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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

॥ एकोनविंशः खण्डः ॥

१२६ छान्दोग्योपनिषद् श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स दिग्भिर्ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद य एवं वेद ॥ ६ ॥ श्रोत्र ही मनोमय ब्रह्म का चतुर्थ पाद है। वह दिशाओं रूपी ज्योति से दीप्तिमान् और तेजस्वी होता है। जो साधक इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति, यश और ब्रह्मवर्चस से देदीप्यमान और तेजस्वी होता है ॥ ६ ॥ ॥ एकोनविंशः खण्डः ॥ आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत्तत्सदासीत्तत्समभव- तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम् ॥ १ ॥ आदित्य ही ब्रह्म है, ऐसा विवेचन मिलता है। उसी की विविध व्याख्याएँ की जाती हैं। आदि में यह असत्रूप (अदृश्य) ही था, तदनन्तर वह सत्रूप (प्रत्यक्ष-प्रकट) हुआ। वह विकसित होकर अण्डे में परिवर्तित हुआ। कालान्तर में वह अण्ड विकसित होकर फूटा। उसके दो खण्ड हुए- एक रजत, दूसरा स्वर्ण ॥ १ ॥ तद्यद्रजतं सेयं पृथिवी यत्सुवर्णं सा द्यौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्बं समेघो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकं स समुद्रः ॥ २ ॥ उनमें जो खण्ड रजत रूप प्रकट हुआ, वह यह पृथिवी है और जो स्वर्णरूप खण्ड प्रकट हुआ, वह द्युलोक है। उस अण्डे का जो जरायु भाग था, वे पर्वत हैं, जो उल्ब भाग था, वह मेघयुक्त कुहरा है, जो धमनियां थीं, वे नदियाँ हैं तथा जो मूत्राशय का जल था, वह समुद्र है ॥ २ ॥ अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्तं जायमानं घोषा उलूलवोऽनूदतिष्ठन्त् सर्वाणि च भूतानि च सर्वे च कामास्तस्मात्तस्योदयं प्रति प्रत्यायनं प्रति घोषा उलूलवोऽनूत्तिष्ठन्ति सर्वाणि च भूतानि सर्वे चैव कामाः ॥ ३ ॥ उस अण्डे से जो उत्पन्न हुआ, वह आदित्य ही है। उससे विस्फोट जन्य तीव्र घोष उत्पन्न हुआ, उसी से सम्पूर्ण प्राणी और सम्पूर्ण भोग-साधन उत्पन्न हुए हैं। इसीलिए आदित्य के उदय और अस्त होने पर तीव्र घोष होता है और समस्त प्राणी एवं सम्पूर्ण भोग-साधन विकसित होते हैं ॥ ३ ॥ स य एतमेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो घोषा आ च गच्छेयुरुप च निम्रेडेरन्निम्रेडेरन् ॥४॥ इस प्रकार जो 'आदित्य ही ब्रह्म है', यह जानकर उपासना करता है, इसके समीप सुखप्रद घोष सुनाई देते हैं और उसे सुख प्रदान करते हैं, सन्तोष प्रदान करते हैं ॥ ४ ॥

अध्याय ४ खण्ड १ मन्त्र ६ १२७

अध्याय ४ खण्ड १ मन्त्र ६ १२७ ॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य आस स ह सर्वत आवसथान्मापयांचक्रे सर्वत एव मेऽत्स्यन्तीति ॥ १ ॥ जनश्रुत राजा के प्रपौत्र श्रद्धापूर्वक बहुत धन दान किया करते थे। उनके यहाँ बहुत अन्न पकाया जाता था। उन्होंने अपने राज्य में अनेक विश्रामालय बनवा दिये थे, ताकि लोग वहाँ ठहरकर भोजन ग्रहण कर सकें ॥ १ ॥ अथ ह हँसा निशायामतिपेतुस्तद्धैवँ हँसो हँसमभ्युवाद हो होऽयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत्त्वा मा प्रधाक्षीरिति ॥ २ ॥ फिर एक बार रात्रि के समय दो हंस उस राज्य के ऊपर से उड़ते हुए जा रहे थे, उनमें से एक हंस ने दूसरे से कहा- हे मन्द दृष्टि ! जनश्रुत राजा के प्रपौत्र का तेज द्युलोक के सदृश व्याप्त हो रहा है। तू उसे स्पर्श न कर, वह तुझे भस्म न कर दे ॥ २ ॥ तमु ह परः प्रत्युवाच कम्बर एनमेतत्सन्तः सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथँ सयुग्वा रैक्व इति ॥ ३ ॥ दूसरे हंस ने कहा - अरे तुम किस महत्त्वाकांक्षी राजा के लिए सम्मानजनक शब्द कहते हो। क्या यह गाड़ी वाले रैक्व के सदृश है ? इस पर पहले वाले हंस ने कहा- यह गाड़ी वाला रैक्व कौन है ? ॥ ३ ॥ यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनँ सर्वं तदभिसमेति यत्किंच प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ४ ॥ जिस प्रकार द्यूत क्रीड़ा में पुरुष कृतसंज्ञक पासे को जीतकर सम्पूर्ण निम्न पासे अपने अधीन कर लेता है, उसी प्रकार राजा जो कुछ सत्कर्म करता है, वह सब रैक्व को प्राप्त हो जाता है। वह रैक्व जिस (गूढ़ तत्त्व दर्शन) को जानता है, उसे कोई नहीं जानता। उनके विषय में मैं इतना ही जानता हूँ ॥ ४ ॥ तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशुश्राव स ह संजिहान एव क्षत्तारमुवाचाङ्गारे ह सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथँ सयुग्वा रैक्व इति ॥ ५ ॥ हंसों की वार्ता को जनश्रुत के प्रपौत्र ने सुना। प्रातःकाल उठते ही उन्होंने स्तुतिकर्ता सेवकों से कहा- क्या तुम मेरी स्तुति गाड़ी वाले रैक्व के समान करते हो ? सेवकों ने कहा- यह गाड़ी वाला रैक्व कौन है ? ॥ ५ ॥ यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनँ सर्वं तदभिसमेति यत्किंच प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ६ ॥ जिस प्रकार द्यूतक्रीड़ा में पुरुष कृत नामक पासे को जीतकर अन्य सभी निम्न पासे को अपने अधीन कर लेता है, उसी प्रकार राजा जो कुछ सत्कर्म करता है, वह सब रैक्व को प्राप्त हो जाता है। जो कुछ रैक्व जानते हैं, उसे कोई और नहीं जानता, ऐसा उनके विषय में मुझसे कहा गया है ॥ ६ ॥

जहाँ ब्राह्मण की खोज की जाती है, वहाँ उन्हें ढूँढ़ो ॥ ७ ॥

१२८ छान्दोग्योपनिषद् स ह क्षत्तान्विष्य नाविदमिति प्रत्येयाय तँ होवाच यत्रारे ब्राह्मणस्यान्वेषणा तदेनमच्छेति ॥ ७ ॥ वे सेवक रैक्व को ढूँढ़ने के पश्चात् वापस लौटकर कहते हैं- 'उसे नहीं पा सके'। तब राजा ने कहा- जहाँ ब्राह्मण की खोज की जाती है, वहाँ उन्हें ढूँढ़ो ॥ ७ ॥ सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणमुपोपविवेश तँ हाभ्युवाद त्वं नु भगवः सयुग्वा रैक्व इत्यहँ ह्या ३ इति ह प्रतिजज्ञे स ह क्षत्ताऽविदमिति प्रत्येयाय ॥ ८ ॥ उन्होंने एक शकट के नीचे खाज खुजाते हुए रैक्व को देखकर उनसे पूछा- भगवन्! क्या आप ही गाड़ी वाले रैक्व हैं ? उनने कहा हाँ मैं ही हूँ। ऐसा जानकर सेवक राजा के पास चले आये ॥ ८ ॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ तदुह जानश्रुतिः पौत्रायणः षट् शतानि गवां निष्कमश्वतरीरथं तदादाय प्रतिचक्रमे तँ हाभ्युवाद ॥ १ ॥ तब राजा जनश्रुत के प्रपौत्र छः सौ गौएँ, एक हार और खच्चरों से खींचा जाने वाला एक रथ लेकर रैक्व के पास गये और बोले ॥ १ ॥ रैक्वेमानि षट् शतानि गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथो नु म एतां भगवो देवताँ शाधि यां देवतामुपास्स इति ॥ २ ॥ हे रैक्व! ये छः सौ गौएँ, एक हार और खच्चरों से जुतां एक रथ आपके निमित्त लाया हूँ, इसे ग्रहण करें। हे भगवन्! आप जिस देवता की उपासना करते हैं, उसका मुझे उपदेश करें। ऐसा राजा ने रैक्व से कहा ॥ २ ॥ तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति तदुह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे ॥ ३ ॥ उस राजा से रैक्व ने कहा- हे क्षुद्र ! गौएँ, हार और रथ अपने पास रखो। तब जनश्रुत के प्रपौत्र एक सहस्र गौएँ, एक हार, खच्चरों से जुता रथ और अपनी कन्या लेकर उनके पास आये ॥ ३ ॥ तँ हाभ्युवाद रैक्वेदं सहस्रं गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथ इयं जायाऽयं ग्रामो यस्मिन्नास्सेऽन्वेव मा भगवः शाधीति ॥ ४ ॥ राजा ने रैक्व से कहा- हे रैक्व ! ये एक हजार गौएँ, यह हार, खच्चरों से जुता रथ, यह पत्नी और यह गाँव (जिसमें आप रहते हैं) आप ले लें। हे भगवन् ! मुझे ईश्वरीय अनुशासन बतायें ॥ ४ ॥ तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाचाजहारेमाः शूद्रानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इति ते हैते रैक्व पर्णा नाम महावृषेषु यत्रास्मा उवास तस्मै होवाच ॥ ५ ॥ तब रैक्व ने उस राजकन्या को विद्या ग्रहण का द्वार समझकर राजा से कहा- 'हे क्षुद्र ! आप ये जो कुछ लाए हैं, ये सब गौण हैं; परन्तु विद्या ग्रहण के इस द्वार से आप (प्रसन्न करके) मुझसे उपदेश कराते हैं'। इस प्रकार जितने क्षेत्र में वे 'रैक्व' रहते थे, वे सभी गाँव महावृष देश में 'रैक्वपर्ण' के नाम से प्रसिद्ध हुए। (इससे प्रसन्न होकर) उन (रैक्व) ने उस राजा से कहा- ॥ ५ ॥

अध्याय ४ खण्ड ३ मन्त्र ८ १२१

अध्याय ४ खण्ड ३ मन्त्र ८ १२१ ॥ तृतीयः खण्डः ॥ वायुर्वाव संवर्गो यदा वा अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ॥ १ ॥ वायु ही संवर्ग है। जब अग्नि शान्त होती है, तो वायु में ही समाहित होती है। जब सूर्य अस्त होता है, तो वायु में ही समाहित होता है और जब चन्द्रमा अस्त होता है, तो वायु में ही समाहित हो जाता है॥ यदाप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुर्हेवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इत्यधिदैवतम् ॥ २॥ जब जल सूखता है, तो वायु में ही समाहित हो जाता है। इस प्रकार वायु ही इन सबको अपने में समाहित कर देने वाला है। यह आधिदैविक उपासना है॥ २॥ अथाध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणःश्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इति ॥ ३ ॥ अब आध्यात्मिक तत्त्व का विवेचन किया जाता है। प्राण ही संवर्ग है। जब साधक सोता है, तब प्राण में ही वागिन्द्रिय समाहित हो जाती है। प्राण में ही चक्षु, श्रोत्र और मन समाहित हो जाते हैं। इस प्रकार प्राण ही इन सबको अपने में समाहित कर लेने वाला है॥ ३॥ तौ वा एतौ द्वौ संवर्गों वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ॥ ४ ॥ इस प्रकार मात्र दो ही संवर्ग हैं। देवताओं में वायु संवर्ग हैं और इन्द्रियों में प्राण संवर्ग है॥४॥ अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी बिभिक्षे तस्मा उ ह न ददतुः ॥ ५॥ एक समय शौनक कापेय और अभिप्रतारी काक्षसेनि को जब भोजन परोसा जा रहा था, तब एक ब्रह्मचारी ने उनसे भिक्षा माँगी; किन्तु उन्होंने (उसकी पात्रता परखे बिना) भिक्षा नहीं दी॥ ५॥ स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः स जगार भुवनस्य गोपास्तं कापेय नाभिप्रश्यन्ति मर्त्या अभिप्रतारिन्बहुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति ॥ ६ ॥ तब उस ब्रह्मचारी ने कहा- भुवनों के स्वामी उन देव प्रजापति ने चार महान् स्वरूपों को अपने में समाहित कर लिया है। हे कापेय! हे अभिप्रतारिन्! विभिन्न स्वरूपों में निवास करने वाले उन देव को मनुष्य नहीं देख पाते और जिसके लिए यह अन्न है, उसे (देव प्रजापति को ) ही अन्न नहीं दिया गया ॥ ६ ॥ तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायात्मा देवानां जनिता प्रजानाःहिरण्यदंष्ट्रो बभसो ऽनसूरिर्महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदनन्नमत्तीति वै वयं ब्रह्मचारिन्नेदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति ॥ ७॥ उनके कथन का शौनक कापेय मुनि ने विचार किया और ब्रह्मचारी से कहा- जो देवताओं की आत्मा, प्रजाओं के जनक, हिरण्यदंष्ट्र, भक्षणवृत्ति वाले, बुद्धिमान् और महिमावान् हैं, जो दूसरों से न खाये जाने वाले और अन्न न खाने वाले हैं। हे ब्रह्मचारिन् ! हम उसी देव की उपासना करते हैं- ऐसा कहकर उन्होंने ब्रह्मचारी को भिक्षा देने का आदेश दिया ॥ ७॥ तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश संतस्तत्कृतं तस्मात्सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव दशकृतः सैषा विराडन्नादी तयेदः सर्वं दृष्टः सर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८॥

॥ चतुर्थः खण्डः ॥

१३० छान्दोग्योपनिषद् तब उन्होंने उसे भिक्षा दे दी। वह वाणी आदि पञ्च इन्द्रियों से भिन्न है तथा अग्नि, वायु आदि पञ्चभूतों से भी भिन्न सत्ता है। इस प्रकार ये सब संख्या में दस होते हैं। वह विराट् सत्ता ही अन्न का भक्षण करने वाली है। वही सम्पूर्ण जगत् रूप में दृष्ट है। जो ऐसा जानते हैं, उनके द्वारा यह सब दृष्ट होता है और वे अन्न का भक्षण करने वाले होते हैं ॥ ८ ॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरममन्त्रयांचक्रे ब्रह्मचर्यं भवति विवत्स्यामि किं गोत्रोन्वहमस्मीति ॥ १ ॥ सत्यकाम जाबाल ने अपनी माँ जबाला से कहा- हे मातः! मैं ब्रह्मचारी बनकर गुरुकुल में रहना चाहता हूँ, मुझे बताएँ कि मेरा गोत्र क्या है? ॥ १ ॥ सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति ॥ २ ॥ जबाला ने कहा- हे तात! तुम जिस गोत्र के हो, उसे मैं भी नहीं जानती। यौवनावस्था में मैं बहुत से अतिथियों की परिचर्या में संलग्न रहती थी। उन्हीं दिनों तुझे प्राप्त किया, तत्पश्चात् तुम्हारे पिता के न रहने पर(उनके दिवंगत हो जाने पर) मैं गोत्र न जान सकी। अतः मैं नहीं जानती कि तुम्हारा गोत्र क्या है? मैं जबाला नाम की हूँ और तुम सत्यकाम नाम के हो, अतः आचार्य से कहो- मैं सत्यकाम जाबाल हूँ ॥ २ ॥ स ह हारिद्रुमतं गौतममेत्योवाच ब्रह्मचर्यं भगवति वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति ॥ ३ ॥ उन्होंने ऋषि हारिद्रुमत गौतम के पास जाकर कहा - हे भगवन् ! मैं आपके पास ब्रह्मचर्य पूर्वक निवास करना चाहता हूँ, इसलिए मैं आपके पास आया हूँ ॥ ३ ॥ तः होवाच किंगोत्रो नु सोम्यासीति स होवाच नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्म्यपृच्छं मातरः सा मा प्रत्यब्रवीद्बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसीति सोऽहं सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥ ४ ॥ गौतम ऋषि ने कहा- हे सोम्य! तुम किस गोत्र के हो ? उनने कहा- हे भगवन्! मैं किस गोत्र का हूँ, यह मैं नहीं जानता। मैंने अपनी माता से पूछा तो उन्होंने कहा कि मैं बहुत पहले से अतिथियों की सेवा करती रहती थी, जब तुझे प्राप्त किया, तब तुम्हारे पिता के (शीघ्र) न रहने से मैं गोत्र न जान सकी (पूछ सकी)। अतः मैं नहीं जानती कि तुम किस गोत्र के हो ? मेरा नाम जबाला है, तुम्हारा सत्यकाम। अतः मैं सत्यकाम जाबाल हूँ ॥ ४ ॥ तः होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधः सोम्याहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति तमुपनीय कृशानामबलानां चतुःशता गा निराकृत्योवाचेमाः सोम्यानुसंव्रजेति ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणावर्त्तयेति स ह वर्षगणं प्रोवास ता यदा सहस्रं संपेदुः ॥ ५ ॥ गौतम ऋषि ने कहा- ऐसी सत्य अभिव्यक्ति ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं कर सकता। हे सोम्य! चूँकि तुमने सत्य वचनों का त्याग नहीं किया, अतः तुम समिधा ले आओ, मैं तुम्हारा उपनयन

॥ पञ्चमः खण्डः ॥

अध्याय-४ खण्ड ६ मन्त्र ३ १३१ करूँगा। तब उन्होंने सत्यकाम का उपनयन करके चार सौ कृश एवं अबला गौओं को देकर उनसे कहा- हे सोम्य ! तुम इन गौओं को ले जाकर चराना। इन्हें वन में तब तक चराना, जब तक ये सहस्र गौएँ न हो जाएँ। उन गौओं के अनुगामी होकर सत्यकाम ने कहा - हे आचार्य ! जब तक ये सहस्र गौएँ न हो जाएँगी तब तक नहीं लौटूँगा। सहस्र संख्यक गौएँ होने तक वे वर्षों वन में भ्रमण करते रहे ॥ ५ ॥ ॥ पञ्चमः खण्डः ॥ अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्राप्ताः सोम्य सहस्रं स्मः प्रापय न आचार्यकुलम् ॥ १ ॥ एक दिन वृषभ ने सत्यकाम से कहा- हे सत्यकाम ! अब हम एक हजार हो गये हैं, हमें आचार्य के पास ले चलो ॥ १ ॥ ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राची दिक्कला प्रतीची दिक्कला दक्षिणा दिक्कलोदीची दिक्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम ॥ २ ॥ पुनः वृषभ ने सत्यकाम से कहा- हे सत्यकाम ! क्या मैं तुम्हें ब्रह्म का एक पाद बताऊँ ? सत्यकाम ने उनसे कहा- हे भगवन् ! मुझे अवश्य बताएँ। तब वृषभ ने कहा- पूर्व, पश्चिम,उत्तर और दक्षिण ये दिक् कलाएँ हैं। वह 'प्रकाशमान' संज्ञक ब्रह्म इन चारों कलाओं में एक पाद व्याप्त करता है ॥ २ ॥ स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते प्रकाशवानस्मिँल्लोके भवति प्रकाशवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते ॥ ३ ॥ इस प्रकार जानने वाला जो विद्वान् ब्रह्म के प्रकाशवान् स्वरूप की उपासना करता है, वह इस लोक में प्रकाशवान् होता है और प्रकाशवान् लोकों को विजित करता है। इस प्रकार वह विद्वान् जो चतुष्कल पाद की ब्रह्म के प्रकाशमान रूप की उपासना करता है, वह उसी स्वरूप को प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ ॥ षष्ठः खण्डः ॥ अग्निष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ॥ १ ॥ उस वृषभ ने उनसे पुनः कहा- ब्रह्म का दूसरा पाद तुम्हें अग्निदेव बताएँगे। सत्यकाम ने गौओं को आचार्य कुल की ओर हाँक दिया। सायंकाल जहाँ हुई, वहीं वे गौओं को रोककर अग्निदेव को प्रज्वलित कर समिधाधान करके अग्नि के पश्चिम में, पूर्व की ओर मुख करके बैठ गये ॥ १ ॥ तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥ अग्निदेव ने सत्यकाम को सम्बोधित किया। प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा- जी भगवन् ! ॥ २ ॥ ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच पृथिवी कलान्तरिक्षं कला द्यौः कला समुद्रः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम ॥ ३ ॥ अग्निदेव ने उनसे कहा- हे सोम्य ! मैं आपको ब्रह्म का दूसरा पाद बताऊँ ? उन्होंने कहा- हे भगवन् ! मुझे अवश्य बताएँ। तब अग्निदेव ने कहा- एक कला पृथ्‍वी, दूसरी कला अन्तरिक्ष, तीसरी कला द्युलोक और चौथी कला समुद्र है। हे सोम्य! ब्रह्म का यह चतुष्कल पाद अनन्तवान् संज्ञक है ॥ ३ ॥

१३२ छान्दोग्योपनिषद् स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्तेऽनन्तवानस्मिँल्लोके भवत्यनन्तवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ इस प्रकार जानने वाला जो विद्वान् ब्रह्म के अनन्तवान् संज्ञक चतुष्कल पाद की उपासना करता है, वह इस लोक में अनन्तवान् होता है और अनन्तवान् लोकों को विजित करता है। इस प्रकार ब्रह्म के अनन्तवान् संज्ञक चतुष्कल पाद की उपासना करने वाला विद्वान् ब्रह्म के उसी स्वरूप को प्राप्त होता है ॥४॥ ॥ सप्तमः खण्डः ॥ हँसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ्ङोपविवेश ॥ १ ॥ अग्निदेव ने उनसे कहा- आपको ब्रह्म का तीसरा पाद हंस बताएगा। दूसरे दिन उन्होंने गौओं को आचार्यकुल की ओर हाँक दिया। जहाँ सायंकाल हुई, वहाँ वे गौओं को रोककर अग्नि प्रज्वलित कर समिधाधान करके अग्नि के पश्चिमी ओर पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये ॥ १ ॥ तँ हंस उप निपत्याभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥ तब हंस ने अग्नि के समीप उतर कर सत्यकाम को पुकारा, उन्होंने प्रत्युत्तर दिया- जी भगवन् ! ॥ २ ॥ ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युत्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम ॥ ३ ॥ हंस ने उनसे कहा- हे सोम्य ! मैं तुम्हें ब्रह्म का तीसरा पाद बताऊँ ? सत्यकाम ने कहा- हाँ भगवन् ! आप मुझे बताएँ। तब हंस ने उनसे कहा- अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा और विद्युत् - ये चार कलाएँ हैं। हे सोम्य ! ब्रह्म का यह चतुष्कल पाद ज्योतिष्मान् नाम का है ॥ ३ ॥ स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिँल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ इस प्रकार जानने वाला जो विद्वान् ब्रह्म के इस 'ज्योतिष्मान्' संज्ञक चतुष्कल पाद की उपासना करता है, वह इस लोक में ज्योतिष्मान् होता है और ज्योतिष्मान् लोकों को विजित करता है। इस प्रकार ब्रह्म के ज्योतिष्मान् स्वरूप की उपासना करने वाला विद्वान् ब्रह्म के उसी स्वरूप को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ ॥ अष्टमः खण्डः ॥ मद्गुष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ्ङोपविवेश ॥ १ ॥ हंस ने सत्यकाम से कहा- मद्गु (जलपक्षी) तुम्हें ब्रह्म का चौथा पाद बताएगा। अगले दिन उन्होंने गौओं को आचार्य कुल की ओर हाँक दिया। जहाँ सायंकाल हुई, वहाँ वे गौओं को रोककर अग्नि प्रज्वलित कर समिधाधान करके अग्नि के पश्चिमी ओर पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये ॥ १ ॥ तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥ मद्गु ने उनके पास आकर उन्हें पुकारा, तो सत्यकाम ने उत्तर दिया- जी भगवन् ! ॥ २ ॥

अध्याय ४ खण्ड १० मन्त्र १ १३३

अध्याय ४ खण्ड १० मन्त्र १ १३३ ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राणः कला चक्षुः कला श्रोत्रं कला मनः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मण आयतनवान्नाम ॥ ३॥ तब मद्गु ने उनसे कहा- हे सोम्य ! मैं तुम्हें ब्रह्म का चौथा पाद बताऊँगा ? सत्यकाम ने कहा- हे भगवन् ! मुझे अवश्य बताएँ। प्राण, चक्षु, श्रोत्र और मन- ये चार कलाएँ हैं। हे सोम्य! यह ब्रह्म का चतुष्कल पाद आयतनवान् (आश्रययुक्त) संज्ञा का है॥ ३॥ स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्त आयतनवानस्मिँल्लोके भवत्यायतनवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते ॥४॥ इस प्रकार जानने वाला जो विद्वान् ब्रह्म के इस 'आयतनवान्' संज्ञक चतुष्कल पाद की उपासना करता है, वह इस लोक में आयतनवान् होता है और आयतनवान् लोकों को विजित करता है। इस प्रकार ब्रह्म के आयतनवान् स्वरूप की उपासना करने वाला विद्वान् ब्रह्म के उसी स्वरूप को प्राप्त होता है॥ ४॥ ॥ नवमः खण्डः ॥ प्राप हाचार्यकुलं तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ १॥ जब सत्यकाम आचार्यकुल में पहुँचे, तो आचार्य ने उन्हें सम्बोधित किया- सत्यकाम ! उन्होंने उत्तर दिया जी भगवन् !॥ १॥ ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वानुशशासेत्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे भगवाँस्त्वेव मे कामे ब्रूयात् ॥ २॥ आचार्य ने उनसे कहा हे सोम्य ! तुम ब्रह्मवेत्ता के सदृश दीप्तिमान् हो रहे हो, तुम्हें किसने उपदेश दिया ? सत्यकाम ने उन्हें उत्तर दिया- हे आचार्य ! मुझे मनुष्य से भिन्न प्राणियों ने उपदेश दिया है। अब मेरी कामना के अनुसार आप ही मुझे उपदेश करें ॥ २ ॥ श्रुतः ह्येव मे भगवद्दृशेभ्य आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापतीति तस्मै हैतदेवोवाचात्र ह न किंचन वीयायेति वीयायेति ॥ ३॥ तब आचार्य ने उन्हें उपदेश किया- मैंने भगवद् स्वरूप ऋषियों के मुख से सुना है कि आचार्य के मुख से जानी गई विद्या ही उपयुक्तता-सार्थकता को प्राप्त होती है। आगे उन्होंने जब उपदेश किया, तो कुछ भी जानना शेष न रहा अर्थात् वे सम्पूर्ण ज्ञान को प्राप्त हुए ॥ ३॥ ॥ दशमः खण्डः ॥ उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास तस्य ह द्वादशवर्षाण्यग्नीन्परिचचार स ह स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयँस्तँ ह स्मैव न समावर्तयति ॥ १॥ उपकोसल कामलायन (कमल का वंशज) सत्यकाम जाबाल के आचार्यत्व में ब्रह्मचर्य पूर्वक वास करते थे। उन्होंने बारह वर्ष तक आचार्यकुल में अग्नियों की परिचर्या की । आचार्य सत्यकाम ने अन्य ब्रह्मचारियों का समावर्तन संस्कार कर दिया, परन्तु उनका नहीं किया ॥ १॥

१३४ छान्दोग्योपनिषद् तं जायोवाच तप्तो ब्रह्मचारी कुशलमग्नीन्परिचचारीन्मा त्वाग्नयः परिप्रवोचन्प्रब्रूह्यस्मा इति तस्मै हाप्रोच्यैव प्रवासांचक्रे ॥ २ ॥ आचार्य सत्यकाम से उनकी धर्मपत्नी ने कहा- यह ब्रह्मचारी बहुत तपश्चर्या कर चुका है, इनके द्वारा भली प्रकार अग्नियों की परिचर्या भी की गई है। अतः आप इसे उपदेश कर दें, जिससे अग्नियां आपकी निन्दा न करें, किन्तु वे बिना कुछ कहे प्रवास पर चल दिये ॥ २ ॥ स ह व्याधिनानशितुं दधे तमाचार्यजायोवाच ब्रह्मचारिन्नशान किंनु नाश्नासीति स होवाच बहव इमेऽस्मिन्पुरुषे कामा नानात्यया व्याधिभिः प्रतिपूर्णोऽस्मि नाशिष्यामीति ॥ ३ ॥ उन उपकोसल ने मानसिक व्यथा से अनशन करने का निश्चय किया। उनसे आचार्य की धर्मपत्नी ने कहा- हे ब्रह्मचारिन् ! तू भोजन क्यों नहीं करता ? उन्होंने कहा- इस पुरुष में बहुत सी कामनाएँ रहती हैं, जो दुःख देती हैं। मैं उन्हीं विविध मानसिक व्यथाओं से परिपूर्ण हूँ, अतः भोजन नहीं करूँगा ॥ ३ ॥ अथ हाग्नयः समूदिरे तप्तो ब्रह्मचारी कुशलं नः पर्यचारीद्धन्तास्मै प्रब्रवामेति तस्मै होचुः ॥ तदनन्तर अग्नियों ने एकत्रित होकर आपस में कहा- यह ब्रह्मचारी तपश्चर्या कर चुका है। इसने हमारी भली प्रकार परिचर्या की है। अब हम इसे उपदेश करते हैं। ऐसा उन अग्नियों ने निश्चय कर उनसे कहा- प्राण ब्रह्म है। 'क' (सुख) ब्रह्म है और 'ख' (आकाश) ब्रह्म है ॥ ४ ॥ प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति स होवाच विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामीति ते होचुर्यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः ॥ ५ ॥ उपकोसल ने कहा- यह मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है, किन्तु 'क' और 'ख' मैं नहीं जानता। उन अग्नियों ने उत्तर दिया- जो 'क' है वही 'ख' है और जो 'ख' है वही 'क' है। इस प्रकार उन्होंने उपकोसल को प्राण और उसके आधारभूत आकाश का उपदेश किया ॥ ५ ॥ ॥ एकादशः खण्डः ॥ अथ हैनं गार्हपत्योऽनुशशास पृथिव्यग्निरन्नमादित्य इति य एष आदित्ये पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥ आगे उन्हें गार्हपत्याग्नि ने उपदेश किया- पृथिवी, अग्नि, अन्न और आदित्य, इन चारों में मैं ही हूँ। आदित्य के मध्य जो पुरुष दिखाई देता है, वह मैं ही हूँ, वही मेरा (विस्तृत) रूप है ॥ १ ॥ स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकीभवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिँश्च लोकेऽमुष्मिँश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥ जो पुरुष इस प्रकार जानकर उसकी (आदित्य पुरुष की) उपासना करता है, वह पाप कर्मों को नष्ट कर देता है। वह अग्नि के भोगों (लोक) को प्राप्त होता है, पूर्ण आयु का उपभोग करता है, तेजस्वी जीवन जीता है, उनके वंशज क्षीण नहीं होते। इस प्रकार जानकर जो पुरुष उसकी उपासना करता है, उसका हम (अग्नियाँ) इस लोक तथा परलोक (अदृश्य लोक) में भी पालन करती हैं ॥ २ ॥

अध्याय ४ खण्ड १४ मन्त्र २ १३५

अध्याय ४ खण्ड १४ मन्त्र २ १३५ ॥ द्वादशः खण्डः ॥ अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशासापो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इति य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥ तदनन्तर अन्वाहार्यपचन (दक्षिणाग्नि) ने उन्हें उपदेश किया-जल, दिशा, नक्षत्र और चन्द्रमा- ये चार रूप मेरे ही हैं। चन्द्रमा के मध्य जो पुरुष दिखाई देता है, वह मैं ही हूँ, वही मेरा रूप है ॥ १ ॥ स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकीभवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ वह साधक जो इस प्रकार जानकर उसकी (चन्द्र पुरुष) की उपासना करता है, वह पाप कर्मों को विनष्ट करता है, चन्द्रलोक को प्राप्त होता है, पूर्ण आयु का उपभोग करता है और तेजस्वी जीवन जीता है। उसके अनुवर्ती वंशज कभी क्षीण नहीं होते। जो इस प्रकार जानकर उसकी उपासना करता है, इस लोक तथा परलोक में भी हम (अग्नियाँ) उसका पालन करती हैं ॥ २ ॥ ॥ त्रयोदशः खण्डः ॥ अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास प्राण आकाशो द्यौर्विद्युदिति य एष विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥ उसके बाद आहवनीय अग्नि ने उन्हें उपदेश किया-प्राण, आकाश, द्युलोक और विद्युत् - इन चारों में मैं ही हूँ। यह जो विद्युत् के मध्य पुरुष दिखायी देता है, वह मैं ही हूँ। वही मेरा रूप है ॥ १ ॥ स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥ वह साधक जो इस प्रकार जानकर उसकी (विद्युत् पुरुष की ) उपासना करता है, वह पापकर्मों को विनष्ट करता है, विद्युत् लोक में भोगों से युक्त होता है, पूर्ण आयु का उपभोग करता है और तेजस्वी जीवन जीता है। उसके अनुवर्ती वंशज कभी क्षीण नहीं होते। जो इस प्रकार जानकर उसकी उपासना करता है, हम (अग्नियाँ) उसका इस लोक में और परलोक में भी पालन करती हैं ॥ २ ॥ ॥ चतुर्दशः खण्डः ॥ ते होचुरुपकोसलैषा सोम्य तेऽस्मद्विद्यात्मविद्या चाचार्यस्तु ते गतिं वक्तेत्याजगाम हास्याचार्यस्तमाचार्योऽभ्युवादोपकोसल ३ इति ॥ १ ॥ उन अग्नियों ने उपकोसल से कहा- हे उपकोसल ! हे सोम्य ! तुम्हारे लिए हमने यह विद्या (अग्नि) और आत्म विद्या कही। इससे आगे की विद्या तुझे आचार्य बताएँगे। इसके बाद आचार्य आये और उपकोसल को सम्बोधित किया- उपकोसल ! ॥ १ ॥ भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद इव सोम्य ते मुखं भाति को नु त्वानुशशासेति को नु मानुशिष्याद्भो इतीहापेव निहुत इमे नूनमीदृशा अन्यादृशा इतीहाग्नीनभ्यूदे किं नु सोम्य किल तेऽवोचन्निति ॥ २ ॥

१३६ छान्दोग्योपनिषद उन्होंने प्रत्युत्तर दिया- जी भगवन्! आचार्य सत्यकाम ने उनसे कहा- हे सोम्य! तुम्हारा मुख ब्रह्मवेत्ता के सदृश दिखाई पड़ता है। उपकोसल ने उनसे कहा- भगवन्! मुझे उपदेश देने वाला यहाँ कौन है? तब अग्नियों की ओर संकेत कर कहा- उन्होंने ही मुझे उपदेश दिया है, परन्तु अब ये अन्य स्वरूप में हैं। आचार्य ने उनसे कहा- हे सोम्य! इन्होंने क्या उपदेश किया है? ॥ २ ॥ इदमिति ह प्रतिजज्ञे लोकान्वाव किल सोम्य तेऽवोचन्न्रहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाश ? आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच ॥ ३ ॥ उपकोसल ने अग्नियों का उपदेश आचार्य को बताया। तब आचार्य ने उनसे कहा- हे सोम्य! इन्होंने तो तुझे केवल लोकों का ज्ञान दिया है। अब तुझे मैं वह ज्ञान देता हूँ, जिसे जानने पर पाप कर्म उसी प्रकार लिप्त नहीं होते, जिस प्रकार कमल पत्र जल से लिप्त नहीं होते। उन्होंने कहा- भगवन्! मुझे अवश्य बताएं। तब आचार्य ने उन्हें उपदेश दिया ॥ ३ ॥ ॥ पञ्चदशः खण्डः ॥ य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तद्यद्यप्यस्मिन्सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चन्ति वर्त्मनी एव गच्छति ॥ १ ॥ यह नेत्र में जो पुरुष दिखायी देता है, (जो चक्षुओं का चक्षु अथवा दृष्टि का द्रष्टा है) वह आत्मा है। यह अविनाशी, भयरहित और ब्रह्मस्वरूप है। उसके स्थान पर जल या घृत डालें, तो वह पलकों में ही चला जाता है (अर्थात् वह सम्पूर्ण पदार्थों से अलिप्त रहता है।) ॥ १ ॥ एतः संयद्वाम इत्याचक्षत एतः हि सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति सर्वाण्येनं वामान्यभिसंयन्ति य एवं वेद ॥ २ ॥ इस पुरुष को 'संयद्वाम' कहते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण शोभन वस्तुएँ सब ओर से इसे ही प्राप्त होती हैं। जो साधक इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, वह सर्वोपयोगी वस्तुएँ सब ओर से धारण करता है॥ एष उ एव वामनीरेष हि सर्वाणि वामानि नयति सर्वाणि वामानि नयति य एवं वेद ॥ ३ ॥ यह पुरुष निश्चय ही सम्पूर्ण पुण्यफलों को धारण करने वाला है। जो साधक इस प्रकार जानता है, वह सम्पूर्ण पुण्यफलों को धारण करता है॥ ३ ॥ एष उ एव भामनीरेष हि सर्वेषु लोकेषु भाति सर्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद ॥ ४ ॥ यह पुरुष निश्चय ही प्रकाशमान है, क्योंकि यही सम्पूर्ण लोकों में प्रकाशित होता है। जो साधक इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह सम्पूर्ण लोकों में प्रकाशित होता है॥ ४॥ अथ यदु चैवास्मिञ्छव्यं कुर्वन्ति यदि च नार्चिषमेवाभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमपूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासांस्तान्मासेभ्यः संवत्सरः संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः ॥ ५ ॥ स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते नावर्तन्ते ॥ ६ ॥

अध्याय ४ खण्ड १६ मन्त्र ५ १३७

अध्याय ४ खण्ड १६ मन्त्र ५ १३७ इस प्रकार जानने वाला पुरुष मृत्यु के पूर्व या उपरान्त अर्चि देवता को प्राप्त होता है। फिर अर्चि देव से दिवस सम्बन्धी देव को, दिवस से शुक्ल पक्ष को, शुक्ल पक्ष से उत्तरायण के छः मासों को, उत्तरायण के छः मासों से संवत्सर को, संवत्सर से आदित्य को, आदित्य से चन्द्रमा को और चन्द्रमा से विद्युत् को प्राप्त होता हैं। वहाँ से अमानवी पुरुष (विशिष्ट देवपुरुष) उन्हें ब्रह्म लोक को प्राप्त कराता है। यह देवमार्ग अथवा ब्रह्म मार्ग है, इससे गमन करने वाला पुरुष पुनः इस मानव जगत् को नहीं प्राप्त होता ॥ ५-६ ॥ ॥ षोडशः खण्डः ॥ एष ह वै यज्ञो योऽयं पवत एष ह यन्निदꣳ सर्वं पुनाति। यदेष यन्निदꣳ सर्वं पुनाति तस्मादेष एव यज्ञस्तस्य मनश्च वाक् च वर्तनी ॥ १ ॥ वह जो प्रवहमान (वायु) है, वह यज्ञ ही है। यह प्रवहमान तत्त्व इस सम्पूर्ण जगत् को पवित्र करता है। चूँकि यह सम्पूर्ण जगत् को पवित्र करता है, अतः यही यज्ञ है। वाणी और मन ये दो इसके मार्ग हैं ॥ तयोरन्यतरां मनसा सꣳस्करोति ब्रह्मा वाचा होताध्वर्यु रुद्गातान्यतराꣳ स यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यववदति ॥ २ ॥ उनमें से एक मार्ग का संस्कार ब्रह्मा अपने मन से करते हैं तथा होता, अध्वर्यु और उद्गाता वाणी द्वारा दूसरे मार्ग का संस्कार करते हैं। (यदि) प्रातः कालीन अनुवाक के आरम्भ होने के पूर्व ब्रह्मा अपनी वाणी का प्रयोग करते हैं ॥ २ ॥ अन्यतरामेव वर्तनीꣳ सꣳस्करोति हीयतेऽन्यतरा स यथैकपाद्ब्रजन्नथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो रिष्यत्येवमस्य यज्ञो रिष्यति यज्ञꣳ रिष्यन्तं यजमानोऽनुरिष्यति स इष्ट्वा पापीयान्भवति ॥ ३ ॥ (तो) वह केवल एक वाणी के मार्ग का ही संस्कार करते हैं, दूसरा मार्ग नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार एक पैर से चलने वाला पुरुष अथवा एक पहिये से चलने वाला रथ नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार इस यज्ञ का विनाश हो जाता है। यज्ञ के विनष्ट होने पर यजमान भी नष्ट हो जाता है। ऐसा यज्ञ करने पर यजमान अधिक पापों को प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके न पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यववदत्युभे एव वर्तनी सꣳस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरा ॥ ४ ॥ यदि प्रातः कालीन अनुवाक आरम्भ करने के पश्चात् परिधानीया ऋचा से पूर्व ब्रह्मा नहीं बोलते हैं, तो (समस्त ऋत्विक् मिलकर) दोनों ही मार्गों का संस्कार करते हैं, तब कोई भी मार्ग नष्ट नहीं होता ॥ ४ ॥ स यथोभयपाद्ब्रजन्नथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान्भवति ॥ ५ ॥ जिस प्रकार दोनों पैरों से चलने वाला पुरुष तथा दोनों पहियों से चलने वाला रथ भली प्रकार स्थित रहता है, वैसे ही यह यज्ञ भी भली प्रकार स्थित रहता है। यज्ञ के स्थित रहने से यजमान भी भली प्रकार स्थित रहता है। ऐसा यज्ञ करके यजमान विशिष्ट श्रेय को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥

॥ सप्तदशः खण्डः ॥

१३८ छान्दोग्योपनिषद् ॥ सप्तदशः खण्डः ॥ प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेषां तप्यमानानाꣳ रसान्प्रावृहदग्निं पृथिव्या वायुमन्त- रिक्षादादित्यं दिवः ॥ १ ॥ प्रजापति ब्रह्मा ने लोकों का सार ग्रहण करने के निमित्त तप किया। तप के प्रभाव से उन्होंने लोकों से रसों को उत्पन्न किया। पृथ्‍वी से अग्नि, अन्तरिक्ष से वायु और द्युलोक से आदित्य को ग्रहण किया॥ १ ॥ स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत्तासां तप्यमानानाꣳ रसान्प्रावृहदग्नेर्ऋचो वायोर्र्यजूꣳषि सामान्यादित्यात् ॥ २ ॥ फिर उन्होंने तीन देवों से सार ग्रहण करने के निमित्त तप किया। तप के प्रभाव से उन्होंने देवों से रसों को उत्पन्न किया। अग्निदेव से ऋक्, वायुदेव से यजुष् और आदित्यदेव से साम को ग्रहण किया॥ २ ॥ स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत्तस्यास्तप्यमानाया रसान्प्रावृहद्भूरित्यृग्भ्यो भुवरिति यजुर्भ्यः स्वरिति सामभ्यः ॥ ३ ॥ फिर उन्होंने इस त्रयी विद्या का सार ग्रहण करने के निमित्त तप किया। तप के प्रभाव से उन्होंने त्रयी विद्या से रसों को उत्पन्न किया। ऋचाओं से भूः, यजुः कण्डिकाओं से भुवः तथा साम मंत्रों से स्वः को ग्रहण किया ॥ ३ ॥ तद्यदृक्तो रिष्येद्भूः स्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयादृचामेव तद्रसेनर्चां वीर्येणर्चां यज्ञस्य विरिष्टꣳ संदधाति ॥ ४ ॥ यदि ऋचाओं के यज्ञ में कोई त्रुटि हो, तो 'भूः स्वाहा' ऐसा कहकर गार्हपत्याग्नि में यज्ञ करे। इस प्रकार ऋचाओं के रस से ऋचाओं के बीज द्वारा ऋचा सम्बन्धी यज्ञ की त्रुटियों की पूर्ति होती है ॥ ४ ॥ अथ यदि यजुष्टो रिष्येद्भुवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ जुहुयाद्यजुषामेव तद्रसेन यजुषां वीर्येण यजुषां यज्ञस्य विरिष्टꣳ संदधाति ॥ ५ ॥ यदि यजुः कण्डिकाओं के यज्ञ में कोई त्रुटि हो, तो 'भुवः स्वाहा' ऐसा कहकर दक्षिणाग्नि में आहुति देनी चाहिए। इस प्रकार यजुओं के रस से यजुओं के बीज द्वारा यजुष् सम्बन्धी यज्ञ की पूर्ति होती है॥ ५॥ अथ यदि सामतो रिष्येत्स्वः स्वाहेत्याहवनीये जुहुयात्सामामेव तद्रसेन साम्नां वीर्येण साम्नां यज्ञस्य विरिष्टꣳ संदधाति ॥ ६ ॥ यदि साम मंत्रों के यज्ञ में कोई त्रुटि हो, तो 'स्वः स्वाहा' इस उच्चारण के साथ आहवनीयाग्नि में आहुति देनी चाहिए। इस प्रकार साम मंत्रों के रस से साम के बीज द्वारा साम सम्बन्धी यज्ञ की पूर्ति होती है ॥ ६ ॥ तद्यथा लवणेन सुवर्णꣳ संदध्यात्सुवर्णेन रजतꣳ रजतेन त्रपु त्रपुणा सीसꣳ सीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा ॥ ७ ॥ जिस प्रकार लवण से सोने को, सोने से चाँदी को, चाँदी से राँगा को, राँगे से सीसे को, सीसे से लोहे को, लोहे से काष्ठ को और चमड़े से काष्ठ को जोड़ा जाता है ॥ ७ ॥

अध्याय ४ खण्ड १७ मन्त्र १० १३१

अध्याय ४ खण्ड १७ मन्त्र १० १३१ एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्टः संदधाति भेषजकृतो ह वा एष यज्ञो यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवति ॥ ८ ॥ उसी प्रकार इन लोकों, देवों और तीनों वेदों के सार से यज्ञ के छिद्र (दोष) का सुधार किया जाता है। जिस यज्ञ में इस प्रकार जानने वाला ब्रह्मा होता है, वह यज्ञ निश्चय ही ओषधियों (आहुतियों) से संस्कारित (प्रभावयुक्त) होता है ॥ ८ ॥ एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवत्येवंविदः ह वा एषा ब्रह्माणमनु गाथा यतो यत आवर्तते तत्तद्गच्छति ॥ ९ ॥ जिस यज्ञ में इस प्रकार जानने वाला ब्रह्मा होता है, वह यज्ञ उत्तर मार्ग को प्राप्त कराता है। इस प्रकार ज्ञान-सम्पन्न ब्रह्मा के प्रति यह उक्ति कही गई है- जहाँ भी वह यज्ञ में प्रवृत्त होता है, वह यज्ञ के अभीष्ट को प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ मानवो ब्रह्मैवैक ऋत्विक्कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानः सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ॥ १० ॥ इस प्रकार ब्रह्मा मनन करने वाला एक ऋत्विक् होता है। जिस प्रकार घोड़ी सब योद्धाओं की रक्षा करती है, उसी प्रकार ब्रह्मा यज्ञ की, यजमान की और सब ऋत्विजों की सब ओर से रक्षा करता है। अतः इस प्रकार ज्ञान-सम्पन्न को ही ब्रह्मा बनाएँ, ऐसा न जानने वाले को न बनाएँ, कभी न बनाएँ ॥ १० ॥

॥ प्रथमः खण्डः ॥

१४० छान्दोग्योपनिषद् ॥ अथ पञ्चमोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ इस अध्याय में प्राण की सर्वश्रेष्ठता एवं पञ्चाग्नि विद्या का वर्णन किया गया है- यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥ जो ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ (आयु में प्रथम और गुणों में अधिक) को जानता है, वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है। निश्चय ही प्राण ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ है ॥ १ ॥ यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग्वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥ जो वसिष्ठ (समग्र श्रेष्ठता) को जानता है, वह स्वजातियों में वसिष्ठ (श्रेष्ठ धन से सम्पन्न) होता है। निश्चय ही वाक् (वाणी) वसिष्ठ है ॥ २ ॥ यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिँश्च लोकेऽमुष्मिँश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥ जो कोई प्रतिष्ठा को जानता है, वह लोक, परलोक (स्थूल शरीर एवं सूक्ष्म शरीर) में प्रतिष्ठित होता है। निश्चय ही चक्षु प्रतिष्ठा है ॥ ३ ॥ यो ह वै संपदं वेद सँहास्मै कामाः पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव संपत् ॥ ४ ॥ जो कोई सम्पद् को जानता है, उसे दैव और मानुष दोनों ही काम (भोग) सभी प्रकार से प्राप्त होते हैं। श्रोत्र ही सम्पत्ति है ॥ ४ ॥ यो ह वा आयतनं वेदायतनँ ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥ जो कोई आयतन को जानता है, वह स्वजनों का आयतन होता है अर्थात् उनका आश्रय बन जाता है। निश्चय ही मन आयतन है ॥ ५ ॥ अथ ह प्राणा अहँ श्रेयसि व्यूदिरेऽहँ श्रेयानस्म्यहँ श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥ एक बार प्राण (विभिन्न इन्द्रियों में स्थित प्राण) अपनी श्रेष्ठता के लिए परस्पर विवाद करने लगे कि मैं श्रेष्ठ हूँ - मैं श्रेष्ठ हूँ ॥ ६ ॥ ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन्को नः श्रेष्ठ इति तान्होवाच यस्मिन्व उत्क्रान्ते शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥ तब उन प्राणों ने अपने पिता प्रजापति के पास जाकर पूछा 'भगवन् ! हममें से श्रेष्ठ कौन है?' तब प्रजापति ने उत्तर दिया कि 'तुममें से जिस तत्त्व के निकल जाने पर शरीर अत्यन्त पापिष्ठ (जीवित रहते हुए भी प्राणहीन एवं उससे भी निकृष्ट जैसा) दिखाई देने लगे, वही तत्त्व श्रेष्ठ है' ॥ ७ ॥ सा ह वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा कला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवंमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥ (तब) वाक् इन्द्रिय ने उत्क्रमण किया, अर्थात् शरीर से बाहर चली गयी। उसने एक वर्ष तक प्रवास में रहने के बाद वापस लौटकर पूछा- 'मेरे बिना तुम जीवित रहने में कैसे समर्थ रह सके?' तब इन्द्रियों ने कहा- जिस प्रकार गूँगा वाणी से बिना बोले हुए भी प्राण से श्वासोच्छ्वास करता है, नेत्रों से देखता है,

अध्याय ५ खण्ड १ मन्त्र १३ १४१

अध्याय ५ खण्ड १ मन्त्र १३ १४१ कानों से सुनता है और मन से चिन्तन करते हुए जीवनयापन करता है। उसी प्रकार (हम भी जीवित रहे) ऐसा सुनकर वागिन्द्रिय ने शरीर में पुनः प्रवेश किया ॥ ८ ॥ चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथान्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैबमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥ (फिर) चक्षु (नेत्र) ने उत्क्रमण किया। एक वर्ष तक प्रवास में रहने के पश्चात् वापस लौटकर पूछा- ‘मेरे बिना तुम जीवित कैसे रह सके?, (तब अन्य इन्द्रियों ने कहा) ‘जिस प्रकार नेत्रहीन नेत्रों से देख नहीं सकता, तो भी प्राणों से श्वासोच्छ्वास करते, वाणी से बोलते, कानों से श्रवण करते और मन से चिन्तन करते हुए जीवित रहता है, उसी प्रकार [हम भी जीवित रहे], ऐसा सुनकर नेत्र ने पुनः प्रवेश किया ॥ ९ ॥ श्रोत्रः होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बधिरा अशृण्वन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥ (इसके पश्चात्) श्रोत्र (कान) ने उत्क्रमण किया। एक वर्ष तक प्रवास में रहने के उपरान्त पुनः लौटकर पूछा- हमारे बिना तुम कैसे जीवित रहे ? तब अन्य इन्द्रियों ने कहा- ‘जिस प्रकार बधिर बिना सुने, प्राण से प्राणन करते, वाणी से बोलते, चक्षु से देखते और मन से चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं, वैसे ही हम भी जीवित रहे।’ यह सुन करके श्रोत्र ने शरीर में पुनः प्रवेश किया ॥ १० ॥ मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥ (श्रोत्र के बाद) मन ने बाह्य गमन किया। एक वर्ष तक प्रवास में रहने के बाद लौटकर उसने वाक् आदि इन्द्रियों से पूछा कि ‘मेरे बिना तुम किस प्रकार जीवित रहे ?’ (तब उन सभी ने कहा) ‘जिस प्रकार छोटे बच्चे, जिनका कि मन विकसित नहीं होता, प्राण द्वारा श्वासोच्छ्वास करते, वाणी से बोलते, चक्षु से देखते, कर्णों से श्रवण करते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार (हम भी जीवित रहे)।’ यह सुनकर मन ने शरीर में पुनः प्रवेश किया ॥ ११ ॥ अथ ह प्राण उच्चिक्रमिषन्स यथासुहयः पड्वीशशङ्कन्संखिदेदेवमित- रान्प्राणान्समखिदत्तः हाभिसमेत्योचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२ ॥ फिर प्राण बहिर्गमन करने के लिए तत्पर होता है। जिस तरह शक्तिशाली अश्व पैर बाँधने की कीलों को उखाड़ देता है, उसी प्रकार प्राण ने समस्त इन्द्रियों के बन्धन से अपने आप को मुक्त किया। तब उन सबने प्राण से निवेदन किया कि ‘भगवन्! आप अपने ही स्थान पर रहें, आप ही हम सब में श्रेष्ठ हैं, आप बाहर न जाएँ' ॥ १२ ॥ अथ हैन वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैन चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति ॥ १३ ॥ तत्पश्चात् उस वागिन्द्रिय ने मुख्य प्राण से कहा- ‘मैं जो वसिष्ठ हूँ, वह वसिष्ठ आप ही हैं।’ चक्षु ने कहा- ‘‘मैं जो प्रतिष्ठा हूँ, सो (वह) प्रतिष्ठा आप ही हैं।‘’ ॥ १३ ॥

१४२ छान्दोग्योपनिषद् अथ हैनꣳ श्रोत्रमुवाच यदहꣳ संपदस्मि त्वं तत्संपदसीत्यथ हैन मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४॥ फिर उस श्रोत्र ने कहा कि 'मैं जो सम्पद्' (श्रेष्ठ सम्पत्ति) हूँ, सो वह सम्पद् आप ही हैं। (इसके बाद) उस मुख्य प्राण से मन ने कहा- 'मैं जो आयतन (आश्रय) हूँ, वह आश्रय आप ही हैं॥ १४ ॥ न वै वाचो न चक्षूꣳषि न श्रोत्राणि न मनाꣳसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥ इसलिए लोक में वाक् आदि समस्त इन्द्रियों को न वाणी, न नेत्र, न श्रोत्र और न ही मन; बल्कि सबको 'प्राण' नाम से ही सम्बोधित करते हैं, क्योंकि ये सभी प्राण ही हैं ॥ १५ ॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किंचिदिदमा श्वभ्य आ शकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा एतदनस्यान्नमनो ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि किंचनानन्नं भवतीति ॥ १ ॥ उस मुख्य प्राण ने प्रश्न किया कि मेरा अन्न क्या होगा ? तब वाक् आदि इन्द्रियों ने उत्तर देते हुए कहा- 'कुत्तों और पक्षियों से लेकर सभी प्राणियों का यह जो कुछ भी अन्न है, वह सब तुम्हारा ही है।' 'अन्' यह प्राण का नाम प्रसिद्ध है। इस प्रकार जानने वाले के लिए कुछ भी अभक्ष्य नहीं होता है ॥ १ ॥ [ प्राणियों में जब तक प्राण रहते हैं, तभी तक उन्हें अन्न की आवश्यकता पड़ती है। प्राण जाते ही अन्न की माँग समाप्त हो जाती है, इसीलिए सारे अन्न प्राण के लिए ही हैं।] स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥ उस मुख्य प्राण ने पुनः प्रश्न किया कि 'मेरा वास (वस्त्र)क्या होगा ?' तब वाक् आदि इन्द्रियों ने कहा -'जल'। (प्राण को) भोजन करने से पूर्व और पश्चात् आच्छादित करते हैं। (ऐसा करने से) वह वस्त्र धारण करने वाला और अनग्न होता है ॥ २ ॥ तद्धैतत्सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येतच्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥ इस प्राणोपासना पद्धति का विवरण सत्यकाम जाबाल ने व्याघ्रपद के पुत्र गोश्रुति नामक वैयाघ्रपद को सुनाया- "यदि कोई इस प्राणोपासना को शुष्क ठूँठ से भी कहेगा, तो उसमें भी शाखाएँ उत्पन्न हो जाएँगी और पत्ते प्रस्फुटित हो आएँगे।"'॥ ३ ॥ [ मन्त्र क्र० १ में प्राण-प्रक्रिया को जानने वाले तथा क्र० ३ में सुनने वाले को असाधारण लाभ प्राप्त होने की बात कही गयी है। उस काल में जानने का अर्थ उस प्राण-प्रक्रिया को चलाने की क्षमता होना तथा सुनने का अर्थ उस प्राण-प्रक्रिया को आत्मसात् करना ही रहा होगा। उसी स्थिति में किसी अन्न से पोषण पाने तथा सूखे ठूँठ में भी नये प्राण का संचार होने की बात सिद्ध होती है।] अथ यदि महज्जिगमिषेदामावास्यायां दीक्षित्वा पौर्णमास्याꣳ रात्रौ सर्वौषधस्य मन्थं दधिमधुनोरुपमथ्य ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्रावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत् ॥ ४ ॥

अध्याय ५ खण्ड २ मन्त्र १ १४३

अध्याय ५ खण्ड २ मन्त्र १ १४३ इसके बाद अब यदि वह महत्त्व का अभिलाषी हो, तो उसे अमावस्या को दीक्षा प्राप्त करके पूर्णिमा की रात्रि को सभी औषधियों, दही और शहद सम्बन्धी मन्थ (मथकर तैयार किया गया हव्य) का मंथन कर 'ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहा' के मन्त्र द्वारा अग्नि में घृत की आहुति देकर मन्थ में उसका अवशेष डालना चाहिए॥ वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत्प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत्संपदे स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत् ॥ ५ ॥ (इसी प्रकार) 'वसिष्ठाय स्वाहा' के मन्त्र से अग्नि में घृताहुति समर्पित कर मन्थ में भी घृत के स्राव को डाले, 'प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्र से अग्नि को घृताहुति समर्पित करके मन्थ में घृत के अवशेष को डाले, 'संपदे स्वाहा' मन्त्र के द्वारा अग्नि में हवन करके अवशिष्ट घृत को मंथ में डाले तथा 'आयतनाय स्वाहा' इस मंत्र से अग्नि में घृत की आहुति देकर शेष घृत को मन्थ में समर्पित करे॥ ५॥ अथ प्रतिसृप्याञ्जलौ मन्थमाधाय जपत्यमो नामास्यमा हि ते सर्वमिदं स हि ज्येष्ठः श्रेष्ठो राजाधिपतिः स मा ज्यैष्ठ्यं श्रेष्ठ्यं राज्यमाधिपत्यं गमयत्वहमेवेदं सर्वमसानीति ॥ ६ ॥ (तत्पश्चात्) अग्नि से कुछ दूर हटकर अञ्जलि में मन्थ को लेकर इस मन्त्र का उच्चारण करे-'अमो नामसि' हे मन्थ ! तू 'अम' (प्राण) नाम वाला है, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् (अपने प्राणभूत) तेरे साथ अवस्थित है। तू ही ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, राजा (प्रकाशमान) और सबका अधिपति है। वह तुम मुझे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ तत्त्व, राज्य और आधिपत्य को प्राप्त कराओ। मैं ही सर्वरूप हो जाऊँ॥ ६॥ अथ खल्वेतयर्चा पच्छ आचामति तत्सवितुर्वृणीमह इत्याचामति वयं देवस्य भोजनमित्याचामति श्रेष्ठं सर्वधातममित्याचामति तुरं भगस्य धीमहीति सर्वं पिबति ॥ ७॥ तदनन्तर वह इस ऋचा से (हम प्रकाशमान सविता के उस सर्वविषयक श्रेष्ठतम भोजन की प्रार्थना करते हैं और शीघ्र ही सविता देवता के स्वरूप का ध्यान करते हैं) पादशः (उस मन्थ का) एक-एक पद को कहकर मध्य के एक-एक ग्रास का भक्षण करता है। 'तत्सवितुर्वृणीमहे' ऐसा कहकर एक ग्रास का भक्षण करता है। 'वयं देवस्य भोजनम्' ऐसा कहकर एक ग्रास का भक्षण करता है। 'श्रेष्ठं सर्वधातमम्' मन्त्र कहकर पुनः एक ग्रास को ग्रहण करता है तथा 'तुरं भगस्य धीमहि' ऐसा कहकर कंस अथवा चमस के आकार वाले पात्र को धोकर सम्पूर्ण मंथ लेप को पी जाता है॥ ७॥ निर्णिज्य कंसं चमसं वा पश्चादग्नेः संविशति चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः स यदि स्त्रियं पश्येत्ससमृद्धं कर्मेति विद्यात् ॥ ८ ॥ इसके बाद अग्नि के पृष्ठ भाग पर पीछे की ओर पवित्र मृग चर्म आदि बिछाकर अथवा स्थण्डिल (पवित्र यज्ञ भूमि) में ही वाणी का संयम रखते हुए शयन करता है। उस समय यदि वह स्वप्न में स्त्री का दर्शन करे, तो यह समझे कि मेरा यह अनुष्ठान सफलता को प्राप्त हो गया ॥ ८ ॥ तदेष श्लोकः । यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यति । समृद्धिं तत्र जानीयात्तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने तस्मिन्स्वप्ननिदर्शन इति ॥ ९ ॥ इससे सम्बन्धित यह श्लोक है- 'काम्य कर्मों में जब स्त्री को देखे, तो उस स्वप्न के दर्शन होने पर उस कार्य की सफलता समझे ॥ ९॥

॥ तृतीयः खण्डः ॥

१४४ छाान्दोग्योपनिषद् ॥ तृतीयः खण्डः ॥ श्वेतकेतुर्हारुणेयः पञ्चालानाꣳसमितिमेयाय तꣳह प्रवाहणो जैवलिरुवाच कुमारानु त्वाशिषत्पितेत्यनु हि भगव इति ॥ १ ॥ पाञ्चाल नरेश की सभा में (एक बार) आरुणि पुत्र श्वेतकेतु आया। वहाँ उससे जीवल पुत्र प्रवाहण ने प्रश्न करते हुए कहा कि 'कुमार ! क्या तुम्हारे पिताजी ने तुमको शिक्षा प्रदान की है'। तब उसने कहा- हाँ, भगवन् ! हमने अपने पिताजी से शिक्षा प्राप्त की है ॥ १ ॥ वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति न भगव इति वेत्थ यथा पुनरावर्तन्त ३ इति न भगव इति वेत्थ पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना ३ इति न भगव इति ॥ २ ॥ प्रवाहण ने पुनः प्रश्न किया कि क्या तुम्हें यह ज्ञात है कि प्रजा इस लोक से जाने के बाद कहाँ जाती है ? श्वेतकेतु ने कहा- ' भगवन् ! यह जानकारी मुझे नहीं है। उसने फिर पूछा कि क्या तुम्हें यह ज्ञात है कि वह प्रजा पुनः इस लोक में किस प्रकार आती है ? श्वेतकेतु ने पुनः नकारात्मक उत्तर दिया कि मुझे यह भी नहीं मालूम है। प्रवाहण पुनः अगला प्रश्न पूछता है कि देवयान और पितृयान मार्गों का एक दूसरे से अलग होने का स्थान क्या तुम्हें ज्ञात है ?' श्वेतकेतु ने कहा- नहीं भगवन् ! मैं यह भी नहीं जानता ॥ २ ॥ वेत्थ यथासौ लोको न संपूर्यत ३ इति न भगव इति वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति नैव भगव इति ॥ ३ ॥ प्रवाहण ने पुनः प्रश्न किया कि क्या तुम्हें ज्ञात है कि यह पितर लोक क्यों नहीं भरता है ? श्वेतकेतु ने कहा- 'नहीं भगवन् ! उसने फिर पूछा कि 'पाँचवीं आहुति के यजन कर दिये जाने पर घृत सहित सोमादि रस 'पुरुष' संज्ञा को कैसे प्राप्त करते हैं' ? श्वेतकेतु ने कहा- नहीं भगवन् ! मैं यह भी नहीं जानता ॥ ३ ॥ अथानु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात्कथꣳ सोऽनुशिष्टो ब्रुवीतेति स हायस्तः पितुरर्धमेयाय तꣳहोवाचाऽननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनु त्वाशिषमिति ॥ ४ ॥ ''तो फिर तुमने स्वयं के सम्बन्ध में ऐसा क्यों कहा कि मुझे शिक्षा प्रदान की गयी है ?'' जो इन सभी विद्याओं की जानकारी नहीं रखता है, वह अपने को पूर्ण शिक्षित कैसे कह सकता है ? उपर्युक्त सभी प्रश्नों के उत्तर न दे पाने से त्रस्त होकर वह अपने पिता आरुणि के पास गया और बोला कि आपने मुझे शिक्षा दिये बगैर ही आश्वस्त कर दिया था कि मैंने तुझे शिक्षा प्रदान कर दी है ॥ ४ ॥ पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत्तेषां नैकञ्चनाशकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं तदैतानवदो यथाहमेषां नैकंचन वेद यद्यहमिमानवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ॥ ५ ॥ श्वेतकेतु ने अपने पिता से कहा कि 'उस क्षत्रिय कुमार ने मुझसे अग्निविद्या से सम्बन्धित पाँच प्रश्न किये। मैं उनमें से एक का भी सन्तोषजनक उत्तर नहीं दे सका। तब उसके पिता ने कहा कि 'तुमने ये जितने प्रश्न मुझसे कहे, मैं भी उनमें से एक प्रश्न का उत्तर नहीं जानता। यदि मुझे जानकारी होती, तो भला तुम्हें क्यों नहीं इसकी जानकारी देता ॥ ५ ॥

अध्याय ५ खण्ड ४ मन्त्र २ १४५

अध्याय ५ खण्ड ४ मन्त्र २ १४५ स ह गौतमो राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मै ह प्राप्तायार्हाञ्चकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय तꣳहोवाच मानुषस्य भगवन्गौतम वित्तस्य वरं वृणीथा इति स होवाच तवैव राजन्मानुषं वित्तं यामेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तामेव मे ब्रूहीति स ह कृच्छ्रीबभूव ॥ ६ ॥ तब वह पिता और पुत्र (आरुणि और श्वेतकेतु) पुनः उस पाञ्चाल नरेश के समीप प्रश्नों की जिज्ञासा को लिए हुए आये। राजा ने अपने यहाँ आये उन दोनों (पिता और पुत्र) को सम्मानित किया। दूसरे दिन प्रातःकाल गौतम गोत्रोत्पन्न वे दोनों राजा की सभा में गये। उस राजा ने कहा कि 'हे भगवन् गौतम! आप सांसारिक धन का वरदान हमसे प्राप्त कर लें। तब उन मुनि ने कहा- राजन्! ये मनुष्य सम्बन्धी धन आपके ही पास रहें; आपने मेरे पुत्र के प्रति जो बात (प्रश्नरूप से) कही थी, वही मुझे बताने की कृपा करें। यह सुनकर वह राजा अत्यन्त संकट में पड़ गया॥ ६॥ तꣳह चिरं वसेत्याज्ञापयांचकार तꣳ होवाच यथा मा त्वं गौतमवदो यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान्गच्छति तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूदिति तस्मै होवाच ॥ ७ ॥ पाञ्चाल नरेश ने उन दोनों (पिता और पुत्र) को अपने पास चिरकाल तक रहने की आज्ञा प्रदान की। उसने कहा- 'हे गौतम! जिस प्रकार आपने मुझसे कहा है, उसे आप यह समझें कि प्राचीन काल में यह अग्निविद्या ब्राह्मण के पास नहीं गयी। इसी कारण से सभी लोकों में इस विद्या पर क्षत्रियों का ही अनुशासन रहा है। इस प्रकार कहकर उस राजा ने गौतम को अग्निविद्या का उपदेश दिया॥ ७॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ श्वेतकेतु से प्रवाहण ने जो प्रश्न पूछे थे, उनमें से पहले 'पाँचवीं आहुति में आपः पुरुष वाचक कैसे बन जाता है' इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है। इस प्रश्न के समाधान के साथ ही अन्य प्रश्नों के समाधान का मार्ग भी खुलता है। वेद ने इस सृष्टि को यज्ञमय कहा है। ऋषि स्थूल यज्ञ की उपमा देते हुए सृष्टिचक्र के विभिन्न चरणों को समझाते हैं। द्युलोक में पहली आहुति से सोम, अंतरिक्ष में दूसरी आहुति से वर्षा, पृथ्वी पर तीसरी आहुति से अन्न, पुरुष में चौथी आहुति से वीर्य तथा नारी में पाँचवीं आहुति से पुरुषवाची जीव की उत्पत्ति होती है। प्रश्न था 'आपः' पुरुष वाची कैसे बन जाता है। प्रथम आहुति श्रद्धा की कही गयी है। 'श्रद्धा = आपः' अर्थात् श्रद्धा और आपः पर्यायवाची शब्द हैं। वेद ने आपः को ब्रह्म के तप से उत्पन्न सृष्टि का मूल क्रियाशील पदार्थ माना है। प्रकारान्तर से यह चक्र 'ब्राह्मी चेतना' के 'जीव चेतना' के रूप में प्रकट होने तक के रहस्यात्मक चरणों को प्रकट करता है- असौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ हे महर्षि गौतम! यह प्रसिद्ध द्युलोक ही अग्नि है। आदित्य ही उस अग्नि की समिद् (ईंधन) है, किरणें ही धूम हैं, दिन ही ज्वाला है, चन्द्रमा ही अङ्गार और नक्षत्र ही विस्फुलिङ्ग (चिनगारियाँ) हैं॥ १॥ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुतेः सोमो राजा संभवति ॥ २ ॥ उस द्युलोक रूप अग्नि में देवगण श्रद्धा का यजन करते हैं। उस आहुति से राजा सोम का प्रादुर्भाव होता है॥ २॥ [ सृष्टि यज्ञ के प्रथम चरण में श्रद्धा अथवा आपः तत्त्व के यजन से सोम अर्थात् आधारभूत पोषक प्रवाह की उत्पत्ति होती है।]