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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

३५०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| जीर्यति । अथ च भवत्यस्य नामाशिषिषतीति गौणम् । जीर्णेऽन्नेऽशितुमिच्छति सर्वो हि जन्तुः ।<br><br>तत्रापामशितनेतृत्वादशनाया इति नाम प्रसिद्धमित्येतस्मिन्नर्थे । यथा गोनायो गां नयतीति गोनाय इत्युच्यते गोपालः, तथाश्वान्नयतीत्यश्वनायोऽश्वपाल इत्युच्यते, पुरुषनायः पुरुषान्नयतीति राजा सेनापतिर्वा, एवं तत्तदाप आचक्षते लौकिका अशनायेति विसर्जनीयलोपेन ।<br><br>तत्रैवं सत्यङ्गी रसादिभावेन नीतेनाशितेनान्नेन निष्पादितमिदं शरीरं वटकणिकायामिव | उसका भक्षण किया हुआ अन्न पचता है । तत्पश्चात् उसका ‘अशिषिषति’ ऐसा गौण नाम होता है, क्योंकि सभी जीव अन्नके जीर्ण हो जानेपर ही भोजन करनेकी इच्छा करते हैं ।<br><br>अशित (भक्षित अन्न) का नेता (ले जानेवाला) होनेके कारण जलका ‘अशनाया’ ऐसा नाम प्रसिद्ध है । [इस विषयमें यह दृष्टान्त है-] जिस प्रकार ‘गोनायः’ गौको ले जाता है इसलिये ग्वाला ‘गोनायः’ कहा जाता है, तथा अश्वोंको ले जाता है इसलिये अश्वपाल ‘अश्वनायः’ ऐसा कहा जाता है और पुरुषोंको ले जाता है इसलिये राजा या सेनापति ‘पुरुषनायः’ कहलाता है । इसी प्रकार उस समय [अशितको ले जानेके कारण] लौकिक पुरुष जलको ‘अशनाय’ ऐसा विसर्गका लोप करके कहते हैं [अर्थात् ‘अशनायः’ इस पदके विसर्गका लोप करके ‘अशनाय’ ऐसा कहते हैं] ।<br><br>ऐसा होनेपर ही जलद्वारा रसादिभावको प्राप्त हुए अन्नद्वारा निष्पन्न हुआ यह शरीररूप अङ्कुर वटके बीजसे उत्पन्न होनेवाले अङ्कुर- |

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५१


शुङ्गोऽङ्कुर उत्पतित उद्गतः; तमिमं शुङ्गं कार्यं शरीराख्यं वटादिशुङ्गवदुत्पतितं हे सोम्य विजानीहि । किं तत्र विज्ञेयम् ? इत्युच्यते—शृण्विदं शुङ्गवत्कार्यत्वाच्छरीरं नामूलं मूलरहितं भविष्यति ॥ ३ ॥के समान उत्पन्न हुआ है। हे सोम्य ! वटादिके अङ्कुरके समान उत्पन्न हुए उस इस शरीरसंज्ञक शुंग—कार्यको तू जान । उसमें क्या विज्ञेयं है ? सो बतलाया जाता है—सुन, अङ्कुरके समान कार्यरूप होनेके कारण यह शरीर अमूल—कारणरहित नहीं हो सकता ॥ ३ ॥

—: ० :—

इत्युक्त आह श्वेतकेतुः—<br>यद्येवं समूलमिदं शरीरं वटादिशुङ्गवत्तस्यास्य शरीरस्य क्व मूलं स्याद्भवेदित्येवं पृष्ट आह पिता—[ आरुणिद्वारा ] इस प्रकार कहे जानेपर श्वेतकेतु बोला 'यदि इस प्रकार वटादिके अङ्कुरके समान यह शरीर समूल है तो इसका मूल कहाँ हो सकता है ? इस प्रकार पूछे जानेपर पिताने कहा—

तस्य क्व मूलꣳस्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यानेन शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छाद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥

अन्नको छोड़कर इसका मूल और कहाँ हो सकता है ? इसी प्रकार हे सोम्य ! तू अन्नरूप शुंगके द्वारा जलरूप मूलको खोज और हे सोम्य ! जलरूप शुङ्गके द्वारा तेजोरूप मूलको खोज तथा तेजोरूप शुङ्गके द्वारा सद्रूप मूलका अनुसंधान कर । हे सोम्य ! इस प्रकार यह सारी प्रजा सन्मूलक है तथा सत् ही इसका आश्रय है और सत् ही प्रतिष्ठा है ॥ ४ ॥

६५२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ६

६५२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ६


| तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्रान्नादन्नं मूलमित्यभिप्रायः। कथम्? अशितं ह्यन्नमद्भिर्द्रवीकृतं जाठरेणाग्निना पच्यमानं रसभावेन परिणमते। रसाच्छोणितं शोणितान्मांसं मांसान्मेदो मेदसोऽस्थीन्यस्थिभ्यो मज्जा मज्जायाः शुक्रम्। तथा योषिद्भुक्तं चान्नं रसादिक्रमेणैव परिणतं लोहितं भवति। ताभ्यां शुक्रशोणिताभ्यामन्नकार्याभ्यां संयुक्ताभ्यामन्नेनैवं प्रत्यहं भुज्यमानेनापूर्यमाणाभ्यां कुड्यमिव मृत्पिण्डैः प्रत्यहमुपचीयमानोऽन्नमूलो देहशुङ्गः परिनिष्पन्न इत्यर्थः। | अन्नको छोड़कर इसका मूल और कहाँ हो सकता है? तात्पर्य यह है कि अन्न ही इसका मूल है किस प्रकार? क्योंकि खाया हुआ अन्न ही जलके द्वारा द्रवीभूत होकर जठराग्निद्वारा पचाया जानेपर रसरूपमें परिणत हो जाता है। वह रससे रक्त, रक्तसे मांस, मांससे मेद, मेदसे अस्थि, अस्थिसे मज्जा और मज्जासे वीर्यरूपमें परिणत होता है। इसी प्रकार स्त्रीद्वारा खाया हुआ अन्न रसादिके क्रमसे परिणत होकर रज बनता है। उस परस्पर मिले हुए अन्नके कार्य तथा प्रतिदिन खाये जानेवाले अन्नसे पुष्ट हुए वीर्य और रजसे मृत्तिकाके पिण्डसे भीतके समान प्रतिदिन पुष्ट होनेवाला यह अन्नमूलक देहरूप अङ्कुर निष्पन्न हुआ है—ऐसा इसका तात्पर्य है? | | यत्तु देहशुङ्गस्य मूलमन्नं निर्दिष्टं तदपि देहवद्विनाशोत्पत्तिमत्वात्कस्माच्चिन्मूलादुत्पत्तितं शुङ्ग एवेति कृत्वाह—यथा | इस प्रकार जो देहरूप अङ्कुरका मूल अन्न बतलाया गया है वह भी देहके समान उत्पत्ति-नाशवाला होनेके कारण किसी मूलसे उत्पन्न हुआ अङ्कुर ही है—ऐसा मानकर आरुणि कहता है—'हे सोम्य! |

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५३


| देहशुङ्गोऽन्नमूल एवमेव खलु सोऽस्यान्नेन शुङ्गेन कार्यभूतेनापो मूलमन्नस्य शुङ्गस्यान्विच्छ प्रतिपद्यस्व। अपामपि विनाशोत्पत्तिमत्त्वाच्छुङ्गत्वमेवेति, अद्भिः सोम्य शुङ्गेन कार्येण कारणं तेजो मूलमन्विच्छ। तेजसोऽपि विनाशोत्पत्तिमत्त्वाच्छुङ्गत्वमिति, तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमेकमेवाद्वितीयं परमार्थसत्यम्। | जिस प्रकार देहरूप अङ्कुर अन्नमूलक है उसी प्रकार कार्यभूत अन्नरूप अङ्कुरके द्वारा तू अन्नरूप अङ्कुरके मूल जलको खोज-प्राप्त कर। जल भी उत्पत्ति-नाशवान् होनेके कारण अङ्कुररूप ही है; अतः हे सोम्य! जलरूप शुंग यानी कार्यके द्वारा तू उसके मूल कारण तेजको खोज। नाशोत्पत्तिमान् होनेके कारण तेजका भी शुंगत्व ही है; अतः हे सोम्य! तेजरूप शुंगके द्वारा तू एकमात्र अद्वितीय परमार्थ सत्य सद्रूप मूलकी शोध कर। | | यस्मिन्सर्वमिदं वाचारम्भणं विकारो नामधेयमनृतं रज्ज्वामिव सर्पादिविकल्पजातमध्यस्तमविद्यया तदस्य जगतो मूलमतः सन्मूलाः सत्कारणा हे सोम्येमाः स्थावरजङ्गमलक्षणाः सर्वाः प्रजा न केवलं सन्मूला एवेदानीमपि स्थितिकाले सदायतना सदाश्रया एव ! न हि मृदमाश्रित्य घटादेः सत्त्वं स्थितिर्वास्ति। अतो मृद्वत्सन्मूलत्वात्प्रजानां सदाय- | जिस सद्रूप मूलमें यही वाणीरूप आश्रयवाला नाममात्र विकार रज्जुमें सर्पके समान अविद्यासे अध्यस्त है वही इस जगत्का मूल है। अतः हे सोम्य! यह स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण प्रजा सन्मूलक तथा सद्रूप कारणवाली है। यह सन्मूलक ही नहीं, इस समय स्थितिकालमें भी सदायतना अर्थात् सद्रूप आश्रयवाली ही है, क्योंकि मृत्तिकाको आश्रय किये बिना घटादिकी सत्ता अथवा स्थिति है ही नहीं। अतः मृत्तिकाके समान सन्मूलक होनेके कारण |

६५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६५४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| तनं यासां ताः सदायतनाः प्रजाः, अन्ते च सत्प्रतिष्ठाः सदेव प्रतिष्ठा लयः समाप्तिरवसानं परिशेषो यासां ताः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥ | जिस प्रजाका सत् ही आयतन (आश्रय) है वह प्रजा सदायतना है तथा अन्तमें सत्प्रतिष्ठा है—सत् ही जिसकी प्रतिष्ठा—लयस्थान—समाप्ति—अवसान अर्थात् परिशेष है ऐसी वह प्रजा सत्प्रतिष्ठा है ॥ ४ ॥ |

—: ० :—

अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीतं नयते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्‌गमुत्पतितꣳसोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ५ ॥

अब; जिस समय यह पुरुष ‘पिपासति’ (पीना चाहता है) ऐसे नामवाला होता है तो उसके पीये हुए जलको तेज ही ले जाता है। अतः जिस प्रकार गोनाय, अश्वनाय एवं पुरुषनाय कहलाते हैं उसी प्रकार उस तेजको ‘उदन्या’ ऐसा कहकर पुकारते हैं। हे सोम्य! उस (जलरूप मूल) से यह शरीररूप अङ्कुर उत्पन्न हुआ है—ऐसा जान, क्योंकि यह मूलरहित नहीं हो सकता ॥ ५ ॥

| यथेदानीमप्शृङ्गद्वारेण सतो मूलस्यानुगमः कार्य इत्याह-यत्र यस्मिन्काल एतन्नाम पिपासति पातुमिच्छतीति पुरुषो भवति। अशिशिषतीतिवदिदमपि गौणमेव नाम भवति। द्रवीकृतस्याशितस्यान्नस्य नेत्र्य आपो- | अब—इस समय जलरूप अङ्कुरके द्वारा सद्रूप मूलका ज्ञान कराना है, इस अभिप्रायसे आरुणि कहता है—‘जिस समय यह पुरुष ‘पिपासति’—पीना चाहता है ऐसे नामवाला होता है। ‘अशिशिषति’ इस नामके समान यह भी उसका गौण नाम ही है। भक्षण किये हुए द्रवीकृत अन्नको ले जानेवाला |

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
ऽन्नशृङ्गं देहं क्लेदयन्त्यः शिथिलीकुर्युरब्बाहुल्याद्यदि तेजसा न शोष्यन्ते । नितरां च तेजसा शोष्यमाणास्वप्सु देहभावेन परिणममानासु पातुमिच्छा पुरुषस्य जायते । तदा पुरुषः पिपासति नाम ।<br><br>तदेतदाह--तेज एव तत्तदा पीतमन्वादि शोषयद्देहगतलोहितप्राणभावेन नयते परिणमयति । तद्यथा गोनाय इत्यादि समानमेवं तत्तेज आचष्टे लोक उदन्येत्युदकं नयतीत्युदन्यम् । उदन्येतिच्छान्दसं तत्रापि पूर्ववत् अपामप्येतदेव शरीराख्यं शृङ्गं नान्यदित्येवमादि समानमन्यत् ॥ ५ ॥जल, यदि उसे तेजके द्वारा शोषित न किया जाता तो अपनी बहुलताके कारण अन्नके अङ्कुरभूत देहको आर्द्र करके शिथिल कर देता । देहभावमें परिणत होते हुए जलके तेजद्वारा सर्वथा शोषित किये जानेपर ही पुरुषको जल पीनेकी इच्छा होती है । उसी समय पुरुष 'पिपासति' इस नामवाला होता है ।<br><br>उसी बातको श्रुति इस प्रकार कहती है--'उस समय पीये हुए जल आदिको तेज ही सुखाकर देहगत रक्त एवं प्राणभावको ले जाता है अर्थात् उसे रक्त एवं प्राणरूपमें परिणत कर देता है । उसे जिस प्रकार कि 'गोनाय' आदि शब्द हैं उसी प्रकार लोक उस तेजको 'उदन्या' उदकको ले जानेके कारण 'उदन्य' कहते हैं । तेजके अर्थमें भी 'उदन्या' यह प्रयोग पूर्ववत् (जलके अर्थमें 'अशनाया'के समान) छान्दस है । जलका भी यह शरीर नामक अङ्कुर ही है--उससे भिन्न नहीं है--इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥५॥

६५६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

६५६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६


तस्य क्व मूलँस्यादन्यत्राद्भ्योऽद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठा यथा नु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् ॥ ६ ॥

हे सोम्य ! उस (जलके परिणामभूत शरीर) का जलके सिवा और कहाँ मूल हो सकता है ? हे प्रियदर्शन ! जलरूप अङ्कुरके द्वारा तू तेजोरूप मूलकी खोज कर और हे सोम्य ! तेजोरूप अङ्कुरके द्वारा सदरूप मूलकी शोध कर । हे सोम्य ! यह सम्पूर्ण प्रजा सन्मूलक तथा सदरूप आयतन और सदरूप प्रतिष्ठा (लयस्थान) वाली है । हे सोम्य ! जिस प्रकार ये तीनों देवता पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हो जाता है वह मैंने पहले ही कह दिया । हे सोम्य मरणको प्राप्त होते हुए इस पुरुषकी वाक् मनमें लीन हो जाती है तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो जाता है ॥ ६ ॥


| सामर्थ्यात्तेजसोऽप्येतदेव शरीराख्यं शुङ्गम् । अतोऽप्शुङ्गेन देहेनापो मूलं गम्यते । अद्भिः शुङ्गेन तेजो मूलं गम्यते । तेजसा शुङ्गेन सन्मूलं गम्यते पूर्ववत् । एवं हि तेजोऽबन्नमयस्य | त्रिवृत्करणके सामर्थ्यसे यह ज्ञात होता है कि तेजका भी यही शरीर-संज्ञक शुङ्ग (कार्य) है ? अतः जलके कार्यभूत देहद्वारा उसके मूल जलका ज्ञान होता है, जलरूप कार्यसे उसके मूल तेजका पता लगता है तथा तेजोरूप कार्यसे उसके मूल सतका ज्ञान होता है—ऐसा पूर्ववत समझना चाहिये । इस प्रकार तेज, जल और अन्नके |

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५७


देहशुङ्गस्य वाचारम्भणमात्रस्यान्नादिपरम्परया परमार्थसत्यं सन्मूलमभयमसंत्रासं निरायासं सन्मूलमन्विच्छेति पुत्रं गमयित्वाऽशिशिषति पिपासतीति नामप्रसिद्धिद्वारेण यदन्यदिहास्मिन्प्रकरणे तेजोऽबन्नानां पुरुषेणोपयुज्यमानानां कार्यकारणसंघातस्य देहशुङ्गस्य स्वजात्यसाङ्कर्येणोपचयकरत्वं वक्तव्यं प्राप्तं तदिहोक्तमेव द्रष्टव्यमिति पूर्वोक्तं व्यपदिशति ।विकार वाचारम्भणमात्र देहरूप कार्यके परमार्थ सत्य निर्भय निस्त्रास और निरायास सद्‌रूप मूलको अन्नादि परम्परासे जान—ऐसा पुत्रको समझाकर और इसके सिवा ‘अशिशिषति’ और ‘पिपासति’ इन नामोंकी प्रसिद्धिके द्वारा इस प्रकरणमें जो पुरुषद्वारा उपभोगमें लाये जानेवाले तेज, जल और अन्नका अपनी जातिका सांकर्य न करते हुए भूत और इन्द्रियोंके संघातभूत इस शरीरका पोषकत्व बतलाना प्राप्त होता था वह भी ऊपर बतला ही दिया गया है—ऐसा जानना चाहिये—यह बतलानेके लिये आरुणि पहले कहे हुए प्रसंगका ही निर्देश करता है।
यथा नु खलु येन प्रकारेणेमास्तेजोऽबन्नाख्यास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यन्नमशितं त्रेधा विधीयत इत्यादि तत्रैवोक्तम् । अन्नादीनामशितानां ये मध्यमा धातवस्ते सप्तधातुकंहे सोम्य ! जिस प्रकार ये तेज, जल और अन्नसंज्ञक तीनों देवता पुरुषको प्राप्त होकर इनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत-त्रिवृत् हो जाता है वह पहले ही कहा जा चुका है। ‘खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका हो जाता है’ यह बात वहीं कही गयी है। वहीं यह भी बतलाया गया है कि भक्षण किये हुए अन्नादिका जो

३५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

३५८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| शरीरमुपचिन्वन्तीत्युक्तम्। मांसं भवति लोहितं भवति मज्जा भवत्यस्थि भवतीति। ये त्वणिष्ठा धातवो मनः प्राणं वाचं देहस्यान्तःकरण संघातमुपचिन्वन्तीति चोक्तम्—तन्मनो भवति स प्राणो भवति सा वाग्भवतीति। | मध्यम भाग होता है वह सात धातुओंवाले*शरीरका पोषण करता है; यथा—'मांस होता है', 'लोहित होता है', 'मज्जा होता है', 'अस्थि होता है' इत्यादि। तथा यह भी बतलाया गया है कि उनका जो सूक्ष्मतम भाग होता है वह मन, प्राण और वाक् इस देहके अन्तःकरणसंघातका पोषण करता है। यथा—'वह मन होता है', 'वह प्राण होता है' 'वह वाक होती है' इत्यादि। | | सोऽयं प्राणकरणसंघातो देहे विशीर्णे देहान्तरं जीवाधिष्ठितो येन क्रमेण पूर्वदेहात्प्रच्युतो गच्छति तदाहास्य हे सोम्य पुरुषस्य प्रयतो म्रियमाणस्य वाङ्मनसि सम्पद्यते मनस्युपसंह्रियते। अथ तदाहुर्ज्ञातयो न वदतीति। मनःपूर्वो हि वाग्व्यापारः, "यद्धै मनसा ध्यायति | वह यह प्राण और इन्द्रियोंका संघात देहके नष्ट होनेपर जीवसे अधिष्ठित हुआ जिस क्रमसे पूर्व देहसे च्युत होकर अन्य देहको प्राप्त होता है उसका वर्णन आरुणि करता है—'हे सोम्य ! इस पुरुषके मरते समय वाणी मनको प्राप्त हो जाती है अर्थात् वाणीका मनमें उपसंहार हो जाता है। उस समय जातिवाले कहा करते हैं कि 'यह नहीं बोलता' क्योंकि वाणीका व्यापार तो मनःपूर्वक ही होता है; जैसा कि "जो बात मनसे सोचता |


* शरीरके आधारभूत सात धातु ये हैं-त्वचा, रक्त, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि और वीर्य।

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६५९

संस्कृत-मूलहिन्दी-भाष्यार्थ
तद्वाचा वदति" (नृ० पू० ता० उ० १ । १) इति श्रुतेः ।है वही वाणीसे बोलता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ।
वाच्युपसंहृतायां मनसि मनो मननव्यापारेण केवलेन वर्तते ।वाणीका मनमें उपसंहार हो जानेपर मन केवल मननव्यापार करता हुआ वर्तमान रहता है ।
मनोऽपि यदोपसंह्रियते तदा मनः प्राणे सम्बद्धं भवति-सुषुप्तकाल इव; तदा पार्श्वस्था ज्ञातयो न विजानातीत्याहुः । प्राणश्च तदोर्ध्वोच्छवासी स्वात्मन्युपसंहृतबाह्यकरणः संवर्गविद्यायां दर्शनाद्धस्तपादादीन्विक्षिपन्मर्मस्थानानि निकृन्तन्निव उत्सृजन्क्रमेणोपसंहृतस्तेजसि सम्पद्यते । तदाहुर्ज्ञातयो न चलतीति । मृतो नेति वा विचिकित्सन्तो देहमालभमाना उष्णं चोपलभमाना देह उष्णो जीवतीति । यदाजिस समय मनका भी उपसंहार होता है उस समय मन प्राणमें लीन हो जाता है । तब आस-पास बैठे हुए जातिवाले कहते हैं—'अब यह पहचानता नहीं है' उस समय, जिसने बाह्य इन्द्रियोंका अपनेमें उपसंहार कर लिया है वह प्राण ऊर्ध्वोच्छ्वासी होकर—क्योंकि संवर्ग विद्यामें※ [ प्राण, वागादिको अपनेमें लीन कर लेता है—ऐसा ] दिखलाया गया है—हाथ-पाँव पटकता हुआ मानो मर्मस्थानोंका छेदन करता बहिर्गत होनेके लिये क्रमशः उपसंहृत होकर तेजमें लीन हो जाता है । तब जातिवाले कहते हैं—'अब हिल-डुल नहीं सकता' । फिर यह शङ्का करते हुए कि अभी मरा है या नहीं वे देहका स्पर्श करते हैं और देहमें उष्णता देखकर कहते हैं 'अभी शरीर उष्ण है, अतः जीता है' । जिस समय

※ देखिये छान्दोग्य० ४ । ३ । ३ ।

६६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६६०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| तदप्यौष्ण्यलिङ्गं तेज उपसंह्रियते तदा तत्तेजः परस्यां देवतायां प्रक्षाम्यति ।<br><br>तदैवं क्रमेणोपसंहृते स्वमूलं प्राप्ते च मनसि तत्स्थो जीवोऽपि सुषुप्तकालवन्निमित्तोपसंहारादुपसंह्रियमाणः सन्सत्याभिसन्धिपूर्वकं चेदुपसंह्रियते सदेव सम्पद्यते न पुनर्देहान्तराय सुषुप्तादिवोत्तिष्ठति । यथा लोके सभये देशे वर्तमानः कथञ्चिदिवाभयं देशं प्राप्तस्तद्वत् । इतरस्त्वनात्मज्ञस्तस्मादेव मुलात्सुषुप्तादिवोत्थाय मृत्वा पुनर्देहजालमाविशति यस्मान्मूलादुत्थाय देहमाविशति जीवः ॥ ६ ॥ | उष्णता ही जिसका लिङ्ग है वह तेज भी उपसंहृत हो जाता है तब वह तेज परदेवतामें प्रशान्त होता है ।<br><br>तब इस प्रकार क्रमशः उपसंहृत होकर मनके अपने मूलभूत पर देवताको प्राप्त होनेपर उसमें स्थिर जीव भी सुषुप्तकालके समान अपने निमित्त [ मन ] का उपसंहार हो जानेके कारण उपसंहृत होता हुआ यदि सत्यानुसंधानपूर्वक उपसंहृत होता है तो सत्‌को ही प्राप्त हो जाता है; सोनेसे जगे हुए पुरुषके समान फिर देहान्तरको प्राप्त नहीं होता; जिस प्रकार कि लोकमें भयपूर्ण देशमें रहनेवाला कोई प्राणी किसी प्रकार अभय देशमें पहुँच जानेपर [ फिर उससे नहीं लौटता ] उसी प्रकार [यह भी नहीं लौटता] । किंतु अन्य जो अनात्मज्ञ है वह सोनेसे जगे हुए पुरुषके समान मरनेके अनन्तर उस अपने मूलसे, जिस मूलसे कि जीव उठकर देहमें प्रवेश करता है, उठकर फिर देहपाशमें प्रवेश करता है ॥ ६ ॥ |


— : ० : —

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६६१


स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवा-न्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥

वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है [ आरुणिके इस प्रकार कहने-पर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ७ ॥


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
स यः सदाख्य एष उक्तोऽणिमाणुभावो जगतो मूलमैतदात्म्यमेतत्सदात्मा यस्य सर्वस्य तदेतदात्म तस्य भाव ऐतदात्म्यम् । एतेन सदाख्येनात्मनात्मवत्सर्वमिदं जगत् । नान्योऽस्त्यस्यात्मा संसारी, “नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ” (बृ०उ० ३ । ८ । ११) इत्यादिश्रुत्यन्तरात् ।<br><br>येन चात्मनात्मवत्सर्वमिदं जगत्तदेव सदाख्यं कारणं सत्यं परमार्थसत् । अतः स एवात्मा जगतः प्रत्यक्स्वरूपं सतत्त्वं याथात्म्यम् । आत्मशब्दस्य निरुपपदस्य प्रत्यगा-यह जो सत्संज्ञक अणिमा—अणुता जगत्का मूल बतलायी गयी है 'ऐतदात्म्य' यह सब है—जिस सबकी एतत् (यह) सत् आत्मा है उसे 'एतदात्म' कहते हैं उसका भाव 'ऐतदात्म्य' है; अर्थात् इस सत्संज्ञक आत्मासे यह सारा जगत् आत्मवान् है। इसका आत्मा कोई और संसारी नहीं है; जैसा कि “इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है, इससे अन्य कोई श्रोता नहीं है” इस अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है।<br><br>जिस आत्मासे यह सारा जगत् आत्मवान् है वही सत्संज्ञक कारण सत्य अर्थात् परमार्थ सत् है। अतः वह आत्मा ही जगत्का प्रत्यक् स्वरूप—सतत्त्व अर्थात् याथात्म्य है, क्योंकि जिस प्रकार गो आदि शब्द बैल, गाय आदि अर्थमें रूढ़

३६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

३६२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| त्मनि गवादिशब्दवन्निरूढत्वात् । अतस्तत्त्वमसीति हे श्वेतकेतो । <br><br> इत्येवं प्रत्यायितः पुत्र आह भूय एव मा भगवान्विज्ञापयतु यद्भवदुक्तं तत्संदिग्धं ममाहन्यहनि सर्वाः प्रजाः सुषुप्ते सत्संपद्यन्त इत्येतद्येन सत्सम्पद्य न विदुः सत्सम्पन्ना वयमिति । अतो दृष्टान्तेन मां प्रत्यायत्वित्यर्थः । एवमुक्तस्तथास्तु सोम्येति होवाच पिता ॥ ७ ॥ | हैं उसी प्रकार उपपदरहित 'आत्मा शब्द प्रत्यगात्मामें रूढ है । अतः हे श्वेतकेतो ! वह् सत् तू है । <br><br> इस प्रकार प्रतीति कराये हुए पुत्रने फिर कहा—'भगवन् ! आप मुझे फिर समझाइये । आपने जो कहा है उससे अभी मुझे संदेह ही है—सम्पूर्ण प्रजा रोज-रोज सुषुप्तिमें सत्को प्राप्त होती है; अतः इस विषयमें मुझे संदेह ही है कि वह यह कैसे नहीं जानती कि हम सत्को प्राप्त हो गये हैं । इसलिये तात्पर्य यह है कि आप मुझे दृष्टान्त देकर समझाइये' इस प्रकार कहे जानेपर पिताने 'सौम्य ! अच्छा' ऐसा कहा ॥ ७ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये
अष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥

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नवम खण्ड

सुषुप्तिमें 'सत्'की प्राप्तिका ज्ञान न होनेमें मधुमक्खियोंका दृष्टान्त

यत्पृच्छस्यहन्यहनि सत्सम्पद्य <br><br> न विदुः सत्सम्पन्नाः स्म इति <br><br> तत्कस्मादित्यत्र शृणु दृष्टान्तम्—तू जो पूछता है कि प्रजा जो प्रतिदिन सत्‌को प्राप्त होकर भी यह नहीं जानती कि हम सत्‌को प्राप्त हो गये हैं, सो उसका यह अज्ञान किस कारणसे है ?—इस विषयमें दृष्टान्त श्रवण कर—

यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणाँरसान्समवहारमेकताँरसं गमयन्ति ॥ १ ॥

हे सोम्य ! जिस प्रकार मधुमक्खियाँ मधु निष्पन्न (तैयार) करती हैं तो नाना दिशाओंके वृक्षोंका रस लाकर एकताको प्राप्त करा देती हैं ॥१॥

यथा लोके हे सोम्य मधुकृतो मधु कुर्वन्तीति मधुकृतो मधुकरमक्षिका मधु निस्तिष्ठन्ति मधु निष्पादयन्ति तत्पराः सन्तः । कथम् ? नानात्ययानां नानागतीनां नानादिक्कानां वृक्षाणां रसान्समवहारं समाहृत्यैकतामेकभावं मधुत्वेन रसान्गमयन्ति मधुत्वमापादयन्ति ॥ १ ॥हे सोम्य ! जिस प्रकार लोकमें मधुकृत--मधु करती हैं इसलिये जो मधुकृत कही जाती हैं। वे मधुमक्खियाँ तत्पर होकर मधु तैयार करती हैं । किस प्रकार तैयार करती हैं ? नानात्यय नाना गतियोंवाले ( नाना प्रकारके ) विविध दिशाओंमें स्थित वृक्षोंके रस लाकर उन रसोंको मधुरूपसे एकताको प्राप्त करा देती हैं अर्थात् मधुत्वको प्राप्त करा देती हैं ॥ १ ॥
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६६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६६४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

ते तथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पद्यामह इति ॥ २ ॥

वे रस जिस प्रकार उस मधुमें इस प्रकारका विवेक प्राप्त नहीं कर सकते कि 'मैं इस वृक्षका रस हूँ और मैं इस वृक्षका रस हूँ' हे सोम्य! ठीक इसी प्रकार यह सम्पूर्ण प्रजा सत्‌को प्राप्त होकर यह नहीं जानती कि हम सत्‌को प्राप्त हो गये ॥ २ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
ते रसा यथा मधुत्वेनैकतां गतास्तत्र मधुनि विवेकं न लभन्ते। कथममुष्याहमाम्रस्य पनसस्य वा वृक्षस्य रसोऽस्मीति यथा हि लोके बहूनां चेतनावतां समेतानां प्राणिनां विवेकलाभो भवत्यमुष्याहं पुत्रोऽमुष्याहं नप्तास्मीति। ते च लब्धविवेकाः सन्तो न संकीर्यन्ते न तथेहानेकप्रकारवृक्षरसानामपि मधुराम्लतिक्तकटुकादीनां मधुत्वेनैकतां गतानां मधुरादिभावेन विवेको गृह्यत इत्यभिप्रायः।मधुरूपसे एकताको प्राप्त हुए वे रस जिस प्रकार उस मधुमें [ इस प्रकारका ] विवेक प्राप्त नहीं करते—किस प्रकारका ?—कि मैं इस आम अथवा कटहलके वृक्षका रस हूँ, जिस प्रकार कि लोकमें बहुत-से चेतन प्राणियोंके एकत्रित होनेपर इस प्रकार विवेक हुआ करता है कि 'मैं इसका पुत्र हूँ, इसका नाती हूँ' इत्यादि और इस प्रकार विवेक रखनेके कारण वे आपसमें नहीं मिलते, उसी प्रकार यहाँ मधुरूपसे एकताको प्राप्त हुए अनेकों वृक्षोंके मीठे, खट्टे, तीखे अथवा कड़वे रसोंका मधुर आदि रूपसे विवेक ग्रहण नहीं किया जाता—ऐसा इसका अभिप्राय है।
यथायं दृष्टान्त इत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाजैसा कि यह दृष्टान्त है ठीक इसी प्रकार हे सोम्य ! यह सम्पूर्ण प्रजा

खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६५


अहन्यहनि सति सम्पद्य सुषुप्तिकाले मरणप्रलययोश्च न विदुर्न विजानीयुः—सति सम्पद्यामह इति सम्पन्ना इति वा ॥ २ ॥नित्य प्रति सुषुप्ति, मृत्यु तथा प्रलयकालमें सत्को प्राप्त होकर यह नहीं जानती कि हम सत्को प्राप्त हो रहे हैं अथवा हो गये हैं ॥ २ ॥
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यस्माच्चैवमात्मनः सद्रूपतामज्ञात्वैव सत्सम्पद्यते, अतः—क्योंकि इस प्रकार वे अपनी सद्रूपताको बिना जाने ही सत्को प्राप्त होते हैं; इसलिये—

त इह व्याघ्रो वा सिꣳहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दꣳशो वा मशको यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ॥ ३ ॥

वे इस लोकमें व्याघ्र, सिंह, भेड़िया, शूकर, कीट, पतङ्ग, डाँस अथवा मच्छर जो-जो भी [ सुषुप्ति आदिसे पूर्व ] होते हैं वे ही पुनः हो जाते हैं ॥ ३ ॥

त इह लोके यत्कर्मनिमित्तां यां यां जातिं प्रतिपन्ना आसुर्व्याघ्रादीनां व्याघ्रोऽहं सिंहोऽहमित्येवं ते तत्कर्मज्ञानवासनाङ्किताः सन्तः सत्प्रविष्टा अपि तद्भावेनैव पुनराभवन्ति पुनः सत आगत्य व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वावे इस लोकमें जिस-जिस कर्मके कारण व्याघ्रादिमेंसे जिस-जिस जातिको 'मैं व्याघ्र हूँ, मैं सिंह हूँ' इस प्रकारके अभिनिवेशसे प्राप्त हुए थे उस कर्म और ज्ञानकी वासनासे अङ्कित हुए वे सत्में प्रविष्ट होनेपर भी उसी भावसे फिर उत्पन्न हो जाते हैं; अर्थात् सत्से पुनः लौटकर व्याघ्र, सिंह, वृक, वराह, कीट, पतंग, डाँस अथवा मच्छर जो कुछ वे पहले इस लोकमें

६६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६६६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६
यद्यत्पूर्वमिह लोके भवन्ति बभू-ये वही फिर लौटकर हो जाते हैं।
वुरित्यर्थः, तदेव पुनरागत्यतात्पर्य यह है कि सहस्रों कोटि
भवन्ति युगसहस्रकोट्यन्तरि-युगोंका अन्तर पड़ जानेपर भी
तापि संसारिणो जन्तोर्या पुरासंसारी जीवोंकी जो पूर्वभावित
भाविता वासना सा न नश्य-वासना होती है वह नष्ट नहीं
तीत्यर्थः । “यथाप्रज्ञं हि स-होती । “जन्म पूर्व वासनाके अनुसार
म्मवाः” इति श्रुत्यन्तरात् ॥३॥ही होते हैं” ऐसी एक दूसरी श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है ॥३॥
बाः प्रजा यस्मिन्प्रविश्यजिसमें प्रवेश करके वह प्रजा
पुनराविर्भवन्ति ये त्वितोऽन्येपुनः आविर्भूत होती है, तथा उनसे
सत्यत्यात्माभिसन्धा यमणुभावंअन्य जो सद्रूप सत्यात्मामें अभि-
सदात्मानं प्रविश्य नावर्तन्तेनिवेश रखनेवाले हैं वे जिस अणु-
भाव अर्थात् सत्यात्मामें प्रवेश करके फिर नहीं लौटते—

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवा-न्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥

वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है । वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है । [ आरुणि के इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ४ ॥

स य एषोऽणिमेत्यादि व्या-'स य एषोऽणिमा' इत्यादि मन्त्रकी व्याख्या पहले की जा चुकी
ख्यातम् । तथा लोके स्वकीयेहै । [ श्वेतकेतु बोला— ] जिस प्रकार लोकमें अपने घरमें सोया
गृहे सुप्त उत्थाय ग्रामान्तरं गतोहुआ पुरुष उठकर ग्रामान्तरमें

खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६७


| जानाति स्वगृहादागतोऽस्मी- | जानेपर यह जानता है कि मैं अपने | | त्येवं सत आगतोऽस्मीति च | घरसे आया हूँ, इसी प्रकार जीवोंको | | जन्तूनां कस्माद्विज्ञानं न भव- | ऐसा ज्ञान क्यों नहीं होता कि मैं | | तीति भूय एव मा भगवान्वि- | सत्‌के पाससे आया हूँ, अतः हे | | ज्ञापयत्वित्युक्तस्तथा सोम्येति | भगवन् ! मुझे फिर समझाइये । | | होवाच पिता ॥ ४ ॥ | इस प्रकार कहे जानेपर पिताने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥४॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥

दशम खण्ड

नदीके दृष्टान्तद्वारा उपदेश

शृणु तत्र दृष्टान्तं यथा—इस विषयमें दृष्टान्त श्रवण कर।<br>जिस प्रकार—

इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात्प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात्प्रतीच्यस्ताः समुद्रात्समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मियमहमस्मीति ॥ १ ॥

हे सोम्य ! ये नदियाँ पूर्ववाहिनी होकर पूर्वकी ओर बहती हैं तथा पश्चिमवाहिनी होकर पश्चिमकी ओर । वे समुद्रसे निकलकर फिर समुद्रमें ही मिल जाती हैं और वह समुद्र ही हो जाता है । वे सब जिस प्रकार वहाँ ( समुद्रमें ) यह नहीं जानतीं कि ‘यह मैं हूँ, यह मैं हूँ’ ॥ १ ॥

| सोम्येमा नद्यो गङ्गाद्याः पुरस्तात्पूर्वां दिशं प्रति प्राच्यः प्रागञ्चनाः स्यन्दन्ते स्रवन्ति । पश्चात्प्रतीचीं दिशं प्रति सिन्ध्वाद्याः प्रतीचीमञ्चन्ति गच्छन्तीति प्रतीच्यस्ताः समुद्रादम्भोनिधेर्जलधरैराक्षिप्ताः पुनर्वृष्टिरूपेण पतिता गङ्गादिनदीरूपिण्यः पुनः समुद्रमम्भोनिधिमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति । ता नद्यो यथा तत्र समुद्रे समुद्रात्मनैकतां | हे सोम्य ! ये गङ्गा आदि नदियाँ प्राच्य पूर्ववाहिनी होकर पुरस्तात् पूर्व दिशाकी ही ओर बहती हैं तथा सिन्धु आदि, जो पश्चिमको ओर जाती हैं अतः प्रतीच्य (पश्चिमवाहिनी) हैं, पश्चिम दिशाके प्रति बहती हैं । वे समुद्र—जलनिधिसे मेघोंद्वारा आकृष्ट होकर वृष्टिरूपसे बरसकर गङ्गादिरूपमें फिर समुद्रमें ही मिल जाती हैं और वह समुद्र ही हो जाता है । जिस प्रकार समुद्रमें समुद्ररूपसे एकताको प्राप्त हुई वे |

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६९

| गता न विदुर्न जानन्तीयं गङ्गाहमस्मियं यमुनाहमस्मीति च ॥ १ ॥ | नदियाँ यह नहीं जानतीं कि 'यह मैं गङ्गा हूँ; यह मैं यमुना हूँ' इत्यादि ॥ १ ॥ |


एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामह इति त इह व्याघ्रो वा सिꣳहो वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दꣳशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ॥ २ ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्‌विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥

ठीक इसी प्रकार हे सोम्य ! ये सम्पूर्ण प्रजाएँ सत्‌से आनेपर यह नहीं जानतीं कि हम सत्‌के पाससे आयी हैं। इस लोकमें वे व्याघ्र, सिंह, शूकर, कीट, पतङ्ग, डाँस अथवा मच्छर जो-जो भी होते हैं वे हो फिर हो जाते हैं ॥ २ ॥ वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला—] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [तब आरुणिने] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥

| एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजा यस्मात्सति सम्पद्य न विदु- स्तस्मात्सत्त आगम्य न विदुः सत | ठीक इसी प्रकार हे सोम्य ! ये सम्पूर्ण प्रजाएँ क्योंकि सत्‌में लीन होकर [अपना पार्थक्यज्ञान नहीं रहता, इसलिये] उस सत्‌से |