मोह का अभाव हो जायगा । जब संसार का कारण मोह निवृत्त हुआ, तब फिर उसका सद्भाव न होगा । जब तक जीव अज्ञानरूपी निद्रा से दृढ़ होकर नहीं जागता, तब तक आवरण रहता है । जैसे निद्रा से जागने पर फिर निद्रा घेर लेती है, पर जब दृढ़ होके जागे तब फिर नहीं घेरती, वैसे ही दृढ़ अभ्यास से अज्ञान निवृत्त होने पर फिर आवरण न करेगा । इससे मोह और दुःख की निवृत्ति के अर्थ दृढ़ अभ्यास करो ।
हे राम ! आत्मा देह के गुण को अङ्गीकार नहीं करता । यदि देह के गुण अङ्गीकार करे तो आत्मा भी जड़ हो जाय । पर यह तो सदा ज्ञानरूप है और जो देह आत्मा का गुण परमार्थ से अङ्गीकार करे तो देह भी चेतन हो जाय । पर वह तो जडरूप है । उसको अपना ज्ञान कुछ नहीं । जब यथार्थ ज्ञान होता है, तब शरीर तुच्छ और जड़ भासित होता है । हे राम ! देह और आत्मा का कुछ सम्बन्ध नहीं । समवायसम्बन्ध भी नहीं । फिर इससे मिलकर वृथा दुःख को ग्रहण करने
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १३
से बढ़के और मूर्खता क्या है ? जब कुछ भी इसका समान लक्षण न हो, तब सम्बन्ध भी हो । पर जिसका कुछ भी समान लक्षण न हो, उसका सम्बन्ध कैसे हो ? आत्मा चैतन्य है, देह जड़ है, आत्मा सतरूप है, देह असतरूप है; आत्मा प्रकाशरूप है, देह तमरूप है; आत्मा निराकार है, देह साकार है; आत्मा सूक्ष्म है और देह स्थूल है । तो फिर आत्मा और देह का सम्बन्ध कैसे हो ? और जब इनका संयोग ही नहीं, तब दुःख किसको हो ? जैसे सूक्ष्म और स्थूल, दिन और रात्रि, ज्ञान और अज्ञान, धूप और छाया, सत् और असत् का सम्बन्ध नहीं होता, वैसे ही आत्मा और देह का संयोग नहीं होता । देह के सुख-दुःख से आत्मा को सुखी या दुःखी मानना मिथ्या भ्रम है । जरा-मरण, सुख-दुःख और भाव-अभाव आत्मा में रञ्चमात्र भी नहीं । यदि देह में अभिमान होता है तो जीव ऊँच-नीच जन्म पाता है । वास्तव में कुछ नहीं । केवल ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है और उसमें विकार कोई नहीं । जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब जल में होता है और जल के हिलने से प्रतिबिम्ब भी हिलता है, वैसे ही देह के सुख-दुःख से आत्मा में सुख-दुःखरूप विकार मूर्ख देखते हैं ।
आत्मा सदा निर्लेप है । जब यथाभूत सम्यक् आत्मज्ञान हो तब देह में स्थित होकर भी वह भ्रम को न प्राप्त हो । हे राम ! जब यथाभूत ज्ञान होता है, तब सत् को सत् और असत् को असत् जानता है । जैसे दीपक हाथ में होता है, तब सत्-असत् पदार्थ भासते हैं, वैसे ही ज्ञान से मनुष्य सत् असत् यथार्थ जानता है, और वैसे ही अज्ञान से मोह में भ्रमता है । जैसे वायु से पत्र भ्रमता है, वैसे ही मोहरूपी वायु से अज्ञानी जीव भ्रमता है और कदाचित् स्वस्थ नहीं होता । जैसे यन्त्र की पुतली तागे से चेष्टा करती है, वैसे ही अज्ञानी जीव प्राणरूपी तागे से चेष्टा करते हैं । और जैसे नट अनेक स्वाँग भरता है वैसे ही कर्म से जीव अनेक शरीर रखता है । जैसे काठ की पुतली तृण, काष्ठ, फूल आदि को लेती, छोड़ती और नृत्य करती है, वैसे ही ये प्राणी भी चेष्टा करते हुए शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध को ग्रहण करते हैं । जैसे वे पुतलियाँ जड़ हैं,
१४ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
वैसे ही ये भी जड़ हैं। यदि कहिये कि इनमें तो प्राण है तो जैसे लुहार की धौकनी श्वास को लेती और छोड़ती है, वैसे ही ये जीव भी चेष्टा करते हैं।
हे राम ! अपना वास्तव स्वरूप जो है सो ब्रह्म है। उसके प्रमाद से जीव मोह और कृपणता को प्राप्त होते हैं। जैसे लुहार की खाल वृथा श्वास लेती है, वैसे ही इनकी चेष्टा व्यर्थ है। इनकी चेष्टा और बोलना अनर्थ के निमित्त है। जैसे धनुष से जो बाण निकलता है, वह हिंसा के निमित्त है उससे और कुछ कार्य सिद्ध नहीं होता, वैसे ही अज्ञानी की चेष्टा और बोलना अनर्थ और दुःख के निमित्त है, सुख के निमित्त नहीं और उसकी संगति भी कल्याण के निमित्त नहीं। जैसे जङ्गल के ठूँठ वृक्ष से छाया और फल की इच्छा करनी व्यर्थ है, उससे कुछ फल नहीं होता और न विश्राम के निमित्त छाया ही प्राप्त होती है; वैसे ही अज्ञानी जीव की संगति से सुख नहीं होता। उनको दान देना व्यर्थ है। जैसे कीचड़ में घृत डालना व्यर्थ होता है, वैसे ही मूर्खों को दिया दान व्यर्थ होता है। उनसे बोलना भी व्यर्थ है। जैसे यज्ञ में कुत्ते को बुलाना निष्फल है, वैसे ही उनसे बोलना निष्फल है। हे राम ! जो अज्ञानी जीव हैं, वे संसार में आते-जाते और जन्मते-मरते हैं और शरीर में आस्था करते हैं, वे पुत्र, दारा, बान्धव, धनादिक से ममत्व बुद्धि करते हैं। पर इस मिथ्यादृष्टि से वे दुःख पाते हैं और मुक्ति कदाचित् नहीं होती; क्योंकि वे अनात्मा में आत्मबुद्धि को त्याग नहीं करते और ममताबुद्धि में दृढ़ रहते हैं।
हे राम ! जो अज्ञानी हैं वे असत् पदार्थ को देखते हैं और वस्तुरूप की ओर से अन्धे हैं, इससे वे परमार्थ धन से विमुख रहते हैं। नरक का सार जो स्त्री आदि हैं, उनमें वे प्रीति करते हैं और उनको देखकर प्रसन्न होते हैं। जैसे मेघ को देखकर मोर प्रसन्न होता है, वैसे ही स्त्री आदि को देखकर मूर्ख प्रसन्न होते हैं। हे राम ! मूर्ख को मारने के निमित्त स्त्री विष की बेलि है। नेत्र उसके फूल हैं, होंठ पत्ते हैं, स्तन गुच्छे हैं और अज्ञानरूपी भँवरे वहाँ विराजमान होते हैं और उसका नाश करते
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १५
हैं। मतिरूपी तालाब में हर्षरूपी कमल और चित्तरूपी भँवरे सदा रहते हैं और अज्ञानरूपी नदी में दुःखरूपी लहरें और तृष्णारूपी बुलबुले उठते हैं। यह नदी मरणरूपी बड़वाग्नि में जा पड़ेगी।
हे राम ! जब जन्म होता है, तब जीव महागर्भ अग्नि से जलता हुआ निकलता है और महामूर्ख अवस्था में निकलकर दुखी होता है। वह जब यौवन अवस्था को प्राप्त होता है तब विषयों का सेवन करता है। वे भी दुःख के कारण होते हैं। फिर वृद्धावस्था को प्राप्त होता है। तब शरीर अशक्त होता है और हृदय को तृष्णा जलाती है। इस प्रकार जन्म-मरण अवस्था में जीव भटकते हैं। हे राम ! संसाररूपी कूप में मोहरूपी घटों की माला है और तृष्णा और वासनारूपी रस्सी से बँधे हुए जीव भ्रमते हैं। ज्ञानवान् को संसार कोई दुःख नहीं देता, गोपद की नाईं तुच्छ हो जाता है। पर अज्ञानी को समुद्र की तरह उससे उबरना कठिन होता है। वह अपने भीतर ही भ्रम देखता है और निकल नहीं सकता-थोड़ा भी उसको बहुत हो जाता है। जैसे पक्षी को पिंजड़े में और कोल्हू के बैल को घर ही में मार्ग दुस्तर हो जाता है, वैसे ही अज्ञानी को तुच्छ संसार बड़ा दुस्तर भासता है। हे राम ! जगत् को रमणीय जानकर जीव उसके जिन पदार्थों की इच्छा करता है, वे सब पञ्चभौतिक पदार्थ हैं। पर वह मोह से उनको सुन्दर जानता है, उनमें प्रीति करता है और उन्हें स्थिर जानता है। वे सब अनर्थ के निमित्त होते हैं।
हे राम ! अज्ञानरूपी चन्द्रमा के उदय से भोगरूपी वृक्ष पुष्ट होते हैं। वे जन्मों की परंपरारूपी रस को पाते हैं, कर्मरूपी जल से सिंचते हैं और पुण्य और पापरूपी मञ्जरी उनमें होती है। अज्ञानरूपी चन्द्रमा का अमृतवासना है और आशारूपी चकोर उसको देखकर प्रसन्न होता है। आशारूपी कमलिनी पर अज्ञानरूपी भँवरा बैठकर प्रसन्न होता है, इसलिए सब जगत् अज्ञान के कारण रमणीय भासता है। हे राम ! जिस ज्ञान से यह जगत् स्थित है, उसका प्रवाह सुनो । जब अज्ञानरूपी चन्द्रमा पूर्ण होकर स्थित होता है तब कामनारूपी क्षीरसमुद्र उमड़ता
१६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
है और उसमें अनेक तरंगे उठती हैं। उसके रस से तृष्णारूपी मञ्जरी पुष्ट होती है और काम, क्रोध, लोभ और मोहरूपी चकोर उसको देखकर प्रसन्न होते हैं। देहाभिमानरूपी रात्रि के निवृत्त होने पर विवेकरूपी सूर्य का उदय होता है । तब अज्ञानरूपी चन्द्रमा का प्रकाश निवृत्त हो जाता है । हे राम ! अज्ञान से जीव भ्रमते हैं और उनकी चेष्टा उल्टी हो जाती है । जो तुच्छ और नीच दुःखरूप पदार्थ है, उसको देखकर वे उनको सुखदायक और रमणीय जानते हैं और स्त्री को देख प्रसन्न होते हैं ।
कवीश्वर कहते हैं कि उसके कपोल कमल से, नेत्र भँवरे से, होठ हँसते हुए और भुजा बेलि की नाईं हैं। कञ्चन के कलश से स्तन हैं। उदर और वक्षःस्थल बहुत सुन्दर हैं। जंघाएँ केले के खंभे सी हैं। कवि जिम स्त्री की स्तुति करते हैं, वह रक्तमांस की पुतली है। कपोल भी रक्तमांस है। होठ भी रक्तमांस हैं। भुजा विष के वृक्ष की शाखा-सी हैं। स्तन भी रक्तमांस हैं और संपूर्ण शरीर भी रक्तमांस अस्थि से पूर्ण एक मूर्ति है । उसको जो रमणीय जानते हैं वे मूर्ख मोह से मोहित हुए हैं और अपने नाश की इच्छा करते हैं। जैसे सर्पिणी से जो कोई हित करेगा वह नष्ट होगा, वैसे ही इस स्त्री से प्रेम करने से नाश होगा । जैसे कदलीवन का महाबली हाथी काम से नीच गति पाता और संकट में पड़ता है और अंकुश सहकर अपमान को प्राप्त होता है। वह एक स्त्री की चाह से ही ऐसी गति को प्राप्त होता है । वैसे ही यह जीव स्त्री की इच्छा करके अनेक दुःख पाता है। जैसे दीपक को रमणीय जानकर पतङ्ग उस पर गिरता और नष्ट होता है, वैसे ही यह जीव स्त्री की इच्छा करता है और उसके संग से नाश को प्राप्त होता है । लक्ष्मी का आश्रय करके जो सुख की इच्छा करता है वह भी सुखी न होगा । जैसे पहाड़ दूर से देखने पर सुन्दर लगता है, वैसे ही यह भी देखने में सुन्दर लगती है । पर स्त्री का आश्रय करके जो सुख की इच्छा करे तो सुख न मिलेगा, अन्त में दुःख ही प्राप्त होगा । लक्ष्मी का भी यही हाल है । जब लक्ष्मी प्राप्त होती है, तब मनुष्य अनर्थ और
⚛ निर्वाण प्रकरण ⚛ १७
पाप करने लगता है और दुःख का पात्र होता है। और जब वह जाती है तब दुःख दे जाती है और वह उससे जलता रहता है। हे राम! जगत् में सुख की इच्छा करना व्यर्थ है। जीव जब पहले जन्म लेता है, तब भी दुःख सहता है। फिर जन्म लेकर जब मूर्ख और नीच बाल अवस्था को प्राप्त होता है तब कुछ विचार नहीं होता। उसमें दुःख पाता है। और कुछ शक्ति नहीं होती, उससे भी दुःख पाता है। जब यौवन अवस्थारूपी रात्रि आती है तब उसमें काम, क्रोध, लोभ और मोहरूपी निशाचर विचरते हैं और तृष्णारूपी पिशाचिनी घेरती है; क्योंकि उस अवस्था में विवेकरूपी चन्द्रमा नहीं उदय होता। इससे अन्धकार में वे सब क्रीड़ा करते हैं।
हे राम! यौवन अवस्थारूपी वर्षाकाल में बुद्धि आदि नदियाँ मलिनभाव को प्राप्त होती हैं। कामरूपी मेघ गर्जता है और तृष्णारूपी मोरनी उसको देख प्रसन्न होकर नृत्य करती है। फिर यौवन अवस्थारूपी चूहे को बुढ़ापारूपी बिल्ली खा लेती है और शरीर महाजर्जरीभूत हो निर्बल हो जाता है। तृष्णा बढ़ती जाती है और हृदय जलता है। निदान फिर मृत्युरूपी सिंह जरारूपी हरिणी को भक्षण कर लेता है। इस प्रकार मनुष्य उपजता और मरता है और आशारूपी रस्सी से बँधा हुआ घड़ी के लटकन की तरह भटकता है-शान्ति कदापि नहीं पाता। हे राम! यह ब्रह्माण्ड एक वृक्ष है। उसमें जीवरूपी पत्ते लगे हैं। वे कर्मरूपी वायु से हिलते हैं। उसमें अज्ञानरूपी जड़ता है। चित्तरूपी ऊँचा वृक्ष है, उस पर लोभादिक उलूक बैठते हैं। जगतरूपी सरोवर में शरीररूपी कमल है; उस पर जीवरूपी भँवरे आ बैठते हैं और कालरूपी हाथी आकर उनको चट कर जाता है।
हे राम! जनतारूपी जीर्ण पक्षी आशारूपी फंदे से बँधे हुए वासना-रूपी पिंजड़े में पड़े हैं। वे रागद्वेषरूपी अग्नि में जल-भुनकर काल-रूपी पुरुष के मुख में पड़े प्रवेश करते हैं। जनरूपी पक्षी उड़ते फिरते हैं। किसी दिन जब कालरूपी व्याध जाल फैलावेगा तब उनको फँसा लेगा। हे राम! संसाररूपी तालाब में जीवरूपी मछलियाँ हैं, और
१८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
कालरूपी बगुला उनको भोजन करता है । कालरूपी कुम्हार जन-रूपी मृत्तिका के बर्तन बनता है और वे शीघ्र ही फूट जाते हैं । जीवरूपी नदी कर्मरूपी तरङ्गों को फैलाती है और कालरूपी बड़वाग्नि में जा पड़ती है । जगतरूपी हाथी के मस्तक में जीवरूपी मोती है । उस हाथी को कालरूपी सिंह भोजन कर जाता है । वह कालरूपी भक्षक ऐसा है कि उसमें ब्रह्मा को भी नहीं छोड़ा । इस तरह सबको खाकर भी वह तृप्त नहीं होता । जैसे घृत की आहुति से अग्नि तृप्त नहीं होता वैसे ही काल जीवों के भोजन से तृप्त नहीं होता । हे राम ! एक निमेष में अनेक जगत् उपजते हैं और निमेष में लीन हो जाते हैं । सबके अभाव में जो शेष रहता है वह रुद्र है । फिर वह भी निवृत्त होता है और सबके पीछे एक परमतत्त्व ब्रह्मसत्ता रहती है । हे राम ! जो कुछ जगत् है वह अज्ञान से भासता है जन्म, मरण, बाल अवस्था, यौवन और वृद्धादिक विकार अज्ञान से भासते हैं और अज्ञान के नष्ट होने पर सब नष्ट हो जाते हैं । जब तक आत्मविचार नहीं उपजता तब तक अज्ञान रहता है और जब आत्मविचार उपजता है तब अज्ञानरूपी रात्रि निवृत्त हो जाती है, केवल ब्रह्मपद भासता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अज्ञानमाहात्म्य- वर्णनन्नाम षष्ठसर्गः ॥ ६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह संसाररूपी यौवन चेतनरूपी पर्वत के शृङ्ग पर स्थित है और अविद्यारूपी बेलि उसमें बढ़कर विकास को प्राप्त हुई है । सुख, दुःख, भाव, अभाव और अज्ञान उसके पत्र, फूल और फल हैं । जहाँ अविद्या सुखरूप होकर स्थित होती है वहाँ ऊँचे सुख का भोग कराती है और सत्य प्रतीत होती है, और जहाँ दुःखरूप होकर स्थित होती है वहाँ दुःखरूप भासती है । वे ही सुख व दुःख इसके फल हैं । दिन फूल हैं और रात्रि भँवरे हैं । जन्म अंकुर है और यह भोगरूपी रस से पूर्ण है । जब विचार का घुन अविद्यारूपी वृक्ष को खाने लगता है, तब नष्ट हो जाती है । जब तक विचाररूपी घुन नहीं लगा तब तक वह दिन-दिन बढ़ती और दृढ होती जाती है ।