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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 370)

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एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

संजयका धृतराष्ट्रके प्रति श्रीकृष्णादिके द्वारा की हुई दुर्योधनादिके वधकी प्रतिज्ञाका वृत्तान्त सुनाना

वैशम्पायन उवाच

तेषां तच्चरितं श्रुत्वा मनुष्यातीतमद्भुतम् ।
चिन्ताशोकपरीतात्मा मन्युनाभिपरिप्लुतः ॥ १ ॥
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
अब्रवीत् संजयं सूतमामन्त्र्य पुरुषर्षभ ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—पुरुषरत्न जनमेजय! पाण्डवोंका वह अद्भुत एवं अलौकिक चरित्र सुनकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रका मन चिन्ता और शोकमें डूब गया। वे अत्यन्त खिन्न हो उठे और लंबी एवं गरम साँसें खींचकर अपने सारथि संजयको निकट बुलाकर बोले— ॥ १-२ ॥

न रात्रौ न दिवा सूत शान्तिं प्राप्नोमि वै क्षणम् ।
संचिन्त्य दुर्नयं घोरमतीतं द्यूतजं हि तत् ॥ ३ ॥

'सूत! मैं बीते हुए द्यूतजनित घोर अन्यायका स्मरण करके दिन तथा रातमें क्षणभर भी शान्ति नहीं पाता ॥

तेषामसह्यवीर्याणां शौर्यं धैर्यं धृतिं पराम् ।
अन्योन्यमनुरागं च भ्रातृणामतिमानुषम् ॥ ४ ॥

'मैं देखता हूँ, पाण्डवोंके पराक्रम असह्य हैं। उनमें शौर्य, धैर्य तथा उत्तम धारणाशक्ति है। उन सब भाइयोंमें परस्पर अलौकिक प्रेम है ॥ ४ ॥

देवपुत्रौ महाभागौ देवराजसमद्युती ।
नकुलः सहदेवश्च पाण्डवौ युद्धदुर्मदौ ॥ ५ ॥

'देवपुत्र महाभाग नकुल-सहदेव देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी हैं। वे दोनों ही पाण्डव युद्धमें प्रचण्ड हैं ॥ ५ ॥

दृढायुधौ दूरपातौ युद्धे च कृतनिश्चयौ ।
शीघ्रहस्तौ दृढक्रोधौ नित्ययुक्तौ तरस्विनौ ॥ ६ ॥

'उनके आयुध दृढ़ हैं। वे दूरतक निशाना मारते हैं। युद्धके लिये उनका भी दृढ़ निश्चय है। वे दोनों ही बड़ी शीघ्रतासे हस्तसंचालन करते हैं। उनका क्रोध भी अत्यन्त दृढ़ है। वे सदा उद्योगशील और बड़े वेगवान् हैं ॥ ६ ॥

भीमार्जुनौ पुरोधाय यदा तौ रणमूर्धनि ।

स्थास्येते सिंहविक्रान्तावश्विनाविव दुःसहौ ॥ ७ ॥
न शेषमिह पश्यामि मम सैन्यस्य संजय ।
तौ ह्यप्रतिरथौ युद्धे देवपुत्रौ महारथौ ॥ ८ ॥
‘जिस समय भीमसेन और अर्जुनको आगे रखकर वे दोनों सिंहके समान पराक्रमी और अश्विनीकुमारोंके समान दुःसह वीर युद्धके मुहानेपर खड़े होंगे, उस समय मुझे अपनी सेनाका कोई वीर शेष रहता नहीं दिखायी देता है। संजय! देवपुत्र महारथी नकुल-सहदेव युद्धमें अनुपम हैं। कोई भी रथी उनका सामना नहीं कर सकता ॥ ७-८ ॥
द्रौपद्यास्तं परिक्लेशं न क्षंस्येते त्वमर्षिणौ ।
वृष्णयोऽथ महेष्वासाः पञ्चाला वा महौजसः ॥ ९ ॥
युधि सत्याभिसंधेन वासुदेवेन रक्षिताः ।
प्रधक्ष्यन्ति रणे पार्थाः पुत्राणां मम वाहिनीम् ॥ १० ॥
‘अमर्षमें भरे हुए माद्रीकुमार द्रौपदीको दिये गये उस कष्टको कभी क्षमा नहीं करेंगे। महान् धनुर्धर वृष्णिवंशी, महातेजस्वी पांचाल योद्धा और युद्धमें सत्यप्रतिज्ञ वासुदेव श्रीकृष्णसे सुरक्षित कुन्तीपुत्र निश्चय ही मेरे पुत्रोंकी सेनाको भस्म कर डालेंगे ॥ ९-१० ॥
रामकृष्णप्रणीतानां वृष्णीनां सूतनन्दन ।
न शक्यः सहितुं वेगः सर्वैस्तैरपि संयुगे ॥ ११ ॥
‘सूतनन्दन! बलराम और श्रीकृष्णसे प्रेरित वृष्णि-वंशी योद्धाओंके वेगको युद्धमें समस्त कौरव मिलकर भी नहीं सह सकते ॥ ११ ॥
तेषां मध्ये महेष्वासो भीमो भीमपराक्रमः ।
शैक्या वीरघातिन्या गदया विचरिष्यति ॥ १२ ॥
तथा गाण्डीवनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः ।
गदावेगं च भीमस्य नालं सोढुं नराधिपाः ॥ १३ ॥
‘उनके बीचमें जब भयानक पराक्रमी महान् धनुर्धर भीमसेन बड़े-बड़े वीरोंका संहार करनेवाली आकाशमें ऊपर उठी हुई गदा लिये विचरेंगे तब उन भीमकी गदाके वेगको तथा वज्रगर्जनके समान गाण्डीव धनुषकी टंकारको भी कोई नरेश नहीं सह सकता ॥ १२-१३ ॥
ततोऽहं सुहृदां वाचो दुर्योधनवशानुगः ।
स्मरणीयाः स्मरिष्यामि मया या न कृताः पुरा ॥ १४ ॥
‘उस समय मैं दुर्योधनके वशमें होनेके कारण अपने हितैषी सुहृदोंकी उन याद रखनेयोग्य बातोंको याद करूँगा, जिनका पालन मैंने पहले नहीं किया’ ॥ १४ ॥

संजय उवाच
व्यतिक्रमोऽयं सुमहांस्त्वया राजन्नुपेक्षितः ।

समर्थेनापि यन्मोहात् पुत्रस्ते न निवारितः ॥ १५ ॥ संजयने कहा— राजन्! आपके द्वारा यह बहुत बड़ा अन्याय हुआ है, जिसकी आपने जान-बूझकर उपेक्षा की है (उसे रोकनेकी चेष्टा नहीं की है); वह यह है कि आपने समर्थ होते हुए भी मोहवश अपने पुत्रको कभी रोका नहीं ॥ १५ ॥ श्रुत्वा हि निर्जितान् द्यूते पाण्डवान् मधुसूदनः । त्वरितः काम्यके पार्थान् सम्भावयदच्युतः ॥ १६ ॥ भगवान् मधुसूदनने ज्यों ही सुना कि पाण्डव द्यूतमें पराजित हो गये, त्यों ही वे काम्यकवनमें पहुँचकर कुन्तीपुत्रोंसे मिले और उन्हें आश्वासन दिया ॥ १६ ॥ द्रुपदस्य तथा पुत्रा धृष्टद्युम्नपुरोगमाः । विराटो धृष्टकेतुश्च केकयाश्च महारथाः ॥ १७ ॥ इसी प्रकार द्रुपदके धृष्टद्युम्न आदि पुत्र, विराट, धृष्टकेतु और महारथी कैकय—इन सबने पाण्डवोंसे भेंट की ॥ १७ ॥ तैश्च यत् कथितं राजन् दृष्ट्वा पार्थान् पराजितान् । चारेण विदितं सर्वं तन्मयाऽऽवेदितं च ते ॥ १८ ॥ राजन्! पाण्डवोंको जूएमें पराजित देखकर उन सबने जो बातें कहीं, उन्हें गुप्तचरोंद्वारा जानकर मैंने आपकी सेवामें निवेदन कर दिया था ॥ १८ ॥ समागम्य वृतस्तत्र पाण्डवैर्मधुसूदनः । सारथ्ये फाल्गुनस्याजौ तथेत्याह च तान् हरिः ॥ १९ ॥ पाण्डवोंने मिलकर मधुसूदन श्रीकृष्णको युद्धमें अर्जुनका सारथि होनेके लिये वरण किया और श्रीहरिने 'तथास्तु' कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया ॥ १९ ॥ अमर्षितो हि कृष्णोऽपि दृष्ट्वा पार्थांस्तथा गतान् । कृष्णाजिनोत्तरासंगानब्रवीच्च युधिष्ठिरम् ॥ २० ॥ भगवान् श्रीकृष्ण भी कुन्तीपुत्रोंको उस अवस्थामें काला मृगचर्म ओढ़कर आये हुए देख उस समय अमर्षमें भर गये और युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले— ॥ २० ॥ या सा समृद्धिः पार्थानामिन्द्रप्रस्थे बभूव ह । राजसूये मया दृष्टा नृपैरन्यैः सुदुर्लभा ॥ २१ ॥ 'इन्द्रप्रस्थमें कुन्तीकुमारोंके पास जो समृद्धि थी तथा राजसूययज्ञके समय जिसे मैंने अपनी आँखों देखा था, वह अन्य नरेशोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ थी ॥ २१ ॥ यत्र सर्वान् महीपालाञ्छस्त्रतेजोभयार्दितान् । सवङ्गाङ्गान् सपौण्ड्रोड्रान् सचोलद्राविडान्ध्रकान् ॥ २२ ॥ सागरानूपकांश्चैव ये च प्रान्ताभिवासिनः । सिंहलान् बर्बरान् म्लेच्छान् ये च लङ्कानिवासिनः ॥ २३ ॥ पश्चिमानि च राष्ट्राणि शतशः सागरान्तिकान् ।

पह्लवान् दरदान् सर्वान् किरातान् यवनाञ्छकान् ॥ २४ ॥
हारहूणांश्च चीनांश्च तुषारान् सैन्धवांस्तथा ।
जागुडान् रामठान् मुण्डान् स्त्रीराज्यमथ तङ्गणान् ॥ २५ ॥
केकयान् मालवांश्चैव तथा काश्मीरकानपि ।
अद्राक्षमहमाहूतान् यज्ञे ते परिवेषकान् ॥ २६ ॥
'उस समय सब भूमिपाल पाण्डवोंके शस्त्रोंके तेजसे भयभीत थे। अंग, वंग, पुण्ड्र, उड्र, चोल, द्राविड़, आन्ध्र, सागरतटवर्ती द्वीप तथा समुद्रके समीप निवास करनेवाले जो राजा थे, वे सभी राजसूययज्ञमें उपस्थित थे। सिंहल, बर्बर, म्लेच्छ, लंकानिवासी, पश्चिमके राष्ट्र, सागरके निकटवर्ती सैकड़ों प्रदेश, पह्लव, दरद, समस्त किरात, यवन, शक, हारहूण, चीन, तुषार, सैन्धव, जागुड़, रामठ, मुण्ड, स्त्रीराज्य, तंगण, केकय, मालव तथा काश्मीरदेशके नरेश भी राजसूययज्ञमें बुलाये गये थे और मैंने उन सबको आपके यज्ञमें रसोई परोसते देखा था ॥ २२—२६ ॥
सा ते समृद्धिरैरात्ता चपला प्रतिसारिणी ।
आदाय जीवितं तेषामाहरिष्यामि तामहम् ॥ २७ ॥
'सब ओर फैली हुई आपकी उस चंचल समृद्धिको जिन लोगोंने छलसे छीन लिया है, उनके प्राण लेकर भी मैं उसे पुनः वापस लाऊँगा ॥ २७ ॥
रामेण सह कौरव्य भीमार्जुनयमैस्तथा ।
अक्रूरगदसाम्बैश्च प्रद्युम्नेनाहुकेन च ॥ २८ ॥
धृष्टद्युम्नेन वीरेण शिशुपालात्मजेन च ।
दुर्योधनं रणे हत्वा सद्यः कर्णं च भारत ॥ २९ ॥
दुःशासनं सौबलेयं यश्चान्यः प्रतियोत्स्यते ।
ततस्त्वं हास्तिनपुरे भ्रातृभिः सहितो वसन् ॥ ३० ॥
धार्तराष्ट्रीं श्रियं प्राप्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् ।
'कुरुनन्दन! भरतकुलतिलक! बलराम, भीमसेन, अर्जुन, नकुल-सहदेव, अक्रूर, गद, साम्ब, प्रद्युम्न, आहुक, वीर धृष्टद्युम्न और शिशुपालपुत्र धृष्टकेतुके साथ आक्रमण करके युद्धमें दुर्योधन, कर्ण, दुःशासन एवं शकुनिको तथा और जो कोई योद्धा सामना करने आयेगा, उसे भी शीघ्र ही मारकर मैं आपकी सम्पत्ति लौटा लाऊँगा। तदनन्तर आप भाइयोंसहित हस्तिनापुरमें निवास करते हुए धृतराष्ट्रकी राज्यलक्ष्मीको पाकर इस सारी पृथ्वीका शासन कीजिये' ॥ २८—३० १/२ ॥
अथैनमब्रवीद् राजा तस्मिन् वीरसमागमे ॥ ३१ ॥
शृण्वत्स्वेतेषु वीरेषु धृष्टद्युम्नमुखेषु च ।
तब राजा युधिष्ठिरने उस वीरसमुदायमें इन धृष्टद्युम्न आदि शूरवीरोंके सुनते हुए श्रीकृष्णसे कहा ॥ ३१ १/२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

प्रतिगृह्णामि ते वाचमिमां सत्यां जनार्दन ॥ ३२ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**जनार्दन! मैं आपकी सत्य वाणीको शिरोधार्य करता हूँ ॥ ३२ ॥

अमित्रान् मे महाबाहो सानुबन्धान् हनिष्यसि । वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं सत्यं मां कुरु केशव ॥ ३३ ॥ प्रतिज्ञातो वने वासो राजमध्ये मया ह्ययम् । महाबाहो! केशव! तेरहवें वर्षके बाद आप मेरे सम्पूर्ण शत्रुओंको उनके बन्धु-बान्धवोंसहित नष्ट कीजियेगा। ऐसा करके आप मेरे सत्य (वनवासके लिये की गयी प्रतिज्ञा)-की रक्षा कीजिये। मैंने राजाओंकी मण्डलीमें वनवासकी प्रतिज्ञा की है ॥ ३३ १/२ ॥

तद् धर्मराजवचनं प्रतिश्रुत्य सभासदः ॥ ३४ ॥ धृष्टद्युम्नपुरोगास्ते शमयामासुरोजसा । केशवं मधुरैर्वाक्यैः कालयुक्तैरमर्षितम् ॥ ३५ ॥ धर्मराजकी वह बात सुनकर धृष्टद्युम्न आदि सभासदोंने समयोचित मधुर वचनोंद्वारा अमर्षमें भरे हुए श्रीकृष्णको शीघ्र ही शान्त किया ॥ ३४-३५ ॥

पाञ्चालीं प्राहुरक्लिष्टां वासुदेवस्य शृण्वतः । दुर्योधनस्तव क्रोधाद् देवि त्यक्ष्यति जीवितम् ॥ ३६ ॥ तत्पश्चात् उन्होंने क्लेशरहित हुई द्रौपदीसे भगवान् श्रीकृष्णके सुनते हुए कहा—‘देवि! दुर्योधन तुम्हारे क्रोधसे निश्चय ही प्राण त्याग देगा ॥ ३६ ॥

प्रतिजानीमहे सत्यं मा शुचो वरवर्णिनि । ये स्म तेऽक्षजितां कृष्णे दृष्ट्वा त्वां प्राहसंस्तदा । मांसानि तेषां खादन्तो हरिष्यन्ति वृकद्विजाः ॥ ३७ ॥ ‘वरवर्णिनि! हम यह सच्ची प्रतिज्ञा करते हैं, तुम शोक न करो। कृष्णे! उस समय तुम्हें जूएमंे जीती हुई देखकर जिन लोगोंने हँसी उड़ायी है, उनके मांस भेड़िये और गीध खायेंगे और नोच-नोचकर ले जायँगे ॥ ३७ ॥

पास्यन्ति रुधिरं तेषां गृध्रा गोमायवस्तथा । उत्तमाङ्गानि कर्षन्तो यैः कृष्टासि सभातले ॥ ३८ ॥ ‘इसी प्रकार जिन्होंने तुम्हें सभाभवनमें घसीटा है, उनके कटे हुए सिरोंको घसीटते हुए गीध और गीदड़ उनके रक्त पीयेंगे ॥ ३८ ॥

तेषां द्रक्ष्यसि पाञ्चालि गात्राणि पृथिवीतले । क्रव्यादैः कृष्यमाणानि भक्ष्यमाणानि चासकृत् ॥ ३९ ॥ ‘पांचालराजकुमारि! तुम देखोगी कि उन दुष्टोंके शरीर इस पृथ्वीपर मांसाहारी गीदड़-गीध आदि पशु-पक्षियोंद्वारा बार-बार घसीटे और खाये जा रहे हैं ॥ ३९ ॥

परिक्लिष्टासि यैस्तत्र यैश्चासि समुपेक्षिता। तेषामुत्कृत्तशिरसां भूमिः पास्यति शोणितम्॥ ४०॥ 'जिन लोगोंने तुम्हें सभामें क्लेश पहुँचाया और जिन्होंने चुपचाप रहकर उस अन्यायकी उपेक्षा की है, उन सबके कटे हुए मस्तकोंका रक्त यह पृथ्वी पीयेगी'॥ ४०॥ एवं बहुविधा वाचस्त ऊचुर्भरतर्षभ। सर्वे तेजस्विनः शूराः सर्वे चाहतलक्षणाः॥ ४१॥ भरतकुलतिलक! इस प्रकार उन वीरोंने अनेक प्रकारकी बातें कही थीं। वे सब-के-सब तेजस्वी और शूरवीर हैं। उनके शुभ लक्षण अमित हैं॥ ४१॥ ते धर्मराजेन वृता वर्षादूर्ध्वं त्रयोदशात्। पुरस्कृत्योपयास्यन्ति वासुदेवं महारथाः॥ ४२॥ धर्मराजने तेरहवें वर्षके बाद युद्ध करनेके लिये उनका वरण किया है। वे महारथी वीर भगवान् श्रीकृष्णको आगे रखकर आक्रमण करेंगे॥ ४२॥ रामश्च कृष्णश्च धनंजयश्च प्रद्युम्नसाम्बौ युयुधानभीमौ। माद्रीसुतौ केकयराजपुत्राः पाञ्चालपुत्राः सह मत्स्यराज्ञा॥ ४३॥ एतान् सर्वान् लोकवीरानजेयान् महात्मनः सानुबन्धान् ससैन्यान्। को जीवितार्थी समरेऽभ्युदीयात् क्रुद्धान् सिंहान् केसरिणो यथैव॥ ४४॥ बलराम, श्रीकृष्ण, अर्जुन, प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि, भीमसेन, नकुल, सहदेव, केकयराजकुमार, द्रुपद और उनके पुत्र तथा मत्स्यनरेश विराट—ये सब-के-सब विश्वविख्यात अजेय वीर हैं। ये महामना जब अपने सगे-सम्बन्धियों और सेनाके साथ धावा करेंगे, उस समय क्रोधमें भरे हुए केसरी सिंहोंके समान उन महावीरोंका समरमें जीवनकी इच्छा रखनेवाला कौन पुरुष सामना करेगा? ॥ ४३-४४॥

धृतराष्ट्र उवाच

यन्माब्रवीद् विदुरो द्यूतकाले त्वं पाण्डवाञ्जेष्यसि चेन्नरेन्द्र। ध्रुवं कुरूणामयमन्तकालो महाभयो भविता शोणितौघः॥ ४५॥ **धृतराष्ट्र बोले—**संजय! जब जूआ खेला जा रहा था, उस समय विदुरने मुझसे जो यह बात कही थी कि नरेन्द्र! यदि आप पाण्डवोंको जूएमं जीतेंगे तो निश्चय ही यह कौरवोंके

लिये खूनकी धारासे भरा हुआ अत्यन्त भयंकर विनाशकाल होगा ॥ ४५ ॥
मन्ये तथा तद् भवितेति सूत
यथा क्षत्ता प्राह वचः पुरा माम् ।
असंशयं भविता युद्धमेतद्
गते काले पाण्डवानां यथोक्तम् ॥ ४६ ॥
सूत! विदुरने पहले जो बात कही थी, वह अवश्य ही उसी प्रकार होगी, ऐसा मेरा विश्वास है। वनवासका समय व्यतीत होनेपर पाण्डवोंके कथनानुसार यह घोर युद्ध होकर ही रहेगा, इसमें संशय नहीं ॥ ४६ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि धृतराष्ट्रविलापे
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें धृतराष्ट्रविलापविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥

(नलोपाख्यानपर्व)

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(नलोपाख्यानपर्व)

द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

भीमसेन-युधिष्ठिर-संवाद, बृहदश्वका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्वके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना

जनमेजय उवाच

अस्त्रहेतोर्गते पार्थे शक्रलोकं महात्मनि ।
युधिष्ठिरप्रभृतयः किमकुर्वत पाण्डवाः ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! अस्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये महात्मा अर्जुनके इन्द्रलोक चले जानेपर युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंने क्या किया? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

अस्त्रहेतोर्गते पार्थे शक्रलोकं महात्मनि ।
आवसन् कृष्णया सार्धं काम्यके भरतर्षभाः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! अस्त्रविद्याके लिये महात्मा अर्जुनके इन्द्रलोक जानेपर भरतकुलभूषण पाण्डव द्रौपदीके साथ काम्यकवनमें निवास करने लगे ॥ २ ॥

ततः कदाचिदेकान्ते विविक्त इव शाद्वले ।
दुःखार्ता भरतश्रेष्ठा निषेदुः सह कृष्णया ॥ ३ ॥
धनंजयं शोचमानाः साश्रुकण्ठाः सुदुःखिताः ।
तद्वियोगाार्दितान् सर्वाञ्छोकः समभिपुप्लुवे ॥ ४ ॥
तदनन्तर एक दिन एकान्त एवं पवित्र स्थानमें, जहाँ छोटी-छोटी हरी दूर्वा आदि घास उगी हुई थी, वे भरतवंशके श्रेष्ठ पुरुष दुःखसे पीड़ित हो द्रौपदीके साथ बैठे और धनंजय अर्जुनके लिये चिन्ता करते हुए अत्यन्त दुःखमें भरे अश्रुगद्गद कण्ठसे उन्हींकी बातें करने लगे। अर्जुनके वियोगसे पीड़ित उन समस्त पाण्डवोंको शोकसागरने अपनी लहरोंमें डुबो दिया ॥ ३-४ ॥

धनंजयवियोगाच्च राज्यभ्रंशाच्च दुःखिताः ।
अथ भीमो महाबाहुर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ ५ ॥

पाण्डव राज्य छिन जानेसे तो दुःखी थे ही। अर्जुनके विरहसे वे और भी क्लेशमें पड़ गये थे। उस समय महाबाहु भीमने युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ५ ॥ निदेशात् ते महाराज गतोऽसौ भरतर्षभः । अर्जुनः पाण्डुपुत्राणां यस्मिन् प्राणाः प्रतिष्ठिताः ॥ ६ ॥ ‘महाराज! आपकी आज्ञासे भरतवंशका रत्न अर्जुन तपस्याके लिये चला गया। हम सब पाण्डवोंके प्राण उसीमें बसते हैं ॥ ६ ॥ यस्मिन् विनष्टे पाञ्चालाः सह पुत्रैस्तथा वयम् । सात्यकिर्वासुदेवश्च विनश्येयुर्न संशयः ॥ ७ ॥ ‘यदि कहीं अर्जुनका नाश हुआ तो पुत्रोंसहित पांचाल, हम पाण्डव, सात्यकि और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण—ये सब-के-सब नष्ट हो जायँगे ॥ ७ ॥ योऽसौ गच्छति धर्मात्मा बहून् क्लेशान् विचिन्तयन् । भवन्नियोगाद् बीभत्सुस्ततो दुःखतरं नु किम् ॥ ८ ॥ ‘जो धर्मात्मा अर्जुन अनेक प्रकारके क्लेशोंका चिन्तन करते हुए आपकी आज्ञासे तपस्याके लिये गया, उससे बढ़कर दुःख और क्या होगा? ॥ ८ ॥ यस्य बाहू समाश्रित्य वयं सर्वे महात्मनः । मन्यामहे जितानाजौ परान् प्राप्तां च मेदिनीम् ॥ ९ ॥ ‘जिस महापराक्रमी अर्जुनके बाहुबलका आश्रय लेकर हम संग्राममें शत्रुओंको पराजित और इस पृथ्वीको अपने अधिकारमें आयी हुई समझते हैं ॥ ९ ॥ यस्य प्रभावान्न मया सभामध्ये धनुष्मतः । नीता लोकममुं सर्वे धार्तराष्ट्राः ससौबलाः ॥ १० ॥ ‘जिस धनुर्धर वीरके प्रभावसे प्रभावित होकर मैंने सभामें शकुनिसहित समस्त धृतराष्ट्रपुत्रोंको तुरंत ही यमलोक नहीं भेज दिया ॥ १० ॥ ते वयं बाहुबलिनः क्रोधमुत्थितमात्मनः । सहामहे भवन्मूलं वासुदेवेन पालिताः ॥ ११ ॥ ‘हम सब लोग बाहुबलसे सम्पन्न हैं और भगवान् वासुदेव हमारे रक्षक हैं तो भी हम आपके कारण अपने उठे हुए क्रोधको चुपचाप सह लेते हैं ॥ ११ ॥ वयं हि सह कृष्णेन हत्वा कर्णमुखान् परान् । स्वबाहुविजितां कृत्स्नां प्रशासैम वसुन्धराम् ॥ १२ ॥ ‘भगवान् श्रीकृष्णके साथ हमलोग कर्ण आदि शत्रुओंको मारकर अपने बाहुबलसे जीती हुई सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन कर सकते हैं ॥ १२ ॥ भवतो द्यूतदोषेण सर्वे वयमुपप्लुताः । अहीनपौरुषा बाला बलिभिर्बलवत्तराः ॥ १३ ॥

‘आपके जूएके दोषसे हमलोग पुरुषार्थयुक्त होकर भी दीन बन गये हैं और वे मूर्ख दुर्योधन आदि भेंटमें मिले हुए हमारे धनसे सम्पन्न हो इस समय अधिक बलशाली बन गये हैं।। १३ ।।

क्षात्रं धर्मं महाराज त्वमवेक्षितुमर्हसि ।
न हि धर्मो महाराज क्षत्रियस्य वनाश्रयः ॥ १४ ॥
‘महाराज! आप क्षत्रियधर्मकी ओर तो देखिये। इस प्रकार वनमें रहना कदापि क्षत्रियोंका धर्म नहीं है ।। १४ ।।

राज्यमेव परं धर्मं क्षत्रियस्य विदुर्बुधाः ।
स क्षत्रधर्मविद् राजा मा धर्म्यान्नीनशः पथः ॥ १५ ॥
‘विद्वानोंने राज्यको ही क्षत्रियका सर्वोत्तम धर्म माना है। आप क्षत्रियधर्मके ज्ञाता नरेश हैं। धर्मके मार्गसे विचलित न होइये ।। १५ ।।

प्राग् द्वादशसमा राजन् धार्तराष्ट्रान् निहन्महि ।
निवर्त्य च वनात् पार्थमानाय्य च जनार्दनम् ॥ १६ ॥
‘राजन्! हमलोग बारह वर्ष बीतनेके पहले ही अर्जुनको वनसे लौटाकर और भगवान् श्रीकृष्णको बुलाकर धृतराष्ट्रके पुत्रोंका संहार कर सकते हैं ।। १६ ।।

व्यूढानीकान् महाराज जवेनैव महामते ।
धार्तराष्ट्रानमुं लोकं गमयामि विशाम्पते ॥ १७ ॥
सर्वानहं हनिष्यामि धार्तराष्ट्रान् ससौबलान् ।
दुर्योधनं च कर्णं च यो वान्यः प्रतियोत्स्यते ॥ १८ ॥
‘महाराज! महामते! धृतराष्ट्रके पुत्र कितनी ही सेनाओंकी मोर्चाबन्दी क्यों न कर लें, हम उन्हें शीघ्र यमलोकका पथिक बनाकर ही छोड़ेंगे। मैं स्वयं ही शकुनिसहित समस्त धृतराष्ट्रपुत्रोंको मार डालूँगा। दुर्योधन, कर्ण अथवा दूसरा जो कोई योद्धा मेरा सामना करेगा, उसे भी अवश्य मारूँगा ।। १७-१८ ।।

मया प्रशमिते पश्चात् त्वमेष्यसि वनात् पुनः ।
एवं कृते न ते दोषा भविष्यन्ति विशाम्पते ॥ १९ ॥
‘मेरे द्वारा शत्रुओंका संहार हो जानेपर आप फिर तेरह वर्षके बाद वनसे चले आइयेगा। प्रजानाथ! ऐसा करनेपर आपको दोष नहीं लगेगा ।। १९ ।।

यज्ञैश्च विविधैस्तात कृतं पापमरिंदम ।
अवधूय महाराज गच्छेम स्वर्गमुत्तमम् ॥ २० ॥
‘तात! शत्रुदमन! महाराज! हम नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करके अपने किये हुए पापको धो-बहाकर उत्तम स्वर्गलोकमें चलेंगे ।। २० ।।

एवमेतद् भवेद् राजन् यदि राजा न बालिशः ।
अस्माकं दीर्घसूत्रः स्याद् भवान् धर्मपरायणः ॥ २१ ॥

'राजन्! यदि ऐसा हो तो आप हमारे धर्मपरायण राजा अविवेकी और दीर्घसूत्री नहीं समझे जायेंगे ॥ २१ ॥ निकृत्या निकृतिप्रज्ञा हन्तव्या इति निश्चयः । न हि नैकृतिकं हत्वा निकृत्या पापमुच्यते ॥ २२ ॥ 'शठता करने या जाननेवाले शत्रुओंको शठताके द्वारा ही मारना चाहिये, यह एक सिद्धान्त है। जो स्वयं दूसरोंपर छल-कपटका प्रयोग करता है, उसे छलसे भी मार डालनेमें पाप नहीं बताया गया है ॥ २२ ॥ तथा भारत धर्मेषु धर्मज्ञैरिह दृश्यते । अहोरात्रं महाराज तुल्यं संवत्सरेण ह ॥ २३ ॥ 'भरतवंशी महाराज! धर्मशास्त्रमें इसी प्रकार धर्मपरायण धर्मज्ञ पुरुषोंद्वारा यहाँ एक दिन-रात एक संवत्सरके समान देखा जाता है ॥ २३ ॥ तथैव वेदवचनं श्रूयते नित्यदा विभो । संवत्सरो महाराज पूर्णो भवति कृच्छ्रतः ॥ २४ ॥ 'प्रभो! महाराज! इसी प्रकार सदा यह वैदिक वचन सुना जाता है कि कृच्छ्रव्रतके अनुष्ठानसे एक वर्षकी पूर्ति हो जाती है ॥ २४ ॥ यदि वेदाः प्रमाणान्ते दिवसादूध्वर्मच्युत । त्रयोदश समाः कालो ज्ञायतां परिनिष्ठितः ॥ २५ ॥ 'अच्युत! यदि आप वेदको प्रमाण मानते हैं तो तेरहवें दिनके बाद ही तेरह वर्षोंका समय बीत गया, ऐसा समझ लीजिये ॥ २५ ॥ कालो दुर्योधनं हन्तुं सानुबन्धमरिंदम । एकाग्रां पृथिवीं सर्वां पुरा राजन् करोति सः ॥ २६ ॥ 'शत्रुदमन! यह दुर्योधनको उसके सगे-सम्बन्धियों-सहित मार डालनेका अवसर आया है। राजन्! वह सारी पृथ्वीको जबतक एक सूत्रमें बाँध ले, उसके पहले ही यह कार्य कर लेना चाहिये ॥ २६ ॥ द्यूतप्रियेण राजेन्द्र तथा तद् भवता कृतम् । प्रायेणाज्ञातचर्यायां वयं सर्वे निपातिताः ॥ २७ ॥ 'राजेन्द्र! जूएके खेलमें आसक्त होकर आपने ऐसा अनर्थ कर डाला कि प्रायः हम सब लोगोंको अज्ञातवासके संकटमें लाकर पटक दिया ॥ २७ ॥ न तं देशं प्रपश्यामि यत्र सोऽस्मान् सुदुर्जनः । न विज्ञास्यति दुष्टात्मा चारैरिति सुयोधनः ॥ २८ ॥ अधिगम्य च सर्वान् नो वनवासमिमं ततः । प्रव्राजयिष्यति पुनर्निंकृत्याधमपूरुषः ॥ २९ ॥

‘मैं ऐसा कोई देश या स्थान नहीं देखता, जहाँ अत्यन्त दुष्टचित्त, दुरात्मा दुर्योधन अपने गुप्तचरोंद्वारा हमलोगोंका पता न लगा ले। वह नीच नराधम हम सब लोगोंका गुप्त निवास जान लेनेपर पुनः अपनी कपटपूर्ण नीतिद्वारा हमें इस वनवासमें ही डाल देगा ।। २८-२९ ।।

यद्यस्मानभिगच्छेत पापः स हि कथंचन ।
अज्ञातचर्यामुत्तीर्णान् दृष्ट्वा च पुनराह्वयेत् ।। ३० ।।
‘यदि वह पापी किसी प्रकार यह समझ ले कि हम अज्ञातवासकी अवधि पार कर गये हैं, तो वह उस दशामें हमें देखकर पुनः आपको ही जूआ खेलनेके लिये बुलायेगा ।। ३० ।।

द्यूतेन ते महाराज पुनर्धूर्तमवर्तत ।
भवांश्च पुनराहूतो द्यूते नैवापनेष्यति ।। ३१ ।।
‘महाराज! आप एक बार जूएके संकटसे बचकर दुबारा द्यूतक्रीडामें प्रवृत्त हो गये थे, अतः मैं समझता हूँ, यदि पुनः आपका द्यूतके लिये आवाहन हो तो आप उससे पीछे न हटेंगे ।। ३१ ।।

स तथाक्षेषु कुशलो निश्चितो गतचेतनः ।
चरिष्यसि महाराज वनेषु वसतीः पुनः ।। ३२ ।।
‘नरेश्वर! वह विवेकशून्य शकुनि जूआ फेंकनेकी कलामें कितना कुशल है, यह आप अच्छी तरह जानते हैं, फिर तो उसमें हारकर आप पुनः वनवास ही भोगेंगे ।।

यद्यस्मान् सुमहाराज कृपणान् कर्तुमर्हसि ।
यावज्जीवमवेक्षस्व वेदधर्मांश्च कृत्स्नशः ।। ३३ ।।
‘महाराज! यदि आप हमें दीन, हीन, कृपण ही बनाना चाहते हैं तो जबतक जीवन है, तबतक सम्पूर्ण वेदोक्त धर्मोंके पालनपर ही दृष्टि रखिये ।। ३३ ।।

निकृत्या निकृतिप्रज्ञो हन्तव्य इति निश्चयः ।
अनुज्ञातस्त्वया गत्वा यावच्छक्ति सुयोधनम् ।। ३४ ।।
यथैव कक्षमुत्सृष्टो दहेदनिलसारथिः ।
हनिष्यामि तथा मन्दमनुजानातु मे भवान् ।। ३५ ।।
‘अपना निश्चय तो यही है कि कपटीको कपटसे ही मारना चाहिये। यदि आपकी आज्ञा हो तो जैसे तृणकी राशिमें डाली हुई आग हवाका सहारा पाकर उसे भस्म कर डालती है, वैसे ही मैं जाकर अपनी शक्तिके अनुसार उस मूढ़ दुर्योधनका वध कर डालूँ, अतः आप मुझे आज्ञा दीजिये ।। ३४-३५ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवं ब्रुवाणं भीमं तु धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
उवाच सान्त्वयन् राजा मूर्ध्न्युपाघ्राय पाण्डवम् ।। ३६ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! धर्मराज राजा युधिष्ठिरने उपर्युक्त बातें कहनेवाले पाण्डुनन्दन भीमसेनका मस्तक सूँघकर उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा— ।। ३६ ।।

असंशयं महाबाहो हनिष्यसि सुयोधनम् । वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं सह गाण्डीवधन्वना ।। ३७ ।। 'महाबाहो! इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि तुम तेरहवें वर्षके बाद गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ जाकर युद्धमें सुयोधनको मार डालोगे ।। ३७ ।।

यत् त्वामाभाषसे पार्थ प्राप्तः काल इति प्रभो । अनृतं नोत्सहे वक्तुं न ह्येतन्मम विद्यते ।। ३८ ।। 'किंतु शक्तिशाली वीर कुन्तीकुमार! तुम जो यह कहते हो कि सुयोधनके वधका अवसर आ गया है, वह ठीक नहीं है। मैं झूठ नहीं बोल सकता, मुझमें यह आदत नहीं है ।। ३८ ।।

अन्तरेणापि कौन्तेय निकृतिं पापनिश्चयम् । हन्ता त्वमसि दुर्धर्ष सानुबन्धं सुयोधनम् ।। ३९ ।। 'कुन्तीनन्दन! तुम दुर्धर्ष वीर हो, छल-कपटका आश्रय लिये बिना भी पापपूर्ण विचार रखनेवाले सुयोधनको सगे-सम्बन्धियोंसहित नष्ट कर सकते हो' ।। ३९ ।।

एवं ब्रुवति भीमं तु धर्मराजे युधिष्ठिरे । आजगाम महाभागो बृहदश्वो महर्षिः ।। ४० ।। धर्मराज युधिष्ठिर जब भीमसेनसे ऐसी बातें कह रहे थे, उसी समय महाभाग महर्षि बृहदश्व वहाँ आ पहुँचे ।। ४० ।।

तमभिप्रेक्ष्य धर्मात्मा सम्प्राप्तं धर्मचारिणम् । शास्त्रवन्मधुपर्केण पूजयामास धर्मराट् ।। ४१ ।। धर्मात्मा धर्मराज युधिष्ठिरने धर्मानुष्ठान करनेवाले उन महात्माको आया देख शास्त्रीय विधिके अनुसार मधुपर्कद्वारा उनका पूजन किया ।। ४१ ।।

आश्वस्तं चैनमासीनमुपासीनो युधिष्ठिरः । अभिप्रेक्ष्य महाबाहुः कृपणं बह्वभाषत ।। ४२ ।। जब वे आसनपर बैठकर थकावटसे निवृत्त हो चुके अर्थात् विश्राम कर चुके, तब महाबाहु युधिष्ठिर उनके पास ही बैठकर उन्हींकी ओर देखते हुए अत्यन्त दीनतापूर्ण वचन बोले— ।। ४२ ।।

अक्षद्यूते च भगवन् धनं राज्यं च मे हृतम् । आहूय निकृतिप्रज्ञैः कितवैरक्षकोविदैः ।। ४३ ।। 'भगवन्! पासे फेंककर खेले जानेवाले जूएके लिये मुझे बुलाकर छल-कपटमें कुशल तथा पासा डालनेकी कलामें निपुण धूर्त जुआरियोंने मेरे सारे धन तथा राज्यका अपहरण

कर लिया है ।। ४३ ।। अनक्षज्ञस्य हि सतो निकृत्या पापनिश्चयैः । भार्या च मे सभां नीता प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ।। ४४ ।। ‘मैं जूएका मर्मज्ञ नहीं हूँ। फिर भी पापपूर्ण विचार रखनेवाले उन दुष्टोंके द्वारा मेरी प्राणोंसे भी अधिक गौरवशालिनी पत्नी द्रौपदी केश पकड़कर भरी सभामें लायी गयी ।। ४४ ।। पुनर्द्यूतेन मां जित्वा वनवासं सुदारुणम् । प्राव्राजयन् महारण्यमजिनैः परिवारितम् ।। ४५ ।। ‘एक बार जूएके संकटसे बच जानेपर पुनः द्यूतका आयोजन करके उन्होंने मुझे जीत लिया और मृगचर्म पहनाकर वनवासका अत्यन्त दारुण कष्ट भोगनेके लिये इस महान् वनमें निर्वासित कर दिया ।। ४५ ।। अहं वने दुर्वसतीर्वसन् परमदुःखितः । अक्षद्यूताधिकारे च गिरः शृण्वन् सुदारुणाः ।। ४६ ।। आर्तानां सुहृदां वाचो द्यूतप्रभृति शंसताम् । अहं हृदि श्रिताः स्मृत्वा सर्वरात्रीर्विचिन्तयन् ।। ४७ ।। ‘मैं अत्यन्त दुःखी हो बड़ी कठिनाईसे वनमें निवास करता हूँ। जिस सभामें जूआ खेलनेका आयोजन किया गया था, वहाँ प्रतिपक्षी पुरुषोंके मुखसे मुझे अत्यन्त कठोर बातें सुननी पड़ी हैं। इसके सिवा द्यूत आदि कार्योंका उल्लेख करते हुए मेरे दुःखातुर सुहृदोंने जो संतापसूचक बातें कही हैं, वे सब मेरे हृदयमें स्थित हैं। मैं उन सब बातोंको याद करके सारी रात चिन्तामें निमग्न रहता हूँ ।। ४६-४७ ।। यस्मिंश्चैव समस्तानां प्राणा गाण्डीवधन्वनि । विना महात्मना तेन गतसत्त्व इवाभवम् ।। ४८ ।। ‘इधर जिस गाण्डीव धनुषधारी अर्जुनमें हम सबके प्राण बसते हैं, वह भी हमसे अलग है। महात्मा अर्जुनके बिना मैं निष्प्राण-सा हो गया हूँ ।। ४८ ।। कदा द्रक्ष्यामि बीभत्सुं कृतास्त्रं पुनरागतम् । प्रियवादिनमक्षुद्रं दयायुक्तमतन्द्रितः ।। ४९ ।। ‘मैं सदा निरालस्यभावसे यही सोचा करता हूँ कि श्रेष्ठ, दयालु और प्रियवादी अर्जुन कब अस्त्रविद्या सीखकर फिर यहाँ आयेगा और मैं उसे भर आँख देखूँगा ।। ४९ ।। अस्ति राजा मया कश्चिदल्पभाग्यतरो भुवि । भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुतपूर्वोऽपि वा क्वचित् । न मत्तो दुःखिततरः पुमानस्तीति मे मतिः ।। ५० ।। ‘क्या मेरे-जैसा अत्यन्त भाग्यहीन राजा इस पृथ्वीपर कोई दूसरा भी है? अथवा आपने कहीं मेरे-जैसे किसी राजाको पहले कभी देखा या सुना है। मेरा तो यह विश्वास है कि

मुझसे बढ़कर अत्यन्त दुःखी मनुष्य दूसरा कोई नहीं है' ।। ५० ।।

बृहदश्व उवाच

यद् ब्रवीषि महाराज न मत्तो विद्यते क्वचित् । अल्पभाग्यतरः कश्चित् पुमानस्तीति पाण्डव ।। ५१ ।। अत्र ते वर्णयिष्यामि यदि शुश्रूषसेऽनघ । यस्त्वत्तो दुःखिततरो राजाऽऽसीत् पृथिवीपते ।। ५२ ।। **बृहदश्व बोले—**महाराज पाण्डुनन्दन! तुम जो यह कह रहे हो कि मुझसे बढ़कर अत्यन्त भाग्यहीन कोई पुरुष कहीं भी नहीं है, उसके विषयमें मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा। अनघ! पृथिवीपते! यदि तुम सुनना चाहो तो मैं उस व्यक्तिका परिचय दूँगा, जो इस पृथिवीपर तुमसे भी अधिक दुःखी राजा था ।। ५१-५२ ।।

वैशम्पायन उवाच

अथैनमब्रवीद् राजा ब्रवीतु भगवानिति । इमामवस्थां सम्प्राप्तं श्रोतुमिच्छामि पार्थिवम् ।। ५३ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिरने मुनिसे कहा—'भगवन्! अवश्य कहिये। जो मेरी-जैसी संकटपूर्ण स्थितिमें पहुँचा हुआ हो, उस राजाका चरित्र मैं सुनना चाहता हूँ' ।। ५३ ।।

बृहदश्व उवाच

शृणु राजन्नवहितः सह भ्रातृभिरच्युत । यस्त्वत्तो दुःखिततरो राजाऽऽसीत् पृथिवीपते ।। ५४ ।। **बृहदश्वने कहा—**राजन्! अपने धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले भूपाल! तुम भाइयोंसहित सावधान होकर सुनो। इस पृथिवीपर जो तुमसे भी अधिक दुःखी राजा था, उसका परिचय देता हूँ ।। ५४ ।।

निषधेषु महीपालो वीरसेन इति श्रुतः । तस्य पुत्रोऽभवन्नाम्ना नलो धर्मार्थकोविदः ।। ५५ ।। निषधदेशमें वीरसेन नामसे प्रसिद्ध एक भूपाल हो गये हैं। उन्हींके पुत्रका नाम नल था। जो धर्म और अर्थके तत्त्वज्ञ थे ।। ५५ ।।

स निकृत्या जितो राजा पुष्करेणेति नः श्रुतम् । वनवासं सुदुःखार्तो भार्यया न्यवसत् सह ।। ५६ ।। हमने सुना है कि राजा नलको उनके भाई पुष्करने छलसे ही जूएके द्वारा जीत लिया था और वे अत्यन्त दुःखसे आतुर हो अपनी पत्नीके साथ वनवासका दुःख भोगने लगे थे ।। ५६ ।।

न तस्य दासा न रथो न भ्राता न च बान्धवाः । वने निवसतौ राजञ्छिष्यन्ते स्म कदाचन ॥ ५७ ॥ राजन्! उनके साथ न सेवक थे न रथ, न भाई थे न बान्धव। वनमें रहते समय उनके पास ये वस्तुएँ कदापि शेष नहीं थीं ॥ ५७ ॥ भवान् हि संवृतो वीरैर्भ्रातृभिर्देवसम्मितैः । ब्रह्मकल्पैर्द्विजाग्र्यैश्च तस्मान्नार्हसि शोचितुम् ॥ ५८ ॥ तुम तो देवतुल्य पराक्रमी वीर भाइयोंसे घिरे हुए हो। ब्रह्माजीके समान तेजस्वी श्रेष्ठ ब्राह्मण तुम्हारे चारों ओर बैठे हुए हैं। अतः तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ॥

युधिष्ठिर उवाच

विस्तरेणाहमिच्छामि नलस्य सुमहात्मनः । चरितं वदतां श्रेष्ठ तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥ ५९ ॥ युधिष्ठिर बोले—वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुने! मैं उत्तम महामना राजा नलका चरित्र विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। आप मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ ५९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें बृहदश्वयुधिष्ठिरसंवादविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥

नल-दमयन्तीके गुणोंका वर्णन, उनका परस्पर अनुराग और हंसका दमयन्ती और नलको एक-दूसरेके संदेश सुनाना

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त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

नल-दमयन्तीके गुणोंका वर्णन, उनका परस्पर अनुराग और हंसका दमयन्ती और नलको एक-दूसरेके संदेश सुनाना

बृहदश्व उवाच

आसीद् राजा नलो नाम वीरसेनसुतो बली ।
उपपन्नो गुणैरिष्टै रूपवानश्वकोविदः ॥ १ ॥
**बृहदश्वने कहा—**धर्मराज! निषधदेशमें वीरसेनके पुत्र नल नामसे प्रसिद्ध एक बलवान् राजा हो गये हैं। वे उत्तम गुणोंसे सम्पन्न, रूपवान् और अश्वसंचालनकी कलामें कुशल थे ॥ १ ॥

अतिष्ठन्मनुजेन्द्राणां मूर्ध्नि देवपतिर्यथा ।
उपर्युपरि सर्वेषामादित्य इव तेजसा ॥ २ ॥
ब्रह्मण्यो वेदविच्छूरो निषधेषु महीपतिः ।
अक्षप्रियः सत्यवादी महानक्षौहिणीपतिः ॥ ३ ॥
जैसे देवराज इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके शिरमौर हैं, उसी प्रकार राजा नलका स्थान समस्त राजाओंके ऊपर था। वे तेजमें भगवान् सूर्यके समान सर्वोपरि थे। निषधदेशके महाराज नल बड़े ब्राह्मणभक्त, वेदवेत्ता, शूरवीर, द्यूत-क्रीड़ाके प्रेमी, सत्यवादी, महान् और एक अक्षौहिणी सेनाके स्वामी थे ॥ २-३ ॥

ईप्सितो वरनारीणामुदारः संयतेन्द्रियः ।
रक्षिता धन्विनां श्रेष्ठः साक्षादिव मनुः स्वयम् ॥ ४ ॥
वे श्रेष्ठ स्त्रियोंको प्रिय थे और उदार, जितेन्द्रिय, प्रजाजनोंके रक्षक तथा साक्षात् मनुके समान धनुर्धरोंमें उत्तम थे ॥ ४ ॥

तथैवासीद् विदर्भेषु भीमो भीमपराक्रमः ।
शूरः सर्वगुणैर्युक्तः प्रजाकामः स चाप्रजः ॥ ५ ॥
इसी प्रकार उन दिनों विदर्भदेशमें भयानक पराक्रमी भीम नामक राजा राज्य करते थे। वे शूरवीर और सर्व-सद्गुणसम्पन्न थे। उन्हें कोई संतान नहीं थी। अतः संतानप्राप्तिकी कामना उनके हृदयमें सदा बनी रहती थी ॥

स प्रजार्थे परं यत्नमकरोत् सुसमाहितः ।
तमभ्यगच्छद् ब्रह्मर्षिर्दमनो नाम भारत ॥ ६ ॥

भारत! राजा भीमने अत्यन्त एकाग्रचित्त होकर संतानप्राप्तिके लिये महान् प्रयत्न किया। उन्हीं दिनों उनके यहाँ दमन नामक ब्रह्मर्षि पधारे ।। ६ ।।

तं स भीमः प्रजाकामस्तोषयामास धर्मवित् ।
महिष्या सह राजेन्द्र सत्कारेण सुवर्चसम् ।। ७ ।।
तस्मै प्रसन्नो दमनः सभार्याय वरं ददौ ।
कन्यारत्नं कुमारांश्च त्रीनुदारान् महायशाः ।। ८ ।।
राजेन्द्र! धर्मज्ञ तथा संतानकी इच्छावाले उस भीमने अपनी रानीसहित उन महातेजस्वी मुनिको पूर्ण सत्कार करके संतुष्ट किया। महायशस्वी दमन मुनिने प्रसन्न होकर पत्नीसहित राजा भीमको एक कन्या और तीन उदार पुत्र प्रदान किये ।। ७-८ ।।

दमयन्तीं दमं दान्तं दमनं च सुवर्चसम् ।
उपपन्नान् गुणैः सर्वैर्भीमान् भीमपराक्रमान् ।। ९ ।।
कन्याका नाम था दमयन्ती और पुत्रोंके नाम थे—दम, दान्त तथा दमन। ये सभी बड़े तेजस्वी थे। राजाके तीनों पुत्र गुणसम्पन्न, भयंकर वीर और भयानक पराक्रमी थे ।। ९ ।।

दमयन्ती तु रूपेण तेजसा यशसा श्रिया ।
सौभाग्येन च लोकेषु यशः प्राप सुमध्यमा ।। १० ।।
सुन्दर कटिप्रदेशवाली दमयन्ती रूप, तेज, यश, श्री और सौभाग्यके द्वारा तीनों लोकोंमें विख्यात यशस्विनी हुई ।। १० ।।

अथ तां वयसि प्राप्ते दासीनां समलंकृताम् ।
शतं शतं सखीनां च पर्युपासच्छचीमिव ।। ११ ।।
जब उसने युवावस्थामें प्रवेश किया, उस समय सौ दासियाँ और सौ सखियाँ वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो सदा उसकी सेवामें उपस्थित रहती थीं। मानो देवांगनाएँ शचीकी उपासना करती हों ।। ११ ।।

तत्र स्म राजते भैमी सर्वाभरणभूषिता ।
सखीमध्येऽनवद्याङ्गी विद्युत्सौदामनी यथा ।। १२ ।।
अनिन्द सुन्दर अंगोंवाली भीमकुमारी दमयन्ती सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो सखियोंकी मण्डलीमें वैसी ही शोभा पाती थी, जैसे मेघमालाके बीच विद्युत् प्रकाशित हो रही हो ।। १२ ।।

अतीव रूपसम्पन्ना श्रीरिवायतलोचना ।
न देवेषु न यक्षेषु तादृग् रूपवती क्वचित् ।। १३ ।।
वह लक्ष्मीके समान अत्यन्त सुन्दर रूपसे सुशोभित थी। उसके नेत्र विशाल थे। देवताओं और यक्षोंमें भी वैसी सुन्दरी कन्या कहीं देखनेमें नहीं आती थी ।। १३ ।।

मानुषेष्वपि चान्येषु दृष्टपूर्वाथवा श्रुता ।
चित्तप्रसादनी बाला देवानामपि सुन्दरी ।। १४ ।।

मनुष्यों तथा अन्य वर्गके लोगोंमें भी वैसी सुन्दरी पहले न तो कभी देखी गयी थी और न सुननेमें ही आयी थी। उस बालाको देखते ही चित्त प्रसन्न हो जाता था। वह देववर्गमें भी श्रेष्ठ सुन्दरी समझी जाती थी ।। १४ ।।

नलश्च नरशार्दूलो लोकेष्वप्रतिमो भुवि ।
कन्दर्प इव रूपेण मूर्तिमानभवत् स्वयम् ।। १५ ।।
नरश्रेष्ठ नल भी इस भूतलके मनुष्योंमें अनुपम सुन्दर थे। उनका रूप देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो नलके आकारमें स्वयं मूर्तिमान् कामदेव ही उत्पन्न हुआ हो ।। १५ ।।

तस्याः समीपे तु नलं प्रशशंसुः कुतूहलात् ।
नैषधस्य समीपे तु दमयन्तीं पुनः पुनः ।। १६ ।।
लोग कौतूहलवश दमयन्तीके समीप नलकी प्रशंसा करते थे और निषधराज नलके निकट बार-बार दमयन्तीके सौन्दर्यकी सराहना किया करते थे ।। १६ ।।

तयोरदृष्टः कामोऽभूच्छृण्वतोः सततं गुणान् ।
अन्योन्यं प्रति कौन्तेय स व्यवर्धत हृच्छयः ।। १७ ।।
कुन्तीनन्दन! इस प्रकार निरन्तर एक-दूसरेके गुणोंको सुनते-सुनते उन दोनोंमें बिना देखे ही परस्पर काम (अनुराग) उत्पन्न हो गया। उनकी वह कामना दिन-दिन बढ़ती ही चली गयी ।। १७ ।।

अशक्नुवन् नलः कामं तदा धारयितुं हृदा ।
अन्तःपुरसमीपस्थे वन आस्ते रहोगतः ।। १८ ।।
जब राजा नल उस कामवेदनाको हृदयके भीतर छिपाये रखनेमें असमर्थ हो गये, तब वे अन्तःपुरके समीपवर्ती उपवनमें जाकर एकान्तमें बैठ गये ।। १८ ।।

स ददर्श ततो हंसान् जातरूपपरिष्कृतान् ।
वने विचरतां तेषामेकं जग्राह पक्षिणम् ।। १९ ।।
इतनेहीमें उनकी दृष्टि कुछ हंसोंपर पड़ी, जो सुवर्णमय पंखोंसे विभूषित थे। वे उसी उपवनमें विचर रहे थे। राजाने उनमेंसे एक हंसको पकड़ लिया ।। १९ ।।

ततोऽन्तरिक्षगो वाचं व्याजहार नलं तदा ।
हन्तव्योऽस्मि न ते राजन् करिष्यामि तव प्रियम् ।। २० ।।
तब आकाशचारी हंसने उस समय नलसे कहा—'राजन्! आप मुझे न मारें। मैं आपका प्रिय कार्य करूँगा ।।

दमयन्तीसकाशे त्वां कथयिष्यामि नैषध ।
यथा त्वदन्यं पुरुषं न सा मंस्यति कर्हिचित् ॥ २१ ॥
‘निषधनरेश! मैं दमयन्तीके निकट आपकी ऐसी प्रशंसा करूँगा, जिससे वह आपके सिवा दूसरे किसी पुरुषको मनमें कभी स्थान न देगी' ॥ २१ ॥

एवमुक्तस्ततो हंसमुत्ससर्ज महीपतिः ।
ते तु हंसाः समुत्पत्य विदर्भानगमंस्ततः ॥ २२ ॥
हंसके ऐसा कहनेपर राजा नलने उसे छोड़ दिया। फिर वे हंस वहाँसे उड़कर विदर्भदेशमें गये ॥ २२ ॥

विदर्भनगरीं गत्वा दमयन्त्यास्तदान्तिके ।
निपेतुस्ते गरुत्मन्तः सा ददर्श च तान् खगान् ॥ २३ ॥
तब विदर्भनगरीमें जाकर वे सभी हंस दमयन्तीके निकट उतरे। दमयन्तीने भी उन अद्भुत पक्षियोंको देखा ॥ २३ ॥

सा तानद्भुतरूपान् वै दृष्ट्वा सखिगणावृता ।
हृष्टा ग्रहीतुं खगमांस्त्वरमाणोपचक्रमे ॥ २४ ॥