भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

सूत्रो ं का पातन करे । दलो ं के अग्र भागो ं का जो मान है उसी मान

७० ] [ श्रीशारदा तिलक दलमूलेषु यु॰गशः केसराणि प्रकल्पयेत् । एतत् साधारणं प्रोक्तं पङ्कजं तन्त्रवेदिभिः । ११८ पदानि त्रीणि पादार्थं पीठकोणेषु मार्जयेत् । अवशिष्टैः पदैर्विद्वान् गात्राणि परिकल्पयेत् । ११९ पदानि वीथिसंस्थानि मार्जयेत्पङ्क्त्यभेदतः । दिक्षु द्वाराणि रचयेद्द्विचतुष्कोष्ठकैस्ततः । १२० पदैस्त्रिभिरथैकेन शोभाः स्युर्द्वारपार्श्वयोः । उपशोभाः स्युरेकेन त्रिभिः कोष्ठैरनन्तरम् । १२१ वाह्य वृत्त के अन्तराल के मान से विधि से सुधी केसराद्यो ं में रखकर दोनो ं और अर्ध निशाचरो ं को लिये कर वहांपर सन्धि संस्थान सूत्रो ं का पातन करे । दलो ं के अग्र भागो ं का जो मान है उसी मान वाला वृत्त लिखे । ११५-११६। उसके अन्तरालमें सुधी पुरुष दोनो ं ओर उसके मध्यस्थ सूत्र के चारो ं ओर वाह्य हस्त से दलाग्रो ं को लिखे । ।११७। दलो ं के मूलो ं में दो केसरो ं को प्रकल्पित करे । तन्त्र शास्त्र विद्वानो ं द्वारा यह साधारण पंकज बताया गय है । ११८। पाद के लिये पीठ के कोणों में तीन पदो ं का मार्जन करना चाहिये । अवशिष्ट पदो ं के द्वारा विव्दान् को चाहिये कि वह गात्रो ं का परिकल्पन करे ।११९। पक्ति के अभेद से ही वीथि में संस्थिति पदो ं का मार्जन करे । दिशाओ ं में द्वारो ं की रचना करे फिर दो और चार कोष्ठो ं वाले पदो ं से रचना करनी चाहिये । इसके अनन्तर एक के द्वारा द्वार के पार्श्व भागो ं की शोभाएं होती है । एक से उपशोभाए होती हैं और अनन्तर में तीन कोष्ठो ं से होती हैं । १२०-१२१। क्षवशिष्टैः पदैः षड्भिः कोणानां स्याञ्चतुष्टयम् । रञ्जयेत्पञ्चभिर्वर्णैर्मण्डलं तन्मनोहरम् । १२२ पीतं हरिद्राचूर्णं स्यात्सितं तन्डुलसम्भवम् । कुसुम्भचूर्णमरुणं कृष्णं दग्धं पुलाकजम् । १२३

य पटल ] [ ७१ विल्वादिपत्रजं श्याममित्युक्तं पञ्चवर्णकम् । अंगुलोत्सेधविस्ताराः सीमारेखाः सिताः शुभाः । १२४ कर्णिकां पीतवर्णेन केसपाण्यरुणेन च । शुभ्रवर्णेन पत्राणि तत्सन्धिः श्यामलेन च । १२५ रजसा रञ्जयेन्मन्त्री यद्वा पीतैव कर्णिका । केसराः पीतवर्णाक्ताः अरुणानि दलानि च । १२६ सन्धयः कृष्णवर्णाः स्युः पीतेनाप्यसितेन वा । रञ्जयेत्पीठगर्भाणि पादाः स्यु रुणप्रभाः । १२७ अवशिष्ट छै पदों से कोणों का चतुष्टय होता है। उस मण्डल को परम मनोहर पाँच वर्णों के द्वारा रंजित करना चाहिये । १२२। पीला हल्दी का चूर्ण होता है और श्वेत तण्डुलों का चूर्ण है-कुसुम्भों का चूर्ण अरुण वर्ण माला होता है। और पुलाकज जलाया हुआ कृष्ण होता है । १२२। विल्व आदि के पत्तों समुत्पन्न श्याम होता है-ये पांच वर्ण कहे गये हैं। एक अद्भूत उत्सेध (ऊँचाई) और विस्तार से समन्वित सित एवं शुभ सीमा की रेखाये होती हैं । १२४। कर्णिका को पीत वर्ण से और अरुण वर्ण से केसरों को—शुभ्र वर्ण से पत्रों का और उनकी सन्धि को श्यामल वर्ण से रजक द्वारा मन्त्रधारी रंजन करे अथवा कर्णिका पीत ही होवे । केसर पीत वर्ण से अक्त होवे और दल अरुण होवे । १२५-१२६। सन्धियाँ कृष्ण वर्ण वाली होवें या पीत अथवा सित से युक्त होवें । पीठ के गर्भों का रंजन करे और पाद अरुण प्रभा वाले होने चाहिये । १२७। गात्राणि तस्य शुक्लानि विथीषु च चतसृषु । आलिखेत्कल्पलतिका दलपुष्पफलान्विताः । १२८ वर्णैर्नानाविधैश्चित्राः सर्वदृष्टिमनोहराः । द्वाराणि श्वेतवर्णानि शोभा रक्ताः समीरिताः । १२६ उपशोभाः पीतवर्णाः कोणांन्यसितभांसि च । तिस्रोरे (ले) खा बहिः कुर्यात्सितरक्तासितैः (१) क्रमात् । १३०

७२ ] [ श्रीशारदा तिलक मण्डलं सर्वतो भद्रमैतत्साधारणं स्मृतम् । चतुरस्रां भुवं भित्वा दिग्भ्यो द्वादशधा सुधीः ।१३१ पातयेत्तत्र सूत्राणि कोष्ठानां दृश्यते शतम् । चतुश्चत्वारिशदाढ्यं पश्चात्षट् त्रिंशताम्बुजम् ।१३२ कोष्ठैः प्रकल्पयेत् पीठं षड् त्तं या नैवांत्र वीथिका । द्वारशोभे यथा पूर्वमुपशोभा न दृश्यते । १३३ अवशिष्टैः पदैः कुर्यात्षड्भिः कोणानि तन्त्रवित् । विदध्यात्पूर्ववच्छेषमेवं वा मण्डलं शुभम् ।१३४ चारों वीथियों के उसके पात्र शुक्ल होवे । फिर दलों-पुष्पों और फलों से संयुत कल्प लतिका का आलेखन करे ।१२८। नाना प्रकार के वर्णों के चित्र होवें तथा सब की दृष्टि में मन को हरण करने वाली होवे । द्वार श्वेत वर्ण के होवे तथा शोभा रक्त बतलाई गई है ।१२६। उपशोभा पीत वर्ण वाली होवे और कोण असित होवे । उसके वाहिर क्रम से सित—रक्त--असित तीन रेखायें बनावें ।१३०। यह साधा- रण सर्वतोभद्र मण्डल बताया गया है । चौकोर भूमि का भेदन करके द्वादश प्रकार से सुधी दिशाओं में सूत्रों का पातन करे तो सौ कोष्ठ दिखलाई दिया करते हैं। जो चौवालीस से युक्त और पीछे छत्तीस अम्बुजों वाला होता है ।१६१-१६२। कोष्ठों के द्वारा पीठ को कल्पित करे । यहां पर पंक्ति से वीथिका नहीं होती है । द्वार शोभाऐं जैसी पूर्व में है होती है और उपशोभा दिखलाई नहीं देती ।१३३। तन्त्र का ज्ञाता नवशिष्ट पदों से जो षट् है कोणों की रचना करे । शेष सभी पहिली ही भांति समझना चाहिये । इसप्रकार से शुभ मण्डल होता है । ।१ ३४। चतुरस्रे चतुष्षष्टिप (पा) दान्यारचयेत्सुधीः । पदैश्चतुर्भिः पद्मं स्यान्म (१) ध्ये तत्परितः पुनः ।१३५ बोथीश्चतस्रः कुर्वीत मण्डलान्तावसानिकाः । दिग्गतेष चतुष्केषु पङ्कजानि समालिकेत् १३६

तृतीय पटल ] [ ७३ विद्दिग्गतचतुष्कानि भित्त्वा षोडशधा सुधीः । मार्जयेत्स्वस्तकाकारं (२) श्वेतपीतासितारुणैः । १३७ रजोभिः पूरयेत्तानि स्वस्तिकानि शिवादितः । प्राक् प्रोक्तेनैव मार्गेण शेषमन्यत्समापयेत् ।१३८ नवनाभमिदं प्रोक्तं मण्डलं सर्वसिद्धिदम् पञ्चाब्जं मण्डलं प्रोक्तमेतत्स्वस्तिकवर्जितम् ।१३६ दीक्षायां देवपूजार्थं मण्डलानां चतुष्टयम् । सर्वतन्त्रानुसारेण प्रोक्तं सर्वसमृद्धिदम् ।१४० सुधी पुरुष चतुशस्र में चौंसठ पदों की रचना करे । चार पदों से पद्म होता है फिर उसके चारों ओर मध्य में चार वीणियों बनावे जो मण्डल के अन्तवास वाली होवे । दिशामें संस्थित चारों कोंनों में पंक्तियों को लिखे ।१३५-१३६। विदिशाओं में स्थित चारों को सुधी सोलह भागों में भेदन करके स्वस्तिक के आकार वालेका मार्जन करे । शिवादि ले श्वेत पीत-असित-अरुण रज से उन स्वस्तिकों को पूरित कर देवे । पूर्व में बताते हुये ही मार्ग के द्वारा अन्य शेष का अन्य शेष का समापन करना चाहिये ।१३७-१३८। यह मण्डल नवभाव कहा गयाहै जो समस्त सिद्धियों का प्रदान करने वाला होता है यह पाँच कमलों वाला मण्डल कहा गया है जो स्वस्तिक से रहित होता है ।१३६। दीक्षा में-देवों की पूजा के लिये मण्डलों का चतुष्टय होता है । सभी तन्त्रों के अनुसार यह सब समृद्धियों का प्रदाता बताया गया है ।१८०।

चतुर्थ पटल

अथ दीक्षां प्रवक्ष्यामि मन्त्राणां हितकाम्यया । विना यया न लभ्येत सर्वमन्त्रफलं यतः ।१ दिव्यं ज्ञानं यतो दद्यात्कुर्यात्पापस्य संक्षयः । तस्माद्दीक्षेति संप्रोक्तं सर्वमान्त्रवेदिभिः ।२ चतुर्विधा सा सन्दिष्टा क्रियावत्यादि भेदतः क्रियावती वर्णमयी कलात्मा वेधमय्यपि ।३ ताः क्रमेणैव कथ्यन्ते तन्त्रेऽस्मिन्संपदावहाः । देशिको विधिवत्स्नात्वा कृत्वा पौर्वाह्निकीः क्रियाः ।४ प्रायादलङ्कृतो मौनी यागार्थं यागमण्डपम् । आचम्य विधिना तत्र सामान्यार्घ्यं विधाय च ।५ द्वारमस्त्राम्बुभिः प्रोक्ष्य द्वारपूजां समाचरेत् । ऊर्ध्वोदुम्बरके तत्र महालक्ष्मीं सरस्वतीम् ।६ ततो दक्षिणशाखायां विघ्नं क्षेत्रेशमन्यतः । तयोः पार्श्वगते गङ्गायमुने पुष्पवारिभिः ।७ देहाल्यामर्चयेदस्त्रं प्रतिद्वारा ति क्रमात् । अनन्तरं देशिकेन्द्रो दिव्यदृष्ट्यवलोकनात् ।८ इसके अनन्तर मन्त्रों के हित सम्पादन की कामना से दीक्षा के विषय में बतलाऊँगा, क्योंकि बिना दीक्षा के सभी मन्त्रों का फल नहीं प्राप्त किया जाया करता है ।१। जिसके द्वारा परम दिव्य ज्ञान प्रात हो और समस्त पापों का संक्षय हो उसी का तन्त्र शास्त्र के ज्ञाता आचार्यवरों के द्वारा इसको दीक्षा कहा गया है ।२। वह दीक्षा क्रिया- वती आदि के भेदों से चार प्रकार की सन्दिष्ट की गई है । उन भेदों के नाम ये हैं - क्रियावती--वर्णमयी--कलात्मा और वेधमयी--ये ही चार हैं । अब उन चारों को ही क्रम से यहाँ कहा जाता है जो इस

चतुर्थ पटल ] [ ७५. तन्त्र में सम्प्रदायों के आवहन करने वाली है। आचार्य को चाहिए कि वह विधि के सहित स्नान करे और पूर्वार्चन में होने वाली सम्पूर्ण क्रियाओं को पूर्ण करे ४। सब प्रकार से समलङ्कृत होकर मौन व्रत धारण करके याग के सम्पादन करने के लिए याग मण्डप में प्रयाण करे। वहाँ पर जाकर आचमन करे और सामान्य अर्ध्य देवे ।५। द्वार को अस्त्र के जल से प्रोक्षण करके फिर द्वार पूजा करने का समा- चरण करे। वहाँ पर ऊर्ध्व उदुम्बर में महालक्ष्मी और सरस्वती का यजन करे। फिर दक्षिण की ओर वालो शाखा में विघ्नराज का और अन्य ओर क्षेत्रेश का अर्चन करे। उन दोनों के पार्श्व से संस्थित गङ्गा और यमुना का पुष्पों सहित जल से यजन करे। प्रति द्वार में क्रम से देहली में अस्त्र का अर्चन करना चाहिए। इसके अनन्तर आचार्य दिव्य दृष्टि से अवलोकन करे ।६-८। दिव्यानुत्सारयेद्विघ्नानस्त्राद्भिष्चान्तरिक्षान् । पाष्णिघातैस्त्रिभिर्भौमानिति विघ्नान्निवारयेत् ।६ किंचित्स्पृशन्वामशाखां देहलो लङ्घयेद्गुरुः । अङ्गं संकोचयन्न्तः प्रविशेदक्षिणाऽङ्घ्रिगा ।१० नैऋत्यां दिशि वास्त्वीशान् (शं) ब्रह्माणं च समर्चयेत् । पञ्चगव्य।घृतोयाभ्यां प्रोक्षयेद्यागमण्डपम् ।११ चतुष्पथान्तं तच्छुद्धिं विदध्याद्वीक्षणादिना । वीक्षणं मूलमन्त्रेण शरेण प्रोक्षणं मतम् ।१२ तेनैव ताडनं दर्णैर्वर्मणाभ्युक्षणं मतम् । चन्दनागरुकर्पूरैर्वूर्पयेदन्तरं सुधीः ।१३ अन्तरिक्ष में रहने वाले दिव्य विघ्नों का अस्त्र के जल के द्वारा उत्सारण करे। पाष्णि घात तीनों से भूमिगत विघ्नों का निवारण करना चाहिये ।६। वामशाखा का कुछ स्पर्श करके गुरु देहलीका लङ्घन करे। अपने अङ्ग का संकोच करते हुए ही दाहिने चरण के द्वारा उनमें प्रवेश करना चाहिए ।१०। नैऋत्य दिशा में वास्तु के ईशों का और

७६ ] [ श्रीशारदा तिलक ब्रह्मा का समर्चन करे। फिर पञ्चगव्य और अर्घ्य के जल से याग मण्डप का प्रोक्षण करना चाहिये ।११। चतुष्पथ के अन्त पर्य्यन्त उसकी शुद्धि वीक्षण आदि के द्वारा करे। वीक्षण मूल मन्त्र के द्वारा और शर के द्वारा प्रोक्षण माना गया है ।१२। उसी के द्वारा दर्भों से ताड़न और वर्म के द्वारा अभ्युक्षण माना गया है। इसके अनन्तर सुधी को चाहिये कि चन्दन-अगरु और कपूर से धूप देवे ।१३। विकिरान्विकिरेत्तत्र सप्तजप्ताञ्छराणुना । लाजाश्चन्दनसिद्धार्थ भस्मदूर्वाङ्कु राक्षताः ।१४ विकिरा इति सन्दिष्टाः सर्वविघ्नौघनाशनाः । अस्त्रजप्तेन दर्भाणां मुष्टिना मार्जयेच्चतान् ।१५ ईशस्य दिशि वर्द्धन्या आसनाय प्रकल्पयेत् । पुण्याह वाचयित्वा तु ब्राह्मणान्परितोष्य च ।१६ उक्तेषु मण्डलेष्वेकं वेदिकायां समालिखेत् । विशेन्मृद्वासने मन्त्री प्राङ् मुखो वाप्युदङ्मुखः ।१७ बद्धपद्मासनो मौनी समाहितजितेन्द्रियः । स्थापयेद्दक्षिणे भागे पूजाद्रव्याणि देशिकः । १८ सुवासिताम्बुसम्पूर्ण सव्ये कुम्भं सुशोभनम् । प्रक्षालनाय करयोः पश्चात्पात्रं निवेशयेत् । १६ वहाँ पर सात बार जाप किये शराणु से विकिरों का विवरण करना चाहिये । लाजा—चन्दन—सिद्धार्थ—भस्म—दूर्वों—अंकुर और अक्षत में विकर वतावे गये हैं जो कि सभी विघ्नों के विनाश करने वाले होते हैं। अस्त्र से अभिमन्त्रित दर्भों की मुष्टि ने उनका मार्जन करना चाहिये ।१३-१४। ईश की दिशा में वर्धनी से आसन के लिये परिकल्पना करे । पुण्याह याचन कराकर विप्रोंको तुष्ट करे ।१६। उक्त मण्डलों में से एक मण्डेल को वेदिका में लिखे । मन्त्रधारी पूर्व की ओर अथवा उत्तर की ओर मुख वाला होकर मृदु आसन पर बैठ जावे ।१७। आचार्य पद्मासन बोध करके स्थित होवे-उसे मौन व्रत धारी

चतुर्थ पटल ] [ ७७ होना चाहिये तथा परम सावधान और इन्द्रियों की जीतने वाला रहना चाहिये । आचार्य अपने दाहिने भाग में समस्त पूजा के द्रव्यों को स्था- पित करे ।१८। परम सुगन्धित जल से भरा हुआ एक घट जो बहुत ही शोभन हो मध्य में रखे । और करों में प्रक्षालन करने के लिये पीछे एक पात्र स्थापित करे ।१९। घृतप्रज्वालितान्दीपान्स्थापयेत्परितः शुभान् । दर्पणं चामरं छत्रं तालवृन्तं मनोहरम् ।२० मङ्गलांकुरपात्राणि स्थापयेद्दक्षु देशिकः । कृतांजलिपुटोभूत्वा वामदक्षिणपाश्र्वयोः ।२१ नत्वा गुरून् गणेशानं भूतशुद्धिं समाचरेत् । करशुद्धिं समासाद्य पश्चात्तालत्रयं ततः । २२ उर्द्धवोर्द्धवमस्तमन्त्रेण दिग्बन्धमपि देशिकः । तेन संजनितं तेजो रक्षां कुर्यात्समन्ततः ।२३ सुषुम्णा वर्त्मनाऽऽत्मानं परमात्मनि योजयेत् । योगयुक्तेन विधिना चिन्मन्त्रेण समाहितः ।२४ अपने चारों ओर घृत के द्वारा जलाये हुये परम शुभ दीपों को स्थापित करे । दर्पण-चमर-छत्र-मनोहर लाल वृन्त और मङ्गल अङ्- कुरों के पात्रों को दैविक दिशाओं में स्थापित करें । दोनों हाथों को जोड़कर वाम और दक्षिण पार्श्वोमें गुरुजनों को तथा गणेशों को प्रणाम करके फिर भूत शुद्धि करे । अपने करों की शुद्धि करके पीछे तीन दिशाओं का बन्धन करे । उससे संजनित तेज सभी ओर से रक्षा करे । ।२३। सुषुम्ना के मार्ग के द्वारा अपनी आत्मा को परमात्मा में योजित करना चाहिए । परम समाहित रहे और योग में युक्त विधि से तथा चिन्मात्र के द्वारा योजन करे ।२४। कारणे सर्वभूतानान्तत्त्वान्यपि च चिन्तयेत् । बीजभावेन लीकानि व्युत्क्रमात्परमात्मनि ।२५

७८ ] [ श्रीशारदा तिलक ततः संशोषये द्देहेहं वायु बीजेन वायुना । वह्निवीजेन तेनैव संदहेत्सकलां तनुम्।२६ विश्लेषयंत्तदा दोषानमृतेनामृताम्भसा। आप्लाव्याप्लावयेद्देहमापादतलमस्तकम् ।२७ आत्मलीनानि तत्त्वानि स्वस्थानं प्राप्तेत्तदा। आत्मानं हृदयाम्भोजमानयेत्परमात्मनः ।२८ मनुना हंसदेवस्य कुर्यान्न्यासादिकं ततः ऋषिश्चन्दोदेवतानि न्यसेन् मन्त्रस्य मन्त्रवित् ।२६ आत्मनो मूर्ध्नि बदने हृदये च यथाक्रमात् । विधाय मूलमन्त्रेण प्राणायामं यथाविधि ।३० समस्त भूतों के कारण में तत्वों का भी विशेष चिन्तन करना चाहिए । जो बीज भाव से व्युत्क्रम से परमात्मा में लीन हैं ।२५। इसके अनन्तर वायु बीज के द्वारा वायु से देह को संशोषण करे । उसी वह्नि बीज के द्वारा अपने सम्पूर्ण देह का दहन करे ।२६। उस अवसर में अमृत जल स दोषों का विश्लेषण करे । देह को आप्लावित करके मस्तकसे चरणों तक आप्लावित करना चाहिये ।२७। तब आत्मा में लीन हुए तत्त्वों को पुनः अपने स्थान पर प्राप्त करा देवे । परमात्मा के हृदय कमल में आत्मा का आनयन करना चाहिये ।२८। फिर हंसदेव के मन्त्र के द्वारा व्योम आदि का समाचरण करे । मन्त्र के ज्ञाता मन्त्र को ऋषि-छन्द और देवता का न्यास करे ।२६। आत्मा का मस्तक में मुख में और उदय में यथाक्रम मूलमन्त्र से न्यास करे और फिर विधि के साथ प्राणायाम करना चाहिए । विदध्यान्मातृकान्यासं मन्त्रन्यासमनन्तरम् । अंगुष्ठादिष्वंगुलीषु न्यसेदङ्गैः सजातिभिः ।३१ अस्त्रं तत्तलयोर्न्यस्य कुर्यात्तालत्रयादिकम् । दिशस्तेनैव बध्नीयाच्छोटिकाभिः समाहितः ।३२

चतुर्थ पटल ] [ ७६ हृदयादिषु विन्यस्येच्चाङ्गमन्त्रांस्ततः सुधीः हृदयाय नमः पूर्वं शिरशे वह्निवल्लभा ॥३३ शिखायै वषडित्युक्तं कवचाय हुमीरितम् । नेत्रत्रयाय वौषट् स्यादस्त्राय फडिति क्रमात् । ३४ षडङ्गमन्त्रानित्युक्तान्षडङ्गेषु नियोजयेत् । पञ्चाङ्गानि मनोर्यस्य तत्र नेत्रमनुन्यजेत् । ३५ अङ्गहीनस्य मन्त्रस्य त्वेनैवाङ्गानि कल्पयेत् । तत्तत्कल्पोक्तविधिना न्यासानन्यान्समाचरेत् । ३६ फिर मातृका न्यास करके अनन्तर में मन्त्र का न्यास करना चाहिए। सजाति अङ्गों से अंगुष्ठादि अंगुलियों में न्यास करे । ३१। उनके तलों में अस्त्र का न्यास करके तीन तालियां आदि करे। समा- हित होकर उसी के द्वारा दिशाओं का छोटिकाओं से बन्धव करना चाहिए । ३२। इसके उपरान्त सुधी पुरुष हृदय आदि से अङ्ग मन्त्रों का विन्यास करे । न्यास का क्रम यह है पहिले हृदयाय नमः-शिर से स्वाहा-शिखायै वषट् -कवचाय हुम् - नेत्रत्रयाय वौषट् और अस्त्राय फट-इसी क्रम से करे । ३३-३४। फिर छे अङ्गों में युक्त षडङ्ग- मन्त्रों को नियोजित करना चाहिए। जिस मन्त्र के पाँच अङ्ग हैं वहाँ पर नेत्र मन्त्र का यजन करे । ३५। अङ्गहीन मन्त्र के अपने ही के द्वारा अंगों की कल्पना करे। उस-उस कल्प में कही हुई विधि से अन्य न्य-सों का समाचरण करना चाहिए। ३६। कल्पयेदात्मनोदेहे पीठं धर्मादिभिः क्रमात् । अंसोरुयुग्मयोर्विद्वान्प्रादक्षिण्ये न देशिकः । २७ धर्मं ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं न्यस्य त् क्रमात् । मुखापार्श्वनाभिपाष्ठोऽधर्मादींश्च प्रकल्पयेत् । ३८ धर्मादयः स्मृताः पादाः पीठगात्राणि चापरे । अनन्तं हृदये पद्ममस्मिन्सूर्येन्दुपावकान् । ३६

८० ] [ श्रीशारदा तिलक एषु स्वस्वकला न्यस्येन्नामाद्यक्षरपूर्विकाः । सत्त्वादींस्त्रीन् गुणान् न्यस्येत्तथैवात्र गुरुत्तमः । ४० आत्मानमन्तरात्मानं परमात्मानमत्र तु । ज्ञानात्मानं प्र (च) विन्त्यस्य न्यस्येत्पीठमनुन्ततः । ४१ अपने देह में धर्मादिके द्वारा क्रम से पीठ की कल्पना करे । विद्वान् आचार्य प्रदक्षिणा से कन्धे और ऊरुओं के युग्म में क्रम से धर्म-ज्ञान वैराग्य और ऐश्वर्य का न्यास करे । मुखपार्श्व —नाभिपार्श्व में अधर्म आदि की कल्पना करे । ३७-३८। धर्म आदिक पाद कहे गये हैं और दूसरे पीठ गात्र हैं। हृदय में अनन्त पद्म का और इसमें सूर्य-चन्द्र- अग्नि का—इनमें अपनी-अपनी नाम से पूर्व अक्षरों वाली कलाओं का न्यास करे । ३६-४०। आत्माका अन्तरात्मा का और परमात्मा का यहाँ पर ज्ञानात्मा का न्यास करके फिर पीठ मन्त्र का न्यास करना चाहिए ।४१। एवं देहमये पीठे चिन्तयेदिष्टदेवताम् । मुद्राः प्रदर्श्य विधिवदर्घ्यस्थापनमाचरेत् । ४२ शंखमस्त्राम्बुना प्रोक्ष्य वामतोवह्निमण्डले । साधारं स्थापयेद्विद्वान् बिन्दुस्रु (च्यु) तसुधामयैः ।४३ तोयैः सुगन्धिपुष्पाक्तैः पूरयेत्तं यथाविधि । आधा पावकं शंख सूर्य तोयं सुधामयम् । ४४ स्मरेद्वह्न्यर्कचन्द्राणाँ कलास्तास्तेष्वनुक्रमात् । मूलमन्त्रं जपेत्स्पृष्ट्वा न्यसेत्तस्याङ्गमन्त्रवित् । ४५ हृन्मन्त्रेणाभिसम्पूज्य हस्ताभ्यां छादयन्नपः । जपेद्विद्यां यथान्यायं देशिको देवताधिया । ४६ अस्त्रमन्त्रेण संरक्ष्य कवचेनावगुण्ठ्य च । धेनुमुद्रां समासाद्य रोधतेत्तत्त्वमुद्रया ।४७

चतुर्थ पटल ] [ ८१ दक्षिणे प्रोक्षणीपात्रमाधायाद्भिः प्रपूरयेत् । किञ्चिदर्घाम्बु संगृह्य प्रोक्षण्यम्भसि योजयेत् । ४८ अर्घस्योत्तरतः कार्यं पाद्यं साचमनीयकम् । आत्मानं यागवस्तूनि मण्डलं प्रोक्षयेद्गुरूः । ४६ इस रीति से देहगम पीठ में अपने इष्टदेव का चिन्तन करना चाहिये । फिर विधि के साथ मुद्राओं को प्रदर्शित करके अर्घ स्थापना का समाचरण करे ।४०। अस्त्राग्बु से शंख का प्रोक्षण करके वह्नि- मण्डल के वाम भागमें विद्वान् व्यक्ति विन्दुयुत सुधासे परिपूर्णों के द्वारा साधार की स्थापना करे ।४३। उसको सुगन्धित पुष्पादिके द्वारा जल से यथाविधि पूरित करें । आधा-पावक - शंख-सूर्य और सुधामय जल का स्मरण करे ।४४। वहिन-चन्द्र और सूर्य की उन कलाओं का और अनुक्रम से उनमें स्मरण करना चाहिए । स्पर्श करके मूल मन्त्र का जप करे, और मन्त्र का ज्ञाता उसके अंग का न्यास करे ।४५। देवता की बुद्धि से आचार्य हृन्मन्त्र के द्वारा भली भाँति पूजन करके हाथों से जल का छादन करते हुए न्यायानुसार विद्याका जप करे ।४६। अस्त्र मन्त्र के द्वारा संरक्षण करके तथा कवच से अवगुण्ठन करके धेनुमुद्रा का समासादन करके उसका अपनी मुद्रा से रोधन करे ।४७। दक्षिण में प्रोक्षणी पात्र का आधान करके उस को जल से पूरित कर देवे । कुछ अर्ध जल का संग्रह करके प्रोक्षणी के जल में योजित कर देवे ।४८। वर्ष के उत्तर में आचमनीय के सहित पाद्य करना चाहिये। गुरु को चाहिये कि अपने आपको-हवन की दन्तुओं की ओर मण्डल को प्रोक्षित करे ।४६। प्रोक्षणीपात्रतोयेन मन्त्रतनुनान्यदपि क्रमात् । न्यासक्रमेण देहे स्वे धर्मादीन्पूजयेत्तत । ५० पुष्पाद्यैः पीठमन्त्रं तस्मिंश्च परदेवताम् । पञ्चकृत्वाः पुनः कुर्यात्पुष्पाञ्जलिमनन्तधीः । ५१

८२ ] [ श्रीशारदा तिलक उत्तमाङ्गे हृदाधारे पादेसर्वाङ्गके क्रमात् । विना नैवेद्यं गन्धाद्यै रूपचारैः समर्चयेत् । ५२ गुरुपदिष्टविधिना शेषमन्यत्समापयेत् । सर्वमेतत् प्रयुञ्जीत प्रोक्षणीस्थेन वारिणा । ५३ विसृज्य तोयं प्रोक्षण्याः पूरयेत्तां यथा पुरा । ततस्तन्मण्डलं मन्त्री गन्धाद्यैः साधु पूजयेत् । ५४ प्रोक्षणी पात्र के जल से मन्त्र के द्वारा अन्य का भी क्रम से प्रोक्षण करना चाहिये। न्यास के ही क्रम से अपने देह में फिर धर्म आदि का भी अर्चन करना चाहिये ।५०। पुष्पादिक के द्वारा पीठमन्त्र के अन्त तक उसमें पर देवता का पूजन करे। फिर अनन्य बुद्धि वाला होकर पाँच बार पुष्पांजलि करे ।५१। उत्तमाङ्ग में हृदाक्षर में- पाद में और सर्वाङ्ग में क्रम से नैवेद्य के बिना ही गन्ध आदि उपचारों के द्वारा अर्चन करना चाहिये ।५२। गुरुदेव के द्वारा जिस विधि का उपदेश दिया गया है उसीसे अन्य शेष कृत्योंका समापन करे। यह सभी प्रोक्षणी पात्र में संस्थित जल के द्वारा प्रयोग करना चाहिए ।५३। प्रोक्षणी पात्र के जल का विसर्जन करके फिर पूर्व की ही भांति वस्तु को पूरित कर देवे। इसके उपरान्त मन्त्रधारी उस मण्डल का गन्ध आदि से भलीभाँति पूजन करे ।५४। शालिभिः कर्णिकामध्यमापूयोपरि तण्डुलैः । अलंकृत्य पुनस्तेषु दर्भानास्तीर्य तन्त्रवित् । ५५ कूर्चमक्षतसंयुक्तं न्यसेत्तेषामथोपरि । आधारशक्तिमारभ्य पीठमन्त्रमयं यजेत् । ५६ अधः कूर्मशिलारूढां शरच्चन्द्रनिभप्रभाम् । आधारशक्तिं प्रजयेत्पङ्कजद्वयधारिणीम् । ५७ मूर्ध्नि. तस्याः समारूढं कूर्मं नीलाभमर्चयेत् । ऊर्ध्वं ब्रह्मशिलासीनमनन्तं कुन्दसन्निभम् । ५८

चतुर्थ पटल ] [ ८३ यजेच्चक्रधरं मूर्ध्नि धारयन्तं वसुन्धराम् । तमालश्यामलां तत्र नोलेन्दीवरधारिणीम् । ५६ अभ्यर्च्चयेद्वसुमतीं स्फुरत्सागरनेशलाम् । तस्यां रत्नमयं द्वीपं तस्मिंश्च मणिमण्डपम् । ६० यजेत्कल्पतरूंस्तस्मिन्साधकाभीष्टसिद्धिदान् । अधस्तात्पूजयेत्तेषां वेदिकां मण्डपोज्ज्वलाम् । ६१ शाली के द्वारा कणिका के मध्य को आपूरित करके और ऊपर तण्डुलों से अलंकृत करके फिर उनमें दर्भों को फैलाकर तन्त्र का ज्ञाता पुरुष इसके अनन्तर उनके ऊपर कूर्च-अक्षत से संयुत का न्यास करे । आधार शक्ति का आरम्भ करके मन्त्रमय पीठ का यजन करे ।५६। नीचे की ओर कूर्म शिलापर समारूढ़-शरत्काल के चन्द्रमा के समान मुख वाली दो पंकजों के धारण करने वाली आधार शक्ति का यजन करना चाहिये ।५७। उसके मस्तक में समारूढ़ और नील आभा वाले कूर्म का समर्चन करना चाहिये । ऊपर की ओर कुन्दकी आभा वाले- ब्रह्मशिला पर समासीन अनन्त का यजन करे ।५८। वसुन्धरा को मूर्धा में धारण करते हुए चक्रधर का यजन करे । तमाल के समान श्यामला-नील इन्दीवर को धारण करने वाली, जिसके चारों ओर स्फुरित सागरों की मेखला विद्यमान है, ऐसी वसुमती देवी का अभ्यर्चन करना चाहिए । उसमें रत्नों से परिपूर्ण द्वीप है और उस द्वीप में मणि- निर्मित मण्डप है । उस मण्डपमें कल्प तरुओंका अर्चन करे जो साधना करने वाले मनुष्योंके अभीष्टोंके देने वाले हैं । उनके नीचे मण्डपोज्ज्वला वेदि का अर्चन करना चाहिये ।५६-६१। पश्चादभ्यर्चयेत्तस्यां पीठं धर्मादिभिः पुनः । रक्तश्यामहरिद्वेन्द्रनीलाभात्पादरूपिणः । ६२ वृषकंसरभूतंभरूपान् धर्मादिकान्यजेत् । गात्रेषु पूजयेत्तांस्तु नञ्पूर्वानुक्तलक्षणान् । ६३

८४ ] [ श्रीशारदा तिलक आग्नेयादिषु कोणेषु दिक्षु चाथाम्बुजं यजेत् । आनन्दकन्दं प्रथमं संविन्नालमन्तरम् ।६४ सर्वतत्त्वात्मकं पद्ममभ्यर्च्य तदनन्तरम् । मन्त्री प्रकृतिपत्राणि विका मयकेसरान् ।६५ पञ्चाशद्बीजवर्णाढ्यां कर्णिकां पूजयेत्ततः । कलाभिः पूजयेत्सार्द्धं तस्यां सूर्येन्दुपावकान् । ६६ प्रणवस्य त्रिभिर्वर्णैरथ सत्त्वादिकान् गुणान् । आत्मानमन्तरात्मानं परमात्मानमर्चयेत् । ६७ ज्ञानात्मानं च विधित्पीठमन्त्रावसानम् । पीठशक्तिः केसरेषु मध्ये च सवराभयाः । ६८ इसके पीछे धर्मादिक के सहित पीठ का उसमें यजन करे । अब धर्मादिक का स्वरूप बतलाते हैं-रक्त श्याम-हरिद्रा-इन्द्रनील की आभा वाले पादरूपी हैं-वृष केसरीभूतेभ के स्वरूपसे संयुत हैं ऐसे धर्मा- दिक का यजन करना चाहिये । उनका तत्र पूर्व अनुक्त लक्षणों वालों का गात्रों में पूजन करे ।६२-६३। आग्नेय आदि कोणों में दिशाओं में अम्बुज का यजन करे । प्रथम आनन्दकन्द और इसके अनन्तर सम्वित् नालवाले सब तत्वों के स्वरूप वाले पद्म का अभ्यर्चन करके उसके उप- रान्त मन्त्रधारी प्रकृति पत्रों का और विकार से परिपूर्ण केसरों का यजन करे ।६४-६५। इसके उपरान्त पचास बीजों में आढ्य कर्णिका का पूजन करे। उसमें कलाओं के साथ सूर्य चन्द्र और पावक का पूजन करे प्रणव की तीस वर्णों के साथ यजन करना चाहिये । इसके अनन्तर सत्व आदिक गुणोंका-आत्मा का-अन्तरात्माका और पापात्मा का अर्चन करना चाहिये ।६६-६७। तथा ज्ञानात्माका और पीठ मन्त्र के अवसान् पर्यन्त विधिके साथ यजन करे । और केसरोंके मध्यमेंवर दान तथा अभयदान के सहित पीठ की शक्तियों का पूजन करना चाहिये -६८।

चतुर्थे पटय ] [ ८५ हेमादिरचितं कुम्भमस्त्राद्भिः क्षालितान्तरम् । चन्दनागुरुकर्पूरधूमितं शोभनाऽऽकृतिम् । ६६ आवेष्टिताऽङ्गं नीरन्ध्रं तन्तुना त्रिगुणात्मना । अर्चित गन्धपुष्पाद्यैः कूर्चाक्षतसमन्वितम् ।७० नवरत्नोदरं मन्त्री स्थापयेत्तारमुच्चरन् । ऐक्यं सङ्कल्प्य कुम्भस्य पीठस्य च विधानवित् । ७१ क्षीरद्रुमकषायेण पलाशत्वग्भवेन वा । तीर्थोदकैर्वा कर्पूरगन्धपुष्पसुवासितैः । ७२ आत्माऽभेदेन विधिवन्मातृकां प्रतिलोमतः । जपन्मूलमन्त्रं तद्गतपूरयेद्देवताधिया । ७३ शंखेक्वाथाम्बुसंपूर्णे गन्धाष्टकमभीष्टदम् । विलोड़्य पूजयेत्तस्मिन्नाबाह्या सकलाः कलाः । ७४ दश वह्ने कलाः पूर्वं द्वादश द्वादशात्मनः । कलाः षोडश सोमस्य पश्चात्पञ्चाशतं कलाः ।७५ जपित्वा प्रतिलोमेन मूलमन्त्रं च मन्त्रवित् । समाहितेन मनसा ध्यायन्मन्त्रस्य देवताम् । ७६ प्राणप्रतिष्ठा कुर्वीत तत्र तत्र विचक्षणः । कलात्मकं शंखसंस्थं क्वाथं कुम्भे विनिःक्षिपेत् । ७७ हेम आदि विशुद्ध धातुओं के द्वारा निर्माण हुए कुम्भ को जिसका अन्तर भाग अस्त्र के जल के द्वारा क्षात्रिलित कर लिया गया है जो चन्दन, अगरु कर्पूर से धूपित होवें तथा शोभन आकृति से संयुक्त हो, जिसका अङ्ग आवेष्ठित होवे-जो नीरन्ध्र त्रिगुणात्मना तन्तुओं के द्वारा किया गया होवे । उसका गन्ध पुष्पादिके द्वारा अर्चन किया जावे और कूर्च तथा अक्षत से संयुक्त होवे । उस के मध्यमें नौ प्रकार के रत्न होवे । ऐसे घट की स्थापना करनी चाहिये । और मन्त्रधारी प्रणव का उच्चारण करते हुये विधान का ज्ञाता कुम्भ और पीठ को एक समान संकल्प करे ।६६-७१।

८६ ] [ श्रीशारदा तिलक दूध वाले वृक्ष के कषाय से-पलाश वृक्ष से समुत्पन्न से अथवा तीर्थों के जल से जो कपूर-गन्ध और पुष्पों से सुगन्धित होवें । आत्मा के अभेद से प्रतिलोभ से विधि के साथ मातृका का और मूल मन्त्र का जप करते हुए देवता की बुद्धि से पूरित कर देना चाहिए ।७२-७३। क्वाथ के जल से सम्पूर्ण शंख में अभीष्ट के प्रदाता गन्धाष्टक का बिलोड़न करके सकल कलाओं कावाहन करे और पूजन करना चाहिये ।७४। पूर्व में वह्िनकी दशों कलाएं और बारह-बारह आत्मा की-सोम की सोलह कयाएं पीछे पचास कलाओं का पूजन व रे ।७५। मत्र के ज्ञान रखने वाला मूल मंत्र का प्रतिलोग के व्दारा जप करे और परम सावधान मन वाले को मंत्र के देवता का ध्यान करते हुये वहाँ-वहाँ पर विचरण पुरुष को प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिये । और कलाओं के स्वरूप वाले शंख में स्थित क्वाथ का कुम्भ में विनिःक्षेपण कर देना चाहिये ।७६-७७। गन्धाष्टकं तत्त्रिविधं शक्तिविष्णुशिवात्मकम्। चन्दनागुरुकर्पूरचोरकुङ्कुमरोचना । ७८ जटामांसी कपियुता शक्तेर्गन्धाष्टकं विदुः । चन्दनागुरुह्रीवेरकुष्ठकुङ्कुमसेव्यकाः । ७९ जटामांसीमुरमिति विष्णोर्गन्धाष्टकं विदुः । चन्दनागुरुकर्पूर तमालजलकुङ्कुमम् । ८० कुशीत कुष्ठ संयुक्तं शैवं गन्धाष्टकं विदुः । पाशादित्र्यक्षरात्मान्ते स्यादमुष्य पदन्ततः । ८१ क्रमात्प्राणा इह प्राणस्तथा सीव इह स्थितः । अमुष्य सर्वेन्द्रियाणि भूयोऽमुष्य पदं वदेत् । ८२ वाङ्मनस्त्वक्छ्रोत्रघ्राणप्राणपदान्वय । पश्चादिहागत्य सुखं चिरन्तिष्ठन्तु ठद्वयम् । ८३ अयं प्राणममन्त्रः प्रोक्तः सर्वजीवप्रदायकः पश्चाद्वश्वत्थपनसचूतकोमलपल्लवैः । ८४

चतुर्थे पटल ] [ ८७ इन्द्रवल्लीसमाबद्धं सुरद्रुमधिया गुरुः । कुम्भवक्त्रं पिधायास्मिंश्चषकं सफलाक्षतम् ।८५ संस्थापयेत्फलधिया विधिवत्कल्पशाखिनम् । ततः कुम्भं निर्मलेन क्षौमयुग्मेन वेष्टयेत् ।८६ वहाँ पर गन्धाष्टक तीन प्रकार का होता है जो शक्ति-विष्णु और शिवके स्वरूप वालाहोता है । चन्दन-अगर-कर्पूर-चोरकुंकुम-रोचना- कपि से युक्त जटामांसी-यह शक्ति का गन्धाष्टक जानना चाहिए । चन्दन-अगरु-ह्रीवेर-कुंकुम-सेव्यक-जटामांसी मुरकुष्ठ-यह विष्णु भगवान् का अष्टगन्ध होता है । चन्दन-अगरु-कर्पूर-तमाल जल-कुंकुम -कुशील और कूट-यह शिव का गन्धाष्टक होता है । पाश आदि तीन अक्षरों के स्वरूप वाले के अन्त में फिर अमुष्यः-यह पद होना चाहिए । क्रमात् प्राणा इह प्राणास्तथा जीव इह स्थितः- अमुष्य सर्वान्द्रियाणि-यह कह कर पुनः 'अमुष्य'-इस पद को कहे ।७८-७९-८०-८१-८२। वाङ्-मनों नयन-श्रोत्र-घ्राण-इन पदों को कह कर पीछे 'इहगत्य सुखं चिरन्तिष्ठन्तु'-यह कह कर दो ठकार कहे ।८३। यह प्राण प्रतिष्ठा करने का मंत्र कहा गया है जो सब जीव का प्रदान करने वाला है इसके पश्चात् पीपल-पनस- आम्र के कोमल पल्लवों से जो बन्ध्वल्ली से समाबद्ध होवें गुरु देववृक्ष की बुद्धि से घट के मुख को ढक कर पके फल और अक्षतों के सहित विधि के साथ फल की बुद्धि से कल्प शाखा को संस्थापित करना चाहिए । इसके बाद निर्मल दो क्षौम वस्त्रों से कुम्भ का वेष्ठन कर देवे ।८४-८६। मूलेन मूर्त्तिमिष्ट्वाऽस्मिञ्छायायां कल्पशाखिनाम् । आवाह्य पूजयेत्तस्यां मन्त्री मन्त्रस्य देवताम् ।८७ मूलमन्त्रं समुच्चार्य सुषुम्णावर्त्मना सुधीः । आनीय तेजःस्वस्थानान्नासिका रन्ध्रनिर्गतम् ।८८

८८ ] [ श्रीशारदा तिलक करस्थमातृकाम्भोजे चैतन्यं पुष्पसञ्चये । संयोज्य ब्रह्मरन्ध्रेण मूर्त्यांमावाहयेत्सुधीः । ८६ संस्थापनं सन्निधानं सन्निरोधमनन्तरम् । सकलीकरणं पश्चाद्विदध्यादवगुण्ठनम् । ९० अमृतीकरणं कृत्वा कुर्वीत परमोकृतिम् । क्रमादेतानि कुर्वीत स्वमुद्राभिः समाहितः । ९१ इनमें मूल मन्त्र से मूर्ति का यजन करके कल्प वृक्षों की छाया में मन्त्र धारी व्यक्ति उसमें मन्त्र के देवता का आवाहन करके अभ्यर्चन करना चाहिए ।८९। मूल मन्त्र का भली भाँति उच्चारण करके सुधी पुरुष सुषुम्ना के मार्ग से नासिका के रन्ध्र से निर्गत अपने स्थान से तेज का आनयन करके कर में संस्थित मातृका पद्म में पुरुष के संचय चैतन्य को ब्रह्मरन्ध्र से संयोजित करके सुधी मूर्ति में आवाहन करे ।८८-८६। संस्थापन—सन्निधान—फिर सन्निरोधन—सकलीकरण और इसके पश्चात् अवगुण्ठन करना चाहिये ।६०। अमृतीकरण करके परमो कृति करे । अपनी मुद्राओं के द्वारा समाहित होकर क्रम से इनको करना चाहिये ।६१। अथोपचारान्कुर्वीत मन्त्रवित्स्वागतादिकान् । स्वागतं कुशलप्रश्नं निगदेदग्रतो गुरुः । ६२ पाद्य पादास्बुजे दद्याद्देवस्य हृदयाणुना । एतच्छ्यामाकदूर्वाब्जविष्णुक्रान्ताभिरीरितम् । ६३ सुधामन्त्रेण वदने दद्यादाचमनीयकम् । जातीलवङ्गकङ्कोलैस्तदुक्त तन्त्रवेदिभिः । ६४ अर्घ्यं दिशेत्ततो मूर्ध्नि शिरोमन्त्रेण देशिकः । गन्धपुष्पाक्षतयवकुशाग्रतिलमर्षपैः । ६५ सद्दूर्वैः सर्वदेवानामेतदर्घ्य मुदीरितम् । सुधाणुना ततः कुर्यान्मधुपर्क सुखाम्बुजे । ६६

चतुर्थ पटल ] [ ८१ आज्यन्दधिमधून्मिश्रमेतदुक्तं मनीषिभिः । तेनैव मनुना कुर्यादिभिराचमनीयकम् ।६७ गन्धाद्भि कारयेत्स्नानं वाससी परिधापयेत् । दद्याद्यज्ञोपवीतं च हाराद्याभरणैः सह ।६८ इसके अनन्तर मन्त्र का ज्ञाता पुरुष स्वागत आदि उपचारों का समाचरण करे । गुरु आगे स्वागत और कुशल प्रश्नका कथन करो।६२। हृदयाणु के द्वारा देव के चरण कमल में पाद्य देवे । यह श्यामाक दूर्वा- कमल और विष्णु कान्ता से कहा है ।६३। सुधामन्त्र के द्वारा मुख में आचमनीय अर्पितकरे । वह आमचनीयजाती फल लौंग और ककोलसे युक्त तन्त्र के वेत्ताओं के द्वारा कही गयी है ।६४। इसके उपरान्त देशिक (आचार्य) शिरोमन्त्र के द्वारा मूर्धा में अर्घ्य देवे। गन्ध-पुष्प- अक्षत-यव कुशाग्र-तिल-सर्षप-दूर्वा से सभी देवों का अर्घ्य कहा गया है । सुधामन्त्र के द्वारा मुख कमल में मधुपर्क समर्पित करना चाहिये ।६५। ।६६। उस मधुपर्क को मनीषियों ने यही बतलाया है कि वह आज्य- दधि और मधु संमिश्रित होता है । उसी मन्त्र के द्वारा जल से आच- मन करे ।६७। गन्ध आदि से मिश्रित जल से स्नान करावे और फिर वस्त्रोंका परिधापन करना चाहिये । हार अदि आभरणोंके सहित यज्ञो- पवीत का समर्पण करे ।६८। न्यासक्रमेण मनुना पुटितैर्मातृकाक्षरैः । अभ्यर्च्य देवीं गन्धाद्यैरङ्गादीन्पूजयेत्ततः ।६६ गन्धश्चन्दनकर्पूरकालागुरुभिरीरितः । कमलेकरवीरे द्वे कुमुदे तुलसीद्वयम् । १०० जातीद्वयं केतके द्वे कह्लारं चम्पकोत्पले । कुन्दमन्दारपुन्नागपाटलानागचम्पकम् ।१०१ आरग्वधं कर्णिकारं पारन्ती नवमल्लिका । सौगन्धिकं सकोरण्टं पलाशशोकमल्लिकाः । १०२