भारतकोश
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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

६०. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०९

६०. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०९ कल्पन्ते । विहितं च जायमानम्, विधीयते च जायमानम् । तेन यः सम्बद्ध्यते सोऽयं जायमान इति । प्रत्यक्षविधानाभावादिति चेद् ? न; प्रतिषेधस्यापि प्रत्यक्षविधानाभावादिति । प्रत्यक्षतो विधीयते गार्हस्थ्यं ब्राह्मणेन, यदि चाश्रमान्तरमभविष्यत् तदपि व्यधास्यत् प्रत्यक्षतः, प्रत्यक्षविधानाभावान्नास्त्याश्रमान्तरमिति ? न; प्रतिषेध- स्यापि प्रत्यक्षतो विधानाभावात् । न प्रतिषेधोऽपि वै ब्राह्मणेन प्रत्यक्षतो विधीयते, 'न सन्त्याश्रमान्तराणि एक एव गृहस्थाश्रमः' इति प्रतिषेधस्य प्रत्यक्ष- तोऽश्रवणादयुक्तमेतदिति । अधिकाराच्च विधानं विद्यान्तरवत् । यथा शास्त्रान्तराणि स्वे स्वेऽधिकारे प्रत्यक्षतो विधायकानि, नार्थान्तराभावात्; एवमिदं ब्राह्मणं गृहस्थशास्त्रं स्वेऽधिकारे प्रत्यक्षतो विधायकम्, नाश्रमन्तराणामभावादिति । ऋग्ब्राह्मणं चापवर्गाभिधाय्यभिधीयते । ऋचश्च ब्राह्मणानि चापवर्गा- भिवादीनि भवन्ति । ऋचश्च तावत्— 'कर्मभिर्मृत्युमृषयो निषेदुः प्रजावन्तो द्रविण॒च्छमानाः । अथापरे ऋषयो मनीषिणः परं कर्मभ्योऽमृतत्वमानशुः ॥ फलसाधन हैं न कि फल; वे सम्पन्न होते हुए फल को कल्पित करते हैं। यहाँ 'जायमान' विहित है; इससे जो यहाँ सम्बद्ध होता है वही (गृहस्थ) जायमान है । इस ब्राह्मण में जरा का संकेत है, प्रव्रज्या का प्रत्यक्षविधान तो है नहीं ? ऐसा न कहें; क्योंकि उस प्रव्रज्यानिषेध का भी तो प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है । पूर्वपक्षी शंका करता है कि उक्त ब्राह्मण में गार्हस्थ्यविधान तो प्रत्यक्ष है, यदि आश्रमान्तर उसके लिये विहित होता तो उसका भी प्रत्यक्ष विधान होता, अतः ज्ञात होता है गार्हस्थ्यातिरिक्त आश्र- मान्तर नहीं है ? सिद्धान्ती उत्तर देता है—उक्त ब्राह्मण में प्रव्रज्याप्रतिषेध का भी तो प्रत्यक्षविधान नहीं है, अतः यह हम कैसे मान लें कि आश्रमान्तर होता ही नहीं ! एक बात और, इस ब्राह्मणवाक्य की बात छोड़ भी दें, तो भी अन्यत्र हमें यह नहीं मिलता कि एक गृहस्थाश्रम ही है, अन्य आश्रम नहीं हैं । अतः आपका कहना अयुक्त ही है । बल्कि यह समझिये कि यह ब्राह्मणवाक्य अपने अधिकार का विधान करता है । जैसे विद्यान्तर का विधान अन्य शास्त्र में नहीं प्राप्त होता । क्योंकि वे शास्त्र अपने-अपने अधिकार में प्रत्यक्ष विधायक हैं, अर्थान्तर न होने से; उसी तरह यह ब्राह्मण भी गृहस्थ- शास्त्र का प्रत्यक्ष विधायक है आश्रमान्तर का यहाँ विधान न होने से । उधर ऋग्वेद का ब्राह्मण भी अपवर्ग का बोधक है । कुछ ऋचाएँ तथा उनके ब्राह्मण अपवर्ग के बोधक हैं । पहले ऋचाओं को लें । जैसे वाजसनेयिसंहिता (३१.१८) में कहा है—कुछ ऋषि पुत्रपौत्रादि युक्त धन को चाहते हुए कर्मों से बन्ध कर मृत्यु को

३१० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः । परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद् यतयो विशन्ति' ॥ 'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' ॥ अथ ब्राह्मणानि— 'त्रयो धर्मस्कन्धाः—यज्ञोऽध्ययनं दानमिति, प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचा- र्याचार्यकुलवासीति तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् । सर्वे एवैते पुण्यलोका भवन्ति । ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' । 'एतमेव प्रव्राजिनो लोकमभीप्सन्तः प्रव्रजन्ति' इति । 'अथो खल्वाहुः—काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तथाक्रतु- र्भवति, यथाक्रतुर्भवति तथा तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते' । इति कर्मभिः संसरणमुक्त्वा प्रकृतमन्यदुपदिगन्ति— 'इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आत्मकाम आप्त- प्राप्त हुए; तथा दूसरे बुद्धिमान् धर्मज्ञ ऋषि उन कर्मों से दूर रहकर अमृतत्व ( अपवर्ग ) पा गये । उन्हें न कर्म से, न पुत्रपौत्रादिक से, न धन से यह अमृतत्व मिल पाया अपितु केवल त्याग से मिल पाया । यह अमृतत्व अविद्या से दूर गुह्यतम होते हुये भी देदी- प्यमान तेजःपुंज है, जिसे जितेन्द्रिय पुरुष ही पा सकते हैं । तैत्तिरीयारण्यक (३. १२. ७) में लिखा है—'मैं इस आदित्यवर्ण ( तेजोमय ) तम (अविद्या) से दूर महान् पुरुष (आत्मा) को जानता हूँ । इसी को जानकर मनुष्य मृत्यु (जन्म-मरण) को पार कर सकता है । मोक्ष का अन्य कोई मार्ग नहीं है।' अब ब्राह्मण के कुछ उदाहरण सुनिये— छान्दोग्योपनिषद् (२. २३. १) का ब्राह्मणवाक्य है—'ये तीन धर्मस्कन्ध हैं । यज्ञ, अध्ययन तथा दान यह प्रथमस्कन्ध (गृहस्थ), तथा तप द्वितीयस्कन्ध (वानप्रस्थ) है । तीसरा है—आचार्य कुल में रहकर ब्रह्मचर्यव्रतपूर्वक आचार्य की आज्ञा में अपना समय बिताना (ब्रह्मचर्य) । ये सभी पुण्यफलप्रद हैं । परन्तु ब्रह्मज्ञानी (संन्यासी) अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है, अतः वह श्रेष्ठ हैं'। बृहदारण्यक के ब्राह्मण (४. ४. २२) में लिखा है—'इसी संन्यासियों के लोक को चाहते हुए बुद्धिमान् लोग प्रव्रज्या लेते हैं।' दूसरे स्थान (४. ४. ५) पर यही कहता है—'ज्ञानी लोग कहते हैं यह प्राणी वासनामय है, जैसी वासना करेगा वैसे इसके संकल्प होंगे, संकल्पों के अनुसार यह कर्म करेगा; जैसा कर्म करेगा वैसा फल मिलेगा।' इस तरह संसार को कर्ममय बताकर प्रसङ्गोपात्त दूसरी बात का भी उपदेश देते हैं—'यह तो हुई वासना की बात; परन्तु जिसको वासना नहीं है वह अकाम पुरुष CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

६१. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३११

६१. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३११ कामो भवति न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति, इहैव समवलीयन्ते । ब्रह्मौव सन् ब्रह्माप्येति' इति । तत्र यदुक्तम्—'ऋणानुबन्धादपवर्गाभावः' इत्येतदयुक्तमिति । 'ये चत्वारः पथयो देवयानाः' इति च चातुराश्रम्यश्रुतेरेकाश्रम्यानुपपत्तिः ॥ ६० ॥ फलार्थिनश्चेदं ब्राह्मणम्—'जरामर्य्यं वा एतत्सत्रं यदग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासौ च' इति । कथम् ? समारोपणादात्मन्यप्रतिषेधः ॥ ६१ ॥ 'प्राजापत्यामिष्टिं निरूप्य तस्यां सार्ववेदसं हुत्वा आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेत्' इति श्रूयते, तेन विजानीमः—प्रजावित्तलोकैषणाभ्यो व्युत्थि- तस्य निवृत्ते फलार्थित्वे समारोपणं विधीयते इति । एवं च ब्राह्मणानि—"सोऽन्यद् व्रतमुपाकरिष्यमाणो याज्ञवल्क्यो मैत्रेयीमिति होवाच—प्रव्रजिष्यन् वा अरे अहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्या सहान्तं करवाणीति । अथाप्युक्तानुशासनासि मैत्रेयि एतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यः प्रवव्राजेति" ॥ ६१ ॥ वासनारहित हो आत्मज्ञान चाहता हुआ पूर्णसङ्कल्प हो जाता है, उसके प्राण फिर इधर- उधर नहीं भटकते । वह शाश्वत हो जाता है, ब्रह्मरूप हो ब्रह्म में लीन हो जाता है ।' इतनी ऋचाओं तथा ब्राह्मणों का प्रमाण मिलने के बाद भी आपका 'ऋणानुबन्ध से अपवर्ग नहीं होता'— यह कहना अयुक्तियुक्त ही है । अपि च—तैत्तिरीयसंहिता (५. ७. २. ३) में तो 'ये चार आश्रम देवलोक में जाने के मार्ग हैं'—यह कह कर स्पष्ट ही चार आश्रम स्वीकार कर लिए गये हैं ॥ ६० ॥ उक्त 'वार्धक्यपर्यन्त यह अग्निहोत्र तथा दर्श, पूर्णमास यज्ञ हैं'—यह शतपथब्राह्मण- वाक्य फलार्थी को लेकर कहा गया है, न कि यह प्रव्रज्या की मर्यादा का बोधक है । कैसे ? (आगे चल कर) अग्नियों का आत्मा में समारोपण बताने से प्रव्रज्या का प्रतिषेध नहीं बनता ॥ ६१ ॥ 'प्राजापत्य इष्टि का निरूपण करके उसमें अपना सर्वस्व दानकर उन अग्नियों को आत्मा में रखकर ब्राह्मण प्रव्रज्या ग्रहण कर लें'—ऐसा श्रुतिवाक्य हैं। इससे हम अनु- मान करते हैं कि यह वाक्य पुत्रैषणा, धनैषणा, तथा लोकैषणाओं को त्यागकर गार्हस्थ्य से व्युत्थितचित्त पुरुष की फल-कामनायें निवृत्त हो जाने पर उनमें अग्नि का समारोपण विहित करता है । गार्हस्थ्य से व्युत्थितचित्त की प्रव्रज्या विहित है, तभी यह (बृहदारण्यक का) ब्राह्मणवाक्य भी उपपन्न हो पाता है—"वे याज्ञवल्क्य दूसरा व्रत करना चाहते हुए मैत्रेयी से बोले—'या प्रव्रज्या लेकर मैं इस स्थान (जन्ममरणरूपी संसार) से कात्यायनी के साथ अपना छुटकारा कर लूंगा । मैत्रेयि ! तुम यह अच्छी तरह समझ चुकी हो कि वही पद (अपवर्ग) अमृतत्वयुक्त है'—ऐसा कहकर याज्ञवल्क्य प्रव्रजित हो गये" ॥६१॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

३१२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. अ० पात्रचयान्तानुपपत्तेश्च फलाभावः ॥ ६२ ॥ जरामर्यं च कर्मण्यविशेषेण कल्प्यमाने सर्वस्य पात्रचयान्तानि कर्माणीति प्रसज्यते, तत्रैषणाव्युत्थानं न श्रूयेत—'एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे ब्राह्मणा अनूचाना विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोक इति ! ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्तीति' । एषणाभ्यश्च व्युत्थितस्य पात्रचयान्तानि कर्माणि नोपपद्यन्ते इति । नाविशेषेण कर्तुः प्रयोजकं फलं भवतीति । चातुराश्रम्यविधानाच्चेतिहासपुराणधर्मशास्त्रेष्वैकाश्रम्यानुपपत्तिः । तद- प्रमाणमिति चेद् ? न; प्रमाणेन प्रामाण्याभ्यनुज्ञानात् । प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेनेति- हासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते—'ते वा खल्वेते अथर्वाङ्गिरस एतदिति- हासपुराणमभ्यवदन्नितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेद इति' । तस्मादयुक्तमेत- दप्रामाण्यमिति । अप्रामाण्ये च धर्मशास्त्रस्य प्राणभृतां व्यवहारलोपाल्लोको- 'उक्त वाक्य फलार्थी के लिए ही विहित है तथा चतुर्थ आश्रम भी है'—इसमें एक और युक्ति देते हैं— पात्रचयान्तानुपपत्ति से भी फलाभाव सिद्ध होता है ॥ ६२ ॥ यदि पुरुष प्रव्रज्या न लेकर गृहस्थाचरण करता हुआ ही मर जाता है तो उसके अग्निहोत्र के पात्र भी उसी के साथ जला दिये जाते हैं—यह विधि यदि साधारणतः सब पुरुषों में कल्पित की जायेगी तो सभी में उक्त पात्रचयदाह कल्पित करना पड़ेगा । तब पीछे कही एषणात्रय से व्युत्थानवाली बात कैसे बनेगी ! जैसे कि बृहदारण्यक में कहा है—"पहले के विद्वान् बुद्धिमान् ब्राह्मण पुत्र की कामना नहीं करते थे, उनका कहना था कि इन पुत्रपौत्रादिकों का हम क्या करेंगे जिनसे न यह लोक सुधरता है न परलोक ! वे ब्राह्मण तीनों ही एषणाओं से अपने चित्त को हटाकर प्रव्रज्या ले भिक्षाचरण करते थे ।" यों इन प्रमाणों से जब ऐषणाओं से व्युत्थान होने पर परिव्राट् को पात्रचयनान्त कर्म उपपन्न ही नहीं होते तो उनका परिव्राट् के साथ दाह कैसे बनेगा ! कर्त्ता को सामान्यतया लेने के लिए प्रयोजक फल नहीं हो सकता । इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र में भी चार आश्रमों का ही विधान होने से एकाश्रम की बात कहीं उपपन्न नहीं होती । वे तो सब अप्रमाण हैं ? यह नहीं कह सकते; क्योंकि प्रमाण ( श्रुति ) से उन ( इतिहासादि ) का प्रामाण्य सिद्ध होता है । ब्राह्मण-प्रमाण से इतिहास-प्रामाण्य यों सिद्ध होता है—'उन अथर्वा, आङ्गिरस आदि ऋषियों ने इस इति- हास-पुराण का आख्यान किया है अतः यों मानना चाहिए कि इतिहास पुराण भी वेदों में एक ( पञ्चम ) वेद है ।' अतः इतिहास पुराणादि को अप्रामाणिक कहना अयुक्त है । धर्मशास्त्र को अप्रामाणिक मानने पर प्राणियों के व्यवहार का कोई आधार न होने से समग्र लोकों का उच्छेद-प्रसंग उपस्थित हो जायेगा । दूसरे, जो ऋषि उन श्रुतियों के CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

६४. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३१३

६४. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३१३ च्छेदप्रसङ्गः । द्रष्टृप्रवक्तृसामान्याच्चाप्रामाण्यानुपपत्तिः । य एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चेति । विषयव्यवस्थानाच्च यथाविषयं प्रामाण्यम् । अन्यो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयः, अन्यच्चेतिहासपुराणधर्मशास्त्राणामिति । यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य, लोकवृत्तमितिहास- पुराणस्य, लोकव्यवहारव्यवस्थानं धर्मशास्त्रस्य विषयः । तत्रैकेन न सर्वं व्यव- स्थाप्यत इति यथाविषयमेतानि प्रमाणानीन्द्रियादिवदिति ॥ ६२ ॥ २. यत्पुनरेतत् 'क्लेशानूबन्धस्याविच्छेदात्' इति ? सुषुप्तस्य स्वप्नादर्शने क्लेशाभावादपवर्गः ॥ ६३ ॥ यथा सुषुप्तस्य खलु स्वप्नादर्शने रागानुबन्धः सुखदुःखानुबन्धश्च विच्छिद्यते, तथापवर्गेऽपीति । एतच्च ब्रह्मविदो मुक्तस्यात्मनो रूपमुदाहरन्तीति ॥ ६३ ॥ ३. यदपि 'प्रवृत्त्यनुबन्धात्' इति ? न प्रवृत्तिः प्रतिसन्धानाय हीनक्लेशस्य ॥ ६४ ॥ प्रक्षीणेषु रागद्वेषमोहेषु प्रवृत्तिर्न प्रतिसन्धानाय । प्रतिसन्धिरस्तु पूर्वजन्म- द्रष्टा या प्रवक्ता हैं वे ही इन इतिहास-पुराणों के भी द्रष्टा प्रवक्ता हैं, अतः इस समा- नता से भी इतिहास-पुराणादि में प्रामाण्य ही मानना चाहिए । वास्तविकता भी यही है कि जो ऋषि मन्त्र ब्राह्मणों के द्रष्टा या प्रवक्ता हैं वे ही लोग इतिहास, पुराण तथा धर्म शास्त्रों के द्रष्टा, प्रवक्ता हैं। एक बात और, दोनों का पृथक्-पृथक् विषय होने से भी दोनों में प्रामाण्य है । मन्त्र ब्राह्मणों का दूसरा विषय है, इतिहास-पुराण-धर्मशास्त्रों का दूसरा विषय है। जैसे यज्ञ मन्त्रब्राह्मण का विषय है, इतिहास पुराण का लोकवृत्त तथा धर्मशास्त्र का लोकव्यवहार व्यवस्थित रखना विषय है ! इनमें से एक ही ने सब यज्ञेतिवृत्तादि की व्यवस्थाएं नहीं की हैं, अतः इनके पृथग्विषयं होने से इन्द्रियों की तरह इनकी प्रामाणिकता भी स्वीकार करना चाहिये ॥ ६२ ॥ २. यह जो कहा था कि क्लेशानूबन्ध के अविच्छेद से अपवर्गाभाव है ? · सुषुप्त को स्वप्नावस्था न रहने पर क्लेशाभाव दिखायी देने से अपवर्ग में क्लेशानू- बन्ध-विच्छेद सम्भव है ॥ ६३ ॥ जैसे सोते हुए पुरुष को घोर निद्रावस्था में राग तथा सुख-दुःखानुबन्ध विच्छिन्न होता है, उसी तरह अपवर्ग में भी यह अनुबन्धविच्छेद सम्भव है। यह मुक्त ब्रह्मज्ञानी अवस्था है ॥ ६३ ॥ ३. यह जो कहा था कि प्रवृत्त्यनुबन्ध से अपवर्गाभाव है ? क्षीणक्लेश ज्ञानी की प्रवृत्ति पुनर्जन्म के लिये प्रतिसन्धान नहीं कर पाती ॥ ६४ ॥ राग-द्वेष-मोह के क्षीण हो जाने पर प्राणी के दैनिक कर्म प्रतिसन्धान करने योग्य नहीं होते । एक जन्म निवृत्त होने पर पुनर्जन्म होना 'प्रतिसन्धि' कहलाता है। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

३१४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० निवृत्तौ पुनर्जन्म, तच्च तृष्णाकारितम्१, तस्यां प्रहीणायां पूर्वजन्मभावे जन्मान्त- राभावोऽप्रतिसन्धानमपवर्गः । कर्मवैफल्यप्रसङ्ग इति चेद् ? न; कर्मविपाकप्रति- संवेदनस्याप्रत्याख्यानात् । पूर्वजन्मनिवृत्तौ पुनर्जन्म न भवतीत्युच्यते, न तु कर्म- विपाकप्रतिसंवेदनं प्रत्याख्यायते । सर्वाणि पूर्वकर्माणि ह्यन्ते जन्मनि विपच्यन्त इति ॥ ६४ ॥ न; क्लेशसन्ततेः स्वाभाविकत्वात् ? ॥ ६५ ॥ नोपपद्यते क्लेशानुबन्धविच्छेदः, कस्मात् ? क्लेशसन्ततेः स्वाभाविकत्वात् । अनादिरियं क्लेशसन्ततिः, न चानादिः शक्य उच्छेत्तुमिति ? ॥ ६५ ॥ अत्र कश्चित् परिहारमाह— प्रागुत्पत्तेरभावानित्यत्ववत् स्वाभाविकेऽप्यनित्यत्वम् ॥ ६६ ॥ यथाऽनादिः प्रागुत्पत्तेरभाव उत्पन्नेन भावेन निवर्त्यते, एवं स्वाभाविकी क्लेशसन्ततिरनित्येति ॥ ६६ ॥ अपर आह— अणुश्यामतानित्यत्ववद् वा ॥ ६७ ॥ यह पुनर्जन्म विषयजन्य तृष्णा के कारण होता है । तृष्णा के क्षीण होने पर पूर्व-जन्म के नाश के बाद दूसरा जन्म नहीं होगा, यह अप्रतिसन्धान ही ‘अपवर्ग’ है । तब तो कर्मवैफल्य होने लगेगा ? हम कर्मविपाकप्रतिसंवेदन का खण्डन नहीं कर रहे हैं, किन्तु हम इतना ही कहते हैं कि पूर्व जन्म निवृत्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता । सभी पूर्व कर्म अन्तिम जन्म में विपाक को प्राप्त हो जाते हैं ॥ ६४ ॥ क्लेशप्रवाह के स्वाभाविक होने से क्लेशानूबन्ध विच्छिन्न नहीं होता ? ॥ ६५ ॥ क्लेशानूबन्धविच्छेद उपपन्न नहीं होता; क्योंकि यह सांसारिक क्लेशप्रवाह स्वाभा- विक है ! यह क्लेशप्रवाह अनादि है, इसका उच्छेद सम्भव नहीं ? ! ६५ ॥ यहां कोई एकदेशी समाधान करता है— उत्पत्ति से पूर्व अभावानित्यत्व की तरह स्वाभाविक में भी अनित्यत्व बन सकता है ॥ ६६ ॥ जैसे क्षीरादि में उत्पत्ति से पूर्व का दध्यभाव ( प्रागभाव ) उत्पन्न दधिभाव से निवृत्त हो जाता है, इसी तरह स्वाभाविक क्लेशप्रवाह की अनित्यता सिद्ध होने से क्लेश- विच्छेद सम्भव है ॥ ६६ ॥ दूसरा एकदेशी कहता है— अणुश्यामता के अनित्यत्व की तरह क्लेशसन्तति का अनित्यत्व बन सकता है ॥ ६७ ॥ १. अदृष्ट०-पाठ० ।

६८. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३१५

६८. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३१५ यथानादिरणुश्यामता अथ चाग्निसंयोगादनित्या, तथा क्लेशसन्ततिरपीति । सतः खलु धर्मो नित्यत्वमनित्यत्वं च । तत्त्वं भावेऽभावे भाक्तमिति । 'अनादि- रणुश्यामता' इति हेत्वभावादयुक्तम् । अनुत्पत्तिधर्मकमनित्यमिति नात्र हेतु- रस्तीति ॥ ६७ ॥ अयं तु समाधिः— न; सङ्कल्पनिमित्तत्वाच्च रागादीनाम् ॥ ६८ ॥ कर्मनिमित्तत्वादितरेतरनिमित्तत्वाच्चेति समुच्चयः । मिथ्यासङ्कल्पेभ्यो रञ्जनीयकोपनीयमोहनीयेभ्यो रागद्वेषमोहा उत्पद्यन्ते, कर्म च सत्त्वनिकायनिर्व- र्तकं नैयमिकान् रागद्वेषमोहान्निर्वर्त्तयति; नियमदर्शनात् । दृश्यते हि कश्चित् सत्त्वनिकायो रागबहुलः, कश्चिद् द्वेषबहुलः, कश्चिन्मोहबहुल इति । इतरेतर- निमित्ता च रागादीनामुत्पत्तिः । मूढो रज्यति, मूढः कुप्यति, रक्तो मुह्यति, कुपितो मुह्यति । सर्वमिथ्यासङ्कल्पानां तत्त्वज्ञानादनुत्पत्तिः । कारणानुत्पत्तौ च कार्यानुत्पत्तेरिति—रागादीनामत्यन्तमनुत्पत्तिरिति । जैसे यद्यपि अणु का श्यामरूप अनादि है, परन्तु वही अग्निसंयोग होने पर निवृत्त हो जाता है, उसी तरह क्लेशसन्तति अनादि होते हुए भी निवृत्त हो सकती है । अब सिद्धान्ती पहले दोनों एकदेशिमंतों का खण्डन करता है— १. नित्यत्वानित्यत्वादि धर्म भावरूप पदार्थ में ही सम्भव हो सकते हैं, अभाव में नहीं । यदि कहीं ये अभाव में उपलब्ध होते हों तो वे उपचारात् ही समझने चाहिये । अतः अभाव का दृष्टान्त देना उचित नहीं । २. 'अणुश्यामता अनादि है' इसमें हेतु न होने से यह अयुक्त है । और उसको अनित्य कहना भी नहीं बनेगा; क्योंकि जो कुछ भी अनुत्पत्तिधर्मा हो वह अनित्य हो हो—यह किसी हेतु से सिद्ध नहीं किया जा सकता ! ॥ ६७ ॥ सिद्धान्ती का समाधान यह है— रागादि के सङ्कल्पनिमित्त होने से ( क्लेशसन्तति स्वाभाविक ) नहीं ॥ ६८ ॥ कर्मनिमित्त होने से तथा इतरेतरनिमित्त होने से भी वह स्वाभाविक नहीं । १. रञ्जनीय, कोपनीय तथा मोहनीय मिथ्या सङ्कल्पों से राग द्वेष तथा मोह उत्पन्न होते हैं । तथा पुरुष में वैसी व्यवस्था देखी जाने से सत्त्वनिकाय ( प्राणिशरीर ) को उत्पन्न करने वाला कर्म भी नियमतः राग द्वेष मोह को उत्पन्न करता है—यह नियम ज्ञात होता है । उदाहरणार्थ, इस संसार में कोई प्राणी रागातिशयी, कोई द्वेषातिशयी तथा कोई मोहातिशयी होता है । २. रागादि की उत्पत्ति परस्परनिमित्तक भी है, जैसे—मोहसम्पन्न को राग होता है, वही कुपित भी होता है; रागातिशयी मुग्ध भी होता है, और कुपित भी । सभी मिथ्यासङ्कल्प तत्त्वज्ञान होने पर उत्पन्न नहीं हो पाते । यों कारणानुत्पत्ति से कार्यानुत्पत्ति हो जाने पर रागादि की अत्यन्तानुपपत्ति सम्भव है ।

३१६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० 'अनादिश्च क्लेशसन्ततिः' इत्यप्युक्तम्, सर्वे इमे खल्वाध्यात्मिका भावा अनादिना प्रबन्धेन प्रवर्त्तन्ते शरीरादयः । न जात्वत्र कश्चिदनुत्पन्नपूर्वः प्रथमत उत्पद्यतेऽन्यत्र तत्त्वज्ञानात् । न चैवं सत्यनुत्पत्तिधर्मकं किञ्चिद्व्ययधर्मकं प्रतिज्ञा- यते इति । कर्म च सत्त्वनिकायनिर्वर्तकं तत्त्वज्ञानकृतान्मिथ्यासङ्कल्पविधातान्न रागाद्युत्पत्तिनिमित्तं भवति, सुखदुःखसंवित्तिफलं तु भवतीति ॥ ६८ ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये चतुर्थाध्यायस्याद्यमाह्निकम् । • [ द्वितीयमाह्निकम् ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् [ १-३ ] किं नु खलु भोः ! यावन्तो विषयास्तावत्सु प्रत्येकं तत्त्वज्ञानमुत्पद्यते ? अथ क्वचिदुत्पद्यत इति ? कश्चात्र विशेषः ? न तावदेकैकत्र यावद्विषयमुत्पद्यते; ज्ञेया- नामानन्त्यात् । नापि क्वचिदुत्पद्यते, यत्र नोत्पद्यते तत्रानिवृत्तो मोह इति मोह- शेषप्रसङ्गः । न चान्यविषयेण तत्त्वज्ञानेनान्यविषयो मोहः शक्यः प्रतिषेद्धुमिति ? मिथ्याज्ञानं वै खलु मोहो न तत्त्वज्ञानस्यानुत्पत्तिमात्रम् । तच्च मिथ्याज्ञानं 'क्लेशसन्तति अनादि हैं'—यह भी आपने कहा । इतना ही नहीं, सभी आध्यात्मिक शरीरादि भाव अनादिप्रवाह से प्रवर्त्तमान हैं। ऐसा इनमें आज कोई पहली बार उत्पन्न नहीं हुआ जो पहले कभी उत्पन्न न हुआ हो, केवल तत्त्वज्ञान को छोड़ कर । इसका यह अर्थ नहीं कि अनुत्पत्तिधर्मक भाव भी निवृत्त होता है । अपि तु प्राणिशरी- रोत्पादक कर्म तत्त्वज्ञानकृत मिथ्यासङ्कल्पनाश से रागादि की उत्पत्ति में कारण नहीं बनता । हाँ, तत्त्वज्ञान होने पर भी सुखदुःखसंवेदन फल तो होता ही रहता है ॥ ६८ ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन) में चतुर्थाध्याय का प्रथमाह्निक समाप्त • क्यों जी, हम पूछते हैं कि जितने विषय हैं उनमें से व्यक्तिशः प्रत्येक का तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है या किसी एक व्यक्ति का तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है ? इसमें अन्तर क्या आयेगा ? विषय के अनुसार एक-एक का ज्ञान सम्भव नहीं; क्योंकि ज्ञेय अनन्त हैं, कहाँ तक पार पाइयेगा । किसी एक व्यक्ति के तत्त्वज्ञानोत्पाद से कोई लाभ नहीं; क्योंकि जहाँ वह उत्पन्न नहीं हुआ वहां मोह रह ही जायेगा तो मोह फिर भी शेष रह गया । यह कैसे हो सकता है कि अन्यविषयक तत्त्वज्ञान से अन्यविषयक मोह निवृत्त हो जाये ! मिथ्याज्ञान को मोह कहते हैं, न कि तत्त्वज्ञान की अनुत्पत्तिमात्र को । मिथ्याज्ञान जिस

१. सू० ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् ३१७

१. सू० ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् ३१७ यत्र विषये प्रवर्त्तमानं संसारबीजं भवति स विषयस्तत्त्वतो ज्ञेय इति। किं पुनस्तन्मिथ्याज्ञानम् ? अनात्मन्यात्मग्रहः, ‘अहमस्मि’ इति मोहोऽहङ्कार इति। अनात्मानं खलु ‘अहमस्मि’ इति पश्यतो दृष्टिरहङ्कार इति। किं पुनस्तदर्थजातं यद्विषयोऽहङ्कारः ? शरीरेन्द्रियमनोवेदनाबुद्धयः। कथं तद्विषयोऽहङ्कारः संसारबीजं भवति ? अयं खलु शरीराद्यर्थजातमहमस्मीति व्यवसितः तदुच्छेदेनात्मोच्छेदं मन्यमानोऽनुच्छेदतृष्णापरिल्लुतः पुनः पुनस्त- दुपादत्ते, तदुपाददानो जन्ममरणाय यतते, तेनावियोगान्नात्यन्तं दुःखद्विमुच्यते, इति। यस्तु दुःखं दुखायतनं दुखानुषक्तं सुखं च सर्वमिदं दुःखमिति पश्यति स दुःखं परिजानाति, परिज्ञातं च दुःखं प्रहीण भवत्यनुपादानात्, सविषान्नवत्। एवं दोषान् कर्म च दुःखहेतुरिति पश्यति। न चाप्रहीणेषु दोषेषु दुःखप्रबन्धोच्छेदेन शक्यं भवितुमिति दोषान् जहाति। प्रहीणेषु च दोषेषु न प्रवृत्तः प्रतिसन्धाना- येत्युक्तम्। प्रेत्यभावफलदुःखानि च ज्ञेयानि व्यवस्थापयति, कर्म च दोषांश्च प्रहेयान्। अपवर्गोऽधिगन्तव्यः, स्तस्याधिगमोपायस्तत्त्वज्ञानम्। एवं चतसृभिर्विधाभिः प्रमेय॑ विषय में प्रवृत्त होता हुआ संसारोत्पत्ति का कारण बनता है तत्त्व से वही विषय जानना चाहिये। वह मिथ्याज्ञान क्या है ? अनात्मपदार्थों में आत्माभिमान अर्थात् शरीर की दृष्टि से 'मैं हूँ' यह अहङ्कार मोह है। अनात्मपदार्थों को 'मैं हूँ'—ऐसा समझने वाले की मिथ्यादृष्टि ही अहङ्कार है। वह विषयसमूह कौन-सा है जिसको लेकर अहङ्कार होता है ? शरीर, इन्द्रिय, मन, वेदना, बुद्धि। तद्विषयक अहङ्कार संसारोत्पत्ति का कारण कैसे हो जाता है ? यह मिथ्याभिनिवेशी अरीरादिसमूह में 'मैं हूँ' यह अभिनिवेश करके उनके नाश में अपना नाश मानता हुआ उन को टिकाये रखने की चाह से भरा हुआ पुनः पुनः उनको ग्रहण करता है, उनको ग्रहण करता हुआ जन्म-मरण के लिए प्रयत्न करता है, यों उनसे सम्बन्ध विच्छिन्न न होने से आत्यन्तिक दुःख से छुटकारा नहीं पाता। परन्तु तत्त्वजिज्ञासु दुःख, दुःखाधिष्ठान दुःख से लिपटे सुख को भी 'यह सब दुःख है' ऐसा मानता हुआ दुःख को ठीक से समझ लेता है, पहचान लेता है, पहचाने दुःख को विष-सम्पृक्त अन्न की तरह ग्रहण न करने से उसका दुःख क्षीण हो जाता है। इसतरह वह कर्म तथा दोषों को दुःखहेतु समझता है। दोषों को छोड़े बिना दुःखप्रवाह का उच्छेद हो नहीं सकता, अतः उन दोषों को वह छोड़ देता है। दोषों के प्रहीण होने पर उस तत्त्वज्ञ की प्रवृत्ति प्रतिसन्धानयोग्य नहीं रह जाती—यह हम पहले कह चुके। १. प्रेत्यभाव, फल तथा दुःख ज्ञेय हैं। २. कर्म तथा दोष प्रहेय हैं। ३. अपवर्ग अधिगन्तव्य (प्राप्तव्य) हैं। ४. उसके पाने का एकमात्र उपाय है तत्वज्ञान। इस तरह चार प्रकारों में विभक्त इन सम्पूर्ण प्रमेयों पर विचार करने वाले को

३१८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० विभक्तमासेवमानस्याभ्यस्यतो भावयतः सम्यग्दर्शनं यथाभूतावबोधस्तत्त्वज्ञान- मुत्पद्यते । एवं च— दोषनिमित्तानां तत्त्वज्ञानादहङ्कारनिवृत्तिः ॥ १ ॥ शरीरादि दुःखान्तं प्रमेयं दोषनिमित्तम्; तद्विषयत्वान्मिथ्याज्ञानस्य । तदिदं तत्त्वज्ञानं तद्विषयमुत्पन्नमहङ्कारं निवर्त्तयति; समानविषये तयोर्विरोधात् । एवं तत्त्वज्ञानाद् 'दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायाद- पवर्गः' (१.१.२) इति । स चायं शास्त्रार्थसङ्ग्रहोऽनूद्यते, नापूर्वो विधीयते इति ॥१॥ प्रसंख्यानानुपूर्वी तु खलु— दोषनिमित्तं रूपादयो विषयाः १सङ्कल्पकृताः ॥ २ ॥ कामविषया इन्द्रियार्था इति रूपादय उच्यन्ते, ते मिथ्यासङ्कल्प्यमाना रागद्वेषमोहान् प्रवर्त्तयन्ति, तान् पूर्वं प्रसञ्चक्षीत । तांश्च प्रसञ्चक्षाणस्य रूपादि- विषयो मिथ्यासङ्कल्पो निवर्त्तते । तन्निवृत्तावध्यात्मं शरीरादि प्रसञ्चक्षीत । तत्प्रसंख्यानादध्यात्मविषयोऽहङ्कारो निवर्त्तते । सोऽयमध्यात्मं वहिश्च विविक्त- चित्तो विहरन्मुक्त इत्युच्यते ॥ २ ॥ बार-बार मनन भावना करने वाले को सम्यग्दर्शन, याथातथ्य ज्ञान अर्थात् तत्त्वज्ञान हो जाता है । और इस तरह— दोषनिमित्त शरीरादि के तत्त्वज्ञान से अहङ्कार निवृत्त हो जाता है ॥ १ ॥ शरीर से लेकर दुःख तक प्रमेय दोष का हेतु है, क्योंकि मिथ्याज्ञान तद्विषयक होता है । तद्विषयक तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता हुआ अहङ्कार को निवृत्त करता है; क्योंकि समान- विषय में उन दोनों तत्त्व एवं मिथ्या ज्ञानों का विरोध है। इस प्रकार तत्त्वज्ञान से 'दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष, मिथ्या ज्ञानों के उत्तरोत्तर अपाय से उससे पूर्व-पूर्व के न होने से अप- वर्ग हो जाता हैं' (१. १. २) । यहाँ यह शास्त्रार्थसंग्रह तत्रोक्त तत्त्वज्ञान का उत्पत्ति प्रकार दिखाने के लिए उक्त सूत्र का अनुवाद ही है कोई अपूर्व विषय नहीं उठाया गया है ॥ १ ॥ ( इस समाधिज ) तत्त्वज्ञान् का क्रम यह है— सङ्कल्पकृत रूपादि विषय दोषों के कारण होते हैं ॥ २ ॥ इन्द्रियों के अर्थ रूपादि कामविषय हैं । वे मिथ्या संकल्पित किये जाते हुए राग द्वेष मोह को प्रवृत्तित करते हैं । जिज्ञासु पहले उनका तत्त्वज्ञान करें । उनका तत्त्वज्ञान होने पर तत्त्ववेत्ता का रूपादिविषयक मिथ्यासंकल्प निवृत्त हो जाता है । उनके निवृत्त होने पर वह अध्यात्म शरीरेन्द्रियादि का तत्त्व जानने का प्रयास करे । उसके तत्त्वज्ञान से अध्यात्मविषयक अहङ्कार निवृत्त हो जाता है । इस प्रकार रूपादि विषय तथा शरीरादि को तत्त्वतः जानकर यह ज्ञानी रागद्वेषादि से विमुक्तचित्त होकर लोकयात्रा करता हुआ भी 'मुक्त' कहलाता है ॥ २ ॥ १. 'सङ्कल्पः = समीचीनोऽयमिति मानसं' इति वार्त्तिककृतः ।

३. सू० ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् ३१९

३. सू० ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् ३१९ अतः परं काचित्संज्ञा हेया, काचिद्भावयितव्येत्युपदिश्यते, नार्थनिराकरणम्, अर्थोपादानं वा । कथमिति ? तन्निमित्तं त्ववयव्यभिमानः ॥ ३ ॥ तेषां दोषाणां निमित्तं त्ववयव्यभिमानः । सा च खलु स्त्रीसंज्ञा सपरिष्कारा पुरुषस्य, पुरुषसंज्ञा च स्त्रियाः । परिष्कारश्च निमित्तसंज्ञा, अनुव्यञ्जनसंज्ञा च । निमित्तसंज्ञा—रसनाश्रोत्रम्, दन्तोष्ठम्, चक्षुर्नासिकम् । अनुव्यञ्जनसंज्ञा-इत्थं दन्तौ इत्थमोष्ठाविति । सेयं संज्ञा कामं वर्धयति, तदनुषक्तांश्च दोषान् विवर्ज- नीयान् । वर्जनं त्वस्या भेदेनावयवसंज्ञा केशलोममांसशोणितास्थिस्नायुशिरा- कफपित्तोच्चारादिसंज्ञा, तामशुभसंज्ञेत्याचक्षते । तामस्य भावयतः कामरागः प्रहीयते । सत्येव च द्विविधे विषये काचित्संज्ञा भावनीया, काचित्परिवर्जनीयेत्यु- पदिश्यते, यथा विषसम्पृक्तेऽन्नेऽन्नसंज्ञोपादानाय, विषसंज्ञा प्रहाणायेति ॥ ३ ॥ अब इससे आगे 'कौन सी बात छोड़नी चाहिए, किस का ग्रहण करना चाहिए'— इसी का उपदेश किया जा रहा है। न कि उसका सर्वांशतः ग्रहण या त्याग अपेक्षित है। कैसे ?— अवयवी (कामिनी-शरीरादि) का अभिमान ही दोषों का कारण है ॥ ३ ॥ उन दोषों का कारण है अवयव्यभिमान । जैसे पुरुष को स्त्रीविषय में 'सुन्दर स्त्री' यह भावना राग का कारण होती है, तथा स्त्री की पुरुष के विषय में 'सुन्दर पुरुष' यह भावना राग का कारण होती है । संज्ञा के दो भेद होते हैं— १. निमित्त, २. अनुव्यञ्जन । जैसे—उसके कान, दांत, आँख नाक को लेकर सम्मुग्ध की तरह भावना निमित्त है; तथा 'इसके ऐसे सुन्दर दांत है, ऐसे सुन्दर ओठ हैं'—इत्यादि भावना अनुव्यञ्जन है। यह कामुक- भावना वासना को बढ़ाती है तथा तदनुषक्त विवर्जनीय दोषों को भी बढ़ावा देती है। इस भावना का परिहार अवयवभावना से होता है। अर्थात् स्त्री-विषयक आसक्ति को हटाने के लिए उस स्त्री के अवयवों के वारे में जिज्ञासु तत्त्वतः सोचे कि यह समग्र शरीर तो केश, रोम, मांस, रक्त, अस्थि, स्नायु, शिरा, कफ-पित्त, मल-मूत्र से भरा पड़ा है, इसमें कौन सी अच्छी चीज है, जिसके लिए मेरी इतनी अधिक आसक्ति हो ! इन अवयवों पर इस रूप से विचार को 'अशुभसंज्ञा' भी कह देते हैं। इस प्रकार उक्त साधक का कामज राग क्षीण हो जाता है । इस तरह विषय के शुभ-अशुभ रूप से दो भेद दिखाते हुए उक्त कामिनी- शरीरादि में कोई संज्ञा (निमित्त संज्ञा, तथा अनुव्यञ्जन संज्ञा) छोड़ने के लिए तथा किसी संज्ञा (अवयव संज्ञा या अशुभ संज्ञा) का ग्रहण (भावना) करने के लिए उपदेश देते हैं । जैसे विषसम्पृक्त अन्न में 'अन्न' संज्ञा ग्रहण के लिए होती है, तथा 'विष' संज्ञा त्याग के लिए होती है ॥ ३ ॥

प्रासङ्गिकम् अवयविप्रकरणम् [ ४-१७ ]

३२० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० प्रासङ्गिकम् अवयविप्रकरणम् [ ४-१७ ] अथेदानीमर्थं निराकरिष्यताऽवयव्युपपाद्यते— विद्याऽविद्याद्वैविध्यात् संशयः ? ॥ ४ ॥ सदसतोरुपलम्भाद्विद्या द्विविधा, सदसतोरनुपलम्भादविद्यापि द्विविधा । उप- लभ्यमानेऽवयविनि विद्याद्वैविध्यात् संशयः, अनुपलभ्यमाने चाविद्याद्वैविध्यात् संशयः । सोऽयमवयवी यद्युपलभ्यते, अथापि नोपलभ्यते—न कथञ्चन संशयान्मु- च्यते इति ? ॥ ४ ॥ तदसंशयः; पूर्वहेतुप्रसिद्धत्वात् ॥ ५ ॥ तस्मिन्ननुपपन्नः संशयः । कस्मात् ? पूर्वोक्तहेतूनामप्रतिषेधादस्ति द्रव्या- न्तरारंभ इति ॥ ५ ॥ वृत्त्यनुपपत्तेरपि तर्हि न संशयः ? ॥ ६ ॥ संशयानुपपत्तिर्नास्त्यवयवीति ? ॥ ६ ॥ तद्विभजते— पूर्वोक्त निमित्त-अनुव्यञ्जन संज्ञाओं का अवयवी ही विषय है, उन संज्ञाओं में से कतिपय के परिवर्जन के लिये 'अशुभ संज्ञा' का उपदेश किया गया । अब विज्ञानवादी बौद्ध के मत में जब अर्थमात्र नहीं है तो अवयवी तथा तदाश्रित उक्त संज्ञाएँ कहाँ होंगी ! अतः वह अर्थ का खण्डन करना चाहता हुआ पहले अवयवी का निराकरण कर रहा है— विद्या, अविद्या के द्वैविध्य से संशय होता है ? ॥ ४ ॥ सत्, असत् की उपलब्धि से विद्या दो प्रकार की है। सत्, असत् की अनुपलब्धि से अविद्या भी दो प्रकार की है। अवयवी के उपलब्ध होने पर विद्याद्वैविध्य से संशय होता है ! तथा उसके अनुपलब्ध रहने पर अविद्याद्वैविध्य से भी संशय होगा । इस तरह यह अवयवी भले ही उपलब्ध होता हो या न उपलब्ध होता हो—किसी भी तरह संशय से मुक्त नहीं होता ॥ ४ ॥ पूर्व हेतु की सिद्धि से संशय उपपन्न नहीं है ॥ ५ ॥ उस अवयवी में संशय नहीं है; क्योंकि पूर्वोक्त हेतुओं से अवयवी के बारे में सिद्धि की जा चुकी है कि अवयवी द्रव्यान्तर से आरब्ध होता है। ऐसा सिद्ध हो जाने के बाद उसमें संशय क्यों होगा ! ॥ ५ ॥ (हमारा भी यही कहना है कि) सत्तानुपपत्ति से भी उसमें संशय नहीं है ? ॥ ६ ॥ विज्ञानवादी ( बौद्ध ) प्रतिबन्दी उत्तर देता है—हमारा भी यही कहना है कि वहाँ संशय नहीं होता; क्योंकि अवयवी की सत्ता ही सिद्ध नहीं होती ? ॥ ६ ॥ इसी का वह (विज्ञानवादी) उपपादन करता है—

९. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२१

९. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२१ कृत्स्नैकदेशावृत्तित्वादवयवानामनवयव्यभावः ? ॥ ७ ॥ एकैकोऽवयवो न तावत् कृत्स्नेऽवयविनि वर्त्तते; तयोः परिमाणभेदात्, अवय- वान्तरसम्बन्धाभावप्रसङ्गाच्च । नाप्यवयव्येकदेशेन, न ह्यस्यान्ये अवयवा एक- देशभूताः सन्तोति ? ॥ ७ ॥ अथावयवेष्वेवावयवी वर्त्तते ? तेषु चावृत्तेरवयव्यभावः ? ॥ ८ ॥ न तावत् प्रत्यवयवं वर्त्तते, तयोः परिमाणभेदाद्, द्रव्यस्य चैकद्रव्यत्वप्रसङ्गात् । नाप्येकदेशेन, सर्वेषु अन्यावयवाभावात् । तदेवं न युक्तः संशयः—नास्त्यव- यवोति ? ॥ ८ ॥ पृथक् चावयवेभ्योऽवृत्तेः ॥ ९ ॥ अवयव्यभाव इति वर्त्तते । न चायं पृथगवयवेभ्यो वर्त्तते; अग्रहणात्, नित्यत्व- प्रसंगाच्च । तस्मान्नास्त्यवयवीति ? ॥ ९ ॥ अवयवों के सम्पूर्ण या एकदेश में अवयवों के न रहने से उसकी सिद्धि नहीं होती ? ॥ ७ ॥ एक एक अवयव समग्र अवयवी में नहीं रहता; क्योंकि उन दोनों में परिमाणभेद हैं (अवयव अणुपरिमाण तथा अवयवी महापरिमाण हैं), तथा वैसी स्थिति में अवयवा- न्तर का उससे सम्बन्ध भी न बन पायेगा । और न अवयव उसके एकदेश में ही रहता है; क्योंकि अवयवों को छोड़ कर इसका कोई अन्य एकदेश नहीं है। यदि सब अवयव ही अवयवी हैं इस स्थिति में जितने अवयव हैं उतने ही अवयवी होने लगेंगे; जबकि आप अवयवी को एक मानते हैं ? ॥ ७ ॥ तो अवयवों में अवयवी रहता है—ऐसा मान लें ? उन अवयवों में अवयवी के वर्त्तमानत्व की अनुपपत्ति से अवयवी का अभाव ही है ? ॥ ८ ॥ पूर्वोक्त परिमाणभेद होने से अवयवी प्रत्येक अवयव में नहीं रह सकता; तथा एकावयववृत्ति होने से एक द्रव्य में एकसमवेत द्रव्यत्वप्रसक्ति होने लगेगी। अवयवी अपने एकदेश से प्रत्येक अवयव में नहीं रह सकता; क्योंकि सभी अवयवों में अन्य अवयव का अभाव ही है। अतः इसमें आप सन्देह क्यों कर रहे हैं कि अवयवी नहीं है ? ॥ ८ ॥ अवयव से पृथक् उसकी सत्ता न होने के कारण भी ? ॥ ९ ॥ अवयवी का अभाव ही है। अवयवी अवयवों से पृथक् नहीं हैं, क्योंकि वैसा गृहीत नहीं होता। अथ च, उसे पृथक् मानने पर उसके निराधार होने से उसमें नित्यत्व प्राप्त होगा। अतः अवयवी नहीं है—यही मान लें ? ॥ ९ ॥ न्या० दर्श० २१

३२२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० न चावयव्यवयवाः ? ॥ १० ॥ न चावयवानां धर्मोऽवयवी । कस्मात् ? धर्ममात्रस्य धर्मिभिरवयवैः पूर्ववत् सम्बन्धानुपपत्तेः । पृथक् चावयवेभ्यो धर्मिभ्यो धर्मस्याग्रहणादिति समानम् ॥ १० ॥ एकस्मिन् भेदाभावाद् भेदशब्दप्रयोगानुपपत्तेरप्रश्नः ॥ ११ ॥ किं प्रत्यवयवं कृत्स्नोऽवयवी वर्त्तते, अथैकदेशेन ? इति नोपपद्यते प्रश्नः । कस्मात् ? एकस्मिन् भेदाभावाद् भेदशब्दप्रयोगानुपपत्तेः । 'कृत्स्नम्' इत्यनेकस्या- शेषाभिधानम्, 'एकदेशः' इति नानात्वे कस्यचिदभिधानम्—ताविमौ कृत्स्नैक- देशशब्दौ भेदविषयौ नैकस्मिन्नवयविन्युपपद्येते; भेदाभावादिति ॥ ११ ॥ 'अन्यावयवाभावान्नैकदेशेन वर्त्तते' इत्यहेतुः अवयवान्तरभावेऽप्यवृत्तेरहेतुः ॥ १२ ॥ अवयवान्तरभावादिति । यद्यप्येकदेशोऽवयवान्तरभूतः स्यात्, तथाप्यवयवे- ऽवयवान्तरं वर्त्तत नावयवीति । अन्योऽवयवीति अन्यावयवभावेऽप्यवृत्तेर- 'अवयवों का धर्ममात्र हो अवयवी हैं'—यह मत भी युक्त नहीं ? ॥ १० ॥ 'अवयवों का धर्म' भी अवयवी नहीं है; क्योंकि धर्ममात्र अवयवी का धर्मी अवयवों से किसी भी तरह पूर्ववत् कोई सम्बन्ध नहीं बन सकता । और धर्मी अवयवों से धर्म का पृथक् ग्रहण नहीं हुआ करता, अन्यथा वह नित्य होने लगेगा ? ॥ १० ॥ सिद्धान्ती उत्तर देता है— एक अवयवी में भेद न होने के कारण 'भेद' शब्द प्रयोग अयुक्त होने से आपका प्रश्न नहीं बनता ॥ ११ ॥ 'क्या प्रत्येक अवयव में अवयवी रहता है, या एकदेश में ?' यह प्रश्न उचित नहीं; क्योंकि एक में भेद न होने से भेद ( पार्थक्य ) वाचक शब्द का प्रयोग अनुचित है । क्योंकि 'कृत्स्न' ( समग्र )—यह अनेक होते हुए अशेष का बोधन करता है, 'एकदेश' यह भी अनेक में एक का बोधन करता है । अर्थात् ये 'कृत्स्न' तथा 'एकदेश' शब्द भिन्न वस्तु के बोधक हैं, अतः एक अवयवी में उपपन्न नहीं होते; क्योंकि उनमें भेद नहीं है ॥ ११ ॥ 'परिमाण भेद होने के कारण अवयवी में अवयव न रहने से अवयवान्तर भी न होने से अवयवी एकदेश में नहीं रहता'—यह भी अहेतु है । अवयवान्तर होने पर भी उसमें अवयवी के न रहने से वह अहेतु है ॥ १२ ॥ अवयवान्तर होने से । यद्यपि अवयवी एकदेशेन अवयवान्तर में रह सकता है तो भी अवयव में अवयवान्तर ही रहेगा, अवयवी नहीं । 'अवयवी अन्य है, अवयव अन्य, अतः वह अवयवों से गृहीत नहीं होता, यों अन्यावयव न होने से वह एकदेश से गृहीत नहीं

१३. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२३

१३. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२३ वयविनो नैकदेशेन वृत्तिरन्यावयवाभावादित्यहेतुः । वृत्तिः कथमिति चेत् ? एकस्यानेकत्राश्रयाश्रितसम्बन्धलक्षणा प्राप्तिः । आश्रयाश्रितभावः कथमिति चेत् ? यस्य यतोऽन्यत्रात्मलाभानुपपत्तिः स आश्रयः । न कारणद्रव्येभ्योऽन्यत्र कार्यद्रव्यमात्मानं लभते, विपर्ययस्तु कारणद्रव्येष्विति । नित्येषु कथमिति चेत् ? अनित्येषु दर्शनात् सिद्धम् । नित्येषु द्रव्येषु कथमाश्रयाश्रयिभाव इति चेत् ? अनित्येषु द्रव्यगुणेषु दर्शनादाश्रयाश्रितभावस्य, नित्येषु सिद्धिरिति । तस्माद- वयव्यभिमानः प्रतिषिद्ध्यते निःश्रेयसकामस्य, नावयवी; यथा-रूपादिषु मिथ्या- सङ्कल्पः, न रूपादय इति ॥ १२ ॥ सर्वाग्रहणमवयव्यसिद्धेः ( २.१.३५ ) इति प्रत्यवस्थितोऽप्येतदाह— केशसमूहे तैमिरिकोपलब्धिवत् तदुपलब्धिः ? ॥ १३ ॥ यथैकैकः केशस्तैमिरिकेण नोपलभ्यते, केशसमूहस्तूपलभ्यते, तथैकैकोऽणुर्नो- पलभ्यते, अणुसञ्चयस्तूपलभ्यते । तदिदमणुसमूहविषयं ग्रहणमिति ? ॥ १३ ॥ होता' यह अहेतु ही है ! अवयवों में यह अवयवी की वृत्ति कैसे है ? एक ( अवयवी ) की अनेक ( अवयवों ) में आश्रयाश्रित सम्बन्ध ( समवायसम्बन्ध ) से प्राप्तिवृत्ति । आश्रयाश्रित सम्बन्ध क्या है ? जिसकी जिससे अन्यत्र सत्ता न मिल पाये वह 'आश्रय' है । कारणद्रव्यों से अन्यत्र कार्यद्रव्य की सत्ता नहीं मिलती, अतः कारण कार्यद्रव्य का आश्रय है । इसके विपरीत, कारणद्रव्य ( मृत्तिकादि ) कार्यद्रव्य के अतिरिक्त कुम्भकार के घर में भी मिल सकता है, अतः वह कार्यद्रव्य का आश्रित नहीं । नित्य पदार्थों में यह व्यवस्था कैसे बैठाओगे ? अनित्य ( द्रव्यगुणों ) में यह आश्रयाश्रितभाव देखा जाने से नित्यों में भी उसका अनुमान कर लेंगे । अतः मुमुक्षु के लिये अवयव्यभिमान निषिद्ध बताया है, अवयवी नहीं; जैसे रूपादि में मिथ्यासङ्कल्प निषिद्ध किया है, न कि रूपादि ॥ १२ ॥ ‘अवयवी को न मानोगे तो समग्र द्रव्य का ग्रहण न होगा'—( २.१.३५ ) इस प्रक- रण में हम इस शून्यवादी की युक्तियाँ निरस्त कर चुके हैं, अब फिर बात आ पड़ी तो घुमा फिरा कर वह वही युक्तियाँ दे रहा है— तिमिररोगग्रस्त रोगी को केशसमूह की उपलब्धि के समान ही यह उप- लब्धि है ? १३ ॥ जैसे तिमिरोग ( आन्ध्य = मोतियाबिन्द ) ग्रस्त को एक-एक केश नहीं दिखायी देता, परन्तु केशसमूह ( केशों का गुच्छा ) को वह देख लेता है, उसी तरह अवयव ( अणु ) न दिखायी दे पाने पर भी अवयवसमूह ( अणुसमूह = द्रव्य ) दिखायी दे जाता है—यह मान लेने से काम चल सकता है तो अवयवी ( द्रव्यान्तर ) मानने से क्या लाभ ? ॥ १३ ॥

३२४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [४. अ० २. आ० स्वविषयानतिक्रमेणेन्द्रियस्य पटुमन्दभावाद्विषयग्रहणस्य तथाभावो नाविषये प्रवृत्तिः ॥ १४ ॥ यथाविषयमिन्द्रियाणां पटुमन्दभावाद्विषयग्रहणानां पटुमन्दभावो भवति । चक्षुः खलु प्रकृष्यमाणं नाविषयं गन्धं गृह्णाति, निकृष्यमाणं च न स्वविषयात् प्रच्यवते । सोऽयं तैमिरिकः कश्चिच्चक्षुर्विषयं केशं न गृह्णाति, कश्चिद् गृह्णाति केशसमूहम्; उभयं ह्यतैमिरिकेण चक्षुषा गृह्यते । परमाणवस्त्वतीन्द्रिया इन्द्रिया- विषयभूता न केनचिदिन्द्रियेण गृह्यन्ते, समुदितास्तु गृह्यन्ते—इत्यविषये प्रवृत्तिरिन्द्रियस्य प्रसज्येत । न जात्वर्थान्तरमणुभ्यो गृह्यते इति । ते खल्विमे परमाणवः सन्निहिता गृह्यमाणा अतीन्द्रियत्वं जहति, वियुक्ताश्चागृह्यमाणा इन्द्रियविषयत्वं न लभन्ते इति । सोऽयं द्रव्यान्तरानुत्पत्तावतिमहान् व्याघातः । इत्युपपद्यते द्रव्यान्तरं यद् ग्रहणस्य विषय इति । सञ्चयमात्रं विषय इति चेद् ? न; सञ्चयस्य संयोगाभावात् तस्य चातीन्द्रि- यस्याग्रहणादयुक्तम् । सञ्चयः खल्वनेकस्य संयोगः, स च गृह्यमाणाश्रयो गृह्यते स्वविषय (रूपरसादि) के अनतिक्रम से इन्द्रियों के तीव्र मन्द भाव से विषयज्ञान में तीव्रता-मन्दता आ जाती है, अपने से अविषयों में उनकी प्रवृत्ति नहीं हुआ करती ॥१४॥ स्व-स्व विषय के अनुसार, इन्द्रियों की पटुता-मन्दता से विषयज्ञान में पटुता-मन्दता आ जाती हैं । चक्षु पर कितना भी दबाव डाला जाये वह अपने अविषय गन्ध का ग्रहण नहीं कर पाती । या उस पर कितना भी नियन्त्रण रखा जाये वह स्वविषय (रूप) से प्रच्युत भी नहीं होती । यहाँ कोई तिमिररोगी चक्षुर्विषय केश को नहीं देख पाता, कोई केशसमूह को देख लेता है; परन्तु स्वस्थनेत्र पुरुष केश तथा केशसमूह—दोनों को देख सकता है। परन्तु परमाणु तो अतीन्द्रिय होने से इन्द्रिय के अविषय हैं वे किसी भी चक्षु से देखे नहीं जा सकते, हाँ वे समुदित हों तो देखे जा सकते हैं। तात्पर्य यह निकला कि इन्द्रिय की प्रवृत्ति अविषय में नहीं होगी। यदि ऐसा कहा जाय कि वहाँ परमाणु से अतिरिक्त गृहीत नहीं होता । इसका अर्थ यह हुआ कि परमाणु जब इकट्ठे होते हैं तो अपने अतीन्द्रियत्व को छोड़ देते हैं, पर जब अलग अलग होते हैं तो इन्द्रिय-विषय नहीं बनते । तो जो परमाणु अतीन्द्रिय है वही इन्द्रियविषय भी बन जाता है, यह बात द्रव्या- न्तरानुत्पत्ति में विरुद्ध पड़ रही है । अतः आपके कथन से ही सिद्ध हो जाता है कि जो इन्द्रिय-विषय है वह द्रव्यान्तर (अवयवी) है । परमाणुओं का सञ्चय ही इन्द्रिय का विषय बन जाता है, वह सञ्चय द्रव्यान्तर नहीं है ? ऐसा भी नहीं कह सकते; क्योंकि सञ्चय संयोगसम्बन्ध से अतिरिक्त नहीं है और वह अतीन्द्रिय है-उसका ग्रहण कैसे होगा ! तात्पर्य यह है कि 'सञ्चय' कहते हैं अनेक के

१६. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२५

१६. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२५ नातीन्द्रियाश्रयः। भवति हि-'इदमनेन संयुक्तम्' इति, तस्मादयुक्तमेतदिति। गृह्यमाणस्य चेन्द्रियेण विषयस्याऽऽवरणाद्यनुपलब्धिकारणमुपलभ्यते। तस्मा- न्नेन्द्रियदौर्बल्यादनुपलब्धिरणूनाम्, यथा-नेन्द्रियदौर्बल्याच्चक्षुषाऽनुपलब्धि- र्गन्धादीनामिति ॥ १४ ॥ अवयवावयविप्रसङ्गश्चैवमाप्रलयात् ॥ १५ ॥ यः खल्ववयविनोऽवयवेषु वृत्तिप्रतिषेधादभावः, सोऽयमवयवस्यावयवेषु प्रसज्यमानः सर्वप्रलयाय वा कल्पेत, निरवयवाद्वा परमाणूतो निवर्त्तेत, उभयथा चोपलब्धिविषयस्याभावः, तदभावादुपलब्ध्यभावः। उपलब्ध्याश्रयश्चायं वृत्ति- प्रतिषेधः। स आश्रयं व्याघ्नन्नात्मघाताय कल्पत इति ॥ १५ ॥ अथापि— न प्रलयोऽणुसद्भावात् ॥ १६ ॥ अवयवविभागमाश्रित्य वृत्तिप्रतिषेधादभावः प्रसज्यमानो निरवयवात् पर- संयोग को, वह संयोग इन्द्रियगोचर द्रव्यों का हो तो गृहीत हो सकता है, परन्तु अती- न्द्रियों का नहीं गृहीत होता ! जैसे कि लोक में कहा जाता है 'यह इससे संयुक्त है', यहाँ संयोग और संयुज्यमान दोनों इन्द्रियविषय है। आवरणादिक भी इन्द्रिय से गृह्यमाण विषय की अनुपलब्धि के ही कारण कहलाते हैं; अतीन्द्रिय की अनुपलब्धि के नहीं। अतः परमाणुओं की अनुपलब्धि इन्द्रियदौर्बल्य के कारण नहीं, अपितु उनकी अतीन्द्रियता के कारण है। जैसे चक्षु से गन्ध की अनुपलब्धि उसके दौर्बल्य के कारण नहीं, अपितु उसके अविषय के कारण है ॥ १४ ॥ (पृथक् अवयवी न मानने से) अवयवों के भी अवयवी प्रसक्त होंगे, यों सर्वप्रलय (अभाव) हो जायेगा ॥ १५ ॥ यह जो आप अवयवों में न रहने से अवयवी का प्रतिषेध करते हैं, यह प्रतिषेध फिर अवयवों के अवयव में भी होने लगेगा, तब आश्रयव्याघात से वह सब कुछ रहेगा ही नहीं, अर्थात् यह प्रतिषेध उसे प्रलय (अभाव) की तरफ ढकेल देगा। यदि निरवयव होने से उक्त प्रतिषेध परमाणु से निवृत्त होगा तो भी दोनों ही पक्ष में उपलब्धि-विषय कोई रहेगा नहीं, उसके न रहने से उपलब्धि कहाँ से होंगी ! जो उपलब्धि का आश्रय (अवयवी) है, उसको आप मान नहीं रहे हैं। इस तरह आश्रय का विरोध करके आप अपने ही पक्ष से अपने पक्ष का खण्डन कर रहे हैं ! ॥ १५ ॥ [तुष्यतुदुर्जनन्याय से हमने कह दिया था कि प्रलय (सर्वाभाव) हो जायेगा, वस्तुतः सर्वाभाव है नहीं; क्योंकि परमाणु अविनाशी है। वही प्रसङ्ग उठा रहे हैं—] अणु के रहने से प्रलय नहीं होगा ॥ १६ ॥ अवयवविभाग मानने पर, वृत्ति का प्रतिषेध होने से प्रलय (अभाव) प्रसक्त होगा।

३२६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० माणोर्निवर्तते न सर्वप्रलयाय कल्पते । निरवयवत्वं खलु परमाणोर्विभागैरल्पतर- प्रसङ्गस्य यतो नाल्पीयस्तत्रावस्थानात् । लोष्टस्य खलु प्रविभज्यमानावयवस्या- ल्पतरमल्पतममुत्तरमुत्तरं भवति । स चायमल्पतरप्रसङ्गो यस्मान्नाल्पतरमस्ति यः परमोऽल्पस्तत्र निवर्त्तते, यतश्च नाल्पीयोऽस्ति तं परमाणुं प्रचक्ष्महे इति ॥१६॥ परं वा त्रुटेः १ ॥ १७ ॥ अवयवविभागस्यानवस्थानाद् द्रव्याणामसंख्येयत्वात् त्रुटित्वनिवृत्तिरिति ॥१७ औपोद्धातिकं निरवयवप्रकरणम् [ १८-२५ ] अथेदानीमानुपलम्भिकः सर्वं नास्तीति मन्यमान आह— आकाशव्यतिभेदात् तदनुपपत्तिः ॥ १८ ॥ तस्याणोर्निरवयवस्य नित्यस्यानुपपत्तिः । कस्मात् ? आकाशव्यतिभेदात् । अन्तर्बहिश्चाणुराकाशेन समाविष्टो व्यतिभिन्नो व्यतिभेदात् सावयवः; सावयव- त्वादनित्य इति ? ॥ १८ ॥ निरवयव होने से परमाणु में यह सिद्धान्त लागू नहीं होता, अतः सर्वप्रलय की कल्पना नहीं हो सकती । निरवय से तात्पर्य है कि छोटे-से छोटा विभाग करने पर उससे छोटा कोई विभाग न हो पाये । परमाणु की यही स्थिति है, इसका कोई विभाग नहीं हो पाता । जैसे ढेले को जब हम खण्डशः विभक्त करते हैं तो उसका अल्प से अल्प या बड़े से बड़ा विभाग हो सकता है, यह विभाग परमाणु में प्रसक्त नहीं होता । अर्थात् यह विभागवाली बात जहाँ जाकर रुक जाती है जिससे कोई अल्पतर विभाग न हो, यों जो स्वयं सबसे छोटा हो । जिससे कोई अल्पतर नहीं है उसे ही हम परमाणु कहते हैं, वह निरवयव है ॥ १६ ॥ त्रसरेणु से परे अन्तिम (सबसे लघु विभाग) है ॥ १७ ॥ अवयवविभाग की कोई सीमा न मानोगे तो अवयवपरम्परा में द्रव्यों के असंख्य होने से त्रसरेणु का 'त्रसरेणु' यह नाम व्यर्थ हो जायेगा । क्योंकि उसमें भी अनन्त विभागों की कल्पना होती चलेगी, उसकी विरति कहाँ होगी ! ॥ १७ ॥ अब शून्यवादी 'सव कुछ नहीं हैं' मानता हुआ कहता है— अणु आकाश से अन्तर्भिद्यमान होने के कारण वह निरवयव नहीं है, अतएव नित्य नहीं माना जा सकता ? ॥ १८ ॥ वह अणु नित्य, निरवयव नहीं हो सकता; क्योंकि वह भी आकाश से संयुक्त होने के कारण अन्तर्भिद्यमान है । अणु भीतर और बाहर देशभेद से आकाश से व्याप्त है, इस आकाशव्याप्ति से उसमें भी अवयव उपपन्न हो सकता है । यदि वह सावयव सिद्ध हो गया तो उसमें नित्यता कैसी ? ॥ १८ ॥ १. त्रुटिः = त्रसरेणुरिति तात्पर्यकृतः । द्व्यणुक एवेत्यन्ये । जालसूर्यमरीचिस्थं त्रसरेणुरजः स्मृतम् ।

२२. सू० ] निरवयवप्रकरणम् ३२७

२२. सू० ] निरवयवप्रकरणम् ३२७ आकाशासर्वंगतत्वं वा ? ॥ १९ ॥ अथैतन्नेष्यते—परमाणोरन्तर्नास्त्याकाशमिति असर्वंगतत्वं प्रसज्यते इति ? अन्तर्बहिश्च कार्यद्रव्यस्य कारणान्तरवचनादकार्ये तदभावः ॥ २० ॥ अन्तरिति पिहितं कारणान्तरैः कारणमुच्यते । बहिरिति च व्यवधायक- मव्यवहितं कारणमेवोच्यते । तदेतत् कार्यद्रव्यस्य सम्भवति; नाणोरकार्यत्वात् । अकार्ये हि परमाणौवन्तर्बहिरित्यस्याभावः । यत्र चास्य भावोऽणुकार्यं तन्न परमाणुः, यतो हि नाल्पतरमस्ति स परमाणुरिति ॥ २० ॥ शब्दसंयोगविभवाच्च सर्वंगतम् ॥ २१ ॥ यत्र क्वचिदुत्पन्नाः शब्दा विभवन्त्याकाशे तदाश्रया भवन्ति, मनोभिः पर- माणुभिस्तत्कार्यैश्च संयोगा विभवन्त्याकाशे, नासंयुक्तमाकाशेन किञ्चिन्मूर्त्तं- द्रव्यमुपलभ्यते, तस्मान्नासर्वंगतमिति ॥ २१ ॥ अव्यूहाविष्टम्भविभुत्वानि चाकाशधर्माः ॥ २२ ॥ या फिर 'आकाश सर्वंगत है' यह अपना सिद्धान्त छोड़ना पड़ेगा ? ॥ १९ ॥ यदि परमाणु में आकाश नहीं मानते हो तो आप ( नैयायिक ) का 'आकाश सर्वंगत हैं' यह सिद्धान्त खण्डित हो जायेगा ? ॥ १९ ॥ अवयवाभिधायक 'अन्तर्' तथा 'बहिर्' शब्द कार्यद्रव्य ( अवयवी ) के कारण- विशेष को ही बतलाते हैं, अतः अकार्यं होने से ( अनवयवी ) परमाणु के वे दोनों सम्भव नहीं हो सकते ॥ २० ॥ 'अन्तर्' अर्थात् पिहित प्रदेश जो घट के अन्दर उसके बाह्य अवयवों से ढका हुआ हो, इसी तरह 'बहिर्' वह कहलाता है जो घट के अन्दर के अवयवों को ढका रखे । 'अन्तर्' यह कारणान्तर से कारण का बोधन कर रहा है तथा बहिर्' यह स्वयं कारण है । ये दोनों शब्द कार्यद्रव्य के बोध में सम्भव हो सकते हैं, परन्तु परमाणु के नहीं, क्योंकि वह अकार्यं है । अकार्य ( निरवयव ) परमाणु में 'अन्तर्' 'बहिर्' क्या बनेंगे ! जिसके ये होते हैं वह अणु-कार्य है, उसे परमाणु नहीं कहते । जैसा कि हम अभी पीछे कह आये हैं कि परमाणु उसे कहते हैं जिसका कोई अन्य लघुतर विभाग न किया जा सके ॥ २० ॥ हमारा आकाश का सर्वंगतत्व शब्दसंयोग के सार्वत्रिक होने से उपपन्न हो जाता है ॥ २१ ॥ जहाँ कहीं उत्पन्न शब्द वर्तमान होते हैं वहाँ वे आकाश में रहते ही हैं क्योंकि वे आकाशाश्रित हैं । तथा मन, परमाणु और कार्य-द्रव्यों के संयोग आकाश में आश्रय पाते हैं । ऐसा कोई मूर्त द्रव्य नहीं जो आकाश से असंयुक्त हो । अतः यह मानना ही पड़ेगा कि आकाश असर्वगत नहीं है ॥ २१ ॥ अव्यूह ( मिश्रित द्रव्य का अपरावर्तन ), अविष्टम्भ ( अन्य देश में गत्यभाव ) तथा विभुत्व—ये आकाश के धर्म हैं ॥ २२ ॥

३२८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० संसर्पता प्रतिघातिना द्रव्येण न व्यूह्यते यथा काष्ठेनोदकम् । कस्मात् ? निरवयवत्वात् । सर्पच्च प्रतिघाति न विष्टभ्नाति—नास्य क्रियाहेतुं गुणं प्रति- बध्नाति, कस्मात् ? अस्पर्शत्वात्, विपर्यये हि विष्टम्भो दृष्ट इति स भवान् सावयवे स्पर्शवति द्रव्ये दृष्टं धर्मं विपरीते नाशङ्कितुमर्हति । अण्ववयवस्याणुतरत्वप्रसङ्गादणुकार्यप्रतिषेधः । सावयवत्वे चाणोरण्ववयवोऽणुतर इति प्रसज्यते । कस्मात् ? कार्यकारण- द्रव्ययोः परिमाणभेददर्शनात् । तस्मादण्ववयवस्याणुतरत्वम्, यस्तु सावयवोऽणु- कार्यं तदिति । तस्मादणुकार्यमिदं प्रतिषिध्यते इति । कारणविभागाच्च कार्यस्यानित्यत्वम्; नाकाशव्यतिभेदात् । लोष्टस्यावयव- विभागादनित्यत्वम्; नाकाशसमावेशादिति ॥ २२ ॥ मूर्तिमतां च संस्थानोपपत्तेरवयवसद्भावः ? ॥ २३ ॥ परिच्छिन्नानां हि स्पर्शवतां संस्थानम्—त्रिकोणं चतुरस्रं समं परिमण्डल- मित्यपपद्यते, यत्तत् संस्थानं सोऽवयवसंन्निवेशः । परिमण्डलाश्चाणवः, तस्मात् सावयवा इति ? ॥ २३ ॥ आकाश, निरवयव होने से, क्रियावान् द्रव्य द्वारा मिश्रित होकर वह रूपान्तर में परावृत्त नहीं किया जा सकता और क्रियावान् द्रव्य अभिमुख उपस्थित द्रव्य की तरह आकाश द्वारा प्रतिबद्ध नहीं होता, अर्थात् इस द्रव्य के क्रियाहेतुगुण को आकाश स्पर्शवान् न होने से प्रतिबद्ध नहीं कर पाता। क्योंकि निरवयव स्पर्शवान् से विष्टम्भ देखा गया है, इसलिये आप निरवयव तथा अस्पर्शवान् आकाश में भी उस विष्टम्भ की कल्पना करें—यह उचित नहीं ! अणु का भी अवयव मानने पर वह अवयव उससे भी छोटा होगा तथा उस अवयव का भी अन्य अवयव कल्पित किया जा सकता है—इस आनन्त्य-कल्पना से अनवस्था- दोष आने लगेगा—अतः हम अणु के कार्य ( अवयव ) नहीं मानते। तात्पर्य यह है कि अणु को सावयव मानने पर अणु का अवयव उससे भी लघ्वाकार होगा; क्योंकि कार्य- द्रव्य से कारणद्रव्य में परिमाणभेद हुआ ही करता है। अतः अण्ववयव में अणुतरत्व आयेगा, वह अण्ववयव ही अणुकार्य है। उपर्युक्त हेतु ( अनवस्था-दोष ) से हम इस अणु में कार्यत्व का प्रतिषेध करते हैं। यह जो आप लोक में कार्य की अनित्यता देखते हैं वह कारण के विभाग से होती है, न कि आकाश का समावेश होने से । लोष्ट का नाश उसके अवयवों के विनाश से होता है, न कि आकाश के समावेश से ॥ २२ ॥ मूर्तिमान् द्रव्यों में आकारोपपत्ति देखी जाने से अणु के अवयव की सत्ता सिद्ध है ? ॥२३॥ लोक में परिच्छिन्न ( मूर्तिमान् ) स्पर्शवान् द्रव्यों का त्रिकोण, चौकोर, गोल, चपटा—आदि परमाणु का आकार देखा जाता है। वह आकार अवयवों का मिश्रण है। अणु में ऐसा चौकोर आदि भेद उसकी सावयवता से देखा जाता है। अतः वे भी सावयव हैं ? ॥ २३ ॥