शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
कैलाससंहिता
कैलाससंहिता
ऋषियोंका सूतजीसे तथा वामदेवजीका स्कन्दसे प्रश्न—प्रणवार्थ-निरूपणके लिये अनुरोध
नमः शिवाय साम्बाय सगणाय ससूनवे।
प्रधानपुरुषेशाय सर्गस्थित्यन्तहेतवे॥
जो प्रधान (प्रकृति) और पुरुषके नियन्ता तथा सृष्टि, पालन और संहारके कारण हैं, उन पार्वतीसहित शिवको उनके पार्षदों और पुत्रोंके साथ प्रणाम है।
ऋषि बोले—सूतजी! हमने अनेक आख्यानोंसे युक्त परम मनोहर उमासंहिता सुनी। अब आप शिवतत्त्वका ज्ञान बढ़ानेवाली कैलाससंहिताका वर्णन कीजिये।
व्यासजीने कहा—पुत्रो! शिवतत्त्वका प्रतिपादन करनेवाली दिव्य कैलास-संहिताका वर्णन करता हूँ, तुम प्रेमपूर्वक सुनो। तुम्हारे प्रति स्नेह होनेके कारण ही मैं तुम्हें यह प्रसंग सुना रहा हूँ।
इतना कहकर व्यासजीने काशीमें मुनियोंके तथा सूतजीके संवाद, व्यास-मुनि-संवाद, शिव-पार्वती-संवाद, शिवजीके द्वारा पार्वतीके प्रति संन्यास-पद्धति, संन्यासाचार, संन्यास-मण्डल, संन्यास-पद्धतिन्यास, वर्णपूजन, प्रणवार्थ-पद्धति आदि प्रसंगोंका वर्णन करके पुनः ऋषिगण तथा सूतजीके मिलन एवं संवादकी अवतारणा करते हुए सूतजीके प्रति ऋषियोंके प्रश्नका यों वर्णन किया।
ऋषि बोले—महाभाग सूतजी! आप हमारे श्रेष्ठ गुरु हैं। अतः यदि आपका हमपर अनुग्रह हो तो हम आपसे एक प्रश्न पूछते हैं। श्रद्धालु शिष्योंपर आप-जैसे गुरुजन सदा स्नेह रखते हैं, इस बातको आपने इस समय हमें प्रत्यक्ष दिखा दिया। मुने! विरजाहोमके समय पहले आपने जो वामदेवका मत सूचित किया था, उसे हमने विस्तारपूर्वक नहीं सुना। अब हम बड़े आदर और श्रद्धाके साथ उसे सुनना चाहते हैं। कृपासिन्धो! आप प्रसन्नतापूर्वक उसका वर्णन करें।
ऋषियोंकी यह बात सुनकर सूतके शरीरमें रोमांच हो आया। उन्होंने गुरुके भी परम उत्कृष्ट गुरु महादेवजीको, त्रिभुवन-जननी महादेवी उमाको तथा गुरु व्यासको भी भक्तिपूर्वक नमस्कार करके मुनियोंको आह्लादित करते हुए गम्भीर वाणीमें इस प्रकार कहा।
सूतजी बोले—मुनियो! तुम्हारा कल्याण हो, तुम सब लोग सदा सुखी रहो। महाभाग महात्माओ! तुम भगवान् शिवके
* कैलाससंहिता * ६२७
भक्त तथा दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करने- वाले हो, यह निश्चितरूपसे जानकर ही मैं तुम लोगोंके समक्ष इस विषयका प्रसन्नता- पूर्वक वर्णन करता हूँ। ध्यान देकर सुनो। पूर्वकालके रथन्तर कल्पमें महामुनि वामदेव माताके गर्भसे बाहर निकलते ही शिवतत्त्वके ज्ञाताओंमें सर्वश्रेष्ठ माने जाने लगे। वे वेदों, आगमों, पुराणों तथा अन्य सब शास्त्रोंके भी तात्त्विक अर्थको जाननेवाले थे। देवता, असुर तथा मनुष्य आदि जीवोंके जन्म- कर्मोंका उन्हें भलीभाँति ज्ञान था। उनका सम्पूर्ण अंग भस्म लगानेसे उज्ज्वल दिखायी देता था। उनके मस्तकपर जटाओंका समूह शोभा देता था। वे किसीके आश्रित नहीं थे। उनके मनमें किसी वस्तुकी इच्छा नहीं थी। वे शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे परे तथा अहंकारशून्य थे। वे दिगम्बर महाज्ञानी महात्मा दूसरे महेश्वरके समान जान पड़ते थे। उन्हींके-जैसे स्वभाववाले बड़े-बड़े मुनि शिष्य होकर उन्हें घेरे रहते थे। वे अपने चरणोंके स्पर्शजनित पुण्यसे इस पृथ्वीको पवित्र करते हुए सब ओर विचरते और अपने चित्तको निरन्तर परमधामस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें लगाये रहते थे। इस तरह घूमते हुए वामदेवजीने मेरुके दक्षिण शिखर— कुमारशृंगमें प्रसन्नतापूर्वक प्रवेश किया, जहाँ मयूरवाहन शिवकुमार, ज्ञानमय शक्ति धारण करनेवाले, समस्त असुरोंके नाशक और सर्वदेव-वन्दित भगवान् स्कन्द रहते थे। उनके साथ उनकी शक्तिभूता 'गजावल्ली' भी थीं। वहीं स्कन्दसरके नामसे प्रसिद्ध एक सरोवर था, जो समुद्रके समान अगाध एवं विशाल दिखायी देता था। उसका जल ठंडा और स्वादिष्टथा। वह सरोवर स्वच्छ, अगाध एवं बहुत जलराशिसे पूर्ण था। उसमें सम्पूर्ण आश्चर्यजनक गुण विद्यमान थे। वह जलाशय स्कन्दस्वामीके समीप ही था। महामुनि वामदेवने शिष्योंके साथ उसमें स्नान करके शिखरपर बैठे हुए मुनिवृन्द- सेवित कुमारका दर्शन किया। वे उगते हुए सूर्यके समान तेजस्वी थे। मोर उनका श्रेष्ठ वाहन था। उनके चार भुजाएँ थीं। सभी अंगोंसे उदारता सूचित होती थी। मुकुट आदि उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। रत्नभूत दो शक्तियाँ उनकी उपासना करती थीं। उन्होंने अपने चार हाथोंमें क्रमशः शक्ति, कुक्कुट, वर और अभय धारण कर रखे थे। स्कन्दका दर्शन और पूजन करके उन मुनीश्वरने बड़ी भक्तिसे उनका स्तवन आरम्भ किया।
वामदेव बोले—जो प्रणवके वाच्यार्थ, प्रणवार्थके प्रतिपादक, प्रणवाक्षररूप बीजसे युक्त तथा प्रणवरूप हैं, उन आप स्वामी कार्तिकेयको बारंबार नमस्कार है। वेदान्तके अर्थभूत ब्रह्म ही जिनका स्वरूप है, जो वेदान्तका अर्थ करते हैं, वेदान्तके अर्थको जानते हैं और नित्य विदित हैं, उन स्कन्दस्वामीको बारंबार नमस्कार है। समस्त प्राणियोंकी हृदयगुफामें प्रतिष्ठित गुहको नमस्कार है। जो स्वयं गुह्य हैं, जिनका रूप गुह्य है तथा जो गुह्य शास्त्रोंके ज्ञाता हैं, उन स्वामी कार्तिकेयको नमस्कार है। प्रभो! आप अणुसे भी अत्यन्त अणु और महान्से भी परम महान् हैं, कारण और कार्य अथवा भूत और भविष्यके भी ज्ञाता हैं। आप परमात्मस्वरूपको नमस्कार है। आप स्कन्द (माताके गर्भसे च्युत) हैं। स्कन्दन (गर्भसे
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* संक्षिप्त शिवपुराण *
स्खलन) ही आपका रूप है। आप सूर्य और अरुणके समान तेजस्वी हैं। पारिजातकी मालासे सुशोभित, मुकुट आदि धारण करनेवाले आप स्कन्दस्वामीको सदा नमस्कार है। आप शिवके शिष्य और पुत्र हैं, शिव (कल्याण) देनेवाले हैं, शिवको प्रिय हैं तथा शिवा और शिवके लिये आनन्दकी निधि हैं। आपको नमस्कार है। आप गंगाजीके बालक, कृत्तिकाओंके कुमार, भगवती उमाके पुत्र तथा सरकंडोंके वनमें शयन करनेवाले हैं। आप महाबुद्धिमान् देवताको नमस्कार है। षडक्षरमन्त्र आपका शरीर है। आप छह प्रकारके अर्थका विधान करनेवाले हैं। आपका रूप छह मार्गोंसे परे है। आप षडाननको बारंबार नमस्कार है। द्वादशात्मन्! आपके बारह विशाल नेत्र और बारह उठी हुई भुजाएँ हैं। उन भुजाओंमें आप बारह आयुध धारण करते हैं। आपको नमस्कार है। आप चतुर्भुजरूपधारी, शान्त तथा चारों भुजाओंमें क्रमशः शक्ति, कुक्कुट, वर और अभय धारण करते हैं। आप असुरविदारण देवको नमस्कार है। आपका वक्षःस्थल गजावल्लीके कुचोंमें लगे हुए कुंकुमसे अंकित है। अपने छोटे भाई गणेशजीकी आनन्दमयी महिमा सुनकर आप मन-ही-मन आनन्दित होते हैं। आपको नमस्कार है। ब्रह्मा आदि देवता, मुनि और किंनरगणोंसे गायी जानेवाली गाथाविशेषके द्वारा जिनके पवित्र कीर्तिधामका चिन्तन किया जाता है, उन आप स्कन्दको नमस्कार है। देवताओंके निर्मल किरीटको विभूषित करनेवाली पुष्प-मालाओंसे आपके मनोहर चरणारविन्दोंकी पूजा की जाती है। आपको नमस्कार है। जो वामदेवद्वारा वर्णित इस दिव्य स्कन्दस्तोत्रका पाठ या श्रवण करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। यह स्तोत्र बुद्धिको बढ़ानेवाला, शिवभक्तिकी वृद्धि करनेवाला, आयु, आरोग्य तथा धनकी प्राप्ति करानेवाला और सदा सम्पूर्ण अभीष्टको देनेवाला है।*
वामदेवने इस प्रकार देवसेनापति भगवान् स्कन्दकी स्तुति करके तीन बार
* वामदेव उवाच—
ॐ नमः प्रणवार्थाय प्रणवार्थविधायिने। प्रणवाक्षरबीजाय प्रणवाय नमो नमः॥
वेदान्तार्थस्वरूपाय वेदान्तार्थविधायिने। वेदान्तार्थविदे नित्यं विदिताय नमो नमः॥
नमो गुहाय भूतानां गुहासु निहिताय च। गुह्याय गुह्यरूपाय गुह्यागमविदे नमः॥
अणोरणीयसे तुभ्यं महतोऽपि महीयसे। नमः परावरज्ञाय परमात्मस्वरूपिणे॥
स्कन्दाय स्कन्दरूपाय मिहिरारुणतेजसे। नमो मन्दारमालोद्यन्मुकुटादिभृते सदा॥
शिवशिष्याय पुत्राय शिवस्य शिवदायिने। शिवप्रियाय शिवयोरानन्दनिधये नमः॥
गाङ्गेयाय नमस्तुभ्यं कार्तिकेयाय धीमते। उमापुत्राय महते शरकाननशायिने॥
षडक्षरशरीराय षड्विधार्थविधायिने। षडध्वातीतरूपाय षण्मुखाय नमो नमः॥
द्वादशायतनेत्राय द्वादशोद्यतबाहवे। द्वादशायुधधराय द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥
चतुर्भुजाय शान्ताय शक्तिकुक्कुटधारिणे। वरदाभयहस्ताय नमोऽसुरविदारिणे॥
गजावल्लीकुचालिप्तकुङ्कुमाङ्कितवक्षसे। नमो गजाननानन्दमहिमानन्दितात्मने॥
* कैलाससंहिता *
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उनकी परिक्रमा की और पृथ्वीपर दण्डकी भाँति गिरकर नतमस्तक हो बारंबार साष्टांग प्रणाम और परिक्रमा करनेके अनन्तर वे विनीतभावसे उनके पास खड़े हो गये। वामदेवजीके द्वारा किये गये इस परमार्थपूर्ण स्तोत्रको सुनकर महेश्वरपुत्र भगवान् स्कन्द बड़े प्रसन्न हुए। उस समय वे महासेन वामदेवजीसे बोले—'मुने! मैं तुम्हारी की हुई पूजा, स्तुति और भक्तिसे तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। आज मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य सिद्ध करूँ? तुम योगियोंमें प्रधान, सर्वथा परिपूर्ण और निःस्पृह हो। इस जगत्में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसके लिये तुम-जैसे वीतराग महर्षि याचना करें; तथापि धर्मकी रक्षा और सम्पूर्ण जगत्पर अनुग्रह करनेके लिये तुम-जैसे साधु-संत भूतलपर विचरते रहते हैं। ब्रह्मन्! यदि इस समय मुझसे कुछ सुनना हो तो कहो; मैं लोकपर अनुग्रह करनेके लिये उस विषयका वर्णन करूँगा।'
स्कन्दकी वह बात सुनकर महामुनि वामदेवने विनयावनत हो मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा।
वामदेव बोले—भगवन्! आप परमेश्वर हैं। अलौकिक और लौकिक—सब प्रकारकी विभूतियोंके दाता हैं। सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, सम्पूर्ण शक्तियोंको धारण करनेवाले और सबके स्वामी हैं। हम साधारण जीव हैं। आप परमेश्वरके समीप बोलनेकी शक्ति या बात करनेकी योग्यता हममें नहीं है; तथापि यह आपका अनुग्रह है कि आप मुझसे बात करते हैं। महाप्राज्ञ! मैं कृतार्थ हूँ। कणमात्र विज्ञानसे प्रेरित हो आपके समक्ष अपना प्रश्न रख रहा हूँ। मेरे इस अपराधको आप क्षमा करेंगे! प्रणव सबसे उत्तम मन्त्र है। वह साक्षात् परमेश्वरका वाचक है। पशुओं (जीवों)-के पाश (बन्धन)-को छुड़ानेवाले भगवान् पशुपति ही उसके वाच्यार्थ हैं। 'ओमितीदं सर्वम्' (तै० उ० १।८।१)—ओंकार ही यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला समस्त जगत् है, यह सनातन श्रुतिका कथन है। 'ओमिति ब्रह्म' (तै० उ० १।८।१) अर्थात् 'ॐ यह ब्रह्म है' तथा 'सर्वं ह्येतद् ब्रह्म' (माण्डू० २)—'यह सब-का-सब ब्रह्म ही है।' इत्यादि बातें भी श्रुतियोंद्वारा कही गयी हैं। इस प्रकार मैंने समष्टि तथा व्यष्टिभावसे प्रणवार्थका श्रवण किया है। तात्पर्य यह है कि समष्टि और व्यष्टि—सभी पदार्थ प्रणवके ही अर्थ हैं, प्रणवके द्वारा सबका प्रतिपादन होता है—यह बात मैंने सुन रखी है। महासेन! मुझे कभी आप-जैसा गुरु नहीं मिला है, अतः कृपा करके आप प्रणवके अर्थका प्रतिपादन कीजिये। उपदेशकी विधिसे तथा सदाचारपरम्पराको ध्यानमें रखकर आप हमें प्रणवार्थका उपदेश दें।
मुनिके इस प्रकार पूछनेपर स्कन्दने प्रणवस्वरूप, अड़तीस श्रेष्ठ कलाओंद्वारा
ब्रह्मादिदेवमुनिकिन्नरगीयमानगाथाविशेषशुचिचिन्तितकीर्तिधाम्ने। वृन्दारकामलकिरीटविभूषणस्रक्पूज्याभिरामपदपङ्कज ते नमोऽस्तु॥
इति स्कन्दस्तवं दिव्यं वामदेवेन भाषितम्। यः पठेच्छृणुयाद्वापि स याति परमां गतिम्॥
महाप्रज्ञाकरं ह्येतच्छिवभक्तिविवर्धनम्। आयुरारोग्यधनकृत्सर्वकामप्रदं सदा॥
(शि० पु० कै० सं० ११। २२–३५)
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लक्षित तथा सदा पार्श्वभागमें उमाको साथ रखनेवाले और मुनिवरोंसे घिरे हुए भगवान् सदाशिवको प्रणाम करके उस श्रेयका वर्णन आरम्भ किया, जिसे श्रुतियोंने भी छिपा रखा है।
(अध्याय १–११)
प्रणवके वाच्यार्थरूप सदाशिवके स्वरूपका ध्यान, वर्णाश्रम-धर्मके पालनका महत्त्व, ज्ञानमयी पूजा, संन्यासके पूर्वांगभूत नान्दीश्राद्ध एवं ब्रह्मयज्ञ आदिका वर्णन
श्रीस्कन्दने कहा—महाभाग मुनीश्वर वामदेव! तुम्हें साधुवाद है; क्योंकि तुम भगवान् शिवके अत्यन्त भक्त हो और शिवतत्त्वके ज्ञाताओंमें सबसे श्रेष्ठ हो। तीनों लोकोंमें कहीं कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो तुम्हें ज्ञात न हो। तथापि तुम लोकपर अनुग्रह करनेवाले हो, इसलिये तुम्हारे समक्ष इस विषयका वर्णन करूँगा। इस लोकमें जितने जीव हैं, वे सब नाना प्रकारके शास्त्रोंसे मोहित हैं। परमेश्वरकी अति विचित्र मायाने उन्हें परमार्थसे वंचित कर दिया है। अतः प्रणवके वाच्यार्थभूत साक्षात् महेश्वरको वे नहीं जानते। वे महेश्वर ही सगुण-निर्गुण तथा त्रिदेवोंके जनक परब्रह्म परमात्मा हैं। मैं अपना दाहिना हाथ उठाकर तुमसे शपथपूर्वक कहता हूँ कि यह सत्य है, सत्य है, सत्य है। मैं बारंबार इस सत्यको दोहराता हूँ कि प्रणवके अर्थ साक्षात् शिव ही हैं। श्रुतियों, स्मृति-शास्त्रों, पुराणों तथा आगमोंमें प्रधानतया उन्हींको प्रणवका वाच्यार्थ बताया गया है। जहाँसे मनसहित वाणी उस परमेश्वरको न पाकर लौट आती है, जिसके आनन्दका अनुभव करनेवाला पुरुष किसीसे डरता नहीं, ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्रसहित यह सम्पूर्ण जगत् भूतों और इन्द्रियसमुदायके साथ सर्वप्रथम जिससे प्रकट होता है, जो परमात्मा स्वयं किसीसे और कभी भी उत्पन्न नहीं होता, जिसके निकट विद्युत्, सूर्य और चन्द्रमाका प्रकाश काम नहीं देता तथा जिसके प्रकाशसे ही यह सम्पूर्ण जगत् सब ओरसे प्रकाशित होता है, वह परब्रह्म परमात्मा सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न होनेके कारण स्वयं ही सर्वेश्वर ‘शिव’ नाम धारण करता है।* हृदयाकाशके भीतर विराजमान जो भगवान् शम्भु मुमुक्षु पुरुषोंके ध्येय हैं, जो सर्वव्यापी प्रकाशात्मा, भासस्वरूप एवं चिन्मय हैं, जिन परम पुरुषकी पराशक्ति शिवा भक्तिभावसे सुलभ मनोहरा, निर्गुण, अपने गुणोंसे ही निगूढ़ और निष्कल हैं, उन परमेश्वरके तीन रूप
* यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं यस्य वै विद्वान्न बिभेति कुतश्चन॥
यस्माज्जगदिदं सर्वं विधिविष्ण्विन्द्रपूर्वकम्। सह भूतेन्द्रियग्रामैः प्रथमं सम्प्रसूयते॥
न सम्प्रसूयते यो वै कुतश्चन कदाचन। यस्मिन्न भासते विद्युन्न च सूर्यो न चन्द्रमाः॥
यस्य भासो विभातीदं जगत् सर्वं समन्ततः। सर्वैश्वर्येण सम्पन्नो नाम्ना सर्वेश्वरः स्वयम्॥
(शि० पु० कै० सं० १२। ७–१०)
* कैलाससंहिता * ६३१
हैं—स्थूल, सूक्ष्म और इन दोनोंसे परे। मुने! मुमुक्षु योगियोंको नित्य क्रमशः उनके इन स्वरूपोंका ध्यान करना चाहिये। वे शम्भु निष्कल, सम्पूर्ण देवताओंके सनातन आदिदेव, ज्ञान-क्रिया-स्वभाव एवं परमात्मा कहे जाते हैं, उन देवाधिदेवकी साक्षात् मूर्ति सदाशिव हैं। ईशानादि पाँच मन्त्र उनके शरीर हैं। वे महादेवजी पंचकला रूप हैं। उनकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल है। वे सदा प्रसन्न रहनेवाले तथा शीतल आभासे युक्त हैं। उन प्रभुके पाँच मुख, दस भुजाएँ और पंद्रह नेत्र हैं। ‘ईशान’ मन्त्र उनका मुकुतमण्डित मस्तक है! ‘तत्पुरुष’ मन्त्र उन पुरातन प्रभुका मुख है। ‘अघोर’ मन्त्र हृदय है। ‘वामदेव’ मन्त्र गुह्य प्रदेश है तथा ‘सद्योजात’ मन्त्र उनके पैर हैं। इस प्रकार वे पंचमन्त्र रूप हैं। वे ही साक्षात् साकार और निराकार परमात्मा हैं। सर्वज्ञता आदि छः शक्तियाँ उनके शरीरके छः अंग हैं। वे शब्दादि शक्तियोंसे स्फुरित हृदय-कमलके द्वारा सुशोभित हैं। वामभागमें मनोन्मनी नामक अपनी शक्तिसे विभूषित हैं।
अब मैं मन्त्र आदि छः प्रकारके अर्थोंको प्रकट करनेके लिये जो अर्थोपन्यासकी पद्धति है, उसके द्वारा प्रणवके समष्टि और व्यष्टिसम्बन्धी भावार्थका वर्णन करूँगा; परंतु पहले उपदेशका क्रम बताना उचित है, इसलिये उसीको सुनो। मुने! इस मानवलोकमें चार वर्ण प्रसिद्ध हैं। उनमेंसे जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीन वर्ण हैं; उन्हींका वैदिक आचारसे सम्बन्ध है। त्रैवर्णिकोंकी सेवा ही जिनके लिये सारभूत धर्म है, उन शूद्रोंका वेदाध्ययनमें अधिकार नहीं है। यदि सब त्रैवर्णिक अपने-अपने आश्रम-धर्मके पालनमें हार्दिक अनुरागके साथ लगे हों तो उनका ही श्रुतियों और स्मृतियोंमें प्रतिपादित धर्मके अनुष्ठानमें अधिकार है, दूसरेका कदापि नहीं। श्रुति और स्मृतिमें प्रतिपादित कर्मका अनुष्ठान करनेवाला पुरुष अवश्य सिद्धिको प्राप्त होगा, यह बात वेदोक्तमार्गको दिखानेवाले परमेश्वरने स्वयं कही है। वर्णधर्म और आश्रम-धर्मके पालनजनित पुण्यसे परमेश्वरका पूजन करके बहुत-से श्रेष्ठ मुनि उनके सायुज्यको प्राप्त हो गये हैं। ब्रह्मचर्यके पालनसे ऋषियोंकी, यज्ञकर्मोंके अनुष्ठानसे देवताओंकी तथा संतानोत्पादनसे पितरोंकी तृप्ति होती है—ऐसा श्रुतिने कहा है। इस प्रकार ऋषि-ऋण, देव-ऋण तथा पितृ-ऋण—इन तीनोंसे मुक्त हो वानप्रस्थ-आश्रममें प्रविष्ट होकर मनुष्य शीत, उष्ण तथा सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंको सहन करते हुए जितेन्द्रिय, तपस्वी और मिताहारी हो यम-नियम आदि योगका अभ्यास करे, जिससे बुद्धि निश्चल तथा अत्यन्त दृढ़ हो जाय। इस प्रकार क्रमशः अभ्यास करके शुद्धचित्त हुआ पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंका संन्यास कर दे। समस्त कर्मोंका संन्यास करनेके पश्चात् ज्ञानके समादरमें तत्पर रहे। ज्ञानके समादरको ही ज्ञानमयी पूजा कहते हैं। वह पूजा जीवकी साक्षात् शिवके साथ एकताका बोध कराकर जीवन्मुक्तिरूप फल देनेवाली है। यतियोंके लिये इस पूजाको सर्वोत्तम तथा निर्दोष समझना चाहिये। महाप्राज्ञ! तुमपर स्नेह होनेके कारण लोकानुग्रहकी कामनासे मैं उस पूजाकी विधि बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो।
६३२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
साधकको चाहिये कि वह सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वार्थके ज्ञाता, वेदान्तज्ञानके पारंगत तथा बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ आचार्यकी शरणमें जाय। उत्तम बुद्धिसे युक्त एवं चतुर साधक आचार्यके समीप जाकर विधिपूर्वक दण्ड-प्रणाम आदिके द्वारा उन्हें यत्नपूर्वक संतुष्ट करे। फिर गुरुकी आज्ञा ले वह बारह दिनोंतक केवल दूध पीकर रहे। तदनन्तर शुक्लपक्षकी चतुर्थी या दशमीको प्रातःकाल विधिवत् स्नानकर शुद्धचित्त हुआ विद्वान् साधक नित्य-कर्म करके गुरुको बुलाकर शास्त्रोक्त विधिसे नान्दीश्राद्ध करे। नान्दीश्राद्धमें विश्वेदेवोंकी संज्ञा सत्य और वसु बतायी गयी है। प्रथम देवश्राद्धमें नान्दीमुख-देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहे गये हैं। दूसरे ऋषिश्राद्धमें उन्हें ब्रह्मर्षि, देवर्षि तथा राजर्षि कहा गया है। तीसरे दिव्य श्राद्धमें उनकी वसु, रुद्र और आदित्य संज्ञा बतायी गयी है। चौथे मनुष्यश्राद्धमें सनक$^१$ आदि चार मुनीश्वर ही नान्दीमुख-देवता हैं। पाँचवें भूत-श्राद्धमें पाँच महाभूत, नेत्र आदि ग्यारह इन्द्रियसमूह तथा जरायुज आदि चतुर्विध प्राणिसमुदाय नान्दीमुख माने गये हैं। छठे पितृश्राद्धमें पिता, पितामह और प्रपितामह—ये तीन नान्दीमुख-देवता हैं। सातवें मातृश्राद्धमें माता, पितामही और प्रपितामही—इन तीनोंको नान्दीमुख-देवता बताया गया है तथा आठवें आत्मश्राद्धमें आत्मा, पिता, पितामह और प्रपितामह—ये चार नान्दीमुखदेवता कहे गये हैं$^२$। मातामहात्मक श्राद्धमें मातामह, प्रमातामह और वृद्ध-प्रमातामह—ये तीन नान्दीमुख देवता सपत्नीक बताये गये हैं। प्रत्येक श्राद्धमें दो-दो ब्राह्मण करके जितने ब्राह्मण आवश्यक हों, उनको आमन्त्रित करे और स्वयं यत्नपूर्वक आचमन करके पवित्र हो उन ब्राह्मणोंके पैर धोये। उस समय इस प्रकार कहे—‘जो समस्त सम्पत्तिकी प्राप्तिमें कारण, आयी हुई आपत्तिके समूहको नष्ट करनेके लिये धूमकेतु (अग्नि)-रूप तथा अपार संसारसागरसे पार लगानेके लिये सेतुके समान हैं, वे ब्राह्मणोंकी चरणधूलियाँ मुझे पवित्र करें। जो आपत्तिरूपी घने अन्धकारको दूर करनेके लिये सूर्य, अभीष्ट अर्थको देनेके लिये कामधेनु तथा समस्त तीर्थोंके जलसे पवित्र मूर्तियाँ हैं, वे ब्राह्मणोंकी चरणधूलियाँ मेरी रक्षा करें।’$^३$
ऐसा कह पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर साष्टांग प्रणाम करे। तत्पश्चात् पूर्वाभिमुख बैठकर भगवान् शंकरके युगल चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए दृढ़तापूर्वक आसन ग्रहण करे। हाथमें पवित्री ले शुद्ध हो नूतन यज्ञोपवीत धारण कर तीन बार प्राणायाम करे। तदनन्तर तिथि आदिका स्मरण करके इस तरह संकल्प करे—‘मेरे संन्यासका अंगभूत जो पहले विश्वेदेवका पूजन, फिर देवादि अष्टविधि श्राद्ध तथा अन्तमें
१-सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार।
२-धर्मसिन्धुकार आदिने आत्मश्राद्धमें भी तीन ही नान्दीमुख कहे हैं—आत्मा, पिता और पितामह।
३-समस्तसंपत्समवाप्तिहेतवः समुत्थितापत्कुलधूमकेतवः। अपारसंसारसमुद्रसेतवः पुनन्तु मां ब्राह्मणपादरेणवः ॥
आपद्धनध्वान्तसहस्रभानवः समीहितार्थार्पणकामधेनवः। समस्ततीर्थाम्बुपवित्रमूर्तयो रक्षन्तु मां ब्राह्मणपादपांसवः ॥
(शि० पु० कै० सं० १२। ४४-४५)
* कैलाससंहिता * ६३३
मातामहश्राद्ध है, उसे आपलोगोंकी आज्ञा लेकर मैं पार्वणकी विधिसे सम्पन्न करूँगा।' ऐसा संकल्प करके आसनके लिये दक्षिण-दिशासे आरम्भ करके उत्तरोत्तर कुशोंका त्याग करे। तत्पश्चात् आचमन करके खड़ा हो वर्णक्रमका आरम्भ करे। अपने हाथमें पवित्री धारण करके दो ब्राह्मणोंके हाथोंका स्पर्श करते हुए इस प्रकार कहे—
'विश्वेदेवार्थं भवन्तौ वृणे।
भवद्भ्यां नान्दीश्राद्धे क्षणः प्रसादनीयः।'
अर्थात् 'हम विश्वेदेव श्राद्धके लिये आप दोनोंका वरण करते हैं। आप दोनों नान्दीश्राद्धमें अपना समय देनेकी कृपा करें।' इतना सभी श्राद्धोंके ब्राह्मणोंके लिये कहे। सर्वत्र ब्राह्मणवरणकी विधिका यही क्रम है।
इस प्रकार वरणका कार्य पूरा करके दस मण्डलोंका निर्माण करे। उत्तरसे आरम्भ करके दसों मण्डलोंका अक्षतसे पूजन करके उनमें क्रमशः ब्राह्मणोंको स्थापित करे। फिर उनके चरणोंपर भी अक्षत आदि चढ़ाये। तदनन्तर सम्बोधनपूर्वक विश्वेदेव आदि नामोंका उच्चारण करे और कुश, पुष्प, अक्षत एवं जलसे 'इदं वः पाद्यम्' कहकर पाद्य निवेदन करे*।
इस प्रकार पाद्य देकर स्वयं भी अपना पैर धो ले और उत्तराभिमुख हो आचमन करके एक-एक श्राद्धके लिये जो दो-दो ब्राह्मण कल्पित हुए हैं, उन सबको आसनोंपर बिठाये तथा यह कहे— 'विश्वेदेवस्वरूपस्य ब्राह्मणस्य इदमासनम्।'—विश्वेदेवस्वरूप ब्राह्मणके लिये यह आसन समर्पित है, यह कह कुशासन दे स्वयं भी हाथमें कुश लेकर आसनपर स्थित हो जाय। इसके बाद कहे—'अस्मिन्नान्दीमुखश्राद्धे विश्वेदेवार्थे भवद्भ्यां क्षणः क्रियताम्—इस नान्दीमुख श्राद्धमें विश्वेदेवके लिये आप दोनों क्षण (समय प्रदान) करें।' तदनन्तर 'प्राप्नुतां भवन्तौ—आप दोनों ग्रहण करें।' ऐसा कहे। फिर वे दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मण इस प्रकार उत्तर दें 'प्राप्नुयाव—हम दोनों ग्रहण करेंगे।' इसके बाद यजमान उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे प्रार्थना करे—'मेरे मनोरथकी पूर्ति हो, संकल्पकी सिद्धि हो—इसके लिये आप अनुग्रह करें।'
तत्पश्चात् (पद्धतिके अनुसार अर्घ्य दे, पूजन कर) शुद्ध केलेके पत्ते आदि धोये हुए पात्रोंमें परिपक्व अन्न आदि भोज्य पदार्थोंको परोसकर पृथक्-पृथक् कुश बिछाकर और स्वयं वहाँ जल छिड़ककर प्रत्येक पात्रपर आदरपूर्वक दोनों हाथ लगा 'पृथिवी ते
* प्रथम मण्डलमें दो विश्वेदेवोंके लिये, फिर आठ मण्डलोंमें क्रमशः देवादि आठ श्राद्धोंके अधिकारियोंके लिये तथा दसवें मण्डलमें सपत्नीक मातामह आदिके लिये पाद्य अर्पण करने चाहिये। अर्पणवाक्यका प्रयोग इस प्रकार है—
ॐ सत्यवसुसंज्ञकाः विश्वेदेवाः नान्दीमुखाः भूर्भुवः स्वः इदं वः पाद्यं पादावनेजनं पादप्रक्षालनं वृद्धिः॥ १ ॥
ॐ ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः नान्दीमुखाः भूर्भुवः स्वः इदं वः पाद्यं पादावनेजनं पादप्रक्षालनं वृद्धिः॥ २ ॥
ॐ देवर्षिब्रह्मर्षिक्षत्रर्षयो नान्दीमुखाः भूर्भुवः स्वः इदं वः पाद्यं पादावनेजनं पादप्रक्षालनं वृद्धिः॥ ३ ॥
इसी प्रकार अन्य श्राद्धोंके लिये वाक्यकी ऊहा कर लेनी चाहिये।
६३४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
पात्रम्'१ इत्यादि मन्त्रका पाठ करे। वहाँ स्थित हुए देवता आदिका चतुर्थ्यन्त उच्चारण करके अक्षतसहित जल ले 'स्वाहा' बोलकर उनके लिये अन्न अर्पित करे और अन्तमें 'न मम' इस वाक्यका उच्चारण करे।२ सर्वत्र—माता आदिके लिये भी अन्न-अर्पणकी यही विधि है।
अन्तमें इस प्रकार प्रार्थना करे—
यत्पादपद्मस्मरणाद् यस्य नामजपादपि।
न्यूनं कर्म भवेत् पूर्णं तं वन्दे साम्बमीश्वरम्॥
'जिनके चरणारविन्दोंके चिन्तन एवं नाम-जपसे न्यूनतापूर्ण अथवा अधूरा कर्म भी पूरा हो जाता है, उन साम्ब सदाशिव (उमामहेश्वर)-की मैं वन्दना करता हूँ।'
इसका पाठ करके कहे—'ब्राह्मणो ! मेरे द्वारा किया हुआ यह नान्दीमुख श्राद्ध यथोक्तरूपसे परिपूर्ण हो, यह आप कहें।' ऐसी प्रार्थनाके साथ उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको प्रसन्न करके उनका आशीर्वाद ले और अपने हाथमें लिया हुआ जल छोड़ दे। फिर पृथ्वीपर दण्डकी भाँति गिरकर प्रणाम करे और उठकर ब्राह्मणोंसे कहे—'यह अन्न अमृतरूप हो।' फिर उदारचेता साधक हाथ जोड़ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक प्रार्थना करे। श्रीरुद्रसूक्तका चमकाध्यायसहित पाठ करे। पुरुषसूक्तकी भी विधिवत् आवृत्ति करे। मनमें भगवान् सदाशिवका ध्यान करते हुए 'ईशानः सर्वविद्यानाम्' इत्यादि पाँच मन्त्रोंका जप करे। जब ब्राह्मणलोग भोजन कर चुकें, तब रुद्रसूक्तका पाठ समाप्तकर क्षमा-प्रार्थनापूर्वक उन ब्राह्मणोंको पुनः 'अमृतापिधानमसि स्वाहा' यह मन्त्र पढ़कर उत्तरापोशनके लिये जल दे।
तदनन्तर हाथ-पैर धो आचमन करके पिण्डदानके स्थानपर जाय। वहाँ पूर्वाभिमुख बैठकर मौनभावसे तीन बार प्राणायाम करे। इसके बाद 'मैं 'नान्दीमुख' श्राद्धका अंगभूत पिण्डदान करूँगा' ऐसा संकल्प करके दक्षिणसे लेकर उत्तरकी ओर नौ रेखाएँ खींचे और उन रेखाओंपर क्रमशः बारह-बारह पूर्वाग्र कुश बिछाये। फिर दक्षिणकी ओरसे देवता आदिके पाँच३ स्थानोंपर चुपचाप अक्षत और जल छोड़े। पितृवर्गके तीनों४ स्थानोंपर क्रमशः अक्षत, जल छोड़कर नवें मातामहादिके स्थानपर भी मार्जन करे५। तत्पश्चात् 'अत्र पितरो मादयध्वम्' कहकर देवादिके पाँचों स्थानोंपर क्रमशः अक्षत, जल छोड़े। इस प्रकार अवनेजन दे पाँचों स्थानोंपर प्रत्येकके लिये तीन-तीन पिण्ड दे६। (इसी
१-पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखेऽमृतेऽमृतं जुहोमि स्वाहा' यह पूरा मन्त्र है।
२-वाक्यका प्रयोग इस प्रकार है—'ॐ सत्यवसुसंज्ञकेभ्यो विश्वेभ्यो देवेभ्यो नान्दीमुखेभ्यः स्वाहा न मम' इत्यादि।
३-देव, ऋषि, दिव्य मनुष्य और भूत—इनके पाँच स्थान समझने चाहिये।
४-पिता आदि, माता आदि तथा आत्मा आदि—ये तीन स्थान हैं।
५-उस समय इस प्रकार कहे—'शुन्धन्तां ब्रह्माणो नान्दीमुखाः शुन्धन्तां विष्णवो नान्दीमुखाः शुन्धन्तां महेश्वरा नान्दीमुखाः।' यह प्रथम रेखापर मार्जन करते समय कहे। इस प्रकार अन्य रेखाओंपर भी कहता चले।
६-पिण्डदान-वाक्य इस प्रकार है—'ब्रह्मणे नान्दीमुखाय स्वाहा', 'विष्णवे नान्दीमुखाय स्वाहा।' इत्यादि।
* कैलाससंहिता * ६३५
तरह शेष स्थानोंपर भी करे।)। अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई पद्धतिके अनुसार सभी पिण्ड पृथक्-पृथक् देने चाहिये। फिर पितरोंके साद्गुण्यके लिये जल-अक्षत अर्पित करे। तत्पश्चात् अपने हृदयकमलमें सदा शिवदेवका ध्यान करे और पूर्वोक्त 'यत्पादपद्मस्मरणात्…………' इत्यादि श्लोकका पुनः पाठ करके ब्राह्मणोंको नमस्कारपूर्वक यथाशक्ति दक्षिणा दे। फिर त्रुटियोंके लिये क्षमा-प्रार्थना करके देवता-पितरोंका विसर्जन करे। पिण्डोंका उत्सर्ग करके उन्हें गौओंको खानेके लिये दे दे अथवा जलमें डाल दे। तत्पश्चात् पुण्याह-वाचन करके स्वजनोंके साथ भोजन करे।
दूसरे दिन प्रातःकाल उठकर शुद्ध बुद्धिवाला साधक उपवासपूर्वक व्रत रखे। काँख और उपस्थके बालोंको छोड़कर शेष सभी बाल मुँड़वा दे, परंतु शिखाके सात-आठ बाल अवश्य बचा ले। फिर स्नान करके धुले हुए वस्त्र पहनकर शुद्ध हो दो बार आचमन करके मौन हो विधिवत् भस्म धारण करे। पुण्याहवाचन करके उससे अपने-आपका प्रोक्षण कर बाहर-भीतरसे शुद्ध हो होम, द्रव्य और आचार्यकी दक्षिणाके द्रव्यको छोड़कर शेष सभी द्रव्य महेश्वरार्पणबुद्धिसे ब्राह्मणों और विशेषतः शिवभक्तोंको बाँट दे। तदनन्तर गुरुरूपधारी शिवके लिये वस्त्र आदिकी दक्षिणा दे, पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम करके डोरा, कौपीन, वस्त्र तथा दण्ड आदि जो धोकर पवित्र किये गये हों, धारण करे। तदनन्तर होमद्रव्य और समिधा आदि लेकर समुद्र या नदीके तटपर, पर्वतपर, शिवालयमें, वनमें अथवा गोशालामें किसी उत्तम स्थानका विचार करके वहाँ बैठ जाय और आचमन करके पहले मानसिक जप करे। फिर 'ॐ नमो ब्रह्मणे' इस मन्त्रका तीन बार जप करके 'अग्निमीळे पुरोहितम्' इस मन्त्रका पाठ करे। इसके बाद 'अथ महाव्रतम्', 'अग्निर्वै देवानाम़्', 'एतस्य समाम्नायम्', 'ॐ इषे त्वोर्जे त्वा वायवस्थ', 'अग्न आयाहि वीतये' तथा 'शं नो देवी रभीष्टये' इत्यादिका पाठ करे। तत्पश्चात् 'म य र स त ज भ न ल ग' 'पञ्चसंवत्सरमयम्', 'समाम्नायः समाम्नातः', 'अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि', 'वृद्धिरादैच्', 'अथातो धर्मजिज्ञासा,' 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा'—इन सबका पाठ करे। तदनन्तर यथासम्भव वेद, पुराण आदिका स्वाध्याय करे। इसके बाद ॐ ब्रह्मणे नमः', 'ॐ इन्द्राय नमः', 'ॐ सूर्याय नमः', 'ॐ सोमाय नमः', 'ॐ प्रजापतये नमः', 'ॐ आत्मने नमः', 'ॐ अन्तरात्मने नमः', 'ॐ ज्ञानात्मने नमः', 'ॐ परमात्मने नमः' इत्यादि रूपसे ब्रह्मा आदि शब्दोंके आदिमें 'ॐ' और अन्तमें 'नमः' लगाकर उनके चतुर्थ्यन्त रूपका जप करे। इसके बाद तीन मुट्ठी सत्तू लेकर प्रणवके उच्चारणपूर्वक तीन बार खाय और प्रणवसे ही दो बार आचमन करके नाभिका स्पर्श करे। उस समय आगे बताये जानेवाले शब्दोंके आदिमें प्रणव और अन्तमें 'नमः स्वाहा' जोड़कर उनका उच्चारण करे। यथा—'ॐ आत्मने नमः स्वाहा',
धर्मसिन्धुकारने प्रत्येक देवताके लिये दो-दो पिण्डका विधान किया है, अतः नौ स्थानोंके २७ देवताओंके लिये ५४ पिण्ड होंगे।
| ६३६ | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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'ॐ अन्तरात्मने नमः स्वाहा', 'ॐ ज्ञानात्मने नमः स्वाहा', 'ॐ परमात्मने नमः स्वाहा', 'ॐ प्रजापतये नमः स्वाहा' इति। तदनन्तर पृथक्-पृथक् प्रणवमन्त्रसे$^१$ ही दूध-दही मिले हुए घीको (अथवा केवल जलको) तीन बार चाटकर पुनः दो बार आचमन करे। इसके बाद मनको स्थिर करके सुस्थिर आसनपर पूर्वाभिमुख बैठकर शास्त्रोक्त विधिसे तीन बार प्राणायाम करे।
(अध्याय १२)
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संन्यासग्रहणकी शास्त्रीय विधि—गणपति-पूजन, होम, तत्त्व-शुद्धि, सावित्री-प्रवेश, सर्वसंन्यास और दण्ड-धारण आदिका प्रकार
स्कन्द कहते हैं—वामदेव! तदनन्तर मध्याह्नकालमें स्नान करके साधक अपने मनको वशमें रखते हुए गन्ध, पुष्प और अक्षत आदि पूजा-द्रव्योंको ले आये और नैर्ऋत्यकोणमें देवपूजित विघ्नराज गणेशकी पूजा करे। 'गणानां त्वा' इत्यादि मन्त्रसे विधिपूर्वक गणेशजीका आवाहन करे। आवाहनके पश्चात् उनके स्वरूपका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये। उनकी अंगकान्ति लाल है, शरीर विशाल है। सब प्रकारके आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं। उन्होंने अपने करकमलोंमें क्रमशः पाश, अंकुश, अक्षमाला तथा वर नामक मुद्राएँ धारण कर रखी हैं। इस प्रकार आवाहन और ध्यान करनेके पश्चात् शम्भुपुत्र गजाननकी पूजा करके खीर, पूआ, नारियल और गुड़ आदिका उत्तम नैवेद्य निवेदन करे। तत्पश्चात् ताम्बूल आदि दे उन्हें संतुष्ट करके नमस्कार करे और अपने अभीष्ट कार्यकी निर्विघ्न पूर्तिके लिये प्रार्थना करे।
तदनन्तर अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार औपासनाग्निमें आज्यभागान्त$^२$ हवन करके अग्निदेवतासम्बन्धी यज्ञविषयक स्थालीपाक होम करना चाहिये। इसके बाद 'भूः स्वाहा' इस मन्त्रसे पूर्णाहुति होम करके हवनका कार्य समाप्त करे। तत्पश्चात् आलस्यरहित हो अपराह्नकालतक गायत्री-मन्त्रका जप करता रहे। तदनन्तर स्नान करके सायंकालकी संध्योपासना तथा सायंकालिक उपासनासम्बन्धी नित्य-होम आदि करके मौन हो गुरुकी आज्ञा ले चरु पकाये। फिर अग्निमें समिधा, चरु और घीकी रुद्रसूक्तसे और सद्योजातादि पाँच मन्त्रोंसे पृथक्-पृथक् आहुति दे। अग्निमें उमासहित महेश्वरकी भावना करे और गौरीदेवीका चिन्तन करते हुए
$^१$-धर्मसिन्धुकारने इसके लिये तीन मन्त्र लिखे हैं। प्रथम बार चाटकर कहे 'त्रिवृदसि', द्वितीय बार 'प्रवृदसि' और तृतीय बार 'विवृदसि'।
$^२$-कुशकण्डिकाके अनन्तर अग्निमें जो चार आहुतियाँ दी जाती हैं, उनमें प्रथम दो को 'आघार' और अन्तिम दोको 'आज्यभाग' कहते हैं। प्रजापति और इन्द्रके उद्देश्यसे 'आघार' तथा अग्नि और सोमके उद्देश्यसे 'आज्यभाग' दिया जाता है।
* कैलाससंहिता * ६३७
‘गौरीर्मिमाय’$^१$ इस मन्त्रसे एक सौ आठ बार होम करके ‘अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा’ इस मन्त्रसे एक बार आहुति दे।
इस प्रकार मन्त्रसे हवन करनेके पश्चात् विद्वान् पुरुष अग्निसे उत्तरमें एक आसनपर बैठे, जिसमें नीचे कुशा, उसके ऊपर मृगचर्म और उसके ऊपर वस्त्र बिछा हुआ हो। ऐसे सुखद आसनपर बैठकर मौन-भावसे सुस्थिरचित्त हो जागरणपूर्वक ब्राह्ममुहूर्त्त आनेतक गायत्रीका जप करता रहे। इसके बाद स्नान करे। जो जलसे स्नान करनेमें असमर्थ हो, वह भस्मसे ही विधि-पूर्वक स्नान करे फिर उस अग्निपर ही चरु पकाकर उसे घीसे तर करे। उसे उतारकर अग्निसे उत्तर दिशामें कुशपर रखे। पुनः घीसे चरुको मिश्रित करे। इसके बाद व्याहृति-मन्त्र, रुद्रसूक्त तथा सद्योजातादि पाँच मन्त्रोंका जप करे और इनके द्वारा एक-एक आहुति भी दे। चित्तको भगवान् शिवके चरणारविन्दमें लगाकर प्रजापति, इन्द्र, विश्वेदेव और ब्रह्माके लिये भी एक-एक आहुति दे। इन सबके नामके आदिमें ॐ और अन्तमें ‘नमः स्वाहा’ जोड़कर चतुर्थ्यन्त उच्चारण करे (यथा—ॐ प्रजापतये नमः स्वाहा—इत्यादि)। तत्पश्चात् पुण्याहवाचन कराकर ‘अग्नये स्वाहा’ इस मन्त्रसे अग्निके मुखमें आहुति देनेतकका कार्य सम्पन्न करे। फिर ‘प्राणाय स्वाहा’ इत्यादि पाँच मन्त्रोंद्वारा घृतसहित चरुकी आहुति दे। इसके बाद ‘अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा’ बोलकर एक आहुति और दे। तदनन्तर फिर रुद्रसूक्त तथा ईशानादि पाँच मन्त्रोंका जप करे। महेशादि चतुर्व्यूह मन्त्रोंका भी पाठ करे। इस प्रकार तन्त्र-होम करके अपनी गृह्यशाखामें बतायी हुई पद्धतिके अनुसार उन-उन देवताओंके उद्देश्यसे बुद्धिमान् पुरुष सांग होम करे। इस तरह जो अग्निमुख आदि कर्मतन्त्रको प्रवर्तित किया गया है, उसका निर्वाह करके विरजा होम करे। छब्बीस तत्त्वरूप इस शरीरमें छिपे हुए तत्त्व-समुदायकी शुद्धिके लिये विरजा होम करना चाहिये।
उस समय यह कहे कि ‘मेरे शरीरमें जो ये तत्त्व हैं, इन सबकी शुद्धि हो।’ उस प्रसंगमें आत्मतत्त्वकी शुद्धिके लिये आरुणकेतुक मन्त्रोंका पाठ करते हुए पृथ्वी आदि तत्त्वसे लेकर पुरुषतत्त्वपर्यन्त क्रमशः सभी तत्त्वोंकी शुद्धिके निमित्त घृतयुक्त चरुका होम करे तथा शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए मौन रहे$^२$। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश ये पृथिव्यादिपंचक कहलाते हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये शब्दादिपंचक हैं। वाक्, पाणि, पाद, पायु तथा उपस्थ— ये वागादिपंचक हैं। श्रोत्र, नेत्र, नासिका, रसना, और त्वक्—ये श्रोत्रादिपंचक हैं।
१-पूरा मन्त्र इस प्रकार है—गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी। अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन् स्वाहा। (ऋग्वेद मं० १ सू० १६४। ४१)
२-तत्त्वशुद्धिके लिये पृथक्-पृथक् वाक्य-योजना करनी चाहिये, जैसे पृथ्वी आदिके लिये— ‘पृथिव्यापस्तेजो वाय्वाकाशो मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासँस्वाहा’ इतना बोलकर समिधा, चरु और आज्यकी चालीस-चालीस आहुतियाँ दे। इसी तरह सभी तत्त्वोंके नाम लेकर वाक्य-योजना करे।
६३८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
शिर, पार्श्व, पृष्ठ और उदर—ये चार हैं। इन्हींमें जंघाको भी जोड़ ले। फिर त्वक् आदि सात धातुएँ हैं। प्राण, अपान आदि पाँच वायुओंको प्राणादिपंचक कहा गया है। अन्नमयादि पाँचों कोशोंको कोशपंचक कहते हैं। (उनके नाम इस प्रकार हैं—अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय।) इनके सिवा मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार, ख्याति, संकल्प, गुण, प्रकृति और पुरुष हैं। भोक्तापनको प्राप्त हुए पुरुषके लिये भोगकालमें जो पाँच अन्तरंग साधन हैं, उन्हें तत्त्वपंचक कहा गया है। उनके नाम ये हैं—नियति, काल, राग, विद्या और कला। ये पाँचों मायासे उत्पन्न हैं। 'मायां तु प्रकृतिं विद्यात्'। इस श्रुतिमें प्रकृति ही माया कही गयी है। उसीसे ये तत्त्व उत्पन्न हुए हैं, इसमें संशय नहीं है। कालका स्वभाव ही 'नियति' है, ऐसा श्रुतिका कथन है। ये नियति आदि जो पाँच तत्त्व हैं, इन्हींको 'पंचकंचुक' कहते हैं। इन पाँच तत्त्वोंको न जाननेवाला विद्वान् भी मूढ़ ही कहा गया है।
नियति प्रकृतिसे नीचे है और यह पुरुष प्रकृतिसे ऊपर है। जैसे कौएकी एक ही आँख उसके दोनों गोलकोंमें घूमती रहती है, उसी प्रकार पुरुष प्रकृति और नियति दोनोंके पास रहता है। यह विद्यातत्त्व कहा गया है। शुद्ध विद्या, महेश्वर, सदाशिव, शक्ति और शिव—इन पाँचोंको शिवतत्त्व कहते हैं। ब्रह्मन्! 'प्रज्ञानं ब्रह्म' इस श्रुतिके वाक्यसे यह शिवतत्त्व ही प्रतिपादित हुआ है। मुनीश्वर! पृथ्वीसे लेकर शिवपर्यन्त जो तत्त्वसमूह है, उसमेंसे प्रत्येकको क्रमशः अपने-अपने कारणमें लीन करते हुए उसकी शुद्धि करो। १ पृथिव्यादिपञ्चक, २ शब्दादिपञ्चक, ३ वागादिपञ्चक, ४ श्रोत्रादिपञ्चक, ५ शिरादिपञ्चक, ६ त्वगादिधातुसप्तक, ७ प्राणादिपञ्चक, ८ अन्नमयादिकोशपञ्चक, ९ मन आदि पुरुषान्त तत्त्व, १० नियत्यादि तत्त्वपञ्चक (अथवा पञ्चकञ्चुक) और ११ शिवतत्त्व-पञ्चक—ये ग्यारह वर्ग हैं; इन एकादश-वर्गसम्बन्धी मन्त्रोंके अन्तमें 'परस्मै शिवज्योतिषे इदं न मम' इस वाक्यका उच्चारण करे*। इसके द्वारा अपने उद्देश्यका त्याग बताया गया है।
इसके बाद 'विविद्या' तथा 'कर्षोत्क' सम्बन्धी मन्त्रोंके अन्तमें अर्थात् 'विविद्यायै स्वाहा', 'कर्षोत्काय स्वाहा' इनके अन्तमें स्वत्वत्यागके लिये 'व्यापकाय परमात्मने शिवज्योतिषे विश्वभूतघसनोत्सुकाय परस्मै देवाय इदं न मम' इसका उच्चारण करे। तत्पश्चात् 'उत्तिष्ठब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे। उप प्र यन्तु मरुतः सुदानव इन्द्र प्राशूर्भवाः स चा' इस मन्त्रके अन्तमें 'विश्वरूपाय पुरुषाय ॐ स्वाहा' बोलकर स्वत्वत्यागके लिये 'लोकतत्रयव्यापिने परमात्मने शिवायेदं न मम' का उच्चारण करे। तदनन्तर अपनी शाखामें बतायी हुई विधिसे पहले तन्त्रकर्मका सम्पादन करके घृतमिश्रित चरुका प्राशन एवं आचमन करनेके पश्चात्पुरोधा आचार्यको सुवर्ण आदिसे सम्पन्न समुचित दक्षिणा दे।
* यथा—'पृथिव्यादिपञ्चकं मे शुध्यतां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासःस्वाहा—पृथिव्यादिपञ्चकाय परस्मै शिवज्योतिषे इदं न मम।'
* कैलाससंहिता * ६३९
फिर ब्रह्माका विसर्जन करके प्रातःकालिक उपासनासम्बन्धी नित्य होम करे। इसके बाद मनुष्य 'सं मा सिञ्चन्तु मरुतः' इस मन्त्रका जप करे।$^१$ तत्पश्चात्—'या ते अग्ने यज्ञिया तनूस्तयेह्यारोहात्मानम्'$^२$ इत्यादि मन्त्रोंसे हाथको अग्निमें तपाकर उस अग्निको अद्वैतधामस्वरूप अपने आत्मामें आरोपित करे। तदनन्तर प्रातःकालकी संध्योपासना करके सूर्योपस्थानके पश्चात् जलाशयमें जाकर नाभितक जलके भीतर प्रवेश करे। वहाँ प्रसन्नतापूर्वक मनको स्थिरकर उत्सुकतापूर्वक वेदमन्त्रोंका जप करे।$^३$
जो अग्निहोत्री हो, वह स्थापित अग्निमें 'प्राजापत्येष्टि'$^४$ करे तथा वेदोक्त वैश्वानर स्थालीपाक होम करके उसमें अपना सब कुछ दान कर दे। पूर्वोक्तरूपसे अग्निका आत्मामें आरोप करके ब्राह्मण घरसे निकल जाय। मुनीश्वर! फिर वह साधक निम्नांकितरूपसे 'सावित्रीप्रवेश' करे—
ॐ भूः सावित्रीं प्रवेशयामि, ॐ तत्सवितुर्वरेण्यम्, ॐ भुवः सावित्रीं प्रवेशयामि$^५$ भर्गो देवस्य धीमहि, ॐ स्वः सावित्रीं प्रवेशयामि, धियो यो नः प्रचोदयात्, ॐ भूर्भुवः स्वः सावित्रीं प्रवेशयामि, तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
—इन वाक्योंका प्रेमपूर्वक उच्चारण करे और चित्तको चंचल न होने दे।
१-धर्मसिन्धुकारने कहा है कि 'सं मा सिञ्चन्तु मरुतः' इस मन्त्रसे अग्निका उपस्थान करके उसमें काष्ठमय यज्ञपात्रोंको जला दे। यदि पात्र तैजस धातुके हों तो उन्हें आचार्यको दे दे।
पूरा मन्त्र और उसका अर्थ इस प्रकार है—
सं मा सिञ्चन्तु मरुतः समिन्द्रः सं बृहस्पतिः। सं मायमग्निः सिञ्चत्वायुषा च धनेन च बलेन चायुष्मन्तं करोतु मा।
अर्थात् मरुद्गण, इन्द्र, बृहस्पति तथा अग्नि—ये सभी देवता मुझपर कल्याणकी वर्षा करें। ये अग्निदेव मुझे आयु, ज्ञानरूपी धन तथा साधनकी शक्तिसे सम्पन्न करें। साथ ही मुझको दीर्घजीवी भी बनायें।
२-पूरे मन्त्र और अर्थ यों हैं—
या ते अग्ने यज्ञिया तनूस्तयेह्यारोहात्मानम्। अच्छा वसूनि कृण्वन्नस्ये नर्या पुरूणि॥
यज्ञो भूत्वा यज्ञमासीद स्वां योनिम्। जातवेदो भुव आजायमानः सक्षय एहि॥
'हे अग्निदेव! जो तुम्हारा यज्ञिय (यज्ञोंमें प्रकट होनेवाला) स्वरूप है, उसी स्वरूपसे तुम यहाँ पधारो और मेरे लिये बहुत-से मनुष्योपयोगी विशुद्ध धन (साधन-सम्पत्ति)-की सृष्टि करते हुए आत्मारूपसे मेरे आत्मामें विराजमान हो जाओ। तुम यज्ञरूप होकर अपने कारणरूप यज्ञमें पहुँच जाओ। हे जातवेदा ! तुम पृथिवीसे उत्पन्न होकर अपने धामके साथ यहाँ पधारो।'
३-वहाँ जल लेकर उसे 'आशुः शिशानः' इस सूक्तसे अभिमन्त्रित करके 'सर्वाभ्यो देवताभ्यः स्वाहा' ऐसा कहकर छोड़ दे। फिर संन्यासका संकल्प ले तीन बार जलांजलि दे। उसके मन्त्र इस प्रकार हैं—
ॐ एष ह वा अग्निः सूर्यः प्राणं गच्छ स्वाहा॥ १॥ ॐ स्वाम योनिं गच्छ स्वाहा॥ २॥ ॐ आपो वै गच्छ स्वाहा॥ ३॥ (धर्मसिन्धु)
४-'यदिष्टं यच्च पूर्तं यच्चापद्यनापदि प्रजापतौ तन्मनसि जुहोमि। विमुक्तोऽहं देवकिल्बिषात्स्वाहा' ऐसा कह घीकी आहुति दे—'इदं प्रजापतये न मम' कहकर त्याग करे। यही प्राजापत्येष्टि है।
५-धर्मसिन्धुमें 'प्रविशामि' पाठ है।
६४० * संक्षिप्त शिवपुराण *
उस समय गायत्रीका इस प्रकार ध्यान करे—ये भगवती गायत्री साक्षात् भगवान् शंकरके आधे शरीरमें वास करनेवाली हैं। इनके पाँच मुख और दस भुजाएँ हैं। ये पंद्रह नेत्रोंसे प्रकाशित होती हैं। नूतन रत्नमय किरीटसे जगमगाती हुई चन्द्रलेखा इनके मस्तकको विभूषित करती है। इनकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिक मणिके समान उज्ज्वल है। ये शुभलक्षणा देवी अपने दस हाथोंमें दस प्रकारके आयुध धारण करती हैं। हार, केयूर ( बाजूबंद ), कड़े, करधनी और नूपुर आदि आभूषणोंसे इनके अंग विभूषित हैं। इन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखा है। इनके सभी आभूषण रत्ननिर्मित हैं। विष्णु, ब्रह्मा, देवता, ऋषि तथा गन्धर्वराज और मनुष्य ही सदा इनका सेवन करते हैं। ये सर्वव्यापिनी शिवा सदाशिवदेवकी मनोहारिणी धर्मपत्नी हैं। सम्पूर्ण जगत्की माता, तीनों लोकोंकी जननी, त्रिगुणमयी, निर्गुणा तथा अजन्मा हैं। इस प्रकार गायत्रीदेवीके स्वरूपका चिन्तन करते हुए शुद्धबुद्धिवाला पुरुष ब्राह्मणत्व आदि प्रदान करनेवाली अजन्मा आदि देवी त्रिपदा गायत्रीका जप करे।
गायत्री व्याहृतियोंसे उत्पन्न हुई हैं और उन्हींमें लीन होती हैं। व्याहृतियाँ प्रणवसे प्रकट हुई हैं और प्रणवमें ही लयको प्राप्त होती हैं। प्रणव सम्पूर्ण वेदोंका आदि है। वह शिवका वाचक, मन्त्रोंका राजाधिराज, महाबीजस्वरूप और श्रेष्ठ मन्त्र है। शिव प्रणव है और प्रणव शिव कहा गया है; क्योंकि वाच्य और वाचकमें अधिक भेद नहीं होता। इसी महामन्त्रको काशीमें शरीर-त्याग करनेवाले जीवोंके मरणकालमें उन्हें सुनाकर भगवान् शिव परम मोक्ष प्रदान करते हैं। इसलिये श्रेष्ठ यति अपने हृदयकमलके मध्यमें विराजमान एकाक्षर प्रणवरूप परम कारण शिवदेवकी उपासना करते हैं। दूसरे मुमुक्षु, धीर एवं विरक्त लौकिक पुरुष भी मनसे विषयोंका परित्याग करके प्रणवरूप परम शिवकी उपासना करते हैं।
इस प्रकार गायत्रीका शिववाचक प्रणवमें लय करके ‘अहं वृक्षस्य रेरिवा’$^{१}$ इन अनुवाकका जप करे। तत्पश्चात् ‘ यश्छन्दसामृषभो:’ (तैत्तिरीय० १ । ४ । १) —इस अनुवाकको आरम्भसे लेकर......... ‘श्रुतं मे गोपाय’$^{२}$ तक पढ़कर कहे—‘दारैषणायाश्च
१—अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव। ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि। द्रविणं सवर्चसम्। सुमेधा अमृतोक्षितः। इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम्। (तैत्तिरीय० १।१०।१)
‘मैं संसारवृक्षका उच्छेद करनेवाला हूँ, मेरी कीर्ति पर्वतके शिखरकी भाँति उन्नत है; अन्नोत्पादक शक्तिसे युक्त सूर्यमें जैसे उत्तम अमृत है, उसी प्रकार मैं भी अतिशय पवित्र अमृतस्वरूप हूँ तथा मैं प्रकाशयुक्त धनका भण्डार हूँ, परमानन्दमय अमृतसे अभिषिक्त तथा श्रेष्ठबुद्धिवाला हूँ—इस प्रकार यह त्रिशंकु ऋषिका अनुभव किया हुआ वैदिक प्रवचन है।’
२—यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः। छन्दोभ्योऽध्यमृतात्सम्बभूव। स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु। अमृतस्य देव धारणो भूयासम्। शरीरं मे विचर्षणम्। जिह्वा मे मधुमत्तमा। कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम्। ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः श्रुतं मे गोपाय।
- कैलाससंहिता * ६४१
वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थितोऽहम्' अर्थात् 'मैं स्त्रीकी कामना, धनकी कामना और लोकोंमें ख्यातिकी कामनासे ऊपर उठ गया हूँ।' मुने! इस वाक्यका मन्द, मध्यम और उच्चस्वरसे क्रमशः तीन बार उच्चारण करे। तत्पश्चात् सृष्टि, स्थिति और लयके क्रमसे पहले प्रणवमन्त्रका उद्धार करके फिर क्रमशः इन वाक्योंका उच्चारण करे—'ॐ भूः संन्यस्तं मया', 'ॐ भुवः संन्यस्तं मया', 'ॐ सुवः संन्यस्तं मया', 'ॐ भूर्भुवः सुवः संन्यस्तं मया'$^१$ इन वाक्योंका मन्द, मध्यम और उच्चस्वरसे हृदयमें सदाशिवका ध्यान करते हुए सावधान चित्तसे उच्चारण करे। तदनन्तर 'अभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः स्वाहा' (मेरी ओरसे सब प्राणियोंको अभयदान दिया गया)—ऐसा कहते हुए पूर्वदिशामें एक अंजलि जल लेकर छोड़े। इसके बाद शिखाके शेष बालोंको हाथसे उखाड़ डाले और यज्ञोपवीतको निकालकर जलके साथ हाथमें ले इस प्रकार कहे—'ॐ भूः समुद्रं गच्छ स्वाहा' यों कहकर उसका जलमें ही होम कर दे। फिर 'ॐ भूः संन्यस्तं मया', 'ॐ भुवः संन्यस्तं मया', 'ॐ सुवः संन्यस्तं मया'—इस प्रकार तीन बार कहकर तीन बार जलको अभिमन्त्रित करके उसका आचमन करे। फिर जलाशयके किनारे आकर वस्त्र और कटिसूत्रको भूमिपर त्याग दे तथा उत्तर या पूर्वकी ओर मुँह करके सात पदसे कुछ अधिक चले। कुछ दूर जानेपर आचार्य उससे कहे, 'ठहरो, ठहरो भगवन्! लोक-व्यवहारके लिये कौपीन और दण्ड स्वीकार करो।' यों कह आचार्य अपने हाथसे ही उसे कटिसूत्र और कौपीन देकर गेरुआ वस्त्र भी अर्पित करे। तत्पश्चात् संन्यासी जब उससे अपने शरीरको ढककर दो बार आचमन कर ले तब आचार्य शिष्यसे कहे—'इन्द्रस्य वज्रोऽसि' यह मन्त्र बोलकर दण्ड ग्रहण करो। तब वह इस मन्त्रको पढ़े और 'सखा मा गोपायौजः सखा योऽसीन्द्रस्य वज्रोऽसि वार्त्रघ्नः शर्म मे भव यत्पापं तन्निवारय'$^२$—इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए दण्डकी प्रार्थना करके उसे हाथमें ले। (तत्पश्चात् प्रणव या गायत्रीका उच्चारण करके कमण्डलु ग्रहण करे।)
तदनन्तर भगवान् शिवके चरणारविन्दका चिन्तन करते हुए गुरुके निकट जा वह तीन बार पृथ्वीमें लोटकर दण्डवत् प्रणाम करे। उस समय वह अपने मनको पूर्णतया
'जो वेदोंमें सर्वश्रेष्ठ है, सर्वरूप है और अमृतस्वरूप वेदोंसे प्रधानरूपमें प्रकट हुआ है, वह सबका स्वामी परमेश्वर मुझे धारणायुक्त बुद्धिसे सम्पन्न करे। हे देव! मैं आपकी कृपासे अमृतमय परमात्माको अपने हृदयमें धारण करनेवाला बन जाऊँ। मेरा शरीर विशेष फुर्तीला—सब प्रकारसे रोगरहित हो और मेरी जिह्वा अतिशय मधुमती (मधुरभाषिणी) हो जाय। मैं दोनों कानोंद्वारा अधिक सुनता रहूँ। (हे प्रणव ! तू) लौकिक बुद्धिसे ढकी हुई परमात्माकी निधि है। तू मेरे सुने हुए उपदेशकी रक्षा कर।'
१-मैंने भूलोकका संन्यास (पूर्णतः त्याग) कर दिया। मैंने भुवः (अन्तरिक्ष) लोकका परित्याग कर दिया तथा मैंने स्वर्गलोकका भी सर्वथा त्याग कर दिया। मैंने भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक—इन तीनोंको भलीभाँति त्याग दिया।
२-हे दण्ड! तुम मेरे सखा (सहायक) हो, मेरी रक्षा करो। मेरे ओज (प्राणशक्ति)-की रक्षा करो। तुम वही मेरे सखा हो, जो इन्द्रके हाथमें वज्रके रूपमें रहते हो। तुमने ही वज्ररूपसे आघात करके वृत्रासुरका संहार किया है। तुम मेरे लिये कल्याणमय बनो। मुझमें जो पाप हो, उसका निवारण करो।
789 संक्षिप्त शिवपुराण—21 A
६४२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
संयममें रखे। फिर धीरेसे उठकर प्रेमपूर्वक अपने गुरुकी ओर देखते हुए हाथ जोड़ उनके चरणोंके समीप खड़ा हो जाय। संन्यासदीक्षा-विषयक कर्म आरम्भ होनेके पहले ही शुद्ध गोबर लेकर आँवले बराबर उसके गोले बना ले और सूर्यकी किरणोंसे ही उन्हें सुखाये। फिर होम आरम्भ होनेपर उन गोलोंको होमाग्नि के बीचमें डाल दे। होम समाप्त होनेपर उन सबको संग्रह करके सुरक्षित रखे। तदनन्तर दण्डधारणके पश्चात् गुरु विरजाग्निजनित उस श्वेत भस्मको लेकर उसीको शिष्यके अंगोंमें लगाये अथवा उसे लगानेकी आज्ञा दे। उसका क्रम इस प्रकार है। 'ॐ अग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्म व्योमेति भस्म सर्वꣳ ह वा इदं भस्म मन एतानि चक्षूꣳषि' इस मन्त्रसे भस्मको अभिमन्त्रित करे। तदनन्तर ईशानादि पाँच मन्त्रोंद्वारा उस भस्मका शिष्यके अंगोंसे स्पर्श कराकर उसे मस्तकसे लेकर पैरोंतक सर्वांगमें लगानेके लिये दे दे। शिष्य उस भस्मको विधिपूर्वक हाथमें लेकर 'त्र्यायुषम्०'$^१$, तथा 'त्र्यम्बकम्०'$^२$, इन दोनों मन्त्रोंको तीन-तीन बार पढ़ते हुए ललाट आदि अंगोंमें क्रमशः त्रिपुण्ड्र धारण करे।
तत्पश्चात् श्रेष्ठ शिष्य अपने हृदय-कमलमें विराजमान उमासहित भगवान् शंकरका भक्तियुक्त चित्तसे ध्यान करे। फिर गुरु शिष्यके मस्तकपर हाथ रखकर उसके दाहिने कानमें ऋषि, छन्द और देवतासहित प्रणवका उपदेश करे। इसके बाद कृपा करके प्रणवके अर्थका भी बोध कराये। श्रेष्ठ गुरुको चाहिये कि वह प्रणवके छः प्रकारके अर्थका ज्ञान कराते हुए उसके बारह भेदोंका उपदेश दे। तत्पश्चात् शिष्य दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर गुरुको साष्टांग प्रणाम करे और सदा उनके अधीन रहे, उनकी आज्ञाके बिना दूसरा कोई कार्य न करे। गुरुकी आज्ञासे शिष्य वेदान्तके तात्पर्यके अनुसार सगुण-निर्गुणभेदसे शिवके ज्ञानमें तत्पर रहे। गुरु अपने उसी शिष्यके द्वारा श्रवण, मनन और निदिध्यासनपूर्वक जपके अन्तमें प्रातःकालिक आदि नियमोंका अनुष्ठान करवाये। कैलासप्रस्तर नामक मण्डलमें शिवके द्वारा प्रतिपादित मार्गके अनुसार शिष्य वहीं रहकर शिवपूजन करे। यदि गुरुके आदेशके अनुसार वह प्रतिदिन वहीं रहकर मंगलमय देवता शिवकी पूजा करनेमें असमर्थ हो तो उनसे अर्घासहित स्फटिकमय शिवलिंग ग्रहण कर ले और कहीं भी रहकर नित्य उसका पूजन किया करे। वह गुरुके निकट शपथ खाते हुए इस तरह प्रतिज्ञा करे—'मेरे प्राण चले जायें, यह अच्छा है। मेरा सिर काट लिया जाय, यह भी अच्छा है; परंतु मैं भगवान् त्रिलोचनकी पूजा किये बिना कदापि भोजन नहीं कर सकता।' ऐसा कहकर सुदृढ़ चित्तवाला शिष्य मनमें शिवकी भक्ति लिये गुरुके निकट तीन बार शपथ खाय और तभीसे मनमें उत्साह रखकर उत्तम भक्तिभावसे पंचावरण-पूजनकी पद्धतिके अनुसार प्रतिदिन महादेवजीकी पूजा करे। (अध्याय १३)
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१- त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम्। यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नोऽस्तु त्र्यायुषम्॥ (यजुर्वेद ३।६२)
२- त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ (यजुर्वेद ३।६०)
789 संक्षिप्त शिवपुराण—21 B
* कैलाससंहिता * ६४३
प्रणवके अर्थोंका विवेचन
वामदेवजी बोले—भगवान् षडानन! सम्पूर्ण विज्ञानमय अमृतके सागर! समस्त देवताओंके स्वामी महेश्वरके पुत्र! प्रणतार्तिके भंजन कार्तिकेय! आपने कहा है कि प्रणवके छः प्रकारके अर्थोंका परिज्ञान अभीष्ट वस्तुको देनेवाला है। यह छः प्रकारके अर्थोंका ज्ञान क्या है? प्रभो! वे छः प्रकारके अर्थ कौन-कौनसे हैं और उनका परिज्ञान क्या वस्तु है? उनके द्वारा प्रतिपाद्य वस्तु क्या है और उन अर्थोंका परिज्ञान होनेपर कौन-सा फल मिलता है? पार्वतीनन्दन! मैंने जो-जो बातें पूछी हैं, उन सबका सम्यक्-रूपसे वर्णन कीजिये।
सुब्रह्मण्य स्कन्द बोले—मुनिश्रेष्ठ! तुमने जो कुछ पूछा है, उसे आदरपूर्वक सुनो। समष्टि और व्यष्टिभावसे महेश्वरका परिज्ञान ही प्रणवार्थका परिज्ञान है। मैं इस विषयको विस्तारके साथ कहता हूँ। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर! मेरे इस प्रवचनसे उन छः प्रकारके अर्थोंकी एकताका भी बोध होगा। पहला मन्त्ररूप अर्थ है, दूसरा यन्त्रभावित अर्थ है, तीसरा देवताबोधक अर्थ है, चौथा प्रपंचरूप अर्थ है, पाँचवाँ अर्थ गुरुके रूपको दिखानेवाला है और छठा अर्थ शिष्यके स्वरूपका परिचय देनेवाला है। इस प्रकार ये छः अर्थ बताये गये। मुनिश्रेष्ठ! उन छहों अर्थोंमें जो मन्त्ररूप अर्थ है, उसको तुम्हें बताता हूँ। उसका ज्ञान होनेमात्रसे मनुष्य महाज्ञानी हो जाता है। प्रणवमें वेदोंने पाँच अक्षर बताये हैं, पहला आदिस्वर—'अ', दूसरा पाँचवाँ स्वर—'उ', तीसरा पंचम वर्ग पवर्गका अन्तिम अक्षर 'म', उसके बाद चौथा अक्षर बिन्दु और पाँचवाँ अक्षर नाद। इनके सिवा दूसरे वर्ण नहीं हैं। यह समष्टिरूप वेदादि (प्रणव) कहा गया है। नाद सब अक्षरोंकी समष्टिरूप है; बिन्दु-युक्त जो चार अक्षर हैं, वे व्यष्टिरूपसे शिववाचक प्रणवमें प्रतिष्ठित हैं।
विद्वन्! अब यन्त्ररूप या यन्त्रभावित अर्थ सुनो। वह यन्त्र ही शिवलिंगरूपमें स्थित है। सबसे नीचे पीठ (अर्घा) लिखे। उसके ऊपर पहला स्वर अकार लिखे। उसके ऊपर उकार अंकित करे और उसके भी ऊपर पवर्गका अन्तिम अक्षर मकार लिखे। मकारके ऊपर अनुस्वार और उसके भी ऊपर अर्धचन्द्राकार नाद अंकित करे। इस तरह यन्त्रके पूर्ण हो जानेपर साधकका सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होता है। इस प्रकार यन्त्र लिखकर उसे प्रणवसे ही वेष्टित करे। उस प्रणवसे ही प्रकट होनेवाले नादके द्वारा नादका अवसान समझे।
मुने! अब मैं देवतारूप तीसरे अर्थको बताऊँगा, जो सर्वत्र गूढ़ है। वामदेव! तुम्हारे स्नेहवश भगवान् शंकरके द्वारा प्रतिपादित उस अर्थका मैं तुमसे वर्णन करता हूँ। 'सद्योजातं प्रपद्यामि' यहाँसे आरम्भ करके 'सदाशिवोम्' तक जो पाँच* मन्त्र हैं, श्रुतिने प्रणवको इन सबका वाचक कहा है। इन्हें ब्रह्मरूपी पाँच सूक्ष्म देवता समझना चाहिये। इन्हींका शिवकी मूर्तिके रूपमें भी विस्तारपूर्वक वर्णन है। शिवका वाचक
* इन पाँचों मन्त्रोंका उल्लेख पहले हो चुका है।
789 संक्षिप्त शिवपुराण—21 C
६४४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
मन्त्र शिवमूर्तिका भी वाचक है; क्योंकि मूर्ति और मूर्तिमान्में अधिक भेद नहीं है। ‘ईशान मुकुटोपेतः’ इस श्लोकसे आरम्भ करके पहले इन मन्त्रोंद्वारा शिवके विग्रहका प्रतिपादन किया जा चुका है। अब उनके पाँच मुखोंका वर्णन सुनो। पंचम मन्त्र ‘ईशानः सर्वविद्यानाम्’ को आदि मानकर वहाँसे लेकर ऊपरके ‘सद्योजात’ मन्त्रतक क्रमशः एक चक्रमें अंकित करे। फिर ‘सद्योजात’ से लेकर ‘ईशान’ मन्त्रतक क्रमशः उसी चक्रमें अंकित करे। ये ही पाँच भगवान् शिवके पाँच मुख बताये गये हैं। पुरुषसे लेकर सद्योजाततक जो ब्रह्मरूप चार मन्त्र हैं, वे ही महेश्वरदेवके चतुर्व्यूह पदपर प्रतिष्ठित हैं। ‘ईशान’ मन्त्र सद्योजातादि पाँचों मन्त्रोंका समष्टिरूप है। मुने! पुरुषसे लेकर सद्योजाततक जो चार मन्त्र हैं, वे ईशानदेवके व्यष्टिरूप हैं।
इसे अनुग्रहमय चक्र कहते हैं। यही पंचार्थका कारण है। यह सूक्ष्म, निर्विकार, अनामय परब्रह्मस्वरूप है। अनुग्रह भी दो प्रकारका है। एक तो तिरोभाव आदि पाँच$^१$ कृत्योंके अन्तर्गत है, दूसरा जीवोंको कार्यकारण आदिके बन्धनोंसे मुक्ति देनेमें समर्थ है। यह दोनों प्रकारका अनुग्रह सदाशिवका ही द्विविध कृत्य कहा गया है। मुने! अनुग्रहमें भी सृष्टि आदि कृत्योंका योग होनेसे भगवान् शिवके पाँच कृत्य माने गये हैं। इन पाँचों कृत्योंमें भी सद्योजात आदि देवता प्रतिष्ठित बताये गये हैं। वे पाँचों परब्रह्मस्वरूप तथा सदा ही कल्याणदायक हैं। अनुग्रहमय चक्र शान्त्यतीत$^२$ कलारूप है। सदाशिवसे अधिष्ठित होनेके कारण उसे परम पद कहते हैं। शुद्ध अन्तःकरणवाले संन्यासियोंको मिलनेयोग्य पद यही है। जो सदाशिवके उपासक हैं और जिनका चित्त प्रणवोपासनामें संलग्न है, उन्हें भी इसी पदकी प्राप्ति होती है। इसी पदको पाकर मुनीश्वरगण उन ब्रह्मरूपी महादेवजीके साथ प्रचुर दिव्य भोगोंका उपभोग करके महाप्रलयकालमें शिवकी समताको प्राप्त हो जाते हैं। वे मुक्त जीव फिर कभी संसारसागरमें नहीं गिरते।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे॥
(मुण्डक० ३।२।६)
—इस सनातन श्रुतिने इसी अर्थका प्रतिपादन किया है। शिवका ऐश्वर्य भी यह समष्टिरूप ही है। अथर्ववेदकी श्रुति भी कहती है कि वह सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न है। सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रदान करनेकी शक्ति सदाशिवमें ही बतायी गयी है। चमकाध्यायके पदसे यह सूचित होता है कि शिवसे बढ़कर दूसरा कोई पद नहीं है। ब्रह्मपंचकके विस्तारको ही प्रपंच कहते हैं। इन पाँच ब्रह्ममूर्तियोंसे ही निवृत्ति आदि पाँच कलाएँ हुई हैं। वे सब-की-सब सूक्ष्मभूत स्वरूपिणी होनेसे कारणरूपमें विख्यात हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वामदेव! स्थूल-रूपमें प्रकट जो यह जगत्-प्रपंच है, इसको जिसने पाँच रूपोंद्वारा व्याप्त कर रखा है, वह ब्रह्म अपने उन पाँचों रूपोंके साथ ब्रह्मपंचक नाम धारण करता है। मुनिश्रेष्ठ!
$^१$सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव तथा अनुग्रह—ये परमेश्वरके पाँच कृत्य हैं।
$^२$कलाएँ पाँच हैं—निवृत्तिकला, प्रतिष्ठाकला, विद्याकला, शान्तिकला तथा शान्त्यतीताकला।
789 संक्षिप्त शिवपुराण—21 D
* कैलाससंहिता * ६४५
पुरुष, श्रोत्र, वाणी, शब्द और आकाश—इन पाँचोंको ब्रह्मने ईशानरूपसे व्याप्त कर रखा है। मुनीश्वर! प्रकृति, त्वचा, पाणि, स्पर्श और वायु—इन पाँचको ब्रह्मने ही पुरुषरूपसे व्याप्त कर रखा है। अहंकार, नेत्र, पैर, रूप और अग्नि—ये पाँच अघोररूपी ब्रह्मसे व्याप्त हैं। बुद्धि, रसना, पायु, रस और जल—ये वामदेवरूपी ब्रह्मसे नित्य व्याप्त रहते हैं। मन, नासिका, उपस्थ, गन्ध और पृथिवी—ये पाँच सद्योजातरूपी ब्रह्मसे व्याप्त हैं। इस प्रकार यह जगत् पञ्चब्रह्मस्वरूप है। यन्त्ररूपसे बताया गया जो शिववाचक प्रणव है, वह नादपर्यन्त पाँचों वर्णोंका समष्टिरूप है तथा बिन्दुयुक्त जो चार वर्ण हैं, वे प्रणवके व्यष्टिरूप हैं। शिवके उपदेश किये हुए मार्गसे उत्कृष्ट मन्त्राधिराज शिवरूपी प्रणवका पूर्वोक्त यन्त्ररूपसे चिन्तन करना चाहिये। (अध्याय १४)
$$\sim\sim\circ\sim\sim$$
शैवदर्शनके अनुसार शिवतत्त्व, जगत्-प्रपंच और जीवतत्त्वके विषयमें विशद विवेचन तथा शिवसे जीव और जगत्की अभिन्नताका प्रतिपादन
तदनन्तर उत्तम श्रेष्ठ पद्धतिका वर्णन करके सृष्टि, स्थिति और संहार—सबको शक्तिमान् शिवकी लीला बतलाते हुए वामदेवजीके पूछनेपर स्कन्दने कहा—मुने! कर्मास्तित्त्वसे लेकर जो विस्तृत शास्त्रवाद है अर्थात् कर्मसत्ताके प्रतिपादक कर्मफलवादसे आरम्भ करके शास्त्रोंमें जो विविध विषयोंका विशद विवेचन है, वह ज्ञान प्रदान करनेवाला है; अतः ज्ञानवान् पुरुषको विवेकपूर्वक इसका श्रवण करना चाहिये। तुमने जिन शिष्योंको उपदेश दिया है, उनमेंसे कौन तुम्हारे समान है? वे अधम शिष्य आज भी अन्यान्य शास्त्रोंमें भटक रहे हैं। अनीश्वरवादी दर्शनोंके चक्करमें पड़कर मोहित हो रहे हैं। छः मुनियोंने उन्हें शाप दे रखा है; क्योंकि पहले वे शिवकी निन्दा किया करते थे। अतः उनकी बातें नहीं सुननी चाहिये; क्योंकि वे अन्यथावादी (शिव-शास्त्रके विपरीत बात करनेवाले) हैं। यहाँ पाँच* अवयवोंसे युक्त अनुमानके प्रयोगके लिये भी अवकाश है ही। उत्तम
* प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन—ये अनुमानके पाँच अवयव हैं। 'पर्वतो वह्निमान्' (पर्वतपर आग है)—यह प्रतिज्ञा है। 'धूमवत्त्वात् (क्योंकि वहाँ धूम दिखायी देता है)—यह हेतु है। 'जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ आग अवश्य रहती है, जैसे रसोईघर'—यह उदाहरण है। 'यतोऽयं धूमवान्' (चूँकि यह पर्वत धूमवान् है)—यह उपनय है। 'अतः अग्निमान्' (अतः अग्निसे युक्त है) यह निगमन है। इसी तरह ईश्वरके लिये भी अनुमान होता है—यथा—'क्षित्यङ्कुरादिकं कर्तृजन्यम्' (पृथिवी तथा अंकुर आदि किसी कर्ताद्वारा उत्पन्न हुए हैं)—यह प्रतिज्ञा है। 'कार्यत्वात्' (क्योंकि ये कार्य हैं—) यह हेतु है। 'यत्-यत् कार्यं तत्तत् कर्तृजन्यं यथा घटः कुम्भकारजन्यः' (जो-जो कार्य है, वह किसी-न-किसी कर्तासे उत्पन्न होता है, जैसे घड़ा कुम्भकारसे उत्पन्न होता है—यह उदाहरण हुआ। 'यत इदं कार्यम्' (चूँकि ये पृथ्वी आदि कार्य हैं)—यह उपनय हुआ। 'अतः कर्तृजन्यम्' (इसलिये कर्तासे उत्पन्न हुए हैं)—यह निगमन हुआ। पृथ्वी आदि कार्य हम-जैसे लोगोंसे उत्पन्न हुआ है, यह कहना सम्भव नहीं; अतः इसका कोई विलक्षण कर्ता है, वही सर्वशक्तिमान् ईश्वर है।