१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
देव्युपनिषत् [ ४८५ अहं सोमं त्वष्टारं पूषणं भगं दधाम्यहम् । विष्णुमुरुक्रमं ब्रह्माणमुत प्रजापतिं दधामि ॥५ अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते । अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनामहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् ॥६ मम योनिरप्स्वन्तःसमुद्रे य एवं वेद स देवीपदमाप्नोति ॥७ देवी के समीप जाकर सभी देवताओं ने निवेदन किया—'महा- देवि ! अपने सम्बन्ध में बताओ कि तुम कौन हो ?' ॥१॥ देवी ने उत्तर दिया—'मैं ब्रह्म स्वरूपिणी हूँ। यह कार्य-कारण रूप, प्रकृति-पुरुषात्मक विश्व मुझसे ही उत्पन्न हुआ है। मैं आनन्द रूपिणी तथा अ नन्द-रहित रूप वाली हूँ। मैं विज्ञानमयी और अविज्ञान रूप हूँ। मैं ज्ञातव्य ब्रह्म तथा ब्रह्म से परे भी हूँ। मैं पञ्चीकृत अथवा अपञ्चीकृत महाभूत हूँ। दिखाई पड़ने वाला यह सम्पूर्ण विश्व मैं ही हूँ। विद्या-अविद्या, वेद-अवेद, अजा और अनजा मैं ही हूँ। मैं नीचे भी हूँ, ऊपर भी हूँ, अगल-बगल में भी मैं ही हूँ। मैं रुद्रों और वसुओं के रूप में संचार करने वाली हूँ। आदित्यों और विश्वेदेवों के रूप में भ्रमण करती रहती हूँ। मैं ही मित्रावरुण, इन्द्राग्नि और अश्विद्वय की पालिका हूँ। सोम, पूषा, भग और त्वष्टा को मैं ही धारण करती हूँ। तीनों लोकों को आक्रान्त करने के उद्देश्य से पदक्षेप करने वाले विष्णु ब्रह्मा और प्रजापति के धारण करने वाली हूँ। देवताओं के लिए हवि- वाहक और सोमाभिषव वाले यजमान के निमित्त हवियुक्त धनों को धारण करती हूँ। मैं उपासकों के लिए धन-दायिनी, ज्ञानवती, यज्ञों में नायिका तथा सम्पूर्ण विश्व की अधीश्वरी हूँ। विश्व के पिता रूप आकाश को परमात्मा के ऊपर मैं ही प्रकट करती हूँ। मेरा स्थान आत्मरूप की धारयित्री बुद्धि वृत्ति में है। इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी पुरुष दिव्य सम्पत्ति प्राप्त करता है ॥ २-७ ॥
४८६ ] [ देव्युपनिषत् ते देवा अब्रुवन्— नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥८ तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् । दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्ये सुतरां नाशय ये तमः ॥६ देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुतैतु ॥१० कालरात्रिं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम् । सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम् ॥११ महालक्ष्मीश्च विद्महे सर्वसिद्धिश्च धीमहि । तन्नो देवी प्रचोदयान् ॥१२ अदितिरिह जनिष्ट दक्षया दुहिता तव । तां देवा अन्वजायन्त भद्रा अमृतबन्धवः ॥१३ कामो योनिः कामकला वज्रपाणि— गुंहा हसा मातरिश्वाऽभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा सकला मायया च पुरुच्येषा विश्वमाताऽऽदिविद्योम् ॥१४ एषाऽऽत्मशक्तिः । एषा विश्वमोहिनी पाशांकुशधनुर्वा- णधरा । एषा श्रीमहायिद्या ॥ १५ ॥ य एवं वेद स शोकम् तरति ॥ १६ ॥ नमस्ते अस्तु भगवति भवति मातरस्मान् पातु सर्वतः ॥ १७ ॥ -देवताओं ने कहा—'देवी को नमस्कार ! महान् पुरुषों को भी अपने कर्त्तव्य में प्रवृत्त करने वाली कल्याणकारी महादेवी को सादर नमस्कार है । गुणों से साम्य अवस्था वाली कल्याणी को नमस्कार है। हम उन्हें विधिवत् प्रणाम करते हैं । वे अग्नि के समान तेजोमयी, ज्ञान से प्रकाशमाना, कर्मफल की प्राप्ति के लिए सेव्यमाना एवं दीप्तिमयी
देव्युपनिषत् [ ४८७ भगवती दुर्गा की हम शरण ग्रहण करते हैं। हे दैत्यविनाशिनी देवि ! तुम्हें नमस्कार है। देवताओं द्वारा उत्पन्न वैखरी वाणी का अनेक प्रकार के प्राणी उच्चारण करते हैं। वे कामधेनु के समान सुख देने वाली तथा अन्न, बल दायिनी वाणी रूपा देवी हमारी उत्तम स्तुति से सन्तुष्ट होकर हमारे निकट पधारें। जो वेदों द्वारा स्तुत, काल-नाशिनी, विष्णु शक्ति, सरस्वती, स्कन्दमाता, देवमाता, अदिति अथवा दक्ष-कन्या सती रूप वाली भगवती हैं, उन कल्याणमयी और पापनाशिनी भगवती को हम नमस्कार करते हैं। हम सर्वशक्ति वाली भगवती महालक्ष्मी से परिचित हैं और उनका सदा ध्यान करते हैं। वे देवी हमें अपने विषय विशेष में प्रस्तुत करें। हे दक्ष ! आपकी कन्या अदिति के प्रसूता होने पर अमृतत्व गुण वाले देवताओं की उत्पत्ति हुई। काम, योनि, कमल, वज्री, गुहा, वर्ण, वायु, अभ्र, वज्रपाणि, गुहा, सकलरूप वर्ण एवम् माया यह सब उस जगन्माता की ब्रह्मरूपिणी मूल विद्या है। यह विश्व को विमोहित करने वाली, पाश-अंकुश-धनुष बाण धारिणी परब्रह्म की शक्ति हैं। यही श्री महाविद्या हैं। इस प्रकार जानने वाला पुरुष शोक-सन्ताप से मुक्त हो जाता है। हे जगन्माता ! तुम्हें नमस्कार है। तुम सभी प्रकार से हमारी रक्षा करने वाली बनो ॥ ८-१७॥ सैषाऽष्टौ वसवः । सैषैकादशरुद्रा । सैषा द्वादशादित्याः । सैषा विश्वेदेवाः सोमपा असोमपाश्च । सैषा यातुधाना असुरा रक्षांसि पिशाचा यक्षाः सिद्धाः । सैषा सत्त्वरजस्तमांसि । सैषा प्रजापतीन्द्रमनवः । सैषा ग्रहनक्षत्रज्योतींषि कलाकाष्ठाऽऽदिकाल- रूपिणी । तामहं प्रणौमि नित्यम् ॥ १८ ॥ तापापहारिणीं देवीं भुक्तिमुक्तिप्रदायिनीम् । अनन्तां विजयां शुद्धां शरण्यां शिवदां शिवाम् ॥१९॥ वियदीकारसंयुक्तं वीतिहोत्रसमन्वितम् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
४८८ ] [ देव्युपनिषत् अर्धन्दुलसितं देव्या बीजं सर्वार्थसाधकम् ॥२० एवमेकाक्षरम् मन्त्रम् यतयः शुद्धचेतसः । ध्यायन्ति परमानन्दमया ज्ञानाम्बुराशयः ॥२१ वाङ् मया ब्रह्मभूस्तस्मात् षष्ठम् वक्त्रसमन्वितम् । सूर्यो वामश्रोत्र विन्दुः संयुताष्टतृतीयकम् ॥२२ नारायणेन संयुक्तो वायुश्चाधरसंयुतः । विच्चे नवार्ण कोऽर्णः स्यान्महदानन्ददायकः ॥२३ हृत्पुण्डरीकमध्यस्थां प्रातःसूर्यसमप्रभाम् । पाशाङ्कुशधरां सौम्यां वरदाभयहस्तकाम् । त्रिनेत्रां रक्तवसनां भक्तकामदुघां भजे ॥२४ नमामि त्वामहं देवीं महाभयविनाशिनीम् । महादुर्गप्रशमनीं महाकारुण्यरूपिणीम् ॥२५ यस्याः स्वरूपं ब्रह्मादयो न जानन्ति तस्मादुच्यतेऽज्ञेया । यस्या जन्तो न विद्यते तस्मादुच्यतेऽनन्ता । यस्या ग्रहणं नोप- लभ्यते तस्मादुच्यतेऽलक्ष्या । यस्या जननं नोपलभ्यते तस्मादु- च्यतेऽजा । एकैव सर्वत्र वर्तते तस्मादुच्यते एका । एकत्र विश्व- रूपिणी तस्मादुच्यते नैका । अत एवोच्यतेऽज्ञेयाऽनन्ताऽलक्ष्याऽ- जैका नैका ॥ २६ ॥' वही यह एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य और अष्ट वसु हैं। वही यह सोमपायी, विश्वदेवा हैं। वही यह यातुधान, दैत्य राक्षस, पिशाच, यक्ष और सिद्ध हैं। वही यह विष्णु और रुद्र रूप वाली तथा सत्व-रज- कला काष्ठादि सहित काल स्वरूपा हैं। भोग और मोक्षदायिनी पाप- नाशिनी, विजय की अधिष्ठात्री, अन्त से अतीत, कल्याण-मङ्गल रूप वाली, Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
देव्युपनिषत् [ ४८६ दोषरहित एवम् आश्चर्यवादी भी यही हैं। हम इन देवी को सदा नमस्कार करते हैं। आकाश एवं ईकार युक्त, अग्नि सहित अर्द्धचन्द्र से विभूषित जो बीज है, वह सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। जिन साधकों का मन शुद्ध है, वे इस एकाक्षर ब्रह्म का चिन्तन करते हैं। वाणी, माया, काम, वक्त्र, दक्षिण कर्ण, बिन्दु, नारायण, अधर, विच्चे इनसे युक्त नवार्ण मन्त्र उपासकों को सायुज्य पदवी प्रदान करने वाला है। हृदय-कमल में निवास करने वाली, अरुणोदय के समान प्रभा वाली, पाश-अंकुशधारिणी मनोहर रूप वाली वरदहस्त और अभय मुद्रा वाली त्रिनेत्रा, लोहितवसना, कामना पूर्ण करने वाली देवी का मैं सदा भजन करता हूँ। हे महादेवि ! तुम महान् भय और महान् सङ्कट को दूर करने वाली तथा करुणामयी मूर्ति हो। मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। ब्रह्मादि भी जिनके यथार्थ रूप को नहीं जानते, इसीलिए जो अज्ञेया तथा अन्त न होने से अनन्ता कही जाती हैं, जो दिखाई न पड़ने से अलक्ष्या, जन्म रहित होने से अजा, एक ही सर्वत्र व्याप्त होने से एका तथा विश्व रूप में अकेली ही सुशोभित होने से नैका कही जाती है । १८-२६ ॥ मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी । ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी ॥२७ यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता । तां दुर्गां दुर्गमां देवीं दुराचारविघातिनीम् । नमामि भवभीतोऽहं संसारार्णवतारिणीम् ॥२८ इदमथर्वणशीर्षं योऽधीते स पञ्चाथर्वशीर्षजपफल मवा- प्नोति । इदमथर्वणशीर्षं ज्ञात्वा योऽर्चां स्थापयति ॥२६.। शतलक्षं प्रजप्त्वाऽपि नार्चासिद्धिं च विन्दति । शतमष्टोत्तरं चास्याः पुरश्चर्याविधिः स्मृतः ॥३० Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
४६० ] [ देव्युपनिषत् दशवारं पठेद्यस्तु सद्यः पापैः प्रमुच्यते । महादुर्गाणि तरति महादेव्याः प्रसादतः ॥३१ प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति । तत् सायं प्रातः प्रयुञ्जानः पापोऽपापो भवति । निशीथे तुरीयसंध्यायां जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति । नूतन- प्रतिमायां जप्त्वा देवतासांनिध्यं भवति । प्राणप्रतिष्ठायां जप्त्वा प्राणानां प्रतिष्ठा भवति । भौमाश्विन्यां महादेवीसंनिधौ जप्त्वा महामृत्युं तरति । य एवं वेदेत्युपनिषत् ॥३२॥ समस्त अक्षरों में मूलाक्षर रूप में रहने वाली, चिन्मयातीता, शून्यसाक्षिणी वे सर्वश्रेष्ठ दुर्गा के नाम से प्रसिद्ध हैं। उन संसार सागर से पार करने वाली, दुराचार को नष्ट करने वाली दुर्गा देवी को मैं भव- सागर से भयभीत हुआ नमस्कार करता हूँ । इस अथर्वशीर्ष का जप करने वाले को पाँचों अथर्वशीर्ष के जप का फल प्राप्त होता है। इसके बिना जाने हुए लाखों बार अर्चना करने से भी कोई लाभ नहीं हो सकता। इसका दस बार जप करने से समस्त पापों से उसी समय मुक्ति हो जाती है। सायंकाल में पाठ करने से दिन भर के और प्रातःकाल पाठ करने से रात्रि भर के पाप दूर हो जाते हैं। मध्य रात्रि के पाठ से वाक् सिद्धि होती है। भौमाश्विनी योग में पाठ करने से महा-मृत्यु से परित्राण होता है ॥ २७-३२ ॥ ॥ देव्युपनिषद् समाप्त ॥
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri बह्वृचोपनिषत् ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमा- विरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे माप्रहासीरनेना- धीतेनाहोरात्रान्संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारमवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । शान्तिपाठ—ॐ मेरी वाणी मन में स्थिर हो, मन वाणी में स्थिर हो, हे स्वयंप्रकाश आत्मा ! मेरे सम्मुख तुम प्रकट होओ । हे वाणी और मन ! तुम दोनों मेरे वेद ज्ञान के आधार हो इसलिए मेरे वेदाभ्यास का नाश न करो । इस वेदाभ्यास में ही मैं रात्रि-दिन व्यतीत करता हूँ। मैं ऋत भाषण करूँगा, सत्य भाषण करूँगा मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्ति । ॐ देवी ह्येकाऽग्र आसीत् । सैव जगदण्डमसृजत । कामकलेति विज्ञायते । शृङ्गारकलेति विज्ञायते ॥१॥ तस्या एवब्रह्माऽजीजनत् । विष्णुरजीजनत् । रुद्रोऽजीज- नत् । सर्वे मरुद्गणा अजीजन् । गन्धर्वाप्सरसः । किन्नरा वादि- त्रवादिनः समन्तादजीजनन् । भोग्यमजीजनत् । सर्वमजीजनत् । सर्वं शाक्तमजीजनत् । अण्डजं स्वेदजमुद्भिज्जं जरायुजं यत् किंचैतत् प्राणिस्यावरजङ्गमं मनुष्यमजीजनन् ॥२॥ सैषा परा शक्तिः । सैषा शांभवी विद्या कादिविद्येति वा हादिविद्येति वा सादिविद्येति वा रहस्योमोमों वाचि प्रतिष्ठा ॥३॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
४६२ ] [ बह्वृचोपनिषद् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सैव पुरत्रयं शरीरत्रयं व्याप्य बहिरन्तरवभासयन्ती देश- कालवस्त्वन्तरासङ्गान्महात्रिपुरसुन्दरी वै प्रत्यक् चितिः ॥४॥ सैवात्मा ततोऽन्यदसत्यमनात्मा । अत एषा ब्रह्मसंवित्ति- र्भावाभावकलाविनिर्मुक्ता चिद्विद्याऽद्वितीयाब्रह्मसंवित्तिः सच्चि- दानन्दलहरी महात्रिपुरसुन्दरी बहिरन्तरनुप्रविश्य स्वयमेकैव विभाति । यदस्ति सन्मात्रम् । यद्भाति । चिन्मात्रम् । यत् प्रिय- मानन्दम् । तदेतत् सर्वाकार महात्रिपुरसुन्दरी । त्वं चाहं च सर्वं विश्वं सर्वदेवता । इतरत् सर्वं महात्रिपुरसुन्दरी । सत्यमेकं ललिताऽऽख्यं वस्तु तदद्वितीयमखण्डार्थं परं ब्रह्म ।॥५॥ पञ्चरूपपरित्यागादवरूपप्रहाणतः । अधिष्ठानं परं तत्त्वमेकं सच्छिष्यते महत् ॥ इति ॥६॥ देवी ने ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की और वही संसार की उत्पत्ति से पहले थीं । वह ही कामकला और शृङ्गारकला के नाम से प्रसिद्ध हैं । उन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु व रुद्र का प्रादुर्भाव हुआ । उन्हीं से सारे मरुद्गण, गन्धर्व, अप्सराएं और किन्नर उत्पन्न हुए, समस्त भोग सामग्री का कारण वही हुई । सब कुछ उन्हीं से सृजन हुआ । शक्ति से ही सब कुछ बना । मनुष्य तथा समस्त स्थावर-जंगम प्राणियों ( अण्डज, स्वेदज, उद्भिज, जरायुज ) की उत्पत्ति उन्हीं से हुई, उन्हीं को अपरा शक्ति, शाम्भवी विद्या, कादि विद्या, हादि विद्या, सादि विद्या, व रहस्यरूपा कहते हैं । वे ही वह अक्षर तत्व हैं जो प्रणव का प्रतिपादन करती हैं, प्रणव स्वरूपा हैं, प्रत्येक प्राणी की वाणी पर अधिष्ठित हैं । वे ही तीनों अवस्थाओं ( जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति ) व तीनों प्रकार के शरीरों ( स्थूल, सूक्ष्म और कारण ) में व्याप्त हो रही हैं और वही उनको प्रकाशित कर रही हैं । वे देश, काल और वस्तु की सीमा के भीतर रहती हैं, परन्तु यह उन्हें स्पर्श नहीं कर सकते और वे प्रत्येक प्राणी में चेतना उत्पन्न करती Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
बह्वृचोपनिषत् ] [ ४६३ हैं। उन्हीं को आत्मा कहा जाता है। उनको छोड़कर सब कुछ अमर्त्य और अनात्म है। वे परब्रह्म का बोध कराने वाली विद्या शक्ति हैं। वे ब्रह्म का ज्ञान कराने वाली हैं वे सत्, चित् और आनन्दस्वरूपा हैं। प्रत्येक वस्तु के बाहर और भीतर व्याप्त हो रही हैं। उनके अस्ति, भाति और प्रिय तीनों रूप, सत्, चित् और आनन्द के बोधक हैं। इस प्रकार से वह महात्रिपुरसुन्दरी समस्त स्थूल वस्तुओं में अधिष्ठित हैं। मैं और तुम, देवता, सारा संसार व शेष सब कुछ वे देवी ही हैं। ललिता ही सत्य हैं, वे ही परब्रह्म तत्व हैं। पाँच रूपों (अस्ति, भाति, प्रिय, नाम, रूप) के त्यागने और अपने रूप के न त्यागने से जो सत्ता शेष रह जाती है, उसी को परम तत्व कहते हैं ॥ १ ॥ प्रज्ञानं ब्रह्मेति वा अहं ब्रह्मास्मीति वा भाष्यते । तत्त्वमसीत्येव संभाव्यते । अयमात्मा ब्रह्मेति वा अहं ब्रह्मा- स्मीति वा ब्रह्मैवाहमस्मीति वा ॥७॥ योऽहमस्मीति वा सोऽहमस्मीति वा योऽसौ सोऽहमस्मीति वा या भाव्यते सैषा षोडशी श्रीविद्या पञ्चदशाक्षरी श्रीमहात्रि- पुरसुन्दरी बालाऽम्बिकेति बगलेति वा मातङ्गीति वरस्वयं- कल्याणीति भुवनेश्वरीति चामुण्डेति चण्डेति वाराहीति तिरस्क- रिणीति राजमातङ्गीति वा शुकश्यामलेति वा लघुश्यामलेति वा अश्वारूढेति वा प्रत्यङ्गिरा धूमावती सावित्री सरस्वती गायत्री ब्रह्मानन्दकलेति ॥८॥ ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः । यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यतिय इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ इत्युपनिषत् ॥६॥ "प्रज्ञान ही ब्रह्म है" व 'मैं ही ब्रह्म हूँ' आदि वाक्यों से उसी परम तत्व को व्यक्त किया जाता है। जब तक 'वह-तू-मैं' कहते हैं तो हम उसी को प्रकट करते हैं। जो वह है, वह ही मैं हूँ' 'वह भी मैं
४६४ ] [ बह्वृचोपनिषत् हूँ" "ब्रह्म भी मैं ही हूँ" "आत्मा ब्रह्म है" यदि वाक्यों द्वारा उसी परम विद्या का विवेचन होता है । उसी पञ्चदशाक्षरवाली देवी के ही बाला, अम्बिका, बगला, मातङ्गी स्वयंवर-कल्याणी, भुवनेश्वरी, चामुण्डा, चण्डा, बाराही, तिरस्करिणी, राजमातङ्गी, शुकश्यामला, लघुश्यामला, अश्वारूढ़ा, प्रत्यङ्गिरा, धूमावती, सावित्री, सरस्वती, ब्रह्मानन्दकला, आदि नाम हैं। जिस विनाश को प्राप्त न होने वाले आकाश में सारे देवता विराजमान रहते हैं, उसी परम आकाश में ऋचाएँ अधिष्ठित हैं। जो उस परम आकाश को भली-भाँति समझने की चेष्टा नहीं करता, वह केवल ऋचाओं के पढ़ने से कुछ नहीं कर सकता। उसको भली प्रकार समझ लेने वाले ही उसमें सदा निवास करने का स्थान पा जाते हैं। ॥ बह्वृचोपनिषद् समाप्त ॥
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमावि- रावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीरनेना- धीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्युतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मा- मवतु ! तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतुवक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः । शांति पाठ—ॐ मेरी वाणी मन में स्थिर हो, मन वाणी में स्थिर हो, हे स्वयंप्रकाश आत्मा ! मेरे सम्मुख तुम प्रकट होओ । हे वाणी और मन ! तुम दोनों मेरे वेद ज्ञान के आधार हो, इसलिए मेरे वेदाभ्यास का नाश न करो । इस वेदाभ्यास में ही मैं रात्रि-दिन व्यतीत करता हूँ । मैं ऋत भाषण करूँगा, सत्य भाषण करूँगा, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्ति । प्रथमः खण्डः अथ भगवन्तं देवा ऊचुर्हे भगवन्नः कथय सौभाग्यलक्ष्मी- विद्याम् ।।१।। तथेत्यवोचद्भगवान्नादिनारायणः सर्वे देवा यूय सावधान मना भूत्वा शृणुत । तुरीयरूपां तुरीयातीतां सर्वोत्कटां सर्व- मन्त्रासनगतां पीठोपपीठदेवतापरिवृतां चतुर्भुजां श्रियं हिरण्य- वर्णामिति पञ्चदशर्भिर्गायथ ।।२।। अथ पञ्चदशऋगात्मकस्य श्रीसूक्तस्यानन्दकर्दमचिक्लीतेन्दि- रासुता ऋषयः । श्रीरित्याद्या [या] ऋचः । चतुर्दशानामृचां-
४६६ ] [ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् मानन्दाहृषयः । हिरण्यवर्णमित्याद्युक्तत्रयस्यानुष्टुप् छन्दः । कासोऽस्मीत्यस्य बृहती छन्दः । तदन्ययोर्द्वि योस्त्रिष्टुप् । पुनरष्ट- कस्याद्यनुष्टुप् । शेषस्य प्रस्तारपङ्क्तिः । श्रयग्निद्देवता । हिरण्य- रजतस्रजा बीजम् । कासोऽस्मीति शक्तिः । हिरण्मया चन्द्रा णथनस्स्रजा हिरण्यस्रजा हिरण्या हिरण्यवर्णेति प्रणवादिन्नमोऽन्तै- श्रुत्युद्यन्तैरङ्गन्यासः । अब वक्तव्यैरङ्गन्यासः मस्तकलोचन- श्रुतिघ्राणवदन कण्ठबाहुद्वयहृन्नाभिगुह्यपायूरुजानुजङ्घेषु श्री सूक्तैरेव क्रमशोन्यसेत् ॥३॥ अमलकमलसंस्था तद्रजः पुञ्जवर्णं करकमलधृतेष्वाभीति युग्माम्बुजा च । मणिगटकविचित्रांकृताकल्पजालैः सकलभुवनमाता संतत श्रीः श्रियै 'नः ॥४ एक समय की बात है, भगवान् आदि नारायण से देवताओं ने निवेदन किया—'प्रभो ! सौभाग्यलक्ष्मी विद्या का हमारे उपदेश करिये । भगवान् ने कहा—'देवताओ ! एकाग्र मन से सुनो । स्थूल, सूक्ष्म और कारण रूप अवस्थाओं से जो तुरीयावस्था, वरन् तुरीयावस्था से भी परे निर्गुंण एवं विकराल रूप वाली हैं, जो मन्त्र रूप आसन पर प्रतिष्ठित होने वाली हैं, पीठों और उपपीठों में विराजमान देवगण से घिरी हुई हैं, उन चार भुजा वाली लक्ष्मीजी का श्रीसूक्त की पन्द्रह ऋचाओं के द्वारा चिंतन करना चाहिए । उन पन्द्रह ऋचाओं के ऋषि इन्दिरा, आनन्द, कर्दम और चिव- लीत हैं । प्रथम मंत्र की ऋषि इंदिरा शेष मंत्रों के ऋषि पुत्र हैं । प्रथम तीन ऋचाओं का छन्द अनुष्टुप्, चौथी का वृहती, पांचवीं-छठवीं का त्रिष्टुप्, सातवीं से चौदहवीं तक का अनुष्टुप् और प्रस्तार पंक्ति हैं ।
सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् [ ४६७ देवता श्री और अग्नि, बीज 'हिरण्यवर्णम्', शक्ति 'का सोस्मि' है । हिर- ण्यमयी, चन्द्रा, रजतस्रजा, हिरण्यस्रजा हिरण्या,हिरण्यवर्ण इन नामों को चतुर्थी विभक्ति में रखकर ओंकार से आरम्भ कर अन्त में नमः उच्चा- रण करता हुआ न्यास करे । फिर श्रीसूक्त के मन्त्रों से अङ्गन्यास करे फिर निम्न मन्त्र से ध्यान करे— 'अरुण वर्ण के कमलदल पर विराजमान, कमल-पराग की राशि के समान पीले रङ्ग वाली,वर-मुद्रा, अभय-मुद्रा और दो हाथों में कमल- पुरुष-धारिणी, मणिमय कंकणों से अलंकृत, सब लोकों की माता श्री महालक्ष्मी हमें निरन्तर श्री से सम्पन्न बनावे' ॥१-४॥ तत्पीठम् । कर्णिकायां ससाध्यं श्रीबीजम् । वस्वादित्य- कलापद्मेषु श्रीसूक्तगतार्धर्चर्चा तद्वहिर्यः शुचिरिति मातृकया च श्रियं यन्त्राङ्गदशशं च विलिख्य श्रियमावाहयेत् ॥५॥ अङ्गैः प्रथमाऽऽवृत्तिः । पद्मादिभिर्द्वितीया । लोकेशैस्तृ- तीया । तदायुधैस्तुरीयाऽऽवृत्तिर्भवति । श्रीसूक्तैरावाहनादि । षोडशसहस्रजपः ॥६॥ सौभाग्यरमै कार्कश्य भृगुतृच्दगायत्रीश्रिय ऋष्यादयः । शमिति बीजशक्तिः । श्रामित्यादि षडङ्गम् ॥७ ययाद्भूयो द्विपद्माभयवरदकरा तप्तकार्त्तस्वराभां शुभाभ्राभ्राभेभयुग्मद्वयकरधृतकुम्भाद्भिरासिच्यमाना । रत्नौघाबद्धमौलिर्विमलतरदुकूलार्तवालेपनाढ्या पद्माक्षी पद्मनाभोरसि कृतवसतिः पद्मगा श्रीः श्रियैः नः॥८। पीठ कर्णिका के भीतर साध्य कार्यं श्रीबीज लिखे फिर अष्टदल, द्वादशदल और षोडशदल वाले पद्मों पर भूवृत्तों के मध्य में श्रीसूक्त की
४६८ ] [ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् ] आधी-आधी ऋचा लिखे। फिर निभूर्वृत्त में फलश्रुतिरूप ऋचा लिख कर षोडशार के बीच में और ऊपर 'अ' से 'स'कार तक मातृका वर्णों का लेखन करे। सबसे ऊपर निभूर्वृत्त में वषड् सम्पन्न त्वरिता बीज के सहित श्रीबीज का लेखन करे। इस प्रकार दश अङ्गों वाला श्रीचक्र बनावे। अङ्ग मन्त्रों के द्वारा प्रथम आवरण पूजा की जाती है। पद्म निधियों के द्वारा दूसरी बार आवरण पूजा की जाती है। लोकपालों के द्वारा तृतीय आवरण पूजा होती है। वज्रादि आयुधों के द्वारा चतुर्थ आव- रण पूजा का क्रम है। श्रीसूक्त की ऋचाओं से आवाहनादि कार्य किये जाते हैं। इतना करने के पश्चात् पुरश्चरण के लिए सोलह हजार मंत्र- जप का विधान है। एकाक्षर सौभाग्यलक्ष्मी मन्त्र के ऋषि भृगु, छन्द नीवृद्गायत्री और देवता श्री हैं। बीज 'श्रो' और अङ्गन्यास 'श्रां' इत्यादि के द्वारा होता है। जिन श्रीदेवी ने अपने दो हाथों में कमल तथा दो में वर मुद्रा और अभयमुद्रा ग्रहण की हुई हैं, जिनके देह की कान्ति स्वर्ण के समान है, जो शुभ मेघ के समान आभा वाली दो हाथियों की सूँड़ों में धारण किये कलशों के जल से अभिषिक्त हो रही हैं, जिनके सिर पर लाल वर्ण के रत्नों का मुकुट सुशोभित है, जिनके अंगों पर ऋतु के अनुकूल अंग राग लिपे हुए हैं, जो स्वच्छ वस्त्र वाली हैं, कमल के समान नेत्र वाली, पद्मनाय निवासिनी, कमलासना श्रीदेवी हमारे निमित्त परम ऐश्वर्य प्रदान करावें ॥५-८॥ तत्पीठम् । अष्टपत्रं वृत्तद्वयं द्वादशराशिखण्डं चतुरश्रं रमापीठं भवति। कर्णिकायां ससाध्यं श्रीबीजम्। विभूति- रुन्नतिः कान्तिः सृष्टिः कीर्तिः सन्नतिर्व्यर्थरिष्टरुत्कृष्ट ऋद्धिरिति प्रणवादि नमोऽन्तैश्चतुर्थ्यन्तैर्नवशक्तीर्यजेत् ॥६॥
सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् [ ४६६ अङ्गैः प्रथमाऽऽवृत्तिः । वासुदेवादिद्वितीया । बालकयादि- स्तृतीया । इन्द्रादिभिश्चतुर्थी भवति । द्वादशलक्षजपः ॥ १० ॥ श्रीलक्ष्मीर्वरदा विष्णुपत्नी वसुप्रदा हिरण्यरूप्रा स्वर्ण- मालिनी रजतरस्रजा स्वर्णप्रभा स्वर्णप्राकारा पद्मवासिनी पद्म- हस्ता पद्मप्रिया मुक्तालङ्कारा चन्द्रा सूर्या बिल्वप्रिया ईश्वरी भुक्तिर्मुक्तिर्विभूतिर्ऋद्धिः समृद्धिः कृष्टिः पुष्टिर्धनदा धनेश्वरी श्र- द्धा भोगिनी भोगदा धात्री विधात्रीत्यादिप्रणवादिनमोऽन्ताश्चतुर्थ्य- न्ता मंत्राः । एकाक्षरवदङ्गादिपीठम् । लक्षजपः । दशांशं तर्पणम् । शतांशं हवनम् । सहस्रांशं द्विजतृप्ति ॥११॥ निष्कामानामेव श्रो- विद्यासिद्धिः । न कदाऽपि सकामानामिति ॥ १२॥ तीन वृत्तों से युक्त रमापीठ यंत्र अङ्कित करे । अष्टदल कर्णिका में साध्य सहित श्री बीज लिखे । प्रारम्भ से ओंकार और अन्त में नमः के योग सहित प्रत्येक नाम के साथ चतुर्थी विभक्ति के प्रयोग द्वारा नौ शक्तियों की पूजा करे । विभूति, उन्नति, कान्ति, सृष्टि, कीर्ति, सन्नति, व्युष्टि, सत्कृष्ट एवं ऋद्धि यही नौ शक्तियां हैं । अङ्गन्यास द्वारा प्रथम आवरण पूजा करे । वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध का क्रमशः पूजन करे । इस प्रकार द्वितीय आवरण पूजा होती है । फिर बालकी आदि की पूजा द्वारा तृतीय आवरण को पूजे । फिर इन्द्रादि देवों और उनके आयुधों के द्वारा चतुर्थ आवरण की पूजा करे । पुरश्चरण के निमित्त द्वादशलक्ष मंत्र-जप का विधान है । त्र्यक्षरी विद्या के पूजन में आदि में ओंकार और अन्त में नमः लगाकर प्रत्येक नाम की चतुर्थी विभक्ति सहित प्रयोग होता है । श्री, लक्ष्मी, वरदा, विष्णुप्रिया, हिरण्यरूप्रा, वसुप्रदा, रजतरस्रजा, स्वर्ण- मालिनी, स्वर्णप्रभा, स्वर्णंप्रकाश, पद्मवासिनी, पद्महस्ता, पद्मप्रिया, विल्वप्रिया, चन्द्रसूर्या, मुक्तालङ्कार, ईश्वरी, भुक्ति, मुक्ति, विभूति, ऋद्धि,
दसवां भाग हवन और हवन का दसवां भाग ब्राह्मण भोजन कराना
५०० ] सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् समृद्धि, कॄष्टि, पुष्टि, धनदा, धनेश्वरी, श्रद्धा, सावित्री, भोगिनी, भोगदा, धात्री, विधात्री, प्रभृति नामों के द्वारा शक्ति-पूजन करे । एका- क्षर मंत्र के समान ही पीठ पूजा की जाती है । पुरश्चरण के निमित्त एक लक्ष मंत्र-जप करना चाहिए । जप का दसवां भाग तर्पण, तर्पण का दसवां भाग हवन और हवन का दसवां भाग ब्राह्मण भोजन कराना चाहिये । इस श्रीविद्या की प्राप्ति उन्हीं को होती है जो कामना-रहित भाव से उपासना करते हैं । कामना सहित उपासना करने वालों को इसकी सिद्धि नहीं होती ॥ ६—१२ ॥ द्वितीयः खण्डः अथ हैन देवा ऊचुस्तुरीया माययां निर्दिष्टं तत्त्वं ब्राह्मोत तथेति स होवाच— योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात् प्रवर्धते । योऽप्रमत्तस्तु योगेन स योगी रमते चिरम् ॥ १ ॥ समापय्य निद्रां सुजीर्णेऽल्पभोजी श्रमत्याज्यबाधे विविक्ते प्रदेशे । सदाऽऽसीत निस्तृष्ण एष प्रयत्नो- ऽथ वा प्राणरोधो निजाभ्यासमार्गात् ॥ २ ॥ वक्त्रेणापूर्यं वायुं हुतवहनिलयेऽपानमाकृष्य धृत्वा स्वाङ्गुष्ठाद्यङ्गुलीभिर्वरकरतलयोः षड्भिरेवं निरुध्य । श्रोत्रे नेत्रे च नासापुटयुगलमथोज्नेन मार्गेण सम्यक् पश्यन्ति प्रत्ययांसं प्रणवबहुविधध्यानसंलीनचित्ताः ॥ ३ ॥ आदि नारायण से देवताओं ने निवेदन किया—'भगवन् ! तुरीया माया द्वारा निर्दिष्ट तत्व के सम्बन्ध में हमें उपदेश दीजिये ।'
सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् ] [ ५०१ भगवान् आदि नारायण ने कहा—'योग से योग की वृद्धि होती है, इसलिए योग के द्वारा ही योग को जाने। योग में सदा दत्तचित्त योगी चिरकाल तक सुख का उपभोग करता है। मितभोगी साधक राग- द्वेषादि मल के परिपक्व होने पर आलस्य-रहित होकर तथा इस विश्व- प्रपञ्च को ब्रह्मत्व-प्राप्ति में रोड़ा समझकर एकान्त-साधन करता है। वह या तो राजयोग में प्रवृत्त होता है अथवा गुरु द्वारा बताये हुए हठ योग वाले मार्ग पर चलता है। इस प्रकार योगी इन दो प्रकार के योगों में से किसी एक का अवलम्बन करता है। जो साधक प्राणायाम का अभ्यास करते हैं वे मुख द्वारा वायु को भीतर खींचते और अपानवायु को नाभि में जठराग्नि कोष्ठ में खींचकर मुख द्वारा खींची हुई वायु का उससे संयोग कराते हैं, फिर अँगूठे, अँगुलियों और हथेलियों से कान, नेत्र और नासा- पुटों को बन्द कर प्राणायाम द्वारा प्रणव का चिन्तन कर, उसी में रमण करते हुए आत्म-साक्षात्कार करते हैं ॥ १-३ ॥ श्रवणमुखनयननासानिरोधनेनैव कर्तव्यम् । शुद्धसुषुम्नासरणी स्फुटममलं श्रूयते नादः ॥४ विचित्रघोषसंयुक्ताऽनाहते श्रूयते ध्वनिः । दिव्यदेहश्च तेजस्वी दिव्यगन्धोऽप्यरोगवान् ॥५ संपूर्णहृदयः शून्ये त्वारम्भे योगवान् भवेत् । द्वितीयां विघटीकृत्य वायुर्भवपि मध्यगः ॥६ कान, नाक, मुख, नेत्र के छिद्रों को बन्द करने पर अभ्यास की एक अन्य विधि भी सिद्ध होती है। उनके द्वारा शुद्ध सुषुम्णा नाड़ी में प्रणव का अनाहत नाद सुना जाता है। अनाहत चक्र में ध्वनि सुनते हुए विभिन्न प्रकार के विचित्र घोष सुनाई देते हैं। यह साधना साधक का अत्यन्त तेजस्विता प्राप्त कराती है। उसके देह से दिव्य गन्ध आती है और वह स्वस्थ होता हुआ दिव्य शरीर को प्राप्त होता है। शून्य में
५०२ ] [ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत्
पूर्ण मनोयोगपूर्वक ध्वनि सुनते रहने से आरम्भ में साधक योग से युक्त होता है। इस प्रकार इच्छा शक्ति द्वारा प्रेरित जीवात्मा जब सुषुम्णा मार्ग पर अग्रसर होता है तब स्वाधिष्ठान चक्र को भेदकर उसके मध्यवर्ती छिद्र के द्वारा प्राणवायु सुषुम्णा में प्रविष्ट हो जाता है ॥ ४-६ ॥
दृढासनो भवेद्योगी पद्माद्यासनसंस्थितः । विष्णुग्रन्थेस्ततो भेदात् परमानन्दसंभवः ॥७ अतिशून्यो विमर्दश्च भेरीशब्दस्ततो भवेत् । तृतीयां यत्नतो भित्त्वा निनादो मद्दुलध्वनिः ॥८ महाशून्यं ततो याति सर्वसिद्धिसमाश्रयम् । चित्तानन्दं ततो भित्त्वा सर्वपीठगतानिलः ॥६ निष्पत्तौ वैष्णवः शब्दः क्वणतीति क्वणो भवेत् । एकीभूतं तदा चित्तं सनकादिमुनीडितम् ॥१० अन्तेऽनन्तं समारोप्य खण्डेऽखण्डं समर्पयन् । भूमानं प्रकृतिं ध्यात्वा कृत्यकृत्योऽमृतो भवेत् ॥११ योगेन योगं संरोध्य भावं भावेन चाञ्जसा । निर्विकल्पं परं तत्त्वं सदा भूत्वा परं भवेत् ॥१२ अहंभावं परित्यज्य जगद्भावमनीदृशम् । निर्विकल्पे स्थितो विद्वान् भूयो नाप्यनुशोचति ॥१३
पद्मासन में स्थित योगी दृढ़ अभ्यास में सफल होता है। इसके पश्चात् तृतीय मणिपूरक नामक चक्र में स्थित जो माया अनेक कामनाओं की वृद्धि करती रहती है, उसे विच्छिन्न कर देने पर परम आनन्द प्राप्त हो सकता है। शून्य को लांघता हुआ प्राणवायु जब नाड़ी के साथ सङ्घर्षित होता है तब उससे भेरी सदृश्य ध्वनि सुनाई देती है। तृतीय
सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् [ ५०३ मणिपूरक चक्र के भेद कर चलने पर प्राणवायु से मृदङ्ग की-सी ध्वनि निकलती है। फिर अन्य चक्रों को भेदता हुआ चलने वाला प्राणवायु महाशून्य में पहुँच कर सब प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त करता है। तद- नन्तर प्राणवायु तालु चक्र द्वारा चित्त को जीतकर तालुचक्र का भेदन करता है वहाँ चित्त स्थित सभी आनन्द उसे प्राप्त होते हैं ॥ ७—६ ॥ इस साधना के अन्त में प्रणव शब्द के रूप में स्वयं प्रकट होकर गूँजता है। चित्त उसमें लीन हो जाता है। यह कथन सनकादि मुनियों का है। उस महाचक्र में स्थित साधक अन्त में अनन्त का समारोप करता है। माया ग्रस्त रूप को ब्रह्मा में समर्पित कर साधक आत्मा की सर्व- व्याप्तता के चिन्तन द्वारा कृतकृत्य होता हुआ अमृतत्व प्राप्त करता है। असंप्रज्ञात योग द्वारा संप्रज्ञात योग पर विजय पावे और अभाव से भाव का निरोध करे। तब साधक निर्विकल्प समाधि को प्राप्त होकर कैवल्य में स्थित होता है। उस समय उसका अहं भाव मिट जाता है और मायामय संसार भी लुप्त हो जाता है। ऐसे ज्ञानी साधक को फिर ममत्व नहीं घेरता ॥ १०-१३ ॥ सलिले सैन्धवं यद्वत् साम्यं भवति योगतः । तथाऽऽत्ममनसोरैक्यं समाधिरभिधीयते ॥१४ यदा संक्षीयते प्राणो मानसं च प्रलीयते । तदा समरसत्वं यत् समाधिरभिधीयते ॥१५ यत् समत्वं तयोरत्र जीवात्मपरमात्मनोः । समस्तनष्टसङ्कल्पः समाधिरभिधीयते ॥१६ प्रभाशून्यं मनःशून्यं बुद्धिशून्यं निरामयम् । सर्वशून्यं निराभासं समाधिरभिधीयते ॥१७ स्वयमुच्चलिते देहे देही नित्यसमाधिना । निश्चलं तं विजानीयात् समाधिरभिधीयते ॥१८ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
५०४ ] [ मण्डलब्राह्मणोपनिषत्
५०४ ] [ मण्डलब्राह्मणोपनिषत्
यत्रयत्र मनो याति तत्रतत्र परं पदम् । तत्रतत्र परं ब्रह्म सर्वत्र समवस्थितम् ॥१६
जल में मिलाया हुआ नमक उसी में घुलमिल जाने के समान, मन जब आत्मा में विलीन हो जाता है उस अवस्था को समाधि कहते हैं। प्राणायाम के द्वारा सम्यक् रूप से क्षीण हुआ प्राणवायु जब कुम्भक में स्थिर होता है और चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है, तब चित्त और आत्मा का एकीभाव समाधि कहा जाता है। समाधि उस अवस्था का नाम है, जिसमें जीव आत्मा का परमात्मा से समत्व होने पर सभी सङ्कल्प मिट जाते हैं। सांसारिक बोध-रहित जिस स्थिति में मन-बुद्धि का पूर्ण विलीनीकरण हो जाने पर सब कुछ शून्यवत् दिखाई पड़ता है, उस अवस्था को निरामय कहते हैं, वही समाधि कही जाती है। शरीर के इधर-उधर गमन करने पर भी चित्त का निश्चल एवं ध्यानमग्न रहना समाधि की अवस्था ही है। उस अवस्था में साधक का मन जहाँ भी गमन करता है, वहीं उसे परम पद उपलब्ध होता है। उसके लिए परम ब्रह्म सर्वत्र समान रूप से अवस्थित रहता है ॥ १४-१६ ॥
तृतीयः खण्डः
अथ हैन देवा ऊचुर्नवचक्रविवेकमनुब्रूहीति । तथेति स होवाच— आधारे ब्रह्मचक्रं त्रिरावृत्तभङ्गीमण्डलाकारं तत्र मूलकन्दे शक्तिः पावकाकारं ध्यायेत् तत्रैव कामरूपपीठं सर्वकामप्रदं भवति इत्याधारचक्रम् ॥ १ ॥ द्वितीयं स्वाधिष्ठानचक्रं षड्दलं तन्मध्ये पश्चिमाभिमुखं