साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
अष्टादशोऽध्यायः ९१
अष्टादशोऽध्यायः ९१
इसी प्रकार संवत्सर की अग्नि से ऋतुगण उत्पन्न होते हैं। ऋतुपुत्र पाँच आर्त्तवगण नित्य सर्ग से उत्पन्न हैं॥३५॥
संवत्सरस्तु प्रथमो द्वितीयः परिवत्सरः।
इद्वत्सरस्तृतीयश्च चतुर्थस्त्वनुवत्सरः ॥३६॥
पञ्चमो वत्सरस्तेषां वायुश्चैवानुवत्सरः।
तेषु संवत्सरो ह्यग्निः सूर्यस्तु परिवत्सरः ॥३७॥
सोम इद्वत्सरस्तेषां वायुश्चैवानुवत्सरः।
रुद्रस्तु वत्सरो ज्ञेयः पश्चाद्वायोर्युगात्मकाः ॥३८॥
संवत्सर अग्नि प्रथम है। द्वितीय परिवत्सर है। तृतीय इद्वत्सर, चतुर्थ अनुवत्सर एवं पञ्चम है—वत्सर। इनमें वायु है—अनुवत्सर, संवत्सर है—अग्नि, सूर्य है—परिवत्सर, सोम है—इद्वत्सर एवं रुद्र को वत्सर कहा गया है। तदनन्तर वायु के युगात्मकगण आगे कहते हैं॥३६-३८॥
आर्त्तवाः पितरो ज्ञेया ये जाता ऋतुसूनवः।
पितामहास्तु ऋतवो मासा वै सोमसूनवः ॥३९॥
प्रपितामहाश्च ऋतवः पश्चाद्वा ब्रह्मणः सुताः।
सौम्या बर्हिषदश्चैव अग्निष्वात्ताश्च ते त्रिधा ॥४०॥
आदित्यश्चैव सोमश्च लोहिताङ्गो बुधस्तथा।
बृहस्पतिश्च शुक्रश्च तथा चैव शनैश्चरः ॥४१॥
राहुश्च धूमकेतुश्च इत्येते वै नवग्रहाः।
त्रैलोक्यस्य त्विमे नित्यं भावाभावनिवेदकाः ॥४२॥
ऋतुपुत्र आर्त्तवगण को पितृपुरुष जानना चाहिये। पितामह हैं—ऋतुगण, मास हैं—सोमपुत्र। प्रपितामह ऋतुगण हैं, पश्चात् हैं—ब्रह्मपुत्रगण। सौम्य, बर्हिषद् एवं अग्निष्वात्त—ये तीन पितृपुरुष हैं। आदित्य (रवि), सोम (चन्द्र), लोहिताङ्ग (मंगल), बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर राहु तथा केतु—ये नव ग्रह हैं। ये त्रिभुवन में नित्य शुभाशुभ के ज्ञापक हैं॥३९-४२॥
आदित्यश्चैव सोमश्च स्मृतौ द्वौ मङ्गलग्रहौ।
राहुश्छायाग्रहश्चैव शेषास्ताराग्रहाः स्मृताः ॥४३॥
रवि तथा चन्द्र—ये मंगल ग्रह कहे गये हैं। राहु है—छायाग्रह। अन्य सबको ताराग्रह कहा गया है॥४३॥
नक्षत्राधिपतिः सोमो ग्रहराजो दिवाकरः।
पञ्च्यते वाग्निरदित्यश्चाब्मयश्चन्द्रमाः स्मृतः ॥४४॥
९२ श्रीसाम्बपुराणम्
नक्षत्र का अधिपति सोम है (चन्द्र है)। ग्रहराज हैं—दिवाकर। चन्द्रमा अग्नि तथा जलमय है॥४४॥
आदित्यः पठ्यते ब्रह्मा विष्णुस्तेषां च चन्द्रमाः ।
माहेश्वरस्तु विज्ञेयस्तृतीयोऽङ्गारको ग्रहः ॥४५॥
रवि हैं—ब्रह्मा, विष्णु हैं—चन्द्रमा एवं महेश्वर के पुत्र हैं—मंगल॥४५॥
कश्यपस्य सुतः सूर्यः सोमो धर्मसुतः स्मृतः ।
देवासुरगुरू द्वौ तु भानुमन्तौ महाग्रहौ ॥४६॥
कश्यप के पुत्र सूर्य हैं एवं चन्द्र धर्मपुत्र हैं। देव तथा असुरों के गुरु क्रमशः बृहस्पति तथा शुक्र हैं। ये उज्ज्वल महाग्रह हैं॥४६॥
प्रजापतिसुतावेतावुभौ शुक्रबृहस्पतिः ।
बुधः सोमात्मजः श्रीमान् सूर्यपुत्रः शनैश्चरः ॥४७॥
प्रजापति के पुत्र शुक्र तथा बृहस्पति हैं। बुध है—चन्द्रपुत्र तथा श्रीमान् शनैश्चर सूर्यपुत्र हैं॥४७॥
सैंहिकेयः स्मृतो राहुः केतुश्च ब्रह्मणः सुतः ।
सर्वेषां तु ग्रहाणां वै ह्यधस्ताच्चरते रविः ॥४८॥
राहु को सिंहिका का पुत्र तथा केतु को ब्रह्मा का पुत्र कहा गया है। समस्त ग्रहों के मध्य निम्न भाग में विचरणशील हैं—सूर्य॥४८॥
रवेरूर्ध्वं स्थितः सोमः सोमान्नक्षत्रमण्डलम् ।
नक्षत्रेभ्यो बुधस्तूर्ध्वं बुधादूर्ध्वं तु भार्गवः ॥४९॥
तस्मादङ्गारकश्चोर्ध्वं तस्य चोर्ध्वं बृहस्पतिः ।
तस्माच्छनैश्चरश्चोर्ध्वं तस्योर्ध्वमृषिमण्डलम् ॥५०॥
रवि के ऊपर सोम (चन्द्र) स्थित हैं। सोम के ऊपर नक्षत्रमण्डल है। नक्षत्र के ऊपर शुक्र हैं और उसके ऊर्ध्व में है—मंगल। उसके ऊर्ध्व में है—बृहस्पति। उसके ऊर्ध्व में शनि तथा उसके ऊर्ध्व में ऋषिमण्डल विराजमान है॥४९-५०॥
ऋषिभ्यश्च ध्रुवस्योर्ध्वमासनं कथितं बुधैः ।
आदित्यनिलये राहुः कदाचित् सोममार्गगः ॥५१॥
सूर्यमण्डलसंस्थस्तु केतुर्नित्यं प्रसर्पति ।
नवयोजनसाहस्रो विस्तारो भास्करस्य तु ॥५२॥
विस्तारात् त्रिगुणं चास्य परिणाहेन मण्डलम् ।
द्विगुणः सूर्यविस्ताराद् विस्तारः शशिनः स्मृतः ॥५३॥
अष्टादशोऽध्यायः ९३
अष्टादशोऽध्यायः ९३
ऋषियों से ऊर्ध्व में ध्रुव का आसन है। यह विद्वान् लोग कहते हैं। रविमण्डल में राहु अवस्थित है, जो कदाचित् सोम के पथ पर गमन करता है। सूर्यमण्डल-स्थित केतु नित्य सोममण्डल में गमन करता है। सूर्य का विस्तार ९००० योजन है। इस विस्तार से तीन गुणा परिणाह वाला मण्डल है। सूर्य के विस्तार का दूना चन्द्र का विस्तार कहा गया है॥५१-५३॥
विशेष— सूर्य से चन्द्र को दूना बताया गया है, यह सम्भव नहीं है।
त्रिगुणं मण्डलं चास्य यथैव सवितुस्तथा।
चन्द्रतः षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते ॥५४॥
भार्गवात् पादहीनो वै विज्ञेयस्तु बृहस्पतिः।
बृहस्पतेः पादहीनौ कुजसौम्यावुदाहृतौ ॥५५॥
विस्तारमण्डलाभ्यां च पादहीनस्तयोर्बुधः।
बुधतुल्यानि ऋक्षाणि सर्वह्रस्वानि यानि तु ॥५६॥
चन्द्र का मण्डल सूर्य से तिगुना (?) विस्तृत है। चन्द्र के सोलहवें भाग की विस्तृति शुक्र की है। शुक्र का पादहीन विस्तार बृहस्पति का है। बृहस्पति के एक पादहीन विस्तार के बराबर मंगल तथा बुध हैं। बुध के समान ही समस्त नक्षत्रों का विस्तार है॥५४-५६॥
योजनार्धप्रमाणानि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते।
राहुः सूर्यप्रमाणस्तु कदाचित् सोऽपि सम्मितः।
तस्माद् ग्रहप्रमाणन्तु केतुस्त्वनियत: स्मृतः ॥५७॥
जो सब से हीन नक्षत्र है, उसका विस्तार आधा योजन प्रमाण है। उससे ह्रस्व कोई नक्षत्र नहीं है। राहु कभी-कभी सूर्यवत् प्रतीत होता है। तभी राहु को ग्रह मानते हैं। केतु का स्थान नियत नहीं है॥५७॥
भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकस्तदनन्तरम्।
महर्जनस्तपःसत्यं सप्तलोकाः प्रकीर्त्तिताः ॥५८॥
भूरूपं पार्थिवो लोको ह्यन्तरिक्षं भुवः स्मृतः।
स्वरित्येवं दिवं विद्याच्छेषास्तूर्ध्वं यथाक्रमम् ॥५९॥
भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपःलोक, सत्य लोक—ये सात लोक कहे गये हैं। भूलोक है—पार्थिव लोक, अन्तरिक्ष है—भुवर्लोक, स्वर्लोक है—द्युलोक। अन्य सबको यथाक्रम से ऊर्ध्वलोक जानना चाहिये॥५८-५९॥
भूतस्याधिपतिश्चाग्निस्ततो भूतपतिस्तु सः।
नभसोऽधिपतिर्वायुस्तेन वायुर्नभस्पतिः ॥६०॥
९४ || श्रीसाम्बपुराणम् ||
गन्धर्वाप्सरसश्चैव गुह्यकाः सह राक्षसैः।
भूर्लोकवासिनः सर्वेऽप्यन्तरिक्षचरान् शृणु ॥६१॥
भूलोकाधिपति हैं—अग्नि, इसीलिये अग्नि को भूतपति कहते हैं। नभोलोक के अधिपति हैं—वायु, तभी वे नभस्पति कहलाते हैं। स्वर्गलोकाधिपति हैं—सूर्य, अतः उन्हें दिवस्पति कहते हैं। गन्धर्व, अप्सरा, गुह्यक तथा राक्षस भूलोकवासी हैं। अब अन्तरिक्षचारियों की बात सुनो॥६०-६१॥
मरुतः सप्तभिः स्कन्धैः रुद्रास्तत्रैव चाश्विनौ।
आदित्या वसवः स्वर्गे तत्रैव च गवां गणः ॥६२॥
मरुद्गण, सप्त स्कन्धगण, रुद्रगण तथा अश्विनीकुमारद्वय वहाँ अन्तरिक्ष में रहते हैं। आदित्यगण एवं वसुगण स्वर्ग में रहते हैं। वहीं गौ की भी स्थिति है॥६२॥
चतुर्थे च महर्लोके तिष्ठन्त्याकल्पवासिनः।
प्रजानां पतिभिः सर्वैः सेव्यते पञ्चमो जनः ॥६३॥
मनुः सनत्कुमाराद्या वैराजश्च तपःस्थिताः।
सत्यस्तु सप्तमो लोको ह्यापुर्मार्गगतानिमान् ॥६४॥
चतुर्थ लोक महर्लोक में आकल्पवासी निवास करते हैं। सभी प्रजागण के पतिगण जनलोक में स्थित रहते हैं। वसु, सनत्कुमारादि तथा विराट-सम्बन्धित (वैराज) सभी तपलोक में अवस्थान करते हैं। सत्य सप्तम लोक में अवस्थित है। सभी मार्गगत लोकों का यही प्राप्ति-स्थान है॥६३-६४॥
ब्रह्मलोकः समाख्यातो ह्यप्रतीघातलक्षणः।
महीतलां सहस्राणां शतादूर्ध्वं दिवाकरः ॥६५॥
यह जो सत्यलोक (ब्रह्मलोक) नाम से ख्यात है, वह विघ्नरहित स्थान है। महीतल (पृथ्वी) से शत सहस्र ऊर्ध्व में दिवाकर स्थित हैं॥६५॥
दश तानि ध्रुवं यावद् द्विगुणाद् द्विगुणोत्तरे।
दश योजनकोट्यस्तु भूमेरूर्ध्वं ध्रुवः स्मृतः ॥६६॥
ये दस लोक ध्रुव लोक-पर्यन्त द्विगुण से लेकर उत्तरोत्तर द्विगुण वर्धित होते हैं। भूमि से ऊर्ध्व में दश योजन कोटि ध्रुवलोक को कहा गया है॥६६॥
त्रयोविंशतिलक्षाणि त्रैलोक्यात् संघ उच्यते।
द्विगुणेषु सहस्रेषु योजनानां शतेषु च ॥६७॥
तेईस लाख त्रैलोक्य की उच्चता कही गई है। उसका द्विगुण है—शत सहस्र योजन॥६७॥
अष्टादशोऽध्यायः ९५
अष्टादशोऽध्यायः ९५
लोकोत्तरमथैकैकं ध्रुवादूर्ध्वं विधीयते ।
देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगाः ।
भूता विद्याधराश्चैव अष्टौ ते देवयोनयः ॥६८॥
अस्मिन्व्योम्नि त्वमी लोकाः सप्तैव सम्प्रतिष्ठिताः ।
मरुतः पितरो छन्दास्तस्मिन्नेवाग्नयो ग्रहाः ॥६९॥
ये चाप्येते समाख्याता मयाष्टौ देवयोनयः ।
मूर्तयोऽमूर्तयश्चैव सर्वे ते व्योम्यवस्थिताः ॥७०॥
एवंविधमिदं व्योम सर्वदेवमयं स्मृतम् ।
सर्वभूतमयं चैव सर्वश्रुतिमयं तथा ॥७१॥
तस्माद् योऽर्चयते व्योम तेन सर्वेऽर्चिताः पुराः ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन शुभार्थी व्योम पूजयेत् ॥७२॥
इति श्री साम्बपुराणे देवतोपाख्यापनं नामाष्टादशोऽध्यायः
ध्रुवलोक के ऊर्ध्व में एक लोक है। देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पन्नग, भूत तथा विद्याधर—यह आठ देवयोनि है। उस व्योम में यह सप्तलोक प्रतिष्ठित हैं। मरुद्गण, पितृगण, मेघसमूह, अग्नि तथा सभी ग्रह वहाँ अवस्थित हैं।
इस प्रकार यह व्योम सर्वदेवमय है। यह सर्वभूतमय तथा सर्वश्रुतिमय है। अतएव जो व्योम की अर्चना करते हैं, वे समस्त देवों की अर्चना करते हैं। अतः मंगलकामी व्यक्ति को सर्वप्रयास के साथ व्योम का पूजन करना चाहिये॥६८-७२॥
श्री साम्बपुराण का देवतोपाख्यान नामक अष्टादश अध्याय समाप्त
एकोनविंशोऽध्यायः
(व्योमोत्पत्तिः)
नारद उवाच
आकाशं खं वियद्व्योम चान्तरिक्षं नभोऽम्बरम्।
पुष्करं गगनं चेति मेरुस्तत्रैव कीर्त्यते ॥१॥
मेरुश्च पृथिवीमध्ये समन्तात्तस्य मेदिनी।
भूमेर्द्वीपविभागस्तु प्रवक्ष्यामि समन्ततः ॥२॥
आकाश, खं, वियत्, व्योम, अन्तरिक्ष, नभ, पुष्कर तथा गगन—यह सब आकाश के पर्याय हैं। वहीं मेरु भी कीर्तित है। यह पृथिवी के मध्य में है। उसके चारो ओर मेदिनी (पृथिवी) है। चारो ओर भूमि का द्वीपविभाग है॥१-२॥
जम्बूशककुशद्वीपक्रौञ्चगोमेदकानि च।
शाल्मलीपुष्कराख्ये च सप्तद्वीपानि भागशः ॥३॥
लवणक्षीरदध्यम्बुघृतोदेक्षुरसोदकाः ।
स्वादूदकश्च सप्तैते समुद्राः परिकीर्तिता ॥४॥
जम्बू, शक, कुश, क्रौञ्च, गोमेध, शाल्मलि तथा पुष्कर नामक सात द्वीप कहे गये हैं। लवण, क्षीर, दध्यम्बु, घृतोद, इक्षु, रसोदक तथा स्वादूदक नामक सात समुद्र कहे गये हैं॥३-४॥
हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नील एव च।
श्वेतश्च शृङ्गवांश्चैव षडेते वर्षपर्वताः ॥५॥
हिमवान्, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत तथा शृङ्गवान्—ये छः वर्ष पर्वत कहे गये हैं॥५॥
मानसः सप्तमस्तेषां पुर्योऽष्टौ यत्र संस्थिताः ।
माहेन्द्री चाप्यथाग्नेयी याम्या च नैर्ऋती तथा ॥६॥
वारुणी वायवी चैव सौम्येशानी तथैव च।
मानसान्निर्जला भूमिलोंकालोकस्ततो गिरिः ॥७॥
तदनन्तर सप्तम है—मानस पर्वत। वहाँ आठ नगरी विद्यमान है। माहेन्द्री, आग्नेयी, याम्या, नैर्ऋती, वारुणी, वायवी, सौम्या तथा ईशानी—ये आठ नगरी हैं। मानस पर्वत से आगे निर्जला भूमि है और उसके आगे है—लोकालोक पर्वत॥६-७॥
एकोनविंशोऽध्यायः ९७
एकोनविंशोऽध्यायः ९७
ततस्त्वण्डकपालं तु तस्माच्च परतस्तमः।
ततोऽग्निर्वायुराकाशं ततो भूतादिरुच्यते ॥८॥
ततो महान् प्रधानं च प्रकृतिः पुरुषस्ततः।
पुरुषादीश्वरो ज्ञेय ईश्वरेणावृतं जगत् ॥९॥
तदनन्तर अण्डकपाल उसके बाद अन्धकार है। उसके आगे अग्नि, वायु, आकाश, तदनन्तर भूतादि हैं। तदनन्तर महान्, प्रधान एवं प्रकृति है। उसके पश्चात् पुरुष है और उस पुरुष से आगे ईश्वर अवस्थित है। उसी ईश्वर के द्वारा यह जगत् आवृत है॥८-९॥
ऊर्ध्वं मध्यमथश्चैते प्राङ्मया ये प्रकीर्त्तिता।
भूयस्तान् सम्प्रवक्ष्यामि ह्यण्डावरणकारणात् ॥१०॥
ऊर्ध्व, मध्य एवं अधः—यह मैंने पहले कह दिया है। अण्ड के आवरण का कारण कहकर पुनः उसकी बात कहूँगा॥१०॥
भूर्लोकश्च भुवश्चैव तृतीयः स्वः प्रकीर्त्तितः।
महर्जनस्तपः सत्यं सप्तलोकाः प्रकीर्त्तिताः ॥११॥
भूलोक, भुवर्लोक तथा तृतीय स्वर्गलोक कहा गया है। मह, जन, तप, सत्य—ये सात लोक प्रसिद्ध हैं॥११॥
ततस्त्वण्डकपाले च तस्माच्च परतस्तमः।
ततोऽग्निर्वायुराकाशः ततो भूतादिरुच्यते ॥१२॥
तदनन्तर अण्डकपाल एवं तत्पश्चात् अन्धकार की स्थिति है, तत्पश्चात् अग्नि, वायु, आकाश एवं तदनन्तर भूतादि की स्थिति कही जाती है॥१२॥
ततो महान् प्रधानं च प्रकृतिः पुरुषस्ततः।
पुरुषादीश्वरो ज्ञेय ईश्वरेणावृतं जगत् ॥१३॥
तदनन्तर महान्, प्रधान तथा प्रकृति; तदनन्तर पुरुष। पुरुष के पश्चात् ईश्वर, ईश्वर के द्वारा जगत् आवृत है॥१३॥
भूमेरधस्तात् सप्तैव लोकांस्तान्नामभिः शृणु।
ततः सुतलपातालौ तमस्तालस्ततः परः ॥१४॥
सुशालश्च विशालश्च सप्तमश्च रसातलः ॥१५॥
भूमि के निम्न भाग के सात लोकों के नाम सुनो। भूमि के नीचे सुतल, पाताल, तम, ताल, सुशाल, विशाल एवं सप्तम है—रसातल॥१४-१५॥
ततो महान् प्रधानं च प्रकृतिः पुरुषस्ततः।
पुरुषादीश्वरो ज्ञेय ईश्वरेणावृतं जगत् ॥१६॥
९८ श्रीसाम्बपुराणम्
एवं मेरोः समन्तात्तु सर्वमेतत् प्रकीर्त्तितम्। उत्पन्नं स चतुःशृङ्गः सुमेरुः शुद्धकाञ्चनः ॥११७॥ पृथिव्यां संस्थितो मध्ये सिद्धगन्धर्वसेवितः। चतुर्भिः काञ्चनैः शृङ्गैर्दिव्यैर्देवमिवोल्लिखत् ॥११८॥
तदनन्तर महान्, प्रधान तथा प्रकृति; तदनन्तर पुरुष, पुरुष के परे ईश्वर, ईश्वर द्वारा समस्त जगत् आवृत रहता है। मेरु के चारो ओर यह सब है। चतुःशृङ्ग-विशिष्ट शुद्ध स्वर्णमय सुमेरु उत्पन्न है। यह पृथिवी के मध्य में है। यह सिद्ध तथा गन्धर्व द्वारा सेवित है। यह चार स्वर्णमय दिव्य शिखरों से युक्त है तथा इसे देवता के समान कहा गया है॥११६-१८॥
योजनानां सहस्राणि चतुराशीतिरुच्छ्रितः। प्रवृष्टः षोडशाधस्तादष्टाविंशतिविस्तृतः ॥११९॥ विस्तरात् त्रिगुणश्चास्य परीणाहः समन्ततः। तस्य सौमनसं नाम शृङ्गमेकं तु काञ्चनम् ॥१२०॥
इसका एक शृङ्ग चौरासी हजार योजन उन्नत, सोलह सहस्त्र योजन वर्षणयोग्य स्थान एवं निम्न देश में अट्ठारह हजार योजन विस्तृत एवं विस्तार का तीन गुना चारो ओर फैला है। वह सौमनस नामक सुवर्णमय शृङ्ग है॥११९-२०॥
द्वितीयं पद्मरागाभं ज्योतिष्कं नामनामतः। तृतीयं नामतश्चित्रं सर्वधातुमयं शुभम् ॥१२१॥
द्वितीय शृङ्ग पर पद्मराग की प्रभातुल्य ज्योतिष्क नामक लोक विराजमान है। तृतीय शृङ्ग पर चित्रनामक सर्वधातुमय शुभ लोक है॥१२१॥
चतुर्थं राजतं शुक्लं चान्द्रमासमिति स्मृतम्। तस्य सौमनसं यत्तत् शृङ्गं जाम्बूनदं श्रुतम् ॥१२२॥ तदेव चोदयन्नाम्ना यत्रोद्यन् दृश्यते रविः। उत्तरेण परिक्रम्य जम्बूद्वीपे दिवाकरः ॥१२३॥ दृश्यो भवति भूतानां शिखरं तत्समाश्रितः। काञ्चनस्य च शृङ्गस्य तेजसार्कस्य चावृते ॥१२४॥
चतुर्थ चाँदी के समान शृङ्ग पर शुक्ल चन्द्र लोक ख्यात है। उसका जो सौमनस्य शृङ्ग है, वह जाम्बूनद नाम से प्रसिद्ध है। जो उदयाचल कहा गया है, वहाँ रवि दृष्ट होते हैं। उत्तर दिक् में परिक्रमा करके जम्बूद्वीप में उस शिखर का आश्रय लेकर दिवाकर प्राणियों को दृष्ट होते हैं। वह स्वर्णशृङ्ग सूर्यतेज से ढका है॥१२३-२४॥
एकोनविंशोऽध्यायः ९९
एकोनविंशोऽध्यायः ९९
उभे सन्ध्ये प्रकाशेते आताम्रे पूर्वपश्चिमे।
शृङ्गे सौमनसे सूर्ये ह्यत्तिष्ठत्युत्तरायणे ॥२५॥
उस सौमनस शृङ्ग पर उत्तरायण में सूर्य के आने पर प्रातः तथा सायंकाल में पूर्व तथा पश्चिम दिक् में सूर्य ताम्रवर्ण दिखलाई पड़ता है॥२५॥
ज्योतिष्के दक्षिणे चापि विषुवे मध्यगस्तयोः।
तस्येशानेऽभवत्सर्वः शृङ्गेऽग्निः पूर्वदक्षिणे ॥२६॥
सूर्य के दक्षिण दिशा (दक्षिणायन में जाने पर)······पूर्व तथा पश्चिम दिक् शुभ्र अग्निवर्ण के हो जाते हैं॥२६॥
नैर्ऋत्ये पितरो ज्ञेयो वायव्ये मरुतस्तथा।
मध्ये नारायणः साक्षाद् ब्रह्मज्योतींषि चैव हि।
आदित्यः स्वेन रूपेण तस्मिन् व्योम्नि प्रतिष्ठितः ॥२७॥
इति श्री साम्बपुराणे व्योमोत्पत्तिर्नामैकोनविंशोऽध्यायः
नैर्ऋत्य में पितरों का एवं वायव्य में मरुद्गणों का स्थान है तथा मध्य में साक्षात् नारायण विराजमान हैं, जो ब्रह्मज्योतिःस्वरूप हैं। उसी आकाश में सूर्य अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित है॥२७॥
श्री साम्बपुराण का व्योमोत्पत्ति नामक उनविंश अध्याय समाप्त
विंशोऽध्यायः
(सूर्यपरिक्रमणम्)
नारद उवाच
अथ हेममयस्यास्य मेरोः प्रतिदिशं स्थिताः।
चतुर्णां लोकपालानां पूर्वस्तान्नामभिः शृणु॥१॥
नारद कहते हैं—हेममय इस मेरु के प्रत्येक दिशा में स्थित चार लोकपालों की नगरी विद्यमान है। अब उनके नाम सुनो॥१॥
प्राच्यां दिशि सुमेरोस्तु महेन्द्रस्यामरावती।
दक्षिणे तु पुनर्मेरोर्यमस्य यमनीपुरी॥२॥
प्रतीच्यां तु पुनर्मेरोर्वरुणस्य सुखापुरी।
दिश्युत्तरस्यां मेरोस्तु सोमस्यापि विभापुरी॥३॥
मध्याह्नं मध्यरात्रं च उदयास्तमने तथा।
कुर्वंश्चतुर्षु पार्श्वेषु तपत्येष हि भास्करः॥४॥
सुमेरु के पूर्व की ओर महेन्द्र की अमरावती नगरी विद्यमान है। मेरु के दक्षिण में यमनी नामक यम की पुरी है। मेरु के पश्चिम में वरुण की सुखा नामक पुरी है और मेरु के उत्तर की ओर सोम की विभानामक पुरी स्थित है। उदय तथा अस्तगमन काल में मध्याह्न तथा मध्यरात्र (अर्थात् उदयकाल के दिवाभाग में मध्याह्न तथा अस्तगमनकाल में रात्रि में मध्यरात्र) का सम्पादन करके चारो ओर भास्कर ताप-दान करते हैं॥२-४॥
मध्यगश्चामरावत्यां यदा भवति भास्करः।
वैवस्वते संयमने चोत्तिष्ठन् दृश्यते तदा॥५॥
जब सूर्य अमरावती के मध्यगामी होता है, तब वैवस्वत (सूर्य) संयमनी पुरी से उठते हैं तथा दिखलाई पड़ते हैं॥५॥
सुखायामर्धरात्रं तु विभायामस्तमेति च।
वैवस्वते संयमने मध्यगस्तु रविर्यदा॥६॥
सुखायामथ वारुण्यामुत्तिष्ठन् दृश्यते तदा।
विभायामर्धरात्रं तु माहेन्द्रयामस्तमेति च॥७॥
१०१
सुखा (वरुणपुरी) में आधी रात को तथा विभा (सोम की पुरी) में सूर्य अस्त होते हैं। वैवस्वत संयमनी पुरी में जब मध्यगामी होते हैं तब वरुण की सुखा पुरी में उदित सूर्य दृश्यमान होते हैं। किन्तु तब विभा में अर्धरात्रि होती है एवं माहेन्द्र (अमरावती) पुरी में सूर्य का अस्तगमन होता है।।६-७।।
सुखायां चापि वारुण्यां मध्याह्ने चार्यमा यदा।
विभायां सोमपुर्यां स उत्तिष्ठति विभावसुः ॥८॥
सुखा नामक वरुण की पुरी में जब मध्याह्न में अर्यमा (सूर्य) रहते हैं तब विभा की सोमपुरी में विभावसु (सूर्य) उदित होते हैं।।८।।
रात्र्यर्धे त्वमरावत्यामस्तमेति यमस्य वै।
सोमपुर्यां विभायान्तु मध्याह्ने त्वर्यमा यदा ॥९॥
जब अमरावती में अर्द्धरात्रि होती है, तब यमपुरी में सूर्यास्त होता है। तब सोमपुरी विभा में मध्याह्न होता है।।९।।
माहेन्द्र्याममरावत्यामुत्तिष्ठति दिवाकरः।
अर्द्धरात्रं संयमने वारुण्यामस्तमेति च ॥१०॥
महेन्द्रपुरी अमरावती में जब दिवाकर उदित होते है, संयमनी में तब आधी रात होती है तथा वरुण की पुरी में सूर्यास्त होता है।।१०।।
एवं चतुर्षु पार्श्वेषु मेरोः कुर्वन् प्रदक्षिणाम्।
उदयास्तमने चासावुत्तिष्ठति पुनः पुनः॥११॥
इस प्रकार मेरु के चारो ओर प्रदक्षिणा करते हुये अस्त होने के पश्चात् बार-बार सूर्य उदित होता है।।११।।
पूर्वाह्ने वापराह्ने च द्वौ द्वौ देवालयौ तु सः।
तपत्येकञ्च मध्याह्ने ताभिरेव गभस्तिभिः ॥१२॥
पूर्वाह्न तथा अपराह्न में वह सूर्य दो-दो देवालय एवं मध्याह्न में एक देवालय में सब किरणों द्वारा ताप प्रदान करते हैं।।१२।।
उदितो वर्धमानाभिरामध्याक्रान्तये रविः।
ततः परं ह्रसन्तीभिर्गोभिरस्तु नियच्छति ॥१३॥
रवि उदित होने पर (मेरु) अतिक्रम के लिये क्रमशः वर्द्धमान किरण प्रकाशित करके एवं तदनन्तर क्षीण किरणों के साथ अस्तगमन करता है।।१३।।
यत्रोद्यन् दृश्यते चैव स तेषामुदयः स्मृतः।
अदृश्यं गच्छते यत्र तेषामस्तं तदुद्यते ॥१४॥
१०२ श्रीसाम्बपुराणम्
सूर्य उदित होने पर जहाँ दृश्य होता है, उसे उदय कहते हैं तथा जहाँ अदृश्य होते हैं, उसे अस्त कहते हैं।।१४।।
विदूरभावादर्कस्य भूमिलेखागतस्य च।
लीयते रश्मयो यस्मात्तेन रात्रौ न दृश्यते ॥१५॥
भूमिरेखा से सूर्य के अतिदूर स्थित होने के कारण तथा रश्मिसमूह लीन होने के कारण रात में सूर्य दृश्य नहीं होता।।१५।।
लेखायामास्थितः सूर्यो यत्र यत्र प्रदृश्यते।
ऊर्ध्वं शतसहस्रं तु योजनानां स दृश्यते ॥१६॥
भूमि रेखा में अवस्थित सूर्य जहाँ-जहाँ दृश्य होता है, शतसहस्र योजन ऊर्ध्व में भी वह दृश्य होता है।।१६।।
एवं पुष्करमध्यन्तु यथा भवति भास्करः।
त्रिंशद्भागन्तु मेदिन्यां मुहूर्तेन स गच्छति ॥१७॥
पूर्णं शतसहस्राणामेकत्रिंशच्छताधिकम्।
निमेषान्तरमात्रेण दिवि सूर्यः प्रसर्पति ॥१८॥
जब सूर्य पुष्कर-मध्य में अवस्थान करते हैं, तब पृथिवी का तीस भाग मुहूर्त में अतिक्रम करते हैं। पूर्ण, शत, सहस्र, एकत्रिंश शताधिक निमेषमात्र सूर्य आकाश में गमन करते हैं।।१७-१८।।
पञ्चाशता तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु।
मौहूर्तिकी गति ह्येषा सूर्यस्य तु विधीयते ॥१९॥
योजनानां सहस्रे द्वे शते द्वे चैव योजने।
निमिषान्तरमात्रेण दिवि सूर्यः प्रसर्पति ॥२०॥
पञ्चशत तथा अन्य सहस्राधिक मौहूर्तिकी गति इस सूर्य की होती है। सूर्य निमेष मात्र में दो हजार दो सौ योजन गमन करते हैं।।१९-२०।।
स शीघ्रमेव पर्येति भास्कराऽलातचक्रवत्।
भ्रमाद्यैर्भ्रममानेषु ऋक्षेषु विहरत्यसौ ॥२१॥
वह भास्कर शीघ्रता से अलातचक्र के समान परिभ्रमण करते-करते भ्रममाण नक्षत्रों में विहार करते हैं।।२१।।
इन्द्रः पूजयते सूर्यमुदयन्तं दिने दिने।
मध्याह्ने धर्मराजस्तु ह्यस्तं यान्तमपांपतिः ॥२२॥
विंशोऽध्यायः १०३
विंशोऽध्यायः १०३
इन्द्र प्रतिदिन उदीयमान सूर्य का पूजन करते हैं। मध्याह्न काल में धर्मराज पूजन करते हैं तथा अस्तगामी सूर्य का पूजन वरुण करते हैं।।२२।।
सोमस्तथार्धरात्रे तु कुबेरश्चैव सानुगः।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च पूजयन्ति निशाक्षये ॥२३॥
एवमग्निर्निर्र्ऋतिश्च वायुरीशान एव च।
पूजयन्ति क्रमेणैव भ्रममाणं दिवाकरम् ॥२४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्यस्य परिक्रमणं नाम विंशतितमोऽध्यायः
इसी प्रकार अर्द्धरात्रि में सोम एवं सानुग (अनुगामी गण के साथ) कुबेर पूजन करते हैं। रात्रि के शेष काल में ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव सूर्य का पूजन करते हैं। इसी प्रकार अग्नि, निर्ऋति (दक्षिण पश्चिम कोण के शासक देवता), वायु तथा ईशान (अष्टम रुद्र) क्रमशः भ्रममान सूर्य का पूजन करते हैं।।२३-२४।।
श्री साम्बपुराणोक्त सूर्यपरिक्रमा तथा देवपूजन नामक विंश अध्याय समाप्त
एकविंशोऽध्यायः
(आदित्यरथवर्णनम्)
नारद उवाच
अथ सूर्यरथस्यास्य सन्निवेशं निबोध मे।
स्यन्दते चैकचक्रेण पञ्चारेण त्रिणेमिना ॥१॥
नारद कहते हैं—अब सूर्यरथ का सन्निवेश कहता हूँ, मुझसे सुनो। एक चक्र, पाँच अर (चक्र की नाभि तथा नेमि में संयोजित काष्ठ) तथा तीन नाभि द्वारा वह परिचालित होता है॥१॥
हिरण्मयेन कान्तेन ह्यष्टचर्मैकनेमिना।
चक्रेण भास्वता चैव दिवि सूर्य प्रसर्पति ॥२॥
हिरण्मय कान्तियुक्त अष्ट चर्म के नेमियुक्त उज्ज्वल रथ द्वारा द्युलोक में सूर्य गमन करते हैं॥२॥
नवयोजनसाहस्रो विस्तारायाम उच्यते।
द्विगुणोऽस्य रथोपस्थादीषादण्डप्रमाणतः ॥३॥
नव योजन सहस्र (९०००) इसकी विस्तृति एवं विशालता कही गयी है तथा रथ से द्विगुण इषादण्ड का प्रमाण है (अक्ष तथा युगधारणार्थ दण्ड)॥३॥
धुरेऽस्यैव तु विस्तीर्णे अरुणो नाम सारथिः।
स तस्य ब्रह्मणा सृष्टो रथः संवत्सरात्मकः ॥४॥
इस विस्तीर्ण धूर का अरुण नामक सारथी है। उनका यह रथ ब्रह्मा द्वारा सृष्ट तथा संवत्सरात्मक है॥४॥
आसङ्गः काञ्चनो दिव्यो युक्तः परमगैर्हयैः।
छन्दोभिर्वाजिरूपैस्तैर्यतश्चक्रं ततः स्थितैः ॥५॥
तेनासौ सर्पते व्योम्नि भास्वता तु दिवस्पतिः ॥६॥
यह स्वर्णवर्ण के द्रुतगामी अश्वों से जुता रथ है। अश्वरूप छन्दों से आकाश को उद्भासित करने वाले इस रथ पर दिवाकर संक्रमण करते हैं॥५-६॥
अथ मारीचसूर्यस्य प्रत्यङ्गानि रथस्य तु।
संवत्सरास्यावयवैः कल्पितानि यथाक्रमम् ॥७॥
एकविंशोऽध्यायः १०५
नाभ्यास्तिस्रस्तु चक्रस्य त्रयः कालाः प्रकीर्त्तिताः।
आराः पञ्चार्त्तवास्तस्य नेमिः षड्ऋतवः स्मृताः ॥८॥
तथोर्व्यो तस्य चायने दक्षिणोत्तरे।
मुहूर्त्ताश्च बन्धु रास्तस्य सव्यास्तस्य कलाः स्मृताः ॥९॥
मारीच सूर्य के रथ के अंगसमूह संवत्सर के अवयव के द्वारा यथाक्रम से कल्पित होते हैं। चक्र की तीन नाभि में तीन काल (भूत-भविष्यत् तथा वर्तमान) रहता है। जो अर हैं, वे पञ्च ऋतु हैं। नेमि को षड् ऋतु कहा है। उसकी दो डोरियाँ दक्षिण-उत्तर अयन हैं, धुरा मुहूर्त है एवं सव्य कलायें हैं॥७-९॥
तस्य काष्ठाः स्मृता घोणा ह्यक्षदण्डाः क्षणास्तु वै।
निमेषाश्चानुकक्षाश्च ईषा चास्य लवाः स्मृताः ॥१०॥
नाभिर्धनूर्ध्वो धर्मस्य ऊर्ध्वं तस्य समुच्छ्रितः।
युगाक्षकौ तु तौ तस्य चार्थकामावुभौ स्मृतौ ॥११॥
इसके काष्ठासमूह को (अष्टादश निमेषात्मक काल को) घोण तथा अक्षदण्ड-समूह को क्षण कहते हैं। निमेषसमूह को अनुकक्ष तथा ईषा को (रथावयव-विशेष को) लव कहा जाता है। नाभि के धनु के ऊर्ध्व को धर्म का ऊर्ध्व भाग कहते हैं। उसके युग को अर्थ तथा अक्ष को काम कहा गया है॥१०-११॥
अक्षरूपाणि च्छन्दांसि वहन्ते क्रमतो धुरम्।
गायत्री चैव त्रिष्टुप् च जगत्यनुष्टुबेव च ॥१२॥
पंक्तिश्च बृहती चैव उष्णिगेव च सप्तमी।
चक्रमक्षनिबद्धं तु ध्रुवे चाक्षः समर्थितः ॥१३॥
इसके अक्षरूप छन्द यथाक्रम से भार वहन करते हैं। गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, पंक्ति, बृहती तथा उष्णिक्—ये सात छन्द हैं। इसके चक्र से अक्षसमूह निबद्ध है तथा ध्रुव में अक्ष समर्थित है॥१२-१३॥
सहचक्रो भ्रमत्यक्षः स चाक्षो भ्रमति ध्रुवे।
मोक्षः सहैव चक्रेण भ्रमतेऽसौ ध्रुवेरितः ॥१४॥
चक्र के साथ अक्ष भ्रमण करता है और वह अक्ष ध्रुव में भ्रमण करता है। ध्रुव के द्वारा परिचालित वह अक्ष चक्र के साथ भ्रमण करता है॥१४॥
एवमर्थवशात्तस्य सन्निवेशो रथस्य तु।
तथा संसर्पते व्योम्नि संसिद्धो भास्करो रथः ॥१५॥
इस प्रकार प्रयोजनानुरूप सूर्यदेव का रथ सन्निवेशित है। आकाश में यह सिद्ध सूर्यरथ क्रमपूर्वक परिभ्रमण करता है॥१५॥
१०६ श्रीसाम्बपुराणम्
जेतासौ तु रविर्देवान्नभः संसर्पते तथा।
युगाक्षकोटिसम्बद्धे तस्य वै स्यन्दनस्य तु॥१६॥
ते भ्रमेते ध्रुवासक्ते तच्चक्रं युगयोस्तु वै।
भ्रमतो मण्डलान्यस्य खेचरस्य रथस्य तु॥१७॥
जयशील रवि देवगण को आकांश में परिचालित करते हैं। उनका रथ का युग कोटि अक्ष से सम्बद्ध है। चक्र तथा युग ध्रुव से आसक्त है। ऐसा आकाशगामी रथ मण्डलों में भ्रमण करता रहता है॥१६-१७॥
कुलालचक्रवद् भाति मण्डलं सर्वतोदिशम्।
रज्जुभ्यां प्रगृहीते ते चक्रे वै चेरतुर्ध्रुवे॥१८॥
यह मण्डल कुम्हार के चक्र के समान सभी दिशाओं को प्रकाशित करता है। रज्जु के द्वारा प्रगृहीत दो चक्र ध्रुव में विचरण करते रहते हैं॥१८॥
ह्रसेते तस्य रश्मी ते मण्डले दक्षिणायने।
उत्तरे त्वथ वर्धेते पुरा रश्मी युगे तु वै॥१९॥
तथैव बाह्यतः सूर्यो भ्रमते मण्डलानि तु।
अशीतिमण्डलशतं काष्ठयोरन्तरं तयोः।
स रथोऽधिष्ठितो देवैरादित्यै ऋषिभिस्तथा॥२०॥
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च सर्पग्रामणिराक्षसैः।
एते वसन्ति सूर्ये वै मासौ द्वौ द्वौ क्रमेण तु॥२१॥
दक्षिणायन में सूर्यरश्मि का ह्रास होता है। पुनः उत्तरायण में रश्मियुक्त होकर वृद्धि प्राप्त करता है। ऐसे ही सूर्य बाहर मण्डलों में भ्रमण करते हैं। उन काष्ठाद्वय के पार्थक्य से अशीति शत मण्डल होता है। देवगण, आदित्यगण तथा ऋषिगण, गन्धर्व, अप्सरा, सर्प, ग्रामणि तथा राक्षसों के साथ सूर्यदेव रथ पर अधिष्ठित रहते हैं। ये सभी क्रमशः दो-दो मास सूर्य के रथ में अवस्थान करते हैं॥१९-२१॥
धातार्यमा पुलस्त्यश्च पुलहश्च प्रजापतिः॥२२॥
उरगो वासुकिश्चैव कच्छनीरस्तथेरितः।
तुम्बुरुर्नारदश्चैव गन्धर्वौ गायतां वरौ॥२३॥
कृतस्थल्यप्सराश्चैव या तथा पुञ्जिकस्थली।
ग्रामण्यौ रथकृत्स्नश्च रथौजाश्चैव तावुभौ॥२४॥
धाता, अर्यमा, पुलस्त्य, पुलह, प्रजापति, सर्प, वासुकी, कच्छ, नीर, तुम्बुरु तथा नारद, गायन में श्रेष्ठ गन्धर्वद्वय, गायिका कृतस्थली, पुञ्जिकस्थली अप्सरायें, दो यातुधान, दो सर्प तथा व्याघ्र उस रथ पर रहते हैं॥२२-२४॥
एकविंशोऽध्यायः १०७
रक्षो हेतिः प्रहेतिश्च यातुधानौ स्मृतावभौ।
मधुमाधवयोरेष गणौ वसति भास्करे॥२५॥
राक्षस हेति-प्रहेती—ये दो लोग यातुधान कहे गये हैं। मधु (चैत्र) तथा माधव (वैशाख) मास में गणलोग सूर्य में अवस्थान करते हैं॥२५॥
वसतो ग्रैष्मिकौ मासौ मित्रश्च वरुणश्च ह।
ऋषिरत्रिर्वशिष्ठश्च तक्षकोऽनन्त एव च॥२६॥
मेनका सहजान्या च गन्धर्वौ च हहाहूहूः।
रथस्वनश्च ग्रामण्यौ रथचित्रश्च तावुभौ॥२७॥
ग्रीष्म के दो मास में मित्र तथा वरुण वास करते हैं। ऋषि हैं—वशिष्ठ तथा अत्रि। सर्प हैं—तक्षक एवं अनन्त। मेनका तथा सहजन्या हैं—अप्सरा। हाहा-हूहू गन्धर्व हैं। रथस्वन तथा रथचित्र हैं—ग्रामणी॥२६-२७॥
पौरुषेयो वधश्चैव यातुधानौ च तावुभौ।
शुचिशुक्रौ तु द्वौ मासौ सूर्ये ह्येते वसन्ति वै॥२८॥
पौरुषेय तथा वध—ये दो यातुधान हैं। शुचि तथा शुक्र (शुचि अर्थात् ज्येष्ठ, शुक्र अर्थात् आषाढ़) मास में ये सूर्य में वास करते हैं॥२८॥
अथ सूर्ये पुनस्त्वन्या निवसन्तिस्म देवताः।
इन्द्रश्चैव विवस्वांश्च अङ्गिरा भृगुरेव च॥२९॥
एलापत्रस्तथा शङ्खपालः सर्पौ च तावुभौ।
विश्वावसूग्रसेनौ च प्रेतोऽसमरथस्तथा॥३०॥
प्रम्लोचन्त्यप्सराश्चैवाऽनुम्लोचन्तीव ते शुभे।
यातुधानौ तथा सर्पौ व्याघ्रश्चैव स्मृतावभौ॥३१॥
तदनन्तर सूर्य में अन्य देवता वास करते हैं—इन्द्र तथा विवस्वान् देवता, अंगिरा तथा भृगु ऋषि, एलापत्र तथा शङ्खपाल सर्प, विश्वावसु, उग्रसेन, प्रेत, असमरथ, गन्धर्व, प्रम्लोचन्ती तथा अनुम्लोचन्ती शुभजनक अप्सरा, दो यातुधान, दो सर्प एवं व्याघ्र निवास करते हैं॥२९-३१॥
एते नभौ नभस्यौ च निवसन्ति दिवाकरे।
शरद्यान्याः पुनः शुभ्रा निवसन्तिस्म देवताः॥३२॥
ये सभी श्रावण तथा भाद्र में सूर्य में निवास करते हैं। शरत् काल में अन्यान्य देवगण वास करते हैं॥३२॥
| १०८ | श्रीसाम्बपुराणम् |
|---|
पर्जन्यश्चैव पूषा च भारद्वाजः सगौतमः।
चित्रसेनश्च गन्धर्वस्तथा वसुरुचिश्चयः॥३३॥
विश्वाची च घृताची च उभे तु पुण्यलक्षणे।
नागस्त्वैरावतश्चैव विश्रुतश्च धनञ्जयः॥३४॥
सेनजिच्च सुषेणश्च सेनानी ग्रामणीश्च तौ।
आपो वातश्च द्वावेतौ यातुधानौ प्रकीर्तितौ॥३५॥
वसन्त्येते तु वै सूर्ये ईषोर्जौ कालपर्ययात्।
पर्जन्य तथा पूषा देवता, भारद्वाज तथा गौतम ऋषि, गन्धर्वगण, चित्रसेन, रुचि तथा चय नामक वसुद्वय, पुण्यलक्षणा विश्वाची तथा घृताची अप्सरा, नाग तथा ऐरावत, विश्रुत एवं धनञ्जय, सेनजित् सुषेण-सेनानी तथा ग्रामरक्षक, अप तथा वात—ये दो यातुधान। ये सभी कालक्रम से आश्विन एवं कार्तिक में सूर्य में निवास करते हैं॥३३-३५॥
हैमन्तिकौ तु द्वौ मासौ वसन्ति तु दिवाकरे॥३६॥
अंशो भागश्च द्वावेतौ कश्यपश्च क्रतुश्च तौ।
भुजङ्गश्च महापद्मः सर्पः कर्कोटकस्तथा॥३७॥
चित्राङ्गदश्च गन्धर्व ऊर्णायुश्चैव तावुभौ।
अप्सराः पूर्वचित्तिश्च गन्धर्वा चोर्वशी तथा॥३८॥
तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च सेनानीर्ग्रामणीश्च तौ।
अवस्फूर्जश्च विद्युच्च यातुधानौ तु तौ स्मृतौ॥३९॥
अग्रहायण तथा पौष (हैमान्तिक) मास में ये दिवाकर में निवास करते हैं—अंश तथा भाग ये दो देवता, कश्यप तथा ऋतु ऋषि, भुजङ्ग महापद्म तथा कर्कोटक सर्प, चित्रांगद तथा ऊर्णायु गन्धर्व, पूर्वचित्ति तथा उर्वशी अप्सरा, तार्क्ष्य (गरुड़) तथा अरिष्टनेमि—दो सेनानी (ग्रामणी) एवं दो यातुधान—अवस्फूर्ज तथा विद्युत्॥३६-३९॥
सह चैव सहस्ये च वसन्त्येते दिवाकरे।
ततः शैशिरयश्चापि मासयोर्निवसन्ति वै॥४०॥
त्वष्टा विष्णुर्जमदग्निः विश्वामित्रस्तथैव च।
काद्रवेयौ तथा नागौ कम्बलाश्वतरावुभौ॥४१॥
गन्धर्वौ धृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चाश्च तावुभौ।
इत्येते निवसन्ति स्म द्वौ द्वौ मासौ दिवाकरे॥४२॥
माघ तथा फाल्गुन में ये सूर्य में अवस्थान करते हैं। तदनन्तर शीतकालीन मासद्वय में ये वास करते हैं—त्वष्टा एवं विष्णु देवता, जगदग्नि तथा विश्वामित्र ऋषि, काद्रवेय तथा कम्बलाश्वतर नाग, धृतराष्ट्र तथा सूर्य वर्चा गन्धर्व—ये सब दो-दो मास सूर्य में रहते हैं॥४०-४२॥
एकविंशोऽध्यायः १०९
स्थानाभिमानिनो होते गणा द्वादशसप्तकाः।
तिलोत्तमा च रम्भा च शुभे चाप्सरसां वरे ॥४३॥
ग्रामणीः ऋतुजिच्चैव सप्तजिच्च महायशाः।
ब्रह्मप्रेतश्च रक्षो वै यक्षप्रेतश्च तावुभौ ॥४४॥
सूर्यमाप्यायन्येते तेजसां तेज उत्तमम्।
प्रथितैः स्वैर्वचोभिश्च स्तुवन्ति ऋषयो रविम् ॥४५॥
स्थानाभिलाषी ये ८४ जन सूर्य के परिकर हैं। मंगलमयी अप्सराश्रेष्ठ तिलोत्तमा तथा रम्भा, ऋतुजित् तथा सप्तजित् महायशस्वी ग्रामणी, ब्रह्मप्रेत तथा यक्षप्रेत—ये राक्षस। तेजस्वी सूर्य को आप्यायित करते हैं। ऋषिगण अपने-अपने प्रसिद्ध वाक्यों से सूर्य की स्तुति करते हैं॥४३-४५॥
गन्धर्वाप्सरसश्चैव गीतनृत्यैरुपासते।
विद्युद् ग्रामणिो यक्षाः कुर्वन्तिस्म प्रदक्षिणम् ॥४६॥
गन्धर्व तथा अप्सरायें गीत-नृत्य से उपासना करते हैं। विद्युत्, ग्रामणीगण तथा यक्षगण प्रदक्षिणा करके स्तुति करते हैं॥४६॥
सर्पाः वहन्ति सूर्यं वै यातुधानानुयान्ति च।
बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद्रविम् ॥४७॥
सर्पगण सूर्य का वहन करते हैं। यातुधान उनका अनुगमन करते हैं। बालखिल्य ऋषिगण उदय के समय सूर्य को परिवृत करके अस्ताचल-पर्यन्त ले जाते हैं॥४७॥
एतेषामेव देवानां यथावीर्यं यथातपः।
यथायोगं यथातत्त्वं यथासत्त्वं यथाबलम् ॥४८॥
तथा तपत्यसौ सूर्यस्तेषामिन्द्रस्तु तेजसाम्।
एते तपन्ति वर्षन्ति यान्ति भान्ति सृजन्ति च ॥४९॥
जिन देवतागण की जैसी शक्ति है, जैसी तपस्या है, जैसा योग है, जैसा तत्त्व है, जैसा सत्व है, जैसा बल है, उसे तेजोसमूह श्रेष्ठ सूर्य उसी प्रकार का ताप प्रदान करते हैं। तब ये देवगण ताप देते हैं, वर्षा कराते हैं, गमन-प्रकाश प्रदान करते हैं तथा सृष्टि करते हैं॥४८-४९॥
भूतानामशुभं कर्म व्यपोहन्ति च कीर्त्तिताः।
एते सहैव सूर्येण भ्रमन्ते सानुगा दिवि ॥५०॥
तपन्तश्च जपन्तश्च ह्लादयन्तश्च वै प्रजाः।
गोपायन्तिस्म भूतानि सर्वाणीहानुकम्पया ॥५१॥
११० श्रीसाम्बपुराणम्
ये प्राणियों के जो अशुभ कर्म कहे गये हैं, उनका अपनोदन करके सूर्य के साथ द्युलोक में भ्रमण करते हैं। ये प्रजागण को ताप देते हैं, जप करने पर आनन्द देते हैं और जगत् पर कृपा करके प्राणीगण की रक्षा करते हैं।।५०-५१।।
स्थानाभिमानिनामेतत् स्थानं मन्वन्तरेषु वै।
अतीतानागताश्चैव वर्त्तन्ते साम्प्रतं च ये॥५२॥
स्थानाभिमानियों के मन्वन्तर का यही स्थान है। अतीत, अनागत तथा वर्त्तमान में जो हैं, उनके लिये भी यही स्थान है।।५२।।
ग्रैष्मे हिमे च वर्षासु विमुञ्चमानो
घर्मं हिमं च वर्षं च दिवानिशं च।
गच्छत्यसावृतुवशात् परिवर्त्य रश्मीन्
देवान् पितृंश्च मनुजांश्च स तर्पयन् वै॥५३॥
ग्रीष्म, हिम तथा वर्षा में यथाक्रमेण गर्मी, हिम तथा वृष्टि प्रदान करते हैं। सूर्य ऋतु के वशात् रश्मि-निवर्त्तन नहीं करके देवता, पितृ एवं मनुष्यों को तृप्ति प्रदान करते हैं।।५३।।
प्रीणाति देवानमृतेन सूर्यः सोमं सुषुम्नेन विवर्द्धयित्वा।
शुक्ले तु पूर्णं दिवसक्रमेण तं कृष्णपक्षे विबुधाः पिबन्ति ॥५४॥
सूर्य देव अमृत द्वारा देवगण का प्रीतिविधान करते हैं। सोम का वर्षण सुषुम्ना नाड़ी से करते हैं। शुक्लपक्ष के दिवसक्रम में (प्रतिदिन क्रमानुसार) उसे पूर्ण करते हैं। कृष्ण पक्ष में देवता उसका पान करते हैं।।५४।।
पीतं तु सोमं हि कलावशिष्टं कृष्णे च पक्षे रुचिभिः क्षरन्तम्।
स्वधामृतं तं पितरः पिबन्ति सर्पाश्च सौम्याश्च तथैव काव्याः ॥५५॥
पीत कलावशिष्ट कृष्ण पक्ष की कान्ति द्वारा क्षरित उसे पितृगण स्वधामृत रूप से पान करते हैं। वैसे ही सर्प, सौम्य तथा काव्यगण भी पीते हैं।।५५।।
सूर्येण गोभिस्तु समुद्गताभिरद्भिः पुनश्चैव समुज्झिताभिः।
वृष्ट्याभिवृद्ध्यापि तथौषधीभिर्मर्त्याः सुधामन्नरसैर्जयन्ति ॥५६॥
सूर्य की किरणों से समुद्भूत, पुनः परित्यक्त जल द्वारा वृष्टिरूपेण अभिवृद्ध औषधि द्वारा, अन्नरस द्वारा मर्त्यगण (मनुष्य जाति) सुधा प्राप्त करते हैं।।५६।।
मासार्द्धतृप्तिस्त्वमृतात्सुराणां मासं च तृप्तिः स्वधया पितॄणाम्।
अन्नेन शश्वच्च दधाति मर्त्यान् सूर्यः स्वयं तत्र विभाति गोभिः ॥५७॥
अमृत से देवगण की एक पक्ष (आधा मास) तक तृप्ति होती है। स्वधा से देवगण एक मास तृप्त रहते हैं। मृत्युलोक-वासी जीवगण को निरन्तर अन्न से तृप्त करके सूर्य अपनी किरणों से प्रकाश प्रदान करते हैं।।५७।।