छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
९४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
९४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
| पुरुषः पुरि शयनात्पूरयति वा स्वेनात्मना जगदिति, दृश्यते निवृत्तचक्षुर्भिः समाहितचेतोभिर्ब्रह्मचर्यादिसाधनापेक्षैः । तेजस्विनोऽपि श्मश्रुकेशादयः कृष्णाः स्युरित्यतो विशिनष्टि— हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश इति । ज्योतिर्मयान्येवास्य श्मश्रूणि केशाश्चेत्यर्थः । आप्रणखात्प्रणखो नखाग्रं नखाग्रेण सह सर्वः सुवर्ण इव भारूप इत्यर्थः ॥ ६ ॥ | [ ऐसा जो हिरण्मय ] पुरुष, [ शरीररूप ] पुरमें शयन करनेके कारण अथवा अपनेद्वारा सारे जगत्-को पूर्ण करता है इसलिये यह पुरुष कहलाता है, जिनकी इन्द्रियाँ बाह्य विषयोंसे निवृत्त हो गयी हैं उन समाहित चित्त और ब्रह्मचर्यादि-साधनवान् पुरुषोंको दिखायी देता है—तेजस्वी होनेपर भी उसके दाढ़ी-मूँछ आदि तो काले ही होंगे, अतः श्रुति उसकी विशेषता बतलाती है—जो सुनहली श्मश्रु और सुनहले केशोंवाला है; अर्थात् इसके दाढ़ी-मूँछ और केश भी ज्योतिर्मय ही हैं । तात्पर्य यह है कि यह नख-पर्यन्त अर्थात् नखाग्रसे लेकर सारा-का-सारा सुवर्णके समान प्रकाशस्वरूप ही है ॥ ६ ॥ |
तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥ ७ ॥
उसके दोनों नेत्र बन्दरके बैठनेके स्थान (गुदा) के सदृश अरुण वर्णवाले पुण्डरीक (कमल) के समान हैं । उसका 'उत' ऐसा नाम है, क्योंकि वह सम्पूर्ण पापोंसे ऊपर गया हुआ है ! जो इस प्रकार जानता है वह निश्चय ही सम्पूर्ण पापोंसे ऊपर उठ जाता है ॥ ७ ॥
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| तस्यैवं सर्वतः सुवर्णवर्णस्याप्य- | इस प्रकार · सब ओरसे सुवर्ण- |
| वर्ण होनेपर भी उसके नेत्रोंमें एक | |
| क्ष्णोर्विशेषः । कथम् ? तस्य | विशेषता है । किस प्रकार ? उस |
| देवके, जैसा कि कप्यास होता है | |
| यथा कपेर्मर्कटस्यासः कप्यासः, | उसके सदृश लाल पुण्डरीक (कमल)के |
| समान अत्यन्त तेजस्वी नेत्र हैं। कपि- | |
| आसेरुपवेशनार्थस्य करणे घञ्, | मर्कट (बंदर) के आसका नाम |
| कप्यास है; उपवेशन (बैठने) अर्थके | |
| कपिपुष्ठान्तो येनोपविशति । | वाचक 'आस्' धातुसे करणमें 'घञ्' |
| प्रत्यय होनेपर 'आस' शब्द सिद्ध | |
| कप्यास इव पुण्डरीकमत्यन्त- | होता है । अतः 'कप्यास' का अर्थ |
| वानरकी पीठका अन्तिम भाग (गुदा) | |
| तेजस्वि, एवमस्य देवस्या- | है, जिससे कि वह बैठता है । |
| [यहाँ 'पुण्डरीक' को 'कप्यास' से | |
| क्षिणी । उपमितोपमानत्वान्न | उपमित किया गया है और नेत्रोंको |
| पुण्डरीककी उपमा दी गयी है; इस | |
| हीनोपमा । | प्रकार] उपमितोपमान होनेके कारण |
| यह हीनोपमा नहीं है । | |
| तस्यैवं गुणविशिष्टस्य गौण- | ऐसे गुणवाले उस आदित्यान्तर्गत |
| मिदं नामोदिति। कथं गौणत्वम् ? | पुरुषका 'उत' यह गौण नाम है । |
| इसकी गौणता किस-प्रकार है ? | |
| स एष देवः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः | वह यह देव सम्पूर्ण पापोंसे अर्थात् |
| पाप्मना सह तत्कार्येभ्य इत्यर्थः। | पापोंसहित उनके कार्योंसे उदित |
| अर्थात् ऊपर गया हुआ है, इसलिये | |
| 'य आत्मापहतपाप्मा' इत्यादि | वह 'उत' नामवाला है । जैसा कि |
| वक्ष्यति । उदित उद् इत उद्गत | 'जो आत्मा पापसे हटा हुआ है' |
| इत्यादिरूपसे श्रुति आगे कहेगी । | |
| इत्यर्थः, अतोऽसावुन्नामा । | ऐसे गुणसे युक्त उस 'उत' नामवाले |
| तमेवंगुणसंपन्नमुन्नामानं यथोक्तेन | पुरुषको जो पूर्वोक्त प्रकारसे जानता |
| प्रकारेण यो वेद सोऽप्येवमेवो- | है वह भी इसी प्रकार सम्पूर्ण |
९६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
९६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १ XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
| देत्युद्गच्छति सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः। हं वा इत्यवधारणार्थौ निपातौ उदेत्येवेत्यर्थः ॥ ७ ॥ | पापोंसे ऊपर उठ जाता है। 'ह' और 'वै' ये निश्चयार्थक निपात हैं—अर्थात् ऊपर उठ ही जाता है ॥ ७ ॥ |
—: ० :—
| तस्योद्गीथत्वं देवस्यादित्या-<br>दीनामिव विवक्षितत्वादाह— | आदित्यादिके समान उस [ उद्-<br>संज्ञक ] देवका उद्गीथत्व कहना<br>इष्ट होनेके कारण श्रुति कहती है— |
तस्यर्क् साम च गेष्णौ तस्मादुद्गीथस्तस्मात्त्वे-<br>वोद्गातैतस्य हि गाता । स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो<br>लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां चेत्यधिदैवतम् ॥ ८ ॥
उस देवके ऋक् और साम—ये दोनों पक्ष हैं। इसीसे वह देव उद्गीथरूप है, और इसीसे [ इसका गान करनेवाला ] उद्गाता कहलाता है, क्योंकि वह इस (उत्) का ही गान करनेवाला होता है। वह यह उत् नामक देव जो इस ( आदित्यलोक ) से ऊपरके लोक हैं और जो देवताओंकी कामनाएँ हैं, उनका शासन करता है। यह अधिदैवत उद्गीथोपासना है ॥ ८ ॥
| तस्यर्क् साम च गेष्णौ<br><br>पृथिव्याद्युक्तलक्षणे पर्वणी ।<br><br>सर्वात्मा हि देवः। परापरलोक<br><br>कामेशितृत्वादुपपद्यते पृथिव्य-<br><br>ग्न्यादृक्सामगेष्णत्वम्, सर्वयो-<br><br>नित्वाच्च । | उस देवके ऋक् और साम गेष्ण हैं अर्थात् पूर्वोक्त पृथिवी और अग्नि आदि उसके दोनों पक्ष हैं, क्योंकि वह देव सर्वरूप है। वह परलोक और इहलोकसम्बन्धी कामनाओंका शासन करनेवाला है; अतः उसका पृथिवी और अग्नि आदिरूप ऋक् और साममय पंखोंसे युक्त होना उचित ही है। तथा सबका कारण होनेसे भी [ उसका ऋक्-सामरूप पक्षोंवाला होना उचित है ] । |
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| यत एवमुन्नामा चासावृक्सामगेष्णश्च तस्मादृक्सामगेष्णत्वप्राप्तमुद्गीथत्वमुच्यते परोक्षेण परोक्षप्रियत्वाद्देवस्य, तस्मादुद्गीथ इति। तस्मात्त्वेव हेतोरुदं गायतीत्युद्गाता। तस्माद्ध्येतस्य यथोक्तस्योन्नाम्नो गातासावतो युक्तोद्गातेति.नामप्रसिद्धिरुद्गातुः। | इस प्रकार क्योंकि वह 'उत्' नामवाला है तथा ऋक् और साम उसके पक्ष हैं, इसलिये ऋक्-साम-रूप पक्षोंवाला होनेसे उसमें प्राप्त उद्गीथत्वका परोक्षरूपसे प्रतिपादन हो जाता है; क्योंकि वह देव परोक्ष प्रिय* है। इसलिये वह उद्गीथ है ऐसा कहा। इसी हेतुसे, क्योंकि [यज्ञमें उद्गान करनेवाला] उत्का गान करता है इसलिये वह उद्गाता कहलाता है। इस प्रकार क्योंकि वह उपर्युक्त 'उत्' नामक देवका गान करता है इसलिये उद्गाताका 'उद्गाता' ऐसा नाम प्रसिद्ध होना उचित ही है। |
| स एष देव उन्नामा ये चामुष्मादादित्यात्पराञ्चः परागञ्चनादूर्ध्वा लोकास्तेषां लोकानां चेष्टे न केवलमीशितृत्वमेव चशब्दाद्धारयति च, “स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमाम्” (यजु० २५। १०) इत्यादिमन्त्रवर्णात्। किं च देवकामानामीष्ट इत्येतदधिदैवतं देवताविषयं देवस्योद्गीथस्य स्वरूपमुक्तम् ॥ ८ ॥ | वही यह उत् नामक देव इस आदित्यलोकसे परे जानेके कारण जो पराङ् यानी ऊपरके लोक हैं उन लोकोंका ईश्वर (शासक) है। वह केवल शासनकर्ता ही नहीं है 'च' शब्दसे यह भी सिद्ध होता है कि वह उनका धारण भी करता है; जैसा कि “उसने इस पृथ्वीको और द्युलोक-को धारण किया” इत्यादि मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है। यही नहीं, वह देवताओंकी कामनाओंका भी शासक है-इस प्रकार यह उस देवका--उद्गीथका अधिदैवत--देवताविषयक स्वरूप कहा गया ॥ ८ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
* देवताओंकी परोक्षप्रियता 'परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः' इस श्रुतिसे प्रमाणित होती है।
सप्तम खण्ड
— : ० : —
अध्यात्म-उद्गीथोपासना
अथाध्यात्मं वागेवर्क्प्राणः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते । वागेव सा प्राणोऽमस्तत्साम ॥ १ ॥
इससे आगे अध्यात्म उपासना है—वाणी ही ऋक् है और प्राण साम है। इस प्रकार इस [वाक्रूप] ऋक्में [प्राणरूप] साम अधिष्ठित है। अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। वाक् ही 'सा' है और प्राण 'अम' है। इस प्रकार ये [दोनों मिलकर] साम हैं ॥ १ ॥
| अथाधुनाध्यात्ममुच्यते—वागेवर्क्प्राणः साम, अधरोपरिस्थानत्वसामान्यात् । प्राणो घ्राणमुच्यते सह वायुना। वागेव सा प्राणोऽम इत्यादि पूर्ववत् ॥ १ ॥ | आधिदैविक उपासनाके पश्चात् अब अध्यात्म उपासनाका वर्णन किया जाता है—नीचे-ऊपर स्थान होनेमें तुल्य होनेके कारण वाक् ही ऋक् है और प्राण साम है। वायुके सहित घ्राणेन्द्रिय ही यहाँ प्राण कहा गया है। वाक् ही 'सा' है और प्राण 'अम' है इत्यादि कथन पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ १ ॥ |
चक्षुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते । चक्षुरेव सात्मामस्तत्साम ॥ २ ॥
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९
चक्षु ही ऋक् है और आत्मा साम है । इस प्रकार इस [चक्षुरूप] ऋक्में यह [आत्मारूप] साम अधिष्ठित है । इसलिये ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है । चक्षु ही 'सा' है और आत्मा 'अम' है । इस प्रकार ये [दोनों मिलकर] साम हैं ॥ २ ॥
| चक्षुरेव ऋक्, आत्मा साम, आत्मेतिच्छायात्मा तत्स्थत्वात्साम ॥ २ ॥ | चक्षु ही ऋक् है और आत्मा साम है। यहाँ 'आत्मा' शब्दसे छायात्माका ग्रहण है; क्योंकि वही नेत्रमें स्थित होनेके कारण साम है ॥ २ ॥ |
श्रोत्रमेवर्ङ्मनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते । श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्तत्साम ॥ ३ ॥
श्रोत्र ही ऋक् है और मन साम है । इस प्रकार इस [श्रोत्ररूप] ऋक्में यह [ मनरूप ] साम अधिष्ठित है। अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। श्रोत्र ही 'सा' है और मन 'अम' है । इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥ ३ ॥
| श्रोत्रमेवर्ङ्मनः साम, श्रोत्रस्याधिष्ठातृत्वान्मनसः सामत्वम्॥३॥ | श्रोत्र ही ऋक् है और मन साम है, श्रोत्रका अधिष्ठाता होनेके कारण मनकी सामरूपता है ॥ ३ ॥ |
अथ यदेतदक्षणः शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम । तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम । तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते। अथ यदेवैतदक्षणः शुक्लं भाः सैव साथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्साम ॥४॥
छा० उ० ४—
१०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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तथा यह जो आँखोंका शुक्ल प्रकाश है वह ऋक् है और जो नीलवर्ण अत्यन्त श्यामता है वह साम है। इस प्रकार इस [शुक्ल प्रकाशरूप] ऋक्में यह [नीलवर्ण अत्यन्त श्यामतारूप] साम अधिष्ठित है। अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। तथा यह जो नेत्रका शुक्ल प्रकाश है वही 'सा' है और जो नीलवर्ण परम श्यामता है वही 'अम' है। इस प्रकार ये [दोनों मिलकर] साम हैं ॥ ४ ॥
| अथ यदेतदक्षणः शुक्लं भाः सैवर्क्। अथ यन्नीलं परः कृष्णमादित्य इव दृक्शक्त्यधिष्ठानं तत्साम ॥ ४ ॥ | तथा यह जो नेत्रोंका शुक्ल प्रकाश है वही ऋक् है और जो सूर्यके समान दृक्शक्तिका अधिष्ठानभूत नीलवर्ण अतिशय श्यामत्व है वह साम है ॥ ४ ॥ |
—: ० :—
आदित्यान्तर्गत और नेत्रान्तर्गत पुरुषोंकी एकता
अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते सैवर्क्साम तदुक्थं तयजुस्तद्ब्रह्म। तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ यन्नाम तन्नाम ॥५॥
तथा यह जो नेत्रोंके मध्यमें पुरुष दिखलायी देता है वही ऋक् है, वही साम है, वही उक्थ है, वही यजुः है और वही ब्रह्म (वेद) है। उस इस पुरुषका वही रूप है जो उस (आदित्यान्तर्गत पुरुष) का रूप है। जो उसके पक्ष हैं वही इसके पक्ष हैं, जो उसका नाम है वही इसका नाम है ॥ ५ ॥
खण्ड ७] शाङ्करभाष्यार्थ १०१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते, पूर्ववत् । सैवर्गध्यात्मं वागाद्या पृथिव्याद्या चाधिदैवतम् । प्रसिद्धा च ऋक्पादबद्धाक्षरात्मिका तथा साम । उक्थसाहचर्याद्वा स्तोत्रं साम ऋक् शस्त्रमुक्थादन्यत् । तथा यजुःस्वाहास्वधावषडादि सर्वमेव वाग्यजुस्तत्स एव; सर्वात्मकत्वात्सर्वयोनित्वाच्चेति ह्यवोचाम । ऋगादिप्रकरणात्तद्ब्रह्मेति त्रयो वेदाः । | तथा यह जो नेत्रोंके मध्यमें पुरुष दिखलायी देता है—इस वाक्यका तात्पर्य पूर्ववत् समझना चाहिये। वही वागादि अध्यात्म और पृथिवी आदि अधिदैवत ऋक् है, जिसके पाद नियत अक्षरोंसे बँधे होते हैं वह ऋक् तो प्रसिद्ध ही है—तथा वही साम है। अथवा [इन ऋक् और साम शब्दोंका अर्थ इस प्रकार समझना चाहिये—] उक्थका सहचारी होनेसे स्तोत्र ही साम है और उक्थसे भिन्न जो शस्त्र (मन्त्रविशेष) हैं वे ही ऋक् हैं; तथा स्वाहा, स्वधा और वषट् आदि सम्पूर्ण वाक्य ही यजुः है। सर्वात्मक और सबका कारण होनेके कारण वह यजुः स्वयं पुरुष ही है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं। यहाँ ऋगादिका प्रकरण होनेसे 'वही ब्रह्म है' इस वाक्यमें [ब्रह्म-शब्दसे] तीनों वेद समझने चाहिये। |
| तस्यैतस्य चाक्षुषस्य पुरुषस्य तदेव रूपमतिदिश्यते । किं तत् ? यदमुष्यादित्यपुरुषस्य । हिरण्मय इत्यादि यदधिदैवतमुक्तम् । यावमुष्य गेष्णौ पर्वणी तावेवास्यापि चाक्षुषस्य गेष्णौ । यच्चामुष्य नामोदित्युद्गीथ इति च तदेवास्य नाम । | उस इस नेत्रस्थ पुरुषका वही रूप बतलाया जाता है। वह रूप क्या है? जो रूप उस आदित्यान्तर्गत पुरुषका था, जिसका कि हिरण्मय आदि अधिदैवतरूपसे वर्णन किया गया था। जो उस (आदित्यपुरुष) के पक्ष थे वे ही इस नेत्रान्तर्गत पुरुषके भी पक्ष हैं। जो उसके 'उत्' अथवा 'उद्गीथ' आदि नाम थे, वे ही इसके भी नाम हैं। |
१०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| स्थानभेदाद्रूपगुणनामातिदेशादीशितृत्वविषयभेदव्यपदेशाच्चादित्यचाक्षुषयोर्भेद इति चेत् ?<br><br>न; अमुनानेनैवेत्येकस्योभयात्मप्राप्त्यनुपपत्तेः । | यदि कहो कि आश्रयका भेद होनेसे, [ आदित्यान्तर्गत पुरुषके ] रूप, गुण और नामका ( चाक्षुष पुरुषमें ) अतिदेश¹ होनेसे तथा ईशितृत्व ( शासन ) के विषयोंका भेद बतलाये जानेके कारण आदित्य और नेत्रान्तर्गत पुरुषोंका भेद है— तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा माननेपर [ मन्त्र ७ और ८ में ] 'अमुना' 'अनेनैव' इन शब्दोंसे प्रतिपादित एकके ही द्वारा दोनोंकी प्राप्ति सम्भव नहीं होगी । | | द्विधाभावेनोपपद्यत इति चेत्, वक्ष्यति हि "स एकधा भवति त्रिधा भवति" इत्यादि, न, चेतनस्यैकस्य निरवयवत्वाद् द्विधाभावानुपपत्तेः। तस्मादध्यात्ममधिदैवतयोरेकत्वमेव ।<br><br>यत्तु रूपाद्यतिदेशो भेदकारणमवोचो न तद्भदावगमाय । किं तर्हि ? स्थानभेदाद् भेदाशङ्का मा भूदित्येवमर्थम् ॥ ५ ॥ | यदि कहो कि वह उन दोनोंको दो रूपसे प्राप्त होता है, जैसा कि "वह एकरूप होता है, वह तीन रूप होता है" इत्यादि रूपसे श्रुति कहेगी भी—तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि निरवयव होनेके कारण एक ही चेतनका दो रूप होना सम्भव नहीं है । अतः अध्यात्म और अधिदैवत—इन दोनोंकी एकता ही है ।<br><br>और तुमने जो रूपादिके अतिदेशको उनके भेदका कारण बतलाया, सो वह उनका भेद सूचित करनेके लिये नहीं है। तो वह किसलिये है? वह तो, आश्रयका भेद होनेसे कहीं उनके भेदकी आशङ्का न हो जाय—इसलिये है॥ ५ ॥ |
१. अन्यके धर्मोंको अन्यमें लगाना ।
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३
स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां चेति। तय इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति तस्मात्ते धनसनयः ॥ ६ ॥
वह यह ( चाक्षुष पुरुष ) जो इस ( अध्यात्म आत्मा ) से नीचेके लोक हैं उनका तथा मानवीय कामनाओंका शासन करता है । अतः जो ये लोग वीणामें गान करते हैं वे उसीका गान करते हैं इसीसे वे धनवान् होते हैं ॥ ६ ॥
| स एष चाक्षुषः पुरुषो ये चैतस्मादाध्यात्मिकादात्मनोऽर्वाञ्चोऽर्वाग्गता लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यसंबन्धिनां च कामानाम्। तत्तस्माद्य इमे वीणायां गायन्ति गायकास्त एतमेव गायन्ति । यस्मादीश्वरं गायन्ति तस्मात्ते धनसनयो धनलाभयुक्ता धनवन्त इत्यर्थः ॥ ६ ॥ | वह यह चाक्षुष पुरुष जो इस आध्यात्मिक आत्मासे नीचेके लोक हैं, उनका तथा मनुष्यसम्बन्धी कामनाओंका ईशन (शासन) करता है । अतः जो ये गायक लोग वीणामें गान करते हैं वे उसीका गान करते हैं । इस प्रकार क्योंकि वे ईश्वरका ही गान करते हैं, इसलिये वे धनलाभयुक्त अर्थात् धनवान् होते हैं ॥ ६ ॥ |
इनकी अभेददृष्टिसे उपासनाका फल
अथ य एतदेवं विद्वान्साम गायत्युभौ स गायति सोऽमुनैव स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्ताँश्चाप्नोति देवकामाँश्च ॥ ७ ॥
तथा जो इस प्रकार [ चाक्षुष और आदित्य दोनों पुरुषोंकी एकता ] जाननेवाला पुरुष सामगान करता है वह [ चाक्षुष और आदित्य ]
१०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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दोनोंका ही गान करता है। तथा वह इसके ही द्वारा जो इस (आदित्यलोक) से ऊपरके लोक हैं और जो देवताओंके भोग हैं, उन्हें प्राप्त करता है ॥ ७ ॥
| अथ य एतदेवं विद्वान्यथोक्तं देवमुद्गीथं विद्वान्साम गायत्युभौ स गायति चाक्षुषमादित्यं च । तस्यैवंविदः फलमुच्यते—सोऽमुनैवादित्येन स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति आदित्यान्तर्गतदेवो भूत्वेत्यर्थो देवकामांश्च ॥ ७ ॥ | इस उपर्युक्त देवको जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष सामगान करता है वह चाक्षुष और आदित्य दोनों ही पुरुषोंको गाता है। इस प्रकार जाननेवाले उस उपासकको जो फल मिलता है वह बतलाया जाता है—वह यह उपासक इस आदित्यके द्वारा ही जो इससे ऊपरके लोक हैं उन्हें प्राप्त होता है। तात्पर्य यह है कि आदित्यान्तर्गत देवरूप होकर वह इन्हें और देवताओंके भोगोंको प्राप्त करता है ॥ ७ ॥ |
अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति मनुष्यकामांश्च तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयात् ॥ ८ ॥
कं ते काममागायानीत्येष ह्येव कामागानस्येष्टे य एवं विद्वान्साम गायति साम गायति ॥ ९ ॥
तथा इसीके द्वारा जो इससे नीचेके लोक हैं उन्हें और मनुष्यसम्बन्धिनी कामनाओंको प्राप्त करता है। अतः इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता [यजमानसे इस प्रकार] कहे—॥ ८ ॥ 'मैं तेरे लिये किन इष्ट कामनाओंका आगान करूँ' क्योंकि यह उद्गाता कामनाओंके आगानमें समर्थ होता है, जो कि इस प्रकार जाननेवाला होकर सामगान करता है, सामगान करता है ॥ ९ ॥
| खण्ड ७ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०५ |
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| अथानेनैव चाक्षुषेणैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति मनुष्यकामांश्च चाक्षुषो भूत्वेत्यर्थः । तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयाद्यजमानं कमिष्ठं ते तव काममागायानीति । एष हि यस्मादुद्गाता कामागानस्योद्गानेन कामं संपादयितुमीष्टे समर्थ इत्यर्थः । कोऽसौ ? य एवं विद्वान्साम गायति साम गायति । द्विरुक्तिरुपासनसमाप्त्यर्था ॥ ८-९ ॥ | तथा इस चाक्षुष पुरुषके द्वारा ही, जो इससे नीचेके लोक हैं उन्हें मनुष्यसम्बन्धी भोगोंको वह प्राप्त करता है। अभिप्राय यह कि चाक्षुष पुरुष होकर ही उन सबको प्राप्त करता है। अतः इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता यजमानसे कहे कि 'मैं तेरे लिये किन इष्ट कामनाओंका आगान करूँ ?' क्योंकि यह उद्गाता इष्टकामनासम्बन्धी आगानके उद्गानसे उन कामनाओंको सम्पन्न करनेमें समर्थ होता है। वह उद्गाता कौन है ! जो इस प्रकार जाननेवाला होकर साम गान करता है, साम गान करता है। यह द्विरुक्ति उपासनाकी समाप्तिके लिये है ॥८-९॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥
अष्टम खण्ड
—: ० :—
उद्गीथोपासनाकी उत्कृष्टता प्रदर्शित करनेके लिये शिलक, दाल्भ्य और प्रवाहणका संवाद
| अनेकधोपास्यत्वादक्षरस्य प्रकारान्तरेण परोवरीयस्त्वगुणफलमुपासनान्तरमानिनाय । इतिहासस्तु सुखावबोधनार्थः । | उद्गीथसंज्ञक अक्षर (ओंकार) के अनेक प्रकारसे उपासनीय होनेके कारण श्रुति प्रकारान्तरसे उसकी उत्तरोत्तर उत्कृष्ट गुणविशिष्ट फलवाली एक अन्य उपासना प्रस्तुत करती है। यहाँ जो इतिहास दिया जाता है वह सरलतासे समझानेके लिये है। |
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त्रयो होद्गीथे कुशला बभूवुः शिलकः शालावत्यश्चैकितायनो दाल्भ्यः प्रवाहणो जैवलिरिति ते होचुरुद्गीथे वै कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां वदाम इति ॥ १ ॥
कहते हैं, शालावान्का पुत्र शिलक, चिकितायनका पुत्र दाल्भ्य और जीवल्का पुत्र प्रवाहण—ये तीनों उद्गीथविद्यामें कुशल थे। उन्होंने परस्पर कहा—'हमलोग उद्गीथविद्यामें निपुण हैं; अतः यदि आपलोगोंकी अनुमति हो तो उद्गीथके विषयमें परस्पर वार्तालाप करें' ॥ १ ॥
| त्रयस्त्रिसंख्याकाः, ह इत्यैतिह्यार्थः, उद्गीथ उद्गीथज्ञानं प्रति कुशला निपुणा बभूवुः । | त्रयः—तीन संख्यावाले, ‘ह’ यह निपात इतिहासको सूचित करनेके लिये है, उद्गीथमें—उद्गीथविद्यामें कुशल—निपुण थे। तात्पर्य यह |
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खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थ १०७
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| कस्मिंश्चिद्देशे काले च निमित्ते वा समेतानामित्यभिप्रायः । न हि सर्वस्मिञ्जगति त्रयाणामेव कौशलमुद्गीथादिविज्ञाने । श्रूयन्ते ह्युषस्तिजानश्रुतिकैकेयप्रभृतयः सर्वज्ञकल्पाः ।<br><br>के ते त्रयः ? इत्याह—<br>शिलको नामतः शालावतोऽपत्यं शालावत्यः चिकितायनस्यापत्यं चैकितायनः, दल्भगोत्रो दाल्भ्यो द्व्यामुष्यायणो वा । प्रवाहणो नामतो जीवलस्यापत्यं जैवलिरित्येते त्रयः ।<br><br>ते होचुरन्योन्यमुद्गीथे वै कुशला निपुणा इति प्रसिद्धाः स्मः । अतो हन्त यद्यनुमतिर्भवतामुद्गीथ उद्गीथज्ञाननिमित्तां कथां विचारणां पक्षप्रतिपक्षोपन्यासेन वदामो वादं कुर्म इत्यर्थः । | है कि किसी देश और कालमें अथवा किसी निमित्तविशेषसे एकत्रित हुए पुरुषोंमें [ये तीन व्यक्ति उद्गीथमें निपुण थे]। सारे संसारके भीतर उद्गीथ आदिके ज्ञानमें इन तीनकी ही कुशलता हो—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें उषस्ति, जानश्रुति और कैकेय आदि सर्वज्ञकल्प पुरुष भी प्रसिद्ध हैं ही ।<br><br>वे तीन कौन थे ? इस विषयमें श्रुति कहती है—शिलक जिसका नाम था वह शालावान्का पुत्र शालावत्य, चिकितायनका पुत्र चैकितायन, जो दल्भगोत्रमें उत्पन्न होनेके कारण दाल्भ्य कहा गया है। अथवा वह द्व्यामुष्यायण *होगा । तथा नामसे प्रवाहण और जीवलका पुत्र होनेसे जैवलि कहलानेवाले ये तीन पुरुष थे ।<br><br>उन्होंने परस्पर एक-दूसरेसे कहा—हमलोग उद्गीथमें कुशल-निपुण हैं—इस प्रकार प्रसिद्ध हैं । अतः यदि आपलोगोंकी सम्मति हो तो उद्गीथमें—उद्गीथविद्याके सम्बन्धमें कथा—विचार कहें, अर्थात् पक्ष-प्रतिपक्षके स्थापनपूर्वक परस्पर विवाद करें । |
* जिस पुत्रको 'यह मुझे और तुझे दोनोंहीको जल और पिण्डदान देनेका अधिकारी होगा' ऐसा कहकर धर्मपूर्वक ग्रहण किया जाता है उसे 'द्व्यामुष्यायण' कहते हैं ।
१०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| तथा च तद्विद्यसंवादे विपरी- <br> तग्रहनाशोऽपूर्वविज्ञानोपजनः <br> संशयनिवृत्तिश्चेति । अतस्तद्वि- <br> द्यसंयोगः कर्तव्य इति चेति- <br> हासप्रयोजनम् । दृश्यते हि <br> शिलकादीनाम् ॥ १ ॥ | इस प्रकार, जिन्हें विवक्षित अर्थका <br> ज्ञान है उन पुरुषोंके पारस्परिक <br> संवादसे विपरीत ग्रहणका नाश, <br> अपूर्व ज्ञानकी उत्पत्ति और संशयकी <br> निवृत्ति होती है । अतः उन-उन <br> विषयोंके ज्ञाता पुरुषोंका साथ करना <br> चाहिये—यह भी इस इतिहासका <br> प्रयोजन है । यही बात शिलकादिके <br> प्रसङ्गमें भी देखी जाती है ॥ १ ॥ |
तथेति ह समुपविविशुः स ह प्रवाहणो जैवलि- <br> रुवाच भगवन्तावग्रे वदतां ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचँश्रो- <br> ष्यामीति ॥ २ ॥
तब वे 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर बैठ गये । फिर जीवलके पुत्र प्रवाहणने कहा—'पहले आप दोनों पूज्यवर प्रतिपादन करें । मैं आप ब्राह्मणोंकी कही हुई वाणीको श्रवण करूँगा' ॥ २ ॥
| तथेत्युक्त्वा ते समुपविविशु- <br> ह्योपविष्टवन्तः किल । तत्र राज्ञः <br> प्रागल्भ्योपपत्तेः स ह प्रवाहणो <br> जैवलिरुवाचेतरौ भगवन्तौ पूजा- <br> वन्तावग्रे पूर्वं वदताम् । ब्राह्मण- | फिर वे 'बहुत अच्छा' ऐसा कह- <br> कर बैठ गये । उनमें [ ब्राह्मणोंके <br> प्रथम बोलनेसे ] राजा ( क्षत्रिय ) <br> की प्रगल्भता ( धृष्टता ) सिद्ध होती <br> है, इसलिये उस जीवलके पुत्र <br> प्रवाहणने शेष दोनोंके प्रति कहा— <br> 'पहले आप भगवान्—पूजनीय लोग <br> कहें; आप ब्राह्मणोंके कहे हुए शब्दों- |
| खण्ड ८ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०९ |
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| योरिति लिङ्गाद्राजासौ युवयो-<br>र्ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचं श्रोष्यामि।<br><br>अर्थरहितमित्यपरे वाचमिति विशेषात् ॥ २ ॥ | को मैं श्रवण करूँगा। 'आप दोनों ब्राह्मणोंके' इस कथन रूप लिङ्गसे ज्ञात होता है कि वह क्षत्रिय है 'वाचम्' ऐसा विशेषण होनेके कारण दूसरे व्याख्याकार 'अर्थहीन शब्दमात्र सुनूँगा' ऐसा अर्थ करते हैं ॥ २ ॥ |
स ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छामीति पृच्छेति होवाच ॥ ३ ॥
तब उस शालावान्के पुत्र शिलकने चिकितायनकुमार दाल्भ्यसे कहा—'यदि तुम्हारी अनुमति हो तो मैं तुमसे पूछूँ?' उसने कहा—'पूछो' ॥ ३ ॥
| उक्तयोः स ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच —हन्त यद्यनुमंस्यसे त्वा त्वां पृच्छानीत्युक्त इतरः पृच्छेति होवाच ॥ ३ ॥ | उपर्युक्त दोनोंमेंसे शालावान्के पुत्र शिलकने चैकितायन दाल्भ्यसे कहा—'यदि तुम अनुमति दो तो मैं तुमसे पूछूँ।' तब इस प्रकार कहे जानेपर दूसरेने 'पूछो' ऐसा कहा ॥ ३ ॥ |
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| लब्धानुमतिराह— | उसकी अनुमति पाकर [ शिलकने ] कहा— |
का साम्नो गतिरिति स्वर इति होवाच । स्वरस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच । प्राणस्य का गतिरित्यन्नमिति होवाचान्नस्य का गतिरित्याप इति होवाच ॥४॥
११० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
११० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
'सामकी गति ( आश्रय ) क्या है ?' इसपर दूसरेने 'स्वर' ऐसा कहा। 'स्वरकी गति क्या है ?' ऐसा प्रश्न होनेपर दूसरेने 'प्राण' ऐसा कहा। 'प्राणकी गति क्या है ?' इसपर दूसरेने 'अन्न' ऐसा कहा। तथा 'अन्नकी गति क्या है ?' ऐसा पूछे जानेपर दाल्भ्यने 'बल' ऐसा कहा ॥४॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| का साम्नः प्रकृतत्वादुद्गीथस्य। उद्गीथो ह्यत्रोपास्यत्वेन प्रकृतः। “परोवरीयांसमुद्गीथम्” ( १।९।२ ) इति च वक्ष्यति। गतिराश्रयः परायणमित्येतत्। एवं पृष्टो दाल्भ्य उवाच—स्वर इति; स्वरात्मकत्वात्साम्नः। यो यदात्मकः स तद्गतिस्तदाश्रयश्च भवतीति युक्तं मृदाश्रय इव घटादिः। | सामकी—प्रकरणप्राप्त होनेके कारण उद्गीथकी गति—आश्रय अर्थात् परायण क्या है ? क्योंकि यहाँ उपास्यरूपसे उद्गीथका ही प्रकरण है, जैसा कि ‘परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते’ ( १।९।२ ) इत्यादि श्रुतिमें कहेंगे भी। इस प्रकार पूछे जानेपर दाल्भ्यने कहा—‘स्वर’ क्योंकि साम स्वरस्वरूप है। जिस प्रकार [मृत्तिकामय] घटादि पदार्थोंका मृत्तिका ही आश्रय होती है, उसी प्रकार जो पदार्थ यदात्मक—जिसके स्वरूपसे युक्त होता है उस पदार्थकी वही गति और आश्रय भी होता है—यह उचित ही है। |
| स्वरस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच। प्राणनिष्पाद्यो हि स्वरस्तस्मात्स्वरस्य प्राणो गतिः। प्राणस्य का गतिरित्यन्नमिति होवाच। अन्नावष्टम्भो हि प्राणः। “शुष्यति वै प्राण | ‘स्वरकी गति क्या है ?’ ऐसा प्रश्न होनेपर [दाल्भ्यने] ‘प्राण’ ऐसा कहा, क्योंकि स्वर प्राणसे ही निष्पन्न होनेवाला है, इसलिये स्वरकी गति प्राण है। ‘प्राणकी गति क्या है ?’ ऐसा पूछे जानेपर उसने कहा ‘अन्न’, क्योंकि प्राण अन्नके ही आश्रय रहनेवाला है, जैसा कि |
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यथ १११
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| ऋतेऽन्नात्” ( बृ० उ० ५ । १२ । १ ) इति हि श्रुतेः। “अन्नं दाम” ( बृ० उ० २ । २ । १ ) इति च। अन्नस्य का गतिरित्याप इति होवाच। अप्संभवत्वादन्नस्य ॥ ४ ॥ | “अन्नके बिना प्राण सूख जाता है” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है तथा “अन्न यह [वत्सस्थानीय प्राणकी] रस्सी है” ऐसी श्रुति भी है। फिर ‘अन्नकी गति क्या है ?’ ऐसा प्रश्न होनेपर दाल्भ्यने कहा—‘आप्’ क्योंकि अन्न आप् ( जल ) से ही उत्पन्न होनेवाला है ॥ ४ ॥ |
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अपां का गतिरित्यसौ लोक इति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरिति न स्वर्गं लोकमतिनयेदिति होवाच स्वर्गं वयं लोक२सामाभिसंस्थापयामः स्वर्गस२-स्ताव२हि सामेति ॥ ५ ॥
‘जलकी गति क्या है ?’ ऐसा प्रश्न होनेपर उसने ‘वह लोक’ ऐसा कहा। ‘उस लोककी गति क्या है ?’ इसपर दाल्भ्यने कहा कि ‘स्वर्गलोकका अतिक्रमण करके सामको कोई किसी दूसरे आश्रयमें नहीं ले जा सकता। हम सामको स्वर्गलोकमें ही स्थित करते हैं, क्योंकि सामकी स्वर्गरूपसे स्तुति की गयी है’ ॥ ५ ॥
| अपां का गतिरित्यसौ लोक इति होवाच। अमुष्मान्लोकाद् वृष्टिः संभवति। अमुष्य लोकस्य का गतिः ? इति पृष्टो दाल्भ्य उवाच। स्वर्गममुं लोकमतीत्याश्रयान्तरं साम न नयेत्कश्चिदिति होवाच। | ‘जलोंकी गति क्या है ?’ इसपर दाल्भ्यने ‘वह लोक’ ऐसा कहा, क्योंकि उस लोकसे ही वृष्टि होनी सम्भव है। ‘उस लोककी क्या गति है ?’ ऐसा पूछे जानेपर दाल्भ्यने कहा—‘उस स्वर्गलोकका अतिक्रमण करके कोई सामको किसी दूसरे आश्रयमें नहीं ले जा सकता।’ |
११२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ११२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| अतो वयमपि स्वर्गं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। स्वर्गलोकप्रतिष्ठं साम जानीम इत्यर्थः। स्वर्गसंस्तावं स्वर्गत्वेन संस्तवनं संस्तावो यस्य तत्साम स्वर्गसंस्तावं हि यस्मात् "स्वर्गो वै लोकः साम वेद" इति श्रुतिः ॥५॥ | अतः हम भी सामको स्वर्गलोकमें ही स्थापित करते हैं। अर्थात् सामको स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित समझते हैं, क्योंकि साम स्वर्गसंस्ताव अर्थात् जिसका स्वर्गरूपसे संस्तवन किया गया है, ऐसा स्वर्गसंस्ताव है "निश्चय स्वर्गलोक ही साम है ऐसा जानता है" यह श्रुति भी है ॥ ५ ॥ |
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तंह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥६॥
उस चिकितानपुत्र दालभ्यसे शालवान्के पुत्र शिलकने कहा—'हे दालभ्य ! तेरा साम निश्चय ही अप्रतिष्ठित है। जो इस समय कोई सामवेत्ता यह कह दे कि 'तेरा मस्तक पृथिवीपर गिर जाय' तो निश्चय ही तेरा मस्तक गिर जायगा ॥ ६ ॥
| तमितरः शिलकः शालावत्य- | उस चैकितायन दाल्भ्यसे दूसरे |
| श्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच— | शालावत्य शिलकने कहा—'हे दाल्भ्य ! निश्चय ही तेरा साम |
| अप्रतिष्ठितमसंस्थितं परावरीय- | अप्रतिष्ठित-असंस्थित अर्थात् उत्तरोत्तर उत्कृष्टरूपसे असमाप्त गतिवाला |
| स्त्वेनासमामगति सामेत्यर्थः। वा | है।' 'वै' और 'किल' इन निपातों- |
| इत्यागमं स्मारयति किलेति च। | से श्रुति आगम यानी उपदेश- |
| दाल्भ्य ते तव साम। यस्त्व- | परम्पराका स्मरण कराती है। यदि |
| सहिष्णुः सामविदेतर्ह्येतस्मिन्काले | इस समय कोई असहिष्णु सामवेत्ता अप्रतिष्ठित सामको 'यह प्रतिष्ठित |
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| ब्रूयात्कश्चिद्विपरीतविज्ञानमप्रतिष्ठितं साम प्रतिष्ठितमिति एवं वादापराधिनं मूर्धा शिरस्ते विपतिष्यति विस्पष्टं पतिष्यतीति । एवमुक्तस्यापराधिनस्तथैव तद्विपतेन्न संशयो न त्वहं ब्रवीमीत्यभिप्रायः । | है' इस प्रकार कहनेका अपराध करनेवाले तुझ विपरीत विज्ञानवान्से कहे कि 'तेरा मस्तक गिर जायगा—स्पष्टतया पतित हो जायगा' तो इस प्रकार कहे जानेपर तुझ अपराधीका मस्तक उसी प्रकार गिर पड़ेगा—इसमें संशय नहीं। तात्पर्य यह है कि मैं तो ऐसा कहता नहीं हूँ [यदि कोई अन्य कह देगा तो अवश्य ऐसा ही होगा]।' |
| ननु मूर्धपातार्हं चेदपराधं कृतवानतः परेणानुक्तस्यापि पतेन्मूर्धा न चेदपराध्युक्तस्यापि नैव पतति । अन्यथाकृताभ्यागमः कृतनाशश्च स्याताम् । | शंका—यदि मस्तक गिरनेयोग्य पाप किया है तब तो दूसरेके न कहनेपर भी मस्तक गिर ही जायगा और यदि वह ऐसा अपराधी नहीं है तो कहनेपर भी नहीं गिर सकता; नहीं तो बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएका नाश ये दो दोष प्राप्त होंगे। |
| नैष दोषः; कृतस्य कर्मणः शुभाशुभस्य फलप्राप्तेर्देशकालनिमित्तापेक्षत्वात् । तत्रैवं सति मूर्धपातनिमित्तस्याप्यज्ञानस्य पराभिव्याहारनिमित्तापेक्षत्वमिति ॥ ६ ॥ | समाधान—यह दोष नहीं है, क्योंकि किये हुए शुभ और अशुभ कर्मोंके फलकी प्राप्ति देश, काल और निमित्तकी अपेक्षावाली होती है । ऐसी स्थितिमें मूर्धपातका निमित्तभूत जो अज्ञान है, वह भी दूसरेके कथनरूप निमित्तकी अपेक्षावाला ही है ॥ ६ ॥ |