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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

तदपास्य धनुश्छिन्नं द्रोणपुत्रो महामनाः ॥ ९० ॥
अन्यत् कार्मुकमादाय भीमं विव्याध पत्रिभिः ।
इसके बाद महामनस्वी द्रोणपुत्रने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा धनुष ले लिया और भीमसेनको अनेक बाण मारे ॥ ९० १/२ ॥

तौ द्रौणिभीमौ समरे पराक्रान्तौ महाबलौ ॥ ९१ ॥
अवर्षतां शरवर्षं वृष्टिमन्ताविवाम्बुदौ ।
अश्वत्थामा और भीमसेन दोनों वीर महान् बलवान् एवं पराक्रमी थे। वे समरभूमिमें वर्षा करनेवाले दो बादलोंके समान परस्पर बाणोंकी बौछार करने लगे ॥

भीमनामाङ्किता बाणाः स्वर्णपुङ्खाः शिलाशिताः ॥ ९२ ॥
द्रौणिं संछादयामासुर्घनौघा इव भास्करम् ।
जैसे मेघोंकी घटाएँ सूर्यको ढक लेती हैं, उसी प्रकार भीमसेनके नामसे अंकित और सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुनहरी पाँखवाले बाणोंने द्रोणपुत्रको आच्छादित कर दिया ॥ ९२ १/२ ॥

तथैव द्रौणिनिर्मुक्तैर्भीमः संनतपर्वभिः ॥ ९३ ॥
अवाकीर्यत स क्षिप्रं शरैः शतसहस्रशः ।
इसी तरह अश्वत्थामाके छोड़े हुए झुकी हुई गाँठवाले लाखों बाणोंसे भीमसेन भी तत्काल ढक गये ॥

स च्छाद्यमानः समरे द्रौणिना रणशालिना ॥ ९४ ॥
न विव्यथे महाराज तदद्भुतमिवाभवत् ।
महाराज! संग्राममें शोभा पानेवाले अश्वत्थामाके द्वारा समरभूमिमें ढके जानेपर भी भीमसेनको तनिक भी व्यथा नहीं हुई, वह अद्भुत-सी बात थी ॥ ९४ १/२ ॥

ततो भीमो महाबाहुः कार्तस्वरविभूषितान् ॥ ९५ ॥
नाराचान् दश सम्प्रैषीद् यमदण्डनिभाञ्छितान् ।
तदनन्तर महाबाहु भीमसेनने सुवर्णभूषित एवं यमदण्डके समान भयंकर दस तीखे नाराच अश्वत्थामापर चलाये ॥

ते जत्रुदेशमासाद्य द्रोणपुत्रस्य मारिष ॥ ९६ ॥
निर्भिद्य विविशुस्तूर्णं वल्मीकमिव पन्नगाः ।
माननीय नरेश! जैसे सर्प तुरंत ही बाँबीमें घुस जाते हैं, उसी प्रकार वे बाण द्रोणपुत्रके गलेकी हँसलीको छेदकर भीतर समा गये ॥ ९६ १/२ ॥

सोऽतिविद्धो भृशं द्रौणिः पाण्डवेन महात्मना ॥ ९७ ॥
ध्वजयष्टिं समासाद्य न्यमीलयत लोचने ।
महात्मा पाण्डुपुत्रके बाणोंसे अत्यन्त घायल हुए अश्वत्थामाने ध्वजदण्ड थामकर नेत्र बंद कर लिये ॥

स मुहूर्तात् पुन: संज्ञां लब्ध्वा द्रौणिर्नराधिप ।। ९८ ।। क्रोधं परममातस्थौ समरे रुधिरोक्षित: । नरेश्वर! दो ही घड़ीमें पुन: सचेत हो खूनसे लथपथ हुए अश्वत्थामाने उस समरांगणमें अत्यन्त क्रोध प्रकट किया ।। ९८ १/२ ।। दृढं सोऽभिहतस्तेन पाण्डवेन महात्मना ।। ९९ ।। वेगं चक्रे महाबाहुर्भीमसेनरथं प्रति । महामना पाण्डुपुत्रने उसे गहरी चोट पहुँचायी थी। अत: महाबाहु अश्वत्थामाने भीमसेनके रथपर ही बड़े वेगसे आक्रमण किया ।। ९९ १/२ ।। तत आकर्णपूर्णानां शराणां तिग्मतेजसाम् ।। १०० ।। शतमाशीविषाभानां प्रेषयामास भारत । भारत! उसने धनुषको कानतक खींचकर प्रचण्ड तेजसे युक्त और विषैले सर्पोंके समान भयंकर सौ बाण भीमसेनपर चलाये ।। १०० १/२ ।। भीमोऽपि समरश्लाघी तस्य वीर्यमचिन्तयन् ।। १०१ ।। तूर्णं प्रासृजदुग्राणि शरवर्षाणि पाण्डव: । युद्धकी स्पृहा रखनेवाले पाण्डुकुमार भीमसेन भी उसके इस पराक्रमकी कोई परवा न करते हुए तुरंत ही उसपर भयंकर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ।। ततो द्रौणिर्महाराज छित्त्वाश्य विशिखैर्धनु: ।। १०२ ।। आजघानोरसि क्रुद्ध: पाण्डवं निशितै: शरै: । महाराज! तब अश्वत्थामाने कुपित हो बाणोंद्वारा भीमसेनके धनुषको काटकर उन पाण्डुपुत्रकी छातीमें पैने बाणोंका प्रहार किया ।। १०२ १/२ ।। ततोऽन्यद् धनुरादाय भीमसेनो ह्यमर्षण: ।। १०३ ।। विव्याध निशितैर्बाणैर्द्रौणिं पञ्चभिराहवे । तब अमर्षमें भरे हुए भीमसेनने दूसरा धनुष लेकर युद्धस्थलमें पाँच पैने बाणोंसे द्रोणपुत्रको घायल कर दिया ।। १०३ १/२ ।। जीमूताविव घर्मान्ते तौ शरौघप्रवर्षिणौ ।। १०४ ।। अन्योन्यक्रोधताम्राक्षौ छादयामासतुर्युधि । वे दोनों क्रोधसे लाल आँखें करके बरसातके दो बादलोंके समान बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए एक-दूसरेको आच्छादित करने लगे ।। १०४ १/२ ।। तलशब्दैस्ततो घोरैस्त्रासयन्तौ परस्परम् ।। १०५ ।। अयुध्येतां सुसंरब्धौ कृतप्रतिकृतैषिणौ ।

फिर ताल ठोंकनेकी भयंकर आवाजसे परस्पर त्रास उत्पन्न करते हुए वे दोनों योद्धा बड़े रोषसे युद्ध करने लगे। दोनों ही एक-दूसरेके प्रहारका प्रतीकार करना चाहते थे ॥ १०५ ॥
३ ॥
ततो विस्फार्य सुमहच्चापं रुक्मविभूषितम् ॥ १०६ ॥
भीमं प्रैक्षत स द्रौणिः शरानस्यन्तमन्तिकात् ।
शरद्यहर्मध्यगतो दीप्तार्चिरिव भास्करः ॥ १०७ ॥
तत्पश्चात् सुवर्णभूषित विशाल धनुषको खींचकर निकटसे बाणोंकी वर्षा करते हुए भीमसेनकी ओर अश्वत्थामाने देखा। वह शरद्-ऋतुके मध्याह्नकालमें प्रचण्ड किरणोंवाले सूर्यदेवके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ १०६-१०७ ॥
आददानस्य विशिखान् संदधानस्य चाशुगान् ।
विकर्षतो मुञ्चतश्च नान्तरं ददृशुर्जनाः ॥ १०८ ॥
वह कब बाण लेता, कब उन्हें धनुषपर रखता, कब प्रत्यंचा खींचता और कब उन्हें छोड़ता था तथा इन कार्योंमें कितना अन्तर पड़ता था, यह सब श्रद्धालोग नहीं देख पाते थे ॥ १०८ ॥
अलातचक्रप्रतिमं तस्य मण्डलमायुधम् ।
द्रौणेरासीन्महाराज बाणान् विसृजतस्तदा ॥ १०९ ॥
महाराज! बाण छोड़ते समय अश्वत्थामाका धनुष अलातचक्रके समान मण्डलाकार दिखायी देता था ॥
धनुश्च्युताः शरास्तस्य शतशोऽथ सहस्रशः ।
आकाशे प्रत्यदृश्यन्त शलभानामिवार्यतीः ॥ ११० ॥
उसके धनुषसे छूटे हुए सैकड़ों और हजारों बाण आकाशमें टिड्डी-दलोंके समान दिखायी देते थे ॥ ११० ॥
ते तु द्रौणिविनिर्मुक्ताः शरा हेमविभूषिताः ।
अजस्रमन्वकीर्यन्त घोरा भीमरथं प्रति ॥ १११ ॥
अश्वत्थामाके छोड़े हुए सुवर्णभूषित भयंकर बाण भीमसेनके रथपर लगातार गिरने लगे ॥ १११ ॥
तत्राद्भुतमपश्याम भीमसेनस्य विक्रमम् ।
बलं वीर्यं प्रभावं च व्यवसायं च भारत ॥ ११२ ॥
भारत! वहाँ हमलोगोंने भीमसेनका अद्भुत पराक्रम, बल, वीर्य, प्रभाव और व्यवसाय देखा ॥ ११२ ॥
तां स मेघादिवोद्भूतां बाणवृष्टिं समन्ततः ।
जलवृष्टिं महाघोरां तपान्त इव चिन्तयन् ॥ ११३ ॥
द्रोणपुत्रवधप्रेप्सुर्भीमो भीमपराक्रमः ।

अमुञ्चच्छरवर्षाणि प्रावृषीव बलाहकः ।। ११४ ।।
वर्षाकालमें मेघसे होनेवाली अत्यन्त घोर जलवृष्टिके समान चारों ओरसे होनेवाली अश्वत्थामाकी उस बाण-वर्षापर विचार करते हुए भयंकर पराक्रमी भीमसेनने द्रोणपुत्रके वधकी इच्छा की और वे बरसातके बादलोंके समान बाणोंकी बौछार करने लगे ।। ११३-११४ ।।

तद् रुक्मपृष्ठं भीमस्य धनुर्घोरं महारणे ।
विकृष्यमाणं विबभौ शक्रचापमिवापरम् ।। ११५ ।।
उस महासमरमें सोनेकी पीठवाला भीमसेनका भयंकर धनुष जब खींचा जाता था, तब दूसरे इन्द्रधनुषके समान प्रतीत होता था ।। ११५ ।।

तस्माच्छराः प्रादुरासन् शतशोऽथ सहस्रशः ।
संछादयन्तः समरे द्रौणिमाहवशोभिनम् ।। ११६ ।।
रणभूमिमें अधिक शोभा पानेवाले द्रोणकुमार अश्वत्थामाको आच्छादित करते हुए सैकड़ों और हजारों बाण भीमसेनके उस धनुषसे प्रकट हो रहे थे ।।

तयोर्विसृजतोरेवं शरजालानि मारिष ।
वायुरप्यन्तरा राजन् नाशक्नोत् प्रतिसर्पितुम् ।। ११७ ।।
माननीय नरेश! इस प्रकार बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए उन दोनोंके बीचसे निकल जानेमें वायु भी असमर्थ हो गयी थी ।। ११७ ।।

तथा द्रौणिर्महाराज शरान् हेमविभूषितान् ।
तैलधौतान् प्रसन्नाग्रान् प्राहिणोद् वधकाङ्क्षया ।। ११८ ।।
महाराज! तदनन्तर अश्वत्थामाने भीमसेनके वधकी इच्छासे तेलमें साफ किये हुए स्वच्छ अग्रभागवाले बहुत-से स्वर्णभूषित बाण चलाये ।। ११८ ।।

तानन्तरिक्षे विशिखैस्त्रिधैककमशातयत् ।
विशेषयन् द्रोणसुतं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।। ११९ ।।
परंतु भीमसेनने अपनी विशेषता स्थापित करते हुए अपने बाणोंद्वारा आकाशमें ही उन बाणोंमेंसे प्रत्येकके तीन-तीन टुकड़े कर डाले और द्रोणपुत्रसे कहा—'खड़ा रह, खड़ा रह' ।। ११९ ।।

पुनश्च शरवर्षाणि घोराण्युग्राणि पाण्डवः ।
व्यसृजद् बलवान् क्रुद्धो द्रोणपुत्रवधेप्सया ।। १२० ।।
फिर कुपित हुए पाण्डुपुत्र बलवान् भीमसेनने द्रोणपुत्रके वधकी इच्छासे उसके ऊपर पुनः घोर एवं उग्र बाण-वर्षा प्रारम्भ कर दी ।। १२० ।।

ततोऽस्त्रमायया तूर्णं शरवृष्टिं निवार्य ताम् ।
धनुश्चिच्छेद भीमस्य द्रोणपुत्रो महास्त्रवित् ।। १२१ ।।
शरैश्चैनं सुबहुभिः क्रुद्धः संख्ये पराभिनत् ।

तब महान् अस्त्रवेत्ता द्रोणपुत्रने अपने अस्त्रोंकी मायासे तुरंत ही उस बाण-वर्षाका निवारण करके भीमसेनका धनुष काट डाला। साथ ही क्रोधमें भरकर उसने युद्धस्थलमें बहुसंख्यक बाणोंद्वारा इन्हें क्षत-विक्षत कर दिया ॥ १२१ १/२ ॥

स छिन्नधन्वा बलवान् रथशक्तिं सुदारुणाम् ॥ १२२ ॥
वेगेनाविध्य चिक्षेप द्रोणपुत्ररथं प्रति ।
धनुष कट जानेपर बलवान् भीमसेनने द्रोणपुत्रके रथपर एक भयंकर रथशक्ति बड़े वेगसे घुमाकर फेंकी ॥

तामापतन्तीं सहसा महोल्काभां शितैः शरैः ॥ १२३ ॥
चिच्छेद समरे द्रौणिर्दर्शयन् पाणिलाघवम् ।
बड़ी भारी उल्काके समान सहसा अपनी ओर आती हुई उस रथशक्तिको अश्वत्थामाने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए समरभूमिमें तीखे बाणोंसे काट डाला ॥ १२३ १/२ ॥

एतस्मिन्नन्तरे भीमो दृढमादाय कार्मुकम् ॥ १२४ ॥
द्रौणिं विव्याध विशिखैः स्मयमानो वृकोदरः ।
इसी बीचमें मुसकराते हुए भीमसेनने एक सुदृढ़ धनुष लेकर अनेक बाणोंसे द्रोणपुत्रको बींध डाला ॥ १२४ १/२ ॥

ततो द्रौणिर्महाराज भीमसेनस्य सारथिम् ॥ १२५ ॥
ललाटे दारयामास शरेणानतपर्वणा ।
महाराज! तब अश्वत्थामाने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे भीमसेनके सारथिका ललाट छेद दिया ॥ १२५ १/२ ॥

सोऽतिविद्धो बलवता द्रोणपुत्रेण सारथिः ॥ १२६ ॥
व्यामोहमगमद् राजन् रश्मीनूत्सृज्य वाजिनाम् ।
राजन्! बलवान् द्रोणपुत्रके द्वारा अत्यन्त घायल किया हुआ सारथि घोड़ोंकी बागडोर छोड़कर मूर्च्छित हो गया ॥ १२६ १/२ ॥

ततोऽश्वाः प्राद्रवंस्तूर्णं मोहिते रथसारथौ ॥ १२७ ॥
भीमसेनस्य राजेन्द्र पश्यतां सर्वधन्विनाम् ।
राजेन्द्र! सारथिके मूर्च्छित हो जानेपर भीमसेनके घोड़े सम्पूर्ण धनुर्धरोंके देखते-देखते तुरंत वहाँसे भाग चले ॥ १२७ १/२ ॥

तं दृष्ट्वा प्रद्रुतैरश्वैरपकृष्टं रणाजिरात् ॥ १२८ ॥
दध्मौ प्रमुदितः शङ्खं बृहन्तमपराजितः ।
भागे हुए घोड़े भीमसेनको समरांगणसे दूर हटा ले गये, यह देखकर विजयी वीर अश्वत्थामाने अत्यन्त प्रसन्न हो अपना विशाल शंख बजाया ॥ १२८ १/२ ॥

ततः सर्वे च पञ्चाला भीमसेनश्च पाण्डवः ॥ १२९ ॥

धृष्टद्युम्नरथं त्यक्त्वा भीताः सम्प्राद्रवन् दिशः।
तब पाण्डुपुत्र भीमसेन और समस्त पांचाल भयभीत हो धृष्टद्युम्नका रथ छोड़कर चारों दिशाओंमें भाग गये ।। १२९ १/२ ।।
तान् प्रभग्नांस्ततो द्रोणिः पृष्ठतो विकिरन् शरान् ।। १३० ।।
अभ्यवर्तत वेगेन कालयन् पाण्डुवाहिनीम्।
उन भागते हुए सैनिकोंपर पीछेसे बाण बिखेरते और पाण्डव-सेनाको खदेड़ते हुए अश्वत्थामाने बड़े वेगसे पीछा किया ।। १३० १/२ ।।
ते वध्यमानाः समरे द्रोणपुत्रेण पार्थिवाः ।। १३१ ।।
द्रोणपुत्रभयाद् राजन् दिशः सर्वाश्च भेजिरे ।। १३२ ।।
राजन्! समरांगणमें द्रोणपुत्रके द्वारा मारे जाते हुए समस्त राजाओंने उसके भयसे भागकर सम्पूर्ण दिशाओंकी शरण ली ।। १३१-१३२ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वण्यश्वत्थामपराक्रमे
द्विशततमोऽध्यायः ।। २०० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें अश्वत्थामाका पराक्रमविषयक दो सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २०० ।।

२०१-

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः

अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना

संजय उवाच

तत् प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
न्यवारयदमेयात्मा द्रोणपुत्रजयेप्सया ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर अमेय आत्मबल-से सम्पन्न कुन्तीकुमार अर्जुनने सेनाको भागती देख द्रोणपुत्रपर विजय पानेकी इच्छासे उसे रोका ॥ १ ॥

ततस्ते सैनिका राजन् नैव तत्रावतस्थिरे ।
संस्थाप्यमाना यत्नेन गोविन्देनार्जुनेन च ॥ २ ॥
नरेश्वर! श्रीकृष्ण और अर्जुनके द्वारा प्रयत्नपूर्वक ठहराये जानेपर भी वे सैनिक वहाँ खड़े न हो सके ॥ २ ॥

एक एव च बीभत्सुः सोमकावयवैः सह ।
मत्स्यैरन्यैश्च संधाय कौरवान् संन्यवर्तत ॥ ३ ॥
अकेले अर्जुन ही सोमकोंकी टुकड़ियों, मत्स्यदेशीय योद्धाओं तथा अन्य लोगोंको साथ लेकर कौरवोंका सामना करनेके लिये लौटे ॥ ३ ॥

ततो द्रुतमतिक्रम्य सिंहलाङ्गूलकेतनम् ।
सव्यसाची महेष्वासमश्वत्थामानमब्रवीत् ॥ ४ ॥
सव्यसाची अर्जुन सिंहकी पूँछके चिह्नवाली ध्वजासे युक्त महाधनुर्धर अश्वत्थामाके पास तुरंत आकर उससे इस प्रकार बोले— ॥ ४ ॥

या शक्तिर्यच्च विज्ञानं यद् वीर्यं यच्च पौरुषम् ।
धार्तराष्ट्रेषु या प्रीतिर्द्वेषोऽस्मासु च यश्च ते ॥ ५ ॥
यच्च भूयोऽस्ति तेजस्ते तत् सर्वं मयि दर्शय ।
स एव द्रोणहन्ता ते दर्पं छेत्स्यति पार्षतः ॥ ६ ॥
‘आचार्यपुत्र! तुममें जो शक्ति, जो विज्ञान, जो बल-पराक्रम, जो पुरुषार्थ, कौरवोंपर जो प्रेम तथा हमलोगोंपर जो तुम्हारा द्वेष हो, साथ ही तुममें जो तेज और प्रभाव हो, वह सब मुझपर दिखाओ। द्रोणाचार्यका वध करनेवाला वह धृष्टद्युम्न ही तुम्हारा सारा घमंड चूर कर देगा ॥ ५-६ ॥

कालानलसमप्रख्यं द्विषतामन्तकोपमम् । समासादय पाञ्चाल्यं मां चापि सहकेशवम् । दर्पं नाशयितास्म्यद्य तवोद्वृत्तस्य संयुगे ॥ ७ ॥ ‘कालाग्निके समान तेजस्वी तथा शत्रुओंके लिये यमराजके समान भयंकर पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नपर तथा श्रीकृष्णसहित मुझपर भी तुम आक्रमण करो। तुम बड़े उद्दण्ड हो रहे हो। आज युद्धमें मैं तुम्हारा सारा घमंड दूर कर दूँगा’ ॥ ७ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

आचार्यपुत्रो मानार्हो बलवांश्चापि संजय । प्रीतिर्धनंजये चास्य प्रियश्चापि महात्मनः ॥ ८ ॥ न भूतपूर्वं बीभत्सोर्वाक्यं परुषमीदृशम् । अथ कस्मात् स कौन्तेयः सखायं रूक्षमुक्तवान् ॥ ९ ॥ धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! आचार्यपुत्र अश्वत्थामा बलवान् और सम्मानके योग्य है। उसका अर्जुनपर प्रेम है और वह भी महात्मा अर्जुनको प्रिय है। अर्जुनका उसके प्रति ऐसा कठोर वचन पहले कभी नहीं सुना गया। फिर उस दिन कुन्तीकुमार अर्जुनने अपने मित्रके प्रति वैसी कठोर बात क्यों कही? ॥ ८-९ ॥

संजय उवाच

युवराजे हते चैव वृद्धक्षत्रे च पौरवे । इष्वस्त्रविधिसम्पन्ने मालवे च सुदर्शने ॥ १० ॥ धृष्टद्युम्ने सात्यकौ च भीमे चापि पराजिते । युधिष्ठिरस्य तैर्वाक्यैर्मर्मण्यपि च घट्टिते ॥ ११ ॥ अन्तर्भेदे च संजाते दुःखं संस्मृत्य च प्रभो । अभूतपूर्वो बीभत्सोर्दुःखान्मन्थुरजायत ॥ १२ ॥ संजयने कहा—प्रभो! चेदिदेशके युवराज, पौरव वृद्धक्षत्र तथा बाणोंके प्रयोगमें कुशल मालवराज सुदर्शनके मारे जानेपर धृष्टद्युम्न, सात्यकि और भीमसेनके परास्त हो जानेपर अर्जुनके मनमें बड़ा कष्ट हुआ था। इसके सिवा, युधिष्ठिरके उन व्यंगवचनोंसे उनके मर्मस्थलमें बड़ी चोट पहुँची थी और पहलेके दुःखोंका स्मरण करके भी उनका हृदय फट गया था; अतः अधिक खेदके कारण अर्जुनके मनमें अभूतपूर्व क्रोध जाग उठा ॥ १०—१२ ॥

तस्मादनर्हमश्लीलमप्रियं द्रौणिमुक्तवान् । मान्यमाचार्यतनयं रूक्षं कापुरुषं यथा ॥ १३ ॥ इसीलिये माननीय आचार्यपुत्र अश्वत्थामाके प्रति, जो कठोर वचन सुननेके योग्य नहीं था, अर्जुनने कायर मनुष्यसे कहनेयोग्य अश्लील, अप्रिय और कठोर बातें कह

डालीं ॥ १३ ॥
एवमुक्तः श्वसन् क्रोधान्महेष्वासतमो नृप ।
पार्थेन परुषं वाक्यं सर्वमर्मभिदा गिरा ॥ १४ ॥
नरेश्वर! जब अर्जुनने सारे मर्मस्थानोंको विदीर्ण कर देनेवाली वाणीद्वारा उससे ऐसी कठोर बात कह दी, तब श्रेष्ठ महाधनुर्धर अश्वत्थामा क्रोधके मारे लंबी साँस लेने लगा ॥ १४ ॥
द्रौणिश्चुकोप पार्थाय कृष्णाय च विशेषतः ।
स तु यत्तो रथे स्थित्वा वार्युपस्पृश्य वीर्यवान् ॥ १५ ॥
देवैरपि सुदुर्धर्षमस्त्रमाग्नेयमाददे ।
उस समय द्रोणपुत्रको अर्जुन और श्रीकृष्णपर अधिक क्रोध हुआ, उस पराक्रमी वीरने सावधानीके साथ रथपर खड़ा हो आचमन करके आग्नेयास्त्र हाथमें लिया, जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्जय था ॥ १५ १/२ ॥
दृश्यादृश्यानरिगणानुद्दिश्याचार्यनन्दनः ॥ १६ ॥
सोऽभिमन्त्र्य शरं दीप्तं विधूममिव पावकम् ।
सर्वतः क्रोधमाविश्य चिक्षेप परवीरहा ॥ १७ ॥
फिर धूमरहित अग्निके समान एक तेजस्वी बाणको अभिमन्त्रित करके शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले आचार्यनन्दन अश्वत्थामाने सर्वथा क्रोधावेशसे युक्त हो उसे प्रत्यक्ष और परोक्ष शत्रुओंके उद्देश्यसे चला दिया ॥ १६-१७ ॥
ततस्तुमुलमाकाशे शरवर्षमजायत ।
पावकार्चिः परीतं तत् पार्थमेवाभिपूप्लुवे ॥ १८ ॥
फिर तो आकाशमें बाणोंकी भयंकर वर्षा होने लगी और सब ओर फैली हुई आगकी लपटें अर्जुनपर ही टूट पड़ीं ॥ १८ ॥

उल्काश्च गगनात् पेतुर्दिशश्च न चकाशिरे । तमश्च सहसा रौद्रं चमूमवततार ताम् ॥ १९ ॥ आकाशसे उल्काएँ गिरने लगीं, दिशाओंका प्रकाश लुप्त हो गया और उस सेनामें सहसा भयानक अन्धकार उतर आया ॥ १९ ॥ रक्षांसि च पिशाचाश्च विनेदुरतिसङ्गताः । ववुश्चाशिशिरा वाताः सूर्यो नैव तताप च ॥ २० ॥ राक्षस और पिशाच परस्पर मिलकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे, गरम हवा चलने लगी और सूर्यका ताप क्षीण हो गया ॥ २० ॥ वायसाश्चापि चाक्रन्दन् दिक्षु सर्वासु भैरवम् । रुधिरं चापि वर्षन्तो विनेदुस्तोयदा दिवि ॥ २१ ॥ कौए सम्पूर्ण दिशाओंमें काँव-काँव करके भयानक कोलाहल मचाने लगे तथा मेघ रक्तकी वर्षा करते हुए आकाशमें गरजने लगे ॥ २१ ॥ पक्षिणः पशवो गावो विनेदुश्चापि सुव्रताः । परमं प्रयतात्मानो न शान्तिमुपलेभिरे ॥ २२ ॥

पक्षी और गाय आदि पशु भी चीत्कार करने लगे। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शुद्धचित्त साधु पुरुष भी अत्यन्त अशान्त हो उठे ॥ २२ ॥
भ्रान्तसर्वमहाभूतमावर्तितदिवाकरम् ।
त्रैलोक्यमभिसंतप्तं ज्वराविष्टमिवाभवत् ॥ २३ ॥
सम्पूर्ण महाभूत मानो चक्कर काट रहे थे। सूर्य भी घूमता-सा प्रतीत होता था। तीनों लोकोंके प्राणी ज्वरग्रस्तके समान संतप्त हो उठे थे ॥ २३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1544)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अश्वत्थामाके द्वारा अर्जुनपर आग्नेयास्त्रका प्रयोग एवं उसके द्वारा पाण्डव-सेनाका संहार

अस्त्रतेजोऽभिसंतप्ता नागा भूमिशयास्तथा ।
निःश्वसन्तः समुत्पेतुस्तेजो घोरं मुमुक्षवः ॥ २४ ॥
पृथ्वीपर पड़े रहनेवाले नाग भी उस अस्त्रके तेजसे संतप्त हो भयंकर आगसे छुटकारा पानेके लिये फुफकारते हुए ऊपर उछलने लगे ॥ २४ ॥

जलजानि च सत्त्वानि दह्यमानानि भारत ।
न शान्तिमुपजग्मुर्हि तप्यमानैर्जलाशयैः ॥ २५ ॥
भारत! जलाशय भी तप गये थे, जिससे दग्ध होनेवाले जलचर प्राणियोंको भी शान्ति नहीं मिल पाती थी ॥ २५ ॥

दिग्भ्यः प्रदिग्भ्यः खाद् भूमेः सर्वतः शरवृष्टयः ।
उच्चावचा निपेतुर्वै गरुडानिलरंहसः ॥ २६ ॥
दिशा, विदिशा, आकाश और पृथ्वी सब ओरसे छोटे-बड़े नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा होने लगी, वे सभी बाण गरुड़ और वायुके समान वेगशाली थे ॥ २६ ॥

तैः शरैर्द्रोणपुत्रस्य वज्रवेगैः समाहताः ।
प्रदग्धा रिपवः पेतुरग्निदग्धा इव द्रुमाः ॥ २७ ॥
द्रोणपुत्रके चलाये हुए उन वज्रके समान वेगशाली बाणोंसे घायल हुए शत्रुसैनिक आगके जलाये हुए वृक्षोंके समान दग्ध होकर गिरने लगे ॥ २७ ॥

दह्यमाना महानागाः पेतुरुर्व्यां समन्ततः ।
नदन्तो भैरवान् नादाञ्जलदोपमनिःस्वनान् ॥ २८ ॥
विशालकाय गजराज दग्ध हो-होकर मेघकी गर्जनाके समान भयंकर चीत्कार करते हुए सब ओर धराशायी होने लगे ॥ २८ ॥

अपरे प्रद्रुता नागा भयत्रस्ता विशाम्पते । भ्रेमुर्दिशो यथा पूर्वं वने दावाग्निसंवृताः ॥ २९ ॥ प्रजानाथ! भयभीत होकर भागे हुए दूसरे बहुत-से हाथी सम्पूर्ण दिशाओंमें उसी प्रकार चक्कर काटने लगे, जैसे पहले वनमें दावानलसे घिर जानेपर वे चारों ओर चक्कर लगाते थे ॥ २९ ॥

द्रुमाणां शिखराणीव दावदग्धानि मारिष । अश्ववृन्दान्यदृश्यन्त रथवृन्दानि भारत ॥ ३० ॥ अपतन्त रथौघाश्च तत्र तत्र सहस्रशः । माननीय नरेश! भारत! अश्वसमूह तथा रथवृन्द दावानलसे दग्ध हुए वृक्षोंके अग्रभागके समान दिखायी दे रहे थे और जहाँ-तहाँ सहस्रों रथसमूह गिरे पड़े थे ॥ ३० १/२ ॥

तत् सैन्यं भयसंविग्नं ददाह युधि भारत ॥ ३१ ॥ युगान्ते सर्वभूतानि संवर्तक इवानलः । भरतनन्दन! जैसे प्रलयकालमें संवर्तक अग्नि सब प्राणियोंको जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार उस आग्नेयास्त्रने पाण्डवोंकी उस भयभीत सेनाको युद्धस्थलमें जलाना आरम्भ कर दिया ॥ ३१ १/२ ॥

दृष्ट्वा तु पाण्डवीं सेनां दह्यमानां महाहवे ॥ ३२ ॥ प्रहृष्टास्तावका राजन् सिंहनादान् विनेदिरे । राजन्! उस महासमरमें पाण्डव-सेनाको दग्ध होती देख आपके सैनिक अत्यन्त प्रसन्न हो जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ ३२ १/२ ॥

ततस्तूर्यसहस्राणि नानालिङ्गानि भारत ॥ ३३ ॥ तूर्णमाजघ्निरे हृष्टास्तावका जितकाशिनः । भारत! तदनन्तर हर्षसे उल्लसित और विजयसे सुशोभित होनेवाले आपके सैनिक नाना प्रकारके सहस्रों बाजे बजाने लगे ॥ ३३ १/२ ॥

कृत्स्ना ह्यक्षौहिणी राजन् सव्यसाची च पाण्डवः ॥ ३४ ॥ तमसा संवृते लोके नादृश्यन्त महाहवे । नरेश्वर! उस महासमरमें सब लोग अन्धकारसे आच्छन्न हो गये थे। पाण्डवोंकी सारी अक्षौहिणी सेना और सव्यसाची अर्जुन भी नहीं दिखायी देते थे ॥ ३४ १/२ ॥

नैव नस्तादृशं राजन् दृष्टपूर्वं न च श्रुतम् ॥ ३५ ॥ यादृशं द्रोणपुत्रेण सृष्टमस्त्रममर्षिणा । राजन्! अमर्षमें भरे हुए द्रोणपुत्रने जैसे अस्त्रकी सृष्टि की थी, वैसा हमलोगोंने पहले न तो कभी देखा था और न सुना ही था ॥ ३५ १/२ ॥

अर्जुनस्तु महाराज ब्राह्ममस्त्रमुदैरयत् ॥ ३६ ॥ सर्वास्त्रप्रतिघातार्थं विहितं पद्मयोनिना । महाराज! उस समय अर्जुनने ब्रह्मास्त्रको प्रकट किया; जिसे ब्रह्माजीने सम्पूर्ण अस्त्रोंके विनाशके लिये बनाया है ॥

ततो मुहूर्तादिव तत् तमो व्युपशशाम ह ॥ ३७ ॥ प्रववौ चानिलः शीतो दिशश्च विमला बभुः । फिर तो दो घड़ीमें वह सारा अन्धकार दूर हो गया, शीतल वायु बहने लगी और सारी दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं ॥ ३७ १/२ ॥

तत्राद्भुतमपश्याम कृत्स्नामक्षौहिणीं हताम् ॥ ३८ ॥ अनभिज्ञेयरूपां च प्रदग्धामस्त्रतेजसा । वहाँ हमलोगोंने अद्भुत दृश्य देखा। पाण्डवोंकी वह सारी अक्षौहिणी उस अस्त्रके तेजसे इस प्रकार दग्ध एवं नष्ट हो गयी थी कि उसे पहचानना असम्भव हो गया ॥ ३८ १/२ ॥

ततो वीरौ महेष्वासौ विमुक्तौ केशवार्जुनौ ॥ ३९ ॥ सहितौ प्रत्यदृश्येतां नभसीव तमोनुदौ । तदनन्तर उस अस्त्रसे मुक्त हुए महाधनुर्धर वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन एक साथ दिखायी दिये, मानो आकाशमें चन्द्रमा और सूर्य प्रकट हो गये हों ॥ ३९ १/२ ॥

ततो गाण्डीवधन्वा च केशवश्चाक्षतावुभौ ॥ ४० ॥ सपताकध्वजहयः सानुकर्षवरायुधः । प्रबभौ स रथो मुक्तस्तावकानां भयंकरः ॥ ४१ ॥ उस समय गाण्डीवधारी अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्ण दोनोंके शरीरपर आँच नहीं आने पायी थी। पताका, ध्वज, अश्व, अनुकर्ष और श्रेष्ठ आयुधोंसहित मुक्त हुआ उनका वह रथ आपके सैनिकोंको भयभीत करता हुआ चमक उठा ॥ ४०-४१ ॥

ततः किलकिलाशब्दः शङ्खभेरीस्वनैः सह । पाण्डवानां प्रहृष्टानां क्षणेन समजायत ॥ ४२ ॥ तब पाण्डव हर्षसे खिल उठे और क्षणभरमें शंख तथा भेरियोंकी ध्वनिके साथ उनका आनन्दमय कोलाहल गूँज उठा ॥ ४२ ॥ हताविति तयोरासीत् सेनयोरुभयोर्मतिः । तरसाभ्यागतौ दृष्ट्वा सहितौ केशवार्जुनौ ॥ ४३ ॥ श्रीकृष्ण और अर्जुनके सम्बन्धमें उन दोनों ही सेनाओंको यह विश्वास हो गया था कि वे मारे गये। फिर उन दोनोंको एक साथ वेगपूर्वक निकट आया देख सबको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४३ ॥

तावक्षतौ प्रमुदितौ दध्यतुर्वारिजोत्तमौ । दृष्ट्वा प्रमुदितान् पार्थांस्त्वदीया व्यथिता भृशम् ॥ ४४ ॥ उन दोनोंके शरीरमें क्षति नहीं पहुँची थी। वे दोनों वीर आनन्दमग्न हो अपने उत्तम शंख बजाने लगे। कुन्तीके पुत्रोंको प्रसन्न देखकर आपके पुत्रोंके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ ४४ ॥

विमुक्तौ च महात्मानौ दृष्ट्वा द्रौणिः सुदुःखितः । मुहूर्तं चिन्तयामास किं त्वेतदिति मारिष ॥ ४५ ॥ माननीय नरेश! महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुनको आग्नेयास्त्रसे मुक्त देख अश्वत्थामाको बड़ा दुःख हुआ। वह दो घड़ीतक इसी चिन्तामें डूबा रहा कि ‘यह क्या हो गया?’ ॥ ४५ ॥

चिन्तयित्वा तु राजेन्द्र ध्यानशोकपरायणः । निःश्वसन् दीर्घमुष्णं च विमनाश्चाभवत् ततः ॥ ४६ ॥ राजेन्द्र! चिन्ता और शोकमें मग्न होकर कुछ देरतक विचार करनेके पश्चात् अश्वत्थामा गरम-गरम दीर्घ उच्छ्वास लेने लगा और मन-ही-मन उदास हो गया ॥

ततो द्रौणिर्धनुस्त्यक्त्वा रथात् प्रस्कन्द्य वेगितः । धिग् धिक् सर्वमिदं मिथ्येत्युक्त्वा सम्प्राद्रवद् रणात् ॥ ४७ ॥ तत्पश्चात् द्रोणकुमार धनुष त्यागकर रथसे कूद पड़ा और ‘धिक्कार है! धिक्कार है!! यह सब मिथ्या है’ ऐसा कहकर वह रणभूमिसे वेगपूर्वक भाग चला ॥

ततः स्निग्धाम्बुदाभासं वेदावासमकल्मषम् । वेदव्यासं सरस्वत्यावासं व्यासं ददर्श ह ॥ ४८ ॥ इतनेमेंही उसे स्निग्ध मेघके समान श्याम कान्तिवाले, वेद और सरस्वतीके आवास-स्थान तथा वेदोंका विस्तार करनेवाले, पापशून्य महर्षि व्यास वहाँ दिखायी दिये ॥ ४८ ॥

तं द्रौणिरग्रतो दृष्ट्वा स्थितं कुरुकुलोद्वह । सन्नकण्ठोऽब्रवीद् वाक्यमभिवाद्य सुदीनवत् ॥ ४९ ॥ कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुष! महर्षि व्यासको सामने खड़ा देख द्रोणकुमारका गला आँसुओंसे भर आया। उसने अत्यन्त दीनभावसे प्रणाम करके उनसे इस प्रकार पूछा — ॥ ४९ ॥

भो भो माया यदृच्छा वा न विद्मः किमिदं भवेत् । अस्त्रं त्विदं कथं मिथ्या मम कश्च व्यतिक्रमः ॥ ५० ॥ 'महर्षे! यह माया है या दैवेच्छा। मेरी समझमें नहीं आता कि यह क्या है? यह अस्त्र झूठा कैसे हो गया? मुझसे कौन-सी गलती हो गयी? ।। ५० ।।

अधरोत्तरमेतद् वा लोकानां वा पराभवः । यदिमौ जीवतः कृष्णौ कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ५१ ॥ 'इस (आग्नेय) अस्त्रके प्रभावमें कोई उलट-फेर तो नहीं हो गया अथवा सम्पूर्ण लोकोंका पराभव होनेवाला है, जिससे ये दोनों कृष्ण जीवित बच गये। निश्चय ही कालका उल्लंघन करना अत्यन्त कठिन है ।। ५१ ।।

नासुरा न च गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः । न सर्पा यक्षपतगा न मनुष्याः कथंचन ॥ ५२ ॥ उत्सहन्तेऽन्यथा कर्तुमेतदस्त्रं मयेरितम् । तदिदं केवलं हत्वा शान्तमक्षौहिणीं ज्वलत् ॥ ५३ ॥ 'मेरे द्वारा प्रयोग किये हुए इस अस्त्रको असुर, गन्धर्व, पिशाच, राक्षस, सर्प, यक्ष, पक्षी और मनुष्य किसी तरह भी व्यर्थ नहीं कर सकते थे, तो भी यह प्रज्वलित अस्त्र केवल एक

अक्षौहिणी सेनाको जलाकर शान्त हो गया ।। ५२-५३ ।। सर्वघाति मया मुक्तमस्त्रं परमदारुणम् । केनेमौ मर्त्यधर्माणौ नावधीत् केशवार्जुनौ ।। ५४ ।। 'मैंने तो अत्यन्त भयंकर एवं सर्वसंहारक अस्त्रका प्रयोग किया था; फिर उसने किस कारणसे इन मर्त्यधर्मा श्रीकृष्ण और अर्जुनका वध नहीं किया? ।। एतत् प्रब्रूहि भगवन् मया पृष्टो यथातथम् । श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन सर्वमेतन्महामुने ।। ५५ ।। 'भगवन्! महामुने! मैंने जो आपसे यह प्रश्न किया है, इसका मुझे यथार्थ उत्तर दीजिये। मैं यह सब कुछ ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ' ।। ५५ ।।

व्यास उवाच

महान्तमेवमथ मां यं त्वं पृच्छसि विस्मयात् । तं प्रवक्ष्यामि ते सर्वं समाधाय मनः शृणु ।। ५६ ।। **व्यासजी बोले—**तू जिसके सम्बन्धमें आश्चर्यके साथ प्रश्न कर रहा है, उस महत्त्वपूर्ण विषयको मैं तुझसे बता रहा हूँ। तू अपने मनको एकाग्र करके सब कुछ सुन ।। योऽसौ नारायणो नाम पूर्वेषामपि पूर्वजः । (आदिदेवो जगन्नाथो लोककर्ता स्वयं प्रभुः । आद्यः सर्वस्य लोकस्य अनादिनिधनोऽच्युतः ।। जो हमारे पूर्वजोंके भी पूर्वज भगवान् नारायण हैं, वे ही आदिदेव, जगन्नाथ, लोककर्ता और स्वयं ही सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। वे सम्पूर्ण जगत्के आदिकारण तथा स्वयं आदि-अन्तसे रहित हैं। अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेके कारण वे अच्युत कहलाते हैं। व्याकुर्वते यस्य तत्त्वं श्रुतयो मुनयश्च ह । अतोऽजय्यः सर्वभूतैर्मनसापि जगत्पतिः ।।) श्रुतियाँ और महर्षिगण उन्हींके तत्त्वका विवेचन करते हैं। अतः उन जगदीश्वरको समस्त प्राणी मनसे भी जीतनेमें असमर्थ हैं। अजायत च कार्यार्थं पुत्रो धर्मस्य विश्वकृत् ।। ५७ ।। वे विश्वविधाता भगवान् एक समय किसी विशेष कार्यके लिये धर्मके पुत्ररूपमें अवतीर्ण हुए थे ।। ५७ ।। स तपस्तीव्रमातस्थे शिशिरं गिरिमास्थितः । ऊर्ध्वबाहुर्महातेजा ज्वलनादित्यसंनिभः ।। ५८ ।। अग्नि और सूर्यके समान महातेजस्वी उन भगवान् नारायणने हिमालय पर्वतपर रहकर अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये हुए बड़ी कठोर तपस्या की थी ।। ५८ ।। षष्टिं वर्षसहस्राणि तावन्त्येव शतानि च ।

अशोषयत् तदाऽऽत्मानं वायुभक्षोऽम्बुजेक्षणः ॥ ५९ ॥ उन कमलनयन श्रीहरिने छाछठ हजार वर्षोंतक केवल वायु पीकर उन दिनों अपने शरीरको सुखाया ।।

अथापरं तपस्तप्त्वा द्विस्ततोऽन्यत् पुनर्महत् । द्यावापृथिव्योर्विवरं तेजसा समपूरयत् ॥ ६० ॥ तदनन्तर उससे दुगुने कालतक फिर भारी तपस्या करके उन्होंने अपने तेजसे पृथ्वी और आकाशके मध्यवर्ती आकाशको भर दिया ।। ६० ।।