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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages

हनुमानका समरथका ठिकाना और वहाँ पहुँचनेकी युक्ति पूछना

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बाधसागर

( १२७ )

हनुमान वचन-चौपाई

सुनो सुनीन्द्र मोर यक बाता । कहां रहत हैं समरथ दाता ॥ ताको नाम कहो निय जागा । अब मेरा मन तुमसों लागा ॥ सकल भेद कहि दीजे मोही । मोरी सुगति लगी है सोही ॥ तुमतो संत सकल सुखदायी । तुम्हरे है नहिं कछु मान बढायी ॥ सत्य साधु सत्य मैं जाना । सत्य सत्य है तुमरो ज्ञाना ॥ पूरण पद है ध्यान तुम्हारा । मैं अपने दिल कीन्ह विचारा ॥ साखी-पूरण पद निज ध्यान है, सो मोहि देहु बताय । धर्म निरञ्जन तहाँ नहिं, काल दगा नहिं खाय ॥

मुनीन्द्र वचन-चौपाई

सुनो वीर हनुमान विचारा । कठिन विवेक खांडेकी धारा ॥ ताका तुम कीजै इतवारा । निश्चय कारज होय तुम्हारा ॥ अब सन्देह रहै कछु नाहीं । साधु भये साधो मन काहीं ॥ समरथ का तोहि नाम सुनाऊँ । सो युक्ती तोको दिखलाऊँ ॥ सुनो हनुमंत खुशी मन आज । ऐसा अगम तोहि ठौर दिखाऊँ ॥ साखी-अगम ठौर जेहि गम्य नहिं, तहाँ नहीं कोइ जाय । सुरति निरति यक घर धरो, हनुमत गहो तुम आय ॥

हनुमान वचन-चौपाई

हे स्वामी यक संशय आयो । कौन भाति तहैं सुरति लगायो ॥ कौन भाति मैं लागूँ धायी । सो तुम मोहि कहो समझायी ॥ पौरुष बलसों लागो जाई । क्षण इक जाओं तेहि ठाई ॥ राह बाट तेहि मोहि बताओ । काया को सब भेद लखाओ ॥ तुम समरथ समरथ को जाना । सो मोहि कहिये ठौर ठिकाना ॥ जेतिक युक्ति तुम्हारे पास । सो मोहि दिखलाओ अगम तमासा ॥

मुनीन्द्रजीका समरथके घर पहुँचनेके लिये सुरति निरति एक करनेकी युक्ति हनुमानको बताना

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( १२८ )

हनुमानबोध

कहो शिताबँ विलम्ब नहि करना । निश्चय हम आयो शरना ॥ लै पहुँचाओ ठौर दिखाओ । ऐसी वस्तु गहर जनि लाओ ॥ सारवी-गहर न लाउ सुनीन्द्र तुम, हौ समरथ मतिधीर । मैं सेवक निज दास हौं, अरपूँ सकल शरीर ॥

सुनीन्द्र वचन

धन हनुमन्त तुम्हारी वानी । तुम मोरी गति नीके जानी ॥ समरथ मिलत है दोय प्रकारा । भक्ति ज्ञानसे होइ उबारा ॥ तीसरि योग युक्ति है भाई । सुक्ति होय संदेह मिटाई ॥ तीन प्रकार है समरथ करो । सो गर्भवास नहि लेइ बसेरो ॥ जासों भक्ति जो होय सबेरा । पावे अगम ज्ञान सो टेरा ॥ सतगुरु केवल है निज ज्ञाना । सो बिरले कोई साधुन जाना ॥ तीन गुप्त तीनों तोहि भाखा । परदा अन्तर कछू न राखा ॥ सो अपने मन करो विचाग । समरथ नाम सो पइयो सारा ॥ प्रथम भक्ति करो समरथकी । योग युक्ति ज्ञान सुनु नीकी ॥ निष्कपटी होयके साधुमनाओ । साधुनके चरणों चित लाओ ॥ जो साधू अपने धर्म रहाओ । सेवो ताहि परदा नहि लाओ ॥ ऐसी भक्ति जेही मन भावे । भवसागर को भर्म मिटावे ॥ साधु कहै सो राह गहि लीजे । साधु कहै सोई पुनि कीजे ॥ सुनु हनुमंत कहों जो बानी । कूर्म वायु सो अनुभव ज्ञानी ॥ नाग वायु धरि वास समानी । तामैं अमी अंक जल पानी ॥ अमीमाहि यक बेलि उपजायी । तासों नागबेलि चलि आयी ॥ पान सोई सन्धि राखे भाई । समरथ मुख ऐसी फरमायी ॥ पुनि समरथ ऐसी अर्थायी । पान जाहि तुम देहौ जायी ॥ सो इंसा हमारे घर अइहैं । अभय अशंक सदा मुख पइहैं ॥

१ जस्वी शोध ।

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बाघसागर

( १२९ )

तिनुका तोरि करो जिव कोरा । छूटै काल मिटै झकझोरा ॥ चौका आरति करि विस्तारा । हनुमान तुम लेहु निरधारा ॥ समरथ हुकुम भक्ति यह ठानी । जाते यम नहीं बांधै तानी ॥ बनि आवै तो करिये भाई । नातो लीजो पान बनाई ॥ साखी—यहि समरथ की भक्ति है, सुनो ज्ञानकी रीति । योग मुक्ति निज भाषेऊँ करौ सो निजके प्रीति ॥

चौपाई

अब तुम ज्ञान सुनो हनुमाना । समरथ को है निर्मल ज्ञाना ॥ निराधार आधार न कोई । पहुँचे साधु श्रृंमां सोई ॥ निर्गुण सगुन ध्यान करिपावे । तहाँ सगुन निरंजन नहीं आवे ॥ अनुभव वाणी करे परकाशा । सो साधू मोर स्वॉस उस्वॉसा ॥ महाकठिन खाँडे की धारा । ऐसा निर्गुण ज्ञान हमारा ॥ निर्गुण सर्गुण दोनों नाही । है सो हंस नामकी छाहीं ॥ तीनों गुणते सगुण सो होई । चौथा गुण निर्गुण है सोई ॥ निर्गुण सगुण दोष के पारा । शब्द अरु स्वास नहीं ओँकारा ॥ अदम्य ज्ञान विकट है भाई । विकट राह कोइ बिरले पाई ॥ ज्ञान गहे बिनु मुक्ति न होई । कोटिक लिखै पढ़े जो कोई ॥

१ इस चौपाईके तीन पाठ सब ग्रन्थोंमें अलग २ मिलते हैं । एक तो यही है । दूसरा पाठ यह है— “निर्गुण ज्ञान ध्यान धरि आवे । तहूँ कोइ सगुण नजर नहीं आवे ॥”

तीसरा पाठ यह है—

“निर्गुण ध्यान धरे जो पावे । निर्गुण सगुण नजर ना आवे ॥”

इसी प्रकारसे अनेक प्रतिधर्मोंमें अनेक मतभेद हैं कहीं तक कहा जाय । परचातके लेखक महाशयोंकी कृपासे न भावूस कबीरपन्थी साहित्यमें क्या २ फेर हुआ है और होता जाता है ।

नं. ५ कबीरसागर - ६

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( १३० )

हनुमानबोध

साखी-भक्ति ज्ञान तुमसों कह्यो, सुनि लो योग अपार । रोम रोम को गुण कई, काया का विस्तार ॥

चौपाई

काया है यह समरथ केरी । काया की गति काहु न हेरी ॥ शिव गोरख जो योग कमाया । काया को ओरछोर नहिं पाया ॥ कौन गुननसे ठाढी काया । कौन सुरति कौन है माया ॥ कुंज गली सुनो हनुमाना । यह निज भेद काहु नहिं जाना ॥ सोई भेद कहौं तुम पाहीं । सुनिके तुम समझो मन माहीं ॥ बड़े बड़ाई सब पचि हारे । यह निज भेद है अगम अपारे ॥ समरथ सागर समरथ वासा । तासों उपजी समरथ स्वासा ॥ स्वासा अन्तर बोले जो बानी । अमी बुन्द ढरके यक जानी ॥ तासों बीज भये अकूरा । काया कारण सब भरपूरा ॥ सोई बीज धर्मराय जो पाया । शक्ति एक धरि जामन लाया ॥ सो वह शक्ति रक्त की मूला । तासों भयो बीज अस्थूला ॥ कायाकी गति अगम अपारा । हनुमत ताको तुम करो विचारा ॥ तीन लोक जाहिर है भाई । सो सब काया भीतर आई ॥ सो कायाका करो विचारा । हनुमत सो तुम करो निरधारा ॥ अष्ट चक्र कमल है आठा । लागे बन्धन तीनसै साठा ॥ नौ नाडी है बहतर कोठा । अन्तर पट संपुट सो घोठा ॥ परम सुमेरु है दस दरवाजा । पांच तत्त्व तीन गुण छाजा ॥ चन्द्र सूर वहाँ दोउ विराजै । इंगला पिंगला सुख मनि साजै ॥ समुन्दर सात काया के माहीं । नौ सौ नदी बहे तिहि ठाहीं ॥ दशों दिशा कायाके भीतर । यहि देवल सब देव अरु पीतर ॥ यहि काया वैराट स्वरूपा । ज्योति स्वरूप वसत है भूपा ॥ निरंजन है कायाके माहीं । ओम ओंकार माया की छाहीं ॥

हनुमानका कबीर साहबका उपकार मानना

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बोधसागर

( १३१ )

रंकार गरज ब्रह्मण्डा । सप्त द्वीप परगटे नौखण्डा ॥ समरथ अंश बसे अस्थीरा । अस्थिर वस्तु वसैं घर धीरा ॥ ताको कोई चीन्हे नाहीं । ताते सब जग मरि मरि जाहीं ॥

साखी-कायाके गुण अगम हैं, सुनु तुम हनुमत वीर । नहिं काहुको लखि परै, अटपट रचा शरीर ॥

हनुमान बचन-चौपाई

अहोस्वामी मैं सब विधिजानी । तुमही समरथ तुमही ज्ञानी ॥ कहा अस्तुति तुम्हारी कीजै । अमृत बचन सुनी हम भीजै ॥ सब संदेह मिटायो मोरा । जनमजनमकामिटचोझकझोरा ॥ सुखसागर अमर घर चीन्हा । भलेसतगुरु मोहि दर्शन दीन्हा ॥

साखी-दर्शन देइ सुनीन्द्र तुम, मोको किया सनाथ ॥

भी सागरसे लै चले, केश पकड़ि गहि हाथ ॥

हनुमान आधीन है, लीन्हो सहज को पान ॥

जब सुनीन्द्र शिष्य किये, दे समरथको ज्ञान ॥ ❁

खण्ड ब्रह्माण्ड पारके पारा । तहाँ समरथको घर तत सारा ॥ निर्भय घर है तहाँ सो भाई । रोग न व्यापे काल न खाई ॥ ताका तुम जो सुनो विचारा । समरथ का घर है सबके पारा ॥ सबके पार रहे निरधारा । पिंड ब्रह्माण्ड ताके आधार ॥ सो समरथ है सबसों न्यारी । सुनु हनुमत तुम लेहु विचारी ॥

• पुरानी प्रतियोंमें यह पुस्तक इसी साखी तक समाप्त हो गई है किन्तु १९१३ सम्बत्वाली प्रतिमें और भी अधिक है सो इस साखी के आगे से आरम्भ होकर अन्ततक है ।

इतना हो नहीं बहुत पुरानी प्रतियोंमें आदिमें “सेतुबन्ध में जायके, वेखा हनुमतवीर” से ही पुस्तक आरम्भ भी होती है किन्तु उस साखीके ऊपर की चौपाई नवीन प्रतियोंमें पाई जाती है, और उससे कोई किसी प्रकारका बिगाड़ नहीं होता इस कारण उसे लिख दिया है ।

ग्रन्थकी समाप्ति कबीरका वचन धर्मदास प्रति

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( १३२ )

हनुमानबोध

अक्षर सो निःअक्षर है न्यारा । ओम ओंकार ताहि आधार ॥ तीनों गुणका जो विस्तारा । रंकार है सबके पारा ॥ ताके दरे निःअक्षर धारा । सोई भेद निज आहि हमारा ॥ ये सब हैं समरथ आधार । समरथ शक्तिको वार न पारा ॥ ताकी आशा करे जो कोई । उतरे पार भौसागर सोई ॥

हनुमत कहे साहिब सुनो, तुम हौ दीन दयाल ॥ तुम समान रघुपति नहीं, काटयो यमको जाल ॥

कबीर वचन-चौपाई

कहे कवीर सुनो धर्मदासा । वही ज्ञान मैं तुम्हें प्रकाशा ॥ हनुमत अंश पुरुष का होई । तब हम उनको मिलिया सोई ॥ हनुमत बोधि चले हम जबहीं । चतुर्भुजके ढिग पहुँचे तबहीं ॥ उनसे कीना ज्ञान विचारा । वह हंसनका है सरदारा ॥ चतुर्भुजको हम दियो गुरु आई । ताहि बनायो दर्भगा राई ॥ जो कोइ तुम्हारा वीरा पावे । सो हंसा सतलोक सिधावे ॥ इतनी कहिके हम काशी आये । चलत चलत कछुवार नहीं लाये ॥ काशी विद्या गुरु बहुतोई । पण्डित ज्ञानी बहुते होई ॥ धर्मदास तुम वंश हमारा । तुम्हरे काज हम यहां पगुधारा ॥ तुम्हरे हाथ पान जो पावे । बहुरि न योनी संकट आवे ॥

साखी-कहे कवीर धर्मदास सों, हनुमत बोध्यो जाय । पान परावना देइके, तुमको मिलिया आय ॥ धर्मदास वन्दन करे, धनधन हो सत्यकवीर । हनुमतको दर्शन दियो, धन है हनुमत बीर ॥ छन्द-धन्य साहिब धन्य हौ तुम दर्शन दीनो । कीजे दया अब दासपै जाऊँ चरण लागु धाइके ॥

सारविचार पचीसी

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बोधसागर

( १३३ )

वीर हनुमान बोध के ले दिया पान प्रसादहो ॥ शेष शारद विष्णु नारद नाहि न पावैं आदि हो ॥ सोरठा-नाहिं न पावे आदि, शिव ब्रह्मा अरु नारद ॥ तुम्हरो वदन निहारि, धर्मदास वन्दन करे ॥

इति श्रीबोधसागरांतर्गतकबीरधर्मदाससंवादे

हनुमानबोधवर्णनो नाम सप्तमस्तत्रंगः

सारविचारपचीसी

सारखी-ब्रह्मादि सनकादिलै, मुनिवर आदि प्रयन्त ॥ विन गुरु मोह निशा शयन, सुख अपने न लहन्त ॥ १ ॥ गुरुके गुण गावे सभी, सत्य सही विनु लक्ष ॥ मायाके उपदेश अज, हरिहर कालके भक्ष ॥ २ ॥ कर्म धर्म मति तीन ले, अज हरिहर समुदाय ॥ गावहिं ध्यावहिं ताहि कह, जेहि सब जीव नशाय ॥ ३ ॥ कहने को चूके नहीं, जेती जिसकी दौर ॥ सबै शब्द सहिदान है, परख शब्द सो ठौर ॥ ४ ॥ वही प्रमाण सबन मिलि कीन्हा, ज्यों अंधरे की हाथी ॥ आदि बाप कौ मरन जाने, पूत होत नहिं सारखी ॥ ५ ॥ अंधरे को हाथी सांच है, साचे हैं सगरे ॥ हाथन की टोई कहें, आंखिन के अंधरे ॥ ६ ॥ शब्दातीत शब्दते पाइन, बूझे विरला कोइ ॥ कहैं कवीर सतगुरु की सेना, आप मिटै तब ओइ ॥ ७ ॥ जीव दुखी चाहे छुटन, चीन्हे नाहीं काल ॥ आसा देवे निवृत्ति का, भोरे भवके जाल ॥ ८ ॥

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( १३४ )

हनुमानबोध

तामस केरे तीन गुण, भौर लेइ तहँ वास ॥ एकै डारी तीन फल, भांटा ऊख कपास ॥ ९ ॥ जीव फँसे तेहि जाल में, सूझे वार न पार ॥ त्राहि त्राहि निशि दिन करे, साहब लेहु उबार ॥ १० ॥ साहब को जाने नहीं, हाकिम चोर प्रचण्ड ॥ यह ठाकुर यम देशमें, खण्डपिण्ड ब्रह्मण्ड ॥ ११ ॥ नित उपजे नित खपे, निश्चय नष्ट सो मूल ॥ परखहु काल कला सबै, देखि जगत मत भूल ॥ १२ ॥ झिलमिल झगरा झूलते, बाकी छुटी न काहु ॥ गोरख अटके काल पुर, कौन कहावे साहु ॥ १३ ॥ विनु पारख वाणी सुने, धावे ताके साथ ॥ घायल अनेकन भावसो, तजहिँ न पीटहि माथ ॥ १४ ॥ बहु कर्महि अरुझाइ जिव, डोरी अपने हाथ ॥ नाच नचावे यम सदा, कारण कारज साथ ॥ १५ ॥ चाहहि जो निस्तारन को, इन कर्मन छुटकाय ॥ तेहि तिहुँ फाँस लै धावहीं, बंदी देहि दृढाय ॥ १६ ॥ करम कमाई सबन पर, राज दाम परमान ॥ जन्मत मरत न छोड़ई, विविधि कर्म की खान ॥ १७ ॥ बन्दी खाना जो पड़े, जेहि राजा खुशियाल ॥ लोभ गरासे जीवको, सूझे नहीं भव जाल ॥ १८ ॥ जहर जमी दे रोपिया, अमी सींचै सौबार ॥ कवीर खुलंक ना तजै, जामे जौन विचार ॥ १९ ॥ इन्ह आखिन पथरा दिये, समझ दिये भ्रम जाल ॥ क्षण क्षण जीवन जीवके, भोगे काल कराल ॥ २० ॥

१ स्वभाव, प्रकृति ।

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बोधसागर

( १३५ )

मूस विलाई एक सँग, कहु कैसे रहिजाय ॥ अचरज यक देखो संतो, हसती सिंहहि खाय ॥ २१ ॥ पूरण पिण्ड ब्रह्माण्डसो, त्रिगुण फांस लगाय ॥ नाशक नाशे जीवको, आपे आप कहाय ॥ २२ ॥ बन्दी छोड़ छुडावई, मेटि मेटि यम फांस ॥ धन्य धन्य सो जीव हैं, तजहिं महा भोगांस ॥ २३ ॥ प्रभु शरणागति परख दृढ, सत्य लोक परमान ॥ संसत जीव विलास है, दूटा काल गुमान ॥ २४ ॥ पारख सीढी झांकिके, उलटि बहे भवधार ॥ थाह न पावहिं बूडहीं, हो ताके निस्तार ॥ २५ ॥

इति

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इति श्रीबोधसागरान्तर्गत ग्रन्थ हनुमानबोध समाप्त

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भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित

श्री-लक्ष्मणबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराज श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, बम्बई-४०० ००४

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संस्कृत-शिक्षण-विभाग

प्रकाशक-विभाग

प्रकाशक-विभाग

संस्कृत-शिक्षण-विभाग

प्रकाशक-विभाग

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सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

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A faint, stylized illustration of a seated figure, likely a deity or saint, wearing a crown and holding a staff or lotus. The figure is surrounded by a decorative border.

श्री श्री गणेशाय नमः

मङ्गलाचरण और उत्थानिका - कृष्णजीका शरीर त्याग देना, बलभद्रजीका संदेश और कृष्णका समझाना

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श्रीमुनीन्द्राय नमः

अष्टमस्तरंगः

ग्रन्थ लक्ष्मणबोध

मंगलाचरण-दोहा

जय मुक्त जय मुनीन्द्र प्रभु, जय करणानय ईश ॥

जय कबीर कलि बुध हरण, सदा नवाऊँ शीर ॥

उत्थानिका ( धर्मदास बचन )

दोहा-विनय करतं धर्मदास हैं, दोऊ कर को जोर ॥

लक्ष्मण बोध्यो काहि विधि, कहहु सो बन्दी छोर ॥

सत्य कबीर बचन

प्रथम सो सत्यनाम गुण गाऊँ । भक्त हेतु संसारहि आऊँ ॥ अनन्त बार आयो संसारा । देख्यो जर्मौँ खलकँ मंझारा ॥ साधु संत देखौँ सब ठाऊँ । कतहुँ न देखौँ मुक्त का नाऊँ ॥ झुण्ड झुण्ड बहु देखौँ विरागी । कथहिँ ज्ञान अल्पे बुधि लागी ॥ तत्त्व शब्द सुने नहीं काऊ । कतहुँ न सुनी परे वहि गाऊ ॥ एक दिन चले द्वारका भाई । देह तजी जहाँ त्रिभुवनराई ॥ गड रोके बल भद्र रहाये । बहुत चिंता तिन मन उपजाये ॥ कृष्ण देह नहीं दाग लगायी । तब सपने कृष्ण बात जनायी ॥

१ पृष्ठी । २ संसार ।

बलभद्रजीका कृष्णके शवका दाह करके समुद्रमें बहा देना और कृष्णजीका उड़ीसाके राजाको स्वप्न देना

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( १४२ )

लक्ष्मणबोध

बलभद्र सो कहा समझायी । अगली बात सब दर्द बुझायी ॥ बलभद्र तुम भक्त हमारा । तुमसे कहूँ मैं सत व्यवहारा ॥ हमरी सीख मानिकर लीजै । जो हम कहैं सोई अब कीजै ॥

बलभद्र वचन

कहै बलभद्र तुम साहब मेरा । हम तो जनम जनम का चेरा ॥ जो तुम कहो सोई मैं करिहों । मानि सिखापनशिरपर धरिहों ॥

श्रीकृष्ण वचन

जैसे कांचली सर्प तजाई । कांचलि रहे सर्प नहि भाई ॥ याते तनको देहु जलायी । याहिराखी कछु फल नहि आयी ॥ ठाट दहन तब तहवां भयऊ । जरत ठाठ फेफरा रहेऊ ॥ तब बोले अस गोविन्द राई । पेई एक तुम बेगि बनाई ॥ मट्टी धरो पेइके माई । सो पेई तुम देह बहाई ॥ पेई सोह उडीसा जायी । बौद्धावतार की मांड मडायी ॥ ठाकुर कहा सो बलभद्र कीना । एक पेई बनाय कर लीना ॥ ता पेई पर हीरा जड़िया । सो माटी पेई में धरिया ॥ समुद्र माहिं दई पेइ बहाई । सो पेई बहुत उडीसा जाई ॥ तब राजा को सपना भयऊ । सपना में तेहि बात यक कहेऊ ॥

कृष्ण वचन

राजा सीख हमारी लीजै । बुद्धावतार कि थापन कीजै ॥

राजा वचन

राजा कहै कौन हौ भाई । सो मोहि बात कहो समुझाई ॥

श्रीकृष्ण वचन

तब बोले सो गोविन्द राई । हम तो कृष्ण अहैं रे भाई ॥ द्रापर बाचा सम्पूर्ण भयऊ । ताते ठाट हमहुँ तजि दयऊ ॥

१ पेटी, बाकस, सन्दूक ।

राजाका समुद्रमें स्नानको जाना और कृष्णके शवको पाकर स्वप्नको सच्चा समझकर जगन्नाथका मन्दिर बनवाना

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बोधसागर

( १४३ )

अब कलियुग बैठेगा सोई । बौद्ध थापना हमरो होई ॥ जगन्नाथ मम नाम है सोई । हमरी थापना यहि विधि होई ॥

सत्यकबीर वचन

राजा जब स्नानको गयऊ । पेई गडी रेत में पयऊ ॥ तब राजा परिकरमा दीना । पेई उठाय कै शिर पर लीना ॥ तुरतहि राजा महल ले आवा । तबहि रानि कहैं तुरत बतावा ॥ करै निछावर मंगल गावै । घर घर नगर में बाजु बधावै ॥ राजा ब्राह्मण लीन बुलायी । सपने की सब बात सुनायी ॥

ब्राह्मण वचन

ब्राह्मण कहै सुनो महाराजा । सुफल जनम सरिहैं सब काजा ॥ शुभ नक्षत्र वार धरि लीजै । तब देवल की थापना कीजै ॥ रोहिणी नक्षत्र वार बुध लीना । तब देवल की नींव जो दीना ॥ जब देवल सम्पूर्ण भयऊ । तबही राजा जग मंडयऊ ॥

पुरातन वार्ता

मंथन उदधि विष्णु जब कीन्हा । निकसी वस्तु बांटि सो लीना ॥ और त्रेता में बांध बैथाये । ताको बैर उदधि मन लाये ॥

उदधि विचार

तबका बैर अबहीं मैं लेऊँ । देवल गाडि रेतमें देऊँ ॥

सत्य कबीर वचन

लगन मुहूरत पहुँचे आयी । तबही देवल गाडि के जायी ॥ छे बार देवल गाडयो भायी । तब हम इतो जगत के माही ॥ पूर्विल कौल सुरति धरि लीना । जाय आशन समुद्र पर कीना ॥ उदधि साजि दल जबही आवा । तब हम डाट समुद्र बतावा ॥ तब हंकार समुद्र बतावा । महा क्रोध करि हम पै आवा ॥

लक्ष्मी और कबीरसाहबकी बातचीत

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( १४४ )

लक्ष्मणबोध

तब करि कोध ससुद्र ललकारा । महाफटकार ससुद्र फटकारा ॥ तबही पृथ्वी फाटि सो गयऊ । धसी ससुद्र पतालै गयऊ ॥ तबही खबर लक्ष्मी पाई । बैठा साधु ससुद्र के ठाई ॥ तब लक्ष्मी आपे चलि आयी । तब हम शोभा कर्म बनायी ॥ लक्ष्मी कीन दण्डवत आयी । धँसाइ ससुद्र पताल पटायी ॥

लक्ष्मी वचन

तब लक्ष्मी संतन सो कहेऊ । महाप्रसाद तुम जगको लेऊ ॥

संत वचन

संत कहे सुनु लक्ष्मी आई । नेवता देहु कबीरहि जाई ॥

सत्यकबीर वचन

तबहीं लक्ष्मी हम पै आयी । आइके कहै हमहि गोहरायी ॥ तबहीं संत कहैं सुनु माई । बैठे कबीरा परले ठाई ॥ तब लक्ष्मी ध्यानपुरुषका कीना । करमी सभा मेटि सब दीना ॥

लक्ष्मी वचन

तबहीं हमसों बात जनायी । तुम करो प्रसाद जगतके मायी ॥

सत्यकबीर वचन

तब हम कहा बात समझायी । हम तो प्रसाद पुरुषको पायी ॥

लक्ष्मी वचन

लक्ष्मी कहै तुम कौन हो भाई । तुम कैसे गम पुरुष को पाई ॥

सत्यकबीर वचन

कहै कबीर सुनु लक्ष्मी आई । हम तो सेवें पुरुष को पाई ॥ जिन साहिब तुमको कीन्हा । साहिब पति तुम तनको दीन्हा ॥ तुम तो गरबभुलानी सोई । ताते काज सिद्ध नहीं होई ॥ श्याम देह कीना तुम सोई । तब ते तुमरी मुक्ति न होई ॥

लक्ष्मी वचन

तब लक्ष्मी कहे समझायी । तुम कहो सो हम मानें भाई ॥

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बोधसागर

(१४५)

सत्यकबीर वचन

बावन अटका जगन्नाथ चढाओ । चार अटका समरथ अरपाओ ॥ तब हम न्योते तुमरे आवें । जब तुम सेवो पुरुषके पावें ॥ मुनत लक्ष्मी ठाकुरपहँ आयी । जो कुछ सुनीसुकहि समझायी ॥

लक्ष्मी वचन

भक्त कबीर नाम जो आहीं । सो तो बैठे समुद्र की ठाहीं ॥ जब उन डांट समुद्र बताया । तबहीं समुद्र पाताल समाया ॥ तब हम न्योत कबीरहि दीना । तब कबीर हमसों छल कीना ॥ करमी सभा बनाय सो लीन्हा । तब हम ध्यान पुरुषका कीन्हा ॥ मिटिगयी सभा कबीरयकरहेऊ । तब कबीर ऐसे पुनि कहेऊ ॥ जिन साहबने तुमको कीन्हा । काहे विसार तुम उनको दीन्हा ॥ तुम तो गर्व झुलाने सोई । ताते काय्य साधन नहिं होई ॥ छप्पन अटका जगन्नाथ लगाये । सत समरथ को धरे विसराये ॥ कहा कहै प्रसाद तुम्हारा । हमको समरथ देवन हारा ॥ हम बिन्ती सतगुरु सों कीन्हा । तब सतगुरु सिखावन दीन्हा ॥ बावन अटका जगन्नाथ चढाओ । चार अटका समरथकोअरपाओ ॥ तब हम न्योते तुम्हरे आवें । हम तो अंश पुरुष के भावें ॥ उनकी गति मति लखी न जाई । तुम त्रिगुण होय सृष्टि बनायी ॥ हम सतगुरु होय जिव मुक्तावें । हम ती सबें पुरुष के पावें ॥ तुम त्रिगुण का राज कराई । तब बोले गांविन्दे राई ॥

श्रीकृष्ण वचन

ज्योति अंश से हम उत्पानी । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर जानी ॥

लक्ष्मी वचन

तब लक्ष्मी कहै समुझायी । वह तो ज्योति हमारी आई ॥ तुमको तो हम उत्पन कीन्हा । चारिस्वरूप हमहिं रचिदीन्हा ॥ त्रिगुणस्वरूप जो सृष्टि बनायी । चौथे अंश ज्योति थपायी ॥

समुद्र और कबीर साहबकी बातचीत

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(१४६)

लक्ष्मणबोध

सत्यकबीर-वचन

तब ठाकुर मन चकित भयऊ । सुनत तब गरव गलि गयऊ ॥ तब गोविन्द आपु चलि आये । तब कबीर उठि मिले जो धाये ॥ लक्ष्मी गोविन्द कबीर बैठाये । तब गोविन्द एक बात सुनाये ॥

गोविन्द वचन

हम तो गतिमति तुमरी न पाई । हमको लक्ष्मी अब समझाई ॥ सार्वी-जो तुम अंशपुरुष के, सतगुरु हौ तुम सोउ । देवल गाडे रेत में, ताहि वन्दन करि लेउ ॥

चौपाई

जबहि उदधिपल सजिके आया । तबहि कबीर पुकार जनाया ॥ घँसि समुद्र पताले भयऊ । देखत गोविन्द चकित भयऊ ॥ तब विन्ती सतगुरु सो कीन्हा । दौयकर जोरि लक्ष्मी आधीना ॥ चलो कबीर यज्ञमें पगधारो । तुमते शोभा रही हमारो ॥

सत्यकबीर-वचन

छप्पन भोग चढाओ जाई । सत्य समरथको भोग लगाई ॥ तब तुम हमको देखो जाओ । अरध प्रसाद रखा जब पाओ ॥ तब गोविन्द स्थान उठि आये । जाई उपदेश राजहि सुनाये ॥ छप्पन भोग चढाओ जायी । सत्य समरथ को भोग लगायी ॥ राजा पंडा कहै बुझाई । छप्पन भोग चढावहु जाई ॥ सो समरथ को भोग लगायी । तब तुम पावो प्रसाद अघायी ॥ आध प्रसाद ऋषी जब पाई । तब तुम हमको दिखाओ भाई ॥ हारि समुद्र तब ब्राह्मण भयऊ । हाथ जोरिके ठाढे रहऊ ॥

समुद्र वचन

कौन हौ भाइ कहाँते आये । वस्ती छोड़ि यहाँ कस बैठाये ॥ यहाँ तो लहर समुद्रकि आई । आओ यज्ञमें भोजन पाई ॥