ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—४९ देवता—उषा
(१६) सूक्त—४९ देवता—उषा उषो भद्रेभिरा गहि दिवश्चिद्रोचनादधि. वहन्त्वरुणप्सव उप त्वा सोमिनो गृहम्.. (१) हे उषा! प्रकाशमान आकाश से सुंदर मार्ग द्वारा आओ. लाल रंग की गाय तुम्हें सोमयुक्त यजमान के यज्ञ में ले जाए. (१) सुपेशसं सुखं रथं यमध्यस्था उषस्त्वम्. तेना सुश्रवसं जनं प्रावाद्य दुहितर्दिव:.. (२) हे उषा! तुम जिस सुंदर एवं विस्तृत रथ पर बैठती हो, हे स्वर्गपुत्री! उसी रथ से आज हव्यदाता यजमान के पास आओ. (२) वयश्चित्ते पतत्रिणो द्विपच्चतुष्पदार्जुन. उष: प्रारन्नृतूँरनु दिवो अन्तेभ्यस्परि.. (३) हे शुभ्र वर्ण वाली उषा! तुम्हारा आगमन देखकर दो पैरों वाले मनुष्य, चार पैरों वाले पशु एवं पंखों वाले पक्षी अपने-अपने व्यापार में लग जाते हैं. (३) व्युच्छन्ती हि रश्मिभिर्विश्वमाभासि रोचनम्. तां त्वामुषर्वसूयवो गीर्भि: कण्वा अहूषत.. (४) हे उषा! तुम अंधकार का नाश करती हुई अपने तेज से सारे जगत् को प्रकाशित करो. धन चाहने वाले कण्वपुत्रों ने स्तुति वचनों से तुम्हारी प्रशंसा की है. (४) सूक्त—५० देवता—सूर्य उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः. दृशे विश्वाय सूर्यम्.. (१) सूर्य के घोड़े सब प्राणियों को जानने वाले हैं, वे प्रकाशयुक्त सूर्य को इसलिए ऊपर ले जाते हैं कि सारा संसार उन्हें देख सके. (१) अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः. सूराय विश्वचक्षसे.. (२) सबको प्रकाशित करने वाले सूर्य का आगमन देखकर नक्षत्र रात्रिसहित इस प्रकार भाग जाते हैं, जिस प्रकार चोर भागते हैं. (२) eBook converter DEMO Watermarks*
अदृश्रमस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु. भ्राजन्तो अग्नयो यथा.. (३) सूर्य की सूचना देने वाली किरणें चमकती हुई आग के समान हैं. वे एक-एक करके संपूर्ण जगत् को देखती हैं. (३) तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य. विश्वमा भासि रोचनम्.. (४) हे सूर्य! तुम विशाल मार्ग पर चलने वाले समस्त प्राणियों के दर्शनीय एवं प्रकाश के कर्त्ता हो. यह संपूर्ण दृश्य जगत् तुम्हारे द्वारा प्रकाशित होकर चमकने लगता है. (४) प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषान्. प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दृशे.. (५) हे सूर्य! तुम मरुद्देवों एवं मनुष्यों के सामने उदय होते हो. तुम स्वर्गलोक को देखने के लिए उदय होओ. (५) येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु. त्वं वरुण पश्यसि.. (६) हे सूर्य! तुम सबके शोधक एवं अनिष्टनिवारक हो. तुम जिस प्रकार प्रकाश के द्वारा प्राणियों का भरणपोषण करते हुए इस जगत् को देखते हो, हम उसी प्रकाश की स्तुति करते हैं. (६) वि द्यामेषि रजस्पृथ्वहा मिमानो अक्तुभिः. पश्यञ्जन्मानि सूर्य.. (७) हे सूर्य! तुम उसी प्रकाश के द्वारा रात्रि के साथ-साथ दिन का भी उत्पादन करते हुए समस्त प्राणियों को देखते हुए विस्तृत रजौलोक एवं अंतरिक्ष में गमन करते हो. (७) सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य. शोचिष्केशं विचक्षण.. (८) हे सूर्य! तुम दीप्तिमान् एवं सर्वप्रकाशक हो. किरणें ही तुम्हारे केश हैं. हरित नाम के सात घोड़े तुम्हें रथ में बिठाकर ले चलते हैं. (८) अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्यः. ताभिर्याति स्वयुक्तिभिः.. (९) सबके प्रेरक सूर्य ने रथ को खींचने वाली सात घोड़ियों को अपने रथ में जोड़ा है. रथ में जुड़ी हुई उन घोड़ियों के द्वारा ही सूर्य चलते हैं. (९) उद्वयं तमस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरम्. देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्.. (१०) रात्रि के अंधकार के ऊपर उठी ज्योति को देखकर हम समस्त देवों में अधिक प्रकाशयुक्त सूर्य के समीप जाते हैं. सूर्य ही सबसे उत्तम ज्योति वाले हैं. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
उद्यन्नद्य मित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवम्. हृद्रोगं मम सूर्य हरिमाणं च नाशय.. (११) हे सूर्य! तुम सबके अनुकूल प्रकाश से युक्त हो. तुम आज उदय होकर एवं ऊंचे आकाश में चढ़कर मेरा हृदय-रोग एवं हरिमाण नामक शरीर रोग नष्ट करो. (११) शुकेषु मे हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि. अथो हारिद्रवेषु मे हरिमाणं नि दध्मसि.. (१२) मैं अपने हरिमाण नामक शारीरिक रोग को तोता और मैना नामक पक्षियों पर स्थापित करता हूं. मैं अपना हरिमाण रोग को हल्दी पर स्थापित करता हूं. (१२) उदगादयमादित्यो विश्वेन सहसा सह. द्विषन्तं मह्यं रन्धयन्मो अहं द्विषते रधम्.. (१३) ये सम्मुख वर्तमान सूर्य मेरे अनिष्टकारक रोग का विनाश करने के लिए संपूर्ण तेज के साथ उदय हुए हैं. मैं अपने अनिष्टकारी रोग का विनाशकर्त्ता नहीं हूं. (१३) सूक्त—५१ देवता—इंद्र अभि त्वं मेषं पुरुहूतमूग्मियमिन्द्रं गीर्भिर्मदता वस्वो अर्णवम्. यस्य द्यावो न विचरन्ति मानुषा भुजे मंहिष्ठमभि विप्रमर्चत.. (१) हे स्तोताओ! यजमानों द्वारा बुलाए गए, ऋत्विजों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, धन के आवास एवं बलवान् इंद्र को अपने वचनों द्वारा प्रसन्न करो. जो इंद्र सूर्यकिरणों के समान सबका हित करते हैं, उन्हीं अतिशय प्रबुद्ध एवं मेधावी इंद्र की भोग प्राप्ति के लिए अर्चना करो. (१) अभीमवन्वन्त्स्वभिष्टिमूतयोऽन्तरिक्षप्रां तविषीभिरावृतम्. इन्द्रं दक्षाय ऋभवो मदच्युतं शतक्रतुं जवनी सूनृतारुहत्.. (२) सबका रक्षण एवं प्रवर्धन करने वाले ऋभुगण नामक मरुतों ने शोभन, आगमनशील, अपने तेज से आकाश को पूर्ण करने वाले, अति बली, शत्रुओं का गर्व नष्ट करने वाले एवं शतक्रतु इंद्र के सम्मुख आकर उनकी सहायता की. (२) त्वं गोत्रमङ्गिरोभ्योऽवृणोरपोतात्रये शतदुरेषु गातुवित्. ससेन चिच्छिद्रमादायावहो वस्वाजावद्रिं वावसानस्य नर्तयन्.. (३) हे इंद्र! तुमने अव्यक्त शब्द करने वाले एवं वर्षा के निरोधक मेघ को अपने वज्र से हटाकर अंगिरा ऋषियों के लिए जल बरसाया था. जब असुरों ने अत्रि को पीड़ा पहुंचाने के ebook converter DEMO Watermarks*
त्वमपामपिधानाऽवृणोरपाधारयः पर्वते दानुमद्वसु.
लिए शतद्वार नामक यंत्र का प्रयोग किया था, तब तुमने उन्हें मार्ग बताया था. तुमने विमद ऋषि के लिए अन्नयुक्त धन प्रदान किया था, इसी प्रकार तुमने संग्राम में विजय प्राप्ति के लिए स्तुति करने वाले अनेक स्तोताओं को वज्र चलाकर बचाया था. (३) त्वमपामपिधानाऽवृणोरपाधारयः पर्वते दानुमद्वसु. वृत्रं यदिन्द्र शवसावधीरहिमादित्सूर्य दिव्यारोहयो दृशे.. (४) हे इंद्र! तुमने जल के अवरोधक मेघों को हटा दिया है एवं वृत्र आदि असुरों को पराजित करके उनका धन पर्वत पर छिपा दिया है. तुमने तीनों लोकों की हिंसा करने वाले वृत्र का वध किया एवं उसके तुरंत पश्चात् संसार को देखने के लिए सूर्य को आकाश में चढ़ा दिया था. (४) त्वं मायाभिरप मायिनोऽधमः स्वधाभिर्ये अधि शुप्तावजुह्वत. त्वं पिप्रोनृमणः प्रारुजः पुरः प्र ऋजिश्वानं दस्युहत्येष्वाविथ.. (५) हे इंद्र! जो असुर हविष्य अन्नों से सुशोभित अपने मुखों में ही यज्ञीय सामग्री डाल लेते थे, तुमने उन मायावियों को माया द्वारा पराजित किया था. हे यजमानों पर अनुग्रहबुद्धि रखने वाले इंद्र! तुमने पिप्रु असुर के निवासस्थान ध्वस्त कर दिए थे. तुमने हत्या करने के लिए उद्यत दस्युओं के हाथों में पड़े ऋजिश्वान् की पूर्णतया रक्षा की थी. (५) त्वं कुत्सं शुष्णहत्येष्वाविथारन्धयोऽतिथिग्वाय शम्बरम्. महान्तं चिदर्बुदं नि क्रमीः पदा सनादेव दस्युहत्याय जज्ञिषे.. (६) हे इंद्र! तुमने शुष्ण असुर के साथ भयानक संग्राम में कुत्स ऋषि की रक्षा की थी तथा अतिथियों का स्वागत करने वाले दिवोदास को बचाने के लिए शंबर असुर का वध किया था. तुमने अर्बुद नामक महान् असुर को पैरों से कुचल डाला था. इस प्रकार तुम्हारा जन्म दस्युनाश के लिए हुआ जान पड़ता है. (६) त्वे विश्वा ताविषी सध्म्यग्घिता तव राधः सोमपीथाय हर्षते. तव वज्रश्चिकिते बाह्वोर्हितो वृश्चा शत्रोरव विश्वानि वृष्ण्या.. (७) हे इंद्र! तुम में संपूर्ण बल निहित है एवं सोमरस पीने के बाद तुम्हारा मन अत्यंत प्रसन्न हो जाता है. हम यह जानते हैं कि तुम्हारे दोनों हाथों में वज्र रहता है. इसलिए तुम शत्रुओं का समस्त बल छिन्न करो. (७) वि जानीह्यार्यान्ये च दस्यवो बर्हिष्मते रन्धया शासदव्रतान्. शाकी भव यजमानस्य चोदिता विश्वेत्ता ते सधमादेषु चाकन.. (८) हे इंद्र! पहले तुम यह बात जानो कि कौन आर्य है और कौन दस्यु? इसके पश्चात् तुम कुशयुक्त यज्ञों का विरोध करने वालों को नष्ट करके उन्हें यजमानों के वश में लाओ. तुम ebook converter DEMO Watermarks*
शक्तिशाली हो, इसलिए यज्ञ करने वालों के सहायक बनो. मैं स्तोता भी तुम्हें प्रसन्नता देने वाले यज्ञों के तुम्हारे उन समस्त कर्मों की प्रशंसा करना चाहता हूं. (८) अनुव्रताय रन्धयन्नपव्रतानाभूरिन्द्रः श्रथयन्नाभुवः. वृद्धस्य चिद्वर्धतो द्यामिनक्षतः स्तवानो वम्रो वि जघान संदिहः.. (९) जो इंद्र यज्ञविरोधियों को यज्ञप्रिय यजमानों के वश में ला देते हैं तथा अपने अभिमुख स्तोताओं द्वारा स्तुतिपरांगमुखों का नाश करा देते हैं, बभ्रु ऋषि ने ऐसे बुद्धिशील एवं स्वर्गव्यापी इंद्र की स्तुति करते हुए यज्ञ में एकत्रित धन समूह ले लिया था. (९) तक्षद्यत्त उशना सहसा सहो वि रोदसी मज्मना बाधते शवः. आ त्वा वातस्य नृमणो मनोजुज आ पूर्यमाणमवहन्नभि श्रवः.. (१०) हे इंद्र! जब शुक्र ने अपने बल के सहयोग से तुम्हारी शक्ति को तीक्ष्ण कर दिया था, तब तुम्हारे उस विशुद्ध बल ने अपनी तीक्ष्णता द्वारा धरती और आकाश को भयभीत बना दिया था. हे यजमानों के प्रति अनुग्रहबुद्धि रखने वाले इंद्र! बल से पूर्ण तुम्हारी इच्छा से रथ में जोड़े गए एवं वायु के समान वेगशाली घोड़े तुम्हें यज्ञअन्न के सम्मुख ले आवें. (१०) मन्दिष्ट यदुशने काव्ये सचाँ इन्द्रो वङ्कू वङ्कुतराधि तिष्ठति. उग्रो ययिं निरपः स्रोतसासृजद्धि शुष्णस्य दृंहिता ऐरयत्पुरः.. (११) हे इंद्र! जब सुंदर शुक्राचार्य ने तुम्हारी स्तुति की थी, तब तुम वक्रगति वाले दोनों घोड़ों को रथ में जोड़कर उस पर सवार थे. उग्र इंद्र ने चलने वाले बादलों से धारारूप में जल बरसाया था एवं सबको सताने वाले शुष्ण असुर के विस्तृत नगर को नष्ट कर दिया था. (११) आ स्मा रथं वृषपाणेषु तिष्ठसि शार्यातस्य प्रभृता येषु मन्दसे. इन्द्र यथा सुतसोमेषु चाकनोऽनर्वाणं श्लोकमा रोहसे दिवि.. (१२) हे इंद्र! तुम सोमरस पीने के लिए रथ पर बैठकर गमन करते हो. जिस सोम से तुम प्रसन्न होते हो, वही सोम शार्यात राजर्षि ने तैयार किया है. तुम जिस प्रकार अन्य यज्ञों में निचोड़े हुए सोमरस को पीते हो, उसी प्रकार इस शार्यात के सोम की भी कामना करो. ऐसा करने से तुम स्वर्ग में स्थिर यश प्राप्त करोगे. (१२) अददा अर्भा महते वचस्यवे कक्षीवते वृचयामिन्द्र सुन्वते. मेनाभवो वृषणश्वस्य सुक्रतो विश्वेत्ता ते सवनेषु प्रवाच्या.. (१३) हे इंद्र! तुमने यज्ञों में सोम निचोड़ने वाले एवं तुम्हारी स्तुति करने के इच्छुक वृद्ध कक्षीवान् ऋषि को वृचया नामक युवती प्रदान की थी. हे शोभन कर्म करने वाले इंद्र! तुम वृषणाश्व राजा के घर मेना नामक कन्या के रूप में उत्पन्न हुए थे. सोमरस निचोड़ते समय तुम्हारी इन सब कथाओं का वर्णन होना चाहिए. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*
इन्द्रो अश्रायि सुध्यो निरेके पज्रेषु स्तोमो दुर्यो न यूपः. अश्वयुर्गव्यू रथयुर्वस्यूरिन्द्र इद्रायः क्षयति प्रयन्ता.. (१४) शोभन कर्म वाले यजमान निर्धनता से सुरक्षित होने के लिए इंद्र की सेवा करते हैं. अंगिरावंशी यज्ञों के स्तोत्र यज्ञद्वार पर गड़े लकड़ी के खंभों के समान निश्चल हैं. धन देने वाले इंद्र यजमानों के लिए अश्व, रथ एवं विविध संपत्तियों को देने की इच्छा करते हैं तथा सब प्रकार के धन देने के लिए स्थित हैं. (१४) इदं नमो वृषभाय स्वराजे सत्यशुष्माय तवसेऽवाचि. अस्मिन्निन्द्र वृजने सर्ववीराः स्मत्सूरिभिस्तव शर्मन्त्स्याम.. (१५) हे इंद्र! तुम वर्णनशील, अपने तेज के द्वारा प्रकाशित, वास्तविक बलसंपन्न एवं अत्यंत महान् हो. हमने यह स्तुति वचन तुम्हारे लिए ही प्रयोग किया है. हम इस युद्ध में समस्त वीरों सहित विजय प्राप्त करके तुम्हारे द्वारा दिए हुए सुंदर घर में विद्वान् ऋत्विजों के साथ निवास करें. (१५) सूक्त—५२ देवता—इंद्र त्यं सु मेषं महया स्वर्विदं शतं यस्य सुभ्वः साकमीरते. अत्यं न वाजं हवनस्यदं रथेमेन्द्रं ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः.. (१) हे अध्वर्युगणो! उन बली इंद्र की पूजा करो, जिनकी स्तुति सौ स्तोता एक साथ मिलकर करते हैं और जो स्वर्ग प्राप्त करा देते हैं. इंद्र का रथ तेज दौड़ते हुए घोड़े के समान अत्यंत वेगपूर्वक यज्ञ की ओर चलता है. मैं अपनी स्तुतियों के द्वारा इंद्र से अनुरोध करता हूं कि वे उसी रथ पर चढ़कर मेरी रक्षा करें. (१) स पर्वतो न धरुणेष्वच्युतः सहस्रमूतिस्तविषीषु वावृधे. इन्द्रो यद्वृत्रमवधीन्नदीवृतमुब्जन्नर्णोसि जर्हृषाणो अन्धसा.. (२) जिस समय यज्ञीय अन्न से प्रसन्न इंद्र ने जल की वर्षा करते हुए नदी के प्रवाह को रोकने वाले वृत्र का वध किया, उस समय वह धारा रूप में बहने वाले जल के बीच पर्वत के समान अचल रहा एवं उसने मनुष्यों की हजारों प्रकार से रक्षा करके पर्याप्त शक्ति प्राप्त की. (२) स हि द्वरो द्वरिषु व्व्र ऊधनि चन्द्रबुध्नो मदवृद्धो मनीषिभिः. इन्द्रं तमहे स्वपस्यया धिया मंहिष्ठरातिं स हि पप्रिरन्धसः.. (३) मैं विद्वान् ऋत्विजों के साथ आक्रमणकारी शत्रुओं को जीतने वाले, जल के समान आकाश में व्याप्त, सबकी प्रसन्नता के कारण, सोमपान से बुद्धिप्राप्त, महान् एवं धनसंपन्न इंद्र को अपनी शोभन कार्य योग्य बुद्धि से बुलाता हूं, क्योंकि वे इंद्र अन्न को पूर्ण करने वाले ebook converter DEMO Watermarks*
हैं. (३) आ यं पृणन्ति दिवि सद्मबर्हिषः समुद्रं न सुभव१ स्वा अभिष्टयः. तं वृत्रहत्ये अनु तस्थुरूूतयः शुष्मा इन्द्रमवाता अहुतप्सवः.. (४) जिस प्रकार समुद्र की ओर दौड़ती हुई इसकी आत्मीय सरिताएं उसे पूर्ण करती हैं, उसी प्रकार कुशों पर रखा हुआ सोमरस स्वर्गलोक में अवस्थित इंद्र को पूर्णता प्रदान करता है. शत्रुओं का शोषण करने वाले, शत्रुरहित एवं शोभन शरीर मरुद्गण वृत्रवध के समय उन्हीं के सहायक के रूप में उनके पास खड़े थे. (४) अभि स्ववृष्टिं मदे अस्य युध्यतो रघ्वीरिव प्रवणे सस्रूरतयः. इन्द्रो यद्वज्री धृषमाणो अन्धसा भिनद्वलस्य परिधींरिव त्रितः.. (५) जिस प्रकार स्वभाव के अनुसार जल नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार इंद्र के सहायक मरुद्गण सोमपान द्वारा प्रसन्न होकर इंद्र के साथ युद्ध करते हुए वृष्टि के स्वामी वृत्र के सामने गए. जिस प्रकार त्रित नामक पुरुष ने परिधियों का भेदन किया था, उसी प्रकार इंद्र ने सोमरस से शक्तिशाली बनकर बल नामक असुर को विदीर्ण कर दिया था. (५) परीं घृणा चरति तित्विषे शवोऽपो वृत्वी रजसो बुध्नमाशयत्. वृत्रस्य यत्प्रवणे दुर्गुभिष्वनो निजघन्थ हन्वोरिन्द्र तन्यतुम्.. (६) हे इंद्र! वृत्र नामक असुर जल को रोककर आकाश में सोया था. आकाश में वृत्र के विस्तार की कोई सीमा नहीं थी. तुमने अपने शब्द करते हुए वज्र के द्वारा उसी वृत्र की ठोड़ी को जिस समय घायल किया था, उसी समय तुम्हारा शत्रुविजयी तेज विस्तृत हो गया एवं तुम्हारा बल सर्वत्र प्रकाशित हो गया. (६) हृदं न हि त्वा न्यृषन्त्युर्मयो ब्रह्माणीन्द्र तव यानि वर्धना. त्वष्टा चित्ते युज्यं वावृधे शवस्ततक्ष वज्रमभिभूत्योजसम्.. (७) हे इंद्र! जिस प्रकार जल के प्रवाह जलाशय में पहुंच जाते हैं, उसी प्रकार तुम्हारी वृद्धि करने वाले स्तोत्र तुम्हें प्राप्त हो जाते हैं. त्वष्टा देव ने ही तुम्हारे योग्य तुम्हारा बल बढ़ाया है. उसी ने शत्रुओं को अभिभूत करने वाले तेज से संपन्न तुम्हारे वज्र को तीक्ष्ण बनाया है. (७) जघन्वां उ हरिभिः संभृतक्रतविन्द्र वृत्रं मनुषे गातुयन्नपः. अयच्छथा बाह्वोर्वज्रमायसमधारयो दिव्या सूर्यं दृशे.. (८) हे यज्ञकर्म संपादक इंद्र! तुमने अपने भक्तजनों के समीप आने के लिए रथ में अश्व जोड़कर वृत्र असुर का नाश किया, रुके हुए जल की वर्षा की, अपने दोनों बाहुओं में वज्र धारण किया एवं हम सबके दर्शन के निमित्त सूर्य को आकाश में स्थापित किया. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
बृहत्स्वश्चन्द्रमवद्यदुक्थ्य१मकृण्वत भियसा रोहणं दिवः. यन्मानुषप्रधना इन्द्रमूतयः स्वर्णृषाचो मरुतोऽमदन्ननु.. (९) वृत्र असुर के भय से स्तोताओं ने बृहत्, प्रसन्नताकारक तेज से युक्त, बलसंपन्न एवं स्वर्ग के सोपानभूत स्तोत्रों का गान किया था. उस समय स्वर्गलोक की रक्षा करने वाले मरुद्गणों ने मनुष्यों की रक्षा के लिए वृत्र से युद्ध करके एवं स्तोताओं का पालन करके इंद्र को वृत्र वध के लिए उत्साहित किया. (९) द्यौश्चिदस्यामवाँ अहेः स्वनादयोयवीद्भियसा वज्र इन्द्र ते. वृत्रस्य यद्बद्धधानस्य रोदसी मदे सुतस्य शवसाभिनच्छिरः.. (१०) हे इंद्र! जब निचोड़े हुए सोमरस को पीकर तुम अत्यंत हर्षित हो रहे थे, तब तुम्हारे वज्र ने धरती और आकाश में बाधक बनने वाले वृत्र का सिर वेग से काट दिया था. उस समय बलवान् आकाश भी वृत्र के शब्द भय से कांपने लगा था. (१०) यदिन्न्विन्द्र पृथिवी दशभुजिरहानि विश्वा ततनन्त कृष्टयः. अत्राह ते मघवन्विश्रुतं सहो द्यामनु शवसा बर्हणा भुवत्.. (११) हे इंद्र! यदि पृथ्वी अपने वर्तमान आकार से दस गुनी बड़ी होती और उस पर रहने वाले मनुष्य सदा जीवित रहते, तब भी तुम्हारी वृत्रवधकारिणी शक्ति सर्वत्र प्रसिद्ध होती. तुम्हारे द्वारा वृत्र का वध आकाश के समान विशाल कार्य है. (११) त्वमस्य पारे रजसो व्योमनः स्वभूत्योजा अवसे धृषन्मनः. चकृषे भूमिं प्रतिमानमोजसोऽपः स्वः परिभूरेष्या दिवम्.. (१२) हे शत्रुनाशक इंद्र! तुमने इस व्यापक आकाश के ऊपर रहते हुए अपनी शक्ति से हमारी रक्षा करने के निमित्त भूलोक का निर्माण किया है. तुम बल की अंतिम सीमा हो. तुमने सुखपूर्वक गमन करने योग्य आकाश एवं स्वर्ग को व्याप्त कर लिया है. (१२) त्वं भुवः प्रतिमानं पृथिव्या ऋष्ववीरस्य बृहतः पतिर्भूः. विश्वमाप्रा अन्तरिक्षं महित्वा सत्यमद्धा नकिरन्यस्त्वावान्.. (१३) हे इंद्र! जिस प्रकार भूलोक का विस्तार अचिंत्य है, उसी प्रकार तुम्हारी भी महत्ता जानी नहीं जा सकती. तुम दर्शनीय देवों वाले स्वर्ग के पालनकर्ता हो. यह सत्य है कि तुमने अपनी महत्ता से धरती और आकाश के मध्यभाग को पूरित कर दिया है, इसलिए तुम्हारे समान दूसरा कोई नहीं है. (१३) न यस्य द्यावापृथिवी अनु व्यचो न सिन्धवो रजसो अन्तमानशुः. नोत स्ववृष्टिं मदे अस्य युध्यत एको अन्यच्चकृषे विश्वमानुषक्.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*
जिस इंद्र के विस्तार को आकाश और पृथ्वी नहीं पा सके हैं, आकाश के ऊपर होने वाला जलप्रवाह जिस इंद्र के तेज का अंत नहीं जान सका, हे इंद्र! समस्त प्राणी समुदाय उसी तरह तुम्हारे अपने वश में है. (१४) आर्चन्नत्र मरुतः सस्मिन्नाजौ विश्वे देवासो अमदन्ननु त्वा. वृत्रस्य यद्भृष्टिमता वधेन नि त्वमिन्द्र प्रत्यानं जघन्थ.. (१५) हे इंद्र! इस युद्ध में मरुद्गणों ने तुम्हारी अर्चना की थी. जिस समय तुमने तेज धार वाले वज्र से वृत्र के मुख पर चोट की, उस समय समस्त देव संग्राम में तुम्हें आनंद प्राप्त करता हुआ देखकर प्रसन्न हो रहे थे. (१५) सूक्त—५३ देवता—इंद्र न्यू३ षु वाचं प्र महे भरामहे गिर इन्द्राय सदने विवस्वतः. नू चिद्धि रत्नं ससतामिवाविदन्न दुष्टुतिर्द्रविणोदेषु शस्यते.. (१) हम महान् इंद्र के लिए शोभन स्तुतियों का प्रयोग करते हैं, क्योंकि परिचर्या करने वाले यजमान के घर में इंद्र की स्तुतियां की जाती हैं. जिस प्रकार चोर सोए हुए लोगों की संपत्ति छीन लेते हैं, उसी प्रकार इंद्र असुरों के धन पर तुरंत अधिकार कर लेते हैं. धन देने वालों के विषय में अनुचित स्तुति नहीं की जाती. (१) दुरो अश्वस्य दुर इन्द्र गोरसि दुरो यवस्य वसुन इनस्पतिः. शिक्षानरः प्रदिवो अकामकर्शनः सखा सखिभ्यस्तमिद्रं गृणीमसि.. (२) हे इंद्र! तुम अश्व, गो एवं जौ आदि धान्य के देने वाले हो. तुम निवास हेतु धन के स्वामी एवं सबके पालक हो. तुम दान के नेता एवं प्राचीन देव हो. तुम हवि देने वाले यजमानों की इच्छाओं को अभिमत फल देकर पूरा करते हो तथा उनके लिए मित्र के समान अत्यंत प्रिय हो. हम इस प्रकार के इंद्र के लिए स्तुति वचनों का प्रयोग करते हैं. (२) शचीव इन्द्र पुरुकृद्द्युमत्तम तवेदिदमभितश्चेकिते वसु. अतः संगृभ्याभिभूत आ भर मा त्वायतो जरितुः काममूनयीः.. (३) हे इंद्र! तुम प्रज्ञावान् वृत्रवधादि अनेक कर्मों के कर्त्ता एवं अतिशय तेजस्वी हो. हम यह जानते हैं कि सर्वत्र वर्तमान धन तुम्हारा है. हे शत्रुनाशक इंद्र! इसलिए हमें धन दो. जो स्तोता तुम्हें चाहते हैं, उनकी अभिलाषा को अपूर्ण मत रहने दो. (३) एभिर्द्युभिः सुमना एभिरिन्दुभिर्निरुन्धानो अमतिं गोभिरश्विना. इन्द्रेण दस्युं दरयन्त इन्दुभिर्युतद्वेषसः समिषा रभेमहि.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! हमारे द्वारा दिए हुए पुरोडाशादि हव्य एवं सोमरस से प्रसन्न होकर हमें गायों और घोड़ों के साथ-साथ धन भी दो. इस प्रकार हमारी दरिद्रता मिटाकर तुम शोभन मन बन जाओ. इंद्र इस सोमरस के कारण संतुष्ट होकर हमारी सहायता करेंगे तो हम दस्युओं का नाश करके एवं शत्रुओं से छुटकारा पाकर इंद्र के द्वारा दिए हुए अन्न का उपभोग करेंगे. (४) समिन्द्र राया समिषा रभेमहि सं वाजेभिः पुरुश्चन्द्रैरभिद्युभिः. सं देव्या प्रमत्या वीरशुष्मया गोअग्रयाश्वावत्या रभेमहि.. (५) हे इंद्र! हम धन और अन्न के साथ-साथ ऐसा बल भी प्राप्त करें, जो बहुतों का आह्लादक एवं दीप्तिमान् हो. शत्रुविनाश में समर्थ तुम्हारी उत्तम बुद्धि हमारी सहायता करे. तुम्हारी बुद्धि स्तोताओं को गाय आदि प्रमुख पशु एवं अश्व प्रदान करे. (५) ते त्वा मदा अमदन्तानि वृष्ण्या ते सोमासो वृत्रहत्येषु सत्पते. यत्कारवे दश वृत्राण्यप्रति बर्हिष्मते नि सहस्राणि बर्हयः.. (६) हे सज्जनों के पालक इंद्र! जिस समय तुमने वृत्र असुर का वध किया, उस समय तुम्हारे मादक मरुद्गण ने तुम्हें प्रमुदित किया था. तुम वर्षा करने में समर्थ हो. जब तुमने शत्रुओं की बाधा को पार करके स्तुतिकर्त्ता एवं हव्यदाता यजमान के दस हजार उपद्रवों को समाप्त किया था, उस समय चरुपुरोडाशादि हव्य एवं प्रसिद्ध सोमरस ने तुम्हें प्रसन्न किया था. (६) युधा युधमुप घेदेषि धृष्णुया पुरा पुरं समिदं हंस्योजसा. नम्या यदिन्द्र सख्या परावति निबर्हयो नमुचिं नाम मायिनम्.. (७) हे शत्रुध्वंसक इंद्र! तुम सदा युद्धशील रहते हो एवं अपने बल से शत्रुओं के एक नगर के बाद दूसरे का विनाश करते हो. हे इंद्र! तुमने वज्र की सहायता से दूर देश में वर्तमान, प्रसिद्ध, मायावी नमुचि नामक असुर का वध किया था. (७) त्वं करञ्जमुत पर्णयं वधीस्तेजिष्ठ यातिथिग्वस्य वर्तनी. त्वं शता वङ्गदस्याभिनत्पुरोऽनानुदः परिषूता ऋजिश्वना.. (८) हे इंद्र! तुमने अतिथिग्व नामक राजा की सहायता करने के लिए तेज एवं शत्रुनाशक आयुध से करंज एवं पर्णय नामक असुरों का वध किया था. ऋजिश्वान् नामक राजा ने वंगृद असुर के सौ नगरों को चारों ओर से घेर लिया था. तुमने अकेले ही उन नगरों का विनाश कर दिया था. (८) त्वमेताञ्जनराज्ञो द्विर्दशाबन्धुना सुश्रवसोपजग्मुषः. षष्टिं सहस्रा नवतिं नव श्रुतो नि चक्रेण रथ्या दुष्पदावृणक्.. (९) असहाय सुश्रवा नामक राजा के साथ युद्ध करने के लिए साठ हजार निन्यानवे ebook converter DEMO Watermarks*
सहायकों के सहित बीस जनपद शासक आए थे. हे प्रसिद्ध इंद्र! तुमने शत्रुओं द्वारा अलंघ्य चक्र से उन अनेक को पराजित किया था. (९) त्वमाविथ सुश्रवसं तवोतिभिस्तव त्रामभिरिन्द्र तूर्वयाणम्. त्वमस्मै कुत्समतिथिग्वमायुं महे राज्ञे यूने अरन्धनायः.. (१०) हे इंद्र! तुमने पालकशक्ति द्वारा सुश्रवा एवं सूर्यवान् नामक राजाओं की रक्षा की थी. तुमने कुत्स, अतिथिग्व एवं आयु नामक राजाओं को महान् एवं तरुण राजा सुश्रवा के अधीन किया था. (१०) य उद्दीचन्द्र देवगोपाः सखायस्ते शिवतमा असाम. त्वां स्तोषाम त्वया सुवीरा द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः.. (११) हे इंद्र! यज्ञ की समाप्ति पर उपस्थित देवों द्वारा पालित तुम्हारे मित्र तुल्य प्रिय एवं अतिशय कल्याणपात्र हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. हम तुम्हारी दया से शोभन पुत्रों एवं उत्तम दीर्घ जीवन को प्राप्त करें. (११) सूक्त—५४ देवता—इंद्र
प्रभूत यशस्वी एवं शक्तिसंपन्न इंद्र के प्रति स्तुतिवचनों का उच्चारण करो. वे इंद्र शत्रुनाशक, अश्वों द्वारा सेवित, कामनाएं पूर्ण करने वाले एवं वेगवान् हैं. (३) त्वं दिवो बृहतः सानु कोपयोऽव त्मना धृषता शम्बरं भिनत्. यन्मायिनो वन्दिनो मन्दिना धृषच्छितां गभस्तिमशनिं पृतन्यसि.. (४) हे इंद्र! तुमने विशाल आकाश के ऊपर उठा हुआ प्रदेश कंपित कर दिया था एवं शत्रुनाशक शक्ति द्वारा शंबर असुर का वध किया था. तुमने हर्षित एवं प्रगल्भ मन से तेज धार वाले तथा चमकीले वज्र को मायावी असुर समूह की ओर चलाया था. (४) नि यद्वृणक्षि श्वसनस्य मूर्धनि शुष्णस्य चिद्व्रन्दिनो रोरुवद्वना. प्राचीनेन मनसा बर्हणावता यदद्या चित्कृणवः कस्त्वो परि.. (५) हे इंद्र! तुम वायु के तथा जल सोखने वाले एवं फलों को पकाने वाले सूर्य के ऊपर वाले प्रदेश में जल बरसाते हो. हे दृढ़ निश्चय एवं शत्रुविनाशक हृदय वाले इंद्र! आज आपने पराक्रम दिखाया है, उससे स्पष्ट है कि आपसे बढ़कर कोई नहीं है. (५) त्वमाविथ नर्यं तुर्वशं यदुं त्वं तुर्वीतिं वय्यं शतक्रतो. त्वं रथेमेतशं कृत्व्ये धने त्वं पुरो नवतिं दम्भयो नव.. (६) हे शतक्रतु! तुमने नर्य, तुर्वश, यदु एवं वय्य कुल में उत्पन्न तुर्वीति नामक राजाओं की रक्षा की है. तुमने धन प्राप्ति के उद्देश्य से प्रारंभ संग्राम में रथ एवं एतश ऋषियों की रक्षा की तथा शंबर असुर के निन्यानवे नगरों का ध्वंस किया है. (६) स घा राजा सत्पतिः शूशुवज्जनो रातहव्यः प्रति यः शासमिन्वति. उक्था वा यो अभिगृणाति राधसा दानुरस्मा उपरा पिन्वते दिवः.. (७) वे ही यजमान सुशोभित होकर सज्जनों के पालन के साथ-साथ अपनी भी वृद्धि करते हैं, जो इंद्र को हव्य प्रदान करके उनकी स्तुति करते हैं. अभिमत फलदाता इंद्र ऐसे ही लोगों के लिए आकाश से मेघों द्वारा वर्षा करते हैं. (७) असमं क्षत्रमसमा मनीषा प्र सोमपा अपसा सन्तु नेमे. ये त इन्द्र ददृषो वर्धयन्ति महि क्षत्रं स्थविरं वृष्ण्यं च.. (८) इंद्र का बल एवं बुद्धि अतुलनीय है. हे इंद्र! जो सोमपायी यजमान अपने यज्ञकर्म द्वारा तुम्हारा महान् बल एवं स्थूल पौरुष बढ़ाते हैं, उनकी उन्नति हो. (८) तुभ्येदेते बहुला अद्रिदुग्धाश्चमूसदश्चमसा इन्द्रपानाः. व्यश्नुहि तर्पया काममेषामथा मनो वसुदेयाय कृष्व.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
अपामतिष्ठद्धरुणह्वरं तमोऽन्तर्वृत्रस्य जठरेषु पर्वत:
हे इंद्र! यह सोमरस पत्थर की सहायता से तैयार किया गया है एवं पात्रों में रखा हुआ है. यह तुम्हारे पीने योग्य है. तुम इसे पीकर अपनी अभिलाषा पूर्ण करो एवं उसके पश्चात् हमें धन देने के कर्म में अपना मन लगाओ. (९) अपामतिष्ठद्धरुणह्वरं तमोऽन्तर्वृत्रस्य जठरेषु पर्वत: अभीमिन्द्रो नद्यो वव्रिणा हिता विश्वा अनुष्ठा: प्रवणेषु जिघ्नते.. (१०) वृष्टि की धाराओं को रोकने वाला अंधकार फैला हुआ था. तीनों लोकों का आवरण करने वाले वृत्र असुर के पेट में मेघ था. जो जल वृत्र द्वारा रोक लिया गया था, उसे इंद्र ने नीचे धरती की ओर बहाया. (१०) स शेवृधमधि धा द्युम्नमस्मे महि क्षत्रं जनाषाळिन्द्र तव्यम्. रक्षा च नो मघोनः पाहि सूरीन्न्राये च नः स्वपत्या इषे धाः.. (११) हे इंद्र! तुम हमें रोगों की शांति के उपरांत बढ़ने वाला यश दो. हमें महान् एवं शत्रुओं को हराने वाला बल दो, हमें धनवान् बनाकर हमारी रक्षा करो, विद्वानों का पालन करो एवं हमें धन, सुंदर संतान तथा अन्न दो. (११) सूक्त—५५ देवता—इंद्र दिवश्चिदस्य वरिमा वि पप्रथ इन्द्रं न मह्ना पृथिवी चन प्रति. भीमस्तुविष्माञ्चर्षणिभ्य आतपः शिशीते वज्रं तेजसे न वंसगः.. (१) इंद्र का प्रभाव आकाश की अपेक्षा अधिक विस्तृत है. पृथ्वी भी इंद्र की महत्ता की समानता नहीं कर सकती. शत्रुओं के लिए भयंकर एवं बुद्धिमान् इंद्र अपने भक्तजनों के निमित्त शत्रुओं को संताप देते हैं. जैसे सांड़ युद्ध के लिए अपने सींग तेज करता है, उसी प्रकार इंद्र अपने वज्र को तेज करने के लिए रगड़ते हैं. (१) सो अर्णवो न नद्यः समुद्रियः प्रति गृभ्णाति विश्रिता वरीमभिः. इन्द्रः सोमस्य पीतये वृषायते सनात्स युध्म ओजसा पनस्यते.. (२) आकाश में व्याप्त इंद्र दूर तक फैले हुए जल को उसी प्रकार ग्रहण कर लेते हैं, जिस प्रकार सागर विशाल जलराशि को अपने में समेट लेता है. इंद्र सोमरस पीने के लिए बैल के समान दौड़ कर जाते हैं एवं वे महान् योद्धा चिरकाल से अपने वृत्रवधादिकर्म की प्रशंसा चाहते हैं. (२) त्वं तमिन्द्र पर्वतं न भोजसे महो नृम्णस्य धर्मणामिरज्यसि. प्र वीर्येण देवताति चेकिते विश्वस्मा उग्रः कर्मणे पुरोहितः.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! तुम अपने उपभोग के लिए मेघ को भिन्न नहीं करते एवं विशाल धन के धारक कुबेरादि पर अधिकार जमाते हो. हम लोग इंद्र को उनकी शक्ति के कारण भली प्रकार जानते हैं. वे इंद्र अपने वृत्रवधादि रूप कार्यों के द्वारा सभी देवों में आगे का स्थान प्राप्त करते हैं. (३) स इद्धने नमस्युभिर्वचस्यते चारु जनेषु प्रब्रुवाण इन्द्रियम्. वृषा छन्दुर्भवति हर्यतो वृषा क्षेमेण धेनां मघवा यदिन्वति.. (४) स्तोता ऋषि अरण्य में इंद्र की स्तुति करते हैं. इंद्र अपने भक्तों में अपने शौर्य को प्रकट करते हुए शोभा पाते हैं. अभीष्ट वर्षा करने वाले इंद्र हव्यदाता यजमान की रक्षा करते हैं. जब यजमान यज्ञ की इच्छा से इंद्र की स्तुति करता है, तभी वे उसे यज्ञ में तत्पर कर देते हैं. (४) स इन्महानि समिथानि मज्मना कृणोति युध्म ओजसा जनेभ्यः. अधा चन श्रद्दधति त्विषीमत इन्द्राय वज्रं निघनिघ्नते वधम्.. (५) योद्धा इंद्र अपने भक्तों के कल्याण के लिए सबको शुद्ध करने वाले स्वकीय बल से महान् युद्ध करते हैं. इंद्र जिस समय हनन का साधन वज्र मेघों पर फेंकते हैं. उस समय सब लोग बलशाली कहकर तेजस्वी इंद्र के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं. (५) स हि श्रवस्युः सदनानि कृत्रिमा क्ष्मया वृधान ओजसा विनाश्यन्. ज्योतींषि कृण्वन्नवृकाणि यज्यवेऽव सुक्रतुः सर्तवा अपः सृजत्.. (६) शोभन कर्मों वाले इंद्र यश की कामना करते हुए असुरों के सुंदर बने हुए घरों को अपनी शक्ति से नष्ट कर देते हैं. वे धरती के समान विस्तृत हो जाते हैं एवं सूर्य आदि ज्योतिपिंडों को आवरणरहित करके यजमान के निमित्त बहने वाला जल बरसाते हैं. (६) दानाय मनः सोमपावन्न्रस्तु तेऽर्वाञ्चा हरी वन्दनश्रुदा कृधि. यमिष्ठासः सारथयो य इन्द्र ते न त्वा केता आ दभ्नुवन्ति भूर्णयः.. (७) हे सोमपायी इंद्र! तुम्हारा मन दान में लगा रहे. हे स्तुतिप्रिय इंद्र! तुम अपने हरि नामक घोड़ों को हमारे यज्ञ की ओर अभिमुख करो. हे इंद्र! तुम्हारे सारथि घोड़ों को वश में करने में अत्यंत कुशल हैं. इस कारण आयुध धारण करने वाले तुम्हारे शत्रु तुम्हें नहीं हरा सकते. (७) अप्रक्षितं वसु बिभर्षि हस्तयोरषाळ्हं सहस्तन्वि श्रुतो दधे. आवृतासोऽवतासो न कर्तृभिस्तनूषु ते क्रतव इन्द्र भूरयः.. (८) हे प्रसिद्ध इंद्र! तुम अपने हाथों में क्षयरहित धन एवं शरीर में अपराजेय बल धारण करते हो. जिस प्रकार पानी भरने वाले लोग कुएं को घेरे रहते हैं, उसी प्रकार वृत्रवधादि वीरतापूर्ण कर्म तुम्हारे शरीर को घेरे हुए हैं. हे इंद्र! इसीलिए तुम्हारे शरीर में अनेक कर्म विद्यमान हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—५६ देवता—इंद्र
सूक्त—५६ देवता—इंद्र एष प्र पूर्वीरव तस्य चम्रिषोऽत्यो न योषामुदयंस्त भुर्वणिः. दक्षं महे पाययते हिरण्ययं रथमावृत्या हरियोगमृभ्वसम्.. (१) जिस प्रकार घोड़ा क्रीड़ा के निमित्त घोड़ी की ओर दौड़कर जाता है, उसी प्रकार पर्याप्त आहार करने वाले इंद्र यजमान द्वारा बहुत से पात्रों में रखे हुए सोमरस की ओर शीघ्रता से जाते हैं. वृत्रवधादि महान् कार्य में दक्ष वे इंद्र अपना स्वर्ण निर्मित, अश्वयुक्त एवं तेजस्वी रथ रोककर सोमरस पीते हैं. (१) तं गूर्तयो नेमन्निषः परीणसः समुद्रं न संचरणे सनिष्यवः. पतिं दक्षस्य विदथस्य नू सहो गिरिं न वेना अधि रोह तेजसा.. (२) जिस प्रकार धन चाहने वाले वणिक नावों में बैठकर आने-जाने के साधन समुद्र को व्याप्त किए रहते हैं, उसी प्रकार हाथों में हव्य लिए हुए स्तोता इंद्र को चारों ओर से घेरे रहते हैं. हे स्तोताओ! नारियां अपने मनपसंद फूल तोड़ने के लिए जिस प्रकार पर्वत पर चढ़ जाती हैं, उसी प्रकार तुम भी तेजस्वी स्तोत्र के सहारे विशाल यज्ञ के रक्षक एवं शक्तिशाली इंद्र के समीप पहुंच जाओ. (२) स तुर्वणिर्महाँ अरेणु पौंस्ये गिरेर्भृष्टिर्न भ्राजते तुजा शवः. येन शुष्णं मायिनमासो मदे दुध्र आभूषु रामयन्नि दामनि.. (३) इंद्र शत्रुनाशक और महान् हैं. इंद्र की दोषरहित एवं शत्रुनाशकारी शक्ति वीर पुरुषों द्वारा करने योग्य संग्राम में पर्वत की चोटी के समान विराजमान होती है. शत्रुविनाशक एवं लौहकवचधारी इंद्र ने सोमपान के द्वारा मदोन्मत्त होकर मायावी असुर शुष्ण को बेड़ियां डाल कर कारागृह में बंद कर दिया था. (३) देवी यदि तविषी त्वावृधोतय इन्द्रं सिषक्त्युषसं न सूर्यः. यो धृष्णुना शवसा बाधते तम इयर्ति रेणुं बृहदर्हिरिष्वणिः.. (४) हे स्तोता! जिस प्रकार सूर्य नित्य उषा का सेवन करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी बल तुम्हारी रक्षा के निमित्त तुम्हारी स्तुतियां सुनकर वृद्धि प्राप्त करने वाले इंद्र की सेवा करता है. वे इंद्र, शत्रुनाशक शक्ति द्वारा अंधकार रूपी वृत्र असुर का नाश करते हैं एवं शत्रुओं को रुलाकर भली प्रकार नष्ट कर देते हैं. (४) वि यत्तिरो धरुणमच्युतं रजोऽतिष्ठिपो दिव आतासु बर्हणा. स्वर्मीळ्हे यन्मद इन्द्र हर्यश्वान्हन्वृत्रं निरपामौब्जो अर्णवम्.. (५) हे शत्रुहंता इंद्र! जिस समय तुमने वृत्र असुर द्वारा रोके हुए समस्त प्राणियों के
जीवनाधार एवं विनाशरहित जल को आकाश से फैली हुई दिशाओं में बिखेरा था, उस समय तुमने सोमपान से प्रसन्न होकर युद्ध में वृत्र का वध कर दिया था एवं जल से पूर्ण मेघ को वर्षा करने के लिए अधोमुख कर दिया था. (५) त्वं दिवो धरुणं धिष ओजसा पृथिव्या इन्द्र सदनेषु माहिन:. त्वं सुतस्य मदे अरिणा अपो वि वृत्रस्य समया पाष्यारुज:.. (६) हे इंद्र! तुम वृद्धि को प्राप्त करके समस्त विश्व के जीवनाधार वर्षा के जल को अपने बल द्वारा आकाश से धरती के भागों में स्थापित कर देते हो. तुमने सोमपान से प्रसन्न होकर जल को मेघ से पृथक् कर दिया है एवं विशाल पाषाण के द्वारा वृत्र को नष्ट कर दिया है. (६) सूक्त—५७ देवता—इंद्र प्र मंहिष्ठाय बृहते बृहद्रये सत्यशुष्माय तवसे मतिं भरे. अपामिव प्रवणे यस्य दुर्धरं राधो विश्वायु शवसे अपावृतम्.. (१) मैं परम दानशील, गुणों से महान्, प्रभूत धनसंपन्न, अमोघबल के स्वामी एवं विशाल आकार वाले इंद्र को लक्ष्य करके अपनी हार्दिक स्तुति पूर्ण करता हूं. जिस प्रकार नीचे की ओर बहने वाले जल को कोई नहीं रोक सकता, उसी प्रकार इंद्र का बल धारण करने में भी कोई समर्थ नहीं होगा. स्तोताओं को बलशाली बनाने के लिए इंद्र सर्वत्रव्यापक धन को प्रकाशित करते हैं. (१) अध ते विश्वमनु हासदिष्टय आपो निम्नेव सवना हविष्मत:. यत्पर्वते न समशीत हर्यत इन्द्रस्य वज्र: श्रथिता हिरण्यय:.. (२) हे इंद्र! यह सारा संसार तुम्हारे यज्ञ में संलग्न था. हव्यदाता यजमान के द्वारा निचोड़ा हुआ सोमरस तुम्हें उसी प्रकार प्राप्त हुआ था, जिस प्रकार जल नीची जगह पर आ जाता है. इंद्र का शोभन, स्वर्णमय एवं शत्रुनाशक वज्र पर्वत पर कभी निद्रित नहीं था. (२) अस्मै भीमाय नमसा समध्वर उषो न शुभ्र आ भरा पनीयसे. यस्य धाम श्रवसे नामेन्द्रियं ज्योतिरकारि हरितो नायसे.. (३) हे शोभन उषा! तुम इस यज्ञ में शत्रुओं के लिए भयंकर व परमस्तुतिपात्र इंद्र के लिए इस समय यज्ञ का अन्न दो. जिस प्रकार सारथि घोड़े को इधर-उधर ले जाता है, उसी प्रकार इंद्र की सबको धारण करने वाली, प्रसिद्ध एवं पहचान कराने वाली ज्योति उन्हें यज्ञान्न प्राप्त कराने के लिए इधर-उधर ले जाती है. (३) इमे त इन्द्र ते वयं पुरुष्टुत ये त्वारभ्य चरामसि प्रभूवसो. नहि त्वदन्यो गिर्वणो गिर: सघत्क्षोणीरिव प्रति नो हर्य तद्वच:.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
हे प्रभूत धनशाली एवं बहुत से यजमानों द्वारा स्तुत इंद्र! तुम्हारा आश्रय प्राप्त करके हम यज्ञकार्य में वर्तमान हैं. हम तुम्हारे ही भक्त हैं. हे स्तुतिपात्र इंद्र! तुम्हारे अतिरिक्त इन स्तुतियों को कोई प्राप्त नहीं करता. जिस प्रकार पृथ्वी अपने समस्त प्राणियों को चाहती है, उसी प्रकार तुम भी हमारे स्तुति वचनों को प्रेम करो. (४) भूरि त इन्द्र वीर्यं१तव स्मस्यस्य स्तोतुर्मघवन्काममा पृण. अनु ते द्यौर्बृहती वीर्यं मम इयं च ते पृथिवी नेम ओजसे.. (५) हे इंद्र! तुम्हारी सामर्थ्य को कोई भी लांघ नहीं सकता. हम तुम्हारे ही भक्त हैं. हे मघवा! तुम अपने इस स्तोता की इच्छाओं को पूरा करो. विशाल आकाश ने तुम्हारे शौर्य को स्वीकार किया था एवं पृथ्वी तुम्हारे बल के सामने झुक गई थी. (५) त्वं तमिन्द्र पर्वतं महामुरुं वज्रेण वज्रिन्पर्वशश्चकर्तिथ. अवासृजो निवृताः सर्तवा अपः सत्रा विश्वं दधिषे केवलं सहः.. (६) हे वज्रधारी इंद्र! तुमने उस प्रसिद्ध एवं विशाल मेघ को अपने वज्र द्वारा टुकड़े-टुकड़े कर दिया था एवं उस मेघ द्वारा रोके गए जल को नीचे बहने के लिए छोड़ दिया था. केवल तुम ही विश्वव्यापी बल धारण करते हो. (६) सूक्त—५८ देवता—अग्नि नू चित्सहोजा अमृतो नि तुन्दते होता यद्दूतो अभवद्विवस्वतः. वि साधिष्ठेभिः पथिभी रजो मम आ देवतातं हविषा विवासति.. (१) अतिशय बल की सहायता से उत्पन्न एवं अमर अग्नि जलाने में समर्थ है. देवताओं का आह्वान करने वाले अग्नि जिस समय यजमान का हव्य ले जाने के लिए दूत बने थे, उस समय अग्नि ने उचित मार्ग से जाकर अंतरिक्ष लोक बनाया था. अग्नि यज्ञ में हव्य दान करके देवों की सेवा करते हैं. (१) आ स्वमङ्गा युवमानो अज्रस्तृष्वविषन्नत्तसेषु तिष्ठति. अत्यो न पृष्ठं प्रुषितस्य रोचते दिवो न सानु स्तनयन्नचिक्रदत्.. (२) जरारहित अग्नि अपने तृणगुल्म आदि खाद्य पदार्थ को अपनी दाहकशक्ति के द्वारा अपने में मिलाकर एवं भक्षण करके शीघ्र ही बहुत से काठों पर चढ़ गए. जलाने के लिए इधर-उधर जाने वाली अग्नि की ऊंची ज्वालाएं गतिशील अश्व के समान तथा आकाश स्थित उन्नत एवं गंभीर शब्दकारी मेघ के समान शोभा पाती हैं. (२) क्राणा रुद्रेभिर्वसुभिः पुरोहितो होता निषत्तो रयिषाळमर्त्यः. रथो न विश्ववृज्जसान आयुषु व्यानुषग्वार्या देव ऋण्वति.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
अग्नि हव्य का वहन करते हुए रुद्रों तथा वसुओं के सम्मुख स्थान प्राप्त कर चुके हैं एवं देवों का आह्वान करने के निमित्त यज्ञों में उपस्थित रहते हैं. शत्रुओं का धन जीतने वाले, मरणरहित एवं दीप्तिमान् अग्नि यजमानों द्वारा स्तुत होकर रथ की भांति चलते हुए प्रजाओं के पास पहुंचते हैं एवं बार-बार श्रेष्ठ धन प्रदान करते हैं. (३) वि वातजूतो अतसेषु तिष्ठते वृथा जुहूभिः सृण्या तुविष्वणिः. तृषु यदग्ने वनिनो वृषायसे कृष्णं त एम रुशदूर्मे अजर.. (४) वायु द्वारा प्रेरित अग्नि महान् शब्द करते हुए अपनी जलती हुई एवं तीव्र ज्वालाओं के द्वारा अनायास ही पेड़ों को जला देते हैं. हे अग्नि देव! तुम जिस समय वन के वृक्षों को जलाने के लिए सांड़ के समान उतावले होते हो, उस समय तुम्हारे गमन का मार्ग काला पड़ जाता है. हे अग्नि! तुम दीप्त ज्वालाओं वाले एवं जरारहित हो. (४) तपुर्जम्भो वन आ वातचोदितो यूथे न साह्वां अव वाति वंसगः. अभिव्रजन्नक्षितं पाजसा रजः स्थातुश्चरथं भयते पतत्रिणः.. (५) वायु द्वारा प्रेरित अग्नि शिखारूपी आयुध धारण कर लेता है तथा महान् तेज के कारण गीले वृक्षों के रस पर आक्रमण करके सर्वत्र व्याप्त होता हुआ प्राणियों को उसी प्रकार पराजित कर देता है, जिस प्रकार गायों के झुंड में सांड़ पहुंच जाता है. समस्त स्थावर एवं जंगम अग्नि से डरते हैं. (५) दधृष्ट्वा भृगवो मानुषेष्वा रयिं न चारुं सुहवं जनेभ्यः. होतारमग्ने अतिथिं वरेण्यं मित्रं न शेवं दिव्याय जन्मने.. (६) हे अग्नि! मनुष्यों के बीच में भृगु ऋषि ने दिव्य जन्म प्राप्त करने के लिए तुम्हें उसी प्रकार धारण किया था, जिस प्रकार लोग उत्तम धन को संभाल कर रखते हैं. तुम लोगों का आह्वान सरलता से सुन लेते हो एवं देवों का आह्वान करने वाले हो. तुम यज्ञस्थान में अतिथि के समान पूजनीय एवं मित्र के समान सुख देने वाले हो. (६) होतारं सप्त जुह्वो३यजिष्ठं यं वाघतो वृणते अध्वरेषु. अग्निं विश्वेषामरतिं वसूनां सपर्यामि प्रयसा यामि रत्नम्.. (७) आह्वान करने वाले सात ऋत्विज् यज्ञों में सर्वश्रेष्ठ यजनीय एवं देवों के आह्वानकर्त्ता जिस अग्नि का वरण करते हैं, समस्त संपत्तियां देने वाले उसी अग्नि की सेवा मैं हव्य के द्वारा कर रहा हूं तथा उस अग्नि से रमणीय धन की याचना कर रहा हूं. (७) अच्छिद्रा सूनो सहसो नो अद्य स्तोतृभ्यो मित्रमहः शर्म यच्छ. अग्ने गृणन्तमंहस उरुष्योर्जो नपात्पूर्भिरायसीभिः.. (८) हे अग्नि! तुम बल प्रयोग द्वारा अरणि से उत्पन्न एवं अनुकूल प्रकाश वाले हो. तुम हमें ebook converter DEMO Watermarks*
अनवरत सुख प्रदान करो. हे अन्नपुत्र अग्नि! लोहे के समान दृढ़तर पालन साधनों द्वारा अपने स्तोता की रक्षा करके उसे पापों से मुक्त करो. (८) भवा वरूथं गृणते विभावो भवा मघवन्मघवद्भ्यः शर्म. उरुष्याग्ने अंहसो गृणन्तं प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात्.. (९) हे विशिष्ट प्रकाशवान् अग्नि! तुम स्तुति करने वाले यजमान के लिए गृह के समान अनिष्ट निवारक बनो. हे धनवान् अग्नि! हव्यरूप धन से युक्त यजमानों के लिए तुम सुख रूप बनो. हे अग्नि! अपने स्तोताओं की पाप से रक्षा करो. हे बुद्धिरूप धन से संपन्न अग्नि! आज प्रातःकाल शीघ्र पधारो. (९) सूक्त—५९ देवता—अग्नि वया इदग्ने अग्नयस्ते अन्ये त्वे विश्वे अमृता मादयन्ते. वैश्वानर नाभिरसि क्षितीनां स्थूणेव जनां उपमिद्ययन्थ.. (१) हे अग्नि! अन्य अग्नियां तुम्हारी शाखाएं होने के कारण समस्त देवगण तुम्हारे साथ ही प्रसन्न होते हैं. हे वैश्वानर! तुम सब मनुष्यों की नाभि में जठराग्नि रूप से स्थित हो. जिस प्रकार धरती में गड़े हुए लकड़ी के थूने अपने ऊपर बांसों को धारण करते हैं, उसी प्रकार तुम भी सब मानवों को धारण करो. (१) मूर्धा दिवो नाभिरग्निः पृथिव्या अथाभवदरती रोदस्योः. तं त्वा देवासोऽजनयन्त देवं वैश्वानर ज्योतिरिदार्याय.. (२) यह अग्नि आकाश का मस्तक, धरती की नाभि एवं धरती व आकाश के मध्यवर्ती प्रदेश के स्वामी थे. हे वैश्वानर! सभी देवों ने श्रेष्ठ मानवों के कल्याण के लिए तुम्हें ज्योतिरूप एवं दानादिगुण संपन्न उत्पन्न किया था. (२) आ सूर्ये न रश्मयो ध्रुवासो वैश्वानरे दधिरेऽग्ना वसूनि. या पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु या मानुषेष्वसि तस्य राजा.. (३) जिस प्रकार निश्चल किरणें सूर्य में स्थित हैं, उसी प्रकार सभी प्रकार के धन वैश्वानर अग्नि में निवास करते हैं. इसीलिए तुम पर्वतीय ओषधियों, जलों एवं मनुष्यों में स्थित धन के स्वामी हो. (३) बृहती इव सूनवे रोदसी गिरो होता मनुष्यो३न दक्षः. स्वर्वते सत्यशुष्माय पूर्वीर्वैश्वानराय नृतमाय यह्वीः.. (४) धरती और आकाश अपने पुत्र वैश्वानर के लिए विस्तृत हो गए थे. जिस प्रकार बंदी ebook converter DEMO Watermarks*
अपने स्वामी की अनेक प्रकार से स्तुति करता है, उसी प्रकार चतुर होता सुंदर गति वाले, वास्तविक शक्तिसंपन्न एवं सबके कुशल नेता वैश्वानर के लिए महान् एवं विविध स्तुतियों का प्रयोग करता है. (४) दिवश्चित्ते बृहतो जातवेदो वैश्वानर प्र रिरिचे महित्वम्. राजा कृष्टीनामसि मानुषीणां युधा देवेभ्यो वरिवश्चकर्थ.. (५) हे जातवेद! तुम्हारा महत्त्व आकाश से भी बढ़कर है एवं तुम मानव प्रजाओं के राजा हो. तुमने असुरों द्वारा अपहृत धन युद्ध के द्वारा छीनकर देवों को दिया था. (५) प्र नू महित्वं वृषभस्य वोचं यं पूर्वो वृत्रहणं सचन्ते. वैश्वानरो दस्युमग्निर्जघन्वां अधूनोत्काष्ठा अव शम्बरं भेत्.. (६) मनुष्य जलवर्षा के लिए जिस आवारक मेघ के हंता विद्युत्रूप अग्नि की सेवा करते हैं, मैं उसी जलवर्षी वैश्वानर के महत्त्व का उच्चारण करता हूं. उसने दस्यु को मारकर वर्षा का जल गिराया एवं शंबर का नाश किया. (६) वैश्वानरो महिम्ना विश्वकृष्टीर्भरद्वाजेषु यजतो विभावा. शातवनेये शतिनीभिरग्निः पुरुणीथे जरते सूनृतावन्.. (७) वैश्वानर अग्नि अपने महत्त्व के कारण समस्त मनुष्यों के स्वामी एवं पुष्टिवर्धक अन्न वाले यज्ञों में बुलाने योग्य हैं, शतवनि के पुत्र राजा पुरुणीथ अनेक यज्ञों में प्रकाशसंपन्न एवं प्रियवाक् अग्नि की स्तुति करते हैं. (७) सूक्त—६० देवता—अग्नि वह्निं यशसं विदथस्य केतुं सुप्राव्यं दूतं सद्यो अर्थम्. द्विजन्मानं रयिमिव प्रशस्तं रातिं भरद्भृगवे मातरिश्वा.. (१) मातरिश्वा हव्यवाहक, यशस्वी, यज्ञप्रकाशक, उत्तम रक्षक, देवों के दूत, हवि लेकर देवों के समीप जाने वाले, अरणिरूपी दो काष्ठों से उत्पन्न एवं धन के समान प्रशंसित अग्नि को भृगुवंशियों के मित्र के रूप में समीप लावें. (१) अस्य शासुरुभयासः सचन्ते हविष्मन्त उशिजो ये च मर्ताः. दिवश्चित्पूर्वो न्यसादि होतापृच्छ्यो विशपतिर्विक्षु वेधाः.. (२) हव्य के इच्छुक देव और हव्य धारण करने वाले यजमान दोनों ही शासक अग्नि की सेवा करते हैं, क्योंकि पूज्य, वांछितफलदाता एवं प्रजापति अग्नि सूर्योदय से भी पहले यजमानों के बीच स्थापित हुए हैं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*