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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri राधोपनिषत् । ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्ण मादाय पूर्णमेवा वशिष्यते । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ॐ यह ब्रह्म पूर्ण है, यह जगत् पूर्ण है, इस पूर्ण ब्रह्म में से यह पूर्ण जगत उत्पन्न होता है । इस पूर्ण ब्रह्म में से पूर्ण जगत को पृथक् करदें तो पूर्ण ब्रह्म ही शेष रहेगा । ॐ शान्ति, शान्ति । ओमथोर्ध्व मन्थिन ऋषयः सनकाद्या भगवन्तं हिरण्य- गर्भमुपासित्वोचुः देव कः परमो देवता, का वा तच्छक्तयः, तासु च का वरीयसी भावतीति सृष्टि भूता च केति ॥ सहोवाच ! हे पुत्रकाः शृणुतेदं ह वाव गुह्याद् गुह्यतरमप्रकाशयं, यस्मै कस्मै न देयम् ॥ स्निग्धाय, ब्रह्मवादिने, गुरुभक्ताय; देव मन्यथा दातुर्महदवम्भीति । 'कृष्ण ह वै हरिः परमोदेव षड् विधैश्वर्य्यं परिपूर्णो भगवान गोपीगोपसेव्यो वृन्दाऽऽराधितो वृन्दावनादिनाथः स एक एवेश्वरः । तस्य हवे द्वैततनु नारायणोऽखिल ब्रह्माण्डा- धिपतिरेकोंऽशःप्रकृतेः प्राचीनो नित्यः । एवं हि तस्य शक्तयस्त्व- नेकधा । आह्लादिनी, सन्धिनी, ज्ञानेच्छा, क्रियाद्या, बहुविधः शक्तयः । तास्वाह्लादिनी वरीयसी परमान्तरंगभूता राधा, कृष्णेन आराध्यत इति राधा कृष्णं समाराधयति सदेति राधिका गन्धर्वेति व्यापदेश्यत इति । येयं राधा यश्च कृष्णे रसब्धिर्देहे नैकः क्रीडनार्थं द्विधाभूत् । हरि ओ३म् । किसी समय ऊर्ध्वरेता सनकादिक ऋषियों ने पिता- मह ने ब्रह्माजी से स्तुति करके पूछा—'भगवन् ! कौन परम देव है, उनकी Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

५२६ ] [ राधोपनिषत् शक्तियां कौन हैं, उन शक्तियों में सर्वश्रेष्ठ और सृष्टि का कारण रूप कौन-सी शक्ति कही गई है ?' ब्रह्माजी ने कहा - 'पुत्र ! सुनो मैं इस अति गुह्य वार्ता को तुमसे कहता हूँ, पर इसे हर किसी को मत बतलाना। इसे उसी को बतलाना, जो स्नेहशील हो, ब्रह्मचारी हो, गुरु का भक्त हो, अगर इसके विपरीत अनधिकारी को दिया गया तो बड़ा पाप होगा। भगवान् कृष्ण ही सबसे बड़े देव हैं, वे छहों ऐश्वर्य से परिपूर्ण हैं, गोपी- गोप उनकी सेवा करते हैं, वृन्दा द्वारा आराधना किये जाते हैं, ये वृन्दावन अधीश्वर हैं और एक मात्र सर्वेश्वर हैं। श्री नारायण भी उन्हीं के रूप हैं जो समस्त जगत के स्वामी हैं। श्रीकृष्ण ही प्रकृति से परे और अविनाशी हैं। आह्लादिनी, सन्धिनी, ज्ञानेच्छा, क्रिया इत्यादि इनकी अनेक शक्तियां हैं। इन सब में 'आह्लादिनी' सबसे प्रधान है। यह उनकी सर्वाधिक अन्तरङ्ग है, इन्हीं को 'राधा' कहते हैं। भगवान् कृष्ण स्वयं इनकी आराधना करते हैं। श्री राधाजी सदैव कृष्ण की आराधना करती हैं। राधिका को 'गन्धर्वा' भी कहा जाता है। समस्त गोपियां, श्रीकृष्ण भगवान् की महिषियां और लक्ष्मी का आविर्भाव भी राधाजी के शरीर से ही हुआ है। रस-सागर भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही क्रीडार्थ एक से दो रूपों में विभक्त हो गए हैं। एषा वै हरेः सर्वेश्वरी सर्वविद्या सनातनी कृष्णप्राणाधि- देवी चेति, विविक्ते वेदाः स्तुवन्ति, यस्या गतिं वक्तुं न चोत्स- हे। संव यस्य प्रसीदति तस्य करतलावकलितम्परमधामेति। एतामवज्ञाय यः कृष्णमाराधयितुमिच्छति, स मूढतमोमूढतम- श्चेति। अथ हैतानि नामानि गायन्ति श्रुतयः ॥ श्री राधा सर्वेश्वर भगवान् कृष्ण की भी सर्वेश्वरी हैं, उनकी समस्त विद्याओं में सनातनी हैं, ये श्रीकृष्ण की प्राणों से अधिक प्रिय देवी हैं। चारों वेद भी एकान्त भाव से इनकी स्तुति करते हैं। ब्रह्मज्ञानी ऋषि इनकी गति को जानने और कहते हैं, इनकी महिमा

राधोपनिषत् [CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri] ५२७ इतनी अधिक है कि मैं चाहे अपनी समस्त आयु उसे कहता रहूं तो भी उसका पार नहीं मिल सकता । ये राधाजी जिस पर प्रसन्न होती हैं उसे तुरन्त परम धाम की प्राप्ति हो जाती है। यदि कोई राधाजी की अवज्ञा करके कृष्ण भगवान् की आराधना करने की इच्छा करता है तो वह सर्वाधिक मूढ़ है। वेदों में श्रीराधाजी के नाम इस प्रकार गिनाये गये हैं। राधा रासेश्वरी रम्या कृष्ण मन्त्राधिदेवता। सर्वद्या सर्ववन्द्यः च वृन्दावन विहारिणी ॥ वृन्दा राध्या रमाऽशेष- गोपी मण्डल पूजिता। सत्या सत्य परा सत्यभामा श्री कृष्ण वल्लभा ॥ वृषभान सुता गोपी मूल प्रकृतिश्वरी । गान्धर्वा राधिका रम्या रुक्मिणी परमेश्वरी ॥ परात्परता पूर्ण पूर्णचन्द्र निभानना। भुक्तिमुक्तिप्रदा नित्यं भव व्याधि विनाशिनी ॥ राधा, रासेश्वरी, रम्या, कृष्ण मंत्राधिदेवता, सर्वाद्या। सर्व- वन्द्या, वृन्दावन विहारिणी, वृन्दाराध्या, रमा अशेष, गोपी मण्डल पूजिता, सत्यासत्यपरा, सत्यभामा, श्रीकृष्ण वल्लभा, वृषभानुसुता, गोपी, मूल-प्रकृति, ईश्वरी, गन्धर्वा, राधिका, रम्याः रुक्मिणी, परमेश्वरी, परात्परता, पूर्णा, पूर्णचन्द्रनिभानना, भुक्तिमुक्तिप्रदा, नित्य, भवव्याधि विनाशिनी, इत्येतानि नामानि यः पठेत् स जीवनमुक्तो भवति । इत्याह हिरण्यगर्भो भगवानीति । सन्धिनी तु धाम भूषणशय्या- सनादिमिव भृत्यातिरूपेण परिणत मृत्युलोकावतरणकाले मातृ- पितृरूपेण चाऽऽसीदित्यनेकावतारकारणज्ञान शक्तिस्तु क्षेत्रज्ञ- शक्तिरिति इच्छन्भूता मायासतवरजस्तमोमयी बहिरङ्गा जगत्कारणभूता सैवाऽविद्यारूपेण जीवसुन्धन भूता क्रियाशक्तिस्तु लीला शक्तिरिति । य इमामुपनिषदमधोतेः सोऽव्रती व्रतीभवति, स वायुपूतो भवति, स सर्वपूतो भतत्रि, राधाकृष्णप्रियो भवति स यावच्चक्षुः पातं पंक्तोः पुनातिः ॐ तत्सत् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

५२८ ] [ राधोपनिषत् इन नामों का जो पाठ करता है वह जीवन्मुक्त हो जाता है, ऐसा भगवान् ब्रह्माजी का कथन है ( यहाँ तक ह्लादिनी शक्ति—राधा जी का वर्णन हुआ ) अब सन्धिनी शक्ति का वर्णन करते हैं कि यह शक्ति धाम, भूषण, शय्या, आसन आदि और मित्र, सेवक रूप से परिणाम को प्राप्त होती है। जो अनेक अवतारों का कारण है उस ज्ञान शक्ति को ही क्षेत्रज्ञ-शक्ति कहते हैं। इच्छाशक्ति के अन्तर्भूत माया शक्ति है। वह सत्-रज-तम आदि त्रय गुण रूप है और बहिरङ्ग होने से जगत की कारणभूत है। यह माया ही अविद्या रूप से जीव को बंधन में डालने वाली होती है। भगवान् की क्रिया-शक्ति ही लीलाशक्ति है। जो इस उपनिषद् को पढ़ता है, वह अव्रती हो तो भी व्रती हो जाता है; वह वायु के समान पवित्र हो जाता है, वह सर्व पवित्र हो जाता है, वह राधाकृष्ण के प्रिय हो जाता है। जहाँ कहीं उसकी दृष्टि पड़ती है वहां तक वह सबको पवित्र बना देती है। ॐ तत्सत्। ॥ राधोपनिषद् समाप्त ॥

तुलस्युपनिषत् अथ तुलस्युपनिषदं व्याख्यास्यामः । नारद ऋषिः । अथर्वाङ्गिरश्छन्दः । अमृता तुलसी देवता । सुधा बीजम् । वसुधा शक्तिः । नारायणः कीलकम् । श्यामां श्यामवपुर्धरां ऋक्स्वरूपां यजुर्मनां ३[?] ब्रह्माथर्वप्राणां कल्पहस्तां पुराणपठितां अमृतो- द्भवां अमृतरसमञ्जरीं अनन्तां अनन्तरसभोगदां वैष्णवीं विष्णु- वल्लभां मृत्युजन्मनिबर्हणीं दर्शनात्पापनाशिनीं स्पर्शनात्पावनीं अभिवन्दनाद्रोगनाशिनीं सेवनान्मृत्युनाशिनीं बैकुण्ठार्चनाद्विप- द्धन्त्रीं भक्षणात् वयुनप्रदां प्रादक्षिण्याद्दारिद्र्यनाशिनी मूलमृल्ले- पनान्महापापभञ्जिनीं घ्राणतर्पणादन्तर्मलनाशिनीं य एवं वेद स वैष्णवो भवति । वृथा न छिन्द्यात् । दृष्ट्वा प्रदक्षिणं कुर्यात् । यां न स्पृशेत् । पर्वणि न विचिन्वेत् । यदि विचिन्वति स विष्णु- हा भवति । श्रीतुलस्यै स्वाहा । विष्णुप्रियायै स्वाहा । अमृतायै स्वाहा । श्रीतुलस्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि । तन्नो अमृता प्रचोदयात् ॥ अब तुलस्युपनिषद् का विवेचन करते हैं । इस उपनिषद् का ऋषि नारद, छन्द अथर्वाङ्गिर, अमृतस्वरूप तुलसी देवता, सुधा बीज, वसुधा शक्ति, कीलक नारायण है । इस कृष्ण वर्ण वाली, श्यामसुन्दर प्रिय ऋग्वेद स्वरूप, यजुर्वेद चित्त वाली, ब्रह्माथर्ववेद प्राण वाली, कल्प (वेदाङ्ग) की हाथ रूप, पुराण में विख्यात, अमृत से उत्पन्न होने वाली अमृत रस की मंजरी के समान अनन्तरूप असंख्य रस तथा भोग देने वाली वैष्णवी विष्णु सम्बन्धी वस्तु विष्णुप्रिया, मृत्यु तथा जन्म को समाप्त करने वाली, देखने से पाप नाशिनी, छूने से पवित्र करने वाली,

५३० ] [तुलस्युपनिषत् प्रणाम से रोगनाशक, सेवन के मृत्यु दूर करने वाली, विष्णु पूजन करने से ( उनके पूजन में चढ़ाने से ) विपत्तिनाशिका, खाने से प्राणों में शक्ति देने वाली, परिक्रमा से दारिद्रय नाशक, जड़ में मिट्टी लगाने से ( जैसे पौधों को सुरक्षा के लिए मिट्टी लगाई जाती है ) महापाप को भंजन ( समाप्त ) कर देने वाली, सूँघने से अन्दर के मैल को नाश कर देने वाली है। तुलसी को जो इस रूप में श्रद्धापूर्वक देखता है, समझता है, वह सच्चा विष्णुभक्त है। इसे व्यर्थ न तोड़ें। कहीं देख लें तो परि- क्रमा करें। रात को न छूएँ। पर्व के दिन न तोड़ें। यदि तोड़ेगा तो वह विष्णुद्रोही कहलायेगा। श्री तुलसी जो कि विष्णु भगवान् की प्यारी है, अमृत स्वरूप है, उसे नमस्कार पहुँचे। इस विष्णुप्रिय श्री तुलसी का हम ध्यान करते हैं, इसके प्रति अगाध श्रद्धा रखते, हैं, सो वह अमृतस्वरूप हमें अमृतत्व के लिए प्रेरित करे। अमृतेऽमृतरूपासि अमृतप्रदायिनि । त्वं मानुद्धर संसारात् क्षीरसागरकन्यके ॥ श्रीसखि त्वं सदानन्दे मुकुन्दस्य सदा प्रिये । वरदाभयहस्ताभ्यां मां विलोकय दुर्लभे ॥ अवृक्षवृक्षरूपासि वृक्षत्वं मे विनाशय । तलस्यतुलरूपासि तुलाकोटिनिभेऽजरे ॥ अतुले त्वत्तुलायां हि हरिरेकोऽस्ति नान्यथा । त्वमेव जगतां धात्री त्वमेव विष्णुवल्लभा ॥ त्वमेव सुरसंसेव्या त्वमेव मोक्षदायिनी । त्वच्छायायां वसेल्लक्ष्मीस्त्वन्मूले विष्णुरव्ययः । समन्ताद्देवताः सर्वाः सिद्धचारणपन्नगाः । यन्मूले सर्वतीर्थानि यन्मध्ये ब्रह्मदेवताः ॥ हे क्षीर समुद्र की कन्या तुलसी ! तू अमृतस्वरूप है, इसीलिए 'अमृता' कहलाती है। तू अमृतत्व को देने वाली है, तू मुझ इस संसार

तुलसीपनिषत् ] [ ५३१ से उद्धृत कर ले । हे लक्ष्मी की सहेली ! तू सदा आनन्दमय है तथा हमेशा ही विष्णुजी की प्रिय है । हे दुष्प्राप्य ! तू मुझे वरदान तथा अभय की मुद्रा से युक्त हाथों से सुशोभित होकर कृपादृष्टि से देख । यद्यपि तू पेड़ नहीं है, तथापि महात्म्य की अधिकता से वृक्ष ही है, सो तू मेरी अज्ञानता को दूर कर दे । हे तुलसी तू अतुलरूप (जिसके रूप की तुलना नहीं) है । तू जराहीन है । तेरी तुला में करोड़ों तुलाएँ भी नहीं है, तू ही करोड़ों तुलनाओं स्वरूप है । हे तुलनाहीन ! तेरी तुलना में तो केवल एकमात्र भगवान् विष्णु ही टिकते हैं और कोई नहीं तू ही संसार की पालन करने वाली है तथा तू ही भगवान् विष्णु की प्रिय है । तू ही देवताओं द्वारा सेवा करने योग्य तथा मोक्ष देने वाली है । तेरी ही छाया में लक्ष्मी निवास करती है तथा तेरे मूल में (जड़ में) ही भगवान् विष्णु का निवास स्थल है । सारे देवता, सिद्ध, चरण, नाग, जिसके मूल में चारों तरफ से रहते हैं तथा सारे तीर्थ भी जिसके मूल में निवास करते हैं एवम् जिसके मध्य में ब्रह्म देवता रहते हैं । यदग्रे वेदशास्त्राणि तुलसीं तां नमाम्यहम् । तुलसि श्रीसखि शुभे पापहारिणि पुण्यदे ॥ नमस्ते नारदमुने नारायणमनः प्रिये । ब्रह्मानन्दाश्रु संजाते वृन्दावननिवासिनि ॥ सर्वविषयसम्पूर्णे अमृतोपनिषद्रसे । त्वं मामुद्धर कल्याणि महापापाब्धिदुस्तरात् ॥ सर्वेषामपि पापनं प्रायश्चित्तं त्वमेव हि । देवानां च ऋषीणां च पितॄणां त्वं सदा प्रिये ॥ विना श्रीतुलसीं विप्रा येऽपि श्राद्धं प्रकुर्वते । वृथा भवति तच्छ्राद्धं पितॄणां नोपगच्छति । तुलसीपत्रमुत्सृज्य यदि पूजां करोति वै । आसुरी सा भवेत् पूजा विष्णुप्रीतिकरी न च ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

५३२ ] [ तुलस्युपनिषत् यज्ञं दानं जपं तीर्थं नै देवतार्चनम् । तर्पणं मार्जनं चान्यन्न कुर्यात्तुलसीं विना ॥ तुलसीदारुमणिभिः जपः सर्वार्थसाधकः ॥ एवं न वेद यः कश्चित् स विप्रः श्वपचाधमः ॥ जिसके अग्र भाग में वेदशास्त्र रहते हैं उस तुझ तुलसी को मैं प्रणाम करता हूँ । हे तुलसी ! तू लक्ष्मी की सखि, कल्याणमय, पापहरण करने वाली तथा पुण्यदात्री है । हे विष्णु के मन को अच्छी लगने वाली, नारद से हमेशा प्रणाम किये जाने वाली, स्तुति किये जाने वाली तुलसी ! तू ब्रह्मा के आनन्दाश्रुओं से उत्पन्न है तथा वृन्दावन में निवास करने वाली है । हे सभी अंगों-अवयवों से पूर्ण ! तथा तुलस्युपनिषद् की रस रूप हे कल्याणी ! तू मुझे महापाप के दुस्तर समुद्र से उबार ले । सभी पापों की प्रायश्चित्तभूत तू ही है । तू देवताओं, ऋषियों तथा पितरों की सदा ही अत्यन्त प्रिय है । जो भी ब्राह्मण बिना तुलसी के प्रयोग किये श्राद्ध करते हैं वह श्राद्ध व्यर्थ हो जाता है तथा पितरों को प्राप्त नहीं होता । यदि कोई तुलसी को छोड़कर (अर्थात् पूजा की वस्तुओं में न रखकर ) पूजन करता है तो वह पूजा आसुरी कही जाती है तथा वह पूजा विष्णु को प्रसन्न करने वाली नहीं होती । यज्ञ, दान, जप, तीर्थ श्राद्ध, देवताओं का पूजन, तर्पण तथा मार्जन तथा अन्य भी इसी प्रकार के धार्मिक कृत्य तुलसी के बिना नहीं करने चाहिए । तुलसी की लकड़ी के मनकों वाली माला सभी इच्छित वस्तुओं की साधिका है । जो कोई ब्राह्मण इस तथ्य को नहीं जानता वह चाण्डाल के समान अथवा उससे भी अधिक नीच है । इत्याह भगवान् ब्रह्माणं नारायणः, ब्रह्मा नारदसनका- दिभ्यः, सनकादयो वेदव्यासाय, वेदव्यासः शुकाय, शुको वाम- देवाय, वामदेवो मुनिभ्यः मुनयो मनुष्यः प्रोचुः । य एवं वेद स स्त्रीहत्यायाःप्रमुच्यते । स वीरहत्यायाः प्रमुच्यते । स ब्रह्म-

तुलस्युपनिषत् [ ५३३ हत्यायाः प्रमुच्यते । स महाभयात् प्रमुच्यते । स महादुःखात् प्रमुच्यते । देहान्ते वैकुण्ठमवाप्नोति वैकुण्ठमवाप्नोति । इत्युपनिषत् ॥ यह सब भगवान् नारायण ने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने नारद सन- कादियों को, सनकादि ने वेदव्यास को, वेदव्यास ने शुकदेवजी को, शुकदेव ने वामदेव को, वामदेव ने अन्य मुनियों की तथा मुनियों ने मनुष्यों को कहा। जो इसको ( तथ्य को ) जानता है वह स्त्री-हत्या से मुक्त हो जाता है। वह वीरहत्या से मुक्त हो जाता है। वह ब्रह्महत्या, महा-भय, महा-दुःख आदि से भी छूट जाता है और शरीर समाप्ति पर निश्चित वैकुण्ठ में वास प्राप्त कर लेता है। ॥ तुलस्युपनिषद् समाप्त ॥ —०—

सूर्योपनिषत्

ॐ भद्रं कर्णेभिःशृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्ता- क्ष्यो अरिष्टनेमिः ॥ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।

हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें । महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करें, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांति, शांति, शांति ॥

हरिः ॐ । अथ सूर्याथर्वाङ्गिरसं व्याख्यास्यामः । ब्रह्मा ऋषिः गायत्री छन्दः । आदित्यो देवता । हंसः सोऽहमग्निनारा- यणयुक्तं बीजम् । हृल्लेखा शक्तिः । वियदादिसर्गसंयुक्तं कीलकम् । चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थे विनियोगः । षट्स्वरारूढेन बीजेन षडङ्गं रक्ताम्बुजसंस्थितं सप्ताश्वरथिनं हिरण्यवर्णं चतु- भुजं पद्मद्वयाभयवरदहस्तं कालचक्रप्रणोतारं श्रीसूर्यनारायणं य एवं वेद स वै ब्राह्मणः ॥ १ ॥

ॐ भूर्भुवः सुवः । तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ २ ॥

नारायणोपनिषत् ] [ ५३५ ॐ । पुरुष रूप नारायण ने कामना की कि प्रजा की सृष्टि होनी चाहिये । तब नारायण में से प्राण की उत्पत्ति हुई, और मन तथा सब इन्द्रियों की उत्पत्ति भी उन्हीं से हुई । आकाश, वायु, ज्योति, जल और पृथ्विी, जो विश्व को धारण करती है, इन सब पञ्च भूतों की उत्पत्ति भी नारायण से हुई । नारायण से ही ब्रह्माजी उत्पन्न हुये, नारायण से रुद्र की उत्पत्ति हुई । नारायण से इन्द्र उदन्न हुये । नारायण से प्रजा- पति उत्पन्न हुये । नारायण से ही बारह आदित्य, रुद्र, आठ वसु और सब प्रकार के छन्दों की उत्पत्ति हुई । ये नारायण में से ही आते हैं और उसी में लय को प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद के इस शिरोमण ( श्रेष्ठ अङ्ग ) का विद्वान अध्ययन करते हैं ॥ १ ॥ नारायण नित्य रूप है, नारायण ब्रह्मा रूप है, नारायण शिव रूप है, नारायण चक्र रूप है, नारायण काल रूप है, नारायण दिशा रूप है, नारायण विदिशा रूप है, नारायण ही ऊपर है, नारायण ही नीचे है, नारायण ही भीतर और बाहर है । जो कोई उत्पन्न हुआ है, और उत्पन्न होगा वह सब नारायण रूप ही है । एक मात्र नारायण ही निष्कलङ्क, निरंजन, निर्विकल्प, निराख्यात ( वर्णन से रहित ) और शुद्ध देव है, इनके अतिरिक्त और कहीं कोई नहीं है । जो इस प्रकार जानता है वह विष्णुरूप हो जाता, वह विष्णु के समान हो जाता है। विद्वान लोग यजुर्वेदोक्त इस श्रेष्ठ तत्व का अध्ययन करते हैं ॥ २ ॥ ॐ मित्यग्रे व्याहरेत् । नम इति पश्चात् । नारायणा- येत्युपरिष्टात् । ॐ मित्येकाक्षरम् ॥ नम इति द्वे अक्षरे । नारायणायेति पञ्चाक्षराणि । एतद्वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदम् । यो ह वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदमध्येति । अनपब्रुवः सर्वमामु- रेति । विन्दते प्राजापत्यं रायस्पोषं गौपत्यं ततोऽमृतत्वमश्नुते ततोऽमृतत्वमश्नु इति । एतत्सामवेदशिरोऽधीते ॥ ३ ॥ प्रत्यगा- नन्दं ब्रह्मपुरुषं प्रणवस्वरूपम् । अकार उकारो मकार इति ।

५३६ ] [ नारायणोपनिषत् ता अनेकधा समभवत्तदेतदोमिति वमुक्त्वा मुच्यते योगी जन्म- संसारबन्धनात् । ॐ नमो नारायणायेति मन्त्रोपासको वैकुण्ठ- भुवनं गमिष्यति । तदिदं पुण्डरीकं विज्ञानघनं तस्मात्तडिदाभ- मात्रम् । ब्रह्मण्यो देवकीपुत्रो ब्रह्मण्यो मधुसूदनः । ब्रह्मण्यः पुण्डरीकाक्षो ब्रह्मण्यो विष्णुरच्युत इति । सर्वभूतस्थमेकं वै नारायणं कारणपुरुष मकारणं परं ब्रह्मोम् । एतदथर्वशिरोऽधी- ते ॥ ४॥ प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायम- धीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति । तत्सायं प्रातरधीयानो पापोऽपापो भवति । मध्यंदिनमादित्याभिमुखोऽधीयानः पञ्च- महापातकोपपातकात्प्रमुच्यते । सर्ववेदपरायणपुण्यं लभते । नारायणसायुज्यमवाप्नोति श्रीमन्नारायणसायुज्यमवाप्नोति य एवं वेद । आरम्भ में 'ॐ' का उच्चारण करना, उसके पीछे नमः उच्चारण करना, और अन्त में 'नारायणेति' का उच्चारण करना । 'ॐ' में एक अक्षर है, 'नमः' में दो अक्षर हैं, और 'नारायणेति' में पाँच अक्षर हैं। इस प्रकार यह नारायण का आठ अक्षर का मन्त्र होता है, इसका जप और ध्यान करने से मनुष्य अकालमृत्यु से बचकर पूर्ण आयु को भोगता है । उसे प्रजा ( स्त्री पुत्र आदि ), धन सम्पत्ति की और गौ आदि पशुओं की प्राप्ति होती है । अन्त में वह अमृतत्व को प्राप्त होता है । सामवेद के इस शिरोभाग का विद्वज्जन अध्ययन करते हैं । 'अ'कार, 'उ'कार और 'म'कार युक्त यह प्रत्यक् (ॐ) आनन्द रूप, ब्रह्मपुरुष रूप और प्रणव स्वरूप है । यह अनेक प्रकार से सम- मात्रा है, इसको 'ॐ' करते हैं और इसके जप से योगीजन संसार के समस्त बन्धनों और बार-बार जन्म लेने से छूट जाते हैं । 'ॐ नमो नारायणेति' इस मन्त्र की उपासना करने वाला वैकुण्ठ धाम को जाता

नारायणोपनिषत् [ ५३७ है। यह पुण्डरीक (हृदय रूपी कमल) विज्ञान रूप है, इससे विद्युत की आभा प्रकट होती है। ब्रह्म को ही देवकी पुत्र कहा जाता है, वे ही मधुसूदन हैं, वे ही पुण्डरीकाक्ष हैं और वे ही विष्णु तथा अच्युत हैं। सर्व प्राणी मात्र में वे ही नारायण रहते हैं, वे कारण पुकार होते हुए भी कारण रहित हैं, वे ही परब्रह्म हैं। विद्वान लोग अथर्व वेद से इस शिरोभाग (सार भाग) का अध्ययन करते हैं ॥ ४ ॥ प्रातः समय इस मन्त्र का जप करने से रात्रि में जो पाप किये हों वे सब नष्ट हो जाते हैं और इसी प्रकार सायंकाल को जप करने से दिन के पाप दूर होते हैं। इस प्रकार प्रातः और सायं इसका जप करने से मनुष्य निष्पाप हो जाता है। दिन के मध्य (दोपहर) को सूर्य के सम्मुख इसका जप करने से पंच महापातकों और उपपातकों से छुटकारा हो जाता है। उसे सब वेदों के परायण का फल प्राप्त होता है और नारायण का सायुज्य प्राप्त होता है। इस प्रकार जानने से नारायण से साक्षात्कार होता है ॥ ५ ॥ ॥ नारायणोपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—

नारायणोपनिषत्

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सहवीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। ब्रह्म हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ ही रक्षा करो, हम दोनों का साथ ही पालन करो, हम दोनों एक साथ ही पराक्रम करें, हम दोनों का अध्ययन पराक्रमी हो, दोनों किसी का द्वेष न करें। ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥

ॐ अथ पुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत प्रजाः सृजेयेति। नारायणात्प्राणो जायते। मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्ज्यो- तिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणीं। नारायणाद्ब्रह्मा जायते। नारायणद्रुद्रो जायते। नारायणादिन्द्रो जायते। नारायणात्प्र- जापतिः प्रजायते। नारायणाद्द्वादशादित्या रुद्रा वसवः सर्वाणि छन्दासि नारायणादेव समुत्पद्यन्ते। नारायणात्प्रवर्तन्ते। नारायणे प्रलीयन्ते। एतदृग्वेदशिरोऽधीते ॥१॥ अथ नित्यो नारायणः। ब्रह्मा नारायणः। शिवश्च नारायणः। शक्रश्च नारायणः। कालश्च नारायणः दिशश्च नारायणः। विदिशश्च नारायणः। ऊर्ध्वं च नारायणः। अधश्च नारायणः। अन्त- र्बहिश्च नारायणः। नारायण एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्। निष्कलङ्को निरञ्जनो निर्विकल्पो निराख्यातः शुद्धो देव एको नारायणो न द्वितीयोऽस्ति कश्चित्। य एवं वेद स विष्णुरेव भवति स विष्णुरेव भवति। एतद्यजुर्वेदशिरोऽधीते ॥२॥

सूर्योपनिषत् [ ५३६ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च । सूर्याद्वै खल्विमानि भूतानि जायन्ते । सूर्याद्यज्ञः पर्जन्योऽन्नमात्मा ॥ ३ ॥ नमस्त आदित्य । त्वमेव प्रत्यक्षं कर्मकर्ताऽसि । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्माऽसि । त्वमेव प्रत्यक्षं विष्णुरसि । त्वमेव प्रत्यक्षं रुद्रोऽसि । त्वमेव प्रत्यक्षमृगसि । त्वमेव प्रत्यक्ष यजुरसि । त्वमेव प्रत्यक्षं सामासि । त्वमेव प्रत्यक्षमथर्वाऽसि । त्वमेव सर्वं छन्दोऽसि ॥ ४ ॥ • आदित्याद्वायुर्जायते । आदित्याद्भूमिर्जायते । आदित्य- दापो जायन्ते । आदित्याज्ज्योतिर्जायते । आदित्याद्व्योम दिशो जायन्ते । आदित्याद्देवा जायन्ते । आदित्याद्वेदा जायन्ते । आदित्यो वा एष एतन्मण्डलं तपति । असावादित्यो ब्रह्म । आदित्योऽन्तःकरणमनोबुद्धिचित्ताहङ्काराः । आदित्यो वै व्यानः समानोदानोऽपानः प्राणः । आदित्यो वै श्रोत्रत्वक्चक्षूरसन- घ्राणः । आदित्यो वै वाक्पाणिपादपायूपस्थाः । आदित्यो वै शब्दस्पर्शरूप रसगन्धाः । आदित्यो वै वचनादानागमनविसर्गा- नन्दाः । आनन्दमयो विज्ञानमयो विज्ञानमय आदित्यः ॥ ५ ॥ अब सूर्य-सम्बन्धी अथर्ववेदीय मन्त्रों की व्याख्या की जाती है । इस मन्त्र के ऋषि ब्रह्मा, छन्द गायत्री, देवता सूर्य हैं । 'हंसः' 'सोऽहं' अग्निनारायण युक्त बीज तथा हृल्लेखा शक्ति है । कीलक वियत् आदि सृष्टि से संयुक्त है । इसका विनियोग चारों प्रकार की पुरुषार्थ-सिद्धि में करते हैं । छः स्वरों पर प्रतिष्ठित बीज सहित षडाङ्ग रक्तकमल पर स्थित, सात अश्वों से युक्त रथ पर आरूढ़, हिरण्यवर्ण, चार भुजाओं में दो कमल, वरमुद्रा और अभयमुद्राधारी कालचक्र के विधायक सूर्य को इस भांति जानने वाला ही ब्राह्मण है, ॥ १ ॥ जो सूर्य नारायण प्रणव के अर्थभूत सत्-चित्-आनन्दमयं तथा भूः भुवः स्वः रूप से त्रैलोक्य रूप

५४० ] [ सूर्योपनिषत्

हैं, उन्हीं विश्व-रचयिता के महान् तेज का हम चिन्तन करते हैं। वे भगवान हमारी बुद्धियों के प्रेरक हैं ॥ २ ॥ सूर्य सम्पूर्ण स्थावर जङ्गम के आत्मा हैं। इन्हीं से इन भूतों की उत्पत्ति होती है। उन्हीं से यज्ञ, मेघ और आत्मा आविर्भूत होते हैं ॥ ३ ॥ हे आदित्य ! हम तुम्हें नम- स्कार करते हैं। तुम्हीं कर्म और कर्त्ता हो, तुम्हीं ब्रह्मा और विष्णु हो। तुम्हीं रुद्र एवं ऋक्, यजु, साम और अथर्व हो। तुम सम्पूर्ण छन्द रूप हो ॥ ४ ॥ आदित्य से वायु, भूमि, जल, ज्योति, आकाश और दिशाएँ उत्पन्न होती हैं। उन्हीं से देवता प्रकट होते हैं। उन्हीं से वेदों की उत्पत्ति है। इस ब्रह्माण्ड को आदित्य ही तपाते हैं। वही ब्रह्म हैं। वही अन्तःकरण रूप हैं। वही पाँचों प्राण के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वही पंचेन्द्रिय के रूप में कार्य करते हैं। वही पंच कर्मेन्द्रिय हैं। ज्ञानेन्द्रियों के पञ्च विषय भी वही हैं। कर्मेन्द्रियों के पाँच विषय आदित्य ही हैं। वे ही ज्ञान-विज्ञान से युक्त एवं आनन्दमय हैं ॥ ५ ॥

नमो मित्राय भानवे मृत्योर्मा पाहि। भ्राजिष्णवे विश्व- हेतवे नमः । सूर्याद्भवन्ति भूतानि सूर्येण पालितानि तु । सूर्ये लयं प्राप्नुवन्ति यः सूर्यः सोऽहमेव च ॥ चक्षुर्नो देवः सविता चक्षुर्न उत पर्वतः । चक्षुर्धाता दधातु नः ॥ आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि । तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् । सविता पुरस्तात् सविता पश्चात्तात् सवितोत्तरात्तात् सविताऽधरात्तात् । सविता नः सुवतु सर्वतातिं सविता नो रासतां दीर्घमायुः ॥६

यः सदाऽहरहर्जपति स वै ब्राह्मणो भवति स वै ब्राह्मणो

सूर्योपनिषत् [ ५४१ ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म । घृणिरिति द्वे अक्षरे । सूर्य इत्यक्षरद्वयम् । आदित्य । इति त्रीण्यक्षराणि । एतस्यैव सूर्यस्याष्टाक्षरो मनुः ॥७॥ यः सदाऽहरहर्जपति स वै ब्राह्मणो भवति स वै ब्राह्मणो भवति । सूर्याभिमुखो जप्त्वा महाव्याधिभयात् प्रमुच्यते । अलक्ष्मीर्नश्यति । अभक्ष्यभक्षणात् पूतो भवति । अगम्यागमनात् पूतो भवति । पतितसंभाषणात् पूतो भवति । असत्संभाषणात् पूतो भवति । मध्याह्ने सूर्याभिमुखः पठेत् । सद्योत्पन्नपञ्चमहा- पातकात् प्रमुच्यते । सैषा सावित्री विद्यां (द्या) न किंचिदपि न कस्मैचित् प्रशंसयेत् । य एतां महाभागः प्रातः पठति स भाग्यवान् जायते । पशून् विन्दति । वेदार्थं लभते । त्रिकाल- मेतज्जप्त्वा ऋतुशतफलमवाप्नोति । हस्तादित्ये जपति स महामृत्युं तरति स महामृत्युं तरति य एवं वेद । इत्युपनिषत् ।८। मित्र देवता और भगवान् सूर्य को नमस्कार है। भगवन् ! मृत्यु से मेरी रक्षा करो ! विश्व के कारण रूप एवं तेजस्वी सूर्य को नमस्कार है । सूर्य से ही सब चराचर प्राणियों की उत्पत्ति है । वे ही उनका पालन करते हैं तथा अन्त में सब जीव उन्हीं में लीन हो जाते हैं। जो सूर्य हैं, वही मैं हूँ। सविता देव हमारे चक्षु हैं। सब के धारण करने वाले सूर्य हमारे नेत्रों को देखने की शक्ति प्रदान करने वाले बनें । 'हम आदित्य को जानते हैं। इस सहस्ररश्मि वाले भगवान् भास्कर का ध्यान करते हैं। वे सूर्य हमें प्रेरणा दें।' पीछे-आगे, इधर-उधर सब ओर सविता देव हैं । वे सविता देव हमारे निमित्त सब कुछ उत्पन्न करें। वे हमें दीर्घायु दें। ॐ रूप एकाक्षर मन्त्र ब्रह्म है। 'घृणि' और 'सूर्य' दो-दो अक्षरों के मन्त्र हैं। 'आदित्य' में तीन अक्षर हैं। इन सब के योग से सूर्य नारायण का अष्टाक्षर महामन्त्र हो जाता है ॥ ७ ॥ इस

५४२ ] [ सूर्योपनिषत् मन्त्र को नित्य प्रति जपने वाला ब्रह्मज्ञानी होता है। सूर्य की ओर मुख करके जाप करने से घोर रोग से छुटकारा मिलता है। दरिद्रता दूर होती और पाप नष्ट होते हैं। मध्याह्न काल में सूर्याभिमुख जप करने से हाल में उत्पन्न हुए पञ्च महापापों से मुक्त होता है। इस सावित्री विद्या की कहीं कुछ प्रशंसा न करे। प्रातःकाल पाठ करने वाले की भाग्यवृद्धि होती है। उसे पशु, धन आदि के साथ ही वेदार्थ ज्ञान की उपलब्धि होती है। त्रिकाल जप से सैकड़ों यज्ञों का फल मिलता है। सूर्य के हस्त नक्षत्र पर रहते हुए इसका जप करने वाला महामृत्यु से पार होता है तथा इस प्रकार जानने वाला भी महामृत्यु को लाँघ जाता है। ॥ सूर्योपनिषद् समाप्त ॥

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भावनोपनिषत्

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्ताक्षर्यो अरिष्टनेमिः ॥ स्वति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥ शान्तिपाठ—हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आंखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें। महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांति, शांति, शांति ॥ श्री गुरुः परम कारणभूता शक्तिः ॥ १ ॥ केन ! नवरन्ध्ररूपो देहो नवशक्तिमयं श्रीचक्रम् । वाराही पितृरूपा कुरुकुल्ला बली देवता माता । पुरुषार्थाः सागराः । देहो नवरत्नद्वीपः । आधारनवमुद्राः शक्तयः । त्वगादिसप्तधातुभिरनेकैः संयुक्ताः संकल्पा कल्पतरवः । तेजः कल्पकोद्यानम् । रसनया भाव्यमाना मधुराम्लतिक्तकटुकषायलवणरसा षडृतवः । क्रिया- शक्तिः पीठम् । कुण्डलिनी ज्ञानशक्तिर्गुहम् । इच्छाशक्तिर्महात्रि- पुरसुन्दरी ज्ञाता होता । ज्ञानमर्घ्यम् ज्ञेयं हविः । ज्ञातृज्ञान- ज्ञेयानामभेदभावनं श्रीचक्रपूजनम् । नियतिसहितशृङ्गारादयो नव रसा अणिमादयः । कामक्रोधलोभमोहमात्सर्यपुण्यपापमया

Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

५४४ ] [ भावनोपनिषत् ब्राह्माद्यष्टशक्तयः । पृथिव्यापस्तेजोवाय्वाकाशश्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वा- घ्राणवाक्पाणिपादपायूपस्थविकाराः षोडश शक्तयः । वचनादान- गमनविसर्गानन्दहानोपादानोपेक्षाबुद्धयोऽनङ्गकुसुमादिशक्तयोऽष्टौ । अलम्बुसा कुहूविश्वोदरी वरुणा हस्तिजिह्वा यशस्वत्यश्विनी गान्धारी पूषा शङ्खिनी सरस्वतीडा पिङ्गला सुषुम्ना चेति चतुर्दश नाड्यः सर्वसंक्षोभिण्यादिचतुर्दशारदेवताः । प्राणापानव्यानोदान- समाननागकूर्मकृकरदेवदत्तधनंजया दश वायवः सर्वसिद्धि प्रदाऽऽ- दिवहिर्दशारदेवताः । एतद्वायुतशसंसर्गोपाधिभेदेन रेचकपूरकशो- षकदाहकपावका अमृतमिति प्राणमुख्यत्वेन पञ्चविधोऽस्तिं । मनुष्याणां मोहको देहको भक्ष्यभोज्यलेह्यचोष्यपेयात्मकं चतुर्विध- मन्नं पाचयंति । एता दश धनकलाः सर्वज्ञत्वाद्यन्तर्दशारदेवताः । शीतोष्णसुखदुःखेच्छासत्वरजस्तमोगुणा वशिन्यादिशक्तयोऽष्टौ । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः पञ्चतन्मात्राः पञ्च पुष्पबाणा मन इक्षु- धनुः । वश्यो बाणो रागः पाशो द्वेषोऽङ्कुशः । अव्यक्तमहत्तत्वा- हंकारकामेश्वरीवज्रेश्वरीभगमालिन्योऽन्तस्त्रिकोणाग्रगा देवताः । पञ्चदशतिथिरूपेण कालस्य परिणामावलोकनं पञ्चदश नित्या श्रद्धाऽनुरूपाधिदेवता । तयोः कामेश्वरी सदानन्दघना पूर्णा स्वात्मैक्यरूपा देवता ॥ २ ॥ श्री गुरु ही सर्व प्रधानभूत शक्ति हैं । (गुरु शब्द का अर्थ है गु अर्थात् अपने अज्ञान को रु अर्थात् अपने ज्ञान से जो नष्ट करदे ।) (इन्हीं की कृपा से ईशत्व की प्राप्ति होती है)। १। किस कारण से देह में श्रीचक्रत्व सिद्ध होता है ? नौ छेदों से युक्त शरीर है और विमल से लेकर ईशान तक नौ शक्तियों से युक्त श्रीचक्र है। इसकी माता कुरु कुल्ला देवी तथा वाराही पिता के रूप में हैं। पुरुषार्थ उद्योग (परिश्रम) चारों पुरुषार्थ, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ही इसके चार समुद्र हैं । देह ही नवरत्न द्वीप है। इस द्वीप की आधारभूत शक्तियाँ योनिमुद्रा आदि