शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
42 | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे
42 | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे
पहली या बाहर की त्वचा का नाम 'अवभासिनी' (कृष्ण, गौर, पीत और रक्त वर्ण को अवभासित करने वाली) है, सिध्म या सेहुँआ इसी में होता है। दूसरी का नाम 'लोहिता' यहाँ तक रक्त-कोशिकाएँ आयी रहती हैं) यह तिल और झांई का स्थान है। तीसरी का नाम 'श्वेता' (सफेद होने के कारण) है, यह चर्मदल या चम्मल का स्थान है। चौथी 'ताम्रा' (अत्यन्त लाल) है, यह किलास (लाल वर्ण का श्वेतकुष्ठ) एवं श्वेतकुष्ठ या फुलबहरी का स्थान है। पाँचवीं 'वेदनी' (स्पर्शज्ञान का विशिष्ट स्थान) है, यहाँ पर सब प्रकार के कुष्ठ होते हैं। छठी 'रोहिणी' (प्ररोहों या अंकुरों वाली होने के कारण) कही जाती है, यह ग्रन्थियों (बिना मुख के फोड़े), गलगण्ड (घेंघा) और अपची (गण्डमाला) का स्थान है और सातवीं 'स्थूला' (मोटी) नामक त्वचा है, जो विद्रधि आदि का स्थान है। इस प्रकार ये सात त्वचाएँ कही गयी हैं। ये सब दो मांसल स्थानों पर जौ के बराबर मोटी होती हैं। वक्तव्य-त्वचा शब्द 'त्वच् संवरणे' धातु से बना है, जिसका अर्थ है-शरीर का संवरण करना या उसे ढँकना। विशेष जानने के लिए देखें-सु० शा० अ० 4.4 और च० शा० अ० 7.4। 'षट् त्वचः'-च० चि० 15.17। दोषों का वर्णन वायुः पित्तं कफो दोषा धातवश्च मलास्तथा ।। 41 ।। तत्रापि पञ्चधा ख्याताः प्रत्येकं देहधारणात् । वायु, पित्त और कफ ये दोष, धातु और मल माने जाते हैं। शरीर के भिन्न-भिन्न अवयवों में रहकर शरीर को धारण करने के कारण ये एक-एक तथा पाँच-पाँच प्रकार के कहे जाते हैं। दोष आदि संज्ञाओं का हेतु (शरीरदूषणाद् दोषा धातवो देहधारणात् ।। 42 ।। वातपित्तकफा ज्ञेया मलिनीकरणान्मलाः ।) ये वात, पित्त तथा कफ शरीर को दूषित (दुःखित) करने के कारण 'दोष' कहे जाते हैं, शरीर को धारण (स्वस्था- वस्था में सुखी) करने के कारण 'धातु' और शरीर को मलिन या मैला (रुग्ण) करने के कारण 'मल' कहे जाते हैं। दोषों में वायु की प्रधानता पित्तं पङ्गुः कफः पङ्गुः पङ्गवो मलधातवः ।। 43 ।। वायुना यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेघवत् । पित्त पंगु (परतन्त्र) है, कफ पंगु है, मल और धातु भी पंगु हैं। इनको वायु जहाँ ले जाती है, वहीं ये मेघ (बादल) के समान चले जाते हैं। वक्तव्य-इस पाठ से वायु की वह महत्ता बतलायी है, जिसका विस्तृत वर्णन चरकसंहिता सू० अ० 12 तथा सु० नि० अ० 1 में किया गया है। वात के गुण, स्थान तथा नाम पवनस्तेषु बलवान् विभागकरणान्मतः ।। 44 ।। रजोगुणमयः सूक्ष्मः शीतो रूक्षो लघुश्चलः । मलाशये चरेत् कोष्ठे वह्निस्थाने तथा हृदि ।। 45 ।। कण्ठे सर्वाङ्गदेशेषु वायुः पञ्च प्रकारतः । अपानः स्यात् समानश्च प्राणोदानौ तथैव च ।। 46 ।। व्यानश्चेति समीरस्य नामान्युक्तान्यनुक्रमात् । तीनों दोषों में वायु ही बलवान् है, क्योंकि वह शरीर के प्रत्येक अवयवों का विभाग करता है। वह रजोगुणयुक्त है, सूक्ष्म है, शीत है, रूक्ष है, लघु (हल्का) है और चल (गीतशील) है। वह मलाशय में, अग्न्याशय में, हृदय में, कण्ठ (सामीप्यात् फुफ्फुस तक में) तथा समस्त शरीर में विचरता रहता है। अतएव इसके पाँच भेद माने जाते हैं और इन स्थानों में विचरने वाले वायु के क्रमशः पाँच नाम ये हैं-1. अपान, 2. समान, 3. प्राण, 4. उदान और 5. व्यान। वक्तव्य-यद्यपि वायु एक ही है, तथापि स्थान और कर्म के भेद से पाँच प्रकार का कहा गया है। तदनुसार ही इसके पाँच नाम भी रखे गये हैं-वायु शब्द 'वा गतिगन्धनयोः' धातु से बना है, जिसका अर्थ है-'वाति गच्छति इति वायुः' अर्थात् यह सर्वदा चलता रहता है, इसी प्रकार इसके पाँच नाम अत्यन्त विचारपूर्वक रखे गये हैं। यथा-'अप अधस्तात् अनिति प्राणिति गच्छति (अन् प्राणे-अ० प० से०) इति अपानः' अर्थात् जो नीचे की ओर चलता है। यही मल-मूत्रादि का त्याग कराता है और अधोवायु के रूप में निकलता है। समान-'सम्यक् अनिति इति समानः' जो पाचन क्रिया का सम्पादन करता है। प्राण-'प्रकर्षेण अनिति इति प्राणः' अर्थात् जो हृदय का सञ्चालन करता है। उदानः-'उद् ऊर्ध्वम् अनिति इति उदानः' अर्थात् जो ऊपर को प्रश्वास के रूप में आता-जाता है और व्यानः-'विशेषेण आसमन्तात् सर्वतः अनिति इति व्यानः', अर्थात् जो विशेष रूप से सम्पूर्ण शरीर में गति करता है, वह व्यान कहा जाता है। इस प्रकार वायु ही जीवन का प्रधान कारण माना जाता है।
पित्त के गुण, स्थान तथा नाम
पञ्चमोऽध्यायः ] कलादिकाख्यानम् 43
पित्त के गुण, स्थान तथा नाम
पित्तमुष्णं द्रवं पीतं नीलं सत्त्वगुणोत्तरम् ।। 47 ।। कटुतिक्तरसं ज्ञेयं विदग्धं चाम्लतां व्रजेत् । अग्न्याशये भवेत् पित्तमग्निरूपं तिलोन्मितम् ।। 48 ।। त्वचि कान्तिकरं ज्ञेयं लेपाभ्यङ्गादिपाचकम् । दृश्यं यकृति यत् पित्तं तद्रसं शोणितं नयेत् ।। 49 ।। यत् पित्तं नेत्रयुगले रूपदर्शनकारि तत् । यत् पित्तं हृदये तिष्ठेन्मेधाप्रज्ञाकरं च तत् ।। 50 ।। पाचकं भ्राजकं चैव रञ्जकालोचके तथा। साधकं चेति पञ्चैव पित्तनामान्यनुक्रमात् ।। 51 ।।
पित्त उष्ण (गर्म) है, द्रव (पतला या तरल) है, पीला है, नीला है, सत्त्वगुण-प्रधान है, चरपरा और कड़वा है। जब वह विकृत हो जाता है तो खट्टा हो जाता है। अग्न्याशय में जो पित्त है, वह अग्निरूप है और तिलपरिमित है। त्वचा में जो पित्त है, वह शरीर की कान्ति (चमक) का उत्पादक तथा लेप और अभ्यंग (मालिश का स्नेह) का पाचक या शोषक है, यकृत में जो पित्त है, वह वमन (खट्टी और कड़वी कै के रूप) में दिखलायी पड़ता है एवं रस को रक्त बनाता है। जो पित्त दोनों आँखों में है, वह रूप का दर्शन कराता है और जो पित्त हृदय में रहता है, वह मेधा (बुद्धि) तथा प्रज्ञा (सोचने-विचारने को शक्ति) का हेतु है। इसी प्रकार स्थानों के अनुक्रम से पित्त के ये पाँच नाम हैं। यथा-1. पाचक, 2. भ्राजक, 3. रञ्जक, 4. आलोचक और 5. साधक।
वक्तव्य—ताप या सन्तापजनक पदार्थ का नाम पित्त है। देखें अमरकोष-अपि+दो+क्त, वायु के समान एक ही पित्त के कार्यभेद तथा स्थानभेद से पाँच नाम रखे गये हैं जो कि सार्थक हैं। यथा-‘पचति आहारम् इति पाचकम् ’=आहार को पकाता है। ‘भ्राजयति प्रकाशयति वर्णम् इति भ्राजकम्’ = वर्ण को प्रकाशित करता है। ‘रञ्जयति रक्तीकरोति रसम् इति रञ्जकम्’ = रस को रक्त बनाता है। ‘आलोचयति दर्शयति रूपम् इति आलोचकम्’ = रूप को दिखाता है और ‘साधयति कार्याणि इति साधकम्’ = कार्यों को सिद्ध करता है।
कफ के गुण, स्थान तथा नाम
कफः स्निग्धो गुरुः श्वेतः पिच्छिलः शीतलस्तथा। तमोगुणाधिकः स्वादुविदग्धो लवणो भवेत् ।। 52 ।। कफश्चामाशये मूर्ध्नि कण्ठे हृदि च सन्धिषु । तिष्ठन् करोति देहस्य स्थैर्यं सर्वाङ्गपाटवम् ।। 53 ।। क्लेदनः स्नेहनश्चैव रसनश्चावलम्बनः। श्लेष्मकश्चेति नामानि कफस्योक्तान्यनुक्रमात् ।। 54 ।।
कफ या श्लेष्मा स्निग्ध है, गुरु है, श्वेत है, पिच्छिल (चिपचिपा) है, शीतल है, तमोगुणयुक्त है और मीठा है। वह जब विदग्ध या दूषित हो जाता है, तो नमकीन हो जाता है (खखार या बलगम में यही निकलता है)। कफ आमाशय में शिर के भीतर, कण्ठ (और फुस्फुसों) में, हृदय में तथा शरीर की सम्पूर्ण सन्धियों में रहता हुआ शरीर में स्थिरता या सामर्थ्य (जिसके कारण शरीर के सभी अवयव यथास्थान स्थित रहते हैं) और सम्पूर्ण अंगों की पटुता (क्रियाशील या गति) को करता है। वायु और पित्त के समान कफ के भी उक्त स्थानों में क्रम से ये पाँच नाम हैं—1. क्लेदन, 2. स्नेहन, 3. रसन, 4. अवलम्बन और 5. श्लेष्मक।
वक्तव्य—वात और पित्त के समान कफ के भी स्थानभेद से पाँच नाम हैं और वे भी सार्थक हैं। यथा-‘क्लेदयति क्लिद्यते वा अनेन अन्नम् इति क्लेदनः’ = आहार को क्लिन्न या आर्द्र या गीला करता है। ‘स्नेहयति स्निह्यते अनेन वा शिरः, इति स्नेहनः’ = यह शिर या मस्तिष्क को स्निग्ध या तर करता है। ‘रसयति रसं ज्ञापयति अथवा रस्यते रसो मधुरादिः अनेन इति रसनः’ = रस का अनुभव कराता है; इसकी विकृति से ही रसज्ञान का लोप हो जाता है। ‘अवलम्बयति धारयति हृदयम् अथवा अवलम्ब्यते धार्यते वा हृदयम् अनेन इति अवलम्बनः’ = यह हृदय-यन्त्र को धारण करता है; इसके घट जाने से हृदय धड़कने लगता है और ‘श्लेषयति योजयति सन्धीन् इति श्लेष्मकः’ = सन्धियों को सटाता या जोड़ता है। तीनों दोषों का पूर्व विवेचन सु० सू० अ० 21 में देखें।
(स्नायवो बन्धनं प्रोक्ता देहे मांसास्थिमेदसाम्। सन्धीनामपि यत्तास्तु शिराभ्यः सुदृढ़ाः स्मृताः ।। 55 ।।)
‘स्नायु’ शरीर में मांसपेशियों, हड्डियों, मेदस तथा सन्धियों के बन्धन (अर्थात् उन्हें बाँधने वाले) कहे जाते हैं और वे शिराओं की अपेक्षा अधिक दृढ़ होते हैं।
वक्तव्य—‘स्नायु’ डोरी या बटे हुये धागे जैसी अत्यन्त दृढ़ होती हैं, इनसे धनुष की डोरी और शिकार के जाल बनाये जाते हैं।
सन्धि-परिचय
सन्ध्यश्चाङ्गसन्धानाद् देहे प्रोक्ताः कफान्विताः। (अस्थ्नां ते द्विविधाः सन्ति चेष्टावन्तः स्थिरास्तथा ।। 56 ।।
शरीर में जिस स्थान पर अंगों का सन्धान या जोड़ होता
शाखाहनुषु कट्यां च चेष्टावन्तो भवन्ति हि। शेषास्तु सन्धयः सर्वे स्थिरास्तज्ज्ञैरुदाहृताः।। 57।।) शरीर में जिस स्थान पर अंगों का सन्धान या जोड़ होता है, उस स्थान को 'सन्धि' कहते हैं। ये स्थान 'श्लेष्मक' नामक कफ से युक्त होते हैं। प्रायः हड्डियों के जोड़ों को ही सन्धि कहते हैं और वे दो प्रकार की होती हैं-1. चेष्टावान् अर्थात् चल और 2. स्थित अर्थात् अचल। शाखाओं (टांगों और बाहों) में, हनु तथा कमर में 'चेष्टावान्' सन्धियाँ होती हैं और शेष सभी सन्धियाँ 'स्थिर' मानी जाती हैं। वक्तव्य-ये सन्धियाँ केवल हड्डियों की ही हैं। मांसपेशी, स्नायु एवं सिराओं की सन्धियों की संख्या अनन्त होने के कारण वे असंख्येय हैं। अस्थि-परिचय आधारश्च तथा सारः कायेऽस्थीनि बुधा जगुः। (आभ्यन्तरगतः सार आधारो भूरुहां यथा।।58।।) आयुर्वेद के ज्ञाता विद्वान् अस्थियों या हड्डियों को शरीर का वैसा आधार एवं सार (शरीर भर में सबसे ठोस) कहते हैं। जैसे वृक्षों का भीतरी सार उनका आधार होता है। वक्तव्य-अस्थियों की संख्या के सम्बन्ध में शास्त्रकारों का मतभेद है। यथा-वेद, धर्मशास्त्र एवं चरक आदि कायचिकित्सा की संहिताएँ 360, सुश्रुत या शल्यतन्त्र 300, यूनानी चिकित्साशास्त्र 242 तथा आधुनिक प्रत्यक्षाभिमानी 200 (प्रत्यक्षशारीर अ० 3) एवं (हमारे शरीर की रचना वाले) 206 मानते हैं। इसका कारण अपना-अपना दृष्टिकोण ही है। मर्म-परिचय (सन्निपातान् सिरास्नायुसन्धिमांसास्थिसम्भवान्।) मर्माणि जीवाधाराणि प्रायेण मुनयो जगुः।। 59।। सिरा, स्नायु, सन्धि, मांस एवं अस्थियों में होने वाले 'सन्निपातों' या संयोगों को कर्म कहते हैं। माननीय मुनियों का कथन है कि वे जीव के विशिष्ट स्थान हैं। वक्तव्य-विशेष जानने के लिए देखें-सु०शा०अ० 6। सिरा-परिचय सन्धिबन्धनकारिण्यो दोषधातुवहाः सिराः। (नाभ्यां सर्वा निबद्धास्ताः प्रतन्वन्ति समन्ततः ।। 60।।) ये 'सिरा' सन्धियों को बाँधने का कार्य भी करती हैं और दोष तथा धातुओं का वहन या प्रापण (शरीर में पहुँचाना रूपी कार्य) भी करती हैं। वे सब नाभि में उत्पन्न होकर समस्त शरीर में फैली हुई रहती हैं। वक्तव्य-यह 'नाभि' ढूँड़ी या धुत्री नामक उदर के बहिर्भाग का दृश्यमान गढ्ढा नहीं है, अपितु आमाशय एवं पक्वाशय का मध्यभाग अन्न या अँतड़ी नामक अवयव है, जिसमें भुक्त अन्न का पाक (पाक होकर उससे 'रस' पृथक्) हो जाता है। इस 'रस' को उक्त सिराएँ शरीर में पहुँचाती रहती हैं। इस 'रस' में दोष (वातादि) तथा धातुओं (रक्तादि) के उपादान विद्यमान रहते हैं। जिनसे उनकी पुष्टि होती रहती है। अवशिष्ट सारहीन या रसहीन मलद्रव्य पक्वाशय अर्थात् मलाशय में चला जाता है। इसका वर्णन पूर्वखंड अध्याय 6 में देखें। 'आमपक्वाशयोर्मध्यं नाभिनिर्म मर्म' (सु० शा० अ० 6)। धमनी-परिचय धमन्यो रसवाहिन्यो धमन्ति पवनं तनौ। (तदधीनाः क्रियाः सर्वा देहेन्द्रियमनोभवाः ।।61।।) धमनियों के ध्मान के कारण ही रस का 'वहन' होता है, अर्थात् स्थानान्तर में पहुँचता है। वे ही पवन अर्थात् (प्राण, अपान, समान, उदान एवं व्यान नामक) पञ्चविध वायु को शरीर में सञ्चालित करती हैं। अतएव शारीरिक, ऐन्द्रियक एवं मानसिक सभी क्रियाएँ उन्हीं के अधीन हैं। वक्तव्य-'धमनी' नामक पदार्थ प्रत्यक्षगोचर नहीं है। वह 'शव' में नहीं देखी जा सकतीं। अतएव महर्षि सुश्रुत ने (सु० शा० अ० 9 में) 'पञ्चत्वमायान्ति विनाशकाले' कहा है। महर्षि सुश्रुत एवं आचार्य शार्ङ्गधर धमनियों के उत्पत्ति- स्थान नाभि की संख्या 24 एवं उनके कार्य के विषय में एकमत हैं और चरक उनकी संख्या 10 बतलाते हैं तथा उत्पत्ति-स्थान 'हृदय' मानते हैं। इसका कारण भी मात्र दृष्टिकोण का भेद ही है। प्राण के सञ्चार का आदि स्थान 'नाभि' है, अतः महर्षि सुश्रुत तथा तदनुयायी आचार्य शार्ङ्गधर ने 'नाभि' को धमनियों का मूल माना है और महर्षि चरक ने धमनियों के ध्यान को ध्यान में रखकर 'हृदय' को मूल मान लिया है, जो अत्यन्त उपयुक्त एवं युक्तिसंगत है; और आधुनिक प्रत्यक्षवादी 'हृदय' से निकलने वाली रक्तवाहिनी को तथा उसकी शाखा-प्रशाखाओं को 'धमनी' कहते हैं। उनकी इस धारणा का क्या कारण है, इसके लिए देखें-सु० शा० अ० 9, च० सू० अ० 12 तथा 30 और प्रत्यक्षशारीर एवं 'हमारे शरीर की रचना' और सम्पूर्ण आयुर्वेदीय वाङ्मय।
पञ्चमोऽध्यायः] कलादिकाख्यानम् 45 पेशी-परिचय मांसपेश्यो बलाय स्युरवष्टम्भाय देहिनाम्। (पिशितमनुप्रविश्य पेशीर्विभजतेऽनिलः ।। 62 ।।) माँसपेशियाँ शरीर-धारियों के बल (शक्ति) एवं अवष्टम्भ (स्थिति या सहारा) के लिए आवश्यक हैं। मांस में ही प्रविष्ट होकर वायु पेशियों का विभाजन करता है। वक्तव्य-मांसधातु ही मांसपेशियों के रूप में शरीर को आच्छादित किये रहता है। कण्डरा-परिचय प्रसारणाऽऽकुञ्चनयोरङ्गानां कण्डरा मताः। (ग्रीवायां पृष्ठदेशे च करयोः पादयोः स्थिताः ।। 63 ।।) बाहु आदि अंगों के फैलाने तथा सिकोड़ने में 'कण्डराएँ' कारण मानी जाती हैं और वे ग्रीवा, पीठ, बाहु एवं टाँगों में स्थित हैं। रन्ध्र-परिचय नासानयनकर्णानां द्वे द्वे रन्ध्रे प्रकीर्तिते। मेहनापानवक्त्राणामेकैकं रन्ध्रमुच्यते ।। 64 ।। दशमं मस्तके प्रोक्तं रन्ध्राणीति नृणां विदुः। स्त्रीणां त्रीण्यधिकानि स्युः स्तनयोर्गर्भवर्त्मनः ।। 65 ।। सूक्ष्मच्छिद्राणि चान्यानि मतानि त्वचि जन्मिनाम्। नासिका, नयन एवं कान के दो-दो रन्ध्र होते हैं; मेहन (मूत्रमार्ग), अपान (गुद) तथा मुख के एक-एक रन्ध्र होते हैं और दसवाँ रन्ध्र शिर में होता है। ये दस रन्ध्र होते हैं। स्त्रियों के शरीर में तीन रन्ध्र अधिक हैं-2 स्तनों में और 1 गर्भ मार्ग में। वक्तव्य-'नव स्रोतांसि'-सु० शा० अ० 5 तथा 'नव महान्ति छिद्राणि, सप्त शिरसि द्वे चाधः' ।-च० शा० अ० 7। इस प्रकार सुश्रुत एवं चरक में 9 ही छिद्र माने गये हैं तथा गर्भमार्ग और स्तनमार्ग पुरुषों के अव्यक्त एवं स्त्रियों के व्यक्त होते हैं। गर्भमार्ग का नाम 'भग' और वह दोनों को होता है, अतएव पुरुष को भगवान् और स्त्री को भगवती कहते हैं। यह वह अवयव है, जिसकी उत्तेजना से पुरुष स्त्री का तथा स्त्री पुरुष का भजन या सेवन करती है। 'भज सेवायाम्' धातु से भग शब्द का निर्माण होता है। मल तथा स्रोतस्-परिचय (मनः प्राणात्रपानीयदोषधातूपधातवः ।। 66 ।। धातूनां च मला मूत्रं मलमित्र्यादयस्तनी। सञ्चरन्ति च यैर्मार्गैस्तानि स्रोतांसि सञ्जुगुः ।। 67 ।। यथार्थमूष्मणा युक्तो वायुः स्रोतांसि दारयेत्।) शरीर के भीतर मन, प्राण, अन्न, जल, दोष, धातु, उपधातु, धातुओं के मल और मूत्र आदि जिन मार्गों में से होकर सञ्चार करते हैं उनको 'स्रोतस्' कहते हैं। यथायोग्य ऊष्मा से युक्त होकर वायु स्रोतों को बना देता है। वक्तव्य-देखें-च० वि० अ० 5। धन्वन्तरि ने सु० शा० अ० 5 में बहिर्मुख स्रोतस् 9 तथा योगवाही स्रोतस् 10 कहा है। देखें-सु० शा० 9 में। जाल-परिचय (जालानि तु सिरास्नायुमांसास्थानामुद्भवन्ति हि ।। 68 ।। तानि चत्वारि चत्वारि सर्वाण्येव च षोडश । परस्परं निबद्धानि मणिबन्धादिगुल्फयोः ।। 69 ।। गवाक्षितानि जालानि शरीरस्थानि तत्त्वतः।) सिरा, स्नायु, मांस एवं अस्थियों के चार-चार जाल होते हैं और वे सब मिलकर सोलह हैं। ये परस्पर बँधे हुये परस्पर सटे हुये, परस्पर छिद्रयुक्त और शरीर के केवल गुल्फ तथा मणिबन्ध नामक प्रदेशों में आश्रित होते हैं। कूर्च्च-परिचय (कूर्चाः स्युर्हस्तयोर्द्वौ तु तावन्तौ पादयोरपि ।। 70 ।। ग्रीवायामेक एकस्तु मेढ़े सर्वेऽपि षट् स्मृताः।) हाथों में दो, पाँवों में दो, ग्रीवा में एक तथा मेहन में एक-इस प्रकार छः 'कूर्च' होते हैं। रज्जु-परिचय (पार्श्वतः पृष्ठवंशस्य महत्यो मांसरज्जवः ।। 71 ।। चतस्रो मांसपेशीनां बन्धनं तत्प्रयोजनम्।) पृष्ठवंश (रीढ़ या मेरुदण्ड) के दोनों ओर मोटी-मोटी चार रज्जुएँ होती हैं। उनका कार्य मांसपेशियों को बाँधे रखना है। सेवनी-परिचय (सेवन्यः सप्त तासां तु भवेयुः पञ्च मस्तके ।। 72 ।। एका शेफसि जिह्वायामेका विध्येन्न ताः क्वचित्।) सेवनियाँ सात होती हैं। उनमें पाँच मस्तक में, एक शेफस् (मेहन या लिंग) में तथा एक जीभ में होती है। इनका कभी भी वेध न करे। सङ्घात-परिचय (चतुर्दशास्थां सङ्घाता गुल्फे जानुनि वङ्क्षणे ।। 73 ।। द्वितीये सविक्षा बाह्रोश्चाप्येकैकं शिरसि त्रिके।)
46 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
46 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे अस्थियों के संघात चौदह हैं। एक गुल्फ (एड़ी के ऊपर की गाँठ, टखना का घुट्टी) में, एक जानु में और एक वंक्षण (पेड़ू और जाँघ के बीच का भाग, ऊरुसंधि) में, इसी प्रकार दूसरी सक्थि (टाँग) में तथा दोनों बाहुओं में और एक-एक शिर तथा त्रिकास्थि में होते हैं। सीमन्त-परिचय (सङ्घाताः सीविता यैस्तु सीमन्तास्ते प्रकीर्तिताः ।। 74 ।। चतुर्दशैव सीमन्ताः कथिता मुनिपुङ्गवैः।) सीमन्त भी चौदह होते हैं और उनकी गणना अस्थि-संघात के ही समान होती है, क्योंकि जिनके संघात सीवित (सिये गये) हैं, वे सीमन्त कहे जाते हैं। जिह्वा-परिचय (उदरे पच्यमानानामाध्मानाद् रुक्मसारवत् ।। 75 ।। कफशोणितमांसानां सारो जिह्वा प्रजायते।) जिस प्रकार सुवर्ण को तपाने से स्वर्ण का सार भाग ही बच जाता है, इसी प्रकार शरीर की उष्णता से उदर में पकते हुये कफ, रक्त एवं मांस का सारभूत पदार्थ 'जीभ' बनती है। हृदय-परिचय (उरसि स्तनयोर्मध्ये रक्तश्लेष्मप्रसादजम् ।। 76 ।। मुकुलं पुण्डरीकेण सदृशं स्यादधोमुखम्।) हृदयं चेतनास्थानमोजसश्चाश्रयो मतम् ।। 77 ।। (जाग्रतस्तद् विकसति स्वपतश्च निमीलति । यतो व्यानप्रणुन्नेन शुद्धरक्तेन जन्तवः ।। 78 ।। प्रीणिता वर्तयन्तीह यावज्जीवनसंस्थितिः।) 'हृदय' नामक अवयव उरस् या वक्षस् के भीतर स्तनों (फुप्फुसों) के बीच में स्थित है, जो शरीर-निर्माण के समय रक्त तथा श्लेष्मा के प्रसाद या सारभाग से उत्पन्न होता है, मुकुल (अविकसित या न खिले) कमल के समान उसकी आकृति होती है, उसका मुख नीचे की ओर होता है, वह 'चेतना' का प्रधान स्थान है और 'ओजस्' का आश्रय है। जब प्राणी जागता रहता है, तब वह खिला रहता है और जब प्राणी सोया रहता है, तब वह संकुचित रहता है तथा वहीं से व्यान वायु द्वारा प्रेरित किये हुये शुद्ध रक्त से प्रीणित या तृप्त किये हुये जन्तु जीवन-पर्यन्त जीवित रहते हैं। वक्तव्य—यह रक्त रस-मिश्रित होता है, अतः रक्त से अथवा रस से इन दोनों से शरीर का तर्पण या प्रीणन होता रहता है।
फुप्फुसादि का स्थान तद्वामे फुप्फुसप्लीहौ दक्षिणाङ्गे यकृत् तिलम् ।। 79 ।। हृदय के बाईं ओर फुप्फुस तथा प्लीहा और दाहिनी ओर यकृत् एवं तिल की स्थिति है। फुप्फुस-परिचय (उरो मध्यगतश्चापि श्वासोच्छ्वासप्रसाधनः । ·रक्तफेनभवो ज्ञेयः फेनवद् बहुकोष्ठकः ।। 80 ।।) उदानवायोराधारः फुप्फुसः प्रोच्यते बुधैः । 'फुप्फुस' या फेफड़ा वक्षस् के भीतर रहता है यह श्वास-उच्छ्वास क्रिया का साधक है। गर्भाशय में शरीर-निर्माण के समय यह रक्त की झाग से उत्पन्न होता है। इसलिये उसमें फेन के समान ही अनन्त कोष्ठ होते हैं और विद्वान् लोग उसे उदानवायु का आधार मानते हैं। वक्तव्य-सुश्रुत ने दो भागों में विभक्त होने पर भी 'फुप्फुस' को एक ही माना है, किन्तु महर्षि चरक ने 'द्वौ श्लेष्मभुवौ' (च० शा० अ० 7) दो फुप्फुस माने हैं। इसका कारण मात्र दृष्टिकोण का भेद है। प्लीहा-परिचय (शोणिताच्च समुत्पन्ना रसरञ्जनतत्परा ।। 81 ।।) रक्तवाहिसिरामूलं प्लीहाख्याता महर्षिभिः । शरीरोत्पत्ति के समय प्लीहा रक्त से उत्पन्न होता है और सदैव रस को रक्त बनाने में तत्पर रहती है। इसलिये महर्षियों ने उसे रक्तवाही सिराओं का मूल माना है। यकृत्-परिचय (शोणिताच्च समुत्पन्नं रसरञ्जनतत्परम् ।। 82 ।।) यकृद् रञ्जकपित्तस्य स्थानं रक्तस्य संश्रयः । यकृत् गर्भोत्पत्ति के समय रक्त से उत्पन्न होता है और रस को रंगकर रक्त बनाने में तत्पर रहता है, क्योंकि वह रंजकपित्त का स्थान है और इसलिये वह रक्त का आश्रय माना जाता है। वक्तव्य-'शोणितवहानां स्रोतसां यकृन्मूलं प्लीहा च'। देखें-च० वि० अ० 5। तथा 'स खलु आप्यो रसो यकृत्- प्लीहानौ प्राप्य रागमपुपैति' । देखें-सु० सू० अ० 14। क्लोम-परिचय (रक्तानिलात्समुत्पन्नं कालीयकमिति स्मृतम् ।। 83 ।।) जलवाहिसिरामूलं तृष्णाच्छादनकं तिलम् ।
पञ्चमोऽध्यायः] कलादिकाख्यानम् 47 तिल या क्लोम गर्भोत्पत्ति के समय रक्त तथा वायु से उत्पन्न होता है। उसका एक नाम 'कालीयक' भी है। वह जलवाही सिराओं का मूल है, इसलिये तृष्णा या पिपासा को आच्छादित करता है, अर्थात् उसको व्यवस्थित रखता है। वक्तव्य-'उदकवहानां स्रोतसां तालुमूलं क्लोम च'। देखें-च० वि० अ० 5। वृक्क-परिचय ( उत्पद्येते प्रसादाच्च मेदसः शोणितस्य च ।। 84 ।। ) वृक्कौ पुष्टिकरो प्रोक्तौ जठरस्थस्य मेदसः । मेदस् तथा रक्त के प्रसाद या सार से वृक्क उत्पन्न होते हैं और वे उदर की मेदस् को पुष्ट करते हैं। वक्तव्य-वृक्क दो होते हैं। 'मूत्रवहे द्वे' (सु० शा० अ० 9) तथा 'मूत्रवहानां स्रोतसी वस्तिमूलं वङ्कणौ च' (च० वि० अ० 5) और इन वाक्यों से यह भी ज्ञात होता है कि वृक्क मूत्र का भी वहन करते हैं। मूत्र के साथ पित्त के निकलते रहने से रक्त शुद्ध होता रहता है और लवण के निकलते रहने से मेदस् की पुष्टि होती रहती है। मूत्र मल है, अतः जो जल पिया जाता है, वह शरीर के उन पदार्थों को, जो शरीर को मलिन करते हैं या कर सकते हैं, लेकर मूत्र रूप से बाहर निकल जाता है। वृषण-परिचय ( उत्पद्येते प्रसादाच्च मांसासृक् कफमेदसाम् ।। 85 ।। ) वीर्यवाहिसिराधारौ वृषणौ पौरुषावहौ । 'वृषण' मांस, रक्त, कफ तथा मेदस् के प्रसाद या सारभाग से उत्पन्न होते हैं। वे वीर्यवाहिनी सिराओं के मूल हैं तथा पौरुष या पुरुषत्व या मैथुन-सामर्थ्य का वहन करते हैं। लिंग-परिचय ( ग्रीवाहृदयबद्धाभ्यः कण्डराभ्यः प्रजायते ।। 86 ।। ) गर्भाधानकरं लिङ्गमयनं वीर्यमूत्रयोः । ग्रीवा तथा हृदय से सम्बन्ध रखने वाली कण्डराओं से 'लिंग' का उत्पत्ति होती है। उसी से गर्भाधान होता है और वह वीर्य या शुक्र तथा मूत्र के निकलने का मार्ग है। गर्भाशय-परिचय ( शङ्खनाभ्याकृतिर्योनिस्त्र्यावर्त्ता सा च कीर्तिता ।। 87 ।। तस्यास्तृतीये त्वावर्त्ते गर्भशय्या प्रतिष्ठिता । ) योनि या भग की आकृति शंख की नाभि के समान होती है। उसमें तीन आवर्त्त होते हैं। उसके तीसरे आवर्त्त में 'गर्भशय्या' या गर्भाशय प्रतिष्ठित रहता है। वक्तव्य-लिंग एवं वृषण पुमान् या नर में व्यक्त और स्त्री या नारी में अव्यक्त होते हैं और योनि (भग) तथा गर्भाशय स्त्री में व्यक्त और पुरुष में अव्यक्त होते हैं और नपुंसक में ये चारों अंग अव्यक्त होते हैं। यह सिद्ध है कि यह चारों अंग नर, नारी एवं नपुंसक तीनों में है। अतएव सुश्रुत ने कहा है-'पुंसां पेश्यः पुरस्ताद् याः प्रोक्ता लक्षणमुष्कराः। स्त्रीणामवृत्य तिष्ठन्ति फलमन्तर्गतं हि ताः' ।। (सु० शा० अ० 5)। अर्थात् जो मांसपेशियां नर के लक्षण अर्थात् लिंग तथा मुष्क (वृषण) को बनाती हैं, वे ही नारी के फल अर्थात् गर्भाशय का निर्माण करती हैं। यही कारण है कि नर से नारी और नारी से नर तथा नर से नपुंसक बन जाते हैं। इन अंगों में विशेष प्रकार की उत्तेजना होने पर नर, नारी एवं नपुंसक में एक ही प्रकार की वासना उत्पन्न होती है; एक-सी ही रति तथा एक-सी ही तृप्ति होती है। शरीर-पोषण के प्रकार शिरा धमन्यो नाभिस्थाः सर्वा व्याप्य स्थितास्तनुम् ।। 88 ।। पुष्णन्ति चानिशं वायोः संयोगात् सर्वधातुभिः । शिरा तथा धमनियां नाभि (अर्थात् आमाशय एवं पक्वाशय का मध्य (अन्त्र नामक) स्थान से प्रारम्भ होकर सम्पूर्ण शरीर में फैली हुई रहती हैं और वे वायु के संयोग से सभी धातुओं द्वारा सम्पूर्ण शरीर का निरन्तर पोषण करती रहती हैं। वक्तव्य-प्राणी जो आहार ग्रहण करता है, उसका पाक अन्त्र में होता है। पाक होने पर जो रस बनता है, उसमें सब धातुओं के पोषक पदार्थ विद्यमान रहते हैं और उस रस को सिराएँ सम्पूर्ण शरीर में पहुँचाती रहती हैं, जिससे प्राणी का पोषण होता रहता है। यह क्रिया निरन्तर होती रहती है। स्मरण रहे कि नाभिस्थ प्राणवायु धमनियों के ध्मान से धकेला हुआ रससिराओं द्वारा सम्पूर्ण शरीर में घूमता है और उसे पुष्ट करता रहता है। 'अन्नं वै प्राणाः' (उपनिषद्) तथा 'पुष्यन्ति हि आहाररसात् रसरुधिरमांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्रौजंसि' इति। देखें-च० सू० अ० 28। 3 तथा सु० सू० अ० 14। प्राणवायु द्वारा शरीर-पोषण नाभिस्थः प्राणपवनः स्पृष्ट्वा हृत् कमलान्तरम् ।। 89 ।। कण्ठाद् बहिर्निर्याति पातुं विष्णुपदामृतम् ।
48 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
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पीत्वा चाम्बरपीयूषं पुनरायाति वेगतः ।। 90 ।। प्रीणयन् देहमखिलं जीवयञ्जठरानलम् । नाभि (पक्वाशय तथा आमाशय के बीच) में रहने वाली प्राणवायु हृदय के भीतरी भाग को स्पर्श करती हुई कण्ठ या श्वास मार्ग से बाहर विष्णुपद (आकाश) के अमृत का पान करने के लिए निकलती है और आकाश के अमृत (प्राणवायु) को पीकर शीघ्र ही फिर शरीर में प्रविष्ट हो जाती है। इस प्रकार जीवन भर सम्पूर्ण शरीर को तृप्त तथा प्रसन्न कर जठराग्नि को प्रदीप्त करती रहती है। वक्तव्य—प्राणवायु नाभि से चलकर हृदय, फुप्फुस और कण्ठ से होता हुआ श्वास के रूप में बाहर निकलता है और आकाश में सदैव व्याप्त रहने वाले अमृत को पीकर फिर प्रश्वास के रूप में शरीर में चला जाता है। यह क्रिया जीवनभर निरन्तर होती रहती है। इस श्वास-प्रश्वास क्रिया से प्राणी प्रसन्न रहता है और अग्नि दीप्त होती है, क्योंकि 'एषः ह वा अग्नेर्योनिः यः प्राणः' (जाबालोपनिषद्) अर्थात् यह प्राण ही अग्नि या जठराग्नि की योनि (कारण) है।
जीवन-मरण परिभाषा शरीरप्राणयोरेवं संयोगादायुरुच्यते ।। 91 ।। कालेन तद्वियोगाच्च पञ्चत्वं कथ्यते बुधैः । उपर्युक्त प्रकार से शरीर तथा प्राणवायु के संयोग को आयुः या जीवन कहा जाता है। काल या समय से उन (शरीर और प्राण) का वियोग होने से विद्वान् लोग उसे 'पञ्चत्व' ('मृत्यु') कहते हैं। वक्तव्य—तात्पर्य यह है कि जितने समय तक शरीर और प्राण का संयोग या मेल रहता है, उतने समय का नाम 'आयु' है। जब शरीर से सदा के लिए प्राणवायु निकल जाता है, तो 'मृत्यु' हो जाती है।
रोग-निवृत्ति का महत्त्व न जन्तुः कश्चिदमरः पृथिव्यां जायते क्वचित् ।। 92 ।। अतो मृत्युरवार्यः स्यात् किन्तु रोगान्निवारयेत् । इस संसार में कहीं भी कोई प्राणी अमर (न मरने वाला) नहीं उत्पन्न होता। मृत्यु तो अवश्यंभावी है। इसलिये रोगों का निवारण अवश्य करना चाहिये। वक्तव्य—'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः' (गीता)। रोगों की चिकित्सा करके अकाल मृत्यु रोकी जाती है, क्योंकि रोगों के कारण प्राणी अकाल में ही मर जाते हैं (सं० वि० अ० 3 तथा
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च० शा० अ० 6)। तात्पर्य यह है कि सौ वर्ष के भीतर यदि कोई मरता है, तो अकाल में मरता है, क्योंकि 'शतायुर्वे पुरुषः, इति श्रुतिः'।
चिकित्सा का महत्त्व याप्यत्वं याति साध्यस्तु याप्यो गच्छत्यसाध्यताम् ।। 93 ।। जीवितं हन्त्यसाध्यस्तु नरस्याऽप्रतिकारिणः । जो मनुष्य उचित समय पर अपने रोग की चिकित्सा नहीं करवाता है, उसका साध्य (चिकित्सा से दूर हो जाने योग्य) रोग याप्य (जो रोग चिकित्सा करते समय दवा रहता है) हो जाता है और याप्य रोग असाध्य हो जाता है तथा असाध्य रोग जीवन को नष्ट कर देता है। वक्तव्य—जहाँ तक हो सके शीघ्र ही रोग की चिकित्सा करा लेनी चाहिये।
रोगनिवारण-निर्देश धर्मार्थकाममोक्षाणां शरीरं साधनं यतः ।। 94 ।। अतो रुग्ण्यस्तनुं रक्षेन्नरः कर्मविपाकवित् । क्योंकि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का साधन (प्राप्ति का उपाय) शरीर ही है। इसलिये कर्म के परिणाम को जानने वाला मनुष्य रोगों से अपने शरीर की रक्षा करे। वक्तव्य—जब तक मनुष्य स्वस्थ या नीरोग है, तभी तक वह उक्त चारों पदार्थों की प्राप्ति कर सकता है। अन्यथा कर्मण्य भी अकर्मण्य होकर पड़ा रहता है और कष्ट भोगता रहता है। इसलिये प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह सर्वतोभावेन शरीर को स्वस्थ एवं नीरोग बनाये रखें।
समदोष का महत्त्व धातवस्तन्मला दोषा नाशयन्त्यसमास्तनुम् ।। 95 ।। समाः सुखाय विज्ञेया बलायोपचयाय च । रस, रक्त आदि धातुओं उनके मल और वात आदि दोष जब विषम (विकृत) हो जाते हैं, तो शरीर को रुग्ण या नष्ट कर देते हैं। जब वे सम (प्रकृतिस्थ या अविकृत) रहते हैं, तो सुख, बल और पुष्टि के कारण होते हैं। वक्तव्य—'दोषधातुमलमूलं हि शरीरम्'। (सु० सू० अ० 15) अर्थात् दोष (वातादि), धातु (रसादि), एवं मल ये शरीर के कारण हैं। जब ये सभी प्रकृतिस्थ रहते हैं, तो शरीर सुखी रहता है, अन्यथा रोगी हो जाता है अथवा मृत्यु हो जाती है।
पञ्चमोऽध्यायः ] कलादिकाख्यानम् 49 स्वस्थ की परिभाषा ( समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः ।। ९६ ।। प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते । एषां समत्वं यच्चापि भिषग्भिरवधार्यते ।। ९७ ।। न तत्स्वास्थ्यादृते शक्यं वक्तुमन्येन हेतुना । दोषादीनां त्वसमतामनुमानेन लक्षयेत् ।। ९८ ।। अप्रसन्नेन्द्रियं वीक्ष्य पुरुषं कुशलो भिषक् ।) जिस प्राणी के दोष (अर्थात् पाँच प्रकार का वात, पाँच प्रकार का पित्त तथा पाँच प्रकार का कफ) सम हों, अग्नि (जठराग्नि या पाचनशक्ति) सम हो तथा धातु (रसादि सातों धातुएँ), मल (मल, मूत्र तथा स्वेद आदि) तथा क्रिया (सोना, जागना आदि) सम हों, आत्मा, सभी इन्द्रियाँ और मन प्रसन्न हों, वह स्वस्थ कहा जाता है। चिकित्सक वर्ग इन दोष, धातु एवं मला की जिस 'समता' का निश्चय करता है, वह (समता) प्राणी की 'स्वस्थता' या नीरोगता के बिना और किसी भी कारण से नहीं कही जा सकती, अर्थात् प्राणी को स्वस्थ या प्रसन्न देखकर उसके दोष, धातु एवं मल 'सम' समझ लिये जाते हैं। कुशल चिकित्सक किसी भी पुरुष (प्राणी) को अप्रसन्नेन्द्रिय या दुःखी या रोगी देख कर के दोषादियों की असमता या विषमता का अनुमान कर ले, अर्थात् समझ ले कि अब इसके दोषादि 'सम' नहीं रह गये हैं। वक्तव्य-उक्त श्लोकों में 'सम' शब्द का अर्थ तुल्य या बराबर नहीं है। इसका अर्थ है, प्रकृतिस्थ या जितना होना चाहिये उतना। समता को जानने की विधि उक्त 97वें पद्य में दी गयी है। सृष्टि-क्रम ( जगद्योनेरनिच्छस्य चिदानन्दैकरूपिणः ।। ९९ ।। पुंसोऽस्ति प्रकृतिर्नित्या प्रतिच्छायेव भास्वतः ।) संसार की उत्पत्ति का क्रम-संसार के मूल कारण, वासना रहित, ज्ञान-स्वरूप एवं आनन्द स्वरूप पुरुष (परम पुरुष या ईश्वर) की प्रकृति वैसी नित्य (अनादि एवं अविनाशी) है, जैसे तेजःस्वरूप भगवान् सूर्य का प्रतिबिम्ब होता है। वक्तव्य-ईश्वर नित्य है और प्रकृति भी नित्य है, ईश्वर चित्स्वरूप या चेतन शक्ति है, किन्तु प्रकृति जड़ या अचेतन है और प्रकृति के संयोग से ही ईश्वर जगद्योनि या जगत्-कारण होता है। प्रकृति-रहित या शुद्ध परमात्मा इच्छा-रहित या वासना-रहित है। ज्ञान और आनन्द ही एकमात्र उसका लक्षण है। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश और सूर्य के मण्डल का नित्य सम्बन्ध है, उसी प्रकार प्रकृति तथा पुरुष का भी नित्य सम्बन्ध है। सृष्टि में प्रकृति का योगदान अचेतनापि चैतन्ययोगेन परमात्मनः ।। १०० ।। अकरोद् विश्वमखिलमनित्यं नाटकाकृति । प्रकृति यद्यपि अचेतन या जड़ है, तथापि उसने परमात्मा की चेतन शक्ति के संयोग से इस सम्पूर्ण विश्व की रचना की है, जो कि नाटक के समान अनित्य अर्थात् एक ही रूप में रहने वाली नहीं है। वक्तव्य-जैसे नाटक के पात्र अनेक रूप बदलते रहते हैं-एक ही मनुष्य कभी स्त्री का रूप धारण करता है तो कभी पुरुष का, कभी मालिक का, तो कभी नौकर का, कभी धनी का तो कभी निर्धन का; ठीक इसी प्रकार एक ही जीव अनेक रूप धारण करता है-कभी मनुष्य का तो कभी स्त्री का, कभी कीट का तो कभी पतंग का, कभी वृक्ष का तो कभी लता का। प्रकृति और पुरुष से निर्मित संसार के सभी पदार्थ परिवर्तनशील हैं। एक पदार्थ जिस रूप में आज दिखलायी दे रहा है, कल वह दूसरे ही रूप में परिवर्तित हो जाता है। अतएव संसार नाटकों के दृश्यों की भाँति अनित्य कहा गया है। बुद्धि आदि तत्त्वों की उत्पत्ति प्रकृतिर्विश्वजननी पूर्वं बुद्धिमजीजनत् ।। १०१ ।। इच्छामयीं महद्रूपामहङ्कारस्ततोऽभवत् । त्रिविधः सोऽपि सञ्जातो रजःसत्त्वतमोगुणैः ।। १०२ ।। सम्पूर्ण विश्व को उत्पन्न करने वाली प्रकृति ने इच्छायुक्त या वासनायुक्त एवं 'महत् तत्त्वरूप' 'बुद्धि' को सर्वप्रथम उत्पन्न किया। उस बुद्धितत्त्व से 'अहङ्कार' की उत्पत्ति हुई। वह अहंकार भी रजोगुण, सत्त्वगुण एवं तमोगुण के कारण तीन प्रकार का हो गया। वक्तव्य-प्रकृति और पुरुष के संयोग से उत्पन्न होने वाले प्राणी में पहले अनुभवशक्ति उत्पन्न होती है, जिसमें इच्छा या वासना रहती है। इस वासनायुक्त बुद्धितन्त्र से अहंकार या अहंभाव उत्पन्न हो जाता है और वह अहंकार तीन प्रकार का होता है-1. रजोगुण युक्त या रागात्मक प्रेम या भक्ति करने वाला; 2. सत्त्वगुण युक्त रागरहित सुख-दुःख के द्वन्द्वों में समानभाव से रहने वाला; और 3. तमोगुणयुक्त द्वेष, शत्रुता आदि दुर्भावनावों से युक्त।
50 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
दस इन्द्रियाँ तस्मात् सत्त्वरजोयुक्तादिन्द्रियाणि दशाभवन्। मनश्च जातं तान्याहुः श्रोत्रत्वङ्नयनं तथा।। 103 ।। जिह्वाघ्राणवचोहस्तपादौपस्थगुदानि च। पञ्च बुद्धीन्द्रियाण्याहुः प्राक्तनानीतराणि च।। 104।। कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव कथ्यन्ते सूक्ष्मबुद्धिभिः। सत्त्वगुण और रजोगुण से युक्त अहंकार द्वारा दस 'इंद्रियाँ' और 'मन' उत्पन्न हुआ। वे दस इन्द्रियाँ ये हैं-1. श्रोत्र, 2. त्वचा, 3. नयन, 4. जिह्वा (रसना), 5. घ्राण, 6. वाक्, 7. हस्त, 8. पाद, 9. उपस्थ (लिंग) तथा 10. गुद। इनमें पहली पाँच तो बुद्धि इन्द्रियाँ या ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और दूसरी पाँच कर्मेन्द्रियाँ कही जाती हैं। वक्तव्य-बुद्धितत्त्व की इच्छाओं और महत्त्वाकांक्षाओं को प्राप्त करने के लिए अहंभाव तो उत्पन्न हो गया, किन्तु उनकी प्राप्ति के साधनों का अभाव था, वह भी दस इन्द्रियाँ और मन की उत्पत्ति हो जाने से पूर्ण हो गया। ये 11 पदार्थ सत्त्व और रजोगुण से युक्त होते हैं, क्योंकि 'कारणानुरूपं कार्यम्' (सु० शा० अ० 1) जिससे ऐश्वर्य की सामर्थ्य प्राप्त की जाये, उसे 'इन्द्रिय' कहते हैं। मन मनन और संकल्प आदि का साधन है, इसके संयोग से पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच प्रकार के ज्ञानों की साधन हैं और पाँच कर्मेन्द्रियाँ पाँच प्रकार के कर्मों के साधन हैं। यहाँ तक के बतलाये हुये सभी तत्त्वों का समन्वित नाम सूक्ष्मशरीर है। पञ्च तन्मात्राएँ तमः सत्त्वगुणोत्कृष्टादहङ्कारादथाभवत् ।। 105 ।। तन्मात्रपञ्चकं तस्य नामान्युक्तानि सूरिभिः। शब्दतन्मात्रकं स्पर्शतन्मात्रं रूपमात्रकम् ।। 106 ।। रसतन्मात्रकं गन्धतन्मात्रं चेति तद्विदुः। तन्मात्रपञ्चकात्तस्मात् सञ्जातं भूतपञ्चकम् ।। 107 ।। व्योमानिलानलजलक्षोणीरूपं च तन्मतम्। तमोगुण तथा सत्त्वगुण से युक्त अहंकार तत्त्व से पाँच 'तन्मात्राएँ' उत्पन्न हुईं। उनके नाम विद्वानों ने ये बतलाये हैं-1. शब्दतन्मात्र, 2. स्पर्शतन्मात्र, 3. रूपतन्मात्र, 4. रसतन्मात्र और 5. गन्धतन्मात्र। इन पाँच तन्मात्राओं से पाँच 'महाभूत' उत्पन्न हुये और वे ये हैं-1. आकाश, 2. वायु, 3. अग्नि, 4. जल और 5. पृथिवी। वक्तव्य-भोग के साधनों के रहने पर भी भोक्ता (भोगने वाला) भोगायतन (भोगस्थान) के अभाव में भोग नहीं कर सकता। अतः भोगायतन (भोगायतनं शरीरम्) अर्थात् स्थूल शरीर भी उत्पन्न हो गया। आकाश आदि पाँच महाभूतों से शरीर की उत्पत्ति होती है, जिसमें पुरुष (पुरि शेते इति पुरुषः) शयन करता या व्याप्त रहता है। देखें-'पञ्चमहाभूत- शरीरिसमवायः पुरुषः'। (सु० सू० अ० 1)। जिस प्रकार सम्पूर्ण विश्व में ईश्वर व्याप्त है। महाभूत का सूक्ष्म रूप ही 'तन्मात्र' है। इसी को नैयायिक लोग 'परमाणु' कहते हैं। तन्मात्राओं के स्थूल रूप शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसगन्धावनुक्रमात् ।। 108 ।। तन्मात्राणां विशेषाः स्युः स्थूलभावमुपागताः। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँचों ही शब्दतन्मात्र आदि पाँच तन्मात्राओं के क्रमशः स्थूलरूप को प्राप्त हुये विशेष हैं। वक्तव्य-पञ्चमहाभूतों के परमाणु शब्द आदि विशेषों द्वारा जाने जाते हैं। 'विशेष्यन्ते श्रोत्रादिभिः इन्द्रियैः ज्ञायन्ते इति विशेषाः'। अर्थात् शब्दादि शब्दतन्मात्रादि के सूचक या बोधक हैं। इन्द्रियों के विषय बुद्धीन्द्रियाणां पञ्चैव शब्दाद्या विषया मताः ।। 109 ।। कर्मेन्द्रियाणां विषया भाषादानविहारिताः। आनन्दोत्सर्गकौ चैव कथितास्तत्त्वदर्शिभिः ।। 110 ।। साङ्ख्यशास्त्र के विद्वानों का कथन है कि उक्त शब्द आदि विशेष श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियों के विषय या ज्ञेय भाव हैं। कर्मेन्द्रियों के विषय (कर्म) ये हैं, यथा-1. भाषण (बोलना), 2. आदान (ग्रहण करना), 3. विहरण (विचरना या चलना), 4. आनन्द (रतिसुख की प्राप्ति करना) एवं 5. उत्सर्ग (त्यागना)। वक्तव्य-आचार्य शार्ङ्गधर ने सुश्रुत का अनुसरण करते हुये उपस्थेन्द्रिय (लिंग और योनि) का विषय आनन्द माना है-'आनन्द्यते अनेन इति आनन्दः'। किन्तु महर्षि चरक ने इसका विषय विसर्ग (शुक्र मोक्षण) ही माना है। आनन्द तो अनुभव है, कर्म नहीं। उक्त कर्म में स्त्री और पुरुष के रजस् तथा शुक्र का विसर्ग अर्थात् त्याग होता है। प्रकृति-परिचय प्रधानं प्रकृतिः शक्तिर्नित्या चाविकृतिस्तथा। एतानि तस्या नामानि शिवमाश्रित्य या स्थिता ।। 111 ।।
पञ्चमोऽध्यायः ] कलादिकाख्यानम् 51 प्रधान, प्रकृति, शक्ति, नित्या एवं अविकृति ये उस प्रकृति के नाम हैं, जो शिव (ईश्वर) के आश्रित होकर रहती है। वक्तव्य-प्रकृति के उक्त नाम सार्थक हैं। यथा-प्रधान सब तत्त्वों में प्रधान है अथवा इसी से वे धारण किये जाते हैं। प्रकृति-यह स्वभाव-सिद्ध है। शक्ति-इसी से ईश्वर जगद्योनि होने में समर्थ होता है। नित्या-ईश्वर के समान यह नित्य अर्थात् शाश्वत है। अविकृति-वह किसी की विकृति अर्थात् विकार या कार्य नहीं है, अर्थात् उसको किसी ने उत्पन्न नहीं किया। 'अकारणम्'। देखें-सु० शा० अ० 1। प्रकृति-विकृति महानहङ्कृतिः पञ्च तन्मात्राणि पृथक् पृथक्। प्रकृतिर्विकृतिश्चैव सप्तैतानि बुधा जगुः ॥112॥ विद्वानों का कथन है, कि महान् (बुद्धितत्त्व) अहंकार और पृथक्-पृथक् पाँच तन्मात्रा ये सात प्रकृति (कारण) भी हैं। और विकृति (कार्य) भी। वक्तव्य-उक्त सातों तत्त्व प्रधान से उत्पन्न हुये हैं, इसलिये उन्हें विकृति अर्थात् कार्य कहा जाता है और इनसे पञ्चमहाभूत उत्पन्न हुये हैं। इसलिये उन्हें प्रकृति अर्थात् कारण भी कहा जाता है। सोलह-विकार दशेन्द्रियाणि चित्तं च महाभूतानि पञ्च च। विकाराः षोडश ज्ञेयाः सर्वं व्याप्य जगत्स्थिताः ।। 113 ।। दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच महाभूत ये सोलह 'विकार' कहे जाते हैं और ये सम्पूर्ण संसार में व्याप्त होकर रहते हैं। वक्तव्य-ये सोलह तत्त्व 'विकार' या कार्य ही कहे जाते हैं, क्योंकि ये उक्त तन्मात्राओं से उत्पन्न होते हैं। प्रश्न-इनको केवल विकार ही क्यों कहते हैं? प्रकृति भी क्यों नहीं कहते? कारण यह है कि इनसे कोई नवीन तत्त्व उत्पन्न नहीं होता। अतः इन्हें केवल विकार ही कहते हैं प्रकृति नहीं। जीवात्मा का निवास-स्थान एवं चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वैः सिद्धे वपुर्गृहे। जीवात्मा नियतो नित्यो वसति स्वान्तदूतवान् ।।114 ।। उक्त चौबीस तत्त्वों द्वारा बने हुये शरीर रूपी घर में अविनाशी जीवात्मा मन को अपना दूत बनाकर कर्म-बन्धन से बँधा हुआ निवास करता है। जीवात्मा का स्वरूप स देही कथ्यते पापपुण्यदुःखसुखादिभिः । व्याप्तो बद्धश्च मनसा कृत्रिमैः कर्मबन्धनैः ।। 115 ।। पाप, पुण्य, सुख और दुःख द्वन्द्वों से युक्त तथा मन द्वारा किये गये कर्मों के बन्धनों से बँधा हुआ वह जीवात्मा देही (देह वाला) या शरीर (शरीर वाला) कहा जाता है। वक्तव्य-वासनाओं से रहित जीवात्मा मन के फेर में पड़कर अनेक प्रकार के सुख दुःखों में पड़ जाता है। जैसे एक भला आदमी अपने नौकर या मित्र के फेर में पड़कर अनेक झंझटों में फँस जाता है, ठीक वही दशा शुद्ध सच्चिदानन्द पूर्ण ब्रह्म जीवात्मा की भी होती है। जीवात्मा के प्रतिबन्धक कामक्रोधौ लोभमोहावहङ्कारश्च पञ्चमः । दशेन्द्रियाणि बुद्धिश्च तस्य बन्धाय देहिनः ।। 116 ।। काम, क्रोध, लोभ, मोह और पाँचवाँ अहङ्कार, दस इन्द्रियाँ तथा बुद्धि-ये सभी उस जीवात्मा को बन्धन में डालने वाले हैं। वक्तव्य-बुद्धि इच्छामयी है और इच्छाएँ ही सबको फँसाती हैं। काम (सुखभोग की वासना), क्रोध (गुस्सा), लोभ (धनादि के सञ्चय की अभिलाषा), मोह (मिथ्याज्ञान) और अहङ्कार (अभिमान)-ये सब मानसिक दोष हैं। इनके आवेश से सद्-असद् विवेक का नाश या ह्रास हो जाता है और अनेक प्रकार के संकट उठाने पड़ते हैं। मोह का लक्षण ( अश्रेयः श्रेयसोर्मध्ये भ्रमणं संशयो भवेत् । मिथ्याज्ञानं तु तं प्राहुरहिते हितदर्शनम् ।। 117 ।।) शुभ एवं अशुभ में जो भ्रान्ति एवं सन्देह होता है और जो अहित (दुःखदायी) में हित (सुखदायी) दिखलायी पड़ता है, उसे मिथ्याज्ञान या 'मोह' कहते हैं। अहङ्कार का लक्षण (अहमित्यभिमानेन यः क्रियासु प्रवर्त्तते । कार्यकारणयुक्तस्तु तदहङ्कारलक्षणम् ।। 118 ।।) कार्य एवं कारण से युक्त जो पुरुष 'अहम्' (मैं भी कुछ हूँ) इस प्रकार के अभिमान के साथ कार्यों में प्रवृत्त होता है, उसका नाम 'अहंकार' है। काम का लक्षण ( स्त्रीषु जातो मनुष्याणां स्त्रीणां च पुरुषेषु वा। परस्परकृतः स्नेहः काम इत्यभिधीयते ।। 119 ।।)
52 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे स्त्रियों में पुरुषों का एवं पुरुषों में स्त्रियों का जो परस्पर स्नेह होता है, उसे 'काम' कहते हैं। क्रोध का लक्षण (यदूष्मा हृदयाज्जन्तोः समुत्तिष्ठति वै सकृत्। परहिंसात्मकः क्लेशः क्रोध इत्यभिधीयते।।120।।) दूसरे को आघात पहुँचाने के लिए एकाएक प्राणी के हृदय से जो ऊष्मा (गर्मी) उठती है, जिससे क्लेश होता है, उसे 'क्रोध' कहते हैं। लोभ का लक्षण (परार्थं परभोगांश्च परसामर्थ्यमेव च। दृष्ट्वा श्रुत्वा च या तृष्णा जायते लोभ एव सः।।121।।) परायी सम्पत्ति, उपभोग सामग्री एवं शक्ति को देखकर अथवा सुनकर जो लालसा उत्पन्न होती है, उसे 'लोभ' कहते हैं। रोग-आरोग्य के लक्षण आप्नोति बन्धमज्ञानादात्मज्ञानाच्च मुच्यते। तद्दुःखयोगकृद्व्याधिरारोग्यं तत् सुखावहम्।।122।। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे कलादिकाख्यानं नाम पञ्चमोऽध्यायः।।5।।
उक्त देहधारी प्राणी अज्ञान के कारण बन्धन को प्राप्त होता है और आत्मज्ञान (तत्त्वज्ञान या सद् विवेक) होने से मुक्त (दुःखों और संकटों से पार) हो जाता है। उस देहधारी को जो दुःख या कष्ट देने वाले भाव हैं, उनको व्याधि या रोग कहते हैं तथा उसको सुख देने वाला आरोग्य है। वक्तव्य-यहाँ विश्व की उत्पत्ति का जो क्रम बतलाया गया है, ठीक यही क्रम मनुष्य की उत्पत्ति का भी है। जिस प्रकार इस विशाल विश्व में ईश्वर व्याप्त है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में आत्मा व्याप्त है। इस प्रकार मनुष्य का शरीर एक छोटा-सा विश्व है और उसमें आत्मा छोटा ईश्वर है। 'पुरुषोऽयं लोकसम्मित इत्युवाच भगवानात्रेयः। यावन्तो हि लोके भावविशेषाः तावन्तः पुरुषे यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके'।। (च० शा० अ० 5)। अर्थात् जितने तत्त्व संसार में हैं, उतने ही पुरुष में भी हैं। इसी प्रकार पञ्चमहाभूत तथा अव्यक्त ब्रह्म का मिश्रण यह संसार है और उक्त छः तत्त्वों का ही मिश्रण यह प्राणी भी है। 'षड् धातवः समुदिताः 'पुरुष' इति संज्ञां लभन्ते' (च० शा० अ० 5)। 'पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषः' (सु० सू० अ० 1)। इस विषय को पूर्णरूप से समझने के लिए आप च० शा० अ० 5 की चन्द्रिका टीका देखें।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का पांचवा अध्याय समाप्त।।5।।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
षष्ठोऽध्यायः आहारादिगतिकथनम्
[वाम स्तम्भ / Left Column]
आहार-परिचय (आहारः प्रीणनः सद्यो बलकृद् देहधारकः। आयुस्तेजः समुत्साहः स्मृत्योर्जोऽग्निविवर्द्धनः ।। 1 ।।) आहार या भोजन तृप्तिकारक, तत्काल बलकारक, शरीर का धारक एवं पोषक है। यह आयुः, तेजस्, उत्साह, स्मरणशक्ति, ओजस् एवं अग्नि को बढ़ाता है। आहार के भेद (आहारः षड्विधो भोज्यो भक्ष्यश्चर्व्यस्तथैव च। लेह्यश्चोष्यस्तथा पेयस्तदुदाहरणानि च ।। 2 ।। भोज्य ओदनसूपादिर्भक्ष्यो मोदकमण्डकः। चर्व्यश्चिपिटधान्यादी रसालादिस्तु लेह्यते ।। 3 ।। चोष्य आम्रफलेक्ष्वादिः पेयस्तु पानकं पयः।) आहार छः प्रकार का होता है—1. भोज्य, 2. भक्ष्य, 3. चर्व्य, 4. लेह्य, 5. चोष्य तथा 6. पेय। इनके उदाहरण हैं—भात तथा दाल आदि 'भोज्य' कहलाते हैं। लड्डू तथा रोटी आदि 'भक्ष्य' कहे जाते हैं। चिउड़ा एवं भुने चने आदि 'चर्व्य' (चबाने योग्य) कहे जाते हैं। सिखरन, चटनी, च्यवनप्राश आदि 'लेह्य' (चाटने योग्य) कहे जाते हैं। आम के फल एवं ईख आदि 'चोष्य' (चूसने योग्य) तथा पानक (शर्बत) एवं दूध आदि 'पेय' (पीने योग्य) कहे जाते हैं। इन सबका एक नाम 'आहार' भी है। पाचन-प्रकार यात्यामाशयमाहारः पूर्वं प्राणानिलेरितः ।। 4 ।। माधुर्यं फेनभावं च षड्रसोऽपि लभेत सः। अथ पाचकपित्तेन विदग्धश्चाम्लतां व्रजेत् ।। 5 ।। ततः समानमरुता ग्रहणीमभिनीयते। आहार प्राणवायु से प्रेरित होकर पहले मुख एवं आहार-मार्ग द्वारा 'आमाशय' में जाता है और वहाँ छहों रसों
[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]
युक्त आहार मधुरता (मीठेपन) और फेन-भाव (झाग जैसी अवस्था) को प्राप्त होता है। इसके पश्चात् वह मधुर एवं फेनरूप आहार पाचक पित्त द्वारा पकने लगता है और खट्टा हो जाता है। फिर समान वायु के प्रभाव से वह ग्रहणी में पहुँच जाता है। वक्तव्य—प्राणवायु के प्रकृतिस्थ रहने पर प्राणी आहार का आहरण या ग्रहण कर सकता है अन्यथा नहीं। आमाशय में क्लेदक नामक कफ रहता है। उसके प्रभाव से आहार मधुर हो जाता है और आमाशय में आहार पहुँचने पर आलोडन- विलोडन होने से यह झाग-सा बन जाता है। पाचक पित्त स्वयं विदग्ध होकर खट्टा हो जाता है, अतः उसके मिश्रण से आहार भी खट्टा हो जाता है। पाचक पित्त (जठराग्नि) के साथ ही समान वायु रहता है और वह आहार को 'ग्रहणी' में पहुँचा देता है। ग्रहणी-परिचय (षष्ठी पित्तधरा नाम या कला परिकीर्तिता ।। 6 ।। पक्वामाशयमध्यस्था ग्रहणीत्यभिधीयते।) पाचक पित्त का धारण और पोषण करने वाली जो छठी कला कही जाती है और जो पक्वाशय तथा आमाशय के मध्यभाग में अवस्थित है, वह 'ग्रहणी' कही जाती है। वक्तव्य—आमाशय से प्रारम्भ होकर पक्वाशय-पर्यन्त जो साढ़े तीन 'व्याम' पुरुषों तथा तीन व्याम (एक व्याम = 4 हाथ) स्त्रियों के उदर में जो अवयव है, उसका नाम 'अन्त्र' है। इसी में से होकर आहार आमाशय से मलाशय तक पहुँचता है और इसी में आहार का पाक होता है। अतएव इसे सुश्रुत में 'पित्तधरा', शार्ङ्गधर में 'अग्निधरा' और चरक में 'अग्न्याधिष्ठान' तथा अन्न के पाक के लिए ग्रहण करने के कारण इसे 'ग्रहणी' कहा है।
54 शाङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे --- [स्तम्भ १ / Column 1] --- जठराग्नि के कार्य ग्रहण्यां पच्यते कोष्ठवह्निना जायते कटुः ।। 7 ।। रसो भवति सम्यक्त्वादपक्वादासम्भवः । उक्त ग्रहणी में आहार जठराग्नि से पचता है, तदनन्तर उसका स्वाद कटु या चरपरा हो जाता है। भली-भाँति पाक होने से रस आहार में से पृथक् हो जाता है, अन्यथा आम (कच्चा) रह जाता है। **वक्तव्य—**जठराग्नि अर्थात् पाचक पित्त स्वयं कटु है, अतः उसके प्रभाव से आहार भी कटु हो जाता है। रस आहार में पृथक् हो गया तो वह रसवाहिनियों द्वारा शरीर-पोषणार्थ हृदय की ओर चला जाता है, अन्यथा आम के रूप में गुदमार्ग से निकल जाता है। रस-परिपाक वह्नेर्बलेन माधुर्यं स्निग्धतां याति तद्रसः ।। 8 ।। पुष्णाति धातूनखिलान् सम्यक् पक्वोऽमृतोपमः । आहार का वह रस जठराग्नि की शक्ति से भली-भाँति परिपक्व होकर मधुरता और स्निग्धता को प्राप्त हो जाता है और शरीर की सब धातुओं को पुष्ट करता है, अतएव वह अमृत के समान होता है। **वक्तव्य—**इस आहार रस में सब धातुओं के पोषकतत्त्व रहते हैं और यही जीवन की रक्षा भी करता है। अपक्वरस से हानि मन्दवह्निविदग्धश्च कटुश्चाम्लो भवेद् रसः ।। 9 ।। विषभावं व्रजेद् वापि कुर्याद् वा रोगसङ्करम् । वह रस जठराग्नि की मन्दता के कारण यदि भली-भाँति परिपक्व नहीं होता तो कडुवा एवं खट्टा हो जाता है और विषभाव को प्राप्त हो जाता है, अथवा अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न कर देता है। **वक्तव्य—**मन्दाग्नि के कारण रस का सम्यक् परिपाक न होने से 'दण्डालसक' नामक रोग हो जाता है। इसके लक्षण विष के लक्षणों के समान होते हैं। यह आशुकारी या शीघ्रमारक होता है। यदि सौभाग्य से उक्त रोग न हुआ तो विसूची, अलसक एवं आमवातादि रोग हो जाते हैं। देखें- च० वि० अ० 2 तथा वाग्भट सू० अ० 8 । रस, मल, मूत्र तथा वली परिचय आहारस्य रसः सारः सारहीनो मलद्रवः ।। 10 ।। शिराभिस्तज्जलं नीतं बस्ती मूत्रत्वमाप्नुयात् । --- [स्तम्भ २ / Column 2] --- तत् किट्टं च मलं ज्ञेयं तिष्ठेत् पक्वाशये च तत् ।। 11 ।। वलित्रितयमार्गेण यात्यपानेन नोदितम् । प्रवाहिणी सर्जनी च ग्राहिकेति वलित्रयम् ।। 12 ।। आहार का सारभाग 'रस' बन जाता है और साररहित भाग 'मलद्रव' (पतला मल) होता है। और उस 'मलद्रव' का जलभाग सिराओं द्वार वस्ति (मूत्राशय) में पहुँचाया हुआ 'मूत्र' बन जाता है। उस मलद्रव का किट्ट भाग अर्थात् गाढ़ा हिस्सा मल (पुरीष) बन जाता है। वह मलाशय में अवस्थित रहता है। वह समय-समय पर अपानवायु द्वारा प्रेरित किया हुआ तीन वलियों से निर्मित मार्ग (गुद) में से होकर बाहर निकल जाता है। इन वलियों के ये नाम हैं- 1. प्रवाहिणी (मल को प्रवाहित करने वाली), 2. सर्जनी (मल को त्यागने वाली) और 3. ग्राहिका या ग्राहिणी (निकलते हुये मल को यथावश्यक रोकने वाली)। रक्तनिर्माण-प्रक्रिया रसस्तु हृदयं याति समानमरुतेरितः । रञ्जितः पाचितो यः स पित्तेनायाति रक्तताम् ।। 13 ।। वह रस समान वायु द्वारा प्रेरित होकर हृदय में चला जाता है और जो रंजक पित्त द्वारा रंजित तथा पाचित होता है, वही 'रक्त' बन जाता है। वक्तव्य— 'रस गतौ' धातु से 'रस' शब्द का निर्माण होता है। इसका अर्थ है कि वह सदा चलता रहता है- 'रसति अहरहः गच्छति इत्यतो रसः'। इस रस का स्थान हृदय है और यह वहाँ से चलकर प्रतिदिन सम्पूर्ण शरीर का तर्पण, पोषण एवं सञ्चालन करता है और यह पोषक रस यकृत एवं प्लीहा में जाकर राग को प्राप्त कर रक्त बन जाता है। देखें- सु० सू० अ० 14 । रक्त का महत्त्व रक्तं सर्वशरीरस्थं जीवस्याधारमुत्तमम् । स्निग्धं गुरु चलं स्वादु विदग्धं पित्तवद् भवेत् ।। 14 ।। वह रक्त (रंगा हुआ रस) सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है और वह जीवात्मा का सर्वश्रेष्ठ आधार है। वह स्नेहयुक्त है, जल की अपेक्षा गुरु है, सदा चलता रहता है और स्वादु (कुछ नमकीन स्वाद वाला) है। जब कभी वह विकृत हो जाता है, तो पित्त के समान अर्थात् खट्टा हो जाता है। **वक्तव्य—**जो रस रक्तरूप में शरीर के सम्पूर्ण अवयवों, दोषों, धातुओं एवं मलों में अनुसरण करता रहता है, वह
षष्ठोऽध्यायः] आहारदिगतिकथनम् 55 द्रवरूप है तथा स्नेहन, जीवन, तर्पण एवं धारण आदि सद्गुणों के कारण सौम्य अर्थात् सोम के आह्लादक आदि गुणों से युक्त समझा जाता है। यही शुद्ध पोषक रस जब शुद्ध रंजक पित्त द्वारा रंग दिया जाता है, तो वह 'रक्त' कहा जाता है। यहाँ उसी रक्त का ग्रहण किया गया है। देखें-सु० सू० अ० 14। रसादि धातुओं का परिणाम-क्रम पाचिताः पित्ततापेन रसाद्या धातवः क्रमात्। शुक्रत्वं यान्ति मासेन तथा स्त्रीणां रजो भवेत् ।। 15 ।। सम्पूर्ण शरीरव्यापी पित्त के ताप से पकायी हुई रस आदि धातुएँ क्रमशः एक मास में शुक्र भाव को प्राप्त हो जाती हैं। उसी प्रकार स्त्रियों का 'रजस्' बन जाता है। वक्तव्य- शरीर के रस, रक्त आदि धातु तथा उपधातु आदि पदार्थों का निर्माण तीन प्रकार से होता है-1. रस से रक्त, रक्त से मांस एवं मांस से मेदस् आदि। 2. 'तत्रैषां (धातूनां) अन्नपानरसः प्रीणयिता' तथा 3. 'तेषां (धातूनाम्) क्षयवृद्धी शोणितनिमित्ते' अर्थात् अन्नपान का रस ही सभी धातुओं का पोषण करता है और धातुओं का क्षय एवं वृद्धि रस से ही होती है। गर्भावतरण-क्रम कामान्मिथुनसंयोगे शुद्धशोणित-शुक्रजः। गर्भः सञ्जायते नार्याः स जातो बाल उच्यते ।। 16 ।। सन्तानोत्पत्ति अथवा आनन्द या रतिसुख की कामना से नारी एवं नर का उपस्थेन्द्रिय-विषयक संयोग होने पर शुद्ध शोणित एवं शुक्र के सम्मिलन से उत्पन्न होने वाला गर्भ नारी के गर्भाशय में प्रादुर्भूत होता है। वह जब जन्म लेता है तो 'बाल' कहा जाता है। वक्तव्य-नर और नारी के जोड़े का नाम 'मिथुन' है। इसकी उपस्थ = लिंग एवं योनि सम्बन्धी एक विशिष्ट क्रिया का नाम 'मैथुन' है। इस क्रिया से कभी-कभी अर्थात् जब कभी शुक्र और शोणित शुद्ध होते हैं, तो गर्भाधान हो जाता है। यह जब तक गर्भाशय में रहता है तब तक भ्रूण या गर्भ और जन्म होने पर 'शिशु' कहलाता है। पुत्र-कन्या की उत्पत्ति में कारण आधिक्ये रजसः कन्या पुत्रः शुक्राधिके भवेत्। नपुंसकं समत्वेन यथेच्छा पारमेश्वरी ।। 17 ।। गर्भाधान के समय प्रायः रजस् अर्थात् शोणित की अधिकता से कन्या शुक्र की अधिकता से पुत्र और रजस् एवं शुक्र की समता से नपुंसक की उत्पत्ति होती है, अथवा जैसी परमेश्वर की इच्छा हो। वक्तव्य- 'यथेच्छा पारमेश्वरी' कहने का तात्पर्य यह है कि कभी-कभी उक्त प्रकार के विपरीत साँप, बिच्छू आदि भी उत्पन्न हो जाते हैं। देखें-सु० शा० अ० 2। कुछ जिज्ञासु आधुनिक पाश्चात्य पद्धति के ग्रन्थों में शुक्रगत कीटाणुओं की चर्चा एवं चित्रों को देखकर पूछा करते हैं कि भारतीय अथवा आयुर्वेद साहित्य में शुक्र के कीटाणुओं की चर्चा है कि नहीं? इसका संक्षिप्त समाधान इस प्रकार है-पुराणों में लोक की उत्पत्ति का क्रम इस प्रकार कहा गया है-विष्णु भगवान् क्षीरसागर में सहस्रों फणों वाले शेषनाग पर शयन करते हैं और उनके पास लक्ष्मी एवं गरुड़ आदि भी विराजमान रहते हैं, उनकी नाभि से नाल निकलती है, उस पर कमल और कमल पर ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, उस समय सब ओर जल ही जल होता है इत्यादि और आयुर्वेद में 'एवमयं लोकसम्मितः पुरुषः' (च० शा० अ० 2.4)। अर्थात् इस प्रकार लोक के समान ही पुरुष भी है। तो अब विचार कीजिये, कि यह समानता किस प्रकार है-सातवीं धातु शुक्र क्षीरसागर है, उसमें सर्पाकार कीटाणु शेषनाग है, उसमें चेतनाधातु रूप (जीवात्मा) विष्णु हैं, बुद्धितत्त्व लक्ष्मी एवं मन गरुड़ है, अहंकार नारद है, जो वीणा बजाता हुआ उसकी स्तुति किया करता है। ये सभी सदैव भगवान् विष्णु के साथ ही रहते हैं- 'अतीन्द्रियैस्तैरतिसूक्ष्मरूपैः आत्मा कदाचित् न वियुक्तरूपः। न कर्मणा नैव मनो मतिभ्यां न चाप्यहङ्कारविकारदोषैः।।' (च० शा० अ० 2)। कर्मानुसार आत्मा अर्थात् भगवान् विष्णु गर्भाशय में प्रविष्ट हो जाता है अर्थात् गर्भाशय के किसी भाग में चिपक जाता है। उसकी नाभि से नाल अर्थात् गर्भनाल निकलती है, उस पर भ्रूण का शरीर बन जाता है, यह ब्रह्मा है। उस समय सब ओर गर्भोदक अर्थात् गर्भाशय में समुद्र-जल के समान खारा जल ही जल होता है। 'यथा लोकस्य सर्गादिस्तथा पुरुषस्य गर्भाधानम्' (च० शा० अ० 5)। अर्थात् जैसे लोक की सृष्टि होती है, वैसे ही पुरुष का गर्भाधान होता है। आशा है इस चर्चा से आपके प्रश्न का कुछ समाधान हो जायेगा। जातकर्म-संस्कार (जातमात्रस्य ताल्वोष्ठकण्ठनासाप्रमार्जनम्। कुर्यात् सतुलयाऽङ्गुल्या सर्पिःसैन्धवलिप्तया ।। 18 ।।)
56 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
56 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे जन्म के पश्चात् तत्काल धात्री (दाई) अपनी तर्जनी अंगुली पर रूई लपेट और उस पर बारीक पिसा हुआ सेंधा नमक तथा गोघृत पोतकर बालक के तालु, होंठ, कण्ठ तथा नाक के छिद्रों को भली-भाँति धीरे-धीरे साफ कर दें। ( अश्मनो वादनं चास्य कर्णमूले समाचरेत् । शीतलेनाथवोष्णेन जलेन परिषेचयेत् ।। 19 ।।) बालक के कानों के पास पत्थरों अथवा काँसे के पात्रों को बजाये और शीतल अथवा उष्ण जल के छींटें दे। ( संक्लेशविहतानेवं प्राणान् संल्लभते शिशुः । तथापि यद्यचेष्टः स्यात् शूर्पेण बीजयेच्च तम् ।। 20 ।।) इस प्रकार बालक जन्मकाल के क्लेश से नष्टप्राय प्राणों को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् श्वास लेने लगता है तथा हिलने-डुलने लग जाता है। इतने पर भी यदि बालक चेष्टारहीन ही पड़ा रहे तो सूप (छाज) से उसके मुख पर हवा करे। ( ततः प्रत्यागतप्राणं प्रकृतिस्थं समीक्ष्य च । पिताऽस्य दक्षिणे कर्णे मन्त्रमुच्चारयेदिमम् ।। 21 ।।) इसके पश्चात् जब बालक में पूर्णरूप से प्राणों का संचार होना प्रारम्भ हो जाये और वह प्रकृतिस्थ (स्वस्थ) दिखलायी पड़े, तब उसका पिता उसके दाहिने कान में नीचे दिये मन्त्र का उच्चारण करे। मन्त्र ( अङ्गादङ्गात् सम्भवसि हृदयादधिजायसे । आत्मा वै पुत्रनामासि त्वं जीव शरदां शतम् ।। 22 ।। शतायुः शतवर्षोऽसि दीर्घमायुरवाप्नुहि । नक्षत्राणि दिशो रात्रिरहश्च त्वाभिरक्षतु ।। 23 ।।) हे पुत्र ! तू मेरे अंग-अंग से उत्पन्न हुआ है और तू पुत्र नामधारी मेरी आत्मा है, तू सौ वर्ष पर्यन्त जीवित रह, तू सौ वर्ष तक सुख तथा हित आयु वाला हो, तू शतायु हो, बहुत लम्बी आयु को प्राप्त कर, नक्षत्र, दिशाएँ, रात्रि तथा दिन तुम्हारी रक्षा करें। नाल-छेदन मूर्ध्नि स्नेहपिचुं दत्त्वा नाड्याः कल्पनमाचरेत् । अष्टाङ्गुलमभिक्षाय बध्नीयाद् बन्धनद्वयम् ।। 24 ।। तन्मध्ये लोहकर्त्तर्या छेदयेल्लेपयेत् तथा । मधुमिश्रेण चाऽऽज्येन सूत्रं कण्ठेऽवसज्जयेत् ।। 25 ।। इसके पश्चात् बालक के शिर पर नवनीत अथवा तिलतैल से भिगोया हुआ रूई का टुकड़ा (फोहा) रख दें तथा नाल-छेदन का प्रबन्ध करे। उसकी विधि यह है-बालक की नाभिनाल को आठ अङ्गुल (नापकर) पर फिर एक अंगुल के अन्तर पर सूत के डोरे से दो बन्धनों से कस कर बाँध दे। फिर इन दोनों बन्धनों के बीच में से लोहे की कैंची से काट दे और घृत-मधु से लेप कर सूत के डोरे को बालक के गले में लटका दें। वक्तव्य-स्मरण रहे कि यदि माता के गर्भाशय से नाल निकल आयी हो तो उक्त प्रकार का एक ही बन्धन पर्याप्त होता है, अन्यथा दो बन्धन करने चाहिये। ( ततस्तैलस्तमभ्यज्य स्नापयेत् कोष्णवारिणा । रूप्यहेमप्रतप्तेन सर्वगन्धश्रुतेन वा ।। 26 ।।) इसके पश्चात् यथोचित तैल से मालिश करके चाँदी अथवा सुवर्ण को तपाकर और उसे जल में बुझाकर अथवा 'सर्वगन्ध' नामक गण के क्वथित जल से अथवा केवल गुनगुने जल से बालक को स्नान कराये। ( मन्त्रपूतेऽथ सस्वर्णे प्राशयेन्मधुसर्पिणी । ततः कुलोचिताऽऽचारैर्जातकर्म समाचरेत् ।। 27 ।।) इसके पश्चात् सुवर्ण भस्म मिलाकर अथवा सुवर्ण को घिसकर मधु तथा गोघृत मिलाकर बालक को चटाये। इसके पश्चात् अपने कुलाचारों के अनुसार 'जातकर्म' करे। वक्तव्य-देशाचार अथवा कुलाचार के अनुसार भिन्न- भिन्न प्रकार से जातकर्म एवं नामकरण आदि संस्कार किये जाते हैं। औषध-पान के पूर्व भिन्न-भिन्न प्रकार के मन्त्रों से औषधादि को अभिमन्त्रित किया जाता है। अपठित लोग केवल इष्टदेवता या ईश्वर का नाम-स्मरण कर लेते हैं, उनके वे ही मन्त्र होते हैं। अभिमन्त्रण-मन्त्र ( ॐ ब्रह्मदक्षाश्विरुद्रेन्द्र भूचन्द्रार्कानिलानलाः । ऋषयः सौषधिग्रामा भूतसङ्घाश्च पान्तु ते ।। 28 ।। रसायनमिवर्षीणां देवानामृतं यथा । सुधेवोत्तमनागानां भैषज्यमिदमस्तु ते ।। 29 ।।) तुम्हारा कल्याण हो, ब्रह्मा, दक्ष, अश्विनीकुमार, शंकर, इन्द्र, पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि, ऋषिगण, औषधियाँ एवं भूतगण तुम्हारी रक्षा करें। जैसे-ऋषियों को रसायन, देवताओं को अमृत और नागों को सुधा, वैसे ही यह औषध तुमको सुखदायक हो।
षष्ठोऽध्यायः] आहारादिगतिकथनम् 57 वक्तव्य-इसकी विस्तृत व्याख्या के लिए 'चन्द्रिका टीका युक्त चरकसंहिता' का सम्बन्धित प्रकरण देखें। स्त्री की देख-रेख (रजोवतीं गर्भवतीं च नारीं प्रसूयमानाम्अथ सम्प्रसूताम्। उपाचरेयुर्बहुशः प्रसूताः स्त्रियः सुशीलाः परिचारदक्षाः ॥30॥) रजस्वला, गर्भवती, प्रसवकाल में एवं प्रसूता स्त्री का उपचार, आहार-विहार एवं ओषधादि की व्यवस्था वे स्त्रियाँ करें, जो वृद्धा हों, जिनको बहुत बार प्रसव हुआ हो, जो सुशील हों और जो परिचार क्रिया में कुशल हों। प्रसूतासंज्ञा (प्रसूता सार्धमासान्ते दृष्टे वा पुनरार्तवे। सूतिका नाम हीना स्यादिति धन्वन्तरेर्मतम् ।।31।।) प्रसूता स्त्री डेढ़ मास के पश्चात् अथवा फिर आर्तव के दिखलायी पड़ने पर 'सूतिका या प्रसूता' संज्ञा से रहित हो जाती है। प्रसूता का आहार-विहार (प्रसूता हितमाहारं विहारं च समाचरेत्। व्यायामं मैथुनं क्रोधं शीतसेवा विवर्जयेत् ॥32॥) प्रसूता स्त्री उचित आहार तथा उचित विहार करे और व्यायाम, मैथुन, क्रोध एवं शीतल आहार आदि का परित्याग करे। बालक की स्तन्यपान विधि (तत्र माता प्रशस्ताङ्गी चारुवस्त्रा पुरोमुखी। उपविश्यासने सम्यक् दक्षिणं स्तनमम्बुना ।। 33 ।। प्रक्षाल्येषत्परिस्राव्य मन्त्राभ्यामभिमन्त्रितम्। उदङ्मुखं शिशुं क्रोडे शनैः सन्धार्थ पाययेत् ॥34॥) माता या धाई स्नानादि से स्वच्छ होकर सुन्दर वस्त्र पहन कर, पूर्व की ओर मुख करके आसन पर बैठकर, दाहिने स्तन को जल से भली-भाँति धोकर, थोड़ा दूध चुआकर निम्नलिखित मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर उत्तर की ओर मुख वाले बालक को धीरे से गोद में लेकर दूध पिलाये। अभिमन्त्रण मन्त्र (क्षीरनीरनिधिस्तेऽस्तु स्तनयोः क्षीरपूरकः। सदैव सुभगे बालो भवत्वेष महाबलः ॥35॥ पयोऽमृतसमं पीत्वा कुमारस्ते शुभानने। दीर्घमायुरवाप्नोतु देवा प्राप्यामृतं यथा ॥36॥) हे भाग्यवती ! तुम्हारे स्तनों में क्षीरसागर सदैव दूध भरता रहे, जिसे पीकर यह बालक बलशाली हो। हे सुमुखी ! तुम्हारे अमृत जैसे दूध को पीकर यह कुमार दीर्घायु को प्राप्त करे, जैसे अमृत को पाकर देनतागण दीर्घायु प्राप्त करते हैं। स्तन्य-प्रवृत्ति (नार्याः स्तन्यं त्रिरात्राद् वा चतुरात्रादनन्तरम्। प्रवर्त्तयन्ति विवृता धमन्यो हृदये स्थिताः ।। 37 ।।) प्रसव के तीसरे या चौथे दिन नारी को (पशु जाति को प्रसव के ही दिन) दूध उतरने लगता है और उस दूध को माता के हृदय से सम्बद्ध धमनियां सञ्चालित करती हैं। वक्तव्य-ये धमनियां वे हैं, जिनका 'द्वे स्तन्यं स्त्रिया वहतः स्तनयोः श्रिते'। (सु० शा० अ० 9 में) इस प्रकार वर्णन मिलता है। प्रसव के बाद तीन दिन के भीतर प्रसूता के स्तनों से पीला-सा लसीला द्रव निकलता है। माताओं का विश्वास है कि उसके पीने से बालक मर जाता है। अतः उसे धाय निकालकर स्तनों को धोकर शुद्ध दूध ही बालक को पिलाये। नवजात के लिए पेय (गुडं यवानिकां चैव पक्त्वा नीरे द्वितोलके। पादशेषं परिस्राव्य पिचुना पाययेत् शिशुम् ॥38॥) जब तक दूध न उतरे तब तक गुड़ तथा अजवायन को दो तोला जल में पकायें; चौथायी शेष रहने पर छानकर पिचु (रुई का फाहा) अथवा बत्ती द्वारा बालक को उक्त पेय पिलाये। दूध की कमी का कारण (अवात्सल्याद्भयाच्छोकात् क्रोधादत्यपतर्पणात्। स्त्रीणां स्तन्यं भवेत् स्वल्पं गर्भान्तरविधारणात् ॥ 39 ।।) कभी-कभी स्नेह के अभाव से, भय से, शोक से, क्रोध से, अत्यन्त भूखी रहने से अथवा दूसरा गर्भाधान हो जाने से स्त्रियों का दूध स्वल्प (थोड़ा) होने लगता है, जिससे बच्चे की तृप्ति नहीं होती। माता के दूध का विकल्प (क्षीरसात्म्यतया क्षीरमाजं गव्यमथापि वा। दद्यादास्तन्यपर्याप्तेर्बालेभ्यो वीक्ष्य मात्रया ।। 40 ।।) बालक को दूध ही 'सात्म्य' या अनुकूल होता है, इसलिये जिससे बालक की तृप्ति होती रहे, उतनी मात्रा में बकरी अथवा गाय का दूध देते रहना चाहिये।
58 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
शुद्ध दुग्ध के लक्षण ( नीरे क्षिप्तं यदेकिं स्यादविवर्णमतन्नुमत्। पाण्डुरं तनु शीतं च तद् दुग्धं शुद्धमादिशेत् ।। 41 ।। ) जो दूध धीरे से जल में डालने पर घुल जाये, जिसका वर्ण बिगड़ा न हो, जो चिपचिपा न हो, श्वेत हो पतला हो तथा शीत हो, वह दूध 'शुद्ध' होता है। बालक की परिचर्या विधि ( बालमङ्के सुखं दध्यान्न चैनं तर्जयेत् क्वचित्। सहसा बोधयेन्नैव नायोग्यमुपवेशयेत् ।। 42 ।। नाकृष्य स्थापयेत् क्रोडे न क्षिप्रं शयने क्षिपेत्। रोदयेन्न क्वचित् कार्ये विधिमावश्यकं विना ।। 43 ।। तच्चित्तमनुवर्त्तेत तं सदैवानुमोदयेत्। निम्नोच्चस्थानतः रक्षेपि बालं प्रयत्नतः ।। 44 ।। ) बालक को गोद में सुखपूर्वक रखे, इसे कभी झिड़की न दे, सोये को झटपट न जगाये, जब तक बैठने के योग्य न हो तब तक नहीं बैठाये, दूसरे से खींचकर गोद में न ले, बिस्तरे पर नहीं पटके, आवश्यक विधि (स्नान-अञ्जन-औषध- पानादि) के बिना कभी भी उसे नहीं रुलाये, उसके मन के अनुकूल वर्त्ताव करे, उसे सदैव प्रसन्न रखे और ऊँचे-नीचे स्थानों से प्रयत्नपूर्वक उसकी रक्षा करे। **वक्तव्य-**काश्यपसंहिता-जातकर्म्मोत्तराध्याय 12 तथा च० शा० अ० 8 में बालक के लिए बड़े ही सुन्दर खिलौनों का उल्लेख है। उसे देखिये और सम्भव हो तो उन्हें लाने की व्यवस्था करें। बालक का अन्नप्राशन ( यथोक्तविधिना बालं मासे षष्ठेऽष्टमेऽपि वा। अन्नं सम्प्राशयेत् किञ्चित् ततस्तद्वर्द्धयेत् क्रमात् ।। 45 ।। ) शास्त्रोक्त-विधि अथवा कुलाचार के अनुसार बालक का छठे अथवा आठवें मास में 'अन्नप्राशन' संस्कार करे, अर्थात् उसे अन्न खिलाना प्रारम्भ करे। प्रारम्भ में बहुत थोड़ा अन्न खिलाये, तत्पश्चात् क्रमशः बढ़ाते जायें। तीन प्रकार की अवस्था ( वयस्तु त्रिविधं बाल्यं मध्यमं वार्द्धकं तथा। ऊनषोडशवर्षस्तु नरो बालो निगद्यते ।। 46 ।। मध्ये षोडशसप्तत्योर्मध्यमः कथितो बुधैः। ततस्तु सप्ततेरूर्ध्वं वृद्धो भवति मानवः ।। 47 ।। ) 'वयस्' (अवस्था) तीन प्रकार का होता है, यथा-
- बाल्य, 2. मध्यम और 3 वार्द्धक। जन्म से 16 वर्ष तक 'बाल' कहलाता है, अर्थात् 'बाल्य-अवस्था' होती है। 16 और 70 के भीतर 'मध्यम' अवस्था होती है और 70 से ऊपर मनुष्य 'वृद्ध' हो जाता है। वक्तव्य-'शतायुर्वे पुरुषः' के अनुसार पुरुषों की आयु 100 वर्ष का मानी गयी है। उसी के अनुसार उक्त तीन भेद होते हैं। देखें-च० वि० अ० 8। अवस्था-क्रम से दोष-विचार ( बाल्ये विवर्द्धते श्लेष्मा पित्तं स्यान्मध्यमेऽधिकम्। वार्द्धके वर्द्धते वायुर्विचार्यैतदुपक्रमेत् ।। 48 ।। ) बाल्य अवस्था में कफ बढ़ता है, मध्यम अवस्था में पित्त अधिक हो जाता है और वृद्धावस्था में वायु बढ़ता है। इसको विचार कर चिकित्सा की व्यवस्था करनी चाहिये। औषधमात्रा-विचार बालस्य प्रथमे मासि देया भेषजरक्तिका ।। 49 ।। अवलेहीकृतैकैव क्षीरक्षौद्रसिताघृतैः। वर्धयेत् तावदेकैकां यावद् भवति वत्सरः ।। 50 ।। माषैर्वृद्धिस्तदूर्ध्वं स्याद् यावत् षोडशवत्सरः। ततः स्थिरा भवेत् तावद् यावद्वर्षाणि सप्ततिः ।। 51 ।। ततो बालकवन्मात्रा ह्रासनीया शनैः शनैः। मात्रेयं कल्कचूर्णानां कषायाणां चतुर्गुणा ।। 52 ।। बालक को प्रथम मास में काष्ठ औषधि की एक रत्तीभर मात्रा दूध, शहद, चीनी एवं घी के साथ मिला चाटने योग्य बनाकर देनी चाहिये। इसके पश्चात् एक-एक रत्ती मात्रा बढ़ाते जाना चाहिये जब तक एक वर्ष पूर्ण न हो जाये। इसके पश्चात् एक-एक माशा मात्रा बढ़ाना चाहिये, जब तक बालक सोलह वर्ष का न हो जाये। इसके पश्चात् सत्तर वर्ष तक इस मात्रा को स्थिर रखना चाहिये। इसके पश्चात् बालक की मात्रा के समान धीरे-धीरे मात्रा को घटाना चाहिये। यह मात्रा कल्क एवं चूर्ण औषधों की है। कषायों अर्थात् स्वरस, क्वाथ, फाण्ट एवं हिम की मात्रा उक्त मात्रा से चौगुनी होनी चाहिये। **वक्तव्य-**यह संकेत मात्र है। वस्तुतः रोग, रोगी एवं औषध केबल को देखकर देश-कालादि के अनुसार मात्रा की व्यवस्था करना उचित है। बालक को यथासम्भव मधुर, मृद्वीर्य, लघु, सुगन्धियुक्त, शीत एवं कल्याणकारी औषधियों का प्रयोग कराना चाहिये।
षष्ठोऽध्यायः ] आहारादिगतिकथनम् 59 बालकोचित-उपचार अञ्जनं च तथा लेपः स्नानमभ्यङ्गकर्म च। वमनं प्रतिमर्शश्च जन्मप्रभृति शस्यते।।53।। अञ्जन अर्थात् सुरमा एवं काजल, लेप (उबटन), स्नान, अभ्यङ्ग (मालिश), वमन, प्रतिमर्श नामक नस्य (देखें-उ० खं० अ० 8) का प्रयोग जन्मकाल से ही किया जा सकता है। प्रमुख उपचारों में काल की अवधि कवलः पञ्चमाद् वर्षादष्टमान्नस्यकर्म च। विरेकः षोडशाद् वर्षाद विंशतेश्चैव मैथुनम्।।54।। कवल एवं गण्डूष का प्रयोग पाँचवें वर्ष के पश्चात्, नस्यकर्म का प्रयोग आठवें वर्ष के पश्चात्, विरेचन का प्रयोग सोलहवें वर्ष के पश्चात् और मैथुन का सेवन बीसवें वर्ष के पश्चात् करना उचित होता है। अञ्जन-प्रयोग (सौवीरमञ्जनं नित्यं हितमक्ष्णोस्ततो भजेत्। पञ्चरात्रेऽष्टरात्रे वा स्त्रावणार्थे रसाञ्जनम्।।55।।) काला तथा सफेद सुरमा आँखों के लिए लाभदायक होता है। अतः प्रतिदिन उसका सेवन करना चाहिये, क्योंकि आँख को श्लेष्मा से उत्पन्न होने वाले (मोतिया) रोग से भय रहता है। अतः श्लेष्मा के स्रावण के लिए पाँचवें तथा आठवें दिन रात के समय रसवत का सेवन अवश्य करना चाहिये। उबटन (उर्द्धत्तनं कफहरं मेदसः प्रविलापनम्। स्थिरीकरणमङ्गानां त्वक् प्रसादकरं परम्।।56।।) उबटन कफ को हरता है, मेदा को घटाता है, अङ्गों को स्थिर (सबल) करता है और त्वचा को अत्यन्त प्रसन्न अर्थात् कान्तियुक्त बनाता है। स्नान (पवित्रं वृष्यमायुष्यं श्रमस्वेदमलापहम्। शरीरबलसन्धानं स्नानमोजस्करं परम्।।57।।) स्नान अन्तर्रात्मा को पवित्र करता है, वीर्य तथा आयु को बढ़ाता है, थकावट, पसीना एवं मल को नष्ट करता है। शरीर में बल देता है और ओजस् को बढ़ाने में सर्वोत्तम है। अभ्यङ्ग (अभ्यङ्गमाचरेन्नित्यं स जरा-श्रमवातहा। दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुः स्वप्नसुत्वक्त्वदार्ढ्यकृत्।।58।।) अभ्यङ्ग (तैल की मालिश) प्रतिदिन करनी चाहिये,
वह जरा (बुढ़ापा), थकावट और वायु को नष्ट करता है, दृष्टि की प्रसन्नता, पुष्टि, आयु, निद्रा, त्वचा की सुन्दरता एवं शरीर की दृढ़ता को बनाये रखता है। व्यायाम (लाघवं कर्मसामर्थ्यं दीप्तोऽग्निर्मेदसः क्षयः। विभक्तघनगात्रत्वं व्यायामादुपजायते।।59।।) उचित व्यायाम करने से शरीर में हल्कापन, काम करने की शक्ति, जठराग्नि की वृद्धि, मेदा का क्षय तथा प्रत्येक अंग सुडौल एवं सुगठित हो जाता है। मैथुन (वयोरूपगुणोपेतां तुल्यशीलां गुणान्विताम्। अभिकामोऽभिकामां तु हृष्टो हृष्टामलङ्कृताम्।।60।। सेवेत प्रमदां युक्त्या वाजीकरणबृंहितः। अतिस्त्रीसम्प्रयोगाच्च रक्षेदात्मानमात्मवान्।।61।।) मैथुनाभिलाषी पुरुष प्रसन्नचित्त तथा वाजीकरण (शक्तिवर्द्धक) द्रव्यों का सेवन करके युक्तिपूर्वक स्त्री-सहवास करे। स्त्री कैसी हो? वयस् तथा रूप आदि गुणों से युक्त समान स्वभाव वाली, सद्गुणों से युक्त, मैथुनाभिलाषिणी, प्रसन्नचित्त, भूषणों से भूषित तथा प्रमदा हो। किन्तु आत्मवान् (आत्मबल से युक्त संयमी) पुरुष अपने को अधिक स्त्री- सहवास से बचाता रहे। ह्रास-क्रम बाल्यं वृद्धिश्चर्विर्मेधा त्वग्दृष्टिः शुक्रविक्रमौ। बुद्धिः कर्मेन्द्रियं चेतो जीवितं दशतो हसेत्।।62।। जन्म से प्रति दस वर्ष के अनन्तर निम्नलिखित भावों का ह्रास होता जाता है। यथा-बाल्य (बालकपन), वृद्धि (शरीर का बढ़ना), वपुः (आकृति का सौन्दर्य), मेधा (धारणाशक्ति), त्वचा की सद्गुणता, दृष्टि (दर्शनशक्ति), शुक्र अर्थात् मैथुन- सामर्थ्य या गर्भधान-सामर्थ्य, विक्रम, पराक्रम, बुद्धि, हस्तपादादि कर्मेन्द्रियाँ, चेतस् या 'मनस्' और जीवित (जीवन) का। वक्तव्य-भावमिश्र ने अपने ग्रन्थ में उक्त 'दशतः' के स्थान पर 'क्रमतः' पद उद्धृत किया है। उक्त विधि से मानव की आयु 120 वर्ष की हो जाती है, किन्तु 'शतायुर्वे पुरुषः' 'जीवेम शरदः शतम्'-इस प्रकार वेदों में तथा 'वर्षशतं खलु आयुषः प्रमाणम्' (च० शा० अ० 6)। चरकसंहिता में मानव की आयु 100 वर्ष ही कही गयी है। आप भी विचार करें।
60 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
[वाम स्तम्भ / Left Column]
प्रकृति का कारण (शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद्दोष उत्कटः। प्रकृतिर्जायते तेन तस्या मे लक्षणं शृणु ।। 63 ।।) गर्भाधान के समय शुक्र एवं शोणित के संयोग में जो दोष (वात, पित्त एवं कफ) उत्कट अर्थात् बढ़ा हुआ होता है, उसके प्रभाव से 'प्रकृति' उत्पन्न होती है। उसका लक्षण मुझसे सुनो।
वात-प्रकृति का लक्षण अल्पकेशः कृशो रूक्षो वाचालश्चलमानसः। आकाशचारी स्वप्नेषु वातप्रकृतिको नरः।। 64 ।। जिसके केश छोटे-छोटे हों, शरीर कृश तथा रूक्ष हो, जो वाचाल या बकवादी हो, जिसका मन चञ्चल हो और स्वप्नों में आकाश में उड़ा करे, वह पुरुष 'वातप्रकृति' होता है।
पित्त-प्रकृति का लक्षण अकालपलितैर्व्याप्तो धीमान् स्वेदी च रोषणः। स्वप्नेषु ज्योतिषां द्रष्टा पित्तप्रकृतिको नरः।। 65 ।। जिसके बाल (केश एवं दाढ़ी-मूँछ) अकाल या युवावस्था में ही श्वेत हो जायें, जो बुद्धिमान् हो, जिसे पसीना अधिक हो, जो क्रोधी हो तथा स्वप्नों में ज्योति या चमकने वाले तारे, बिजली आदि को देखा करे, वह मनुष्य 'पित्तप्रकृति' होता है।
कफ-प्रकृति का लक्षण गम्भीरबुद्धिः स्थूलाङ्गः स्निग्धकेशो महाबलः। स्वप्ने जलाशयालोकी श्लेष्मप्रकृतिको नरः।। 66 ।। जिसकी बुद्धि गम्भीर हो, शरीर मोटा हो, केश चिकने हों, जो बलवान् हो और स्वप्नों में जलाशयों (झील, तालाब आदि) को देखा करे, वह पुरुष 'कफप्रकृति' होता है।
मिश्रित प्रकृति का लक्षण ज्ञातव्या मिश्रचिह्नैश्च द्वित्रिदोषोल्बणा नराः। उपरिलिखित चिह्नों के मिश्रण से द्विदोष-प्रकृति तथा त्रिदोष-प्रकृति जानी जाती है।
निद्रा, मूर्च्छा, भ्रम एवं तन्द्रा का कारण तमः कफाभ्यां निद्रा स्यान्मूर्च्छा पित्ततमोभवा ।। 67 ।। रजःपित्तानिलैर्भ्रान्तिस्तन्द्रा श्लेष्मतमोनिलैः। तमोगुण एवं कफ की अधिकता से 'निद्रा' या 'नींद' पित्त तथा तमोगुण की अधिकता से 'मूर्च्छा' या बेहोशी; रजोगुण, पित्त एवं वायु की अधिकता से 'भ्रान्ति' या भ्रम
[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]
और कफ, तमोगुण तथा वायु की अधिकता से 'तन्द्रा' या 'उँघायी' उत्पन्न होती है।
ग्लानि और आलस्य का लक्षण ग्लानिरोजःक्षयाद्दुःखादजीर्णाच्च श्रमाद्भवेत्।। 68 ।। यः सामर्थ्येऽप्यनुत्साहस्तदालस्यमुदीर्यते। ओजस् के क्षय से, दुःख से, अनपच से एवं थकावट से ग्लानि या सुस्ती होती है। सामर्थ्य (शक्ति) होने पर भी जो किसी काम को करने का उत्साह (हौसला) नहीं होता, उसे 'आलस्य' कहते हैं। वक्तव्य—'ग्लानि' हर्ष (उल्लास) के क्षय का नाम है।
जृम्भा का लक्षण चैतन्यशैथिल्यत्वाद् यः पीत्वैकं श्वासमुद्गमेत्।। 69 ।। विदीर्णवदनः श्वासं जृम्भा सा कथ्यते बुधैः। चेतनाशक्ति के शिथिल होने से मुँह खोलकर जो एक लम्बा साँस लेकर फिर छोड़ा जाता है, उसे 'जृम्भा' या 'जँभाई' कहते हैं।
छींक का कारण और लक्षण उदानप्राणयोरूर्ध्वयोगान्मौलिखस्रवात् ।। 70 ।। शब्दः सञ्जायते नस्तः क्षुतं तत् कथ्यते बुधैः। उदानवायु तथा प्राणवायु का ऊर्ध्वभाग (शृंगाटक मर्म) में संयोग होने के कारण शिर में स्थित कफ का स्राव होने से नाक द्वारा जो छीं-छीं ऐसा शब्द होता है, उसे 'क्षुत' या छींक कहते हैं।
उद्गार का कारण तथा लक्षण उदानकोपादाहारसुस्थिरत्वाच्च यद् भवेत्।। 71 ।। पवनस्योर्ध्वगमनं तमुद्गारं प्रचक्षते। उदानवायु के कोप के कारण अथवा आमाशय में भोजन के स्थित होने से वायु को जो ऊर्ध्वगमन (ऊपर को उठना और मुखमार्ग से निकलना) होता है, उसे 'उद्गार' या डकार कहते हैं।
निद्रा का कारण और लक्षण (यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः क्लमान्विताः ।। 72 ।। विषयेभ्यो निवर्त्तन्ते तदा स्वपिति मानवः।) मन के क्रियाहीन हो जाने पर जब चक्षुः आदि इन्द्रियाँ अपने-अपने रूप आदि विषयों को ग्रहण करने से निवृत्त हो जाती हैं, तब मानव सोता है, यही 'निद्रा' कही जाती है।
वक्तव्य—इससे भिन्न मूर्च्छा होती है। देखें-माधवनिदान
षष्ठोऽध्यायः ] आहारादिगतिकथनम् 61 वक्तव्य—इससे भिन्न मूर्च्छा होती है। देखें-माधवनिदान तथा च० सू० अ० 24। उत्क्लेश का कारण और लक्षण (उत्क्लिश्यान्नं न निर्गच्छेत् प्रसेकष्ठीवनेरितम् ।। 76 ।। हृदयं पीड्यते चास्य तमुत्क्लेशं विनिर्दिशेत्।) जिससे उदर में से अन्न निकलना चाहता है, किन्तु निकलता नहीं, मुख में पानी जाता है, बार-बार थूक आता है एवं हृदय में पीड़ा होती है, उसे 'उत्क्लेश' (जी मिचलाना या मिचली आना) कहते हैं। भ्रम का कारण और लक्षण (चक्रवद् भ्रमतो लोकान् स्वात्मानं मन्यते तथा ।। 73 ।। उत्थाने चाऽसमर्थः स्यात् यस्मात्स वै भ्रमः स्मृतः ।) जिससे संसार के सभी पदार्थ चक्र के समान घूमते से दिखलायी पड़ें और मनुष्य अपने को भी वैसा ही माने तथा जिससे मनुष्य खड़ा रहने में भी असमर्थ हो जाये, उसका नाम 'भ्रम' या चक्कर आना है। तन्द्रा का कारण और लक्षण (इन्द्रियार्थेष्वसंवित्तिर्गौरवं जृम्भणं क्लमः ।। 74 ।। निद्रार्त्तस्येव यस्येहा तस्य तन्द्रां विनिर्दिशेत्।) जिसको रूपादि विषयों का सम्यक् ज्ञान न हो, शरीर में भारीपन हो, जम्भाइयाँ आ रही हों, सुस्ती हो तथा उँघाई आती हो, उसकी इस व्याधि को 'तन्द्रा' कहते हैं। ग्लानि का कारण और लक्षण (वक्त्रे मधुरता तन्द्रा हृदयोद्वेष्टनं भ्रमः ।। 77 ।। न चान्नमभिकाङ्क्षेत ग्लानिं तस्य विनिर्दिशेत्।) जिससे मुख में मीठापन, तन्द्रा, हृदय में ऐंठन, भ्रम एवं अन्न में अरुचि हो, उसे 'ग्लानि' कहते हैं। गौरव का कारण और लक्षण (आर्द्रचर्मावनद्धं हि यो गात्रमभिमन्यते । तथा गुरु शिरोऽत्यर्थं गौरवं तद् विनिर्दिशेत् ।। 78 ।।) इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे आहारादिगतिकथनं नाम षष्ठोऽध्यायः ।। 6 ।। जिससे रोगी शरीर को आर्द्र चर्म (गीला चमड़ा) से बँधा हुआ-सा और शिर को अत्यन्त भारी-सा अनुभव करता हो, उसे 'गौरव' कहते हैं। क्लम का कारण और लक्षण (योजनायासः श्रमो देहे प्रवृद्धः श्वासवर्जितः ।। 75 ।। क्लमः स इति विज्ञेय इन्द्रियार्थप्रबाधकः ।) जिससे बलपूर्वक कार्य किये बिना शरीर में 'श्रम' (थकावट) बढ़ जाता है, किन्तु श्वास में किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता, इन्द्रियों द्वारा विषयों के ग्रहण में बाधा पड़ती है, उसे 'क्लम' जानना चाहिये। इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका-व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का छठा अध्याय समाप्त ।। 6 ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA