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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

४०४ कथासरित्सागर

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४०४ कथासरित्सागर इति वत्सश्वरस्याग्रे कथयित्वा कथामिमाम्। यौगन्धरायणो भूयो भूपतिं तमभाषत॥२१८॥ तस्मात्तव स राजेन्द्र ! जित्वाप्याचरत शुभम्। ब्रह्मवत्सो विकुर्वीत यदि स्यात्तन्मषेव तम्॥२१९॥ इत्युक्तो मन्त्रिमुख्येन तद्वाक्यमभिनन्द्य सः। उत्थाय दिनकर्त्तव्यं वत्सेशो निरवर्तयत्॥२२ ॥ अथद्युश्च स सम्प्राप्तसर्वदिग्विजयः कृती। लावाणकादुदचलत्कौशाम्बीं स्वपुरीं प्रति॥२२१॥ क्रमेण नगरीं प्राप क्षितीशः सपरिच्छदः। उत्पताकाभुजलतां नृत्यन्तीमुत्सवादिव॥२२२॥ विवेश चैनां पौरस्त्रीनयनोत्पलकानने। वितन्वानः प्रतिपदं प्रवातारम्भविभ्रमम्॥२२३॥ चारणैरुद्गीयमानश्च स्तूयमानश्च बन्दिभिः। नृपैः प्रणम्यमानश्च राजा मन्दिरमाययौ॥२२४॥ ततो विनम्रेष्वधिरोप्य शासनं स वत्सराजोऽखिलवेश्मराजसु। पूर्वं निधानाधिगतं कुलोचितं प्रसङ्ग सिंहासनमारुरोह तत्॥२२५॥ तत्कालमङ्गल समाहृत सारधीर तूर्यारवेप्रतिरवेण नभः पुपूरे। तन्मन्त्रिमुख्य-परितोषित लोकपाल- दत्तैरिव प्रतिदिशं समसाधुवादैः॥२२६॥ विविशमथ वितीर्य वीतलोभो वसु वसुधाविजयार्जितं द्विजेभ्यः। अकृत कृतमहोत्सवः कृतार्थं क्षितिपतिमण्डलमात्ममन्त्रिपदञ्च॥२२७॥ क्षेमेषु वर्षति सवामुगुण नरेन्द्रे रस्मिन्घनस्तनमुदर्कनिनादितायाम् । सम्भाव्य भाविबहुधान्यफलं जनोऽपि। तस्यां पुरि प्रतिगृहं विहितोत्सवोऽभूत् ॥२२८।

तृतीय लम्बक ४५

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तृतीय लम्बक ४५ यौगन्धरायण वत्सराज के सम्मुख यह कथा कहकर राजा से फिर बोला— 'हे राजेन्द्र ! जीतकर भी उसकी कल्याण-कामना करते हुए तुम्हारा यदि ब्रह्मदत्त (काशिराज) अपकार करता है, तो तुम उसे दंड दे सकते हो' ॥२१८-२१९॥ मुख्य मन्त्री से इस प्रकार कहे गये राजा ने उसकी सम्मति का अभिनन्दन किया और उठकर प्रातःकालीन कृत्यों से निवृत्त होने में लग गया ॥२२० ॥ और दूसरे दिन वह नीतिकुशल राजा उदयन समस्त दिशाओं को जीतकर लावाणक से अपनी नगरी कौशाम्बी को चला ॥२२१॥ वत्सराज सभी साधनों के साथ क्रमशः चलकर अपनी नगरी पहुँचा। जो (नगरी) पताकारूपी भुजलता को ऊपर उठाकर आनन्द से नाचती-सी मालूम हो रही थी ॥२२२॥ नागरिकों की कमल-कानन जैसी आँखों को पग-पग पर हवा के झोकों के समान झकोरता हुआ (वत्सराज) ने नगरी में प्रवेश किया ॥२२३॥ चरणों से प्रलंबित बन्दियों से अभिनन्दित और राजाओं से प्रणाम किया जाता हुआ राजा अपने भवन में गया ॥२२४॥ तब सभी देशों के विजित राजाओं को अपने शासन में लाकर परम्परा के अनुसार पूवार्जित सिंहासन पर साधिकार बैठा ॥२२५॥ उस समय मांगलिक वाद्यों के धीर-गम्भीर शब्दों से आकाश इस प्रकार गूँज उठा मानो राजा के मुख्य मन्त्रियों द्वारा परितोषित लोकपालों ने प्रत्येक दिशा से एक साथ साधुवाद दिये हों ॥२२६॥ इसके बाद तेजस्वी राजा ने दिग्विजय के क्रम में अर्जित विपुल धन ब्राह्मणों को दिया और महोत्सव मनाकर सभी नरेशों तथा अपने मन्त्रियों को कृतार्थ किया ॥२२७॥ इस प्रकार वह राजा जब अपने गुणों के अनुसार पात्रों में दान कर रहे थे तब बजते हुए मृदंग की मेघ-मन्द्र ध्वनि से प्रतिध्वनित उस नगरी की प्रजा भी अनेक प्रकार के धन-धान्य की संभावना करती हुई अपने घरों में उत्सव मनाने लगी ॥२२८॥

४ ६ कथासरित्सागर

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४ ६ कथासरित्सागर एवं विजित्य जगतीं स कृती रुमण्वद् यौगन्धरायणनिवेशितराज्यभारः । तस्थौ यथेच्छमथ वासवदत्तयाम पद्मावती सहितया सह वत्सराजः ॥२२९॥ कीर्त्तिश्रियोरिव तयोरुभयोश्च देव्यो- र्मध्यस्थितः स वरचारणगीयमानः । चन्द्रोदयं निजयशोधवल सिषेवे शत्रुप्रतापमिव सीधु पपौ च शश्वत् ॥२३०॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे लावानकलम्बके षष्ठस्तरङ्गः । समाप्तश्चायं लावानकलम्बकस्तृतीयः ।

तृतीय लम्बक ४७

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तृतीय लम्बक ४७ इस प्रकार वह नीतिनिपुण राजा वत्सराज समस्त संसार को जीतकर रुमन्वन् और यौगन्धरायण को राज्य का भार सौंपकर पद्मावती और वासवदत्ता के साथ स्वच्छन्द बिहार करने लगा ।।२२ ॥ कीर्ति और श्री के समान उन दोनों देवियों के बीच में बैठा वह वत्सराज श्रेष्ठ चारणों से प्रशंसित अपने यश के समान उज्ज्वल चन्द्रोदय का आनन्द लेता हुआ शत्रु के प्रताप के समान मद्य का निरन्तर पान करने लगा ॥२३ ॥ छठा तरंग समाप्त कथासरित्सागर का लावानक नामक तृतीय लम्बक समाप्त

नरवाहनदत्तजननं नाम चतुर्थो लम्बकः

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नरवाहनदत्तजननं नाम चतुर्थो लम्बकः इह गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना- त्पुरा किल कथामृतं हरमुखात्सुधेशोद्गतम् । प्रसह्य रसयन्ति ये विगतविघ्नलब्धर्द्धयो धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते ॥ प्रथमस्तरङ्गः उदयनराज्ञः कथा (पूर्वानुवृत्ता) कर्णतालचलाघातसीमन्तितककुभाञ्चलः । पन्थानमिव सिद्धीनां दिक्षु जयति विघ्नजित् ॥१॥ ततो वत्सेश्वरो राजा स कौशाम्ब्यामवस्थितः । एकातपत्रां बुभुजे जितामुदयनो महीम् ॥२॥ विधाय सहमन्त्येव भारं यौगन्धरायणे । बिहारकरसश्चाभूद् वसन्तकसखः सुखी ॥३॥ स्वयं स वादयन् वीणां दभ्या वासवदत्तया । पद्मावत्या च सहितः सङ्गीतकमसचत ॥४॥ देवीकाकलिगीतस्य तद्वीणानिन्दस्य च । अभेदे वादनाङ्गुष्ठकम्पोऽभूद् भवसूचकः ॥५॥ हर्म्याग्रे निजकीर्त्येव ज्योत्स्नया धवले च सः । धाराविगलितं सीधु पपौ मदमिव द्विषाम् ॥६॥ आनिन्युः स्वर्णकलशैस्तस्य वाराङ्गना रहः । स्मरराज्याभिषेकाम्भ इव रागोञ्ज्वलं मधु ॥७॥ मारकतरसुरत्नस्वच्छमन्तस्फुरित मुखम् । उपनिन्यु र्व्योममध्य स स्वबिम्बिमिवासवम् ॥८॥ ईर्ष्याश्यामाभावमपि भङ्गुरभ्रूणि रागिणि । न मुग्धे वतयो राज्योस्तदृष्टिरतृप्तिमाययौ ॥९॥

नरवाहनदत्तजनन नामक चतुर्थ लम्बक

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नरवाहनदत्तजनन नामक चतुर्थ लम्बक (मंगल-श्लोक का अर्थ प्रथम लम्बक के प्रथम तरंग के प्रारम्भ में देखें।) प्रथम तरंग राजा उदयन की कथा (क्रमशः) कर्णताल के प्रबल आघातों से दुःस्वप्नों को एक ओर करके मानों सफलता का मार्ग प्रदर्शन कर रहे हों ऐसे विघ्नराज गणेश की जय हो॥१॥ तदनन्तर कौशाम्बी में रहता हुआ राजा उदयन विजित पृथ्वी का एकच्छत्र राज्यभोग कर रहा था॥२॥ वह राजा सेनापति रुमण्वान् के साथ मुख्यमन्त्री यौगन्धरायणपर समस्त राज्य-शासन का भार देकर, अपने नर्मसचिव वसन्तक के साथ सुखपूर्वक सांसारिक भोग-विलास का आनन्द लेने लगा॥३॥ वह स्वयं वीणा बजाता हुआ रानी वासवदत्ता और पद्मावती के साथ संगीत का सेवन करता था॥४॥ वासवदत्ता के सूक्ष्म और मधुर संगीत-स्वर उसकी वीणा के स्वर की एकता (समता) होने पर बजाने के लिए चलते हुए अँगूठे से ही दोनों का भेद लक्षित होता था। अर्थात् गायन और वादन का स्वर एक साथ मिलने पर यह प्रतीत नहीं होता था कि रानी गा रही है या वीणा बज रही है॥५॥ राजमहल के सामने अपनी कीर्ति के समान शुभ चाँदनी से धवल बरामदे में बैठकर वह राजा प्याला में अनवरत धारा से गिरते हुए मद्य का समुद्र के मद के समान पान करता था॥६॥ उस एकान्त स्थान में बैठे हुए राजा के लिए सुन्दरियाँ मद्य के घड़ा में रूप से उज्ज्वल मद्य को ऐसे पहुँचा रही थीं मानों कामदेव के राज्याभिषेक के लिए स्वर्ण के कलशों में तीर्थों का जल लाया जा रहा हो॥७॥ वह राजा दोनों रानियों के बीच में बैठकर अपने रागपूर्ण चित्त के समान रक्तवर्ण स्वादु, स्वच्छ और रानियों के मुखों से प्रतिबिम्बित मद्य का प्रसन्नपूर्वक पान करता था॥८॥ ईर्ष्या और कोष के बिना भी (मद्य के नशे में) टेढ़ी भौंहोंवाले एवं प्रेमपूर्ण रानियों के मुखों को निरन्तर देखते हुए राजा को तृप्ति नहीं होती थी॥९॥ ९२

४१ कथासरित्सागर

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४१ कथासरित्सागर शमपुष्किरिणीतल्पमध्यास्ते तस्य पादपम् । बभौ चातपताम्राक्षसितपक्षेव पद्मिनी ॥१०॥ वत्सराजस्य मृगयावर्णनम् अन्तरा च विन्ध्याटाप पलालयामकुन्दुरैः । स मदान्धगजां भेजे व्याधैर्मृगवाननम् ॥११॥ जघान पद्मकुम्भान्धगहनिबहोग्गरैः । तिमिरोधनविराद्धं बरैर्दिग्य मरीचिमान् ॥१२॥ विध्वस्तदृगुतामन्द्रिभृष्णगाग प्रधाविनः । बभुः पूर्वाभिभूतानो वराहा मघुभामिव ॥१३॥ रेजुः खड्गिणा भाग्ग मही मण्विणानिनः । गतागत्यं तक्षान्दुगगमयुक्ता वनान्त्रिनी ॥१४॥ ध्यासस्तत्रपतद्रायग्रागण्पि मृगाग्निषु । गामन्तस्त्रिनिष्पक्षान्तत्रावितुषु सन्तण ग ॥१५॥ दवान इवथ्रे वन तम्मिरन्ध्रस्य बन्धन बागृग । गा व्याधपतित्द्रभार्यात्रया मृगयारग ॥१६॥ वत्सराजं प्रति शारदोपदेशः एव मनाशभोग्य वर्त्तमानं तमत्रतः । रात्रानपाग्यानन्तं नान्दा पूर्विम्दगारु ॥१७॥ निरु दप्रमावडर्रणः प्रह्लद निरुः । कृतार्थारम्भसंस्याभित्रा यान्तमालि ॥१८॥ स मने गर्वभार्यान्त्या तृणमप्रय भभताः । प्रात राज्ञिध विष्वत रात्रान ततमन्तत ॥१९॥ रुमण्डतकथा शृणु यत्नभवम्य वमन्धरः समाद्रम यः । बभूव राजसिंहस्य स मन्त्री पूर्वजन्मसु ॥ सस्य गदः सुहृद् व्यास प्रास भन्म वभवतुः । एता दृश्य निष्पाप च ब्रह्मा सत्य सुरोत्तमः ॥ स चात्र गूर्भदामापि विप्रगोपाङ्गसम्भूतः । तस्य वत्सेश्वरोऽभूत् कृतकृत्यः सहायवान् ।

चतुर्थ लम्बक ४११

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चतुर्थ लम्बक ४११ सुरापूर्ण अनेक स्फटिक के प्यालों से भरी हुई राजा की पानभूमि प्रभातकालीन सूर्य की लाल किरणों से रक्त और श्वेत कमलों से युक्त कनक-लता के समान सुशोभित हो रही थी॥१०॥ वत्सराज का मृगया-वर्णन इसी विलास-क्रीड़ा के बीच कभी-कभी राजा बहेलिया के साथ हरे पत्तों का-सा वेष धारण किये हुए और धनुष लिये हुए मृगवनों का भी सेवन करता था (अर्थात् शिकार खेलने के लिए भी जाता था) ॥११॥ इस क्रीड़ा में कीचड़ से सने हुए सूकरों के मुखों को वह बाणों से बेधकर मार देता था। उसके पीछा करने पर भय से इधर-उधर भागे हुए कृष्णसार मृग ऐसे मालूम होते थे जैसे मानों पूर्वकाल में विजय की हुई दिशाएँ उसपर कटाक्षपात कर रही हों॥१२-१३॥ जंगली भैंसों को मारने के कारण उनके रक्त से रंजित वनभूमि ऐसी मालूम होती थी कि माना वन-कमलिनी राजा की सेवा के लिए उपस्थित हुई हो॥१४॥ मुँह फाड़े हुए, अतएव भालों में बिधे (पिरोय) हुए मुखोंवाले सिंहों को देखकर राजा प्रसन्न होता था॥१५॥ अपने शस्त्र पर विश्वास रखनेवाले उस राजा की मृगया-क्रीड़ा में गड्ढों में छिपे हुए शिकारी कुत्ते और मार्ग में बिछे हुए जाल—यह परिस्थिति थी॥१६॥ वत्सराज को नारदजी का उपदेश इस प्रकार के आनन्द के दिनों में एक बार नारद मुनि सभा (दरबार) में बैठे हुए राजा के समीप आये—॥१७॥ अपनी देह के कान्ति-मंडल से आवृत वे ऐसे मालूम होते थे मानों तेजस्वी राजा के प्रेम से तेजस्वी सूर्य अवतार धारण करके आये हों॥१८॥ सादर प्रणाम करते हुए राजा से समुचित सत्कार प्राप्त करने पर प्रसन्नचेता मुनि कुछ ठहरकर बोले॥१९॥ राजा पाण्डु की कथा हे वत्सराज ! संक्षेप में ही कहता हूँ सुनो। पहले समय में पांडु नाम का राजा था जो तेरा पहला पितामह (परदादा) था॥२०॥ तुम्हारे ही समान उस महान् प्रतापी राजा के दो पत्नियां थीं—एक कुन्ती और दूसरी माद्री॥२१॥ अपने अतुल बल से सातोद्वीप पृथ्वी को विजय करके एक बार शिकार का व्यसनी होने के कारण वह पांडु वन को गया॥२२॥

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तत्र किन्दमनामानं स मुनिं मुक्तसायकः। जघान मृगरूपेण सम्भार्यं सुरतस्थितम्॥२३॥ स मुनिर्मृगरूपं तत्त्यक्त्वा कण्ठविवर्तिभिः। प्राणैः शशाप तं पाण्डुं विषण्णं मुक्तकार्मुकम्॥२४॥ स्वैरन्ध्यो निर्विमर्षेण हतोऽहं यत्त्वया ततः। भार्यासंभोगकाले ते मद्धव मृत्युर्भविष्यति॥२५॥ इत्याप्तशापस्तद्भीत्या त्यक्तभोगस्पृहोऽथ सः। पत्नीभ्यामन्वितः पाण्डुस्तस्थौ शान्ते तपोवने॥२६॥ तत्रस्थोऽपि स शापेन प्रेरितेनेव नैकदा। अकस्माच्चकमे माद्रीं प्रियां प्राप च पञ्चताम्॥२७॥ तदेवं मृगया नाम प्रमादो भूप भूभृताम्। क्षपिता ह्यनयाऽयेऽपि नृपास्तं ते मृगा इव॥२८॥ घोरनाषामिषव्याप्ता रुक्षा भूत्राश्वंमूर्खता। कुलदन्ता कथं कुर्यात्प्राज्ञस्त्रीय हि सा क्षिवम्॥२९॥ तस्माद् विफळभाभास जहीहि मृगयारसम्। वन्यवाहनहन्तॄणां समानं प्राणसंक्षयः॥३०॥ त्वं च त्वत्पूर्वजप्रीत्या प्रिय कल्याणपात्र ! मे। पुत्रश्च तव कामांशो यथा भावी तथा शृणु॥३१॥ पुरानङ्गाङ्गसम्भूत्य रत्या स्तुतिभिरर्चितः। तुष्टो रहसि सङ्घपमिव तस्याः शिवोऽभ्यधात्॥३२॥ अवतीर्य निजांशेन भूमावागच्छ मां स्वयम्। गौरी पुषायिनी कामं जनयिष्यत्यसाविति॥३३॥ अतरचण्डमहासेनसुता देवी नरेन्द्र सा। माता वासवदत्तेयं सम्पन्ना महिषी च ते॥३४॥ तदेषा शम्भुमाराध्य कामांशा सोष्यते सुतम्। सर्वविद्याधराणां यश्चक्रवर्ती भविष्यति॥३५॥ इत्युक्तेनादृतवचा राजा पृथ्वीं तदर्पिताम्। प्रत्यर्प्य तस्मै स ययो मन्दारगिरिवर्धनम्॥३६॥ तस्मिन्गते धरमराजं स तद्वासवदत्तया। जातपुत्रच्छया साकं निन्ये तच्चिन्तया दिनम्॥३७॥

चतुर्थ लम्बक ४१३

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चतुर्थ लम्बक ४१३ वन में किन्दम नाम का एक मुनि मृग का रूप धारण करके अपनी पत्नी के साथ आनन्द कर रहा था॥२३॥ राजा ने उसे मृग समझकर और बाण चलाकर मार डाला। उस मुनि ने प्राणों का परित्याग करते हुए, धनुष छोड़कर विप्र बैठ राजा को शाप दिया—हे राजन् ! बिना विचारे तुमने मुझे मार डाला। अत पत्नी का समागम करने पर मेरे ही समान तुम्हारी भी मृत्यु होगी॥२४-२५॥ इस प्रकार शापित और शाप के भय से सांसारिक भोगों से विरक्त राजा पांडु अपनी दोनों पत्नियों के साथ प्रशान्त तपोवन में रहने लगा॥२६॥ तपोवन में रहते हुए कन्दर्प से प्रेरित राजा ने अकस्मात् छोटी पत्नी माद्री के साथ समागम किया और मर गया॥२७॥ इसलिए हे राजन् ! यह शिकार राजाओं में प्रमाद करानेवाला बुरा व्यसन है। इसने और भी अनेक राजाओं का मृदा के समान नाश कर दिया है॥२८॥ यह शिकार राक्षसी के समान है। इससे किसका कल्याण हो सकता है? यह पार शब्द के साथ मांस पिशाचिनी है, रूखी है, धूलिधूसर हुए बाणोंवाली है और भाले इसके दाँत हैं, अर्थात् शिकारी दौड़ते-दौड़ते धूल में रंगा हो जाता है। उसके धूल में भरे बाण हवा में ऊपर उठे रहते हैं ॥२९॥ इसलिए व्यर्थ परिश्रमवाले इस शिकार के प्रेम को छोड़ दो। इसमें शिकार, शिकारी और वाहन तीनों के प्राणों का सन्देह मात्र ही रहता है॥३०॥ तुम्हारे पूर्वज मेरे मित्र थे उन्हीं के प्रेम से तुम भी मेरे प्यारे हो। साथ ही तुम्हारा पुत्र कामदेव के अनुरूप में उत्पन्न होनेवाला है। मूर्ता—॥३१॥ प्राचीन समय में काम का दहन होने पर उसकी पत्नी रति ने शिवजी की स्तुति द्वारा आराधना की। उनसे प्रसन्न होने पर शिवजी ने गगन से उससे कहा—पार्वती अपने अंश से पृथ्वी पर अवतीर्ण होकर और पुत्र की कामना से स्वयं मेरी आराधना करके उस अपने गर्भ में जन्म देगी॥३२-३३॥ इसलिए हे राजन् ! वहमहासेन की पुत्री यह वासवदत्ता गौरी के अंश से उत्पन्न हुई है और तुम्हारी महारानी है॥३४॥ यह रानी शिवजी की आराधना करके कामदेव के अनुरूप बालक का जन्म देगी जो सब विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा बनेगा॥३५॥ ऐसा सुनकर मुनि के वचन का आदर करके राजा ने गन्धर्ववृत्त्या मुनिको दान कर दी। नारद मुनि उस पुत्र उत्पन्न के लिए राजा को सौंपकर अन्तर्धान हो गए॥३६॥ मुनि के चले जाने पर राजा ने पुत्र की इच्छावाली रानी वासवदत्ता के साथ पुत्र की चिन्ता में ही दिन व्यतीत किया॥३७॥

४१४ कथासरित्सागर

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४१४ कथासरित्सागर

पिङ्गलिकाब्राह्मणीकथा

अथैकद्युस्तं स वत्सपामुपेत्यास्थानवर्त्तिनम् । नित्योत्क्षिप्तस्य प्रवरः प्रतीहारो व्यजिज्ञपत् ॥३८॥ शिशुद्वयसमुद्भूता ब्राह्मणी कापि दुर्गता । द्वारि स्थिता महाराज देवदर्शनकांक्षिणी ॥३९॥ तच्छ्रुत्वाभ्यनुज्ञाते तत्क्षणं महीभृता । ब्राह्मणी सा विवेशात्र कृशपाण्डुरधूसरा ॥४०॥ माननव विशीर्णेन वाससा विधुरीकृता । दुर्दैव्यनिभावङ्के बिभ्रती बालकावुभौ ॥४१॥ कृतोचितप्रणामा च सा राजानं व्यजिज्ञपत् । ब्राह्मणी कुलजा चाहमीदृशीं दुर्गतिं गता ॥४२॥ दैवायुगपदेतौ च जातौ द्वौ तनयौ मम । तच्च नास्ति मे स्तन्यमतयोर्भोजनं बिना ॥४३॥ तनेह कृपणा माद्य शरणागतवत्सलम् । प्राप्तास्मि देवं शरणं प्रमाणमधुना प्रभुः ॥४४॥ तच्छ्रुत्वा सद्यो राजा स प्रतीहारमादिक्षत् । इयं वासवदत्तायै देव्यै नीत्वाप्यतामिति ॥४५॥ सतद्द कर्मणा स्वेन शुभेनेवाग्रयायिना । नीताऽभून्निकटं देव्याः प्रतीहारेण तेन सा ॥४६॥ राज्ञा विसृष्टां दृष्ट्वा तां प्रतीहारानुपागताम् । देवी वासवदत्ता सा ब्राह्मणीं श्लघ्नतराम् ॥४७॥ युग्मापत्यां च पश्यन्ती दीनामतां व्यचिन्तयत् । अहो वामकबुद्धित्वं किमप्येतत्प्रजापतेः ॥४८॥ अहो ! वस्तुनि मारम्यमहो भक्तिरवस्तुनि । नाद्याप्येकोऽपि मे जाता जातौ त्वस्या यमाविमौ ॥४९॥ एवं सचिन्तयन्ती च सा देवी स्नानकांक्षिणी । ब्राह्मण्याश्चेटिकास्तस्याः स्नपनादौ समादिशत् ॥५०॥ स्नपिता दत्तवस्त्रा च ताभिः स्वादु च भोजिता । ब्राह्मणी गाम्बुसिक्तेव तप्ता भूः समुदश्वसत् ॥५१॥

चतुर्थ लम्बक ४१५

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चतुर्थ लम्बक ४१५ पिङ्गलिका ब्राह्मणी की कथा किसी एक दिन प्रातःकालीन सभा (दरबार) में बैठे हुए वत्सराज से नित्योदित नामक मुख्य द्वारपाल ने आकर निवेदन किया—हे महाराज दो बच्चोंवाली एक दरिद्र ब्राह्मणी आपके दर्शन की अभिलाषा से द्वार पर खड़ी है॥३८-३९॥ यह सुनते ही राजा से उसके प्रवेश की आज्ञा पाकर दुबली-पतली मैली-कुचैली एक ब्राह्मणी राजा के सम्मुख उपस्थित हुई॥४०॥ अपने सम्मान के समान फटे-पुराने वस्त्र से लिपटी हुई और दैन्य एवं दुःख के समान अपने दोनों बालकों को गोद में लिये हुई वह ब्राह्मणी राजा का समुचित अभिवादन करके बोली— मैं कुलीन घर की ब्राह्मणी हूँ और परिस्थितिवश ऐसी दरिद्रावस्था में आ गई हूँ। ये एक साथ दो अर्थात् जुड़वाँ बच्चे उत्पन्न हो गये। मेरे भोजन का ठिकाना नहीं है। इसलिए इन बच्चों को मैं दूध नहीं पिला सकती॥४१-४३॥ इसलिए हे महाराज मैं दुखिया शरण में आये हुए पर दया करनेवाले आपकी शरण में आई हूँ। अब आप जो उचित समझें करें॥४४॥ यह सुनकर दयालु राजा ने द्वारपाल को आज्ञा दी कि इसे ले जाकर महारानी वासवदत्ता को सौंप दो॥४५॥ तब वह अपने शुभकर्म के समान आगे चलनेवाले उस द्वारपाल ने उसे महारानी वासव- दत्ता के पास पहुँचा दिया॥४६॥ द्वारपाल से यह जानकर कि 'इसे महाराज ने भेजा है'—रानी वासवदत्ता ने उस ब्राह्मणी पर अत्यन्त दया प्रकट की॥४७॥ दो बच्चोंवाली उस दीन ब्राह्मणी को देखकर रानी सोचने लगी कि विधि की यह विपरीत गति है कि वन्द्य वस्तु से उसे डाह होता है और न-वस्तु से प्रेम होता है। अभी तक मुझे एक बालक भी नहीं हुआ और इसके एक साथ ही दो हो गये॥४८-४९॥ ऐसा सोचती हुई रानी स्नान करने गई और दासियों को उस ब्राह्मणी के स्नानादि के लिए आज्ञा दे गई॥५०॥ दासियों द्वारा स्नान नवीन वस्त्र और स्वादिष्ट भोजनों से सम्मानित वह ब्राह्मणी इस प्रकार आश्वस्त होकर अच्छी सांस लेने लगी जैसे संतृप्त भूमि पानी सींचने पर सोधी सुगन्ध छोड़ती है ॥५१॥

४१८ कथासरित्सागर

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४१८ कथासरित्सागर तत्पार्श्वं व्रज राज्यं ते साधयिष्यति वत्स सः। इत्युक्तः स तदा मात्रा राजपुत्रो जगाद ताम् ॥६६॥ तत्र मां निष्परिकरं गतं को बहु मन्यते। तच्छ्रुत्वा पुनरप्येवं सा माता तमभाषत ॥६७॥ श्वशुरस्य गृहं गत्वा स्वं हि प्राप्य सतो धनम्। कृत्वा परिकरं गच्छ निकटं चक्रवर्तिनः ॥६८॥ इति स प्रेरितो मात्रा समन्योऽपि नृपात्मजः। तस्मात्प्रतस्थे साय च प्राप तच्छ्वशुर गृहम् ॥६९॥ पितृहीनो विनष्टार्थोबाष्पपातामिलक्षणः। अकाल नाशकच्चात्र प्रवेष्टुं लज्जया निशि ॥७०॥ निकटे सत्रशालास्य स्थितः श्वशुरमन्दिरात्। नक्तं रज्जवावरोहन्तीमकस्मात्स्त्रियमैक्षत ॥७१॥ क्षणाच्च भार्या स्वामेव तां रत्नद्युतिभास्वराम्। उल्कामिवान्ध्रपतितां परिज्ञायाभ्यतप्यत ॥७२॥ सा तु तं धूसराङ्गम दृष्ट्वाप्यपरिजानती। कोऽसीत्यपृच्छत्तच्छ्रुत्वा पान्थोऽहमिति सोऽब्रवीत् ॥७३॥ ततः सा सत्रशालान्तः प्रविष्टा वणिक्सुता। अन्वगाद्राजपुत्रोऽपि स तां गुप्तमवेक्षितुम् ॥७४॥ सा चात्र पुरुषं कञ्चिदुपागात्क्रुब्धोऽपि ताम्। स्वं चिरेणागतासीति पादघातैरताडयत् ॥७५॥ ततः सा द्विगुणीभूतरागा पापा प्रसाद्य तम्। पुरुषं तेन सहिता तत्र तस्थौ यदृच्छया ॥७६॥ तदृष्ट्वा तु स सुप्रज्ञो राजपुत्रो व्यचिन्तयत्। कोपस्यायं न कालो मे साध्यमम्यद्धि वर्तते ॥७७॥ क्व च प्रसरद्रक्तच्छद्म कृपणयोर्द्वयोः। शत्रुर्योऽयं स्त्रियामस्यामस्मिंश्च नृपशौ मम ॥७८॥ किमेतया दुष्टया वा कृत्यमेतद्धि युज्यते। मद्यैर्मासोक्तनक्रोडानेपुच्छे दुःखरूपिणः ॥७९॥ अतुल्यकुलसम्बन्धः सैषा किं वापराध्यति। मुक्त्वा वलिभुजं काकी कोकिले रमते कथम् ॥८०॥

चतुर्थ लम्बक ४१९

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चतुर्थ लम्बक ४१९ माता के इस प्रकार कहने पर राजकुमार बोला कि 'बिना राजा के योग्य साज-सामान के वहाँ जाने पर कौन मेरा सम्मान करेगा। यह सुनकर माता ने बेटे से फिर कहा कि 'तुम श्वशुर के घर जाकर उससे धन लेकर अपना साज-सामान आदि ठीक करके चक्रवर्ती के पास जाओ ॥६६-६८॥ इस प्रकार माता से प्रेरित वह राजकुमार श्वशुर से धन माँगने में लज्जित होता हुआ भी गया और सायंकाल मथुराम् मे पहुँचा ॥६९॥ पितृहीन भ्रष्टराज्य और धनवासा वह राजकुमार रोने की शंका से उस समय घर में जाना उचित न समझकर श्वशुर-गृह के समीप ही एक धर्मशाला में ठहर गया ॥७० ॥ धर्मशाला में रहते हुए उसने रात को रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ती हुई एक स्त्री को देखा ॥७१॥ कुछ समय में ही रत्नों की चमक से चमकती हुई अपनी स्त्री को उसने पहचान लिया और आकाश से गिरी हुई उल्का के समान उसे देखकर सन्तप्त हो गया ॥७२॥ उसकी स्त्री मार्ग रमण से दुर्बल और धूल से धूसरित उसके शरीर को देखकर भी उसे न पहचान सकी और पूछने लगी कि 'तुम कौन हो ?' उत्तर में उसने कहा—'मैं पथिक (बटोही) हूँ ॥७३॥ तब वह स्त्री धर्मशाला के अन्दर गई। राजकुमार भी रहस्य जानने की इच्छा से छिपकर उसका पीछा करने लगा ॥७४॥ वहाँ पर एक पुरुष भी आया और उसने 'तू देर से आई' ऐसा कहकर उस स्त्री को लातें मारी ॥७५॥ लात खाकर वह पापिष्ठ दूयूने प्रेम से उसे मनाकर उसके साथ विहार करने लगी ॥७६॥ उसे देखकर वह बुद्धिमान् राजकुमार सोचने लगा कि 'यह चाप करने का समय नहीं है। मुझे तो इस समय दूसरा ही कार्य सिद्ध करना है ॥७७॥ शत्रुओं के पाश अपने शस्त्र का इस पातिन स्त्री और महान् पर क्या चलाऊँ? जैसी दुष्ट स्त्री से भी क्या प्रयोजन ? यह मेरे दुर्भाग्य का ही दोष है या मेरे धैर्य की परीक्षा का स्वभाव देखने के लिए विधाता दुःखों की वर्षा कर रहा है ॥७८-३ ॥ असंसान कुला के सम्बन्ध का यह परिणाम है। इसमें उस स्त्री का क्या दोष है। कोई कौवे को छोड़कर पारवत (नर) का धैर्य १ बात गवती है ॥८४ ॥

४१६ कथासरित्सागर

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४१६ कथासरित्सागर समाश्वस्ता च सा युक्त्या कथाञ्चाप परीक्षतुम्। क्षणान्तर निजगदे देव्या वासवदत्तया ॥५२॥ भो ब्राह्मणि ! कथा काचित्त्वया मः कथ्यतामिति । सम्परक्षा सा तथेत्युक्त्वा कथां वक्तु प्रचक्रम ॥५३॥ राजः देवदत्तस्य तद्भार्यायाश्च कथा पुराभूज्जयदत्ताख्यः सामान्य कोऽपि भूपतिः । देवदत्ताभिधानश्च पुत्रस्तस्योदपद्यत ॥५४॥ यौवनस्थस्य तस्याथ विवाहं तनयस्य सः । विधातुमिच्छन्नृपतिर्मेक्षमानित्त्यचिन्तयत् ॥५५॥ वेश्येव बलवद्भोग्या राजश्रीरतिचञ्चला । वणिजां तु कुलस्त्रीव स्थिरा लक्ष्मीरनन्यगा ॥५६॥ तन्माद् विवाहं पुत्रस्य करोमि वणिजां गृहात् । राज्येऽस्य बहुदायादे यन नापद् भविष्यति ॥५७॥ इति निश्चित्य पुत्रस्य कृते वव्रे स भूपतिः । वणिजो वसुदत्तस्य कन्यां पाटलिपुत्रकात् ॥५८॥ वसुदत्तोऽपि स ददौ श्लाघ्यसम्बन्धवाञ्छया । दूरदेशान्तरञ्ज्यस्मै राजपुत्राय तां सुताम् ॥५९॥ पूरयामास च तथा रत्नजर्मास्तर स तम्। मगलद्धहुमानोऽस्य यया स्वपितृवैभवं ॥६०॥ अवाप्ताढ्यवणिकपुत्रीसहितेनाथ तेन सः । तनयेन समं तस्थौ जयदत्तनृप सुखम् ॥६१॥ एकदा तत्र चागत्य सोत्क सम्बन्धिसद्मनि । स वणिग्वसुदत्तस्तां निनाय स्वगृहं सुताम् ॥६२॥ ततोऽकस्मात्स नृपतिर्जयदत्तो दिवं ययौ । उपभूय गोत्रजैस्तस्य तच्च राज्यमधिष्ठितम् ॥६३॥ तद्भीत्या तस्य तनयो जनन्या निजया मिलि । देवदत्तस्तु नीतोऽभूदन्यदेशमरक्षितः ॥६४॥ सत्राहु राजपुत्रं तं माता दुःखितमानसा । देवोऽस्ति चक्रवर्ती न प्रभुः पूर्वदिगीश्वरः ॥६५॥

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४१८ कथासरित्सागर

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४१८ कथासरित्सागर तत्पार्श्वं व्रज राज्यं ते साधयिष्यति वत्स सः। इत्युक्तः स तथा मात्रा राजपुत्रो जगाद ताम् ॥६६॥ तत्र मां निष्परिकरं गतं को बहु मन्यते। तच्छ्रुत्वा पुनरप्येवं सा माता तमभाषत ॥६७॥ श्वशुरस्य गृहं गत्वा त्वं हि प्राप्य ततो धनम्। कृत्वा परिकरं गच्छ निकटं चक्रवर्तिनः ॥६८॥ इति स प्रेरितो मात्रा सल्लज्जोऽपि नृपात्मजः। क्रमादतस्थे सायं च प्राप तच्छ्वशुरं गृहम् ॥६९॥ पितृहीनो विनष्टश्रीर्बाष्पपाताभिशङ्कया। अकाले नाशकच्चात्र प्रवेष्टुं लज्जया निशि ॥७०॥ निकटे सत्रशालायां स्थितः श्वशुरमन्दिरात्। नक्तं रज्ज्वावरोहन्तीमकस्मात्स्त्रियमैक्षत ॥७१॥ क्षणाच्च भार्यां स्वामेव तां रत्नद्युतिभास्वराम्। उल्कामिवाभ्रपतितां परिज्ञायाभ्यतप्यत ॥७२॥ सा तु तं धूसराङ्गं दृष्ट्वाप्यपरिजानती। कोऽसीत्यपृच्छत्तच्छ्रुत्वा पान्थोऽहमिति सोऽब्रवीत् ॥७३॥ ततः सा सत्रशालान्तः प्रबिवेश वणिक्सुता। अन्वगाद्राजपुत्रोऽपि स तां गुप्तमवेक्षितुम् ॥७४॥ सा चात्र पुरुषं कञ्चिदुपागात्कुप्योऽपि ताम्। त्वं चिरेणागतासीति पादघातैरताडयत् ॥७५॥ ततः सा द्विगुणीभूतरागा पापा प्रसाद्य तम्। पुरुषं तेन सहिता तत्र तस्थौ यदृच्छया ॥७६॥ तद्दृष्ट्वा तु स सुप्रभो राजपुत्रो व्यचिन्तयत्। कोपस्यायं न कालो मे साध्यमन्यद्धि वर्तते ॥७७॥ अथ च प्रसरञ्चेत्तच्छन्नं दूषणयोर्द्वयोः। धनुर्योग्यः स्त्रियामस्यामस्मिन्वा नृपशौ मम ॥७८॥ किमेतया सुबध्वा वा शूरयमतद्धि दुर्विधः। मल्लर्याकोशमक्रोडानेपुष्य दुःस्तनपिनः ॥७९॥ अतुल्यकुलसम्बन्धं मया किं वापराध्यति। भूरन्धा बलिभुजं काकी कोकिलं रमतं वधम् ॥८०॥

चतुर्थ लम्बक ४१९

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चतुर्थ लम्बक ४१९ माता के इस प्रकार कहने पर राजकुमार बोला कि 'बिना राजा के योग्य साज-सामान के वहाँ जाने पर कौन मेरा सम्मान करेगा। यह सुनकर माता ने बेटे से फिर कहा कि 'तुम श्वशुर के घर जाकर उससे धन लेकर अपना साज-सामान आदि ठीक करके चक्रवर्ती के पास जाना ॥६६-६८॥ इस प्रकार माता से प्रेरित वह राजकुमार श्वशुर से धन माँगने में लज्जित होता हुआ भी गया और सायंकाल मथुरापुर में पहुँचा ॥६९॥ पितृहीन भ्रष्टराज्य और धनचाहा वह राजकुमार रात्रि की शंका में उस समय घर में जाना उचित न समझकर श्वशुर-गृह के समीप ही एक धर्मशाला में ठहर गया ॥७०॥ धर्मशाला में रहते हुए उसने रात को रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ती हुई एक स्त्री को देखा ॥७१॥ कुछ समय में ही रत्नों की चमक से चमकती हुई अपनी स्त्री को उसने पहचान लिया और आकाश से गिरी हुई उल्का के समान उसे देखकर संतप्त हो गया ॥७२॥ उसकी स्त्री मार्ग श्रम से दुर्बल और धूल से धूसरित उसके शरीर को देखकर भी उसे न पहचान सकी और पूछने लगी कि 'तुम कौन हो'? उत्तर में उसने कहा—'मैं पथिक (बटोही) हूँ ॥७३॥ तब वह स्त्री धर्मशाला के अन्दर गई। राजकुमार भी रहस्य जानने की इच्छा से छिपकर उसका पीछा करने लगा ॥७४॥ वहाँ पर एक पुरुष भी आया और उसने 'तू देर से आई' ऐसा कहकर उस स्त्री को लातें मारीं ॥७५॥ लातें खाकर वह चारित्र दुष्टा ने उसे मनाकर उसके साथ विहार करने लगी ॥७६॥ उसे देखकर वह बुद्धिमान् राजकुमार सोचने लगा कि यह क्रोध करने का समय नहीं है। अतः तो इस समय इसका ही कार्य सिद्ध करना है ॥७७॥ शत्रुओं के योग्य अपने राज्य का इस चारित्र स्त्री और शङ्खलूट रूप क्या बनाऊँ? ऐसी दुष्टा स्त्री से भी क्या प्रयोजन? यह मेरे दुर्भाग्य का ही काम है या मेरे धैर्य की परीक्षा का प्रमाण देखने के लिए मुझपर दुःखों की वर्षा कर रहा है ॥७८-७९॥ प्रच्छन्न दुष्टा के सम्बन्ध का यह परिणाम है। इसमें उस स्त्री का क्या दोष है। खोटी गाँठ का ग्राहक काष्ठ (नर) का दोष थाम सकती है ॥८०॥

४२० कथासरित्सागर

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४२० कथासरित्सागर इत्यालोच्य स तां भार्यामुपेक्षत सकामुकाम् । मत्वा गुरु भिगोप्ये हि चेतसि स्त्रीत्वम् कियत् ॥८१॥ तत्कालं च रतावेगवशात्तस्याः किलापतत् । वणिक्सुतायाः श्रवणात् समुक्तानयं विभूषणम् ॥८२॥ तच्च सा न ददर्शैव सुरतान्ते च सत्वरा । ययौ यथागतं गेहमापुंश्च्योपपति स्ततः ॥८३॥ तस्मिन्नपि गते क्वापि द्रुतं प्रच्छन्नकामुके । स राजपुत्रो दृष्ट्वा तद्रत्नमाभरणमग्रहीत् ॥८४॥ स्फुरद्रत्नशिखाजाल भान्त्रा मोहतमोपहम् । हस्तदीपमिव दत्तं प्रनष्टस्त्रीयवेषणे ॥८५॥ महार्हं च तदालोक्य राजपुत्रः स तत्क्षणम् । निर्गत्य सिद्धकार्यः सन्कान्यकुब्जं ततो ययौ ॥८६॥ तन्न बन्धाय दत्त्वा तत्स्वर्गसक्षेण भूषणम् । क्रीत्वा हस्त्यश्वमगमत्स पार्श्वं चक्रवर्तिनः ॥८७॥ तद्दत्तेन बले साकमत्य हत्वा रिपून् रणे । प्राप तत्पैतृकं राज्यं कृती मात्रामिनन्दितः ॥८८॥ तन्न बन्धाद् विनिर्मोक्ष्य भूषणं स्वश्वशुरान्तिकम् । प्राहिणोत् प्रकटीकर्त्तुं रहस्यं तदधङ्कितम् ॥८९॥ सोऽपि तच्छ्वशुरो दृष्ट्वा स्वसुताकर्णभूषणम् । तत्तमोपागतं तस्मै सम्भ्रान्तं समदर्शयत् ॥९०॥ सापि पूर्वपरिभ्रष्टं चारित्रमिव वीक्ष्य तत् । बुद्ध्वा च भर्त्रा प्रहितं व्याकुलञ्च समस्मरत् ॥९१॥ इव मे पतिन तस्यां रात्रौ सत्रगृहान्तरे । यस्यां सत्र स्थितो दृष्टः स कोऽपि पथिको मया ॥९२॥ तन्नूनं सोऽत्र भर्त्ता मे धीमन्विज्ञामयाययौ । मया तु न म विज्ञातस्तनेदं प्रापि भूषणम् ॥९३॥ इत्येवं धिग्तयस्त्यान्यं पुर्नयव्यक्तिविह्वलम् । वणिक्सुताया हृदयं तस्याः कातरमस्फुटत् ॥९४॥ ततस्तस्या रहस्यज्ञां पृष्ट्वा चटीं स्वयुक्तिभिः । तत्पिता स वणिग्बुद्ध्या तत्त्वं तत्पात्र तज्जुदुपम् ॥९५॥

चतुर्थ लम्बक ४२१

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चतुर्थ लम्बक ४२१ ऐसा सोचकर उसने उपपति के साथ उस स्त्री की उपेक्षा कर दी। शत्रु-विजय की प्रबल इच्छा रखनेवाले सज्जनों के हृदय में स्त्री-रूपी तृण का क्या महत्त्व है॥८१॥ उसी समय विहार की हलबल में उस बनिये की बेटी का मणियों से जड़ा हुआ कान का बहुमूल्य आभूषण (तरङ्गी) कहीं गिर पड़ा। जाने की शीघ्रता में उसने गिरे हुए कान के आभूषण को नहीं देखा और वह अपने प्रेमी से आज्ञा लेकर अपने घर चली गई॥८२-८३॥ कुछ समय के उपरान्त उस प्रेमी के भी चले जाने पर राजकुमार ने उस जड़ाऊ गहने को उठा लिया॥८४॥ चमकीले रत्नों की चमचमाती हुई किरणात्मक बहुमूल्य मणियों से जड़ा हुआ वह आभूषण विनष्ट राज्यलक्ष्मी को ढूंढ़ने में सहायक हाथ के दीपक के समान दैव ने मानो राजकुमार के हाथ में दे दिया था॥८५॥ गृहगमनोत्सुक राजकुमार वहाँ से निकलकर उसी समय कान्यकुब्ज (कन्नौज) देश को चला गया॥८६॥ राजकुमार कन्नौज जाकर कान के उस आभूषण का एक भाग मुहरों पर बन्धक (गिरवी) रखकर उस धन से हाथी घोड़े आदि खरीदकर राजोचित ठाट-बाट से कान्यकुब्ज के चक्रवर्ती के समीप गया॥८७॥ उनसे मिलकर और सहायता-स्वरूप उनकी सेनाओं को लेकर वह शत्रुओं पर चढ़ आया। कठिन युद्ध में विजयी होकर उसने पिता का राज्य प्राप्त किया और माता ने भी उसका अभिनन्दन किया॥८८॥ राज्य प्राप्त करने पर उसने बन्धक का रुपया देकर पत्नी के उस कर्णाभूषण को छुड़ा लिया और अपनी पत्नी का रहस्य प्रकट करने के लिए उस आभूषण को अपने श्वशुर के पास भेज दिया। वह वैश्य इस प्रकार अपनी कन्या के कर्णाभूषण को पाकर घबराया हुआ उसके पास गया और उसे दिखाया॥८९ ॥ वह वैश्यपुत्री उसे देखकर और वह भी पति के द्वारा भेजा हुआ जानकर, अत्यन्त व्याकुल हुई॥ ९० ॥ 'मेरे कान का यह आभूषण उस दिन रात को धर्मशाला के भीतर गिर गया था जिस दिन जैन किसी अज्ञात पथिक का डेरा था॥ ९१ ॥ अवश्य ही वह मेरा पति था जो मेरा चरित्र जानने की इच्छा से छिपकर आया था। मैंने उसे नहीं पहिचाना। बस उसी ने यह कर्णाभूषण वहाँ पाया होगा॥ ९२॥ इस प्रकार सोचते हुए पश्चात्ताप से व्याकुल उस वैश्य-कन्या का हृदय उसी समय फट गया और वह मर गई॥ ९३॥ तदनन्तर उसके रहस्य को जाननेवाली उसकी अंगरक्षक दासी से युक्तिपूर्वक सब वृत्तान्त कहकर उसके पिता ने भी उसके मरने पर दुःख नहीं मनाया। प्रत्युत उसका अच्छा कल्याण ही मनाया॥ ९४ ॥