योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
६० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः पीठोऽर्धचन्द्ररूपः, अप्स्तत्त्वमयः, 'अम्मण्डलस्यार्धचन्द्ररूपत्वात् । त्रिकोणम् ओड्याणपीठस्त्रिकोणरूपः, तेजस्तत्त्वमयः, अग्निमण्डलस्य त्रिकोणरूपत्वात् । क्रमेण कामरूपादीनां पीठानामेतानि रूपाणीत्यर्थः । अत्र गगनतत्त्वस्यारूपत्वान्निर- वयवत्वाच्चानुक्तिः ॥४२॥ पीठानामेव क्रमेण वर्णनाह— पीतो धूम्रस्तथा श्वेतो रक्तो रूपं च कीर्तितम् ॥४३॥ पृथिवीवायुसलिलतेजसां क्रमेण पीतधूम्रश्वेतरक्तवर्णत्वात् पीठानामपि त एव वर्णा इत्यर्थः । अवयवार्थः स्पष्टः । अत्र भूतानामक्रमः पीठानुसारेण । पीठानां त्वाम्नायभेदेन क्रमस्य नियमात्^२ ॥४३॥ पीठेषु लिङ्गान्याह— स्वयम्भूर्बाणलिङ्गं च इतरं च परं पुनः । पीठेष्वेतानि लिङ्गानि संस्थितानि वरानने ॥४४॥ अर्धचन्द्र के समान होता है, अतः जलतत्त्व के प्रतिनिधि जालन्धर पीठ का आकार भी वैसा ही है। ओड्याण पीठ तिकोना होता है। अग्निमण्डल का आकार त्रिकोण- सदृश बनता है, अतः तेजस्तत्त्व के प्रतिनिधि इस पीठ का आकार भी तिकोना माना गया है। इस तरह से क्रमशः कामरूप आदि पीठों के ये स्वरूप हैं। गगनमण्डल रूप- रहित और निरवयव होता है। इसलिये यहाँ उसका उल्लेख नहीं हुआ है ॥४२॥ अब इन पीठों के वर्ण (रंग) बताये जा रहे हैं— पीत, धूम्र, श्वेत तथा रक्त—ये क्रमशः इन चार पीठों के वर्ण (रंग) होते हैं ॥४३॥ पृथिवी, वायु, जल और तेज नामक तत्त्व क्रमशः पीत (पीला), धूम्र (मटमैला), श्वेत (सफेद) और रक्त (लाल) वर्ण वाले होते हैं, अतः इन तत्त्वों के प्रतिनिधि उक्त चार पीठों का भी वही रंग होता है। श्लोक के शब्दों का अर्थ स्पष्ट है। पृथिवी प्रभृति चार भूतों की चर्चा यहाँ तत्त्वों के क्रम से न होकर पीठों के क्रम के अनुसार है। पीठों का यह क्रम शास्त्रों में निश्चित है और प्रस्तुत प्रकरण पीठों से ही संबद्ध है ॥४३॥ इन पीठों में लिंगों की स्थिति इस तरह से है— हे वरानने ! उक्त पीठों में क्रमशः स्वयंभू, बाण, इतर और पर नामक लिंग स्थित हैं ॥४४॥ १. 'अम्मण्डलं वार्धचन्द्रम्' २. नियमाद् इति पाठान्तरम् ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ६१ लीनं बाह्येन्द्रियागोचरं चिद्रूपमर्थं गमयन्तीति लिङ्गानि । मनोऽहङ्कारबुद्धि- चित्तात्मकानि कामरूपादीनि चित्स्फुरत्ताधारत्वात् पीठानि । एतेष्वन्तःकरण- चतुष्टयरूपेषु तत्तद्वृत्तिचतुष्टयमयानि लिङ्गानि स्वयम्भ्वादीनि वसन्तीत्यर्थः । एतत्सर्वं सौभाग्यसुधोदये प्रपञ्चितम् । यथा— पुनरेव कामपीठे तदग्रकोणस्थिते मनोरूपे । प्रतिफलितं तज्ज्योतिः स्वयम्भुलिङ्गं समीरितं सद्भिः ॥५।६॥ दक्षिणकोणेऽहङ्कृतिरूपे जालन्धरे तु संक्रान्तम् । परधाम बाणलिङ्गं^१ जातं संक्रान्त्युपाधिभेदवशात् ॥५।४॥ मध्यत्रिकोणकोणे वामे श्रीपूर्णपीठमेतस्मिन् । बुद्धिमये परतेजः प्रतिफलितं त्वितरलिङ्गतां यातम् ॥५।२॥ चित्तमये श्रीपीठे ज्योतिर्बिन्दौ^२ यदस्य संक्रान्तम् । प्रतिफलितं परधाम्नः परलिङ्गं तत् प्रकीर्त्यते प्राज्ञैः ॥४।१॥ इति॥४४॥ लीन अर्थात् बाह्य इन्द्रियों के अविषय चित्स्वरूप अर्थ का बोध कराने वाला तत्त्व यहाँ लिंग नाम से कहा गया है । मन, अहंकार, बुद्धि और चित्त के प्रतिनिधि कामरूप प्रभृति को पीठ इसलिये कहा जाता है कि इन्हीं के सहारे चित् तत्त्व का स्फुरण होता है । इस तरह से इन चार अन्तःकरणों के प्रतिनिधि उक्त चार पीठों में इन अन्तः- करणों की चार वृत्तियों के समान स्वयंभू प्रभृति चार लिंगों की स्थिति मानी जाती है । इस विषय को दीपिकाकार ने अपने दूसरे ग्रन्थ ^१सौभाग्यसुधोदय में समझाया है— उस त्रिकोण के अग्रभाग की सीधी रेखा मनोमय कामरूप पीठ का प्रतिनिधित्व करती है । इस स्थान पर परम प्रकाशमय महाबिन्दु का तेज जब पुनः प्रतिफलित होता है, तो उससे स्वयंभू लिंग का आविर्भाव होता है । त्रिकोण के अहंकारमय दक्षिण कोण में स्थित जालन्धर पीठ में जब यह तेज संक्रान्त होता है, तो वह उपाधि के भेद से भिन्न आकार ग्रहण कर बाण लिंग के नाम से जाना जाता है । इसी मध्यत्रिकोण के बुद्धिमय वाम कोण में स्थित पूर्णगिरि पीठ में जब यह परम प्रकाश प्रतिफलित होता है, तो वह इतर लिंग के रूप में अभिव्यक्त होता है । चित्तमय ओड्याण पीठ की स्थिति त्रिकोण १. लिङ्गाज्जातं-ग. उ. । २. विन्दोस्तदस्य-ग. ने. ज. झ. उ. । १. यह ग्रन्थ भी नित्याषोडशिकार्णव के परिशिष्ट भाग (पृ० ३०६-३२१) में प्रकाशित हो चुका है। दीपिका के पूर्व संस्करणों में इस ग्रन्थ का नाम सौभाग्यसुभगोदय दिया गया है। यह ठीक नहीं है। भास्करराय ने ललितासहस्रनाम के अपने सौभाग्य- भास्कर नामक भाष्य (पृ० १००, १२२, १२५), वरिवस्यारहस्य (पृ० ६८) तथा नित्याषोडशिकार्णवटीका सेतुबन्ध (पृ० २९१) में सौभाग्यसुधोदय के नाम से ही इसको उद्धृत किया है। आनन्दवर्द्धन के अनुसार इसका रचनाकाल विक्रम संवत् १६७० (सन् १६१३ ई०) है।
६२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः लिङ्गानां स्वरूपं पीतादिवर्णान् वैखरीवर्णांश्च विभज्याह— हेमबन्धूककुसुमशरच्चन्द्रनिभानि तु । स्वरावृतं त्रिकूटं च महालिङ्गं स्वयम्भुवम् ॥४५॥ कादितान्ताक्षरवृतं बाणलिङ्गं त्रिकोणकम् । कदम्बगोलकाकारं थादिसान्ताक्षरावृतम् ॥४६॥ सूक्ष्मरूपं समस्तार्णवृतं परमलिङ्गकम् । बिन्दुरूपं परानन्दकन्दं नित्यपदोदितम् ॥४७॥ हेमनिभं पीतवर्णम्, त्रिकूटं बिन्दुत्रयकूटरूपम्, स्वरावृतम् अकारादिषोडश- स्वरावृतं स्वयम्भुलिङ्गम्। बन्धूककुसुमनिभं रक्तवर्णं त्रिकोणरूपं कादितान्ता- ऽक्षरवृतं बाणलिङ्गम्। शरच्चन्द्रनिभं श्वेतवर्णं कदम्बगोलकाकारं कदम्बकुसुम- गोलकरूपं थादिसान्ताक्षरावृतम् इतरलिङ्गम्। परलिङ्गस्य परतेजोरूपत्वा- के बीच में स्थित बिन्दु में मानी गई है। इस श्रीपीठ में विद्यमान ज्योतिर्बिन्दु में जब परप्रकाशमय तेज संक्रान्त होता है, तो उससे परलिंग की अभिव्यक्ति होती है ॥४४॥ अब इन लिंगों का स्वरूप, पीत आदि रंग और वैखरी वाणी के वर्णों की उनमें स्थिति बताई जा रही है— सुवर्ण सदृश पीला रंग, बन्धूक पुष्प के सदृश लाल रंग और शरच्चन्द्र के समान सफेद रंग क्रमशः स्वयंभू, बाण और इतर लिंग का होता है। स्वयंभू नामक महालिंग तीन शिखरों जैसे आकार वाला और १६ स्वरों से घिरा हुआ है। बाण लिंग त्रिकोण सदृश आकार वाला और क से त पर्यन्त १६ अक्षरों से घिरा हुआ है। इतर लिंग कदम्ब के फल के सदृश गोल आकार वाला और थ से स पर्यन्त १६ अक्षरों से घिरा हुआ है। पर लिंग अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप वाला है, अतः बिन्दु से इसका बोध कराया जाता है। यह समस्त वर्णों से आवृत है। यह परमानन्द का सार तथा नित्य पद से उदित माना जाता है ॥४५-४७॥ सुवर्ण के समान चमक लिये हुए पीले रंग का, तीन बिन्दुओं से बने तीन शिखर सदृश आकृति वाला, अकार से अःकार पर्यन्त १६ स्वरों से घिरा हुआ है स्वयंभू लिंग। बन्धूक के पुष्प के समान लाल रंग का त्रिकोण सरीखो आकृति वाला क से त पर्यन्त १६ अक्षरों से घिरा हुआ है बाण लिंग। शरत्पूर्णिमा के चाँद के समान चटकीले सफेद रंग का, कदम्ब के फूल के समान गोल आकार वाला थ से स पर्यन्त १६ अक्षरों से आवृत है इतर लिंग। पर लिंग परम तेजस्वी है, अतः इसका कोई वर्ण नहीं होता। इसका
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ६३ दवर्णत्वम् । अतः सूक्ष्मरूपमनिन्द्रियगोचरम् । अत एव बिन्दुरूपं समस्तार्णवृतम् आदिक्षान्तपञ्चाशदक्षरवृतं परलिङ्गं परानन्दकन्दं पराया अक्षररूपायाः पश्य- न्त्यादिशाखावत्या लताया आनन्दमयं कन्दं नित्यपदोदितम्, नित्यत्वं च मातृ- १काया उत्पत्तिविनाशरहितत्वात् । पदाद् विश्वमुमुक्षुमनःप्राप्यात्, उदितं प्रथम- स्पन्दरूपतया ॥४५-४७॥ २एतानि सर्वाण्यपि बीजत्रितययुक्तायास्तुरीयविद्याया वाच्यरूपाणीत्याह— बीजत्रितययुक्तस्य सकलस्य मनोः पुनः । एतानि वाच्यरूपाणि कुलकौलमयानि तु ॥४८॥ एतानि शक्तिचतुष्टयं मातृकाचतुष्टयं मध्यकोणचतुष्टयं पीठचतुष्टयं लिङ्ग- चतुष्टयं चेत्येतानि सर्वाणि बीजत्रितययुक्तस्य सकलस्य मनोर्वाग्भवकामराजशक्ति- बीजसमेतायास्तत्समष्टिरूपायास्तुरीयविद्याया वाच्यरूपाणि । विद्या वाचिका, एतानि सर्वाणि वाच्यानि । अत एव तच्चतुष्टयरूपिणीयं विद्येत्यर्थः, वाच्यवाच- कयोरभेदात् । कुलं मेयमानमातृलक्षणम्, कौलं तत्समष्टिः । तन्मयानीत्यर्थः ॥४८॥ आकार अत्यन्त सूक्ष्म है, अतः इसका इन्द्रियों से साक्षात्कार नहीं हो सकता । इसीलिये इसको बिन्दुस्वरूप माना गया है । यह पर लिंग अकार से क्षकार पर्यन्त समस्त ५० वर्णों से आवृत है । यह पर लिंग परानन्दकन्द और नित्यपदोदित है, अर्थात् अक्षर स्वरूप परा वाणी और पश्यन्ती आदि शाखा वाली लता का यह आनन्दमय सार है । परा मातृका का स्वरूप उत्पत्ति और विनाश से रहित होने से नित्य कहलाता है । इस नित्य पद का साक्षात्कार विश्व से मुक्ति की कामना वाले योगी के मन में ही हो सकता है, अर्थात् ऐसे ही योगी के मन में इस पर लिंग का प्रथम स्पन्दन होता है ॥४५-४७॥ अब ऊपर बताये गये सभी प्रकार तीन बीजों वाली तुरीय (चतुर्थ) श्रीविद्या के ही वाच्य स्वरूप हैं, इस विषय को यहाँ समझाया जा रहा है— ऊपर बताये गये शक्ति, मातृका आदि के चार-चार समस्त कुलकौलमय भेद तीन बीजों वाली और सकल स्वरूप वाली श्रीविद्या से ही बोधित होते हैं ॥४८॥ अभी ऊपर अम्बिका तथा शान्ता आदि चार शक्तियों का, परा आदि चार वाणियों का, मध्य बिन्दु और त्रिकोण को मिलाकर मध्यकोणचतुष्टय का, चार पीठ और चार लिंगों का वर्णन किया गया है । यह सब वाग्भव, कामराज और शक्ति बीज वाली तथा समष्टिरूपिणी सकलस्वरूपिणी तुरीया श्रीविद्या के वाच्य हैं। श्रीविद्या इनकी वाचिका और ये सब उसके द्वारा बोधित होते हैं । इस तरह से उक्त चारों रूपों में यह श्रीविद्या १. कात्वात्-ख. झ. उ., कारूपत्वात्-ज. । २. 'एतानि' नास्ति-ख. ग. ने. ज.
६४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः अमूनि पूर्वोक्तानि सर्वाणि चतुरात्मकानि जाग्रदादिमयानीत्याह— जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्याख्यतुर्यरूपाण्यमूनि तु । जाग्रद् जागरितं देहेन्द्रियव्यापारः, अन्तःकरणमात्रव्यवहारः स्वप्नः, सर्वेन्द्रियो- परतिः सुखतान्मात्रपरामर्शः सुषुप्तिः, तुरीयं चैतन्यमात्रवृत्तिः । अत्रैव वक्ष्यति— ''वह्रौ देवि महाजाग्रदवस्था त्विन्द्रियद्वयैः'' (३।१७७) इत्यादिना । पूर्वं चक्रस्य चतुरात्मतामुक्त्वा तन्मध्ये बैन्दवनिवासिन्याः स्वसंविदस्तदतीत- रूपतामाह— अतीतं तु परं तेजः स्वसंविदुदयात्मकम् ॥४९॥ अतीतं जागरितादिदशाचतुष्टयातीतम् । अत एव परं विश्वोत्तीर्णम्, विश्वो- त्तरत्वात् । किञ्च, परमनुत्तरं प्रकाशरूपम् । अत्र श्रुतिः—''तदेव ज्योतिषां ही विराजमान है, क्योंकि वाच्य और वाचक में भेद नहीं रहता । मेय, मान और माता स्वरूप यह जगत् कुल कहलाता है और इन तीनों की समष्टि कौल कहलाती है । इस तरह से कुलकौलमय यह सारा प्रपंच श्रीविद्या का ही विलास है ॥४८॥ ऊपर बताये गये चार संख्या वाले सभी पदार्थ जाग्रत् आदि चार अवस्थाओं से युक्त हैं— ये सब पदार्थ जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुर्य नाम की चार अवस्थाओं से युक्त हैं ॥ शरीर और इन्द्रियों का भी व्यापार जब चलता रहता है, तो इसे जाग्रदवस्था कहते हैं । स्वप्न दशा में केवल अन्तःकरण का व्यवहार चलता है । सुषुप्ति दशा में सभी इन्द्रियां विश्राम करती हैं, तब उस समय एक अनोखे सुख (आराम) की अनुभूति बची रहती है और तुरीय अवस्था में केवल चैतन्य बचा रहता है । इन चारों अवस्थाओं का स्वरूप यहीं आगे 'वह्रौ देवि' (३।१७७) इत्यादि श्लोकों के द्वारा बताया जायगा । इस तरह से चक्र की चार अवस्थाओं का वर्णन करने के उपरान्त अब मध्य बिन्दु में निवास करने वाली संवित्स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा के विषय में बताया जा रहा है कि वह स्वरूप इन सबसे ऊपर है— यह परम प्रकाशमय सभी प्राणियों में अपनी संवित्ति के रूप में भासमान तत्त्व इन सभी दशाओं से अतीत है ॥४९॥ अतीत का अर्थ है जाग्रत् आदि चार दशाओं से ऊपर । इसी लिये इसको विश्वोत्तीर्ण (लोकोत्तर) तत्त्व कहते हैं । यह परम अनुत्तर प्रकाशस्वरूप है । मुण्डक उपनिषद् में ''तमेव भान्तमनुभाति सर्वं...
प्रथमः ] Deepika Bhashanuvada Sahitam ६५ ज्योतिः' (मु० उ० २।२।९) इति। स्वसंविदुदयात्मकं सर्वप्राणिष्वात्मतया स्थितम्। तदुक्तं नवशतीशास्त्रे—'“अनन्तं परमं ज्योतिः सर्वप्राणिहृदि स्थितम्” इति ॥४९॥ चक्रस्य पुनर्वासनान्तरकथनाय विश्वातीतं वस्तु कथयित्वा वक्तव्यां वासनामाह— स्वेच्छाविश्वमयोल्लेखखचितं विश्वरूपकम्। विश्वमयोल्लेखः, विश्वं षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकम्, तन्मयः उल्लेखः, उल्लिख्यत इति उल्लेखः चित्रम्, तेन स्वेच्छाविश्वमयोल्लेखेन खचितं व्याप्तं स्वेच्छातुलिक- याऽऽत्मभित्तौ [२मायाचित्रमुल्लिखतीत्यर्थः। तदुक्तमीश्वरप्रत्यभिज्ञायाम्—"स्वेच्छया स्वभित्तौ] विश्वमुन्मीलयति (प्र० हृ० २) इति। अत्र प्रमाणवचनं च— जगच्चित्रं ३समालिख्य ४स्वेच्छातूलिकयाऽऽत्मनि। स्वयमेव समालोक्य प्रीणाति भगवान् शिवः॥ इति। विश्वरूपकम्। अत एव शिवादिक्षित्यन्तरूपेण परिणतमित्यर्थः। यथा क्षीरं
इसको सभी प्रकाशों का प्रकाशक कहा गया है। यह तत्त्व सभी प्राणियों में अपनी आत्मा के रूप में भासित होता है। नवशती शास्त्र में बताया गया है—"यह अनन्त परम ज्योति सभी प्राणियों के हृदय में विराजमान है"॥४९॥ चक्र की भावना का दूसरा प्रकार बताने के लिये विश्वोत्तीर्ण तत्त्व का उपदेश करने के बाद अब उसकी भावना का प्रकार बताते हैं— यह विश्वोत्तीर्ण तत्त्व अपनी इच्छा से अपने में विश्वमय चित्र का निर्माण कर विश्वमय हो जाता है॥ यह ३६ तत्त्वों से बना जगत् ही विश्व कहलाता है। उल्लेख चित्र को कहते हैं। विश्वोत्तीर्ण तत्त्व अपनी इच्छा से विश्वमय चित्र का स्वरूप धारण कर लेता है, अपनी इच्छा रूपी तूलिका से स्वयं अपने को ही आधार बनाकर उसमें मायामय चित्र का निर्माण कर लेता है। प्रत्यभिज्ञाहृदय में भी बताया गया है—"चिति शक्ति अपनी इच्छा से स्वात्मस्वरूप भित्ति (दीवाल) पर विश्व का उन्मीलन (चित्रण) करती है"॥ इस प्रसंग में एक प्रामाणिक व्यक्ति का वचन भी उपलब्ध है— भगवान् शिव अपनी इच्छारूपी तूलिका से अपने में ही इस जगत् रूपी चित्र का निर्माण करते हैं और फिर उसको देखकर प्रसन्न भी होते हैं॥ इस तरह से जगत् रूपी चित्र का निर्माण कर वह स्वयं उसमें प्रविष्ट हो जाते हैं, शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त तत्त्वों के रूप में परिणत हो जाते हैं। जैसे दूध दही के रूप
पादटिप्पणी: १. अनर्क्कं-ख. ग. ज. उक., अमनस्कं परं-उग.। २. कोष्ठान्तर्गतः पाठः कपुस्तकं विहाय क्वापि न दृश्यते। ३. समहिलख्य-ख.। ४. स्वात्म-ने. उ.।
६६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः दध्याकारेण परिणमते, तथा चिच्छक्तिरेव विश्वाकारेण परिणमते। तदुक्तं ^१श्रीप्रत्यभिज्ञाहृदये—"चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः" (सू० १) इति। तेन किमायातं ^२परमशिवस्येत्यत आह— चैतन्यमात्मनो रूपं निसर्गानन्दसुन्दरम् ॥५०॥ चैतन्यं चिद्विमर्शशक्तिः, आत्मनः प्रकाशात्मनः परशिवस्य, रूपं निसर्गा- नन्दसुन्दरं तत्सामरस्येन सहजानन्दोल्लासादखिलस्य स्पृहणीयम्। विमर्शशक्तिः प्रकाशात्मना परशिवेन सामरस्याद् विश्वं सृजति, न तु केवला। यथा न केवलेन तुषेणाङ्कुरो जायते, नापि तण्डुलेन, किन्तुभाभ्यामयुतसिद्धसंबन्धशालिभ्याम्। तदुक्तं ^३स्वच्छन्दसंग्रहे—"शिवाऽभिन्ना पराशक्तिः सर्वक्रमशरीरिणी" इति ॥५०॥ तदेवाह— मेयमातृप्रमामानप्रसरैः संकुचत्प्रभम् । शृङ्गाटरूपमापन्नमिच्छाज्ञानक्रियात्मकम् ॥५१॥ में परिणत होता है, उसी तरह से चिति शक्ति ही विश्व का आकार धारण कर लेती है। प्रत्यभिज्ञाहृदय में बताया गया है—"चिति शक्ति स्वतन्त्र रूप में बिना किसी की सहा- यता से इस विश्व की रचना में समर्थ है"॥ ऐसा करने से परमशिव का क्या बनता है? इसका उत्तर देते हैं— वह पर प्रकाशात्मक स्वरूप इस तरह से विमर्श शक्ति से संपन्न होकर सहज आनन्द की सृष्टि का कारण बनकर; सबके लिये स्पृहणीय हो जाता है ॥५०॥ चैतन्य पद यहाँ चितिस्वरूपा विमर्श शक्ति का बोध कराता है। आत्मा अर्थात् प्रकाशात्मक परशिव का स्वरूप उस विमर्श शक्ति के साथ समरस होकर सहज आनन्द की सृष्टि करता है और इस तरह से सबका स्पृहणीय बन जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि विमर्श शक्ति प्रकाशात्मक परशिव के साथ मिलकर विश्व की रचना करती है, अकेली नहीं। जैसे केवल तुष या तण्डुल (चाँवल) से अंकुर की उत्पत्ति नहीं होती, किन्तु जब दोनों अभिन्न रूप में विद्यमान रहते हैं, तभी उनसे अंकुर निकलता है, उसी तरह से केवल शिव या शक्ति से जगत् की सृष्टि नहीं होती, किन्तु दोनों मिलकर ही सृष्टि कर सकते हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—"शिव से अभिन्न रूप में विद्यमान परा शक्ति क्रमशः सारे विश्व का शरीर धारण करती है" ॥५०॥ आगे इसी क्रम को बताया गया है— संवित्ति जब मेय, माता, प्रमा और प्रमाण के रूप में फैलती है, तो उसकी प्रभा संकुचित हो जाती है और वह इच्छा, ज्ञान, क्रियात्मक शृंगाट का स्वरूप धारण कर लेती है ॥ ५१ ॥ १. ईश्वरप्रत्यभिज्ञायामिति परिदृश्यमानः पाठोऽनुचितः। २. देवस्ये—ख. ग. ने. ज. झ. ब. उ. । ३. महास्वच्छन्द—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ६७ मेयं प्रमेयम् । प्रमाविषयः सम्यगनुभवः प्रमा । तद्वान् प्रमाता । प्रमाकरणं प्रमाणम् । तदुक्तं तन्त्रान्तरे— मितिः सम्यक्परिच्छित्तिस्तद्वत्ता च प्रमातृता । तद्योगव्यवच्छेदः प्रामाण्यं गौतमे मते ॥ (कु० का० ४।५) इति । निर्विकल्परूपायाः स्वसंविदो मातृमेयप्रमाणप्रमारूपेण विकल्पात्मना प्रसर एव संकोचः । शिवस्य प्रकाशात्मनो १दीपस्य शक्तिर्विमर्शाख्यैव प्रभा । सा२ निर्वि- कल्पात्मना विश्वाकारा मेयमातृप्रमाप्रमाणभेदैः संकुचद्रूपा, तदा३ शिवोऽपि संकुच- द्रूपः । एतदुभयमिच्छाज्ञानक्रियात्मकम् इच्छादिवामादिशक्त्यंशभेदभिन्नं शृङ्गाट- रूपमापन्नं त्रिकोणरूपेण परिणतम् ॥५१॥ पूर्वं “बीजत्रितययुक्तस्य सकलस्य मनोः पुनः” (१।४८) इत्यत्र कामकलादि- काया विद्यायाः श्रीचक्रहेतुभूतत्रिकोणमयपीठादिचतुर्मयतामुक्तेवेदानीं देवताया मेय प्रमेय को कहते हैं । विषय की सम्यक् प्रतीति प्रमा कहलाती है । इस सम्यक् प्रतीति से जो युक्त हैं, उसे प्रमाता और प्रमा के साधन को प्रमाण कहते हैं । कुसुमा- ञ्जलिकारिका में इनके लक्षण बताये गये हैं— न्याय मत में सम्यक् परिच्छित्ति ( ज्ञान ) को मिति ( प्रमा ) कहते हैं । यह सम्यक् ज्ञान जिसको होता है, वह प्रमाता कहलाता है और प्रमा के साथ निरन्तर संयोग का ही नाम यहां १प्रामाण्य है । निर्विकल्पात्मक स्वात्मसंवित्ति जब विकल्पात्मक माता, मेय, प्रमा और प्रमाण के रूप में फैलती है, तो उसका स्वरूप संकुचित हो जाता है । प्रकाशात्मक शिव दीपक है, तो विमर्श शक्ति उसकी प्रभा है । निर्विकल्पक स्वरूप में वह विश्वस्वरूप है, किन्तु वह विमर्श शक्ति जब मेय, माता, प्रमा, प्रमाण रूप विकल्पों का स्वरूप धारण कर अपने स्वरूप को संकुचित कर लेती है, परिमित कर लेती है, तो शिव भी परिमित प्रमाता बन जाते हैं । तब शिव और शक्ति दोनों इच्छा-ज्ञान-क्रियात्मक और वामा-ज्येष्ठा-रौद्रात्मक शक्तियों का स्वरूप धारण कर त्रिकोण के आकार में परिणत हो जाते हैं ॥ ५१ ॥ “बीजत्रितय” (१।४८) इत्यादि श्लोक में यह बताया गया है कि कामकला स्वरूप श्रीविद्या ही श्रीचक्र को निष्पत्ति में कारणभूत त्रिकोणमय पीठचतुष्टय आदि के रूप १. जीवस्य-ख. ग. ने. झ. उ. । २. सा तु निर्विकारा-ने. ज. झ. उ. । ३. तथा- ख. ग. ने. ज. झ. उ. । १. न्याय मत में ज्ञान का प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों परतः गृहीत होते हैं । ज्ञान की संवादकता के आधार पर प्रामाण्य का तथा विसंवादिता के आधार पर उसके अप्रामाण्य का निश्चय अनुमान प्रमाण द्वारा किया जाता है । इसी अभिप्राय से यहां प्रमा के साथ निरन्तर संयोग, अर्थात् संवादकता की बात कही गई है ।
६८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः ] अपि तन्मयताभावना'मुक्तवानिति भावः । तदेव विवृणोति "विश्वाकारप्रथाधार" इत्यादि, "२तदीयशक्तिनिकरस्फुरदूमिसमावृतम्" इत्यन्तेन (श्लो० ५२-५५) — विश्वाकारप्रथाधारनिजरूपशिवाश्रयम् । कामेश्वराङ्कपर्यङ्कनिविष्टमतिसुन्दरम् ॥५२॥ विश्वाकारप्रथा षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मना परिणता विमर्शशक्तिः, तस्या आधारः, निजं रूपं तात्त्विकं रूपम्, शिवः प्रकाशात्मकः, स एवाश्रय आधारो यस्य तद्वि- श्वाकारप्रथाधारनिजरूपशिवाश्रयं परं तेजः । कामेश्वराङ्कपर्यङ्कनिविष्टम् । कामेश्वरः प्रकाशात्मकः शिवः, तस्याङ्कपर्यङ्के निविष्टं विमर्शशक्तिरूपम् । अति- सुन्दरम् अत्यन्तसुभगम्, सर्वैः स्वस्वात्मतया स्पृहणीयत्वात् ॥५२॥ इच्छाशक्तिमयं पाशमङ्कुशं ज्ञानरूपिणम् । क्रियाशक्तिमये बाणधनुषी दधदुज्ज्वलम् ॥५३॥ में परिणत होती है। अब यह बताया जा रहा है कि श्रीचक्रनिवासिनी देवता भी तन्मय ही है। आगे के (१।५२-५५) श्लोकों में यही विषय प्रतिपादित है — विमर्श शक्ति विश्व का आकार ग्रहण करती है, किन्तु उसका अपना स्वरूप तो प्रकाशात्मक शिव में स्थित है। कामेश्वर के अंक रूपी पर्यंक में विश्राम करने वाला विमर्श शक्ति का यह स्वरूप अत्यन्त सुन्दर है ॥५२॥ विश्वाकार प्रथा का अर्थ है ३६ तत्त्वों के रूप में परिणत हुई विमर्श शक्ति। इस शक्ति का आधार और उसका वास्तविक स्वरूप प्रकाशात्मक शिव ही है, अर्थात् ऊपर के श्लोक में वर्णित शिवरूपी दीपक की इस विमर्श शक्ति रूप प्रभा का आधार शिव ही है। इस प्रकार विमर्श शक्ति प्रकाशात्मक शिव में अभिन्न रूप में विराजमान है। भगवान् कामेश्वर प्रकाशात्मक शिव की गोद में विराजमान इस विमर्श शक्ति का स्वरूप अत्यन्त सुन्दर है, सभी के लिये स्पृहणीय है। इसका भाव यह है कि प्रत्येक प्राणी यही चाहता है कि मेरा स्वरूप भी ऐसा ही हो जाय ॥५२॥ इच्छाशक्तिमय पाश, ज्ञानरूपी अंकुश और क्रियाशक्तिमय बाण-धनुष को धारण करने से कामेश्वर और कामेश्वरी के इस युगल-स्वरूप की शोभा और भी बढ़ गई है ॥५३॥ १. 'उक्तवानिति भावः । तदेव' इत्येतानि पदान्यनावश्यकानि । २. 'तदीयशक्तिनिकर' नास्ति-ने., ज., झ., ञ.।
प्रथमः ] दीपकाभाषानुवादसहितम् ६९ इच्छाशक्तिरेव पाशः, बन्धहेतुत्वात् । ज्ञानशक्तिरेव अङ्कुशः, मनोमयगजस्य नियामकत्वात् । क्रियाशक्तिमये बाणधनुषी, "शब्दस्पर्शादयो बाणा मनस्तस्या- भवद्धनुः" इति वचनात् शब्दादिबाणानां मनसा धनुषा सह^१ संयोजनं क्रिया- शक्तेरेव व्यापारः । अत्र इच्छाशक्तिमयं पाशम्, ज्ञानशक्तिमयमङ्कुशम्, क्रिया- शक्तिमये बाणधनुषी—एवमायुधचतुष्टयं स्वेच्छागृहीतकामकलामयविग्रहबाहु- चतुष्टयेन दधदुज्ज्वलम्, चिदात्मकत्वात् ॥५३॥ आश्रयाश्रयिभेदेन अष्टधाभिन्नहेतिमत् । आश्रयः कामेश्वरः, आश्रयि कामेश्वर्याख्यं परं तेजः । एवमाश्रयाश्रयिभेदेन अष्टधाभिन्नहेतिमत् । हेतिरायुधम्, आश्रयस्य चत्वार्यायुधानि आश्रयिणश्चत्वारि इच्छा शक्ति बन्धन का कारण होती है, अतः पाश इच्छा शक्ति का प्रतीक है । ज्ञान शक्ति अंकुश है, क्योंकि मन रूपी मतवाले हाथी को ज्ञान रूपी अंकुश से ही वश में रखा जा सकता है । बाण और धनुष क्रिया शक्ति के प्रतीक हैं । ^१शास्त्रवचन के अनुसार "शब्द, स्पर्श आदि विषय बाण और मन धनुष होता है" । शब्द, स्पर्श आदि विषय रूपी बाण को मन रूपी धनुष पर चढ़ा देने का कार्य क्रिया शक्ति का ही व्यापार है । इस तरह से इच्छाशक्तिमय पाश, ज्ञानशक्तिमय अंकुश, क्रियाशक्तिमय बाण और धनुष— इन चार आयुधों को यह कामेश्वर-कामेश्वरी का युगल स्वरूप अपनी इच्छा से कामकला का शरीर ग्रहण कर अपने चार बाहुओं में धारण करता है और इस तरह से उनका यह चिदात्मक स्वरूप अति उज्ज्वल हो जाता है ॥५३॥ कामेश्वर-कामेश्वरी का यह युगल स्वरूप आश्रय और आश्रयी के भेद से आठ आयुध वाला होता है ॥ यहां आश्रय कामेश्वर और आश्रयी कामेश्वरी नामक परम तेज है । इस तरह से आश्रय और आश्रयी के भेद से यह युगलस्वरूप आठ आयुध वाला बन जाता है । हेति १. 'सह' नास्ति-झ. उ. ।
- नित्याषोडशिकार्णव की अपनी व्याख्या सेतुबन्ध में भास्करराय ने पंचम पटल में कुछ अधिक श्लोकों का समावेश किया है, जो कि वामकेश्वरीमत, ऋजुविमर्शिनी, अर्थ- रत्नावली आदि में व्याख्यात नहीं हैं । प्राचीन हस्तलेखों में भी ये श्लोक नहीं मिलते । अमृतानन्द ने दीपिका व्याख्या में नित्याषोडशिकार्णव के वचनों को सर्वत्र चतुःशती के नाम से उद्धृत किया है । यहाँ उसने चतुःशती शास्त्र का उल्लेख नहीं किया । स्पष्ट है कि अमृतानन्द भी इसको चतुःशतीशास्त्र का वचन नहीं मानते । भास्करराय द्वारा व्याख्यात अन्य वचनों को भी वे अभियुक्तवचन या प्रामाणिक वचन कहकर उद्धृत करते हैं । अतएव ये श्लोक नित्याषोडशिकार्णव के न होकर किसी अन्य ग्रन्थ के होने चाहिये ।
७० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः चेत्यष्टधाभिन्नहेतिमत्। कोऽर्थः¹ ? परशिव एव प्रकाशविमर्शात्मना² निजावंशौ विभज्य कामेश्वरः कामेश्वरीति भूत्वा पाशाङ्कुशधनुश्शरान् पुंस्त्रीभेदेनाष्टौ धृत्वाऽऽश्रयाश्रयिभावेन स्वरमयमध्यत्रिकोणमध्यगतसदाशिवारूख्यबैन्दवचक्रे तुरीय- बिन्दुमये परलिङ्गे निवसतीत्यर्थः। इदमेव मिथुनं नवधा ³विभज्यात्मानं नवचक्रेषु स्थितमित्याह— अष्टारचक्रसंरूढं नवचक्रासनस्थितम् ॥५४॥ पूर्वोक्तक्रमेण तदेव वामादीच्छा⁴दिशक्तिमयं त्रिकोणमेव त्रिधा विभिन्नं द्विशक्त्येकवह्निभेदेनाष्टारचक्रमभूत्। पुनस्तदेव⁵ त्रिपदं वह्निशक्तिरूपं च भूत्वा नवचक्रमभूत्। एवंरूपं श्रीचक्रं स्वयमेवाष्टारचक्रम्, शब्द आयुध (शस्त्र) का वाचक है। आश्रय कामेश्वर के चार और आश्रयी कामेश्वरी के चार—इस तरह से आठ आयुधों से यह स्वरूप शोभित है। इसका अभिप्राय यह है कि परम शिव ही प्रकाश और विमर्श के रूप में विभक्त होकर कामेश्वर और कामेश्वरी युगल का स्वरूप धारण कर लेता है और तब आश्रय तथा आश्रयी के भेद से, स्त्री और पुरुष के भेद से पाश, अंकुश, बाण और धनुष नामक आयुधों को अलग अलग धारण करके स्वरों से सुशोभित त्रिकोण चक्र के मध्य में विद्यमान सदाशिव रूपी बैन्दव चक्र में, जो कि तुरीय बिन्दुमयं स्थान है और जिसमें परलिंग का भी निवास है, विराजमान हो जाता है। यही मिथुन स्वरूप नवधा विभक्त होकर नौ चक्रों में स्थित है— त्रिकोण और अष्टार के क्रम से यही युगल स्वरूप क्रमशः नवचक्ररूपी आसन पर आरूढ हो जाता है ॥ ५४ ॥ पहले (१।१२-१४) बताया जा चुका है कि वामा आदि और इच्छा आदि तीन-तीन शक्तियों का प्रतीक त्रिकोण चक्र ही दो शक्ति और एक वह्नि के रूप में परिणत होकर अष्टार चक्र बन जाता है। तीन त्रिकोण वाला यह अष्टार चक्र ही पुनः वह्नि और शक्ति त्रिकोणों के विस्तार से नौ चक्रों का स्वरूप धारण कर लेता है। इस प्रकार श्रीचक्रमय आठ आयुधों को धारण करने वाला यह कामेश्वर-कामेश्वरी युगल-स्वरूप ही अष्टार चक्र में आरूढ हो जाता है। १. 'कोऽर्थः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। २. त्मकौ-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ३. प्रवि-ने.। ४. च्छादिमयं-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ५. तदेव शक्तिरूपं-ख. ग. ने. ज. झ. उ.।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ७१ चितिश्चित्तं$^१$ च चैतन्यं चेतनाद्वयकर्म$^२$ च । जीवः कला $^३$शरीरं च सूक्ष्मं पुर्यष्टकं मतम् ॥ इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या निजं सूक्ष्मं पुर्यष्टकं विभज्याष्टारचक्रं वशि- न्यादिक्रमेण संरूढमित्यर्थः । नवचक्रासनस्थितम् एवंरूपं मिथुनमेव निजाधार- नवकं नवचक्रत्वेन विभज्य निजनादशक्तिनवकं नवचक्रेश्वरीरूपेण संपाद्य, इच्छादिशक्तित्रितयं पशोः सत्त्वादिसंज्ञकम् । $^४$महत्त्र्यस्रं चिन्तयामि गुरुवक्त्रादनुत्तरात्$^५$ ॥१८॥ अष्टारांशप्रदेशोऽयं$^६$ चिन्निर्याणेषु$^७$ सादिकम्$^८$ । सूक्ष्मं पुर्यष्टकं देव्या मतिरेषा हि गौरवी ॥१७॥ चिति, चित्त, चैतन्य, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, जीव, कला और शरीर—इन आठ तत्त्वों को सूक्ष्म पुर्यष्टक माना जाता है ॥ स्वच्छन्दसंग्रह के इस वचन के अनुसार यह कामेश्वर-कामेश्वरी युगल अपने सूक्ष्म पुर्यष्टकमय शरीर को विभक्त कर इस अष्टार चक्र में वशिनी प्रभृति आठ देवियों के रूप में विराजमान हो जाता है। यही युगल स्वरूप अपने नौ आधारों को नौ चक्रों के रूप में विभक्त कर अपनी नौ नाद शक्तियों को नौ चक्रेश्वरियों का स्वरूप प्रदान कर देता है । शिवानन्द की $^१$शुभ्रमोदयवासना में यह स्थिति इस तरह से वर्णित है— पशु (अज्ञ जीव) की इच्छा आदि तीन शक्तियां ही सत्त्व, रज और तमोगुण हैं। गुरु के मुख से उपदिष्ट पद्धति से मैं इसी रूप में महात्र्यश्र (मूल त्रिकोण) की भावना करता हूँ। $^२$चिच्छक्ति के निर्गमन का प्रथम कारण देवी का सूक्ष्म पुर्यष्टकमय शरीर ही १. इच्चैत्यं-ग. ज. उ. । २. द्वयमेव च-ग. झ. उ., द्वयमेव च-चि. । ३. च देवेशि-क. ख. ने. । ४. महा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. दनन्तरम्-ग. उ. । ६. रकप्रदेशो-ग. । ७. चिन्निर्वाणैषणादिकम्-मु., विनि-ने. ज. झ. उ., वत्-ग. ब. उ. । ८. चि. पाठोऽत्र स्थापितः । १. यह ग्रन्थ भी नित्याषोडशिकार्णव के परिशिष्ट भाग (पृ० २९७-३०३) में प्रकाशित हो चुका है। दीपिकाकार ने योगिनीहृदय के सृष्टिक्रम को ध्यान में रखकर वहां के श्लोकों का क्रम बदल दिया है। शिवानन्द ने अपने ग्रन्थ में संहार क्रम से श्रीचक्र की वासना बताई है । २. श्रीचक्र की सर्वतत्त्वात्मकता के प्रतिपादक इस प्रकरण पर उपोद्घात में विस्तार से विचार किया गया है।
७२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः अन्तर्दशारवसुधा ज्ञानकर्मेन्द्रियावलिः। महात्रिपुरसुन्दर्या इति संचिन्तयाम्यहम् ॥१६॥ बाह्यो दशारभागोऽयं बुद्धिकर्माक्षगोचरः ॥१५॥ चतुर्दशारवसुधा¹ करणानि चतुर्दश ॥१४॥ वसुच्छदनपद्माङ्कदेशो यश्चक्रगो विभुः। अव्यक्ताद्याः प्रकृतयो भूतान्ता निश्चिनोम्यहम् ॥१३॥ षोडशच्छदपद्माङ्कदेशो² भूताक्षमानसम्। विकारात्मकतापन्नं देव्या संभावयाम्यहम् ॥१२॥ इति³ सुभगोदयवासनोकरीत्या बैन्दवादिचतुरस्रान्तेषु नवचक्रेष्वासनभूते- ष्विन्द्रियादिरूपेण स्थितमित्यर्थः ॥५४॥ एवंरूपं परं तेजः श्रीचक्रवपुषा स्थितम्। एवंरूपम् उक्तप्रकारेण विभक्तनिजेच्छादिषोडशविकारान्तावयवमयत्रिकोणादि- चतुरस्रान्त⁴श्रीचक्र⁵वपुषा स्थितमित्यर्थः। अष्टार चक्र के नाम से प्रसिद्ध हो गया है, यह ज्ञान भी हमें अपने गुरु से ही मिलता है। अन्तर्दशार का आधार महात्रिपुरसुन्दरी के ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय से बना है, ऐसी मैं भावना करता हूँ। इस चक्र का बाह्य दशार भाग ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों के विषयों का परिणाम है। चतुर्दशार चक्र का आधार चौदह इन्द्रियाँ हैं। चक्र में जो आठ दल वाला पद्म है, वह अव्यक्त, महत्, अहंकार और पंचतन्मात्रा रूप आठ प्रकृतियों का परिणाम है, ऐसा मैं निश्चय करता हूँ। इस चक्र का षोडश दल पद्म वाला प्रदेश देवी से आविर्भूत १६ विकारों (पांच महाभूत और मन सहित एकादश इन्द्रिय) का प्रतिनिधि है, ऐसी मैं भावना करता हूँ'। इसका अभिप्राय यह है कि बैन्दव से लेकर चतुरस्र पर्यन्त नौ चक्रों में, जो कि देवी के निवास के स्थान हैं, इन्द्रिय आदि ऊपर बताये गये विभिन्न रूपों में स्वयं देवी ही अवतरित होती है ॥५४॥ इस तरह से यह परम तेज ही श्रीचक्र का स्वरूप धारण कर विद्यमान है॥ ऊपर बताई गई पद्धति से इच्छा शक्ति से लेकर षोडश विकार पर्यन्त विविध अवयवों (स्वरूपों) को धारण कर प्रकाशविमर्शात्मक यह परम तेजस्वी युगल स्वरूप ही त्रिकोण से लेकर चतुरस्र पर्यन्त श्रीचक्र का शरीर धारण कर लेता है॥ १. धरणी-मु.। २. पद्मोऽयं भागो-मु.। ३. इत्यादि-ने. ग. उ.। ४. इतः परम्- 'त्रिकोणरूपं स्थितमित्यतश्चतुरस्रान्त' इत्यधिकं ने.। ५. श्रीपीठ-ग.।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ७३ इत्थं तस्मिन् मिथुने श्रीचक्रवपुषा परिणते सति तदीया १वयवशक्तय एवा- वरणदेवतारूपेण स्थिता २इत्याह— तदीयशक्तिनिकरस्फुरदूर्मिसमावृतम् ॥५५॥ तयोः कामेश्वरकामेश्वर्योरेवावयवास्तदीयावयवाः, तेषां शक्तयः, तासां निकराः समूहाः, ते च स्फुरन्त एवोर्मयस्तरङ्गाः, तैः समावृतम्। कोऽर्थः ? प्रकाशविमर्शमयकामेश्वरकामेश्वरीस्वेच्छागृहीतविग्रहावयवेषु ३चक्रावयवतामुप- गतेषु तदवयवशक्तयोऽपि कामेश्वरी-वज्रेश्वरी-भगमालिन्याद्यावरण४देवतारूपेण परिवार्य तिष्ठन्तीत्यर्थः५। ऊर्मिशब्देनेदं द्योत्यते—प्रकाशात्मकः परमेश्वरः समुद्रः, विमर्शरूपिणी कामेश्वरी सलिलम्, तदीयावयवाः शक्तिनिकरा ऊर्मयः। यथा इस तरह से उस कामेश्वर-कामेश्वरी मिथुन के श्रीचक्र का स्वरूप धारण कर लेने पर उसके अवयवों में विद्यमान शक्तियाँ ही आवरण देवताओं का स्वरूप धारण कर लेती हैं। यही विषय आगे वर्णित है— उस मिथुन की अवयव शक्तियों का समूह समुद्र से उठी हुई तरंगों के समान उसको घेर लेता है ॥५५॥ कामेश्वर और कामेश्वरी के विभिन्न अवयवों से उत्पन्न शक्तियों का समूह समुद्र से उठी हुई तरंगों के समान उस युगल स्वरूप को चारों तरफ से घेर लेता है। इसका अभिप्राय यह है कि प्रकाशविमर्शस्वरूप कामेश्वर-कामेश्वरी युगल अपनी इच्छा से जो शरीर धारण करता है, उस शरीर के विभिन्न अवयव ही चक्र के अवयवों का स्वरूप धारण कर लेते हैं और इस तरह से उसकी इच्छा प्रभृति अवयव शक्तियाँ ही कामे- श्वरी, वज्रेश्वरी, भगमालिनी आदि १आवरण देवताओं के रूप में उसको घेर लेती हैं। यहाँ ऊर्मि शब्द विशेष अभिप्राय से प्रयुक्त हुआ है। तदनुसार यह प्रकाशात्मक परमेश्वर समुद्रस्थानीय है। विमर्शस्वरूपिणी कामेश्वरी जल का प्रतिनिधित्व करती है। उसकी अवयवशक्तियों का समूह लहरों का बोध कराती हैं। इसका तात्पर्य यह है कि जैसे लहरियाँ समुद्र में उठती हैं और उसी में लीन भी हो जाती हैं, उसी तरह से ३६ १. या अव-ने. झ. उ.। २. इत्यर्थः-ग. ने. उ.। ३. 'चक्रा'''गतेषु' नास्ति-ख. ने. ज. झ.। ४. रणं परिवार्य-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ५. इतः परम्-'एवमूर्भयस्तरङ्गास्तैः समावृतं परिवृतम्। कोऽर्थः-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। १. नित्याषोडशिकार्णव (१।१५३-१८२) में मध्यबिन्दुनिवासिनी भगवती त्रिपुर- सुन्दरी (मुख्य देवता) और चतुरस्र आदि चक्रों की अधिष्ठात्री आवरण देवताओं का संहारक्रम से वर्णन किया गया है। इस विषय पर आगे (२।५७) विचार किया जायेगा। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
७४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः कल्लोलाः समुद्रे जायन्ते तत्रैव लीयन्ते, एवं १षट्त्रिंशत्तत्त्वमयं सशक्तिकं चक्रं तत्रैवोदेत्यस्तमेति चेति तात्पर्यम् । तत्राभियुक्तवचनम्— मूलोद्भवं शक्तिचक्रं यतस्तन्मयतां गतम् । तस्मिन्नेवाव्यये तत्त्वे विलीनं २परिभावयेत् ॥ ३मूलं स्वात्मनि चिद्रूपे यजेद् यत्तत् तदेव हि । इति ॥५५॥ (सु० ६७-६८) सर्वचक्रवासनामुक्त्वा तेषु सवासनं मुद्राभेदमाह “चिदात्मभित्तौ” इत्यादिना “एवं चक्रमयम्” इत्यन्तेन (श्लो० ५६-७१)— चिदात्मभित्तौ विश्वस्य प्रकाशामर्शने यदा । करोति स्वेच्छया पूर्णविचिकीर्षासमन्विता ॥५६॥ तत्त्वों का प्रतिनिधि यह समस्त शक्तिचक्र युगल स्वरूप से ही निकलता है और उसी में लीन भी हो जाता है, शिवानन्द मुनि ने भी सुभगोदय में इसी विषय का वर्णन किया है— १मूल स्वरूप (भगवती त्रिपुरसुन्दरी) से उत्पन्न हुआ शक्तिचक्र अब पुनः तन्मय हो गया है, उसी अव्यय तत्त्व में लीन हो गया है, ऐसी भावना करनी चाहिये । उस मूल स्वरूप की भी चिद्रूप स्वात्मा में ही उपासना करनी चाहिये, क्योंकि इष्ट देवता की जिन पत्र-पुष्प आदि से पूजा की जाती है, वे सब चिद्रूप स्वात्मा से भिन्न नहीं हैं ॥५५॥ सभी चक्रों की भावना का प्रकार इस प्रकार उपदिष्ट हुआ, अब आगे (१।५६-७१) के श्लोकों में विभिन्न मुद्राओं का और उनकी भावना का प्रकार बताया जा रहा है— चित्-शक्ति स्वात्मस्वरूप भित्ति में जब स्वेच्छा से विश्व की रचना के लिये परिपूर्ण इच्छा शक्ति से संपन्न हो प्रकाश और विमर्श का सहारा लेती है, उस १. एवं तत्त्वमयं शक्तिचक्रं-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. तद्विभा-मु. । ३. मूले- क. ग. झ. उ. । I. सुभगोदय में शिवानन्द ने श्रीचक्र की पूजाविधि का संक्षेप में वर्णन किया है । वहाँ विसर्जन की विधि का निरूपण करते हुए वे कहते हैं कि मूलस्वरूप (त्रिपुर- सुन्दरी) से ही शक्तिचक्र, अर्थात् आवरण देवताओं का आविर्भाव होता है, अतः विसर्जन के समय ऐसी भावना करनी चाहिये कि वे सभी आवरण देवता मूल स्वरूप में पुनः विलीन हो गये हैं । किं बहुना, वह मूलस्वरूप भी स्वात्मचिद्रूप में लीन हो गया है । विसर्जन का यही आध्यात्मिक स्वरूप त्रिपुरा सम्प्रदाय में मान्य है ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ७५ क्रियाशक्तिस्तु विश्वस्य मोदनाद् द्रावणात् तथा । मुद्राख्या चिद् विमर्शशक्तिः । आत्मभित्तौ आत्मैव भित्तिरात्मभित्तिस्तस्याम्^१, स्वस्वरूप- मेव भित्तिरित्यर्थः । विश्वस्य शिवादेर्भूभ्यन्तस्य । प्रकाशामर्शने । अस्फुटस्य स्फुटी- कारः प्रकाशः, इदन्तया हृदयङ्गमीभावो विमर्श ^२एवामर्शनम् । एवंविधे प्रकाशा- मर्शने, यदा सृष्टिकाले, पूर्णविचिकीर्षासमन्विता, विशेषेण कर्तुमिच्छा विचिकीर्षा । विकारः क्षीरादीनामप्यस्ति, आतञ्चनादिना^३ । अत एवाह-पूर्णविचिकीर्षा- समन्वितेति । तत्र^४ तु क्षीरादेर्दध्यादिमात्रमेव विकारः, अत्र तु शिवादिक्षित्यन्तं तत्त्वाकारेण विकारः । अत एव पूर्णविचिकीर्षासमन्विता । क्रियाशक्तिस्तु क्रिया- शक्तिरेव भूत्वा । तुरवधारणे । एवंविधस्य विश्वस्य मोदनाद् द्रावणाच्च । अत्र त्वनुकूलक्रियैव मोदनम् । द्रावणं नाम तदेकरसीभावः । “संविद् मुद्राख्यां लभते । अयमर्थः-यदा विमर्शशक्तिर्विश्वरूपेण ^५विहर्तुमिच्छति, तदा क्रिया- समय उसकी क्रिया शक्ति विश्व के मोदन और द्रावण व्यापार में प्रवृत्त हो मुद्रा का स्वरूप धारण कर लेती है ॥५६-५७॥ चित्स्वरूपिणी विमर्श शक्ति अपने स्वरूप को ही भित्ति बना कर उसमें शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त सारे जगत् का प्रकाश और आमर्शन करती है। यहाँ अस्पष्ट वस्तु को स्पष्ट कर देना प्रकाश शब्द का और उस स्पष्ट वस्तु को 'इदं' (यह) रूप से ग्रहण करना आमर्शन शब्द का अर्थ है। सृष्टि करते समय यह चित्-शक्ति विचिकीर्षा से परि- पूर्ण हो जाती है। विचिकीर्षा शब्द का अर्थ है अपने को पूरी तरह से बदल डालने की इच्छा। आतंचन (जामन) आदि देने से दूध आदि में भी विकार आ जाता है। वहाँ दूध ही दही के रूप में बदल जाता है। यहाँ तो चित्-शक्ति का शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त परिणाम चेतन ही नहीं, जड़ रूप में भी हो जाता है। इसी अर्थ को बताने के लिये यहाँ 'पूर्णविचिकीर्षा' शब्द का प्रयोग किया गया है। चित्-शक्ति का जब इस तरह से परिणाम होने लगता है, उस समय उसकी क्रिया-शक्ति ही इस परिणत विश्व के मोदन और द्रावण में लग जाती है। अनुकूल कार्य का सम्पादन मोदन और उसमें तन्मयता द्रावण शब्द का अर्थ है। इस तरह से मोदन और द्रावण व्यापार में लगी क्रिया शक्ति ही 'मुद्रा' नाम से जानी जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि जब विमर्श शक्ति विश्व का स्वरूप धारण कर विहार करना चाहती है, तब पहले वह क्रिया शक्ति बन जाती है और १. 'तस्याम्' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २ 'एवामर्शनम्' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. दीनाम्-क. ख. ग. नै. । ४. 'तत्र तु' नास्ति-ख. ग. ज. झ. उ. । ५. 'विहर्तुं' नास्ति-क. 'विहर्तुमिच्छति'-ख. 'विहर्तुकामा'-ग. 'विहर्तुकाम्यया'-ने. ज. झ. उ. ।
७६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः शक्तिर्भूत्वा स्वविकारभूतस्य विश्वस्य परचिदानन्दलक्षणेन मोदनेन तदैक्यरस्य- लक्षणेन द्रावणेन च मुद्रारूपमापन्नेत्यर्थः ॥५६-५७॥ तत्रादौ व्यापिकां त्रिखण्डामुद्रामाह— सा यदा संविदम्बिका त्रिकलामयी ॥५७॥ त्रिखण्डारूपमापन्ना सदा संनिधिकारिणी । सर्वस्य चक्रराजस्य व्यापिका परिकीर्तिता ॥५८॥ सा विमर्शरूपिणी संवित्, १त्रिकलामयी वामाज्येष्ठारौद्रीरूपकलात्रयसमष्टि- रूपा अम्बिका २भूत्वा, ३अम्बिकाग्रहणं ४शान्ताया अप्युपलक्षणम् । इच्छाज्ञानक्रिया- शक्तिरूपकलात्रयसमष्टिरूपा शान्तात्मिकाऽपि भूत्वेत्यर्थः । त्रिखण्डारूपमापन्ना । दक्षिणाङ्गुलयो वामाद्याः प्रकाशांशाः वामाङ्गुलय इच्छाद्या विमर्शांशाः । तदुभयसंयोगरूपबन्धनात्मकखण्डत्रयवती त्रिखण्डा मुद्रा जातेत्यर्थः । सदा तब अपने ही परिणाम स्वरूप विश्व को परम चिदानन्द के अंशभूत लौकिक आनन्द से परिपूर्ण कर उसको परम चिदानन्द की तरफ बहा ले जाने का उपक्रम करने के लिये मुद्रा का रूप धारण कर लेती है ॥५६-५७॥ सबसे पहले व्यापिका त्रिखण्डा मुद्रा का वर्णन करते हैं— यह विमर्शरूपिणी संवित् पहले तीन कलाओं वाली अम्बिका शक्ति का और तब त्रिखण्डा मुद्रा का स्वरूप धारण कर लेती है। यह मुद्रा भगवती त्रिपुरा के पास पहुँचाने वाली है। श्रीचक्र के सभी अवयवों में व्याप्त रहने से इसको व्यापिका भी कहा जाता है ॥५७-५८॥ वह विमर्शरूपिणी संवित् पहले वामा, ज्येष्ठा और रौद्री स्वरूप तीन कलाओं वाली समष्टिस্বরূপिणी अम्बिका शक्ति का रूप धारण करती है। यहाँ अम्बिका शक्ति शान्ता शक्ति का भी बोध कराती है, क्योंकि शान्ता शक्ति भी इच्छा, ज्ञान और क्रियात्मक तीन कलाओं का समष्टि स्वरूप है। इस तरह से संवित् तीन कलाओं वाली अम्बिका और शान्ता शक्ति का प्रातिनिध्य सी करती हुई त्रिखण्डा मुद्रा का स्वरूप धारण कर लेती है। दाहिने हाथ की अंगुलियां प्रकाश से आविर्भूत वामा प्रभृति शक्तियों का और बायें हाथ की अंगुलियां विमर्श से आविर्भूत इच्छा प्रभृति शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। दायें और बायें हाथ की अंगुलियों का मिलन ही यहाँ बन्धन कहा गया है। तीन खण्डों में यह मिलन होता है। इस तरह से त्रिखण्डा मुद्रा बनती है। प्रकाश और विमर्श स्वरूपिणी १. चित्कला-ग. ने. ज. उ. । २. 'भूत्वा' नास्ति-क. ग. उ. । ३. शान्त्यती- तायाः-ख. घ. च. छ. । ४. शान्तायाः क्रोडीकारात्-ख. घ. च. छ. ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ७७ संनिधिकारिणी। अत एवेयं¹ संविद्देवतायास्त्रिपुरायाः संनिधिकारिणी सांनिध्य²- कारिणी। सर्वस्य चक्रराजस्य सर्वेषां चक्राणां पूजायन्त्राणां श्रेष्ठत्वाच्चक्रराजस्य व्यापिका, नवचक्रस्थितनवमुद्राणां समष्टिभूतत्वात् ॥५७-५८॥ सर्वसंक्षोभिणीमुद्राम्राह— योनिप्राचुर्यतः सैषा सर्वसंक्षोभिणी पुनः। वामाशक्तिप्रधानेयं द्वारचक्रे स्थिता भवेत् ॥५९॥ सैषा त्रिखण्डा खण्डत्रयं³मुन्मुच्य योनिप्राचुर्यतः। मध्यमाद्वयसंयोगादेका⁴, अनामिकाद्वयसंयोगादन्या⁵, कनिष्ठिकाद्वयसंयोगादपरा, एवं योनि⁶प्राचुर्यात् सर्व- ⁷संक्षोभिणी परानन्दप्रवणत्वकारिणी। वामाशक्तिप्रधानेयं सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा वामाशक्तिप्रधानत्वात् सृष्टिः। सृष्टिरेव क्षोभः। द्वारचक्रे चतुरस्रत्रयरूपे चतु- र्द्वारवति त्रैलोक्यमोहने ⁸चक्रे स्थिता ॥५९॥ अंगुलियों के मिलन से बनी होने के कारण यह त्रिखण्डा मुद्रा संविद्देवता भगवती त्रिपुरा के सामीप्य को देने वाली है और चक्रराज श्रीयन्त्र के, जो कि समस्त पूजायन्त्रों में सर्व- श्रेष्ठ माना जाता है, समस्त स्वरूप में, सभी नौ चक्रों में व्याप्त होने से व्यापिका कह- लाती है, अर्थात् यह तीन खण्ड वाली त्रिखण्डा मुद्रा समस्त नौ चक्रों में विद्यमान समस्त नौ मुद्राओं की समष्टिस्वरूपिणी है, उन सबमें व्याप्त है ॥५७-५८॥ सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा का स्वरूप बताते हैं— त्रिखण्डा मुद्रा में जब योनियों की अधिकता हो जाय, तो वह सर्वसंक्षोभिणी कहलाती है। इसमें वामा शक्ति प्रधान है और यह द्वार चक्र में स्थित है ॥५९॥ ऊपर बताई गई त्रिखण्डा मुद्रा अपने तीन खण्डों वाले स्वरूप को छोड़कर जब योनि- प्रचुर हो जाती है, तो इसे सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा कहते हैं। यहाँ दो मध्यमाओं के संयोग से एक, दो अनामिकाओं के संयोग से दूसरी और दो कनिष्ठाओं के संयोग से तीसरी योनि बनती है। इस तरह से इस मुद्रा में योनियों की प्रचुरता रहती है। इसीलिये यह मुद्रा सर्वसंक्षोभिणी है, सभी को परमानन्द की तरफ ले जाने वाली है। इस मुद्रा में वामा शक्ति की प्रधानता रहती है और वामा शक्ति सृष्टि की प्रतीक है। यह सृष्टि ही क्षोभ है। इस तरह से इस मुद्रा का सर्वसंक्षोभिणी नाम सार्थक है। यह मुद्रा त्रैलोक्य- मोहन चक्र में स्थित है, जिसका कि स्वरूप चार द्वार वाली तीन चतुरस्र (चौकोर) रेखाओं से बनता है ॥५९॥ १. 'इयं' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. 'सांनिध्यकारिणी' नास्ति-ने. ज. झ. उ. । ३. मुन्मोच्य-ग. ने. ज. झ. उ. । ४. देका योनिः, अनामा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. दन्या योनिः, कनिष्ठा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. योनित्रयप्रा-क. ने. ज. झ. उ. । ७. सर्वसंक्षोभिका-ग. ने. ज. झ. उ. । ८. चक्रे नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।
७८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः द्राविणी¹मुद्रामाह— क्षुब्धविश्वस्थितिकरी ज्येष्ठाप्राचुर्यमाश्रिता । स्थूलनादकलारूपा सर्वानुग्रहकारिणी ॥६०॥ सर्वाशापूरणाख्ये तु सैषा स्फुरितविग्रहा । क्षुब्धस्य विश्वस्य स्थितिकरी स्वसंविन्मात्रस्थितिकारिणी । अतो ज्येष्ठा- प्राचुर्यमाश्रिता, ज्येष्ठाशक्तेः स्थितिहेतुत्वात् । ²स्थूलनादकलारूपा । स्थूलनादः, श्रुतिगोचरत्वात् । नादाज्जाताः कला नादकलाः षोडशस्वराः । अत्राभियुक्तवच- नम्— "कलाः कला नादभवा वदन्त्यतः³" (प्र० सा० ७।१८) इत्यादि । ⁴तद्रूपा, कामाकर्षण्यादिनिवाससर्वाशापरिपूरकचक्र⁵पूरकत्वात्, सर्वाशापूरणाख्ये कामा- कर्षिणीकलाधार⁶त्वात् । अत एव सर्वानुग्रहकारिणी । कामाकर्षणमेव सर्वानुग्रहः । द्राविणी मुद्रा का स्वरूप बताते हैं— ज्येष्ठा शक्ति की प्रधानता के कारण क्षुब्ध विश्व को स्थिरता देने वाली, स्थूल नाद की १६ कलाओं को धारण करने वाली और सब पर अनुग्रह करने वाली यह द्राविणी मुद्रा सर्वाशापरिपूरक चक्र में अपना स्वरूप प्रकाशित करती है ॥६०-६१॥ क्षुब्ध विश्व को स्थिरता प्रदान करने वाली, अपने संवित् स्वरूप में प्रतिष्ठित करने वाली इस द्राविणी मुद्रा में ज्येष्ठा शक्ति की प्रधानता है, क्योंकि ज्येष्ठा शक्ति ही क्षुब्ध विश्व को स्थिरता प्रदान करती है । कानों से सुनाई पड़ने वाला नाद स्थूलनाद है । इस नाद से उत्पन्न १६ कलाएं ही १६ स्वरों का रूप धारण करती हैं । ¹प्रपंचसार में बताया गया है— "इस मधुर नाद से ही उसकी सोलह कलाओं वाले स्वरों की उत्पत्ति बताई गई है" ॥ यह द्राविणी मुद्रा उन्हीं कलाओं का प्रतिनिधित्व करती है, क्योंकि जिस सर्वाशापरिपूरक चक्र में यह निवास करती है, उसमें कामाकर्षिणी आदि १६ शक्तिकलाएँ विद्यमान हैं । इसीलिये यह सब पर अनुग्रह करने वाली है । काम का आकर्षण, इच्छित वस्तु को प्राप्त करा देना ही तो सबका अनुग्रह है । श्लोक में विद्यमान 'सैषा' शब्द से १. 'मुद्रा' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. 'स्थूल••••गोचरत्वात्' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. वदन्त्यजाः-मु. । ४. तद्रूपाः कामाकर्षिण्याद्यास्तद्रूपाः सर्वाशा- ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. व्यापकत्वात्-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. धाररूपत्वात्- ग. ने. ज. झ. उ. ।
- प्रपंचसार भगवत्पाद शंकराचार्य की कृति मानी जाती है । कलान्यास के प्रसंग का उक्त श्लोक-खण्ड यहाँ उद्धृत किया गया है । इसकी व्याख्या प्रयोगक्रमदीपिका में बताया गया है कि अकार आदि सोलह स्वर नाद की कलाएँ हैं । यहाँ बाद में बिन्दु की सोलह कलाओं का भी निर्देश किया गया है।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ७९ सैषेति तच्छब्देन चतुःशतीशास्त्रोक्ता (३।६-७) सर्वविद्राविणी मुद्रा परामृश्यते । स्फुरितविग्रहा संविद्रूपत्वात् । कोऽर्थः ? ज्येष्ठाप्राचुर्याधारत्वात् स्थितिरूपिणी, अत एव ऋजुरूपमध्यमातर्जन्यन्वयोः कनिष्ठिकाऽनामिकयोश्च संयोगरूपिणो, कामा- कर्षिण्यादिरूपत्वात् सर्वानुग्रहकारिणो, तदाधारत्वात् सर्वाशापरिपूरणाख्ये चक्रे संविद्रूपत्वात् स्फुरितविग्रहा चतुःशतोशास्त्रे प्रतिपादिता सैषा सर्वविद्राविणी मुद्रा स्थितेत्यर्थः ॥६०-६१॥ सर्वार्कर्षिणीमुद्रामाह— ज्येष्ठावामासमत्वेन सृष्टेः प्राधान्यमाश्रिता ॥६१॥ आकर्षिणी तु मुद्रेयं सर्वसंक्षोभिणी स्मृता । ज्येष्ठावामासमत्वेन ज्येष्ठावामाशक्तिद्वयसामरस्यरूपत्वात् । सृष्टेः प्राधान्य- माश्रिता । सृष्टिरूपा वामा, स्थितिरूपा ज्येष्ठा । उभयसाम्यात् सृष्टिस्थितिसाधा- रणीयं वामांशेन वक्रतर्जनीमध्यमाद्वयरूपा, ज्येष्ठांशेन ऋजुसंयुक्तानामिकाकनिष्ठा- द्वयरूपेत्यर्थः । अत एव वक्राङ्गुलिद्वयरूपत्वाद् आकर्षिणीयं मुद्रा सर्वसंक्षोभिणि चतुःशतीशास्त्र (३।६-७) में उपदिष्ट सर्वविद्राविणी मुद्रा का ग्रहण होता है, अर्थात् इस मुद्रा का स्वरूप वहाँ बता दिया गया है । संवित्स्वरूपिणी इस मुद्रा का स्वरूप सर्वाशा- परिपूरक चक्र में ही स्फुरित होता है । इसका अभिप्राय यह है कि यह मुद्रा ज्येष्ठा शक्ति पर ही प्रधानतः आधृत होने से स्थितिरूपिणी है । इसीलिये सरल (सीधी) आकृति वाली मध्यमा-तर्जनी और कनिष्ठा-अनामिका के संयोग से यह बनती है । कामा- कर्पिणी प्रभृति शक्तियों का प्रतिनिधित्व करने से यह सब पर अनुग्रह करने वाली है । सर्वाशापरिपूरक चक्र में विद्यमान शक्तियों की आधारभूत यह शक्ति उसमें संवित् स्वरूप में स्फुरित होती है । चतुःशतीशास्त्र (३।६-७) में इसी का सर्वविद्राविणी के नाम से वर्णन है ॥६०-६१॥ सर्वार्कर्षिणी मुद्रा का स्वरूप बताते हैं— इस आकर्षिणी मुद्रा में ज्येष्ठा और वामा शक्ति की समानता होने पर भी सृष्टि शक्ति वामा को प्रधानता दी जाती है । सर्वसंक्षोभकर चक्र में यह स्थित है ॥६१-६२॥ ज्येष्ठा और वामा शक्तियों के सामरस्य से उत्पन्न होने पर भी यह मुद्रा सृष्टि शक्ति वामा पर प्रधानतः आश्रित है । वामा शक्ति सृष्टि का और ज्येष्ठा शक्ति स्थिति का प्रतिनिधित्व करती है । इस मुद्रा में दोनों की समान स्थिति है, अर्थात् इस मुद्रा में सृष्टि और स्थिति शक्ति की समान स्थिति होने से वामांश से वक्र (तिरछी) तर्जनी और मध्यमा का और ज्येष्ठांश से सरल (सीधी) अनामिका और कनिष्ठा का संयोग बनता है । इस मुद्रा में दो अंगुलियाँ तिरछी रहती हैं, अतः यह आकर्षिणी कहलाती है और सर्व-